Chronological Quran : 15th Year of Revelation
[July 05, 623 AD --- June 23, 624 AD] / 2 AH
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : पंद्रहवें वर्ष में उतरी आयतें
[1 मुहर्रम/ 2 हिजरी ----- 30 ज़ुल हिज्जा/ 2 हिजरी] हिजरत के बाद मदीना में दूसरा साल सूरह/ Surah 8 : अल-अनफ़ाल /Al-Anfal
[युद्ध में हाथ आया माल/ Battle Gains]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।
[ऐ रसूल] वे आप से युद्ध में हाथ आ गये माल (के बंटवारे) के बारे में पूछते हैं। कह दें, "उस (माल के बंटवारे) का मामला तो अल्लाह और उसके रसूल का है, अतः अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो और आपस में मामलों को ठीक रखा करो। अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो : (1)
सच्चे ईमानवाले तो वह लोग हैं कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल मारे डर के काँप उठते हैं, और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वह उनके ईमान को और बढ़ा देती हैं, और जो हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखते हैं, (2)
जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (एक हिस्सा) दूसरों को भी देते हैं। (3)
यही वे लोग हैं जो सचमुच ईमानवाले हैं। उनके रब के यहां उनका बड़ा ऊंचा दर्जा है, उनके लिए वहां (गुनाहों की) माफ़ी है, और दिल खोलकर दी जानेवाली रोज़ी है।” (4)
(युद्ध में हाथ आए माल के बंटवारे पर बातें हो रही हैं, मगर असल में) वह तो आपका रब था जिसने एक सच्चे मक़सद के लिए [ऐ रसूल], आपको अपने घर से बाहर (बद्र नाम की जगह) निकल पड़ने पर मजबूर किया था ----- हालांकि ईमानवालों में से एक गिरोह ने इसे पसंद नहीं किया था। (5)
वे (अल्लाह की तरफ़ से जीत की) सच्चाई स्पष्ट हो जाने के बाद भी आप से बहस व विवाद करते रहे, मानो वे अपनी आँखों से देख रहे थे कि उन्हें मौत के मुँह में ढकेला जा रहा हो। (6)
(ईमानवालोे!), याद करो कि किस तरह अल्लाह ने तुमसे वादा किया था कि दो गिरोहों [मक्का के व्यापारियों का कारवाँ और मक्का की सेना] में से एक तुम्हारे हाथ ज़रूर आ जाएगा : तुम चाहते थे कि वह (गिरोह) तुम्हारे हाथ आ जाए, जो निहत्था गिरोह [व्यापारियों का कारवाँ] हो, मगर अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों के मुताबिक़ सच्चाई को मज़बूती से क़ायम कर दे, और विश्वास करने से इंकार करनेवालों की जड़ काट कर रख दे---- (7)
ताकि सच को सच और झूठ को झूठ साबित कर के दिखा दे, चाहे अपराधियों को ये कितना ही बुरा लगे। (8)
याद करें जब आपने अपने रब से (बद्र की लड़ाई के समय) मदद के लिए फ़रियाद की थी, उसने आपकी पुकार सुनते हुए कहा, "मैं एक हजार फ़रिश्तों से (लड़ाई में) आपकी मदद करूँगा जो एक के बाद एक आएंगे।" (9)
अल्लाह ने यह इसलिए किया कि (लोगों में) आशा का संदेश फैल जाए और इससे तुम्हारे दिलों में फिर से यक़ीन पैदा हो जाए : मदद तो केवल अल्लाह ही की तरफ़ से होती है, वह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)
याद करो जब अल्लाह ने तुम्हारी बेचैनी दूर करने के लिए (बद्र की लड़ाई से एक रात पहले) तुम्हें नींद दी, आसमान से तुम पर पानी बरसाया ताकि तुम साफ़-सुथरे हो सको, तुम्हारे अंदर की शैतानी गंदगियाँ दूर हो जाएं, तुम्हारे दिलों को मज़बूत बना दें और तुम्हारे पाँव (मज़बूती से) जमा दें। (11)
याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों को 'वही' (Revelation) द्वारा कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ : तुम ईमानवालों के क़दम मज़बूती से जमाए रखो; मैं विश्वास न करनेवालों के दिलों में डर बैठा दूंगा -----तुम उनकी गर्दनों के ऊपर वार करो, और उनकी अंगुलियों की पोर-पोर पर हमला करो।" (12)
यह इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया था, और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे, तो उसे अल्लाह बहुत कठोर यातना देता है------ (13)
“यह है जो तुम्हें मिला है! अब चखो मज़ा!” ----- और (जहन्नम की) आग की यातना (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करनेवालों के इंतिज़ार में है। (14)
ईमानवालो, जब विश्वास न करनेवाले हमला कर दें और युद्ध में तुम्हारा उनके साथ सामना हो, तो कभी भी उन्हें पीठ न दिखाओ : (15)
अगर कोई भी ऐसे मौक़े पर पीठ दिखाता है ------ तो यह (पीठ दिखाना) अगर युद्ध में एक चाल के रूप में हो या दूसरी टुकड़ी से जा मिलने के लिए हो, तो और बात है----- नहीं तो वह अल्लाह के ग़ुस्से का भागी होगा, और जहन्नम उसका ठिकाना होगा, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह! (16)
फिर क्या तुम ने (युद्ध में) उनका क़त्ल किया?, नहीं, बल्कि अल्लाह ने उन्हें क़त्ल किया, और [ऐ रसूल!], आप ने जब (जंग के मैदान में) उनकी ओर (एक मुट्ठी बालू) फेंका, तो असल में आप ने (वह बालू) नहीं फेंका था (जिससे उनकी हार हुई), बल्कि वह अल्लाह ने फेंका था, ताकि वह ईमानवालों पर अपना ख़ास करम [favour] कर सके : अल्लाह हर बात को सुननेवाला, हर चीज़ को जाननेवाला है -------- (17)
"यह सब कुछ तो हो चुका"----- और यह (जान लो) कि अल्लाह इंकार करनेवालों के हर मंसूबे को कमज़ोर कर देनेवाला है। (18)
[ऐ मक्का के विश्वास करने से इंकार करनेवालो], अगर तुम फ़ैसला चाहते थे, तो (बद्र के युद्ध में हार कर) फ़ैसला अब तुम ने देख लिया है : अगर तुम (लड़ाइयों से) यहीं रुक जाओ, तो यह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा होगा। अगर तुम (गुनाहों की तरफ़) फिर से मुड़े, तो हम भी (सज़ा देने की ओर) मुड़ेंगे, और तुम्हारा जत्था, चाहे वह (गिनती में) कितना ही बड़ा हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। अल्लाह ईमान रखनेवालों के साथ है। (19)
ईमानवालो, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो : जब उनकी (सच्चाई की) बातें सुन रहे हो, तो मुँह न फेर लिया करो; (20)
और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने (अपने मुँह से) कहा था, "हमने सुना," हालाँकि वे सुन नहीं रहे थे----- (21)
अल्लाह की नज़र में सबसे बुरा प्राणी वह है जो (जान-बूझकर) गूँगा- बहरा बना रहता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेता। (22)
अगर अल्लाह यह जानता कि उनमें कुछ भी अच्छाई है, तो वह उन्हें सुनने की शक्ति ज़रूर देता, लेकिन अगर अल्लाह ने उन्हें (सुनने की) शक्ति दे दी होती, तब भी, उन्होंने इस पर कोई ध्यान न दिया होता, और मुँह फेर कर भाग गए होते। (23)
ईमानवालो, अल्लाह और उसके रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाए जो तुम्हें (रुहानी मौत की हालत से निकालकर) ज़िंदा कर दे. जान लो कि आदमी और उसके दिल (की इच्छाओं) के बीच (मौत के रूप में) अल्लाह आ जाता है, और फिर (अंत में) उसी के सामने तुम सब इकट्ठा किए जाओगे। (24)
उस विवाद से बचते रहो, जो अगर उठा, तो उसकी लपेट में केवल वही नहीं आएंगे जो तुम्हारे बीच अत्याचार करने वाले हैं : जान लो अल्लाह (बुरे कर्मों के लिए) दंड देने में बहुत कठोर है। (25)
याद करो (मक्का में) जब तुम गिनती में बहुत थोड़े थे, ज़मीन पर दबे हुए थे, डरे-सहमे रहते थे कि कहीं लोग तु्म्हें उचक कर न ले जाएं, पर अल्लाह ने (मदीना में) तुम्हें ठिकाना दिया, और अपनी मदद से तुम्हें मज़बूती दी, तुम्हें अच्छी चीज़ों की रोज़ी दी, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा करो। (26)
ऐ ईमान रखनेवालो!, तुम अल्लाह और उसके रसूल को धोखा न दो, या जानते-बूझते (किसी और के) भरोसे को न तोड़ो। (27)
जान लो, कि तुम्हारे माल और बाल-बच्चे तो केवल तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए हैं, और (यह न भूलो कि) अल्लाह के पास बड़ा ज़बरदस्त इनाम है। (28)
ईमानवालो, अगर तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहे, तो वह तुम्हें (सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ करने की) शक्ति देगा और तुम से तुम्हारी बुराइयाँ मिटा देगा, और तुम्हें माफ़ कर देगा: अल्लाह का करम करना सचमुच बड़ी चीज़ है। (29)
(ऐ रसूल!), याद करें जब विश्वास न करनेवालों ने (मक्का में) आपको क़ैद कर लेने, जान से मार देने, या (देश से) निकाल बाहर करने की साज़िश रची थी। उन लोगों ने अपनी योजना बनायी थी और अल्लाह ने अपनी : (याद रहे!) अल्लाह योजना बनाने में सबसे अच्छा है। (30)
जब कभी उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे कहते है, "हम यह सब पहले भी सुन चुके हैं---- अगर चाहें, तो इस तरह की बातें हम भी कह सकते हैं ----- यह और कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (31)
उन लोगों ने यह भी कहा था, "ऐ अल्लाह! अगर सचमुच यह तेरी तरफ़ से सच्चाई की बातें हैं, तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दर्दनाक यातना ही भेज दें।” (32)
मगर (ऐ रसूल), जब तक आप उनके बीच मौजूद हैं, अल्लाह उन लोगों पर कोई यातना नहीं भेजेगा, और न ही उन्हें सज़ा देगा, जबकि उनमें से (कुछ अपने गुनाहों की) माफ़ी मांग रहे हों, (33)
लेकिन, (आप के मक्का छोड़ कर जाने के बाद) अल्लाह की ओर से अब उन्हें क्यों न सज़ा दी जाए, जबकि वे लोगों को पवित्र 'मस्जिद’ [काबा] जाने से रोकते हैं, हालाँकि वे उसके कोई (क़ानूनी) देखरेख करनेवाले नहीं हैं? उसकी असल देखरेख करनेवाले तो केवल वही हो सकते हैं, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, मगर ज़्यादातर विश्वास न करनेवाले इस बात को नहीं समझते। (34)
उस पवित्र घर [काबा] के पास उनकी नमाज़ तो बस सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होतीं। “अतः विश्वास न करने के नतीजे में अब यातना का मज़ा चखो।” (35)
वे लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकने के लिए अपना धन ख़र्च करते हैं, और वे आगे भी ऐसा करते रहेंगे। अंत में यही उनके बड़े दुःख व पछतावे का कारण बनेगा : उन पर क़ाबू पा लिया जाएगा और उन्हें जहन्नम की ओर हंका कर ले जाया जाएगा। (36)
अल्लाह अच्छों में से बुरे को छाँटकर अलग कर देगा, और बुरों को एक के ऊपर एक रख देगा---- एक साथ ऊपर तक ढेर बना कर ---- फिर उन्हें जहन्नम में डाल देगा। यही लोग हैं जो घाटे में रहेंगे। (37)
(ऐ रसूल), आप विश्वास न करनेवालों से कह दें कि अगर वे पहले की गयी हरकतों को छोड़ दें, तो जो कुछ पहले हो चुका, उसे माफ़ कर दिया जाएगा, लेकिन अगर वे वही करते रहेंगे, तो फिर उनसे पहले गुज़र चुके लोगों का नतीजा क्या हुआ, वह उनके सामने है। (38)
[ईमानवालो!], उन लोगों से उस वक़्त तक युद्ध करते रहो, जब तक कि कोई जुल्म व अत्याचार बाक़ी न रहे, और (पवित्र काबा में) होनेवाली सारी इबादतें केवल एक अल्लाह के लिए हो जाएं : अगर वे बुराइयों को छोड़ दें, तो जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह की नज़रों से छिपा नहीं है, (39)
लेकिन अगर वे इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देते, तो यक़ीन रखो कि अल्लाह तुम्हारा रखवाला है, और वह सबसे अच्छा रखवाला, और सबसे अच्छा मददगार है। (40)
यह बात जान लो कि युद्ध के बाद जो माल हाथ आ जाए, उसका पाँचवाँ हिस्सा अल्लाह और उसके रसूल का, उनके नज़दीकी रिश्तेदारों और यतीमों का, ज़रूरतमंदों और मुसाफ़िरों का है (जिसे अदा करना ज़रूरी है)। अगर तुम अल्लाह पर और उस (फ़रिश्तों से की गयी मदद) पर यक़ीन रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर 'फ़ैसला कर देनेवाले दिन' उतारी थी, जिस दिन दोनों सेनाएं (बद्र के) युद्ध में टकरायी थीं. (याद रहे!) सारी चीज़ें अल्लाह के क़ाबू में हैं। (41)
याद करो जब तुम घाटी के नज़दीक वाले छोर पर थे, उधर (मक्का से आती हुई सेना के) दुश्मन घाटी के दूर वाले छोर पर थे और (मक्का के व्यापारियों का) कारवाँ तुमसे नीचे की ओर था (जो समंदर के किनारे किनारे निकल गया था)। अगर तुम ने युद्ध करने का समय पहले से तय किया होता, तो तुम (विवाद के चलते) ज़रूर युद्ध न कर पाते, [मगर वह युद्ध हुआ] इसलिए कि अल्लाह ने जिस बात का होना पहले से तय कर रखा था, वह बात सामने आ सके, ताकि जिन्हें मरना लिखा था, वे स्पष्ट प्रमाण देखकर मर सकें, और जिन्हें ज़िंदा रहना था, वे भी स्पष्ट़ प्रमाण देखकर ज़िंदा रहें -----अल्लाह सब (की) सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (42)
[ऐ रसूल], याद करें जब अल्लाह ने आपको ख़्वाब में उन (दुश्मनों) की संख्या कम कर के दिखायी : अगर अल्लाह ने तुम [ईमानवालों] को उनकी संख्या ज़्यादा दिखायी होती, तो तुम ज़रूर ही हिम्मत हार बैठते और इस मामले में झगड़ने लग जाते, मगर अल्लाह ने तुम्हें (उस हालत से) बचा लिया। (याद रहे!) वह दिलों के अंदर छिपे हुए राज़ को भी जानता है। (43)
जब तुम्हारा आमना-सामना हुआ, तो अल्लाह ने तुम्हारी निगाहों में उनकी संख्या कम करके दिखायी, और अल्लाह ने तुम्हें भी उनकी निगाहों में कम करके दिखाया, ताकि जो बात होने वाली थी, वह सामने आ जाए : सारे मामले अल्लाह की मर्ज़ी पर टिके होते हैं। (44)
ईमानवालो, जब युद्ध में किसी सेना से तुम्हारा मुक़ाबला हो जाए, तो मज़बूती से अपने क़दम जमाए रखो, और ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह को याद करते रहो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (45)
अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, और आपस में झगड़ा न करो, नहीं तो हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। (मुसीबतों में) सब्र व धैर्य से काम लो : अल्लाह उनका साथी है जो धैर्य रखने वाले हैं। (46)
और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते हुए निकलते थे, लोगों को अपनी शान दिखाते हुए, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोकते हुए------- जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है। (47)
फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन (काफ़िरों) के कुकर्मों को उनके लिए बड़ा सुहाना बनाकर दिखाया, और कहने लगा, "आज कोई नहीं है जो तुम को हरा सकता हो, क्योंकि मैं तुम्हारे बिल्कुल साथ खड़ा रहूँगा," मगर जब सेनाएं आमने-सामने दिखायी देने लगीं, तो वह उलटे पाँव वापस हुआ, और कहने लगा, "मैं अब तुम्हारा साथ छोड़े जाता हूँ : मैं वह चीज़ देख रहा हूँ, जो तुम नहीं देख सकते, और मुझे अल्लाह से डर लग रहा है ----- अल्लाह (बुरे कर्मों की) बड़ी कठोर यातना देनेवाला है।" (48)
और जब ऐसा हुआ था कि पाखंडियों [Hypocrites] और वे लोग जिनके दिलों में (ईमान की कमज़ोरी का) रोग था, कहते थे, "इन (ईमान रखनेवाले) लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है", मगर जो कोई भी अल्लाह पर भरोसा करे, तो निश्चय ही अल्लाह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (49)
काश कि (ऐ रसूल!) आप देख सकते जब फ़रिश्ते इंकार करनेवालों की जान निकालते हैं, किस तरह वे उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं: उनसे कहा जाएगा, "अब (जहन्नम की) आग की सज़ा का मज़ा चखो, (50)
यह उन्हीं (बुरे कर्मों) का नतीजा है जो कुछ (कर्म) तुम्हारे हाथों ने तुम्हारे लिए जमा कर के रखा : अल्लाह तो अपने प्राणियों पर कभी भी अन्याय नहीं करता। (51)
ये लोग भी फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों, और उनसे पहले के लोगों की तरह हैं, जिन्होंने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया, अत: अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें सज़ा दी : अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (52)
(अल्लाह ने) ऐसा इसलिए किया कि जब वह किसी क़ौम के लोगों पर अपनी नेमतें उतारता है, तो उसे उस वक़्त तक नहीं बदलता है, जब तक कि वे लोग ख़ुद अपनी हालत न बदल डालें। अल्लाह सब (की) सुनता, सब कुछ जानता है। (53)
वे सचमुच फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों की तरह हैं, जिन्होंने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया था : हमने उनके गुनाहों की वजह से उन्हें तबाह व बर्बाद कर दिया, और फ़िरऔन के लोगों को दरिया में डुबा दिया था----- वे सभी शैतानियाँ करनेवाले लोग थे। (54)
अल्लाह की नज़र में सबसे बुरे प्राणी वे लोग हैं, जो उसे मानने से इंकार करते हैं और वे (सच्चाई पर) कभी विश्वास करनेवाले नहीं ; (55)
जिनके साथ (ऐ रसूल!), आप जब कभी कोई संधि [Treaty] करते हैं, तो वे उसकी शर्तों को (हर बार) तोड़ डालते हैं, क्योंकि उन्हें (वचन तोड़ने) का कोई डर नहीं है। (56)
(ऐसी हालत में) अब अगर जंग के मैदान में तुम्हारा सामना उनके साथ हो जाए, तो उन्हें ऐसी सज़ा दो कि वे (जान लेकर) भाग खड़े हों, और उनके पीछे आनेवाले (मक्का के) लोगों के लिए एक डरावनी मिसाल बन जाए, हो सकता है कि वे इससे सबक़ सीखें (कि वचन तोड़ने का नतीजा क्या होता है)। (57)
और अगर तुम्हें किसी क़ौम के लोगों की तरफ़ से विश्वासघात [treachery] होने का पता लग जाए, तो तुम उनसे की हुई संधि को समाप्त करने की साफ़-साफ़ घोषणा कर दो (ताकि दोनों गिरोह को बराबरी का मौक़ा मिल सके), क्योंकि अल्लाह विश्वासघात करनेवाले लोगों को पसंद नहीं करता। (58)
विश्वास न करनेवालों को यह नहीं समझना चाहिए कि वे जीत गए हैं ; वे हमारे चंगुल से निकल नहीं सकते। (59)
(ईमानवालों!) उनके साथ (युद्ध के लिए), जितना तुम इकट्ठा कर सको, सैनिकों की टुकड़ियां और साथ में लड़ाकू घोड़े तैयार रखो, ताकि इससे अल्लाह के दुश्मनों और अपने दुश्मनों को डरा सको, और उन दूसरे लोगों को भी चेतावनी दे सको जिन्हें तुम नहीं जानते मगर अल्लाह जानता है। अल्लाह के रास्ते में (जिहाद के लिए) तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा, और तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (60)
लेकिन अगर वे शांति व सुलह की ओर झुकें, तो (ऐ रसूल!), आप भी ज़रूर इसकी तरफ़ झुक जाएं, और अल्लाह पर अपना भरोसा रखें: वह सब (की) सुनता है, सब कुछ जानता है। (61)
अगर वे आपको धोखा देने का इरादा करें, तो आपके लिए अल्लाह काफ़ी है : वही तो है जिसने अपनी ख़ास मदद से आपको मज़बूती दी, (62)
और ईमानवालों के हाथों भी (मज़बूती दी), और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। अगर आप ने इस ज़मीन की सारी चीज़ें भी दे दी होतीं, तब भी आप यह नहीं कर पाते, मगर अल्लाह (ने उनके दिल मिला दिए और) उन्हें एक साथ ले आया : अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपने कामों में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (63)
ऐ नबी! आपके लिए और आपके पीछे चलने वाले ईमानवालों के लिए तो अल्लाह ही काफ़ी है। (64)
ऐ नबी! ईमान रखनेवालोें को आप लड़ाई लड़ने पर उभारें : अगर (लड़ाई में) तुम्हारे बीस आदमी हों जो (मुश्किल झेलते हुए) अपने क़दम जमाए रहें, तो वे दो सौ पर भारी पड़ेंगे, और अगर तुम्हारे सौ आदमी हों जो अपने क़दम जमाए रहें, तो वे (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के एक हज़ार पर भारी पड़ेंगे, क्योंकि वे ऐसे (काफ़िर) लोग हैं जिनमें समझ-बूझ नहीं है। (65)
मगर अल्लाह ने यह देखते हुए कि तुम्हारे अंदर कुछ कमज़ोरियां हैं, अब तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया है ---- अल्लाह के हुक्म से, अब तुम्हारे सौ आदमी अगर अपने क़दम जमाए रहें, तो वे दो सौ लोगों को हरा देंगे, और अगर तुम में से ऐसे हजार होंगे तो वे दो हज़ार पर जीत हासिल कर लेंगे : (याद रहे!) अल्लाह उन लोगों का साथ देता है जो सब्र के साथ अपने क़दम जमाए रखते हैं। (66)
जब तक कि युद्ध के मैदान में पूरी तरह जीत हासिल न कर ली हो, किसी नबी के लिए यह सही नहीं होगा कि वह किसी को क़ैदी बना ले। तुम (लोग) इस संसार की क्षण भर में ख़त्म होने वाली चीज़ें चाहते हो, जबकि अल्लाह (तुम्हारे लिए) आख़िरत [Hereafter] (का इनाम) चाहता है---- अल्लाह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है--- (67)
और अगर (इस बारे में) अल्लाह द्वारा पहले से ही तय किया हुआ न होता, तो जो कुछ तुम ने (बद्र की जंग के बाद माल) लूटा, उसके लिए तुम पर ज़रूर कोई कठोर यातना आ चुकी होती। (68)
बहरहाल, युद्ध के बाद जो कुछ माल तुम्हारे हाथ आ गया है, उन चीज़ों का अच्छे और उचित (lawful) तरीक़े से मज़ा उठाओ और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो : वह (गुनाहों को) बहत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (69)
ऐ नबी! जो युद्ध के क़ैदी आपके क़ब्जे में हैं, उनसे कह दें, “अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिलों में कुछ भी भलाई पायी, तो जो तुम से ले लिया गया है, उससे कहीं बेहतर चीज़ वह तुम्हें दे देगा, और वह तुम्हें माफ़ कर देगा : अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है।" (70)
लेकिन अगर वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहते हों, तो वे इससे पहले अल्लाह के साथ भी विश्वासघात कर चुके हैं, और इसी के चलते तुम्हें उन पर पूरा अधिकार दे दिया है : (याद रहे), अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा समझ बूझ रखनेवाला है। (71)
जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास [ईमान] कर लिया और वे हिजरत (कर के मदीना) चले गए, और अल्लाह के रास्ते में अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] किया, और जिन लोगों ने उन मक्कावालों को (मदीना में) शरण दी और उनकी मदद की, ऐसे सभी लोग एक-दूसरे के साथी (allies) हैं। रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास तो कर लिया, मगर हिजरत (कर मदीना) नहीं गए, तो उनकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी आप पर तब तक नहीं है, जब तक कि वे (मदीना तक) हिजरत न कर लें। लेकिन अगर वे (दीन के चलते) अपने ऊपर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आप से मदद मांगें, तो आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप उनकी मदद करें, सिवाय ऐसे गिरोह के मुक़ाबले में जिनके साथ आप ने (दुश्मनों के अदला बदली न करने की) कोई संधि कर रखी हो : जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (72)
और (देखो!) विश्वास न करनेवाले लोग भी एक-दूसरे की मदद करते हैं। अगर तुम [ईमान वाले] भी एक-दूसरे की मदद नहीं करोगे, तो ज़मीन पर अत्याचार होगा और बड़ा भारी फ़साद [corruption] पैदा होगा। (73)
जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया और हिजरत कर (के मदीना चले) गए, और अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया, और जिन लोगों ने उन (मुहाजिरों) को शरण दी और उनकी मदद की ----- वही सच्चे ईमानवाले हैं, उनके (गुनाह) माफ़ कर दिए जाएंगे और उन्हें दिल खोलकर रोज़ी दी जाएगी। (74)
और जो लोग बाद में ईमान लाए, और हिजरत कर (मदीना) पहुंचे और आपके साथ मिलकर जिहाद किया, तो ऐसे लोग भी आप ही का हिस्सा हैं, मगर अल्लाह की किताब के अनुसार (विरासत/ inheritance में) रिश्तेदारों का (दूसरों से) ज़्यादा हक़ बनता है : अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (75)