Monday, March 4, 2024

Medina II

 Chronologically Arranged Medinan Quran II

6H/628 AD




सूरह 62: अल-जुमा

[जुमे' की नमाज़/ The Congregation Prayer]


यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 9-11 में आए निर्देशों पर रखा गया है जिनमें ईमानवालों को अदेश दिया गया है कि जब जुमा की नमाज़ के लिए पुकारा जाए तो अपना काम-काज छोड़कर पूरी लगन से नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद आ जाया करो। सूरह में आगे मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि यह अल्लाह का फ़ज़ल है कि उन्हें रास्ता दिखानेवाला एक रसूल मिला और उन्हें आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा मिला (आयत 2-4). जो यहूदी लोग ऐसे हैं जिन्हें सही ज्ञान दिए जाने के बावजूद, वे उस ज्ञान के अनुसार कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, तो वे सचमुच निंदा के पात्र हैं (5-8). 


विषय:


   01:  अल्लाह की महानता

2 4: ऐसे लोगों में रसूल को भेजना जिनके पास कोई (आसमानी) किताब नहीं थी 

5 - 8: यहूदियों की इस मान्यता की कड़ी निंदा कि केवल वही अल्लाह के दोस्त हैं 

9-11:  जुमे की नमाज़ 


 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, जो हर चीज़ को अपने नियंत्रण में रखनेवाला [बादशाह] है, बेहद पवित्र है, ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)


वही है जिसने उन्हीं लोगों में से एक रसूल को उठाया जिनके पास कोई आसमानी किताब नहीं थी, ताकि वह उन्हें उसकी आयतें पढ़कर सुनाए, (मूर्तिपूजा से हटाकर) उनके मन को पवित्र करे, और उन्हें किताब और सही समझ-बूझ [हिकमत] की शिक्षा दे---- इससे पहले तो वे सचमुच खुली गुमराही में थे -----(2)


और उन्हीं में से (भविष्य में आने वाले) कुछ दूसरे लोगों को भी (किताब और हिकमत की शिक्षा दे) जो अभी उनसे आकर नहीं मिले हैं। वह बेहद ताक़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है: (3)


यह अल्लाह का ऐसा फ़ज़ल (favour) है कि वह जिसे चाहे, उसे [रसूल बना] देता है; और अल्लाह बड़े फ़ज़लवाला है। (4)


जिन लोगों पर तोरात [Torah] (की शिक्षाओं) को मानने का बोझ डाला गया था, वे उन (शिक्षाओं पर अमल करने की ज़िम्मेदारी) को निभा न सके, उनकी मिसाल उस गधे की-सी है जो बहुत सी किताबें लादे हुए हो (मगर उससे अज्ञान ही रहे)। कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की, जो अल्लाह की आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार करते हैं! अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता, जो ग़लत काम करने पर तुले रहते हैं। (5)

 

[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ यहूदी मत के माननेवालो! अगर तुम्हारा यह दावा सच्चा है कि दूसरे सारे लोगों को छोड़कर केवल तुम ही अल्लाह के दोस्त हो, तो फिर अपनी मौत की कामना करो।" (6)


मगर उन्होंने अपने हाथों अपने लिए जो (बुरे कर्मों का ढेर) जमा कर रखा है, इस कारण वे कभी भी अपनी मौत की कामना नहीं करेंगे----- और अल्लाह ज़ालिमों को अच्छी तरह जानता है---- (7)


अत: आप कह दें, “जिस मौत से तुम भागते हो, वह तो तुम से मिलने ज़रूर आएगी, फिर तुम्हें उसकी ओर लौटकर जाना होगा, जो हर छिपी चीज़ को भी जानता है और खुली चीज़ को भी: वह तुम्हें हर चीज़ बता देगा जो कुछ तुम किया करते थे।"  (8)


ऐ ईमानवालो, जब जुमे के दिन [Friday] नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो ख़रीदने-बेचने का काम बंद कर दो, और अल्लाह के ज़िक्र [नमाज़] की तरफ़ तेज़ी से चल पड़ो--- यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानो”---- (9)


फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए, तो ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह की दी हुई रोज़ी [फ़ज़ल] तलाश करो। अल्लाह को बराबर याद करते रहो, ताकि तुम (दोनों जहान में) कामयाब हो सको।  (10)


(इसके बावजूद, कुछ लोग) जब ख़रीदने-बेचने के सामान या खेल-तमाशे की ख़बर पाते हैं, तो (ज़रूरत के चलते मस्जिद से भागकर) उसकी ओर टूट पड़ते हैं, और (ऐ रसूल) आपको (ख़ुत्बे में बोलते हुए) खड़ा छोड़ जाते हैं। आप कह दें, "अल्लाह के पास जो (इसका इनाम) है, वह किसी भी खेल-तमाशे या व्यापार से कहीं अच्छा है: (याद रहे!), अल्लाह सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (11)

 

 

नोट:

2. लोगों को "पवित्र करने" का मतलब दूसरों को दान या ज़कात देने पर ज़ोर देना भी हो सकता है, देखें 2:129, 151; 3:164


3: मतलब यह है कि मुहम्मद (सल्ल) केवल अरब के लोगों के लिए रसूल बनाकर नहीं भेजे गए थे, बल्कि आप क़यामत तक आने वाले इंसानों के लिए पैग़म्बर बनाकर भेजे गए हैं चाहे वह किसी भी नस्ल से हों। 

 

4: यहूदी चाहते थे कि आख़िरी नबी इसराईल की संतानों में से हो, अरब के बहुदेववादी कहते थे कि अल्लाह को अगर रसूल भेजना ही था, तो वह उनके कोई बड़े सरदारों में से होना चाहिए था। मगर अल्लाह कहता है कि रसूल को चुनकर भेजना, तो उसका काम है और उसकी मर्ज़ी के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। 

 

5: मतलब यह है कि यहूदियों को तोरात में आख़िरी नबी पर विश्वास करने का हुक्म दिया गया था, मगर वे उसकी शिक्षाओं पर ठीक से अमल नहीं करते थे, और उन्होंने आप पर विश्वास नहीं किया। 

 

6: इसी तरह का चैलेंज सूरह बक़रा (2: 94-95) में भी आया है कि अगर उन्हें लगता है कि वे ही अल्लाह के सबसे चुने हुए बंदे हैं (2:111; 5:18), और उनका जन्नत में जाना तय है, तो अपनी मौत की कामना करें, मगर किसी यहूदी ने डर के मारे ऐसा नहीं किया, शायद यह सोचकर कि कहीं यह सचमुच सही न हो जाए। 

 

10: मतलब यह है कि जुमे की नमाज़ पूरी हो जाने के बाद अपने-अपने धंधे में लग जाना चाहिए। 

 

11: इब्ने कसीर ने लिखा है कि शुरू में मुहम्मद (सल्ल) जुमे की नमाज़ के बाद ख़ुत्बा [भाषण] दिया करते थे, एक बार ऐसा हुआ कि नमाज़ के बाद जब आप ख़ुत्बा दे रहे थे, तभी शहर में एक क़ाफिला आ पहुँचा, और उसके आने की ख़बर ढोल-नगाड़ा बजाकर दी जाने लगी, उस समय चूँकि मदीने में खाने-पीने के सामान की बहुत कमी हो गई थी, इसलिए काफ़ी लोग मस्जिद से क़ाफिले की तरफ़ दौड़ पड़े, और मस्जिद में बहुत ही कम लोग बच गए। इस आयत में इस तरह ख़ुत्बा छोड़कर जाने से मना किया गया है।  


 

सूरह 58: अल- मुजादिला

[बहस करनेवाली/ She Who Disputes]


यह एक मदनी सूरह है जिसमें अरब के बुतपरस्तों में पायी जाने वाली एक अजीब रस्म को अवैध घोषित किया गया है। आयत 1 में एक झगड़े का हवाला दिया गया है जिसमें  एक तरफ़ तो एक औरत है जिसको उसके पति ने वहाँ की रस्म के मुताबिक़ तलाक़ दे दिया था, और दूसरी तरफ़ पैग़म्बर हैं जिनके सामने यह मामला लेकर वह औरत आयी थी। इस सूरह में अल्लाह ने औरत का साथ दिया है। इस सूरह में घोषणा की गई है कि जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, जो शैतान के साथ चुपचाप गठबंधन करते हैं, जो अपने वचनों को तोड़ डालते हैं, और अल्लाह के रसूल के ख़िलाफ़ षडयंत्र करते हैं, वे सब हरा दिए जाएंगे और वे इस दुनिया और आने वाली दुनिया में बेइज़्ज़त किये जाएंगे (आयत 5 और 20), जबकि जो अल्लाह की तरफ़ हैं जीत उन्हीं की होगी (आयत 22). 


विषय:

01-04: बीवियों से बेवजह अलग हो जाने का मसला तय 

05-06: अल्लाह के रसूल का विरोध करना बेकार है

07-10: ऐसी कोई चीज़ नहीं जो अल्लाह की नज़र से बच सके

11   : रसूल की मजलिस में सही आचरण का तरीक़ा 

12-13: रसूल के साथ अकेले में मिलने की शर्तें 

14-21: विरोधियों की हार हो जाएगी

22   : विरोधियों के साथ कोई रिश्ता न रखें

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!] अल्लाह ने उस औरत की बात सुन ली है जो अपने पति के बारे में आपसे बहस कर रही थी और अल्लाह से शिकायत कर रही थी: अल्लाह ने (इस बारे में) आप दोनों का कहना सुना। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (1)

तुममें से कोई अगर अपनी बीवियों से यह कह भी देता है कि, "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो", तो वे उनकी माएँ तो नहीं हो जाएंगी; उनकी माएँ तो वही हैं जिन्होंने उनको जन्म दिया है। जो कुछ वे कहते हैं, वह सचमुच अनुचित और झूठ है, मगर अल्लाह (ग़लतियों को) टाल जाने वाला और (गुनाहों को) माफ़ करने वाला है। (2)

तुममें से जो लोग अपनी बीवियों से ऐसी बात कह देते हैं, फिर कहकर अगर अपनी बात से टल जाते हैं, तो इससे पहले कि दोनों [मियाँ-बीवी] एक-दूसरे को फिर से हाथ लगाएँ, उन्हें एक ग़ुलाम को आज़ाद करना चाहिए---- यह है वह बात जिसका तुम्हें हुक्म दिया जाता है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है------ (3)

लेकिन जिस किसी के पास (ग़ुलाम आज़ाद करने का) साधन न हो, तो इससे पहले कि वे दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ, उसे लगातार दो महीने रोज़ा रखना चाहिए, और अगर कोई यह भी न कर सके, तो उसको चाहिए कि साठ ज़रूरतमंद लोगों को खाना खिलाए। ऐसा इसलिए है ताकि तुम सचमुच अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रख सको। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ है: जो कोई इन्हें नज़रअंदाज़ करेगा, दर्दनाक यातना उसके इंतज़ार में रहेगी।  (4)

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे, जैसा कि उनसे पहले के लोग हुए थे: हमने साफ़ व स्पष्ट आयतें [संदेश] उतार भेजी हैं, और उन्हें मानने से इंकार करने वालों के लिए अपमानित कर देने वाली यातना होगी,  (5)

उस दिन अल्लाह सबको (दोबारा) उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। वे भले ही भूल गए हों, मगर अल्लाह ने (अपने खाते में) हर काम का हिसाब कर रखा है: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (6)


[ऐ रसूल!] क्या आप नहीं देखते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को अल्लाह जानता है? तीन आदमियों के बीच कोई ख़ुफ़िया बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ चौथा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, न पाँच आदमियों के बीच गुप्त बातचीत हो सकती है, क्योंकि वहाँ भी छठा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, बिना उस [अल्लाह] की मौजूदगी के, चाहे वे कहीं भी हों (कोई ख़ुफ़िया बात नहीं हो सकती),---- न इससे कम आदमियों के बीच और न इससे ज़्यादा के बीच। क़यामत के दिन वह उन्हें दिखा देगा, जो भी उन लोगों ने किया होगा: सचमुच अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है।  (7)

क्या आपने नहीं देखा कि जिन लोगों को ख़ुफ़िया बैठक करने से रोका गया था, वे लोग वहाँ से जाने के बाद ऐसी बैठकें करते हैं, और एक दूसरे के साथ मिलकर साज़िशें रचते हैं, जो कि गुनाह है, शत्रुतापूर्ण है, और रसूल की आज्ञा को मानने से इंकार करना है? जब वे आपके पास आते हैं तो आपके अभिवादन [Greeting] में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिन्हें अल्लाह ने आपके अभिवादन के लिए कभी भी प्रयोग नहीं किया, और अपने मन में कहते हैं, "जो कुछ हम कहते हैं, उसके लिए अल्लाह हमें सज़ा क्यों नहीं देता?" सज़ा के तौर पर उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी होगी: वे उसी में जलेंगे--- वह अंतिम पड़ाव की बड़ी बुरी जगह है!  (8)


ऐ ईमानवालो! जब तुम आपस में चुपके-चुपके बातें करो, तो वह (गुप्त बातें) ऐसी न की जाएं जिसमें गुनाह, ज़्यादती और रसूल की आज्ञा न मानने की बातें शामिल हों, बल्कि बातें इस तरीक़े से की जाएं जो नेकी और (अल्लाह का डर रखते हुए) बुराइयों से बचने की बातें हों। अल्लाह से डरो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा किया जाएगा। (9)

(किसी भी दूसरे तरह की) ख़ुफिया बातचीत शैतानी काम है, जिसका मक़सद ईमानवालों को परेशानी में डालना है, हालाँकि अल्लाह की अनुमति के बिना वे उन्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। ईमान रखनेवालों को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए। (10)


ऐ ईमानवालो! मजलिसों में अगर तुमसे कहा जाए कि एक दूसरे (के बैठने) के लिए थोड़ी जगह बनाओ, तो जगह बना दिया करो, अल्लाह तुम्हारे लिए जगह बना देगा, और अगर तुम (बैठे हो, और तुम) से कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो: अल्लाह उन लोगों के दर्जों को ऊँचा उठा देगा, जो लोग तुममें से ईमान रखते हैं, और जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है: (याद रखो!) जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (11)

ऐ ईमानवालो! जब तुम अपने रसूल से अकेले में बात करने के लिए आओ, तो बातचीत से पहले, (ग़रीबों को) कुछ दान दे दिया करो: यह तुम्हारे लिए अच्छा और अधिक पवित्र तरीक़ा होगा। हाँ, अगर तुम्हारे पास (देने के लिए) कुछ न हो, तो अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)


क्या तुम इस बात से डर गए कि (रसूल के साथ) अकेले में बातचीत से पहले दान देना होगा? चूँकि तुमने दान नहीं दिया, और (फिर भी) अल्लाह ने तुम्हारे प्रति नरम रुख़ अपनाया है, इसलिए (कम से कम) नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, निर्धारित ज़कात [Prescribed alms] दिया करो, और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (13)


[ऐ रसूल] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जिनका मेलजोल ऐसे लोगों के साथ है जिन पर अल्लाह का ग़ुस्सा उतरा? वे न तुम्हारे साथ हैं, और न उनके साथ हैं, और वे जानते-बूझते झूठी बात पर क़समें खाते हैं। (14)

अल्लाह ने उनके लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है: जो कुछ वे करते हैं, वह सचमुच बहुत बुरा है। (15)

उन्होंने अपनी क़समों का इस्तेमाल (अपने काले कारनामों को) छिपाने के लिए कर रखा है, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका है। एक बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना उनके घात में है-----(16)

अल्लाह के ख़िलाफ़ न उनकी धन-दौलत किसी काम आएगी, और न उनके बाल-बच्चे----- वे जहन्नम (की आग) में रहने वाले हैं, उसी में हमेशा रहेंगे। (17)

उस (क़यामत के) दिन, जब अल्लाह सबको (मुर्दे से) ज़िंदा करके उठाएगा, तो वे अल्लाह के सामने भी क़समें खाने लगेंगे, जिस तरह वे आपके सामने आज क़समें खाते हैं, और समझेंगे कि इससे उन्हें कुछ सहारा मिल जाएगा। कितने बड़े झूठे हैं वे! (18)

शैतान ने उन पर पूरी तरह से अपना क़ब्ज़ा जमा लिया है, और उन्हें ऐसा बना दिया है कि वे अल्लाह की याद को भुला बैठे हैं। वे शैतान के पक्ष [side] में हैं, और शैतान के पक्षवालों की ही हार होगी:   (19)

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे उन लोगों में होंगे जिनकी भारी बेइज़्ज़ती होगी।  (20)

अल्लाह ने लिख दिया है, "मैं अवश्य जीतकर रहूंगा, मैं और मेरे रसूल!" निस्संदेह अल्लाह बेहद ताक़तवाला, बड़ा प्रभुत्वशाली है। (21)


जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर सचमुच विश्वास रखते हैं, [ऐ रसूल!] आप उन्हें ऐसा नहीं पाएंगे कि उन लोगों की निष्ठा [Loyalty] ऐसे लोगों के साथ हो, जो अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हों, भले ही वे उनके अपने बाप हों, बेटे हों, भाई हों, या उनके रिश्तेदार हों: ये वह लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने ईमान अंकित कर दिया है, और अपनी रूह से उन्हें मज़बूती दी है। वह उन्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे: अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश होगा, और वे अल्लाह से। वे अल्लाह के पक्ष [side] वाले हैं, और अल्लाह के पक्षवाले ही कामयाब होंगे।  (22)


नोट:

1: अरब के बहुदेववादियों [Pagans] के यहाँ एक अजीब परम्परा थी कि वे अपनी बीवियों से यह कहकर अलग हो जाते थे कि "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो" जिसे "ज़िहार" कहते थे, जिससे बीवियों के वैवाहिक अधिकार ख़त्म हो जाते थे, यहाँ तक कि वे फिर से शादी भी नहीं कर पाती थीं। सलबा की बेटी ख़ौला के पति ने भी एक बार इसी तरह ग़ुस्से में उसे ज़िहार कर दिया, जब ख़ौला मुहम्मद (सल्ल) से इस मामले के बारे में शिकायत लेकर आयीं, तो आपने भी उससे यही कहा कि तुम अब अपने पति के लिए वैध [हलाल] नहीं हो। फिर वह बार-बार इस बात पर मुहम्मद (सल्ल) से बहस करने लगी कि उसके पति ने उसे तलाक़ तो दिया नहीं है, फिर उसी समय यह आयत उतरी जिसमें बीवियों के प्रति इस ज़ालिमाना नियमों को बदलकर इस पर रोक लगा दी गई।

3:  यहाँ यह बता दिया गया कि ज़िहार करने के बाद भी मियाँ-बीवी का रिश्ता दोबारा जुड़ सकता है, मगर दोबारा मिलन से पहले भरपाई के तौर पर एक ग़ुलाम आज़ाद किया जाए, यह न हो सके तो दो महीने लगातार रोज़े रखे जाएं, या यह भी न हो सके तो 60 ग़रीबों को खाना खिलाया जाए। 

7:  मदीना में मुसलमानों के आने के बाद से ही यहूदियों के मन में उनके लिए नफ़रत और जलन की भावना थी। वे जब मुसलमानों को देखते तो आपस में कानाफूसी और इशारों में बातें करने लगते थे, जैसे कि वे कोई साज़िश कर रहे हों, मदीना के कुछ पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग भी ऐसा ही किया करते थे। 

8: यहूदियों की एक और शरारत यह थी कि जब वे मुसलमानों से मिलते तो उन्हें "अस्सलामो अलैकुम" यानी तुम पर सलामती हो, कहने के बजाए "अस्सामो अलैकुम" यानी तुम पर बर्बादी हो, कहते थे जो सुनने में एक जैसा ही लगता था। वे अपने मन में यह भी कहते थे कि अगर ऐसी बात कहना ग़लत है, तो अल्लाह इस पर उन्हें कोई सज़ा क्यों नहीं देता? 

12: कुछ लोग मुहम्मद (सल्ल) से अकेले में मिलते, तो बेज़रूरत देर तक बातें करते रहते, और आप तहज़ीब की वजह से उन्हें कह नहीं पाते थे कि अब आप चले जाएं। इस आयत में यह हुक्म हुआ कि ऐसे लोगों को मिलने से पहले ग़रीबों को कुछ दान देना चाहिए। 

13: पिछली आयत में और इस आयत के आने में कुछ समय का अंतराल था। पिछली आयत में जो हुक्म हुआ उसके बाद अब मुहम्मद (सल्ल) से अकेले में मिलने वालों की संख्या बहुत कम हो गई थी, सो जब मक़सद पूरा हो गया, तो इस आयत के द्वारा वह हुक्म हटा लिया गया। 

14: यहाँ मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़] का बयान है। ये लोग ऊपर से तो क़समें खाते थे कि वे मुसलमान हैं, लेकिम असल में ईमान नहीं रखते थे, इन्होंने यहूदियों के साथ सांठ-गांठ कर रखी थी, और मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करते रहते थे। 


सूरह 24: अन-नूर 

[रौशनी/ Light]


यह सूरह मदनी है जो मुस्लिम समुदाय के बहुत से नियम-क़ायदे को स्पष्ट करती है, ख़ासकर शादी-ब्याह, पर्दा, रसूल की आज्ञा मानना, घरों में रहने-सहने का सही तरीक़ा, ज़बरदस्ती देह-व्यापार कराना, किसी पर व्यभिचार का लांछन लगाना इत्यादि।  शुरुआती संदर्भ हज़रत आयशा [मुहम्मद सल्ल की बीवी] के एक मर्द के साथ संबंध के बारे में उड़ायी गई झूठी अफ़वाह के बारे में है, जब वह एक अभियान में क़ाफ़िले के साथ गई थीं और भोर के समय शौच के लिए किनारे की तरफ़ निकल गईं, फिर उनका हार कहीं गिर पड़ा और उसे खोजने के चक्कर में वह व्यस्त हुईं और इस बीच क़ाफ़िला वहाँ से चल पड़ा और वह पीछे छूट गईं, एक मुसलिम नौजवान जो क़ाफिले के पीछे रहा था, उसने आयशा (रज़ि) को हिफ़ाज़त के साथ मदीना पहुँचा दिया। उनपर उसी नौजवान के साथ संबंध होने का लांछन लगाया गया था, जो बाद में ग़लत साबित हुआ। इस सूरह का नाम "रौशनी वाली आयत" (35-36) पर पड़ा है, जहाँ अल्लाह की रौशनी की तुलना सच्चाई पर विश्वास करने वालों के अंधेरे में पड़े रहने से की गई है।


विषय:

01:       यह सूरह अल्लाह की तरफ़ से है

02-03:  अवैध सेक्स करने के लिए सज़ा 

04-10:  झूठे इल्ज़ाम लगाने पर सज़ा 

11-20:  एक झूठी बात गढ़ने का मामला 

21   :   अश्लीलता और बुराई के रास्ते पर मत चलो 

22   :   नातेदारों, ग़रीबों और घर-बार छोड़कर आने वालों की मदद करो 

23-25: निर्दोष औरतों पर लांछन लगाने की दर्दनाक सज़ा 

26   :   अच्छे या बुरे मर्दों की शादियाँ उनके ही जैसी औरतों से होनी चाहिए 

27-29: दूसरों के घरों में बिना इजाज़त नहीं घुसना चाहिए 

30-31: मर्द और औरत को एक दूसरे से शर्म और लिहाज़ रखने पर ज़ोर 

32-33: शादी करने की सलाह 

34:      स्पष्ट आयतें, साफ़ निशानियाँ 

35-38: अल्लाह की रौशनी [नूर] की मिसाल 

39-40: विश्वास न करने की मिसाल 

41-46: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

47-54: अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो 

55-57: ईमानवालों को अल्लाह का वादा 

58-60: घरों में आने का सही तरीक़ा 

61   :   एक-दूसरे के घरों में खाना खाना

62   :   मजलिस से उठकर जाने के लिए रसूल की अनुमति लेना 

63   :   रसूल के बुलाने पर तुरंत हाज़िर होना चाहिए 

64   :  अल्लाह सब जानता है 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।

यह एक सूरह है, जो हमने उतारी है और इस पर अमल करना ज़रूरी ठहरा दिया है: इसमें हमने साफ़ व स्पष्ट (आदेशों के साथ) आयतें उतारी हैं, ताकि तुम इस पर ध्यान दो और इससे शिक्षा ले सको। (1)

अगर औरत और मर्द बिना शादी किए, एक दूसरे के साथ सेक्स [ज़िना/ extra-marital sexual intercourse] करते हैं, तो ऐसे में दोनों को (सज़ा के तौर पर) सौ-सौ कोड़े मारो। अगर तुम अल्लाह और आने वाले अंतिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हो, तो (देखो) कहीं ऐसा न हो कि अल्लाह के क़ानून पर अमल करते समय उनपर तरस खाकर तुम्हारा हाथ रुक जाए------ और (यह भी ध्यान रहे कि) उन्हें दंड देते समय ईमानवालों का एक समूह वहाँ देखने के लिए मौजूद होना चाहिए। (2)

बिना शादी के, सेक्स [ज़िना] करनेवाला मर्द [Adulterer] इसी लायक़ है कि वह ज़िना (पसंद) करनेवाली औरत [Adulteress] या बहुदेववादी औरत [Idolatress] से ही (शादी के लिए) रिश्ता जोड़े, (इसी तरह) अवैध सेक्स [ज़िना] करनेवाली औरत [Adulteress] के लिए भी उपयुक्त यही है कि वह ज़िना (पसंद) करनेवाले मर्द [Adulterer] या बहुदेववादी मर्द [Idolater] से ही रिश्ता जोड़े: ऐसे आचरण ईमानवालों के लिए बिल्कुल मना कर दिए गए हैं। (3)

और जो लोग शरीफ़ (और विवाहित) औरतों पर (अवैध सेक्स करने का) आरोप लगाएँ, फिर (सबूत में) चार गवाह न ला सकें, तो उन्हें (दंड के रूप में) अस्सी कोड़े मारो और आगे कभी उनकी गवाही क़बूल न करो: ऐसे ही लोग हैं जो क़ानून तोड़ने वाले हैं, (4)

हाँ, जिन लोगों ने इस बुरे कर्म के बाद तौबा कर ली और अपने आपको सुधार लिया, तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है। (5)


जो लोग अपनी बीवियों पर ज़िना [Adultery] करने का इल्ज़ाम लगाएं, मगर उनके पास अपने सिवा कोई दूसरा गवाह मौजूद न हो, तो ऐसे हर आदमी की गवाही इस तरह होगी कि पहले चार बार अल्लाह की क़सम खाकर यह बयान दे कि (इल्ज़ाम के बारे में) वह सच बोल रहा है,  (6)

और, पाँचवी बार, यह गवाही दे कि अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ, तो मुझ पर अल्लाह की फिटकार हो";  (7)

(मर्द की गवाही के बाद) उसकी बीवी से (ज़िना की) सज़ा टल सकती है, अगर वह भी चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि उसका पति झूठ बोल रहा है (8)

और, पाँचवी बार, यह गवाही दे कि "अगर उसके पति का बयान सच्चा है, तो मुझ पर अल्लाह की फिटकार हो!" (9)


अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] और उसकी रहमत [mercy] साथ न होती, और अगर अल्लाह (गुनाहों की) तौबा [repentance] क़बूल करनेवाला, और बेहद समझ-बूझ रखनेवाला न होता,.....(तो सोचो, क्या हुआ होता)! (10)

[मुसलमानो!] तुम्हारे ही लोगों के बीच एक समूह था जिसने (रसूल की बीवी हज़रत आयशा के बारे में) झूठी बातें गढ़ ली थीं--------तुम (लोग) यह न समझना कि यह तुम्हारे लिए बुरा हुआ; नहीं, बल्कि यह तुम्हारे लिए अच्छा ही हुआ------ उन झूठी बातें बनाने वालों में से हर एक के हिस्से में अपने किए का गुनाह आया है। और उनमें से वह जिसने इस (घटना) में सबसे बड़ी भूमिका निभायी, उसे दर्दनाक सज़ा होगी। (11)

जब तुमने यह झूठी बात सुनी, तो ईमान रखने वाले मर्दों और औरतों को चाहिए था कि अपने लोगों के बारे में अच्छा विचार रखते, और कह देते कि "यह तो बिल्कुल गढ़ी हुई झूठी बात है?" (12)

(अगर इस बात में दम था तो) वे इल्ज़ाम लगाने वाले क्यों इस पर चार गवाह नहीं लाए? अगर वे ऐसे गवाह नहीं पेश कर सकते, तो अल्लाह की नज़र में वही लोग झूठे हैं। (13)

[मुसलमानो!] अगर इस दुनिया और आने वाली दुनिया में तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] और उसकी रहमत [mercy] साथ न होती, तो जिस बात के पीछे तुम पड़ गए थे, उसके कारण तुम पर अब तक एक बड़ी सख़्त यातना आ चुकी होती। (14)

जब तुम (बिना सोचे-समझे) एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों से कहने लगे, और तुम अपने मुँह से वह बातें कहने लगे जिसके (सच होने के) बारे में तुम्हें कोई जानकारी न थी, तुमने उसे एक मामूली व हल्की बात समझा, मगर अल्लाह के नज़दीक तो वह बहुत गंभीर बात थी। (15)

जब तुमने झूठी बात सुनी, तो तुमने ऐसा क्यों न कहा, "अल्लाह की पनाह!---हमें ऐसी बात दोबारा अपनी ज़बान पर नहीं लाना चाहिए---- यह तो बहुत बड़ा लांछन है?"(16)

अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो फिर कभी ऐसा काम न करना। (17)

अल्लाह अपने संदेशों को तुम्हारे लिए स्पष्ट कर देता है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (18)

वे लोग जो चाहते हैं कि ईमान रखने वालों के बीच शर्मनाक बुराइयाँ [अश्लीलता/ Indecency] फैल जाएं, उनके लिए दुनिया और आख़िरत [परलोक] में दर्दनाक यातना होगी। (याद रखो!) अल्लाह सब कुछ जानता है, और तुम कुछ नहीं जानते!  (19)

अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, और यह बात न होती कि वह बड़ा नर्म दिल, और बेहद दयालु है ---------! (तॊ तुम भी नहीं बचते!) मगर अल्लाह बड़ा करुणा रखनेवाला, बेहद दयावान है। (20)

ऐ ईमानवालो! तुम शैतान के बताए हुए रास्ते पर मत चलो--------अगर उस रास्ते पर चले, तो शैतान तुम पर ज़ोर डालेगा कि तुम अश्लीलता औऱ बुराई को अपना लो। अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, तो तुममें से कोई भी कभी पवित्रता [Purity] हासिल न कर पाता। अल्लाह जिसे चाहता है, उसे पवित्र करके निखार देता है: अल्लाह सब कुछ सुनता है, हर चीज़ जानता है। (21)


तुममें से जिन्हें (अल्लाह की तरफ़ से) भरपूर धन-दौलत मिली है, उन्हें ऐसी क़सम नहीं खानी चाहिए कि वे आगे से नातेदारों, ग़रीबों, और अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर आने वालों को अपने माल से कभी कोई मदद नहीं करेंगे: उन्हें चाहिए कि ऐसे लोगों की ग़लतियों को भूल जाएं, और उन्हें माफ़ कर दें। क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह भी तुम्हारी गलतियों को माफ़ कर दे: अल्लाह (गुनाहों का) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (22)


जो लोग इज़्ज़तदार और भोली-भाली ईमानवाली औरतों पर लांछन लगाते हैं, तो (याद रखो!) वे लोग इस दुनिया और आने वाली दुनिया में अल्लाह के द्वारा ठुकरा दिए जाएंगें। एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में होगी, (23)

जो कुछ वे करते रहे थे, उसके बारे में उस दिन ख़ुद उनकी ज़बानें, उनके हाथ और उनके पाँव उनके ही विरुद्ध गवाही देंगे---- (24)

उस दिन, अल्लाह उन्हें उनके कर्मों के मुताबिक़ जो उचित बदला होगा, पूरा पूरा अदा कर देगा----और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही वह सच्चाई है जो हर चीज़ को स्पष्ट कर देती है। (25)

भ्रष्ट [corrupt] औरतें भ्रष्ट मर्दों के लिए हैं, और भ्रष्ट मर्द भ्रष्ट औरतों के लिए हैं; अच्छी औरतें, अच्छे मर्दों के लिए हैं, और अच्छे मर्द अच्छी औरतों के लिए हैं। अच्छे (व शरीफ़) मर्द और औरतों के ख़िलाफ़ जो कुछ कहा जाता रहा है, उन बातों से ये (लोग) पूरी तरह निर्दोष [पाक] हैं; उनके लिए वहाँ माफ़ी भी होगी और (दुनिया में) इज़्ज़त की रोज़ी भी। (26)


ऐ ईमानवालो! दूसरे लोगों के घऱों में तब तक न घुसा करो, जब तक कि अंदर जाने की इजाज़त न मांग लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो----  यही तुम्हारे लिए सबसे अच्छा तरीक़ा होगा: शायद कि तुम इस बात का ध्यान रखो। (27)

अगर ऐसा लगे कि घर के अंदर कोई नहीं, तब भी अंदर तब तक न जाओ, जब तक कि अनुमति न ले लो। अगर तुमसे कहा जाए,  “वापस चले जाओ”, तो लौट जाओ-----  यही तुम्हारे लिए उचित होगा। (याद रखो) अल्लाह अच्छी तरह जानता है जो कुछ तुम करते हो। (28)

ऐसे घरों के अंदर जाने में कोई दोष नहीं है, जहाँ कोई न रहता हो, और जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ मिल सके। (याद रखो!) हर वह चीज़ जो तुम सबके सामने करते हो और हर वह चीज़ जो तुम छिपाते हो, सब कुछ अल्लाह जानता है।  (29)

(ऐ रसूल), ईमान रखनेवाले मर्दों से कह दें कि (परायी औरतों के सामने) अपनी नजरें नीची रखा करें, और अपने गुप्त अंगों (private parts) को क़ाबू में रखें: यह उनके लिए ज़्यादा शुद्ध तरीक़ा होगा। अल्लाह अच्छी तरह से जानता है, हर वो चीज़ जो वे किया करते हैं। (30)

और ईमानवाली औरतों से कह दें कि वे भी (पराए मर्दों के सामने) अपनी नजरें नीची रखें और अपने गुप्त अंगों को क़ाबू में रखें, और अपने बनाव-श्रृंगार न दिखाया करें, सिवाए (चेहरे और हाथ-पाँव के) वे हिस्से जो देखने में आ जाते हैं; और उन्हें चाहिए कि अपनी ओढ़नियों के आंचल अपने सीनों पर डाल लिया करें, और अपने बनाव-श्रृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाए अपने पतियों के या अपने बाप के या अपने ससुर के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या मेल-जोल की औरतों के या जो उनकी अपनी लौंडी/ग़ुलाम होे, या उन (बूढ़े) नौकरों के जिनमें सेक्स की इच्छा बाक़ी न रही हो, या उन कमसिन लड़कों के जो अभी औरतों के छिपे हुए अंगों से परिचित न हों; और वे अपने पाँव ज़मीन पर पटक-पटककर न चलें कि अपना जो श्रृंगार [पायल/पाज़ेब] उन्होंने छिपा रखा हो, वह सबको मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके।  (31)


तुममें से जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई, और तुम्हारे दास व दासियों में भी जो (शादी के) योग्य हों, उनकी शादी करा दो। अगर वे ग़रीब हैं, तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से उनकी रोज़ी की व्यवस्था कर देगा: अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है और वह सब कुछ जाननेवाला है। (32)

जो लोग (ग़रीबी के कारण) शादी नहीं कर पा रहे हों, उन्हें चाहिए कि संयम से काम लेते हुए अपनी इज़्ज़त बचाए रखें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने फ़ज़ल से उन्हें काफ़ी कुछ दे दे। अगर तुम्हारे ग़ुलामों में से कोई अपनी क़ीमत चुकाकर आज़ाद होना चाहता है, तो उनके साथ लिखित समझौता कर लो, अगर तुम जानते हो कि उसके अंदर योग्यता है। और जो धन-दौलत अल्लाह ने तुम्हें दे रखा है, उसमें से कुछ उन्हें देकर मदद करो। और दुनिया के अल्प समय के फ़ायदे के लिए अपनी दासियों को वैश्या बनने पर मजबूर न करो, अगर वे ख़ुद इज़्ज़त की ज़िन्दगी जीना चाहती हों। हालांकि, अगर उन्हें (वैश्यावृत्ति पर) मजबूर किया जाता है, तो (वे दुखी न हों) अल्लाह माफ़ कर देनेवाला और दयावान है। (33)


हमने तुम लोगों की तरफ़ ऐसी आयतें उतार भेजी हैं जो सही रास्ते को स्पष्ट कर देती हैं, जो उन लोगों की मिसालें देती हैं जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं, और जो उन लोगों को नसीहत देती हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं। (34)


अल्लाह आसमानों और ज़मीन की रौशनी है। (मोमिनों के दिल में) उसकी रौशनी की मिसाल ऐसी है जैसे: एक ताक़ (Niche) हो, जिसमें एक चिराग़ रखा हो - वह चिराग़ एक शीशे के अंदर हो, वह शीशा ऐसा (साफ़) हो मानो चमकता हुआ कोई तारा है। वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकतवाले पेड़ के तेल से जलाया गया हो, जो न पूरब की तरफ़ हो न पश्चिम की तरफ़, उसका तेल (इतना साफ़ हो कि) चाहे आग उसे छुए तक नहीं, तब भी क़रीब क़रीब हर दम तेज़  रौशनी देता हो, --- मतलब रौशनी के ऊपर रौशनी! ---- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रौशनी को हासिल करने का रास्ता दिखा देता है; अल्लाह लोगों के समझने के लिए ऐसी मिसालें देता है; अल्लाह हर चीज़ की पूरी जानकारी रखता है----- (35)

(उसकी रौशनी) उन इबादत करने की जगहों में चमकती रहती है। अल्लाह ने हुक्म दिया है कि उन (इबादतगाहों) को ऊँचा बनाया जाए और यह कि उनमें उसके नाम का ज़िक्र किया जाए, साथ में उनमें ऐसे लोग हों जो सुबह-शाम उसकी महानता का गुणगान करते रहते हों:  (36)

ऐसे लोग जिनका मन (अल्लाह से) कभी नहीं भटकता---- न सामान की ख़रीद-बिक्री से, न मुनाफ़े से, न अल्लाह की याद से, और न पाबंदी से नमाज पढ़ने से, और न ही तयशुदा ज़कात देने से। वे (आने वाले) उस दिन से डरते रहते हैं जिस दिन (लोगों के) दिल (डर से) उलट जाएंगे और आँखें पत्थरा जाएँगी! (37)

अल्लाह उनके कामों के मुताबिक़ ऐसे लोगों को अच्छे से अच्छा इनाम देगा, और वह अपने फ़ज़ल से उन्हें और ज़्यादा देगा: अल्लाह जिसे देना चाहता है, बेहिसाब देता है। (38)


मगर जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके कर्म ऐसे हैं जैसे रेगिस्तान में मरीचिका (mirage) हो: प्यासा आदमी यह सोचता है कि वहाँ पानी होगा, मगर जब वहाँ पहुंचता है तो कुछ नहीं पाता, केवल अल्लाह को पाता है, जो उसे (इस बेकार कोशिश का) पूरा-पूरा हिसाब चुका देता है----  और अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (39)

या फिर ऐसा समझो कि जैसे एक गहरे समुद्र में परछाइयाँ हों जो लहरों के ऊपर लहर से घिरी हुई हों, और ऊपर बादल छाए हुए हों-----एक के ऊपर एक अंधेरे की परतें---- अगर वह अपना हाथ निकाले, तो उसे वह भी सुझाई न दे। और जिसे अल्लाह ही रौशनी न दे, फिर उसके लिए कौन सी रौशनी हो सकती है? (40)


(ऐ रसूल) क्या आप नहीं देखते कि हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह का गुणगान कर रही है, जैसा कि (उड़ते हुए) पंख फैलाए हुए पक्षी भी करते हैं? हर एक को अपनी इबादत करने और गुणगान करने का तरीक़ा मालूम है: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी जानकारी है। (41)

आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण (control) अल्लाह के ही पास है: और अल्लाह ही के पास आख़िर में लौटकर जाना है। (42)

क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह बादलों को चलाता है, फिर उनको एक साथ मिला देता है और उसकी तहें एक दूसरे पर चढ़ जाती हैं, फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं? और वह आसमान में बादल के पहाड़ों से जिस पर चाहता है ओले बरसाता है, और जिस पर चाहता है, उस पर से हटा देता है---- इस समय बिजली की चमक ऐसी होती है कि मानो निगाहों को उचक ले जाएगी। (43)

(मगर) अल्लाह रात और दिन को बारी बारी से लाता रहता है (इसलिए कोई हालत एक जैसी नहीं होती)----- सचमुच आँखें रखने वालों के लिए इन सब चीज़ों में सीखने के लिए एक सबक़ है------(44)

और (देखो), अल्लाह ने हर जानवर को (उसके अपने) तरल पदार्थ से पैदा किया: उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई उनमें दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है; अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (45)


हमने वो आयतें उतार भेजी हैं जो सीधे मार्ग को साफ़ व स्पष्ट कर देनेवाली हैं: अल्लाह जिसे चाहता है, सीधा रास्ता दिखा देता है। (46)

वे (पाखंडी लोग) कहते हैं, "हम अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करते हैं, और हम उनकी आज्ञा मानते हैं," मगर इसके बाद उनमें से कुछ लोग (अल्लाह और रसूल के हुक्म से) मुँह मोड़ लेते हैं: ऐसे लोग सच्चे ईमानवाले नहीं हैं।  (47)

और जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर होने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला कर सकें, तो (देखो) उनमें से कुछ लोग मुंह मोड़ लेते हैं। (48)

लेकिन अगर उन्हें अपना हक़ मिलने वाला हो, तो (ख़ुशी-ख़ुशी) वे उस (रसूल) के पास आज्ञाकारी बने चले आएंगे। (49)

क्या उनके दिलों में कोई रोग है? क्या वे संदेह में पड़े हुए हैं? क्या उन्हें इस बात का डर है कि अल्लाह और उसके रसूल उनके साथ न्याय नहीं करेंगे? नहीं, बल्कि असल में वही लोग अन्याय करने वाले हैं। (50)

जब सच्चे ईमानवाले को अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर होने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला कर सकें, तो वे कहते हैं, "हमने (हुक्म) सुना और मान लिया।" यही वे लोग हैं जो कामयाबी पाने वाले हैं:  (51)

जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानता है, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है, और उसके प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करता है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।  (52)

ये (पाखंडी लोग) अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते हैं कि अगर आप [रसूल] उन्हें हुक्म दें, तो वे (युद्ध के लिए घर-बार छोड़कर) ज़रूर निकल खड़े होंगे। उनसे कह दें, "क़समें न खाओ: असल चीज़ तो आज्ञा मानना है, और तुम जो कुछ भी (बहानेबाज़ियाँ) करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।" (53)

कहें, "अल्लाह की आज्ञा मानो; उसके रसूल का कहना मानो। अगर तुम मुँह मोड़ते हो तो (याद रखो) जो काम रसूल को सौंपा गया है, उसकी ज़िम्मेदारी उनके सर होगी, और तुम उस काम के लिए ज़िम्मेदार हो जिसका बोझ तुम पर डाला गया है। अगर तुम उन (रसूल) का कहना मानोगे, तो सही मार्ग पा लोगे, मगर रसूल के ज़िम्मे तो इससे ज़्यादा कुछ नहीं कि (सच्चाई का) संदेश साफ़-साफ़ पहुँचा दे। (54)


तुममें से वे लोग जो ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, अल्लाह ने उनसे वादा कर रखा है: वह उन्हें ज़मीन का ख़लीफ़ा (Successors) बनाएगा, जिस तरह उसने उनसे पहले के लोगों को बनाया था; उनके लिए अल्लाह उस दीन [religion] को मज़बूती से जमा देगा जिसे उसने उनके लिए चुना है; और उनके अंदर जो डर की हालत रही है, वह उसे ज़रूर सुरक्षा (व अमन) में बदल देगा। “वे मेरी इबादत करेंगे, और किसी भी चीज़ को मेरी ख़ुदायी के साथ नहीं जोड़ेंगे।” जो लोग इसके बाद भी हुक्म नहीं मानते, वैसे ही लोग (बाग़ी (rebels) होंगे---- (55)

(लोगो), पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, (सही-सही) ज़कात दिया करो, और रसूल की आज्ञा माना करो, ताकि तुम पर दया की जाए। (56)

(ऐ रसूल!) आप ऐसा न समझें कि विश्वास न करनेवाले ज़मीन पर अल्लाह की पकड़ से बच सकते हैं; उनका अंतिम ठिकाना तो (जहन्नम की) आग है, और वह कितना बुरा अंत है! (57)


ऐ ईमानवालो, तुम्हारे ग़ुलामों और तुममें से वह बच्चे जो अभी युवावस्था को नहीं पहुँचे हैं, उनको चाहिए कि दिन के तीन समयों में तुम्हारे पास आएं तो अनुमति लेकर आया करेंँ: सुबह की नमाज़ से पहले; दोपहर की गर्मी के वक़्त जब तुम (आराम के लिए) अपने कपड़े उतारकर रखते हो; और रात की नमाज़ के बाद। ये तीन समय तुम्हारे लिए (पर्दे में) अकेले रहने के हैं; इसके अलावा दूसरे वक़्तों में तुम पर या उनपर कोई गुनाह नहीं है अगर तुम एक दूसरे के यहाँ बिना किसी रोक-टोक के आते जाते हो। तो (देखो), अल्लाह इस तरीक़े से अपने संदेशों को स्पष्ट करता है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (58)

जब तुम्हारे बच्चे युवावस्था को पहुँच जाएँ, तो उन्हें भी चाहिए कि अंदर आने से पहले (हमेशा) अनुमति लिया करें, जैसा कि उनसे बड़े लेते हैं। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (59)

बड़ी बूढ़ी औरतें जिन्हें अब निकाह करने की उम्मीद बाक़ी नहीं रही, अगर वे बिना अपना बनाव-श्रृंगार दिखाए हुए अपने ओढ़ने के कपड़े (चादरें) उतारकर रख देंं, तो उनके लिए इसमें गुनाह की कोई बात नहीं, फिर भी अगर वे (चादर उतारने से) बचें, तो उनके लिए ज़्यादा अच्छा होगा: अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (60)


न अंधे आदमी पर कोई दोष होगा, न लँगड़े आदमी पर, न किसी बीमार पर। और ख़ुद तुम्हारे लिए भी कोई दोष की बात नहीं चाहे तुम अपने घरों में खाओ या ऐसे घरों में खाओ जो तुम्हारे बाप, मां, भाई, बहन, चाचा, फूफी [बुआ], मामूं, ख़ाला [मौसी] के घर हों या उन घरों में जिनकी कुंजियाँ तुम्हारे क़ब्जे में हों या अपने दोस्तों के यहाँ, इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं होगा: चाहे तुम मिलकर खाओ या अलग-अलग, तुम्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा। हाँ, जब किसी के घरों में जाया करो, तो एक दूसरे को सलाम किया करो, कि यह अल्लाह की तरफ़ से तय की हुई बड़ी बरकतवाली और भलाई की दुआ है। अल्लाह इसी तरीक़े से तुम्हारे लिए अपने संदेशों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम समझ सको। (61)


असली ईमानवाले तो वही लोग हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर (सच्चे दिल से) विश्वास रखते हैं, और वे, जब किसी सामुदायिक मामले के लिए अपने रसूल के साथ इकट्ठा होते हैं, तो वे तब तक वहाँ से नहीं जाते जब तक कि (अपने रसूल से) इसकी अनुमति न ले लें----  (ऐ रसूल!) जो लोग (ज़रूरत पड़ने पर) आप से इजाज़त मांगते हैं, वही लोग हैं जो सचमुच अल्लाह और रसूल पर ईमान रखते हैं। जब वे किसी निजी काम के लिए (जाने की) अनुमति मांगें, तो उनमें से आप जिस किसी को सही समझें, जाने की अनुमति दे दिया करें, और उन लोगों के लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ किया करें। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (62)

(ऐ लोगो!) अल्लाह के रसूल जब तुम्हें हाज़िर होने के लिए बुलाएं, तो उनके बुलाने को तुम आपस में एक-दूसरे को बुलाने जैसा मत समझ बैठना ---- अल्लाह तुममें से उन लोगों को अच्छी तरह से जानता है जो (भीड़ में) छिपकर चुपके से खिसक लेते हैं---- और वे लोग जो उनके हुक्म के ख़िलाफ़ काम करते हैं, उनको डरना चाहिए कि कहीं ऐसा न हो कि वे किसी सख़्त आफ़त में पड़ जाएं या उन पर कोई दर्दनाक यातना आ पड़े। (63)


आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है: वह अच्छी तरह जानता है तुम जिस हालत [state] में भी हो----- उस दिन जब सब लोग लौटकर उसके पास लाए जाएंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें हर चीज़ बता देगा----- अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (64)

 

नोट:

2:  यहाँ उन अधिकारियों को संबोधित किया गया है जिनके ऊपर इन नियमों को लागू करने की ज़िम्मेदारी है। "ज़िना" के इल्ज़ाम को साबित करना ज़रूरी है, चाहे मर्द/औरत ख़ुद ही अपना जुर्म स्वीकार कर ले या फिर चार भरोसे का आदमी गवाही दे।

अपनी पत्नी या पति के अलावा [extra-marital], एक मर्द या औरत के बीच किया गया सेक्स [sexual intercourse] "ज़िना" के अपराध में आता है। अगर ज़िना करने वाला मर्द या औरत शादी-शुदा नहीं [unmarried] हो, तो उसे 100 कोड़े लगाए जाएंगे। 

लेकिन अगर ज़िना करने वाला मर्द या औरत शादी-शुदा [married] हुआ, तो यह अपराध और भी संगीन माना जाएगा और उसे संगसार यानी तब तक पत्थरों से मारा जाएगा जबतक कि उसकी मौत न हो जाए। यह सज़ा क़ुरआन में साफ़ तौर से नहीं है, मगर इस बात के प्रमाण हैं कि मुहम्मद (सल्ल) ने अपने ज़माने में कुछ मुक़दमों में यह सज़ा सुनाई थी। 

3: यहाँ कोई हुक्म नहीं दिया गया है, बल्कि ज़िना करने वाले मर्द और औरत दोनों के अपराध पर ज़ोर डालते हुए उसकी निंदा की गई है, जो कि एक ईमानवाले के लिए बिल्कुल ही हराम है। 

4: जिस तरह ज़िना एक बेहद घिनौना अपराध है जिसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है, उसी तरह किसी शरीफ़ और विवाहित औरत पर ज़िना करने का लांछन लगाना भी संगीन जुर्म है, इसीलिए झूठा आरोप लगाने वाले को 80 कोड़े मारने की सज़ा है। यह नियम शरीफ़ और विवाहित मर्दों पर भी झूठा आरोप लगाने पर लागू होता है। इस सज़ा के साथ एक और दंड यह है कि ऐसे झूठे आदमी की आगे कभी भी किसी मामले में कोई गवाही नहीं मानी जाएगी।

5: अगर अपराधी सच्चे दिल से गुनाहों की माफ़ी मांग लेता है, तो अल्लाह माफ़ कर सकता है, मगर दुनिया में मिलने वाली सज़ा तो उसे भुगतनी ही होगी।

6: अगर कोई आदमी अपनी बीवी को दूसरे मर्द के साथ ज़िना करते हुए देख ले, मगर उसके पास अपने सिवा चार गवाह न हों, तो वह उस पर इल्ज़ाम किस तरह लगाए, क्योंकि गवाह न होने की सूरत में उसे झूठा आरोप लगाने की सज़ा के रूप में 80 कोड़े खाने पड़ेंगे।

 यहाँ ऐसे मामले के लिए एक रास्ता बताया गया है, जिसे "लिआन" कहते हैं। इसका तरीक़ा यह है कि पहले क़ाज़ी दोनों को झूठ बोलने के नतीजे से डराएगा क्योंकि दुनिया के मुक़ाबले आख़िरत में मिलने वाली सज़ा कहीं सख़्त होगी। फिर क़ाज़ी के सामने पहले शौहर क़समें खाएगा कि उसने बीवी पर सच्चा इल्ज़ाम लगाया है, फिर अगर बीवी उसके इल्ज़ाम को मान ले, तो उसे ज़िना की सज़ा दी जाएगी, लेकिन अगर बीवी भी क़समें खा ले कि उसका शौहर झूठ बोल रहा है, तो फिर दोनों को कोई सज़ा नहीं होगी, मगर क़ाज़ी दोनों की शादी हमेशा के लिए तोड़ देगा, और बाद में अगर कोई बच्चा पैदा हुआ जिसे उसके शौहर ने मानने से इंकार किया तो फिर वह बच्चा माँ के नाम के साथ जाना जाएगा। 

10: यहाँ से आयत 22 तक एक ख़ास घटना के बारे में कहा गया है जिसका संबंध मुहम्मद (सल्ल) की बीवी हज़रत आयशा (रज़ि) से जुड़ा हुआ है। क़रीब 6 हिजरी में मुहम्मद (सल्ल) ने अरब के एक क़बीले बनु अलमुस्तलक़ पर हमला किया था, इस अभियान में उनकी बीवी आयशा (रज़ि) भी साथ गई थीं। वहाँ से वापस आते हुए मदीना से कुछ पहले एक जगह रात में पड़ाव डाला गया था। रात के पिछले पहर आयशा (रज़ि) शौच के लिए जंगल की तरफ़ गईं, वहाँ से वापस आते हुए उन्हें एहसास हुआ कि उनका हार कहीं गिर गया है, वह उसे खोजते हुए फिर से दूर निकल गईं, इस बीच काफ़िले को चलने का हुक्म हो गया। क़ायदे के मुताबिक़ हज़रत आयशा की डोली उठाकर ऊँट पर रख दी गयी, चूँकि वह काफ़ी हल्की थीं इसलिए डोली उठाने वालों को पता न चला कि आप उसमें नहीं हैं। फिर जब हज़रत आयशा पड़ाव की जगह वापस आयीं, तब तक क़ाफ़िला जा चुका था, वह इधर-उधर जाने के बजाए उसी जगह लेट गईं। क़ायदे के मुताबिक़ क़ाफ़िले के पीछे एक आदमी को रखा जाता था ताकि अगर कोई चीज़ छूट गई हो या गिर-पड़ गई हो, तो वह उसे ला सके, इस काम के लिए वहाँ सफ़वान बिन मुअत्तल (रज़ि) पीछे रह गए थे। जब ज़रा उजाला हुआ तो सफ़वान पड़ाव की जगह देखने लगे, इतने में उनकी नज़र हज़रत आयशा पर पड़ी, वह समझ गए कि आप छूट गई हैं, उन्हें अपने ऊँट पर बैठाया और ख़ुद उसकी लगाम पकड़े हुए मदीना पहुँच गए। उन्हें इस तरह आते हुए कई लोगों ने देखा जिनमें पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई भी था, उसने झट एक बेहूदा बात गढ़ी और हज़रत आयशा (रज़ि) के बारे में यह बात मशहूर कर दी कि उन्होंने अकेले में सफ़वान के साथ ग़लत काम किया है। इस लांछन की बात काफ़ी दिनों तक एक दूसरे की ज़बानी शहर में फैलती रही जिसमें पाखंडियों के साथ कुछ मुसलमान भी शामिल हो गए थे। क़रीब एक महीने तक मुहम्मद (सल्ल), हज़रत आयशा (रज़ि) और सफ़वान (रज़ि) को सख़्त मानसिक तकलीफ़ें उठानी पड़ीं, फिर यह आयतें उतरी जिनमें इस लांछन को झूठा क़रार दिया गया और मुसलमानों को बताया गया कि आगे से ऐसी बेबुनियाद बातों को एक दूसरे से कहने से पहले उसकी छानबीन करना ज़रूरी है। इस घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया था, इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि जो पाखंडी लोग मुसलमानों में शामिल होकर उनके साथ छल कर रहे थे, उनके चेहरे सामने आ गए, और साथ में मुसलमानों के आचरण में सुधार के लिए कई नियम-क़ायदे भी बनाए गए ताकि समाज में बुराई और अश्लीलता फैलने की संभावना पर रोक लगाई जा सके।

22: हज़रत आयशा (रज़ि) पर लांछन लगाने वालों में यूँ तो कई मुसलमान भी शामिल हो गए थे, मगर उनमें ख़ासकर तीन सीधे-साधे लोग भी थे जो पाखंडियों द्वारा फैलायी गई बेहूदा बातों में आ गए थे, उनमें एक मस्तह बिन असासा (रज़ि) भी थे जो हज़रत अबु बकर (रज़ि) के रिश्तेदारों में थे, जब अबु बकर (रज़ि) को उनकी इस हरकत का पता चला, तो उन्होंने क़सम खा ली कि अब कभी उनकी आर्थिक मदद नहीं करेंगे। मस्तह ने अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा कर ली थी, और इस आयत के उतरने के बाद अबु बकर (रज़ि) ने अपनी क़सम तोड़ते हुए फिर से उनकी मदद करनी शुरू कर दी। 

26: इसका अनुवाद ऐसे भी किया गया है, "भ्रष्ट चीज़ें भ्रष्ट लोगों के लिए हैं, और भ्रष्ट लोग भ्रष्ट चीज़ों के लिए हैं; अच्छी चीज़ें अच्छे लोगों के लिए हैं, और अच्छे लोग अच्छी चीज़ों के लिए हैं।" यहाँ भ्रष्ट और अच्छी चीज़ें को भ्रष्ट और अच्छी बातों से समझा जा सकता है जिसे ज़िना के झूठे लांछन के संदर्भ में देखा जा सकता है; इसका मतलब यह हुआ कि भ्रष्ट चीज़ें केवल भ्रष्ट लोग ही बोल सकते हैं या भ्रष्ट चीज़ें भ्रष्ट लोगों के ही बारे में कही जाती हैं, और अच्छे लोग भ्रष्ट चीज़ों से पाक व निर्दोष होते हैं, जैसे हज़रत आयशा और सफ़वान। 

29: "ऐसे घरों में जहाँ कोई न रहता हो" से मतलब ऐसी जगह जो आम लोगों के इस्तेमाल की हो और जहाँ कोई permanently न रहता हो, जैसे सड़क के किनारे मुसाफ़िरों के लिए कोई सराय या कोई टूटा-फूटा मकान आदि।

30: नज़रें नीची रखना और अपने गुप्त अंगों की रक्षा करना केवल औरतों के लिए ही नहीं हैं, इसलिए यहाँ मर्दों को भी तमीज़ सिखायी गई है जिनका पालन करना समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए बहुत ज़रूरी है। परायी औरतों के सामने उन्हें अपनी नज़रें नीची रखनी चाहिए, इसका मतलब यह है कि राह चलती औरतों पर पहली बार नज़र पड़ जाने में कोई ख़राबी नहीं, लेकिन यह कि उन्हें बार-बार देखना या घूरते रहना बेहद ग़लत है, साथ में हर तरह की बेहूदा और गिरी हुई हरकतों [sexual misconduct] से अपने आपको क़ाबू में रखना भी ज़रूरी है। 

31: यह औरतों के पर्दे के बारे में है, जैसाकि कुछ विद्वान कहते हैं कि औरतें (ख़ास समारोह आदि के मौक़े पर) जो बनाव-श्रृंगार और ज़ेवर-गहने आदि पहनती हैं, उन्हें पराये लोगों से छिपाना चाहिए, सिवाए चेहरे और हाथ-पाँव के। बाक़ी आम हालतों में जब उन्होंने कोई सजावट नहीं की हुई हो, तो फिर छिपाने की ज़रूरत नहीं। कुछ विद्वानों का मत है कि औरतों का चेहरा ही उनकी असल सजावट का केंद्र है, इसलिए इसे छिपाना चाहिए, और इसकी दलील सूरह अहज़ाब (33: 59) से दी जाती है जहाँ घर से निकलते हुए औरतों को इस तरह चादर ओढ़ने का हुक्म है कि चेहरे पर घूंघट हो। हालाँकि कुछ दूसरे विद्वान इस तर्क को नहीं मानते क्योंकि सूरह अहज़ाब में चादर ओढ़ने का मक़सद पर्दा करना नहीं था, बल्कि इसलिए था कि उन्हें शरीफ़ और आज़ाद औरत के रूप में पहचाना जा सके और कोई उनके साथ छेड़छाड़ न कर सके। देखें 33:59

33: जब ग़ुलामी की प्रथा थी, तो उस समय कभी-कभी कोई ग़ुलाम अपने मालिक से यह समझौता कर लेता था कि अगर तय की हुई रक़म वह चुका देगा, तो उसे आज़ाद कर दिया जाएगा। यहाँ इस तरीक़े को बढ़ावा दिया गया है कि अगर ग़ुलाम ऐसा चाहे तो उसके साथ "लिखित समझौता" कर लेना चाहिए, और मुसलमानों को ऐसे ग़ुलामों/लौंडियों को आर्थिक मदद देनी चाहिए ताकि वे आज़ाद हो सकें। 

दासियों/लौंडियों को वैश्या बनाने पर मजबूर करने से भी मना कर दिया गया। इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में यह आम बात थी। 

35: यह एक बहुत ही मशहूर आयत है जिसका मतलब विद्वानों ने कई तरह से लगाया है। अल्लाह आसमानों और ज़मीन के हर जीव को सही रास्ता दिखाने वाली रौशनी [नूर] है। इस रौशनी की मिसाल ऐसे चिराग़ से दी गई है जो अँधेरे में ख़ूब तेज़ और साफ़ रौशनी दे रहा हो, क्योंकि वह ज़ैतून के ऐसे पेड़ के तेल से जल रहा हो जो पेड़ पूरब या पश्चिम में नहीं, बल्कि किसी ऊँची और बीच की जगह में लगा हुआ हो जहाँ दिनभर अच्छी धूप पड़ती हो, उसका फल अच्छी तरह पक जाता है और उसका तेल बहुत साफ होता है।  

इस नूर की मिसाल सूरज से नहीं बल्कि चिराग़ की रौशनी से दी गई है, क्योंकि यह गुमराही के छाए हुए अँधेरे के बीच में सही रास्ता दिखाने वाली है, जिस तरह चिराग़ अँधेरों के बीचो-बीच रौशनी पैदा कर देता है, जबकि सूरज की रौशनी में चारों तरफ़ कोई अँधेरा बाक़ी नहीं रहता है।

39: सच्चाई पर विश्वास न करने वाले नेकी और भलाई के जो काम पुण्य समझकर करते हैं, उनका बदला अल्लाह इसी दुनिया में चुका देता है, मगर चूंकि उन लोगों ने एक अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास नहीं किया, सो आख़िरत में उनके कर्म मरीचिका की तरह बेहक़ीक़त होकर रह जाएंगे। 

40: यहाँ सच्चाई पर विश्वास न करने वाले काफ़िरों की मिसाल दी गयी है। उनके कर्म दो तरह के होते हैं, एक तो वह जो भलाई के काम इस उम्मीद में करते हैं कि उससे उन्हें कुछ पुण्य मिलेगा, मगर उनकी हक़ीक़त मरीचिका की तरह यानी धोखे के सिवा कुछ भी नहीं है। और कुछ कर्म तो ऐसे हैं जो वे भलाई समझकर नहीं करते, उनकी मिसाल उन अँधेरों की है जिनमें रौशनी की कोई किरण नहीं होती। फिर उनका झूठे ख़ुदाओं को पूजना और सच्चाई को मानने से इंकार करने की ज़िद्द व हठधर्मी को समंदर में एक के ऊपर एक अंधेरे की परतों से मिसाल दी गयी है जिससे वे हक़ीक़त को देख नहीं पाते।  

41: सूरह इसरा (17:44) में भी है कि कायनात की कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह की बड़ाई के साथ उसका गुणगान न कर रही हो। 

47: पाखंडी लोगों ने दिखावे के लिए तो विश्वास कर लिया था, लेकिन असल में ईमान नहीं रखते थे। इस आयत के पीछे की बात यह बतायी जाती है कि एक बार ऐसा हुआ कि बशर नाम के एक पाखंडी का एक यहूदी से झगड़ा हो गया, यहूदी जानता था कि मामला अगर मुहम्मद (सल्ल) के पास जाएगा तो वह बिल्कुल सही फ़ैसला करंगे, सो उसने बशर से कहा कि चलो मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसला कराने के लिए चलते हैं, मगर बशर के मन में चोर था, इसलिए वह एक यहूदी काब बिन अशरफ़ के पास फ़ैसला कराने गया। 

61: कई बार अंधे, लंगड़े या मजबूर आदमी यह सोचते थे कि उन्हें मिल-बैठकर खाने वाली जगहों पर जाकर नहीं खाना चाहिए, क्योंकि हो सकता है उनके साथ बैठने में कुछ आदमी को तकलीफ़ हो, या वे अनजाने में कुछ ज़्यादा खा लें, दूसरी तरफ़ कुछ लोग ऐसा भी सोचते थे कि ऐसे मजबूर लोग शर्म-लिहाज़ की वजह से खाना बहुत कम खाएं। इस आयत में बताया गया है कि सब मिलकर साथ खा सकते हैं और इतनी बारीकी से सोचने की ज़रूरत नहीं है।

कुछ लोग जब कहीं जंग लड़ने बाहर चले जाते थे तो वे अपनी घर की कुंजियाँ किसी को देकर जाते थे और साथ में उन्हें घर में रखे खाने-पीने के सामान को भी इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर जाते, तब भी लोग उनके सामान नहीं इस्तेमाल करते थे, मगर इस आयत ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी। 

62: यहाँ अहज़ाब की लड़ाई [सूरह 33] के ठीक पहले की घटना के बारे में बताया गया है जब मदीना की रक्षा के लिए लोगों को खाई खोदने के लिए बुलाया गया था। सारे मुसलमान तो इस काम में चुस्ती से लगे हुए थे, लेकिन जो पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग थे, वे आने में बहुत सुस्ती करते थे, किसी तरह बहाने बनाकर चले जाते थे या कभी-कभी बिना अनुमति के धीरे से खिसक लेते थे। 



सूरह 63: अल-मुनाफ़िक़ून 

 [(मदीना के) पाखंडी लोग/ The Hypocrites]


यह एक मदनी सूरह है जिसमें मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] की धोखाधड़ी का पर्दाफ़ाश किया गया है और इनसे ईमानवालों को होशियार रहने के लिए कहा गया है। एक बहुत ही ख़ास मौक़े का ज़िक्र आया है जब लोग ईमानवालों की कुछ आर्थिक मदद करना चाहते थे और पाखंडियों ने उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश की (आयत 7-8), और इसकी भरपाई के लिए अल्लाह ने मुसलमानों को अपना ज़्यादा से ज़्यादा धन ऐसे ज़रूरतमंदों को देने के लिए कहा (आयत 9-11). 


विषय:

01-08: पाखंडियों का वर्णन 

09-11: ईमानवालों को अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने पर ज़ोर 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल!] जब (मदीना के) पाखंडी लोग [मुनाफ़िक/ Hypocrites] आपके पास आते हैं, तो कहते हैं, "हम इस बात की गवाही देते हैं कि आप अल्लाह के रसूल हैं।" वैसे अल्लाह जानता है कि आप सचमुच उसके रसूल हैं, और अल्लाह (यह भी) गवाही देता है कि ये पाखंडी लोग बिलकुल झूठे हैं----(1)


वे अपनी क़समों को ढाल [Shield] के रूप में उपयोग करते हैं, और इस तरह वे दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं: वे जो कुछ भी करते रहे हैं, वह सचमुच ही शैतानी काम हैं----- (2)


यह इस कारण से है कि पहले तो उन लोगों ने (सच्चाई पर ज़बान से) विश्वास कर लिया था, मगर फिर बाद में (दिल से) उसे मानने से इंकार कर दिया, अतः उनके दिलों को बंद करके उस पर ठप्पा लगा दिया गया है, और अब वे (सच्चाई की बातें) नहीं समझ सकते हैं। (3)


(ऐ रसूल!) जब आप उन्हें देखें, तो उनके बाहरी रूप को पसंद करेंगे; फिर जब वे बातें करें, तो आप उनकी बात सुनते ही रह जाएं। मगर वे किसी सहारे से खड़ी की गयी लकड़ियों की तरह हैं (जो देखने में मज़बूत लगें, मगर बिना जड़ के हों) ---- वे सुनायी देनेवाली हर ज़ोर की आवाज़ को अपने ही विरुद्ध समझते हैं---- और वे (आपके) दुश्मन हैं। अतः उनसे बचकर रहें। अल्लाह की मार हो उन पर! वे कितने शातिर व कुटिल हैं! (4)

 


जब उनसे कहा जाता है कि, "आओ, ताकि अल्लाह के रसूल तुम्हारे लिए माफ़ी की दुआ कर दें", तो वे तिरस्कार से अपने सिर झटककर फेर लेते हैं, और आप देखते हैं कि वे अकड़ते हुए चल देते हैं। (5)


इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, चाहे (ऐ रसूल) आप उनके लिए माफ़ी की दुआ करें या न करें, अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा: ऐसे विश्वासघातियों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता।  (6)


ये वही लोग हैं जो (मदीना के अंसार [Helpers] से) कहते हैं, “जो लोग अल्लाह के रसूल के साथ हैं, उन लोगों पर कुछ भी ख़र्च न करो, जब तक कि वे उनका साथ न छोड़ दें", लेकिन आसमानों और ज़मीन के ख़जाने तो अल्लाह ही के हैं, हालांकि पाखंडी लोग इस बात को नहीं समझते हैं। (7)


वे कहते हैं, "एक बार हम मदीना वापस पहुंच जाएं, तो फिर (वहां) जो ताक़तवर (और इज़्ज़तदार) लोग हैं, वे कमज़ोरों [मुहाजिरों/Emigrants] को निकाल बाहर करेंगे," मगर असल ताक़त तो अल्लाह की है, उसके रसूल की है, और ईमान रखनेवालों की है, हालांकि पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] इस बात को नहीं जानते। (8)

 


ऐ ईमान रखनेवालो! (देखो), कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी दौलत और तुम्हारी औलाद, तुम्हारा ध्यान अल्लाह की याद (और उसके ज़िक्र) से भटका दे: (याद रहे) जो लोग ऐसा करेंगे, वही हैं जो घाटे में रहेंगे। (9)


जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा है, उसमें से ख़र्च कर लो, इससे पहले कि तुममें से किसी की मौत आ जाए और उस समय वह कहने लगे, "ऐ मेरे रब! काश तूने मुझे कुछ थोड़े समय की और मुहलत दी होती, तो मैंने ख़ूब दान‌‌-दक्षिणा [ज़कात] दिया होता, और अच्छे व नेक लोगों में शामिल हो जाता!" (10)


मगर अल्लाह, किसी आदमी को उस वक़्त कोई मुहलत नहीं देता, जब उसकी तय की हुई बारी आ जाती है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (11)

 

 

 

नोट:

2: मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] ने ईमान रखने का ढोंग कर रखा था और वे झूठी क़समें खाया करते थे ताकि उन्हें काफ़िर न समझा जाए। 

4: ये पाखंडी लोग देखने में काफ़ी अच्छे थे और उनकी बातें मन को मोहने वाली होती थीं, मगर दिल में नफ़रत और धोखा भरा हुआ था। ये लोग जब मुहम्मद (सल्ल) की मजलिसों में बैठते, तो बड़े बुरे दिल से बैठ तो जाते, मगर उनका ध्यान कहीं और ही होता, इसीलिए उनकी मिसाल बिना जड़ की बेजान लकड़ियों से की गई है जिनमें कोई मज़बूती नहीं होती।

6: जब तक ये लोग अपने पाखंड को हमेशा के लिए छोड़कर पक्के ईमानवाले नहीं हो जाते, तब तक उन्हें अल्लाह माफ़ नहीं करेगा।

7: पाखंडियों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबी एक अभियान में मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों के साथ गया था, जब लड़ाई ख़त्म हो गई, तो वहाँ पानी के मामले को लेकर आपस में मदीना के अंसारियों [Helpers] और (मक्का से आए हुए) मुहाजिरों [Migrants] के बीच हाथा-पाई हो गई, मुहम्मद (सल्ल) के समझाने-बुझाने से मामला ठंढा हो गया। मगर उसके बाद अब्दुल्लाह बिन उबी ने आपस में फूट डालने के लिए यह कहकर आग लगायी कि अंसारियों ने मुहाजिरों को मदीने में पनाह देकर बहुत सिर चढा रखा है, यहाँ तक कि अब मुहाजिर यहाँ के मूल निवासियों पर हाथ उठाने लगे हैं! उसने अपने साथियों से यह भी कहा कि "अल्लाह के रसूल के साथ जो उनके साथी हैं, उन पर अपना माल ख़र्च करना बंद कर दो, वे अपने आप मुहम्मद साहब का साथ छोड़कर कहीं और चले जाएंगे, और जब हम मदीना वापस पहुँचेंगे, तो वहाँ जो ताक़त और इज़्ज़तवाले [अंसारी] हैं, वे कमज़ोरों [मुहाजिरों] को निकाल बाहर करेंगे।"

10: एक हदीस में है कि आदमी का असल धन वही है जो वह दान कर दे, जो धन वह छोड़ जाए वह तो उसके वारिसों का है। (सही बुख़ारी: 6442)

 


सूरह 48: अल-फ़तह 

[जीत/ Victory]

 


यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 1 में आए "साफ़ जीत" [हुदैबिया की संधि] के वर्णन से लिया गया है, इस सूरह में एक ख़ास मौक़े के हवाले से मुहम्मद सल्ल. के एक ख़्वाब का वर्णन है जिसमें उन्होंने देखा था कि वह और उनके अनुयायी छोटा हज [उमरा] करने के लिए (628 ई./ 6 हिजरी में) मक्का गए हैं (आयत 27). उसके बाद वे हज के लिए निकले, मगर मक्का पहुँचने से से कुछ दूर पहले ही हुदैबिया नाम की जगह पर रोक दिए गए, फिर मुहम्मद सल्ल से बातचीत के लिए मक्का से कुछ दूत भेजे गए। काफ़ी लम्बी बातचीत के बाद आख़िर में एक संधि हुई और उसमें तय हुआ कि मुहम्मद सल्ल और उनके साथ आए हुए लोग इस साल उमरा के लिए मक्का में दाख़िल नहीं होंगे, बल्कि अगले साल हज करेंगे। उस इलाक़े में अमन-शांति स्थापित करने के इरादे से और इसके दूरगामी महत्व को देखते हुए मक्कावालों के साथ 10-साल का शांति समझौता किया गया, जिसकी शर्त के मुताबिक़ इस अवधि में अगर कोई मक्का का आदमी (मुसलमान होकर) मदीना चला जाता है तो उसे वापस मक्का लौटा दिया जाएगा, जबकि कोई मदीना का आदमी अगर मक्का चला जाता है तो उसे मदीना नहीं लौटाया जाएगा। पूरी सूरह में मुहम्मद सल्ल. को आश्वस्त किया गया है कि इस संधि के ज़रिये अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल. को शांति के लिए पहल करने का और लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँचाने का एक बड़ा ही अच्छा अवसर दिया है (आयत 1-3, 18-21, 27), ईमानवालों को भी भरोसा दिलाया गया है कि जिस तरह हुदैबिया में उन लोगों ने संयम दिखाया और रसूल के हुक्म को मानते हुए संधि करने के लिए तैयार हुए, यह सब अल्लाह की मर्ज़ी से हुआ है (4-5, 24-26). इस सूरह में मदीना के पाखंडियों (आयत 6) और मक्का के बुतपरस्तों (6, 26) दोनों की भर्त्सना की गई है और अंत में तौरात व इंजील में सच्चे ईमानवालों की मिसाल दी गई है और उनकी सराहना की गई है (आयत 29). 

 

विषय: 


01-10: अल्लाह की तरफ़ से रसूल को आश्वासन 

11-17: युद्ध के लिए जाने से आना-कानी करने की निंदा 

18-21: युद्ध में हाथ आया माल और आगे भी लूट का माल मिलने का वादा 

22-26: मक्का के लोगों के साथ युद्ध की हालत 

27-29: मुहम्मद (सल्ल.) और उनके मानने वालों को बड़ा इनाम मिलेगा



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!] सचमुच हमने आपके लिए एक पक्की जीत का रास्ता खोल दिया है, (1)

ताकि अल्लाह आपके पिछले गुनाहों को और आगे होने वाली भूल-चूक को माफ़ कर दे, आपके ऊपर अपनी नेमतें [Grace] पूरी कर दे, और आपको सीधे रास्ते पर चलाए, (2)

और अल्लाह आपकी ऐसी मदद करे जो ज़बरदस्त हो। (3)

वही (अल्लाह) था, जिसने ईमान रखनेवालों के दिलों के अंदर (उस समय) शान्ति व सुकून उतार दिया (जब हुदैबिया में ईमानवालों ने अपने रसूल के फ़ैसले को मानने की क़सम खायी), ताकि उनके ईमान में कुछ और ईमान की बढ़ोत्तरी हो जाए ------- आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह ही की हैं; और वह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की समझ-बूझ रखनेवाला है------- (4)

ताकि वह ईमान रखनेवाले मर्दों और ईमानवाली औरतों को (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे, और उनसे उनकी बुराइयाँ दूर कर दे ----- यही है अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ी कामयाबी!----- (5)

और पाखंडी [मुनाफ़िक़/ Hypocrites] मर्दों और औरतों को, और मूर्तिपूजा करनेवाले [Idolatrous] मर्दों और औरतों को (जो अल्लाह के साथ दूसरों को जोड़ते हैं) यातना दे, जिन्होंने अपने दिलों में अल्लाह (और रसूल) के बारे में बुरे विचार बैठा रखे हैं------ वही लोग हैं जो बुराइयों के घेरे में पड़ जाएंगे! ----- जो अल्लाह की नाराज़गी उठाए फिरते हैं, जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) दूर कर दिया है और जिनके लिए उसने जहन्नम तैयार कर रखी है, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (6)

आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह की हैं; अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (7)

[ऐ रसूल!] हमने आपको (सच की) गवाही देनेवाला, (ईमान व अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुनानेवाला, और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला बनाकर भेजा है, (8)

ताकि तुम [लोग] अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] करो, उसकी मदद करो, उसका सम्मान करो, और सुबह-शाम उसकी तारीफ़ों का बखान किया करो। (9)


[ऐ रसूल] जो लोग आपके साथ अपनी निष्ठा का वचन [बै'त] देते हैं, वे असल में ख़ुद अल्लाह के साथ अपनी निष्ठा का वचन देते हैं-----(लोगों ने रसूल के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन दिया, तो) उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ भी है-----और अगर कोई अपना वचन तोड़ेगा, तो ऐसा करके वह ख़ुद अपने आपको ही नुक़सान में डाल लेगा: तो जिस किसी ने अल्लाह के साथ अपना वचन निभाया, उसे अल्लाह बहुत बड़ा इनाम देगा। (10)

अरब के वह देहाती लोग [बद्‌दू] जो (हुदैबिया के अभियान में) साथ नहीं गए थे, वे अब आपसे कहेंगे, "हम (उस समय) अपनी संपत्ति और अपने परिवार (के मामलों) में व्यस्त थे: आप हमारे लिए माफ़ी की दुआ कर दें," मगर वे अपनी ज़बान से जो कुछ कहते हैं, असल में वह उनके दिलों में नहीं होतीं। आप कह दें, "अल्लाह अगर तुम्हें कोई नुक़सान या फ़ायदा पहुँचाना चाहे, तो कौन है जो तुम्हारे लिए उसके सामने कुछ भी कर सके?" नहीं! बल्कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (11)

"नहीं! बल्कि तुमने यह सोचा कि रसूल और उनके साथी ईमानवाले, अब कभी अपने घरवालों के पास लौटकर नहीं आएँगे और इस ख़्याल से तुम्हारे दिलों को ख़ुशी होती थी। तुम्हारी सोच बहुत बुरी व गंदी है, क्योंकि तुम भ्रष्ट लोग हो":  (12)

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल में विश्वास [ईमान] नहीं रखते, उनके लिए हमने (जहन्नम की) भड़कती आग तैयार कर रखी है। (13)

आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के हाथ में है, और वह जिसे चाहे माफ़ कर देता है, और जिसे चाहे सज़ा देता है: अल्लाह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (14)


[ऐ ईमानवालो!] जब तुम (जंग के लिए) ऐसी जगह निकल पड़ो जहाँ से 'लूट का माल' [माल-ए-ग़नीमत/ war-gains] पाने की उम्मीद हो, तो जो लोग (पिछली बार के अभियान में जान बूझकर) नहीं गए थे, वे कहेंगे, "हमें भी अपने साथ चलने दो।" वे अल्लाह की बात बदल देना चाहते हैं, मगर [ऐ रसूल!] आप उनसे कह दें, "तुम हमारे साथ नहीं चल सकते: अल्लाह ने यह बात पहले ही कह रखी है।" इस पर वे जवाब देंगे, "तुम हम से जलते हो, इसलिए नहीं ले जाते," (अफ़सोस इन पर!) ये कितने ना-समझ हैं! (15)


आप उन अरबी देहातियों [बददुओं] से कह दें, जो (मदीने में ही) रुके रह गए थे, "तुम लोगों को अब जंग में बहुत ही ताक़तवर लोगों का सामना करने और उनसे उस वक़्त तक लड़ने के लिए बुलाया जाएगा, जब तक कि वे समर्पण न कर दें: अगर तुम ने आज्ञा मानी, तो तुम्हें अच्छा इनाम दिया जाएगा, लेकिन अगर तुम ने (लड़ाई से) मुंह मोड़ा, जैसा कि तुम पहले भी कर चुके हो, तो अल्लाह तुम्हें भारी दंड देगा----- (16)

हाँ, अंधे लोगों पर, लँगड़े लोगों पर, और बीमार लोगों पर (जंग में शामिल न होने का) कोई दोष नहीं है।" जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानेगा, उसे वह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी; जो कोई उससे मुँह मोड़ेगा, उसे वह दर्दनाक सज़ा देगा।  (17)


अल्लाह ईमानवालों से बहुत ख़ुश हुआ, जब (ऐ रसूल) उन लोगों ने (हुदैबिया में) एक पेड़ के नीचे आपके हाथ पर हाथ रखकर आपसे निष्ठा [बै'त] की क़सम खायी: अल्लाह जानता था जो कुछ उनके दिलों में था और इसीलिए उसने उन पर सुकून व शान्ति उतार भेजी और इनाम में उन्हें जल्द मिलने वाली जीत (की ख़बर) दी, (18)

और साथ में यह भी कि (जंग के बाद) बहुत सारे माल, उनके हाथ आ जाएंगे। अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और समझ-बूझ रखनेवाला है। (19)

अल्लाह ने तुम (लोगों) से भविष्य में (जंग के बाद हाथ आने वाले) बहुत से माल का वादा कर रखा है: उसने तुम्हारे लिए ये फ़ायदे बहुत कम समय में ही दे दिए हैं। उसने आक्रमक लोगों के हाथ तुम तक पहुंचने से रोक रखे हैं, (ऐसा इसलिए हुआ) ताकि यह ईमानवालों के लिए एक निशानी बन सके, और यह कि वह तुम्हें सीधे मार्ग पर चलने का सही रास्ता दिखा दे। (20)

इसके अलावा कई दूसरे (लूट के) माल और भी हैं (जो मिलने वाले हैं), मगर अभी उन पर तुम्हारा ज़ोर नहीं चल सकता। (लेकिन) उनके ऊपर अल्लाह का पूरा नियंत्रण है: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (21)


अगर (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] ने तुम (लोगों) से लड़ाई लड़ी होती, तो वे (मैदान छोड़कर) भाग खड़े होते, और कोई न होता जो उन्हें बचा सकता या उनकी मदद कर सकता:  (22)

अल्लाह की रीति [सुन्नत] पहले भी ऐसी ही थी, और तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई बदलाव नहीं पाओगे। (23)

वही (अल्लाह) था जिसने मक्का की घाटी में उनके हाथ तुम तक पहुँचने से, और तुम्हारे हाथ उन तक पहुँचने से रोक लिए, जबकि वह तुम्हें इससे पहले ही उन (मक्का से आकर हमला करनेवाले) लोगों पर जीत दे चुका था----- जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (24)

ये वही लोग हैं जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, तुम्हें पवित्र मस्जिद [काबा] जाने से रोका, और क़ुरबानी के जानवरों को क़ुरबान करने की जगह पहुंचने सेे रोक दिया। अगर उन (काफ़िरों) के बीच बहुत-से ईमानवाले मर्द और औरतें (मक्का में) मौजूद न होते, जिन्हें तुम नहीं जानते हो, तो तुमने उन्हें अपने क़दमों तले रौंद दिया होता, और अनजाने में ही तुम्हारे हाथों गुनाह हो जाता (इसीलिए युद्ध की अनुमति नहीं दी गयी) ----- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रहमत के साये में ले लेता है---- अगर (मक्का में) ईमानवाले (काफ़िरों से) अलग-थलग रह रहे होते, तो हमने विश्वास न करनेवालों को दर्दनाक सज़ा दी होती। (25)

जबकि (एक तरफ़) विश्वास न करनेवाले लोगों केे दिलों में नफ़रत व ग़ुस्सा भरा था ---- जिहालत [अज्ञानता] का ग़ुस्सा---- दूसरी तरफ़ अल्लाह ने अपने रसूल और ईमानवालों के दिलों पर शान्ति व सुकून उतार दिया और उनके लिए (हुदैबिया में पेड़ के नीचे) अल्लाह से किए हुए वादे को निभाना (और ग़लत काम से रुक जाना) ज़रूरी क़रार दिया, क्योंकि यही उनके लिए ज़्यादा सही और उचित था। और अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है। (26)


सचमुच अल्लाह ने अपने रसूल के ख़्वाब को पूरा कर दिखाया है: "अल्लाह ने चाहा, तो आप ज़रूर ही उस पवित्र मस्जिद [काबा] में सुरक्षित दाख़िल होंगे, (हज की रीति के अनुसार) अपने सिर के बाल मुंडवाए हुए या बाल छंटवाए हुए, बिना किसी डर-भय के!" ----- अल्लाह वह बातें जानता था जो आप नहीं जानते-----और उसने आपके लिए बहुत जल्द मिलने वाली जीत तय कर दी है।  (27)

वही [अल्लाह] था जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन और सच्चे दीन [religion] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दीन सारे (झूठे) दीनों से बढ़कर है। और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है: (28)


मुहम्मद (सल.) अल्लाह के रसूल [Messenger] हैं।

जो लोग उनके पीछे चलनेवाले हैं, वे विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त हैं और आपस में एक दूसरे के साथ रहम-दिल हैं। तुम उन्हें देखोगे कि अल्लाह के फ़ज़ल [bounty] की तलाश में और उसकी ख़ुशी की चाहत में वे रुकू [kneeling] और सज्दे [Prostrating] में झुके रहते हैं: उनके चहरों पर सज्दे (में बार-बार झुकने) के कारण निशान पड़ जाते हैं। तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] में उनके बारे में इसी तरह दर्शाया गया है: जैसे किसी बीज से कोंपल निकलती है, फिर वह मज़बूत होती है, फिर बढ़कर मोटी हो जाती है, फिर अपने तने पर इस तरह सीधी खड़ी हो जाती है कि उसे उगाने वाले देखकर बहुत ख़ुश हो जाते हैं। इस तरह, अल्लाह उन (की तरक़्क़ी) से विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] के दिल जलाता है; जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उनके (गुनाहों की) माफ़ी के लिए और बहुत बड़े इनाम के लिए अल्लाह ने वादा कर रखा है। (29)

 

नोट:

1: यह आयत "हुदैबिया की संधि" [6 हिजरी/ 628 ई] के बारे में है, जिससे मक्का की होने वाली पक्की जीत का रास्ता खुल गया, क्योंकि अब मुसलमानों और ग़ैर-मुस्लिमों का मेल-जोल पहले से बढ़ गया जिससे ज़्यादा लोग इस्लाम क़बूल करने लगे थे, और मक्का की तरफ़ से बार-बार होने वाले हमले से मदीना के मुसलमानों को कुछ समय के लिए राहत मिल गई थी।  

4: चूँकि हुदैबिया की संधि की शर्तें मुसलमानों को बराबरी की नहीं लग रही थीं, इसलिए वे ग़ुस्से और जोश में थे, मगर अल्लाह ने मुसलमानों के दिलों पर सुकून उतार दिया और उन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि की शर्तों को मान लेने का वचन दिया, देखें आयत 18. 

6: अल्लाह और उसके रसूल के बारे में बुरे विचार बैठे होने के लिए देखें आयत 12. 

10: मुसलमानों को छोटे हज [उमरा] के लिए मक्का जाने से जब रोक दिया गया, तो वे मक्का से कुछ पहले हुदैबिया नाम की जगह पर रुक गए थे, वहाँ से उन लोगों ने मक्का में बातचीत के लिए अपना दूत भेजा, फिर जब उस दूत के मारे जाने की अफ़वाह सुनने में

आयी, तो फिर एक पेड़ के नीचे सब लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से अपनी निष्ठा का वचन दिया [बैत ए रिज़वान] और लड़ने-मरने के लिए तैयार हो गए। यहाँ उसी की तरफ़ इशारा है।  

11: जब छोटे हज [उमरा] के इरादे से मुहम्मद (सल्ल) मदीना से निकले, तो उन्होंने आसपास के देहात के लोगों को भी साथ चलने को कहा था, मगर उनमें जो पाखंडी लोग थे, वे इस डर से साथ नहीं गए कि कहीं मक्का वालों से मुठभेड़ हो गई तो युद्ध लड़ना पड़ेगा। 

15: हुदैबिया की संधि के बाद 7 हिजरी/ 629 ई. में जब मुसलमानों की फ़ौज ख़ैबर की जंग के लिए जाने लगी तो अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को यह ख़बर दी थी कि जीत मुसलमानों की होगी और बहुत सा लूट का माल भी मिलेगा। हुदैबिया के मोर्चे पर जिन लोगों ने बड़े धीरज से काम लिया था, उन्हें ही इस युद्ध में जाने के लिए कहा गया। दूसरे पाखंडी लोग जो पिछली लड़ाई में नहीं गए थे, इस बार लूट के माल में हिस्सेदारी की लालच में जाना चाहते थे, मगर उन्हें ले जाने से मना कर दिया गया। 

16: उन देहाती पाखंडियों को ख़ैबर की जंग में तो भाग लेने से मना कर दिया गया, लेकिन कहा जा रहा है कि आगे होने वाली जंगों में उन्हें मौक़ा दिया जाएगा जबकि मुक़ाबला कड़े योद्धाओं से होगा। अगर उन लोगों ने हुक्म मानते हुए ठीक से लड़ाइयाँ लड़ीं, तो उनके गुनाहों को माफ़ कर दिया जाएगा, और इसका इनाम मिलेगा। 

18: यहाँ जल्द मिलने वाली जीत से मतलब ख़ैबर की जीत है, यह इलाक़ा मदीना के उत्तर में था जहाँ यहूदियों की बड़ी संख्या आबाद थी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ योजनाएं बनाते रहते थे, इस जीत से मुसलमानों को काफ़ी आर्थिक लाभ हुआ। 

21: और भी कई लड़ाइयों में जीत और उनसे मिलने वाले माल की ख़बर सुनायी गई है, जैसे मक्का की जीत, हुनैन की जीत, बाद में बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत आदि। 

22: अगर मक्का के विश्वास न करने वालों ने हुदैबिया में मुसलमानों से लड़ाई लड़ी होती, तो वे ज़रूर हार जाते, मगर अल्लाह ने कई वजहों से मुसलमानों के हाथ लड़ने से रोक दिए, उनमें से मुख्य कारण आयत 25 में दिया गया है। 

23: अल्लाह की रीति [सुन्नत] हमेशा से यही रही है कि अल्लाह ने अपने रसूलों की मदद की है और उसके ख़िलाफ़ लड़ने वालों को हराया है, क्योंकि सच्चाई की झूठ पर जीत होती है, अगर कभी झूठ की जीत हो भी जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि सच्चाई वाले गिरोह के काम करने के तरीक़े में कोई कमी थी। 

24: यहाँ मक्का की घाटी से मतलब वही हुदैबिया है जहाँ मुसलमानों ने पड़ाव डाला हुआ था। दोनों पक्षों में हुई संधि से पहले मक्का से 30 या 80 नौजवानों का एक दल ख़ुफिया तरीक़े से हुदैबिया में मुहम्मद (सल्ल) के क़त्ल के इरादे से घुस आया, मगर मुसलमानों ने उन्हें सही वक़्त पर पकड़ लिया। शुरू में लोग उन्हें क़त्ल करना चाहते थे, मगर बाद में उन्हें माफ़ कर दिया गया। दूसरी तरफ़ संधि की बातचीत करने के लिए मुसलमानों के दूत के रूप में गए हज़रत उस्मान (रज़ि) को भी मक्का वालों ने रोक रखा था। फिर दोनों पक्षों ने समझदारी दिखाते हुए संधि कर ली और इस तरह युद्ध टल गया। इस तरह अल्लाह ने दोनों के हाथ लड़ने से रोक दिए। 

25: मुसलमानों का इरादा चूँकि छोटे हज [उमरा] का था, इसलिए वे अपने साथ क़ुरबानी के जानवर भी लेकर चले थे जिसे काबा में ले जाकर क़ुर्बान करना था, मगर उन्हें हुदैबिया से आगे मक्का तक जाने नहीं दिया गया।  

27: मुहम्मद (सल्ल) ने मदीना में एक ख़्वाब देखा था कि वह अपने साथियों के साथ मक्का जाकर छोटा हज [उमरा] कर रहे हैं, इसी इरादे से सब लोग मदीना से निकले थे, मगर वे मक्का तक न जा सके और हुदैबिया से ही उन्हें लौटना पड़ा। लेकिन जो वहाँ संधि हुई उसके अनुसार अगले ही साल 7 हिजरी/ 629 ई. में मुहम्मद (सल्ल) ने अपने सभी साथियों के साथ बिना किसी डर-भय के उमरा किया, इस तरह अल्लाह ने उनका ख़्वाब पूरा कर दिया। इसके साथ ख़ैबर की जीत की ख़ुशख़बरी भी दे दी। 

29: संधि की शर्तों को लिखते समय मक्का वाले मुहम्मद (सल्ल) के नाम के साथ "अल्लाह का रसूल" लिखने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए इस आयत में अल्लाह ने उन्हें साफ़ तौर से "अल्लाह का रसूल" बताया है। .... उनके पीछे चलने वालों की मिसाल बीज से मज़बूत पौधा बनने के चरण से दी गई है। इससे मिलती जुलती मिसालें तोरात और इंजील में भी हैं। .... तोरात में इनकी मिसाल: Deuteronomy 6:8; 11:18 “उनके माथे पर एक निशान होता है।" बाइबल में: Mark 4:26-29; 30-32 में फैले हुए सरसों के बीज की मिसाल दी गई है। 



7H/629 AD


सूरह 5: अल-माइदा [Al-Ma’ida]

[The Table Spread With Food/ तरह-तरह के खाने की दावत]


इस सूरह का शीर्षक "खाने के थाल" से जुड़ा हुआ है जिसका ज़िक्र आयत 112-115 में आया है। इस मदनी सूरह का केंद्रीय विषय वैध [हलाल] और अवैध [हराम] खाने के नियम-क़ायदे के बारे में है, जिसके लिए अल्लाह ने ईमान रखनेवालों से हुक्म मानने का वचन लिया था (1--5; 87--108). इस सूरह के एक हिस्से में हज की रीति-रिवाजों का सम्मान करने और हज के सफ़र के दौरान खाने के लिए शिकार न करने, और सफ़र के दौरान वसीयत करने के बारे में है। अल्लाह ने यहूदियों और ईसाइयों से भी वचन लिए थे, इन दोनों समुदायों ने इन वचनों के साथ क्या किया, इसका ज़िक्र आयत 13 से 86 के बीच आया है, और इसके साथ इनका मुसलमानों के साथ जो संबंध है, उसका भी ज़िक्र आया है। आयत 109 से लेकर 120 तक आख़िरत [परलोक] की ज़िंदगी के बारे में बताया गया है और अपने-अपने समुदायों के लोगों के आचरण के बारे में उनके रसूलों का फ़ैसला क्या होगा, यह भी बताया गया है, ईसा अलै. को ख़ास करके अहमियत दी गई है: यहाँ आसमान से उतरने वाले खाने के एक थाल का ज़िक्र आया है जिसके लिए उनके शिष्यों ने उन्हें अल्लाह से दुआ करने की माँग की थी, और साथ में ख़ुदा के बेटे होने का जो दावा किया गया था, उसको भी रद्द किया गया है।


विषय:


01-05: दायित्वों को पूरा करने, खाना-पीना, हज की रीतियाँ, और शादी-ब्याह से जुड़े नियम-क़ायदे  

06-07: नमाज़ पढ़ने से पहले की तैयारी 

08-10: बिना किसी का पक्ष लिए सच्ची गवाही देना 

11   : अल्लाह ने ख़तरा टाल दिया 

12-19: किताबवाले लोगों की कड़ी निंदा 

20-26:  इसराईल की संतानों ने पवित्र भूमि में दाख़िल होने से इंकार कर दिया

27-31: आदम (अलै) के दो बेटों की कहानी 

32   :  क़त्ल करने की सज़ा 

33-34: अल्लाह और उसके रसूल के ख़िलाफ़ लड़ने की सज़ा 

35-37: अल्लाह के रास्ते में लड़ना 

38-40: चोरी की सज़ा 

41-43: अविश्वास के माहौल में रसूल का उत्साह बढ़ाना 

44-47: तौरात और इंजील 

48-50: रसूल की किताब 

51-53: यहूदियों और ईसाइयों के गठ-जोड़ के ख़िलाफ़ ख़तरा 

54-56: अपने दीन को छोड़ने पर चेतावनी 

57-66: दीन का मज़ाक़ उड़ाने वालों के ख़िलाफ़ चेतावनी 

67-69: किताबवाले लोगों से अपील 

70-71: इसराईल की संतानों की कड़ी निंदा 

72-77: ईसाई ट्राइनिटी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ कड़ी निंदा 

78-81: इसराईल के संतानों में से कुछ को दाऊद और ईसा (अलै) ने ठुकरा दिया

82-86: यहूदियों और बहुदेववादियों से ज़्यादा ईसाई, मुसलमानों के प्रति नरम हैं   

87-96: खाना-पीना, क़समें, शराब और जुए के बारे में नियम-क़ायदे 

97-99:   अल्लाह ने काबा को स्थापित किया 

100  :     बुराई और अच्छाई कभी बराबर नहीं होती 

101-102:  ज़्यादा खोद-खोदकर सवाल पूछने से मना किया गया 

103-105: बहुदेववादियों की कड़ी निंदा 

106-108: वसीयत बनाते समय गवाह रखने का आदेश 

109    :    रसूलों से पूछताछ होगी 

110    :     ईसा (अलै) के चमत्कार 

111-115:  खाने से भरा थाल भेजने का चमत्कार 

116-120:  ईसा (अलै) ने अपनी और अपनी माँ की पूजा करने को कभी नहीं कहा था 




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है

ऐ ईमानवालो! अपने (धार्मिक) दायित्वों [obligations] को पूरा करो। मवेशी चौपाये (का मांस) खाना तुम्हारे लिए वैध [हलाल/ lawful] कर दिया गया है, सिवाय उनके जो तुम्हें आगे बताया जा रहा है। (याद रहे), जब तुम हज/ उमरे की (तीर्थ) यात्रा पर रहो, तो (इहराम की हालत में) शिकार करना तुम्हारे लिए वैध नहीं [हराम] है------- अल्लाह जैसा चाहता है, आदेश देता है,  (1)


अत: ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की निशानियों [हज से जुड़े संस्कारों, रीति-रिवाजों] का अनादर न करो, न उन (चार) महीनों का जो पवित्र ठहराये गए हैं, न क़ुर्बानी के जानवरों का, न उन जानवरों के गले में पड़े हुए पट्टों का, और न उन लोगों का जो अपने रब के फ़ज़ल [bounty] और उसकी ख़ुशी की चाह में पवित्र घर [काबा] को जा रहे हों------- मगर जब तुम हज से जुड़ी रीतियों को पूरा कर चुको, तब शिकार कर सकते हो। और (देखो!), जिन लोगों ने (हुदैबिया की संधि के समय) तुम्हें उस पवित्र मस्जिद [काबा] में (हज के लिए) जाने से रोक दिया था, उनसे तुम्हारी नफ़रत कहीं तुम्हें इस बात पर न उभार दे कि तुम नियमों को तोड़ डालो: भलाई के कामों को करने और बुराई के कामों से बचने में एक दूसरे की मदद किया करो; गुनाह के काम करने और ज़ुल्म व अत्याचार के कामों में (कभी भी) एक दूसरे की मदद न करो। अल्लाह (के आदेश न मानने के नतीजे) से डरो, क्योंकि उसकी सज़ा बड़ी कठोर होती है। (2)


[मुसलमानो!], तुम्हारे लिए (खाने की) ये चीज़ें हराम [Forbidden] कर दी गयी हैं: मरे हुए जानवर का (सड़ा-गला) मांस; ख़ून; सूअर का मांस, कोई भी जानवर जिस पर (काटते समय) अल्लाह को छोड़कर किसी और का नाम लिया गया हो; कोई भी जानवर जिसका गला घोंटकर मारा गया हो, या ज़ोरदार चोट खाकर मर गया हो, या ऊँचाई से गिरकर या सींग लगने से मरा हो या जिसे किसी हिंसक पशु ने फाड़ खाया हो--- मगर हाँ, वह (हराम नहीं) जिसे (मरने से पहले) तुमने (सही तरीक़े से) ज़बह कर लिया हो; और (किसी जानवर का मांस) जो मूर्तिपूजकों के बलि देने की जगह पर काटा गया हो, हराम [Forbidden] है। तुम्हारे लिए यह भी हराम किया जाता है कि लोगों के बीच (मांस के) हिस्सों का बंटवारा निशान लगी हुई जुए की तीरों से किया जाए----- यह बड़े गुनाह की रीति है ----- आज (सच्चाई से) इंकार करनेवाले इस बात की सारी उम्मीद छोड़ चुके हैं कि तुम अपना धर्म छोड़ दोगे। अत: उनसे न डरो: मुझसे डरो। आज के दिन मैंने तुम्हारे दीन को तुम्हारे लिए (हर तरह से) पूरा कर दिया, तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और मैंने तुम्हारे दीन के रूप में "इस्लाम" [एक अल्लाह पर पूरी भक्ति] को पसन्द कर लिया: लेकिन अगर तुममें से कोई भूख से ऐसा मजबूर हो जाए कि उसे हराम चीज़ें खानी पड़ जाएं, तो अगर उसका इरादा गुनाह करने का नहीं था, तो (कोई बात नहीं) अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (3)



[ऐ रसूल!], वे आपसे पूछते हैं कि "क्या क्या चीज़ें उनके खाने के लिए हलाल [वैध/ lawful] हैं?" कह दें, "सारी अच्छी चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल हैं।" (इनमें वह भी शामिल हैं) जिन शिकारी चिड़ियों और जानवरों को तुमने शिकार पकड़ने के लिए सधा रखे हों, फिर जैसे अल्लाह ने तुम्हें सिखा दिया है, उन्हें भी सिखा दो, अत: वे जिस जानवर को (शिकार करके) तुम्हारे लिए बचाए रखें, उसको (बिना झिझक) खा सकते हो, मगर (शिकारी जानवर को शिकार के लिए छोड़ते हुए) अल्लाह का नाम ले लिया करो। अल्लाह (के हुक्म को न मानने के नतीजे) से डरते रहो: (याद रहे) अल्लाह (कर्मों का) हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।" (4


आज सारी अच्छी चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल कर दी गयी हैं, जिन [यहूदी व ईसाई] लोगों को (तुमसे) पहले (आसमानी) किताब दी गयी थी, उनका खाना तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा खाना उनके लिए हलाल है। इसी तरह, शरीफ़ और ईमानवाली औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं, और साथ में, जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गयी थी [यहूदी व ईसाई], उन लोगों की भी शरीफ़ औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं, शर्त यह है कि तुमने उनकी मेहर [bride-gifts] अदा कर दी हो और उनसे शादी की हो। (ध्यान रहे), न तो इसका मक़सद (बिना निकाह के) प्यार-मोहब्बत करना हो, और न ही चोरी-छिपे रखैलों को रखने का होना चाहिए। जिस किसी ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उसका सारा किया-धरा (कर्म) बेकार हो गया, और आख़िरत [परलोक] में वह घाटा उठाने वालों में गिना जाएगा। (5)



ऐ ईमान रखनेवालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने चहरों को और हाथों को कुहनियों तक धो लिया करो और अपने सिरों पर हाथ फेर लो और अपने पैरों को भी टखनों तक धो लो। और अगर (सेक्स करने या वीर्य/Semen निकल जाने के कारण) तुम नापाक हो गए हो, तो अच्छी तरह (नहा-धोकर) पाक हो जाओ। अगर तुममें से कोई बीमार हो, या सफ़र में हो, या शौच करके आया हो या उसका किसी औरत से शारीरिक मिलन हुआ हो, और फिर पानी न मिले तो थोड़े सी साफ़ मिट्टी को लेकर उसे अपने मुँह और हाथों पर फेर लो। अल्लाह तुम पर किसी तरह का बोझ डालना नहीं चाहता: वह तो केवल तुम्हें पाक-साफ़ करना (और हराम चीज़ों से बचाना) चाहता है और तुम पर अपनी नेमत [हिदायत] पूरी कर देना चाहता है, ताकि तुम शुक्र अदा करनेवाले बनो। (6


याद करो उन नेमतों Blessings] को, जो अल्लाह ने तुम पर उतारीं, और वह वचन जिससे तुम्हें बाँधा गया था, जबकि तुमने कहा था: "हमने सुना और हमने (आदेश) मान लिया।" अल्लाह से डरते रहो: वह दिलों के अंदर छिपे हुए राज़ की भी पूरी जानकारी रखता है। (7)


ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की भक्ति में मज़बूती से जमे रहो और निष्पक्ष होकर गवाही देने वाले बनो: ऐसा नहीं होना चाहिए कि दूसरों के प्रति नफ़रत तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम न्याय करना छोड़ दो। बल्कि हर हाल में न्याय करो, कि यह अल्लाह का डर रखने के ज़्यादा निकट है। अल्लाह से डरते रहो: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।  (8)


जिस लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया [ईमान] और अच्छे कर्म किए, उनके लिए (गुनाहों की) माफ़ी और बड़े इनाम का अल्लाह ने वादा कर रखा है;  (9)


जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में पड़ने वाले हैं।  (10



ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की उस मेहरबानी को याद करो जो उसने तुम पर किया था, जब कुछ लोग तुम्हारे ख़िलाफ़ (ज़ुल्म करने और मार डालने के लिए) हाथ उठाने वाले थे, और अल्लाह ने उनके हाथ (तुम तक पहुँचने से) रोक दिए थे। अत: अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो: ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए। (11)



अल्लाह ने इसराईल की सन्तान से वचन लिया था। हमने (उनके बारह क़बीले के लिए) उनके बीच से बारह सरदार खड़ा किए, और अल्लाह ने कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ: अगर तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ो, निर्धारित ज़कात दो, मेरे रसूलों पर विश्वास करो और उनका साथ दो, और (मेरे रास्ते में ख़र्च करके बाद में कई गुना ज़्यादा पाने के लिए) अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो मैं तुम्हारे गुनाहों को मिटा दूँगा, और तुम्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, तुममें से कोई भी अगर अब भी इस (वचन) को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ेगा।" (12)


मगर उन लोगों ने अपने वचन तोड़ दिए, तो फिर हमने उन्हें (अपनी रहमत से) दूर कर दिया, और उनके दिल कठोर कर दिए। वे (उतारी गयी किताब के) शब्दों में हेर-फेर करके उसके अर्थ को बिगाड़ देते हैं, और जो चीज़ उन्हें याद रखने के लिए बोली गयी थी, उसमें से एक बड़ा हिस्सा तो वे बिल्कुल भुला बैठे हैं: (ऐ रसूल) आप उनके कुछ लोगों को छोड़कर बाक़ी सारे लोगों में धोखा देने की प्रवृत्ति पाएंगे। आप इस पर ध्यान न दें, और उन्हें माफ़ कर दें: अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो अच्छा कर्म करते हैं। (13)

 

हमने उन लोगों से भी वचन लिया था, जो कहते हैं, "हम ईसाई [Christians] हैं", मगर वे भी उनमें से कुछ चीज़ों को भुला बैठे जिसे उन्हें याद रखने के लिए बोला गया था, अत: हमने उनके बीच क़यामत तक के लिए (आपस में) दुश्मनी और नफ़रत की आग भड़का दी, जब अल्लाह उन्हें बता देगा, जो कुछ उन्होंने किया होगा।  (14)

 

ऐ किताबवालो [यहूदियों व ईसाइयों]! हमारा रसूल तुम्हारे पास आ चुका है, ताकि वह तुम्हें (आसमानी) किताब की बहुत सी बातों को समझा सके जो तुम लोगों ने छिपा रखी थीं, और (जो कुछ तुमने किया है), उनमें से बहुत सी चीज़ों को नज़रअंदाज़ [overlook] कर सके। तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल के रूप में) एक रौशनी आ चुकी है, और साथ में चीज़ों को स्पष्ट कर देनेवाली एक किताब [क़ुरआन] भी, (15


जिसके द्वारा अल्लाह उन लोगों को सलामती की राह दिखाता है, जो ऐसी चीज़ के पीछे चलते हैं जिससे अल्लाह ख़ुश होता है, जो उन्हें अल्लाह की मर्ज़ी से, अँधेरों से बाहर निकालकर रौशनी की तरफ़ लाता है, और उन्हें सीधा रास्ता दिखाता है। (16


जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम [Mary] का बेटा मसीह [Jesus] है", वे तो खुले-आम सच्चाई को झुठला रहे हैं। कह दें, "अगर अल्लाह मरयम के बेटे, मसीह को, साथ में उसकी माँ को और ज़मीन पर बसने वाले बाक़ी सबको बर्बाद करना चाहे, तो क्या कोई भी उसे ऐसा करने से रोक सकता है? आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उसके बीच में है, उसका सारा नियंत्रण अल्लाह ही के क़ब्ज़े में है: वह (बिना बाप के मसीह की तरह) जैसा चाहता है, पैदा करता है। अल्लाह को हर चीज़ (करने) की ताक़त है।" (17)


यहूदी और ईसाई कहते हैं, "हम तो अल्लाह के बच्चे और उसके चहेते हैं।" कह दें, "तो फिर वह तुम्हारे गुनाहों पर तुम्हें दंड क्यों देता है? बात यह नहीं है, बल्कि तुम एक मामूली आदमी हो, जो उसकी पैदा की हुई सृष्टि का एक हिस्सा है: वह जिसे चाहता है, क्षमा कर देता है और जिसे चाहता है, दंड देता है।" आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उसके बीच में हैं, हर चीज़ का नियंत्रण अल्लाह ही के हाथ में है: सबको अंत में उसी के पास पहुंचना है। (18


ऐ किताबवालो! हमारे रसूलों के आने का सिलसिला एक मुद्दत से बन्द था, मगर अब तुम्हारे पास हमारा रसूल आ गया है, ताकि तुम्हारे लिए वह (हमारे आदेशों को) स्पष्ट कर दे और तुम यह न कह सको कि "हमारे पास (नेक काम की) ख़ुशख़बरी देनेवाला और (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला कोई नहीं आया।" तो देखो! अब तुम्हारे पास ख़ुशख़बरी देनेवाला और सावधान करनेवाला आ चुका है: अल्लाह को हर चीज़ करने की शक्ति है। (19) 



मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "ऐ लोगो! तुम पर की गयी अल्लाह की नेमतों को याद करो: कैसे उसने तुम्हारे बीच से नबियों [Prophets] को खड़ा किया और तुम्हें बादशाह बनाया और (उस ज़माने में) तुमको कुछ ऐसी चीज़ें दीं, जो किसी और क़ौम के लोगों को नहीं मिली थीं। (20)


"ऐ मेरे लोगो! इस पवित्र सरज़मीन [सीरिया व फ़िलिस्तीन क्षेत्र] में (हिम्मत करके) दाख़िल हो जाओ, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए पहले से तय कर रखा है------  (देखो!) उल्टे पाँव न लौट आओ, वर्ना नुक़सान उठाने वालों में हो जाओगे।" (21


लोगों ने (जवाब में) कहा, "ऐ मूसा! इस सरज़मीन पर तो बड़े ताक़तवर (और डरावने) लोग रहते हैं। जब तक वे लोग वहाँ से चले नहीं जाते, हम तो वहाँ क़दम रखने वाले नहीं। हाँ, अगर वे वहाँ से निकल जाएँ, तो हम ज़रूर दाख़िल हो जाएँगे।" (22)


तब भी, उन डरनेवाले लोगों में से दो आदमियों ने जिन्हें अल्लाह ने (ईमान की) नेमत दी थी, बोल उठे, "तुम हिम्मत करके उन पर चढ़ाई कर दो और (शहर के) दरवाज़े से जा घुसो और एक बार तुम अंदर घुस गए, तो जीत तुम्हारी ही होगी। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो अल्लाह पर भरोसा रखो।" (23)


उन लोगों ने कहा, "ऐ मूसा! जब तक वे लोग वहाँ हैं, हम तो वहाँ कभी दाख़िल नहीं होंगे। अगर लड़ना ही है तो तुम और तुम्हारा रब, दोनों वहाँ जाकर उनसे लड़ते रहना, हम तो यहीं बैठे रहेंगे।" (24


मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे अपने और अपने भाई के अलावा किसी और पर कोई अधिकार नहीं है: हम दोनों और इन आज्ञा न माननेवालों के बीच अब तू ही फ़ैसला कर।" (25


अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तो अब उनके लिए चालीस साल तक इस ज़मीन पर जाने से रोक लगा दी गयी है: (इस दौरान) ये धरती पर मारे-मारे फिरेंगे, सो (ऐ मूसा!) जो लोग आज्ञा नहीं मानते, उनकी हालत पर शोक न करो।" (26)



[ऐ रसूल!], आप उन्हें आदम के दो बेटों की कहानी की सच्चाई के बारे में बता दें: दोनों ने (अल्लाह के सामने) अपनी-अपनी क़ुर्बानी पेश की, उनमें से एक [हाबील/ Abel] की क़ुर्बानी क़बूल हो गई और दूसरे [क़ाबील/ Cain] की क़बूल नहीं हुई। इस पर (क़ाबील ने जलते हुए हाबील से) कहा, "मै तुझे अवश्य मार डालूँगा।" मगर हाबील ने कहा, "अल्लाह तो उन्हीं की क़ुर्बानी क़बूल करता है, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं। (27


अगर तू मुझे क़त्ल करने के लिए हाथ उठाएगा, तो मैं तुझे मारने के लिए अपना हाथ नहीं उठाउँगा। मैं डरता हूँ अल्लाह से, जो सारे संसार का रब है,  (28


मैं तो चाहता हूँ कि तू मेरे गुनाह और साथ में अपने गुनाहों का बोझ अपने ही सिर ले ले, और (जहन्नम) की आग में बसने वालों में से हो जा: शैतानियाँ करने वालों का बदला ऐसा ही होता है।" (29


मगर उसकी आत्मा ने उसे अपने भाई की हत्या के लिए उकसाया: उसने अपने भाई (हाबील) की हत्या कर डाली और हारे हुए लोगों में शामिल हो गया।  (30)


तब अल्लाह ने एक कौआ भेजा जो ज़मीन कुरेदने लगा, ताकि उसे दिखा दे कि वह अपने भाई की लाश को कैसे छिपाए। यह देखकर (क़ाबील) कहने लगा, "हाय, अफ़सोस मुझ पर! क्या मैं इस कौए जैसा भी न हो सका कि अपने भाई की लाश (ज़मीन खोदकर) छिपा देता?" (अपनी हालत पर) बाद में वह बहुत शर्मिंदा हुआ। (31)


इसी के चलते, हमने इसराईल की सन्तान के लिए यह आदेश लिख दिया था कि अगर कोई आदमी किसी को क़त्ल कर डालता है, तो मानो उसने सारे इंसानों का ख़ून कर दिया, और जिस किसी ने किसी आदमी की जान बचा ली, तो मानो उसने सारे इंसानों की ज़िंदगी बचा ली ------सिवाय इसके कि यह हत्या किसी और की जान के बदले में हो, या देश में लूट-मार मचाने वालों को सज़ा देने के लिए की गयी हो। हमारे रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आते रहे (और ज़ुल्म करने से रोकते रहे), मगर फिर भी उनमें बहुत-से लोग ऐसे निकले जो ज़मीन पर ज़्यादतियाँ करते ही रहे।  (32


जो लोग अल्लाह और उसके रसूल के विरुद्ध जंग करते हैं और ज़मीन पर फ़साद फैलाने के लिए (डाकू, लुटेरे बनकर) दौड़ते फिरते हैं, (जुर्म के अनुसार) उनकी सज़ा तो यही है कि क़त्ल कर दिए जाएं या सूली पर चढ़ाए जाएँ या उनके हाथ-पाँव विपरीत दिशाओं में काट डाले जाएँ [दायाँ हाथ और बायाँ पाँव] या उन्हें देश-निकाला दे दिया जाए: यह अपमान और तिरस्कार तो इस दुनिया के लिए है, और फिर परलोक में भी उनके लिए बड़ी भयानक यातना है,  (33)


मगर (हाँ), इससे पहले कि तुम उन पर क़ाबू पाते हुए गिरफ़्तार कर लो, अगर वे (अपने गुनाहों से) तौबा कर लें------- तो ऐसी हालत में तुम्हें ध्यान रहे कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (34)


ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरते रहो, और अल्लाह के नज़दीक पहुँचने का ज़रिया ढूंढो, और उसके मार्ग में जी-तोड़ संघर्ष करो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (35)


अगर विश्वास न करने वालों के हाथ में वह सब कुछ (धन-दौलत) आ जाए जो सारी ज़मीन में है और उतना ही और भी (कहीं से) पा लें, फिर वे ये सब कुछ क़यामत के दिन की यातना से बचने के लिए अपनी जान के बदले में देने को तैयार हों, तब भी उनकी ये चीज़ें स्वीकार नहीं की जाएँगी---- उन्हें दर्दनाक यातना होगी।  (36)


वे चाहेंगे कि (जहन्नम की) आग से बाहर निकल आएँ, मगर वे उससे निकल नहीं सकेंगे: उनके लिए कभी न ख़त्म होने वाली यातना है। (37)



चोर चाहे मर्द हो या औरत, उसके हाथ काट डालो, जो कुछ उन्होंने किया है यह उसकी सज़ा है और अल्लाह की ओर से इस (बुराई) को रोकने का एक तरीक़ा: अल्लाह सब पर प्रभुत्व रखनेवाला, (और आदेश देने में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (38


लेकिन अगर किसी ने अपने बुरे काम [चोरी] से (दिल से) तौबा कर ली और अपनी ग़लतियों को सुधार लिया, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल कर लेगा: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, दयावान है। (39


[ऐ रसूल!], क्या आप नहीं जानते कि आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] केवल अल्लाह के पास है? वह जिसे चाहे यातना दे और जिसे चाहे माफ़ कर दे: अल्लाह को हर चीज़ करने की शक्ति है। (40)



ऐ रसूल! जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने में एक दूसरे को पीछे छोड़ देने की दौड़ में लगे हैं, उनके लिए आप दुखी न हों----- वे (पाखंडी) लोग जो अपने मुँह से कहते हैं, "हमने विश्वास कर लिया," मगर (असल में) उनके दिल में थोड़ा भी ईमान नहीं, वे यहूदी लोग जो झूठी बातें कान लगाकर सुनते हैं और वे लोग जो तुम्हारे पास आकर मिले तक नहीं, वे (तौरात के) शब्दों में हेर-फेर करके उसके अर्थ बिगाड़ देते हैं और (एक दूसरे से) कहते हैं, "(जो तौरात का आदेश हमने बताया है) अगर वैसा ही आदेश तुम्हें (मुहम्मद साहब से) मिले, तो इसे मान लेना और अगर वैसा आदेश न मिले, तो बचकर रहना!"-----(इनकी हरकत देखकर) अगर अल्लाह ही चाहे कि ऐसे लोगों को भटकता छोड़ दे, तो अल्लाह के सामने आपका कोई बस नहीं चलेगा कि आप उनके लिए कुछ कर पाएं। ये वही लोग हैं जिनके दिलों (के मैल) को अल्लाह साफ़ करना नहीं चाहता। इनके लिए इस संसार में भी अपमान और तिरस्कार है और फिर आख़िरत [परलोक] में भी बड़ी भारी यातना है -------  (41)


वे झूठी बातें कान लगा-लगाकर सुनते हैं, और बुरे तरीक़ों से (हराम का) माल खाते हैं। [ऐ रसूल], अगर वे आपके पास (किसी मामले का) फ़ैसला कराने के लिए आएं, तो आप या तो उनके बीच फ़ैसला कर दें या चाहें तो मना कर दें ---- अगर आप (फैसला करने से) मना कर दें, तो वे आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, लेकिन अगर आप उनके बीच फ़ैसला करें, तो इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करें: अल्लाह इंसाफ़ करने वालों को पसंद करता है------ (42) 


मगर वे आपके पास फ़ैसला कराने के लिए आते ही क्यों हैं, जबकि उनके पास तौरात [Torah] है, जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है, इसके बावजूद वे (तौरात के आदेश से) मुँह मोड़ते हैं? असल में वे ईमान नहीं रखते। (43


इसमें संदेह नहीं कि हमने तौरात उतारी, जो रास्ता दिखानेवाली और रौशनी फैलानेवाली थी, और अल्लाह के नबी [Prophets] जो उसकी आज्ञा माननेवाले थे, इसी के (हुक्म के) अनुसार यहूदियों के लिए फ़ैसला किया करते थे। इसी तरह, सभी संतों [rabbis] और किताबों के ज्ञानियों [scholars] ने भी अल्लाह की किताब के उस हिस्से के मुताबिक़ ही फ़ैसले दिए जिसको सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गयी थी, और वे उसके (आदेशों पर) गवाह भी थे। अत: [ऐ अल्लाहवालो और ज्ञानियों], लोगों से न डरो, बल्कि मुझ से डरो; मेरे संदेशों को (दुनिया के फ़ायदे के लिए) सस्ते दामों में न बेच दो; (याद रखो!), जो लोग अल्लाह के उतारे हुए विधान के अनुसार फ़ैसला न करें, तो ऐसे लोग (अल्लाह की शिक्षाओं को) ठुकरानेवाले [काफ़िर] हैं।  (44


हमने तौरात में यहूदियों के लिए (हुक्म) निर्धारित कर दिया था कि जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, दाँत के बदले दाँत, ज़ख्म के बदले वैसा ही ज़ख़्म होगा: अगर कोई भलाई की नीयत से अपना बदला लेना माफ़ कर दे, तो यह उसके लिए (बुरे कर्मों का) प्रायश्चित होगा। जो लोग अल्लाह के उतारे गए विधान के अनुसार फ़ैसला नहीं करते, वे लोग बड़े ज़ालिम हैं।  (45)


और फिर (उन नबियों के बाद) उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर हमने मरयम के बेटे, ईसा (Jesus) को भेजा, ताकि उससे पहले उतरी हुई किताब 'तौरात' [Torah] की सच्चाई की पुष्टि हो जाए: हमने उसे इंजील [Gospel] दी, रास्ता दिखानेवाली, रौशनी फैलानेवाली, और अपने से पहली उतरी किताब तौरात की पुष्टि करनेवाली ------ जो अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए (अच्छाई का) रास्ता दिखानेवाली और नसीहत बनकर आयी थी। (46


अतः इंजील के माननेवालों को चाहिए कि उसी के विधान के अनुसार फ़ैसला करें, जो अल्लाह ने उसमें उतारा है। (याद रखो!) जो कोई अल्लाह की उतारी हुई किताब के अनुसार फ़ैसला न करे, तो ऐसे ही लोग नियमों को तोड़ने वाले हैं।  (47)


[ऐ मुहम्मद] हमने आपके पास यह किताब [क़ुरआन] सच्चाई के साथ भेजी है, जो इससे पहले आयी हुई सारी आसमानी किताबों की पुष्टि करती है, और जो उन सब पर निर्णायक [final authority] की हैसियत रखती है: अतः जो हुक्म अल्लाह ने उतारा है, आप उसी के मुताबिक़ लोगों के बीच फ़ैसला करें। जो सच्चाई आपके पास आ चुकी है उससे हटकर उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें। तुममें से हर एक गिरोह के लिए हमने अलग-अलग 'एक क़ानून' [शरीअत] और 'एक रास्ता' [तरीक़ा] निश्चित कर दिया है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक समुदाय बना देता, मगर वह चाहता था कि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसके द्वारा वह तुम्हारी परीक्षा ले, अतः भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करो: तुम सबको अल्लाह के पास लौटकर जाना है, फिर वह तुम्हें बता देगा कि जिन मामलों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (48)


अत: [ऐ रसूल], जो कुछ अल्लाह ने आप पर उतारा है, उसी के अनुसार आप उन लोगों के बीच फ़ैसला करें। उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें, और उनकी तरफ़ से सावधान रहें कि कहीं ऐसा न हो कि वे आपको धोखे में डालकर किसी ऐसे हुक्म से हटा दें, जो अल्लाह ने आप पर उतारा है। फिर अगर वे (अल्लाह के हुक्म से) मुँह मोड़ें, तो याद रखें कि उनके द्वारा किए गए कुछ गुनाह के कारण अल्लाह उन्हें सज़ा देना चाहता है: इनमें से बहुत सारे लोग नियमों को तोड़ने वाले हैं। (49


अब क्या वे ऐसा फ़ैसला चाहते हैं जो जाहिलियत [ignorance] के ज़माने के नियमों के अनुसार हो? पक्का ईमान रखनेवालों के लिए क्या कोई अल्लाह से बेहतर फ़ैसला करनेवाला हो सकता है? (50)


ऐ ईमानवालो! तुम यहूदियों और ईसाइयों को (जो तुम्हारी दुश्मनी में लगे हैं) अपना साथी व संरक्षक न बनाओ: वे केवल एक-दूसरे के साथी हैं। अब जो कोई उनको अपना संरक्षक बनाएगा, तो वह उन्हीं लोगों में से समझा जाएगा ----- अल्लाह ऐसा ज़ुल्म करने वालों को मार्ग नहीं दिखाता-------- (51


इसके बावजूद, [ऐ रसूल], आप देखेंगे कि जिनके दिलों में रोग है, वे अपनी हिफ़ाज़त के लिए यह कहते हुए उनके पास दौड़े हुए जाते हैं कि, "हमें डर है कि कहीं हमारा भाग्य, हमारे ही विरुद्ध न हो जाए।" मगर हो सकता है कि अल्लाह तुम्हारे लिए जीत ले आए या उसकी ओर से कोई और बात सामने आ जाए: फिर तो ये लोग जो कुछ राज़ अपने जी में छिपाए हुए थे, उसपर अफ़सोस करेंगे, (52


और उस समय ईमानवाले कहेंगे, "क्या ये वही लोग हैं जो अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाकर विश्वास दिलाते थे कि हम तुम्हारे साथ हैं?" इनका किया-धरा सब बेकार गया: वे सब कुछ खो बैठे हैं।  (53)


ऐ ईमान रखनेवालो! तुममें से जो कोई अगर अपने पिछले धर्म की ओर लौटता है (और उन्हें अपना मददगार बनाता है), तो अल्लाह जल्द ही तुम्हारे बदले में ऐसे लोगों को ले आएगा जिन्हें वह पसंद करता है और वे उसे पसंद करते हों, वे ईमानवालों के साथ नर्मी से पेश आएंगे और विश्वास न करनेवालों के साथ कठोरता अपनाएंगे, और वे बिना बुरा-भला कहने वालों की परवाह किए, अल्लाह की राह में जी-तोड़ संघर्ष करेंगे। यह है अल्लाह का फ़ज़ल [bounty], वह जिसे चाहता है प्रदान करता है। अल्लाह के पास कभी न ख़त्म होने वाला फ़ज़ल भी है और ज्ञान भी।  (54


तुम्हारे सच्चे संरक्षक व मददगार तो अल्लाह, उसका रसूल और वे ईमानवाले हैं ---- जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, निर्धारित ज़कात देते हैं, और बंदगी में झुके रहते हैं।  (55)


जो लोग अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह, उसके रसूल और ईमानवालों की तरफ़ झुकते हैं, [वे अल्लाह के दलवाले हैं]: और अल्लाह के दलवालों की जीत निश्चित है। (56)



ऐ ईमानवालो! तुम उन्हें अपना साथी व संरक्षक न बनाओ, जो तुम्हारे दीन को अपमानित करते हैं, और उसकी हँसी उड़ाते हैं ----- चाहे वे लोग हों जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई थी, या विश्वास न करनेवाले लोग हों ---- और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो। (57)


जब तुम नमाज़ के लिए (अज़ान) पुकारते हो, तो वे उसे तमाशा बनाते हैं, और उसकी हँसी उड़ाते हैं: यह इस कारण से है कि ये लोग बुद्धि से काम नहीं लेते। (58)


[ऐ रसूल], आप कह दें, "ऐ किताबवालो! हमें नापसंद करने का तुम्हारे पास और तो कोई कारण नहीं है सिवाय इसके, कि हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं, और उस (सच्चाई) पर ईमान रखते हैं जो हम पर उतारी गई, और उस पर भी जो हमसे पहले उतारी जा चुकी हैं, जबकि तुममें से ज़्यादातर लोग (तौरात की) आज्ञाओं का पालन नहीं करते?" (59)


आप कहें, "क्या मैं बताऊँ कि (तुम जो हमारे लिए सज़ा चाहते हो, उससे) कहीं बुरी सज़ा का हक़दार कौन है? वे लोग जिनसे अल्लाह ने अपने आपको दूर कर लिया, जिनसे वह बहुत नाराज़ हुआ, और उनमें से कितनों को बन्दर और सूअर (की तरह) कर दिया, और वे जो मूर्तियों की पूजा करने लगे: यही वे लोग हैं जो सबसे निचले दर्जे में हैं, और सीधे मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं।" (60)



[ईमानवालो], जब वे [मदीना के कुछ यहूदी] लोग तुम्हारे पास आते हैं, तो कहते हैं, "हमने (सच्चाई पर) विश्वास किया," मगर वे मन में (सच्चाई से) इंकार करते हुए आए भी थे और उस पर विश्वास किए बिना चले भी गए हैं ------ वे जो कुछ अपने दिलों में छिपाते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (61


[ऐ रसूल!], आप देखेंगे कि उनमें से ढेर सारे लोग गुनाहों के काम में, अत्याचार करने में और हराम (का माल) खाने में बड़ी तेज़ी दिखाते है। क्या ही बुरे काम हैं जो ये दिन-रात कर रहे हैं! (62


उनके सन्तों और किताब का ज्ञान रखने वालों को क्या हो गया है कि उन्हें गुनाह की बात बकने और हराम (का माल) खाने से रोकते नहीं? (अफ़सोस!) कितने बुरे हैं कर्म उनके!  (63


और यहूदियों ने कहा, "अल्लाह ने (देने से) अपनी मुट्ठी बंद कर ली है," मगर (सच्चाई यह है कि) उन्हीं लोगों ने (कंजूसी से) अपनी मुट्ठियाँ बंद कर रखी हैं, और जो कुछ उन्होंने कहा है उसके चलते उन्हें ठुकराया जाता है। सचमुच, अल्लाह के हाथ तो (देने के लिए) पूरी तरह खुले हुए हैं: वह जिस तरह चाहता है, (अपने फ़ज़ल से) देता है। (इसीलिए आप देखेंगे कि) जो कुछ [क़ुरआन] आपके रब ने आप पर उतारा है, उससे (सबक़ सीखने के बजाय) उनमें अधिकतर लोगों के अंदर बुरे व्यवहार और आज्ञा न मानने की प्रवृत्ति और बढ़ जाएगी। (नतीजे में) हमने उनके कई समुदायों के बीच क़यामत तक के लिए दुश्मनी और नफ़रत का बीज बो दिया है। वे जब भी युद्ध की आग भड़काते हैं, अल्लाह उसे (फैलने से बचाते हुए) बुझा देता है। वे ज़मीन में ख़राबी फैलाने की कोशिश करते हैं, मगर अल्लाह फ़साद मचाने वालों को पसन्द नहीं करता।  (64)


अगर किताबवाले लोग ईमान रखते और (अल्लाह का) डर रखते, तो हम ज़रूर उन पर से उनकी बुराइयों (के प्रभाव) को दूर कर देते और उन्हें नेमत भरी जन्नतों में दाख़िल कर देते। (65


अगर वे तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] को, और जो कुछ (किताब) उनके रब की तरफ़ से उनके पास भेजी गयी, उन पर (सच्चाई के साथ) जमे रहते, तो उन्हें अपने ऊपर [आसमान] से भी और अपने नीचे [ज़मीन] से भी भरपूर (रोज़ी) मिली होती: उनमें से कुछ लोग सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं, मगर उनमें से अधिकतर ऐसे हैं कि जो भी करते हैं, बुरा ही करते हैं।  (66) 



ऐ रसूल! आपके रब की तरफ़ से जो कुछ आप पर उतारा गया है, उसे (बंदों तक) पहुँचा दें---- अगर ऐसा न किया, तो (मतलब यह हुआ कि) आपने अल्लाह के सन्देश को पहुँचाने का काम (पूरा) नहीं किया --- और अल्लाह आपको लोगों (की साज़िशों) से सुरक्षित रखेगा। अल्लाह उन्हें सही रास्ता नहीं दिखाता, जो उसपर विश्वास न करने पर अड़े रहते हैं (और हुक्म नहीं मानते)। (67


आप कह दें, "ऐ किताबवालो! जब तक कि तौरात और इंजील, और जो (किताब) तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उस पर मज़बूती से जमे नहीं रहते, तब तक सही मायने में तुम्हारे दीन का कोई आधार नहीं है," मगर [ऐ रसूल] जो कुछ (संदेश) आपके रब ने आपके पास उतार भेजा है, वह अवश्य ही उनमें से बहुतों के अंदर बुरे व्यवहार और आज्ञा न मानने की प्रवृत्ति को और बढ़ा देगा: सो आप (सच्चाई से) इंकार और अल्लाह के हुक्म को न माननेवालों के बारे में चिंता न करें। (68


जो लोग [क़ुरआन पर] ईमान रखते हैं, जो यहूदी हैं, जो साबई [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं ----- जो कोई भी अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखेगा और अच्छा कर्म करेगा --- उनके लिए (आने वाली दुनिया में) न तो कोई डर है, और न वे दुखी होंगे। (69)



हमने इसराईल की सन्तान से दृढ़ वचन लिया, और उनकी तरफ़ रसूल भेजे। जब कभी उनके पास कोई रसूल ऐसा संदेश लेकर आया जो उन्हें पसन्द न आया, तो उनमें से कुछ पर तो उन्होंने झूठ बोलने का इल्ज़ाम लगा दिया और कुछ दूसरों को जान से मार डाला;  (70)


वे समझ बैठे कि उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँच सकता, इसलिए वे (अल्लाह से) अंधे और बहरे बन गए। फिर अल्लाह ने (तौबा क़बूल करते हुए) उन पर दया-दृष्टि डाली, मगर उनमें से बहुत-से लोग फिर से (सच्चाई को देखने और सुनने से) अंधे और बहरे हो गए: अल्लाह उनके कामों की पूरी जानकारी रखता है।  (71


जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम का बेटा, मसीह है", उन्होंने (सच्चाई से इंकार करते हुए) अल्लाह के आदेश को चुनौती दी है। वैसे ख़ुद मसीह ने कहा था, "ऐ इसराईल की सन्तानों! अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जिस किसी ने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को साझेदार [Partner] ठहराया, तो अल्लाह ने उसके जन्नत में जाने पर रोक लगा दी, और उसका ठिकाना जहन्नम होगा। कोई न होगा जो ऐसे बुरे काम करने वालों की मदद करेगा।" (72)

 


जो लोग यह कहते हैं कि, "अल्लाह तीन [Trinity] [ख़ुदाओं-- यानी बाप, बेटा, और पवित्र रूह] में से तीसरा है", वे सचमुच सच्चाई से इंकार करते हैं: अल्लाह तो केवल एक ही है। जो कुछ वे कह रहे हैं, अगर ऐसा ही कहने पर अड़े रहे, तो उनमें से जो लोग (सच्चाई से) इंकार करने पर तुले हुए हैं, उन्हें दर्दनाक यातना धर दबोचेगी।  (73)


तो फिर क्यों इन लोगों का झुकाव अल्लाह की तरफ़ नहीं होता कि उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँगें, जबकि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है?  (74


मरयम का बेटा, मसीह तो केवल एक रसूल था; उससे पहले भी बहुत-से रसूल आए और चले गए; उसकी माँ सच्ची व बड़ी नैतिकतावाली औरत थी; दोनों ही (मर-खप जानेवाले लोगों की तरह) खाते-पीते थे। देखो, किस तरह से हम इन निशानियों को उनके लिए स्पष्ट कर देते हैं; फिर भी देखो, ये कैसे धोखे में पड़े हुए हैं!  (75


कह दें, "तुम अल्लाह को छोड़कर किसी और की बन्दगी कैसे कर सकते हो, जिनके पास न तो तुम्हें नुक़सान पहुँचाने की ताक़त है, न फ़ायदा? वह अल्लाह ही है जो सब बात सुननेवाला, और सब चीज़ जाननेवाला है।" (76)


कह दें, "ऐ किताबवालो! अपने दीन में तुम सच्चाई की सीमा से पार न चले जाओ, और उन लोगों की इच्छाओं के पीछे न चलो, जो तुम से पहले रास्ते से भटक गए ---- उन्होंने दूसरे बहुत से लोगों को भी रास्ते से भटका दिया, और ख़ुद भी (सच्चाई की) सीधी राह से भटकते फिरे।"  (77)



(तो देखो!) इसराईल की सन्तानों में से जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था, वे दाऊद [David] और मरयम के बेटे ईसा [Jesus] की ज़बान से ठुकरा दिए गए, क्योंकि उन्होंने आज्ञा नहीं मानी, वे बराबर मर्यादा तोड़ते रहे थे, (78


वे एक दूसरे को ग़लत काम करने से रोकते न थे। कितने ज़्यादा बुरे थे उनके कर्म! (79)


(ऐ रसूल), आप देखते हैं कि उन (यहूदियों) में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने आपको (मक्का के) विश्वास न करनेवालों के साथी व सहायक के रूप में जोड़ लिया है। कितना बुरा है जो कुछ उनकी जानों ने उनके (हिसाब-किताब के) लिए जमा कर रखा है: अल्लाह उनसे बहुत ग़ुस्सा है और वे यातना में ही फँसे रहेंगे। (80


अगर उन्होंने अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और  जो (किताब) उनके पास भेजी गयी उसपर विश्वास किया होता, तो उन्होंने कभी भी विश्वास न करनेवालों को अपना साथी व सहायक न बनाया होता, मगर उनमें अधिकतर लोग तो बाग़ी हैं।  (81)




(ऐ रसूल) यह पक्की बात है कि आप यहूदियों को और (अरब के) वे लोग जो दूसरे देवताओं को अल्लाह के साथ जोड़ते हैं उनको, ईमानवालों का सबसे बड़ा विरोधी पाएंगे; और ईमानवालों की दोस्ती में सबसे नज़दीक उन लोगों को पाएंगे, जो कहते हैं कि “वे ईसाई हैं,” क्योंकि उनके बीच ऐसे लोग हैं जो ज्ञान को सीखने में लगे रहते हैं और संयासी हैं। ये लोग घमंड नहीं करते,  (82)


और जब ये (ईसाई) उस (संदेश) को सुनते हैं जो अल्लाह के रसूल पर उतारा गया है, तो आप देखेंगे कि उनकी आँखें आँसुओं से छलकने लगती हैं क्योंकि वे उस बात की सच्चाई पहचान लेते हैं। वे पुकार उठते हैं, "हमारे रब! हमने विश्वास कर लिया, बस हमें भी इन्हीं में से लिख ले जो तेरी (सच्चाई की) गवाही देने वाले हैं।  (83


हम अल्लाह पर और जो सच्चाई हमारे पास पहुँची है, उस पर क्यों न विश्वास करें, जबकि हम आशा करते हैं कि हमारा रब हमें अच्छे व नेक इंसानों के दल में शामिल  करेगा?" (84


तो (देखो), इस बात को कहने पर अल्लाह ने उन्हें बदले में (जन्नत के) ऐसे बाग़ प्रदान किए, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जिनमें वे हमेशा रहेंगे: यह है उन लोगों का इनाम, जो अच्छा कर्म करते हैं।  (85


जो लोग सच्चाई को ठुकरा देते हैं और हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते हैं, वे (जहन्नम की) भड़कती आग (में पड़ने) वाले हैं। (86)


ऐ ईमानवालो! जो अच्छी चीज़ें अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध [हलाल] कर दी हैं, उन्हें 'हराम' [अवैध] न ठहरा लो ----- (रोक-टोक में) हद से आगे न बढ़ो: अल्लाह हद पार करनेवालों को पसंद नहीं करता। ------ (87)


मगर जो कुछ अल्लाह ने हलाल और अच्छी रोज़ी तुम्हें दे रखी है, उन्हें (बेझिझक) खाओ और अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे से) डरते रहो, जिसपर तुमने विश्वास कर लिया है।  (88


अल्लाह तुम्हारी उन क़समों के लिए तुम से हिसाब नहीं लेगा जो बे सिर-पैर की हों, हाँ जो क़सम सोच समझकर खायी गयी हो, उन पर ज़रूर तुम्हारी पकड़ होगी: अगर क़सम तोड़नी पड़े तो उसकी भरपाई [atonement] इस तरह होगी कि तुम्हें दस ग़रीब लोगों को खाना खिलाना होगा जैसा कि तुम आमतौर से अपने घर के लोगों को खिलाते हो, या उन्हें कपड़े देना होगा या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा ----- अगर कोई आदमी की हैसियत यह सब करने की न हो, तो उसे चाहिए कि वह तीन दिन तक रोज़े रखे। यही तुम्हारी क़समों को तोड़ने की भरपाई है---- (याद रखो) जब क़सम खा लो, तो उसे पूरा किया करो। इस तरह से अल्लाह अपनी आयतों को तुम्हारे सामने स्पष्ट करता है, ताकि तुम उसका शुक्र अदा करनेवाले बनो। (89)



ऐ ईमानवालो! शराब और जुआ, मूर्तिपूजा से जुड़ी (बलि चढ़ाने की)  रीतियाँ, जुए की तीरें --- ये सब बहुत बुरे और शैतानी काम हैं। तो इनसे बचकर रहो, ताकि तुम कामयाब हो सको।  (90)


शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच दुश्मनी और नफ़रत का भाव पैदा कर दे, और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे। तो क्या तुम (ऐसी बुरी आदतों को) नहीं छोड़ोगे? (91


और (देखो!) अल्लाह की आज्ञा मानो, उसके रसूल की आज्ञा मानो, और (बुराइयों से) बचते रहो: अगर तुमने (मुँह मोड़ा और) इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, तो जान लो कि हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी तो बस (हमारे संदेश को) साफ़ व स्पष्ट रूप से पहुँचा देने की है।  (92


जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया और अच्छे कर्म किए, तो (हराम चीज़ों के हुक्म से) पहले वे जो कुछ खा-पी चुके हों, उसके लिए उनपर कोई गुनाह नहीं है, शर्त यह है कि वे अल्लाह से डरते हुए (आगे इन चीज़ों से) दूर रहें, ईमान पर क़ायम रहें और अच्छे कर्म करते रहें, फिर (जब उन्हें किसी बात से रोका गया तो) अल्लाह से डरते हुए रुक गए, और (अल्लाह के हुक्म पर) विश्वास किया, इसी तरह (आगे भी) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहे और अच्छे कर्म करता रहे: अल्लाह अच्छा कर्म करने वालों को बहुत पसंद करता है। (93)



ऐ ईमानवालो! [हज की यात्रा के दौरान] अल्लाह उस शिकार के द्वारा तुम्हें ज़रूर परखेगा जब (जानवर) तुम्हारे हाथ और भाले [spear] की पहुँच तक आ जाए, ताकि अल्लाह को पता चल जाए कि कौन है जो (शिकार से हाथ रोक लेता है, और) उससे डरता है, हालाँकि वह उसे देख तक नहीं सकता: अब इस (हुक्म) के बाद भी अगर कोई हद पार करे, तो उसके लिए (आने वाली दुनिया में) दर्दनाक यातना होगी। (94


ऐ ईमानवालो! (हज के लिए जाते हुए) जब तुम इहराम [pilgrim sanctity] की हालत में रहो, तो तुम शिकार के जानवर को न मार डालो। अगर कोई जान-बूझकर उसे मार डाले, तो उसे इसका दंड देना होगा, और (वह यह होगा कि) उसने जो जानवर मारा हो, चौपायों में से ठीक उसी जैसा एक जानवर -- जिसका फ़ैसला तुम्हारे दो न्यायप्रिय आदमी कर दें -- काबा पहुँचाकर क़ुर्बान किया जाए; अगर यह संभव न हो, तो फिर भरपाई के रूप में ज़रूरतमंदों को (उसके दाम के बराबर) खाना खिलाए, या उनकी गिनती के बराबर रोज़े रखे, ताकि वह अपने किए का मज़ा चख ले। जो कुछ पहले हो चुका, उसे अल्लाह ने माफ़ कर दिया; लेकिन अगर किसी ने फिर ऐसा किया, तो अल्लाह उससे बदला लेगा: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, सख़्त बदला लेने वाला है।  (95)


तुम्हारे लिए समंदर (में पाए जाने वाले) जीव का शिकार करना और उसका खाना वैध [हलाल] है ----  तुम भी और दूसरे मुसाफ़िर भी इससे मज़े उठा सकते हैं ---- मगर (हज यात्रा में) जब तुम इहराम की हालत में हो, तो थल [land] का शिकार करना हराम है। अल्लाह (के हुक्म न मानने के नतीजे) से डरते रहो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा करके ले जाया जाएगा।  (96) 



अल्लाह ने पवित्र घर 'का'बा' को लोगों के लिए जीविका [support] (और अमन) का साधन बनाया (जहाँ हर जगह के लोग आकर व्यापार कर सकते हैं), और आदर के महीने, (हज के लिए) क़ुर्बानी के जानवर, और वे जानवर जिनके गले में पट्टे पड़े हुए हों: यह सब कुछ (अमन और सुरक्षा के साधन बनाए गए हैं)। तुम जान लो कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, और यह कि अल्लाह हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है। (97)


यह भी जान लो कि अल्लाह (हज की मर्यादाओं को तोड़ने की) सज़ा देने में बहुत कठोर है, मगर साथ ही, बहुत माफ़ करनेवाला, दयावान भी है। (98)


रसूल की ज़िम्मेदारी तो बस लोगों तक सन्देश पहुँचा देने की है: जो कुछ तुम सबके सामने करते हो और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो, अल्लाह सब जानता है।  (99)



[ऐ रसूल] आप कह दें, "बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ कभी बराबर नहीं हो सकती, चाहे बुरी चीज़ों की बहुतायत तुम्हें अच्छी ही क्यों न लगने लगे।" अतः ऐ समझ-बूझ रखनेवालो! अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरो, ताकि तुम कामयाब हो सको। (100


ऐ ईमानवालो! ऐसी चीज़ों के बारे में (खोद-खोदकर) न पूछा करो, कि अगर तुम्हें बता दी जाएं, तो हो सकता है कि उसके कारण तुम मुश्किल में पड़ जाओ ----- अगर तुम उन चीज़ों को ऐसे समय में पूछोगे, जबकि क़ुरआन उतारी जा रही हो, तो वे चीज़ें तुम्हें बता दी जाएँगी (जिससे तुम मुश्किल में फँस सकते हो) ---- (आगे से इससे बचो) क्योंकि अल्लाह ने उनके बारे में साफ़ कुछ नहीं कहा था: अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, सहनशील [forbearing] है। (101


(देखो!) तुमसे पहले, (इसराईल की संतानों में से) कुछ लोगों ने किसी चीज़ के बारे में ऐसे ही सवाल पूछे थे, मगर फिर (जवाब पर) अमल नहीं कर सके और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले होकर रह गए। (102)


अल्लाह ने तो मूर्तियों की भक्ति के लिए (आज़ाद छोड़े गए) किसी जानवर [ऊँट] को न तो 'बहीरा' ठहराया था, न 'सायबा', न 'वसीला' और न 'हाम'; मगर (सच्चाई से) इंकार करनेवालों ने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ लीं। उनमें अधिकतर लोग समझ-बूझ से काम नहीं लेते:  (103)


जब उनसे कहा जाता है कि, "आओ उस चीज़ [क़ुरआन] की ओर जो अल्लाह ने उतार भेजी है, और उस रसूल की तरफ़", तो वे कहते हैं, "जो तरीक़ा हमने अपने बाप-दादा से ग्रहण किया है, हमारे लिए तो वही काफ़ी है," हालाँकि उनके बाप-दादा न तो कुछ जानते थे, और न ही वे सही मार्ग पर थे।  (104


ऐ ईमानवालो!, तुम अपनी जानों के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार हो; अगर कोई दूसरा (सही रास्ते से) भटक जाता है, तो तुम्हें उस वक़्त तक उससे कोई नुक़सान नहीं होगा, जब तक तुम सही रास्ते पर रहोगे; तुम सबको (अंत में) अल्लाह के पास लौटकर जाना होगा, और वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम करते रहे होगे।  (105)



ऐ ईमानवालो! जब तुममें से किसी के मरने का समय आ जाए, तो तुममें से दो न्याय पसंद करनेवाले आदमी को चाहिए कि वसीयत [bequest] बनते समय गवाह के रूप में मौजूद रहें, या अगर तुम कहीं यात्रा पर गए हो और तुम्हारे मरने का समय क़रीब आ पहुँचे, (और मुसलमान गवाह न मिल पाए) तो दूसरे लोगों में से दो आदमी गवाह बन जाएँ। अगर तुम्हें (उनकी सच्चाई पर) कोई सन्देह हो, तो नमाज़ के बाद उन दोनों को रोक लो और उन्हें अल्लाह की क़समें खिलाओ कि (वे कहें), "हम किसी क़ीमत पर भी अपनी गवाही नहीं बेचेंगे, चाहे मामला किसी नज़दीकी रिश्तेदार का ही क्यों न हो। हम अल्लाह के लिए सच्ची गवाही को कभी नहीं छिपायेंगे, क्योंकि अगर हमने ऐसा किया, तो हम गुनाह करने वालों में शामिल हो जाएंगे।" (106)


अगर बाद में पता चल जाए कि उन दोनों ने (झूठी गवाही देकर) गुनाह कर डाला है, तो फिर उनकी जगह, जिन लोगों का हक़ [rights] मारा गया है, उनमें से दो आदमी खड़े हो जाएँ, क्योंकि उन्हें गवाही देने का ज़्यादा हक़ बनता है। फिर वे दोनों अल्लाह की क़सम खाकर कहें, "हमारी गवाही उन दोनों की गवाही से ज़्यादा सच्ची है। हमने जो कहा, सच के सिवा कुछ न कहा, अगर झूठ कहा हो, तो हम ज़ालिमों में से होंगे": (107


इस तरह (क़समें दिलाने) से इस बात की सम्भावना ज़्यादा है कि वे सच्ची और सही गवाही देंगे, या (कम से कम) डरेंगे कि उनकी क़समों को दूसरे गवाहों द्वारा बाद में झूठा साबित किया जा सकता है। (देखो!) अल्लाह का (हुक्म न मानने के नतीजे से) डरते रहो और सुनो; अल्लाह उन लोगों को सही मार्ग नहीं दिखाता, जो उसका क़ानून तोड़ते हैं। (108)



उस दिन जब अल्लाह सब रसूलों को इकट्ठा करेगा और फिर पूछेगा, "(अपने लोगों के बीच शिक्षा देने से) उनकी तरफ़ से तुम्हें क्या प्रतिक्रिया [response] मिली (यानी उनका अमल कैसा रहा)?" वे कहेंगे, "हमें इसकी कोई जानकारी नहीं: एक तू ही है जो छिपी बातों को भी जानता है।" (109


उसके बाद अल्लाह कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा [Jesus]! याद करो मेरे उस ख़ास करम [favour] को, जो मैंने तुम पर और तुम्हारी माँ पर किया: किस तरह मैंने पवित्र आत्मा [holy spirit] से तुम्हें ताक़त दी थी, कि जब तुम (छोटे बच्चे थे, तो) पालने में भी लोगों से बात करते थे और बड़े उम्र के आदमी के रूप में भी; फिर किस तरह मैंने तुम्हें किताब और समझ-बूझ, तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] सिखा दी थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मिट्टी से चिड़िये की शक्ल जैसी चीज़ बनाते, फिर उसमें फूँक मारते थे, तो वह मेरे आदेश से (सचमुच की) चिड़िया बन जाती थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, अंधे और कोढ़ी [leper] मरीज़ को बिल्कुल चंगा कर देते थे; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मरे हुए आदमी को फिर से ज़िंदा खड़ाकर देते थे; और याद करो किस तरह, मैंने इसराईल की संतानों को तुम्हें नुक़सान पहुँचाने से रोके रखा जब तुम उनके पास साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर पहुँचे थे, उनमें से जो विश्वास नहीं करनेवाले थे, वे कहने लगे, यह तो कुछ और नहीं, साफ़ जादूगरी है";  (110)


और (देखो!), किस तरह मैंने (ईसा के) शिष्यों [disciples] के दिल में यह बात डाली कि मुझ पर और मेरे रसूल पर विश्वास करो -----  तो उन्होंने कहा था, "हम विश्वास करते हैं, और (ऐ ख़ुदा) तू गवाह रहना कि हम अपने आपको (अल्लाह की भक्ति में) समर्पित करते हैं।" (111)



और (देखो!) जब (ईसा के) शिष्यों ने कहा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तुम्हारा रब हमलोगों के लिए आसमान से खाने से भरा थाल उतार सकता है?" ईसा ने कहा, "अल्लाह से डरो, (और ऐसी फ़रमाइश न करो) अगर तुम पक्का ईमान रखते हो।" (112)


वे बोले, "हम चाहते हैं कि उसमें से खाएँ; ताकि हमारे दिलों को संतोष मिल जाए; हम जान लें कि तूने जो कुछ बताया, वह सच था, और इस पर हम गवाह रहें।" (113)


तो मरयम के बेटे, ईसा ने दुआ की, "ऐ अल्लाह, हमारे रब! हम पर आसमान से खाने से भरा थाल उतार दे, जो ख़ुशी का एक त्योहार बन जाए ----हममें से पहले और हममें से आख़िरी (आदमी) के लिए----- और तेरी तरफ़ से एक निशानी हो। हमें रोज़ी दो, कि तू सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (114


अल्लाह ने कहा, "मैं तुम्हारे लिए (खाने का थाल) भेज दूँगा, मगर इसके बाद भी अगर किसी ने विश्वास नहीं किया, तो उसे सज़ा दी जाएगी, ऐसी सज़ा जो पूरी दुनिया में किसी और को नहीं दूँगा।" (115)



जब अल्लाह कहेगा, 'ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तूने लोगों से यह कहा था कि "अल्लाह के साथ मुझे और मेरी माँ को ख़ुदा बना लो?" ईसा कहेगा, "महिमावान है तू! मैं वह बात कभी नहीं कह सकता, जिसको कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है ------ अगर मैंने ऐसा कहा होगा, तो ज़रूर तुझे मालूम होगा: तू जानता है, जो कुछ मेरे मन में है, हालाँकि मैं नहीं जानता जो कुछ तेरे मन के भीतर है, केवल तू ही है जो छिपी हुई सारी बातों को जाननेवाला है -----  (116


मैंने उन लोगों को केवल वही बताया था, जिसका तूने मुझे आदेश दिया था: "अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जब तक मैं उनके बीच रहा, मैं उनके हाल पर नज़र रखता था। फिर जब से तूने मुझे उठा लिया, उस समय से तू ही अकेला उनकी निगरानी करता रहा है: तू तो सारी चीज़ों का गवाह है,  (117


और अगर तू उन्हें यातना देना चाहे, तो ये तो तेरे ही बन्दे हैं; अगर तू उन्हें माफ़ कर दे, तो तू सबसे ज़्यादा ताक़तवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (118


अल्लाह कहेगा, "यह वह दिन है कि सच्चे इंसानों को उनकी सच्चाई काम आएगी। उनके लिए (जन्नत में) ऐसे बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, उनमें वे हमेशा के लिए रहेंगे। अल्लाह उनसे ख़ुश हुआ और वे अल्लाह से ख़ुश हुए: यही सबसे बड़ी कामयाबी है।" (119)


आसमानों की और ज़मीन की और जो कुछ उनमें है, सब पर अल्लाह ही की बादशाही [नियंत्रण] है: उसे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (120)




नोट:


1: मवेशी यानी चरने वाले [Grazing] चौपाये, जैसे गाय, ऊँट, बकरी, भेड़ आदि या उनसे मिलते-जुलते चौपाये जैसे हिरन, नील गाय आदि।

3: इस्लाम से पहले अरब के बहुदेववादियों में एक रिवाज यह था कि कुछ लोग मिलकर ऊँट को ज़बह करते और फिर उसके मांस के बंटवारे के लिए जुए की तीरों का सहारा लेते, हर तीर पर मांस का हिस्सा लिखकर थैले में डाल दिया जाता था और फिर जिसके नाम की तीर निकलती, उसके मुताबिक़ उतना हिस्सा दे दिया जाता था। इसी तरह, अगर किसी काम के बारे में फ़ैसला करना होता कि किया जाए या नहीं, तो इसके लिए भी तीन तरह की बात यानी "करना है", "नहीं करना" और एक को ख़ाली रखकर तीरों को थैले में डाल दिया जाता, और फिर जिस विकल्प की तीर निकल जाती, उसे क़िस्मत का फ़ैसला मान लिया जाता था। 

4: शिकारी कुत्ता या बाज़ आदि अगर सधा हुआ [trained] हो, जो शिकार करके हलाल जानवर ख़ुद न खाए बल्कि अपने मालिक के लिए बचा रखे, तो ऐसा मांस हलाल [वैध] होगा अगर उसे शिकार के लिए छोड़ने से पहले अल्लाह का नाम लिया गया हो। 

5: किताबवाले यानी यहूदियों और ईसाइयों के यहाँ का ज़बह [slaughter] किया हुआ मांस खाना जायज़ [वैध] है, उसी तरह उनसे शादी-ब्याह भी जायज़ है। 

6: नमाज़ से पहले पाक होने को "वुज़ू" कहते हैं। वुज़ू के लिए आम तौर से हाथ, मुँह के साथ पाँव को टख़नों तक धोना होता है, मगर कुछ विद्वानों के अनुसार पाँव को धोने के बजाय उस पर गीला हाथ फेर देना [मसह] काफ़ी होता है। इसी तरह, पानी नहीं मिलने पर साफ़ मिट्टी से चेहरे और हाथ पर मलने को "तयम्मुम"[सूखा वुज़ू] कहते हैं।

8: आयत 1-2 में जो हुक्म दिया गया है, वह यहाँ फिर से शुरू हो रहा है। 

11: मक्का में मुसलमानों पर होनेवाले ज़ुल्म और उसके बाद बहुदेववादियों के हमलों के बावजूद अल्लाह ने मुसलमानों को बड़ी तबाही से बचा लिया और फिर उन्हें मज़बूत हालत में ला खड़ा किया। इसके साथ-साथ ख़ुद मुहम्मद (सल्ल) को कई बार मार डालने की साज़िश बहुदेववादियों ने भी की और यहूदियों ने भी, मगर अल्लाह ने हर बार उन्हें बचा लिया।

12: अल्लाह को "अच्छा क़र्ज़" देने का मतलब बिना दिखावा किए हुए किसी ग़रीब की मदद करना या कोई भलाई के काम में ख़र्च करना जिसका बदला अल्लाह कई गुना बढ़ाकर देगा। दूसरी जगह भी इसका ज़िक्र देखें 57:18; 64:17

13 : इसराइलियों द्वारा अल्लाह से किए गए पक्के वचन [Covenant] तोड़ देने की बात बाइबल में और क़ुरआन में कई जगहों पर आयी है, देखें 2: 63,83,93; 4:155; 7:169. यहूदियों को वचन तोड़ने की यह सज़ा मिली कि अल्लाह ने उन्हें अपने से दूर कर दिया।

14: वचन तोड़ने की सज़ा ईसाइयों को यह मिली कि उनके यहाँ ज़बरदस्त धार्मिक मतभेद के चलते कई गुट बन गए जिनमें आपस में काफ़ी ख़ून-ख़राबा और मारपीट हुई। 

15: बताया जाता है कि मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसले के लिए एक यहूदी मर्द और औरत के बीच ज़िना [Adultery] का मामला आया था, तोरात और बाइबल के हुक्म के मुताबिक़ यहूदियों को पता था कि पत्थर मारने की सज़ा होगी, मगर वे इस निर्धारित दंड को छुपा रहे थे, लेकिन आप (सल्ल) ने भी तोरात के मुताबिक़ यही सज़ा सुनायी और इस तरह यह बात सबके सामने आ गई। ऐसी और भी कई मिसालें हैं।

20: इसराइलियों पर अल्लाह ने बहुत से एहसान किए थे, जैसे फ़िरऔन की गुलामी से निजात, समंदर में रास्ता बनाना, पत्थरों से चश्मों का फूटना, रेगिस्तान में उनके खाने के लिए "मन्ना" व "सलवा" उतारना, उनके ऊपर बादल से छाया करना इत्यादि। 

21: फ़िलिस्तीन, सीरिया और जार्डन के इलाक़े को पवित्र सरज़मीन [Holy Land] इसलिए कहते हैं कि इस इलाक़े में बहुत सारे नबियों को अल्लाह ने समय-समय पर भेजा था। यहाँ उस घटना की तरफ़ इशारा है जब मूसा (अलै) इसराइल की संतानों को मिस्र से निकालकर इस पवित्र भूमि यानी फ़िलिस्तीन के नज़दीक बसाने के लिए लाए थे। उस समय शहर पर काफिरों की हुकूमत थी जिन्हें "अमालक़ा" [Amalekites] कहते थे, वे बड़े लम्बे-चौड़े डील-डौल के लोग थे जो शायद "आद" की क़ौम के वंशज थे। अल्लाह ने वादा किया था कि अमालक़ा से युद्ध में इसराइलियों की जीत होगी, मगर इसराइली अपने ख़तरनाक दिखनेवाले दुश्मन के डील-डौल से डरकर मुक़ाबले के लिए किसी तरह तैयार न हुए।

23: मूसा (अलै) ने इसराईल की संतानों को 12 क़बीले में बाँटा था, बताया जाता है कि हर क़बीले के सरदार को शहर में घुसने से पहले वहाँ का निरीक्षण करने के लिए भेजा गया था, उन्हीं में से दो सरदारों ने अपने लोगों की हिम्मत बढ़ायी थी जिनका नाम हज़रत यूशा’ [Joshua] और हज़रत कालिब [Caleb] बताया जाता है।

26: अल्लाह का हुक्म नहीं मानने के नतीजे में उन्हें दंड मिला, वे फ़िलिस्तीन में बसने के बजाय 40 साल तक सीना के रेगिस्तानों में मारे-मारे फिरे, उन्हें पीछे मिस्र जाने का भी रास्ता नहीं मिल सका। इस सज़ा के बावजूद उनके साथ चूंकि हज़रत मूसा, हारून, यूशा' और कालिब (अलै) थे, इसलिए अल्लाह ने उनपर बहुत सी मेहरबानियाँ की थीं, जैसे बादल से उनपर छाया करना, खाने के लिए "मन और सलवा" उतारना, पीने के लिए 12 चश्मों का फूटना आदि (2: 57-60). इसी रेगिस्तान में हज़रत हारून और मूसा (अलै) की मौत हुई, फिर हज़रत यूशा' नबी बने जिनके ज़माने में सीरिया के इलाक़े पर क़ब्ज़ा हुआ, फिर बाद में हज़रत सैमुएल के ज़माने में कुछ और इलाक़ों में जीत हुई, देखें 2: 142-152. इस तरह, वह पवित्र सरज़मीन इसराइलियों के क़ब्ज़े में अल्लाह के वादे के मुताबिक़ आ गयी। 

27: ऊपर की आयतों में अल्लाह ने इसराईल की संतानों से अमालीक़ की क़ौम से युद्ध करने का हुक्म दिया था जिसे उन लोगों ने नहीं माना, जबकि बाद में उन लोगों ने कई बार बिना किसी हिचकिचाहट के बेगुनाहों का क़त्ल किया। इस तरह, एक अच्छे मक़सद के लिए अल्लाह के हुक्म के बावजूद युद्ध नहीं करना और दुनिया के थोड़े से फ़ायदे के लिए किसी बेगुनाह का क़त्ल करना बिल्कुल ग़लत है। इस आयत में दुनिया के पहले क़त्ल का ज़िक्र है जबकि हज़रत आदम (अलै) के बेटे क़ाबील ने अपने बेगुनाह भाई हाबील को इस जलन की वजह से मार डाला था कि क्यों उसकी क़ुर्बानी क़बूल नहीं हुई जबकि उसके भाई की क़बूल हो गई। 

32: हालाँकि यह बात इसराईल की संतानों को संबोधित करके कही गई है, लेकिन यह बात हर दौर के हर आदमी पर लागू होती है।

33: जब कोई हथियारबंद आदमी या ऐसा कोई डाकू-लुटेरा दल आम लोगों (चाहे मुस्लिम हो या ग़ैर-मुस्लिम) पर हमला करता है और चारों तरफ फ़साद मचाता फिरता है, तो उनके लिए अपराध की संगीनी के मुताबिक़ यहाँ चार तरह की सज़ाएं बतायी गई हैं। विद्वानों ने हदीसों के हवाले से बताया है कि (i) अगर किसी डाकू ने बिना माल लूटे हुए किसी का क़त्ल कर दिया या बलात्कार किया, तो उसे भी क़त्ल किया जाए, (ii) अगर डाकू ने माल भी लूटा हो और क़त्ल भी किया हो, तो उसे सूली चढ़ाया जाए, (iii) अगर केवल माल लूटा हो, तो उसका दायाँ हाथ और बायाँ पाँव काट दिया जाए, और (iv) अगर किसी डाकू ने केवल डराया-घमकाया हो मगर लूटपाट न की हो, तो उसे या तो क़ैद किया जाए या देश-निकाला दिया जाए। 

34: अगर डाकू-लुटेरे पकड़े जाने से पहले अपने जुर्म से तौबा करते हुए हाकिम के सामने समर्पण [surrender] कर दें, तो उनकी सज़ा माफ़ हो जाएगी, मगर जिसका माल लूटा है, उसे वापस करना होगा। इसी तरह, जिसका क़त्ल किया हो, उसके वारिसों को जान के बदले हरजाना देना होगा। 

35:  अल्लाह के नज़दीक पहुँचने का ज़रिया [वसीला] वह नेक और अच्छे कर्म हैं जो अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किए जाएं। अल्लाह के रास्ते में जी-तोड़ संघर्ष करने को "जिहाद" कहते हैं, वह चाहे दुश्मनों से अपने बचाव में लड़कर हो या अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए हो। 

39: चोरी की सज़ा हाथ काटना बताया गया है, मगर इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ इस सज़ा के लिए कुछ कड़ी शर्तें हैं: जैसे कि चोर बालिग़ और होशमंद आदमी हो जो जानता हो कि चोरी करना मना है, जुर्म को साबित करना होगा, चाहे मुजरिम अपना जुर्म स्वीकार कर ले या कम से कम दो भरोसेमंद आदमियों की चश्मदीद गवाही हो, जब एक बड़ी रक़म या कोई  क़ीमती सामान चोरी हो जाए, क़ानून के हिसाब से कम से कम 3 दिरहम (3 ग्राम चांदी) या आम तौर से 1/4 दिनार (1 ग्राम सोना) के बराबर क़ीमत का सामान चोरी हुआ हो, और सामान का मालिक उसका दावा करे, तब यह सज़ा दी जा सकती है। अगर चोर सच्चे दिल से अपनी बुराई की तौबा कर ले और फिर कभी चोरी न करने की ठान ले, तो अल्लाह आख़िरत में उसके गुनाह माफ़ कर देगा। मगर याद रहे, दुनिया में मिलने वाली सज़ा उसे ज़रूर मिलेगी।

यह भी ध्यान देने की बात है कि यह सज़ा ऐसे देश में लागू नहीं हो सकती है जहाँ मुसलमानों की हुकूमत नहीं है और न ही ऐसे मुस्लिम देश में जहाँ शरीअत के नियम पूरी तरह लागू नहीं हैं। इसके अलावा यह सज़ा उसी समाज में लागू होगी जहाँ ग़रीबों की ज़रूरतें ज़कात और दान आदि से पूरी की जाती हैं और जहाँ चोरी मजबूरी में नहीं बल्कि इच्छा से की गयी हो। यहाँ यह बताना उचित होगा कि इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर ने यह सज़ा एक साल तक तब स्थगित कर दी थी जब देश में अकाल पड़ा हुआ था।

41: यहाँ से आयत 50 तक कही गयी बातों के पीछे वे घटनाएं हैं जो मदीना के कुछ यहूदियों से जुड़ी हुई हैं। उनमें से एक घटना (आयत 41-44) यह थी कि ख़ैबर के आसपास रहनेवाले दो शादी-शुदा यहूदी मर्द और औरत ने एक-दूसरे से "ज़िना" [नाजायज़ सेक्स] किया और मदीना के कुछ यहूदी इस मामले को मुहम्मद (सल्ल) के पास  फ़ैसला कराने के लिए इस उम्मीद पर लाए कि हो सकता है कि आप (सल्ल) कुछ हल्की सज़ा देंगे, जबकि तोरात के मुताबिक़ इस जुर्म के लिए पत्थर मारने की सज़ा थी। उन्हें यह सिखाकर भेजा गया था कि अगर हल्की सज़ा दें तो मान लेना और अगर वही पत्थर मारने वाली सज़ा दें तो मत मानना। जब आप (सल्ल) ने यहूदी विद्वानों से पूछताछ की, तो पता चला कि उनके विद्वान तोरात के आदेशों में रिश्वत लेकर फेर-बदल कर डालते हैं और ज़रूरत के अनुसार ग़लत तरीक़े से कुछ का कुछ मतलब निकाल लेते हैं, इस तरह, तोरात के साफ़ आदेश के होते हुए भी उन लोगों ने ऐसे जुर्म के लिए पत्थर मारने के बजाए कोड़ा मारने या मंह काला कर देने की सज़ा देनी शुरू कर दी, खासकर तब, जबकि मामला समाज के बड़े आदमी से जुड़ा हो। फिर जब एक यहूदी विद्वान ने मान लिया कि तोरात में इस जुर्म के लिए पत्थर से मार देने की सज़ा है, तो मुहम्मद (सल्ल) ने भी इस मामले में उन्हें वही सज़ा सुनायी जो तोरात के मुताबिक़ थी। 

45: मदीना में यहूदियों के दो क़बीले थे: बनु नज़ीर और बनु क़ुरैज़ा। बनु नज़ीर क़बीला ज़्यादार मालदार और ताक़तवर था, इसलिए उन लोगों ने क़त्ल से जुड़े हुए मामले में अपने मन-मर्ज़ी के नियम बना लिए थे, उस नियम के अनुसार, अगर बनु नज़ीर के क़बीले के किसी आदमी ने बनु क़ुरैज़ा के आदमी को क़त्ल किया, तो जान के बदले जान [क़सास] नहीं देनी होगी, केवल "ख़ून-बहा" [हरजाना] देना होगा। लेकिन अगर बनु क़ुरैज़ा के किसी आदमी ने बनु नज़ीर के किसी आदमी को क़त्ल किया तो ‘जान के बदले जान’ भी ली जाएगी और ‘ख़ून-बहा’ भी लिया जाएगा और वह भी दुगना!   

48: हर ज़माने में मूल धर्म एक ही रहा है जिसमें हमेशा एक अल्लाह को मानने और अच्छा व नेक काम करने की शिक्षा दी जाती रही है, मगर हर युग की ज़रूरत और परिस्थिति के मुताबिक़ क़ानून [शरिअत] और ज़िंदगी जीने का तरीक़ा अलग-अलग रहा है। ज़्यादातर विद्वान तो यह मानते हैं कि क़ुरआन में जो क़ानून और तरीक़ा बताया गया है, वह चूँकि इस ज़माने की परिस्थिति के अनुसार है, इसलिए किताबवालों यानी यहूदियों और ईसाइयों के मामलों का फ़ैसला क़ुरआन के आदेशों के अनुसार ही होना चाहिए, हाँ कुछ निजी मामले जैसे शादी, तलाक़, इबादत आदि के तरीक़े उनके अपने नियमों के मुताबिक़ होने चाहिए। 

मगर कई विद्वान इसका मतलब यह बताते हैं कि किताबवालों के मामलों का फ़ैसला उनकी किताबों यानी तोरात [Torah] और इंजील [Gospel] के मुताबिक़ होना चाहिए, जैसा कि मुहम्मद (सल्ल) ने फ़ैसला किया था जिसका ज़िक्र आयत 41-43 में आया है। इस तरह अल्लाह ने भी नहीं चाहा कि दुनिया में एक ही समुदाय हो, बल्कि सभी अपने-अपने नियम-क़ायदे पर चल सकते हैं, मगर ध्यान देने की असल बात यहाँ यह है कि सभी समुदाय को आपस में इस बात पर मुक़ाबला करना चाहिए कि कौन है जो भलाई के कामों में आगे निकलता है।   

51: यहाँ मदीना के उन मुसलमानों से कहा गया है कि वे ऐसे यहूदियों और ईसाइयों को अपना साथी या संरक्षक न बनाएं जो उस समय मुसलमानों के खिलाफ़ दुश्मनी में लगे हुए थे, ख़ासकर यहूदियों ने तो मक्का के बुतपरस्तों [Pagans] के साथ भी सांठ-गांठ कर ली थी जबकि दूसरी तरफ़ उन लोगों ने मुसलमानों के साथ शांति-समझौता भी कर रखा था। ध्यान रहे कि इस आयत का मतलब यह नहीं है कि हर दौर के मुसलमानों को यहूदियों व ईसाइयों (या किसी और) से दोस्ती करने से मना किया गया है। बल्कि जब तक कोई ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के साथ युद्ध नहीं करता हो या उन पर कोई अत्याचार नहीं कर रहा हो, तब तक मुसलमानों को भी उनके साथ नर्मी के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए (60:8).

52: यहाँ मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के बारे में कहा गया है जो उहुद की जंग में मुसलमानों को नुक़सान उठाने के बाद यह सोचकर कि अब मुसलमान तबाह हो जाएंगे, मदद के लिए यहूदियों-ईसाइयों की तरफ़ लपके थे। यहाँ अल्लाह ने इशारा किया है कि हो सकता है कि मुसलमानों को जल्दी ही जीत मिल जाए, जो मक्का की मिलने वाली जीत (8 हिजरी/ 630 ई) की तरफ़ इशारा था। 

60: कुछ विद्वान मानते हैं कि वे सचमुच बंदर और सुअर की तरह बना दिए गए, और कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ बंदर और सुअर रूपक [metaphor] की तरह प्रयोग हुआ है। देखें 2:65

64: जब मदीना के यहूदियों ने मुहम्मद सल्ल के संदेश को मानने से इंकार कर दिया तो अल्लाह ने उनकी आंखें खोलने के लिए कुछ दिन उनकी रोज़ी में तंगी कर दी, उस पर यहूदियों ने कहा कि लगता है कि अल्लाह देने में कंजूसी कर रहा है, जबकि ख़ुद कंजूसी करने में यहूदी लोग मशहूर थे।

69: क़रीब-क़रीब यही बात 2: 62 में भी कही गई है, इसकी तुलना 22: 17 से भी करें, जहाँ कहा गया है कि क़यामत के दिन अल्लाह ईमान रखनेवालों, ईसाइयों, यहूदियों, साबई और मजूसियों के बीच फ़ैसला कर देगा। 

73: ईसाइयों में जो लोग Trinity के सिद्धांत में विश्वास रखते थे, उनकी यहाँ निंदा की गई है। इस सिद्धांत के अनुसार ख़ुदा में तीन अलग-अलग वजूद यानी ‘बाप (ख़ुदा), बेटा (ईसा) और ‘पवित्र आत्मा’ मिला हुआ है, और यह भी कहा जाता है कि तीनों मिलकर एक हैं।

78: यानी इसराईल की संतानों में से जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया था, उनकी हरकतों पर "ज़बूर [Psalms] और "बाइबल" [Gospel] में भी कड़े शब्दों में निंदा की गई है।

82: यहाँ अरब के उस ज़माने में रहनेवाले ईसाइयों का ज़िक्र है जिनमें काफ़ी लोग ज्ञान की खोज में लगे रहते थे, घमंड नहीं करते थे और उनमें से काफ़ी लोग दुनिया की चमक-दमक से दूर होकर संयासी थे। जब मुसलमानों पर मक्का में वहाँ के मुश्रिकों ने बहुत ज़ुल्म किए थे, उस वक़्त भी मुसलमानों के एक दल नें इथोपिया में जाकर ईसाई बादशाह "नजाशी" के यहाँ शरण ली थी। कुल मिलाकर ईसाइयों का रवैया मुसलमानों के प्रति यहूदियों की तुलना में कहीं अच्छा था।

83: मदीना में एक बार हब्शा [इथोपिया] से ईसाइयों का एक प्रतिनिधिमंडल आया था, उनके सामने जब क़ुरआन पढ़कर सुनायी गई, तो उन लोगों ने सच्चाई को पहचान लिया और उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। 

90: शराब को हराम किए जाने के क्रम की यह चौथी और आख़िरी आयत है, पहले 16: 67 में यह ज़िक्र है कि अल्लाह ने ऐसे फल पैदा किए हैं जिनके रस से तुम अपने लिए पीने की चीज़ें बनाते हो, फिर 2: 219 में कहा गया कि शराब और जुए में थोड़ा फ़ायदा तो है मगर इससे नुक़सान कहीं ज़्यादा है, उसके बाद 4:43 में लोगों को नशे की हालत में नमाज़ से दूर रहने को कहा गया, और अब यहाँ शराब, जुए और मूर्तिपूजा से जुड़ी जानवरों की बलि चढ़ाने और तीरों से उसके मांस बांटने की रीतियों से पूरी तरह से बचने को कहा गया है। 

94: हज की यात्रा में जब इहराम की हालत हो, तो थल पर हर तरह के शिकार करना हराम है, चाहे आसानी से हाथ आ जानेवाली चिड़ियों का शिकार हो या भाले या किसी हथियार से बड़े जानवर का शिकार।

95: अगर जान बचाने के लिए किसी जानवर का शिकर करना पड़े तो वह किया जा सकता है। अगर हज के यात्री ने जान-बूझकर शिकार कर लिया, तो फिर उसे भरपाई में मरे हुए जानवर की क़ीमत के बराबर का एक जानवर क़ुर्बान करना होगा, या उतनी क़ीमत के बराबर ग़रीबों को खिलाना होगा, और अगर यह न हो सके, तो फिर रोज़े रखने होंगे। रोज़े की गिनती का हिसाब हनफ़िया के अनुसार यह है कि "पौने दो सेर गेंहू की क़ीमत" के बराबर एक रोज़ा माना जाएगा।

100: बुरी या हराम चीज़ का चलन चाहे कितना ही हो जाए, मगर उसे आँख बंद करके नहीं अपना लेना चाहिए, क्योंकि बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ कभी बराबर नहीं हो सकती।

 102: कभी-कभी कोई बात साफ़-साफ़ जान-बूझकर नहीं बतायी जाती ताकि उन पर अमल करते वक़्त आसानी हो, मगर जब उसके बारे में खोद-खोदकर पूछा जाए, तो फिर उस पर अमल करते समय मुश्किल होती है। क़ुरआन में कई जगह पर पुरानी क़ौमों के क़िस्से आए हैं जहाँ उन लोगों ने किसी चीज़ के बारे में बहुत सारे सवाल पूछे और फिर उस पर अमल नहीं कर सके। देखें 2: 246-247 जब इसराइलियों ने अपने लिए एक राजा की माँग की और जब Saul को राजा बनाने का हुक्म हुआ तो लोग उसकी क्षमता पर सवाल उठाने लगे। इसी तरह, देखें 2: 67-71 जहाँ गाय को मारने की घटना का ज़िक्र है कि किस तरह इसराइलियों ने मूसा (अलै) से लगातार सवाल पूछे थे। 

103: अरब के बहुदेववादियों के बीच ऐसी मान्यताएं काफ़ी ज़माने से रही थीं, जहाँ कुछ ख़ास तरह के ऊँटों को वे लोग पवित्र समझकर उसे बुतों के लिए समर्पित कर देते थे और फिर न उसे खाते, न दूध निकालते और न ही उस पर सवारी करते, बल्कि उसे आज़ाद चरने के लिए छोड़ देते थे। "बहीरा" उस जानवर को कहते थे जिसके कान चीरकर उसका दूध किसी बुत के नाम समर्पित कर दिया जाता था। "सायबा" वैसा जानवर था जिसे किसी बुत के नाम करके आज़ाद छोड़ दिया जाता और फिर उससे किसी तरह का फ़ायदा उठाना हराम था। "वसीला" उस ऊँटनी को कहते थे जो लगातार मादा बच्चे जनती और बीच में कोई नर न होता। "हाम" उस नर ऊँट को कहते थे जिसके बच्चों के बच्चे हो चुके हों, उससे भी कोई काम न लेते हुए आज़ाद छोड़ दिया जाता था। 

105: समाज में अगर ढेर सारे लोग सही रास्ते से भटक जाएं, तो दूसरों को सुधारने से ज़्यादा पहले हर आदमी को अपनी फ़िक्र करनी चाहिए क्योंकि वह अपने कामों के लिए ही जवाबदेह होगा। जब लोगों में अपने आपको सुधारने की सोच पैदा होगी, तो समाज में ख़ुद ही सुधार आ जाएगा। 

106:  इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ कोई आदमी मरने से पहले किसी को अपनी संपत्ति में से ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई हिस्सा वसीयत में दे सकता है। चूँकि 4:11-12 में सभी वारिसों का हिस्सा बता दिया गया है, इसलिए विद्वानों की राय यह है कि वसीयत में केवल उन्हें ही दिया जा सकता है जो 4:11-12 में बताए गए वारिसों में नहीं हों।

इस आयत के पीछे एक कहानी बतायी जाती है। एक मुसलमान आदमी अपने दो ईसाई दोस्तों के साथ सीरिया व्यापार के लिए गया, वहाँ उसकी तबियत बिगड़ गई तो उसने अपने दोनों दोस्तों को वसीयत की कि मदीना जाकर मेरा सामान मेरे घरवालों को दे देना, उसके दोस्तों ने वापस आकर उसका सामान उसके वारिसों को दे दिया, मगर एक चांदी का प्याला जो काफ़ी क़ीमती था, ख़ुद अपने पास रख लिया। जब मरे हुए आदमी के वारिसों ने उस प्याले को उसके दोस्तों के पास देखा, तो उसे पहचानते हुए पूछताछ की, उनलोगों ने बताया कि यह प्याला उसने अपने दोस्त से ख़रीद लिया था, मगर वे इस पर कोई गवाह नहीं पेश कर पाए। फिर वारिसों की तरफ़ से दो आदमियों की गवाही पर वह प्याला उन ईसाई दोस्तों से लेकर सही वारिसों को दे दिया गया।  

109: हर रसूल अपनी-अपनी क़ौम के लोगों के लिए गवाही देंगे [4:41; 16: 89], मगर जब अल्लाह उनकी क़ौमों के अमल के बारे में पूछेंगे तो वे ख़ामोश रहेंगे क्योंकि अल्लाह को आदमी का ज़ाहिरी और छिपा हुआ हर अमल अच्छी तरह मालूम होगा।

110: यहाँ अल्लाह ने ईसा (अलै) को उन चमत्कारों [miracles] के बारे में याद दिलाया है जो वह अपनी क़ौम के सामने अल्लाह के हुक्म से दिखाया करते थे। उनके चमत्कारों का ज़िक्र बाइबल में भी है, उनमें से एक था "बच्चे की हालत में उनका बोलना" जिसका ज़िक्र 3: 46 और 19: 29-30 में भी आया है, मगर यह बात बाइबल में नहीं मिलती। 

116: हालाँकि ईसाइयों के "Trinity" यानी "तीन में से एक ख़ुदा" के सिद्धांत में हज़रत मरयम [Mary] को ट्रिनिटी का हिस्सा नहीं माना जाता है, मगर जिस तरह से हर एक चर्च में उनके पुतले और तस्वीरों को हज़रत ईसा (अलै) के साथ रखा जाता है और उन्हें इबादतों में प्रमुखता से शामिल किया जाता है, इसीलिए यह सवाल उठाया गया है।

117: यहाँ ईसा (अलै) को अल्लाह द्वारा उठाए जाने की तरफ़ इशारा है, देखें 3:54 का नोट।





सूरह 60: अल-मुमतहिना 

[जाँच-परख की गयी औरतें/ The Women Tested]


यह एक मदनी सूरह है जो कि हुदैबिया की संधि और मक्का की जीत के बीच की अवधि में उतरी थी। इसका नाम आयत 10 में वर्णन की गई एक घटना के हवाले से रखा गया है: औरतों से जुड़ी हुई कुछ रीतियों के बारे में निर्देश दिए गए, जैसे जो औरतें मक्का में अपने पतियों को छोड़कर और मुसलमान बनकर मदीना मुसलमानों के पास आ जाएं, या जो बीवियाँ मदीना छोड़कर मक्का चली जाएं, तो वैसे मामले को कैसे निपटाया जाना है (आयत 10-11). मुसलमानों को अल्लाह-रसूल और ईमानवालों के प्रति अपनी पूरी निष्ठा रखने का आदेश दिया गया (आयत 1-3, 7-9, 13) और इबराहीम अलै. की मिसाल दी गई है ताकि उनके उदाहरण को सामने रखकर सीखा जा सके (आयत 4-6). ग़ैर-मुस्लिमों के साथ भी नर्मी और इंसाफ़ के साथ बर्ताव करना चाहिए अगर वे मुसलमानों पर ज़ुल्म नहीं कर रहे हों (8-9). 

  


विषय:


1- 3:   दुश्मनों के साथ सुलूक 

 4- 6:  इबराहीम (अलै.) की मिसाल 

7- 9:  मेल-मिलाप अभी भी संभव है 

10-11: मक्का से आकर पनाह लेने वाली औरतें और छोड़कर जाने वाली बीवियाँ 

12:     ईमान रखने वाली औरतों के साथ व्यवहार

13:     दूसरे दुश्मनों के साथ व्यवहार 





 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ ईमानवालो! मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को अपना सहयोगी [Allies] न बना लो, कि उनके साथ दोस्ती का रिश्ता निभाने लग जाओ, जबकि जो सच्चाई तुम्हारे पास (रब की तरफ़ से) आयी है, उसे तो वे मानने से इंकार कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हें और (तुम्हारे) रसूल को केवल इसलिए (मक्का से) बाहर निकाल दिया कि तुमने अपने रब, अल्लाह पर विश्वास [ईमान] कर लिया? अगर तुम सचमुच मेरे रास्ते में संघर्ष [जिहाद] के लिए और मेरी ख़ुशी की तलाश में (घर से दूसरी जगह के लिए) निकले हो, तो फिर (अब) तुम चोरी-छिपे उनसे दोस्ती की बातें (क्यों) करते हो?-------(याद रहे) जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ सामने ज़ाहिर करते हो, मैं सब कुछ जानता हूँ-----तुम में से कोई भी अगर ऐसा करता है, तो सचमुच वह सीधे रास्ते से भटक गया है।  (1)


अगर वे तुम पर हावी हो जाएँ, तो (देखना) वे फिर से तुम्हारे दुश्मन बन जाएँगे और तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए अपने हाथ और ज़बान फैलाने लगेंगे; उनकी तो यह दिली ख़्वाहिश है कि तुम (एक अल्लाह में) ईमान [विश्वास] रखना छोड़ दो। (2)


क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद: वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (3)


तुम लोगों (की सीख) के लिए इबराहीम और उनके साथियों में एक अच्छा उदाहरण है, जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था,  "हम तुम (लोगों) का और जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, उन (सब) का त्याग करते हैं! हम तुम्हें मानने से साफ़ इंकार करते हैं! हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए दुश्मनी और नफ़रत पैदा हो चुकी है, और यह उस समय तक रहेगी जब तक कि तुम एक अल्लाह पर विश्वास न कर लो" -----हाँ, मगर इबराहीम ने अपने बाप से यह ज़रूर कहा था कि "मैं आपके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करूँगा, हालाँकि मैं आपको अल्लाह से बचा नहीं सकता"------[ईमानवालों ने दुआएं की], "ऐ रब! हमने तुझ पर ही भरोसा किया; तौबा के लिए हम तेरे ही सामने झुकते हैं; और तेरे ही पास अन्त में लौटकर हमें जाना है। (4)


ऐ हमारे रब! हमें विश्वास न करनेवालों के हाथों होने वाले दुर्व्यवहार का सामना करने (या आज़माइश) से बचा। ऐ रब! हमें माफ़ कर दे, सचमुच तू ही बेहद ताक़तवाला, और समझ-बूझवाला है।" (5)


सचमुच [ऐ ईमानवालो!], तुम्हारे लिए वे अच्छा उदाहरण हैं जिनके रास्ते पर तुम्हें चलना चाहिए, और हर उस आदमी के लिए भी वे अच्छा उदाहरण हैं जो अल्लाह और अंतिम दिन का डर रखता हो। अगर कोई उससे मुँह मोड़ता है, तो (याद रखो) अल्लाह (को किसी की ज़रूरत नहीं, वह) तो आत्मनिर्भर [Self-sufficing], और सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)


हो सकता है कि अल्लाह अब भी तुम और तुम्हारे मौजूदा दुश्मनों के बीच (कुछ समय बाद) प्रेम का भाव पैदा कर दे----- अल्लाह बहुत ज़्यादा ताक़तवाला, बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है------ (7)


और अल्लाह तुम्हें इस बात से नहीं रोकता कि तुम किसी के साथ अच्छा व्यवहार करो, और उसके साथ इंसाफ़ करो जिसने तुम से धर्म [Faith] के नाम पर युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया: अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है। (8)


मगर अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों को अपना दोस्त बनाने से रोकता है जिन्होंने धर्म के नाम पर तुम से युद्ध किया, तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हें निकलवाने में दूसरों की मदद की: तुममें से कोई भी अगर इन्हें अपना सहयोगी बनाता है, तो वह सचमुच ही ज़ालिमों में होगा। (9)


ऐ ईमानवालो! जब तुम्हारे पास (मक्का से) हिजरत [migration] करके ऐसी औरतें (मदीना में) आ जाएं जो यह दावा करती हों कि वे ईमानवाली हैं, तो तुम उन्हें जाँच-परख लिया करो---- यूँ तो अल्लाह उनके ईमान के बारे में अच्छी तरह जानता है---- और अगर तुम्हें उनके ईमान पर यक़ीन हो जाए, तो उन्हें विश्वास न करनेवालों [Disbelievers/ काफ़िरों] के पास वापस मत भेजो: ये औरतें (अब) उनके लिए जायज़ [lawful] बीवियां नहीं रह गयीं, और न ही अब वे काफ़िर [Disbelievers] मर्द, उनके जायज़ [lawful] पति होंगे। जो कुछ उन काफ़िर (पतियों) ने मेहर [bride-gift] के तौर पर (अपनी बीवी पर) ख़र्च किया हो, तुम उनके पतियों को उतना वापस कर दो-------अगर तुम उन (औरतों) से शादी करना चाहते हो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई बुराई की बात नहीं है, अगर तुम एक बार उन्हें मेहर अदा कर दो----और काफ़िर औरतों के साथ अब तुम ख़ुद भी शादी के बंधन को बनाए मत रखो। इनके लिए जो कुछ मेहर [bride-gift] तुमने अदा की थी, उसे काफ़िरों से मांग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने (अपनी बीवियों पर) ख़र्च किया हो, वह (तुम लोगों से) माँग लें। यह अल्लाह का आदेश है: वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है, और अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)


अगर तुम्हारी बीवियों में से कोई तुम्हें छोड़कर काफ़िरों [Disbelievers] के पास चली गयी हो (और उनसे मेहर की रक़म वापस मिलने की उम्मीद न हो), और फिर अगर तुम्हारे समुदाय के लोगों को (काफ़िरों से) जंग के बाद कुछ माल हाथ आ गया हो, तो उस (माल में) से उन (पतियों) को उतनी रक़म दे दो जितनी उन्होंने अपनी (छोड़कर गयी) बीवियों पर मेहर के तौर पर ख़र्च किया होगा। और (देखो!) अल्लाह का डर रखो, जिस पर तुम ईमान रखते हो। (11)


ऐ रसूल! जब ईमान रखनेवाली औरतें आपके पास आकर इस बात की क़सम खाएं कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] नहीं ठहराएँगी, न चोरी करेंगी, न किसी ग़ैर-मर्द के साथ मुँह काला [adultery] करेंगी, न अपने बच्चों की हत्या करेंगी, और न अपने हाथ और पैरों के बीच झूठी बातें गढ़ेंगी, (अर्थात, इस बात में झूठ नहीं कहेंगी कि उनके बच्चों का बाप कौन है), और न किसी सही चीज़ में आपके हुक्म को मानने से इंकार करेंगी, तो फिर आपको उनके द्वारा ली गयी निष्ठा की क़सम [बै'त] को स्वीकार कर लेना चाहिए, और उनके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करनी चाहिए: सचमुच अल्लाह बेहद माफ़ करनेवाला, बहुत दयावान है।  (12)


ऐ ईमानवालो! तुम ऐसे लोगों को अपना सहयोगी [Allies] न बनाओ, जिनसे अल्लाह नाराज़ है: वे आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत/ Hereafter] से कोई आशा नहीं रखते, यहाँ तक कि विश्वास न करने वाले [काफ़िरों] को उन लोगों (के दोबारा उठाए जाने) की भी कोई उम्मीद नहीं है, जो अपनी क़ब्रों में दफ़न हैं। (13)




नोट:


1: हुदैबिया की संधि (628 ई) के बाद उसकी शर्तें को मक्का के लोगों ने दो साल के अंदर ही तोड़ दिया था, जिसके चलते मुहम्मद (सल्ल) ने मक्का पर हमला करने की ख़ुफ़िया योजना बनाई थी।  मदीना के एक मुहाजिर हातिब बिन अबी बलतआ ने एक ख़ुफ़िया चिट्ठी मक्का के सरदारों के नाम लिखी जिसमें उन्होंने मदीना में चल रही हमले की तैयारियों की ख़बर दी थी, मगर उस चिट्ठी की भनक मुहम्मद (सल्ल) को हो गई और उसे रास्ते में ही पकड़ लिया गया। जब हातिब से पूछताछ हुई तो उन्होंने अपनी सफ़ाई में बताया कि असल में उनके परिवार के लोग और उनकी सम्पत्तियाँ मक्का में हैं, और उनका अब कोई और संबंंधी वहाँ मौजूद नहीं हैं,  इसलिए उन्हें लगा कि मक्का वालों को युद्ध की तैयारी की ख़बर दे देने से वे एहसान मानते हुए उनके परिवार को नुक़सान नहीं पहुँचाएंगे। 


4: हज़रत इबराहीम (अलै) ने शुरू में अपने बाबा की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करने का वादा ज़रूर किया था (14:41; 19:47; 26:86), मगर जैसा कि सूरह तौबा (9: 114) में आया है कि जब उन्हें पता चल गया कि उनके बाप एक अल्लाह पर विश्वास करने वाले नहीं हैं, तो फिर उन्होंने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया। 


7: यानी मक्का में बहुत से लोग जो अभी दुश्मन बने हुए हैं, उम्मीद है कि वे आगे चलकर सच्चाई पर विश्वास कर लेंगे और दोस्त बन जाएंगे, सो मक्का की जीत के बाद ऐसा ही हुआ। 


8: यहाँ साफ़ तौर से कहा गया है कि जो ग़ैर-मुस्लिम [Non-Muslims] ऐसे हैं जिन्होंने मुसलमानों के साथ न तो युद्ध लड़ा, न उन्हें उनके घरों से निकाल बाहर किया और न कोई तकलीफ़ पहुँचाई, तो उनके साथ तो अच्छे संबंध रखने के लिए अल्लाह मना नहीं करता, बल्कि उनके साथ तो भलाई और इंसाफ़ का सलूक करना ही चाहिए।


10: हुदैबिया की संधि में यह तय हुआ था कि अगर मक्का से कोई आदमी (मर्द) मुसलमान होकर मदीना आएगा तो उसे वापस मक्का भेज देना होगा। लेकिन अगर कोई औरत मदीना आती है, तो उसकी जाँच-पड़ताल करने के बाद अगर पाया गया कि सचमुच वह मुसलमान बनकर आयी है, तो उसे वापस मक्का नहीं भेजा जाएगा। चूँकि ऐसी औरतें अपने पति को छोड़कर आती थीं, इसलिए उनका निकाह ख़त्म हो जाता था, अब मुसलमानों को ऐसी औरतों के साथ निकाह करने की इजाज़त दे दी गई इस शर्त के साथ कि वह मेहर की रक़म अदा कर दें। चूँकि अभी मक्का के साथ संधि क़ायम थी, इसलिए यह हुक्म हुआ कि ऐसी औरतों के पुराने पतियों ने जो भी अपनी बीवियों पर ख़र्च किया था, उसको इस तरह से वापस कर दिया जाए कि जो मुसलमान इन औरतों से निकाह करे, वह उसके महर की रक़म उसके पुराने (काफ़िर) पति को अदा कर दे। 

 इसके साथ यह भी आदेश हो गया कि अब किसी मुसलमान के लिए काफ़िरों से शादी का संबंध रखना वैध नहीं होगा। इस तरह, मुसलमानों ने भी अपनी काफ़िर बीवियों को तलाक़ दे दिया और उन बीवियों ने जाकर (मक्का के) काफ़िर मर्दों से निकाह किया। मुसलमान मर्दों को भी यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी काफ़िर बीवियों पर ख़र्च की गई रक़म को अपनी बीवियों के नए पतियों से माँग लें। हालाँकि वे उनके (काफ़िर) पतियों से मेहर की रक़म वसूल नहीं कर पाए। 


13: कुछ विद्वानों के मुताबिक़ अल्लाह "यहूदियों" से नाराज़ है, और यह आयत मदीना के कुछ उन ग़रीब मुसलमानों के बारे में है जो थोड़े से धन की लालच में यहूदियों को मुसलमानों की योजनाओं के बारे में बता दिया करते थे। (देखें 58:14)

मदीना के कुछ यहूदी लोग आने वाली दुनिया [परलोक] पर विश्वास नहीं रखते थे, और मदीना के पाखंडियों का हाल भी वैसा ही था। यहूदियों ने जानते-बूझते मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का पैग़म्बर नहीं माना, और पाखंडी लोग जान-बूझकर उन्हें धोखा देते रहे। 





8H/630 AD


सूरह 66: अत-तहरीम 

[अवैध करना/ रोक लगाना/Prohibition]


यह एक मदनी सूरह है जिसमें पैग़म्बर सल्ल. की घरेलू ज़िंदगी के एक पह्लू पर चर्चा की गई है। इस सूरह में पैग़म्बर साहब की दो बीवियों की एक घटना के सिलसिले में आलोचना की गई है, जबकि उन पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो गया था (आयत 3-5). और सभी ईमानवालों को ज़ोर देकर कहा गया है कि वे अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकें, और अपने आपको और अपने परिवार के लोगों को जहन्नम की आग से बचाएं (आयत 6-8). सूरह के अंत में ईमान रखनेवाली औरतों (जैसे मरयम और फिरऔन की बीवी आसिया) और विश्वास न करने वाली औरतों (जैसे नूह और लूत अलै. की बीवियों) का उदाहरण दिया गया है (आयत 10-12), ताकि उनसे सबक़ सीखा जा सके।  




विषय:

01-05: रसूल और उनकी बीवियाँ 

06-07:  ईमानवालों को कड़ी चेतावनी

08     :  गुनाहों से तौबा करने का इनाम

09     :  विश्वास न करने वालों और पाखंडियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष 

10-12:  (सच्चाई पर) विश्वास करने वाली और विश्वास न करने वाली औरतों के उदाहरण





अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


ऐ रसूल! आप अपनी बीवियों को ख़ुश करने की इच्छा से, ऐसी चीज़ को क्यों अपने लिए हराम (Prohibit) करते हैं, जिसे अल्लाह ने आपके लिए हलाल [वैध/Lawful] ठहराया है? फिर भी, अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है: (1)  


(ऐ ईमानवालो!) अल्लाह ने अपने आदेश से तुम लोगों को (ऐसी) क़समों को तोड़ने का रास्ता बता दिया है------ (असल में) अल्लाह ही तुम्हारा मददगार है: वह सब कुछ जानता है, बहुत ज्ञानी है। (2)

 


(एक बार ऐसा हुआ कि) रसूल ने अपनी एक बीवी [हफ़्सा] से कोई राज़ की बात कही, फिर जब उस (बीवी) ने वह बात [दूसरी बीवी, आयशा को] बता दी और (फिर) अल्लाह ने उस (रसूल) को इसकी जानकारी दे दी, तो रसूल ने (हफ़्सा को) उस (राज़ की) बात का कुछ हिस्सा सुना दिया (जो उसने आयशा को बताया था), और बाक़ी बातें टाल गए। फिर जब रसूल ने अपनी उस बीवी [हफ़्सा] से राज़ खोलने के बारे में पूछताछ की, तो वह बोली, "आपको इसकी ख़बर किसने दी?" रसूल ने कहा, "मुझे उसी ने ख़बर दी जो सब कुछ जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (3)


अगर तुम दोनों (बीवियाँ) अल्लाह के सामने तौबा कर लो---- क्योंकि तुम्हारे दिल सच्चाई की जगह से हट गए हैं-----(तो यह बहुत अच्छा होगा); किन्तु अगर तुम उन (रसूल) के विरुद्ध एक-दूसरे की मदद करोगी, तो फिर (याद रखना कि) अल्लाह उनकी मदद करेगा, और जिबरील [Gabriel] और नेक ईमानवाले भी, और सारे फ़रिश्ते भी उनकी तरफ़ हो जाएंगे। (4)


अगर रसूल तुममें से किसी को तलाक़ देने का फ़ैसला करें, तो उनका रब बड़ी आसानी से, (तुम्हारे बदले) तुम से अच्छी बीवियाँ, उन्हें दे सकता है: बीवियाँ जो पूरी तरह अल्लाह पर समर्पित हों, पक्की ईमानवाली, आज्ञा मानने वाली, तौबा करने वाली, इबादत करने वाली और अल्लाह के रास्ते में सफ़र करने वाली (या रोज़ा रखनेवाली) हों, चाहे उनकी पहले शादी हो चुकी हो या कुँवारी हों। (5)

 


ऐ ईमान रखनेवालो! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन आदमी और पत्थर होंगे, जिस पर कठोर स्वभाव के मज़बूत फ़रिश्ते नियुक्त होते हैं जो अल्लाह के हुक्म को मानने से कभी इंकार नहीं करते, और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है: (6)


“तुम (लोग) जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, आज [क़यामत के दिन] कोई बहाने न बनाओ: तुम्हें तो उन्हीं कर्मों का बदला दिया जा रहा है जो कुछ तुम किया करते थे।"  (7)

 


ऐ ईमानवालो! अल्लाह के सामने सच्चे मन से (अपनी ग़लतियों की) तौबा करो, बहुत सम्भव है कि तुम्हारा रब तुम्हारी बुराइयों को तुम से दूर हटा दे और तुम्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जहां बहती हुई नहरें हों------- उस दिन अल्लाह अपने रसूल को और उनको जिन्होंने (रसूल की) बातों पर विश्वास किया, उन्हें अपमानित नहीं करेगा। और उनकी रौशनी [नूर] उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी, और वे कह रहे होंगे, "ऐ हमारे रब! हमारी रौशनियों को हमारे लिए पूरा कर दे और हमें माफ़ कर दें: तुझे तो हर चीज़ करने की ताक़त है।" (8

 


ऐ रसूल! (सच्चाई से) इंकार करने वालों और (मदीना के) पाखंडियों [Hypocrites] के ख़िलाफ़ जमकर संघर्ष करें, और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। उनका घर जहन्नम होगा, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (9)


अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करने वालों का उदाहरण पेश किया है: नूह [Noah] और लूत [Lot] की बीवियों ने हमारे दो बहुत ही नेक बंदों से शादी की थी, फिर उनके साथ विश्वासघात किया। मगर अल्लाह के मुक़ाबले में उनके पति उनकी कोई मदद नहीं कर सके: (उन बीवियों से) कह दिया गया, "दूसरों के साथ तुम दोनों भी (जहन्नम की) आग में दाख़िल हो जाओ।" (10)  


और ईमान रखनेवालों के लिए अल्लाह ने फ़िरऔन [Pharaoh] की बीवी की मिसाल पेश की है, जबकि उसने कहा, "ऐ मेरे रब! तू मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्मों से छुटकारा दे दे, और मुझे शैतानियाँ करने वालों से बचा ले।" (11)


और इमरान की बेटी मरयम [Mary] का उदाहरण भी है, जिसने अपनी इज़्ज़त बचा कर रखी थी, तो फिर हमने उसके अंदर अपनी रूह [Spirit] फूँक दी, उसने अपने रब की बातों और उसकी किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि की: वह सचमुच पूरी भक्ति से (अल्लाह की) आज्ञा माननेवालों में शामिल थी। (12)




नोट:


1: इस आयत के बारे में दो तरह की बातें बतायी जाती हैं। पहली यह कि मुहम्मद (सल्ल) ने मारिया नाम की अपनी एक दासी के साथ संबंध क़ायम किए थे, जिसके बारे में उनकी एक बीवी हफ़्सा (रज़ि) को पता चल गया जिससे वह नाराज़ हो गईं, मुहम्मद (सल्ल) ने यह क़सम खा ली कि अब वह उस दासी के साथ कोई संबंध नहीं रखेंगे और आपने यह बात राज़ रखने के लिए कहा था, लेकिन उनकी बीवी हफ्सा (रज़ि) ने उनकी दूसरी बीवी आयशा (रज़ि) को यह बात बता दी।

दूसरी बात यह कही जाती है कि आप (सल्ल) अपनी एक बीवी (ज़ैनब) के यहाँ शहद पिया करते थे, उस बीवी से जलन के कारण उनकी दूसरी बीवी हफ़्सा ने जान-बूझकर यह कहा कि आपके मुँह से गंदी महक आ रही है, फिर यह बात हफ़्सा (रज़ि) ने उनकी एक और बीवी आयशा (रज़ि) को भी बता दी, और उन्होंने भी मुँह महकने की झूठी बात कही। इस पर उन्होंने आगे शहद नहीं खाने की क़सम खा ली थी। 

मगर यह दोनों ही चीज़ें उनके लिए वैध [हलाल] थीं जिसे उन्होंने अपनी बीवियों को ख़ुश करने के लिए अपने ऊपर हराम [अवैध] करने की क़सम खा ली थी। 


2. ऐसी क़समों को तोड़ने का तरीक़ा सूरह मायदा में यह बताया गया है कि इसकी भरपाई के तौर पर 10 ग़रीबों को खाना खिलाना है, या उन्हें कपड़ा देना है, या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना है। अगर किसी के पास इतना पैसा नहीं है, तो उसे तीन दिन लगातार रोज़ा रखना चाहिए,  देखें 5: 89. 


6: जहन्नम की आग का ईंधन पत्थर भी होंगे, यानी वे पत्थर की मूर्तियाँ जिनकी पूजा की जाती थी। 


8: रौशनी [नूर] उनके आगे-आगे और दाहिनी तरफ़ फ़ैलने का वर्णन सूरह हदीद ( 57: 12)  में आया है, जो शायद उस समय होगा जब अंतिम फ़ैसले के लिए लोग पुल-सिरात से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर आदमी का ईमान उसके सामने रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा। ..... रौशनी को पूरा कर देने की दुआ से मतलब है कि रौशनी अंत तक बनी रहे। 


9: यह आयत 9: 73 से मिलती-जुलती है, सच्चाई से इंकार करने वालों के साथ जमकर संघर्ष करने को कहा गया है, यह दोनों तरह का हो सकता है, यानी बातचीत के द्वारा उन्हें अल्लाह का संदेश पहुँचाकर भी, और अगर वे लड़ें तो फिर लड़कर भी। मदीना के पाखंडियों के साथ भी कड़ी क़ानूनी कार्रवाई करने को कहा गया है। 


10: बताया जाता है कि नूह (अलै) की बीवी अपने पवित्र पति को दीवाना कहती थी और उनके राज़ दुश्मनों को बताया करती थीं। उसी तरह, लूत (अलै) की बीवी भी उनके दुश्मनों से मिली हुई थी, और उसी ने उनके घर आए हुए मेहमानों का पता बताया था। इस तरह दोनों ने अपने पतियों को धोखा दिया था।  


11: इसके विपरीत, जब मूसा (अलै) ने जादूगरों को चैलेंज में हरा दिया था, तो उस समय जादूगरों के साथ फ़िरऔन की बीवी, हज़रत आसिया भी ईमान ले आयी थीं जिसके नतीजे में फ़िरऔन ने उन पर भी बहुत ज़ुल्म किए थे, यहाँ उनके द्वारा की हुई दुआ को लिखा गया है। 


12: उसी "रूह" के फूँकने से ईसा (अलै) पैदा हुए थे, इसलिए उन्हें "रूहुल्लाह" कहा जाता है। 












9H/631 AD


सूरह 49: अल-हुजुरात

 [रहने के कमरे / The Private Rooms]

 

यह एक मदनी सूरह है, आयत 4 में मुहम्मद सल्ल. के रहने के कमरों के हवाले से इस सूरह का नाम पड़ा है। इस सूरह में रसूल या अपने लीडर के साथ किस तरह इज़्ज़त से पेश आना चाहिए, ईमानवालों को उसका सही तरीक़ा बताया गया है (1-5). इसके साथ-साथ यह भी बताया गया है कि आपस में भी उन्हें एक-दूसरे के साथ इज़्ज़त और भरोसे के साथ पेश आना चाहिए (9-12). इस सूरह में इंसानों की एकता पर ज़ोर दिया गया है और बताया गया है कि अल्लाह चाहता है कि इंसान आपस में शांति और सदभाव के साथ रहें (13). अरब मरुस्थल के देहाती लोगों की सोच में ईमान और अल्लाह के प्रति जो अक्खड़पन का रवैया पाया जाता था, उसकी निंदा की गई है (14-18). 

 

विषय:

01-05: ईमानवालों को अपने रसूल के साथ आदर से पेश आना चाहिए

06-08: ईमानवालों को छान-बीन करके समझदारी से काम लेना चाहिए

09-13: ईमानवालों के आपसी संबंध

14-18: अरब के देहाती लोगों की सोच की निंदा 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल की मौजूदगी में (अपनी बात पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए) आगे बढ़-बढ़कर बातें न किया करो----- और अल्लाह से डरते रहो: अल्लाह सब सुनता है, सब कुछ जानता है------ (1)

ऐ ईमानवालो!, अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न किया करो, और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से (ऊँची आवाज़ में) बातें करते हो, उस तरह उनसे ऊँची आवाज़ में बात न किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे (अच्छे) कर्म बर्बाद हो जाएँ और तुम्हें पता भी न चले। (2)

जो लोग अल्लाह के रसूल के सामने अपनी आवाज़ नीची रखते हैं, वही लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने (बुराइयों से) बचकर रहने के लिए परखकर चुन लिया है-----उन्हें (गुनाहों की) माफ़ी भी मिलेगी, और ज़बरदस्त इनाम भी ------ (3)

मगर [ऐ रसूल!], आपको जो लोग आपके कमरों [हुजरे] के बाहर से पुकारते हैं, उनमें से ज़्यादातर समझ-बूझ से काम नहीं लेते। (4)

(बजाय बाहर से पुकारने के) अगर वे धीरज रखते हुए उस समय तक इंतज़ार करते, जब तक कि आप ख़ुद ही बाहर निकलकर उनके पास आ जाते, तो यह उनके लिए बेहतर होता, वैसे अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)

ऐ ईमान रखनेवालो!, अगर (सही रास्ते से भटका हुआ) कोई बदमाश, तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए, तो पहले उसकी छानबीन कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम दूसरों को अनजाने में नुक़सान पहुँचा बैठो, और फिर अपने किए पर पछताते रहो,  (6)

और यह बात जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल मौजूद हैं: बहुत-से मामलों में अगर सचमुच वह तुम्हारी इच्छाओं को मान लें, तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। मगर अल्लाह ने तुम्हारे अंदर ईमान की मुहब्बत डाल दी है, और उसे तुम्हारे दिलों के लिए आकर्षक बनाया है; और (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र], गुनाह के काम, और आज्ञा न मानने जैसी चीज़ों को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बनाया है। ऐसे ही लोग हैं जो अल्लाह के दिखाए गए सही रास्ते पर हैं,  (7)

जो अल्लाह के फ़ज़ल [favours] और नेमत [blessing] का नतीजा है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (8)


अगर ईमानवालों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें, तो (ऐ ईमानवालो) तुम्हें उनके बीच सुलह कराने की कोशिश करनी चाहिए; अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर (साफ़ तौर पर) ज़ुल्म कर रहा हो, तो ज़ुल्म करनेवाले (गिरोह) के ख़िलाफ़ उस समय तक लड़ो, जब तक कि वे अल्लाह के हुक्म के सामने झुक न जाएं। फिर उनके बीच न्याय और बराबरी का ध्यान रखते हुए सुलह करा दो: अल्लाह बराबरी का इंसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है। (9)

ईमानवाले भाई-भाई होते हैं, अतः अपने दो भाईयों के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम पर दया की जा सके। (10)


ऐ ईमान रखनेवालो!, मर्दों के एक गिरोह को दूसरे (गिरोह के) मर्दों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ा रहे हैं), वे उनसे बेहतर हों, और औरतों के गिरोह को भी दूसरे (गिरोह की) औरतों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ायी जा रही हो) वे उनसे बेहतर हों; एक दूसरे को बुरी बातें न कहो; और न आपस में एक-दूसरे को चिढ़ाने वाले पुकारू नामों [nicknames] से बुलाओ। यह कितनी बुरी बात है कि कोई ईमान लाने के बाद भी "बदमाश" के नाम से जाना जाए! जो लोग अपने इस आचरण पर नहीं पछताते हैं, ऐसे लोग बहुत बुरा काम करते हैं। (11)

ऐ ईमानवालो! किसी चीज़ के बारे में पहले से ही बहुत सारी धारणाएं [assumptions] बनाने से बचा करो----- कुछ पूर्व-धारणाएं गुनाह होती हैं---- और एक दूसरे की जासूसी मत किया करो या लोगों की पीठ-पीछे बुराई न किया करो: क्या तुममें से कोई अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा? नहीं, बल्कि तुम उससे नफ़रत करोगे। अत: अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो: अल्लाह हमेशा (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)

लोगो! हमनें तुम सबको अकेले मर्द और अकेली औरत से पैदा किया, और तुम्हें नस्लों [क़ौमों] और क़बीलों में बाँट दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। अल्लाह की नज़र में तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़तवाला वह है, जो सबसे ज़्यादा अल्लाह से (डरते हुए) बुराइयों से बचने वाला है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (13)


रेगिस्तान में रहनेवाले अरबी (बद्‌दू) कहते हैं, "हम ईमान रखते हैं।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "तुम्हें (पक्का) ईमान नहीं है। सो तुम्हें अभी इतना ही कहना चाहिए, 'हम ने इस्लाम [अल्लाह के सामने समर्पण] को मान लिया है”, क्योंकि ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ है।’ अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानोगे, तो वह तुम्हारे किसी भी कर्म को कम करके नहीं आँकेगा: अल्लाह गुनाहों को बहुत माफ़ करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (14)

असल ईमानवाले वे हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल पर (दिल से) ईमान रखा, फिर किसी सन्देह में नहीं पड़े, और अपनी जान-माल और अपने लोगों के साथ अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया: (यक़ीन मानो) वही लोग हैं जो (अपने दावे में) सच्चे हैं। (15)

आप (बद्दुओं से) कहें, "क्या तुम ऐसा मानते हो कि तुम अल्लाह को अपने दीन [धर्म] के बारे में बताओगे, जबकि अल्लाह आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ जानता है, और उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है?” (16)

वे सोचते हैं कि इस्लाम क़ुबूल करके उन्होंने [ऐ रसूल] आप पर बड़ा एहसान किया है, आप कह दें, "ऐसा मत समझो कि इस्लाम क़ुबूल करके तुमने मुझ पर कोई एहसान कर दिया है; अगर तुम अपनी बात में पक्के हो, तो असल में तो अल्लाह है, जिसने तुम्हें ईमान वाला रास्ता दिखाकर तुम पर एहसान किया है।"  (17)

"अल्लाह आसमानों और ज़मीन के सारे छिपे हुए राज़ जानता है: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ देखता है।" (18)


नोट:

1: इसकी पहली पाँच आयतें एक ख़ास मौक़े पर उतरी थीं। मदीना में मुहम्मद (सल्ल) से अरब के कई क़बीलों के प्रतिनिधिमंडल मिलने के लिए आते रहते थे, आगे भी संबंध बना रहे, इसके लिए उनमें से  आप (सल्ल) किसी को उस क़बीले का अमीर बना देते थे। एक बार बनु तमीम के क़बीले के लोग मिलने आए, मगर आपने किसी को उनके लिए अमीर नहीं चुना, इस बीच, अबु बकर (रज़ि) ने अमीर के लिए एक नाम सुझाया, और उमर (रज़ि) ने दूसरा नाम सुझा दिया, और दोनों एक दूसरे से तेज़ आवाज़ में बहस करने लगे। इसी मौक़े पर यह आयतें उतरीं जिसमें मुहम्मद (सल्ल) की मौजूदगी में बात करने का सही तरीक़ा बताया गया है। 

4: तमीम के क़बीले के लोग दोपहर के समय मदीना आए थे, जब मुहम्मद (सल्ल)

आराम कर रहे थे, उसी समय उन लोगों ने आप (सल्ल) को उनके कमरे के बाहर से ही आवाज़ लगाना शुरू कर दिया, जिसके लिए इस आयत में मना किया गया है।  

6: वैसे तो यहाँ एक आम उसूल बताया गया है, मगर इस आयत के उतरने के पीछे एक घटना बतायी जाती है। क़रीब 5 हिजरी/ 627 ई. में मदीना के मुसलमानों और क़बीला बनु मस्तलिक़ के बीच एक युद्ध हुआ था, जिसमें हारने के बाद उस क़बीले ने इस्लाम क़बूल कर लिया और ज़कात देना मंज़ूर कर लिया था। जब मदीना से वलीद बिन अक़बा को ज़कात वसूल करने के लिए बनु मस्तलिक़ के पास भेजा गया, तो यह ख़बर सुनकर वहाँ शहर के दरवाज़े पर उस दूत के स्वागत के लिए बहुत से लोग जमा हो गए, किसी बदमाश ने शायद वलीद को बताया कि वे तुम्हें मारने के लिए जमा हैं, वलीद की उन लोगों से कुछ पुरानी दुश्मनी भी थी, इसलिए बिना ठीक से पता लगाए वह वहाँ से वापस आ गए और उन्होंने मुहम्मद (सल्ल) को इसके बारे में सूचित किया। अब युद्ध की स्थिति बन गई, मगर फिर, जब ठीक से पता लगाया गया तो यह बात ग़लत निकली और दोनों गुट आपस में लड़ने से बच गए। 

11: यहाँ "बदमाश" [mischief-maker] उसे कहा गया है जो ऊपर बतायी गई सारी बुरी हरकतें करके समाज में बुराई फैलाता हो, यह गुनाह के काम हैं और एक ईमानवाले के लिए तो बहुत ही ग़लत काम है। 

12: यानी बिना ठीक से जाँचे-परखे किसी के बारे में बुरी धारणाएं [बदगुमानी] बैठा लेना गुनाह है। किसी की कमी तलाश करने के लिए उसकी टोह में लगे रहना भी गुनाह का काम है, इसी तरह, पीठ पीछे किसी की बुराई करना तो ऐसा है जैसे अपने मरे भाई का गोश्त खाना! इन सब चीज़ों से बचना चाहिए। 

13: नस्ल और क़बीले केवल आदमी की पहचान के लिए है, इसके आधार पर किसी

की बड़ाई नहीं साबित होती, बल्कि असल इज़्ज़त और बड़ाई तो उसी की है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाता है। अल्लाह सब जानता है: आदमी की असली औक़ात [true-worth] भी और उसके मन में बैठे हुए विचारों को भी, (इसे भी देखें 50: 16). 

14: केवल मुँह से कह देने से कि हम मुसलमान हो गए, आदमी सचमुच का मुसलमान नहीं हो जाता, बल्कि उसमें सच्चा ईमान [belief] होना ज़रूरी है। बताया जाता है कि अरब में जब अकाल पड़ा तो बनु असद क़बीले के लोग मदीना आ गए और यह सोचकर कि उनकी हालत अच्छी हो जाएगी और उन्हें भी मुसलमानों जैसे अधिकार मिल जाएंगे, उन्होंने इस्लाम क़बूल तो कर लिया, लेकिन मन में रसूल की मुहब्बत नहीं बैठी थी और न ही उनके आदेशों को मानने के लिए वे मन से तैयार थे। । 



सूरह 9: अत-तौबा 

[गुनाहों पर पछतावा/ Repentance]


क़ुरआन में यही ऐसी सूरह है जो "अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है" से नहीं शुरू हुई है; कुछ विद्वानों की राय है कि सूरह 8 और सूरह 9 अलग-अलग नहीं, बल्कि असल में एक ही सूरह है जिसमें बात आगे बढ़ायी गई है। यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 104 से लिया गया है। यह एक घोषणा के साथ शुरू होती है जिसमें मक्का के बुतपरस्तों के साथ की गई संधि को तोड़ देने की नोटिस दी गई है, क्योंकि उन लोगों ने संधि की शर्तों को तोड़ दिया था। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा "तबूक के अभियान" में जाने की तैयारी और उसमें जाने वाले लोगों के चुनाव से संबंधित है, जो 631 ई./ 9 हिजरी में सख़्त गर्मी के मौसम में हुआ था। मदीना के पाखंडी लोग, और जो लोग युद्ध में किसी न किसी कारण से नहीं जा सके, और जिन लोगों ने रसूल के इस अभियान में उनको सहयोग नहीं दिया, ऐसे सभी लोगों की कड़ी निंदा की गई है। मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि "हुनैन की जंग" में कैसे शुरुआती हार के बाद अल्लाह ने ईमानवालों को जीत दिलायी और किस तरह अल्लाह ने मक्का से मदीना जाते समय अपने रसूल की बुतपरस्तों से रक्षा की। पूरी सूरह में अल्लाह के तौबा क़बूल करने की बात सामने आती है जिसके कारण इसका नाम "अत-तौबा" है। 


विषय:


01-02: शांति-समझौते से मुक्ति 

03-12: एक घोषणा 

13-24: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने का आहवान 

25-27: हुनैन की जंग में अल्लाह की मदद 

28  : घोषणा का नतीजा 

29-35: किताबवाले [यहूदी, ईसाई] लोगों के ख़िलाफ़ भी लड़ो 

36-37: आदर के महीनों के दौरान लड़ाई 

38-49: लड़ाई लड़ने के लिए बहाने बनाना 

50-57: पाखंडियों के ख़िलाफ़ ज़ोरदार हमला 

58-60: ग़रीबों को दिए जाने वाला माल [ज़कात/सदक़ा]

61-70: पाखंडियों की कड़ी निंदा (जारी) 

71-72: ईमानवालों को इनाम 

73-80: पाखंडियों [मुनाफिक़] की कड़ी निंदा (जारी) 

81-96: युद्ध में जाने से हिचकिचाने की निंदा 

97-99: अरब के देहाती लोगों का रवैया 

101-106: अरब के लोगों का रवैया (जारी) 

107-110: पाखंडियों ने फितना फैलाने के लिए एक मस्जिद बनाई 

111-112: ईमानवालों के साथ अल्लाह का सौदा 

113-116: बहुदेववादियों की माफ़ी के लिए कोई दुआ नहीं 

117-118: ईमानवालों की ग़लतियों को माफ़ करके अल्लाह ने रहम किया 

119-129: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ाई करना ईमानवालों का कर्तव्य है





[मुसलमानो!] तुमने जिन बहुदेववादियों [मुशरिकों/Idolaters] के साथ शांति-समझौता कर रखा था, अब अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से तुम उन (समझौतों) से मुक्त (किए जाते) हो ------ (1)


[ऐ बहुदेववादियो!] तुम (अरब की) इस धरती पर (अगले) चार महीने तक बिना रोक-टोक चल-फिर सकते हो (उसके बाद युद्ध की हालत शुरू हो जाएगी), मगर तुम्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि तुम अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकोगे, और यह भी कि जो लोग उसका आदेश मानने से इंकार करेंगे, अल्लाह उन्हें अपमानित करके रहेगा। (2)


बड़े हज के दिन, अल्लाह और उसके रसूल की ओर से सभी लोगों के लिए (एक घोषणा की जाएगी): "अल्लाह और उसके रसूल बहुदेववादियों (के साथ हुए समझौते की शर्तों को मानने) से अब आज़ाद हैं। [ऐ मुशरिको!], तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम (अपने ज़ुल्म से) तौबा कर लो; अगर तुम (अब भी) नहीं मानोगे, तो जान लो कि तुम अल्लाह की पकड़ से भाग नहीं सकते।" जिन लोगों ने (सच्चाई से) इंकार का रास्ता अपना लिया है, [ऐ रसूल!], आप उन्हें दर्दनाक यातना की ख़ुशख़बरी सुना दें।  (3)


हाँ, मुशरिकों में से वे लोग जिन्होंने तुम्हारे साथ किए गए शांति-समझौते की शर्तों को सही ढंग से माना, और तुम्हारे विरुद्ध (लड़ाई  में) किसी की सहायता नहीं की: तो उनके साथ हुए क़रार [Agreement] को निर्धारित अवधि ख़त्म होने तक पूरा करो। अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (4



जब वह (चार) महीने बीत जाएँ जिसमें जंग करने से रोका गया है, तो फिर उन मुशरिकों के साथ (जिन्होंने समझौते की शर्तों को तोड़ा है) जहाँ कहीं सामना हो (मक्का के पवित्र परिसर के अंदर या बाहर), उनका क़त्ल करो, उन्हें गिरफ़्तार कर लो, उनकी घेराबंदी कर दो, और हर निगरानी-चौकी पर उनकी ताक में बैठो; फिर अगर ऐसा हो कि वे (बुराइयों से) तौबा कर लें, पाबंदी से नमाज़ पढ़ें, और निर्धारित की हुई ज़कात दें, तो उन्हें उनके रास्ते जाने दो, कि सचमुच अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (5)


अगर मुशरिकों में से कोई भी आपसे शरण [पनाह /protection] माँगे, तो [ऐ रसूल!], आप उसे शरण दे दें, ताकि वह (अच्छी तरह) अल्लाह की वाणी सुन सके, फिर उसे ऐसी जगह पहुँचा दें जो उसके लिए सुरक्षित हो, क्योंकि ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें (अल्लाह के संदेश की सच्चाई का) ज्ञान नहीं है। (6)


ऐसे मुशरिकों [बहुदेववादियों] के साथ अल्लाह और उसके रसूल की कोई संधि कैसे हो सकती थी? हाँ, मगर जिन लोगों के साथ आपने पवित्र मस्जिद [काबा] के पास (हुदैबिया में) संधि की थी, जब तक वे उस (संधि की शर्तों) पर क़ायम रहते हैं, आप भी उन (शर्तों) पर क़ायम रहें; अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उससे डरते हुए ग़लत कामों से बचते हैं।  (7)


(कैसे), जबकि उनका हाल यह है कि अगर वे तुम्हारे ऊपर हावी हो जाएं, तो वे तुम्हारे साथ न तो किसी तरह के बंधन का मान रखेंगे, न किसी रिश्ते-नाते का, न किसी संधि का? वे अपनी ज़बान से तुम्हें ख़ुश करना चाहते हैं, मगर उनके दिल तुम्हारा विरोध करते रहते हैं और उनमें ज़्यादातर लोग (अच्छाई के) नियमों को तोड़ने वाले हैं।  (8)


उन लोगों ने मामूली से फ़ायदे के लिए अल्लाह के संदेश को बेच डाला है, और दूसरों को उसके मार्ग (पर चलने) से रोका है। कितने बुरे हैं काम उनके! (9)


ईमान रखनेवालों के साथ, न तो वे रिश्ते-नाते का, और न किसी संधि का कोई मान रखते हैं। यही वे लोग हैं जो (ज़ुल्म करते हुए) आक्रामक क़दम उठा रहे हैं। (10)


अगर वे अल्लाह के सामने (तौबा के लिए) झुक जाएं, पाबंदी से नमाज़ पढ़ें, और निर्धारित की हुई ज़कात दें, तो फिर वे तुम्हारे धर्म के भाई हैं: जो लोग जानना चाहते हैं, उन लोगों के लिए हम अपने संदेश (आयतें) स्पष्ट व खोलकर बता देते हैं। (11


लेकिन अगर वे तुम्हारे साथ समझौता होने के बाद अपनी प्रतिज्ञा तोड़ डालॆं और तुम्हारॆ दीन [धर्म] को बुरा-भला कहने लगॆं, तॊ फिर अधर्म (disbelief) कॆ सरदारों सॆ युद्ध करॊ ----- उन्हें प्रतिज्ञा से कोई मतलब नहीं है ---- ताकि वॆ (ज़ुल्म करने और प्रतिज्ञा तोड़ने) जैसे काम से रुक जाऐं। (12)


[मुसलमानो!], ऐसॆ लॊगॊं सॆ तुम क्यों नहीं लड़ॊगॆ जिन्हॊंनॆ अपनी ली हुई प्रतिज्ञाएं तोड़ डालीं, जिन्होंने अल्लाह के रसूल को निकाल बाहर करने की कोशिश की, पहले जिन्होंने तुम पर हमला किया? क्या तुम उनसे डरते हो? अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो असल में तो अल्लाह है जिसका डर तुम्हारे दिलों में होना चाहिए। (13)


उनसे (बेझिझक) लड़ो: अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें सज़ा देगा, वह उन्हें अपमानित कर देगा, और उन पर जीत हासिल करने में वह तुम्हारी मदद करेगा, वह ईमानवालों की (आहत) भावनाओं पर मरहम का काम करेगा, (14)


और उनके दिलों के अंदर के गु़स्से को मिटा देगा। फिर अल्लाह जिस पर चाहेगा, उस पर अपनी दया-दृष्टि डालेगा; अल्लाह सब जाननेवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (15


[मुसलमानो!], क्या तुम्हें लगता है कि तुम बिना परखे ही छोड़ दिए जाओगे, बिना अल्लाह द्वारा इस बात की पहचान किए हुए कि तुममें से कौन है जो उसके रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करेगा, और अल्लाह, उसके रसूल और दूसरे ईमानवालों को छोड़कर किसी और को अपना मददगार नहीं बनाएगा? तुम्हारे हर काम की अल्लाह पूरी ख़बर रखता है। (16)



यह मुशरिकों के लिए ठीक नहीं है कि (दिखावे के लिए) उनका झुकाव अल्लाह की इबादत की जगहों की ओर हो, जबकि वे स्वयं विश्वास न करने की गवाही दे रहे हैं: ऐसे लोगों के सारे कर्म बेकार हो जाएंगे और वे जहन्नम (की आग) में रहने वाले हैं। (17)


असल में अल्लाह की इबादत की जगहों को आबाद करने का हक़ तो केवल उन्हीं लोगों को होना चाहिए जो अल्लाह और अंतिम दिन पर विश्वास रखते हों, जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हों, निर्धारित ज़कात देते हों और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते हों: ऐसे ही लोग सीधा मार्ग पाने वालों में शामिल होने की उम्मीद कर सकते हैं।  (18)


क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और पवित्र मस्जिद [काबा] के इंतिजा़म करने को उस आदमी के कर्मों के बराबर ठहरा लिया है, जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है और अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करता है? अल्लाह की नज़र में वे बराबर नहीं हैं। अल्लाह (ज़ुल्म करनेवाले) ऐसे जाहिलों को सही रास्ता नहीं दिखाता है। (19)


जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया, (मक्का से घर-बार छोड़कर) हिजरत करके (मदीना) चले गए, और अल्लाह के रास्ते में अपने मालों और अपनी जानों से कड़ा संघर्ष [जिहाद] किया, उनका दर्जा अल्लाह की नज़र में कहीं ऊँचा है; यही लोग हैं जो कामयाब होंगे; (20)


उनका रब उन्हें अपनी रहमत और प्रसन्नता की ख़ुशख़बरी सुनाता है, उनके लिए (जन्नत के) बाग़ों में कभी न ख़त्म होने वाला आनंद होगा (21)


और जहां वे हमेशा-हमेशा रहेंगे: सचमुच अल्लाह के पास (उनके लिए) बड़ा भारी इनाम है। (22)



ऐ ईमानवालो! अपने बाप और अपने भाइयों के साथ कोई गठबंधन न करो, अगर वे (सच्चाई पर) ईमान रखने के बजाय इंकार पर अड़े रहना पसंद करते हैं: तुममें से जो कोई ऐसा करता है, वह ग़लत काम कर रहा है। (23


(ऐ रसूल!) आप (मुसलमानों से) कह दें, "तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवियाँ, तुम्हारे रिश्ते-नातेवाले, तुम्हारी धन-दौलत जो तुमने कमायी हैं, वह कारोबार जिसके मंदा पड़ जाने का तुम्हें डर लगा रहता है, और रहने के घर जिन्हें तुम पसन्द करते हो, अगर ये सब तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल, और उसके रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करने से ज़्यादा प्यारे हैं, तो फिर इंतजा़र करो, यहाँ तक कि अल्लाह की भेजी हुई यातना तुम्हारे सामने आ जाए।” अल्लाह ऐसे लोगों को रास्ता नहीं दिखाता जो हर बंधन तोड़ डालते हैं।" (24)


(ऐ ईमानवालो!), अल्लाह कई बार युद्ध के मैदान में तुम्हारी मदद कर चुका है, (मक्का और तायफ़ की घाटी़ के बीच) हुनैन की लड़ाई के दिन भी, जब तुम अपनी बड़ी संख्या पर फूले हुए थे, मगर वह तुम्हारे कुछ काम न आयी: ज़मीन अपने फैलाव के बावजूद तुम पर तंग होती हुई महसूस हुई, और फिर तुम मैदान से पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए थे। (25)


तब अल्लाह ने अपने रसूल पर और ईमानवालों पर अपनी तरफ़ से दिल का सुकून [calm] उतारा, और ऐसी सेनाएँ उतारी जो दिखाई नहीं देती थीं। अल्लाह ने (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों को सज़ा दी ---- इंकार करनेवाले तो इसी लायक़ हैं ---- (26)


मगर अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, (उसकी तौबा क़बूल करते हुए) अपनी रहमत से लौट आता है। अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (27)


ऐ ईमानवालो!, जो लोग अल्लाह के साथ दूसरों को उसका साझेदार [Partner] ठहराते हैं, सचमुच वे (अपनी सोच में) अपवित्र हैं: इस साल के बाद उन्हें पवित्र मस्जिद [काबा] के नज़दीक मत आने दो। [मुसलमानो], अगर तुम्हें इस बात का डर है कि (उनके न आने से) तुम ग़रीब हो जाओगे, तो (याद रखो!), कि अगर अल्लाह ने चाहा, तो तुम्हें अपने फ़ज़ल [bounty] से मालामाल कर देगा: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझवाला है। (28)



ऐसे किताबवाले (यहूदी व ईसाई), जो अल्लाह और आख़िरी दिन [क़यामत] पर (सच्चे दिल से) विश्वास [ईमान] नहीं रखते, जो उन चीज़ों से (लोगों को) नहीं रोकते, जिनसे अल्लाह और उसके रसूल ने (उनकी किताब में) रोका है, जो इंसाफ़ के नियमों का पालन नहीं करते, उनसे भी उस समय तक लड़ो जब तक कि वे (अपनी सुरक्षा के बदले में) टैक्स [जज़िया] अदा न कर दें, और (आगे से देने के लिए) तैयार न हो जाएं। (29


यहूदी कहते थे, "उज़ैर (Ezra) अल्लाह का बेटा है," और ईसाई कहते थे, "मसीह (Messiah) अल्लाह का बेटा है": ये सब उनके अपने मुँह की बातें थीं, ये वही बातें दोहराते थे जो उनसे पहले के विश्वास न करनेवाले कहा करते थे। अल्लाह की मार हो इन पर! ये सीधे रास्ते से कितनी दूर जा पड़े हैं! (30)


उन्होंने अपने धर्म-गुरुओं [rabbis] और संत-महात्माओं [monks] को और साथ में मरयम के बेटे ईसा को भी अपना रब बना रखा है। मगर उन्हें तो केवल एक अल्लाह की बंदगी करने का आदेश दिया गया था: उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है; जिस किसी को वे अल्लाह का साझेदार [partner] ठहराते हैं, उनसे अल्लाह कहीं ज़्यादा ऊँचा है!  (31)


वे इस कोशिश में लगे हैं कि अल्लाह की रौशनी को अपने मुँह से (फूँक मारकर) बुझा दें, मगर अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी तरह फैलाये बिना नहीं रहेगा, चाहे विश्वास न करनेवालों को यह बात कितनी ही बुरी लगे। (32)


वही (अल्लाह) है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सच्चे दीन के साथ भेजा, यह दिखाने के लिए कि यह दीन सभी (दूसरे) धर्मों से बढ़कर है, चाहे बहुदेववादी इससे कितनी ही नफ़रत करें। (33)


ईमानवालो, बहुत-से धर्मगुरु और संत-महात्मा ऐसे हैं जो ग़लत तरीक़े से लोगों के माल हड़प लेते हैं और लोगों को अल्लाह के मार्ग से दूर हटा देते हैं। (ऐ रसूल), जो लोग अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने के बजाए, सोना और चाँदी की जमाख़ोरी में लगे रहते हैं, आप उनसे कह दें कि उन्हें बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी:  (34)


उस (क़यामत के) दिन जब (ज़ेवरों को) जहन्नम की आग में तपाया जाएगा, फिर उससे उनके माथों, पहलुओं और उनकी पीठों को दाग़ा जाएगा, फिर उनसे कहा जाएगा, "यही है वह जिसे तुमने अपने लिए जमा कर रखा था! जो कुछ तुम जमा करते रहे हो, अब उसका दर्द महसूस करो!" (35)



अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है कि (साल में) बारह महीने होते हैं----यह तो अल्लाह की किताब में उसी दिन से तय किया हुआ है, जिस दिन उसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया था ----- उसमें से चार महीने आदर के हैं: यही सही हिसाब है। इन महीनों में (मारपीट करके) अपनी जानों पर अत्याचार न करो ----- हालाँकि मुशरिकों से तुम किसी भी समय लड़ सकते हो, अगर वे तुम पर पहले हमला कर दें ---- याद रखो, अल्लाह उनके साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से (हर हाल में) बचते रहते हैं।  (36)


आदर के (चार) महीनों को उसकी जगह से आगे-पीछे हटा देना, आज्ञा न मानने की एक और निशानी है जिसके चलते वे लोग जो (अल्लाह के) आदेश पर ध्यान नहीं देते, वे सही रास्ते से भटका दिए जाते हैं: (अपनी इच्छा से) किसी साल तो उन (महीनों) का आदर करते हुए उसे अवैध [हराम] ठहरा लेते हैं (और युद्ध नहीं करते), और अगले साल उसको वैध [हलाल] करके (मारपीट को सही) ठहरा लेते हैं, ताकि ऊपर से यह दिखा सकें कि वे अल्लाह के द्वारा ठहराए हुए पवित्र महीनों की गिनती का सही तरीक़े से पालन करते हैं, मगर ऐसा करने में होता यह है कि जिस चीज़ को अल्लाह ने अवैध [Forbidden] ठहरा दिया है, वे उसे वैध [Permit] कर देते हैं। उनके द्वारा किए गए शैतानी कर्म, उनके लिए सुहावने बना दिए गए हैं: अल्लाह उसे सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो उसके आदेशों पर कोई ध्यान नहीं देता।  (37



ईमानवालो!, जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के रास्ते में लड़ाई के लिए निकलो", तो क्यों तुम्हारे पाँव बोझल होकर ज़मीन पकड़ लेते हैं? क्या तुम आनेवाली दुनिया [आख़िरत] के मुक़ाबले इस दुनिया की ज़िंदगी पर रीझ गए हो? आनेवाली दुनिया के मुक़ाबले इस दुनिया की खुशियाँ कितनी कम हैं! (38)


अगर तुम बाहर निकलकर लड़ाई नहीं लड़ोगे, तो अल्लाह तुम्हें कठोर सज़ा देगा और वह तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ला खड़ा करेगा, और तुम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकोगे: अल्लाह की ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है। (39)


अगर तुम अपने रसूल की मदद न भी करो, तो यह जान लो कि अल्लाह ने उस समय भी उनकी मदद की थी जब इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने उन्हेंं (घर से) निकाल बाहर किया था: जब उनमें से दो लोग (सौर की) गुफ़ा में (छिपे हुए) थे, उनमें एक तो रसूल [मुहम्मद सल्ल.] थे, जिन्होंने अपने साथी से कहा था, “चिंता न करो, अल्लाह हमारे साथ है", और फिर अल्लाह ने उन पर चैन व सुकून उतार भेजा था, उनकी मदद ऐसी सेनाओं से की थी जो तुम्हें दिखायी नहीं देती थी, और इस तरह विश्वास न करनेवालों की योजना को चौपट कर दिया था। अल्लाह की योजना तो बहुत ऊँची है: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (40)


अत: निकल खड़े हो, और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] करो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता चाहे तुम्हारे पास हल्के हथियार हों या भारी: यही तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानते। (41


(ऐ रसूल), वे [पाखंडी] आपके पीछे ज़रूर हो लेते, अगर उन्हें (युद्ध से) मिलने वाला फ़ायदा सामने दिखाई देता और सफ़र छोटा होता, मगर यात्रा उनके लिए कुछ ज़्यादा ही लम्बी (व कठिन) महसूस हुई। अब (देखो!) वे अल्लाह की (झूठी) क़समें खाएँगे, "अगर हम जा सकते, तो ज़रूर आपके साथ (युद्ध के लिए) निकल गए होते," मगर वे अपने आपको तबाही में डाल रहे हैं, क्योंकि अल्लाह जानता है कि वे झूठ बोल रहे हैं।  (42



[ऐ रसूल!] अल्लाह आपको माफ़ करता है! (मगर) इससे पहले कि आप जान पाते कि उनमें से कौन लोग हैं जो सच बोल रहे हैं, और कौन लोग हैं जो झूठे हैं, आपने उन्हें पहले ही (युद्ध में जाने के बजाए) घर पर रुके रहने की अनुमति क्यों दे दी? (43)


जो लोग अल्लाह और आख़िरी दिन [क़यामत] पर ईमान रखते हैं, वे कभी आपसे यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] करने से छूट दे दी जाए ----- अल्लाह जानता है कि कौन है जो सचमुच उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता है ------ (44)


केवल वही लोग आपसे घर पर रुके रहने की अनुमति माँगते हैं, जो अल्लाह पर और आख़िरी दिन पर ईमान नहीं रखते: उनके दिलों में सन्देह है, और इसीलिए वे डाँवाडोल हो रहे हैं। (45


अगर वे सचमुच आपके साथ (युद्ध में) निकलना चाहते, तो इसके लिए उन्होंने कुछ तैयारियाँ की होतीं, मगर अल्लाह ने उनके उठ खड़े होने को पसन्द नहीं किया, और उन्हें (अपनी जगह) पड़े रहने दिया। उनसे कहा गया, "बैठे रहने वाले (अपाहिज) लोगों के साथ तुम भी (घरों में) बैठे रहो।" (46)


अगर वे (लड़ने के लिए) आपके साथ निकले भी होते, तो उन लोगों ने आपको परेशानी के सिवा कुछ न दिया होता: वे तुम लोगों के बीच फूट डालने की कोशिश करते, यहाँ वहाँ उपद्रव मचाते फिरते, और तुममें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने उनकी बातें बड़े चाव से सुनी भी होतीं ------- अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि कौन लोग ज़ुल्म करने वाले हैं। (47)


यक़ीनन, उन्होंने इससे पहले भी कुछ मुद्दे उठाकर झमेला बढ़ाने की कोशिश की थी: वे आपके ख़िलाफ़ हर तरह की चालें चलने में लगे रहे, यहाँ तक कि सच्चाई जग ज़ाहिर हो गयी और उन लोगों के कुढ़ते रहने के बावजूद अल्लाह की इच्छा पूरी होकर रही।  (48)


उन (पाखंडियों) में से कुछ लोगों ने कहा, "मुझे घर पर ही रुके रहने की इजाज़त दे दीजिए: मुझे बहकने से रोक लीजिए।" मगर वे तो पहले ही बहक चुके हैं: जहन्नम विश्वास न करनेवालों को अपने घेरे में ले लेगी। (49)


(ऐ रसूल), अगर आपकी क़िस्मत से कुछ अच्छा हो, तो वह उन्हें दुखी कर देगा, लेकिन अगर आप पर कोई मुसीबत आ जाए, तो वे अपने आपसे कहेंगे, "इसीलिए तो हमने इस काम में सावधानी बरती थी", और वे ख़ुश होते हुए वहां से चल देंगे।  (50


कह दें, "हमारे साथ तो बस वही होना है जो अल्लाह ने हमारे बारे में फ़ैसला कर रखा है। वही हमारा मालिक है: ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।" (51


कह दें, "तुम हमारे साथ जिस घटना [यानी, क़त्ल हो जाने] की उम्मीद लगाए बैठे हो, वह हमारे लिए दो सबसे अच्छी चीज़ों (लड़ाई में जीत या शहीद होकर परलोक में मिलने वाले इनाम) को छोड़कर और क्या है? वैसे हम अल्लाह से यह उम्मीद रखते हैं कि वह तुम्हारे ऊपर कोई यातना उतार दे, ऐसा वह चाहे ख़ुद ही करे या फिर हमारे हाथों कराए। अत: अब (नतीजे का) इंतज़ार करो; हम भी (तुम्हारे साथ) इंतज़ार करते हैं।" (52)


कह दें, "(सच्चाई के रास्ते में) तुम चाहे ख़ुशी से दो या मन मारकर दो, तुम जो कुछ भी दोगे, वह स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि तुम आज्ञा माननेवाले लोग नहीं हो।" (53)


जो कुछ भी वे देते हैं, उसे स्वीकार कर लेने में बस एक ही रुकावट है, और वह यह कि वे अल्लाह और उसके रसूल के आदेश को मानने से इंकार करते हैं, नमाज़ पढ़ने आते हैं, तो बड़ी सुस्ती से, और कुछ देते भी हैं, तो बड़े बेमन से।  (54)


अतः (ऐ रसूल!), आप उनके माल और उनके बाल-बच्चों को देखकर प्रभावित न हो जाएं: अल्लाह का इरादा तो यह है कि इन्हीं (माल व औलाद) के द्वारा उन्हें इस दुनिया में सज़ा दे, और (सच्चाई पर) विश्वास न करने [कुफ्र] की हालत में ही उनकी जान निकले। (55)



वे अल्लाह की क़समें खाते हैं कि वे तुम्हीं [ईमानवालों] में से हैं, मगर (असल में) वे तुममें से नहीं हैं। वे बड़े डरपोक व बुज़दिल लोग हैं: (56)


अगर उन्हें कोई छिपने की जगह मिल जाए, या कोई गुफा या कोई ऐसी जगह जहाँ रेंगकर भी घुसा जा सके, तो वे उसकी ओर ऐसे दौड़ पड़ेंगे मानो रस्सी तोड़कर भागे जा रहे हों।  (57)


[ऐ रसूल], उनमें से कुछ लोग, ग़रीबों को दिए जाने वाले माल [ज़कात] के बँटवारे को लेकर आप पर सवाल उठाते हैं: अगर इसमें से उन्हें हिस्सा दे दिया जाता है, तो वे संतुष्ट हो जाते हैं, और अगर न दिया जाए तो भड़क जाते हैं।   (58)


काश कि वे उतने पर ही संतोष कर लेते जितना कि अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें दिया था, औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है ----- हमें अल्लाह अपने फ़ज़ल से (बहुत कुछ) देगा, और उसका रसूल भी------ (माफ़ी पाने की) उम्मीद में हम तो केवल अल्लाह के ही सामने झुकते हैं।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता!) (59)


यह माल (सदक़ा) तो बस ग़रीबों, ज़रूरतमंदों, ऐसे लोग जो इसके वसूली के काम में लगे हों, ऐसे लोग जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत है, ग़ुलामों को आज़ाद करने के लिए और ऐसे लोगों की मदद के लिए जो क़र्ज़ में डूबे हों, अल्लाह के रास्ते में ख़र्च के लिए और ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों की मदद के लिए है (जो अपने घर न पहुँच पा रहे हों)। यह अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है; अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (60)



कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो नबी का यह कहकर अपमान करते हैं, "वह तो (कान के कच्चे हैं) कुछ भी सुन लेंगे।" आप कह दें, "वह तो तुम्हारी ही भलाई के लिए सुनता है: वह अल्लाह पर विश्वास रखता है, ईमानवालों पर भरोसा करता है, और तुममें से जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए तो वह रहमत है।” जो लोग अल्लाह के रसूल का अपमान करते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी। (61)


(ईमानवालो), वे तुम्हें ख़ुश करने के लिए अल्लाह की क़समें खाते हैं: अगर वे सच्चे ईमानवाले होते, तो उनके लिए ज़्यादा उपयुक्त तो यह होता कि वे अल्लाह और उसके रसूल को मनाने व ख़ुश करने की कोशिश करते। (62)


क्या वे जानते नहीं कि जो कोई अल्लाह औऱ उसके रसूल का विरोध करेगा, वह जहन्नम की आग में जाएगा और वहीं हमेशा रहेगा? यही सबसे बड़ी बेइज़्ज़ती है। (63)



मुनाफ़िक़ों [पाखंडियों] को डर है कि कहीं कोई ऐसी सूरह न उतर जाए जो उनके दिलों के अंदर की छिपी हुई बात को सबके सामने ज़ाहिर कर दे ------ कह दें, "तुम मज़ाक़ उड़ाते रहो: जिस चीज़ का तुम्हें डर है, अल्लाह उसे सामने लाकर रहेगा!"------ (64)


फिर भी अगर आप उनसे पूछते, तो उनका जवाब ज़रूर यही होता, "हम तो बस ऐसे ही बातें कर रहे थे और आपस में हँसी-मज़ाक़ कर रहे थे।" कह दें, "क्या तुम अल्लाह, उसकी उतारी गयी आयतों, और उसके रसूल के बारे में हँसी-मज़ाक़ करते हो? (65


"तुम अपनी तरफ़ से सफ़ाई देने की कोशिश न करो; तुम (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने के बाद अब विश्वास करने से इंकार करते हो।" तुममें से कुछ को तो हम माफ़ कर सकते हैं, मगर बाक़ी बचे लोगों को तो हम ज़रूर सज़ा देंगे: वे मुजरिम लोग हैं।" (66


पाखंडी लोग [Hypocrites], चाहे मर्द हों या औरत, सब एक ही तरह के हैं: वे बुरे काम करने का हुक्म देते हैं, और भलाई के काम से रोकते हैं; उन्होंने (सच्चाई के रास्ते में ख़र्च करने से) अपने हाथों की मुठ्ठियाँ बन्द कर रखी हैं। वे अल्लाह को भुला बैठे हैं, सो अल्लाह ने भी उन पर ध्यान देना छोड़ दिया है। मुनाफ़िक़ लोग बड़े ही नाफ़रमान [Disobedient] लोग हैं। (67)


पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग चाहे मर्द हों या औरत, और (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करने वालों के लिए अल्लाह ने जहन्नम की आग का वादा कर रखा है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे: ये उनके लिए काफ़ी है। अल्लाह ने उन्हें ठुकरा दिया है, और एक कभी न ख़त्म होने वाली यातना उनके इंतज़ार में है।  (68)


"तुम भी उन्हीं की तरह हो, जो तुमसे पहले (यहाँ) रहते थे: वे (ताक़त में) तुमसे कहीं ज़्यादा मज़बूत थे, और धन-दौलत और औलाद में भी तुम से बढ़े हुए थे; उन्होंने भी इस दुनिया में अपने हिस्से की ज़िंदगी का मज़ा उठाया, जैसा कि तुम अभी उठा रहे हो; उनकी ही तरह, तुम भी बेकार बातों में उलझे हुए हो।" उनके किए गए कर्म बेकार चले गए, इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया में भी; ये वही लोग हैं जो आनेवाली ज़िंदगी में सब कुछ गँवा बैठेंगे।  (69)


क्या उन लोगों ने कभी अपने पूर्वजों की कहानियाँ नहीं सुनीं ---  नूह [Noah] के लोगो की, आद और समूद की, इबराहीम [Abraham] की, मदयनवालों [Midians] की और उन खंडहर बनी बस्तियों की? उनके रसूल उनके पास सच्चाई के स्पष्ट प्रमाण लेकर आए थे: अल्लाह ने उन्हें धोखे में नहीं डाला था, उन्होंने तो ख़ुद अपने आपको धोखा दिया था।  (70)


ईमान रखनेवाले, मर्द और औरत दोनों ही एक दूसरे की मदद करते हैं; वे भलाई के काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे कामों से रोकते हैं; वे पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और निर्धारित ज़कात अदा करते हैं; और वे अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा को मानते हैं। अल्लाह ऐसे लोगों को अपनी रहमत से माफ़ कर देगा: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बेहद समझ-बूझवाला है।  (71


ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों, दोनों से अल्लाह ने (जन्नत के) ऐसे बाग़ों का वादा कर रखा है जिनके नीचे नहरें बहती हैं और जहाँ उन्हें हमेशा के लिए रहना है, सदाबहार आनंद के बाग़ों के बीच अच्छे, सुकून के घरों में; और --- सबसे बढ़कर बात--- अल्लाह की ख़ुशी और रज़ामन्दी के साथ रहेंगे; यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (72)



ऐ नबी! विश्वास करने से इंकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों [पाखंडियों] के ख़िलाफ़ संघर्ष [जिहाद] करें और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। जहन्नम उनका आख़िरी ठिकाना है ----- और क्या ही बुरा ठिकाना है यह! (73)


वे अल्लाह की क़समें खाते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा, मगर असल में, उन्होंने बेधड़क हुक्म न मानने की बात कही थी, और ईमान लाने व अल्लाह के सामने झुकने के बाद, वे इसके खुले विरोधी बन गए; उन्होंने (रसूल को नुक़सान पहुँचाने की) कोशिश की, हालाँकि वे ऐसा कर नहीं पाए, ----- उनकी ईर्ष्या व बदले का कारण तो बस यह है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपने फ़ज़ल से उन्हें ख़ुशहाल कर दिया। उनके लिए बेहतर यही होगा कि फिर से (अल्लाह के आगे) झुककर तौबा कर लें: अगर वे मुँह मोड़ते हैं, तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत [Hereafter] में सज़ा देगा, और धरती पर कोई न होगा जो उन्हें बचा सके या उनकी मदद कर सके।  (74)



उनमें से कुछ लोगों ने अल्लाह के सामने यह कहते हुए वचन दिया था कि, "अगर अल्लाह अपने फ़ज़ल से कुछ हमें देगा, तो हम ज़रूर दान करेंगे, और नेक व अच्छे बनकर रहेंगे",  (75)


मगर जब अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़ल से सचमुच दे दिया, तो वे उसमें कंजूसी करने लगे और अपने वचन से फिर गए।  (76)


क्योंकि उन लोगों ने अल्लाह से किए गए वादे को तोड़ डाला, वह सारे झूठ जो वे बोलते रहे, इन सबके नतीजे में अल्लाह ने उनके दिलों में 'पाखंड' [Hypocrisy] को उस दिन तक के लिए बैठा दिया, जिस दिन कि वे अल्लाह से मिलेंगे।  (77)


क्या वे नहीं समझते कि अल्लाह उनके सारे राज़ और उनकी अकेले में की गयी कानाफूसियों को अच्छी तरह जानता है? और यह कि अल्लाह नज़रों से छिपी हुई [ग़ैब की] सारी बातों को जानता है? (78


ये (मुनाफ़िक़) वही लोग हैं, जो दिल खोलकर दान [सदक़ा] देनेवाले ईमानवालों को भी बुरा-भला कहते हैं, और उनको भी जो बड़ी मुश्किल से (अपनी आमदनी से) थोड़ा दान दे पाते हैं: वे ऐसे लोगों की हँसी उड़ाते हैं, मगर अल्लाह (की तरफ़ से) उनकी हँसी उड़ायी जाती है ------ उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है। (79)


[ऐ रसूल], आप ऐसे लोगों की माफ़ी के लिए दुआ करें या न करें, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा: अगर आप उनके लिए सत्तर बार भी दुआ करेंगे, तब भी अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा, यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल को मानने से इंकार कर दिया।  अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो उससे बग़ावत [rebel] कर बैठते हैं। (80)



अल्लाह के रसूल जब (तबूक की लड़ाई के लिए) निकल पड़े, तो जिन लोगों को (अपने घरों में) रुके रहने के लिए छोड़ दिया गया था, वे वहाँ अपने बैठे रहने पर बड़े ख़ुश थे; वे अल्लाह के रास्ते में अपने माल और जान के साथ संघर्ष [जिहाद] करने के विचार से ही चिढ़ते थे। वे एक दूसरे से कहते थे, "इतनी गर्मी में (युद्ध के लिए) न निकलो।" कह दें, "जहन्नम की आग इससे कहीं अधिक गर्म होगी," काश, कि वे समझ पाते (तो ऐसा न कहते)! (81


उन्हें अभी थोड़ा सा हँसने दो; जो कुछ उन्होंने किया है, उसके बदले में उन्हें बहुत रोना पड़ेगा।  (82)


अत: [ऐ रसूल], अगर अल्लाह आपको ऐसे लोगों के एक समूह के पास फिर से ले आए, जो आपके साथ (युद्ध में) जाने की अनुमति माँगते हों, तो कह देना, "तुम मेरे साथ कभी भी दुश्मनों से लड़ने के लिए नहीं जा सकते हो: तुमने पहली बार (जिस तरह) घर पर बैठे रहने को पसंद किया, तो अब उन्हीं के साथ (घरों में) बैठे रहो जो पीछे रह जाते हैं।" (83)


इन (पाखंडियों) में से अगर कोई मर जाए, तो (ऐ रसूल), इनमें से किसी के लिए आप (जनाज़े की) नमाज़ न पढ़ाएं, और न कभी उसकी क़ब्र पर (दुआ के लिए) खड़े हों: इन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करने से इंकार कर दिया और मरे इस हाल में कि बाग़ी बने रहे।  (84)


और (देखो), उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें मोहित न कर दे: अल्लाह तो यह चाहता है कि इन्हीं चीज़ों के द्वारा उन्हें इस संसार में सज़ा दे और यह कि उनकी जान निकलते समय भी वे (सच्चाई पर) विश्वास करनेवाले न हों।  (85)


जब (क़ुरआन की) कोई सूरह उतरती है (जिसमें कहा जाता है), "अल्लाह पर विश्वास करो और उसके रसूल के साथ मिलकर कड़ा संघर्ष [जिहाद] करो", तो उनके अमीर लोग यह कहते हुए आपसे (जिहाद में न जाने की) अनुमति माँगने लगते हैं कि, "दूसरे लोगों के साथ हमें भी यहीं रुके रहने के लिए छोड़ दिया जाए": (86)


वे इस बात को ज़्यादा पसंद करते हैं कि वे पीछे रुके रह जाने वालों [औरतों व अपाहिजों] के साथ रह जाएँ। (असल में) उनके दिलों को बंद करके ठप्पा लगा दिया गया है: इसलिए वे समझते नहीं हैं।  (87)


मगर, अल्लाह के रसूल और उनके साथ वे जो ईमान रखते हैं, अपने मालों और अपनी जानों के साथ जमकर संघर्ष [जिहाद] करते हैं, तो उन्हीं के लिए सबसे बेहतर चीज़ें होंगी; यही वे लोग हैं जो कामयाब होंगे। (88)


अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनमें बहती हुई नहरें होंगी और वे हमेशा वहीं रहेंगे। यही सबसे बड़ी जीत है।  (89)



अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] भी बहाने बनाते हुए आए, कि उन्हें भी (युद्ध में) जाने से छूट मिल जाए। जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल से झूठी बातें बनायीं, वे घरों में ठहरे रहे। उनमें से जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहे, उन्हें दर्दनाक सज़ा होगी,  (90)


मगर, जो लोग कमज़ोर हैं, बीमार हैं, या जिनके पास ख़र्च करने का कोई साधन नहीं है, ऐसे लोगों पर कोई दोष न होगा, शर्त यह है कि वे अल्लाह और उसके रसूल के लिए निष्ठा रखते हों ------ जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं, तो कोई कारण नहीं कि उन पर दोष लगाया जाए: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (91)


और उन लोगों पर भी कोई दोष न होगा जो [ऐ रसूल] आपके पास आए थे कि आप उनके (युद्ध में जाने के) लिए कोई सवारी का प्रबन्ध कर देते, जिन्हें आपने कहा था, "तुम्हारी सवारी के लिए अभी मेरे पास कुछ नहीं है": वे दुखी मन से रोते हुए वहाँ से चले गए कि उनके पास देने के लिए कुछ भी न था।  (92)


इल्ज़ाम तो बस उन पर है जो धन-दौलत के होते हुए भी आपसे (युद्ध में जाने से) छुटकारा पाना चाहते थे, और वे पीछे ठहरे हुए लोगों के साथ रुके रहने को प्राथमिकता देते थे। अल्लाह ने उनके दिलों को बंद करके मुहर [seal] लगा दी है: इसलिए वे समझते-बूझते नहीं। (93)



जब तुम (तबूक से युद्ध करके) अपने अभियान से वापस आओगे, तो [ऐ ईमानवालो], वे तुम्हारे पास बार-बार अपने बहानों के साथ आएंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म पर विश्वास नहीं करते: अल्लाह ने हमें तुम्हारे बारे में बता दिया है। अल्लाह और उसके रसूल अब तुम्हारे काम पर नज़र रखेंगे, और अंत में तुम्हें उस हस्ती के पास लौटना होगा, जो हर दिखायी देनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है। फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुमने किया होगा।" (94


जब तुम उनके पास वापस आओगे, तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो ----- सो तुम उन्हें अकेला छोड़ दो: वे घृणा के पात्र हैं, और उनका ठिकाना जहन्नम होगा, जो उनके कर्मों का बदला है -------- (95)


वे तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे ताकि तुम उन्हें स्वीकार कर लो, लेकिन (याद रखो!), अगर तुमने उन्हें स्वीकार कर भी लिया, तब भी अल्लाह ऐसे लोगों को नहीं अपनाता जो उससे बग़ावत कर देते हैं। (96)



अरब के देहाती लोग [बद्दू], विश्वास न करने [कुफ़्र] और पाखंड में सबसे ज़्यादा कट्टर हैं। इस बात की संभावना बहुत ही कम है कि अल्लाह ने अपने रसूल पर जो आदेश उतारे हैं, उनकी सीमाओं को वे ठीक ढंग से पहचान पाएंगे। अल्लाह सब (का हाल) जाननेवाला और सब कुछ समझनेवाला है। (97)


उनमें से कुछ अरब के देहाती ऐसे हैं कि वे जो कुछ ख़र्च करते हैं, उसे थोपी हुई चीज़ समझते हैं; वे इस इंतज़ार में हैं कि कब तुम्हारी क़िस्मत ख़राब होती है, मगर क़िस्मत तो असल में उनकी ख़राब होने वाली है। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है।  (98)


मगर अरब के देहातियों में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हैं और जो कुछ (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते है, उसे अल्लाह से और नज़दीक होने का, और रसूल की दुआएं हासिल करने का ज़रिया मानते हैं: ये सचमुच उन्हें अल्लाह के और नज़दीक कर देगा, और अल्लाह उन्हें अपनी रहमत में शामिल कर लेगा। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (99)



अल्लाह उन लोगों से बहुत ख़ुश होगा जो (मक्का से मदीना) हिजरत करके सबसे पहले गए [मुहाजिर], और (मदीना के वे लोग) जो उनके मददगार हुए [अंसार], और जो लोग अच्छाई के रास्ते में उनके पीछे-पीछे चले, और (उसी तरह) वे लोग भी अल्लाह से उतने ही ख़ुश होंगे: उसने उनके लिए बहती हुई नहरों के साथ बाग़ [Gardens] तैयार कर रखे हैं, जिसमें उन्हें हमेशा रहना है। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (100)



तुम्हारे आस-पास बसनेवाले कुछ देहाती लोग पाखंडी [मुनाफ़िक़] हैं, इसी तरह मदीना के भी कुछ लोग हैं ------ वे अपने पाखंड में अड़ियल हैं। [ऐ रसूल], आप उन्हें नहीं जानते, मगर हम उन्हें अच्छी तरह जानते हैं: हम उन्हें दो बार यातना देंगे, और उसके बाद (आख़िरत में) उन्हें दर्दनाक सज़ा का सामना करने के लिए लौटकर आना होगा।  (101)


और कुछ दूसरे लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाह करने को क़बूल किया है, उन्होंने कुछ अच्छे कर्म किए हैं और कुछ बुरे कर्म : अल्लाह उनकी तौबा [Repentance] क़बूल कर सकता है, क्योंकि अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और दयावान है।  (102)


[ऐ रसूल], इन लोगों के मन की सफ़ाई और शुद्धि के लिए आप उनकी संपत्तियों में से कुछ तोहफ़े [सदक़ा] स्वीकार कर लें (कि उनमें सुधार हो), और उनके लिए दुआ करें ----- आपकी दुआ उनके दिल को बड़ा सुकून पहुँचाएगी। अल्लाह (दुआएं) सुननेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (103)


क्या वे जानते नहीं कि वह अल्लाह है जो ख़ुद अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और उसके रास्ते में जो कुछ खुले दिल से दिया जाता है, उसे स्वीकार करता है? वह हमेशा (दिल से की गयी) तौबा को क़बूल करने के लिए तैयार रहता है, वह बेहद दयावान है।  (104)


[ऐ रसूल!] कह दें, "कर्म किए जाओ! अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देखेगा ------  उसका रसूल और ईमानवाले भी तुम्हारे कर्मों को देखेंगे------ फिर तुम लौटकर उसके पास जाओगे, जो हर दिखनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है, और वह सब बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो।" (105)


और कुछ दूसरे लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं, चाहे वह उन्हें सज़ा दे या उन पर दया कर दे। अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझवाला रखनेवाला है। (106)



और (मुनाफ़िक़ों में) कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने एक मस्जिद बनायी थी ------ इस विचार से कि नुक़सान पहुँचाएं, अविश्वास बढ़ाएं, और ईमानवालों के बीच फूट डालें -----वह उन लोगों के लिए एक 'निगरानी-चौकी' के रूप में हो, जो पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ाइयाँ लड़ चुके हों: वे इस तरह क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था," मगर अल्लाह गवाही देता है कि वे बिल्कुल झूठे हैं।  (107)


[ऐ रसूल!] आप कभी भी उस मस्जिद में (नमाज़ पढ़ने के लिए) खड़े न हों। बल्कि आपको ऐसी ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहिए, जिसकी बुनियाद पहले दिन से ही अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचने के इरादे से रखी गयी थी: इस मस्जिद में ऐसे लोग आते हैं, जो (अपने मन की) सफ़ाई को और बढ़ाना चाहते हैं------ अल्लाह ऐसे लोगों को पसन्द करता है जो अपने आपको शुद्ध [purify] करना चाहते हैं।  (108)


अब बताओ कौन अच्छा हुआ, वह जो अपनी इमारत की बुनियाद अल्लाह से डरते हुए और उसकी ख़ुशी हासिल करने के इरादे से रखता है, या वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद किसी खाई के टूटते हुए किनारे पर रखी हो, फिर वह उसे लिए-दिए लुढ़कती हुई जहन्नम की आग में जा गिरे? अल्लाह शैतानी करने वालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता:  (109


जो इमारत इन लोगों ने बनायी है, वह हमेशा उनके दिलों के अंदर उस समय तक संदेह पैदा करती रहेगी, जब तक कि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े न हो जाएँ। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (110)



अल्लाह ने जन्नत [Garden] के बदले में, ईमानवालों से उनकी जान और उनके माल ख़रीद लिए हैं ------ वे अल्लाह के रास्ते में लड़ते हैं: वे जान मारते भी हैं, और मारे भी जाते हैं---- यह अल्लाह का किया हुआ एक पक्का वादा है जो तौरात [Torah], इंजील [Gospel] और क़ुरआन में मौजूद है। अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला कौन हो सकता है? अतः जो सौदा तुमने उससे किया है, उस पर खु़शियाँ मनाओ: यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (111)


(ईमानवाले वो हैं), जो (गुनाहों से) तौबा के लिए अल्लाह के सामने झुकते हैं; उसकी बन्दगी और उसका (दिन-रात) गुणगान करते हैं; जो (सच की खोज में) घूमते रहते हैं; जो रुकू और सज्दे में (अल्लाह के आगे) अपने आपको झुकाते हैं; जो अच्छा काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे काम से रोकते हैं और अल्लाह की तय की हुई सीमाओं की निगरानी करते हैं। ऐसे ईमानवालों को ख़ुशख़बरी सुना दें।  (112)



यह बात नबी [Prophet] और ईमान रखनेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों [Idolaters] के लिए माफ़ी की दुआ करें ----- चाहे वे उनके नातेदार ही क्यों न हो ---- जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे (जहन्नम की) भड़कती आग में रहने वाले हैं:  (113)


इबराहीम ने अपने बाबा की माफ़ी के लिए जो दुआ की थी, वह इस कारण से थी कि उन्होंने अपने बाप से एक वादा कर लिया था, मगर एक बार जब उनकी समझ में आ गया कि उनके बाप अल्लाह (की सच्चाई) के दुश्मन हैं, तो फिर वह उनसे अलग हो गए। असल में, इबराहीम बड़े ही नर्म दिल, और बहुत सहनशील थे।  (114


अल्लाह ऐसा नहीं है कि लोगों को (ईमान का) सही रास्ता दिखा देने के बाद उन्हें भटकता छोड़ दे, जब तक कि वह उन्हें पूरी तरह साफ़-साफ़ बता न दे कि उन्हें किन चीज़ों से बचना चाहिए। अल्लाह के पास हर चीज़ की जानकारी है;  (115


आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के ही पास है; वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है; उसके सिवा तुम्हारा कोई दोस्त और मददगार नहीं है। (116)



अल्लाह ने अपने नबी [Prophet] पर और मुहाजिरों [Emigrants] और अंसार [Helpers] पर अपनी रहमत व ख़ास दया दृष्टि डाली, जिन्होंने ऐसी मुश्किल घड़ी में (तबूक के अभियान में नबी का) साथ दिया, जबकि उनमें से कुछ के दिल क़रीब-क़रीब डगमगा गए थे: फिर अल्लाह ने (माफ़ करते हुए) उनके हाल पर रहम किया; सचमुच वह उनके लिए बेहद उदार और मेहरबान था।  (117)


और वे तीन आदमी जो (घर पर) रुके रह गए थे: जब ज़मीन अपने पूरे फैलाव के बावजूद उन पर तंग हो गई थी, और जब वे ख़ुद अपनी जानों से तंग आ गए थे, और जब उन्हें समझ आ गया कि अल्लाह (की पकड़) से बचने के लिए उसकी शरण के सिवा कहीं कोई शरण नहीं मिल सकती है, फिर अल्लाह ने उन पर अपनी रहमत [Mercy] दिखायी, ताकि वे (उसकी ओर तौबा करते हुए) लौट आएँ। सचमुच अल्लाह हमेशा ग़लतियों को माफ़ करनेवाला, बेहद मेहरबान है।  (118)



ऐ ईमानवालो!, तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो: और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ।  (119)


मदीना के लोगों और उसके आसपास बसने वाले देहाती लोगों को अल्लाह के रसूल का साथ देने से अपने आपको न तो रोकना चाहिए था, और न ही उन्हें उस (रसूल) की जान से ज़्यादा अपनी जान की फ़िक्र करनी चाहिए थी: अल्लाह के रास्ते में (लड़ने वालों को) जब कभी प्यास लगती है, थकान होती है, या भूख सताती है, या जब वे कोई ऐसा क़दम उठाते हैं जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के, या किसी दुश्मन को कोई नुक़सान पहुँचाते हैं, तो ऐसे हर काम पर उनके कर्म-खाते में नेकी लिख ली जाती है----- अच्छा कर्म करने का बदला [reward], अल्लाह कभी बेकार नहीं जाने देता ------  (120)


अल्लाह के रास्ते में चाहे वे थो़ड़ा ख़र्च करें या ज़्यादा, या किसी पहाड़ की घाटी को पार कर लें, ये सारी चीज़े उनके हिसाब में लिख ली जाती हैं, ताकि अल्लाह उन्हें हर ऐसे काम का इनाम दे जो उनके बेहतरीन कर्मों के लिए तय है।  (121)



हाँ, यह बात ठीक नहीं होगी कि सब के सब ईमानवाले एक साथ (युद्ध के लिए) निकल खड़े हों: हर एक समुदाय [Group] में से लोगों का एक दल होना चाहिए जो बाहर निकलकर दीन [Religion] की सही समझ हासिल करे, ताकि वह अपने लोगों को सिखा सके जब वे (युद्ध से) लौटकर आएं और ताकि वे अपने आपको बुरे कामों से बचा सकें।  (122)


ऐ ईमानवालो! तुम उन विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] से लड़ो जो तुम्हारे आसपास फैले हुए हैं, और उन्हें लगना चाहिए कि तुम (जंग के लिए) मज़बूती से खड़े हो: यह जान लो कि अल्लाह उन लोगों के साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (123



जब भी कोई सूरह (अल्लाह की तरफ़ से) उतारी गई, तो उन (पाखंडियों) में से कुछ लोग कहते हैं, "क्या तुममें से किसी के भी ईमान में इससे मज़बूती आयी है?" निश्चय ही इससे विश्वास रखनेवालों [मोमिनों] का ईमान और भी मज़बूत हो जाता है, और वे (नये संदेश के आने की) ख़ुशियाँ मनाने लगते हैं,  (124)


रहे वे लोग जिनके दिलों में (ग़लती पर अड़े रहने का) रोग है, तो हर नई सूरह उनके इस अड़ियल रोग को और ज़्यादा बढ़ा देती है। (नतीजा यह है कि) वे विश्वास नहीं करते और इसी हाल में मर जाते हैं। (125)


क्या वे देखते नहीं कि हर साल वॆ एक या दो बार किसी न किसी आज़माईश [Test] में डाले जाते हैं? फिर भी न तो वे (गुनाहों से) तौबा करते हैं, और न कुछ सबक़ सीखते हैं।  (126)


जब कभी कोई सूरह उतरती [reveal] है, (और उसमें अगर पाखंडियों का ज़िक्र हो) तो वे (चौंककर) एक-दूसरे को देखते हैं, और (इशारों में) कहते हैं, "तुम्हें कोई देख तो नहीं रहा है?" और फिर वहाँ से (मुँह फेरकर) चल देते हैं---- अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए हैं, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझ-बूझ से काम नहीं लेते।  (127)



[लोगो!] तुम्हारे पास (अल्लाह का) एक रसूल आ गया है, जो तुम्हीं लोगों में से है। तुम्हारी तकलीफ़ें उसे बहुत दुखी कर देती हैं: वह तुम्हारी भलाई की ही चिंता में लगा रहता है, और ईमानवालों के प्रति वह बहुत नर्म दिल और बेहद मेहरबान है।  (128)


अगर फिर भी ये लोग मुँह मोड़ें, तो [ऐ रसूल!], आप कह दें, "मेरे लिए अल्लाह का सहारा काफ़ी है: उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं; उसी पर मैंने भरोसा किया है; वह बड़े महान सिंहासन [अर्श/Throne] का मालिक है।" (129)



नोट:

1-4: इस आयत की पृष्टभूमि को समझने की ज़रूरत है। 6 हिजरी/ 628 ई में मुहम्मद (सल्ल) अपने साथियों के साथ छोटे हज [उमरा] के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से मदीना से मक्का के लिए निकले, मगर उन लोगों को मक्का से थोड़ा पहले हुदैबिया नामक जगह पर रुकना पड़ा, मक्का के सरदारों से मुसलमानों की बड़ी लम्बी बातचीत चलती रही, फिर यह तय हुआ कि मुसलमानों को इस बार बिना हज किए लौटना होगा और वे अगले साल आकर मक्का में हज कर सकते हैं। अंत में दोनों पक्षों के बीच 10 साल के लिए "हुदैबिया की संधि" हुई जिसकी कुछ शर्तें मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद नहीं दिखती थीं, मगर मुहम्मद (सल्ल) ने शांति व अमन की बहाली के लिए उन शर्तों को मान लिया। इसकी एक शर्त यह थी कि कोई भी क़बीला अगर चाहे तो वह मुसलमानों का साथी व सहयोगी हो सकता है और इसी तरह कोई भी क़बीला मक्का के बहुदेववादियों का भी सहयोगी हो सकता है, तो जिस तरह दोनों पक्ष एक दूसरे के ख़िलाफ़ युद्ध नहीं करेंगे, उसी तरह उनके सहयोगियों पर भी हमला नहीं करेंगे, मगर हुआ यूँ कि इस संधि के दो साल के अंदर ही मक्का के बहुदेववादियों ने संधि की शर्त तोड़ डाली जबकि उन लोगों ने क़बीला बनु बक्र को आदमी व हथियार दिए ताकि वे बनु ख़ुज़ा पर हमला कर सकें, बनु ख़ुज़ा मुसलमानों के सहयोगी थे, फिर उन लोगों पर हमला कर दिया गया, यहाँ तक कि बनु ख़ुज़ा के कुछ लोगों ने काबा के परिसर में शरण [पनाह] माँगी थी, इसके बावजूद उन लोगों को वहाँ क़त्ल किया गया, उसमें से कुछ लोग बड़ी मुश्किल से जान बचाकर मदीना पहुँचे और वहाँ का हाल सुनाया। इसी के नतीजे में मदीना के मुसलमानों ने मक्का पर 8 हिजरी/ 630 ई में हमला कर दिया, और बिना कुछ ख़ास ख़ून बहाए हुए मक्का को जीत लिया, मक्का की जीत के बाद वहाँ के बहुत सारे बहुदेववादियों ने इस्लाम अपना लिया, मगर बहुत सारे अपने दीन पर ही टिके रहे। 

9 हिजरी में मुसलमानों की बहुत बड़ी फ़ौज मदीना से उत्तर की तरफ़ सीरिया जाने वाले रास्ते पर स्थित "तबूक" के अभियान पर गई, वहाँ से ख़बर मिली थी कि बाइज़ेंटाइनी फौज मदीना पर हमला करने के लिए बढ़ रही है। चूँकि इस बार मुक़ाबला बहुत मज़बूत सेना से था, इसलिए ऐसे कई बहुदेववादी क़बीले जिन्होंने मुसलमानों के साथ शांति संधि कर रखी थी, उन लोगों ने संधि की शर्तों को तोड़ना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें यह विश्वास था कि इस बार मुसलमानों की सेना बुरी तरह हारकर तबाह हो जाएगी, उधर जब मुस्लिम सेना तबूक पहुँची तो वहाँ पता चला कि बाइज़ेंटाइनी सेना के हमला किए जाने की ख़बर सही नहीं थी, सो वे लोग बिना लड़े ही वापस मदीना लौट आए। उसी साल कुछ समय बाद हज़रत अबु बक्र (रज़ि) की अगुवाई में मदीना के लोगों को हज के मौक़े पर मक्का भेजा गया, इसके तुरंत बाद ही इस सूरह का शुरुआती हिस्सा [1--5] उतरा।

इसके तुरंत बाद मुहम्मद (सल्ल) ने हज़रत अली (रज़ि) को हज पर गए दल के पास भेजा ताकि वह हज के दिन सब हाजियों के सामने यानी ईमानवालों और मुशरिकों के सामने एक ख़ास घोषणा कर दें जैसाकि आयत 3 में आया है, उन्होंने घोषणा की: 1. इस बार के बाद अगले साल से बहुदेववादियों [मुशरिकों] को हज करने की अनुमति नहीं होगी, 2. किसी को भी काबा के गिर्द नंगे होकर चक्कर लगाने [तवाफ़] नहीं दिया जाएगा, 3. केवल सच्चाई पर विश्वास करनेवाले ही जन्नत में जाएंगे, और 4. कोई भी संधि जितनी अवधि [मियाद] के लिए की गई हो, उसे हर हाल में मानना चाहिए। हज़रत अली की घोषणा सुनने के बाद मुशरिकों के सरदार ने अली (रज़ि) से कहा, "अपने भाई से कह देना कि हमने संधि तोड़ दी है, और अब हमारे और उनके बीच सिवाय छुरा घोंपने और तलवार चलाने के कुछ नहीं बचा।" 

5: यह एक बहुत ही मशहूर आयत है, जिसे कुछ लोग “Sword Verse” यानी तलवार वाली आयत के नाम से भी जानते हैं। इस आयत को अक्सर उसके संदर्भ से अलग हटाकर देखा गया है, और अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने हिसाब से उसके ग़लत मतलब निकाले हैं, इसमें इस्लाम के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा करने वाले भी हैं, मुसलमानों के कट्टरवादी विचारों के लोग भी हैं और साथ में आतंकवादी भी शामिल हैं। 

"जब चार महीने की मुहलत समाप्त हो जाए तो मुशरिकों [बहुदेववादियों] से जहाँ सामना हो जाए, उनका क़त्ल करो......"इस आयत को इस तरह पेश किया जाता है कि जैसे यह आदेश दुनिया-भर के मुशरिकों के लिए है और हर दौर के लिए है कि मुसलमानों को चाहिए कि जहाँ उन्हें देखें उनका क़त्ल करें!! ज़ाहिर है कि इस तरह का मतलब निकालना बेबुनियाद है। सही बात तो यह है कि इस सूरह का पहला हिस्सा आयत 1- 28 तक है जो एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, और इसे असल संदर्भ से अलग करके नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

अत: चार महीने की नोटिस समाप्त हो जाने के बाद, यहाँ मक्का के केवल उन मुशरिकों के ख़िलाफ कार्र्वाई करने को कहा गया है जिन्होंने संधि की शर्तों को तोड़ डाला और मुसलमानों के विरुद्ध किसी की मदद की। इस आदेश में वे मुशरिक शामिल नहीं हैं जिन्होंने ऐसा काम नहीं किया (9:4), और वे भी शामिल नहीं हैं जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) से शरण माँगी है ताकि वे क़ुरआन को समझ सकें (9:6). 

एक और ध्यान देने की बात है कि यहाँ क़त्ल करने के अलावा गिरफ़्तार करने, घेराबंदी करने और उनकी ताक में बठने को भी कहा गया है, मगर लोगों ने केवल क़त्ल किए जाने पर ही ज़ोर दिया है, ज़ाहिर है कि अगर सबको क़त्ल करना हो, तो फिर गिरफ़्तार या घेराबंदी किसकी होगी? पढ़ने से साफ़ स्पष्ट है कि यहाँ उन मुशरिकों के ख़िलाफ़ चार तरह की सज़ा देने का विकल्प [option] दिया गया है। ग़लत अनुवाद से भी मतलब कुछ का कुछ हो जाता है। इस आयत का सही मतलब यह है कि चार महीने की नोटिस अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी अगर कुछ मुशरिक वहाँ हैं तो मतलब यह हुआ कि वे युद्ध के लिए तैयार हैं, तो फिर यह अनुमति दी जाती है कि उन्हें काबा के परिसर के अंदर या बाहर जहाँ देखो या तो उन्हें क़त्ल कर दो, या उन्हें गिरफ़्तार कर लो, या उनकी घेराबंदी कर लो ताकि वे काबा या मुस्लिम इलाक़ों में न जाने पाएं और निगरानी चौकियों पर उनकी ताक में बैठो ताकि उन्हें आने से रोक सको। फिर उनमें से कुछ मुशरिक अगर यह कहते हैं उन्होंने ग़लतियों से तौबा कर ली, और वे नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात [टैक्स] देते हैं, तो उनके पीछे न पड़ो, बल्कि उन्हें माफ़ कर दो भले ही पहले उन्होंने तुम्हारे साथ ज़ुल्म किए थे। इस बात को आयत 11 में भी कहा गया है कि ऐसे लोग ईमान में तुम्हारे भाई हैं।

6: पिछली आयत का कुछ लोगों ने जो यह मतलब निकाला है कि "इन मुशरिकों को क़त्ल करो जब तक कि वे मुसलमान न बन जाएं", वह यहाँ ग़लत साबित होता है क्योंकि अगली ही आयत में मुहम्मद (सल्ल) से कहा जा रहा है कि जो कोई भी मुशरिक [idolater] अगर आपसे शरण [पनाह] माँगे, उसे शरण दे दें ताकि वह अल्लाह के संदेश को ठीक ढंग से समझ सके और फिर उसको ऐसी जगह पहुँचा दिया जाए जो उसके लिए सुरक्षित हो, यहाँ मुशरिकों को मुसलमान बन जाने की शर्त नहीं लगाई गई है।  

7: यहाँ फिर ज़ोर दिया गया है कि जिन मुशरिकों के साथ पवित्र मस्जिद के नज़दीक यानी "हुदैबिया" में संधि (628 ई.) हुई थी, अगर वे उसकी शर्तों को नहीं तोड़ते हैं, तो मुसलमानों को भी चाहिए कि उसकी शर्तों पर क़ायम रहें। 

11: आयत 10 में बताया गया कि ये ऐसे लोग हैं जो न तो रिश्ते-नाते का मान रखते हैं और न ही किसी संधि का और ये हमेशा आक्रामक रवैया अपनाते हैं, इसके बावजूद अगर ये अपनी ग़लतियों की तौबा कर लें, नमाज़ पढ़ें और निर्धारित ज़कात दें, तो वे मुसलमानों के दीनी भाई हो जाएंगे, इस तरह यहाँ मुसलमानों को इनसे दुशमनी करने या बदला लेने से फिर से रोका गया है। 

12: यहाँ उन लोगों से युद्ध करने की फिर से अनुमति दी गई है, मगर इसलिए नहीं कि उन्होंने तौबा नहीं की या नमाज़ नहीं पढ़ी या ज़कात नहीं दिया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने दिए हुए वचन तोड़ डाले और मुसलमानों के दीन को बुरा भला कहा। यहाँ अधर्म के सरदारों से साफ़ तौर से युद्ध करने को कहा गया है जिन्होंने अपनी ग़लतियों की तौबा करने के बाद भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुश्मनी भड़काने का काम किया। 

13: आयत 9:5 में मारने का हुक्म नहीं दिया गया, बल्कि इजाज़त दी गई थी, लेकिन अगर ऐसी ज़रूरत आ पड़े कि अपनी और दूसरों की रक्षा के लिए लड़ना पड़े, तब ऐसी हालत में यह अहम था कि मुसलमान लड़ने से पीछे नहीं हटें। मुस्लिम समुदाय में कुछ नये-नये मुस्लिम भी शामिल थे, जिनका ईमान उतना मज़बूत नहीं था, उन्हें जो हुक्म मिलता, उसे बेझिझक कर गुज़रने की उनमें वैसी लगन नहीं थी, फिर कुछ पाखंडी लोग भी थे जो मुस्लिम होने का ढोंग करते थे। इस आयत से पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय में कुछ ऐसे लोग थे जो 9:5 में दिए गए आदेश का पालन करने में कतराते थे, इसीलिए यहाँ उन्हें ज़ुल्म करने वालों और प्रतिज्ञा तोड़ने वालों से बेझिझक लड़ने पर ज़ोर दिया गया है। 

16: यहाँ वैसे मुसलमानों की तरफ़ शायद इशारा है जो मक्का के जीत के बाद नये-नये मुस्लिम हुए थे। इसे भी देखें 29: 2

17: मक्का के मुशरिकीन [विश्वास न करने वाले] इस बात पर फ़ख़्र करते थे कि वे काबा परिसर की देखभाल और रख-रखाव करते हैं, और हाजियों के लिए पीने के पानी का इंतिज़ाम करते हैं, इसलिए उनका दर्जा ईमानवालों से बड़ा है। लेकिन अल्लाह ने बता दिया कि ईमानवालों से उनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। 

23: अगर बाप और भाई 'दीन' के ज़रूरी काम में रुकावट बन रहे हों, तो उनके साथ कोई गठबंधन नहीं रखना चाहिए। लेकिन बाप-भाई होने के नाते उनके साथ अच्छा सलूक करना ज़रूरी है। देखें 31:15; 60: 8.

25: "हुनैन की जंग" मक्का की जीत (630 ई) के कुछ ही दिन बाद हुई थी, जबकि अरब के ज़्यादातर क़बीलों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि कर ली थी। मगर मक्का के दक्षिण-पश्चिम में स्थित तायफ़ शहर के आसपास 'हवाज़िन' के क़बीले ने 'सक़ीफ' क़बीले के साथ मिलकर क़रीब 25,000 लोगों की बड़ी फ़ौज इकट्ठा कर ली थी, मक़सद मुसलमानों की बढ़ती ताक़त को कुचल डालना था। मुक़ाबले के लिए मुसलमानों की फ़ौज में भी क़रीब 12-13 हज़ार लोग जमा हुए जो इनकी अभी तक की सबसे बड़ी फ़ौज थी, इस पर कुछ मुसलमानों ने कहा कि "इतनी बड़ी फ़ौज के रहते हम हार ही नहीं सकते।" मक्का और तायफ़ के बीच "हुनैन" की घाटी में जब दोनों फ़ौजें आमने-सामने हुईं तो शुरुआत में जबकि मुस्लिम सेना एक संकरी घाटी से गुज़र रही थी, हवाज़िन वालों ने इस ज़ोर का हमला किया कि मुसलमानों के पाँव उखड़ गए और फौज की एक टुकड़ी को पीछे हटना पड़ा, फिर बड़ी मुश्किल से तितत-बितर फ़ौज ने अपने आपको दोबारा संभाला और फिर बड़े ज़ोर का हमला किया, तब जाकर अल्लाह ने उन्हें जीत दिलाई, नतीजे में मुसलमानों को ढेर सारा लूट का सामान हासिल हुआ।  

27: अल्लाह जिसे चाहे उसको गुनाहों से तौबा करने की तौफ़ीक़ दे देता है, अत: ऐसा ही हुआ कि हुनैन की जंग में जिस जोश से 'हवाज़िन' और 'सक़ीफ़' क़बीले के लोग लड़े, हार जाने के बाद उनमें बहुत सारे लोग गुनाहों से तौबा करते हुए मुसलमान हो गए। 

28: बुतों की पूजा करने के कारण उन्हें "अपवित्र" कहा गया है......सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करने वालों को अगले साल से पवित्र मस्जिद [काबा] के नज़दीक आने से मना कर दिया गया, इसका मतलब यह भी हुआ कि उन्हें अगले साल से हज करने की भी रोक लगा दी गई। विद्वानों का कहना है कि यह रोक वहाँ जाकर केवल पूजा-पाठ करने पर लगाई गई थी, लेकिन अगर कोई किसी और ज़रूरत से जाना चाहे, तो जा सकता था, जैसे कई मौक़े पर मुहम्मद (सल्ल) ने विश्वास न करने वालों को मस्जिद ए नबवी में जाने की इजाज़त दी थी। 

29:  यहाँ "किताबवालों" यानी यहूदियों और ईसाइयों से लड़ने की बात कही जा रही है जो (अल्लाह और अंतिम दिन पर) विश्वास नहीं रखते, मगर देखा जाए तो सभी किताबवाले अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हैं। असल में यहाँ यहूदियों और ईसाइयों में से उन लोगों के बारे में कहा जा रहा है जो सच्चे दिल से विश्वास नहीं रखते, क्योंकि वे उन चीज़ों से लोगों को नहीं रोकते जिनसे अल्लाह और उनके रसूल ने (तौरात और इंजील में) रोका था, और वे इंसाफ़ के नियमों का भी पालन नहीं करते। असल में मुसलमानों और किताबवालों के बीच एक समझौता हुआ था कि वे हुकूमत को जज़िया अदा करेंगे जिसे उन लोगों ने देना बंद कर दिया था, इसलिए यहाँ कहने का मतलब यह है कि उनकी किताबों में समझौता तोड़ने से मना किया गया है और साथ में किसी का अगर बक़ाया है तो उसे देने के लिए ज़ोर दिया गया है, मगर ये लोग इंसाफ़ के इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, इसीलिए ऐसे लोगों से भी उस समय तक लड़ने का हुक्म दिया गया है जब तक कि जिस टैक्स को देने के लिए ये लोग पहले तैयार थे वह अदा न कर दें और आगे देने के लिए तैयार न हो जाएं।

"जज़िया" एक टैक्स है जो मुस्लिम रियासत में ऐसे ग़ैर मुस्लिम लोगों से लिया जाता है जो लड़ने की सलाहियत रखते हों, अत: औरतों, बच्चों, बूढ़ों, साधुओं, पुजारियों आदि से यह टैक्स नहीं लिया जाता। यह असल में हुकूमत की तरफ़ से उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के बदले में होता है जिसके साथ एक शहरी होने के नाते सारी सुख-सुविधा दी जाती है, और युद्ध में भाग लेने से छूट भी मिलती है। यह क़रीब सालाना 1 दिनार (4.25 ग्राम सोना) के बराबर था। इसी तरह मुसलमानों से "ज़कात" (साल भर की बचत का 2.5%) वसूल किया जाता है जो ग़ैर-मुस्लिमों से नहीं लिया जाता। अक्सर "जज़िया" की निंदा करने वाले इस बात को छिपाते हैं।

30: हज़रत उज़ैर [Ezra]  को अरब में रहने वाले कुछ यहूदी अल्लाह का बेटा मानते थे, हालाँकि सब यहूदी ऐसा नहीं मानते थे।..... यहाँ कहा गया है कि कुछ यहूदी और ईसाई भी वैसी ही बात दोहराते हैं जो विश्वास न करने वाले [काफिर] लोगों की मान्यता थी, जैसे कि "फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं।" 

31: धर्म-गुरुओं और महात्माओं को अपना रब बना लेने से मतलब यह है कि उन ईसाइयों और यहूदियों ने उन्हें यह अधिकार दे रखे थे कि वे तौरात या बाइबल के हुक्म के बजाय अपने मन से किसी चीज़ को हराम [अवैध] या हलाल [वैध] ठहरा देते थे। 

34: कुछ धर्म-गुरू और संत-महात्मा ऐसे थे जो लोगों से माल हड़प लेते और मन-मर्ज़ी के नियम-क़ायदे बना लेते जिससे वे लोगों को सही रास्ते से भटका देते थे। 

36 /37: बहुत पुराने ज़माने से अरबों में चाँद के कैलेंडर के हिसाब से चार (4) महीने "आदर के महीने" माने जाते थे, और उन महीनों में लड़ाई करना हराम [अवैध] था सिवाय अपने बचाव में (2: 194), ये चार महीने थे: ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्र्म और रजब जो कि कैलेंडर के मुताबिक़ लगातार 11वाँ, 12वाँ, और पहला महीना था और एक 7वाँ महीना था। धीरे-धीरे अरब के लोगों को तीन महीने लगातार मार-पीट पर अंकुश रखना मुश्किल लगने लगा तो उन लोगों ने इसका रास्ता इस तरह निकाला कि कभी मुहर्र्म के महीने में लड़ाई करना पड़े, तो उसको एक महीना आगे बढ़ा देते और अगले महीने को आदर का महीना बना लेते थे। उसी तरह, चूँकि हज का महीना अलग-अलग मौसमों में पड़ता है, तो जो जिस साल हज का महीना व्यापार के हिसाब से ठीक समय पर नहीं पड़ता, उस साल इसका क्रम भी बदल डालते थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि चूँकि चाँद वाला कैलेंडर 11/12 दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर से कम होता है जिसके चलते हज या रमज़ान अलग-अलग मौसमों में पड़ता है, इसलिए उसे ठीक करने के लिए वे समय-समय पर कुछ दिन जोड़ देते थे। 

38: उस समय रोमन साम्राज्य [बाइज़ेंटाइन] और फ़ारस की ससानी हुकूमत दो महाशक्तियाँ थीं। जब मुसलमानों को यह ख़बर मिली कि रोमन सेना मदीना पर हमला करने की तैयारियाँ कर रही है, तब मुहम्मद(सल्ल) ने आगे बढ़कर तबूक पर हमला करने की ठानी, और क़रीब 30,000 की फ़ौज इकट्ठा की। मक्का और हुनैन की जीत के बाद 9 हिजरी/ 631 ई. में मदीना से मुसलमानों की सेना जब "तबूक" के अभियान पर जा रही थी, उस समय जो लोग इस अभियान में बहाने बनाकर नहीं गए, यह आयत उनके बारे में है। 

विद्वानों के अनुसार कुछ क़बीले मुहम्मद (सल्ल) के साथ इस अभियान पर नहीं जाना चाहते थे, इसके उन्होंने कई कारण बताए हैं:  सख़्त गर्मी का मौसम, बहुत लम्बी (800 मील) यात्रा, साधन जुटाने के लिए धन की कमी और सबसे बड़ी बात बाइज़ेंटाइन रोमियों की मज़बूत सेना से टक्कर, और उस पर अभी तक खजूरों की फ़सल तैयार भी नहीं हुई थी जो कि उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी। इतने मुश्किल अभियान में भी ज़्यादातर मुसलमान आम तौर से जाने के लिए तैयार हो गए थे, कुछ 10 लोग ही ऐसे थे जो नहीं गए, मगर पाखंडियों ने नहीं जाने के तरह-तरह के बहाने बनाए और मुहम्मद (सल्ल) से इसके लिए इजाज़त ली जिसका ज़िक्र आगे किया गया है। हालाँकि जब ये लोग वहाँ पहुँचे, तब तक रोमन सेना तबूक से जा चुकी थी और जंग नहीं हुई और मुसलमान वहाँ से मदीना आराम से वापस लौट आए और पूरे अरब में वे एक नई शक्ति बनकर उभरे। 

40: यह मक्का से मदीना हिजरत करने की घटना की तरफ़ इशारा है, जब मुहम्मद (सल्ल) के साथ हज़रत अबु बक्र (रज़ि) एक गुफा में छुपे हुए थे और अल्लाह की मदद से दुश्मनों से बचने में कामयाब हुए थे।  

48: उदाहरण के लिए पाखंडियों का एक समूह उहुद की जंग के समय मुस्लिम फ़ौज के साथ गया, मगर अंत में फ़ैसला किया कि उन्हें जंग नहीं लड़नी है, और वे सब मैदान छोड़कर चले गए। .....यहाँ शायद मक्का की जीत और उसके बाद हुनैन की जंग में जीत की तरफ़ इशारा है कि पाखंडियों की कोशिशों के बावजूद सच्चाई की जीत हुई।

49: बताया जाता है कि एक पाखंडी जिसका नाम जद्द इब्ने क़ैस था, उसने मुहम्मद (सल्ल) से तबूक की जंग में न जाने की छूट माँगी, और कारण यह बताया कि औरतें उसकी बहुत बड़ी कमज़ोरी रही हैं, और उसे यह डर है कि अगर वह गया, तो वहाँ की रोमन औरतों को देखकर कहीं वह पूरी तरह बहक न जाए। 

56: पाखंडी लोग असल में डरपोक थे, इसलिए वे अल्लाह की राह में लड़ना नहीं चाहते थे।

60: यहाँ बताया गया है कि निर्धारित ज़कात किस-किस को दी जा सकती हैं। यहाँ आठ (8) क़िस्म के लोग बताए गए हैं जिनमें ज़कात की रक़म को बाँटना चाहिए: 

(i) ऐसे ग़रीब जिनकी रोज़ के खाने-पीने की ज़रूरतें भी पूरी न होती हों [फ़क़ीर], (ii) ऐसे ज़रूरतमंद लोग जिनका रोज़ का खाना-पीना तो हो जाता है मगर अगले हफ़्ते क्या होगा मालूम नहीं होता [मिस्कीन], (iii) ऐसे लोग जो ज़कात की रक़म वसूल करने और बाँटने की व्यवस्था  में लगे रहते हैं, (iv) ऐसे लोग जो बड़ी मुसीबत और सदमे की हालत से गुज़र रहे हों या ऐसे नव-मुस्लिम जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत थी (क्योंकि उनका ईमान अभी पूरी तरह से मज़बूत नहीं था), (v) ग़ुलामों और युद्ध-बंदियों [Prisoners of war] को मदद पहुँचाने व उन्हें आज़ाद कराने के लिए, (vi) क़र्ज़ के बोझ से दबे हुए लोगों के लिए,  (vii) अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करने या समाज के फ़ायदे के लिए कोई सामुदायिक काम (civic project] पर ख़र्च करने के लिए [फ़ी सबीलिल्लाह], और (viii)  मुसाफ़िरों और शरण लेने वालों [refugees] पर ख़र्च करने के लिए। 

66: पाखंडियों में जो अपने गुनाहों की तौबा कर लेगा, उसे माफ़ कर दिया जाएगा। हाँ, जो तौबा नहीं करेगा, उसे सज़ा ज़रूर मिलेगी। 

70: "लूत की खंडहर बनी बस्ती" का नाम "सदोम"[Sodom] और "गोमोरह" [Gomorrah] था, देखें 7: 59, 7:92

73: "जिहाद" का असल मतलब संघर्ष करना, कोशिश करना, मेहनत करना आदि होता है। दीन की रक्षा के लिए अगर अपने बचाव में युद्ध लड़ा जाए तो यह जिहाद है, मगर यह जिहाद अलग-अलग नहीं, बल्कि इस्लामी हुकूमत की तरफ़ से किया जाता है। इसके साथ-साथ लोगों को सच्चाई का संदेश सुनाना और इस तरह समझाना कि वे बात मान लें यह भी जिहाद है या अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए कोशिश करना भी जिहाद है। विश्वास न करने वाले (मुशरिकों) के साथ तो अपनी रक्षा में कई लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं, मगर पाखंडी लोग चूँकि ईमान रखने का दावा करते थे, इसलिए उनके साथ वैचारिक जिहाद ही किया गया।

74: पाखंडियों ने कई बार मुहम्मद (सल्ल) को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश की थी, जैसे तबूक के अभियान से वापसी के समय रास्ते में उन्हें मार देने की साज़िश की गई, मगर हर बार आप (सल्ल) को ख़बर हो जाती थी।

98: ये लोग तबूक की जंग से उम्मीद लगाए हुए थे कि मुसलमानों की क़िस्मत ख़राब होने वाली है कि इनकी फ़ौज रूमियों के मुक़ाबले में तबाह हो जाएगी, मगर जब मुसलमान सही-सलामत वहाँ से लौट आए, तो उल्टा ये लोग मुसीबत में पड़ गए, और उनकी पोल खुल गई। 

101: दो बार की सज़ा के कई मतलब बताए गए हैं, एक सज़ा तो उनकी मानसिक थी कि उन लोगों को यक़ीन था कि मुसलमानों की फ़ौज "तबूक" की लड़ाई में बुरी तरह हारकर तबाह हो जाएगी, मगर उल्टा हुआ कि लोग सही-सलामत मदीना लौट आए, दूसरा यह कि मदीना और उसके आसपास रहने वाले देहातियों में वैसे पाखंडी लोग जिनको अभी तक पहचाना नहीं गया था, उनका पाखंड सामने आ गया। इस तरह, इस दुनिया में एक बार तो वे बुरी तरह बेइज़्ज़त हुए और दूसरा यह कि उनकी ज़िंदगी का अंत भी बुरा ही होगा। 

102: यहाँ उन मुसलमानों के बारे में कहा गया है जो अपनी सुस्ती के कारण "तबूक" के अभियान पर नहीं गए थे, मगर बाद में उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ, तो उन्होंने गुनाहों से तौबा की और अपने आपको मस्जिद के खम्भे से बाँध लिया था। ऐसे लोगों की संख्या 7 बतायी जाती है और उनको अल्लाह ने माफ़ी की उम्मीद दिलाई है। 

103: ऊपर की आयत में जिन लोगों की तौबा क़बूल हुई, उन लोगों ने अपने माल में से मुहम्मद (सल्ल) को कुछ तोहफ़ा [सदक़ा] देना चाहा जिसे आप (सल्ल) ने शुरू में लेने से मना किया, मगर फिर अल्लाह के हुक्म से इसे क़बूल किया, क्योंकि बताया गया है कि सदक़ा देना आदमी के मन की गंदगी को दूर करने के लिए अच्छा है। 

105: यानी तौबा करने के बाद भी आगे की ज़िंदगी में सुधार के लिए लगातार अच्छे कर्म करते रहना होगा।

106: बताया जाता है कि तीन (3) मुसलमान ऐसे भी थे जो साधन रहते हुए केवल अपनी सुस्ती के चलते "तबूक" की लड़ाई में नहीं गए और उन्होंने माफ़ी माँगने और तौबा करने में भी वैसी तत्परता नहीं दिखायी जैसी कि बाक़ी 7 लोगों की तरफ़ से देखने को मिली थी (9:102)। जब ये लोग मुहम्मद (सल्ल) के पास माफ़ी के लिए गए तो उन्होंने अपना फ़ैसला अल्लाह के आदेश आने तक टाल दिया, आम मुसलमानों ने उनका क़रीब 50 दिनों तक सामाजिक बायकाट किया, फिर उन्हें बाद में माफ़ी दे दी गई, देखें आयत 118.

107: मदीना में ख़ज़रज क़बीले का एक अबु आमिर नामक आदमी ईसाई संयासी हो गया था और मुहम्मद (सल्ल) के मदीना आने से पहले वहाँ उसकी बड़ी इज़्ज़त थी, मगर वह आप (सल्ल) को अपना दुशमन समझने लगा और हर जंग में वह दुश्मनों की मदद किया करता था। मक्का और हुनैन की जीत के बाद वह सीरिया चला गया था और वहाँ जाकर उसने बाइज़ेंटाइनी राजा हेराक्लियस को मदीना पर हमला करने के लिए उकसाया था। उसके ही मशविरे पर मदीना के पाखंडियों ने मदीना शहर से लगी हुई एक नई मस्जिद बनवाई जो कि मुसलमानों की पहली मस्जिद "मस्जिद-ए-क़ुबा" से नज़दीक में थी। यह दिखावे के लिए तो मस्जिद थी, लेकिन यहाँ मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें होती थीं और इसमें हथियार भी जमा किए गए थे। वे इस बात के लिए भी आस लगाए हुए थे कि रोमन फ़ौज उनकी मदद के लिए आएगी। इसमें नमाज़ पढ़ने के लिए उन लोगों ने आप (सल्ल) को बुलाया था, और आपने 'तबूक' से वापसी पर वहाँ जाने का इरादा भी किया था। मगर इस आयत के उतरने के बाद कुछ लोग कहते हैं कि आपके आदेश पर इस मस्जिद को जला दिया गया।

110: चूँकि यह मस्जिद पाखंडियों ने मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने और नफ़रत फैलाने की नीयत से बनवाई थी, इसलिए वह बर्बाद कर दी गई। फिर पाखंडियों की ऐसी हालत हो गई कि मरते दम तक वे संदेह की हालत में रहे कि जाने कब उनका कोई और राज़ जग-ज़ाहिर हो जाए। 

112: "जो सच की खोज में घूमते रहते हैं" का कुछ लोगों ने अनुवाद "जो रोज़ा रखते हैं" भी किया है।

114: जब इबराहीम (अलै) के बाबा की मौत एक विश्वास न करने वाले के रूप में हो गई, तब से इबराहीम (अलै) ने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया था। देखें 19:47; 60:4; 26: 86

117: मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह ने इस ग़लती के लिए माफ़ कर दिया जबकि आपने कुछ लोगों के युद्ध में नहीं जाने की प्रार्थना को मानते हुए उन्हें छूट दे दी, भले ही वे झूठे बहाने बना रहे थे, या जब आपने बुतपरस्तों के लिए माफ़ी की दुआ करनी चाही। 

118: जैसाकि आयत 106 के नोट में है,  मदीना के मुसलमानों ने अपने तीन सहाबियों का "तबूक के अभियान" पर नहीं जाने के चलते 50 दिनों तक सामाजिक बायकाट किया गया था, इसके नतीजे में उनकी ज़िंदगी तंग हो गई थी और उन्हें समझ में आ गया कि अल्लाह की शरण के सिवा कहीं पनाह नहीं मिलेगी। 

122: "तबूक के अभियान" पर सभी लोगों को लड़ाई में शामिल होने का हुक्म दिया गया था, लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता था, बल्कि आम हालत में हर समुदाय में से कुछ लोग जिहाद के लिए जाते थे। इस आयत में कहा गया है कि हर समुदाय [Group] में कुछ लोग ऐसे भी होने चाहिए जो बाहर निकलकर दीन की सही समझ हासिल करें और फिर जो कुछ उन्होंने सीखा है, वह दूसरों को और ख़ासकर जिहाद से लौटकर आने वालों को सिखाएं, ताकि वे बुराइयों से बच सकें। कुछ विद्वान कहते हैं कि इस आयत का संबंध युद्ध से नहीं है, बल्कि यह आम हालत में घर से निकलकर दीन को सीखने-सिखाने के बारे में है।  

123: जैसा कि सूरह के शुरू में विश्वास न करनेवाले मुश्रिकों से लड़ने के लिए कहा गया है, अंत में यहाँ फिर से इस बात पर ज़ोर दिया गया है। असल में मक्का की जीत के बाद बहुत से लोग नये-नये मुस्लिम हो गए थे और उनमें वहाँ के मुश्रिकों के लिए दिल में नर्मी थी क्योंकि वे उनके रिश्तेदार भी थे, मगर उन्हें विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त रवैया अपनाने के लिए कहा गया है ताकि वे मुसलमानों से डरते हुए फिर लड़ने की हिम्मत न कर सकें। 

127: मदीना के पाखंडी लोग मजबूरी में मुसलमानों की मजलिस में बैठा करते थे, मगर उनका दिल वहाँ लगता नहीं था। जब मजलिस में मुहम्मद (सल्ल) कोई नई सूरह पढ़कर सुनाते और उसमें अगर पाखंडियों का ज़िक्र होता, तो वे आपस में एक दूसरे को इशारे करते और किसी तरह चुपके से वहाँ से खिसक लेते थे। 




10H/632 AD


सूरह 110: अन-नस्र 

[मदद, Help]


यह एक मदनी सूरह है जो मुहम्मद सल्ल. की मौत से पहले की आख़िरी सूरतों में से एक है। इसमें यह हुक्म दिया गया है कि जब आपका मिशन पूरा हो जाए और आप देख लें कि लोग बड़ी संख्या में अल्लाह के संदेश को मानते हुए इस्लाम अपना रहे हैं, तब वह अपने रब से मिलने के लिए तैयार हो जाएं। 


 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

(ऐ रसूल), जब अल्लाह की मदद आ पहुँचे और वह (मक्का की जीत के लिए) आपका रास्ता खोल दे,  (1)

और आप (जब) लोगों को देख लें (कि) वे अल्लाह के दीन [धर्म] में गिरोह के गिरोह शामिल हो रहे हैं, (2)

तो आप (शुक्र अदा करते हुए) अपने रब की बड़ाई के साथ उसका ख़ूब गुणगान करें और उसी से माफ़ी माँगें:  (3)

सचमुच वह हमेशा (अपने बंदों की) तौबा [repentance] क़बूल करने के लिए तैयार रहता है। (4)

 

 

नोट: 

1: यहाँ मक्का की जीत के बारे में कहा गया है, यह सूरह मक्का की जीत से कुछ पहले उतरी थी। इसमें एक तरफ़ ख़ुशख़बरी दी गयी है कि मक्का की जीत के बाद अरब के लोग बड़े पैमाने पर इस्लाम को अपना लेंगे, और दूसरी तरफ़ इस्लाम का संदेश दूर-दूर तक फैल जाने से मुहम्मद (सल्ल) के दुनिया में आने का मक़सद पूरा हो जाएगा, इसीलिए कुछ लोगों ने इससे यह भी मतलब निकाला था कि यहाँ आपको दुनिया से जाने की तैयारी के लिए हुक्म दिया गया है कि अल्लाह की ज़्यादा से ज़्यादा बड़ाई बयान करें और गुनाहों की माफ़ी माँगते रहें।  

 


Medina II

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