Thursday, December 22, 2022

Late Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के बाद के दिनों की सूरतें// उप समूह – II

 Late Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के बाद के दिनों की सूरतें


उप समूह – II

 

सूरह 25: अल-फ़ुरक़ान

 

[सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ बताने वाली किताब/ The Differentiator]



यह एक मक्की सूरह है, इसका नाम आयत 1-6 में आए ज़िक्र पर रखा गया है जहाँ बुतपरस्तों के इस दावे को ग़लत साबित किया गया है कि क़ुरआन को किसी ने गढ़ लिया है या पुरानी आसमानी किताबों [तौरात + इंजील] से नक़ल किया गया है। सूरह की शुरुआत में ही बहुदेववाद की निंदा की गई है, उसके बाद विश्वास करने वालों के उन तर्कों पर चर्चा की गई है जो रसूल, क़ुरआन और फ़ैसले के दिन के ख़िलाफ़ उनके रहे थे। लोगों को उनके अंजाम [fate] से सावधान करने के लिए पुराने गुज़र चुके लोगों का उदाहरण दिया गया है। इस सूरह में अल्लाह की ताक़त क़ुदरत [Power] और उसके फ़ज़ल करम [Grace] का वर्णन है, और अंत में सच्चे पक्के ईमानवाले की विशेषताएं ख़ूबसूरत अंदाज़ में बतायी गई हैं (63-76).



विषय:

01-03: अल्लाह एक है 

04-06: (सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों ने क़ुरआन को मानने से इंकार करते हैं 

07-10: विश्वास न करने वालों ने रसूल को मानने से इंकार कर दिया 

11-16: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दर्दनाक सज़ा होगी

17-19: क़यामत के दिन फ़ैसले का एक दृश्य 

20-21: विश्वास न करने वालों की माँग कि फ़रिश्ते या अल्लाह को देखते 

22-29: फ़ैसला के दिन का दृश्य 

30-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों ने क़ुरआन को ठुकरा दिया

35-40: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

41-44: विश्वास न करने वाले रसूल का मज़ाक़ उड़ाते हैं 

45-62: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

63-76: रहम करने वाले रब के बंदे 

77:      आख़िरी चेतावनी   

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने अपने बन्दे पर एक ऐसी किताब उतारी है, जो सच को झूठ से अलग करने वाली है, ताकि सारी दुनिया के लोगों को सावधान किया जा सके। (1)

 

वही है जिसके पास आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [control] है, और उसकी कोई संतान नहीं है ---- कोई नहीं है जो उसके नियंत्रण व क़ब्ज़े में उसका साझेदार [Partner] हो--- और उसी ने सारी चीज़ें पैदा की हैं और उन्हें बिल्कुल नपे-तुले अन्दाज़े के मुताबिक़ बनाया है।  (2)

 

इसके बावजूद, विश्वास न करने वालों [काफ़िरों] ने अल्लाह को छोड़कर ऐसे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा है, जो किसी चीज़ को पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो स्वयं पैदा किए जाते हैं, न तो वे कोई नुक़सान पहुँचा सकते हैं, न ही ख़ुद अपनी मदद ही कर सकते हैं, और उनके हाथ में न किसी की मौत है, न जीवन है, और न ही मरे हुए को दोबारा ज़िंदा उठाया जाना है। (3)

 

विश्वास न करने वाले [काफ़िर] कहते हैं, "यह (क़ुरआन) तो बस मनघढ़ंत चीज़ है जो इस (रसूल) ने दूसरों की मदद से गढ़ ली है” ---- (मगर) इन लोगों ने तो ख़ुद ही बहुत शैतानियाँ की हैं और अब झूठ बकने पर उतर आए हैं---- (4)

 

वे कहते हैं, "ये (क़ुरआन) तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं, जिनको इस (रसूल) ने लिख रखा है: वह (अफ़साने) उसे सुबह और शाम लिखवाए जाते हैं।" (5)

 

कह दें, "इस (क़ुरआन) को उस (अल्लाह) ने उतारा है जो आसमानों और ज़मीन के रहस्य जानता है। सचमुच ही वह बहुत माफ़ करने वाला, अत्यन्त दयावान है।" (6)

 

उनका यह भी कहना है, "यह किस तरह का रसूल है जो (आम आदमी की तरह) खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है! किसी फ़रिश्ते को क्यों नहीं भेजा गया जो लोगों को सावधान करने में इसकी मदद करता? (7)

 

क्यों नहीं इसे ऊपर से कोई ख़ज़ाना या कोई बाग़ दे दिया गया, जिसमें से यह खाता पीता?" और यह शैतानियाँ करने वाले (मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम लोग जिस आदमी के पीछे चल रहे हो, उस पर कुछ और नहीं, बस जादू हो गया है!" (8)

 

[ऐ रसूल] देखें, आपके बारे में वे कैसी-कैसी बातें सोचते हैं! वे रास्ते से पूरी तरह भटक चुके हैं और अब सही रास्ते पर नहीं आ सकते।  (9)

 

बड़ी ऊँची शान है उस (आल्लाह) की जो अगर चाहे, तो आपको इनसे भी बढ़िया चीज़ें दे सकता है: बहुत से बाग़ और उनके नीचे से बहती हुई नहरें, और (रहने के लिए) कई महल भी। (10)

 

असल में, वे लोग आने वाली (क़यामत की) घड़ी को मानने से इंकार करते हैं: और जो उस घड़ी के आने को नहीं मानता, उसके लिए हमने दहकती हुई आग तैयार कर रखी है। (11)

 

जब वह (जहन्नम की आग) उनको दूर से देखेगी, तो वे लोग उसके बिफरने और ग़ुस्से में चिल्लाने की आवाज़ें सुनेंगे, (12)

 

और जब उनके हाथ-पाँव बाँधकर उस (आग) के एक पतले से हिस्से में उन्हें फेंक दिया जाएगा, तब वे अपनी मौत को पुकारने लगेंगे। (13)

 

(उनसे कहा जाएगा,) "आज के दिन तुम केवल एक मौत को नहीं, बल्कि कई मौतों को पुकारो!" (14)

 

आप कहें, "(बताओ) यह अच्छा रहेगा या हमेशा रहने वाला वह बाग़? --- जो उनका इनाम होगा और उनके सफ़र का अंत भी---- जिसका वादा उन लोगों से किया गया है, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।" (15)

 

उनके लिए वहाँ वह सब कुछ होगा, जो वे चाहेंगे, और वहाँ वे हमेशा रहेंगे। [ऐ रसूल] यह आपके रब की तरफ़ से एकदम पक्का वादा है। (16)

 

उस (क़यामत के) दिन जब अल्लाह सभी को इकट्ठा करेगा---- उनको भी, जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, फिर वह कहेगा, "क्या तुम ही वह [झूठे ख़ुदा] थे जिसने मेरे बन्दों को रास्ते से बहका दिया था, या वे स्वयं ही मार्ग छोड़ बैठे थे?" (17)

 

वे कहेंगे, "महान और बहुत ऊँचा है तू! हम ख़ुद तो तुझे छोड़कर कभी किसी और को अपना मालिक बना ही नहीं सकते थे! मगर  हुआ यह कि तूने उन्हें औऱ उनके बाप-दादा को इस जीवन में मौज-मस्ती के ख़ूब सामान दे दिए, यहाँ तक कि वे तेरी चेतावनी [Reminder] को भुला बैठे और बर्बाद होकर रहे।" (18)

 

[अल्लाह कहेगा], “अब जबकि तुम्हारे (ठहराए हुए) ख़ुदाओं ने भी तुम्हारी बातों को झूठी होने की घोषणा कर दी है: तो अब तुम सज़ा से बच नहीं सकते; तुम्हें कोई मदद नहीं की जाएगी.तुममें से कोई भी अगर ऐसी शैतानी करता है, तो हम उसको ज़रूर बड़ी दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (19)

 

[ऐ मोहम्मद] आपसे पहले हमने कोई भी रसूल [Messenger] ऐसा नहीं भेजा, जो (आम लोगों की तरह) खाना न खाता हो या बाज़ारों में चलता-फिरता न हो। मगर हमने तुममें से कुछ को ऐसा बनाया है जिसके द्वारा दूसरे लोगों को जाँचा-परखा जा सके---- "तो क्या तुम धीरज [सब्र] से काम लोगे?" तुम्हारा रब तो सब कुछ देख रहा है। (20)

 

जिन्हें (अंत में) हमारे सामने हाज़िर होने की उम्मीद (या डर) नहीं है, कहते हैं, "फ़रिश्तों को क्यों नहीं उतारकर हमारे पास भेजा जाता है? या फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि हम अपने रब को देख पाते?" वे घमंड में अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगे हैं और दूसरों को बहुत छोटा समझते हुए हदें तोड़ने में लगे हैं। (21)

 

जिस (क़यामत के) दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे, वह अपराधियों के लिए कोई ख़ुशी का दिन न होगा। फ़रिश्ते कहेंगे, “तुम्हारे लिए उस (जन्नत के दरवाज़े) के अंदर जाने पर रोक [barrier] लगी हुई है।” (22)

 

और फिर हम (हिसाब-किताब के लिए) उनके किए गए कर्मों पर नज़र डालेंगे, और उसे धूलकण (जैसा बेकार) बना देंगे। (23)

 

मगर उस दिन जो लोग जन्नत [बाग़] में होंगे, उनके पास रहने की जगह भी बहुत बेहतर होगी, और आराम करने की जगह भी बहुत अच्छी होगी। (24)

 

उस दिन सारे आसमान और उसके बादल फट पड़ेंगे, और फ़रिश्तों को इस तरह उतारा जाएगा कि ताँता लग जाएगा, (25)

 

उस दिन, वास्तव में सारा अधिकार [Authority] तो रहम व दया करने वाले रब का ही होगा। विश्वास न करने वालों के लिए वह दिन बड़ा ही कठिन होगा। (26)

 

उस दिन शैतानी करने वाला ख़ुद अपने हाथ चबा लेगा और कहेगा, "काश! मैं भी रसूल के बताए हुए मार्ग पर चला होता! (27)

 

हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने उस उस आदमी से दोस्ती न की होती! (28)

 

मेरे पास जबकि (अल्लाह का) संदेश आ चुका था, तब भी उस (दोस्त) ने मुझे उससे भटका दिया। शैतान ने तो हमेशा ही आदमी को धोखा दिया है।" (29)

 

 

रसूल ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोग इस क़ुरआन के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे कि यह कोई छोड़ देने वाली चीज़ हो," (30)

 

मगर हमने हमेशा हर नबी के साथ गुनाहगारों में से ही दुश्मनों को भी नियुक्त किया है: आपका रब मार्गदर्शन देने और मदद कॆ लिए काफ़ी है। (31)

 

विश्वास न करने वाले यह भी कहते हैं, "उसपर पूरी क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारी गयी?" हमने इसे इस तरह (थोड़ाथोड़ा करके) इसलिए उतारा है ताकि इसके द्वारा [ऐ रसूल] आपका दिल मज़बूत कर सकें; और हमने इसे (फ़रिश्ते के द्वारा) ठहर-ठहर के आपको पढ़वाया है।  (32)

 

और जब भी वे अपनी बात को साबित करने के लिए कोई दलील या मिसाल देते हैं, तो हम (पहले ही) उस बात की असल सच्चाई को ठीक ढंग से बता देते हैं, और चीज़ों को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर देते हैं।  (33)

 

जो लोग औंधे मुँह जहन्नम की ओर हँकाकर ले जाए जाएँगे, वे लोग सबसे बुरी जगह में होंगे----वे ही सीधे व सही मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं।  (34)

 

 

हमने मूसा [Moses] को किताब [तोरात] दी थी और उनके भाई हारून [Aaron] को मददगार के रूप में उनके साथ लगा दिया था।  (35)

 

हमने कहा था, "तुम दोनों उन (फ़िरऔन के) लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया है।" बाद में हमने उन लोगों को पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया। (36)

 

और नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी: जब रसूलों को झूठा कहकर मानने से इंकार कर दिया तो हमने उन्हें पानी में डुबा डाला, और तमाम लोगों के लिए (इस घटना को) एक मिसाल बना दिया। हमने शैतानी करने वालों के लिए एक दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है,  (37)

 

जैसा कि आद, समूद और अर-रस्सवाले लोगों और उनके बीच (के काल) की बहुत-सी नस्लों को भी हमने बर्बाद कर दिया। (38)

 

उनमें से हर एक को हमने (पहले) चेतावनियाँ दीं, और हर एक को अंत में पूरी तरह से तबाह-बर्बाद कर दिया। (39)

 

ये विश्वास न करने वाले लोग तो ज़रूर उस बस्ती से होकर गुज़रे होंगे, जिसे एक भयानक बारिश द्वारा तहस नहस कर दिया गया था---- क्या उन्होंने नहीं देखा? इसके बावजूद, वे मरने के बाद, दोबारा जीवित होकर उठाए जाने की आशा नहीं रखते हैं। (40)

 

[ऐ रसूल] वे जब भी आपको देखते हैं, आपका यह कहकर मज़ाक़ उड़ाते हैं: "क्या यही है जिसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है? (41)

 

इसने तो क़रीब-क़रीब हमें अपने देवताओं से भटका ही दिया होता, अगर हम उनकी भक्ति में मज़बूती से जम न गए होते।" जब वे यातना को देखेंगे, तो वे जान जाएंगे कि कौन सही मार्ग से बहुत दूर भटका हुआ था। (42)

 

[ऐ रसूल] आप उसके बारे में ज़रा सोचें, जिसने अपनी ख़्वाहिशों को अपना ख़ुदा बना रखा है: तो क्या आप उसकी (देखरेख की) ज़िम्मेदारी ले सकते हैं? (43)

 

या क्या आपको ऐसा लगता है कि इनमें से ज़्यादातर लोग सुनते या समझते हैं? वे तो एकदम चौपायों की तरह हैं--- नहीं, बल्कि वे सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़े हैं! (44)

 

 

क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारा रब कैसे छाया [shadow] को लम्बी कर देता है? अगर वह चाहता, तो उसे एक जगह स्थिर रख देता---  फिर हमने सूरज को (छाया के लिए) रास्ता दिखाने वाला [indicator] बनाया, (45)

 

मगर हम उस (छाया) को थोड़ा-थोड़ा करके (छोटी करते हुए) अपनी ओर समेट लेते हैं।  (46)

 

वही है जिसने रात को तुम्हारे लिए वस्त्र [garment] बनाया, और नींद को बनाया आराम करने के लिए, और दिन को फिर से जी उठने का समय बनाया। (47)

 

वही है जो हवाओं को पहले भेज देता है जो (बारिश के रूप में) अल्लाह की रहमत की ख़ुशख़बरी लेकर आती हैं। और हम ही हैं जो आसमान से साफ़ पानी उतारते हैं, (48)

 

ताकि हम इससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को दोबारा जीवन प्रदान करें, और उससे अपने पैदा किए हुए बहुत-से जानवरों और आदमियों के लिए पीने का सामान कर दें। (49)

 

और हम इस (बारिश) को लोगों के बीच (अलग-अलग जगहों पर) अलग-अलग समय बाँटते रहते हैं, ताकि वे इससे शिक्षा ले सकें, परन्तु अधिकतर लोग शुक्रिया अदा नहीं करने के आदी बन चुके हैं। (50)

 

अगर हम ऐसा चाहते, तो हर बस्ती में एक सावधान करने वाला भेज देते,  (51)

 

अतः विश्वास न करनेवालों का [ऐ रसूल] आप कहना मत मानें: इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे कड़ा संघर्ष [जिहाद] करें। (52)

 

 

वही है जिसने दो बड़े सागरों को इस तरह बहा दिया कि एक का पानी ताज़ा व मीठा है, और दूसरे का खारा और कड़ुआ, और उन दोनों के बीच उसने एक ऐसी रोक लगा रखी है कि दोनों अपनी सीमाएं नहीं लाँघते हैं। (53)

 

और वही है जिसने पानी से आदमी को पैदा किया, फिर उसे ख़ून और शादी के संबंधों से जोड़कर एक रिश्ते में बाँध दिया: तुम्हारा रब बहुत ताक़तवाला है! (54)

 

इसके बावजूद वे अल्लाह को छोड़कर, ऐसी चीज़ों को पूजते हैं जो उन्हें न कोई फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न ही कोई नुक़सान: विश्वास न करने वालों ने हमेशा ही अपने रब का विरोध करने के लिए कमर कस रखी है। (55)

 

[ऐ रसूल] हमने तो आपको केवल ख़ुशख़बरी सुनानेवाला और चेतावनी देनेवाला ही बनाकर भेजा है। (56)

 

कह दें, "मैं इस काम के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, हाँ अगर कोई (कुछ देना ही) चाहता है, तो उसे चाहिए कि वह अपने रब की ओर जाने वाले मार्ग को अपना ले।" (57)

 

तुम उस (अल्लाह) पर भरोसा रखो जो ज़िंदा है और जिसे कभी मौत नहीं आती, और तुम उसकी बड़ाई का गुणगान करते रहो। वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है: (58)

 

वही है जिसने आसमानों को और ज़मीन को और जो कुछ उन दोनों के बीच है, सबको छह दिनों में पैदा किया, फिर अपने सिंहासन पर विराजमान हुआ--- वह दया करनेवाला [रहमान] रब है; उसे हर चीज़ की पूरी ख़बर है। (59)

 

तब भी, उन लोगों से जब कहा जाता है कि "रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने झुक जाओ" तो वे कहते हैं, "यह रहमान क्या होता है? जिसके सामने भी तुम कहोगे, क्या हम उसके सामने अपना सर झुका देंगे?" इससे वे और भी ज़्यादा बिदक जाते हैं।  (60)

 

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने आसमानों में तारों के समूह [नक्षत्र] बनाए, और उसमें बनाया एक रौशनी देनेवाला चिराग़ [सूरज], और एक चमकता हुआ चाँद --- (61)

 

वही है जिसने रात और दिन को इस तरह बनाया कि वे बारी-बारी से एक-दूसरे के पीछे चले आते हैं--- अत: (यह बातें उसके लिए काम की हैं) जो (इन निशानियों से) सबक़ लेना चाहता हो या (अल्लाह का) शुक्र अदा करना चाहता हो। (62)

 

 

रहम करनेवाले रब [रहमान] के बन्दे वह हैं, जो धरती पर नम्रता से चलते-फिरते हैं, और जब जाहिल व बेवक़ूफ़ उनके मुँह लगते हैं, तो वे जवाब में कह देते हैं, "तुम पर सलामती हो!"; (63)

 

जो अपने रब की इबादत करते हुए रातें गुज़ारते हैं, कभी (सज्दे में) झुके हुए, कभी (नमाज़ में) खड़े होकर; (64)

 

जो यह कहते हैं, "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे दूर रख, कि झेलने के लिए सचमुच कितनी दर्दनाक यातना होगी! (65)

 

सचमुच यह शैतानी घर होगा, रहने की बहुत ही बुरी जगह!”  (66)

 

(अच्छे लोग) वे हैं जो जब ख़र्च करते हैं, तो न फ़ज़ूल-ख़र्ची करते हैं, और न ही कंजूसी से काम लेते हैं, बल्कि वे इनके बीच एक संतुलन बनाए रखते हैं; (67)

 

जो लोग अल्लाह के अलावा किसी दूसरे देवी-देवता को न कभी पूजते हैं; और न किसी की जान (बे वजह) लेते हैं जिसे अल्लाह ने हराम [forbidden] क़रार दिया है, सिवाय इसके कि (किसी का क़त्ल) न्यायसंगत हो, और न ही वे (किसी के साथ) अवैध शारीरिक संबंध [Adultery] बनाते हैं। (तो जो कोई भी इन बातों को न माने) और ऐसे गुनाह करता हो, तो उसे दंड मिलेगा: (68)

 

क़यामत के दिन उनकी यातना बढ़ाकर दोगुनी कर दी जाएगी, और वे उसी में हमेशा पड़े रहेंगे, अपमानित होकर, (69)

 

सिवाए उसके जो पछताया अपने गुनाहों पर, विश्वास रखा (अल्लाह पर), और अच्छे कर्म किए: तो ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को अल्लाह अच्छे कर्मों में बदल देगा। और अल्लाह सबसे ज़्यादा क्षमा करनेवाला, बेहद दयावान है।  (70)

 

जो लोग (गुनाहों से) तौबा कर लेते हैं और फिर अच्छे कर्म करते हैं, तो वे (अपनी तौबा से) सचमुच अल्लाह की ओर पूरी तरह से लौट आते हैं।  (71)

 

[रहम करनेवाले रब के असल बंदे वे हैं] जो कोई झूठी गवाही नहीं देते, और वे, जब कहीं कोई बेकार की चीज़ें होते हुए देखते हैं, तो वहाँ से शालीनता से गुज़र जाते हैं; (72)

 

और जब उन्हें अल्लाह की निशानियाँ [आयतें] याद दिलायी जाती हैं, तो वे उन (आयतों) पर (काफ़िरों की तरह) अपने कानों और आँखों को बंद नहीं कर लेते; (73)

 

बल्कि वे दुआ करते हैं, "ऐ हमारे रब! हमें अपने पति/पत्नियों और अपने बाल-बच्चों के बीच ख़ुशी व आराम के साथ रख। और हमें ऐसा बना दे कि जो लोग तुझ से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके सामने हमारी मिसालें दी जा सकें।" (74)

 

यही वे बंदे होंगे जिन्हें (अपने ईमान पर) जमे रहने की वजह से बदले में जन्नत की सबसे ऊँची जगह दी जाएगी। वहाँ दुआओं और सलाम से उनका स्वागत किया जाएगा। (75)

 

वहीं वे हमेशा रहेंगे--- एक ख़ुशनुमा घर और आराम की बेहतरीन जगह में! (76)

 

[ऐ रसूल, काफ़िरों से कह दें], "मेरे रब के सामने तुम्हारी औक़ात ही क्या है, जो तुम उसके सामने झुककर उससे फ़रियाद नहीं कर सकते? मगर चूँकि तुम सच्चाई को झूठ मानकर ठुकरा ही चुके हो, तो अब वह (सज़ा) तुम्हारे गले पड़ कर रहेगी।" (77)

 

 

नोट:

4: मक्का के लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) पर यह इल्ज़ाम लगाया था कि उन्होंने किसी यहूदी और ईसाई से पुराने नबियों के क़िस्से सीख लिए हैं, और वह इन्हीं को क़ुरआन में लिखवा देते हैं। हालाँकि तोरात का ज्ञान रखने वाले जिन यहूदियों का वे ज़िक्र करते थे, वे ख़ुद ही मुसलमान बन गए थे, लेकिन अगर ऐसी बात होती तो वह मुस्लिम क्यों बनते!

9: कभी वे उन्हें 'जादूगर' कहते, कभी 'शायर', कभी 'कहानियाँ गढ़नेवाला' और कभी 'दीवाना'  

11: असल में उन लोगों को क़यामत और आख़िरत [परलोक] पर विश्वास नहीं था, इसलिए उन्हें सच्चाई पर तरह-तरह की आपत्तियाँ करने और मज़ाक़ उड़ाने में कोई डर नहीं था। 

14: वहाँ मौत नहीं आएगी, बल्कि नित नई यातनाओं से पाला पड़ेगा जो कई मौतों जैसा होगा।

18: अल्लाह को छोड़कर लोगों ने फ़रिश्तों को, जिन्नों को या मूर्तियों को ख़ुदा बना रखा था। यह भी संभव है कि उस दिन मूर्तियों को भी बोलने की क्षमता दे दी जाए।

23: अच्छे कर्मों का बदला उन्हें दुनिया में भले ही मिल जाए, मगर उनके किए हुए अच्छे कर्म (जैसे दान देना) आख़िरत में बेकार हो जाएंगे, क्योंकि वहाँ अच्छे कर्मों को तभी क़बूल किया जाएगा अगर आदमी ने अल्लाह, रसूल और क़यामत पर ईमान रखा होगा।

38: "अर-रस्स वाले" का मतलब 'कुएं वाले', इनके बारे में कोई भी बात ठीक से नहीं मालूम, बस इतना ही पता चलता है कि इनकी क़ौम के लोग किसी कुएं के किनारे आबाद थे, उनके पास भी एक रसूल भेजे गए थे, मगर उन लोगों ने भी सच्चाई पर विश्वास नहीं किया, और नतीजे में तबाह हो गए। कुछ लोग इनकी पहचान मदयन में रहने वाले बुतपरस्त लोगों से की है जिनके पास शुऐब (अलै) भेजे गए थे।

39: चेतावनियों में पुराने लोगों की बर्बादी की मिसालें दी गईं, मगर वे नहीं माने। 

40: यहाँ इशारा लूत (अलै) की क़ौम के खंडहरों से है जो सीरिया जाने के व्यापारिक मार्ग पर था। इन पर पत्थरों की बारिश हुई थी, देखें सूरह हूद (11: 77-83) .

44: मक्का के बुतपरस्त लोग न तो किसी बात पर ध्यान देते हैं और न सही बात ख़ुद से सोचते हैं, बल्कि बस दूसरों के पीछे आँख बंद करके चल पड़ते हैं, इसीलिए उनकी मिसाल मवेशियों से दी गई है, मगर जानवर आम तौर से आज्ञाकारी होते हैं और अपने मालिक के प्रति वफ़ादार होते हैं, जबकि मक्का के लोग न तो अल्लाह का हुक्म मानते हैं और न उसका शुक्र अदा करते हैं, इसलिए वे जानवरों से भी बदतर हैं।

53: जहाँ एक बड़ी नदी समंदर से मिलती है, उस मुहाने पर Estuaries बन जाती है जहाँ दो तरह की जल-धारा साफ़ देखी जा सकती है जो कि मीठी और नमकीन होती हैं।

68: जैसे अगर किसी ने जान-बूझकर किसी को क़त्ल किया तो उसके घर वाले उसका बदला क़ानूनी तरीक़े से अदालत के द्वारा ले सकते हैं।

72: "झूठी गवाही" का एक अनुवाद  "ग़लत और नाजायज़ काम" भी किया गया है। 

 

 

सूरह 23: अल-मोमिनून 

[ईमानवाले, The Believers]

 

यह एक मक्की सूरह हैजो इस बात पर ज़ोर देती है कि ईमानवाले ही अंत में जीतेंगे (आयत 1), जबकि विश्वास  करनेवालों को घमंड करने और सच्चाई का मज़ाक़ उड़ाने के लिए दंड मिलेगा (आयत 117). अल्लाह के एक होने और किसी चीज़ को पैदा करने की उसकी बेपनाह ताक़त के कई सारे प्रमाण दिए गए हैंऔर इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि क़यामत में कर्मों का हिसाब देने के लिए दोबारा उठाया जाना निश्चित  है। 

 

 

विषय: 

 

01-11: ईमानवालों की विशेषताएं 

12-16: अल्लाह की क़ुदरत: ज़िंदगी की निशानियाँ 

17-22: अल्लाह की क़ुदरत: प्रकृति की निशानियाँ 

23-30: नूह (अलै) की कहानी 

31-41: एक रसूल जिनका नाम नहीं लिया गया

42-44: एक के बाद एक कई रसूल भेजे गए 

45-48: मूसा और हारून (अलै) 

49-56: ईसा और मरियम (अलै) 

57-61: ईमानवाले भलाई के काम में तेज़ी दिखाते हैं 

62-77: विश्वास न करने वालों के साथ अल्लाह निपटेगा 

78-83: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

84-92: अल्लाह एक है 

93-98: अल्लाह के रसूल की दुआ 

99-100: मरते समय की तौबा 

101-115: अंतिम दिन, दोबारा ज़िंदा उठाया जाना, और फ़ैसला 

116-118: अल्लाह ही अकेला बादशाह है 

 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 

बेशक कामयाब हैं वहजो ईमान रखते हैं ! (1)

 

जो पूरे दिल से अपनी नमाज़ों में (अल्लाह के सामने) झुकते हैं, (2)

 

जो बेकार व फ़ालतू बातों से दूर रहते हैं, (3)

 

जो (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [Alms] देते रहते हैं, (4)

 

और जो अपने आपको (दूसरों के साथ शारीरिक संबंध बनाने से) रोके रखते हैं (5)

 

सिवाय अपने पति/पत्नियों [spouses] और अपने दास/दासियों [slaves] के ----- कि जिनके साथ (शारीरिक संबंध बनाने में) कोई बुराई नहीं है,  (6)

 

मगर जो कोई इस (बतायी हुई सीमा) के अलावा (किसी और से भी संबंध बनाने) की चाहत रखता होतो ऐसे ही लोग सीमा को तोड़ने वाले हैं---- (7)

 

और जो अपने ऊपर किए गए भरोसे को और अपनी प्रतिज्ञा को ईमानदारी से निभाते हैं (8

 

और अपनी नमाज़ों को पाबंदी से व सही ढंग से अदा करते हैं, (9)

 

तो ऐसे ही लोग हैं जिन्हें विरासत में दिया जाएगा---- (10)

 

जन्नत का सबसे अच्छा बाग़ [फ़िरदौस]जो उनका अपना हो जाएगावे उसमें हमेशा के लिए रहेंगे। (11)

 

 

हमने इंसान को (पहली बार) मिट्टी के सत [essence] से पैदा किया, (12)

 

फिर हमने उसे एक टपकी हुई बूँद [वीर्य, Semen] के रूप में एक सुरक्षित ठहर जाने वाली जगह [कोख] में रखा, (13

 

फिर हमने उस बूँद को (जोंक की तरह) चिमटे हुए जीव जैसा रूप दे दियाफिर हमने उस (जोंक जैसे) जीव को मांस का एक लोथड़ा बनायाफिर हमने उस लोथड़े को हड्डियों के ढाँचे में बदल दियाफिर उन हड्डियों पर मांस की तह चढ़ा दीफिर उसके बाद हमने उसे एक अलग ही रूप देकर (आदमी की शक्ल में) खड़ा कर दिया--- तो कितना महान है अल्लाहरचना करने वालों में सबसे बेहतर!--- (14)

 

फिर (इस पैदाइश के बाद) तुम्हारी मौत हो जाएगी, (15)

 

और फिर क़यामत के दिनतुम दोबारा ज़िंदा करके उठाए जाओगे। (16)

 

हमने तुम्हारे ऊपर (आसमान में) सात तहों में (चक्कर लगाने के) रास्ते [Orbits] बना दिए: और हम कभी भी अपनी की हुई रचना से बेख़बर नहीं हैं।   (17)

 

और हमने आसमान से सही मात्रा में पानी बरसायाफिर हमने उसे धरती में (ज़रूरत के अनुसार) ठहरा दिया---- और अगर हम चाहेंतो जितनी मात्रा (में पानी) हमने दे रखा हैउसे वहाँ से उड़ा ले जाने की ताक़त भी हमारे पास है---- (18)

 

फिर हमने इसी पानी की मदद से तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ पैदा किए--- इन बाग़ों में तुम्हारे खाने के लिए बहुत-से फल पैदा होते हैं, (19)

 

और सीना के पहाड़ [Mount Sinai] पर उगने वाला वह (ज़ैतून का) पेड़जिससे तेल निकलता है और जो खाने में मसाले के रूप में काम आता है। (20)

 

निश्चय ही (पालतू) जानवरों में भी तुम्हारे लिए एक सीख है: जो कुछ (गंदी चीज़ें) उनके पेट में भरी होती हैंउसी में से तुम्हारे पीने के लिए (दूध जैसी अच्छी चीज़) हम पैदा कर देते हैं। और तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से दूसरे फ़ायदे भी हैं: तुम उन्हें खाते भी हो, (21)

 

और (धरती पर) उनकी सवारी भी करते होजैसे (पानी में) नौकाओं पर सवार होते हो। (22)

 

 

हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास (मार्गदर्शन के लिए) भेजा थातो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करोतुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा हैतो क्या तुम (बुरे कामों के नतीजे से) डरते नहीं?" (23

 

मगर उनकी क़ौम के सरदारजिन्होंने (नूह की बातों को मानने से) इंकार किया था, (एक दूसरे से) कहने लगे, "यह तो तुम्हारे ही जैसा एक (मामूली) आदमी हैजो तुम पर अपनी बड़ाई की धाक जमाना चाहता है। अगर अल्लाह चाहता तो उसने (मामूली आदमी के बदले) फ़रिश्तों को भेजा होताऔर तो औरऐसी कोई बात हमने अपने बाप-दादा से कभी सुनी ही नहीं। (24)

 

यह तो बस एक ऐसा आदमी है जिस पर पागलपन सवार हैअतः (इसकी बात मत सुनो और) कुछ समय तक प्रतीक्षा करके देख लो कि इसके साथ क्या होता है।" (25)

 

नूह ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रबमेरी मदद कर! ये लोग मुझे झूठा कहते हैं,”  (26

 

और तब हमने नूह के पास 'वही[revelation] भेजी: "हमारी देखरेख में और हमारी 'वही' के मुताबिक़ एक नौका बनाओ। फिर जब हमारा आदेश मिल जाएऔर ज़मीन का पानी उबलकर बाहर आने लगेतो (हर तरह के जीव-जंतुओं की) प्रत्येक प्रजाति में से दो-दोजोड़े मेंउस (नौका) में साथ रख लो और अपने परिवार के लोगों को भी (इसमें सवार कर लो)मगर घर के ऐसे आदमी को नहीं जिनके विरुद्ध पहले ही फ़ैसला हो चुका है--- शैतानियाँ करने वालों के पक्ष में मुझसे सिफ़ारिश मत करना: वे तो डूब कर रहेंगे---- (27)

 

फिर जब तुम और तुम्हारे साथी नौका पर अच्छी तरह सवार हो जाओतो अपनी ज़बान से कहो,  “शुक्र है अल्लाह काजिसने हमें शैतान लोगों से छुटकारा दिया”, (28

 

और यह भी कहोऐ मेरे रब! मुझे अपनी बरकत के साथ किनारे उतार दे: और तू ही नौका को सबसे बेहतर किनारे लगानेवाला है।" (29)

 

बेशक इन सब (घटनाओं) में (समझने वालों के लिए) कितनी ही निशानियाँ हैं: और यहाँ ज़रूर ऐसा होता है कि हम लोगों को परीक्षा में डालें।   (30)

 

 

फिर उन लोगों के बादहमने क़ौमों की एक दूसरी पीढ़ी को उठाया, (31)

 

और उनके अपने लोगों में से एक को रसूल के रूप में उनके पास भेजा (उसने भी यही कहा): "अल्लाह की बन्दगी करोकि तुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा हैतो क्या तुम (इंकार के बुरे नतीजे से) डरते नहीं?" 32)

 

मगर उनकी क़ौम के वे सरदारजिन्होंने (रसूल की बातों में) विश्वास नहीं किया थाऔर आख़िरत [परलोक, Hereafter] में (अल्लाह के सामने) होने वाली मुलाक़ात को मानने से भी इंकार किया थाऔर जिन्हें हमने सांसारिक जीवन में आराम व ढेर सारे सुख दे रखे थे, (लोगों से) कहने लगे, "यह तो बस तुम्हारे ही जैसा एक आदमी है--- जो कुछ तुम खाते होवही यह भी खाता है और जो कुछ तुम पीते होवही यह भी पीता है--- (33)

 

तो अगर तुम अपने ही जैसे एक (मर-खप जानेवाले) आदमी की आज्ञा मानने लगेतो सचमुच ही तुम भारी घाटे में पड़ोगे। (34)

 

आख़िर यह आदमी तुमसे ऐसा वादा कैसे कर सकता है कि जब तुम मरकर मिट्टी और (सड़ी-गली) हड़्डियों का चूरा होकर रह जाओगे तो तुम फिर से ज़िंदा निकाले जाओगे? (35)

 

जिस बात का तुमसे वादा किया जा रहा हैवह समझ से परे हैबहुत दूर की बात है! (36)

 

(भला दोबारा ज़िंदा होना कैसी बात है!) हमारा जीवन तो केवल इसी संसार का जीवन है: (पीढ़ी दर पीढ़ी) यहीं हम मरते हैंयहीं जीते हैंमगर हमें कभी भी दोबारा ज़िंदा करके उठाया नहीं जाएगा। (37

 

वह तो बस एक आदमी है जिसने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ ली हैं। हम उसकी बातों में कभी भी विश्वास करने वाले नहीं हैं।" (38)

 

इस पर उस रसूल ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद करवे लोग तो मुझे झुठा कहते हैं," (39)

 

और तब अल्लाह ने कहा, "बहुत जल्द ही वे अपने किए पर पछताएंगे।" (40)

 

और फिर ऐसा हुआ कि उन्हें एक भयानक धमाके ने आ घेराऔर हमने उन्हें तिंकों व गंदी झाग की तरह बहाकर रख दिया। अतः फिटकार हैऐसे शैतान व ज़ालिम लोगों पर! (41)

 

फिर हमने उनके बाद क़ौमों की दूसरी पीढ़ियों को पैदा किया---- (42)

 

(अल्लाह के क़ानून के मुताबिक़ हर क़ौम की अवधि तय है) कोई क़ौम [community] न तो अपने निर्धारित समय से पहले आ सकती हैऔर न समय पूरा हो जाने के बाद ठहर सकती है----- (43)

 

फिर हमने एक के बाद एक अपने रसूल [messengers] भेजे: जब भी किसी क़ौम के पास (मेरा संदेश लेकर) कोई रसूल आयातो हमेशा ऐसा हुआ कि लोगों ने (उसकी बात नहीं मानते हुए) उसे झुठा कहानतीजे में हम उन क़ौमों को एक के बाद एक बर्बाद करते चले गएऔर उनकी हस्तियाँ (सबक़ सीखने वाली) कहानियाँ बनकर रह गयीं। फिटकार हो उन लोगों पर जो सच्चाई पर विश्वास नहीं करते! (44)

 

 

फिर हमने मूसा [Moses] और उसके भाई हारून [Aaron] को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण के साथ, (45)

 

फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजामगर वे बड़े अहंकार से पेश आए: वे थे भी घमंडी लोग।   (46)

 

सो वे कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो (मामूली) आदमियों में विश्वास कर लेंऔर जबकि उनकी क़ौम के लोग [इसराइली] तो हमारे सेवक हैं?" (47

 

और इस तरहउन लोगों ने दोनों को झूठा बताया: और बर्बाद हो जाने वालों में शामिल हो गए। (48)

 

(इस घटना के बाद) हमने मूसा को किताब [तोरात] प्रदान कीताकि वे [इसराईल की संतानें] सही मार्ग पर चल सकें। (49)

 

(और इसी तरह) हमने मरयम के बेटे [ईसा] और उसकी माँ को (अपनी सच्चाई की) एक निशानी बनायाऔर हमने उन्हें एक ज़रा ऊँची शांत जगह परबहते हुए पानी के बीचशरण दी (जहाँ उनके बेटे का जन्म हुआ)। (50)

 

 

"ऐ पैग़म्बरो! अच्छी चीज़ें खाओ और अच्छे कर्म करो: जो कुछ तुम करते हो उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। (51)

 

और यह जो तुम्हारी क़ौम हैवह असल में एक (समान विचारधारा वाली) ही क़ौम हैऔर मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मुझे अपने मन में बसाओ (व बुरे कर्मों के नतीजे से डरो)"---- (52

 

(सभी पैग़म्बरों की शिक्षाएं समान थीं) मगर लोगों ने अपनी क़ौम को अलग-अलग (सोच वाले) फ़िरक़ों [sects] में तोड़ डाला हैऔर हर एक फ़िरक़ा अपनी सोच के साथ ख़ुश व मगन है। (53)

 

तो [ऐ मुहम्मद] आप कुछ समय के लिए उन्हें जिहालत [ignorance] में डूबा रहने के लिए छोड़ दें। (54)

 

क्या वे समझते हैं कि हमने जो दौलत और सन्तान उन्हें दे रखी है, (55)

 

तो क्या हम उन्हें अच्छी चीज़ों को देने में जल्दी मचा रहे हैं? (56)

 

असल मेंउन्हें (सच्चाई का) कोई अंदाज़ा है ही नहीं! जो लोग अपने रब के डर से सहमे रहते हैं, (57)

 

जो लोग अपने रब की आयतों (संदेशों) में विश्वास रखते हैं, (58)

 

जो लोग अपने रब के साथ किसी और को (ख़ुदायी में) उसका साझेदार [Partner] नहीं ठहराते, (59)

 

जो (उसकी राह में) जितना कुछ देते हैं हमेशा दिल से देते हैंऔर (फिर भी) उनके दिल यह सोचकर काँप जाते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) लौटकर जाना है; (60)

 

तो बेशक यही वे लोग हैंजो भलाई के कामों में तेज़ी दिखाते हैंऔर यही हैं जो इस राह में सबसे आगे निकल जाने वाले हैं! (61)

 

और हम किसी जान पर (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ लादते हैं जितना कि वह उसे उठा सके-----  हमारे पास (इन सब की हालत व क्षमता के लिए) एक किताब हैजो (सब कुछ) ठीक-ठीक बता देती है---- और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि किसी जान के साथ अन्याय हो। (62)

 

मगर (असल में) उन (विश्वास न करनेवालों) के दिल इन बातों को नहीं जानते और अज्ञानता में डूबे हुए हैंऔर इसके अलावा और भी कई (बुरे) कर्म हैं जो वे हमेशा करते रहते हैं। (63

 

(वे करते रहेंगे) यहाँ तक कि जब हमारी यातना आ पहुँचेगी और उनके बिगड़े हुए धनी लोगों को अपने घेरे में ले लेगीतब वे मदद के लिए रोने-चिल्लाने लगेंगे: (64)

 

(कहा जाएगा,) "बंद करो आज रोना-चिल्लानातुम्हें हमारी ओर से कोई मदद मिलने वाली नहीं है। (65)

 

एक समय था कि तुम्हें बार बार मेरी आयतें सुनाई जाती थींमगर तुम घमंड में उल्टे पाँव वहाँ से चल देते थे, (66)

 

 और लोगों के बीच अपनी शामें उस [क़ुरआन] का मज़ाक़ उड़ाने में लगा देते थे। (67)

 

 

क्या उन्होंने इस [अल्लाह की वाणी] पर विचार नहीं कियाक्या उनके पास ऐसी कोई अजीब चीज़ आ गई है जो उनके बाप-दादा के पास नहीं आई थी? (68)

 

या क्या वे अपने रसूल को (पहले से) जानते ही न थेइसलिए वे इसे मानने से इंकार करते हैं? (69

 

या वे कहते हैं कि इस रसूल पर जुनून सवार हो गया हैनहीं(इनमें से कोई बात नहीं हो सकती) बल्कि वह उनके पास सच्चाई लेकर आए हैं मगर उनमें से ज़्यादातर लोग सच से नफ़रत करते हैं, (70

 

लेकिन सच्चाई अगर कहीं उनकी इच्छाओं के मुताबिक़ हो जातीतो आसमानज़मीन और वह सब जो इनमें हैसब बर्बाद हो जाते। हम उनके पास उनकी सीख के लिए (नसीहत का) संदेश लेकर आए हैंऔर वे हैं कि इस संदेश से मुँह मोड़ लेते हैं। (71)

 

क्या [ऐ रसूल] (वे समझते हैं कि) आप इनसे अपने लिए कोई धन-दौलत माँगते हैंहालाँकि आपके लिए तो आपके रब का दिया ही सबसे अच्छा है: और वही सबसे अच्छी रोज़ी देनेवाला है। (72)

 

सच यह है कि आप बेशक उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हैं, (73)

 

मगर जो लोग आख़िरत [Hereafter] में विश्वास नहीं रखतेवे इस मार्ग से भटके हुए हैं। (74)

 

यहाँ तक कि अगर हम उनपर (कुछ और) दया करें और उनसे उनकी तकलीफ़ें भी दूर कर दें (तो क्या वे शुक्र अदा करेंगे?, नहीं)तब भी वे भटकते हुए मर्यादाओं को तोड़ने में और अधिक लगे रहेंगे। (75)

 

हम उन्हें पहले भी (कुछ) सज़ा दे चुके हैंतब भी वे अपने रब के आगे झुके नहीं: वे विनम्र भाव से उस समय तक नहीं झुकेंगे (76

 

जब तक कि हम उन पर कठोर यातना का द्वार न खोल दें---- और तब वे अचानक पूरी तरह से निराशा में डूबकर रह जाएंगे। (77)

 

 

वह अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे (सुनने के) लिए कान(देखने के लिए) आँखे और (सोचने के लिए) दिल बनाए-----(मगर) बहुत कम ऐसा होता है कि तुम शुक्र अदा करो! (78

 

वही है जिसने तुम्हें धरती में (चारों ओर) फैला दियाऔर वही है जिसके सामने तुम इकट्ठा करके लाए जाओगे:  (79)

 

वही है जो ज़िंदगी और मौत देता हैरात और दिन का बारी बारी से आना जाना भी उसी के हाथ में हैतो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (80)

 

लेकिनअपने से पहले गुज़र चुके लोगों की तरह, (81)

 

वे कहते हैं, "क्याजब हम मर जाएंगेऔर मिट्टी और हड्डियों के चूरे में बदल जाएँगेतो क्या सचमुच हमें दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (82)

 

हमने ऐसे वादे पहले भी सुन रखे हैंऔर ऐसी बातें हमारे बाप-दादा भी सुनते आए थे। यह तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (83)

 

[ऐ रसूल]  आप कहें, "यह सारी ज़मीन और इसमें बसनेवालों का मालिक कौन हैबताओ अगर तुम (बहुत) जानते हो?" (84)

 

और वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह!" कहें, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते?" (85)

 

कहें, "सात आसमानों का मालिक कौन हैआलीशान सिंहासन का मालिक कौन है?" (86)

 

और वे जवाब देंगे, "अल्लाह।" कहें, "फिर अल्लाह का डर क्यों नहीं रखते?" (87)

 

कहें, "कौन है जिसके हाथ में हर चीज़ का नियंत्रण [control] है?, कौन है जो सब की रक्षा करता हैजबकि उसके विरुद्ध कोई शरण नहीं मिल सकतीबताओ अगर तुम (बहुत) जानते हो?" (88)

 

वे जवाब देंगे, "अल्लाह।" कहें, "फिर तुम कैसे इतने धोखे में पड़े हुए हो?" (89)

 

हक़ीक़त यह है कि हमने सच्चाई उन्हें साफ़-साफ़ बता दी हैऔर निश्चय ही वे बिल्कुल झूठे हैं। (90)

 

अल्लाह ने न तो कभी किसी को अपना बेटा बनायाऔर न उसके अलावा पूजने लायक़ कोई दूसरा ख़ुदा हो सकता है---- अगर कोई और (भी ख़ुदा) होतातो हर ख़ुदा अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और एक-दूसरे पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करता। अल्लाह उन बातों से कहीं ऊँचा हैजिसके बारे में वे बयान करते हैं! (91)

 

वह उसे भी जानता है जो (चीज़) दिखायी नहीं पड़ती और उसे भी जो दिखायी देती हैंवे अल्लाह के साथ जिन्हें (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार ठहराते हैंअल्लाह उन चीज़ों से कहीं ऊपर है! (92)

 

[ऐ रसूल] दुआ में कहें, "ऐ मेरे रब! जिस यातना की धमकी उन्हें दी गयी हैअगर वह यातना मेरे सामने ही घटित होने वाली है, (93)

 

तो मेरे रब! मुझे उन शैतानी करने वाले लोगों के गिरोह में शामिल न कीजिओ!" (94

 

यक़ीनन हम इस पर पूरी तरह सक्षम हैं कि जिस यातना की धमकी उन्हें दी जा रही हैहम उसे आपको (इसी जीवन में) दिखा सकते हैं। (95

 

(मगर जब तक वह नियत समय न आ जाएऐ रसूल!) बुराई को (बुराई से नहीं) अच्छाई से दूर करें----- जो कुछ बातें वे बनाते हैंहम उसे अच्छी तरह जानते हैं--- (96)

 

और (दुआ में) कहें, "ऐ मेरे रब! मैं शैतानों की उकसाहटों [temptations] से तेरी शरण चाहता हूँ;  (97)

 

और ऐ रब! मैं तेरी शरण चाहता हूँ ताकि वे मेरे नज़दीक न आ सकें।"(98)

 

 

(इंकार करनेवालों का हाल यह होगा कि) जब उनमें से किसी एक की मौत सिर पर आ खड़ी होगीतब वह पुकारेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे (संसार में) वापस जाने दे  (99)

 

ताकि वहाँ जाकर अच्छे कर्म कर सकूँ जिन्हें मैंने छोड़ रखा था।" हुक्म होगाहरगिज़ नहींयह तो बस एक कहने की बात है जो यह कह रहा हैअब ऐसा होने वाला नहीं: ऐसे लोगों के पीछे एक रोक [barrier] लगी हुई हैजो उस दिन तक रहेगी जब वे दोबारा उठाए जाएँगे। (100)

 

फिर जब वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी जब नरसिंघे [Trumpet] में फूँक मारी जाएगीतो उनके बीच के सब रिश्ते-नाते ख़त्म हो जाएंगे और वे एक-दूसरे को नहीं पूछेंगे: (101)

 

फिर जिनके पलड़े अच्छे कर्मों से भारी हुए तॊ वही हैं जो कामयाब हो जाएंगे, (102)

 

मगर वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुएतो वही हैं जिन्होंने अपने आपको बर्बादी में डाल दिया और वे हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे---- (103)

 

आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उनके होंठ दर्द से ऐंठ जाएंगे। (104)

 

(उनसे कहा जाएगा) "क्या तुम्हें मेरी आयतें बार-बार सुनाई नहीं जाती थींतब भी तुम उन्हें मानने से इंकार करते रहते थे?" (105)

 

वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा मनमौजी व अड़ियल रवैय्या हम पर हावी हो गया थाऔर हम रास्ते से भटक जाने वालों में हो गए। (106)

 

हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे! अगर हम दोबारा वैसा ही कर्म करें, तब हम ज़रूर ही शैतानियाँ करने वाले होंगे।" (107)

 

अल्लाह कहेगा, "फिटकार होइसी (जहन्नम में) में पड़े रहो! और मुझ से बात न करो। (108)

 

हमारे बन्दों में कुछ लोग ऐसे भी थे जो कहते थे हमारे रब! हम विश्वास करते हैं। हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर: तू सबसे बढ़कर दया करने वाला है।  (109)

 

मगर तुम उन लोगों की हँसी उड़ाने में लगे रहे: तुम हँसी उड़ाने में इतने मगन थे कि मेरी चेतावनियों को भी भुला बैठे। (110)

 

आज (देखो) मैंने उनको धैर्य व सब्र रखने के बदले में इनाम दिया है: यही वे लोग हैं जो कामयाब हो गए।" (111)

 

उनसे कहा जाएगाः “तुम धरती पर कितने वर्ष रहे”? (112

 

वॆ जवाब में कहेंगेः, "हम बस एक दिन या एक दिन का कुछ भाग रहे होंगे (हमें समय का ठीक अंदाज़ा नहीं)मगर उन लोगों से पूछें जो हिसाब रखते हैं।“  (113)

 

अल्लाह कहेगा, "तुम ज़मीन पर बहुत ही थोड़ा ठहरेक्या अच्छा होता कि तुम जानते होते! (114)

 

क्या तुमने यह समझा था कि हमने तुम्हें यूँ ही बेकार (बेमक़सद) पैदा किया थाऔर यह कि तुम्हें हमारी ओर (हिसाब-किताब के लिए) लौटना नहीं है?" (115)

 

 

बहुत ऊँची शान है अल्लाह कीजो सही मायने में बादशाह हैउसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहींवह महान सिंहासन का मालिक है!  (116)

 

जो कोई अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को भी पूजता है---- ऐसे देवता को जिसके मौजूद होने का उसके पास कोई सबूत नहीं है--- तो बस रब के सामने उसका हिसाब होना है। निश्चय ही (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कभी सफल नहीं होंगे। (117

 

[ऐ रसूल] आप कहें, "मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मुझ पर दया कर: तुझसे ज़्यादा दया करनेवाला कोई नहीं।" (118)

 

 

नोट:

2: नमाज़ पढ़ते समय पूरा ध्यान उसी की तरफ़ होना चाहिए। 

 

4: 'ज़कात' का शाब्दिक अर्थ है किसी चीज़ को पाक-साफ़ करना। अपने माल में से कुछ हिस्सा ग़रीबों के लिए निकालने से उनका बाक़ी माल पाक-साफ हो जाता है। इसका एक मतलब अपने आपको बुरे कर्मों और बुरे आचरण से पाक-साफ़ करना भी होता है।   

 

6: उस ज़माने में सारी दुनिया की तरह अरब में भी ग़ुलामी की प्रथा थी, मगर शारीरिक संबंध ऐसी ही लौंडियाँ के साथ जायज़ था जो ग़ुलामी की हालत में पड़ी हुई हों और जिनसे निकाह कर लिया गया हो।

 

12: एक गीली मिट्टी जो काफ़ी समय तक सड़ी-गली हालत में रही, उसी के सत से पहली बार ज़िंदगी की नींव पड़ी और आदम (अलै.) के रूप में पहला इंसान बना। 

14: आख़िर में भ्रूण [embryo] में जब रूह फूँक दी जाती है, तो वह इंसान की शक्ल में आ जाता है।

 

20: ज़ैतून के दाने में बहुत चिकनाई होती है और इसका तेल शरीर के लिए बहुत फ़ायदामंद होता है।

25: प्रतीक्षा करने को इसलिए कहा गया है ताकि हो सकता है कि कुछ समय के बाद उनका पागलपन दूर हो जाए या मौत हो जाए।  


27: इस घटना का वर्णन सूरह हूद (11: 25-48) में कुछ विस्तार से है। ........ हज़रत नूह (अलै.) का बेटा ईमान नहीं लाया था, जिसका ज़िक्र सूरह हूद में है। 


32: शायद यहाँ रसूल का मतलब हज़रत सालेह (अलै.) हैंजिन्हें समूद की क़ौम की तरफ़ भेजा गया था, देखें सूरह अ'राफ़ (7:65-73) 

45: नौ निशानियाँ दी गयी थीं: लाठी, हाथ का चमकना (20: 17-22), अकाल, पैदावार की कमी, बाढ़, टिड्डी दल, जुएं, मेढ़क और ख़ून (7: 130-133)

 

50: जहाँ मरयम ने बच्चे को जन्म दिया; देखें सूरह मरयम (19: 22-26). 

कुछ विद्वान कहते हैं कि यहाँ जिस इलाक़े का ज़िक्र है वह शायद मिस्र में नील नदी का ऊपरी इलाक़ा था जो पानी से भरपूर था। ईसा (अलै) के पैदा होने के बाद उनके घरवाले फ़िलिस्तीन से यहाँ आकर बस गए थे।

 

55: कुछ लोगों को यह ग़लतफ़हमी थी कि जिनको काफ़ी दौलत और संतान मिली हुई है, इसका मतलब यह है कि अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश है। 

 

69: मुहम्मद साहब रसूल बनने से पहले उन्हीं लोगों के बीच 40 साल रहे थे, तो वहाँ के लोग तो उन्हें अच्छी तरह से जानते थे कि वह एक सच्चे, ईमानदार और भरोसेमंद आदमी थे। 

71: उनके मन की इच्छा तो यही थी कि ब्रहमांड में एक से अधिक ख़ुदा होते, देखें 21:22

 

75: अल्लाह ने मक्का के लोगों को झिंझोड़ने के लिए उन्हें अकाल और आर्थिक बदहाली में डाला था, यह आयत ऐसे ही मौक़े पर उतरी थी। 

 

84: अरब के इंकार करने वाले लोग भी यह मानते थे कि सारी ज़मीन व आसमान का मालिक अल्लाह है, इसके बावजूद वह उसके साथ कई ख़ुदाओं को भी मानते थे।

101: फ़ैसले के दिन एक फ़रिश्ता नरसिंघा बजाएगा और सब लोग मर जाएंगे। फिर जब दूसरी बार नरसिंघा बजाया जाएगा, तो सारे मुर्दे हिसाब के लिए उठ खड़े होंगे (39:68).

 113: परलोक [आख़िरत] की यातना इतनी भयानक होगी कि जहन्नम में रहने वालों को दुनिया की सारी ज़िंदगी में बितायी गयी अवधि एक दिन या उससे भी कम लगेगी। 

 

 

 

सूरह 114: अन-नास

[आदमी लोग, People]


 

यह मक्की सूरह हैपिछली सूरह की तरह यह भी एक दुआ है जिसे शैतान या इंसानों  जिन्नों की बुराई के ख़िलाफ अल्लाह की पनाह मांगने के लिए किया जाता है। यह आख़िरी सूरह इस बात पर ज़ोर देती है कि अल्लाह सबका रब है और उसके पास हर चीज़ की ताक़त हैऔर यह कि हमें केवल उसी से मदद मांगनी चाहिएइस तरह यह पहली सूरह के केंद्रीय विषय से जुड़ जाती है। 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] आप कह दें कि मैं (सबइंसानों के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं,  (1)

जो (सब) लोगों का मालिक [Controller] है,  (2)

सब लोगों का ख़ुदा है (जिसकी बंदगी की जाती है),  (3)  

(पनाह माँगता हूँचुपके-चुपके मन में बुराई की सोच डालने वाले (शैतान) की बुराई सेजो (अल्लाह को याद करने सेपीछे को छुप जाता है ------ (4)

जो लोगों के दिलों में बुराई की सोच बैठा देता है -------  (5)

चाहे वह (बुराई पर उकसाने वाला शैतान) जिन्नों में से हो (जो दिखायी न देता हो) या आदमियों में से।”  (6)

 

 

नोट:

1: इस सूरह के अलावा चार और ऐसी सूरह हैं जो इसी तरह से शुरु हुई हैं कि "आप कह दें", देखें 72, 109, 112 और 113.

4: मन में बुराई की सोच डालने वाले शैतान के बारे में देखें 7:20; 20:120; 22:52; 50:16.

6: सूरह अनाम (6: 112) में बताया गया है कि शैतान जिन्नों में से भी होते हैं और इंसानों में से भी। हाँजो शैतान जिन्नों में से होता हैवह दिखायी नहीं देता और वह दिलों में बुराइयाँ बैठा देता हैलेकिन इंसानों में से जो शैतान होते हैंवह नज़र आते हैं और उनकी बातें ऐसी होती हैं कि उनकी बातें सुनकर इंसान के दिल में तरह-तरह के बुरे विचार आ जाते हैंइसलिए इस आयत में मन के अंदर दोनों प्रकार की बुराई डालने वालों से पनाह माँगी गई है। शैतान की चालें कमज़ोर होती हैं और उसमें इतनी ताक़त नहीं है कि वह इंसान को गुनाह करने पर मजबूर कर सके। यह तो इंसान की आज़माइश है कि वह इंसान को बहकाने की कोशिश करता हैलेकिन जो बंदा उसके बहकावे में आने से इंकार करके अल्लाह की पनाह माँग लेतो शैतान उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।

क़ुरआन की शुरुआत सूरह फातिहा से हुई थी जिसमें अल्लाह की तारीफ़ के बाद अल्लाह से ही सीधे रास्ते के मार्गदर्शन की दुआ की गई हैऔर इसका अंत सूरह नास पर हुआ है जिसमें शैतान की बुराइयों से पनाह माँगी गई हैक्योंकि सीधे रास्ते पर चलने में उसकी बुराई से जो रुकावट पैदा हो सकती थीउसे दूर करने का तरीक़ा बता दिया गया है।

 

 

 

सूरह 72: अल-जिन्न 

[जिन्न, The Jinn]



यह एक मक्की सूरह है जिसमें एक घटना का ज़िक्र है जब जिन्नों के एक समूह ने पहली बार पैग़म्बर साहब को क़ुरआन पढकर सुनाते हुए देखा और उसकी सच्चाई पर विश्वास कर लिया (आयत 1-15). यह मक्का और अरब के लोगों के सीखने के लिए एक सबक़ हैऔर उन्हें यह भी कहा गया है कि पैग़म्बर उन तक अल्लाह का संदेश पहुँचाकर ही उनकी मदद कर सकते हैं --- अल्लाह सर्वशक्तिमान है (आयत 16-28). विश्वास न करने वालों को फ़ैसले के दिन अल्लाह का सामना करने की चेतावनी दी गई है (आयत 23-27). 

 

 

विषय:

01-25: जिन्नों ने क़ुरआन पर विश्वास किया

16-19: एक चेतावनी

 

20-28: घोषणाओं का सिलसिला 

  

 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

(ऐ रसूल) आप कह दें: मेरी ओर वही”[revelation] भेजी गयी है कि जिन्नों के एक दल ने (मेरे क़ुरआन पढ़ने को) ध्यान से सुनातो (जाकर अपनी क़ौम से) कहने लगे: बेशक हमने एक अजीब क़ुरआन सुना है,  (1)

जो अच्छाई की राह पर चलने का रास्ता दिखाती हैइसलिए हमने उस पर विश्वास कर लिया है ---- और अब हम (इबादत में) अपने रब के साथ किसी और को कभी साझेदार [partner] नहीं ठहराएँगे----  (2)

और यह कि, “हमारे रब की शान बहुत ऊँची है! उसकी न कोई पत्नी है और न ही कोई औलाद।”  (3)

हममें से कुछ मूर्ख लोग अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहा करते थे जो सच्चाई से बहुत दूर थीं,  (4)

हालाँकि हमने यह समझा था कि इंसान और जिन्न अल्लाह के बारे में कभी झूठ बोलने की हिम्मत नहीं करेंगे।  (5)

इंसानों में से कुछ लोगों ने पहले भी जिन्नों से शरण माँगी हैमगर इससे जिन्नों ने उन्हें केवल और ज़्यादा भटका ही दिया था।  (6)

वे [इंसान] समझते थेजैसा कि तुमने (ए जिन्नों के समूह!) समझाकि अल्लाह (मरने के बाद) कभी किसी को दोबारा नहीं उठाएगा।  (7)

हम (जिन्नों) ने आसमानों को टटोलना चाहा तो उन्हें कड़े पहरेदारों और (अंगारों की तरह) जलने और चमकनेवाले सितारों [shooting stars] से भरा हुआ पाया ---- (8)

हम (आगे होने वाली चीज़ों की सुन-गुन लेने के लिए) पहले उस [आसमान] के कुछ स्थानों पर बैठ जाया करते थेमगर अब जो कोई (चोरी-छुपे) सुनना चाहेतो वह देखता है कि कोई आग की लौ है जो उसके घात में लगी हुई है---- (9)

(सो अब),  हम नहीं जानते कि (हमारे ऊपर रोक लगा देने से) ज़मीन पर रहने वालों के साथ कोई बुरा मामला करने का इरादा किया गया हैया उनके रब ने उनके साथ भलाई का (व सीधा रास्ता दिखाने का) इरादा किया है।”  (10)

हममें से कुछ अच्छे व नेक हैं और हम (ही) में से कुछ ऐसे (नेक) नहीं हैं: हम अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं। (11) 

हम जानते हैं कि हम अल्लाह को ज़मीन में कभी भी आजिज़ [frustrate] नहीं कर सकतेहम उससे बचकर कहीं भाग भी नहीं सकते।  (12)

जब हमने रास्ता दिखानेवाली (किताब) को सुना तो उस पर विश्वास कर लिया: फिर जो कोई अपने रब पर विश्वास कर लेता हैउसे न तो किसी नुक़सान से डरने की ज़रूरत हैऔर न किसी अन्याय से। (13)

हममें से कुछ तो उसी (अल्लाह) के सामने अपना सिर झुकाते हैंऔर कुछ दूसरे हैं जो ग़लत रास्तों पर चलते हैं: जो (अल्लाह के) सामने अपना सिर झुकाते हैंउन्होंने तो सूझ-बूझ की राह ढूँढ ली,  (14)

मगर जिन्होंने (सच्चाई से मुँह मोड़ते हुए) ग़लत रास्ता अपना लियातो वे जहन्नम का ईंधन बनने वाले हैं। (15)

(ऐ रसूल आप मक्का के लोगों से कह दें)अगर उन लोगों ने (सच्चाई का) सही रास्ता अपनाया होतातो हमने उनके लिए बड़ी मात्रा में पीने का पानी उपलब्ध करा दिया होता। (16)

ताकि हम इस (नेमत के द्वारा) उनकी परीक्षा ले सकें और जो कोई आदमी अपने रब की याद से मुंह मोड़ेगातो वह [अल्लाह] उसे बहुत सख़्त अज़ाब [यातना] में डाल देगा। (17)

और यह कि सभी मस्जिदें अल्लाह के लिए (विशेष) हैंसो उनमें अल्लाह के साथ किसी और की इबादत [पूजा] मत किया करो। (18)

और यह कि जब अल्लाह के बंदे (मुहम्मद सल्ल.) उसकी इबादत करने खड़े हुए तो (जिन्नों के) समूह के समूह वहाँ जमा हो गये (ताकि उनको क़ुरआन पढ़ते हुए सुन सकें),  (19)

आप कह दें कि मैं तो केवल अपने रब की इबादत करता हूँ और उसके साथ किसी को (ख़ुदायी में उसका) साझेदार या शरीक नहीं मानता”  (20)

आप कह दें कि न तुम्हारा कोई नुक़सान [यानी तुम्हारा सच्चाई से इंकार करना] मेरे अधिकार में है और न भलाई (यानी तुम्हारा सच्चाई पर विश्वास कर लेना] (21)

आप कह दें कि, “न मुझे कभी कोई अल्लाह के (हुक्म के विरुद्ध) अज़ाब [यातना] से बचा सकता है और न मैं उसे छोड़कर कोई पनाह की जगह पा सकता हूँ।" (22)

मगर अल्लाह की ओर से आदेश और संदेश पहुंचाना (मेरी ज़िम्मेदारी है)और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की बात न मानेगातो निश्चित रूप से इसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें ऐसे लोग हमेशा रहेंगे। (23)

(और वे लोग बुराई पर अड़े रहेंगे) यहाँ तक ​​कि जब वे (अज़ाब) देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जा रहा हैतो (उस समय) उन्हें पता चल जाएगा कि किसके मददगार कमज़ोर हैं और कौन संख्या में कम है। (24)

आप कह दें: मैं नहीं जानता कि जिस (क़यामत के दिन) से तुम्हें डराया जा रहा हैवह क़रीब है या इसके लिए मेरे रब ने कोई लंबी अवधि निर्धारित कर रखी है,” (25)

(वही) सारे भेद का जानने वाला हैइसलिए वह अपने भेद के बारे में किसी (आम आदमी) को नहीं बताता,  (26)

सिवाय किसी पैग़म्बर के जिसे उसने (इस काम के लिए) पसंद कर लिया होऐसी सूरत में वह उस पैग़म्बर के आगे और पीछे (भेद की बातों की रक्षा के लिए) कुछ रक्षकों को लगा देता है,   (27)

ताकि अल्लाह (यह) जान ले कि बेशक उनके (रसूलों) ने अपने रब के संदेश पहुंचा दिएऔर (अल्लाह के आदेश और भेद की बातों के ज्ञान में से) जो कुछ उनके पास है, अल्लाह को (पहले से) इनकी सारी जानकारी हैऔर उसने हर एक चीज़ का हिसाब-किताब कर रखा है।  (28)





नोट:

1: जिन्न आग से पैदा किए गए हैं जो हमें दिखायी नहीं देते।

2: मुहम्मद (सल्ल.) जिस तरह इंसानों के लिए पैग़म्बर [Prophet] बनाये गए थे, उसी तरह आप जिन्नों के लिए भी पैग़ंबर थे। आपने जिन्नों के बीच भी अल्लाह के संदेश को फैलाया। आपके नबी होने से पहले जिन्नो को आसमान के करीब तक पहुंचने दिया जाता था, लेकिन आपके नबी होने के बाद जब कोई जिन्न या शैतान आसमान के नजदीक पहुंचना चाहता, तो उसे एक शोले के द्वारा मार भगाया जाता था, जैसा कि सूरह अल-हिज्र (15: 17) और सूरह साफ़्फ़ात (37:10) में आया है। बुख़ारी की हदीस में है कि जिन्नों ने जब इस बदली हुई हालत को देखा तो इसका पता लगाने के लिए उनका एक दल दुनिया का दौरा करने के लिए निकला। यह वह समय था जब मुहम्मद साहब तायफ़ से वापस मक्का आ रहे थे और 'नख़ला' के स्थान पर पड़ाव डाले हुए थे, वहां आपने सुबह की नमाज़ में कुरआन पढ़ना शुरू किया तो जिन्नों का यह दल उस वक्त वहाँ से गुज़र रहा था, उसने जब यह वाणी सुनी तो उसे सुनने के लिए वे रुक गए। इस वाणी का उन पर ऐसा असर हुआ कि वे मुस्लिम हो गए और उन्होंने अपनी कौम के पास इस संदेश को पहुंचाया। इन आयतों में इसी घटना का वर्णन संक्षेप में किया गया है। इस घटना की तरफ़ एक इशारा सूरह अहक़ाफ़ (46: 30) में भी मिलता है। बाद में जिन्नों के कई प्रतिनिधि-मंडल दीन के बारे में बात करने के लिए मुहम्मद (सल्ल) के पास आए। 

4: मतलब यह है कि सच्चाई से इंकार करना, अल्लाह के बराबर दूसरे (देवी-देवताओं) को ठहराना और अल्लाह के बारे में गलत धारणा रखने की बातें।

6: जाहिलियत के जमाने [Period of ignorance] में जब लोग अपनी यात्रा के दौरान किसी जंगल में डेरा डालते, तो उस जंगल के जिन्नों से शरण मांगते थे कि वे उन्हें हर तरह के प्राणियों से जंगल में सुरक्षा दे। जिन्नों ने जब इंसानों को ऐसा करते देखा तो उन्हें यह लगने लगा कि वे इंसानों से बढ़कर हैं। इस तरह उनकी गुमराही में और बढ़ोतरी हो गई। 

7: यहां पर जिन्नों का एक समूह अपनी कौम के दूसरे जिन्नों से कह रहा हैं कि जिस तरह तुम आख़िरत [परलोक] को नहीं मानते थे, उसी तरह काफ़ी इंसान भी मरने के बाद की ज़िंदगी पर विश्वास नहीं करते थेलेकिन अब यह बात गलत साबित हो गई।

8: आसमानों में फरिश्तों को पहरे पर लगा दिया गया है और जो जिन्न चोरी-छिपे फरिश्तों की बातें सुनने के लिए आसमान के नज़दीक जाता है, उसको फ़रिश्ते शोले फेंककर मार भगाते हैं। 

11: इंसानों की तरह सभी जिन्नों का भी मजहब एक नहीं हैबल्कि जिन्नों में भी कई विचारधाराओं को मानने वाले होते हैं। इसीलिए उन्हें भी सही रास्ता दिखानेवाले की ज़रूरत थीजिसे अल्लाह ने मुहम्मद साहब के द्वारा पूरा कर दिया।

 17: जिन्नो की घटना सुनाकर अब मक्का वालों से कहा जा रहा है कि जिस तरह जिन्नों ने सच्चाई को मानते हुए मुहम्मद साहब की बातों पर विश्वास कर लिया, उसी तरह तुम्हें भी उन पर विश्वास कर लेना चाहिए। अगर तुमने ऐसा किया तो अल्लाह तुम पर बारिशों की नेमत भेज देगा। यहां बारिश का खासकर वर्णन इसलिए आया है कि उस वक्त मक्का में अकाल पड़ा हुआ था। 

21: अर्थात असली मालिक अल्लाह हैरसूल तो अल्लाह और बंदे के बीच एक माध्यम हैं। 

24: सूरह मरियम (19:73) में है कि काफ़िर लोग मुसलमानों से कहते थे  कि हम लोग ताक़त और गिनती में तुम से कहीं ज़्यादा हैं। इस आयत में यह कहा गया है कि जब अल्लाह की यातना सामने आ जाएगी तो उस वक्त उन्हें पता चल जाएगा कि किसके मददगार कमज़ोर या संख्या में ज़्यादा हैं।

27: रक्षक [watchers] यानी वे फ़रिश्ते जो पैग़म्बर पर नज़र रखते हैं कि वह अल्लाह के संदेश को लोगों तक सही-सही पहुँचा दें।  

 

 

 

 

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