Late Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के बाद के दिनों की सूरतें
उप समूह – III
सूरह 27: अन-नम्ल
[चीटियाँ, The Ants]
यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम सुलैमान (अलै) की कहानी (आयत 18-19) में आयी चींटियों के ज़िक्र पर पड़ा है, साथ में एक परिंदे "हुदहुद" और सबा की रानी का भी ज़िक्र आया है। इसके शुरुआत और अंत दोनों जगहों पर क़ुरआन को ईमान रखनेवालों के लिए ख़ुशख़बरी और इंकार करने वालों के लिए चेतावनी के तौर पर पेश किया गया है। इसमें पहले गुज़र चुके नबियों की कहानियाँ सुनायी गई हैं, और साथ में विश्वास न करने वाले समुदायों की बर्बादी की दास्तानें भी बयान हुई हैं। अल्लाह की शक्ति किस प्रकृति की होती है, इसके कुछ उदाहरण दिए गए हैं, और इसका मुक़ाबला ऐसे ख़ुदाओं से किया गया है जिन्हें विश्वास न करने वालों ने अल्लाह का 'साझेदार' [Partner] ठहरा रखा है, जिनके पास कोई ताक़त नहीं है। सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए फ़ैसले के दिन का दृश्य (82-90) भी दिखाया गया है। पैग़म्बर साहब को फिर से आश्वस्त किया गया है कि क़ुरआन को सच्चाई के साथ उतारा जा रहा है और उनकी ज़िम्मेदारी बस लोगों तक संदेश पहुँचा देने की है, फ़ैसला करने का काम सिर्फ़ अल्लाह का है।
विषय:
01-06: क़ुरआन, ईमानवाले और (सच्चाई से) इंकार करने वाले
07-14: मूसा (अलै) को पुकारा गया
15-44: सुलैमान (अलै) और सबा की रानी की कहानी
45-53: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी
54-58: लूत (अलै) और उनके लोगों की कहानी
59-64: अल्लाह जैसा कोई नहीं
65-66: सिर्फ़ अल्लाह जानता है कि भविष्य में क्या होगा
67-75: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने की बात को नहीं
मानते
76-81: इसराईल की संतानों [यहूदी व ईसाई] के आपसी मतभेद को क़ुरआन
स्पष्ट कर देती है
82-90: फ़ैसले के दिन का दृश्य
91-93: रसूल का मिशन
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰।
ये आयतें हैं क़ुरआन की ---- एक ऐसी किताब की, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है; (1)
ईमान रखने वालों को सही रास्ता दिखानेवाली और
खुशख़बरी सुनानेवाली, (2)
(ईमानवाले वे हैं) जो नमाज़ को पाबंदी से अदा
करते हैं, और (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [alms] देते हैं, और आने वाले जीवन [आख़िरत/ परलोक] में पक्का
विश्वास रखते हैं। (3)
रहे वे लोग जो आने वाले जीवन [Hereafter] में विश्वास नहीं रखते, उनकी नज़रों में हमने उनके कर्मों को बड़ा
लुभावना बना दिया है, अतः वे (अंधों की तरह) भटकते फिरते हैं: (4)
यही वे लोग हैं, जिनके लिए बहुत बुरी यातना होगी, और वे आने वाले जीवन में सबसे ज़्यादा नुक़सान
उठाने वालों में रहेंगे। (5)
[ऐ रसूल] आप इस क़ुरआन को उस (अल्लाह) की तरफ़
से पा रहे हैं, जो (अपने हर काम में) बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (6)
याद करो जब मूसा [Moses] ने अपने घरवालों से कहा, "मैंने एक आग-सी देखी है। मैं वहाँ से (रास्ते
की) कोई ख़बर लेकर आता हूँ, या तुम्हारे लिए कोई जलती हुई लकड़ी लेकर आता
हूँ, ताकि
तुम अपने आपको गर्मा सको।" (7)
फिर जब वह आग के नज़दीक पहुँचे, तो एक आवाज़ ने उन्हें पुकारा, "बरकतवाला [Blessed] है वह, जो इस आग के नज़दीक है, और वह भी [फ़रिश्ते] जो इसको घेरे हुए हैं; महान है अल्लाह, सारे संसार का रब! (8)
ऐ मूसा! मैं अल्लाह हूँ, बेहद प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझवाला! (9)
अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" जब मूसा ने देखा
कि वह (लाठी) हिल-डुल रही है जैसे कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर न देखा।
(फिर आवाज़ आयी) "ऐ मूसा, डरो नहीं! मेरी मौजूदगी में रसूलों को डरने की
कोई ज़रूरत नहीं, (10)
मैं सचमुच बड़ा माफ़ करनेवाला, और उन लोगों पर बहुत दया करनेवाला हूँ, जो ग़लती करते हैं, और फिर की गयी बुराई को अच्छाई में बदल देते
हैं। (11)
अपना हाथ गिरेबान में डालो, और फिर (बाहर निकालो) तो वह बिना किसी ख़राबी
के सफ़ेद चमकता हुआ बाहर निकलेगा। यह (दो निशानियाँ) उन नौ (9) निशानियों में से हैं जिन्हें फ़िरऔन और उसकी
क़ौम के सामने जाकर तुम्हें दिखाना होगा; वे सचमुच (मर्यादा की) हद से आगे बढ़ हुए
हैं।" (12)
मगर जब आँखें खोल देने वाली हमारी निशानियाँ
उनके पास आयीं, तो उन्होंने कहा, "यह तो साफ़ तौर से जादू मात्र है!" (13)
हालाँकि उन्होंने दिल में इन (निशानियों) को
सच जाना था, मगर उन लोगों ने शैतानी और घमंड के कारण उसे मानने से इंकार
कर दिया। अब देख लो इन गड़बड़ी [corruption] फैलाने वालों का परिणाम क्या हुआ? (14)
हमने दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को बहुत ज्ञान दिया था, (उन्होंने उसके महत्व को समझा) और उन दोनों ने
कहा था, "सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने अपने बहुत-से ईमानवाले बंदों में हम पर
ख़ास तौर से मेहरबानी [favour] की।" (15)
दाऊद के बाद सुलैमान उनका वारिस हुआ। उसने
कहा, "ऐ लोगो! हमें चिड़ियों की बोली सिखायी गई है, और हमें हर चीज़ में हिस्सा दिया गया है: यह
सचमुच (अल्लाह की) ख़ास मेहरबानी है।" (16)
(एक बार) सुलैमान के सामने जिन्नों, आदमियों और चिड़ियों से तैयार की हुई सेना एक
ख़ास वरीयता के अनुसार क़तारों में खड़ी [marshalled] की गई, (17)
और सेना जब चींटियों की घाटी में पहुँची, तो एक चींटी ने कहा, "ऐ चींटियों! अपने अपने घरों में घुस जाओ।
कहीं सुलैमान और उसकी सेना तुम्हें अनजाने में कुचल ही न डाले।" (18)
सुलैमान उसकी बात सुनकर ज़ोर से मुस्कराए और
कहा, "मेरे रब! मुझ में ऐसा गुण दे दे कि जो नेमतें [blessings] तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को दी हैं, मैं उनका शुक्र अदा करता रहूँ, और यह कि अच्छे कर्म करूँ जिससे तू ख़ुश हो
जाए; और अपने करम से मुझे अपने नेक व अच्छे बंदों के दर्जे में
शामिल कर ले।" (19)
(एक बार) सुलैमान ने चिड़ियों की उपस्थिति की
जाँच की और कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद [Hoopoe] को नहीं देख रहा हूँ? क्या वह यहाँ हाज़िर नहीं? (20)
अगर उसने अपने यहाँ मौजूद न होने का कोई सही
कारण न बताया, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा या उसे मार ही डालूँगा।" (21)
लेकिन हुदहुद ने बाहर में ज़्यादा देर नहीं
लगायी: उसने (आकर) कहा, "मुझे कुछ ऐसी बात पता चली है जो आपको मालूम नहीं है: मैं
सबा [Sheba] से आपके पास एक पक्की ख़बर लेकर आया हूँ। (22)
मैंने वहाँ एक औरत को उन लोगों पर शासन करते
हुए पाया, जिसे हर चीज़ का एक हिस्सा दिया गया है---- उसका एक ज़बरदस्त
सिंहासन है--- (23)
(मगर) मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को
अल्लाह के बजाए सूरज की पूजा करते हुए पाया। शैतान ने उन पर कुछ ऐसा (जादू) किया
है कि उन लोगों को अपने (बुरे) कर्म बहुत भले मालूम होते हैं, और उन्हें सही मार्ग से भटका रखा है: वे सही
मार्ग पर नहीं चल सकते। (24)
क्या उन्हें उस अल्लाह की इबादत नहीं करनी
चाहिए, जो आसमानों और ज़मीन में कहीं भी दबी-छिपी चीज़ें बाहर निकाल
लाता है, और वह जानता है —-- उसे भी जो कुछ तुम छिपाते हो और उसे भी जो
कुछ तुम सामने बता देते हो? (25)
वह अल्लाह है, उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं, ज़बरदस्त सिंहासन का मालिक है।" (26)
सुलैमान ने कहा, "हम देखेंगे कि तू सच कह रहा है या झूठ बोल
रहा है। (27)
मेरा यह ख़त लेकर जा, और इसे उन लोगों तक पहुँचा दे, फिर उनके पास से अलग हट जाना, और देखना कि वे क्या जवाब भेजते हैं।" (28)
सबा की मल्लिका ने कहा, "ऐ सरदारो! एक बड़ा ही शानदार ख़त मेरे पास भेजा
गया है। (29)
वह सुलैमान की तरफ़ से है और उसमें यूँ लिखा
है, “अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा मेहरबान, अत्यन्त दयावान है, (30)
अपने आपको मुझ से ऊपर न समझो, और मेरे पास चली आओ (अल्लाह के सामने) झुकते
हुए।" (31)
सबा की रानी ने कहा, "ऐ सरदारो! मेरे सामने जो मामला आया है, इस पर आप मुझे सही सलाह दें: (आप तो जानते हैं
कि) मैं सारे मामलों का फ़ैसला हमेशा आप लोगों की मौजूदगी में ही करती हूँ।"
(32)
उन्होंने जवाब दिया, "हमारी सेना बहुत तगड़ी है और हम पूरी ताक़त से
युद्ध लड़ते हैं, मगर कमान तो आपके हाथ में है, अतः आप सोच लें कि आपको क्या आदेश देना
है।" (33)
सबा की रानी ने कहा, "जब भी कभी राजा किसी शहर में (सेना के साथ)
घुसते हैं, तो उसे खंडहर बना देते हैं और वहाँ के सरदारों को अपमानित
करते हैं ---- वे भी ऐसा ही करेंगे। (34)
मगर मैं उनके पास एक तोहफ़ा भेजने जा रही हूँ; फिर देखती हूँ कि मेरे दूत क्या जवाब लेकर
लौटते हैं।" (35)
फिर जब वह दूत सुलैमान के पास पहुँचा, तो सुलैमान ने उससे कहा, "क्या! तुम क्या मुझे धन-दौलत देना चाहते हो? जो कुछ अल्लाह ने मुझे दे रखा है, वह उससे कहीं उत्तम है जो उसने तुम्हें दिया है, मगर तब भी तुम लोग अपने इस तोहफ़े से बड़े ख़ुश
मालूम होते हो! (36)
अपने लोगों के पास वापस चले जाओ: अब हम उन पर
ज़रूर अपनी सेना के साथ चढ़ायी करेंगे जिसे रोक पाना उनके बस का नहीं, उन्हें अपमानित करके व नीचा दिखाते हुए हम उन्हें
उस ज़मीन से खदेड़ देंगे।" (37)
फिर सुलैमान ने कहा, "ऐ सरदारो! इससे पहले कि वे लोग हमारे पास झुके
हुए आएँ, तुममें
से कौन है जो उस (रानी) का सिंहासन लेकर मेरे पास आ सकता है?" (38)
एक ताक़तवर और चालाक जिन्न ने जवाब दिया, "इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठें, मैं उस (सिंहासन) को आपके पास ले आऊँगा। मैं
मज़बूत भी हूँ, और
भरोसे के लायक़ भी।" (39)
मगर उनमें से एक आदमी जिसे आसमानी किताब का ज्ञान
था, कहने
लगा, "मैं पलक झपकते ही उसे आपके पास ले आऊँगा।"
फिर जब सुलैमान ने उस सिंहासन को अपने पास
रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का मुझ पर एहसान है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं उसका शुक्र
अदा करता हूँ या नहीं: अगर कोई शुक्र अदा करता है तो वह अपने ही फ़ायदे के लिए करता
है, और अगर कोई उसका शुक्र अदा नहीं करता, तो मेरा रब किसी पर निर्भर तो नहीं, बल्कि देने में वह बड़ा उदार [generous] है।" (40)
फिर उसने कहा, "उसके सिंहासन का रूप बदल दो, फिर देखेंगे कि वह उसे पहचान पाती है या
नहीं।" (41)
जब सबा की रानी वहाँ पहुँचीं तो उनसे पूछा
गया, "क्या आपका सिंहासन ऐसा ही है?" उसने कहा, "हाँ, देखकर लगता तो है”, (सुलैमान ने कहा), “हमें तो इस रानी से पहले ही (सही) ज्ञान दे
दिया गया था, और हम अल्लाह के सामने भक्ति-भाव से अपने आपको झुकाते
थे"; (42)
मगर चूँकि अल्लाह के बजाए वह किसी और को
[सूरज को] पूजती थी, इसलिए (अल्लाह में) विश्वास कर लेने [ईमान] से रानी अब तक
रुकी रही थी, असल में वह एक इंकार करनेवाली [काफ़िर] क़ौम में से थी। (43)
फिर सबा की रानी से कहा गया, "महल में दाख़िल हों।" मगर जब उसने वहाँ
देखा, तो उसे ऐसा लगा कि पानी का एक गहरा हौज़ है और इसीलिए (उसने
पाँव के कपड़े चढ़ा लिए तो) उसकी टांगें दिखने लगीं। सुलैमान ने समझाया, "यह तो बस शीशे से बना हुआ हाल है।" रानी
बोल उठी, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने (अब तक ग़लती करके) अपने आप पर
ज़ुल्म किया: अब मैं, सुलैमान के साथ पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकती हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (44)
समूद के लोगों की ओर हमने उनके भाई, सालेह, को (पैग़म्बर बनाया, और) यह कहते हुए भेजा कि "केवल अल्लाह
की बन्दगी करो, "मगर वे लोग दो विरोधी गुटों में बँट गए। (45)
सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, तुम अच्छाई के बदले बुराई को ले आने की जल्दी
क्यों मचा रहे हो? तुम अल्लाह से (अपनी ग़लतियों की) माफ़ी क्यों नहीं मांगते, ताकि तुम पर दया की जा सके।" (46)
वे कहने लगे, "हम तुम्हें और तुम्हारे माननेवालों को ‘बुरा शगुन’ [evil omen] समझते हैं।" सालेह ने जवाब दिया, "कोई भी शगुन जो तुम देखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह ही करेगा: असल में तुम
लोगों की परीक्षा ली जा रही है।" (47)
उस शहर में नौ (9) लोग ऐसे थे जो ज़मीन पर गड़बड़ी [corruption] फैलाते रहते थे, और ग़लत चीज़ों को सुधारते न थे। (48)
वे बोले, “क़सम अल्लाह की: हम सालेह और उसके घरवालों पर
रात के समय हमला करेंगे, फिर उसके वारिस (परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के
विनाश के समय वहाँ मौजूद ही नहीं थे, और यह कि हम सच बोल रहे हैं।" (49)
इस तरह उन्होंने एक शैतानी योजना बनायी थी, मगर एक योजना तो हमने भी बनायी थी जिसकी
उन्हें कोई ख़बर तक न थी। (50)
अब देखो कि उनकी चालों का कैसा अंजाम हुआ:
हमने उन्हें और उनके सभी लोगों को पूरी तरह से तबाह-बर्बाद करके रख दिया। (51)
यह उनके कुकर्मों का नतीजा है कि आज भी उनके
घर उजाड़ खंडहर के रूप में पड़े हुए हैं--- सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक बड़ी
निशानी है, जो जानते हैं---- (52)
मगर हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान रखते
थे और हर तरह की बुराइयों से बचते थे। (53)
हमने लूत [Lot] को भी उनकी क़ौम के लोगों के पास (पैग़म्बर
बनाकर) भेजा, उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "कैसे खुली आँखों देखते हुए भी तुम ऐसे अश्लील
कर्म करते हो? (54)
कैसे तुम (सेक्स के लिए) औरतों को छोड़कर
मर्दों के पीछे जाते हो? कैसे जाहिल लोग हो तुम!" (55)
उनके लोगों ने इस बात का एक ही जवाब दिया, और कहा, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो लूत के
माननेवालों को! ये लोग (सेक्स के मामले में) बहुत पवित्र बनते हैं!" (56)
फिर हमने उन्हें और उनके परिवारवालों को तो
बचा लिया---- केवल उनकी पत्नी को छोड़कर जिसे हमने तय कर रखा था कि वह पीछे रह जाने
वालों में से होगी--- (57)
और हमने उन पर एक ज़बरदस्त बारिश बरसाई। और
कैसी भयानक बारिश थी वह, जो उन लोगों पर बरस पड़ी जिन्हें सावधान किया जा चुका था!
(58)
[ऐ रसूल] कह दें, "प्रशंसा तो सारी अल्लाह के लिए है, और सलामती हो उसके उन बंदों पर जिन्हें उसने
(पैग़म्बर के रूप में) चुन लिया। तो बताओ कौन बेहतर है: अल्लाह बेहतर है या वे
जिनको उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार [Partners] ठहरा रखा है? (59)
आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया? आसमान से तुम्हारे लिए पानी कौन बरसाता है---
जिसकी मदद से हमने ख़ुशनुमा बाग़ उगा दिए: तुम्हारे बस का नहीं था कि तुम उनमें
पेड़ों को उगा पाते--- क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर कुछ लोग हैं जो दूसरों को अल्लाह के
बराबर का ठहराते हैं! (60)
कौन है जिसने धरती को रहने की एक स्थायी जगह
बनायी, और किसने उसके बीच से नदियाँ बहा दीं? किसने इस पर ऐसे पहाड़ जमा दिए जो हिल नहीं
सकते और किसने दो समंदरों के बीच एक आड़ बना दी? क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर अधिकतर लोग जानते ही नहीं! (61)
कौन है वह जो परेशानी में घिरे हुए लोगों की
पुकार सुनकर जवाब देता है? कौन उनकी तकलीफ़ों को दूर करता है? कौन तुम्हें धरती पर उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा/successors] बनाता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? तुम कोई ध्यान ही नहीं देते! (62)
कौन है जो थल और जल के अँधेरों में भी (तारों
और राशियों द्वारा) तुम्हें रास्ता दिखाता है? कौन है जो अपनी रहमत [बारिश] भेजने से पहले
हवाओं को (बारिश की) ख़ुशख़बरी लेकर भेजता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? अल्लाह के अलावा वे जिनको उसका साझेदार [Partners] ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा व महान है! (63)
कौन है जो (हर चीज़ को पैदा करके) जीवन देता
है, और फिर उसको दोबारा पैदा करता है? कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी
देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और भी ख़ुदा है? (फिर भी अगर नहीं मानते, तो) कहें, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो इसका कोई प्रमाण ले आओ।" (64)
कहें, "अल्लाह को छोड़कर, आसमानों और ज़मीन में कोई नहीं जिसे (सामान्य
बुद्धि से परे) अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों की जानकारी हो।” वे नहीं जानते कि मुर्दा पड़े हुए लोग कब
दोबारा उठाए जाएँगे: (65)
वे अपने ज्ञान से आख़िरत [परलोक] के बारे में
नहीं समझ सकते; वे इसके बारे में संदेह में पड़े हैं, बल्कि वे (शक में) अंधे हो चुके हैं। (66)
सो जिन लोगों ने इंकार किया [काफ़िर], वे कहते हैं, "क्या! जब हम और हमारे बाप-दादा (मर के)
धूल-मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या वास्तव में हमें (ज़िंदा करके) उठाया जाएगा? (67)
ऐसे वादों के बारे में हमलोगों ने पहले भी
सुन रखा है, और हमारे बाप-दादाओं ने भी। ये तो बस पुराने ज़माने की
कहानियाँ हैं।" (68)
[ऐ रसूल] आप कहें "ज़मीन पर यहाँ वहाँ
घूमो-फिरो और देखो कि शैतानियाँ करने वालों का कैसा अंजाम हुआ।" (69)
[ऐ रसूल] आप उन लोगों के लिए दुखी न हों; और न उनकी मक्कारी की चालों से परेशान हों। (70)
वे यह भी कहते हैं, "अगर तुम्हारी बात सच है, तो यह बताओ कि यह वादा कब पूरा होगा?" (71)
कह दें, "जिस चीज़ के आने की तुम जल्दी मचा रहे हो, बहुत सम्भव है कि उसका कोई हिस्सा तुम्हारे
बिल्कुल पास आ लगा हो।" (72)
निश्चय ही तुम्हारा रब तो लोगों पर बहुत उदार
है, मगर सच यह है कि उनमें से अधिकतर लोग शुक्र अदा नहीं करते।
(73)
वह हर उस चीज़ को जानता है जो लोगों के सीनों
में छिपी होती हैं, और हर वह चीज़ भी जानता है जो वे सामने बता देते हैं: (74)
आसमानों या ज़मीन पर छिपी हुई कोई भी चीज़ ऐसी
नहीं जो एक स्पष्ट किताब में लिखी हुई न हो। (75)
सच्चाई यह है कि यह क़ुरआन इसराईल की
सन्तानों को ऐसी अधिकतर बातें स्पष्ट कर देती है जिनके विषय में वे [यहूदी व ईसाई]
मतभेद रखते हैं। (76)
और इसमें शक नहीं कि यह ईमानवालों के लिए सही
रास्ता दिखानेवाली है, और रहमत है। (77)
निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच अपने ज्ञान
से फ़ैसला कर देगा---- वह बड़ी ताक़तवाला, सब कुछ जाननेवाला है--- (78)
अतः [ऐ रसूल], आप अल्लाह पर भरोसा रखें, आप बिल्कुल सच्चे व सही रास्ते पर हैं। (79)
आप मरे हुए आदमी को अपनी बात नहीं सुना सकते, और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेरकर चले जा रहे हों, (80)
और न आप अंधों को उनकी गुमराही से बचाकर राह
पर ला सकते हैं: आप किसी को भी अपनी बात नहीं सुना सकते सिवाए उसके, जो हमारी आयतों [निशानियों] में विश्वास रखता
हो, और हमारे सामने पूरी भक्ति से झुकता हो। (81)
जब उन लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो जाएगा, तब हम धरती में से एक जानवर सामने लाएँगे जो
उन्हें बता देगा कि वे लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे। (82)
एक दिन आएगा जब हम प्रत्येक समुदाय में से
ऐसे लोगों का एक गिरोह जमा करेंगे, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झूठ जानकर
विश्वास नहीं किया, फिर उन्हें अलग-अलग समूहों में ले जाया जाएगा, (83)
यहाँ तक कि वे (अल्लाह के) सामने पहुँच
जाएँगे, तो फिर अल्लाह कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों [संदेशों] को बिना ठीक
से समझे-बूझे ही मानने से इंकार कर दिया? या फिर तुम कर क्या रहे थे?" (84)
फिर उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला कर दिया जाएगा, क्योंकि उन लोगों ने सख़्त ग़लतियाँ की थीं: वे
कुछ बोल नहीं पाएंगे। (85)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके आराम
करने लिए (अँधेरी) रात बनायी है, और दिन को उजालेवाला बनाया (ताकि काम-काज हो
सके)? सचमुच इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो ईमान रखते हैं? (86)
और जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन पर बसने वाला हर एक बुरी
तरह डर जाएगा---- सिवाय उनके जिन्हें अल्लाह चाहे --- और सब अपनी गर्दन
झुकाए हुए उसके सामने हाज़िर होंगे। (87)
तुम पहाड़ों को देखोगे, तो तुम्हें लगेगा कि वे मज़बूती से जमे हुए
हैं, मगर वे (उस समय) बादलों की तरह उड़ते फिरेंगे: यह सब अल्लाह
की कारीगरी है, जिसने सारी चीज़ों को एकदम सही व सटीक बनाया है। तुम जो भी
करते हो, वह उसकी पूरी ख़बर रखता है: (88)
जो कोई भी अच्छे कर्म लेकर आएगा, तो बदले में उसको उससे
भी अच्छा इनाम मिलेगा, और वह उस दिन की घबराहट से बचा रहेगा, (89)
मगर जो कोई भी बुरे कर्मों को लेकर आया, तो ऐसे लोगों को मुँह के बल आग में डाल दिया
जाएगा। (और उनसे पूछा जाएगा), "जो कुछ (दुनिया में) तुम करते रहे थे, क्या तुम उन्हीं चीज़ों का बदला पा रहे हो या
किसी और चीज़ का?" (90)
[ऐ रसूल आप कह दें] मुझे जो करने का आदेश मिला
है, वह यह है कि मैं इस नगर (मक्का) के रब की बन्दगी करूँ, जिसने इस (पवित्र नगर) को कभी न मिटनेवाली
इज़्ज़त दी है। हर चीज़ उसी की है; और मुझे आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में से
रहूँ जो उस (अल्लाह) के सामने पूरी भक्ति से झुके रहते हैं; (91)
मुझे यह हुक्म हुआ है कि मैं क़ुरआन पढ़कर
सुनाऊँ।” जो कोई भी सीधे रास्ते पर चलना पसंद करता है, तो वह ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करता है। और
जो कोई भी इस [सीधे रास्ते] से भटकता है, उससे कह दें, "मैं तो बस सावधान ही करनेवाला हूँ।" (92)
और कहें, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है: जल्द ही वह
तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा देगा और तुम उन्हें पहचान लोगे।” और जो कुछ तुम सब करते हो, तुम्हारा रब उससे कभी भी बेख़बर नहीं
है।" (93)
नोट:
4: सच्चाई को न मानने की ज़िद्द और हठधर्मी के
कारण अल्लाह ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ देता है जिसके चलते वे अपने सारे बुरे
कर्मों को अच्छा समझने लगते हैं और सीधे रास्ते पर नहीं आते।
7: मूसा अपने परिवारवालों के साथ मदयन से मिस्र
जा रहे थे और अंधेरे में रास्ता भटक गए थे।
8: ... “जो इस आग के नज़दीक है", या तो यह अल्लाह के बारे में है या मूसा
(अलै.) के बारे में। एक अनुवाद, "जो इस आग में है" भी है, जहाँ आग का मतलब "नूर" यानी 'अल्लाह की रौशनी' से है।
11: मूसा (अलै.) के हाथों मिस्र में जो एक आदमी
मारा गया था (28: 15), यहाँ उसी की
तरफ़ इशारा है।
12: इन निशानियों का वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 130-33) में भी आया है। दो निशानियाँ तो मूसा (अलै.)
की लाठी, और उनका चमकता
हुआ हाथ हुए, फिर एक के बाद
एक सात (7) निशानियाँ
आयीं---- अकाल, पैदावार में
कमी, तूफ़ान, टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार, और पानी में ख़ून।
14: इनका परिणाम क्या हुआ, इसका ज़िक्र सूरह यूनुस (10: 90-92) और सूरह शुअरा (26: 60-66) में आया है।
15: अल्लाह ने उन्हें कुछ ख़ास अधिकार दिए थे, जैसे जानवरों की बोली समझना और उनसे बातचीत
करना, हवा को क़ाबू
में करना, जिन्नों से
अपने बड़े-बड़े काम लेना इत्यादि।
22: यमन के एक इलाक़े में सबा नामक क़ौम रहती थी, इसी के नाम पर उस जगह का नाम भी सबा हो गया।
उस समय वहाँ एक रानी [मल्लिका] की हुकूमत थी, जिसका नाम "बिल्क़ीस" बताया जाता है।
31: इसका अनुवाद ऐसे भी किया गया है, "मेरे ख़िलाफ़ सरकशी न करो, और आज्ञाकारी बनकर मेरे पास चली आओ।"
35: वह सुलैमान (अलै) को परखना चाहती थी कि अगर
वह केवल एक राजा हुए तो तोहफ़े से मान जाएंगे, और अगर कोई नबी हुए तो सच्चाई के आगे सर
झुकाने को कहेंगे।
42: कुछ लोगों का मानना है कि आख़िरी वाक्य भी रानी
बिल्क़ीस ने ही कहे थे, और तब अनुवाद
होगा,.... "हमें तो इससे पहले ही (आपकी सच्चाई की) जानकारी हो गई थी, और हम सिर झुका चुके थे।"
45: एक गुट सच्चाई पर विश्वास करने वाला और दूसरा
विश्वास करने से इंकार करने वाला। समूद की क़ौम और सालेह (अलै.) का विवरण सूरह अ'राफ़ (7:72) और सूरह हूद (11: 61-68) में भी आया
है।
46: अच्छाई का मतलब सच्चाई पर विश्वास कर लेना।
47: असल में बुरा शगुन जैसे अकाल पड़ना आदि तो ख़ुद
उनके बुरे कर्मों के चलते हुआ था।
48: हज़रत सालेह (अलै.) की क़ौम के नौ सरदार थे, जिनमें से हर एक के पीछे एक जत्था था। अंत
में इन्हीं लोगों ने उस ऊँटनी को मार डाला जो अल्लाह के हुक्म से पैदा हुई थी। जब
सालेह (अलै.) ने उन्हें यातना से डराया तो उन्होंने आपस में समझौता किया कि वे रात के समय उन पर ख़ुफ़िया
तरीक़े से हमला करेंगे, और उनको और
उनके घर वालों को मार डालेंगे।
52: सालेह (अलै.) के क़ौम की बस्तियाँ अरब के ही
इलाक़े में थीं, और मदीने से
कुछ दूरी पर सीरिया के व्यापारिक मार्ग पर स्थित थी जहाँ से कारवाँ गुज़रा करता था।
आज भी ये वीरान बस्तियाँ और उनके खंडहर "मदायन सालेह" के नाम से मशहूर है जिससे सबक़ सीखना चाहिए।
58: लूत (अलै.) की घटना विस्तार से सूरह हूद (11: 77-83), और सूरह हिज्र (15: 58-76) में आयी है। इसके अलावा सूरह शुअरा (26: 160-175) और सूरह अ'राफ़ (7: 80) में भी आयी है।
60: मक्का के बहुदेववादी भी यह बात मानते थे कि
इस कायनात को अल्लाह ने ही पैदा किया है, मगर साथ ही वे कहते थे कि उसने हर चीज़ की
व्यवस्था करने के लिए बहुत से विभाग दूसरे ख़ुदाओं को सौंप दिए हैं, इसलिए उन ख़ुदाओं की इबादत [उपासना] करनी
चाहिए।
61: जहाँ दो समंदर आपस में मिलते हैं, वहाँ क़ुदरत का ऐसा करिश्मा देखने को मिलता है
कि दूर तक दोनों समंदर साथ-साथ बहने के बावजूद साफ़ अलग-अलग नज़र आते हैं, जैसे कि उनके बीच एक आड़ हो।
65: अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों के बारे में अल्लाह अपने
पैग़म्बरों को बता देता है, मगर उन्हें भी
इन चीज़ों की पूरी जानकारी नहीं होती।
72: असल यातना तो परलोक में मिलेगी, मगर उसका कुछ हिस्सा दुनिया में भी मिलता है, सो कुछ ही साल बाद बद्र की लड़ाई में मक्का के
बड़े-बड़े सरदार मारे गए और उनकी बुरी हार हुई।
73: उदारता यह है कि अल्लाह सज़ा देने में बहुत
देर करता है और आदमी को काफ़ी समय देता है कि वह गुनाहों से तौबा कर ले।
82: अल्लाह एक अजीब जानवर पैदा करेगा, जो इंसानों से बात करेगा, कहा जाता है कि इसके तुरंत बाद क़यामत आ जाएगी, और तब गुनाहों से माफ़ी माँगने का अवसर भी
ख़त्म हो जाएगा।
87: पहली बार जब नरसिंघा बजाया जाएगा तो क़यामत आ
जाएगी और अल्लाह की पैदा की हुई हर चीज़ (कुछ को छोड़कर जिसे अल्लाह बचा ले) मर-मिट
जाएगी, और फिर दूसरी
बार बजने पर मरी हुई चीज़ ज़िंदा होकर उठ खड़ी होगी।
89: अल्लाह ने हर नेकी का इनाम दस गुना देने का
वादा किया है।
सूरह 67: अल-मुल्क
[बादशाही, नियंत्रण /The Sovereignty, Control]
यह एक मक्की
सूरह है जो इस घोषणा के साथ विश्वास न करने वालों को चुनौती देती है कि अल्लाह की
ताक़त पूरी तरह से उन पर छायी हुई है, बल्कि हर चीज़ पर छायी हुई है, इस दुनिया में भी और आने वाली दुनिया में भी।
अल्लाह की ताक़त की तुलना उन झूठे ख़ुदाओं से भी की गई है जिनमें कोई ताक़त नहीं
होती। इस सूरह में क़यामत के दिन विश्वास न करने वालों के दुख और पछतावे का भी
विवरण दिया गया है (आयत 9-10, 27). और इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि अल्लाह की यातना से कोई सुरक्षा नहीं मिल
सकती (आयत 20-21, 30).
विषय:
01-04: अल्लाह ही हर चीज़ का पैदा करने वाला है।
05-12: सज़ा और इनाम
13-22: अल्लाह का
ज्ञान और उसकी ताक़त
23-30: घोषणाओं का
सिलसिला
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, और बहुत दयावान
है
बड़ी ऊँची शान
है उसकी जिसके हाथ में (सारी दुनिया की) बादशाही है; और वह सब कुछ कर सकता है;
(1)
जिसने मौत और
ज़िंदगी (इसलिए) बनायी, ताकि वह तुम
(लोगों) को परीक्षा में डालकर देखे कि तुम में से कौन सबसे अच्छा कर्म करता है
---- वह ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बड़ा माफ़
करनेवाला है; (2)
जिसने तल्ले ऊपर
सात आसमानों [heavenly spheres] को पैदा किया। तुम रहम करनेवाले रब [रहमान] की रचना में कोई गड़बड़ी या कमी नहीं
पाओगे। फिर से देखो! क्या तुम्हें (इसकी बनावट में) कोई गड़बड़ी दिखायी देती है? (3)
एक बार फिर से
देखो! और बार-बार देखो! (हर बार) नतीजा यही होगा कि तुम्हारी निगाह थक-हारकर
तुम्हारी ओर लौट आएगी। (4)
हमने सबसे नज़दीक
वाले (निचले) आसमान को (ग्रहों, तारों आदि जैसे) रौशन दीपों से सजा रखा है और
उन्हें (मिसाइल के रूप में) शैतानों को मार भगाने का साधन बनाया है, और हमने इन (शैतानों) के लिए (जहन्नम में)
दहकती आग की यातना भी तैयार कर रखी है। (5)
जिन लोगों ने
अपने रब (के हुक्म) को मानने से इंकार किया, उनके लिए जहन्नम की यातना तैयार है: वह
[जहन्नम] बहुत ही बुरा ठिकाना है। (6)
जब वे उस (आग)
में झोंके जाएंगे तो उसके दहाड़ने की आवाज़ सुनेंगे, वह (ऐसी) भड़क रही होगी, (7)
जैसे वह बेहद
गुस्से से फट पड़ेगी। जब भी (काफ़िरों का) कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके
दारोग़ा उनसे पूछेंगे, “क्या तुम्हारे
पास कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया था?" (8)
वे जवाब देंगे, 'हाँ! हमारे पास अल्लाह का डर सुनाने वाला तो
ज़रूर आया था, मगर हमने उस पर
विश्वास नहीं किया। हमने कहा, 'अल्लाह ने तो ऊपर से कुछ भी नहीं उतारा [reveal]: तुम तो बहुत ज़्यादा भटके हुए हो”।' (9)
वे कहेंगे, “काश हमने (सच्चाई को) सुना होता, और समझ से काम लिया होता, तो हम (आज) भड़कती आग के वासियों में (शामिल) न
होते,” और (10)
वे अपने गुनाहों
को ख़ुद स्वीकार कर लेंगे। सो धिक्कार है (जहन्नम की) भड़कती आग में रहने वालों पर!
(11)
मगर जो लोग अपने
रब से डरते हैं हालाँकि उसे देख नहीं सकते, उनके लिए तो (गुनाहों की) माफ़ी और बड़ा भारी
इनाम है। (12)
चाहे तुम लोग
अपनी बात छिपाकर करो या सबके सामने करो, (अल्लाह सब जानता है, क्योंकि) वह दिलों के अंदर की (छुपी) बातों
की (भी) पूरी जानकारी रखता है। (13)
भला अपनी पैदा
की हुई चीज़ को वही नहीं जानेगा, जबकि वह छोटी से छोटी चीज़ पर नज़र रखने वाला, और (हर चीज़ की) ख़बर रखने वाला है? (14)
वही तो है
जिसने तुम्हारे लिए धरती को रहने लायक़ बना दिया ---- सो तुम उसके इलाक़ों में चलो
फिरो; उसकी (दी गयी)
रोज़ी में से खाओ ----- और (मरने के बाद) उसी के पास तुम्हें दोबारा ज़िंदा होकर
जाना है। (15)
क्या तुम्हें
यक़ीन है कि वह [रब] जो आसमान में (बैठा) है, वह कभी धरती को इस तरह बहुत ज़ोर से नहीं
हिलाएगा कि तुम्हें ज़मीन (अपने अंदर) निगल जाए? (16)
क्या तुम्हें
यक़ीन है कि वह [रब] जो आसमान में (बैठा) है, वह कभी तुम पर पत्थर बरसाने वाला बवंडर नहीं
भेजेगा?
तुम्हें पता चल
जाएगा कि मेरी चेतावनी का मतलब क्या होता है। (17)
इनसे पहले भी जो
लोग गुज़र चुके, उन लोगों ने भी
(सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया था ----- सो (देख लो कि) मेरी दी गयी
यातना कितनी बुरी थी! (18)
क्या उन्होंने
अपने ऊपर पक्षियों को पर फैलाए हुए और (कभी) पर समेटे हुए उड़ते नहीं देखा? उन्हें रहम करने वाले रब [रहमान] के (बनाए क़ानून
के) सिवा कौन (हवा में गिरने से) रोके रहता है: वह हर चीज़ पर पूरी नज़र रखता है। (19)
अगर मेहरबानी
करने वाला रब [रहमान] तुम्हारी मदद नहीं करता, तो भला कौन सी ऐसी सेना है जो (मुसीबत में)
तुम्हारी मदद कर सकती है? विश्वास न करने
वाले [काफ़िर] लोग सचमुच निरे धोखे में पड़े हुए हैं। (20)
अगर वह [अल्लाह]
रोज़ी देने से हाथ रोक ले, तो भला कोई है जो
तुम्हें रोज़ी दे सके? इसके बावजूद वे
लोग अपनी बदतमीज़ी और (सच्चाई से) दूर रहने की आदत पर अड़े हुए हैं। (21)
सही रास्ते की
समझ किसे ज़्यादा मिली है: उस आदमी को जो औंधे मुंह गिर पड़ा हो, या उस आदमी को जो खड़ा हुआ सीधी राह पर चला जा
रहा हो? (22)
[ऐ रसूल], आप कह दें, “वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें पैदा किया, और तुम्हें सुनने, देखने और सोचने-समझने की ताक़त दी ---- (मगर)
तुम लोग (इन नेमतों का) कम ही शुक्र अदा करते हो!” (23)
कह दें, “वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें जमीन पर चारों
तरफ़ फैला दिया, और (क़यामत के
दिन) उसी के पास तुम सबको जमा किया जाएगा।” (24)
वे कहते हैं, “जो कुछ तुम कहते हो, अगर वह सच है तो बताओ कि यह (क़यामत आने का)
वादा कब पूरा होगा?" (25)
आप कह दें, “इसके (आने के समय की) सही जानकारी तो केवल
अल्लाह को है: मेरी ज़िम्मेदारी तो बस साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से चेतावनी [warning] देना है।” (26)
फिर जब वे
(क़यामत) को पास आता देख लेंगे, तो विश्वास न करने वालों के चेहरे काले पड़
जाएंगे, और (उनसे) कहा
जाएगा, “यही है वह चीज़
जिसे (जल्द लाने की) तुम माँग किया करते थे।" (27)
आप कह दें, “ज़रा सोचो, कि चाहे अल्लाह मुझे और मेरे मानने वालों को
बर्बाद कर दे (जैसा कि तुम इच्छा करते हो), या हम पर दया कर दे ---- तो (दोनों हालतों
में) विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को दर्दनाक यातना से कौन बचाएगा?” (28)
कह दें, "वह रहम [दया] करने वाला रब [रहमान] है; हम उस पर ईमान [विश्वास] रखते हैं; हम उसी पर अपना भरोसा रखते हैं। तुम्हें जल्द
ही पता लग जाएगा कि कौन है जो साफ़ ग़लत रास्ते पर चल रहा है।” (29)
आप कहें: “ज़रा सोचो, अगर (किसी दिन) तुम्हारे (पीने का) सारा पानी
ज़मीन में बहुत नीचे को उतरकर सूख जाए, तो कौन है जो तुम्हें (ज़मीन पर) बहता हुआ
(साफ़) पानी ला दे?” (30)
नोट:
3. देखें 50:6
5: चिराग़ों से
मतलब तारे और दूसरे खगोलीय पिंड हैंं जो रात के समय सजावट का भी ज़रिया बनते हैं और
उनसे शैतानों को मारने का काम भी लिया जाता है। शैतानों को मारने की चर्चा 15: 18; 37: 9-10;
72: 8-9 में भी है।
7. गुनाहगारों को
अपने अंदर समा लेनी की हवस को 'आग का दहाड़ना' कहा गया है जो कि एक डरा देने वाला वर्णन है।
(इसे भी देखें 11: 106; 25: 12)
15: अर्थात ज़मीन
की सारी चीजें अल्लाह ने तुम्हारे वश में कर दी हैं, लेकिन इनको उपयोग करते समय यह नहीं भूलना
चाहिए कि हमेशा यहाँ नहीं रहना है, बल्कि एक दिन यहाँ से अल्लाह के पास जाना है
जहाँ हमें इन नेमतों का हिसाब-किताब देना होगा। अतः यहाँ की हर
चीज़ को अल्लाह के हुक्म के अनुसार ही उपयोग करना चाहिए।
16: आख़िरत की
यातना तो अपनी जगह
है, लेकिन बुरे
कर्मों के नतीजे में इस दुनिया में भी यातना आ सकती है, जैसे कि इंसान को क़ारून की तरह ज़मीन में धँसा दिया जा सकता है।
22: "जो मुँह के बल
औंधा गिर पड़ा हो" का अनुवाद यह भी हो सकता है कि "वह जो
मुँह के बल औंधा चल रहा हो" यानी जानवरों की तरह।
24: अल्लाह ने
इंसानों को ज़मीन पर चारों तरफ़ फैला दिया जिस तरह बीज बोने वाला बीज को चारों तरफ़
फैला देता है।
26: क़यामत आने के
समय की जानकारी सिर्फ़ अल्लाह के पास है, (देखें 7: 187; 33: 63; 41: 47; 43: 85; और 46: 23).
28: बहुत से काफ़िर
यह कहा करते थे कि जब मोहम्मद साहब दुनिया से चले जाएंगे तो उनके साथ उनका धर्म भी
ख़त्म हो जाएगा, सो वे आपकी
मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे। [52:30] ,
यहाँ पर यह
कहा जा रहा है कि चाहे अल्लाह आप और आपके साथियों को मार डाले या उन पर दया करते
हुए उन्हें जीत दिला दे, लेकिन इससे
काफ़िरों के अंजाम पर तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, दोनों हालतों में उन्हें यातना ज़रूर झेलनी पड़ेगी।
30: जब यह बात तय
है कि पानी समेत हर चीज़ अल्लाह ही के क़ब्ज़े में है तो आख़िर फिर उसके सिवा कौन है जो
उपासना के लायक़ हो, और कौन सी वजह
है जिसके आधार पर उसके इस क़ुदरत का इंंकार किया जाए कि वह इंंसानों को ज़िंदा करके इनाम या सज़ा देगा।
सूरह 21:
अल-अंबिया
[अल्लाह के नबी, The Prophets]
यह एक मक्की सूरह है, इसमें भी पैग़म्बर साहब को भरोसा दिलाते हुए याद कराया गया है कि अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी मेहरबानियाँ हमेशा नबियों के साथ रही हैं, यहाँ कई सारे नबियों जैसे मूसा, हारून, इबराहीम, इसहाक़, याक़ूब, लूत, दाऊद, सुलैमान (अलै.) इत्यादि का वर्णन आया है (आयत 48-91), जिसकी वजह से इसका नाम "अंबिया" पड़ा है। इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मुहम्मद (सल्ल) भी पहले के नबियों की तरह ही हैं और उनको भी एक अल्लाह को मानने का वही संदेश लोगों तक पहुँचाना है। आयत 107 में बताया गया है कि पैग़म्बर सल्ल. को दुनिया भर के सभी लोगों के लिए रहम करने वाला बनाकर भेजा गया है। यह विश्वास करने से इंकार करने वालों को चेतावनी देती है कि फ़ैसले की घड़ी बहुत जल्द आने वाली है जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है।
विषय:
01-06: कर्मों के हिसाब का समय
नज़दीक है
07-10: सभी रसूल आदमी ही हैं
11-15: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक
चेतावनी
16-18: ज़मीन-आसमान को खेल-तमाशे के
लिए नहीं पैदा किया गया
19-20: फ़रिश्ते अल्लाह की बंदगी
करने से नहीं थकते
21-25: अल्लाह एक है, कई नहीं
26-29: अल्लाह की कोई संतान नहीं
30-33: अल्लाह की क़ुदरत की
निशानियाँ
34-41: रसूल पर ऐतराज़ करने को रद्द
किया गया
42-47: दूसरे ख़ुदाओं में कोई ताक़त
नहीं
48-50: मूसा और हारून (अलै)
51-71: इबराहीम (अलै) की कहानी
72-73: इसहाक़ और याक़ूब (अलै)
74-75: लूत (अलै)
76-77: नूह (अलै)
78-82: दाऊद और सुलैमान (अलै)
83-84: अय्यूब (अलै)
85-86: इसमाईल, इदरीस, और ज़ुल-किफ़्ल
87-88: ज़ुल-नून [मछलीवाले: यूनुस]
89-90: ज़करिया
91-94: मरयम
95-100: क़यामत के दिन बर्बाद किए गए
समुदाय दोबारा उठाए जाएंगे
101-103: नेक और सच्चे लोग तकलीफ़
नहीं झेलेंगे
104-106: नेक व अच्छे बन्दे ही
(परलोक में) ज़मीन के वारिस होंगे
107-112: रसूल को सारे लोगों के लिए
रहम करने वाला बनाकर भेजा गया है
अल्लाह के नाम से शुरू जो
सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
लोगों से उनके (कर्मों का)
हिसाब लेने का समय नज़दीक आ पहुँचा है, मगर वे हैं कि (सच्चाई से)
मुँह फेरे हुए, बेफ़िक्री में सब कुछ भुलाए बैठे हैं| (1)
उनके रब की तरफ़ से (नसीहत
के लिए) जब भी कोई नया संदेश उनके पास आता है, तो वे उसे सुनते भी हैं तो बस हँसी-खेल करते हुए, (2)
बेकार चीज़ों में मगन मन के साथ! उन शैतानियाँ करनेवालों ने
चुपके-चुपके आपस में कानाफूसी की: "यह आदमी [मोहम्मद] तुम्हारे जैसा ही एक
(मामूली सा) आदमी नहीं तो और क्या है? फिर क्या तुम सब
जानते-बूझते भी उसके पास जादू की बातें सुनने जाओगे?" (3)
[रसूल ने] कहा, "आसमानों और ज़मीन में जो बात भी कही जाती है (चाहे
चुपके-चुपके हो या सबके सामने हो), मेरा रब उन सबको जानता है: वह सब कुछ सुनता है, हर चीज़ जानता है।" (4)
(इतना ही नहीं!) बल्कि उनमें से कुछ यह कहते हैं, "ये तो बस भटके हुए सपनों की बातें हैं”; कुछ लोगों ने कहा, “उसने इसे स्वयं ही गढ़ लिया
है”; कुछ दूसरे लोगों ने कहा, “वह तो बस एक कवि है, (अगर ऐसा नहीं है तो) उसे
चाहिए कि वह हमें (अल्लाह की तरफ़ से) कोई निशानी लाकर दिखाए, जिस तरह (निशानियाँ लेकर) पहले के रसूल भेजे गए थे।" (5)
लेकिन इनसे पहले जिन जिन
बस्तियों को हमने नष्ट किया, उनमें से तो कोई भी
(निशानियाँ देखकर) ईमान नहीं लाया था, फिर क्या यह लोग (रसूल की बातों पर) विश्वास कर लेंगे? (6)
और [ऐ पैग़म्बर] यहाँ तक कि
आपके समय से पहले, जितने भी रसूल [Messenger] हमने भेजे, सब के सब आदमी ही थे जिन पर
हमारी ‘वही’[revelations] उतरती थी--- [इंकार करनेवालो!] अगर तुम्हें यह बात मालूम न हो तो उन (यहूदियों
या ईसाइयों) से जाकर पूछ लो जो (आसमानी) किताबों का ज्ञान रखते हैं--- - (7)
और हमने उन (रसूलों) का
शरीर कभी ऐसा नहीं बनाया कि वे खाना न खाते हों और न ही वे हमेशा ज़िंदा रहनेवाले
थे। (8)
(तुम्हारे ही जैसे आदमियों
को रसूल बनाकर भेजा) और फिर हमने उनके साथ किए हुए वादे को अंत में पूरा कर
दिखाया: हमने उन्हें (और उनके साथ) जिस किसी को चाहा, बचा लिया, और मर्यादा तोड़ देनेवालों को बर्बाद कर दिया। (9)
(अब) हमने तुम (लोगों) के लिए एक ऐसी किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है, जो तुम्हें (मेरी नसीहतें) याद दिलाती रहे। तो क्या तुम समझ-बूझ से काम नहीं
लोगे? (10)
शैतानियाँ व ज़ुल्म करने
वालों की कितनी बस्तियों को हमने बर्बाद कर डाला! और उनके बाद कितनी दूसरी
बस्तियों को उनकी जगह उठा ख़ड़ा किया! (11)
फिर जब उन्हें ऐसा लगा कि
हमारी यातना उनके सिर पर आ खड़ी हुई है, तो लगे वहाँ से भागने! (12)
उनसे कहा गया, "भागने की कोशिश मत करो! लौट
जाओ अपने घरों को और उसी भोग-विलास के जीवन में जिसमें तुम डूबे हुए थे: शायद वहाँ
(सलाह-मशविरा हो और) तुम से कुछ पूछा जाए।" (13)
बस्तियों में रहनेवाले कहने
लगे, "अफ़सोस हम पर! निस्संदेह हम
ही ग़लती पर थे!" (14)
और फिर उनका रोना चिल्लाना
तब तक बंद नहीं हुआ जब तक कि हमने उन्हें मिटा न दिया--- कटे हुए खेत, व बुझे हुए अंगारों की तरह! (15)
हमने आसमानों और ज़मीन को और
जो कुछ उनके बीच में है, उनको खेल तमाशे के लिए नहीं बनाया। (बल्कि एक ख़ास मक़सद के लिए बनाया है) (16)
अगर हम यूँ ही समय काटने के
लिए (कोई खेल-तमाशा ही) बनाना चाहते, तो ख़ुद अपनी तरफ़ से ही बना लेते----अगर हमने सचमुच ऐसा चाहा होता! (17)
नहीं, बल्कि (हक़ीक़त यह है कि) हम झूठ के ख़िलाफ़ सच्चाई से वार करते हैं, और वह झूठ का सिर कुचल डालता है ---- और देखो झूठ कैसे पूरी तरह से मिट जाता
है! अफ़सोस तुम (लोगों) पर! तुम (अल्लाह के बारे में) कैसी कैसी बातें बनाते हो! (18)
आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है, सब उसी (अल्लाह) का है, (उसी के लिए है), और जो (फ़रिश्ते) उसके पास
हैं, वे कभी भी घमंड में आकर
अल्लाह की बन्दगी से मुँह नहीं मोड़ते, और न कभी (बंदगी से) थकते
हैं; (19)
वे रात दिन, बिना थके हुए, उसकी बड़ाई का गीत गाते रहते हैं। (20)
क्या उन्होंने ज़मीन (के जीवों में) से ऐसे ख़ुदा बना लिए हैं जो मुर्दों को
ज़िंदा कर सकते हैं? (21)
अगर आसमान या ज़मीन में अल्लाह के सिवा कोई दूसरा (पूजने के लायक़) ख़ुदा होता, तो आसमान और ज़मीन दोनों टूट-फूट
जाते: अल्लाह, जो (सारे जहाँ के) सिंहासन का मालिक है, उन बातों से कहीं ऊँचा है, जो बातें वे (उसके बारे में)
बनाते रहते हैं: (22)
जो कुछ वह [अल्लाह] करता है, उसके लिए उससे हिसाब लेने वाला कोई नहीं, जबकि इन लोगों से (हर काम का) हिसाब लिया जाएगा। (23)
फिर क्या इबादत [पूजा] के लिए उस (अल्लाह) के बजाय इन्होंने दूसरे ख़ुदाओं को
चुन रखा है? [ऐ रसूल] कह दें,
"तो ले आओ, अपना प्रमाण! यह किताब [क़ुरआन]
उनके लिए नसीहत है जो लोग मेरे साथ हैं, और उनके लिए भी है जो मुझसे
पहले गुज़र चुकी किताबों के मानने वाले हैं।” मगर ज़्यादातर आदमी सच्चाई को
पहचानते ही नहीं, इसलिए उस पर ध्यान ही नहीं देते। (24)
हमने [ऐ रसूल] आपसे पहले कभी भी
ऐसा रसूल नहीं भेजा, जिस पर यह बात न उतारी हो:
"मेरे सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं है, अतः तुम मेरी ही बन्दगी
करो।" (25)
और वे कहते हैं: "दया
करनेवाले रब [रहमान] ने (फ़रिश्तों को अपनी) सन्तान बना रखा है।" महान है वह!, नहीं! वे [फ़रिश्ते] तो बस हमारे
इज़्ज़तदार बंदे हैं: (26)
वे उस अल्लाह] के बोलने से पहले
कभी बोलते तक नहीं, और उसके आदेश का पालन करने के लिए तैयार रहते हैं। (27)
जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ
उनके पीछे है, अल्लाह उनके सब (भूत व भविष्य
को) जानता है, और वे बिना इजाज़त किसी मामले में दख़ल नहीं दे सकते, सचमुच वे तो ख़ुद ही उसके भय से
सहमे रहते हैं। (28)
उनमें से कोई भी अगर ऐसा दावा
कर बैठे कि "अल्लाह के अलावा मैं भी एक (पूजा करने के लायक़) देवता हूँ", तो हम उसे भी बदले में जहन्नम
देंगे: शैतानियाँ करने वालों को हम ऐसा ही बदला दिया करते हैं। (29)
क्या इंकार करनेवालों को यह
बात मालूम नहीं कि (रचना के समय) सारे आसमान और ज़मीन एक साथ आपस में जुड़े हुए थे, और यह कि हमने उन्हें
खींचकर अलग-अलग किया, और यह कि हमने (धरती पर) हर सजीव चीज़ को पानी से पैदा कर दिया? तो क्या वे (इस बात पर) विश्वास नहीं करेंगे? (30)
और हमने धरती पर पहाड़ों को
मज़बूती से जमा दिया, ताकि धरती नीचे से हिले-डुले नहीं, और हमने उन (पहाड़ों में)
ऐसे दर्रे बना दिए जिनसे चौड़े रास्ते बन गए, ताकि लोग सही दिशा में आ जा
सकें, (31)
और हमने आसमान को एक
सुरक्षित छत जैसा बनाया है---- इसके बावजूद वे इन अनोखी
निशानियों से मुँह मोड़ लेते हैं। (32)
वही (अल्लाह) है जिसने रात
और दिन बनाए, और सूरज और चाँद को भी पैदा किया, हर एक (खगोलीय पिंड) अपनी-अपनी कक्षाओं [orbits] में तैर रहा है। (33)
[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले भी
किसी आदमी को हमेशा ज़िंदा रहने वाला जीवन नहीं दिया--- अगर आपकी मौत होगी, तो क्या ये [विश्वास न
करनेवाले] हमेशा ज़िंदा रहेंगे? (34)
हर जीव को मौत का मज़ा चखना
ही है: हम तुम्हें अच्छे और बुरे हालात में डालकर तुम्हारी परीक्षा करते रहते हैं, और अन्ततः तुम्हें लौटकर
हमारे ही पास आना है। (35)
जब (सच्चाई पर) विश्वास न
करनेवाले आपको देखते हैं, तो आपकी हँसी उड़ाते हुए
कहते हैं: "क्या यही वह आदमी है, जो तुम्हारे देवताओं के (झूठे होने के) बारे में बातें करता है?" वे रहम करनेवाले रब [रहमान]
की किसी भी बात को बस रद्द कर देते हैं। (36)
आदमी जल्दबाज़ी (की आदत) के
साथ पैदा किया गया है: मैं बहुत
जल्द तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाने वाला
हूँ, अतः तुम उन (यातनाओं) को समय से पहले ही ले आने के लिए मुझ से मत कहो। (37)
वे कहते हैं, "अगर तुम जो (यातना आने की बात) कहते हो वह सच है, तो यह वादा कब पूरा होगा?" (38)
(सच्चाई से) इंकार करनेवाले
अगर जान पाते (तो यातना की जल्दी न मचाते), कि जब वह समय आ जाएगा तो फिर उस आग से न तो वे अपने चेहरों को और न अपनी पीठों
को (झुलसने से) बचा पाएंगे, और न उन्हें किसी की सहायता
ही मिलेगी! (39)
बल्कि वह (आग) अचानक उनपर आ
धमकेगी और उन्हें बदहवास कर देगी; उनमें इतना दम न होगा कि वे
उसे पीछे हटा सकें; उन्हें (कुछ समय की) मुहलत
भी नहीं दी जाएगी। (40)
[ऐ रसूल] आपसे पहले भी आए
रसूलों की हँसी उड़ाई गयी थी, मगर (हर बार) हुआ यह कि वे जिस (यातना के आने की) बात की हँसी उड़ाते थे, अंत में उसी (यातना) ने
उन्हें घेर लिया। (41)
आप पूछें, "रात हो या दिन का समय, कौन है जो तुम्हें रहम
करनेवाले रब (की यातना) से बचा सकता है? (कोई नहीं), मगर तब भी वे अपने रब का नाम सुनते ही मुँह मोड़ लेते हैं। (42)
क्या उनके पास ऐसे देवता
हैं जो हमसे उन्हें बचा सकते हैं? (वे क्या बचाएंगे!) उनके
देवताओं में तो इतनी भी ताक़त नहीं कि वे अपनी ही मदद कर सकें, और न ही हमारी तरफ़ से
सुरक्षा पा सकते हैं। (43)
हमने इन गुनाहगारों और उनके
बाप-दादाओं को एक लम्बे समय तक जीवन की सुख-सुविधा से मज़ा लेने दिया है, तो क्या वे देखते नहीं कि हम किस तरह चारों तरफ़ से उनकी सीमाएं सिकोड़कर छोटी
करते जा रहे हैं? तो फिर क्या वे जीत जाएंगे? (44)
[ऐ रसूल] आप कहें, "मैं तो बस (अल्लाह की भेजी हुई) 'वही' [Revelation] के द्वारा तुम्हें सावधान
करता हूँ।" याद रखें, जो बहरे हैं उन्हें चाहे कितना भी सावधान किया जाए, वह कभी सुनने वाले नहीं हैं, 45)
तब भी, अगर आपके रब की यातना का कोई झोंका भी उन्हें छू जाए, तो निश्चय ही वे लगेंगे चिल्लाने, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! सचमुच हम ही ग़लती पर थे।" (46)
क़यामत के दिन हम इंसाफ़ का
तराज़ू लगा देंगे ताकि किसी के साथ थोड़ा भी ज़ुल्म न हो पाए, यहाँ तक कि अगर कोई (कर्म) राई के दाने के (वज़न के) बराबर भी हो, तो हम उसे भी सामने ला खड़ा करेंगे--- और हिसाब रखने के लिए हम काफ़ी हैं। (47)
हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को सही और ग़लत में फ़र्क़ बतानेवाली (एक किताब, तोरात) दी थी, जो (मार्ग दिखाने के लिए) एक रौशनी थी, और परहेज़गार लोगों के लिए
नसीहत देनेवाली [Reminder] थी, (48)
(उन परहेज़गारों के लिए) जो
अपने रब से बिना उसे देखे हुए, डरते रहते हैं, और आने वाली (क़यामत की) घड़ी के भय से सहमे रहते हैं। (49)
यह [क़ुरआन] भी एक शुभ [blessed] संदेश है, जिसको हमने उतारा है---- तो
फिर क्या तुम (लोग) इसे मानने से इंकार करते हो? (50)
बहुत समय पहले हमने इबराहीम [Abraham] को सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ दी थी, और हम उसकी हालत अच्छी तरह
से जानते थे। (51)
जब उन्होंने अपने बाप और
अपनी क़ौम से कहा, "यह क्या मूर्तियाँ हैं, जिनकी तुम इतनी भक्ति करते हो?" (52)
वे बोले, "हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की पूजा करते हुए देखा
था।" (53)
उस [इबराहीम] ने कहा, "तुम ख़ुद भी भटक चुके हो और तुम्हारे बाप-दादा भी सही मार्ग
से बिल्कुल ही भटके हुए थे।" (54)
इस पर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमसे सचमुच ऐसा कह
रहे हो या यूँ ही हँसी-खेल कर रहे हो?" (55)
इबराहीम ने कहा, "नहीं! सुनो, वह आसमानों और ज़मीन का
मालिक है, वही है जिसने उनको पैदा
किया है, और असल में वही तुम्हारा भी रब है, मैं इस पर गवाही देता हूँ। (56)
और (इबराहीम ने कहा), “क़सम है अल्लाह की! (एक दिन) जैसे ही तुम (लोग) पीठ फेरकर (कहीं) चले जाओगे, मैं ज़रूर तुम्हारी
मूर्तियों के साथ एक चाल चलूँगा! " (57)
(और ऐसा ही किया), उसने उन सब (मूर्तियों) को तोड़कर टुकड़े- टुकड़े कर दिया, लेकिन सबसे बड़ी मूर्ति को
छोड़ दिया ताकि लोग उसके सामने झुक सकें (और हाल पूछ सकें)। (58)
वे (वापस आकर) कहने लगे, "किसने हमारे देवताओं के साथ यह हरकत की है? निश्चय ही वह बड़ा ही ज़ालिम आदमी होगा!" (59)
(कुछ लोग) बोले, "हमने एक नौजवान को, जिसे इबराहीम कहकर पुकारते हैं, उन (बुतों) के बारे में कुछ कहते सुना था।" (60)
उन्होंने कहा, "तो उसे बुला लाओ लोगों की आँखों के सामने, ताकि वे भी (पूछ-ताछ के)
गवाह रहें।" (61)
उन्होंने इबराहीम से कहा, "हमारे देवताओं के साथ यह हरकत किसने की है, ऐ इबराहीम क्या तुमने?" (62)
इबराहीम ने कहा, "नहीं, बल्कि यह काम उनके इस सबसे बड़े (देव) ने किया होगा, उन्हीं से पूछ लो, अगर वे बोल सकते हों।" (63)
वे एक दूसरे की तरफ़ (कुछ
सोचते हुए) मुड़े और आपस में कहने लगे, "असल में तो हम ही लोग
शैतानियाँ करते हैं।" (64)
उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा
था, फिर उन्होंने बात बनायी और
कहने लगे, "तुम्हें तो अच्छी तरह मालूम
है कि ये (मूर्तियाँ) बोल नहीं सकतीं।" (65)
इबराहीम ने कहा, "फिर अल्लाह को छोड़कर तुम
ऐसी चीज़ों को क्यों पूजते हो, जो न तुम्हें कुछ फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न कोई नुक़सान? (66)
धिक्कार है तुमपर, और उनपर भी, जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर
पूजते हो! क्या तुम दिमाग़ से काम नहीं
लेते?" (67)
इस पर उन्होंने (आपस में) कहा, “अगर तुम सचमुच कुछ अच्छा करना चाहते हो, तो आओ इस आदमी को आग में जला दो, और अपने (टूटे हुए) देवताओं
की मदद करो।" (68)
(फिर इबराहीम को आग में डाल
दिया गया), मगर हमने कहा, "ऐ आग! तू ठंढ़ी हो जा और
सलामती बन जा इबराहीम पर!" (69)
उन्होंने उसे नुक़सान
पहुँचाने की योजना बनायी थी, मगर हमने उन्हीं को ज़बरदस्त
नुक़सान में डाल दिया। (70)
हमने उन्हें और (उनके
भतीजे) लूत [Lot] को बचा लिया और उन्हें उस ज़मीन [कुनआन] पर भेज दिया, जिसमें हमने दुनियावालों के
लिए बरकतें [blessings] रखी थीं, (71)
और फिर हमने उसे (एक बेटा)
इसहाक़ [Isaac] और (पोता) याक़ूब [Jacob], अतिरिक्त तोहफ़े के रूप में दिया, और उनमें से हर एक को हमने
नेक बनाया था। (72)
और हमने उन सबको (लोगों का)
नायक बनाया जो कि वे हमारे आदेश से लोगों को मार्ग दिखाते थे, और हमने उन्हें 'वही' [revelation] द्वारा भलाई के काम करने, नमाज़ को पाबन्दी से अदा करने और (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने के लिए प्रेरित किया
था: वे हमारे सच्चे व पक्के बंदे थे जो इबादत में लगे रहते थे। (73)
और लूत [Lot] को भी हमने सही फ़ैसला करने
की समझ-बूझ और ज्ञान दिया था, और हमने उन्हें उस (सदूम
नामक) बस्ती (के लोगों) से बचा लिया जो (समलैंगिकता जैसे) कुकर्मों में लगे हुए
थे----- सचमुच वे बड़े शैतान व बेशर्म लोग थे जिन्होंने अल्लाह के (ठहराए हुए)
नियमों को तोड़ा था! (74)
हम ने लूत को अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लिया; निस्संदेह वह अच्छे व नेक
लोगों में से थे। (75)
इससे काफ़ी समय पहले, नूह [Noah] ने (तंग आकर) हमें पुकारा था, तब हमने उसकी (फ़रियाद) सुनी: और फिर उसे और उसके परिवार के लोगों को एक बड़ी
मुसीबत से बचा लिया (76)
और उसकी मदद उन लोगों के
ख़िलाफ़ की, जिन्होंने हमारी निशानियों
को मानने से इंकार कर दिया था---- सचमुच वे बड़े ही शैतान लोग थे, अतः हमने उन सबको डुबा
दिया। (77)
औऱ दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को भी याद करें जब उन्होंने एक ऐसे खेत के झगड़े का फ़ैसला किया था जिस खेत में
रात को लोगों की कुछ भेड़-बकरियाँ घुसकर उसे चर गई थीं। हम इस मामले पर होनेवाले
फ़ैसले को देख रहे थे (78)
और तब हमने सुलैमान को इस मामले में फ़ैसला करने की बेहतर समझ दे दी, हालाँकि हमने दोनों को ही
सही फ़ैसला करने की गहरी समझ और ज्ञान दिया था। हमने पहाड़ों और पक्षियों को भी
दाऊद के वश में लगा दिया था और वे सब (दाऊद के साथ) मिलकर हमारी बड़ाई के गीत गाते
थे---- हमने ही ये तमाम चीज़ें की थीं--- (79)
हमने ही तुम (लोगों) के
फ़ायदे के लिए उन्हें [दाऊद को] धातुओं के कवच बनाने की कला सिखायी थी, ताकि युद्ध में वह तुम्हारी रक्षा कर सके, पर क्या तुम इसके लिए मेरा
आभार मानते हो? (80)
हमने (समुद्र की) तूफ़ानी
हवा को सुलैमान के वश में कर दिया था, जो उसके आदेश से (फ़िलिस्तीन व सीरिया जैसे) भूभाग की ओर चलती थी जिसे हमने
बरकत [blessing] दी थी---- और हम तो हर चीज़ की जानकारी रखते हैं---- (81)
और हमने कुछ जिन्नों
[शैतानों] को उसके अधीन कर दिया था, जो उसके लिए (पानी में)
ग़ोते लगाते थे और इसके अलावा कुछ दूसरे काम भी करते थे। और हम उन पर अपनी नज़र रखे
हुए थे। (82)
याद करो अय्यूब [Job] को, जबकि उसने अपने रब को पुकारा था, "मैं दुख में पड़ गया हूँ, मगर तू दया करनेवालों में
सबसे बढ़कर दयावान है।" (83)
अतः हमने उसकी फ़रियाद सुन
ली, उसकी तकलीफ़ें दूर कर दीं, और उसके परिवार वालों को
फिर से उसके साथ मिला दिया, और उसके साथ उनके जैसे और
लोग भी दे दिए। यह हमारी तरफ़ से एक रहमत [mercy] थी, और हमारी बंदगी करने वालों
के लिए याद रखनेवाला एक सबक़। (84)
इसमाईल [Ishmael], इदरीस और ज़ुलकिफ़्ल को भी याद करें: इनमें से सभी धैर्य रखनेवालों में से थे। (85)
हमने उन्हें अपनी रहमत में
दाख़िल कर लिया था; वे सचमुच सच्चे व अच्छे लोग थे। (86)
और याद करें उस ‘मछलीवाले ’[यूनुस, Jonah] को, जो (अपनी क़ौम से) ग़ुस्सा होकर चले गए थे, यह सोचकर कि हम इस बारे में
उनकी पकड़ नहीं करेंगे। मगर फिर उसने (जब मछली के पेट के अंदर) गहरे अँधेरों में
(हमें) पुकारा था, "(अल्लाह!) तेरे सिवा कोई
इबादत [पूजने] के लायक़ नहीं, महान है तू! सचमुच मैं ही ग़लती पर था।" (87)
तब हमने उनकी फ़रियाद सुन ली
और उन्हें दुख व परेशानी से छुटकारा दे दिया: हम ईमान रखनेवालों को इसी तरह (हर
परेशानी से) बचा लेते हैं। (88)
और ज़करिया [Zachariah] को भी याद करें, जब उसने अपने रब को पुकारा था, "ऐ मेरे रब! मुझे अकेला (बिना संतान के) न छोड़ दे, हालाँकि सबसे अच्छा वारिस तो तू ही है।" (89)
अतः हमने उनकी दुआ क़बूल कर
ली---- उन्हें यह्या [John]
(जैसा बेटा) प्रदान किया, और उनकी पत्नी को (बाँझपन
से) स्वस्थ कर दिया--- वे हमेशा ही नेक व अच्छे कर्मों को करने में पूरी लगन से
तत्पर रहते थे। वे बड़े (मन के) लगाव के साथ और डरते हुए हमें पुकारा करते थे, और हमारे सामने (पूरी भक्ति
से) झुके रहते थे। (90)
और याद करें उस नारी [मरयम, Mary] को जिसने अपनी इज़्ज़त सँभालकर रखी थी। हमने उसके भीतर अपनी रूह
फूँकी और उसे और उसके बेटे [ईसा] को सारे संसार के लिए (सच्चाई की) एक निशानी बना
दिया। (91)
[ऐ नबियों], ये तुम्हारे जो समुदाय
[उम्मत] थे, सब असल में (शिक्षा के
हिसाब से) एक ही समुदाय हैं और मैं ही
तुम्हारा रब हूँ, अतः तुम मेरी बन्दगी करो। (92)
लेकिन लोगों ने एक ही दीन [शिक्षा] के
टुकड़े-टुकड़े कर डाले, मगर उन सबको हमारे पास लौटकर आना होगा। (93)
कोई भी हो, अगर अच्छे कर्म करता है, और (एक अल्लाह में) विश्वास रखता है, तो उसकी कोई भी कोशिश बेकार नहीं जाएगी: हम उसके सारे कर्म लिख लेते हैं। (94)
कोई भी समुदाय [क़ौम]
जिन्हें हमने (उनके गुनाहों के कारण) बर्बाद कर डाला था, वे हमारे पास (हिसाब-किताब
के लिए) लौटकर आने से बच नहीं सकते, (95)
और जब याजूज [Gog] और माजूज [Magog] के लोगों को खुला छोड़ दिया
जाएगा और वे हर ऊँची जगह से दौड़ते हुए नीचे को उतर आएंगे, (96)
जब (अल्लाह के) सच्चे वादे के पूरे होने का समय क़रीब आ जाएगा, तब ऐसा होगा कि विश्वास न करनेवालों की आँखें मारे डर के फटी की फटी रह जाएंगी, और वे कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! हम इस चीज़ को जानते ही न थे और पूरी तरह से भुलाए बैठे थे, बल्कि हम ही ग़लती पर
थे।" (97)
[ऐ विश्वास न करनेवालो!] "तुम और वे जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, सब जहन्नम के ईंधन हैं: उसी (जहन्नम) में तुम्हें जाना होगा।" (98)
अगर ये [मूर्तियाँ] सचमुच की भगवान होतीं, तो वहाँ [जहन्नम में] न गयी होतीं------ तुम सब अब हमेशा वहीं रहोगे। (99)
विश्वास न करनेवाले वहाँ
दुखों से चिल्ला रहे होंगे, मगर वे [मूर्तियाँ] कुछ भी नहीं सुनेंगी। (100)
मगर जिन लोगों के लिए हम पहले
ही जन्नत का फ़ैसला कर चुके हैं, उन्हें जहन्नम से बहुत दूर रखा जाएगा---- (101)
वे उस (जहन्नम) की आहट तक वहाँ
नहीं सुनेंगे---- और वे अपनी मनचाही चीज़ों के साथ वहाँ हमेशा रहने का मज़ा ले रहे
होंगे। (102)
उन्हें वह दिल दहला देने वाली भयानक चीज़ [फ़ैसले का दिन] से कोई डर नहीं होगा:
फ़रिश्ते उनका स्वागत करते हुए कहेंगे, "यही तो है वह दिन, जिसका (क़ुरआन में) तुमसे वादा किया गया था!" (103)
उस दिन हम आसमानों को इस तरह लपेट [roll
up] देंगे जैसे कोई लिखनेवाला (अपने) दस्तावेज़ लिखकर लपेट देता है। फिर, हम दोबारा सृष्टि की रचना
करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे पहली बार की थी: यह एक अटूट वादा है, हम यह सारी चीज़ें करके रहेंगे। (104)
हमने ज़बूर [Psalms] में, और ऐसा ही (पहले की आसमानी) किताबों में भी लिखा था: "मेरे नेक व अच्छे
बन्दे ही (परलोक में) ज़मीन के वारिस होंगे।" (105)
इस [क़ुरआन] में अल्लाह के
बंदों के लिए सचमुच एक संदेश है! (106)
[ऐ रसूल!] हमने आपको इसीलिए भेजा है ताकि सारे संसार में रहमत [mercy] उजागर हो जाए। (या हमने आपको सारे संसार के लिए केवल रहमत बनाकर भेजा है)। (107)
कह दें, "मेरे पास जो बात उतारी गयी [revealed] है, वह यही है कि तुम्हारा (पूजने योग्य) ख़ुदा बस एक अकेला अल्लाह है। तो क्या तुम
बात मानते हुए उसके सामने सिर झुकाओगे?" (108)
फिर भी अगर वे (न मानें और)
मुँह मोड़ लें, तो कह दें, "मैंने (अल्लाह का) संदेश
खुलकर और एक समान तरीक़े से तुम सब तक पहुँचा दिया है। मैं यह नहीं जानता कि जिस
फ़ैसले का तुमसे वादा किया जा रहा है वह निकट आ गया है या अभी दूर है," (109)
मगर, अल्लाह तो उन बातों को भी जानता है जो सबके सामने कही जाती हैं, और उन्हें भी जो (दिलों
में) छिपायी जाती हैं। (110)
मुझे नहीं मालूम: हो सकता
है कि यह (समय) तुम्हारे लिए एक परीक्षा का हो, या यह कि थोड़े समय के लिए
ज़िंदगी के मज़े उठा लो।” (111)
अंत में (रसूल) ने कहा, "ऐ मेरे रब, अब हमारे बीच पक्का व सच्चाई के साथ फ़ैसला कर दे!” और हमारा रब तो बहुत रहम [mercy] करनेवाला है। जो कुछ तुम
(विश्वास न करनेवाले) कहते हो, उसके ख़िलाफ़ हम उसी (रब) से
मदद माँगते हैं।" (112)
नोट:
4: मक्का के लोग आपस में ख़ुफ़िया तरीक़े से जो बातें किया करते
थे, वह भी कई बार मुहम्मद (सल्ल) को 'वही' के द्वारा पता चल जाती थी, इन बातों को वे लोग जादू समझ लेते थे।
13: यह व्यंग्य से कहा गया है, मतलब यह है कि जब तुम भोग-विलास में रह रहे
थे, तो घर के नौकर-चाकर पूछा करते थे कि क्या हुक्म है? अब वापस घर जाओ और देखो, शायद नौकर तुम्हारा हुक्म पूछे, मगर सच तो यह है कि घरों का तो नाम व निशान
ही मिट चुका होगा।
18: यानी अल्लाह के बारे में यह कहना कि उसका कोई साझेदार
है या उसकी औलाद है।
21: मक्का के लोगों में कुछ लोग यह मानते थे कि आसमान का ख़ुदा
कोई और है और ज़मीन का कोई और। अल्लाह को आसमान का ख़ुदा मानते, और ज़मीन का ख़ुदा किसी देवता को मानते थे और
यह भी मानते थे कि यह देवता धरती को नई ज़िंदगी देता है और उससे धरती हरी-भरी हो
जाती है।
24: रसूल से कहा गया है कि वह बुतपरस्तों को इस बात की
चुनौती दें कि अगर अल्लाह के अलावा दूसरे ख़ुदा हैं, तो
वे इसका प्रमाण किसी आसमानी किताब से पेश करें। आगे तर्क द्वारा बताया गया है कि
अगर एक से ज़्यादा ख़ुदा होते, तो बहुत सारे ख़ुदाओं में वर्चस्व की लड़ाई हो
जाती, और नतीजे में पूरा ब्रहमांड बर्बाद हो चुका
होता! क़ुरआन, तौरात और बाइबिल तीनों सहमत हैं कि ख़ुदा केवल
एक ही है।
26: अरब के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहा करते थे।
30: इसका एक मतलब यह भी बताया गया है कि आसमान के बंद होने का
अर्थ यह है कि बारिश नहीं होती थी, और ज़मीन के बंद होने का मतलब है कि इसमें कोई
पैदावार नहीं होती थी। सो दोनों को खोल दिया गया। शायद इसे ही Big Bang कहते हैं।
34: मक्का के विश्वास न करनेवाले इस बात के इंतज़ार में थे कि कब
मुहम्मद (सल्ल) की मौत होती है, ताकि वे ख़ुशियाँ मना सकें और उनका दीन उनके
साथ ही ख़त्म हो जाए, देखें सूरह तूर (52: 30).
44: अरब और उसके आसपास के क्षेत्रों में धीरे-धीरे
बहुदेववादियों का असर और प्रभाव कम होता जा रहा था, जिसे सीमा का सिकुड़ना कहा गया है, देखें सूरह रा'द (13: 41)
47: क़यामत के दिन हर आदमी के साथ इंसाफ़ होगा और वह इंसाफ़ होता
हुआ सब लोगों को दिखायी भी देगा।
58: वह कोई त्यौहार का दिन था जब सारे लोग शहर से बाहर कहीं
जश्न मनाने जाते थे, उस दिन हज़रत इबराहीम (अलै.) किसी बहाने से उन लोगों के साथ
नहीं गए थे, देखें सूरह साफ़्फ़ात (37: 88)
69: इस घटना को थोड़े विस्तार से सूरह (37: 97) में किया गया है। माना जाता है कि यह आग
बादशाह नमरूद [Nimrod] के हुक्म पर लगायी गई थी। बुख़ारी की हदीस में है कि आग में फेंके जाने
के समय इब्राहीम (अलै) ने कहा था, "हमारी मदद के लिए अकेले अल्लाह ही काफ़ी है और
वह ही सबसे अच्छा रखवाला है।
71: इस घटना के बाद इबराहीम और उनके भतीजे लूत (अलै) बाबिल, इराक़
से निकलकर सीरिया/येरुशेलम के इलाक़े में चले गए थे।
74: सदूम के लोगों के बुरे कर्मों के बारे में सूरह हूद (11: 77-83) और दूसरी आयतों में भी ज़िक्र आया है।
78: इस घटना के बारे में बताया जाता है कि एक बार ऐसा हुआ कि एक
आदमी की भेड़-बकरियाँ रात में किसी दूसरे के खेत में घुस गईं और फ़सल बर्बाद कर
डाली। खेतवाला मुक़दमा लेकर दाऊद (अलै.) के पास आया। उन्होंने फ़ैसला सुनाया कि
चूँकि बकरियों के मालिक की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह अपनी बकरियों को बाँधकर रखता, मगर उसने ऐसा नहीं किया था, इसके चलते खेतवाले को नुक़सान हुआ, इसलिए बकरीवाले को चाहिए कि वह खेतवाले के
हुए नुक़सान के बराबर मूल्य की बकरियाँ उसे भरपाई के रूप में दे। जब सुलैमान (अलै)
ने इस फ़ैसले के बारे में सुना, तो कहा कि उनके पास एक बेहतर उपाय है, और वह यह है कि बकरीवाला कुछ अवधि के लिए
अपनी बकरियाँ खेतवाले को दे दे जिनके दूध आदि से खेतवाला लाभ उठाता रहे, और खेतवाला अपना खेत बकरीवाले को दे दे कि वह
इसमें खेती करे, और जब फ़सल इतनी हो जाए जितनी बर्बाद होने से पहले थी, तो उस समय बकरीवाला खेतवाले को खेत वापस कर दे और खेतवाला बकरियाँ वापस कर दे, इसमें दोनों पक्षों का फ़ायदा था। इस फ़ैसले को
दाऊद (अलै.) और दोनों पक्षों ने भी पसंद किया था।
80: सूरह सबा (34: 10) में है कि दाऊद (अलै) लोहे को जिस तरह चाहते
मोड़ लेते थे और इससे जंग में लड़ने के लिए अच्छे क़िस्म के कवच बनाते थे।
81: सुलैमान (अलै) अपने तख़्त पर बैठकर फिलिस्तीन से जहाँ चाहते, हवा उन्हें उड़ा ले जाती थी, इससे वह एक महीने की दूरी सुबह के सफ़र में और
एक महीने की दूरी शाम के सफर में पूरा कर लेते थे, देखें सूरह सबा (34: 12).
82: देखें सूरह सबा (34: 13)
83: अय्यूब (अलै) को कोई बड़ी बीमारी हो गई थी जिसके चलते वह
काफ़ी समय तक तकलीफ़ में रहे, मगर धीरज नहीं खोया और अल्लाह से बीमारी ठीक
करने की दुआ करते रहे, यहाँ तक कि उनकी बीवी को छोड़कर ख़ानदान के सब लोगों ने उनका
साथ छोड़ दिया, फिर अल्लाह ने उनकी दुआ सुन ली।
85: हज़रत इस्माईल और इदरीस (अलै.) का ज़िक्र तो सूरह मरयम (19) में भी है, हज़रत ज़ुल-किफ़्ल के बारे में किसी घटना का ज़िक्र क़ुरआन में नहीं है। कुछ लोग
उन्हें बाइबल में आए नबियों जैसे Ezekiel, Isaiah
और Obadiah के
नाम से जोड़ते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वह हज़रत यसा' के ख़लीफ़ा थे, और नबी नहीं थे, लेकिन बड़े ऊँचे दर्जे के वली थे।
87: यूनुस (अलै) की बातों को उनकी क़ौम के लोग मानने के लिए
तैयार न थे, फिर जब उन्होंने देखा कि यातना आने ही वाली है, तो वह बिना अल्लाह की अनुमति लिए हुए शहर
छोड़कर चले गए। अंत में जब उनकी क़ौम ने यातना आते हुई देखी, तो तुरंत गुनाहों से तौबा की और
अल्लाह ने उनके गुनाह माफ कर दिए। देखें सूरह साफ़्फ़ात (37: 139-148)
89: क्योंकि जब सब कुछ ख़त्म हो जाएगा तब भी अल्लाह तो हमेशा
रहेगा।
90: देखें सूरह आल-इमरान (3: 37-40)
91: बताया जाता है कि फ़रिश्ते जिबरील ने हज़रत मरयम के कपड़े के
आस्तीनों में रूह फूँकी थी जिससे वह गर्भवती हो गई थीं।
95: इसका एक और अनुवाद है....."कोई भी समुदाय [क़ौम]
जिन्हें हमने (उनके गुनाहों के कारण) बर्बाद कर डाला था, उसके लिए मुमकिन नहीं है कि
वह लौटकर (दुनिया में) आ जाएं।"
96: क़यामत के आने की निशानी में
से है कि याजूज और माजूज जैसे वहशी और दरिंदे क़बीले बहुत बड़ी संख्या में दुनिया पर
हमला बोल देंगे, जिन्हें ज़ुल-क़रनैन ने एक
मज़बूत दीवार बनाकर दुनिया में आने से रोक दिया था, सूरह कहफ़ (18:
94-99).
97: सच्चे वादे यानी अंतिम घड़ी
[क़यामत]
105: देखें ज़बूर [Psalm]: 37:29
अकेली सूरह
सूरह 18: अल-कहफ़
[गुफ़ा / The Cave]
यह एक मक्की सूरह है, जिसका नाम "एक गुफा में सोने वालों" के ऊपर पड़ा है, जिनकी कहानी इस सूरह में (9-26) प्रमुखता से बयान की गई है। कहा जाता है कि
मुहम्मद सल्ल. से लोगों ने तीन सवाल पूछे थे: उन नौजवानों के बारे में जो गुफा में
छिप गए थे, उस राजा के बारे में जिसकी हुकूमत दुनिया के बहुत बड़े
हिस्से में थी, और आत्मा के बारे में। इसी के जवाब में आयत 9-26, 83-99 और 85 उतरी थी।
इस सूरह में दो और
कहानियाँ सुनायी गई हैं: मूसा (अलै) का एक बुज़ुर्ग हस्ती से मिलना (60-82), और ज़ुल-क़रनैन की कहानी (83-99)। मक्का के लोगों की सीख के लिए एक और कहानी
भी सुनायी गई है: एक हरे-भरे बाग़ के बर्बाद होने की कहानी, जिसका मालिक अमीर मगर घमंडी और नाशुक्रा था (32-44)। इन कहानियों को यहाँ बताने का असल मक़सद
ईमानवालों को मिलनेवाले इनाम की ख़ुशख़बरी देना और इंकार करने वालों को चेतावनी देना
है। सूरह की शुरुआत और अंत दोनों क़ुरआन के ज़िक्र से हुआ है।
01-08: क़ुरआन का मक़सद
09-26: गुफावाले लोगों की कहानी
27-31: रसूल का उत्साह बढ़ाना
32-44: दो आदमियों की मिसाल
45-46: बारिश और पौधों की मिसाल
47-49: फ़ैसले का दृश्य
50-51: मूर्तिपूजा असल में इबलीस [शैतान] और जिन्नों की पूजा है
52-53: अंतिम फ़ैसले का दृश्य
54-59: विश्वास न करने पर अड़े रहना और उसका परिणाम
60-82: मूसा (अलै) और अल्लाह के बंदे [ख़िज़्र] की कहानी
83-98: ज़ुल-क़रनैन की कहानी
99-102: अंतिम फ़ैसले का एक दृश्य
103-108: सज़ा और इनाम
109 : अल्लाह के संदेश ख़त्म नहीं होने वाले
110 : रसूल भी आदमी ही है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब
पर मेहरबान है, अत्यंत
दयावान है
सारी तारीफ़ें अल्लाह के
लिए हैं जिसने अपने बन्दे पर यह किताब [क़ुरआन] उतार भेजी, और उसे बिना किसी टेढ़ेपन के (सीधी) बनाया, (1)
(उस
किताब को) ठीक व सीधी बनाया, जो लोगों को उस (अल्लाह) की ओर से कठोर सज़ा
की चेतावनी देनेवाली है, और विश्वास करनेवालों को उनके अच्छे कर्मों के लिए ख़ुशख़बरी
सुनाने वाली है---कि (उनके लिए) क्या ही अच्छा इनाम होगा, (2)
जिसका मज़ा वे हमेशा वहाँ
उठाएंगे। (3)
यह उन लोगों को चेतावनी
देती है, जो यह कहते हैं कि, "अल्लाह की कोई औलाद है।" (4)
इसके बारे में उन्हें न तो
कोई जानकारी है, न ही उनके बाप-दादा को थी--- यह बड़ी गम्भीर बात है जो उनके
मुँह से निकलती है: जो कुछ वे कहते हैं वह सिवाय झूठ के कुछ नहीं है। (5)
मगर [ऐ रसूल], अगर वे (अल्लाह के) इस संदेश में विश्वास
नहीं करते हैं, तो क्या उसकी चिंता में आप अपनी जान ही दे देंगे? (6)
हमने धरती को बड़ी आकर्षक
चीज़ों से सजाया है, ताकि हम, लोगों की परीक्षा लें और जान सकें कि उनमें
से किन लोगों ने बेहतरीन कर्म किए, (7)
मगर हम (धरती की) इन सारी
चीज़ों को (समाप्त करके) एक दिन चटियल मैदान बना डालेंगे। (8)
[ऐ
रसूल!] क्या हमारी अन्य निशानियों में से आपको गुफा [Cave] और रक़ीम (नामक शहर के) लोगों (की घटना)
ज़्यादा ही अजूबा लगी? (9)
(जब
ऐसा हुआ था कि) उन नौजवान लड़कों ने गुफा में शरण लेनी चाही थी और कहा था, "ऐ हमारे रब! हम पर रहम कर और इस हालत में
हमारे लिए भलाई का कोई रास्ता निकाल दे।" (10)
फिर हमने उन्हें कई वर्षों
के लिए गुफा में (इस तरह सुला दिया कि) उनके कान (दुनिया की आवाज़
सुनने से) बंद कर दिए गए, (11)
फिर हमने उन्हें जगा दिया, ताकि मालूम कर सकें कि (लड़कों के) उन दो समूहों में से कौन सा समूह
है जो अपने वहाँ रहने की अवधि के बारे में ज़्यादा सही गिनती
बता सकता है। (12)
[ऐ
रसूल] असल में जो घटना हुई थी हम उसकी सही-सही कहानी आपको सुना देते हैं: वे कुछ
नौजवान थे जो अपने रब में विश्वास रखते थे, और हमने उनका ज़्यादा से ज़्यादा मार्गदर्शन
किया था। (13)
हमने उनके दिलों को (ईमान
की ताक़त से) मज़बूत कर दिया था, सो (एक दिन) वे उठ खड़े हुए और कहा, "हमारा रब तो वह है जो आसमानों और ज़मीन का रब
है। हम उसे छोड़कर कभी भी किसी दूसरे प्रभु को नहीं पुकारेंगे, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो यह बिल्कुल बेकार व
सच्चाई से हटी हुई बात होगी। (14)
ये हमारी क़ौम के लोग हैं जिन्होंने उस (अल्लाह) को छोड़कर अन्य
(देवताओं को) अपना प्रभु बना रखा है। (अगर ये सही हैं तो) आख़िर ये उनके बारे में
कोई स्पष्ट प्रमाण
क्यों नहीं लाते? उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के बारे
में झूठी बातें गढ़े? (15)
(साथियो), अब जबकि तुम इन लोगों से अलग हो चुके हो, और उनसे भी जिनको ये अल्लाह के बजाय पूजते
हैं, तो अब चलकर (किसी) गुफा में शरण ली जाए। अल्लाह तुम पर ज़रूर
अपनी रहमत की बारिश करेगा और तुम्हारे काम में आसानी के साधन जुटा देगा।" (16)
अगर आप उस (गुफा) को देखते
जिसके भीतर एक बड़ी सी जगह में वे सोए हुए थे, तो वह ऐसी थी कि जब सूरज निकलता था तो उसकी
किरणें गुफा के दाहिनी तरफ़ से बचकर निकल जाती थीं और जब वह डूबने लगता तो उसकी
किरणें गुफा के बायीं ओर से निकल जाती थीं। यह अल्लाह की निशानियों में से है:
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही सही मार्ग पाने वाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे, तो कोई बचाने वाला ऐसा नहीं जो उसे सीधे
मार्ग पर ले आए। (17)
आप (उन्हें देखकर) यही
समझते कि वे जागे हुए हैं, हालाँकि वे सोए हुए थे। हम उन्हें दाएँ और बाएँ करवट दिलाते
रहते थे, और उनका कुत्ता चौखट पर अपने (आगे के) दोनों पाँव फैलाए हुए
(बैठा) था। अगर आप उन्हें कहीं देख लेते, तो आप में उनका डर समा जाता और वहाँ से उलटे
पाँव भाग खड़े होते। (18)
फिर जब समय (पूरा) हो गया
तो हमने उन्हें (नींद से) उठा दिया, और वे आपस में पूछताछ करने लगे। उनमें से एक
ने पूछा, "तुम कितनी देर यहाँ रहे होगे?" (किसी ने) जवाब दिया, "यही कोई एक दिन या एक दिन का कोई भाग होंगे", मगर फिर (कुछ और लोगों) ने कहा, "तुम्हारा रब ही सही जानता है कि तुम यहाँ असल
में कितनी अवधि तक रहे। तुममें से कोई एक चाँदी के सिक्के के साथ शहर चला जाए, और वहाँ पता लगाए कि सबसे अच्छा खाना कहाँ
मिलता है, फिर उसमें से कुछ खाने को ले आए। मगर होशियार रहना कि कहीं
किसी को तुम्हारे बारे में ख़बर न होने पाए: (19)
अगर उन्हें तुम्हारे बारे
में पता चल गया तो वे तुम्हें पत्थरों से मार डालेंगे या तुम्हें अपने धर्म में
लौट आने पर मजबूर करेंगे, और तब तो तुम कभी भी कामयाब न हो पाओगे।" (20)
इस तरह हम उन (गुफावालों)
की घटना पर (शहर के) लोगों का ध्यान खींच पाए, ताकि वे जान सकें कि (मरने के बाद दोबारा
उठाए जाने का) अल्लाह का वादा सच्चा है, और यह कि क़यामत की घड़ी के आने में कोई सन्देह
नहीं है, (हालाँकि) लोग इसके बारे में आपस में बहस करते रहते हैं।
फिर (कुछ लोगों ने) कहा, "इस गुफा के ऊपर एक भवन बना दो: उनके बारे में
उनका रब ही बेहतर जानता है।" उनमें से असरदार लोगों ने कहा, "हम अवश्य इसके ऊपर (यादगार के तौर पर) एक
इबादत करने की जगह बनाएँगे।" (21)
(कुछ
लोग) कहते हैं, "वे [गुफावाले] तीन थे और चौथा उनका कुत्ता था", कुछ दूसरे कहते हैं, "वे पाँच थे और छठा उनका कुत्ता था" ----- वे अँधेरे में तीर चलाते हैं---- और कुछ यह
भी कहते हैं, "वे सात थे और आठवाँ उनका कुत्ता था।" [ऐ रसूल] आप कह दें, "मेरा रब ही बेहतर जानता है कि असल में वे
कितने थे।" बहुत ही कम लोग हैं जिनको उन (गुफावालों) की सही जानकारी है, अत: इस पर बहस न करें, मगर जो बात स्पष्ट है उसपर जमे रहें, और उनके बारे में इन लोगों में किसी से भी
कुछ न पूछें; (22)
और ऐसी बात कभी न कहें कि, "मैं कल इसे कर दूँगा", (23)
बल्कि (यह जोड़ दें) कि “अल्लाह ने चाहा तो” (कर दूँगा), और, जब कभी आप भूल जाएं, तो अपने रब को याद कर लें और कहें, "आशा है कि मेरा रब सही चीज़ की तरफ़ ही मेरा
मार्गदर्शन कर दे।" (24)
(कुछ
लोग कहते हैं), “गुफा में सोने वाले वहाँ तीन सौ साल तक रहे थे”, कुछ इसमें नौ वर्ष और जोड़ देते हैं। (25)
[ऐ
रसूल] कह दें, "अल्लाह ही बेहतर जानता है कि असल में वे (गुफा में) कितने
दिन रहे।" आसमानों और ज़मीन की हर ढकी छिपी चीज़ उसकी जानकारी में
है---- क्या ख़ूब वह देखनेवाला है! क्या ही अच्छा वह सुननेवाला है!---- उस (अल्लाह)
के सिवा उन्हें बचानेवाला कोई नहीं है; और वह अपनी हुकूमत (या अपने फ़ैसले) में किसी
को हिस्सेदार नहीं बनाता है। (26)
[ऐ
रसूल] अपने रब की क़िताब से जो कुछ ‘वही’ [revelation] के द्वारा आप पर उतारा गया है, उसे पढ़कर सुनाएं: उसके शब्दों को कोई बदल
नहीं सकता, और न ही उसके सिवा आपको कोई शरण लेने की जगह मिल सकती है। (27)
आप धीरज मन से उन लोगों के
साथ जमे रहें जो सुबह-शाम अपने रब की इबादत में इस इच्छा से लगे रहते हैं कि वह
ख़ुश होकर क़बूल कर ले, और देखें, ऐसा न हो कि सांसारिक जीवन की चमक-दमक को
पाने के मोह में आप अपने ही लोगों से नज़रें फेर लें: कहीं दबाव में आकर ऐसे लोगों
की बात न मान लें जिनके दिलों को हमने ऐसा कर दिया है कि वह मेरे संदेशों को भुला
बैठे हैं, और वे बस अपनी नीच इच्छाओं के पीछे चले जा रहे हैं, और वे अपने मामलों में बेलगाम हैं। (28)
कह दें, "तुम्हारे रब की ओर से अब सच्चाई आ चुकी है:
तो जो लोग इसमें विश्वास करना चाहें, वे विश्वास कर लें और जो लोग इसे मानने से
इंकार करना चाहें, वे इंकार कर दें।" हमने ग़लत काम करने वालों के लिए एक आग तैयार
कर रखी है, जो उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी। अगर वे (अपनी हालत में)
थोड़ी सी राहत के लिए फ़रियाद करेंगे तो उन्हें राहत के तौर पर ऐसा पानी मिलेगा जो
किसी पिघले हुए धातु जैसा होगा, जो उनके चेहरों को भून डालेगा। कितनी बुरी है
वह पीने की चीज़! कैसी दर्दनाक है वह आराम करने की जगह! (29)
रहे वे लोग जो ईमान रखते
हैं और अच्छे कर्म करते हैं---- तो जिस किसी ने भी अच्छा कर्म किया, उसके कर्मों के इनाम [reward] को हम कभी बेकार नहीं जाने देते---(30)
उनके लिए परम आनंद के
सदाबहार बाग़ होंगे जहाँ नहरें बह रही होंगी। वहाँ उन्हें सोने के कंगनों से सजाया
जाएगा। वहाँ वे हरे रंग के महीन रेशम और ज़री के कपड़े पहनेंगे और ऊँचे (गद्देदार)
तख़्तों पर तकिया लगाए बैठे होंगे। क्या ही अच्छा इनाम है! कितनी हसीन जगह है आराम
करने की! (31)
[ऐ
रसूल] आप उनको दो आदमियों की मिसाल बता दें: उनमें से एक को हमने अंगूरों के दो
बाग़ दे रखे थे, जो चारों तरफ़ से खजूरों के पेड़ों से घिरे हुए थे और उन
दोनों बाग़ों के बीच अनाज के खेत लगे हुए थे; (32)
दोनों बाग़ में ख़ूब फल हुए
और पैदावार में किसी तरह की भी कमी न हुई; और उन दोनों के बीच हमने (सिंचाई के लिए) एक
नहर भी बहा दी थी, (33)
इस तरह, उसे भरपूर फल हासिल हुए। एक दिन वह अपने
दोस्त से बातचीत करते हुए कहने लगा, "मैं तुझसे माल व दौलत में बढ़कर हूँ और मेरे
पीछे चलने वाले (लोग) भी कहीं ज़्यादा हैं।" (34)
(फिर
बातें करते हुए) वह अपने बाग़ में गया, और यह कहकर अपने आपको नुक़सान में डाल बैठा कि, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा हरा-भरा बाग़ कभी
बर्बाद भी हो सकता है। (35)
और यह कि मैं नहीं समझता
कि वह (क़यामत की) घड़ी कभी आएगी--- और अगर मुझे कभी अपने रब के पास वापस ले भी
जाया गया, तो मुझे यक़ीन है कि मुझे वहाँ इससे भी बेहतर चीज़ मिलेगी।" (36)
उसके साथी ने उससे बातचीत
करते हुए जवाब में कहा, "क्या तू उस (रब) में विश्वास नहीं रखता, जिसने तुझे (पहली बार) मिट्टी से बनाया, फिर वीर्य [sperm] की बूँद से पैदा किया, उसके बाद तुझे एक पूरा आदमी बना दिया? (37)
मगर मेरे लिए तो, मेरा रब वही (अल्लाह) है, और मैं कभी भी किसी को अपने रब के साथ
साझेदार [Partner] नहीं बनाउंगा। (38)
जब तू अपने बाग़ में दाख़िल
हो रहा था, काश कि तूने ऐसा कहा होता, “जो भी होता है सब अल्लाह की मर्ज़ी से होता है, और उसकी मदद के बिना किसी में कोई ताक़त नहीं।” हालाँकि तू देखता है कि मैं धन-दौलत और औलाद
में तुझसे कम हूँ, (39)
मगर मेरा रब चाहे, तो मुझे कोई ऐसी चीज़ दे सकता है जो तेरे बाग़
से अच्छी हो, और तेरे इस बाग़ पर आसमान से कोई बिजली गिरा सकता है जिससे
वह बंजर ज़मीन का ढेर बनकर रह जाए; (40)
या उस बाग़ का पानी धरती की
सतह से इतना नीचे चला जाए कि फिर तू किसी तरह भी उस तक न पहुँच सके।" (41)
और ऐसा ही हुआ: उसके फल
पूरी तरह से बर्बाद हो गए, उसने बाग़ पर जो कुछ ख़र्च किया था उसपर वह दुखी मन से बस हाथ
मलता रह गया, जबकि बाग़ अपनी टट्टियों [Trellis] पर गिरा पड़ा था, वह कहने लगा, "ऐ काश! मैंने अपने रब के साथ किसी को साझेदार [Partner] न बनाया होता!" (42)
अल्लाह को छोड़कर अब उसके
पास (गढ़े हुए ख़ुदाओं की) कोई ताक़त ऐसी न थी जो उसकी कोई मदद कर सकती--- वह तो ख़ुद अपनी भी कोई मदद नहीं कर सका। (43)
ऐसी हालत में, शरण लेने की केवल एक ही जगह है और वह है
अल्लाह की शरण, वही असली ख़ुदा है (जिसके पास हर चीज़ की ताक़त है): वही सबसे
अच्छा बदला [reward] देता है और वही सबसे अच्छा अंजाम दिखाता है। (44)
[ऐ
रसूल] उन लोगों को इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल भी बता दें कि यह ऐसी है जैसे:
हमने आसमान से पानी बरसाया, धरती के पेड़-पौधों ने उसे अपने अंदर सोख लिया
और हरे-भरे हो गए, फिर कुछ समय बाद ऐसा होता है कि पेड़-पौधे सूखी घांस व
भूंसों में बदल जाते हैं जिसे हवाएँ उड़ा ले जाती हैं: अल्लाह को हर चीज़ करने की
पूरी पूरी ताक़त है। (45)
धन दौलत और बच्चे तो केवल
इसी सांसारिक जीवन के आकर्षण हैं, मगर असल में, बाक़ी रहने वाले तो अच्छे कर्म हैं, जिसके लिए अल्लाह के यहाँ बेहतर बदला मिलेगा
और यही (अच्छे नतीजे की) उम्मीद लगाए रहने का कारण भी होगा। (46)
एक दिन आएगा जब हम पहाड़ों
को चला देंगे, और तुम धरती को खुले हुए चटियल मैदान की तरह देखोगे। हम सभी
लोगों को एक साथ इकट्ठा करेंगे, कोई भी पीछे छूट नहीं पाएगा। (47)
वे तुम्हारे रब के सामने
लाइनों में खड़े किए जाएँगे: "जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था, उसी तरह आज तुम्हें हमारे सामने आना पड़ा, हालाँकि तुम तो यह दावा करते थे कि तुम से
दोबारा मिलने का कोई समय हमने तय नहीं कर रखा है।" (48)
और (उस वक़्त) उनके कर्मों
की बही [record of deeds] जब खोलकर सामने रख दी जाएगी, तो अपराधियों को देखोगे कि उसमें लिखी हुई
(बातों को) देखकर घबरा जाएंगे, और कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! यह (कर्मों की) कैसी किताब
है! छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा, कोई भी कर्म ऐसा नहीं जिसे इस किताब में लिखा
न गया हो।" वह सब अच्छे–बुरे कर्म जो उन्होंने कभी भी किए होंगे, सब सामने मौजूद पाएँगे: तुम्हारा रब किसी के
साथ भी नाइंसाफ़ी नहीं करेगा। (49)
और जब (ऐसा हुआ था कि)
हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब (फरिश्ते सज्दे में) झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका: वह जिन्नों में से था
और उसने अपने रब के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। तो क्या तुम (लोग) मुझे
छोड़कर उस [इबलीस] को और उसकी संतानों को अपना स्वामी बनाना चाहते हो, बावजूद इसके कि वे तुम्हारे दुश्मन हैं? शैतानियाँ करने वालों के पास कितना बुरा
विकल्प है! (50)
मैंने आसमानों और ज़मीन को
बनाते समय इन [शैतानों] को नहीं बुलाया था कि वे उस (प्रक्रिया) को देख पाते, और न वे ख़ुद अपनी सृष्टि के समय वहाँ हाज़िर
थे; मैं ऐसे लोगों को अपना मददगार नहीं बनाता जो दूसरों को राह
से भटका देते हैं। (51)
एक दिन आएगा जब अल्लाह
कहेगा, "बुलाओ उन सबको जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे
(ख़ुदायी में) मेरे साझेदार [Partners] हैं”, वे उनको पुकारेंगे, मगर उनसे कोई जवाब नहीं मिलेगा; हम उनके बीच एक भयानक खाई बना देंगे। (52)
शैतानियाँ करने वाले लोग
उस भड़कती आग को देखेंगे और समझ जाएंगे कि वे उसमें गिरने ही वाले हैं: वे वहाँ से
बच निकलने का कोई रास्ता न पाएँगे। (53)
हमने लोगों के फ़ायदे के
लिए इस क़ुरआन में हर तरह के विषयों को मिसाल के साथ बार-बार बयान
किया है, मगर आदमी बड़ा ही झगड़ालू होता है! (54)
अब जबकि उनके पास
मार्गदर्शन आ चुका है, तो उस पर विश्वास करने से और अपने रब से (अपने कर्मों की)
माफ़ी माँगने से उन्हें किस चीज़ ने रोक रखा है? क्या वे इस इंतज़ार में हैं कि उनका अंजाम भी
वैसा ही विनाशकारी हो जैसा कि उनके पीछे गुज़र चुकी पीढ़ियों का हुआ था, या यह कि उनकी यातना उनके बिल्कुल सामने आ
खड़ी हो? (55)
रसूलों [Messengers] को हम केवल इसलिए भेजते हैं कि वे (ईमान व अच्छे कर्म के
लिए) ख़ुशख़बरी सुना दें और (बुरे कर्म करनेवालों को) चेतावनी दे दें, मगर इसके बावजूद (सच्चाई से) इंकार पर अड़े
लोग अपनी झूठी दलीलों से सच्चाई को ग़लत साबित करना चाहते हैं, और मेरे संदेशों [आयतों] और मेरी चेतावनियों
का मज़ाक़ उड़ाते हैं। (56)
उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम
कौन हो सकता है जिसे उसके रब के संदेशों द्वारा जब याद दिलाया जाता है, तो वह उनसे मुँह फेर लेता है, और इस बात को भूल जाता है कि कितने बुरे कर्म
वह पहले कर चुका है? (उनके कुकर्मों के चलते) हमने उनके दिलों पर ग़िलाफ़ [cover] चढ़ा दिए हैं, सो वे इस (क़ुरआन) को समझ नहीं सकते, और उनके कानों में (बहरेपन का) बोझ डाल दिया
है सो वे सुन नहीं सकते: हालाँकि [ऐ रसूल] आप उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाते हैं, मगर वे कभी मार्ग पाने वाले नहीं! (57)
[ऐ
रसूल] आपका रब बेहद माफ़ करनेवाला, बड़ा ही रहम करनेवाला है: जो गुनाह उन लोगों
ने किए हैं, अगर वह [अल्लह] इसके लिए उन्हें पकड़ना चाहता, तो जल्दी ही उन पर यातना ले आता। मगर उनके
लिए एक तय किया हुआ समय निश्चित है, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा, (58)
(ठीक
वैसे ही) जैसे हमने पुरानी क़ौमों को उनके गुनाह की वजह से बर्बाद कर दिया: हमने
उनके विनाश का समय भी निश्चित कर रखा था। (59)
(उस समय
की घटना सुनिए कि) जब मूसा ने अपने (जवान) सेवक से कहा था, "मैं अपनी यात्रा तब तक नहीं रोकूँगा, जब तक कि मैं उस जगह न पहुँच जाऊँ जहाँ दो समंदर
आपस में मिलते हैं, चाहे
मुझे वहाँ पहुँचने में बरसों लग जाए!” (60)
मगर जब वे दोनों उस जगह पर
पहुँचे जहाँ दो समंदर मिलते थे, तो उस मछ्ली का उन्हें ध्यान न रहा (जो उन्होंने
रख ली थी), और वह
(मछली) समंदर में सुरंग जैसा रास्ता बनाती हुई भाग निकली। (61)
जब वे आगे बढ़े तो (एक जगह)
मूसा ने अपने सेवक से कहा, "लाओ! खाना खा लें! हमारी यह यात्रा बड़ी थका देने वाली है", (62)
और उस (सेवक) ने कहा, "याद है आपको, जब हम (समंदर के किनारे) उस चट्टान के पास आराम
कर रहे थे? मैं तो
आपको मछली के बारे में बताना ही भूल गया--- उसने अजीब तरीक़े से समंदर में अपना
रास्ता बना लिया था--- और यह शैतान का ही काम है कि मैं इसके बारे में आपको बताना
भूल गया।" (63)
(मूसा
ने) कहा, "कितनी अजीब बात है! तब तो हो न हो, यह वही जगह थी जिसे हम तलाश कर रहे थे।" अत: दोनों अपने क़दमों के निशान देखते हुए वापस
(उसी जगह को) चल दिए, (64)
(जब उस
चट्टान के पास पहुँचे तो) वहाँ उनको हमारे ख़ास बंदों में से एक बंदा [ख़िज़्र] मिला ---- एक ऐसा आदमी जिस पर हमने अपनी विशेष दया की थी और उसे अपने पास से एक विशेष
ज्ञान दिया था। (65)
मूसा ने उनसे कहा, "क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ ताकि आपको जो कुछ
ज्ञान दिया गया है, उसमें
से सही मार्गदर्शन की कुछ बातें मैं भी सीख सकूँ?" (66)
उस आदमी ने कहा, "हाँ, मगर तुम मेरे साथ रहकर धीरज नहीं रख पाओगे, (67)
जो चीज़ तुम्हारी जानकारी की
सीमा से बाहर हो, उस पर
तुम धीरज रख भी कैसे सकते हो?" (68)
(मूसा
ने) कहा, "अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सब्र करने वाला पाएँगे। मैं आपके किसी भी आदेश को नहीं तोड़ूंगा।" (69)
उन्होंने कहा, "अच्छा, अगर तुम मेरे साथ चलोगे तो मैं चाहे कुछ भी करूं, तुम मुझसे कोई भी सवाल मत पूछना, जब तक कि मैं ख़ुद ही तुम्हें वह बात बता न दूं।" (70)
इस तरह, वे दोनों चल पड़े, फिर जब वे नौका में सवार हुए तो उस आदमी ने नौका
में एक जगह छेद कर दिया, (यह देखते ही) मूसा ने कहा, "आप ऐसा कैसे कर सकते हैं कि (आपने) इस नौका में छेद कर दिया? क्या आप इसमें बैठे हुए मुसाफ़िरो को डुबा
देना चाहते हैं? आपने तो एक ख़तरनाक हरकत कर डाली!" (71)
उन्होंने कहा, "क्या मैंने कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धीरज
न रख सकोगे?" (72)
मूसा ने कहा, "आप मुझे माफ़ कर दें, यह बात तो मैं भूल ही गया था। कृपया इस मामले
को मेरे लिए इतना कठिन न बनाएं कि आपके साथ रहना मुश्किल हो जाए।" (73)
और इस तरह वे दोनों फिर चल
पड़े। फिर जब (एक बस्ती के पास पहुँचे तो) ऐसा हुआ कि उन्हें एक नौजवान लड़का मिला, तो उस आदमी ने उसे मार डाला, मूसा ने कहा, "आप एक बेगुनाह आदमी का क़त्ल कैसे कर सकते
हैं? उसने तो किसी की हत्या नहीं की थी!, यह तो आपने बहुत ही बुरा किया!" (74)
उन्होंने जवाब दिया, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम धीरज
रखते हुए कभी भी मुझे सहन नहीं कर पाओगे?" (75)
मूसा ने कहा, "अब इसके बाद, अगर मैं आपसे कुछ भी पूछूं, तो आप मुझे साथ न रखें--- पहले ही आप मुझे काफ़ी हद तक बर्दाश्त कर
चुके हैं।" (76)
फिर से वे दोनों आगे चल
दिए। उसके बाद, जब वे एक बस्ती के पास पहुँचे, तो वहां के निवासियों से खाना माँगा, किन्तु उन लोगों ने खाना खिलाने से इंकार कर दिया, इसी बीच वहाँ उन्हें एक (पुरानी) दीवार दिखाई दी जो
बस गिरने ही वाली थी, तो उस आदमी ने उस (दीवार) की मरम्मत करके उसे मज़बूत कर दिया। (मूसा ने) कहा, "लेकिन अगर आप चाहते तो इस काम के लिए कुछ
मज़दूरी ले सकते थे।" (77)
उसने कहा, "अब मेरे और तुम्हारे अलग होने का समय आ गया
है। अब मैं तुमको उन चीजों के मतलब बता देता हूँ, जिन पर तुम धीरज न धर सके": (78)
वह जो नौका थी, कुछ ग़रीब लोगों की थी जिनकी रोज़ी-रोटी
समंदर से ही होती थी और मैंने उनकी नौका इसलिए ख़राब कर दी क्योंकि मुझे मालूम था
कि वे जिधर बढ़ रहे थे वहाँ एक राजा था जो हर एक (अच्छी) नौका को ज़बरदस्ती छीन
लेता था। (79)
और रहा वह जवान लड़का, तो उसके माँ-बाप तो ईमानवाले थे, मगर यह आशंका थी कि वह अपनी शैतानी और ईमान न
रखने के चलते उन्हें तकलीफ़ पहुँचाएगा, (80)
इसलिए मैंने चाहा कि उनका
रब उन्हें इसके बदले दूसरी संतान दे---जिसका दिल अधिक साफ़ हो और जिसमें ज़्यादा
दया का भाव हो। (81)
और रही वह दीवार, तो वह उस बस्ती में रहने वाले दो अनाथ लड़कों
की थी और उस दीवार के नीचे उनका ख़जाना गड़ा हुआ था, (दीवार गिरने से भेद खुल जाता, सो दीवार खड़ी कर दी)। उनका बाप एक सच्चा व
अच्छा आदमी था, इसलिए तुम्हारे रब ने चाहा कि जब वे अपनी जवानी को पहुँच
जाएं, तो अपने रब की दया से अपना ख़जाना सुरक्षित निकाल लें। असल
में, मैंने अपनी मर्ज़ी से ये सब नहीं किया: यह है वास्तविकता उन चीजों की, जिन पर तुम धीरज न रख सके।" (82)
(ऐ
रसूल) वे आपसे ज़ुलक़रनैन [दो सींगोंवाले] के बारे में पूछते हैं। कह दें, "मैं उसके बारे में तुम्हें कुछ बताता हूँ।" (83)
हमने धरती पर उसकी सत्ता
स्थापित की थी, और उसे हर चीज़ हासिल करने के लिए संसाधन दिए थे। (84)
उसने एक बार (पश्चिम के)
रास्ते पर अपना अभियान शुरू किया; (85)
फिर जब वह सूरज डूबने की
जगह के पास पहुँचा, तो उसे ऐसा लगा मानो सूरज दलदल जैसे काले पानी की एक झील
में डूब रहा हो। नज़दीक ही उसे कुछ लोग दिखाई दिए, और हमने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! तुझे अधिकार है कि चाहे तो
उन्हें दंड दे या उनके साथ अच्छा व्यवहार कर।" (86)
उसने जवाब दिया, "जिन लोगों ने शैतानियां की हैं, हम उन्हें दंड देंगे, और फिर जब वह अपने रब के पास लौटकर जाएंगे तो
वह उन्हें और भी कठोर यातना देगा, (87)
जबकि जिन लोगों ने (सच्चाई
पर) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए तो बेहतरीन बदला होगा: हम उन्हें ऐसे ही काम का आदेश करेंगे जो उनके
लिए आसान होगा।" (88)
वह उसके बाद एक और यात्रा
पर (पूरब की तरफ़) निकला; (89)
फिर जब वह सूरज निकलने की
जगह पर पहुँचा, तो उसने सूरज को ऐसे लोगों पर निकलते हुए पाया जिनके लिए
हमने सूरज की गर्मी से बचने के लिए कोई छाया नहीं रखी थी। (90)
और वहाँ की हालत ऐसी ही
थी: हमें उसकी पूरी जानकारी थी। (91)
बाद में, वह एक और सफ़र पर निकल पड़ा; (92)
जब वह दो पर्वतों के बीच (mountain barrier) पहुँचा, तो उसे उनके बीच ऐसी क़ौम के लोग मिले, जो लगता था कि कोई बात नहीं समझते। (93)
उन्होंने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! याजूज और माजूज (Gog and
Magog) इस
भूभाग में उत्पात मचाते रहते हैं। क्या तुम उनके और हमारे बीच एक रोक बना दोगे, अगर हम तुम्हें इस काम के लिए उचित मुआवज़ा
दें?” (94)
उसने जवाब दिया, "मेरे रब ने मुझे जो कुछ अधिकार एवं शक्ति दी
है वह किसी मुआवज़े से कहीं बेहतर है, लेकिन अगर तुम लोग मेरे काम में हाथ बटाओ, तो मैं तुम्हारे और उनके बीच एक मज़बूत दीवार
खड़ी कर सकता हूँ: (95)
मुझे लोहे के टुकड़े लाकर दो!", और फिर, जब वह दोनों पहाड़ों के बीच की ख़ाली जगह को
पाटकर बराबर कर चुका, तो (उसने कहा), "अब आग दहकाओ!", फिर जब वह (दीवार) आग की तरह लाल हो गयी, तब उसने कहा, "मुझे पिघला हुआ ताँबा लाकर दो, ताकि मैं उसपर उँडेल दूँ!" (96)
अब न तो उनके दुशमन (याजूज-माजूज) उस दीवार पर चढ़कर आ सकते थे, और न वे उसमें सेंध ही लगा सकते थे, (97)
और उसने कहा, "यह मेरे रब की तरफ़ से रहमत [Mercy] है (कि ऐसी दीवार बन गयी)। मगर जब मेरे रब के वादे का समय
पूरा हो जाएगा, तो वह इस दीवार को गिराकर बराबर कर देगा: मेरे रब की कही हुई बात सच है, टलने वाली नहीं!" (98)
और एक दिन आएगा जब हम उनकी
ऐसी हालत कर देंगे कि एक क़ौम के लोग दूसरी क़ौम के लोगों से लहरों की तरह टकरा रहे
होंगे, और फिर, नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा और हम उन सबको
एक साथ इकट्ठा कर देंगे। (99)
हम (सच्चाई से) इंकार करने
वालों के सामने जहन्नम को इस तरह ला खड़ा करेंगे, जैसे एक चीज़ नज़र के सामने दिखायी दे, (100)
वे इंकार करनेवाले जिनकी आँखें मेरी निशानियों को देखने से अंधी
थीं, और वे लोग (जिनके कानों में बोझ था कि) कोई बात सुन नहीं
सकते थे, (101)
क्या वे ऐसा सोचते थे कि
मुझे छोड़कर वे मेरे ही बन्दों को अपना रखवाला बना लेंगे? हमने ऐसे इंकार करने वालों की आवभगत के लिए
जहन्नम तैयार कर रखी है। (102)
[ऐ
रसूल] आप कह दें, "क्या हम तुम्हें बताएं कि कौन है जो अपने कर्मों के चलते सबसे ज़्यादा नुक़सान
उठाएगा, (103)
वह--- जिसकी सारी दौड़-धूप इस
दुनिया में ग़लत दिशा में होती है, हालाँकि वे इसी धोखे में रहते हैं कि वे बहुत
अच्छा कर्म कर रहे हैं? (104)
यही वे लोग है जिन्होंने अपने
रब के संदेशों पर विश्वास नहीं किया और इस बात से भी इंकार किया कि उन्हें अपने रब
के सामने पेश होना है।" अत: उनके सारे कर्म बेकार गए: क़यामत के दिन हम उनके (कर्मों
के) वज़न को स्वीकार नहीं करेंगे। (105)
उनका बदला तो वही जहन्नम होगा, इसलिए कि उन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से
इंकार किया था और मेरे संदेशों और मेरे रसूलों की हँसी उड़ायी थी। (106)
मगर जिन लोगों ने (सच्चाई
में) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनको (जन्नत के) बाग़ दिए जाएंगे। (107)
जिनमें वे हमेशा रहेंगे, और कभी वहाँ से हटना पसंद नहीं करेंगे।" (108)
[ऐ
रसूल] आप कह दें, "अगर सारे समंदर मेरे रब की बातों को लिखने के लिए स्याही बन
जाएं, तो स्याही सूख जाएगी मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न होंगी---
यहाँ तक कि हम एक और समंदर जोड़ लें, तब भी नहीं।" (109)
कह दें, "मैं तो बस तुम्हारे ही जैसा एक आदमी हूँ, जिस पर यह बात ('वही' द्वारा) उतारी गयी है कि तुम्हारा ख़ुदा वही
एक है। अतः जो कोई अपने रब के सामने खड़े होने से डरता हो, उसे चाहिए कि अच्छा कर्म करे और अपने रब की
बन्दगी में किसी को साझेदार [Partner] न ठहराए।" (110)
नोट:
4: औलाद से मतलब बेटा और बेटी
दोनों ही होता है। चूँकि यह सूरह मक्का में उतरी थी, इसलिए यहाँ मतलब शायद बेटी
से है क्योंकि मक्का के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ मानते थे।
7: जब मुहम्मद (सल्ल) देखते कि
मक्का के लोग अल्लाह के संदेश की सच्चाई पर विश्वास नहीं कर रहे हैं तो वह बहुत
दुखी हो जाते थे। यहाँ उन्हें तसल्ली देते हुए यह कहा गया है कि इस दुनिया को लोगों की परीक्षा के लिए
बहुत आकर्षक बनाया गया है, ताकि देखा जा सके कि कौन है
जो दुनिया की सजावट में गुम होकर अल्लाह को भूल जाता है, और कौन है जो अल्लाह के
हुक्म के अनुसार कर्म करता है।
9: "अल-रक़ीम" के कई मतलब बताए गए हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि जिस पहाड़ या घाटी में यह गुफा थी, उसी पहाड़ का नाम रक़ीम था, कुछ लोग कहते हैं कि यह शहर
का नाम था जो फिलिस्तीन के दक्षिण में स्थित था, मगर कुछ लोग इसे आजकल के
जार्डन [अम्मान] या तुर्की के इफ़ेसस [Ephesus] से जोड़ते हैं। कुछ लोगों का
मानना है कि यह असल में एक "शिलालेख"
[Inscription] था जिसमें "गुफा की घटना" को तख़्ती पर लिखवाकर गुफा
के दरवाज़े पर लगा दिया गया था।
10: ईसाई परम्परा में भी “Seven
Sleepers of Ephesus” नाम की मिलती-जुलती घटना पायी जाती है। इसके मुताबिक एक ज़माने में वहाँ Decius नाम का रोमन राजा था, जिसे अरब के लोग "दक़्युस" या "दक़ियानूस" कहते हैं, कहा जाता है कि वह पारसी
धर्म मानता था और ईसाइयों पर काफ़ी अत्याचार करता और उन्हें एक ख़ुदा को छोड़कर अपने
देवताओं को मानने पर मजबूर करता था। जब राजा के लोग ईसाइयों में से कुछ नौजवानों
के पीछे पड़ गए, तब उनलोगों ने शहर से
किनारे भागकर एक गुफा में पनाह ली। वहाँ अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उन्हें क़रीब 300
या 309 साल तक गहरी नींद में सुला
दिया, और जब वे दोबारा सोकर उठे, तो उनके शरीर सड़े-गले नहीं
थे, और उन्हें लगा कि वे थोड़ी
ही देर सोए होंगे।
17: वह एक बड़ी सी गुफा थी जहाँ
ताज़ा और ठंढी हवा आती थी, और अच्छी बात यह थी कि सीधी
धूप नहीं पड़ती थी जिससे वे तेज़ गर्मी से बचे रहे।
19: बताया जाता है कि उनमें से
एक जब चाँदी का पुराना सिक्का लेकर बाज़ार गया तो दुकानदार देखकर चौंक गया कि यह तो
राजा दक़ियानूस के ज़माने का सिक्का है, जबकि अब तो एक ईसाई राजा
थियोडोसिस [Theodocius] की हुकूमत है जो बड़ा नेक
इंसान है। फिर उन लोगों की पूरी कहानी राजा तक पहुँच गयी, राजा ने उनका बड़ा सम्मान
किया। कहा जाता है कि वे लोग वापस उसी गुफा में चले गए और फिर वहीं उनकी मौत हो
गयी। मरने के बाद उसी गुफा में उन नौजवानों की याद में एक इबादतगाह बना दी गई।
21: गुफावालों के साथ असल में
क्या घटना घटी, वे कितने साल सोए रहे, वे कुल कितने लोग थे, इस पर बाद के लोग बहस करते
रहते थे, मगर सही बात अल्लाह के सिवा
कोई नहीं जानता। असल में सीखने की चीज़ यह है कि अल्लाह की क़ुदरत पर पूरा विश्वास
रखा जाए, जिस तरह उसने कुछ लोगों को
तीन सौ सालों से ऊपर नींद से सुला दिया और फिर यूँ ज़िंदा उठा दिया जैसे कुछ हुआ ही
न हो, उसके लिए सभी इंसानों को
मरने के बाद दोबारा उठाना कोई मुश्किल बात नहीं है।
23: मक्का के जो लोग मुहम्मद
(सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं मानते थे, उन्होंने (यहूदियों के
उकसाने पर) मुहम्मद साहब को गुफावाले और ज़ुल-क़रनैन के बारे में बताने की चुनौती दी
थी। इस उम्मीद पर कि अल्लाह ज़रूर उन्हें इसके बारे में बता देगा, मुहम्मद (सल्ल) ने कह दिया
कि वह कल तक जवाब दे देंगे। मगर ऐसा हुआ कि क़रीब 15 दिन गुज़र गए, लेकिन अल्लाह ने "वही"
[Revelation] नहीं भेजी। उसके बाद जवाब तो भेज दिया, मगर एक सबक़ भी दे दिया कि "वही" का भेजना अल्लाह की मर्ज़ी
पर निर्भर है, इसलिए किसी बात पर यह न कहा
जाए कि मैं कल ऐसा करूँगा, बल्कि यह कहना मुनासिब होगा
कि "अगर अल्लाह ने चाहा [इन शा
अल्लाह], तो मैं कल करूँगा।"
25: ग्रेगोरियन कैलेंडर के
हिसाब से 300 साल इस्लामी चाँदवाले
कैलेंडर के 309 साल के बराबर होता है।
27: मक्का के जो लोग विश्वास
नहीं करते थे, वे मुहम्मद (सल्ल) से कहते
थे कि आप अगर क़ुरआन में हमारी इच्छाओं और मान्यताओं के मुताबिक थोड़ा सा फेर-बदल कर
दें, तो हम आप पर विश्वास कर
लेंगे।
28: मक्का के सरदारों की यह
कोशिश थी कि वे मुहम्मद (सल्ल) को इस बात के लिए मना लें कि उनके पीछे चलने वालों
में जो ग़रीब और छोटे लोग हैं, उन्हें किनारे कर दें और
हमलोगों की बात अलग से सुनें। देखें सूरह इसरा (17:
73-74), और सूरह अबसा (80: 1-10).
37: तुम्हारे बाप यानी आदम को
मिट्टी से पैदा किया।
50: देखें सूरह बक़रा (2:
31-36)
60: आयत 60--82 तक मूसा (अलै) और हज़रत
ख़िज़्र (अलै) के बीच होने वाली मुलाक़ात का वर्णन है। मूसा (अलै) की यह घटना अकेली
ऐसी घटना है जिसका ज़िक्र बाइबल में नहीं है। हज़रत ख़िज़्र के बारे में माना जाता है
कि वह भी अल्लाह के पैग़म्बर हैं जिनकी आम इंसानों से अलग ही ज़िंदगी है, वह रहती दुनिया तक के लिए
ज़िंदा हैं और अल्लाह ने उन्हें कुछ ऐसी चीज़ों का ज्ञान दिया है जो आम इंसानों की
जानकारी से परे है। हदीसों से पता चलता है कि एक बार किसी ने मूसा (अलै.) से पूछा
था कि दीन का सबसे बड़ा जानकार कौन है? उन्होंने जवाब में अपना ही
नाम लिया, मगर यह बात अल्लाह को पसंद
नहीं आयी, इसलिए अल्लाह ने मूसा (अलै)
को ज्ञान का कुछ ऐसा हिस्सा दिखाना चाहा जो उनके ज्ञान के दायरे से
बाहर था। उन्हें हुक्म हुआ कि जहाँ दो समंदर मिलता हो, वहाँ जाकर हज़रत ख़िज़्र से
मिलें, ताकि उन्हें एक अलग तरह के
ज्ञान का अनुभव हो। यह जगह सीना [Sinai]
के उत्तरी हिस्से में लाल सागर और भूमध्य सागर के बीच हो सकती है,
या सीना का वह दक्षिणी इलाक़ा हो सकता है जहाँ लाल सागर दो हिस्सों यानी सुएज़
नहर और अक़बा की खाड़ी में बंट जाता है।
63: मूसा (अलै) के सेवक ने मछली
को पानी में भागते हुए देखा था, मगर उस समय मूसा अलै की आँख
लग गयी थी, जब उनकी नींद खुली, तब उनका सेवक उनको बताना
भूल गया। हदीसों में सेवक की पहचान
हज़रत यूशा [Joshua] से की गयी है जो अभी छोटे
थे और मूसा (अलै) के शिष्य थे, बाद में वह भी नबी बने।
68: चूँकि मूसा (अलै.) को इन
चीज़ों की जानकारी नहीं दी गयी थी जो दिखायी नहीं देती हो, या आगे होने वाली हो, इसलिए उन घटनाओं पर धीरज
रखना कठिन था जो ऊपर से देखने पर ग़लत लगती हो।
83: ज़ुलक़रनैन यानी "दो सींगोंवाला", यह एक बादशाह की उपाधि थी।
यह उपाधि उसे शायद इसलिए दी गई थी कि उसने दो लम्बी यात्राएं की थी, दो सींगों की तरह एक तो सबसे पूर्व की यात्रा और एक सबसे पश्चिम की यात्रा
जहाँ से सूरज निकलता और डूबता है। पहले के विद्वानों ने इसकी पहचान सिकंदर महान से
की थी, मगर कुछ आधूनिक विद्वानों
ने इसकी पहचान ईरान के बादशाह साइरस से की है, जिसने इसराईल की संतानों को
जो अपने देश बाबिल से निकाले गए थे, उन्हें दोबारा फ़िलिस्तीन में
बसाया था। कुछ लोग
"सींगोंवाले" की पहचान यमन में गुज़रे एक नेक राजा अबु क़ुरैब अल-हमीरी से
करते हैं।
90: उन लोगों के पास कड़ी धूप से बचने के लिए शायद
कोई कपड़े या घर नहीं रहे होंगे।
93: मालूम होता है कि यह सफ़र उत्तर की तरफ़ हुआ था
क्योंकि उस तरफ़ पहाड़ों का सिलसिला है।
94: याजूज माजूज [Gog & Magog] दो जंगली
क़बीले थे जो उन पहाड़ों के पीछे रहते थे और थोड़े-थोड़े अंतराल में वे पहाड़ों के बीच
के दर्रे से इस इलाक़े में आकर मार-पीट और लूटमार किया करते थे, इसीलिए लोगों ने ज़ुलक़रनैन से अनुरोध किया कि
वह दर्रे को मज़बूत दीवार बनाकर बंद कर दे।
98: ज़ुलक़रनैन द्वारा बनायी गयी दीवार कहाँ है और
अभी तक टूटी है या नहीं? इस पर विश्वास
से कहना कठिन है। आधूनिक रिसर्च
के मुताबिक यह दीवार रूस के इलाक़े दाग़िस्तान में दरबंद के स्थान पर बनायी गयी थी, और अब यह टूट चुकी है। इतिहास के अलग-अलग दौर
में याजूज-माजूज के हमले विभिन्न आबादियों पर होते रहे हैं। उनके बाहर निकल आने और
आख़िरी हमला करने का ज़िक्र 21: 96-97 में आया है जो कि क़यामत के आने
की प्रमुख निशानियों में से है।
99: या तो याजूज-माजूज और बाक़ी इंसानों में टकराव
होगा, या इंसानों और
जिन्नों में लड़ाई होगी। यह भी हो सकता है कि क़यामत के समय आम लोग बदहवासी में एक
दूसरे से टकरा रहे होंगे।
क़यामत के दिन जब पहली बार नरसिंघा बजेगा, सारे जीव-जंतु मर जाएंगे। उसके बाद यह दूसरी
बार बजाया जाएगा और फिर सारे मरे हुए लोग उठ खड़े होंगे और अपना-अपना हिसाब देने के
लिए इकठ्ठा किए जाएंगे (देखें 39:68).
102: अल्लाह को छोड़कर कुछ लोगों ने ईसा, उज़ैर [Ezra] और फ़रिश्तों को ख़ुदा बना लिया था।
109: रब की बातों का मतलब अल्लाह की विशेषताओं, उसके ज्ञान और गहरी समझ-बूझ का वर्णन। देखें
सूरह लुक़मान (31: 27)
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