Monday, March 4, 2024

Medina I: H1 to H3

Chronologically arranged Medinan Surahs I : H1


सूरह 98: अल-बैय्यिनह  

[स्पष्ट प्रमाण, Clear Evidence]

यह एक मदनी सूरह है, इसका नाम उस 'स्पष्ट प्रमाण' पर रखा गया है जिसकी मांग विश्वास करने वाले बराबर करते रहते थे। मगर स्पष्ट प्रमाण के आने के बावजूद अब जो वे अविश्वास पर अड़े रहे, तो उन्हें भयानक यातना झेलनी होगी। इसमें "ईमान" के बुनियादी सिद्धांतों को बताया गया है, और जहन्नम की आग की तुलना जन्नत के बाग़ों में हमेशा रहने वालों के परम आनंद से की गई है। 


विषय: 

01-05: स्पष्ट प्रमाण 

06-08: ईमानवालों और विश्वास न करनेवालों का अंजाम

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

किताबवालों [यहूदी व ईसाई] में और मुशरिकों [बहुदेववादियों] में से जो लोग सच्चाई से इंकार करनेवाले [काफ़िर] थे, वे उस समय तक अपने तरीक़े छोड़ने वाले न थे जब तक कि उनके पास स्पष्ट प्रमाण न आ जाता,  (1)

अल्लाह की तरफ़ से (संदेश पहुँचाने वाले) एक रसूल के रूप में, जो (उन्हें) पवित्र किताब के पन्नों को पढ़कर सुनाए,  (2)

जिनमें सीधी, सच्ची बातें लिखी हुई हों। (3)

(इसके बावजूद) जिन्हें आसमानी किताब दी गयी थी, उनके पास (रसूल और क़ुरआन के रूप में) इतने साफ़ प्रमाण आ जाने के बाद भी वे आपस में बँट गये,  (4)

हालाँकि उन्हें तो बस यही हुक्म दिया गया था कि वे केवल अल्लाह की ही बंदगी करें, एक सच्चे ईमानवाले की तरह अपने दीन को पूरी भक्ति से केवल उसी के लिए समर्पित करें, और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करें और ज़कात [Alms] दिया करें, कि यही सच्चा दीन है।  (5)

किताबवालों में और मुशरिक लोगों [Idolaters] में से जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहे, वे (सभी) जहन्नम की आग में डाले जाएंगे, जहाँ वे हमेशा पड़े रहेंगे। यही लोग पैदा किए गए सभी प्राणियों में सबसे बुरे हैं।  (6)


बेशक जो लोग ईमान लाए हैं, और अच्छे कर्म करते रहे हैं, यही लोग पैदा किए गए सभी प्राणियों में सबसे बेहतर हैं।  (7)

उनका इनाम उनके रब के यहाँ वह सदाबहार जन्नतें [बाग़] हैं जिनके नीचे से नहरें बहती हैं, और वे उनमें सदा के लिए रहेंगे। अल्लाह उनसे ख़ुश होगा, और वे लोग उससे ख़ुश होंगे। ये (सब कुछ) उन लोगों के लिए ख़ास है जो अपने दिल में अपने रब का डर रखते हों। (8)


नोट: 

4: यहाँ उन किताबवालों की बात हो रही है जो किसी स्पष्ट प्रमाण के इंतज़ार में थेमगर जब मुहम्मद (सल्ल) के नबी होने के पक्के प्रमाण सामने आ गए, तब भी उनलोगों ने विश्वास नहीं किया, और केवल अपनी हठधर्मी के कारण आपकी बात नहीं मानी और अलग रास्ता अपना लिया। देखें 3:19, 105; 23:53; 42:13-14. 


 




सूरह 22: अल-हज्ज 

[हज/The Pilgrimage]

यह एक मदनी सूरह है, इसका नाम आयत 27 में ज़िक्र की गई हज की पवित्र रीतियों के बारे में है, जिसे पहली बार इबराहीम (अलै) ने निभाया था। इस विषय से परिचय इस तरह कराया गया है कि उन लोगों की निंदा की गई है जो ईमानवालों को मक्का की पवित्र मस्जिद में जाने से रोकते हैं, और इसके बाद क़रीब 15 साल तक ज़ुल्म सहने के बाद मुसलमानों को इजाज़त दे दी गई कि अगर उन पर हमला हो, तो वे अपने बचाव में मुक़ाबला कर सकते हैं (आयत 39). यह सूरह शुरू होती है फ़ैसले के दिन से, और अंत में ईमानवालों से कहा गया है कि वे नमाज़ और अच्छे कर्म के द्वारा कामयाबी पा सकते हैं। यह भी बताया गया है कि लोग जिन बुतों की पूजा करते रहते हैं, वे इतने शक्तिहीन हैं कि सब मिलकर एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते (आयत 73). 

विषय:

01-04: आख़िरी दिन 

05-07: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

08-13: कुछ लोगों के ईमान में स्थिरता नहीं होती 

14-16: विश्वास करने वाले और विश्वास से इंकार करने वाले की तुलना 

17-18: धार्मिक समुदायों के बीच अल्लाह फ़ैसला कर देगा 

19-24: विश्वास रखनेवालों और इंकार करने वालों के अंजाम की तुलना 

25  : पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकने वालों को दंड 

26-29: इबराहीम (अलै) ने हज की घोषणा 

30-33: हज से जुड़े नियम-क़ायदे 

34-38: जानवरों की क़ुर्बानी 

39-41: विश्वास न करने वालों के ख़िलाफ़ लड़ने की अनुमति 

42-51: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

52-54: रसूलों के काम में शैतान की फ़ितना डालने की कोशिश 

55-57: फ़ैसले का दिन 

58-60: घर छोड़कर मदीना आने वाले [मुहाजिर] 

61-66: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

67-70: हर मज़हब में इबादत [पूजा] करने का तरीक़ा अलग-अलग 

71-72: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम 

73-74: झूठे ख़ुदाओं में कोई ताक़त नहीं 

75-76: अल्लाह अपने संदेश भेजने के लिए रसूलों को चुनता है 

77-78: ईमानवालों का उत्साह बढ़ाया गया 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है

ऐ लोगो! अपने रब की यातना से डरो, क्योंकि (क़यामत की) अंतिम घड़ी में जो भूचाल होगा वह बड़ी ज़बरदस्त घटना होगी: (1)

(जिस दिन वह घड़ी आ जाएगी) उस दिन तुम देखोगे: हर एक दूध पिलानेवाली माँ अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी, हर एक गर्भवती औरत अपना गर्भ (समय से पहले) गिरा देगी। लोगों को देखकर तुम्हें लगेगा कि वे नशे में मदहोश हैं जबकि वे नशे में न होंगे, अल्लाह की यातना इतनी दिल दहला देने वाली होगी। (2)

इसके बावजूद कुछ ऐसे भी हैंं जो बिना जाने-बूझे अल्लाह के बारे मेंं झगड़ा करते हैं, और हर बाग़ी शैतान के पीछे चल पड़ते हैं, (3)

जबकि शैतान के लिए यह बात लिख दी गयी है कि जो कोई उसका दोस्त हुआ, उसे वह ज़रूर सीधे रास्ते से भटका देगा, और उसे (जहन्नम की) भड़कती आग तक पहुँचा कर रहेगा। (4)


लोगो! अगर तुम्हें (मर के) दोबारा जी उठने के बारे में कोई सन्देह हो तो (याद रखो!), कि हमने तुम्हें (पहले) मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य [sperm] की बूंद से, जो फिर जोंक की तरह सटी हुई चीज़ बन जाती है, फिर गोश्त का लोथड़ा बन जाता है जिसमें (कभी) पूरी शक्ल बन जाती है और (कभी) पूरी नहीं बनती: यह इसलिए कि हम चाहते हैं कि हमारी शक्ति व क़ुदरत (के करिश्मे) तुम्हारी समझ में ठीक से आ जाएं। फिर जिस वीर्य को हम चाहते हैं, उसे (औरत के) गर्भ में एक नियत समय तक ठहराए रखते हैं, फिर तुम्हें एक बच्चे के रूप में बाहर लाते हैं और फिर तुम बड़े होते हुए अपनी जवानी की अवस्था को पहुँच जाते हो। तुममें से कुछ लोग तो (बुढ़ापे से) पहले ही मर जाते हैं, और कुछ लोग (बुढ़ापे की) इतनी उम्र तक ज़िंदा बचे रहते हैं कि जो कुछ वे जानते थे, सब भुला बैठते हैं। कभी कभी तुम देखते हो कि ज़मीन सूखी-बेजान पड़ी है, फिर जब हम उसपर पानी बरसा देते हैं, तो अचानक लहलहाने और उभरने लगती है और उसमें हर क़िस्म की ख़ुशनुमा चीज़े उग आती हैं:   (5)

ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही सच्चाई है; वह मुर्दों को फिर से ज़िंदा करता है; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है। (6)


इस बात में कोई संदेह नहीं कि क़यामत की घड़ी आकर रहेगी, और न इसमें कोई शक है कि अल्लाह मुर्दों को उनकी क़ब्रों से उठा खड़ा करेगा,  (7)

कुछ लोग ऐसे हैं कि न तो उनके पास ज्ञान है, न किसी तरह का मार्गदर्शन है, और न ही ज्ञान की रौशनी देने वाली किताब है, तब भी वे अल्लाह के बारे में झग़ड़ा करते हैं, (8)

घमंड से अपने पहलू मोड़ लेते हैं, ताकि दूसरों को अल्लाह के मार्ग से भटका दें। ऐसे आदमी के लिए दुनिया में भी बेइज़्ज़ती है, और क़यामत के दिन हम उसे आग में जलने का मज़ा चखाएँगे। (9)

(उनसे कहा जाएगा), "यह सब तेरे उन करतूतों का नतीजा है जो ख़ुद तेरे हाथों ने जमा कर रखा है: अल्लाह अपने बंदों पर कभी ज़ुल्म करने वाला नहीं है। (10)


और (देखो!), कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह की बंदगी तो करते हैं, मगर उनके ईमान में स्थिरता नहीं होती: अगर उन्हें (दुनिया में) कोई फ़ायदा पहुँच गया, तो वे उससे सन्तुष्ट हो गए, लेकिन अगर उनकी परीक्षा ली गयी, तो उल्टे पाँव (इंकार करने की) हालत पर लौट आएं, (इस तरह) दुनिया भी हार बैठे और आने वाली दुनिया भी हाथ से निकल गयी---- यह बात साफ़ है कि यही बहुत बड़ा घाटा है।  (11)

वे अल्लाह को छोड़कर (ज़रूरत के समय) उसे पुकारते हैं, जो न उन्हें नुक़सान पहुँचा सके और न उनकी मदद कर सके------ सही रास्ते से बहुत दूर भटक जाना यही है-----  (12)

या वे ऐसे (झूठे ख़ुदा) को पुकारते हैं जिससे फ़ायदा होने के बजाए कहीं अधिक नुक़सान होना तय है। कितना बुरा मददगार है और कितना बुरा साथी है वह! (13)

मगर जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, उन्हें अल्लाह ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। अल्लाह जो चाहता है, करता है।  (14)

जो कोई (निराश होकर) ऐसा सोचता है कि अल्लाह दुनिया और आख़िरत [परलोक] में उसकी कोई मदद करने वाला नहीं, तो उसे चाहिए कि वह छत से एक रस्सी तान ले और (अपने आपको फाँसी लगाकर) ज़मीन से अपना रिश्ता काट दे, फिर देखे कि उस उपाय से उसका ग़ुस्सा दूर होता है कि नहीं।  (15)

(देखो), इस तरह हम इस (क़ुरआन) को स्पष्ट संदेशों के रूप में उतार भेजते हैं, और अल्लाह जिसे चाहता है, सही रास्ते पर लगा देता है। (16)


रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं, जो यहूदी मत के मानने वाले हैं, जो साबी [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं, जो मजूसी [Magians] हैं, और जो मुशरिक [बहुदेववादी /Idolaters] हैं, अल्लाह क़यामत के दिन इन सबके बीच फ़ैसला कर देगा; अल्लाह सब कुछ देखता है। (17)

[ऐ रसूल] क्या आप नहीं समझते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह (के हुक्म) के सामने झुकी रहती है: सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, पेड़, और जानवर? और बहुत सारे आदमी भी (सज्दे में झुके रहते हैं), मगर हाँ, बहुत-से आदमी ऐसे भी हैं जो इसी लायक़ हैं कि उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए। और जिसे अल्लाह बेइज़्ज़त कर दे, तो उसे इज़्ज़त देने वाला कोई नहीं: अल्लाह जो चाहता है, करता है। (18)

ये (ईमानवाले और काफ़िर) दो तरह के आदमी हैं जो अपने रब के बारे में मतभेद रखते हैं। जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके पहनने के लिए आग का कपड़ा होगा; उनके सिरों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा, (19)

इससे उनके पेट के अंदर की चीज़ें भी गल उठेंगी और उनके बदन के चमड़े भी; (20)

उन्हें क़ाबू में रखने के लिए लोहे की छड़ियाँ होंगी; (21)

जब कभी वे परेशान होकर उससे निकल भागना चाहेंगे, तो वे उसी में वापस धकिया दिये जाएंगे और कहा जाएगा, "अब आग में जलने का मज़ा चखो!" (22)

मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो अल्लाह उन लोगों को ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा जिनके नीचें नहरें बह रही होंगी; वहाँ वे सोने के कंगनों और मोतियों से सजाए जाएँगे; उनके पहनने के लिए वहाँ रेशमी कपड़ा होगा।  (23)

उन्हें ऐसी बात की तरफ़ ले जाया गया था जो अच्छी व पाकीज़ा बात थी, और उन्हें ऐसे रास्ते पर चलाया गया था जो उस (ख़ुदा) का रास्ता है जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (24)


रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, जो दूसरों को अल्लाह के मार्ग से और पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकते हैं---- जिसे हमने सारे लोगों (की इबादत) के लिए एक समान बनाया है, चाहे वहाँ का निवासी हो या बाहर से आया हो ---- और (याद रहे कि) जो कोई ज़ुल्म करके इन (नियमों) को तोड़ने की कोशिश करेगा, उसे हम दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (25)

(याद करो!) जब हमने इबराहीम को उस (पवित्र) घर [काबा] की जगह दिखायी और कहा था, "मेरे साथ किसी चीज़ को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराना। मेरे घर को उन लोगों के लिए पाक-साफ़ रखना जो इसके गिर्द फेरा [तवाफ़] लगाते हैं, जो इबादत के लिए खड़े होते हैं, और जो रुकू [bow] और सज्दे [prostrate] में झुकते हैं। (26)

(और हुक्म दिया था कि) लोगों के बीच हज करने की घोषणा कर दो। वे (दूर दूर से) गहरे पहाड़ी दर्रों से होते हुए तेरे पास आया करेंगे, पैदल भी और हर तरह की तेज़ सवारियों पर भी,   (27)

ताकि वे यहाँ आने का फ़ायदा उठा सकें, और निर्धारित दिनों में, जो चौपाए अल्लाह ने उन्हें दे रखे हैं, उनपर अल्लाह का नाम लें (और उनकी क़ुर्बानी कर) सकें ------- फिर उस (क़ुर्बानी के गोश्त) में से ख़ुद भी खाओ और ग़रीब-बदहाल लोगों को भी खिलाओ---- (28)

फिर (हज में आए हुए) लोगों को चाहिए कि साफ़-सुथरे हो जाएं, अपनी मन्नतें पूरी करें और इस पुराने घर [काबा] का (सात बार) चक्कर [तवाफ़] लगाएं।" (29)

ये सारी चीज़ें [अल्लाह ने आदेश की हैं]: जो कोई अल्लाह द्वारा तय की गयी मर्यादाओं का आदर करेगा, तो वह अपने रब से इसका बहुत अच्छा बदला पायेगा।


तुम्हारे लिए सारे चौपाए हलाल [lawful] कर दिए गए हैं, सिवाए उनके जिनके बारे में ख़ास तौर से मना किया गया है। मूर्तिपूजा से जुड़ी धारणाओं और रीतियों (जैसे चौपाया जानवरों को मूर्तियों पर बलि चढ़ाए जाने) की गन्दगी से बचकर रहो, और झूठी बातों से भी बचते रहो। (30)

पूरी भक्ति से अल्लाह के ही सामने झुको और उसके साथ किसी को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराओ, क्योंकि जिस किसी ने ऐसा किया, तो उसका हाल ऐसा होगा जैसे उसे आसमानों से नीचे फेंक दिया गया हो और उसे (हवा में) कोई पक्षी उचक ले जाए, या हवा का झोंका उसे किसी दूर-दराज़ इलाक़े में ले जाकर फेंक दे।  (31)

ये सारी चीज़ें (अल्लाह के हुक्म से होती हैं): जो लोग अल्लाह की रीतियों [rituals] को मानते हुए उसका आदर करते हैं, तो ये (चीज़ें) उनके दिलों में बुराइयों से बचने की भावना को दिखाती हैं।  (32)

एक नियत समय तक चौपाये तुम्हारे लिए बहुत फ़ायदे के हैं। उसके बाद उन्हें पुराने घर [काबा] के पास क़ुर्बानी के लिए ले जाना है: (33)

(और देखो!) हर समुदाय के लिए हमने भक्ति का तरीक़ा तय कर दिया कि जब वे हमारे दिए हुए पालतू चौपायों (को काटकर खाना चाहें, तो उन) पर अल्लाह का नाम ले लें: तुम्हारा अल्लाह तो एक ही है, अत: पूरी भक्ति से उसी के हो रहो, (ऐ रसूल!), आप विनम्र लोगों को (कामयाबी की) अच्छी ख़बर दे दें, (34)

जब कभी ऐसे (नेक) लोगों के सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल दहल उठते हैं, जो भी मुसीबत उन पर आती है, उस पर धीरज से काम लेते हैं, जो नमाज़ को पूरी पाबंदी से पढ़ने में लगे रहते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसे (सही रास्ते में) ख़र्च करते रहते हैं। (35)


(और देखो, क़ुर्बानी के) ऊँटों को हमने तुम्हारे लिए अल्लाह की पवित्र निशानियों में से बनाया है। तुम्हारे लिए उनमें बहुत सी अच्छाइयाँ हैं। अतः जब वे कुर्बानी के लिए क़तार में खड़े किए जाएं, तो उनपर अल्लाह का नाम लो, फिर जब वे (ज़बह होकर) गिर पड़ें, तो उनके गोश्त में से ख़ुद भी खाओ औऱ साथ में उनको भी खिलाओ, जो चाहे मांगते हों या न मांगते हों। इस तरह हमने इन (जानवरों) को तुम्हारे वश में कर दिया है, ताकि तुम शुक्र अदा करने वाले बन जाओ।  (36)

(याद रहे! क़ुर्बानी के जानवर का) न तो गोश्त और न ही ख़ून अल्लाह तक पहुँचता है, वहां अगर कुछ पहुंचता है तो वह तुम्हारे दिल की नेकी [तक़वा /paiety] है! उसने इन (जानवरों) को इस तरह तुम्हारे वश में कर दिया है कि जो सही रास्ता अल्लाह ने तुम्हें दिखाया है, उस पर शुक्र अदा करो, और अल्लाह की बड़ाई बयान करो।


जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हें (सच्चाई क़बूल करने की) ख़ुशख़बरी सुना दो: (37)

ईमान रखनेवालों को अल्लाह (ज़ालिमों से) बचा लेगा; अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता जो न विश्वास करने योग्य हों और न ही (नेमतों के लिए) शुक्र अदा करते हों। (38)

जिन (ईमानवाले) लोगों पर हमला किया गया है, उन्हें हथियार उठाने की अनुमति दी जाती है, क्योंकि उन पर साफ़ तौर से ज़ुल्म किया गया है ----- अल्लाह उनकी मदद करने की पूरी ताक़त रखता है।  (39)

वे लोग जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के, केवल इसलिए भगा दिए गए कि वे कहते थे, "हमारा रब अल्लाह है।" अगर अल्लाह एक-दूसरे के द्वारा कुछ लोगों को हटाता न रहता तो बहुत सारी मठें [Monasteries], गिरजाघर [churches], यहूदियों की इबादतगाहें [Synagogues] और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह के नाम का ज़िक्र बार-बार किया जाता है, सब बर्बाद कर दी जातीं। अल्लाह ऐसे लोगों की मदद ज़रूर करेगा, जो उसकी (सच्चाई के पक्ष में) मदद करते हैं ---- अल्लाह बड़ा मज़बूत, बेहद ताक़तवाला है ---- (40)

ये वह लोग हैं, जिनके क़दम जब हम ज़मीन पर मज़बूती से जमा (कर हुकूमत दे) देते हैं, तो वे नमाज़ का आयोजन करते हैं, निर्धारित ज़कात [alms] देते हैं, भलाई के कामों का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं: सारे मामलों का नतीजा अल्लाह के ही हाथ में है। (41)


[ऐ रसूल], अगर वे आपको झूठा कहकर ठुकराते हैं, तो आपसे पहले नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी ऐसा किया था, और ऐसा ही आद [Aad], समूद [Thamud],  (42)

इबराहीम [Abraham], लूत [Lot], मदयन [Midian] की क़ौम के लोग भी कर चुके हैं। (43)

मूसा [Mose] को भी झूठा कहा गया था। मैंने विश्वास न करने वालों को थोड़े समय के लिए ढील दी, मगर अंत में मैंने उन्हें सज़ा दी। तो (देखो) मेरी पकड़ उनके लिए कैसी थी कि बेकार होकर रह गए! (44)

कितनी ही बस्तियाँ हम बर्बाद कर चुके हैं जो ज़ुल्म करने वाली थीं, हम ने उन्हें पूरी तरह खंडहर बना के छोड़ दिया; कितने ही वीरान पड़े हुए कुएँ; कितने ही ऊँचे-ऊँचे महल! (45)

क्या ये (मक्का के) लोग ज़मीन पर एक जगह से दूसरी जगह चले फिरे नहीं कि सीख ले पाते? उनके पास दिल होते और समझते-बूझते, कान होते और कुछ सुन पाते? असल में लोगों की आँखें अंधी नहीं हुई हैं, बल्कि उनके सीनों में जो दिल हैं, वे अंधे हो गए हैं। (46)


(ऐ रसूल), वे आपसे यातना जल्दी ले आने की चुनौती दे रहे हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि अल्लाह अपना वादा पूरा न करे ----- मगर आपके रब के यहाँ एक दिन, तुम लोगों की गिनती में एक हजार साल जैसा है। (47)

कितनी ही बस्तियाँ थीं जो ग़लत कामों में डूबी हुई थीं जिनको मैंने कुछ और मुहलत दी, फिर उन्हें (पकड़ लिया और) मिटाकर रख दिया: अंत में उन सबको मेरी ही पास लौटकर आना है। (48)


[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ लोगो! मैं केवल इसीलिए भेजा गया हूँ कि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) साफ़ व स्पष्ट ढंग से सावधान कर दूँ।" (49)

फिर जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, उनकी ग़लतियों को माफ़ कर दिया जाएगा और उनके लिए इज़्ज़त की रोज़ी होगी। (50)

लेकिन जो लोग हमारे संदेशों का विरोध करने में लगे रहे और उन्होंने हमें हरा देने की बेकार कोशिश की, उनके भाग्य में (जहन्नम की) आग में जाना लिखा है।  (51)

[ऐ रसूल], हमने आपसे पहले कभी कोई रसूल और नबी [Prophet] ऐसा नहीं भेजा कि जब भी उसने (सुधार करने की) कामना की हो, और शैतान ने उसमें कोई फ़ितना डालने की कोशिश न की हो। मगर अल्लाह शैतान के फ़ितनों [insinuations] को दूर कर देता है, और फिर अल्लाह अपने संदेशों [निशानियों] को और मज़बूत बना देता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (52)

शैतान के फितनों को अल्लाह केवल उन लोगों के लिए आज़माइश बना देता है, जिनके दिलों में रोग है और जिनके दिल (सच्चाई के विरोध में) कठोर हो गये हैं--- ज़ुल्म करने वाले (सच्चाई के) ज़बरदस्त विरोधी हैं----- (53)

और जिन्हें ज्ञान मिला है, अल्लाह चाहता है कि वे जान लें कि जो आयतें उतरी हैं, ये सच्चाई हैं जो तुम्हारे रब की तरफ़ से आयी हैं, ताकि वे इस पर विश्वास कर सकें और उसके सामने उनके दिल झुक जाएँ: अल्लाह ईमान रखने वालों को सीधा मार्ग दिखा देता है। (54)

विश्वास न करने वाले उस वक्त तक संदेह मे ही डूबे रहेंगे, जब तक कि क़यामत की घड़ी अचानक उनपर न आ जाए या एक ऐसे दिन की यातना उनपर न आ पहुँचे जिस दिन सारी आस टूट जाए। (55)

उस दिन सारा नियंत्रण व बादशाही अल्लाह ही की होगी: वह उन सब के बीच फ़ैसला कर देगा। जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, वे ख़ुशियों भरे बाग़ों (जन्नतों) में दाख़िल किए जाएंगे,  (56)

और जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों कोे झूठ समझते हुए ठुकरा दिया, उनके लिए अपमानित कर देने वाली यातना होगी। (57)


अल्लाह उन लोगों को (परलोक में) दिल खोलकर रोज़ी देगा, जो अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर (मदीना) चले आए, फिर मारे गए या जिनकी मौत हो गयी। और अल्लाह ही सबसे बेहतर रोज़ी देने वाला है। (58)

वह उन्हें ऐसी जगह पहुँचा देगा जिससे वे ख़ुश हो जाएँगे: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बेहद सहनशील है। (59)

ये बात तय है कि अगर एक आदमी किसी (दुश्मन) के आक्रामक रवैये का ठीक वैसा ही बदला ले जैसा उसके साथ किया गया हो, और उसके बाद (उसका दुश्मन) उस पर फिर ज़ुल्म करने लग जाए, तो अल्लाह उस (निर्दोष) की ज़रूर मदद करेगा: अल्लाह (बुराइयों को) अनदेखा करने वाला, बहुत माफ़ करने वाला है। (60)

ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही है जो रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है, और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (61)

ऐसा इसलिए भी है कि अकेला अल्लाह ही है जो सच्चाई है, और उसके सिवा वे जिस किसी को पुकारते हैं, निरा झूठ व मिथ्या हैं: वह अल्लाह है जो सबसे ऊँचा, सबसे महान है। (62)


(ऐ रसूल!), क्या आपने ध्यान नहीं दिया कि कैसे हम आसमान से पानी बरसाते हैं और अगले दिन (सूखी) ज़मीन हरी-भरी होकर लहलहाने लगती है? अल्लाह सचमुच बहुत बारीक नज़र रखने वाला, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है; (63 )

आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसी की है; केवल अल्लाह ही है जो किसी पर निर्भर नहीं, हर तरह की तारीफ़ों के लायक़ है। (64)

क्या तुमने ध्यान नहीं दिया कि कैसे अल्लाह ने ज़मीन की हर एक चीज़ को तुम्हारे काम में लगा रखा है? कि उसी के हुक्म से समंदर में जहाज़ चलते हैं? उसने आसमानों को इस तरह रोक रखा है कि बिना उसकी अनुमति के वे ज़मीन पर नहीं गिर सकते। अल्लाह इंसानों के लिए बड़ा तरस खानेवाला, बेहद दयावान है----- (65)

वही है जिसने तुम (लोगों) को ज़िन्दगी दी, वही तुम्हें मौत देगा, और फिर वही तुम्हें दोबारा ज़िंदा करने वाला है---- मगर आदमी सचमुच शुक्र अदा करने वाला नहीं है। (66)


हर समुदाय के लिए हमने इबादत (पूजा-पाठ) करने का तरीक़ा तय कर रखा है, जिसका पालन उसके लोग करते है, अतः इस मामले में उन्हें (ऐ रसूल) आपसे झगड़ने की ज़रूरत नहीं है। आप उन्हें अपने रब की ओर बुलाएं---- आप बिल्कुल सीधे मार्ग पर हैं---- (67)

और अगर (इस पर भी) वे आपसे झगड़ा करें तो कह दें, "तुम जो कुछ कर रहे हो अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है।” (68)

तुम जिन बातों में आपस में एक दूसरे से झगड़ा करते रहते हो, क़यामत के दिन अल्लाह तुम्हारे बीच फ़ैसला करके हक़ीक़त साफ़ कर देगा। (69)

(ऐ रसूल), क्या आपको मालूम नहीं कि वे सारी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, उन्हें अल्लाह जानता है? ये सारी चीज़ें एक किताब में लिखी हुई हैं; यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है। (70)


तब भी ये लोग अल्लाह को छोड़कर उन चीज़ों की बंदगी करते हैं जिनके लिए न तो उसने कोई प्रमाण [authority] भेजा, और न तो उनके पास (आसमानी) ज्ञान की कोई रौशनी है: (याद रहे) कोई न होगा जो शैतानी करने वालों की मदद कर सके।  (71)

[ऐ रसूल!], जब हमारे संदेश उनके सामने साफ़-साफ़ पढ़कर सुनाए जाते हैं, तो विश्वास न करने वालों के चेहरों पर आप दुश्मनी के भाव साफ़ देख सकते हैं: ऐसा लगता है मानो हमारी आयतों को सुनाने वालों पर ये हमला कर बैठेंगे। कह दें, "क्या मैं तुम्हें बता दूँ कि तुम जैसा अभी महसूस कर रहे हो, इससे कहीं बुरी चीज़ क्या है? 'आग' है वह! जिसका वादा अल्लाह ने विश्वास न करने वालों के लिए कर रखा है! क्या दुख भरा अंत है यह!"  (72)

ऐ लोगों! एक मिसाल पेश की जाती है, उसे ध्यान से सुनो: अल्लाह को छोड़कर तुम (ज़रुरत के समय) जिन्हें पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते चाहे वे अपनी सारी ताक़तें एक साथ जोड़ भी लें, और अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो वे उसके चंगुल से उसको छुड़ा भी नहीं सकते। कितने बेबस और असहाय हैं मदद मांगने वाले और कितने कमज़ोर हैं ये जिनसे मदद माँगी जाती है! (73)

उन्होंने असल में अल्लाह के सही मक़ाम [True measure] को पहचाना ही नहीं: अल्लाह सचमुच बहुत मज़बूत, बेहद प्रभुत्वशाली है। (74)


अल्लाह फ़रिश्तों में से भी संदेश पहुँचाने वाले को चुनता है और इंसानों में से भी। अल्लाह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है:  (75)

वह जानता है जो कुछ उनके आगे होने वाला है और जो कुछ उनके पीछे हो चुका है। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौटकर आते हैं। (76)

ऐ ईमानवालो! (अल्लाह के सामने) रुकू में झुको, (माथा टेकते हुए) सज्दे में झुको, और अपने रब की बंदगी करो, और अच्छा व नेक काम करो ताकि तुम कामयाब हो सको। (77)

अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा दो, (उसके रास्ते में) जान लड़ाने का जो हक़ है, उसे पूरा करो: उसने तुम्हें चुन लिया है और उसने तुम्हारे दीन [धर्म] में कोई तंगी और कठिनाई नहीं रखी, वह तरीक़ा तुम्हारा हुआ जो तुम्हारे बाप इबराहीम का तरीक़ा था। अल्लाह ने तुम्हें मुस्लिम [आज्ञाकारी] के नाम से पुकारा है----- पहले भी और इस (क़ुरआन) में भी------ ताकि यह रसूल तुम पर (सच्चाई के) गवाह रहें और तुम दूसरे लोगों पर गवाह रहो। अतः नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, तय किया हुआ ज़कात [alms] दिया करो, और अल्लाह का सहारा मज़बूती से पकड़े रहो: वही तुम्हारा रखवाला है---- तो क्या ही अच्छा रखवाला है वह और कितना अच्छा मददगार! (78)


नोट:

6: अल्लाह का ही वजूद ऐसा है जो किसी का मुहताज नहीं, बाक़ी सारी चीज़ें उसी की क़ुदरत से वजूद [अस्तित्व] में आती हैं, चाहे एक बच्चे का पैदा होना हो या ज़मीन से पौधा उगाना हो। अत: वह मुर्दों को भी दोबारा ज़िंदा करने की ताक़त रखता है। 

7: मरे हुए आदमियों को दोबारा ज़िंदा उठाने का मक़सद यही है कि दुनिया में जिस किसी ने अच्छे और भलाई के काम किए, उन्हें इसका इनाम दिया जाए और जिस किसी ने बुरे कर्म किए, उसे सज़ा दी जाए। अगर ऐसा न किया गया तो लोगों के साथ सही इंसाफ़ नहीं होगा।

11:  अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] और मदीना के पाखंडी लोग ऐसे थे कि उन्होंने इस्लाम तो अपना लिया था, मगर उनका ईमान पक्का नहीं था और यह अभी तक उनके दिल में ठीक से उतरा नहीं था। वे हमेशा एक संदेह की हालत में रहते थे, जब तक उन्हें कुछ आर्थिक फ़ायदा पहुँचता रहता, वे संतुष्ट रहते, मगर जैसे ही किसी संकट में डाले जाते जहाँ उन्हें कोई नुक़सान होता, वे फिर से अपने पुराने धर्म में वापस चले जाते, जबकि ईमानवालों का तरीक़ा यह होता है कि जब ख़ुशहाली हो, तो अल्लाह का शुक्र अदा करे और जब कोई नुक़सान हो, तो सब्र और धीरज से काम ले। 

15: "अल्लाह 'उसकी' कोई मदद करने वाला नहीं है", यहाँ "उसकी" का मतलब कुछ विद्वानों ने मुहम्मद (सल्ल) से लिया है, इस तरह पूरे वाक्य का मतलब यह है कि कुछ लोग सोचते थे कि अल्लाह मुहम्मद (सल्ल) की कोई मदद नहीं करेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अब वे सख़्त ग़ुस्से और झुंझलाहट में या तो अपना गला घोंट लें या आसमान तक रस्सी तानकर ऊपर जाएं और वहाँ से मुहम्मद साहब का संपर्क तोड़ दें।

17: साबी [Sabeans] कौन थे, इनकी पहचान कई लोगों से की गई है। ये एक अल्लाह को मानने वाले [monotheistic] लोग थे, मगर इन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि इनके पास अलग से कोई किताब या रसूल नहीं था, कुछ कहते हैं कि ये नूह (अलै) या यह्या अलै [John, the Baptist] के बताए हुए तरीक़े पर चलते थे, कुछ लोग कहते हैं कि ये तारों और ग्रहों को मानते थे। ये लोग  सीरिया या ईरान व इराक़ के दक्षिणी हिस्से में बसे हुए थे। 

मजूसी [Magians] एक ख़ुदा पर विश्वास रखने वाले प्राचीन फ़ारसी धर्म [Persian and Median religion] को मानने वाले थे जिनकी पहचान आम तौर से पारसी धर्म [ Zoroastrianism] से की जाती है।

25: पवित्र मस्जिद [काबा] और उसके आसपास की वे जगहें जो हज की रीतियों से जुड़ी हुई हैं, जैसे सफ़ा व मर्वा की पहाड़ियों के बीच दौड़ने की जगह, मिना, अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा आदि पर दुनिया भर के मुसलमानों का समान अधिकार है। ..... जो कोई अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना ख़ुदा बना बैठा या इस पवित्र मस्जिद के अहाते में धन का लेनदेन करने लगा, तो वह ज़ुल्म करेगा और वहाँ के नियमों को तोड़ेने वाला होगा। 

26: जैसा कि सूरह बक़रा (2: 127) में आया है कि जहाँ अल्लाह के घर [काबा] के अवशेष बचे थे, वह जगह अल्लाह ने हज़रत इबराहीम (अलै) को दिखायी और वहाँ इसे नये सिरे से बनाने का हुक्म दिया। काबा के गिर्द सात (7) बार चक्कर लगाने [तवाफ़] को हज और उमरा [छोटा हज] की ज़रूरी रीतियों में माना जाता है। 

28: हज के लिए "निर्धारित दिन" इस्लामी कैलेंडर के बारहवें महीने [ज़ुल-हिज्जा] की दस तारीख़ से तेरह तारीख तक माना जाता है। हज की रीतियों में जानवरों की क़ुर्बानी भी एक ज़रूरी काम है।...... यहाँ आने का फ़ायदा जैसे नमाज़ें, हज, गुनाहों की माफ़ी माँगना आदि के साथ-साथ हर जगह के मुसलमानों से मिलना और उनसे संभावित व्यापार बढ़ाना।  

29: हज के दौरान बाल या नाख़ुन काटना मना होता है, जब हज की रीतियाँ पूरी करके जानवर की क़ुर्बानी कर दी जाती है, उसके बाद ही सिर के बाल मुंडवाना /काटना, नाख़ुन काटना, नहाना आदि कर सकते हैं, इसे ही "साफ़-सुथरे" होना कहा गया है। इसके बाद काबा का सात बार चक्कर [तवाफ़ ए ज़ियारत] लगाया जाता है। लोगों के इबादत करने के लिए बनाया गया सबसे पहला घर "काबा" को माना जाता है (3: 96), इसलिए इसे "पुराना घर" [बैत ए अतीक़] कहा गया है।

30: सभी जानवरों को क़ुर्बानी के लिए और खाने के लिए हलाल [वैध/lawful] कर दिया गया है, सिवाय मुर्दा जानवर (का सड़ा गोश्त), ख़ून, सूअर का गोश्त और वह जानवर जिसको काटते समय अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, इसके अलावा इस बारे में विस्तार से देखें सूरह मायदा (5: 3).

31: अल्लाह की ख़ुदायी में किसी को साझेदार [Partner] बनाना ऐसा है जैसे कि उसे आसमान से नीचे गिरा दिया गया हो यानी उसके ईमान में बहुत गिरावट आ गई हो, नतीजा यह होता है कि वह अपने मन की इच्छाओं के चलते इधर-उधर भटकता फिरता है जैसे कि उसे किसी पक्षी ने हवा में उचक लिया हो और यहाँ-वहाँ लिए फिरता हो, फिर वह शैतान के बहकावे में आकर सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ता है जैसे कि हवा ने उसे किसी दूर जगह फेंक दिया हो।

32: रीतियों [शुआएर] का मतलब वह निशानियाँ जिनको देखकर कोई दूसरी चीज़ याद आए। हज के दौरान की जाने वाली रीतियाँ [rituals/rites] और जिन जिन जगहों पर इन रीतियों को करना है, सब पवित्र और आदर की चीज़ें हैं। 

33: जब तक किसी चौपाए जानवर को हज की क़ुर्बानी के लिए मान न लिया हो, तब तक उससे हर क़िस्म का फ़ायदा उठाया जा सकता है, जैसे सवारी करना, दूध निकालना, ऊन निकालना आदि, लेकिन एक बार इसे क़ुर्बानी करने के लिए मान लिया, तब उससे कोई फ़ायदा उठाना सही नहीं होगा।     

36: अनुवाद में ऊँट लिखा गया है, मगर असल शब्द "बुद्न" है जो गाय के लिए भी बोला जाता है। 

38: मक्का में विश्वास न करनेवालों ने मुसलमानों पर क़रीब 13 साल ज़ुल्म किया और उन्हें घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर किया, मगर मक्का की ज़िंदगी के दौरान क़ुरआन में मुसलमानों को सब्र व धीरज से काम लेने के लिए कहा गया था। यहाँ अल्लाह ने वादा किया है कि वह मुसलमानों को ज़ालिमों से बचा लेगा, इसलिए अगली आयत 39 में अब उन ज़ालिमों के ख़िलाफ़ पहली बार हथियार उठाने की इजाज़त दी जा रही है। 

40: हथियार उठाने की अनुमति क्यों दी गई? यहाँ बताया गया है कि ईमानवालों पर केवल इस बात के लिए इतना ज़ुल्म किया गया और घरों से निकाला गया कि उन्होंने अपना रब अल्लाह को मान लिया था। जितने भी नबी [Prophets] दुनिया में आए, सब ने अल्लाह की इबादत करने का संदेश दिया, और इबादतगाहें बनायीं जहाँ अल्लाह को बराबर याद किया जाता है, मगर हर दौर में विश्वास न करनेवालों ने उन इबादतगाहों को मिटाना चाहा, इसीलिए ज़रूरी है कि उनसे लड़ा जाए और उन्हें बुरे काम से रोका जाए।  

41: यहाँ बताया गया है कि जब ईमानवालों की अल्लाह की मदद से जीत हो जाए और उनकी हुकूमत क़ायम हो जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए। नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने के अलावा अहम काम यह है कि भलाई व नेकी के काम करने का हुक्म देना है और बुराई से रोकना है। 

47: अल्लाह के यहाँ का एक दिन दुनिया के एक हज़ार साल जैसा है, इस बात के कई मतलब बताए जाते हैं। अल्लाह ने छ: दिनों में आसमान, ज़मीन और पूरी कायनात बनायी थी (25: 59; 32: 4; 50: 38). वहाँ का एक दिन उसी छ: दिनों में से एक दिन के बराबर है। दूसरा मतलब यह भी बताया जाता है कि काफ़िरों के लिए क़यामत का दिन डर और बदहवासी के कारण एक हज़ार साल जैसा लगेगा।  

52: चूँकि नबी/रसूल कोई फ़रिश्ते नहीं थे, बल्कि इंसान थे, इसलिए उनके भी जज़्बात थे, उन पर भी शैतानों द्वारा डाले गए शक व संदेह का कुछ समय के लिए थोड़ा असर हो सकता था, मगर चूँकि उनकी हिफ़ाज़त अल्लाह करता था, इसलिए उन पर ऐसे फ़ितनों का कोई असर नहीं पड़ता था। 

55: फ़ैसले के दिन को "अक़ीम" [उजाड़] कहा गया है क्योंकि इसके बाद ज़मीन पर से हर तरह का जीवन ख़त्म हो जाएगा और इसके बाद फिर कोई नया दिन नहीं होगा।

56: इस दुनिया में अल्लाह ने अपने कुछ बंदों को कुछ अधिकार दे रखे हैं, मगर फ़ैसले के दिन अल्लाह को छोड़कर किसी को कोई अधिकार न होगा।

60: यहाँ इशारा उन मुसलमानों की तरफ़ है जिनके साथ मक्का में ज़ुल्म किया गया, उन्हें उनके घरों से निकाला गया, तो जितना ज़ुल्म उन मक्का वालों ने किया, ठीक उतना ही बदला उनसे लिया जा सकता है। ध्यान रहे कि मक्का में उतरी हुई सूरतों में हमेशा ज़ुल्म के जवाब में सब्र और धीरज रखने का हुक्म दिया गया था, मगर जैसा आयत 39 में है, उन्हें ज़ुल्म के ख़िलाफ हथियार उठाने की अनुमति दे दी गई।  

61: जिस तरह मौसम बदलने पर दिन और रात के समय में बदलाव आता रहता है, उसी तरह कभी अल्लाह जिन लोगों पर ज़ुल्म हो रहा हो, उन्हें जीत दिला देता है, और जो ज़ालिम और ताक़तवाले हैं उन्हें नीचा दिखा देता है। 

67: दुनिया में जितने भी पैग़म्बर आए, सब यही संदेश लेकर आए कि एक ख़ुदा पर विश्वास रखो और अच्छे कर्म करो। लेकिन हर धार्मिक समुदाय का अपना-अपना क़ानून था। मुसलमानों को ज़िंदगी जीने के जो नियम-क़ायदे बताए गए हैं, उसे "शरीअत" यानी "रास्ता" कहते हैं।

78: अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा देने [जिहाद] का मतलब संघर्ष करना और कोशिश करना होता है। अल्लाह के रास्ते में हर तरह का संघर्ष चाहे हथियारों से लड़ना हो, या शांतिपूर्ण तरीक़े से कोशिश करना हो या अपने आपको सुघारने के लिए की गई कोशिश हो, सभी शामिल है।

मुहम्मद (सल्ल) अपनी उम्मत के लोगों के लिए गवाही देंगे कि ये लोग ईमानवाले थे, देखें 2: 147. 







Medina- H2


सूरह 2: अल-बक़रा 

[गाय / The Cow]


यह क़ुरआन की सबसे लम्बी सूरह है जिसकी आयतें कई सालों में थोड़ी-थोड़ी उतरी थीं। आयत 67 में एक गाय की कहानी का ज़िक्र आया है जिसके नाम पर इस सूरह का नाम पड़ा है, जिसमें इसराइलियों को गाय ज़िबह करने का हुक्म दिया गया था (आयत 66)।पहली सूरह, "अल-फ़ातिहा" में जो सीधा रास्ता दिखाने की दुआ की गई थी, उसी के जवाब में इस सूरह की शुरुआत हुई है, और फिर इस मार्गदर्शन पर अमल करने के हिसाब से सभी इंसानों को तीन समूह में बाँटा गया है ---- सच्चाई पर विश्वास करने वाले (मोमिन), सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करने वाले (काफ़िर), और पाखंडी लोग (मुनाफ़िक़) ---- और फिर सूरह की समाप्ति में ईमान के उन सिद्धांतों की पुष्टि की गई है जिसे शुरू की आयतों (3-5) में बताया गया है। जैसे-जैसे सूरह आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे संबोधित किए गए लोग भी बदलते रहते हैं: बहुत बार इंसानों को आम तौर से संबोधित किया गया है (आयत 22), जहाँ उन्हें कहा गया है कि वे केवल अल्लाह की बंदगी किया करें क्योंकि अल्लाह उनके लिए कितनी मेहरबानियाँ करता रहा है (उन्हें याद दिलाया गया है कि किस तरह अल्लाह ने आदम को पैदा किया और उसे फ़रिश्तों पर वरीयता दी), फिर आदम और उसकी संतानों से शैतान की दुश्मनी का ज़िक्र भी हुआ है। इसराईल की संतानों को याद दिलाया गया है (आयत 40) कि किस तरह अल्लाह ने उन पर अपना ख़ास करम किया, और ज़ोर देकर उन्हें उन  किताबों पर विश्वास करने को कहा गया है जो उनकी किताब की सच्चाई की पुष्टि करती है, और फिर ईमानवालों को (आयत 136), बहुत सारे मामले में ज़रूरी निर्देश दिए गए हैं ---- नमाज़, रोज़ा, हज, रक्षा, शादी-ब्याह के नियम, जिहाद, वसीयत, आर्थिक मामले जैसे क़र्ज़, ब्याज आदि। इस सूरह के बड़े हिस्से में यहूदियों की रीतियों और तौर-तरीक़े के बारे में चर्चा की गई है।



विषय:

02-07: किताब, ईमानवाले और इंकार करने वाले

08-20: ईमान का ढोंग करने वाले 

21-25: ईमानवालों को ताकीद

26-29: विश्वास न करने वालों से अपील 

30-39: आदम, इबलीस और जन्नत से निकलना 

40-48: इसराईल की संतानों से अपील 

49-50: इसराइलियों का फिरऔन से छुटकारा मिलना  

51-74: इसराइलियों द्वारा आज्ञा न मानने की मिसालें 

75-82: यहूदियों द्वारा तौरात में अपनी तरफ़ से कुछ फेर-बदल 

83-103: इसराइलियों द्वारा आज्ञा न मानने की मिसालें (जारी) 

104-110: किताबवाले लोगों के बारे में चेतावनी 

111-121: यहूदियों और ईसाइयों की कड़ी निंदा 

122-123: इसराईल की संतानों से अपील 

124-129: मक्का में इबराहीम (अलै)

130-141: इबराहीम (अलै) का दीन 

142-152: नमाज़ पढ़ने की दिशा [क़िबला] में बदलाव

153-157: जो लोग अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए जान देते हैं

158       : "सफ़ा" और "मरवा" की पहाड़ी 

159-162: जो आसमानी किताब का कुछ हिस्सा छुपाते हैं, उन्हें चेतावनी 

163-167: बहुदेववादियों को सावधान किया गया 

168-173: खाने के बारे में आदेश 

174-176: जो आसमानी किताब का कुछ हिस्सा छुपाते हैं, उन्हें चेतावनी 

177       : सच्ची भलाई 

178-179: जान के बदले जान की सज़ा 

180-182: वसीयतें 

183-187: रोज़े रखना 

188       : धन-दौलत का ग़लत इस्तेमाल 

189 (क): नया चाँद 

189 (ख): घरों में सामने के दरवाज़े से दाख़िल हो 

190-194: अल्लाह के रास्ते में लड़ना 

195       : अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करना 

196-203: हज से जुड़े हुए नियम-क़ायदे 

204-207: झूठे और सच्चे बंदे 

208-214: एकता के लिए अपील 

215       : अल्लाह के रास्ते में (भलाई के लिए) ख़र्च करना 

216-218: अल्लाह के रास्ते में लड़ना 

219       : शराब और जुआ खेलना 

219-220: दान देना 

220  (ख): यतीम [अनाथ] 

221-237: शादी, तलाक़ और पारिवारिक मामले से जुड़े क़ानून 

238-239: नमाज़ को पाबंदी और सही समय पर पढ़ना 

240-242: विधवाओं को खाने-कपड़े का ख़र्च मिलना चाहिए 

243-245: अल्लाह के रास्ते में  ख़र्च करना

246-251: तालूत, जालूत और दाऊद (अलै) की कहानी 

252-253: आप उनलोगों में से हैं जिन्हें हमने रसूल बनाकर भेजा 

254       : अपने माल में से दूसरों पर ख़र्च करना 

255       : "कुर्सी वाली आयत"[आयत-उल-कुर्सी] 

256-257: दीन में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं 

258-260: अल्लाह मुर्दा पड़े हुए लोगों को भी ज़िंदा कर देता है 

261-274: अल्लाह के रास्ते में मदद करना 

275-284: सूद/ब्याज, क़र्ज़ और अनुबंध [Agreements] 

285-286: ईमान का कारोबार, और एक आख़िरी दुआ 



 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)


यह [क़ुरआन] एक ऐसी किताब है, जिसकी (किसी बात पर) कोई सन्देह नहीं, यह उन लोगों के लिए (नेकी का) रास्ता दिखानेवाली है, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं,  (2)


जो नज़र से ओझल चीज़ों (की हक़ीक़तों) पर ईमान रखते हैं, ठीक ढंग व पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है, उसे (अल्लाह के रास्ते में दूसरों पर) ख़र्च करते हैं; (3)


और वह लोग जो उस ['वही'/Revelation] पर ईमान रखते हैं जो [ऐ रसूल] आप पर उतारी गयी, और उन पर भी (विश्वास रखते हैं) जो आपसे पहले उतारी जा चुकी हैं, और (साथ ही) जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी पर भी पक्का विश्वास रखते हैं; (4)


तो यही लोग हैं जो अपने रब के (ठहराए हुए) रास्ते पर हैं, और यही हैं जो (इस दुनिया और आनेवाली दुनिया में) कामयाबी पाएंगे।  (5)


जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े हुए हैं, आप उन्हें सावधान करें या न करें, उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता: वे विश्वास करने वाले नहीं हैं। (6)


अल्लाह ने उनके दिलों और कानों को बंद करके ठप्पा (seal) लगा दिया है, और उनकी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ है। उन्हें ज़बरदस्त यातना होगी।  (7)

 

कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि “हम अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, हालाँकि असल में वे (इस बात पर) विश्वास नहीं रखते। (8)


वे अल्लाह और ईमानवालों को धोखा देना चाहते हैं, मगर (असल में) धोखा वे स्वयं अपने आपको ही दे रहे हैं, परन्तु वे इस बात को समझते नहीं हैं।  (9)


उनके दिलों में एक रोग है, जिसे अल्लाह ने और बढ़ा दिया है: झूठ बोलते रहने के कारण उन्हें दर्दनाक यातना होगी। (10)


जब उनसे कहा जाता है कि "ज़मीन में बिगाड़ पैदा मत करो", तो कहते हैं, "हम तो केवल चीजों को सुधार रहे हैं",  (11)


मगर असल में वे बिगाड़ पैदा कर रहे हैं, हालांकि उन्हें एहसास नहीं होता। (12)


जब उनसे कहा जाता है, "(सच्चाई पर) विश्वास कर लो, जिस तरह दूसरे लोगों ने विश्वास किया है", तो कहते हैं, "क्या हम भी विश्वास कर लें, जिस तरह (इन) बेवक़ूफ़ लोगों [fools] ने विश्वास कर लिया है?" मगर (असल में) यही लोग बेवक़ूफ़ हैं, हालाँकि वे (जिहालत व घमंड के कारण) इस बात को नहीं जानते।  (13)


जब वे ईमान रखनेवालों से मिलते हैं तो कहते हैं, "हम विश्वास करते हैं," मगर जब अकेले में अपने शैतानों के साथ होते हैं, तो कहते हैं, "हम तो असल में तुम्हारे साथ हैं; हम तो केवल (विश्वास करनेवालों की) हँसी उड़ा रहे थे।" (14)


(मगर सच्चाई यह है कि) उनकी ही हँसी उड़ायी जा रही है, और अल्लाह उन्हें और ढील दिए जा रहा है ताकि वे अपनी सरकशी [insolence] में अंधों की तरह भटकते फिरें। (15)


इन लोगों ने मार्गदर्शन के बदले में गुमराही मोल ले ली, इसीलिए इस व्यापार से न तो उन्हें कोई लाभ पहुँचा, और न ही वे सीधा मार्ग पा सके। (16)


उनकी मिसाल ऐसे लोगों की तरह है जिन्होंने (अंधेरे में बड़ी मेहनत से) आग जलाई हो: फिर जब उनके आसपास की हर चीज़ रौशन हो गयी, तो अल्लाह ने उनकी रौशनी ही छीन ली और उन्हें गहरे अँधेरों में छोड़ दिया, जहाँ कुछ सुझाई न देता हो -----  (17)


वे बहरे हैं, गूँगें हैं, और अन्धे हैं: वे (सही रास्ते पर) कभी नहीं लौटेंगे।  (18)


या (उनकी मिसाल ऐसे लोगों की है) जो आसमान से बादल फट पड़ने पर होने वाली तेज़ बारिश में घिर गए हों, साथ में अँधेरा हो, और गरज और चमक भी, वह बिजली की भयानक कड़क के चलते मौत के डर से अपने कानों में उँगलियाँ ठूंस ले रहे हों-----अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करनेवालों को घेर रखा है।  (19)


बिजली की चमक मानो उनकी आँखों की रौशनी उचक लेने को है: जब कभी बिजली चमकती है, तो वे (उसकी रौशनी में) चल पड़ते हैं और जब उन पर अँधेरा छा जाता है, तो वे ठिठककर खड़े हो जाते हैं। अगर अल्लाह चाहता तो उनकी सुनने और देखने की शक्ति बिल्कुल ही छीन लेता: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है।  (20)


ऐ लोगो! बन्दगी [worship] करो अपने रब की, जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम (अल्लाह से डरते हुए) बुराइयों से बच सको  (21)


जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फ़र्श की तरह बिछा दिया और आसमान को छत की तरह ऊँचा उठा दिया; वही है जिसने आसमान से बारिश उतार भेजी, फिर उस पानी से तुम्हारी जीविका के लिए (खाने-पीने की) चीज़ें पैदा कर दीं। यह जानते हुए (कि उसके सिवा कोई नहीं), ऐसा न करो कि किसी को अल्लाह के बराबर का ठहराओ। (22)


हमने अपने बन्दे पर जो 'वही' [Revelation] उतार भेजी हैं, उनकी (सच्चाई के) बारे में अगर तुम्हें कोई सन्देह हो, तो तुम उस जैसी कोई एक सूरह बना लाओ ---- अल्लाह के अलावा अपने जो भी सहायक हों, उन्हें भी बुला लो ----- अगर सचमुच तुम्हें लगता है (कि तुम यह कर सकते हो)।  (23)


अगर तुम यह न कर सको ----- और तुम यह कभी नहीं कर सकोगे ------ तो फिर डरो उस आग से जो (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के लिए तैयार की गई है, जिसका ईधन इंसान और पत्थर हैं।  (24)

 

[ऐ रसूल], जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए, आप उन्हें ख़ुशख़बरी सुना दें कि उनके लिए ऐसे बाग़ होंगे जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी। जब भी उन बाग़ों में से कोई फल उन्हें रोज़ी के रूप में मिलेगा, तो वे कहेंगे, "यह तो हमें पहले भी दिया जा चुका है," क्योंकि उन्हें इससे मिलता-जुलता (फल दुनिया में) दिया गया था। उनके लिए वहाँ पाक-साफ़ मियाँ/बीवियाँ [spouses] होंगी, और वे हमेशा वहाँ रहेंगे। (25)


अल्लाह इस बात से नहीं शर्माता कि वह (बात समझाने के लिए) मच्छर जैसी कोई छोटी सी छोटी चीज़ की मिसाल पेश करे, या उससे भी बढ़कर किसी तुच्छ चीज़ की: सो ईमानवाले तो जान लेते हैं कि यह उनके रब की तरफ़ से सच्चाई है, मगर (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैैं, "भला ऐसी मिसाल देने से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?" (अल्लाह की) ऐसी मिसाल के ज़रिए कितने हैं जो रास्ते से भटक जाते हैं, और कितने हैं जिन्हें वह सीधा रास्ता दिखा देता है। मगर जो बाग़ी हो चुके (और कोई बात नहीं मानते), केवल उन्हें वह भटकने के लिए छोड़ देता है:  (26)


(बाग़ी वे हैं) जो अल्लाह के आदेश को मानने की प्रतिज्ञा करके उसे तोड़ डालते हैं, जिन रिश्तों के जोड़ने का अल्लाह ने आदेश दिया है उसे काट डालते हैं, जो मुल्क में फ़साद फैलाते हैं, यही हैं जो घाटे में रहेंगे।  (27)


तुम अल्लाह (और उसकी बंदगी करने) से कैसे इंकार कर सकते हो, जबकि तुम बेजान थे तो उसने तुम्हें ज़िंदगी दी, फिर वही है जो तुम्हें मौत देगा, फिर मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करेगा, फिर अंत में उसी के सामने तुम्हें लौटना है? (28)


वही तो है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन की सारी चीज़ें पैदा कीं (ताकि तुम उससे काम लो), फिर आसमान की तरफ़ ध्यान दिया और (तुम्हारे फ़ायदे के लिए) सात आसमान बना दिए; वही है जो हर चीज़ की जानकारी रखता है।  (29)

 

(ऐ रसूल), जब ऐसा हुआ था कि आपके रब ने फरिश्तों से कहा, "मैं ज़मीन पर (आदमी को) खलीफ़ा [उत्तराधिकारी/ Successor] बनाने वाला हूँ," फ़रिश्तों ने कहा, "तू किसी ऐसे को ज़मीन पर किस तरह (ख़लीफा बनाकर) रख सकता है जो वहाँ बर्बादी फैलाएगा और ख़ूनख़राबा करेगा, जबकि हम तेरा गुणगान करते हैं और तेरी पवित्रता का ज़िक्र करते रहते हैं?" मगर अल्लाह ने कहा, "मैं वह चीज़ें जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।" (30)


अल्लाह ने आदम [Adam] को सभी (चीज़ों के) नाम सिखा दिए, फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और कहा, "अगर तुम सचमुच यह समझते हो (कि तुम बता सकते हो, तो) इन चीज़ों के मुझे नाम बताओ।" (31)


फ़रिश्तों ने कहा, "महिमावान है तू! हमें केवल उतनी ही जानकारी है जितना कुछ तूने हमें सिखाया है। तू ही हर चीज़ का जाननेवाला, हर चीज़ की समझ-बूझ रखनेवाला है।" (32)


तब अल्लाह ने कहा, "ऐ आदम! तुम उन्हें इन चीज़ों के नाम बताओ।" फिर जब आदम ने उन्हें उन (चीज़ों) के नाम बता दिए, तो अल्लाह ने कहा, "क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मैं जानता हूँ जो कुछ आसमानों और ज़मीन में छिपा हुआ है, और यह कि मैं यह भी जानता हूँ जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो?" (33)

 

फिर जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम के आगे (झुकते हुए) सज्दा करो" तो, वे सब (आदम के सामने) झुक गए, मगर इबलीस [शैतान] ने अपनी गर्दन नहीं झुकायी। उसने (हुक्म मानने से) इंकार कर दिया और वह था भी बड़ा घमंडी: वह विश्वास न करनेवालों में शामिल हो गया।  (34)


(फिर ऐसा हुआ कि) हमने कहा, "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों इस जन्नत [बाग़] में रहो। तुम दोनों जिस तरह चाहो खाओ-पियो, मगर (देखो) इस पेड़ के नज़दीक भी मत जाना, अन्यथा तुम दोनों (मर्यादा तोड़नेवाले) ज़ालिम ठहराए जाओगे।" (35)


मगर शैतान (के प्रलोभन ने) उन्हें फिसलने पर मजबूर कर दिया, और फिर वे जिस (आराम व आनंद की) हालत में वहाँ थे, उससे उन दोनों को निकलना पड़ा। हमने कहा, “तुम सब यहाँ से निकल जाओ! तुम दोनों (शैतान और आदमी) एक-दूसरे के दुश्मन होगे। अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी, और एक निर्धारित समय तक जीने के लिए रोज़ी होगी।" (36)


फिर आदम को अपने रब से (तौबा करने के लिए दुआ के) कुछ शब्द मिल गए और (उसके द्वारा) अल्लाह ने उसकी तौबा [repentance] क़बूल कर ली: वह तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।  (37)


(आदम को माफ़ करने के बाद) हमने कहा, "तुम सब यहाँ से (ज़मीन पर) चले जाओ! (और नयी ज़िन्दगी शुरू करो)। मगर (याद रहे) जब  मेरी तरफ़ से कोई मार्गदर्शन (guidance) आ जाए, जो कि ज़रूर आएगा, तो जो लोग मेरे दिखाए हुए रास्ते पर चलेंगे, उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे दुखी होंगे ------  (38)


जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया और हमारे संदेशों को झूठ समझते हुए ठुकरा दिया, वे आग में रहने वाले हैं, जहां वे हमेशा के लिए रहेंगे।” (39)

 

ऐ इसराईल की सन्तान! याद करो कि मैंने कैसी-कैसी नेमतें [bounty] तुम पर की थीं। और (देखो) तुम मुझसे ली गई प्रतिज्ञा को पूरा करो, और मैं तुमसे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करूँगा: मैं ही हूं जिससे तुम्हें डरना चाहिए।  (40)


मेरे उस संदेश [क़ुरआन] पर विश्वास करो, जो मैंने उतार भेजा है, जो उसकी पुष्टि करता हुआ आया है जो तुम्हारे पास (पहले से) है। (देखो), सबसे पहले तुम ही इस पर (विश्वास करने से) इंकार करनेवाले न बन जाओ, और मेरे संदेशों को थोड़े दाम के बदले न बेच डालो: मैं ही तो वह हूँ जिसकी आज्ञा न मानने से तुम्हें बचना चाहिए।  (41)


सच और झूठ को एक साथ मत मिला दिया करो, या जानते-बूझते सच को छिपाया मत करो। (42)


पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, निर्धारित ज़कात [alms] अदा करो, और जब (अल्लाह के सामने) झुकनेवाले झुकें, तो उनके साथ तुम भी सिर झुका दो।  (43)


लोगों को तुम नेकी का उपदेश कैसे दे सकते हो जबकि तुम ख़ुद ही उस पर अमल करना भूल जाते हो, हालाँकि तुम किताब [तोरात/Torah] भी पढ़ते हो? क्या इतनी मोटी सी बात भी तुम्हारी समझ में नहीं आती? (44)


(स्वयं में सुधार लाने के लिए) सब्र [धैर्य] और नमाज़ से मदद लो ----- हालांकि यह (नमाज़) किसी के लिए भी सचमुच बहुत कठिन चीज़ है, मगर उन लोगों के लिए (मुश्किल) नहीं, जिनके दिल (अल्लाह के आगे) झुके होते हैं, (45)


जो जानते हैं कि (एक दिन) उन्हें अपने रब से मिलना होगा, और (अंत में) उसी की ओर उन्हें लौटकर जाना होगा।  46)

 

ऐ इसराईल की सन्तान! याद करो कि कैसी-कैसी नेमतें मैंने तुम पर की थीं और इसे भी (याद करो) कि किस तरह मैंने तुम्हें दूसरे सभी लोगों पर श्रेष्ठता दी थी। (47)


उस दिन की पकड़ से बचकर रहो, जब न तो कोई आदमी दूसरे आदमी के काम आ सकेगा, न किसी की सिफ़ारिश सुनी जाएगी, न किसी को भरपाई [ransom] लेकर छोड़ा जाएगा; और न ही कहीं से किसी तरह की सहायता मिलेगी।  (48)


याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों (की ग़ुलामी) से छुटकारा दिलाया था, जो तुम्हें बहुत बुरी यातना देते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और केवल तुम्हारी औरतों को (अय्याशी के लिए) ज़िंदा रहने देते थे ------ इसमें तुम्हारे रब की ओर से बड़ी कड़ी परीक्षा थी----  (49)


और याद करो जब हमने (मिस्र से निकल भागने के बाद) तुम्हारे लिए समंदर में रास्ता बनाया था, कि तुम उसमें से बचकर निकल गए, और फ़िरऔन के लोगों को तुम्हारी आँखों के सामने डुबा दिया था। (50)


और (वह घटना भी) याद करो जब हमने मूसा [Moses] से (सीना के पहाड़ पर) चालीस रातों का वादा ठहराया था, और फिर जब वह तुमसे दूर गया हुआ था, तो उसके जाते ही तुम एक बछड़े की पूजा करने लग गए ---- जो बड़ा भारी गुनाह था।  (51)


इतना होने के बावजूद भी हमने तुम्हें माफ़ कर दिया, ताकि तुम शुक्रिया अदा करनेवाले बन सको।  (52)

 

याद करो जब हमने मूसा [Moses] को किताब [तोरात/Torah], और सही और ग़लत के बीच अंतर करने की कसौटी दी थी, ताकि तुम्हें सही रास्ता दिखाया जा सके।  (53)


जब मूसा (चालीस रातों के बाद अल्लाह से किताब लेकर आया, तो) उसने अपने लोगों से कहा, "ऐ मेरी कौम के लोगो! तुम ने बछड़े की पूजा करके अपने आपको बड़े गुनाह में डाल लिया है, अतः अपने बनानेवाले से (अपने गुनाह की) तौबा करो, और अपने लोगों (में दोषियों) को क़त्ल करो। तुम्हारे पैदा करनेवाले की नज़र में तुम्हारे लिए यही सबसे उचित होगा।” इस तरह अल्लाह ने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली: वह (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है।"  (54)


याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम तुम पर तब तक विश्वास नहीं करेंगे जब तक अल्लाह को अपने सामने न देख लें।" इस बात पर, बिजली की एक कड़क ने तुम्हें आ पकड़ा था जबकि तुम देखते रह गए थे।  (55)


फिर तुम्हारे मुर्दा हो जाने के बाद हमने तुम्हें फिर से ज़िंदा किया, ताकि तुम मेरे प्रति शुक्र अदा करनेवाले बन सको। (56)


(जब तुम सीना [Sinai] के रेगिस्तान में धूप की गर्मी और भूख से बेहाल थे तब) हमने बादलों के ढेर से तुम्हें छाया दी, और तुम पर 'मन्न' [manna] और 'सलवा' [Quails] उतारा, और कहा था, "जी भर के खाओ उन अच्छी चीज़ों को, जो हमने तुम्हें दे रखी हैं।" (शुक्र न अदा करके) हमारा तो वे कुछ भी बिगाड़ न सके; उन्होंने अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया।  (57)

 

याद करो जब हमने कहा था, "इस शहर में दाख़िल हो जाओ और वहाँ तुम जो चाहो, आराम से खाओ-पियो, मगर जब उस (शहर के) दरवाज़े में दाख़िल हो, तो सिर झुकाकर और यह कहते हुए दाख़िल हो, "हमें (गुनाहों से) छुटकारा दे दे!" (अगर तूने ऐसा किया तो) हम तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देंगे और जो अच्छा व नेक काम करते हैं, उनको दिए जाने वाले इनाम को और ज़्यादा बढ़ा देंगे।" (58)


लेकिन जो शब्द उन्हें कहने के लिए बताया गया था, शैतानी करने वालोंं ने उस शब्द को किसी दूसरे शब्द से बदल दिया। अतः लगातार आज्ञा न मानने के कारण, हमने आसमान से उन पर (प्लेग जैसी) यातना उतार भेजी।  (59)

 

(उस घटना को भी) याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों के लिए पानी की प्रार्थना की, तो हमने उससे कहा था, "पहाड़ की चट्टान पर अपनी लाठी मारो," नतीजे में उससे पानी के बारह सोते फूट निकले, और हर गिरोह ने अपना-अपना पानी लेने का घाट पता कर लिया। [तुम से कहा गया], जो रोज़ी अल्लाह ने दे रखी है, उसे खाओ और पियो, और ज़मीन पर झगड़ा-फ़साद पैदा न करते फिरो।" (60)


याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम एक ही तरह के खाने पर संतोष नहीं कर सकते, अतः अपने रब से दुआ करो कि हमारे लिए ज़मीन से उगने वाली कुछ चीज़ें पैदा कर दे, इसकी साग-सब्ज़ियाँ और ककड़ियाँ, लहसुन, दालें और प्याज़।" मूसा ने कहा, "क्या तुम (खाने की) बढ़िया चीज़ को घटिया चीज़ों से बदलना चाहते हो? (अब फिर से) तुम मिस्र चले जाओ, जो कुछ तुमने माँगा है, तुम्हें वहाँ मिल जाएगा।" उन (यहूदियों) पर अपमान और बदहाली की मार पड़ी, और उन्हें अल्लाह का प्रकोप झेलना पड़ा क्योंकि वे अल्लाह की आयतों [संदेशों] को मानने से लगातार इंकार करते रहे और हर सच्चाई का विरोध करते हुए नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह सब इसलिए हुआ कि उन्होंने आज्ञा मानने से इंकार किया और वे नियमों को तोड़ने में बेलगाम हो गए थे।  (61)

 

ईमान रखनेवाले [मुस्लिम] हों, यहूदी हों, ईसाई हों या साबी [Sabians] हों----- वे सारे लोग जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, और अच्छा कर्म करते हैं ------ तो वे (अपने कर्मों का) इनाम अपने रब के पास से ज़रूर पाएंगे। उन्हें न तो किसी तरह का डर होगा और न वे दुखी होंगे।  (62)


याद करो जब हमने तुमसे (इस हाल में) प्रतिज्ञा ली थी, (कि तुम उस वक़्त नीचे खड़े थे) और तूर पहाड़ की चोटी तुम्हारे ऊपर उठा दी गयी थी, और कहा था, "जो चीज़ [किताब] तुम्हें दी गयी है उस पर मज़बूती के साथ जमे रहो, और उसमें बतायी गयी बातों को याद रखो, ताकि तुम (गुनाहों से) बच सको।" (63)


इसके बावजूद भी तुम (अपनी प्रतिज्ञा से) फिर गए। अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, तो तुम अवश्य ही भारी घाटे में पड़ गए होते। (64)


तुम उन लोगों के बारे में तो जानते ही हो जिन्होंने 'सब्त' [Sabbath] के दिन के नियम तोड़े थे, और हमने उनसे कहा था, "बन्दर की तरह हो जाओ! तुम (आदमियों के पास से) दुत्कारे जाओगे!" (65)


हमने इसे उन लोगों के लिए एक उदाहरण बना दिया जो उस वक़्त वहाँ थे, और जो लोग उनके बाद दुनिया में आए, और जो अल्लाह से डरते हुए (गुनाहों से) बचते हैं, उनके लिए भी सीखने का एक सबक़ बना दिया।  (66)



याद करो जब मूसा ने अपने लोगों से कहा था, "अल्लाह का आदेश है कि तुम एक गाय को ज़बह करो।" वे (तरह-तरह के बहाने बनाने लगे, और) कहने लगे, "क्या तुम हमारी हँसी उड़ा रहे हो?" मूसा ने जवाब दिया, "अल्लाह बचाए मुझे, कि मैं जाहिलों की-सी बात करुं।" (67)


वे बोले, "हमारे लिए ज़रा अपने रब से पूछकर बताओ कि वह गाय किस तरह की होनी चाहिए?" उसने जवाब दिया, “अल्लाह कहता है कि वह गाय न तो बूढ़ी होनी चाहिए और न ही बछिया, बल्कि दोनों के बीच की हो, सो जैसा तुम्हें हुक्म दिया जाता है, उसे कर डालो।" (68)


वे कहने लगे, "हमारे लिए अपने रब से पूछकर बताओ कि उसका रंग कैसा होना चाहिए?" मूसा ने कहा, “अल्लाह कहता है कि वह गाय सुनहरी पीले रंग की होनी चाहिए, कि देखने वालों को भली लगे।" (69)


वे बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि असल में वह कौन-सी है: हमारी नज़र में सभी गाय लगभग एक जैसी ही है। अगर अल्लाह की मर्ज़ी रही, तो हम ज़रूर उस तक पहुंचने का रास्ता पा लेंगे।" (70)


मूसा ने जवाब दिया, "वह एक बेहतरीन गाय है जिसमें कोई दाग़-धब्बा नहीं है, वह सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो, या खेतों को पानी देती हो।" वे बोले, "अब तुमने असली बात बताई है," और इस तरह उन्होंने उसे ज़बह किया, हालांकि वे ऐसा करने में लगभग असफल हो चुके थे।  (71)


फिर जब [ऐ इसराइलियो!] तुमने किसी की हत्या कर दी थी और एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाना शुरू कर दिया था ------ हालाँकि जो कुछ तुमने छिपाया था, अल्लाह उसे उजागर कर देने वाला था ------ (72)


हमने कहा, "(मरनेवाले के) शरीर पर उस (गाय) के एक हिस्से से मारो”: इस तरह अल्लाह मुर्दे को ज़िंदा करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझ सको। (73)


फिर इसके बाद भी, तुम्हारे दिल पत्थर की तरह सख़्त हो गए, बल्कि उससे भी ज़्यादा सख़्त; क्योंकि कुछ पत्थर तो ऐसे भी होते हैं जिनसे पानी के सोते फूट निकलते हैं, और उन्हीं में से कुछ ऐसी चट्टानें भी हैं जो टूटकर दो टुकड़े हो जाती हैं, और उनमें से पानी अपना रास्ता बना लेता है, और कुछ दूसरी चट्टानें ऐसी भी हैं जो अल्लाह के डर से (काँपती हुई) गिर पड़ती हैं: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।  (74)

 

तो (ऐ ईमानवालो), क्या तुम ऐसे लोगों से उम्मीद कर सकते हो कि वे तुम्हारी बात पर विश्वास कर लेंगे, जबकि उनमें से कुछ लोग अल्लाह का कलाम सुना करते थे, फिर उसे भली-भांति समझ लेने के बाद भी उसमें जान-बूझकर तोड़-मरोड़ करते रहे? (75)


जब वे ईमानवालों से मिलते हैं, तो कहते हैं, "हम भी ईमान रखते हैं।" मगर जब आपस में एक-दूसरे से अकेले में मिलते हैं, तो कहते हैं, "अल्लाह की जो निशानियाँ (हम लोगों पर) उतरीं, उनके बारे में तुम उन लोगों को भला कैसे बता सकते हो? वे तो इसे तुम्हारे रब के सामने तुम्हारे ही ख़िलाफ़ बहस करने के लिए इस्तेमाल करेंगे! क्या तुम्हें कोई समझ है?" (76)


क्या वे नहीं जानते कि अल्लाह अच्छी तरह जानता है, जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं? (77)


उनमें से कुछ तो बिल्कुल पढ़े-लिखे नहीं हैं, और उन्हें (आसमानी) किताब [तोरात] का ज्ञान तो बस अपनी इच्छाओं व कामनाओं के द्वारा ही होता है। वे तो बस अटकल से काम लेते हैं।  (78)


सो तबाही है उन लोगों के लिए जो ख़ुद अपने हाथों से किताब लिखते हैं और दावा करते हैं कि "यह अल्लाह की तरफ़ से है", ताकि उसके द्वारा थोड़ा सा फ़ायदा कमा सकें। अफ़सोस उनपर जो कुछ उनके हाथों ने लिखा है! और अफ़सोस उनपर जो कुछ उन्होंने इसके द्वारा कमाया है!  (79)


ये (यहूदी) लोग कहते हैं, "जहन्नम की आग हमें केवल कुछ दिनों के लिए ही छुएगी।" उनसे कह दें, "क्या तुमसे अल्लाह ने कोई वादा कर रखा है?---- फिर तो अल्लाह कभी अपना वादा नहीं तोड़ता ----- या क्या तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहते हो जिसका तुम्हें असल में कोई ज्ञान ही नहीं है? (80)


सचमुच जो लोग शैतानियाँ करते हैं, और अपने गुनाहों से घिरे रहते हैं, तो ऐसे ही लोग (जहन्नम की) आग के वासी होंगे, वे हमेशा वहीं रहेंगे,  (81)


जबकि वे लोग जो ईमान रखते हैं, और अच्छा कर्म करते हैं, वे (जन्नत के) बाग़ों में रहेंगे, उन्हें हमेशा वहीं रहना है।" (82)


याद करो जब इसराईल की सन्तान से हमने वचन लिया था: "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो; माँ-बाप के साथ और नातेदारों के साथ, अनाथों और ग़रीबों के साथ अच्छा व्यवहार करो; सभी लोगों से भली बात कहो; पाबंदी से नमाज़ क़ायम करो और निर्धारित ज़कात [alms] दो।" तो फिर तुममें से थोड़े लोगों को छोड़कर सब ने मुंह फेर लिया, और इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया।  (83)


याद करो जब हमने तुमसे यह भी वचन लिया था, "एक-दूसरे का ख़ून न बहाओ, और न अपने लोगों को अपनी सरज़मीन से बाहर निकालो।" तुमने उस समय (इन वचनों को) स्वीकार किया था, और तुम स्वयं इसकी गवाही दे सकते हो।  (84)


इसके बावजूद, तुम वही हो कि एक-दूसरे की हत्या करते हो और अपने ही लोगों में से कुछ को उनके घरों से बाहर निकालते हो; गुनाहों में एक-दूसरे के सहायक होते हो और उनके ख़िलाफ़ आक्रामक बन जाते हो। अगर वे बन्दी बनकर तुम्हारे पास आते हैं, तब भी तुम उनकी रिहाई के लिए पैसे देने को तैयार रहते हो, हालाँकि तुम्हें उनको घरों से निकालने का कोई अधिकार नहीं था। सो क्या तुम किताब [तोरात] के कुछ हिस्से को मानते हो और दूसरे हिस्सों को नहीं मानते? फिर तुममें से जो ऐसा करे उसकी सज़ा इसके सिवा और क्या हो सकती है कि वह सांसारिक जीवन में अपमानित होगा और क़यामत के दिन ऐसे लोगों को कठोर से कठोर यातना झेलनी पड़ेगी: जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है। (85)


यही वे लोग हैं जिन्होंने आनेवाली दुनिया के बदले इस दुनिया की ज़िंदगी ख़रीद ली है: तो न उनकी यातना हल्की की जाएगी और न उन्हें कोई मदद ही पहुँच सकेगी। (86)

 

और (देखो!), हमने मूसा [Moses] को किताब दी, और उसके बाद, एक के बाद एक रसूलों को (तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए) भेजा। फिर, हमने मरयम [Mary] के बेटे, ईसा [Jesus] को (सच्चाई की) स्पष्ट निशानियाँ दीं, और पवित्र-आत्मा [Holy Spirit] के द्वारा उसे मज़बूती प्रदान की। फिर आख़िर यह क्या मामला है कि जब कभी कोई रसूल तुम्हारे पास कुछ ऐसी चीज़ लेकर आया जो तुम्हारे मन की इच्छाओं के ख़िलाफ़ हो, तो तुम अकड़ जाते हो, कुछ को झूठा बताने लगते हो और कुछ को क़त्ल कर देते हो? (87)


वे कहते हैं, "(चाहे तुम कुछ भी कहो, पर) हमारे दिलों पर ग़िलाफ़ [आवरण] चढ़ा हुआ है (कि कोई नयी बात इसके अंदर नहीं घुस सकती)," मगर अल्लाह ने उन्हें (सच्चाई को) मानने से इंकार करने के चलते ठुकरा दिया है: उनमें बहुत कम हैं जो (सच्चाई पर) ईमान रखते हों।  (88)


जब उनके पास (मार्गदर्शन के लिए) अल्लाह की तरफ़ से एक किताब [क़ुरआन] आ गयी जो उसकी (सच्चाई की) पुष्टि करती है जो (किताब यानी तोरात) उनके पास पहले से थी, और जबकि इससे पहले वे (सच्चाई से) इंकार करनेवालों पर जीत हासिल करने के लिए दुआएं करते रहे थे, मगर इसके बावजूद, जब वह चीज़ उनके पास आ गई जिसकी (सच्चाई के बारे में) वे जान चुके थे, तब भी उन्होंने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया: अल्लाह ऐसे लोगों को ठुकरा देता है जो (सच्चाई को) मानने से इंकार करते हैं।  (89)


अल्लाह की भेजी हुई सच्चाई [क़ुरआन] को मानने से इंकार करके उन लोगों ने अपनी आत्मा को सचमुच बहुत ही कम दाम में बेच डाला है, और वह भी इस जलन के चलते कि अल्लाह अपने बन्दों में से जिस पर चाहता है, अपना (संदेश या) फ़ज़ल [bounty] क्यों भेज देता है। इस तरह, विश्वास न करनेवालों के हिस्से में (अल्लाह का) प्रकोप भी एक के बाद एक आया, और आगे अपमानित कर देने वाली यातना उनका इंतज़ार कर रही है।  (90)


जब उनसे कहा जाता है, "अल्लाह ने जो कुछ (आयतें/ Revelations) उतार भेजी हैं, उन पर विश्वास करो", तो वे कहते हैं, "हम तो उसपर विश्वास रखते हैं जो (किताब) हम पर उतारी गयी है," मगर वे उस (किताब) पर विश्वास करने से इंकार करते हैं जो (उनकी किताब के) बाद आयी है, हालाँकि यह अल्लाह की सच्ची वाणी है जो उस (तोरात) की पुष्टि करती है जो उनके पास पहले से है। [ऐ रसूल], आप कहें, "अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो यह बताओ कि तुम बीते वक़्तों में अल्लाह के पैग़म्बरों [Prophets] की हत्या क्यों करते रहे हो?" (91)


(फिर देखो!), मूसा [Moses] तुम्हारे पास सच्चाई की स्पष्ट निशानियाँ लेकर आया था, मगर उसके बाद, जबकि वह (चालीस दिन के लिए) तुमसे दूर गया हुआ था, तुमने बछड़े की पूजा शुरू कर दी ---- ऐसा करते हुए सचमुच तुमने बड़ा ज़ुल्म किया।"  (92)

 

याद करो जब पहाड़ की चोटियों को तुम्हारे ऊपर उठाकर, हमने तुम से प्रतिज्ञा ली थी, और कहा था, "जो किताब तुम को दी गयी है, उस पर मज़बूती से जमे रहो, और (जो कुछ हम कहते हैं उसे) ध्यान से सुनो।" वे बोले, "हमने सुना, और हम (दिल से हुक्म) नहीं मानते!" और उनके द्वारा विश्वास करने से इंकार के कारण उनके दिलों में बछड़े की पूजा रच-बस गयी। आप उनसे कह दें, "अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो तुम्हारा ईमान तुम्हें कैसी शैतानी चीज़ें करने का हुक्म देता है!"  (93)


आप कहें, "अगर अल्लाह के यहाँ आख़िरी घर किसी और का नहीं, बल्कि केवल तुम्हारे लिए ही है, तो फिर तुम्हें अपनी मौत की कामना करनी चाहिए, अगर तुम्हारा दावा सच्चा है।" (94)


लेकिन ख़ुद अपने हाथों जो कुछ (कुकर्म) उन्होंने जमा कर रखा है, उसके कारण वे कभी भी अपनी मौत की कामना नहीं करेंगे: अल्लाह ज़ुल्म करने वालों को अच्छी तरह जानता है।  (95)


[ऐ रसूल], आप उन्हें सब लोगों से बढ़कर जीवन का लोभी पाएंगे, यहाँ तक कि वे शिर्क करनेवालों [Polytheist] से भी बढ़े हुए हैं। उनमें से कोई भी यही इच्छा रखता है कि उसे हज़ार वर्ष की आयु मिले, हालाँकि इतनी लम्बी ज़िंदगी भी तो उनको कठोर यातना से नहीं बचा पाएगी: अल्लाह देख रहा है, जो कुछ वे करते हैं।  (96)

 

[ऐ रसूल], आप कह दें, "अगर कोई जिबरील [Gabriel] का दुश्मन है ---- जिसने अल्लाह के हुक्म से आपके दिल पर क़ुरआन को उतारा है, जो पहले उतरी किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि करती है, जो ईमान रखनेवालों के लिए मार्गदर्शन और अच्छी ख़बर सुनाती है ------ (97)


अगर कोई अल्लाह का, उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों का, जिबरील [Gabriel] और मीकाइल [Michael] का दुश्मन हो, तो फिर अल्लाह निश्चय ही विश्वास न करनेवाले लोगों का दुश्मन है।" (98)


क्योंकि हमने तुम्हारे पास स्पष्ट संदेशों को उतार भेजा है और केवल वही लोग इस पर विश्वास करने से इंकार करेंगे जो (अल्लाह के हुक्म का) उल्लंघन करने वाले हैं। (99)


यह कैसी बात है कि जब कभी वे कोई प्रतिज्ञा या वचन लेते हैं, तो उनमें से कुछ लोग उसे किनारे फेंक देते हैं? सच्चाई यह है कि उनमें ज़्यादातर लोग  ईमान नहीं रखते। (100)

 

जब अल्लाह ने उनके पास एक रसूल [ईसा] भेजा, जो उस किताब [तोरात] की पुष्टि करता था जो उनके पास पहले से थी, तो उनमें से कुछ लोगों ने, जिन्हें पहले किताब मिली थी, अल्लाह की किताब को इस तरह अपने पीठ पीछे डाल दिया मानो वे कुछ जानते ही न थे,  (101)


और इसकी जगह, वे उस (जादू-मंतर) के पीछे चलने लगे जिसे शैतानों ने सुलैमान [Solomon] की बादशाही के ज़माने में गढ़ लिया था। ऐसा नहीं था कि सुलैमान ने ख़ुद (सच्चाई को मानने से) इंकार [कुफ़्र] किया हो; असल में कुफ़्र तो शैतानों ने किया था। वे लोगों को जादू-टोना और जो कुछ बाबिल [Babylon] में दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतरा था, उसे सिखाते थे। हालाँकि इन दोनों ने कभी किसी को बिना पहले सावधान किए हुए कुछ नहीं सिखाया, वे (पहले ही यह बता देते थे कि), "हमें तो केवल बहकाने के लिए भेजा गया है---- तुम (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र] न कर बैठो।" इन्हीं दोनों (फ़रिश्तों) से उन लोगों ने यह सीखा कि कैसे मियाँ-बीवी के बीच झगड़ा पैदा किया जा सकता है, हालाँकि वे इसके द्वारा किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा पाते थे, सिवाय इसके कि जब अल्लाह की यही मर्ज़ी हो। उन्होंने (जादू-टोने की) वह चीज़ें तो सीखीं जिससे उन्हें नुक़सान पहुँचा, मगर (अल्लाह की किताब की) वह चीज़ें नहीं सीखीं जिससे उन्हें फ़ायदा पहुँचता, यह जानते हुए भी कि जिस किसी ने (जादू-टोने का ज्ञान) सीखा, उसके लिए आनेवाली दुनिया (की बरकतों) में कोई हिस्सा नहीं होगा। काश! कि वे जान पाते कि कितने घटिया (दाम पर) उन्होंने अपनी जानों को बेच डाला! (102)


अगर उन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास किया होता और वे अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते, तो अल्लाह की तरफ़ से मिलने वाला बदला कहीं ज़्यादा अच्छा होता, काश कि वे इस (सच्चाई को) जानते! (103)

 

ऐ ईमानवालो! तुम (अपने रसूल को) 'रा'इना' [हमारी सुनें] न कहा करो (कि कुछ यहूदी जान-बूझकर इसे ग़लत अर्थ में उपयोग कर रहे हैं), बल्कि 'उनज़ुरना' [हमारी तरफ़ थोड़ा ध्यान दें] कहा करो और (उनकी बात) सुना करो: जो (अल्लाह की बातों पर) कोई ध्यान नहीं देते, उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है।  (104)


न तो किताबवाले वे लोग जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, और न ही मुश्रिक [बहुदेववादी] लोग कभी ऐसा चाहेंगे कि आपके रब की तरफ़ से कोई भी अच्छी (बरकतवाली) चीज़ आप पर उतारी जाए, मगर अल्लाह जिसे चाहे अपनी ख़ास रहमत [Mercy] के लिए चुन लेता है: उसके फ़ज़ल [Bounty] की कोई सीमा नहीं होती।  (105)


हम जिस आयत (या हुक्म) को नए हुक्म से बदलते हैं या उसे भुला देना चाहते हैं, तो उसकी जगह हम उससे बेहतर या उसी तरह के हुक्मवाली (दूसरी आयत) ले आते हैं। [ऐ रसूल] क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है?  (106)


क्या तुम नहीं जानते कि आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण (और बादशाही) उसी के पास है? [ईमानवालो], अल्लाह के सिवा तुम्हारा न तो कोई रखवाला है और न कोई मददगार।  (107)


(ऐ ईमानवालो! क्या तुम चाहते हो कि अपने रसूल से (दीन के बारे में) ऐसी चीज़ों की माँग करो जैसी माँग मूसा की क़ौम के लोगों ने की थी? जिस किसी ने (सच्चाई पर) विश्वास करने के बदले इंकार की नीति अपनाई, तो वह सीधे रास्ते से बहुत दूर जा भटका।  (108)


किताबवालों में से बहुत से लोग अपने भीतर की ईर्ष्या के चलते चाहते हैं कि वे तुम्हें (सच्चाई पर) विश्वास कर लेनेवाले से बदलकर किसी तरह उससे इंकार कर देनेवाला बना सकें, हालाँकि सच्चाई उनके सामने स्पष्ट हो चुकी है। तो जब तक अल्लाह का हुक्म न आ जाए, तुम उन्हें माफ़ कर दो और उन्हें उनकेे हाल पर छोड़ दो: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है।  (109)


और (देखो!), पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और निर्धारित ज़कात [alms] दो। जो कुछ नेकियाँ तुम अपने लिए जमा करते हो, उसे अल्लाह के यहाँ मौजूद पाओगे: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है।  (110)

 

ये यहूदी और ईसाई यह भी कहते हैं, "कोई भी आदमी जन्नत में दाख़िल नहीं होगा, जब तक कि वह यहूदी या ईसाई न हो।" ये उनकी अपनी झूठी कामनाएँ हैं। (ऐ रसूल) आप कहें, “अगर तुम सच बोल रहे हो, तो अपने प्रमाण पेश करो।" (111)


असल में, जो कोई भी अपने-आपको अल्लाह के सामने पूरी तरह झुका देता है और अच्छा व नेक काम करता है, तो इसका इनाम अपने रब के पास से ज़रूर पाएगा: न उन्हें किसी चीज़ का डर होगा और न वे दुखी होंगे।  (112)


यहूदी कहते हैं, "ईसाइयों के दीन में किसी तरह की कोई बुनियाद नहीं।" और ईसाई कहते हैं, "यहूदियों के पास कोई बुनियाद नहीं," हालाँकि वे दोनों अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, और वे लोग जिन्हें (ऐसी किताब का) कोई ज्ञान नहीं है, वे भी ठीक वैसी ही बात कहते हैं; जिस (दीन) के बारे में वे झगड़ते रहते हैं, क़यामत के दिन अल्लाह इस बारे में उनके बीच फ़ैसला कर देगा।  (113)

 

और (विचार करो), उससे बढ़कर अत्याचारी और कौन इंसान हो सकता है जो अल्लाह की इबादत करने की जगहों में उसका नाम लेने से रोकता हो, और उसे वीरान कर देने की कोशिश में लगा हो? ऐसे लोगों को इन (इबादत के घरों) में बिना डरे हुए दाख़िल नहीं होना चाहिए: उनके लिए इस दुनिया में भी अपमान है और आनेवाली दुनिया में भी कठोर यातना होगी।  (114)


और (देखो), पूरब हो या पश्चिम, (सारी दिशाएं) अल्लाह की ही हैं: जिस दिशा में भी तुम अपना मुँह कर लो, अल्लाह तुम्हारे सामने होगा। अल्लाह की क़ुदरत हर चीज़ पर छायी हुई है, और वह सब कुछ जाननेवाला है।  (115)



इन (ईसाई) लोगों ने ज़ोर देकर कहा है, "अल्लाह औलाद रखता है।" महिमावान है वह! नहीं! आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, सब उसी का है, हर चीज़ पूरी भक्ति से उसके हुक्म का पालन करती है।  (116)


वह आसमानों और ज़मीन का असली (रूप में) पैदा करनेवाला है, वह जब किसी काम को करने का फ़ैसला करता है, तो बस हुक्म देता है कि "हो जा" और वह हो जाता है।  (117)


जिन (अरब के बहुदेववादी) लोगों को (अल्लाह की किताब का) कोई ज्ञान नहीं है, वे भी कहते हैं, "काश! कि अल्लाह हमसे बात करता!" या "काश कि कोई चमत्कारवाली निशानी हमारे पास आयी होती!" इनसे पहले के लोग [यहूदी, ईसाई] भी ऐसी ही बातें कहते थे: इन सबके दिल एक जैसे ही हैं। हमने अपनी निशानियाँ उन लोगों के लिए पूरी तरह स्पष्ट कर दी हैं जो (सच्चाई पर) पक्का विश्वास रखते हैं।  (118)


[ऐ रसूल], हमने आपको सच्चाई के साथ भेजा है, ताकि आप (ईमान व अच्छे कर्म के नतीजे की) ख़ुशख़बरी सुना दें और (सच्चाई से इंकार के नतीजे से) सावधान कर दें। आपको उन लोगों के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना जाएगा जो (जहन्नम की) भड़कती आग में पड़ने वाले हैं।  (119)


यहूदी और ईसाई कभी भी आप से ख़ुश नहीं होंगे, जब तक कि आप उनके रास्ते पर न चल पड़ें। आप कह दें, "अल्लाह का मार्गदर्शन ही सच्चा मार्गदर्शन है।" अगर आप उन लोगों की इच्छाओं के पीछे चले, बावजूद इसके कि आपके पास ज्ञान की रौशनी आ चुकी है, तो कोई न होगा जो आपको अल्लाह से बचा सके या आपकी मदद कर सके।  (120)


जिन लोगों को हमने (अल्लाह की) किताब दे रखी है, जो उसको पढ़कर उसके (बताए हुए) रास्ते पर इस तरह चलते हैं जैसा कि चलना चाहिए, तो वही हैं जो उसमें पक्का विश्वास रखते हैं। जो लोग उसकी सच्चाई को मानने से इंकार करेंगे, वही घाटे में रहने वाले हैं।  (121)

 

ऐ इसराईल की सन्तान, मेरी उन नेमतों [blessing] को याद करो, जो मैंने तुम पर की और यह कि किस तरह मैंने दूसरे तमाम लोगों की अपेक्षा तुम पर अपना ख़ास फ़ज़ल [favour] किया था,  (122)


और उस दिन से डरो, जिस दिन कोई जान किसी दूसरी जान के काम नहीं आएगी। (जान छुड़ाने के लिए) न तो किसी तरह की भरपाई [compensation] स्वीकार की जाएगी, न किसी की सिफ़ारिश ही चल पाएगी, और न उनको कोई मदद ही मिल सकेगी।  (123)


और (फिर याद करो) जब इबराहीम [Abraham] के रब ने कुछ बातों में उसकी परीक्षा ली, और वह उसमें खरा उतरा, तो अल्लाह ने कहा, "मैं तुझे सारे इंसानों का पेशवा बनाने वाला हूँ।" इबराहीम ने पूछा, "और क्या तू मेरी नस्ल में से भी पेशवा बनाएगा?" अल्लाह ने जवाब दिया, "मेरे इस वचन के अन्तर्गत वह लोग नहीं आते जो (आज्ञा नहीं मानते और) ज़ुल्म करते हैं।" (124)

 

और जब ऐसा हुआ था कि हमने (मक्का के) इस घर [काबा] को लोगों के लिए बराबर आने-जाने का केन्द्र और अमन की जगह ठहरा दिया, और हुक्म दिया, "इबराहीम के खड़े होने की जगह [मुक़ाम ए इबराहीम] को नमाज़ की जगह बना ली जाए!" हमने इबराहीम [Abraham] और इसमाईल [Ishmael] को हुक्म दिया था: "मेरे इस घर को इसके चारों ओर चक्कर [तवाफ़] लगाने वालोंं, इबादत के लिए ठहरने वालों, और नमाज़ में (झुककर) रुकू [bow] व सज्दा [prostrate] करने वालों के लिए पाक-साफ़ रखो।" (125)


इबराहीम ने दुआ में कहा था, "ऐ मेरे रब! इस जगह को अमन-शांति का एक आबाद शहर बना दे और ऐसा कर कि अपने फ़ज़ल से यहाँ के बसने वालों में जो लोग अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास रखते हों, उनकी रोज़ी के लिए हर तरह की पैदावार उपलब्ध हो जाए।" अल्लाह ने (दुआ क़बूल करते हुए) कहा, "और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, मैं उन्हें भी ज़िंदगी का मज़ा उठाने दूँगा, मगर थोड़े समय के लिए, और फिर (उनके कुकर्मों के चलते) अंत में उन्हें आग की यातना की ओर खींचकर ले जाउंगा ----- और वह कितना बुरा ठिकाना है!" (126)

 

और (वह क्या दौर था कि) जब इबराहीम और इसमाईल इस घर [मक्का] की नींव डाल रहे थे, (तो उन्होंने दुआ की), "हमारे रब! हमारी ओर से (इसे) स्वीकार कर ले। निस्संदेह तू (दुआओं का) सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है।  (127)


हमारे रब, हमें पूरी भक्ति से केवल तेरे सामने झुकनेवाला बना दे; हमारी नस्ल में से ऐसा समुदाय बना जो पूरी भक्ति से केवल तेरे आगे झुकनेवाला हो। हमें इबादत करने के तरीक़े बता दे और हमारी तौबा क़बूल कर, कि तू ही गुनाहों को माफ़ करनेवाला, बड़ी दया रखनेवाला है। (128)


हमारे रब, ऐसा कर दे कि इस (शहर के बसने वालों) में एक ऐसा रसूल पैदा हो जो उन्हीं में से हो, वह तेरी आयतें पढ़कर उन्हें सुनाए, उनको किताब और सही समझ-बूझ की शिक्षा दे, और उनके दिलों को शुद्ध कर दे: तू सचमुच बड़ी ताक़त का मालिक है, और बेहद समझ-बूझ रखनेवाला है।" (129)

 

कोई बेवक़ूफ़ ही हो सकता है जो इबराहीम के तरीक़े [दीन] से मुँह मोड़ेगा? हमने तो उसे इस दुनिया में चुन लिया था और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी उसकी जगह नेक इंसानों में होगी। (130)


उसके रब ने इबराहीम से कहा था, "अपने आपको मुझ पर पूरी तरह समर्पित कर दे [मेरी हर आज्ञा माननेवाला, मुस्लिम बन जा]।" इबराहीम ने जवाब दिया, "मैं अपना सिर सारे संसार के रब के आगे झुकाता हूँ,"  (131)


और इबराहीम ने अपने बेटों को भी ऐसा ही करने का हुक्म दिया था, और याक़ूब [Jacob] ने भी कहा: "ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन [धर्म] पसंद कर लिया है, तो ध्यान रहे कि मरते दम तक, तुम पूरी भक्ति से एक अल्लाह के सामने सिर झुकानेवाले [मुस्लिम] बने रहो।" (132)

 

[ऐ यहूदियो], क्या तुम उस वक़्त वहाँ मौजूद थे जब याक़ूब [Jacob] की मौत का समय आया था? जब उसने अपने बेटों से पूछा था, "मेरे चले जाने के बाद तुम किसकी इबादत करोगे?" उन्होंने जवाब दिया, "उसी एक अल्लाह की, जिसकी  इबादत आपने की है, और आपके बाप-दादा, इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] ने भी की है: हम पूरी भक्ति से उसी (एक अल्लाह के हर हुक्म) के सामने अपना सिर झुकाते [यानी मुस्लिम] हैं।" (133)


वह एक समुदाय था जो गुज़र चुका। जो कुछ उन्होंने (अपने कर्मों से) कमाया, वह उनके लिए था, और जो कुछ तुम (अपने कर्मों से) कमाओगे, वह तुम्हारे लिए होगा: उनके कर्मों के लिए तुम्हें जवाब नहीं देना होगा। (134)

 

वे (ईमानवालों से) कहते हैं, "यहूदी या ईसाई बन जाओ, तुम सही मार्ग पा लोगे।" [ऐ रसूल], आप कहें, "नहीं, हमारा दीन तो इबराहीम का दीन है, जो सीधे रास्ता पर था, और उसने एक अल्लाह के सिवा किसी और ख़ुदा की इबादत नहीं की।" (135)


अत: [ऐ ईमानवालो], तुम कहो, "हम ईमान रखते हैं अल्लाह पर और उस [क़ुरआन] पर जो हम पर उतारी गयी, और जो कुछ (शिक्षाएं) इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael], इसहाक़ [Isaac], याक़ूब [Jacob] और उसकी औलाद की ओर भेजी गयीं, और साथ में जो कुछ मूसा [Moses] और ईसा [Jesus], और सारे नबियों को उनके रब की तरफ़ से दी गयीं। हम इनमें से किसी के बीच कोई अन्तर नहीं करते (कि इनमें से किसी को मानें और किसी को न मानें), और हम पूरी भक्ति से केवल उसी (अल्लाह) के आगे अपना सिर झुकाते हैं।" (136)


अत: अगर वे भी तुम्हारी तरह (उन सब नबियों पर) विश्वास कर लें, तो वे सही मार्ग पा लेंगे। लेकिन अगर वे मुँह मोड़ लें, तो फिर इसका मतलब यह होगा कि वे तुम्हारे विरोध में हठधर्म हो गए हैं। (चिंता न करो) अल्लाह उनसे तुम्हारी हिफ़ाज़त करने के लिए काफ़ी है: वह सब कुछ सुननेवाला, और जाननेवाला है।  (137)


और [ऐ ईमानवालो], तुम कहो, "(हमारी ज़िंदगी तो) अपना सारा रंग अल्लाह से ही लेती है, और अल्लाह से बेहतर रंग कौन दे सकता है? और हम तो केवल उसी की बन्दगी करते हैं।" (138)

 

[ऐ रसूल, आप यहूदियों और ईसाइयों से] कह दें, "तुम हमसे अल्लाह के बारे में कैसे बहस कर सकते हो, जबकि वह हमारा भी रब है और तुम्हारा भी? हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हम तो पूरी भक्ति से उसी के आगे सिर झुकाते हैं।" (139)


"या क्या तुम यह कह रहे हो कि इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़, याक़ूब और उनकी औलाद यहूदी या ईसाई थे?" [ऐ रसूल], आप उनसे पूछें, "कौन ज़्यादा जानता है: तुम या अल्लाह? उससे बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जिसके पास अल्लाह की (ओर से आयी हुई) एक गवाही [Testament] हो और वह उसे छिपाए? (याद रखो), जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।" (140)


(और जो कुछ भी हो) वह एक समुदाय था जो गुज़र चुका: जो कुछ उसने (अपने कर्मों से) कमाया, वह उसके लिए था, और जो कुछ तुम (अपने कर्मों से) कमाओगे, वह तुम्हारे लिए होगा। तुम्हें उनके कर्मों के बारे में कोई जवाब नहीं देना होगा। (141)

 

मूर्ख लोग अब कहेंगे, "इन (मुसलमानों) को किस चीज़ ने नमाज़ पढ़ने की उस दिशा [क़िबला] से फेर दिया जिस (येरूशलम की) दिशा में मुँह करके वे नमाज़ पढ़ा करते थे?" कह दें, "पूरब और पश्चिम अल्लाह के ही हैं, वह जिसे चाहता है उसके लिए सीधे मार्ग पर चलना आसान कर देता है।" (142)


[ईमानवालो], हमने तुम्हें (सच और झूठ के बीच) 'न्याय करनेवाला समुदाय' बनाया है, ताकि तुम दूसरों के सामने (सच्चाई की) गवाही दे सको और हमारा रसूल तुम्हारे सामने (इस बात की) गवाही दे सके। जिस (क़िबले) की दिशा में मुँह करके पहले आप नमाज़ पढ़ते थे, उसे तो हमने केवल इसलिए (क़िबला) बनाया था ताकि हम यह देख सकें कि कौन लोग रसूल के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं, और कौन हैं जो उल्टे पाँव फिर जाते हैं: वह परीक्षा बहुत कड़ी ज़रूर थी, मगर उन लोगों के लिए (कठिन) नहीं थी जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखा दिया है। [ईमानवालो], अल्लाह कभी ऐसा नहीं करता कि वह तुम्हारे ईमान को बेकार जाने दे, कि अल्लाह तो इंसानों के लिए बड़ी करूणा रखनेवाला, बेहद दयावान है। (143)


[ऐ रसूल], हमने आपको आसमान की तरफ़ (दुआ में) मुँह उठाए हुए बहुत बार देखा है, अत: हम आपको उसी (मक्का की) तरफ़ मोड़ दे रहे हैं जिस दिशा में मुँह करके (नमाज़ पढ़ना) आपको पसंद है। अब (नमाज़ के लिए) अपना मुँह (मक्का की) 'पवित्र मस्जिद' [काबा] की ओर कर लें: [ईमानवालो], तुम चाहे जहाँ कहीं भी हो, (नमाज़ के लिए) अपने मुँह को इसी (क़िबले की) दिशा में घुमा लो। जिन लोगों को (अल्लाह की) किताब दी गयी थी, वे यक़ीन से यह बात जानते थे कि यह सच्चाई है जो उनके रब की ओर से आयी है: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है। (144)


इसके बावजूद, अगर तुम उन लोगों के पास जिन्हें किताब दी गई थी, हर एक प्रमाण भी ले आओ, तब भी वे तुम्हारे नमाज़ पढ़ने की दिशा [क़िबले] को नहीं अपनाएंगे, न ही उनके क़िबले को तुम माननेवाले हो, और न ही उनमें से कोई एक-दूसरे के क़िबले को मानने वाला है। [ऐ रसूल], अगर आप उस ज्ञान के बाद, जो आपके पास आ चुका है, उनकी इच्छाओं के पीछे चले, तो निश्चय ही आप ग़लत काम करेंगे।  (145)


जिन लोगों को हमने किताब दी थी वे इसको इस तरह जानते हैं जैसे वे अपने बेटों को जानते हैं, मगर उनमें से कुछ लोग सच्चाई को जान-बूझकर छिपाते हैं। (146)


यह सच्चाई तुम्हारे रब की ओर से है, अतः तुम सन्देह करने वालों में से न हो जाना। (147)


हर समुदाय के पास अपनी एक दिशा [क़िबला] है, जिसकी तरफ़ (इबादत के समय) वह अपना मुँह घुमा लेता है: (असल चीज़ यह है कि) तुम भलाई के काम में एक-दूसरे से आगे निकल जाने की दौड़ लगाओ, तुम जहाँ कहीं भी होगे, अल्लाह तुम सबको (क़यामत के दिन) इकट्ठा करेगा। अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है।  (148)

 

[ऐ रसूल], जहाँ कहीं के लिए भी आप (सफ़र पर) निकलें, (नमाज़ के लिए) अपना मुँह 'पवित्र मस्जिद' [काबा] की दिशा में घुमा लें ----- यह तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है ----- (149)


[ऐ रसूल], जहाँ कहीं के लिए भी आप (सफ़र पर) निकलें, (नमाज़ के लिए) अपना मुँह 'पवित्र मस्जिद' [काबा] की दिशा में घुमा लें; तुम में से कोई भी जहाँ कहीं भी हो, अपना मुँह पवित्र मस्जिद की तरफ़ घुमा लो: और जहाँ कहीं भी तुम रहो, उसी की ओर मुँह कर लिया करो, ताकि लोगों को तुम्हारे ख़िलाफ़ बहस करने का कोई मुद्दा न रहे ------- सिवाय उन लोगों के जो उनमें ज़ालिम हैं: उनसे न डरो; मुझ से डरो ---- और ताकि मैं तुम पर अपनी नेमतें [bounty] पूरी कर दूँ और तुम्हें सीधा रास्ता दिखा दूं,  (150)


जैसाकि हमने तुम्हारे बीच अपना एक रसूल भेजा है जो तुम्हीं में से है, जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हें निखारता है, तुम्हें किताब [क़ुरआन] और (उसकी) समझ-बूझ की शिक्षा देता है, और तुम्हें वह चीज़ें सिखाता है, जो तुम जानते न थे।  (151)


अतः मुझे याद करते रहो; मैं भी तुम्हें याद रखूँगा। मेरा एहसान माना करो, कभी नाशुक्री [ungrateful] न करो।  (152)

 

ऐ ईमानवालो! तुम जब (मेरी) मदद माँगा करो, तो धैर्य [सब्र] और नमाज़ के द्वारा (मदद) माँगा करो, क्योंकि अल्लाह सब्र [Patience] करने वालों के साथ होता है।  (153)


जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे जाएँ उन्हें मुर्दा न कहो; वे ज़िंदा हैं, हालाँकि तुम्हें (उनकी ज़िंदगी का) एहसास नहीं होता।  (154)


हम तुम्हारी परीक्षा ज़रूर लेंगे, (कभी) डर और भूख से, और (कभी) संपत्ति, जान, और पैदावार के नुक़सान से। मगर [ऐ रसूल], आप उन लोगों को ख़ुशख़बरी दे दें जो (मुसीबत में) धीरज के साथ जमे रहते हैं,  (155)


वे लोग जब किसी मुसीबत में घिर जाते हैं, तो कहते हैं, "हम तो अल्लाह के ही हैं, और हमको उसी के पास लौटकर जाना है।" (156)


ये वह लोग हैं जिन पर उनके रब की ख़ास कृपा [Blessings] और रहमत [Mercy] होगी, और यही लोग हैं जो सीधे व सही रास्ते पर हैं।  (157)

 

(काबा के नज़दीक) 'सफ़ा' और 'मरवा' (की पहाड़ियाँ) अल्लाह की निशानियों में से हैं, अतः जो लोग इस घर [काबा] की यात्रा में 'हज' या 'उमरा' [छोटा हज] के लिए जाएं, तो उनके लिए इसमें कोई दोष नहीं होगा अगर वह इन दोनों (पहाड़ियों) के बीच चक्कर लगा लें। जो कोई अपनी ख़ुशी से कोई भलाई का काम करे तो उसे इसका इनाम दिया जाएगा, कि अल्लाह अच्छे कामों का इनाम ज़रूर देता है, और सब कुछ जानता है।  (158)


रहे वे लोग जो हमारी भेजी हुई (सच्चाई की) निशानियों और मार्गदर्शन को छिपाते हैं, इसके बावजूद कि हमने उन्हें किताब में पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है, तो ऐसे ही लोग हैं जिन्हें अल्लाह ठुकरा देता है, और दूसरे लोग भी उन्हें ठुकरा देते हैं,  (159)


जब तक कि वे अपने (गुनाहों की) तौबा नहीं कर लेते, अपने में सुधार नहीं करते, और सच्चाई की खुले आम घोषणा नहीं कर देते। (अगर वे ऐसा करते हैं तो) मैं अवश्य ही उनकी तौबा क़बूल करूँगा: मैं (पछताने वालों की) तौबा हमेशा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान हूँ।  (160)


जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया और अगर इसी इंकार की हालत में मर गए, तो अल्लाह उन्हें ठुकरा देता है, फ़रिश्ते और सारे लोग भी उन्हें ठुकरा देते हैं।  (161)


वे इसी ठुकराई हुई हालत में रहेंगे: उनकी सज़ा हल्की नहीं की जाएगी, और न उन्हें मुहलत ही मिलेगी। (162)

 

तुम्हारा ख़ुदा तो बस एक अल्लाह है: उसके अलावा पूजने लायक़ कोई ख़ुदा नहीं, वह बेहद दयावान, और सब पर मेहरबान है।  (163)

आसमानों और ज़मीन को पैदा करने में; रात और दिन के बारी-बारी से आने जाने में; उन जहाज़ों में जो लोगों के सामान लेकर समुद्र में चलते हैं; उस बारिश के पानी में जिसे अल्लाह आसमान से उतारता है जिससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन फिर से जी उठती है, और इस बात में कि हर तरह के जानवर ज़मीन में फैले हुए हैं; हवाओं के बदलने में और उन बादलों में जो आसमान और ज़मीन के बीच नियत रास्तों में तैरते फिरते हैंं: इन सारी चीज़ों में उनलोगों के लिए (क़ुदरत की) बड़ी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं।  (164)


लोगों में कुछ ऐसे भी हैं जो अल्लाह को छोड़कर दूसरे ख़ुदाओं को उसके बराबर ठहराते हैं, उन्हें इतना पसंद करते हैं जितना उन्हें अल्लाह को पसंद करना चाहिए, मगर जो ईमानवाले हैं, उनके दिलों में सबसे बढ़कर प्रेम अल्लाह से ही होता है। काश कि ये [बहुदेववादी] लोग देख पाते ----- चूँकि वे तभी देखेंगे जब यातना उनके सामने आ जाएगी ----- कि सारी शक्ति तो अल्लाह के ही पास है, और यह कि अल्लाह अत्यन्त कठोर यातना देता है।  (165)


जब ऐसा होगा कि वे (पेशवा] जिनके पीछे लोग चलते हैं, अपने अनुयायियों को अपना मानने से इंकार कर देंगे, जब वे सब उस यातना को अपनी आँखों के सामने देखेंगे, तब उनके बीच के सभी संबंध कटकर रह जाएंगे,  (166)


वे लोग जो उन (पेशवाओं) के पीछे चलते थे, कहेंगे, "काश! हमें (दुनिया में फिर से जाने का) एक आख़िरी मौक़ा मिल जाए, तो हम भी उन (झूठे पेशवाओं को) पहचानने से इंकार कर दें, जैसा कि उन्होंने अब हमें पहचानने से इंकार कर दिया है।" इस तरह, अल्लाह उनके कर्मों को उनके लिए एक दुखद पछतावे का ज़रिया बना देगा: वे अब किसी भी तरह (जहन्नम की) आग से निकल नहीं सकेंगे।   (167)

 

ऐ लोगो! ज़मीन में जितनी भी अच्छी और हलाल [वैध/ lawful] चीज़ें हैं उन्हें खाओ (और अपने वहम से खाने की चीज़ों से लोगों को न रोको), और शैतान के रास्ते पर न चलो, क्योंकि वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।  (168)


वह हमेशा तुम्हें बुराई और अश्लीलता के काम करने का हुक्म देता है, और तुम्हें इस बात पर उकसाता है कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी (झूठी) बातें कहो जिसको तुम सचमुच नहीं जानते।  (169)


लेकिन जब उनसे कहा जाता है, "अल्लाह ने अपना जो संदेश उतार भेजा है, उसका अनुसरण करो," तो कहते हैं, "नहीं, हम तो उसी तरीक़े पर चलेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को चलते देखा है।" क्या! तब भी (चलेंगे) अगर उनके बाप-दादा (दीन के बारे में) कुछ समझते-बूझते नहीं थे और न ही उनका मार्गदर्शन हुआ था? (170)


(सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों की मिसाल ऐसी है जैसे कोई चरवाहा जानवरों के आगे चीख़ता-चिल्लाता हो, मगर जानवर सिवाए बुलाने और पुकारने की आवाज़ के कुछ नहीं सुनते हों: वे बहरे, गूँगें, और अन्धे होकर रह गए हैं, और वे कुछ भी नहीं समझते।  (171)


ऐ ईमानवालो! जो अच्छी चीज़ें हमने तुम्हें दे रखी हैं उनमें से (बेधड़क) खाओ-पियो और अल्लाह का शुक्र अदा करते रहो, अगर तुम उसकी ही बन्दगी करते हो।  (172)


उसने तो तुम पर केवल ये चीज़ें हराम (forbidden) की हैं: मुर्दा जानवर (का सड़ा-गला गोश्त), ख़ून, सूअर का माँस और जिस जानवर पर (काटते वक़्त) अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो। इस पर भी, अगर कोई भूख के मारे ऐसी चीज़ खाने के लिए मजबूर हो जाए, तो उस पर कोई गुनाह नहीं, मगर शर्त यह है कि ऐसी चीज़ उसने अपनी इच्छा से न खायी हो, और न वह हद पार करनेवाला हो: अल्लाह बेहद दयावान, बड़ा माफ़ करनेवाला है।  (173)


जो लोग अल्लाह की उतारी गई किताब में से कुछ चीज़ें छिपा लेते हैं, और उसके बदले मामूली क़ीमत वसूल कर लेते हैं, तो ऐसे लोग बस अपने पेट में अंगारे भर रहे हैं। क़यामत के दिन अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न उन्हें (गुनाहों से) निखारेगा: बड़ी ही दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है। (174)


  ये वह लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले गुमराही, और माफ़ी की जगह यातना मोल ले ली है। तो क्या चीज़ है जो उन्हें आग का सामना करने के लिए इतना धैर्यवान बना सकती है? (175)


यह इसलिए है कि अल्लाह ने तो सच्चाई के साथ किताब उतारी; मगर जो लोग किताबों के बीच के विभेद में पड़े रहते हैं, वे विरोध में बहुत गहराई तक हठधर्म हो गए हैं।  (176)


नेकी व भलाई (का रास्ता) केवल यह नहीं है कि तुम (नमाज़ पढ़ने के वक़्त) अपने मुँह पूरब या पश्चिम की ओर कर लो। सही मायने में नेक व अच्छे लोग तो वह हैं जो अल्लाह पर और अन्तिम दिन पर विश्वास रखते हैं, (इसी तरह) फ़रिश्तों पर, (अल्लाह की) किताबों पर, और (अल्लाह के) नबियों पर ईमान रखते हैं; जो अपने धन में से कुछ हिस्सा, चाहे उस माल से उनका कितना ही लगाव क्यों न हो, रिश्तेदारों, अनाथों, ग़रीबों, (ज़रूरतमंद) मुसाफ़िरों और भीख माँगनेवालों को देते हैं, और (ग़ुलामों को) आज़ाद कराने के लिए भी देते हैं; वह लोग जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, और निर्धारित ज़कात [alms] देते हैं; और वे जब कभी वचन देते हैं, तो उसे पूरा करते हैं; जो अपना क़दम मज़बूती से जमाए रखते हैं, चाहे तंगी हो, मुसीबत की घड़ी हो, और ख़तरे का समय हो, हर हाल में धीरज रखनेवाले हैं। ये वह लोग हैं जो (नेकी की राह में) सच्चे हैं, और यही हैं जो (अल्लाह से डरते हुए) बुराइयों से बचते हैं।  (177)

 

ऐ ईमानवालो! (जान बूझकर बिना कारण) हत्या के मामले में तुम्हारे लिए मारे गए आदमी की जान के बदले जान की सज़ा [क़िसास/retribution] देना अनिवार्य कर दिया गया है: आज़ाद आदमी के बदले आज़ाद आदमी (की जान), ग़़ुलाम के बदले ग़ुलाम, औरत के बदले औरत। लेकिन अगर मरने वाले का भाई (या वारिस), क़ातिल (की जान) को माफ़ कर दे, (और “ख़ून-बहा” लेने के लिए तैयार हो जाए) तो इसका सही तरीक़े से पालन करना चाहिए, और क़ातिल को भले तरीक़े से उतना (ख़ून-बहा/retribution) अदा करना चाहिए जितना देना उचित हो। यह तुम्हारे रब की तरफ़ से एक आसानी पैदा की गयी है और यह उसकी दयालुता है। फिर इसके बाद भी जो कोई इस सीमा को लांघता है, उसके लिए दर्दनाक यातना होगी।  (178)


ऐ बुद्धि और समझवालो! "जान के बदले जान की सज़ा" [क़िसास] असल में तुम्हारी जान बचाने के लिए है, ताकि तुम अपने आपको बुराइयों से बचा सको।  (179)

 

जब तुममें से किसी की मौत का समय आ जाए, और वह कुछ माल छोड़कर जा रहा हो, तो उसे चाहिए कि अपने माँ-बाप और नज़दीकी नातेदारों के लिए सही तरीक़े से वसीयत [bequest] कर दे ----- यह उन लोगों का कर्त्तव्य होगा, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (180)


अगर कोई उस वसीयत को सुनने के बाद बदल डाले, तो (उसे) बदलने का गुनाह उन्हीं लोगों के सिर पर होगा जो उसे बदलेंगे: अल्लाह सब कुछ सुननेवाला और जाननेवाला है। (181)


लेकिन अगर कोई जानता हो, कि वसीयत करनेवाले ने (बँटवारे में) भूल-चूक की है, या उसने पक्षपात किया है, और वह दोनों पक्षों के लोगों को समझा-बुझाकर उनमें कोई समझौता करा दे, तो उस पर कोई गुनाह नहीं: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (182)

 

ऐ ईमानवालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य [फ़र्ज़] किए गए हैं, जिस तरह तुमसे पहले के लोगों पर किए गए थे, ताकि तुम बुराइयों से बचने वाले बन सको।  (183)


तुम गिने हुए कुछ दिनों में जो निर्धारित हैं, रोज़े रखो, लेकिन अगर तुममें से कोई बीमार हो, या सफ़र में हो, तो वह बाद के दूसरे दिनों में रोज़े रखकर गिनती पूरी कर ले। उन लोगों के लिए जिन्हें (किसी बीमारी या मजबूरी के चलते) रोज़ा रख पाना बहुत ही कठिन हो, उनके लिए (रोज़े की) भरपाई का एक रास्ता है ---- एक ग़रीब ज़रूरतमंद को खाना खिलाना। लेकिन अगर कोई अपनी ख़ुशी से कुछ और (ग़रीबों को खाना) दे, तो यह उसके लिए और अच्छा होगा। लेकिन अगर तुम समझ-बूझ रखते हो, तो तुम्हारे लिए रोज़ा रखना (हर हाल में) ज़्यादा अच्छा होगा। (184)


वह रमज़ान का महीना था जिसमें मानव-जाति के मार्गदर्शन के लिए (पहली बार) क़ुरआन उतारी गयी, जो स्पष्ट संदेशों के साथ लोगों को रास्ता दिखानेवाली और सही और ग़लत के बीच अंतर को स्पष्ट कर देनेवाली है। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे इसमें ज़रूर रोज़े रखना चाहिए, और जो कोई बीमार हो या सफ़र में हो, तो उसे बाद के दिनों में छूटे हुए रोज़े को पूरा कर लेना चाहिए। अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता। वह चाहता है कि तुम (रोज़े की) निर्धारित अवधि पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उसके लिए अल्लाह की बड़ाई का बयान करो, और ताकि तुम (उसकी नेमतों का) शुक्र अदा कर सको।  (185)


[ऐ रसूल!], अगर मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, (तो बता दें कि) मैं तो उसके पास ही हूँ। जो मुझे पुकारता है, मैं उसकी पुकार सुनता हूँ और उसे क़बूल करता हूँ, अत: उन्हें भी चाहिए कि वे मेरी पुकार का जवाब दें और मुझ पर ईमान रखें, ताकि वे सीधे मार्ग पर आ सकें।  (186)

 

[ईमानवालो], तुम्हें यह इजाज़त दी जाती है कि रोज़े के दिनों में रात के वक़्त तुम अपनी बीवियों के साथ सो सकते हो: वे [औरतें] तुम्हारे (इतने नज़दीक हैं कि) कपड़ों की तरह हैं, और तुम उनके कपड़ों की तरह हो। अल्लाह को इस बात की ख़बर थी कि तुम लोग (रात में औरतों के साथ सेक्स करके) अपने-आपको धोखा दे रहे थे, अत: उसने तुम पर बड़ी कृपा की और तुम्हें माफ़ कर दिया: अब तुम अपनी बीवियों के साथ (रोज़े की रातों में बेझिझक) सो सकते हो ----- और जो कुछ अल्लाह ने तुम्हारे (दामपत्य जीवन के) लिए लिख रखा है, उसे पाने की इच्छा रखो ----- और रात में (बिना रोक-टोक) खाओ-पियो यहाँ तक कि तुम्हें सुबह की सफ़ेद धारी (रात की) काली धारी से साफ़ अलग दिखाई दे जाए। फिर उस वक़्त से रात (शुरू होने) तक रोज़ा पूरा करो। (रोज़े की) रातों में अगर तुम मस्जिदों में इबादत के लिए ['ऐ’तकाफ़' में] रुके हो, तो तुम उन (बीवियों) के साथ (वहाँ) न सो जाओ: ये अल्लाह की (तय की हुई) सीमाएँ हैं, अतः इनके पास न जाना। अल्लाह इसी तरह अपने संदेशों को लोगों के सामने स्पष्ट करता है, ताकि वे अपने आपको ग़लत काम करने से रोक सकें।  (187)


और (देखो!) तुम एक-दूसरे के माल को अवैध रूप से न खाओ, और न गुनाह के इरादे से इस माल का उपयोग हाकिमों को घूस देने में करो, कि (हक़ मारकर) लोगों के कुछ माल जानते-बूझते हड़प सको। (188)

 

[ऐ रसूल], वे आपसे नए महीनों के चाँद के बारे में पूछते हैं, आप बता दें, "ये लोगों को समय का हिसाब बताता है, और इससे हज के महीने का निर्धारण हो जाता है।" और (देखो), यह कोई नेकी की बात नहीं है कि तुम (हज के बाद) अपने घरों में (सामने का दरवाज़ा छोड़कर) पीछे के रास्ते से आओ; असल में अच्छा व नेक आदमी तो वह है जो (अल्लाह का) डर रखते हुए बुराइयों से बचता हो। अत: अपने घरों में सामने के दरवाज़ों से दाख़िल हो और अल्लाह की आज्ञा न मानने (के नतीजे) से डरते रहो, ताकि तुम कामयाब हो सको। (189)


और (देखो!), जो लोग तुम से लड़ाई लड़ रहे हैं, उन लोगों से तुम्हें भी अल्लाह के रास्ते में लड़ना चाहिए, मगर (लड़ाई में) सीमाएं न लाँघो: अल्लाह (लड़ाई की) मर्यादा तोड़ने वालों को पसन्द नहीं करता।  (190)

(मक्कावालों ने तुम्हारे ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी है, तो तुम भी लड़ो) और जहाँ कहीं उनसे सामना हो उन्हें क़त्ल करो, और उन्हें निकाल बाहर करो जिस जगह से उन्होंने तुम्हें निकाला था, इसलिए कि उनका (लगातार) अत्याचार करना क़त्ल और ख़ून-ख़राबे से ज़्यादा गम्भीर है। लेकिन पवित्र मस्जिद [काबा] की सीमा में तुम उनसे न लड़ो जब तक कि वे ख़ुद तुमसे वहाँ युद्ध न करें। अगर वे वहाँ तुमसे युद्ध करने आ ही जाएं, तो उन्हें क़त्ल करो ----- सच्चाई से इंकार करनेवाले ऐसे (अत्याचारियों) की यही सही सज़ा है ----  (191)

लेकिन अगर वे लड़ाई बंद कर दें, तो फिर अल्लाह भी बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (192)


उन लोगों से उस वक़्त तक लड़ो जब तक कि ज़ुल्म व अत्याचार समाप्त न हो जाए, और (काबा में) इबादत केवल अल्लाह के लिए ही हो जाए। अगर वे लड़ाई से रुक जाएं, तो तुम्हें भी लड़ाई से अपना हाथ रोक लेना चाहिए, सिवाय उन हमला करनेवाले ज़ालिमों के।  (193)


(आदर के चार महीने में अगर दुश्मन हमला न करें, तो तुम भी शांत रहो, और अगर वह हमला कर दे तो फिर बराबरी से मुक़ाबला करो) आदर के महीने का बदला आदर का महीना है: (आदर के महीनों में युद्ध करना मना है, लेकिन) अगर दुश्मन इसकी मर्यादा तोड़ते हुए युद्ध करता है, तो उससे उचित बदला लेना चाहिए। अतः अगर कोई तुम पर हमला कर दे, तो तुम भी उस पर वैसा ही हमला करके बदला लो, मगर अल्लाह से डरते रहो, और जान लो कि अल्लाह उन लोगों के साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (194)


अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करो: अपने ही हाथों (कंजूसी करके) अपनी बर्बादी के हिस्सेदार न बनो, मगर अच्छे से अच्छा काम करो, क्योंकि अल्लाह अच्छा काम करनेवालों को पसन्द करता है।  (195)

 

और (देखो!), हज और उमरा [छोटा हज] करने की जब नीयत कर ली जाए, तो उसे अल्लाह के लिए पूरा करना चाहिए। अगर तुम्हें (किसी कारण से हज करने से) रोका जाए, तो जो जानवर क़ुर्बानी के लिए मिल जाए, उसे पेश कर दो, और उस वक़्त तक अपने सिर के बाल न मुंडवाओ जब तक कि वह जानवर क़ुर्बानी की जगह न पहुँच जाए। अगर तुममें से कोई बीमार हो या उसके सिर में कोई तकलीफ़ हो, तो उसे (बाल न उतरवाने की) भरपाई के तौर पर या तो रोज़ा रखना होगा या ग़रीबों को खाना खिलाना होगा या जानवर क़ुर्बान करना होगा। जब तुम अमन की हालत में रहो, तो जो कोई आदमी पहले उमरा करके (इहराम उतार दे, और) फिर साथ में बड़े हज से भी फ़ायदा उठाना चाहे, तो उसे भी जानवर की क़ुर्बानी देनी होगी, जैसी कुछ उसकी क्षमता हो। और अगर उसकी इतनी क्षमता न हो, तो उसे चाहिए कि हज के दिनों में तीन दिन के रोज़े रखे, और (घर) वापस आने पर सात दिन के रोज़े रखे, तो ये मिलकर दस दिन के रोज़े होंगे। (याद रहे) यह हुक्म उन लोगों के लिए है जिनके घरवाले पवित्र मस्जिद के नज़दीक न रहते हों। और (देखो!) हर हाल में अल्लाह की आज्ञा न मानने (के नतीजे से) डरो, और यह जान लो कि अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है।  (196)

 

हज (की तैयारी) के महीने जाने-पहचाने और निर्धारित हैं। जो कोई इन महीनों में हज करने जा रहा हो, तो हज के दौरान न तो औरतों को लुभानेवाली अश्लील बातें हों, न कोई गुनाह का काम, और न लड़ाई-झगड़े की कोई बात होनी चाहिए ---- तुम जो कुछ भी अच्छा काम करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (हज के सफ़र में) अपने साथ (खाने-पीने का और दूसरे ज़रूरी) सामान ले लिया करो: सबसे ज़रूरी सामान जो साथ होना चाहिए वह है अल्लाह का डर रखना ------ ऐ समझ-बूझ रखनेवालो! तुम हर हाल में मेरी आज्ञा न मानने (के नतीजे) से डरो-----  (197)


इस बात में कोई गुनाह नहीं कि (हज के दौरान) कोई अपने रब का (व्यापार के द्वारा) कुछ फ़ज़ल तलाश करे। फिर जब तुम अरफ़ात नाम की जगह से भीड़ के साथ लौटो, तो (अरफ़ात और मिना के बीच) एक पवित्र जगह [मुज़दलिफ़ा] के नज़दीक ठहरकर अल्लाह को याद करो: जैसा तरीक़ा (अल्लाह ने) तुम्हें बता दिया है। इससे पहले तुम सही रास्ते से भटके हुए थे। (198)


फिर जिस जगह (तक जाकर) लोगों की भीड़ लौटती है, तुम भी वहीं से लौटो, और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगो: वह बड़ा माफ़ करनेवाला, और बेहद दयावान है।  (199)


फिर जब तुम हज से जुड़ी सारी रीतियों को पूरा कर चुको, तो जिस तरह पहले अपने बाप-दादाओं (की बड़ाइयों) का बखान करते थे, अब उसी तरह अल्लाह की बड़ाई का बयान करो, बल्कि उससे भी ज़्यादा (अल्लाह को) याद करो। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो (दुआ में) कहते हैं, "हमारे रब! हमें इस दुनिया में भलाई दे दे," तो (देखो) आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ Hereafter] में उनका कोई हिस्सा नहीं होगा;  (200)

कुछ दूसरे लोग यूँ दुआ करते हैं, "हमारे रब! हमें इस दुनिया में भी भलाई दे और आनेवाली दुनिया में भी भलाई दे, और हमें (जहन्नम की) आग (की यातना) से बचा ले।" (201)


ये वह लोग हैं जिन्होंने अपने कर्मों से जो कुछ कमाया है, उसका हिस्सा उन्हें ज़रूर मिलेगा: अल्लाह (कर्मों का) हिसाब करने में बहुत तेज़ है।  (202)


और (क़ुर्बानी के बाद) हज के उन निर्धारित दिनों [ग्यारहवीं तारीख़ से तेरहवीं तक] में अल्लाह की याद में लगे रहो। अगर किसी को दो दिन बाद ही (मिना से वापस) जाने की जल्दी हो, तो इसमें कोई गुनाह की बात नहीं, और न ही उस पर कोई गुनाह है जो (एक दिन और मिना में) ठहरा रहे, शर्त यह है कि वे अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरते रहें। तो हर हाल में अल्लाह का डर रखो, और यह बात न भूलो कि एक दिन तुम्हें उसी के सामने इकट्ठा होना है।  (203)

 

लोगों में एक तरह का वह भी आदमी है कि इस दुनिया की ज़िंदगी के बारे में उसकी बातें [ऐ रसूल], आपको बहुत अच्छी लग सकती हैं, यहाँ तक कि जो कुछ उसके दिल में होता है, उस पर वह अल्लाह को गवाह भी बनाता है, पर इसके बावजूद वह विरोधियों में सबसे कट्टर है।  (204)


जब वह उठकर वहाँ से जाता है, तो ज़मीन पर बिगाड़ और ख़राबी फैलाने के लिए निकल पड़ता है, फ़सलों को बर्बाद करता है और मवेशियों को मार डालता है ------ मगर अल्लाह यह कभी पसन्द नहीं करता कि ज़मीन पर ख़राबी फैलाई जाए।  (205)


जब उससे कहा जाता है, "अल्लाह से डरो," तो उसका अहंकार उसे और (अधिक) गुनाह करने पर उकसाता है। (वह ज़ुल्म से हाथ रोकनेवाला नहीं है) उसके लिए जहन्नम ही काफ़ी है: और वह आराम करने की बहुत-ही बुरी जगह है! (206)


मगर लोगों में एक तरह का वह भी आदमी है जो अल्लाह को ख़ुश करने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी (उसकी सेवा में) लगा देता है, और अल्लाह भी अपने (ऐसे) बन्दों पर बहुत मेहरबान है। (207)


ऐ ईमानवालो! तुम पूरी तरह से एक अल्लाह के आगे सिर झुकाने वालों [इस्लाम] में दाख़िल हो जाओ, और शैतान के रास्ते पर न चलो, कि वह तुम्हारा खुला हुआ दुश्मन है।  (208)


तुम्हारे पास जो स्पष्ट प्रमाण आ चुका है, उसके बाद भी अगर तुम (सही रास्ते से) फिसल गए, तो फिर यह जान लो कि अल्लाह (की पकड़ से तुम बच नहीं सकते, वह) बड़ा प्रभुत्ववाला, और (अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (209)

 

क्या ये लोग बस इसी इंतज़ार में हैं कि अल्लाह स्वयं ही बादलों की छाँव में उनके सामने आ जाए और उसके साथ फ़रिश्ते भी हों? मगर तब तक तो सारे मामलों का फ़ैसला हो चुका होगा: सारे मामले तो अल्लाह के पास ही लौटकर जाते हैं।  (210)


[ऐ रसूल], आप इसराईल की सन्तान से पूछें कि हम उनके पास कितनी सारी खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए। अगर कोई अल्लाह की नेमतों [blessing] को पा लेने के बाद उसे बदल डाले, तो (याद रहे), अल्लाह सज़ा देने में बहुत कठोर है। (211)


विश्वास न करनेवालों के लिए इस दुनिया की ज़िंदगी को बहुत ही लुभावनी बनाया गया है, और वे ईमान रखनेवालों (की ख़राब आर्थिक हालत) पर हँसते हैं। मगर क़यामत के दिन जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, वे उन (विश्वास न करनेवालों से) कहीं ऊपर होंगे: अल्लाह जिसे चाहता है, उसे बेहिसाब रोज़ी देता है। (212)


(शुरू में) पूरी मानव-जाति तो एक ही समुदाय थी, (धीरे-धीरे लोग अलग-अलग टोलियों में बँट गए), फिर अल्लाह ने (एक के बाद एक) अपने नबियों [Prophets] को भेजा ताकि वे लोगों को (ईमान व अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुना दें, और (सच्चाई से इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें, और उनके साथ ही अल्लाह ने सच्चाई के साथ अपनी किताब [तोरात, इंजील] भी उतारी, ताकि लोगों के बीच होने वाले मतभेदों का फैसला हो सके। ये तो वह लोग थे जिनको किताब दी गई थी और वही लोग इसके बारे में मतभेद करने लगे, और वह भी तब जबकि इसके बारे में स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी थीं, और यह (किसी और कारण से नहीं, बल्कि यहूदियों और ईसाइयों की) आपस की दुश्मनी व हठ के कारण था। अतः अल्लाह ने अपनी इच्छा से ईमानवालों को सच्चाई का रास्ता दिखा दिया जिसके बारे में वे मतभेद रखते थे: अल्लाह जिसे चाहता है, उसे सीधा रास्ता दिखा देता है। (213)

 

क्या तुमने यह समझ रखा है कि तुम (जन्नत के) बाग़ों में यूँ ही दाख़िल हो जाओगे, जबकि तुमने अभी तक वैसी कोई मुसीबत झेली ही नहीं, जैसी कि तुम से पहले के लोग झेल चुके हैं? उन पर (हिंसा हुई, और) बदक़िस्मती और तंगियाँ डाल दी गयीं, और वे इतने झकझोर दिए गए यहाँ तक कि (उनके) रसूल और उनके साथ ईमानवाले भी पुकार उठे कि, "आख़िर अल्लाह की मदद कब आएगी? जान लो! सचमुच अल्लाह की मदद तुम से बहुत नज़दीक आ पहुँची है।  (214)


(ऐ रसूल), वे आपसे पूछते हैं, "(अल्लाह के रास्ते में) उन्हें क्या ख़र्च करना चाहिए?" कह दें, "अपने माल में से जो कुछ भी तुम दो, वह तुम्हारे माँ-बाप, नज़दीकी रिश्तेदार, अनाथ, ज़रूरतमंद और (मुसीबत में फँसे हुए) मुसाफ़िरों के लिए होना चाहिए।" तुम जो कुछ भी भलाई के काम करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।  (215)


तुम्हें (दुश्मनों से) युद्ध करने का आदेश दिया जाता है, हालाँकि तुम इसे पसंद नहीं करते। ऐसा हो सकता है कि तुम कोई चीज़ नापसंद करो मगर वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और कोई चीज़ जो तुम्हें पसंद हो, वह तुम्हारे लिए बुरी हो: अल्लाह जो जानता है, तुम नहीं जानते।" (216)


[ऐ रसूल], वे आपसे पूछते हैं कि आदर के (चार) महीनों में युद्ध करना कैसा है? आप कह दें, उन (महीनों) में लड़ना बड़ा भारी गुनाह है, मगर (याद रखो!), दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकना, उस पर विश्वास करने से इंकार करना, "पवित्र मस्जिद" [काबा] में जाने से रोकना, और (मक्का से) वहाँ बसे हुए लोगों को निकाल बाहर करना, अल्लाह की नज़र में इससे भी कहीं बड़ा गुनाह है: लोगों पर अत्याचार करना (इस कारण से कि वे अल्लाह पर विश्वास रखते हैं), हत्या करने से भी बुरा है।" [ईमानवालो], वे तुम से लड़ना बंद नहीं करेंगे, और अगर उनका बस चले, तो तब तक लड़ेंगे जब तक तुम्हें तुम्हारे दीन [धर्म] से फेर न दें। और अगर तुममें से कोई अपने दीन को छोड़ दे, और इंकार करनेवाले के रूप में मरे, तो उसके सारे कर्म, दुनिया और आख़िरत दोनों में बेकार हो जाएंगे, और उसका ठिकाना (जहन्नम की) आग होगा, जहाँ उसे हमेशा रहना है।  (217)


लेकिन वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास किया, घर-बार छोड़कर (मक्का से मदीना) चले गए, और (अल्लाह के रास्ते में) संघर्ष [जिहाद] किया, तो यही वे लोग हैं जो अल्लाह की रहमत [mercy] की उम्मीद रख सकते हैं: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (218)

 

[ऐ रसूल], लोग आपसे शराब और जुए [gambling] के बारे में पूछते हैं, आप कह दें, "उन दोनों चीज़ों में बड़ा गुनाह है, और लोगों के लिए कुछ फ़ायदे भी हैं: (मगर) गुनाह उनके फ़ायदे से कहीं ज़्यादा है।" और वे आपसे पूछते हैं, "उन्हें (दान में) क्या देना चाहिए?" कह दें, "जो तुम्हारी ज़रूरत से अधिक [surplus] हो।" अल्लाह इसी तरह अपने संदेशों को तुम्हारे लिए स्पष्ट करता है, ताकि तुम सोच-विचार कर सको,  (219)


इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया के बारे में भी। [ऐ रसूल], वे आपसे अनाथों (की संपत्ति) के बारे में पूछते हैं, उनसे कह दें: "यह अच्छा होगा कि उनके मामलों में सुधार किया जाए। अगर तुम उनके मामलों को अपने साथ मिला लो (और उन्हें अपने परिवार के साथ जोड़ लो), तो याद रखो कि वे तुम्हारे भाई-बहन ही हैं: अल्लाह जानता है कि कौन है जो चीज़ों को बिगाड़ने वाला है, और कौन उनमें सुधार लाने वाला है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम्हें भी भारी मुश्किल में डाल सकता था: वह बहुत ताक़तवाला और बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है।" (220)

 

और (देखो!), जब तक मुश्रिक [बहुदेववादी/ Idolatrous] औरतें (सच्चाई पर) विश्वास न कर लें, उनसे शादी न करो: एक ईमान रखनेवाली दासी, निश्चय ही किसी मुश्रिक (आज़ाद) औरत से कहीं बेहतर है, चाहे वह तुम्हें बहुत पसंद क्यों न हो। और अपनी औरतों की शादी मुश्रिक [Idolatrous] मर्दों के साथ न कर दो, जब तक कि वे (सच्चाई पर) विश्वास न कर लें: एक ईमानवाला ग़ुलाम किसी मुश्रिक (आज़ाद) मर्द से निश्चय ही कहीं बेहतर है, चाहे वह तुम्हें कितना ही पसंद क्यों न हो। ऐसे लोग तुम्हें (जहन्नम की) आग की तरफ़ बुलाते हैं, जबकि अल्लाह अपने हुक्म से तुम्हें (जन्नत के) बाग़ और माफ़ी की तरफ़ बुलाता है। वह अपने संदेशों को लोगों के लिए स्पष्ट कर देता है, ताकि वे इन बातों को ध्यान में रखें।  (221)


[ऐ रसूल], वे आपसे (औरतों के) मासिक-धर्म [Menstruation] के बारे में पूछते हैं, आप कह दें, "मासिक-धर्म (औरतों के लिए) एक तकलीफ़ की हालत है, अतः इस दौरान औरतों से अलग-थलग रहो। जब तक कि वे (इसकी अवधि पूरी करके) पाक-साफ़ न हो जाएँ, उनके नज़दीक (सेक्स के लिए) न जाओ; फिर जब वे पाक-साफ़ हो जाएं, तो तुम उनके साथ मिलन कर सकते हो, जिस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए ठहरा दिया है। अल्लाह उन लोगों को पसन्द करता है जो (गुनाहों से तौबा के लिए) उसके आगे झुकते हैं, और वह उन्हें भी पसन्द करता है जो अपने आपको साफ़-सुथरा रखते हैं।  (222)


तुम्हारी बीवियाँ तुम्हारे लिए (फ़सल उगानेवाले) खेत की तरह हैं, अतः (बीज बोने के लिए आगे से या पीछे से) जिस तरह से चाहो, तुम अपने खेतों में जाओ, और अपने लिए (अच्छे कर्म) आगे भेजो। (देखो!) अल्लाह से डरते रहो: याद रखो, एक दिन तुम्हें उससे मिलना है।" ईमान रखनेवालों को (बेकार के रोक-टोक से बच जाने की) ख़ुशख़बरी दे दो।  (223)

 

[ईमानवालो], अल्लाह के नाम से ऐसी क़समें न खा लिया करो जो तुम्हें किसी के साथ भलाई करने, बुराइयों से बचने की कोशिश करने, और लोगों के बीच समझौता करा देने से रोक ले। अल्लाह सब कुछ सुनता, सब जानता है:  (224)


अल्लाह तुमसे उन क़समों का हिसाब नहीं मांगेगा, जो तुमने बिना सोचे-समझे यूँ ही खा ली हो, लेकिन वह उन क़समों का ज़रूर हिसाब लेगा जो तुमने दिल में सोच-समझकर खायी होगी। अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, सहनशील है।  (225)


जो लोग अपनी बीवियों के साथ सेक्स न करने की क़सम खा बैठें, उनके लिए चार महीने इंतज़ार का समय होगा: अगर वे इस दौरान (क़सम तोड़कर बीवी से) मिलन कर लें, तो याद रखो कि अल्लाह उन्हें माफ़ कर देगा, और उन पर दया करेगा,   (226)


लेकिन अगर (ऐसा न हो, और) वे तलाक़ की ठान लें, तो (फिर बीवी को तलाक़ हो जाएगी), याद रहे कि अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, और जाननेवाला है।  (227)


जिन औरतों को तलाक़ दी गयी है, उन्हें चाहिए कि तीन बार मासिक-धर्म [Periods] आने की अवधि तक अपने आपको (दूसरी शादी से) रोके रखें, और, अगर वे सचमुच अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखती हैं, तो उनके लिए यह वैध न होगा कि जो चीज़ अल्लाह ने उनके पेट में पैदा कर दी हो, उसे छिपाएँ: इस अवधि के दौरान, उनके पतियों के लिए बेहतर यह होगा कि वे उन्हें (अपनी बीवी के रूप में) वापस ले लें, शर्त यह है कि वे (आपस के) मामलों को ठीक करने की इच्छा रखते हों। और (देखो), सर्वमान्य तरीक़े के अनुसार, बीवियों के (अपने पतियों पर) जैसे अधिकार हैं, उसी तरह की उनकी ज़िम्मेदारियाँ भी हैं, और पतियों को उन पर एक ख़ास दर्जा (अधिकार) दिया गया है: (दोनों को याद रखना चाहिए कि) अल्लाह बहुत ताक़त रखनेवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है।  (228)

 

[जिस तलाक़ में दोबारा मेल-मिलाप की संभावना है, वैसा] तलाक़ दो बार (एक-एक करके) हो सकता है, और (हर एक बार) बीवियों को या तो क़ायदे के अनुसार रोक लिया जाए (और मेल-मिलाप कर लिया जाए) या भले तरीक़े से छोड़ दिया जाए। [तीसरा तलाक़ अंतिम और पक्का हो जाएगा]। तुम्हारे लिए यह वैध नहीं होगा कि जो कुछ तुम (अपनी बीवियों को पहले) दे चुके हो, उसमें से कुछ (तलाक़ देते समय) वापस ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को यह डर हो कि वे (शादी के लिए) अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे: अगर तुम [फ़ैसला करनेवाले] को यह शक हो कि वे [मियां-बीवी] ऐसा नहीं कर सकेंगे, तो फिर इस बात में दोनों में से किसी का भी दोष नहीं होगा, अगर औरत (तलाक़ के बदले अपने दहेज़/मेहर में से) कुछ देकर अपना पीछा छुड़ाना चाहे। (याद रहे), ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं को तोड़ देगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं।  (229)


अगर कोई पति अपनी बीवी को दूसरे तलाक़ के बाद फिर से [तीसरा] तलाक़ दे दे, तो फिर इसके बाद वह बीवी उसके लिए वैध न होगी, जब तक कि वह (औरत) किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले; फिर अगर ऐसा हो कि वह पति भी उस (औरत) को ख़ुद से तलाक़ दे दे, तो फिर इस बात में कोई गुनाह न होगा अगर वह औरत और उसका पहला पति एक-दूसरे की ओर लौट आएं, अगर वे समझते हों कि वे अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाओं के भीतर रह सकेंगे। और (देखो!), ये अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं, जिन्हें वह उन लोगों के लिए स्पष्ट कर देता है जो ज्ञान रखते हैं।  (230)


जब तुम औरतों को तलाक़ दे दो और उनकी निर्धारित (इद्दत की) अवधि पूरी होने को आए, तो ठीक तरीक़ा अपनाते हुए या (तो मेल-मिलाप करके) उन्हें रोक लो या उन्हें (आख़िरी तलाक़ देकर) विदा कर दो। उन्हें इस इरादे से रोके न रखो कि तुम उन्हें नुक़सान पहुँचाओ और उन पर अत्याचार करो: जो ऐसा करेगा, तो वह ख़ुद अपने हाथों अपना नुक़सान करेगा। और (देखो), अल्लाह के आदेशों को हँसी-खेल न बना लो; याद करो अल्लाह के एहसानों [bounties] को जो उसने तुम पर किया, और उस किताब [क़ुरआन] और गहरी समझ-बूझ [हिकमत] को भी न भूलो, जो तुम्हारी शिक्षा के लिए उसने तुम पर उतारी। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और जान लो कि अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है।  (231)


जब तुम औरतों को (एक या दूसरी बार) तलाक़ दे दो और वे अपनी निर्धारित (इद्दत की) अवधि को पूरा कर लें, तो उन्हें अपने पतियों से दोबारा शादी करने से न रोको, अगर वे दोनों उचित रीति से ऐसा करने के लिए सहमत हों। जो लोग अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, उन्हें यह हुक्म दिया जाता है कि वे ये बात अपने दिल में बैठा लें: यह तुम्हारे लिए सब तरह से ज़्यादा सही और साफ़-सुथरा तरीक़ा है। अल्लाह जानता है, मगर तुम नहीं जानते। (232)

 

(कोई आदमी अपनी बीवी को तलाक़ दे दे, और उसकी गोद में बच्चा हो), और वह अगर बच्चे की माँ से पूरी अवधि तक दूध पिलवाना चाहता है, तो माएँ अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष तक दूध पिलाएँ, और माँ के खाने-कपड़े की ज़िम्मेदारी, उचित रीति से उसके बाप को उठानी चाहिए। किसी पर भी (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ डालना चाहिए जितना बोझ वह (अपनी हैसियत के मुताबिक़) उठा सके: न तो माँ को उसके बच्चे के कारण नुक़सान पहुँचाया जाए, और न ही बाप को उसके बच्चे के कारण। (माँ के लिए) ऐसी ही ज़िम्मेदारी (बच्चे के बाप के मरने के बाद) उसके वारिस पर भी आती है। फिर अगर (ऐसा हो कि) माँ-बाप आपसी सहमति और सलाह-मशविरे से (बच्चे का) दूध (समय से पहले) छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई गुनाह नहीं, और न ही इस पर कोई गुनाह होगा अगर तुम बच्चे को (माँ के बदले) किसी दूसरी औरत [wet-nurse] से दूध पिलवाना चाहो, शर्त यह है कि तुमने जो कुछ बदले में देने का वादा किया हो, उचित तरीक़े से उसे चुका दो। और (देखो!) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, और यह जान लो कि तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह सब देख रहा है।  (233)

 

अगर तुममें से कोई मर जाए और अपने पीछे विधवा छोड़ जाए, तो उन विधवाओं को दोबारा शादी के लिए चार महीने और दस रातों तक इंतज़ार करना चाहिए। जब वे अपनी निर्धारित अवधि [इद्दत] पूरी कर लें, तो वे अपने लिए जो भी ठीक समझें, चुने लें, उसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (234)


तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं होगा, चाहे तुम इशारे-इशारे में बताओ कि इन औरतों से शादी करना चाहते हो, या बात को अपने मन में छिपाए रखो ----- अल्लाह जानता है कि तुम उन्हें शादी का प्रस्ताव देना चाहते हो। उनके साथ छिपकर कोई क़रार न कर लेना; उनके साथ इज़्ज़त से बातचीत करो और जब तक निर्धारित अवधि पूरी न हो जाए, शादी के बंधन की घोषणा मत करो। याद रखो कि अल्लाह तुम्हारे मन की बात भी जानता है, अतः उससे डरते रहो। याद रहे कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और सहनशील है।  (235)

 

अगर तुमने औरतों को इस हाल में तलाक़ दे दिया, जबकि शादी के बाद अभी तक तुमने उनके साथ सेक्स न किया हो, और न उनके लिए "मेहर" [bride-gift] तय की हो, तो तुम पर कोई गुनाह नहीं होगा। मगर ऐसी हालत में (उस औरत को रिश्ता जोड़ने और फिर तोड़ देने में जो नुक़सान हुआ, उसकी भरपाई के लिए) उन्हें कुछ तोहफ़ा दे दो, अमीर आदमी अपनी हैसियत के अनुसार और ग़रीब आदमी अपनी हैसियत के मुताबिक़ ----- यह उन लोगों पर फ़र्ज़ है जो नेक व अच्छा काम करते हैं।  (236)


अगर तुम अपनी बीवियों को सेक्स करने से पहले ही तलाक़ दे देते हो लेकिन अगर उस वक़्त "मेहर" तय हो चुकी हो, तो जो "मेहर" पहले तय हो चुकी थी, उसका आधा उन्हें दे दो, हाँ अगर वे ख़ुद से (अपना हक़) छोड़ दें तो और बात है, या वह मर्द जिसके हाथ में शादी के बंधन की डोर है, वह [पूरी मेहर देकर अपना हक़] छोड़ दे। (देखो) अगर तुम अपना हक़ छोड़ दो, तो यह बुराइयों से बचने के ज़्यादा नज़दीक है, अत: एक-दूसरे के प्रति खुले दिल से लेना-देना न भूलो: (याद रहे) जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देखता है।  (237)


अपनी नमाज़ों को (सही वक़्त पर और पाबंदी से) पढ़ने पर ध्यान रखो, ऐसी नमाज़ (जो बीच के वक़्त की हो, या) जो सबसे बेहतर ढंग से पढ़ी जाए, और अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से खड़े हुआ करो। (238)


अगर तुम्हें किसी (दुश्मन का) ख़तरा हो, तो चलते-फिरते या सवारी में ही, जिस तरह बन पड़े, नमाज़ पढ़ लो; जब तुम फिर से सुरक्षित हो जाओ, तो अल्लाह को (नमाज़ों में) याद करो, जिस तरह उसने तुम्हें सिखाया है जिसे तुम जानते न थे।  (239)

 

अगर तुममें से कोई मर जाए और अपने पीछे विधवाओं को छोड़ जाए, तो उन्हें चाहिए कि वे उन (विधवाओं) के लिए यह वसीयत [bequest] कर दिया करें: एक साल तक उन्हें खाने-कपड़े का ख़र्च दिया जाए, और उन्हें (उस अवधि में पति के) घरों से न निकाला जाए। लेकिन अगर वे (इस अवधि से पहले) ख़ुद ही घर छोड़ दें (और दूसरी शादी के लिए क़दम उठाएं), तो जो कुछ वे उचित तरीक़े से अपने लिए करना चाहें, उसके लिए तुम दोषी नहीं होगे: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, (और हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (240)


और (याद रहे!) तलाक़ दी हुई औरतों को भी खाने-कपड़े का ख़र्चा, जितना उचित समझा जाए, मिलना चाहिए: ऐसा करना अल्लाह का डर रखनेवालों का कर्तव्य होगा।  (241)


इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें [Revelations] स्पष्ट कर देता है, ताकि तुम्हारी समझ-बूझ बढ़ सके।  (242)

 

[ऐ रसूल!] क्या आपको उन लोगों की कहानी मालूम नहीं जो मौत की डर से अपने घर-बार छोड़कर भाग खड़े हुए थे, हालाँकि वे हज़ारों की संख्या में थे? अल्लाह ने (उनकी बुज़दिली देखते हुए) उनसे कहा, "मर जाओ!" बाद मेंं अल्लाह ने उन्हें दोबारा ज़िंदा कर दिया; अल्लाह तो लोगों पर सचमुच बड़ा फ़ज़ल [favour] करता है, मगर उनमें अधिकतर लोग शुक्र अदा नहीं करते।  (243)


और (देखो!) अल्लाह के रास्ते में (अगर लड़ना पड़े, तो बिना किसी डर के) लड़ो, और याद रखो कि अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाला है।  (244)


कौन है जो (सच्चाई के रास्ते में ख़र्च करके) अल्लाह को ख़ुशी-खुशी क़र्ज़ दे, ताकि अल्लाह उसका क़र्ज़ कई गुना बढ़ाकर उसे चुका दे? और (अगर माल ख़र्च करने से तंगी का डर हो, तो याद रहे), अल्लाह ही तंगी देता है और वही है जो भरपूर देता है, और उसी के पास तुम सबको लौटकर जाना है।  (245)

 

[ऐ रसूल], आप उस घटना पर विचार करें जो मूसा के बाद इसराईल की सन्तान के सरदारों के साथ घटी, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा, "हमारे लिए एक राजा नियुक्त कर दें और हम (उसके झंडे तले) अल्लाह के रास्ते में युद्ध करेंगे।" नबी ने कहा, "लेकिन अगर तुम्हें लड़ाई का आदेश दिया जाए, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि तुम लड़ने से मना कर दो?" वे कहने लगे, "हम अल्लाह के रास्ते में आख़िर क्यों न लड़ेंगे, जबकि हम और हमारे बाल-बच्चे अपने घरों से निकाल बाहर किए गए हैं?" इसके बावजूद जब उन्हें जंग करने का हुक्म दे दिया गया, तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवा सब पीठ फेरकर चल दिए: अल्लाह हुक्म न मानने वालों की पूरी जानकारी रखता है।  (246)


उनके नबी ने उनसे कहा, "अल्लाह ने तुम्हारे लिए तालूत [Saul] को राजा नियुक्त किया है," मगर वे बोले, "उसकी बादशाही हम पर कैसे हो सकती है, जबकि उसके मुक़ाबले में हम राजा बनने के ज़्यादा हक़दार हैं, उसके पास तो ज़्यादा धन-दौलत भी नहीं है?" नबी ने कहा, "अल्लाह ने उसी को तुम्हारे ऊपर चुना है, और उसे ज़बरदस्त ज्ञान भी दिया है और शारीरिक ताक़त भी। अल्लाह जिसे चाहता है, ज़मीन की बादशाही प्रदान कर देता है: अल्लाह (की क़ुदरत) ने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है, वह सब कुछ जाननेवाला है।"  (247)


उनके नबी ने उनसे कहा, "उसकी बादशाही की निशानी यह है कि (बरसों पहले खोया हुआ) एक ताबूत [Ark of the Covenant] तुम्हारे पास आ जाएगा। उसके अंदर तुम्हारे रब की तरफ़ से (तोहफ़े में) लड़ाई की घबराहट दूर करनेवाला ‘सुकून’ [Tranquility] और मूसा [Moses] व हारून [Aaron] के मानने वालों की छोड़ी हुई यादगारें होंगी, जिसको फ़रिश्ते उठाए हुए होंगे। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है।"  (248)

 

फिर तब तालूत [Saul] अपनी सेना लेकर चला, तो उसने (अपनी सेना से) कहा, "अल्लाह एक नदी द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेने वाला है। जो कोई इस नदी का पानी पियेगा, वह मेरा आदमी नहीं होगा, मगर जो कोई अपने आपको इसे चखने से रोक लेगा, वही मेरा आदमी होगा; हाँ अगर कोई अपने हाथ से एक चुल्लू भर ले ले (तो उसे माफ़ किया जाएगा)।" मगर ऐसा हुआ कि कुछ लोगों को छोड़कर, सभी ने (जमकर) उसका पानी पी लिया। फिर जब तालूत और ईमानवाले जो उसके साथ थे, नदी पार कर गए, तो वे कहने लगे, "आज हममें जालूत [Goliath] और उसके योद्धाओं का मुक़ाबला करने की ताक़त नहीं है।" मगर, जो लोग जानते थे कि (एक दिन) उन्हें अल्लाह से मिलना है, कहने लगे, "कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि एक छोटी-सी टुकड़ी ने अल्लाह की अनुमति से, एक बड़ी सेना को हरा दिया है! अल्लाह तो उनके साथ होता है जो धीरज से अपना पाँव जमाए रहते हैं।" (249)


और जब उनका मुक़ाबला जालूत और उसके योद्धाओं के साथ हुआ, तो वे बोले, "ऐ हमारे रब! हम पर धीरज (धरने की ताक़त) उंडेल दे, हमारे क़दम (लड़ाई में मज़बूती से) जमा दे, और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले लोगों के ख़िलाफ़ हमारी मदद कर,"  (250)


और इस तरह, अल्लाह की अनुमति से उन्होंने जालूत की सेना को हरा दिया। दाऊद [David] ने जालूत [Goliath] को मार डाला, और अल्लाह ने उसे बादशाही और समझ-बूझ [हिकमत] प्रदान की, और जो कुछ सिखाना था, दाऊद को सिखा दिया। अगर अल्लाह एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता न रहता, तो धरती पर पूरी तरह से बिगाड़ पैदा हो जाता, मगर, अल्लाह सब के लिए बड़ा फ़ज़ल करनेवाला है।  (251)

 

ये अल्लाह की आयतें हैं जिसे [ऐ रसूल], हम आपको सच्चाई के साथ पढ़कर सुना रहे हैं, और आप सचमुच उन लोगों में से हैं, जिन्हें हमने रसूल [Messenger] बनाकर भेजा है।  (252)


इन रसूलों में से हमने कुछ पर दूसरों से ज़्यादा फ़ज़ल [favour] किया था। इनमें कुछ तो ऐसे थे जिनसे अल्लाह ने बातचीत की; कुछ के दर्जे बुलंद कर दिए; हमने मरयम के बेटे, ईसा [Jesus] को खुली निशानियाँ दीं, और पवित्र आत्मा [Holy Spirit] से उन्हें मज़बूती दी। अगर अल्लाह चाहता, तो जो लोग इन रसूलों के बाद पैदा हुए, वे स्पष्ट निशानियाँ पा लेने के बाद भी एक-दूसरे से न लड़ते। मगर (रसूलों के बाद) उनमें मतभेद हो गया: कुछ ने विश्वास कर लिया और कुछ (सच्चाई से) इंकार करने पर अड़ गए। (यहाँ सबको सोचने और फ़ैसला करने की आज़ादी दी गयी है, वरना) अगर अल्लाह चाहता, तो वे एक-दूसरे से न लड़ते, मगर अल्लाह जो चाहता है, करता है।  (253)

 

ऐ ईमानवालो! जो कुछ (माल व दौलत) हमने तुम्हें दे रखा है, उसमें से (दूसरों पर भी) ख़र्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें न कोई मोल-भाव होगा, न कोई दोस्ती-यारी (काम आएगी), और न कोई सिफ़ारिश हो सकेगी। (सच्चाई से) इंकार करनेवाले ही वे लोग हैं जो भारी ग़लती पर हैं।  (254)


अल्लाह के सिवा कोई पूजने के लायक़ (ख़ुदा) नहीं: वह हमेशा ज़िंदा रहनेवाला, पूरी कायनात को सम्भाले रखनेवाला, (और हर चीज़ पर नज़र रखनेवाला है)। उसे न तो झपकी लगती है और न उस पर नींद हावी होती है। आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है जो उसके सामने उसकी इजाज़त के बिना सिफ़ारिश कर सके? जो कुछ हालात उन (इंसानों) के आगे हैं और जो कुछ उनके पीछे (गुज़र चुके) हैं, वह सब जानता है, मगर वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को नहीं समझ सकते, सिवाय उतने ज्ञान के जितना वह बताना चाहे। उसका तख़्त [साम्राज्य] समूचे आसमान और ज़मीन में फैला हुआ है; इन दोनों पर नज़र रखने और उसकी हिफ़ाज़त करने में उसे कोई थकान नहीं होती। वह सबसे ऊँचा और सबसे महान है।  (255)


दीन [धर्म] के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है: सही व सीधा रास्ता ग़लत रास्ते से अलग होकर साफ़ और स्पष्ट हो गया है, तो अब जिस किसी ने झूठे ख़ुदाओं को ठुकरा दिया और अल्लाह पर ईमान रखा, तो उसने ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नहीं है। अल्लाह सब कुछ सुनने, जाननेवाला है।  (256)


अल्लाह उन लोगों का साथी (और मददगार) है, जो ईमान रखते हैं: वह उन्हें अँधेरे की गहराई से बाहर निकालकर रौशनी में ले आता है। रहे वे लोग जो (सच्चाई को मानने से) इंकार करते हैं, उनके साथी व मददगार तो वे झूठे ख़ुदा हैं जो उन्हें रौशनी से निकालकर अँधेरे की गहराई में पहुँचा देते हैं। वे (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, और वे हमेशा उसी में रहेंगे।  (257)

 


[ऐ रसूल], क्या आपने उस आदमी के बारे में विचार किया है जिसने इबराहीम [Abraham] से उसके रब के बारे में झगड़ा किया था, इसलिए कि अल्लाह ने उसको हुकूमत चलाने की शक्ति दे रखी थी? जब इबराहीम ने कहा, "मेरा 'रब' वह है जो ज़िंदगी और मौत देता है।" तो उसने कहा, "मैं भी तो ज़िंदगी और मौत देता हूँ।" अत: इबराहीम ने कहा, "अल्लाह सूरज को पूरब से उगाता है; तो तू उसे पश्चिम से उगाकर दिखा।" (सच्चाई पर) विश्वास न करने वाला (बादशाह) इस पर भौंचक्का रह गया: अल्लाह उन्हें सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो शैतानी (और ज़ुल्म) करते हैं।  (258)

 

या उस आदमी की हालत पर भी विचार करें जिसका गुज़र एक ऐसी बस्ती से हुआ जिसके घरों की छतें गिरी हुई थीं। (यह हाल देखकर) उसने कहा, "अल्लाह इस वीरान पड़ी हुई बस्ती को फिर से किस तरह ज़िंदा करेगा?" अत: अल्लाह ने उसे सौ वर्ष की मौत दे दी, फिर उसे उठा खड़ा किया, और पूछा, तुम इस हालत में कितनी अवधि तक रहे।" उसने जवाब दिया, "एक दिन या एक दिन का कुछ हिस्सा।" अल्लाह ने कहा, "नहीं, बल्कि तुम सौ सालों तक इस हालत में रहे हो। तुम अपने खाने-पीने की चीज़ों को ध्यान से देखो: ये अब तक ख़राब नहीं हुए हैं। तुम अपने गधे को देखो ----- (यह सब इसलिए हुआ ताकि) लोगों के लिए हम तुम्हें (सच्चाई की) एक निशानी बना दें ---- उन हड्डियों को देखो: किस तरह हम उन्हें एक साथ (ढाँचे के रूप में) ले आते हैं, और फिर उन पर माँस चढ़ा देते हैं!" जब सारी बातें उसकी समझ में आ गयीं, तो वह पुकार उठा, "अब मैं जान गया हूँ कि अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है।" (259)


और जब ऐसा हुआ कि इबराहीम ने कहा था, "ऐ मेरे रब! मुझे दिखा कि तू मुर्दों को कैसे ज़िंदा करेगा?" अल्लाह ने कहा," तो क्या तुझे विश्वास नहीं?" इबराहीम ने कहा, "विश्वास तो है, पर चाहता हूँ कि मेरे दिल को बस ज़रा इत्मिनान हो जाए।" अत: अल्लाह ने कहा, "अच्छा, तो चार चिड़ियों को ले, फिर उन्हें अपने साथ हिला-मिला ले ताकि बुलाने पर वे तुम्हारे पास आ सकें। फिर उन्हें (ज़बह करके) अलग-अलग पहाड़ियों पर रख दे, फिर उनको बुला, और वे उड़ते हुए तेरे पास चले आएँगे: जान लो कि अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखने वाला है।" (260)

 


जो लोग अल्लाह के रास्ते में अपना माल ख़र्च करते हैं, उनकी मिसाल ऐसी है जैसे अनाज के एक दाने से सात बालियाँ [ears] उग जाएं, और हर बाली में सौ-सौ दाने हों। अल्लाह जिस किसी को चाहता है, कई गुना बढ़ाकर देता है: अल्लाह के फैलाव की कोई सीमा नहीं, वह सब कुछ जाननेवाला है। (261)


जो लोग अल्लाह के रास्ते में अपना माल ख़र्च करते हैं, फिर ख़र्च करके अपने किए गए एहसान को जताते नहीं हैं, और न (लेने वाले को) अपनी बातों से दिल दुखाते हैं, तो वे अपने रब के पास इसका बदला ज़रूर पाएंगे: न तो उनके लिए कोई डर होगा, और न वे (किसी बात पर) दुखी होंगे।  (262)


मुँह से एक भली बात कहना, और (दया करते हुए) ग़लतियों को माफ़ कर देना, उस दान [सदक़ा] से कहीं अच्छा है, जिसको देने के बाद (बातों से) दिल को चोट पहुँचाई जाए: अल्लाह तो आत्म-निर्भर है, बहुत सहनशील है।  (263)


ऐ ईमानवालो! तुम अपने दान व ख़ैरात को एहसान जताकर और (बातों से) चोट पहुँचाकर उस आदमी की तरह बर्बाद न करो, जो लोगों को बस दिखाने के लिए अपना माल ख़र्च करता है और अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान नहीं रखता। ऐसे आदमी की मिसाल उस चट्टान जैसी है जिस पर कुछ मिट्टी की तह जमी हुई हो (जिस पर कुछ पौधे उग आते हैं): फिर जब ज़ोर की बारिश हुई (तो सब मिट्टी, पौधा बह गए और) एक साफ़ (और सख़्त) चट्टान के सिवा कुछ बाक़ी न रहा। ऐसे (दिखावा करनेवाले) लोगों को उनके (दान के) कामों के लिए कुछ भी इनाम नहीं मिलने वाला: अल्लाह (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता।  (264)


मगर जो लोग अपने माल को अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने और अपने विश्वास को और पक्का करने के लिए ख़र्च करते हैं, उनकी मिसाल उस बाग़़ की तरह है जो किसी ऊँची पहाड़ी पर हो: जब ज़ोर की बारिश हुई, तो उसमें दुगुने फल-फूल पैदा हो गए; अगर ज़ोरदार वर्षा नहीं भी हुई, तो हल्की फुहार ही उसे हरा-भरा करने के लिए काफ़ी होगी। (याद रहे), तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह सब देख रहा है।  (265)


क्या तुममें से कोई भी यह चाहेगा कि उसके पास खजूरों के पेड़ों और अंगूरों की बेलों का एक बाग़ हो, जिसके नीचे नहरें बह रही हों, और उसमें हर तरह के फल-फूल पैदा होते हों, और फिर ऐसा हो कि जब बुढ़ापा आ जाए और उसके बच्चे अभी कमज़ोर ही हों, कि अचानक उस बाग़ पर एक झुलसा देनेवाला बवंडर [whirlwind] आ जाए और बाग़ जलकर वीरान हो जाए? अल्लाह ऐसी ही मिसालों के द्वारा तुम्हारे सामने (सच्चाई की) निशानियों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम उन पर सोच-विचार करो।  (266)

 


ऐ ईमानवालो! जो कुछ तुम ने कमायी की हो और जो कुछ हमने ज़मीन से तुम्हारे लिए पैदा किया है, उनमें से अच्छी चीज़ें दान में दिया करो। (अल्लाह के रास्ते में) ख़राब चीज़ें मत दान किया करो जो ख़ुद तुम्हें (इतनी नापसंद हों) कि उन चीज़ों को तभी ले सकते हो जब तुमने (जान-बूझकर) आँखें बंद कर ली हों: याद रखो कि अल्लाह आत्म-निर्भर है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है।  (267)


शैतान तुम्हें ग़रीबी से डराता है और बुरे (व गंदे) काम करने पर उभारता है; जबकि अल्लाह तुम्हें ऐसे रास्ते की तरफ़ बुलाता है जिसमें उसकी माफ़ी और उसके फ़ज़ल [bounty] करने का वादा है: (देने में) अल्लाह की कोई सीमा नहीं है, और वह सब कुछ जाननेवाला है,  (268)


और वह जिसे चाहता है, 'गहरी समझ-बूझ' [हिकमत] दे देता है। और जिस किसी को 'गहरी समझ-बूझ' मिल गयी, तो उसे सचमुच बड़ी भलाई की चीज़ मिल गई, मगर नसीहत तो केवल वही लोग लेते हैं जो समझ-बूझ से काम लेते हैं।  (269)


और (देखो!) दान के लिए तुम जो कुछ भी दो, या मन्नत के रूप में जो ख़र्च करो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है, और जो लोग (दिखावे का) ग़लत काम करते हैं, उन्हें मदद करने वाला कोई न होगा।  (270)


अगर तुम सबके सामने दान देते हो, तो यह अच्छी बात है, लेकिन तुम अगर इसे गुप्त रखते हुए किसी ज़रूरतमंद को अकेले में दो, तो यह अधिक अच्छा होगा, और यह तुम्हारे कुछ गुनाहों को मिटा देगा: (याद रखो!) जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है।  (271)


[ऐ रसूल], इन (इंकार करनेवालों) को सीधे मार्ग पर लाने की ज़िम्मेदारी आप पर नहीं है; यह काम अल्लाह का है, वह जिसे चाहता है सही मार्ग पर लगा देता है। जो कुछ भी दान में तुम दोगे, वह तुम्हारे अपने ही भले के लिए होगा, बशर्ते कि तुम इस काम को अल्लाह की ख़ुशी के लिए करो: (दान में) जो कुछ भी तुम दोगे, तो (अल्लाह का क़ानून यह है कि) उसका बदला पूरा-पूरा तुम्हें चुका दिया जाएगा, और तुम्हारा हक़ नहीं मारा जाएगा।  (272)


उन ज़रूरतमंदों को ख़ास करके दान दो जिन्होंने अपने आपको पूरी तरह से अल्लाह के रास्ते में लगा दिया है, और वे शहरों में (व्यापार के लिए) एक जगह से दूसरी जगह दौड़-धूप नहीं कर सकते। उनके स्वाभिमान के कारण अनजान लोग उन्हें मालदार समझते हैं, मगर तुम उन्हें उनके चेहरे के लक्षणों से पहचान सकते हो, वे पीछे पड़-पड़कर लोगों से नहीं माँगते। (याद रखो!) तुम नेकी के रास्ते में जो कुछ भी ख़र्च करोगे, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर होगी।  (273)

 

जो लोग अपने माल में से दान देते हैं, रात में भी और दिन में भी, ढके-छिपे भी और सबके सामने भी, तो इसका इनाम उन्हें उनके रब के पास ज़रूर मिलेगा: न तो उन्हें किसी (यातना का) डर होगा और न वे दुखी होंगे।  (274)


मगर जो लोग (क़र्ज़ देकर) ब्याज [usury] लेते हैं, वे क़यामत के दिन इस तरह उठेंगे जैसे (मिर्गी का रोगी हो, या) किसी को शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो, और यह इसलिए होगा कि वे कहते हैं, "व्यापार [Trade] और ब्याज दोनों एक ही चीज़ है," मगर अल्लाह ने व्यापार को वैध और ब्याज लेने को अवैध [forbidden] ठहराया है। अतः अल्लाह की तरफ़ से चेतावनी मिलने के बाद, जो कोई ब्याज लेने से रुक गया, तो जो कुछ उसने (ब्याज से) पहले कमाया था, वह उसे रख सकता है ------अल्लाह ही उसका फ़ैसला करेगा ---- मगर जिस किसी ने फिर से ब्याज लेना शुरू किया, तो ऐसे ही लोग (जहन्नम की) आग में पड़ने वाले हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे।  (275)


अल्लाह ब्याज को मिटाता है, मगर दान के कामों को (अपने फ़ज़ल से कई गुना) बढ़ाता है: ऐसे लोग जो (अल्लाह की नेमतों का) शुक्र अदा नहीं करते और गुनाहों में लगे रहते हैं, उन्हें अल्लाह पसन्द नहीं करता। (276)


जो लोग (अल्लाह पर) ईमान रखते हैं, अच्छे काम करते हैं, पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, और निर्धारित ज़कात देते हैं, तो उन्हें उनके रब के पास ज़रूर इसका इनाम मिलेगा: न तो उनके लिए किसी तरह का डर होगा, न वे दुखी होंगे।  (277)


ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरो: अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो जो कुछ ब्याज वसूल करना बाक़ी रह गया है, उसे छोड़ दो।  (278)


अगर तुमने ऐसा न किया, तो अल्लाह और उसके रसूल से युद्ध के लिए तैयार  हो जाओ। अगर तुम (ब्याज से) तौबा कर लो, तो (ब्याज छोड़कर) अपना मूलधन [Principal] लेने का तुम्हें हक़ है, न तुम्हें कोई घाटा उठाना पड़े और न तुम दूसरों को घाटे में पड़ने पर मजबूर करो।  (279)


अगर क़र्ज़दार तंगी की हालत में है, तो उसकी (आर्थिक) हालत ठीक होने तक उसे मुहलत देनी चाहिए; इसके बावजूद, अगर तुम समझ रखते हो, तो तुम्हारे लिए बेहतर तो यह होगा कि दान-पुण्य का काम समझकर, (ऐसी तंगी में डूबे हुए आदमी का) पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दो।  (280)


डरो उस दिन से जिस दिन तुम सब लौटकर अल्लाह के सामने हाज़िर होगे: फिर हर एक आदमी ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया होगा, उसका बदला पूरा-पूरा उसे मिल जाएगा, और किसी के साथ भी कोई अन्याय नहीं होगा।  (281)

 

ऐ ईमानवालो! तुम जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में क़र्ज़ के लेन-देन का क़रार [Contract] करो, तो उसे लिख लिया करो: तुम्हारे बीच एक लिखनेवाला [Scribe] हो जो ईमानदारी से दस्तावेज़ लिख दे। किसी लिखनेवाले को लिखने से इंकार नहीं करना चाहिए: उसे लिख देना चाहिए जैसा कि अल्लाह ने उसे सिखाया है। जिस पर क़र्ज़ अदा करने का भार है [यानी क़र्ज़दार], वह बोल-बोलकर लिखाए [dictation], और उसे अपने रब, अल्लाह का डर रखना चाहिए, और उस (क़र्ज़ की राशि) को कम करके नहीं बताना चाहिए। अगर क़र्ज़दार मंद बुद्धि हो, कमज़ोर हो या वह बोलकर न लिखा सकता हो, तो ऐसी हालत में उसके अभिभावक [Guardian] को चाहिए कि वह ईमानदारी से बोलकर लिखा दे। (अब दस्तावेज़ पर) अपने आदमियों में से दो को गवाह बना लो, अगर वहाँ दो आदमी न हों, तो जिन्हें तुम गवाह बनाना पसंद करो, उनमें से एक मर्द और दो औरतों को गवाह बना लो, (दो औरतें इसलिए) ताकि दोनों में से एक अगर भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे। गवाहों को जब बुलाया जाए, तो उन्हें आने से इंकार नहीं करना चाहिए। क़र्ज़ के मामले को लिख लिया करो और साथ में क़र्ज़ की निर्धारित अवधि भी, और लिखने में सुस्ती न करो, चाहे मामला छोटा हो या बड़ा: यह तरीक़ा अल्लाह की नज़र में ज़्यादा न्यायसंगत, गवाही में अधिक भरोसेमंद, और इसमें तुम्हारे बीच पैदा होने वाले संदेह को रोकने की अधिक संभावना है। लेकिन अगर कोई सामान बिक्री करने का हो और उसका लेन-देन तुम नक़द में हाथों-हाथ करते हो, तो तुम पर कोई दोष न होगा, अगर तुम इसकी लिखा-पढ़ी नहीं करते। जब कभी तुम एक-दूसरे के साथ कारोबार करो, तो गवाहों को वहाँ ज़रूर रखा करो। और (देखो!), चाहे लिखनेवाला हो या गवाह हो, उसे किसी क़िस्म का नुक़सान न पहुँचाया जाए, क्योंकि अगर तुमने किसी एक को भी कोई नुक़सान पहुँचाया, तो तुम्हारी तरफ़ से यह एक अपराध होगा। अल्लाह का डर रखो, और वह तुम्हें सिखाएगा: अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है।  (282)


अगर तुम सफ़र में हो, और कोई लिखनेवाला न मिल पाए, तो ज़मानत [security] के रूप में कोई चीज़ गिरवी रख देना चाहिए। लेकिन अगर तुम एक-दूसरे पर भरोसा करने का फ़ैसला करो, तो फिर जिस पर भरोसा किया गया है उसे चाहिए कि वह उस भरोसे को बनाए रखे; उसे अपने रब, अल्लाह का डर रखना चाहिए। और (देखो!) गवाही को न छिपाओ: जो कोई ऐसा करता है, उसका दिल गुनाहगार है, और (याद रखो!) तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (283)


जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सब अल्लाह का है और, चाहे तुम अपने मन की बातें सबके सामने ज़ाहिर करो या छिपाकर रखो, अल्लाह तुमसे उनका हिसाब ज़रूर लेगा। फिर वह जिसे चाहे माफ़ कर देगा और जिसे चाहे सज़ा देगा: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है।  (284)

 

जो कुछ रसूल [मुहम्मद सल्ल.] पर उनके रब की तरफ़ से उतारा गया, वह उस पर ईमान रखते हैं, और वैसे ही सारे मुसलमान भी (उस पर ईमान रखते हैं)। वे सब अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर, और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं। वे कहते हैं, "हम उसके रसूलों के बीच आपस में कोई फ़र्क़ नहीं करते" (कि किसी एक को मानें और दूसरे को न मानें), वे कहते हैं, "हमने सुना और हमने आज्ञा मान ली। हमारे रब! तू अपनी तरफ़ से हमें माफ़ी दे दे। तेरे ही पास हम सबको लौटकर आना है!" -----  (285)


अल्लाह किसी जान पर (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ डालता है, जितना बोझ उठाने की उसमें ताक़त होती है: हर एक ने जो कुछ भी भलाई की होगी उसका फ़ायदा उसी को होगा, और जो कुछ बुराई की होगी उसकी यातना भी उसी को झेलनी होगी ---- [तुम्हारी दुआ यह होनी चाहिए] "हमारे रब! अगर हम कुछ भूल जाएं या हम से ग़लती हो जाए, तो हमारी पकड़ न कीजियो। ऐ रब! हम पर ऐसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले के लोगों पर डाला था। हमारे रब! हम पर उतना बोझ न डाल, जिसको उठाने की हममें ताक़त न हो। हमारी ग़लतियों पर ध्यान न दे, हमें माफ़ कर, और हम पर दया कर। तू ही हमारी रक्षा करनेवाला है, अत: विश्वास न करनेवालों के ख़िलाफ़ हमारी मदद कर।" (286)




 

 

 

 





नोट: 

 

1: यह अरबी के तीन अक्षरों के नाम हैं: अलिफ़, लाम, मीम. सब मिलाकर क़ुरआन की उन्तीस (29) सूरह ऐसी हैं जो ऐसे अलग-अलग पढ़े जाने वाले अक्षरों [हुरूफ़ ए मुक़त्तेआत]  से शुरू हुई हैं, उनमें एक अक्षर से लेकर पाँच अक्षर तक इस्तेमाल हुए हैं जिन्हें अलग-अलग पढ़ा जाता है। विद्वानों ने इन अक्षरों के बहुत से मतलब निकाले हैं, मगर साथ में यह भी लिखा है कि इसका सही मतलब अल्लाह ही को मालूम है, उनमें से यहाँ दो दिए जा रहे हैं:


(i) अरब के लोग जिन्होंने यह क़ुरआन सबसे पहले सुनी थी, उन्हें इन अक्षरों से शायद यह बताया गया कि क़ुरआन में जो अक्षर और शब्द इस्तेमाल हुए हैं, वे उनकी अपनी भाषा यानी अरबी के हैं, हालाँकि ये उनकी भाषा में लिखे गए किसी भी कलाम से बहुत ऊँचे दर्जे का था क्योंकि ये अल्लाह का कलाम है।

(ii) इन अक्षरों से शायद हैरत या आश्चर्य प्रकट होता था, जिसे शुरू में कहने से सुननेवाले का ध्यान आकर्षित हो जाता था। कुछ इसी तरह का प्रयोग उस ज़माने की अरबी कविताओं में भी होता था जिनमें शुरू में ही "नहीं! या "यक़ीनन" कहकर बात आगे बढ़ायी जाती थी।   


2: "ला रैबा फ़ीहि" का एक मतलब तो यह है कि इस किताब में ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिस पर शक या संदेह किया जाए, या यह भी मतलब हो सकता है कि इस किताब (की सच्चाई) पर शक नहीं किया जा सकता है, चाहे बात इसके लिखने वाले की हो या इसकी विषयवस्तु [content] की या consistency की हो। 

“तक़वा" का अनुवाद 'अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचना' किया गया है। असल में "तक़वा" का मतलब हर समय अल्लाह का खटका लगा रहना, या अपने आपको हर तरह की बुराइयों से बचाना होता है। 


3: नज़र से ओझल चीज़ [ग़ैब] जो आदमी के अनुभूति [perception] से परे है, यानी उसे छूकर, देखकर या सूंघकर नहीं महसूस किया जा सकता है, जो एक दूसरी ही दुनिया की चीज़ें हैं, जैसे अल्लाह, आख़िरत, जन्नत, जहन्नम इत्यादि। ऐसी चीज़ों को केवल अल्लाह ही जानता है, सिवाय इसके कि जितना वह अपने रसूलों/नबियों को "वही" द्वारा बताना चाहे (जैसे देखें 2:33, 3:179, 6:59,73; 19:78; 72: 26-27)  


4: एक ईमानवाले के लिए ज़रूरी है कि वह क़ुरआन के साथ-साथ मुहम्मद (सल्ल) से पहले आए नबियों पर उतारी गयी किताबों जैसे तोरात, इंजील, ज़बूर आदि पर भी विश्वास रखे कि वे भी अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए संदेश थे। 

आनेवाली ज़िंदगी [आख़िरत] से मतलब "आख़िरी" या अंत" है, यानी क़यामत के बाद की ज़िंदगी है जो हमेशा के लिए होगी और उसमें हर आदमी को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा, उसी बुनियाद पर आदमी को जन्नत की ख़ुशियाँ मिलेंगी या जहन्नम की मुसीबत झेलनी होगी (जैसे देखें 7:38-51; 41:19-24; 55:33-78; 56:11-44; 69:19-36; 76:4-22; 83:15-22)  


6: यहाँ ऐसे लोगों का ज़िक्र है जिन्होंने तय कर लिया था कि चाहे जो हो जाए, उन्हें मुहम्मद (सल्ल) द्वारा लाए हुए संदेश को न सुनना है, न मानना है। अब ऐसे आदमियों को बुरे काम के नतीजे से सावधान किया जाए या न किया जाए, वे सच्चाई पर विश्वास नहीं करने वाले। 


7: अगर कोई आदमी किसी कारण से कोई गुनाह कर बैठे और फिर अपने किये पर शर्मिंदा हो, तो उसमें सुधार के उम्मीद की जा सकती है, मगर कोई आदमी अगर ग़लती पर अड़ जाए, और यह ठान ले कि सही बात माननी ही नहीं है, तो फिर उसकी ज़िद्द का आख़िरी नतीजा यह होता है कि अल्लाह उसके दिल को बंद करके उस पर ठप्पा लगा देता है जिसके बाद सच्चाई को क़बूल करने की उस आदमी की सलाहियत ख़त्म हो जाती है।

"अज़ाब" यानी ऐसी चीज़ जो बड़ी दर्दनाक हो, यातना, सज़ा आदि, यह शब्द क़ुरआन में 300 से भी ज़्यादा बार आया है।    


8: यहाँ से मदीना में रहने वाले एक तीसरे समूह का ज़िक्र है जिन्हें पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrite] कह सकते हैं जो ऊपर से तो यह कहता था कि वह मुहम्मद (सल्ल) की शिक्षाओं पर विश्वास रखता है, पर असल में वह इस पर ईमान नहीं रखता था। 


10: उन लोगों ने अपनी मर्ज़ी से पाखंड का रास्ता चुना और उस पर अड़े रहे, और इसी के चलते अल्लाह ने उन्हें भटकता छोड़ दिया।

11: जब मदीना के पाखंडियों की इस बात पर आलोचना होती कि उनके संबंध मक्का के बुतपरस्तों से बहुत मधुर हैं, जबकि वे मुसलमानों के दुश्मन हैं, तो वे कहते कि हम मुसलमानों और उनके दुश्मनों के बीच सुलह कराने की कोशिश कर रहे थे।


14: यहाँ "अपने शैतानों" का मतलब उनके जो पेशवा और लीडर थे जो उनको गलत रास्ते पर चलने की सलाह देते थे। 


17: जब इस्लाम की शिक्षाएं सामने लायी गईं तो एक तरह से पूरे माहौल में रौशनी हो गई और सारी सच्चाइयाँ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगी, मगर केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते कुछ पाखंडियों ने उन सच्चाइयों को मानने से इंकार कर दिया और उस पर अड़े रहे। तो फिर अल्लाह ने भी उनकी समझ-बूझ में अंधेरा लिख दिया और उन्हें अंधेरे में भटकने के लिए छोड़ दिया। 


19: यहाँ वैसे पाखंडियों की मिसाल दी गई है जो अपने विश्वास में पक्के नहीं थे। जब इस्लाम की सच्चाई की दलीलें सामने आयीं और जन्नत के वादे किए गए, तो उनका झुकाव इस्लाम की ओर हो गया और वे उसकी तरफ़ क़दम बढ़ाने लगे, मगर फिर उसके साथ जब उसके आदेशों को मानने की ज़िम्मेदारियाँ आयीं, तो फिर अपनी ख़ुदग़र्ज़ी के चलते उन कर्मों से अपने आपको रोक नहीं पाए जिन्हें करने से रोका गया था। इस तरह कभी जब बिजली कड़कती और रौशनी होती, तो वह उससे फ़ायदे की लालच में थोड़ा चल लेते, मगर जब अल्लाह के आदेश मानने की बात आती, तो उन पर अपनी इच्छाओं का अंधेरा छा जाता, और वहीं क़दम रोककर खड़े रह जाते। 


22: आयत 21-22 में इस्लाम की बुनियादी सिद्धांत "तौहीद" के बारे में बताया गया है, यानी इबादत के लिए केवल एक अल्लाह को मानना। अरब के लोग भी यह मानते थे कि सारी कायनात अल्लाह की पैदा की हुई है, मगर इसके साथ वे यह भी मानते थे कि अल्लाह ने अपने बहुत से काम छोटे-छोटे देवी-देवताओं को सौंप रखे हैं जो अपने कामों में ख़ुद से फ़ैसले कर सकते हैं। अत: उन लोगों ने इन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बना रखी थीं और अपनी ज़रूरतों के लिए उनके सामने हाथ फैलाते थे। अल्लाह ने कहा है कि जब सारी चीज़ें मेरी बनायी हुई हैं, तो इबादत केवल मेरी ही होनी चाहिए। 


23: इस आयत में इस्लाम की एक और बुनियादी मान्यता 'रिसालत" के बारे में कहा गया है, यानी यह कि मुहम्मद (सल्ल) अल्लाह के रसूल हैं जिन पर अल्लाह की तरफ़ से संदेश [क़ुरआन] आता है। जब अरब के लोगों ने क़ुरआन की सच्चाई को मानने से इंकार किया, तो उन्हें यह चुनौती दी गई कि अगर यह एक आदमी का गढ़ा हुआ कलाम है, तो वे लोग जो अरबी भाषा में माहिर हैं, ऐसी एक सूरह ही लिखकर दिखाएं, और इसके लिए अपने सभी मददगारों (मूर्तियों या अपने नेताओं) की भी सहायता ले लें। ऐसी चुनौती क़ुरआन में कई जगह आयी है, देखें 10:38; 11:13; 28:49; 52:34. 


24: 'आग' जहन्नम/दोज़ख़ के कई उपनामों में से है। "पत्थर" को आग का ईंधन कहने से मतलब शायद 'पत्थर की मूर्तियाँ' हैं। देखें 66:6


25: इस दुनिया के बाद आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत] में मिलने वाले इनाम के बारे में यहाँ बताया गया है। 

जन्नत में लोगों को हर बार खाने के लिए इतना मज़ेदार फल मिलेगा कि जब कभी फिर से उन्हें वह दिया जाएगा तो वे उस पसंदीदा फल को देखकर बहुत ख़ुश हो जाएंगे। दूसरा मतलब यह भी हो सकता है कि जब वहाँ उन्हें फल दिए जायेंगे तो वह देखने में दुनिया के फल जैसे ही जाने-पहचाने होंगे, मगर मज़े में बहुत ज़्यादा अच्छे होंगे। ..... जन्नत में रहने वालों को हर तरह की ---- शारीरिक गंदगियों जैसे बीमारी, पिशाब-पाख़ाना, मासिक-घर्म आदि से या आध्यात्मिक गंदगियाँ जैसे नफ़रत, ईर्ष्या आदि से मुक्ति मिल जाएगी।


26: यह आयत उन लोगों के जवाब में है जिन्होंने इस बात पर आपत्ति की थी कि ऐसी तुच्छ चीज़ों की मिसाल देना अल्लाह के लिए उचित नहीं है। 


27: ज़्यादातर विद्वानों ने इंसानों द्वारा अल्लाह के सामने प्रतिज्ञा लिए जाने को उस प्रतिज्ञा से जोड़ा है जिसका उल्लेख सूरह अ'राफ़ (7: 172) में आया है, जब अल्लाह ने इंसानों को पैदा करने से बहुत पहले उनकी रूहों को जमा करके उनसे अपने आदेशों को मानने का वचन लिया था। दुनिया में समय-समय पर आकर नबियों ने भी इंसानों को उस प्रतिज्ञा को न तोड़ने की बात याद दिलायी थी। एक और बात यह है कि हर इंसान पैदा होते ही ख़ुद ही अपने पैदा करने वाले के साथ एक प्रतिज्ञा से बंध जाता है कि वह उसके आदेश के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारेगा। कुछ लोगों ने इसका मतलब इसराईल की संतानों द्वारा ली गई उस प्रतिज्ञा से लिया है जिसका ज़िक्र नीचे 2:40-48 में है।  

यहाँ अपने रिश्तेदारों से रिश्ता जोड़कर रखने की बात भी कही गई है, ताकि उनका जो हक़ है वह अदा हो जाए। 


30: इंसान को पहली बार पैदा किए जाने का क़िस्सा कई बार आया है, (देखें 7:10-25; 15:28-48; 20:115-123). 

इंसान को "ख़लीफ़ा" बनाने का कई मतलब हो सकता है, एक तो यह कि वह ज़मीन पर अल्लाह का प्रतिनिधि [Deputy] होगा, मगर इसका बुनियादी मतलब उतराधिकारी है, या उसे अस्थायी सरपरस्त [Trustee] भी कहा जा सकता है। विद्वानों का कहना है कि इंसानों से पहले जिन्नों को पैदा किया जा चुका था जो आपस में ख़ून-ख़राबा करते रहते थे, इसलिए फ़रिश्तों ने इंसानों के बारे में भी ऐसा सोचा था। 

अल्लाह जानता था कि बहुत सारे लोग होंगे जो भलाई का काम करेंगे, शांति फैलाएंगे और इंसाफ़ के लिए खड़े होंगे। चूँकि इंसानों को अच्छा-बुरा रास्ता चुनने की आज़ादी है, इसलिए जो कोई सच्चाई पर विश्वस करते हुए अच्छे कामों में लगा रहेगा, वह अल्लाह की नज़र में दूसरे सभी जीवों से बेहतर होगा, और जो कोई विश्वास नहीं करेगा और बुरे कामों में लगा रहेगा, वह सभी जीवों से बुरा होगा। देखें 98: 6-8.


31: नाम सिखाने का मतलब अल्लाह ने आदम को प्रकृति में फैली हुई सारी चीज़ों के नाम और उनकी विशेषताएं सिखा दीं। 


34: इबलीस ही शैतान के नाम से भी जाना जाता है। फ़रिश्तों के साथ वह भी शामिल था, मगर वह जिन्नों में से था (18:50), जिन्न भी इंसानों की तरह अल्लाह की पैदा की हुई जाति है जो फ़रिश्तों से इस मामले में अलग है कि वह अपनी मर्ज़ी से अच्छा-बुरा काम करने के लिए आज़ाद है, उसे अल्लाह ने बिना धुएं की आग से बनाया है, जो इंसानों को नहीं दिखायी देते। आदम को सज्दा करने का हुक्म उसके लिए असल में एक परीक्षा थी कि वह हुक्म मानता है कि नहीं। उसने घमंड में आदम के आगे सज्दा करने से इंकार कर दिया, क्योंकि वह अपने को आदम से बेहतर मानता था, देखें 7: 12; 

यहाँ सज्दे से मतलब बंदगी करना नहीं है बल्कि इज़्ज़त देने का तरीक़ा है, जैसे यूसुफ़ (अलै) के सामने याक़ूब (अलै), उनकी बीवी और उनके 11 बच्चों ने सज्दा किया था (सूरह 12). 


36: शैतान ने आदम और उनकी बीवी को बहकाकर उस पेड़ का फल खाने के लिए तैयार कर लिया जिसे खाने के लिए अल्लाह ने मना किया था, उसने बात यह बनायी कि इसे खाने से आप फ़रिश्तों की तरह हमेशा ज़िंदा रहेंगे। इसका ज़िक्र थोड़े विस्तार से सूरह अ'राफ़ (7: 19-23) और सूरह ताहा (20: 120) में भी आया है। यह गुनाह दोनों से ही हुआ था, और इस्लाम में ईसाई धर्म की तरह "Original sin" की परिकल्पना नहीं है।


37: आदम (अलै) को अपनी ग़लतियों के लिए तौबा करने की दुआ भी अल्लाह ने ही सिखायी थी, दुआ के शब्द सूरह अ'राफ़ (7: 23) में आये हैं। 


40: "याक़ूब [Jacob] (अलै) का एक नाम "इसराईल" भी है। यहाँ मदीना के यहूदियों को याद दिलाया जा रहा है कि अल्लाह ने उन पर कैसी-कैसी नेमतें की थीं जिनका बयान आयत 49-50 में और उसके आगे की आयतों में दिया गया है। उन नेमतों के बदले उन्हें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और तौरात के आदेशों को सही तरीक़े से मानने की प्रतिज्ञा पूरी करनी चाहिए, मगर एक तरफ़ उन लोगों ने तोरात व इंजील में अपनी मर्ज़ी से फेर-बदल किया और दूसरी तरफ़ आख़िरी नबी के आने की ख़बर को छिपाते हुए क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) को मानने से इंकार कर दिया। शायद उन्हें डर था कि अगर क़ुरआन पर विश्वास कर लिया तो उनकी क़ौम के लोग ही उन पर भड़क जाएंगे, सो उनसे डर गए मगर अल्लाह से नहीं डरते। 


41: यहूदियों से कहा गया है कि जो आसमानी किताबें यानी तौरात और इंजील [Torah & Gospel] उनके पास पहले से थीं, उनमें भी एक अल्लाह की इबादत करने को कहा गया है, क़ुरआन उन बातों की सच्चाई की पुष्टि करती है कि ये किताबें भी अल्लाह ने ही उतारी थीं, भले ही इनमें कुछ फेर-बदल कर दिया गया है, और साथ में आख़िरी नबी के आने की जो ख़बर इनमें दी गई थी उसे भी क़ुरआन ने सच्चा कर दिखाया है, इसलिए उन्हें क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) की सच्चाई पर सबसे पहले विश्वास करना चाहिए था।

दुनिया के मामूली फ़ायदे के लिए अल्लाह की आयतों का सौदा कर लेने के बारे में क़ुरआन मेंं बार बार ज़िक्र है, ख़ासकर पहली कुछ सूरतों में। यहाँ मदीना के कुछ यहूदी धर्म-गुरुओं के यहाँ चली आ रही परम्परा के अनुसार वे लोग धन के बदले में लोगों को ख़ुश करने के लिए तौरात के कुछ कड़े नियमों की जगह पर हल्के-फुल्के नियमों का पालन करने का मशविरा दे देते थे।

43: "ज़कात": यह एक टैक्स है जो ऐसे आदमी पर लगता है जिसकी बचत की रक़म 85 ग्राम सोने के मूल्य के बराबर या ज़्यादा हो, और बचत की वह रक़म पूरे एक इस्लामी साल (क़रीब 355 दिन) तक उसके पास मौजूद [untouched] हो, अगर यह शर्त पूरी होती हो, तो बचत के ऊपर 2.5% ज़कात देना होगा।

 

48: "सिफ़ारिश": फ़ैसले के दिन किसी के द्वारा किसी दूसरे आदमी के हक़ में माफ़ी के लिए अल्लाह से वकालत करने को कहते हैं।  

 

49: फ़िरऔन मिस्र का बादशाह था जहाँ इसराईल की संतानें बड़ी संख्या में आबाद थीं, मगर वहाँ वे ग़ुलामी के दिन गुज़ार रही थी। फिर एक भविष्यवक्ता ने फ़िरऔन के सामने बताया कि इस साल इसराइलियों में एक बच्चा पैदा होगा जो फ़िरऔन की बादशाहत ख़त्म कर देगा। यह सुनकर उसने हुक्म दे दिया कि इसराइलियों के यहाँ जो भी लड़का पैदा हो, उसे मार दिया जाए, मगर लड़कियों को छोड़ दिया जाए ताकि उनसे दासियों के काम लिए जा सकें। देखें 20:36


51: अल्लाह ने मूसा (अलै) को तूर पहाड़ पर चालीस रातों की गहन इबादत के लिए बुलाया था ताकि उन्हें तोरात दी जा सके। इधर वह तूर पर गए और पीछे उनकी अनुपस्थिति में सामरी ने ज़ेवरों को गलाकर एक बछड़ा बना लिया और इसराईल की संतानों को उसकी पूजा करने के लिए तैयार कर लिया था। इस घटना का वर्णन थोड़े विस्तार से सूरह अ'राफ़ (7: 148-153) और सूरह ताहा (20: 83-97) में आयेगा। 


57: इसराईल की संतानों ने जब अल्लाह के हुक्म को न मानते हुए “अमालक़ा" की क़ौम से युद्ध करने से इंकार कर दिया, तो इसके नतीजे में उन्हें सीना के रेगिस्तान में चालीस साल तक गर्मी और भूख के मारे भटकते रहना पड़ा, फिर अल्लाह ने उन पर मेहरबानी की, बादल से उन पर छाया की, और खाने के लिए "मन्ना" (एक मीठी रोटी) और "सलवा" (मुर्ग़े जैसी चिड़ियों/ बटेर का भुना गोश्त) उतारा। 


58: शहर का नाम नहीं बताया गया है, शायद "येरुशलम" की बात हो। इसका ज़िक्र 7:161 में भी है। 


60: यह घटना भी उसी समय की है जब वे सीना के रेगिस्तान में मारे फिर रहे थे। हज़रत याक़ूब (इसराईल) अलै. के बारह बेटे थे जो आगे चलकर बारह क़बीले में बँट गए थे। अत: सभी क़बीले के लिए एक-एक पानी का सोता! (7:160) 


61: इसराईल की संतानों के बारे में यह बात कई जगह आयी है कि वे बेवजह नबियों का क़त्ल कर देते थे, (देखें 2:87,91; 3:21,112, 181, 183; 4:155; 5:70). यही इल्ज़ाम New Testament (Luke 11:39-52; 13:34-35) में भी देखा जा सकता है। 


62: "साबी" [Sabians] के बारे में बताया जाता है कि ये लोग "एक सर्वशक्तिमान ख़ुदा को मानने वाले" [Monotheistic community] थे जो ज़्यादातर दक्षिणी इराक़ के मूल निवासी थे। यह भी कहा जाता है कि वे हज़रत यह्या [John, the Baptist] को अपना मसीहा मानते थे। कुछ विद्वानों के अनुसार वे अरब में तारों की पूजा करने वाले लोग थे।

 

63: मूसा (अलै) को अल्लाह ने तौरात दी और यह हुक्म दिया कि उनकी क़ौम के लोगों को इसमें दिए गए आदेशों को मानना चाहिए। मगर हुआ यूँ कि लोग हल्के आदेशों को तो मान लेते मगर जो कड़े आदेश होते, उनको मानने में आना-कानी करते। फिर अल्लाह ने तूर पहाड़ को उनके ऊपर करके उनसे इन आदेशों को मानने का वचन लिया था। (देखें 2:93; 4:154; 7:171) 


65: शनिवार [Saturday] को अरबी और सीरियाई भाषा में "सब्त" [Sabbath] कहा जाता है। यहूदियों के लिए यह एक पवित्र दिन होता था जिस दिन पैसा कमाने के लिए कारोबार करना मना था। जिन यहूदियों का यहाँ उल्लेख है, वे शायद दाऊद (अलै) के ज़माने में समंदर के किनारे रहते थे, और मछलियाँ पकड़ा करते थे। शनिवार के दिन मछली पकड़ना उनके लिए वैध नहीं था। शुरू में तो उन लोगों ने कुछ न कुछ बहाने से मछलियाँ पकड़नी शुरू की, फिर बाद में खुलकर अल्लाह के आदेशों को न मानते हुए उन लोगों ने शनिवार के दिन मछ्लियाँ पकड़नी शुरू कर दीं। कुछ अच्छे लोगों ने समझाया भी, मगर वे न माने। फिर अल्लाह की यातना आ पहुँची, और उन लोगों को बंदर बना दिया गया। देखें (7:163-166).

 

क़ुरआन में एक जगह है कि ऐसे लोग जो अल्लाह का हुक्म नहीं मानते, उनमें से कुछ लोगों  को अल्लाह ने बंदर और सुअर बना दिया (5:60)। कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें सचमुच का बंदर बना दिया गया था, जबकि कुछ विद्वान कहते हैं कि असल में यह बात कहने का तरीक़ा है, जैसे 17: 50 में कहा गया है, "तुम पत्थर या लोहा बन जाओ" या जैसे विश्वास न करने वालों को "अंधा, बहरा और गूंगा (2:18)" कहा गया है, उसी तरह यहाँ नियम तोड़नेवालों को बंदर कहा गया है। 


71: इस घटना से यह शिक्षा दी गई है कि बिना कारण ऐसे काम की खोज-पड़ताल में नहीं लगना चाहिए जो ज़रूरी न हो, बल्कि जो बात सीधी-सरल हो, उसे सादगी से ही कर लेना चाहिए। 


73: इस सूरह का नाम इसी गाय की कहानी पर पड़ा है। बताया जाता है कि मूसा (अलै) के ज़माने में एक आदमी ने संपत्ति के बंटवारे के मामले में अपने भाई या चाचा को क़त्ल करके उसकी लाश को किसी बेगुनाह आदमी के दरवाज़े पर रख दिया। फिर ख़ुद ही मूसा (अलै) से गुहार लगाई कि मेरे भाई के क़ातिल को सज़ा मिलनी चाहिए, मगर क़ातिल का कोई सुराग़ नहीं मिल पा रहा था। फिर अल्लाह के हुक्म से मूसा (अलै) ने लोगों को एक गाय ज़बह करके उसके गोश्त को मरे हुए शरीर पर मारने की सलाह दी। जैसे ही गोश्त मुर्दा शरीर पर लगा, वह आदमी ज़िंदा होकर उठ बैठा, और उसने क़ातिल का नाम बता दिया।    


76: तौरात में आगे आने वाले समय में जिस नबी के बारे में भविष्यवाणियाँ की गई थीं, उन पर मुहम्मद (सल्ल) पूरी तरह सही उतरते थे। कुछ यहूदी लोग जो अपने आपको ईमानवाला कहते थे, वे तौरात में आई ऐसी बातों की जानकारी कभी-कभी मुसलमानों को दे देते थे। जब अकेले में यहूदी लोग आपस में मिलते थे तो वहाँ ऐसे लोगों की निंदा की जाती थी कि अगर ऐसी बातें मुसलमानों को बताई जाएंगी, तो क़यामत के दिन वे अपनी दलीलों में ये बात हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल करेंगे।


85: मदीना में यहूदियों के दो क़बीले आबाद थे: बनु क़ुरैज़ा और बनु नज़ीर, इसी तरह वहाँ के मूल निवासियों (बहुदेववादियों) के भी दो क़बीले थे: ओस और ख़ज़रज। शुरू से ओस क़बीले की दोस्ती बनु क़ुरैज़ा से थी, और ख़ज़रज की दोस्ती बनु नज़ीर से थी। ओस और ख़ज़रज क़बीले के बीच जब कभी लड़ाइयाँ होती, तो यहूदियों के दोनों क़बीले अपने दोस्तों की तरफ़ से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भिड़ जाते थे, यहाँ तक कि उनका क़त्ल करने और उन्हें घरों से बाहर निकालवाने में भी सहायक होते। फिर जब दूसरे गुट के यहूदी, युद्ध के बाद बंदी बनाकर लाए जाते, तो फिर ये यहूदी लोग भरपाई में पैसा ख़र्च करके उसे छुड़ा लेते, क्योंकि तौरात में हुक्म था कि अगर कोई यहूदी दुश्मन के क़ब्ज़े में चला गया है, तो उसे छुड़ाना चाहिए। मुहम्मद (सल्ल) के मदीना आने के बाद वहाँ शांति स्थापित हो गई।

 

87: "स्पष्ट निशानियों" का मतलब वे चमत्कार हैं जो अल्लाह के हुक्म से ईसा (अलै) ने दिखाए थे, (देखें 5:110). क़ुरआन में "रूहुल क़ुद्स" यानी 'पवित्र आत्मा' हज़रत जिबरील (अलै) के लिए आया है, (देखें 16:102), जिनका असल काम अल्लाह के संदेश रसूलों तक पहुँचाना था।  


89: जब यहूदियों का बहुदेववादियोंसे झगड़ा होता, तो वे दुआएं माँगते थे कि तौरात में जिस नबी के आने की ख़बर दी गई है, वह आ जाता तो हमलोगों को कामयाबी मिलती। मगर जब सचमुच नबी के रूप में मुहम्मद (सल्ल) आ गए, तो केवल जलन के चलते उन लोगों ने उन पर विश्वास करने से इंकार कर दिया कि वह नबी इसराइलियों में से क्यों नहीं हुआ?


92: बछड़े को पूजने का वर्णन आयत 2:53 में गुज़रा है।

93: प्रतिज्ञा के लिए देखें 2:63. 

94: यहूदियों की जो मान्यता रही है कि वे ही अकेले अल्लाह की चुनी हुई क़ौम हैं, इस पर यहाँ व्यंग्य किया गया है, देखें 62: 6-7

95: उनके कुकर्मों में अल्लाह का हुक्म न मानना, कुछ नबियों जैसे हज़रत ज़करिया और यह्या अलै का क़त्ल करना, ईसा अलै. को सूली चढ़ाने का दावा करना, हज़रत मरयम पर लांछन लगाना और सूद का कारोबार करना। देखें 4: 153-158.  


97: कुछ यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) से कहा था कि अगर आपके पास जिबरील अल्लाह का संदेश लेकर आते हैं तो हम उसे नहीं मानेंगे, हम जिबरील को अपना दुश्मन समझते हैं क्योंकि वह हमारे लिए बहुत कड़े हुक्म लाया करते थे। 


102: बाबिल (Babylon) इराक़ का मशहूर शहर था,  और वहां के यहूदी लोग जादू-टोने में दिखाए गए खेल-तमाशे और नबियों द्वारा सच्चाई को सिद्ध करने के लिए दिखाए गए चमत्कार (मोजिज़ा) में कोई अंतर नहीं समझते थे। अल्लाह ने वहां दो फ़रिश्ते "हारूत और मारूत" को इंसानों के रूप में भेजा ताकि उनमें सच्चाई की समझ पैदा हो। फ़रिशतों ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें जादू भी सिखाया और उससे होने वाली बुराइयों को भी बताया, मगर लोगों ने उनसे जादू सीखकर ग़लत मक़सद के लिए इस्तेमाल किया जिससे समाज में बिगाड़ पैदा हुआ, यहाँ तक कि मियां-बीवी में अलगाव तक हो जाता था। 

यह परम्परा सुलैमान (अलै) के ज़माने तक चलती रही, जब कुछ शैतान आदमियों और जिन्नों ने जादू-टोना गढ़ लिया और यहूदियों के बीच यह बात फैला दी थी कि सुलैमान (अलै) की सारी ताक़त और हुकूमत जादू-टोने की वजह से है, अत: आम लोग भी ऐसी ताक़त और हुकूमत की लालच में जादू-टोने जैसी बुरी चीज़ को सीखने और उस पर अमल करने में लग गए, यहां तक कि कुछ लोग जादू-मंतर के चक्कर में एक ख़ुदा को छोड़कर बुतों की पूजा तक करने लगे। सुलैमान अलै के बारे में कहा जाने लगा कि वह ख़ुद ही बड़े जादूगर हैं जिन्होंने जिन्नों को और हवा को अपने क़ाबू में कर रखा है। बाइबल में है कि बाद के वर्षों में वह भी बुतों की पूजा करने लगे थे, हालांकि क़ुरआन ने इस बात को ग़लत बताया है।

यहां समझने की बात यह है कि इंसानों को अपनी मर्ज़ी से ग़लत या सही काम को चुनने का हक़ दिया गया है। अल्लाह का क़ानून (मशीयत) यह है कि जब कोई आदमी बुरा या अच्छा काम करना चाहता है तो उसे वह करने दिया जाता है, और उसमें अल्लाह की मर्ज़ी भी शामिल हो जाती है, जिससे कि उसे गुनाह या सवाब (पुण्य) हो सके। मगर अल्लाह पसंद केवल अच्छे कामों को ही करता है।


104: मदीना के कुछ शरारती यहूदियों ने जान-बूझकर मुहम्मद (सल्ल) को गालियाँ देने के लिए "राइना" कहना शुरू किया जिसको बोलने में थोड़ा सा फेर-बदल करने से मतलब यह होता था कि "तुम बेवक़ूफ़ हो" या तुम मेरी भेड़ों के चरवाहे हो।" 4:46 भी देखें।


106: अल्लाह का तरीक़ा रहा है कि हर दौर में उस ज़माने के हालात के मुताबिक़ नियम-क़ायदे (शरीयत) में थोड़ा फेर-बदल होता रहा है जबकि दीन की बुनियादी बातें वही रहती हैं। मूसा (अलै) और ईसा (अलै) के ज़माने में नियम-क़ायदे थोड़े अलग थे। इसी तरह से मुहम्मद सल्ल जब नबी हुए तो शुरुआत के ज़माने में हालात के मुताबिक़ जो हुक्म दिए गए, बाद में उसमें ज़रूरत के अनुसार आहिस्ता-आहिस्ता बदलाव लाया गया। कुछ यहूदियों को इस बात पर आपत्ति थी कि जब सारे नियम-क़ायदे उसी एक अल्लाह की तरफ़ से आते हैं, तो फिर इसमें समय-समय पर बदलाव क्यों हो रहा है? यहां इसी बात का जवाब दिया गया है। 

इसी आयत और कुछ और आयतों जैसे 13:39; 16:101; 22:52 से बाद में "नासिख़ व मंसूख़"[Theory of Abrogation] का सिद्धांत बनाया गया, जिसके मुताबिक़ माना जाता है कि क़ुरआन के कुछ पुराने आदेश को बाद की आयतों में आये हुए आदेशों से बदल दिया गया [नस्ख़], इस तरह पुराने आदेश रद्द [मंसूख़] मान लिए गए। उदाहरण के लिए शराब पीने को एक झटके में नहीं, बल्कि तीन चरणों में हराम किया गया था, देखें 2:219; 4:43 और 5:90.


108: मूसा अलै. की क़ौम ने उनसे कैसे-कैसे सवाल पूछे थे, जैसे अल्लाह को देखने की माँग, फ़रिश्तों से बात करने की माँग आदि, इसके लिए देखें 2: 55; 4:153 और 2:67-71


114: इस आयत में शायद यहूदियों, ईसाइयों और मक्का के मुशरिक तीनों समूह का ज़िक्र आया है जिन्होंने अलग-अलग समय में इबादत की जगहों पर हमला किया और लोगों को वहां जाने से रोका। (देखें 22:40). शाह तैतूस [Titus] के ज़माने में ईसाइयों ने “बैतुल मक़दिस” पर हमला करके उसे तहस-नहस किया, उसी तरह, अबरहा जो कि ईसाई था, उसने काबा को बर्बाद करने के इरादे से हमला किया, और मक्का के मुशरिक लोगों ने मुसलमानों को काबा में जाकर नमाज़ पढ़ने से रोका। 

लेकिन यहाँ मालूम होता है कि यह आयत मदीना के यहूदियों के बारे में है जिन्होंने मुसलमानों को मस्जिद ए नबवी में येरूशलम (बैतुल मक़दिस) की जगह काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ने से रोकना चाहा। (देखें 2:115 और 2:142)


115: अल्लाह असल में हर दिशा में मौजूद है, इसलिए उसकी इबादत करने के लिए किसी दिशा में भी मुंह करके इबादत हो सकती है, असल बात है अल्लाह का हुक्म मानना। अगर अल्लाह ने कहा कि फ़लां दिशा में मुंह करके इबादत करो, तो जो उसका हुक्म बिना किसी हिचकिचाहट के मान ले, वह सही है।


116: ईसाई कहते थे कि ईसा (अलै) अल्लाह के बेटे हैं, देखें 4:171; 10:68; 19:88-92; 21:26; 25:2). कुछ यहूदियों का मानना था कि हज़रत उज़ैर अल्लाह के बेटे हैं (9: 30), उसी तरह, अरब के मुशरिक लोग देवियों को या फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियां मानते थे (16: 57) ।


121: इसराईल की संतानों में बहुत बड़ी संख्या तो ऐसे लोगों की थी जो कि नियमों को तोड़ने वाले थे, मगर उनमें कुछ लोग ज़रूर ऐसे थे जो कि तौरात और इंजील के नियमों को मानते भी थे और उन पर अमल भी करते थे। ऐसे लोगों ने जब मुहम्मद सल्ल की लायी हुई शिक्षा को सुना तो तुरन्त उसकी सच्चाई को पहचान लिया और उसको दिल से सही मानते हुए उस पर अमल किया।


124: यहाँ अल्लाह ने इबराहीम अलै. की जिस परीक्षा लेने का हवाला दिया है, वह शायद उनके द्वारा बेटे की क़ुर्बानी वाला मामला है (देखें 37:102-107).

यहां से हज़रत इब्राहीम अलै के हालात बयान किए गए हैं। असल में यहूदी, ईसाई और अरब के मूर्तिपूजक सभी इब्राहीम अलै को अपना पेशवा मानते थे, और कहते थे कि हम उनके बताए हुए मार्ग पर चलते हैं। मगर यहां अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि इब्राहीम केवल एक अल्लाह को मानने वाले थे, और उन्होंने अल्लाह द्वारा ली गई हर परीक्षा में कामयाबी हासिल की थी। तब अल्लाह ने उन्हें पेशवा बनाया, फिर यह बात साफ़ कर दी कि तुम्हारी औलाद में जो अल्लाह का हुक्म नहीं मानकर अपने आप पर ज़ुल्म करेगा, उसे पेशवाई नहीं दी जाएगी। इस तरह, जब तक इसराईल की संतानों ने अल्लाह का हुक्म माना, तब तक वे अपनी क़ौम के पेशवा बने रहे, फिर जब उन्होंने मनमानी शुरू कर दी, तो पेशवाई उनके ख़ानदान से लेकर इस्माइल अलै के ख़ानदान यानी मुहम्मद (सल्ल) को सौंप दी गई।


125: “काबा”को अल्लाह का पवित्र घर कहा जाता है। अल्लाह ने इस मस्जिद को और इसके इर्द-गिर्द के बड़े इलाक़े को अमन की जगह (हरम) बनाया है (5:95), जहां न तो किसी इंसान को क़त्ल किया जा सकता है, न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है और न ही उसे क़ैद करके रखा जा सकता है, न किसी पौधे को उखाड़ा जा सकता है, और न ही कोई युद्ध किया जा सकता है सिवाय इसके कि अगर दुश्मन हमला कर दे तो अपनी सुरक्षा में लड़ने की इजाज़त है।

“मक़ाम ए इबराहीम” उस पत्थर का नाम है जिस पर चढ़कर हज़रत इब्राहीम ने काबा को बनाया था। यह पत्थर आज भी मौजूद है, और काबा का सात बार चक्कर लगाने (तवाफ़) के बाद, इस पत्थर के पास काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ना बहुत अच्छा माना जाता है।

127: काबा को पहली बार हज़रत आदम अलै ने बनाया था, मगर बहुत ज़माने के बाद जब वह टूट-फूट गया था, तब हज़रत इब्राहीम ने इस्माईल अलै के साथ मिलकर उसे फिर से बनाया था।

128: पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकनेवाले को "मुस्लिम" कहते हैं, और इस तरह जितने भी नबी हुए हैं सब मुस्लिम थे। देखें 3:64; 26:89; 37:84.

129: मुहम्मद सल्ल का उन्हीं लोगों में से रसूल बनकर आना हज़रत इब्राहीम अलै की दुआ के क़बूल होने के नतीजे में हुआ था।

130: इबराहीम का दीन (तरीक़ा) असल में पूरी तरह से केवल एक अल्लाह के सामने झुकने वाला था, इसलिए देखा जाए तो इस्लाम ने इसी तरीक़े को दोबारा बहाल किया है, और इस लिहाज़ से बाद के यहूदी और ईसाई दीन से यह बढ़कर है। (देखें 2:135) 

131: इस्लाम का शाब्दिक अर्थ अपने आपको अल्लाह के हर हुक्म के आगे झुका देना होता है।

133: कुछ यहूदियों का कहना था कि हज़रत याक़ूब (इसराईल) अलै ने मरते समय अपनी औलाद से यहूदियत बनाए रखने के लिए कहा था, यह आयत उसी के जवाब में है। देखें 3:65

135: इबराहीम अलै. के साथ "हनीफ़" आता है, जिसका मतलब शुद्ध [Pristine] या असली [Original] "केवल एक अल्लाह को माननेवाला।"

138: इस आयत में शायद ईसाइयों के रिवाज बेपतिस्मा (Baptism) की तरफ़ इशारा किया गया है, जिसे “रंग चढ़ाना” भी कहते हैं। किसी आदमी को ईसाई बनाते समय उसे रंग चढ़े हुए पानी से नहाया जाता है। बच्चों के लिए माना जाता है कि जब तक बपतिस्मा न हो तो वे गुनाहगार होते हैं। क़ुरआन कहता है कि अगर रंग लेना है तो अल्लाह का रंग लेना चाहिए कि उससे बेहतर किसी का रंग हो ही नहीं सकता।

142: मक्का की तेरह साल की ज़िंदगी में मुसलमानों को "काबा" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने का हुक्म था। फिर जब मुहम्मद (सल्ल) और उनके सहाबी मक्का छोड़कर मदीना (हिजरत) चले गए, तो वहाँ अल्लाह के हुक्म से वे येरुशलम स्थित "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने लगे, ऐसा उन्होंने सतरह महीने किया और फिर अल्लाह की तरफ़ से हुक्म आया कि अब हमेशा के लिए मुसलमानों को "काबा" की तरफ़ ही मुँह करके नमाज़ पढ़नी है। इस आदेश पर सबसे ज़्यादा एतराज़ यहूदियों को था क्योंकि वे भी अपनी इबादतें बैतुल मक़दिस की तरफ़ ही मुँह करके करते थे, जबकि ईसाई आम तौर से पूरब यानी उगते हुए सूरज की तरफ़ मुँह करते हैं। वैसे तो अल्लाह हर दिशा में मौजूद है और कोई एक दिशा अपने आप में कोई कमाल नहीं रखती है, मगर अल्लाह ने मुसलमानों को अलग क़ौम की पहचान देने के लिए अपना एक अलग क़िबला [इबादत करने की दिशा]"काबा" को बनाया जिसकी तरफ़ मुँह करके हर मुसलमान को नमाज़ पढ़नी होती है। 

143: मुसलमानों को यहाँ "बीच की क़ौम" [moderate, balanced] कहा गया है जिसका मतलब "न्याय करने वाले समुदाय" से है। यहाँ यह बताया गया है कि जब मुसलमानों को यह हुक्म दिया गया था कि उन्हें अपनी नमाज़ "काबा" की तरफ़ नहीं बल्कि "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके पढ़नी है, तो यह असल में अल्लाह की तरफ़ से एक परीक्षा थी कि देखें कौन अल्लाह के हुक्म के आगे अपना सिर झुका लेता है, और कौन है जो पुराने क़िबले को सही मानते हुए क़िबले को बदलने से इंकार कर देता है। 

कुछ लोगों को शक हुआ कि जिन लोगों ने येरुशलम की तरफ़ मुँह करके नमाज़ें पढ़ीं और वे इस दुनिया से चले गए, उनकी नमाज़ें क्या बेकार हो जायेंगी, जवाब में यहाँ अल्लाह ने उन्हें बताया है कि उनका ईमान और उनका अमल बेकार नहीं जायेगा। 

144: "काबा" चूँकि बैतुल-मक़दिस से ज़्यादा पुराना था, और उसके साथ हज़रत इब्राहीम और इसमाईल अलै. की यादें जुड़ी हुई थी, इसलिए मुहम्मद सल्ल. की दिली ख़्वाहिश थी कि काश फिर से 'काबा' को ही हमेशा के लिए क़िबला बना दिया जाए। इसी उम्मीद पर वह आसमान की तरफ़ मुँह उठाकर दुआएं मांगा करते थे। 

146: अरब में रह रहे यहूदी और ईसाई लोग तौरात और बाइबल में दी गई जानकारी और निशानियों को ध्यान में रखते हुए मुहम्मद सल्ल को एक रसूल/नबी के रूप में अच्छी तरह पहचानते थे, जिस तरह कोई अपने बेटों को पहचानता है, मगर केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते उन्हें मानने से इंकार करते थे। 

149: "काबा" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने के हुक्म को तीन बार दुहराया गया है, इससे इसकी अहमियत का पता चलता है।

 

150: जब तक मुसलमान येरूशलम स्थित "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते थे, तब तक यहूदियों को लगता था कि मुसलमानों ने उनकी बड़ाई के आगे सिर झुका दिया, दूसरी तरफ़ मक्का के काफ़िर लोग कहते थे कि मुसलमान अपने आपको इबराहीम के तरीक़े पर चलने वाला बताते हैं, पर नमाज़ के लिए इन लोगों ने इबराहीम के बनाए गए "काबा" को छोड़कर बैतुल मक़दिस की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते हैं। इस तरह, क़िबला बदलकर दोनों तरह के लोगों को जवाब दे दिया गया। मगर बेकार की बहस करने वालों का मुँह बंद करना तब भी मुमकिन नहीं था।


153: यहाँ मुसलमानों को धीरज [सब्र] से काम लेने का हुक्म दिया गया है। यह दौर ऐसा था कि जब मुसलमानों को अपने दीन पर चलने में और इसके प्रचार-प्रसार में बहुत सी रुकावटें आ रही थीं, और साथ में युद्ध लड़ने का सिलसिला भी लगा हुआ था जिनमें काफ़ी मुसीबतें और सख़्तियाँ झेलनी पड़ रही थीं, अपनों के शहीद हो जाने का दुख भी बराबर लगा हुआ था। मगर उन्हें बताया गया है कि सच्चाई के रास्ते में आने वाली परेशानियों को अल्लाह की मर्ज़ी समझते हुए धीरज के साथ अपने काम में लगे रहना है।


154: अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए जो मारे जाते हैं, उन्हें मरा हुआ नहीं समझना चाहिए, बल्कि वह ज़िंदा हैं, और उन्हें अपने रब से रोज़ी मिलती है। देखें 3:169


158: "सफ़ा" और "मरवा" मक्का की दो पहाड़ियों के नाम हैं। जब हज़रत इबराहीम (अलै) अपनी पत्नी बीबी हाजरा को उनके दूध-पीते बच्चे इस्माईल के साथ छोड़कर चले गए थे, तब बच्चे के लिए पानी की खोज में बीबी हाजरा (रज़ि) "सफ़ा" और "मरवा" के बीच दौड़ी थीं। कुछ लोग इन दो पहाड़ियों के बीच दौड़ने से हिचकिचाते थे, क्योंकि बहुदेववादियों ने दोनों पहाड़ियों पर मूर्तियाँ स्थापित कर दी थीं, मगर यहाँ बता दिया गया कि हज और उमरा [छोटे हज] दोनों में इन दो पहाड़ियों पर दौड़ने में कोई ख़राबी नहीं, बल्कि यह ज़रूरी है। 

"उमरा" यानी 'छोटा हज' तो हज के ज़माने में भी किया जा सकता है, और साल भर में किसी भी समय किया जा सकता है। 

इस्लाम में घर यानी "काबा" की केंद्रीय भूमिका है, चाहे उसकी तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने की बात हो या वहाँ जाकर हज करने की बात हो जैसा कि हज के तरीक़े इबराहीम अलै. ने अल्लाह के हुक्म से स्थापित कर दिए थे।  


159: यहाँ इशारा यहूदियों और ईसाइयों की तरफ़ है जिनकी आसमानी किताबों में मुहम्मद (सल्ल) के आने और उनके संदेशों की सच्चाई के बारे में ख़बरें सुनायी गई थीं जिन्हें ये लोग छिपाते हैं, उन्हें अल्लाह, फ़रिश्ते और इंसान सब लानत भेजते हैं (3:87). 


168: अरब के लोगों ने अपने मन से बहुत सी खाने की चीज़ों को हराम [अवैध] घोषित कर रखा था जिसका वर्णन सूरह अनाम में आगे आयेगा, और कुछ चीज़ें जो हराम थीं उन्हें अपने मन से हलाल [वैध] ठहराया हुआ था, जैसे मरे हुए जानवर का (सड़ा-गला) मांस हलाल था।


169: शैतान अश्लील कामों [sexual immorality] के लिए उकसाता है (2:268; 7:28,30; 24:21). अल्लाह के नाम से झूठी बातों के लिए देखें 6:138, 145


171: इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे विश्वास न करनेवाले देवी-देवताओं को पुकार रहे हों, मगर वे जवाब नहीं दे सकते।


173: किसी जानवर को ज़बह करते समय अगर अल्लाह को छोड़कर किसी दूसरे देवता का नाम लिया गया है, तब भी उसका गोश्त खाना हराम (अवैध) होगा। हराम खानों की पूरी लिस्ट 5:3 में देखी जा सकती है। सूअर के गोश्त [Pork] खाने को बाइबल में भी हराम कहा गया है। (देखें Old Testament में Leviticus 11:7-8 और Deuteronomy 14:8)


177: यहाँ अब संबोधन किताबवालों यानी यहूदियों और ईसाइयों से किया गया है, जो मुसलमानों द्वारा बैतुल मक़दिस को छोड़कर काबा की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने के बारे में इतना वाद-विवाद कर रहे थे जैसे यह चीज़ कोई बहुत ज़्यादा अहम हो, हालाँकि अल्लाह ने कहा है कि असल चीज़ नेकी और भलाई के काम हैं जिसे ज़्यादा से ज़्यादा करने में सबको एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करनी चाहिए।


178: "क़िसास" [Law of Retaliation] का मतलब बराबर का बदला लेना। इस्लाम से पहले भी अरब में जान के बदले जान लेने की परम्परा थी, मगर होता यह था कि जो क़बीला ज़्यादा मज़बूत होता, वह ज़्यादा की माँग करता था। अगर किसी छोटे दर्जे के आदमी ने किसी बड़े दर्जे के आदमी को मार डाला, तो मारे गए आदमी के वारिस यह माँग करते थे कि बदले में हमें क़ातिल की जान नहीं बल्कि उस क़बीले के कोई ऊँचे दर्जे के आदमी की जान चाहिए। इसी तरह, अगर किसी औरत ने क़त्ल किया, तो मारे गए आदमी के वारिस की तरफ़ से यह माँग होती थी कि बदले में हमें औरत की जान नहीं बल्कि किसी मर्द की जान चाहिए। इसी तरह ग़ुलाम के बदले आज़ाद मर्द की माँग करते। इस्लाम ने इस तरह के भेदभाव को हटाकर सीधे तौर पर इसे क़ातिल से जोड़ दिया, अर्थात जिसने भी किसी की जान ली है तो उस जान का बदला भी उसे ही भुगतना होगा।

अगर मरने वाले के वारिसों [सबसे नज़दीकी उत्तराधिकारी] ने क़िसास के बदले क़ातिल से "ख़ून-बहा"[blood money] लेना तय कर लिया तो फिर क़ातिल की जान लेना उनके लिए उचित नहीं होगा।


180: इस आयत में मरने से पहले अपनी संपत्ति में से माँ-बाप और रिश्तेदारों के लिए वसीयत करने का हुक्म है। असल में यह आयत उस समय उतरी थी जब संपत्ति के बंटवारे के बारे में कोई हुक्म नहीं आया था। फिर कुछ साल बाद सूरह निसा (4: 11-14) में विस्तार से बता दिया गया कि छोड़ी गई संपत्ति में सभी वारिसों का कितना हिस्सा होगा। इस तरह, उनके लिए वसीयत की ज़रूरत नहीं रही। मगर कोई इंसान अगर किसी ऐसे आदमी को कुछ देना चाहे जो शरीअत के हिसाब से हक़दार नहीं है, तो वह अपनी संपत्ति का ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई हिस्सा दे सकता है।


183: रोज़े तुम से "पहले के लोगों" मतलब यहूदियों पर भी फ़र्ज़ किए गए थे। 

184: इस्लामी कैलेंडर का 9वाँ महीना "रमज़ान" होता है जिसके पूरे महीने में रोज़ा रखना होता है।


187: मियाँ-बीवी एक दूसरे के लिए "कपड़े" के समान हैं, यहाँ कपड़े को आराम, पवित्रता और सुरक्षा से उपमा दी गई है।

शुरू में रमज़ान के महीने में रात के समय भी सेक्स करना मना था, कुछ मुसलमानों ने मुहम्मद (सल्ल) के सामने इस बात को स्वीकार किया था कि उन लोगों ने रमज़ान की रातों में सेक्स करके अपने रोज़े को ख़राब कर दिया। अब यहाँ इसकी इजाज़त दे दी गई।


189: कुछ अरबों में एक अजीब रिवाज था कि हज करके जब घर लौटते, तो वे सामने का दरवाज़ा छोड़कर पीछे के रास्ते से जाते थे और इसे बड़ा नेक काम मानते थे। यहाँ बताया गया है कि पुरानी रीतियों को आँख बंद करके मानने के बजाय अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकना कहीं महत्वपूर्ण है।

 

190: यह आयतें उस समय उतरी थीं जब हुदैबिया की संधि (6 हिजरी/628 ई) के बाद मक्का वालों ने मुसलमानों को छोटा हज [उमरा] करने से रोक दिया था, और यह तय हुआ था कि वे अगले साल आकर अपना हज पूरा करें। अगले साल जब हज का समय आया तो कुछ मुसलमानों को शंका हुई कि कहीं ऐसा न हो कि मक्का वाले संधि से पलट जाएं और फिर हज करने से रोकें, तो फिर युद्ध करना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ तो वह आदर का महीना होगा जिसमें युद्ध करना मना है, साथ में काबा-परिसर में ऐसे भी युद्ध करना मना है, मगर अल्लाह ने इस आयत में ऐसे समय में और ऐसी जगह पर भी अपने बचाव में युद्ध करने की इजाज़त दे दी। 

"लड़ाई में सीमाएं न लांघो" के मतलब में कई बातें शामिल हैं जिनसे रोका गया है, यानी अपनी तरफ़ से लड़ाई न शुरू करना, उससे नहीं लड़ना जो नहीं लड़ रहा हो, हमले के जवाब में उससे बहुत ज़्यादा हिंसा करना , बच्चों, बूढ़ों और औरतों को नहीं मारना आदि। 


191: इस आयत को अक्सर ,ग़लत तरीक़े से पेश किया जाता है, इसको इसके सही संदर्भ में ही समझने की ज़रूरत है। मुसलमानों को इस बात की चिंता थी कि हज के दौरान अगर मक्का के उन बहुदेववादी लोगों ने काबा परिसर में हमला कर दिया तो क्या बदले की कार्रवाई करने की इजाज़त होगी, देखें 2: 196. यहाँ उन्हें इजाज़त दी गई है कि जब उन्हें हमला करने वालों से पाला पड़ ही जाए, तो उन्हें अपने बचाव में ज़रूर लड़ना चाहिए, चाहे मक्का परिसर के अंदर लड़ना पड़े या बाहर, क्योंकि "तुम्हारे ऊपर ग़लत तरीक़े से [unlawfully] उनका लगातार अत्याचार करना, मक्का परिसर में तुम्हारे द्वारा उनका क़त्ल करने से कहीं बुरा है।''


193: देखें 8: 39 


195: अपने बचाव में युद्ध की तैयारी पर होने वाले ख़र्च में कंजूसी करना अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा, क्योंकि उसके नतीजे में दुश्मन मज़बूत होकर तुम्हारी ही बर्बादी का कारण बनेगा। इस आयत का आम तौर से यह भी मतलब समझा जाता है कि ख़ुदकुशी [आत्महत्या] करना या किसी भी तरीक़े से अपने आपको नुक़सान पहुँचाना भी अवैध है।

196: मक्का की तीर्थयात्रा, यानी "हज" करना हर मुसलमान के लिए ज़िंदगी में कम से कम एक बार ज़रूरी है, अगर वह शारीरिक और आर्थिक रूप से इस लायक़ हो। 'उमरा' यानी छोटा हज के लिए भी जाया जा सकता है, मगर यह ज़रूरी नहीं है। जब कोई आदमी हज या उमरे के इरादे से इहराम बाँध ले, तो जब तक हज की सारी  रीतियाँ पूरी न हो जाए, उन्हें इहराम उतारना मना है। लेकिन अगर किसी कारण से उन्हें काबा तक जाने से रोक दिया जाए, तो ऐसी सूरत में कुर्बानी करके इहराम खोला जा सकता है, जैसा कि आप (सल्ल) ने हुदैबिया में रोके जाने पर किया था।

जब हज की ज़्यादातर रीतियाँ पूरी हो जाती हैं, तब हज में गए मर्दों को अपना बाल कटवाना या मुंडवाना होता है। जब तक हाजी इहराम पहने हुआ होता है, तो ऐसी हालत में सिर के बाल मुंडवाना सही नहीं है, अगर बीमारी के कारण ऐसा करना पड़े, तो फिर इसकी भरपाई इस तरह होगी कि या तो तीन दिन रोज़ा रखे, या छ: ग़रीबों को उचित दान (सदक़ा) दे या एक बकरी कुर्बान करे।

197: यूँ तो हज इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से 12वें महीने में कोई चार दिनों के लिए होता है, मगर हज करने का इरादा 10वें, 11वें और 12वें महीने के शुरू में किया जा सकता है।

 

198: हज के दौरान रोज़ी-रोटी के लिए व्यापार करना कोई गुनाह नहीं, अगर इससे हज के ज़रूरी कामों पर कोई असर न पड़ता हो। 

हज के दूसरे दिन (9वीं को) मिना से अरफ़ात (मक्का से 22 km) पहुँचा जाता है जहाँ दोपहर से शाम तक रुका जाता है, फिर वहाँ से आगे 8 km "मुज़दलिफ़ा" में रात गुज़ारी जाती है, और अगले दिन सूरज निकलने से पहले अल्लाह को याद किया जाता है और दुआएं माँगी जाती हैं। 


199: पुराने ज़माने से अरब के लोगों का तरीक़ा यह रहा था कि हज के दौरान 9 ज़िल-हिज्जा को मिना से अरफ़ात जाते थे, और रात को वहाँ से लौटकर मुज़दलिफ़ा में ठहरते थे। बाद में क़ुरैश और उनका देखा-देखी उनके कुछ साथी क़बीलों ने मिना से अरफ़ात तक जाना बंद कर दिया और वे मुज़दलिफ़ा तक जाकर ही लौट आते थे। इस आयत में यह हुक्म दिया गया है कि सभी को आम लोगों की तरह अरफ़ात तक जाकर ही मुज़दलिफ़ा होते हुए लौटना चाहिए।

 

202: "अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है" इसका मतलब वह कर्मों को लिखने में और उनके अनुसार फ़ैसला करने में बहुत तेज़ है।


203: मिना में तीन दिन गुज़ारना अच्छा है, और इस दौरान शैतान पर कंकरियाँ मारनी ज़रूरी है। 12 तारीख़ के बाद मिना से जाया जा सकता है, 13 तारीख़ तक रुकना ज़रूरी नहीं है। और अगर कोई रुकना चाहे, तो 13 तारीख़ को भी कंकरियाँ मारके वापस जा सकता है।   


205: बताया जाता है कि 'अख़नस बिन शरीक़' नाम का एक आदमी मदीना में आकर मुहम्मद (सल्ल) से मिला था और उनसे बड़ी चिकनी-चुपड़ी बातें कीं, और अल्लाह को गवाह बनाकर सच्चाई पर विश्वास कर लेने की बात कही, मगर जब वह वहाँ से वापस गया तो रास्ते में मुसलमानों के खेत जला दिए और मवेशियों को ज़बह कर डाला। यह आयत इसी पृष्टभूमि में उतरी है, वैसे इस तरह की हरकत मदीना के पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग करते रहते थे।

210: सच्चाई से इंकार करने वालों और मदीना के कई यहूदियों की तरफ़ से यह माँग की जाती थी कि अल्लाह को ख़ुद ही हमारे सामने प्रकट होकर हमें विश्वास कर लेने का हुक्म देना चाहिए। यह आयत ऐसी ही माँगों के जवाब में है कि यह दुनिया इंसानों की आज़माइश [परीक्षा] करने के लिए बनायी गई है, आदमी को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करते हुए प्रकृति में फैली हुई निशानियों की रौशनी में सृष्टि की रचना करनेवाले अल्लाह को पहचानना है और उस पर विश्वास करना है, साथ में उसके द्वारा भेजे गए रसूलों पर भी विश्वास करना है, और वह भी छुपी हुई चीज़ों को बिना देखे हुए। जब अल्लाह सामने ही आ जायेगा तो उसे देखकर विश्वास कर लेने में तो कोई परीक्षा न हुई।

 

212: दुनिया में अगर किसी को बहुत रोज़ी दी गई है और उसकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी है, तो यह ज़रूरी नहीं है कि अल्लाह उससे बहुत ख़ुश है। दुनिया में रोज़ी देना पूरी तरह से अल्लाह की मर्ज़ी पर है और वह जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है।

 

217: इस्लाम में चार महीने आदर के माने जाते हैं (9:36).... मुहर्रम, रजब, ज़ीक़ादा और ज़िल-हिज्जा, जो कि कैलेंडर के हिसाब से पहला, सातवाँ, ग्यारहवाँ और बारहवाँ महीना होता है। इन महीनों में जंग करना बिल्कुल मना है, लेकिन अगर कोई हमला कर दे तो अपनी रक्षा के लिए लड़ने की अनुमति है। इन आदर के महीनों में अगर कोई सताया हुआ आदमी अपने बचाव में लड़ता है तो वह कोई गुनाह नहीं, बल्कि बताया गया है कि इससे कहीं बड़ा जुर्म लोगों पर लगातार अत्याचार करना है और वह भी इस कारण से ताकि वे एक अल्लाह पर विश्वास करना छोड़ दें। आयत 191 में कही बात को यहाँ और साफ़ किया गया है।

यहाँ उन लोगों के बारे में कहा गया है जो एक बार सच्चाई पर विश्वास कर लेने के बाद किसी कारण से इंकार कर बैठते हैं [Apostates]। परम्परावादी विद्वानों का मानना है कि इस्लामी हुकूमत में ऐसे लोगों को पहले दोबारा विश्वास कर लेने की दावत दी जाएगी, और इंकार की स्थिति में मार देने की सज़ा होगी। मगर बहुत सारे विद्वान इसे सही नहीं मानते और उनकी राय है कि क़ुरआन में किसी भी दीन को मानने की आज़ादी दी गई है और दीन के मामले मेंं ज़ोर-ज़बरदस्ती से मना किया गया है (2:256), और आयत 2:217 में भी इस्लाम छोड़ने पर कोई दुनिया में दी जाने वाली सज़ा नहीं बतायी गई है। कुछ हदीसों से पता चलता है कि जिन लोगों ने इस्लाम छोड़कर बाद में मुसलमानों से लड़ाई की थी, उन्हें मार देने की बात कही गई है, मगर वे देश-द्रोह [treason] के आरोप में मारे गए न कि इस्लाम छोड़ने के कारण।


219: अरब के लोग बरसों से शराब पीने के आदी रहे थे, इसलिए क़ुरआन में उसको एकदम से एक ही बार में मना नहीं कर दिया गया, बल्कि धीरे-धीरे इसको बंद किया गया। पहले सूरह नहल (16: 67) में कहा गया कि नशा लानेवाली शराब अच्छी चीज़ नहीं होती, फिर सूरह बक़रा (2: 219) में कहा जा रहा है कि इससे कुछ फ़ायदे तो हैं मगर नुक़सान बहुत ज़्यादा है कि यह गुनाह करने पर उकसाती है। फिर सूरह निसा (4: 43) में आया कि नशे की हालत में नमाज़ से दूर रहना चाहिए, और फिर अंत में सूरह मायदा (5: 90-91) में इसको पूरी तरह हराम [अवैध] घोषित कर दिया गया।  

"दान"[सदक़ा] उतने में से ही देना चाहिए जो अपने घरवालों की ज़रूरत पूरी करने के बाद बच जाए, ताकि घरवाले ज़रूरतमंद न बन जाएं। बताया जाता है कि जब दान देने का हुक्म आया तो कुछ लोगों ने सब कुछ दान कर दिया और अपने घरवालों के लिए कुछ नहीं छोड़ा।


220: जब क़ुरआन ने अनाथों के अभिभावकों को यह बताया कि अनाथों का माल खा जाने पर सख़्त पकड़ होगी (4: 1-2), तब से मदीना के कुछ मुसलमान लोगों ने अनाथों के साथ कुछ ज़्यादा ही सावधानियाँ बरतनी शुरू की, वे उनके खाने अलग पकवाने लगे, और उन्हें अलग ही खिलाते, यहाँ तक कि अगर उनका खाना बच जाता तो ख़राब हो जाता, इसमें तकलीफ़ भी थी और नुक़सान भी। असल मक़सद उनके अभिभावकों को परेशानी में डालना नहीं था, बल्कि यह था कि लोग अनाथों के माल को सही ढंग से रखें और बड़े होने पर उनका माल उन्हें वापस कर दें। 


223: यहाँ एक बात साफ़ कर दी गई है कि मियाँ-बीवी का मिलाप केवल मौज-मस्ती के लिए नहीं, बल्कि उसका मक़सद इंसानी नस्ल को बढ़ाने के लिए होना चाहिए, जिस तरह एक किसान अपने खेत में बीज बोता है तो उसका मक़सद पैदावार हासिल करना होता है। यहाँ पति को 'किसान' से, बीवी को 'फ़सल उगानेवाली ज़मीन' से और बच्चों को 'बीज' से उपमा दी गई है। मियाँ-बीवी के बीच सेक्स के लिए कोई भी तरीक़े [Position] को अपनाया जा सकता है। अत: इस बात में कोई हक़ीक़त नहीं है, जैसाकि उस ज़माने के कुछ यहूदियों का विचार था, कि अगर सेक्स पीछे के रास्ते से किया जाए तो औलाद भैंगी होती है।

लेकिन सेक्स के लिए केवल योनि [Vagina] का ही उपयोग होना चाहिए, शरीर के पीछेवाले हिस्से [गुदा/anus] का उपयोग सेक्स के लिए [anal sex] करना मना है। माहवारी के दौरान या बच्चा जनने के बाद क़रीब चालीस दिन तक सेक्स करना भी मना है।

226: इस्लाम के आने से पहले अरब में यह रिवाज था कि कभी-कभी कोई पति झगड़ा होने से या किसी और कारण से अनिश्चित काल के लिए अपनी बीवी से सेक्स न करने की क़सम खा लेता था, जिसे "इला" कहते थे। इससे बीवी को तलाक़ भी नहीं होती थी कि वह दूसरे आदमी से शादी कर सके और न ही उसे बीवी का सुख ही मिलता था। इस्लाम में यह नियम बनाया गया कि ऐसी क़सम खाने के बाद किसी पति ने अगर चार महीने के अंदर अपनी बीवी से मिलन कर लिया तो ठीक है, लेकिन चार माह पूरे होने तक अगर सेक्स न करने की अपनी क़सम नहीं तोड़ी, तो फिर बीवी को यह हक़ होगा कि वह उससे तलाक़ ले ले। 


228: जिन औरतों को तलाक़ दे दी गई हो, उनके लिए "इद्दत" यानी अगली शादी के लिए इंतज़ार की अवधि तीन माहवारी पूरी होने तक है। अगर वह गर्भवती है, तो उसे यह बात छिपानी नहीं चाहिए। 

हाँ, शादी के तुरंत बाद अगर तलाक़ हो जाए, जबकि मर्द ने अपनी बीवी को छुआ तक न हो, तब औरत को दूसरी शादी के लिए इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं है (33:49). 

जिन औरतों को माहवारी आनी बंद हो गई हो या आनी शुरू न हुई हो, उनके लिए इद्दत की अवधि तीन महीने है, और अगर वह गर्भवती हो, तो उसके लिए इद्दत की अवधि बच्चे के पैदा होने तक है (65:4).


229: अरब में एक अजीब रिवाज यह था कि लोग अपनी औरतों को तंग करने के लिए बार-बार तलाक़ देते और फिर इद्दत की अवधि ख़त्म होने से पहले ही उनसे मेल-मिलाप कर लेते, इस तरह, वैसी औरतें न सही मायने में बीवी होने का दर्जा पातीं और न ही उन्हें भले तरीक़े से छोड़ा जाता कि वे किसी और से निकाह कर सकें। इस्लाम ने नियम बनाकर ऐसे तलाक़ की संख्या ज़्यादा से ज़्यादा दो निर्धारित कर दी जिसके दौरान फिर से मेल-मिलाप हो सकता हो।

क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ तलाक़ देने का सही तरीक़ा नीचे दिया गया है:

(i) जब बीवी को तलाक़ देने की नौबत आ ही जाए, तो यह तब देना चाहिए जब वह माहवारी के बाद साफ़-सुथरी हो जाए और इस बीच उसके साथ सेक्स न किया गया हो।

(ii) एक बार में एक ही तलाक़ देना चाहिए, तलाक़ देने के बाद बीवी को 'इद्दत" यानी तीन माहवारी के पूरे होने तक इंतज़ार करना है। इस अवधि के ख़त्म होने से पहले-पहले अगर मर्द चाहे तो अपनी बीवी से मेल-मिलाप करके उसे घर पर रोक ले या फिर इद्दत की अवधि पूरी होते ही बीवी को एक तलाक़ हो जाएगी, और मर्द को चाहिए कि भले तरीक़े से औरत को घर से जाने दे। अब औरत अपनी दूसरी शादी के लिए आज़ाद होगी। फिर अगर वह औरत और उसका पुराना पति दोनों चाहें तो वे एक-दूसरे से नये सिरे से मेहर देकर निकाह कर सकते हैं।

(iii) एक बार तलाक़ देने के बाद अगर इद्दत पूरी होने से पहले मर्द ने अपनी बीवी से मेल-मिलाप कर लिया, या इद्दत पूरी हो जाने के बाद दोनों ने फिर से एक-दूसरे के साथ शादी कर ली, तो फिर वे मियाँ-बीवी के रूप में रह सकते हैं, मगर मर्द को याद रखना होगा कि उसे बीवी को तलाक़ देने का दो बार ही मौक़ा दिया गया है, जिसमें एक गिनती पूरी हो गई।

(iv) एक साथ रहते-रहते फिर अगर ऐसी नौबत आ जाए कि दूसरी बार तलाक़ देनी पड़े, तो फिर से वही तरीक़ा अपनाना होगा, जैसाकि पहली तलाक़ के समय अपनाया गया था, यानी इद्दत की अवधि पूरी होने से पहले या तो बीवी से मेल-मिलाप कर ले या उसे जाने दे। अब अगर दोनों को फिर से पछतावा हुआ और मियाँ-बीवी आपसी सहमति से फिर से एक-दूसरे के साथ शादी करना चाहें, तो (मेहर के साथ) फिर से शादी कर सकते हैं। औरत के घरवालों को या किसी और को उन्हें दोबारा शादी करने से नहीं रोकना चाहिए। 

(v) इस तरह, दो बार तलाक़ देने के बाद भी मर्द के पास यह अवसर होता है कि वह बीवी से मेल-मिलाप करके शादी के बंधन में बना रहे। लेकिन अगर मर्द ने तीसरी बार भी तलाक़ दे दिया, तो उसी वक़्त तलाक़ पक्का हो जाएगा और तब मेल-मिलाप के रास्ते बंद हो जाएंगे और फिर बीवी उससे जुदा हो जाएगी।

(vi) तलाक़ का एक और तरीक़ा यह भी बताया गया है कि माहवारी से पाक-साफ़ होने के बाद पहली तलाक़ दी जाए, फिर अगली माहवारी के बाद दूसरी तलाक़ और फिर तीसरी माहवारी के बाद तीसरी बार तलाक़, और इस तरह, तीसरी देते ही तलाक़ पक्का हो जाता है। 

(vii) तलाक़ का एक और तरीक़ा जो जाहिलों में आम तौर से पाया जाता है कि एक बार में ही तीन तलाक़ दे दी जाए। यह मामला काफ़ी विवादों में रहा है। शरीअत के हिसाब से ऐसा करना गुनाह है। कुछ उलमा मानते हैं कि एक बार में तीन तलाक़ देने से एक ही गिनती मानी जानी चाहिए, जबकि कुछ उलमा के मुताबिक़ तकनीकी रूप से तलाक़ हो जाती है। इसे बहुत से देशों में ग़लत ठहराया जा चुका है, और यह एक बेहद ख़राब तरीक़ा है।

(viii) मर्दों के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह तलाक़ देने के बाद अपनी बीवी की मेहर या किसी दिए गए तोहफ़े को वापस लेने की माँग करे। हाँ, अगर किसी जायज़ [legitimate] कारण से बीवी ख़ुद ही तलाक़ की माँग करे, जिसे "ख़ुला" कहते हैं, और मर्द इसके लिए आसानी से तैयार न हो, तो औरत उससे पीछा छुड़ाने के लिए मेहर का कुछ हिस्सा देकर या और कुछ दे-ले के यह मामला तय कर सकती है।  


230: तीसरी तलाक़ के बाद मर्द के लिए कोई मौक़ा नहीं रह जाता कि वह फिर से बीवी से मेल-मिलाप कर सके। बस एक सूरत है जिसे "हलाला" कहते हैं, जिसमें तलाक़ के बाद औरत अगर किसी और मर्द से शादी कर ले और फिर ऐसा हो कि इत्तेफ़ाक़ से उसका पति अपनी मर्ज़ी से उसे तीसरी तलाक़ भी दे दे, तो इस सूरत में बीवी अपने पुराने पति से फिर से शादी कर सकती है, अगर दोनों इसके लिए तैयार हों। हदीसों से मालूम होता है कि अगर कोई मर्द योजना बनाकर अपनी तलाक़ दी हुई बीवी को अपने लिए "हलाल" करने के लिए उसकी शादी किसी ऐसे मर्द से करवाता है जो कि उसे शादी के बाद ही तलाक़ दे दे, तो ऐसी शादी पर लानत की गई है, और यह गुनाह का काम है।

 

अल्लाह की 'निर्धारित सीमा' का मतलब अल्लाह के हुक्म के अनुसार मियाँ और बीवी का एक-दूसरे के प्रति वफ़ादार बने रहना है।


232: दो बार तक तलाक़ देने में मियाँ-बीवी को फिर से मेल-मिलाप करके शादी कर लेने का मौक़ा होता है। अगर औरत फिर से अपने पति से शादी करना चाहे, तो औरत के घर वालों जैसे उसके बाप या भाई को इसमें अड़ंगा नहीं लगाना चाहिए।


238: यहाँ नमाज़ों को ---- ख़ासकर "बीचवाली नमाज़' यानी शाम की 'अस्र' नमाज़ को ---- सही वक़्त पर और पाबंदी से पढ़ने पर ध्यान रखने को कहा गया है ताकि इस कड़वे माहौल में भी दोनों पक्ष क़ुरआन में बताए गए तरीक़ों पर अमल करें और एक दिन अल्लाह के सामने अपने किए का जवाब दे सकें।   


240: इस्लाम से पहले अरब में विधवाओं के लिए इद्दत की अवधि एक साल थी, जिसे क़ुरआन ने बाद में घटाकर तीन महीना दस दिन कर दिया (2: 234)। सो, बाद में विधवाओं को खाना-ख़र्चा देने की अवधि भी एक साल के बजाय तीन महीना दस दिन तक ही कर दी गई। इस सूरह के आने तक पतियों की छोड़ी गई संपत्ति में विधवाओं का हिस्सा तय नहीं हुआ था, जो बाद में सूरह निसा (4) में तय कर दिया गया, अत: उसमें बताये गए विधवाओं के तय हिस्से में से उनके लिए खाना-ख़र्चा देना और इद्दत तक अपने पति के घर पर रहना ज़रूरी ठहरा दिया गया।     


243: देखें आयत 246..... असल में यहाँ बुनियादी तौर पर अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करने की सीख दी गई है, मगर कुछ पाखंडी और कमज़ोर-तबियत लोग युद्ध में जाने से इसलिए डरते थे कि उन्हें मरने का डर लगा रहता था। यहाँ एक मिसाल दी गई है कि किसी ज़माने मेंं एक क़ौम थी जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग थे, जब उन पर हमला हुआ तो मुक़ाबला करने के बजाय, वे मरने के डर से भाग खड़े हुए, मगर अल्लाह ने उन्हें मौत दे दी। बाद में उन लोगों को फिर से ज़िंदा कर दिया गया ताकि वे इस घटना से सबक़ सीख सकें। कुछ विद्वान कहते हैं कि यहाँ बात को उपमा [metaphor] द्वारा कहा गया है। "मर जाओ" उनकी बुज़दिली देखकर कहा गया है क्योंकि बिना मुक़ाबला किए वे मरे हुए इंसान जैसे थे, फिर कोई बीस साल बाद नई पीढ़ी के अंदर सैम्युएल नबी ने जोश भरा और उनमें मुक़ाबला करने का जज़्बा पैदा हुआ और तब वे लड़े और फ़िलिस्तीनियों के मुक़ाबले में कामयाब हुए जिसे "दोबारा ज़िंदा" करना कहा गया है। [Samuel 7: 10-14]


244: शादी-तलाक़ आदि विषयों पर चर्चा के बाद क़ुरआन में फिर से बदला लेने का मामला उठाया गया है। 


246: यहाँ सैम्युएल [Samuel] नाम के नबी [Prophet] के बारे में बात कही गई है।    [देखें 1 Samuel 8:19-20]. इनका ज़माना मूसा (अलै) के क़रीब 350 साल बाद का है। 

 

247: तालूत [Saul] असल में समाज के निचले तबक़े के थे, न वह किसी राजा के ख़ानदान से थे और न ही धर्म-गुरुओं में से थे, इसलिए लोगों ने उन्हें अपना राजा मानने से इंकार कर दिया था।

  

248: जब नबी ने तालूत को राजा बनाने की ख़बर सुनाई तो शुरू में तो इसराइलियों ने मानने से इंकार किया, मगर फिर उनसे कोई निशानी की माँग की। नबी ने इसकी निशानी यह बताई कि बरसों का खोया हुआ ताबूत वापस मिल जाएगा, जिसे फ़रिश्ते उठाकर लाएंगे। बताया जाता है कि उन छोड़ी गई यादगारों में मूसा अलै. की लाठी और तख़्तियों [Tablets] के कुछ टुकड़े थे जिनपर तौरात लिखी हुई थी।

  

249: इससे मिलती-जुलती कहानी बाइबल में गिड्योन [Gideon] के क़िस्से में है जब उनकी सेना जार्डन नदी पार कर रही थी, देखें [Judges 7: 4-7], हालाँकि गिड्योन सैम्युएल और तालूत से पहले था।  


251: जालूत [Goliath] दुश्मनों की तरफ़ का देव जैसे डील-डौलवाला पहलवान था। एक दिन दाऊद [David] जो अपने भाइयों में सबसे छोटे थे, जंग के मैदान में अपने भाइयों की ख़बर लगाने के लिए पहुँचे, जो इस जंग में इसराइलियों की तरफ़ से लड़ रहे थे। बाइबल में है कि जालूत कई दिन से इसराइलियों को ललकारता रहा, मगर किसी को भी उससे मुक़ाबला करने की हिम्मत नहीं हो रही थी, जब दाऊद ने यह बात सुनी तो उन्हें ताव आ गया, और वह जालूत [Goliath] से मुक़ाबला करने के लिए खड़े हो गए। उन्होंने अपनी गुलेल चलाई और पत्थर जालूत के माथे पर इस ज़ोर से लगा कि वह चकराकर गिर पड़ा। आपने आगे बढ़कर उसकी गर्दन काट दी। [1 सैम्युएल: 17] 


253: इंसानों को दुनिया में भेजने का मक़सद असल में उनकी परीक्षा लेना है कि कौन है जो पैग़म्बर द्वारा लाई गई शिक्षाओं को सही मानते हुए अपनी मर्ज़ी से उन पर विश्वास कर लेता है, और कौन है जो उस संदेश को नज़रअंदाज़ कर देता है और अपनी इच्छा अनुसार ग़लत रास्ते पर चल पड़ता है। अल्लाह किसी को ज़बरदस्ती सच्चाई पर विश्वास कर लेने के लिए मजबूर नहीं करता, जैसाकि आयत 256 में साफ़ कहा गया है कि दीन [धर्म] को मानने या न मानने पर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है। 


255: यह आयत क़ुरआन की सबसे महान आयत मानी जाती है। "अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखने वाला है। देखें 13:13

यहाँ अल्लाह के तख़्त (कुर्सी) का ज़िक्र है जहाँ से सारी दुनिया को नियंत्रित [control] किया जाता है। देखें 7:54; 10:3; 25:59; 32:4

256: यह आयत तब उतरी जब मदीना में हिजरत करने के बाद वहाँ के कुछ नव-मुस्लिमों ने ज़बरदस्ती कुछ यहूदी और ईसाई बच्चों का धर्म-परिवर्तन करने की कोशिश की। यह आयत ऐसा करने से रोकती है।


258: कहा जाता है कि यह घटना बाबिल [babylonia] के बादशाह नमरूद [Nimrod] के बारे में कही गई है। 


259/260: इन दो आयतों में अल्लाह ने अपने ख़ास बंदों को मौत के बाद दोबारा ज़िंदा करने का अनुभव कराया ताकि उनका यक़ीन और पक्का हो जाए। आयत 259 में जिस घटना का ज़िक्र है, उससे मिलती जुलती बात नबी ज़ुल-किफ़्ल [Ezekiel] के ज़माने में हुई थी जिसके बारे में बाइबल में है, देखें Ezekiel 37:1-14

271: किसी सामाजिक भलाई के काम में सबके सामने चंदा [Donation] दिया जा सकता है ताकि दूसरों को भी ऐसा करने का प्रोत्साहन मिले, जबकि ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को चुपचाप दान [charity] देना ही ज़्यादा अच्छा है।  


272: मदीना के मुसलमानों के कुछ ऐसे ग़रीब रिश्तेदार थे जो मुस्लिम न थे, और इसी कारण वे उनकी मदद नहीं कर पाते थे, बल्कि इस इंतज़ार में थे कि कब वे मुसलमान बन जाएं ताकि उनकी मदद की जा सके। लेकिन इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के इरादे से किसी (ग़ैर-मुस्लिम) की भी मदद की जाए तो इसका बदला ज़रूर अच्छा मिलेगा।

  

273: बताया जाता है कि यह आयत मुहम्मद (सल्ल) के कुछ ऐसे सहाबियों [साथियों] के बारे में है जो मदीना की मस्जिद से लगे हुए चबूतरे पर रात-दिन पड़े रहते थे और उनका मक़सद इस्लाम की सही शिक्षा हासिल करना था, इस काम में पूरी तरह लगे रहने के कारण वे कोई दूसरा काम नहीं करते थे, और इसीलिए उनकी आर्थिक हालत अच्छी न थी, मगर वे किसी से कुछ माँगते न थे। अल्लाह ने ऐसे आदमियों की मदद करने का हुक्म दिया है। 

 

275: एक ख़ास अवधि के लिए किसी को क़र्ज़ देकर उससे बढ़ी हुई रक़म वसूल करने की शर्त तय कर लेने को ब्याज खाना कहते हैं। अगर तय की गई अवधि में क़र्ज़ की रक़म लौटाई नहीं जाती तो फिर ब्याज की रक़म भी बढ़ती जाती है जो कि सरासर अत्याचार है। जबकि अल्लाह ने व्यापार को सही ठहराया है जिसमें सामान को बेचकर ज़्यादा पैसा कमाया जाता है, मगर इसमें सौदा एक बार ही होता है और इसमें लाभ-हानि दोनों ही होने की संभावना रहती है। 

281: कई विद्वान ऐसा मानते हैं कि यह आख़िरी आयत है जो क़ुरआन में उतरी थी।


282: "लिखनेवाले को लिख देना चाहिए जैसाकि उसे अल्लाह ने सिखाया है..." यहाँ ध्यान देने की बात है कि लिखना एक हुनर माना गया है जिसे अल्लाह ने इंसानों को सिखाया है, देखें 68:1; 96:4-5 

एक मर्द की जगह दो औरतों की गवाही: किसी घटना को होते हुए देखना [witness] और अदालत में आकर गवाही देना [testimony] दोनों में फ़र्क़ है। यहाँ इस आयत में क़र्ज़ लेने का अनुबंध [debt contract] होते हुए देखने की बात है, अदालत में गवाही देने की बात नहीं है। इस आयत का सही संदर्भ समझने के लिए 1500 साल पहले के हालात ध्यान में रखने होंगे। उस ज़माने में आम तौर से औरतें व्यापारिक कारवाँ में नहीं जाती थी और न ही व्यापारिक सौदे में हिस्सा लेती थीं, इस तरह बहुत कम ही औरतें ऐसी होंगी जिन्हें क़र्ज़ के अनुबंध को देखने का मौक़ा मिलता होगा। चाहे दो औरतें भले ही ऐसे अनुबंध पर हस्ताक्षर करते समय मौजूद हों, मगर शायद किसी एक औरत के लिए यह बहुत मुश्किल था कि वह उस अनुबंध को विस्तार से याद रख पाए या अपनी निजी व्यस्तता (जैसे गर्भवती होना आदि) के कारण जब भी बुलाया जाए, वह अदालत में गवाही के लिए हाज़िर हो सके। ऐसे ही हालात से निपटने के लिए शायद दूसरी औरत को back up के तौर पर रखा गया है। कुछ विद्वान मानते हैं कि एक औरत की गवाही भी मानी जा सकती है अगर वह भरोसे के लायक़ हो, और अदालत में गवाह के रूप में अगर एक औरत भी उपलब्ध है, तो उसकी गवाही मानी जा सकती है।


284: बिना किसी इरादे के मन में आने वाली बातों पर आम तौर से पकड़ नहीं होती, बल्कि बुरी नीयत से दिल में कोई बात रखना, या मन में गुनाह करने का पक्का इरादा रखना जैसी चीज़ों का ज़रूर हिसाब देना होगा।






सूरह 8: अल-अनफ़ाल /Al-Anfal

 [युद्ध में हाथ आया माल/ Battle Gains]


इस मदनी सूरह के मुख्य भाग में बद्र [मदीने के नज़दीक] की लड़ाई के ऊपर टिप्पणी की गई है, जो मदीना में हिजरत के बाद दूसरे साल (624 ई.) मुसलमानों और उनके मक्का के विरोधियों के बीच हुई थी। मुसलमानों में कुछ लोग जंग करने से शुरू में हिचकिचा रहे थे, और उनकी संख्या भी उनके विरोधियों की तुलना में काफ़ी कम थी, पर इसके बावजूद जंग में उनकी जीत हुई, और उसके बाद जंग में हाथ आ गए माल के बंटवारे को लेकर सवाल उठाए गए, आयत 41 में ऐसे माल के बंटवारे के बारे में बताया गया है। इस सूरह में याद दिलाया गया है कि यह जीत जो हासिल हुई है वह अल्लाह ने दिलाई है। इसके साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि मुसलमानों को अपनी रक्षा के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए, साथ में शांति के प्रस्ताव पर भी खुले दिल से विचार करना चाहिए। मदीना के पाखंडियों के बारे में और जो लोग हमेशा किए गए समझौतों को तोड़ देते हैं (आयत 56), उन पर भी टिप्पणी की गई हैं, और मुसलमानों को ज़रूरी सलाह दी गई है। अंत में निष्ठा और गठबंधनों के बारे में बात कही गई है।


 

विषय:


01   : युद्ध में हाथ आया माल अल्लाह और रसूल का है 

02-04: सच्चे ईमानवाले 

05-06: कुछ लोग युद्ध में भाग लेने को तैयार नहीं 

07-14: अल्लाह की मदद आ पहुँची 

15-16: युद्ध में पीठ न दिखाओ 

17-19: अल्लाह ने युद्ध में साथ दिया 

20-29: ईमानवालों से अपील 

30-35: पहले भी विरोध हुआ 

36-40: मक्कावाले आगे भी विरोध करते रहेंगे 

41   : जंग से मिले लूट के माल का बंटवारा 

42-44: युद्ध का नतीजा अल्लाह ने तय कर रखा था 

45-48: ईमानवालों को युद्ध में मज़बूती से क़दम जमाए रखना चाहिए

49-54: पाखंडियों को सज़ा दी जाएगी 

55-63: विश्वासघात करने वालों के साथ सख़्ती से पेश आना चाहिए 

64-71: लड़ाई लड़ने के बारे में रसूल को ज़रूरी निर्देश 

72-75: विश्वास न करने वालों के साथ रिश्ता तोड़ दो 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।


[ऐ रसूल] वे आपसे युद्ध में हाथ आ गए माल (के बंटवारे) के बारे में पूछते हैं। कह दें, "उस (माल के बंटवारे) का मामला तो अल्लाह और उसके रसूल का है, अतः अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो और आपस में मामलों को ठीक रखा करो। अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: (1)


सच्चे ईमानवाले तो वह लोग हैं कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल मारे डरके काँप उठते हैं, और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वह उनके ईमान को और बढ़ा देती हैं, और जो हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखते हैं, (2)


जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (एक हिस्सा) दूसरों को भी देते हैं। (3)


यही वे लोग हैं जो सचमुच ईमानवाले हैं। उनके रब के यहाँ उनका बड़ा ऊँचा दर्जा है, उनके लिए वहाँ (गुनाहों की) माफ़ी है, और दिल खोलकर दी जाने वाली रोज़ी है।” (4)



(युद्ध में हाथ आए माल के बंटवारे पर बातें हो रही हैं, मगर असल में) वह तो आपका रब था जिसने एक सच्चे मक़सद के लिए [ऐ रसूल], आपको अपने घर से बाहर (बद्र नाम की जगह) निकल पड़ने पर मजबूर किया था ----- हालाँकि ईमानवालों में से एक गिरोह ने इसे पसंद नहीं किया था। (5)


वे (अल्लाह की तरफ़ से जीत की) सच्चाई स्पष्ट हो जाने के बाद भी आपसे बहस व विवाद करते रहे, मानो वे अपनी आँखों से देख रहे थे कि उन्हें मौत के मुँह में ढकेला जा रहा हो।  (6)


(ईमानवालोे!), याद करो कि किस तरह अल्लाह ने तुमसे वादा किया था कि दो गिरोहों [मक्का के व्यापारियों का कारवाँ और मक्का की सेना] में से एक तुम्हारे हाथ ज़रूर आ जाएगा: तुम चाहते थे कि वह (गिरोह) तुम्हारे हाथ आ जाए जो निहत्था गिरोह [व्यापारियों का कारवाँ] हो, मगर अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों के मुताबिक़ सच्चाई को मज़बूती से क़ायम कर दे, और विश्वास करने से इंकार करने वालों की जड़ काटकर रख दे----  (7)


ताकि सच को सच और झूठ को झूठ साबित करके दिखा दे, चाहे अपराधियों को ये कितना ही बुरा लगे। (8)


याद करें जब आपने अपने रब से (बद्र की लड़ाई के समय) मदद के लिए फ़रियाद की थी, उसने आपकी पुकार सुनते हुए कहा, "मैं एक हज़ार फ़रिश्तों से (लड़ाई में) आपकी मदद करूँगा जो एक के बाद एक आएंगे।" (9)


अल्लाह ने यह इसलिए किया कि (लोगों में) आशा का संदेश फैल जाए और इससे तुम्हारे दिलों में फिर से यक़ीन पैदा हो जाए: मदद तो केवल अल्लाह की ही तरफ़ से होती है, वह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)


याद करो जब अल्लाह ने तुम्हारी बेचैनी दूर करने के लिए (बद्र की लड़ाई से एक रात पहले) तुम्हें नींद दी, आसमान से तुम पर पानी बरसाया ताकि तुम साफ़-सुथरे हो सको, तुम्हारे अंदर (संदेह) की शैतानी गंदगियाँ दूर हो जाएं, तुम्हारे दिलों को मज़बूत बना दें और तुम्हारे पाँव (मज़बूती से) जमा दें।  (11)


याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों को 'वही' (Revelation) द्वारा कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ: तुम ईमानवालों के क़दम मज़बूती से जमाए रखो; मैं विश्वास न करने वालों के दिलों में डर बैठा दूँगा -----तुम उनकी गर्दनों के ऊपर वार करो, और उनकी अंगुलियों की पोर-पोर पर हमला करो।" (12


यह इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया था, और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे, तो उसे अल्लाह बहुत कठोर यातना देता है------  (13)


“यह है जो तुम्हें मिला है! अब चखो मज़ा!” ----- और (जहन्नम की) आग की यातना (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करने वालों के इंतज़ार में है। (14)



ईमानवालो, जब विश्वास न करनेवाले हमला कर दें और युद्ध में तुम्हारा उनके साथ सामना हो, तो कभी भी उन्हें पीठ न दिखाओ:  (15)

 

अगर कोई भी ऐसे मौक़े पर पीठ दिखाता है ------ तो यह (पीठ दिखाना) अगर युद्ध में एक चाल के रूप में हो या दूसरी टुकड़ी से जा मिलने के लिए हो, तो और बात है----- नहीं तो वह अल्लाह के ग़ुस्से का भागी होगा, और जहन्नम उसका ठिकाना होगा, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह! (16)


फिर क्या तुमने (युद्ध में) उनका क़त्ल किया?, नहीं, बल्कि अल्लाह ने उन्हें क़त्ल किया, और [ऐ रसूल!], आपने जब (जंग के मैदान में) उनकी ओर (एक मुट्ठी बालू) फेंका, तो असल में आपने (वह बालू) नहीं फेंका था (जिससे उनकी हार हुई), बल्कि वह अल्लाह ने फेंका था, ताकि वह ईमानवालों पर अपना ख़ास करम [favour] कर सके: अल्लाह हर बात को सुननेवाला, हर चीज़ को जाननेवाला है -------- (17


"यह सब कुछ तो हो चुका"----- और यह (जान लो) कि अल्लाह इंकार करने वालों के हर मंसूबे को कमज़ोर कर देने वाला है।  (18)


[ऐ मक्का के विश्वास करने से इंकार करने वालो], अगर तुम फ़ैसला चाहते थे, तो (बद्र के युद्ध में हारकर) फ़ैसला अब तुमने देख लिया है: अगर तुम (लड़ाइयों से) यहीं रुक जाओ, तो यह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा होगा। अगर तुम (गुनाहों की तरफ़) फिर से मुड़े, तो हम भी (सज़ा देने की ओर) मुड़ेंगे, और तुम्हारा जत्था, चाहे वह (गिनती में) कितना ही बड़ा हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। अल्लाह ईमान रखनेवालों के साथ है। (19)



ईमानवालो, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: जब उनकी (सच्चाई की) बातें सुन रहे हो, तो मुँह न फेर लिया करो; (20)


और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने (अपने मुँह से) कहा था, "हमने सुना," हालाँकि वे सुन नहीं रहे थे-----  (21)


अल्लाह की नज़र में सबसे बुरा प्राणी वह है जो (जान-बूझकर) गूँगा-बहरा बना रहता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेता।  (22


अगर अल्लाह यह जानता कि उनमें कुछ भी अच्छाई है, तो वह उन्हें सुनने की शक्ति ज़रूर देता, लेकिन अगर अल्लाह ने उन्हें (सुनने की) शक्ति दे दी होती, तब भी, उन्होंने इस पर कोई ध्यान न दिया होता, और मुँह फेरकर भाग गए होते।  (23)


ईमानवालो, अल्लाह और उसके रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाएं जो तुम्हें (रुहानी मौत की हालत से निकालकर) ज़िंदा कर दे। जान लो कि आदमी और उसके दिल (की इच्छाओं) के बीच (मौत के रूप में) अल्लाह आ जाता है, और फिर (अंत में) उसी के सामने तुम सब इकट्ठा किए जाओगे।  (24


उस विवाद से बचते रहो, जो अगर उठा, तो उसकी लपेट में केवल वही नहीं आएंगे जो तुम्हारे बीच अत्याचार करने वाले हैं: जान लो अल्लाह (बुरे कर्मों के लिए) दंड देने में बहुत कठोर है।  (25)



याद करो (मक्का में) जब तुम गिनती में बहुत थोड़े थे, ज़मीन पर दबे हुए थे, डरे-सहमे रहते थे कि कहीं लोग तु्म्हें उचक कर न ले जाएं, पर अल्लाह ने (मदीना में) तुम्हें ठिकाना दिया, और अपनी मदद से तुम्हें मज़बूती दी, तुम्हें अच्छी चीज़ों की रोज़ी दी, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा करो।  (26)


ऐ ईमान रखनेवालो!, तुम अल्लाह और उसके रसूल को धोखा न दो, या जानते-बूझते (किसी और के) भरोसे को न तोड़ो। (27


जान लो, कि तुम्हारे माल और बाल-बच्चे तो केवल तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए हैं, और (यह न भूलो कि) अल्लाह के पास बड़ा ज़बरदस्त इनाम है।  (28)


ईमानवालो, अगर तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहे, तो वह तुम्हें (सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ करने की) शक्ति देगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ मिटा देगा, और तुम्हें माफ़ कर देगा: अल्लाह का करम करना सचमुच बड़ी चीज़ है। (29)



(ऐ रसूल!), याद करें जब विश्वास न करने वालों ने (मक्का में) आपको क़ैद कर लेने, जान से मार देने, या (देश से) निकाल बाहर करने की साज़िश रची थी। उन लोगों ने अपनी योजना बनायी थी और अल्लाह ने अपनी: (याद रहे!) अल्लाह योजना बनाने में सबसे अच्छा है। (30


जब कभी उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे कहते है, "हम यह सब पहले भी सुन चुके हैं---- अगर चाहें, तो इस तरह की बातें हम भी कह सकते हैं ----- यह और कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (31)


उन लोगों ने यह भी कहा था, "ऐ अल्लाह! अगर सचमुच यह तेरी तरफ़ से सच्चाई की बातें हैं, तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दर्दनाक यातना ही भेज दे।” (32


मगर (ऐ रसूल), जब तक आप उनके बीच मौजूद हैं, अल्लाह उन लोगों पर कोई यातना नहीं भेजेगा, और न ही उन्हें सज़ा देगा, जबकि उनमें से (कुछ अपने गुनाहों की) माफ़ी मांग रहे हों, (33)


लेकिन, (आपके मक्का छोड़कर जाने के बाद) अल्लाह की ओर से अब उन्हें क्यों न सज़ा दी जाए, जबकि वे लोगों को पवित्र 'मस्जिद’ [काबा] जाने से रोकते हैं, हालाँकि वे उसके कोई (क़ानूनी) देखरेख करनेवाले नहीं हैं? उसकी असल देखरेख करनेवाले तो केवल वही हो सकते हैं, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, मगर ज़्यादातर विश्वास न करने वाले इस बात को नहीं समझते। (34)


उस पवित्र घर [काबा] के पास उनकी नमाज़ तो बस सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होतीं। “अतः विश्वास न करने के नतीजे में अब यातना का मज़ा चखो।” (35)


वे लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकने के लिए अपना धन ख़र्च करते हैं, और वे आगे भी ऐसा करते रहेंगे। अंत में यही उनके बड़े दुःख व पछतावे का कारण बनेगा: उन पर क़ाबू पा लिया जाएगा और उन्हें जहन्नम की ओर हँकाकर ले जाया जाएगा। (36)


अल्लाह अच्छों में से बुरे को छाँटकर अलग कर देगा, और बुरों को एक-के ऊपर-एक रख देगा---- एक साथ ऊपर तक ढेर बनाकर ---- फिर उन्हें जहन्नम में डाल देगा। यही लोग हैं जो घाटे में रहेंगे। (37)


(ऐ रसूल), आप (मक्का के) विश्वास न करने वालों से कह दें कि अगर वे पहले की गयी हरकतों को छोड़ दें, तो जो कुछ पहले हो चुका, उसे माफ़ कर दिया जाएगा, लेकिन अगर वे वही करते रहेंगे, तो फिर उनसे पहले गुज़र चुके लोगों का नतीजा क्या हुआ, वह उनके सामने है। (38


[ईमानवालो!], उन लोगों से उस वक़्त तक युद्ध करते रहो, जब तक कि कोई जुल्म व अत्याचार बाक़ी न रहे, और (पवित्र काबा में) होने वाली सारी इबादतें केवल एक अल्लाह के लिए हो जाएं: अगर वे बुराइयों को छोड़ दें, तो जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह की नज़रों से छिपा नहीं है,  (39)


लेकिन अगर वे इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देते, तो यक़ीन रखो कि अल्लाह तुम्हारा रखवाला है, और वह सबसे अच्छा रखवाला, और सबसे अच्छा मददगार है।  (40)



यह बात जान लो कि युद्ध के बाद जो माल हाथ आ जाए, उसका पाँचवाँ हिस्सा अल्लाह और उसके रसूल का, उनके नज़दीकी रिश्तेदारों और यतीमों का, ज़रूरतमंदों और मुसाफ़िरों का है (जिसे अदा करना ज़रूरी है)। अगर तुम अल्लाह पर और उस (फ़रिश्तों से की गयी मदद) पर यक़ीन रखते हो जो हमने अपने बन्दे पर 'फ़ैसला कर देनेवाले दिन' उतारी थी, जिस दिन दोनों सेनाएं (बद्र के) युद्ध में टकरायी थीं। (याद रहे!) सारी चीज़ें अल्लाह के क़ाबू में हैं।  (41)


याद करो जब तुम (बद्र में) घाटी के नज़दीकवाले छोर पर थे, उधर (मक्का से आते हुए) दुश्मन घाटी के दूरवाले छोर पर थे और (मक्का के व्यापारियों का) कारवाँ तुमसे नीचे की ओर था (जो समंदर के किनारे-किनारे निकल गया था)। अगर तुमने युद्ध करने का समय पहले से तय किया होता, तो तुम (विवाद के चलते) ज़रूर युद्ध न कर पाते, (मगर वह युद्ध हुआ) इसलिए कि अल्लाह ने जिस बात का होना पहले से तय कर रखा था, वह बात सामने आ सके, ताकि जिन्हें मरना लिखा था, वे स्पष्ट प्रमाण देखकर मर सकें, और जिन्हें ज़िंदा रहना था, वे भी स्पष्ट़ प्रमाण देखकर ज़िंदा रहें -----अल्लाह सब (की) सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (42)



[ऐ रसूल], याद करें जब अल्लाह ने आपको ख़्वाब में उन (दुश्मनों) की संख्या कम करके दिखायी: अगर अल्लाह ने तुम [ईमानवालों] को उनकी संख्या ज़्यादा दिखायी होती, तो तुम ज़रूर ही हिम्मत हार बैठते और इस मामले में झगड़ने लग जाते, मगर अल्लाह ने तुम्हें (उस हालत से) बचा लिया। (याद रहे!) वह दिलों के अंदर छिपे हुए राज़ को भी जानता है। (43)


जब तुम्हारा आमना-सामना हुआ, तो अल्लाह ने तुम्हारी निगाहों में उनकी संख्या कम करके दिखायी, और अल्लाह ने तुम्हें भी उन (दुश्मनों) की निगाहों में कम करके दिखाया, ताकि जो बात होने वाली थी, वह सामने आ जाए: सारे मामले अल्लाह की मर्ज़ी पर टिके होते हैं।  (44



ईमानवालो, जब युद्ध में किसी सेना से तुम्हारा मुक़ाबला हो जाए, तो मज़बूती से अपने क़दम जमाए रखो, और ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह को याद करते रहो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (45)


अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, और आपस में झगड़ा न करो, नहीं तो हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। (मुसीबतों में) सब्र व धीरज से काम लो: अल्लाह उनका साथी है जो धीरज रखने वाले हैं। (46


और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते हुए निकले थे, लोगों को अपनी शान दिखाते हुए, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोकते हुए------- जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है। (47)


फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन (काफ़िरों) के कुकर्मों को उनके लिए बड़ा सुहावना बनाकर दिखाया, और कहने लगा, "आज कोई नहीं है जो तुमको हरा सकता हो, क्योंकि मैं तुम्हारे बिल्कुल साथ खड़ा रहूँगा," मगर जब सेनाएं आमने-सामने दिखायी देने लगीं, तो वह उलटे पाँव वापस हुआ, और कहने लगा, "मैं अब तुम्हारा साथ छोड़े जाता हूँ: मैं वह चीज़ देख रहा हूँ, जो तुम नहीं देख सकते, और मुझे अल्लाह से डर लग रहा है ----- अल्लाह (बुरे कर्मों की) बड़ी कठोर यातना देने वाला है।" (48



और जब ऐसा हुआ था कि पाखंडियों [Hypocrites] और वे लोग जिनके दिलों में (ईमान की कमज़ोरी का) रोग था, कहते थे, "इन (ईमान रखनेवाले) लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है", मगर जो कोई भी अल्लाह पर भरोसा करे, तो निश्चय ही अल्लाह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (49)


काश कि (ऐ रसूल!) आप देख सकते जब फ़रिश्ते इंकार करनेवालों की जान निकालते हैं, किस तरह वे उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं: उनसे कहा जाएगा, "अब (जहन्नम की) आग की सज़ा का मज़ा चखो, (50


यह उन्हीं (बुरे कर्मों) का नतीजा है जो कुछ (कर्म) तुम्हारे हाथों ने तुम्हारे लिए जमा करके रखा: अल्लाह तो अपने प्राणियों पर कभी भी अन्याय नहीं करता। (51


ये लोग भी फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों, और उनसे पहले के लोगों की तरह हैं, जिन्होंने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया, अत: अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें सज़ा दी: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (52)


(अल्लाह ने) ऐसा इसलिए किया कि जब वह किसी क़ौम के लोगों पर अपनी नेमतें उतारता है, तो उसे उस वक़्त तक नहीं बदलता है, जब तक कि वे लोग ख़ुद अपनी हालत न बदल डालें। अल्लाह सब (की) सुनता, सब कुछ जानता है। (53)


वे सचमुच फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों की तरह हैं, जिन्होंने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया था: हमने उनके गुनाहों की वजह से उन्हें तबाह व बर्बाद कर दिया, और फ़िरऔन के लोगों को दरिया में डुबा दिया था----- वे सभी शैतानियाँ करने वाले लोग थे।  (54)



अल्लाह की नज़र में सबसे बुरे प्राणी वे लोग हैं, जो उसे मानने से इंकार करते हैं और वे (सच्चाई पर) कभी विश्वास करने वाले नहीं; (55)


जिनके साथ (ऐ रसूल!), आप जब कभी कोई संधि [Treaty] करते हैं, तो वे उसकी शर्तों को (हर बार) तोड़ डालते हैं, क्योंकि उन्हें (वचन तोड़ने) का कोई डर नहीं है।  (56)


(ऐसी हालत में) अब अगर जंग के मैदान में तुम्हारा सामना उनके साथ हो जाए, तो उन्हें ऐसी सज़ा दो कि वे (जान लेकर) भाग खड़े हों, और उनके पीछे आने वाले (मक्का के) लोगों के लिए एक डरावनी मिसाल बन जाए, हो सकता है कि वे इससे सबक़ सीखें (कि वचन तोड़ने का नतीजा क्या होता है)।  (57)


और अगर तुम्हें किसी क़ौम के लोगों की तरफ़ से विश्वासघात [treachery] होने का पता लग जाए, तो तुम उनसे की हुई संधि को समाप्त करने की साफ़-साफ़ घोषणा कर दो (ताकि दोनों गिरोह को बराबरी का मौक़ा मिल सके), क्योंकि अल्लाह विश्वासघात करने वाले लोगों को पसंद नहीं करता। (58)


विश्वास न करनेवालों को यह नहीं समझना चाहिए कि वे बच निकले हैं; वे हमारे चंगुल से निकल नहीं सकते। (59


(ईमानवालो!) उनके साथ (युद्ध के लिए), जितना तुम इकट्ठा कर सको, सैनिकों की टुकड़ियाँ और साथ में लड़ाकू घोड़े तैयार रखो, ताकि इससे अल्लाह के दुश्मनों और अपने दुश्मनों को डरा सको, और उन दूसरे लोगों को भी चेतावनी दे सको जिन्हें तुम नहीं जानते मगर अल्लाह जानता है। अल्लाह के रास्ते में (संघर्ष के लिए) तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा, और तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (60)


लेकिन अगर वे शांति व सुलह की ओर झुकें, तो (ऐ रसूल!), आप भी ज़रूर इसकी तरफ़ झुक जाएं, और अल्लाह पर अपना भरोसा रखें: वह सब (की) सुनता है, सब कुछ जानता है। (61)


अगर वे आपको धोखा देने का इरादा करें, तो आपके लिए अल्लाह काफ़ी है: वही तो है जिसने अपनी ख़ास मदद से आपको मज़बूती दी, (62


और ईमानवालों के हाथों भी (मज़बूती दी), और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। अगर आपने इस ज़मीन की सारी चीज़ें भी दे दी होतीं, तब भी आप यह नहीं कर पाते, मगर अल्लाह (ने उनके दिल मिला दिए और) उन्हें एक साथ ले आया: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपने कामों में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (63)


ऐ नबी [Prophet]! आपके लिए और आपके पीछे चलने वाले ईमानवालों के लिए तो अल्लाह ही काफ़ी है। (64)


ऐ नबी! ईमान रखनेवालोें को आप लड़ाई लड़ने पर उभारें: अगर (लड़ाई में) तुम्हारे बीस आदमी हों जो (मुश्किल झेलते हुए) अपने क़दम जमाए रहें, तो वे दो सौ पर भारी पड़ेंगे, और अगर तुम्हारे सौ आदमी हों जो अपने क़दम जमाए रहें, तो वे (सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों के एक हज़ार पर भारी पड़ेंगे, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जिनमें समझ-बूझ नहीं है। (65)


मगर अल्लाह ने यह देखते हुए कि तुम्हारे अंदर कुछ कमज़ोरियाँ हैं, अब तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया है ---- अल्लाह के हुक्म से, अब तुम्हारे सौ आदमी अगर अपने क़दम जमाए रहें, तो वे दो सौ लोगों को हरा देंगे, और अगर तुममें से ऐसे हज़ार होंगे तो वे दो हज़ार पर जीत हासिल कर लेंगे: (याद रहे!) अल्लाह उन लोगों का साथ देता है जो सब्र के साथ अपने क़दम जमाए रखते हैं। (66)



जब तक कि युद्ध के मैदान में पूरी तरह जीत हासिल न कर ली हो, किसी नबी के लिए यह सही नहीं होगा कि वह किसी को क़ैदी बना ले। तुम (लोग) इस संसार की क्षण-भर में ख़त्म होने वाली चीज़ें चाहते हो, जबकि अल्लाह (तुम्हारे लिए) आख़िरत [Hereafter] (का इनाम) चाहता है---- अल्लाह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है--- (67


और अगर (इस बारे में) अल्लाह द्वारा पहले से ही तय किया हुआ न होता, तो जो कुछ (जंग में लूटा हुआ माल और धन की उम्मीद में पकड़े गए क़ैदी) तुमने लिया है, उसके लिए तुम पर ज़रूर कोई कठोर यातना आ चुकी होती। (68)


बहरहाल, युद्ध के बाद जो कुछ माल तुम्हारे हाथ आ गया है, उन चीज़ों का अच्छे और उचित (lawful) तरीक़े से मज़ा उठाओ और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो: वह (गुनाहों को) बहत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (69)



ऐ नबी! जो युद्ध के क़ैदी आपके क़ब्जे में हैं, उनसे कह दें, “अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिलों में कुछ भी भलाई पायी, तो जो तुमसे ले लिया गया है, उससे कहीं बेहतर चीज़ वह तुम्हें दे देगा, और वह तुम्हें माफ़ कर देगा: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (70)


लेकिन अगर वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहते हों, तो वे इससे पहले अल्लाह के साथ भी विश्वासघात कर चुके हैं, और इसी के चलते तुम्हें उन पर पूरा अधिकार दे दिया है: (याद रहे), अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा समझ बूझ रखनेवाला है। (71)



जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास [ईमान] कर लिया और वे हिजरत (करके मदीना) चले गए, और अल्लाह के रास्ते में अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] किया, और जिन लोगों ने उन मक्कावालों को (मदीना में) शरण दी और उनकी मदद की, ऐसे सभी लोग एक-दूसरे के साथी (allies) हैं। रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास तो कर लिया, मगर हिजरत (कर मदीना) नहीं गए, तो उनकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी आप पर तब तक नहीं है, जब तक कि वे (मदीना तक) हिजरत न कर लें। लेकिन अगर वे (दीन के चलते) अपने ऊपर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आप से मदद मांगें, तो आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप उनकी मदद करें, सिवाए ऐसे गिरोह के मुक़ाबले में जिनके साथ आपने (दुश्मनों के अदला बदली न करने की) कोई संधि कर रखी हो: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (72)



और (देखो!) विश्वास न करनेवाले लोग भी एक-दूसरे की मदद करते हैं। अगर तुम [ईमानवाले] भी एक-दूसरे की मदद नहीं करोगे, तो ज़मीन पर अत्याचार होगा और बड़ा भारी फ़साद [corruption] पैदा होगा। (73)

 

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया और हिजरत कर (के मदीना चले) गए, और अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया, और जिन लोगों ने उन (मुहाजिरों) को शरण दी और उनकी मदद की ----- वही सच्चे ईमानवाले हैं, उनके (गुनाह) माफ़ कर दिए जाएंगे और उन्हें दिल खोलकर रोज़ी दी जाएगी।  (74) 


और जो लोग बाद में ईमान लाए, और हिजरत कर (मदीना) पहुंचे और आपके साथ मिलकर जिहाद किया, तो ऐसे लोग भी आप ही का हिस्सा हैं, मगर अल्लाह की किताब के अनुसार (विरासत/ inheritance में) रिश्तेदारों का (दूसरों से) ज़्यादा हक़ बनता है: अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (75)

 

 

 

नोट: 

 

1: बद्र की जंग के मौक़े पर जब मक्कावालों की हार हो गई और वे मैदान छोड़कर भागने लगे तो मुसलमानों की फ़ौज तीन हिस्सों में बँट गई-- एक हिस्सा मुहम्मद (सल्ल) की हिफ़ाज़त के लिए उनके साथ रहा, दूसरा हिस्सा दुश्मनों को खदेड़ने में लगा रहा, और तीसरा हिस्सा दुश्मनों के क़ैदियों और उनके छोड़े हुए माल को जमा करने में लगा रहा। जिन लोगों के क़ब्ज़े में लूटा हुआ माल [अनफाल] आया, उन्हें लगा कि इस माल पर केवल उन्हीं का अधिकार है, जबकि बाक़ी दोनों हिस्सों ने भी बराबरी से युद्ध में भाग लिया था, इसलिए उस लूट के माल में उन लोगों ने भी अपने अधिकार माँगे, इस पर तीनों हिस्से के बीच आपस में बहसें होने लगीं। अभी तक क़ुरआन में ऐसे माल के बंटवारे के बारे में कोई हुक्म नहीं आया था। इस आयत में पहली बार साफ़ तौर से बताया गया कि लूट के माल पर अधिकार तो अल्लाह और उसके रसूल का ही है, इसलिए उसके बंटवारे का अधिकार भी अल्लाह और उसके रसूल का ही होगा। फिर आगे आयत 41 में लूटे हुए माल का बंटवारा किस तरह होगा उसके बारे में हुक्म भी आ गया। 

5: मक्का में 13 साल तक ज़ुल्म व सितम सहने के बाद मुसलमान अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए और उन लोगों ने हिजरत [migration] करके मदीना में पनाह ले ली। घर-बार और अपने माल-असबाब मक्का में छोड़ जाने से मक्का के बुतपरस्तों ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया था, और इस तरह, मुसलमानों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा था। इस आर्थिक घाटे की भरपाई के लिए यह फ़ैसला हुआ कि मक्का से आते-जाते व्यापारिक कारवाँ पर छापा मारा जाए, मगर यह काम छिटपुट ही किए गए। इतने में मुसलमानों को ख़बर मिली कि क़ीमती सामानों से लदा हुआ मक्का का एक बहुत बड़ा कारवाँ अबु सुफ़ियान के नेतृत्व में सीरिया से लौट रहा है, इस कारवाँ में मक्का के ढेर सारे लोगों ने काफ़ी पैसा लगाया था, इसमें मक्का से हिजरत करके गए लोगों की छोड़ी गई संपत्तियाँ भी शामिल थीं। मगर अबु सुफ़ियान को कारवाँ पर छापा मारने की भनक लग चुकी थी, इसलिए उसने पहले ही इस बात की ख़बर मक्का भेज दी, और कारवाँ का रास्ता बदलते हुए (बद्र से होकर जाने वाले रास्ते को छोड़कर) दूर समुद्र के किनारे-किनारे जाने वाले रास्ते से मक्का चल दिया। इधर मक्का में ख़बर पहुँचते ही अबु जहल की कमान में 1000 सैनिकों की भारी फ़ौज कारवाँ की रक्षा करने और मुसलमानों को सबक़ सिखाने के लिए तुरंत ही मदीना की तरफ़ निकल पड़ी। जब तक मुसलमान इस क़ाफ़िले पर छापा मारने के इरादे से मदीना से 115 किमी. दूर दक्षिण-पश्चिम की तरफ़ "बद्र" नाम की जगह पहुँचे, जो कि सीरिया से मक्का जाने वाले व्यापारिक मार्ग पर था, तब पता चला कि कारवाँ तो दूर समुद्र वाले रास्ते से चला गया, और यह कि मक्का की एक बहुत बड़ी सेना उनके काफ़ी नज़दीक आ पहुँची है। 

अब मुसलमानों को यह फ़ैसला करना था कि या तो मदीना वापस चले जाएं क्योंकि काफ़िला तो चला गया, या फिर मक्का की बड़ी सेना से मुक़ाबला करें। मुहम्मद सल्ल ने इस बारे में जब अपने सहाबियों [साथियों] से सलाह-मशविरा किया, तो उनमें से कुछ लोगों का कहना था कि चूँकि हम दुश्मन के मुक़ाबले में गिनती में बहुत कम हैं इसलिए उनसे लड़ना मौत के मुँह में जाने जैसा है, और वैसे भी हम तो क़ाफ़िले पर छापा मारने के इरादे से आए थे, इसलिए वापस मदीना चलना चाहिए, जबकि कुछ सहाबी पूरे जोश में थे और मुक़ाबला करने के लिए तैयार थे ताकि मक्का के मुश्रिकों की कमर तोड़ दी जाए। फिर अंत में मुक़ाबला करने का फ़ैसला हुआ और दुश्मनों की बड़ी सेना और ज़्यादा हथियारों के बावजूद मुसलमानों की जीत हुई।  

9: मुसलमानों की मदद के लिए बद्र की जंग में अल्लाह ने फ़रिश्ते भेजे थे, इसका ज़िक्र 3:124-126 में भी आया है। अल्लाह चाहता तो बिना फ़रिश्ता भेजे भी मदद कर सकता था, मगर वह अपने हर काम में किसी को ज़रिया बनाता है, और इंसान की फ़ितरत यह है कि उस ज़रिये को देखकर उसे यक़ीन व ख़ुशी मिलती है, हालाँकि आदमी को हमेशा यह सोचना चाहिए कि यह ज़रिया भी अल्लाह का ही पैदा किया हुआ है, और असल में भरोसा अल्लाह पर ही करना चाहिए।

11: बद्र की जंग में मुसलमानों की फ़ौज ने जहाँ पड़ाव डाला था वह जगह रेतीली थी और वहाँ पानी की भी कमी थी, जब जंग से एक रात पहले बारिश हुई तो वह रेत जम गई और क़दम ठीक से जमने लगे, पीने के पानी की भी कमी न रही। दूसरी तरफ़ दुश्मनों ने जहाँ डेरा डाला था वहाँ की मिट्टी बारिश की वजह से कीचड़ हो गई थी। 

17: जंग शुरू होने से पहले मुहम्मद सल्ल ने अल्लाह से जीत की दुआ की और दुश्मनों की हार की निशानी के तौर पर एक मुठ्ठी बालू और कंकर लेकर उनकी तरफ़ फेंका, जो बताया जाता है कि उनके हर फ़ौजी की आंख में लगा जिससे उनके लश्कर में अफ़रा-तफ़री मच गई।

21: मदीना में पाखंडी लोग ऐसे थे जो ऊपर से यह दिखावा करते थे कि वे रसूल की बातों को सुन रहे हैं, मगर असल में वे न तो सुनते थे और न ही समझते थे, क्योंकि असल में सुनने और समझने का मतलब तो यह है कि आदमी को जिन चीज़ों से रोका जाए उनसे रुक जाए और जिन चीज़ों को करने का हुक्म दे उसे करे। 

22: इंसानों में समझने की सलाहियत दी गई है, और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वह सोच-समझकर कोई रास्ता अपनाएं, लेकिन अगर वे समझने की कोशिश ही न करें, तो फिर वे जानवरों से भी बदतर हैं। यहाँ विश्वास न करने वालों को "गूंगे-बहरे" से उपमा दी गई है जो सच्चाई को देखने और समझने में नाकाम रहे। 

24: "आदमी और उसके दिल के बीच अल्लाह आ जाता है" के कई मतलब बताए गए हैं। एक मतलब तो यह है कि अल्लाह मौत देकर आदमी को उसके दिल की इच्छाओं से यानी ज़िंदगी से अलग कर देता है। दूसरा मतलब यह हो सकता है कि जो आदमी सच्चाई की तलाश में लगा रहता है, और कभी उससे कोई गुनाह होने वाला हो, तो वह अगर तुरंत अल्लाह की तरफ़ झुककर मदद मांगे, तो अल्लाह उसके और गुनाह के बीच आड़ बन जाता है और आदमी गुनाह करने से बच जाता है।  

25: बुरे काम करना और बुरे काम को रोकने की कोशिश नहीं करना, इनका प्रभाव पड़ता है और समाज में रहने वाले ऐसे आदमियों पर भी पड़ता है जो इन बुरे कामों में शामिल नहीं होते, क्योंकि अक्सर आदमी के पास कोई और चारा नहीं होता, बल्कि जब वह एक समाज में रहता है तो उस पर दूसरे लोग के कामों का असर ज़रूर पड़ता है।  

28: माल और औलाद से लगाव तो हर इंसान में क़ुदरती तौर से पाया जाता है जो एक हद तक हो तो इसमें कोई बुराई भी नहीं, बल्कि अल्लाह के हुक्म को मानते हुए यह मुहब्बत की जाए तो इसके लिए इनाम मिलेगा, लेकिन यही मुहब्बत अगर हद से बढ़ जाए जिससे आदमी अल्लाह को ही भूल जाए या उसके आदेशों को मानने से इंकार करने लगे, तो फिर यह एक वबाल है।

29: गुनाह आदमी की बुद्धि को ख़राब कर देता है जिससे आदमी सही को ग़लत और गलत को सही समझने लगता है।

30: मक्का में और उसके बाहर भी इस्लाम धीरे-धीरे फैल रहा था और फिर ख़बर मिली कि मदीना में काफ़ी तेज़ी से लोग मुसलमान हो रहे हैं, इधर मक्का में मुहम्मद (सल्ल) के चाचा अबु तालिब की मौत के बाद उनके क़बीले की तरफ़ से मिली हुई सुरक्षा की गारंटी उनके लिए ख़त्म हो गई थी, वहाँ के लोगों ने इस्लाम की जड़ ही काट देने के लिए एक बैठक बुलाई जिसमें मुहम्मद (सल्ल) के ख़िलाफ़ योजनाएं बनायी गईं जिसका ज़िक्र इस आयत में हुआ है। मगर अल्लाह ने सारी बातों की ख़बर अपने रसूल को दे दी और तुरंत उन्हें वहाँ से चुपचाप मदीना चले जाने [हिजरत/migration] का आदेश दिया जिससे दुश्मनों को इस बात की भनक तक न लग सके।  

36: मक्का के लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों के ख़िलाफ़ सेना तैयार करने में काफ़ी धन ख़र्च किया था, क्योंकि सीरिया से आ रहे कारवाँ में उनके काफ़ी धन लगे हुए थे। 

38: मक्का के विश्वास न करने वालों से कहा जा रहा है कि जिस तरह उन लोगों ने ईमानवालों पर ज़ुल्म व अत्याचार किए और रात-दिन उनके विरुद्ध योजनाएं बनायीं, अगर वे अपनी इन हरकतों से रुक जाएं तो उन्हें माफ़ कर दिया जाएगा, लेकिन अगर उन लोगों ने इन हरकतों को जारी रखा, तो जिस तरह बद्र की लड़ाई में उनकी हार हुई, आगे भी उनका ऐसा ही अंजाम होगा। 

39: ऐसी ही आयत सूरह बक़रा (2:193) में भी है। मक्का के विश्वास न करनेवालों ने हिजरत से पहले जिस तरह से मुसलमानों के साथ ज़ुल्म व अत्याचार किए, फिर हिजरत के बाद भी जो थोड़े मुसलमान मक्का में रह गए थे, उनके साथ जैसा बर्ताव और अत्याचार हुआ, इसके ख़िलाफ मुसलमानों को लड़ने के लिए कहा गया है, और उस वक़्त तक लड़ने को कहा गया है जबतक कि मक्का और उसके आसपास वह अत्याचार पूरी तरह समाप्त न हो जाए। चूँकि वहाँ ज़ुल्म उन्हीं लोगों पर हो रहा था जो कि एक अल्लाह को मानने वाले थे, इसलिए यह ज़ुल्म भी तभी ख़त्म हो सकता था जबतक कि पवित्र काबा में एक अल्लाह का दीन स्थापित न हो जाता। 

41: युद्ध के बाद दुश्मन का जो माल हाथ आ जाए, उसे "ग़नीमत" का माल कहते हैं। आयत 1 में इस माल के बंटवारे के बारे में जो सवाल उठाए गए थे, उसका यहाँ तरीक़ा बताया गया है। जो भी माल हाथ आ जाए उसका पाँच हिस्सा करना है, उसमें से चार हिस्सा तो युद्ध लड़ने वालों का होगा, मगर पाँचवाँ हिस्सा [ख़ुम्स] सरकारी ख़ज़ाने में जाएगा, फिर उस पाँचवें हिस्से को अल्लाह के रसूल, उनके नज़दीकी रिश्तेदारों (जिन्हें ज़कात लेना मना है), अनाथों, ज़रूरतमंदों और मुसाफ़िरों में बाँटना है। 

43: मक्का की हमला करने वाली सेना में क़रीब 1000 लोग थे, जबकि मुसलमानों की संख्या 313 बतायी जाती है। अगर मुसलमानों को दुश्मनों की सही संख्या मालूम होती, तो हो सकता था कि वे हिम्मत हार जाते।

47: यहाँ उन मक्कावालों का ज़िक्र है जो सीरिया से वापस आते हुए कारवाँ को बचाने के लिए (8:5) और मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों को हराने के लिए एक बड़ा भारी लश्कर लेकर अपने घरों से इतराते हुए और शान दिखाते हुए निकले थे।  

48: इसका एक मतलब तो यह बताया जाता है कि शैतान ने असल में यह बात नहीं कही, बल्कि उसने मक्कावालों के दिलों में उनके जीतने की बात इस तरह बैठा दी कि वे अपने घमंड में इतराते हुए जंग करने गए, मगर वहाँ पहुँचकर जब दुश्मनों की फ़ौज देखी तो जो झूठा आत्मविश्वास शैतान की वजह से था, वह एकदम से हवा हो गया और वे बुरी तरह डर गए।

एक दूसरा मतलब है कि मक्कावाले जब जंग के लिए निकले, तो उन्हें डर था कि कहीं उनके मक्का में न होने से पास का एक क़बीला जिससे कुछ झमेला चल रहा था, वह मक्का पर हमला न कर दे। बताते हैं कि शैतान भेस बदलकर उसी क़बीले का सरदार बनकर आया और उनमें ख़ूब जोश भरने के साथ साथ यह भी भरोसा दिलाया कि वह मक्का पर हमला नहीं करेगा। वह साथ में बद्र तक गया भी, मगर जैसे ही दोनों सेनाएं आमने-सामने हुईं, वह मारे डर के भाग खड़ा हुआ, क्योंकि उसने दुश्मनों की फ़ौज में फ़रिश्तों को देख लिया था। 

49: जब ईमानवालों ने बहुत कम साज़-सामान के साथ इतने बड़े लश्कर से टक्कर ले ली तो पाखंडियों और उन जैसे लोगों ने कहा था कि ये लोग अपने ईमान के घमंड में चूर हैं, वरना इतनी बड़ी फ़ौज से टक्कर नहीं लेते।

53: अल्लाह इंसानों को अक़्ल देता है, ताक़त देता है, काम करने की आज़ादी देता है, ज़िंदगी जीने के लिए अच्छी चीज़ें देता है, ताकि वे अच्छे काम कर सकें और अल्लाह की इबादत कर सकें। मगर वे धीरे-धीरे इन नेमतों से मुंह मोड़ लेते हैं और इसके बदले गुनाह करते हैं और अल्लाह पर ईमान खो बैठते हैं। इस तरह ऐसे लोग नेमतें मिलने के बाद ख़ुद ही अपनी हालत बदल डालते हैं। कुछ विद्वान इसे मक्का के क़ुरैश क़बीले के लोगों से जोड़ते हैं जिन्हें मुहम्मद (सल्ल) के रूप में इतनी बड़ी नेमत मिली जो उन्हीं लोगों में से थे, मगर केवल अपनी ज़िद्द व हठधर्मी के चलते उन लोगों ने सच्चाई को क़बूल नहीं किया और उन्हें घर से निकल जाने पर मजबूर किया। इस तरह जब लोगों ने अपनी हालत इस तरह बदल ली तो अल्लाह ने नेमत के बदले उन्हें सज़ा देने का फ़ैसला कर लिया।

56: मदीना के आसपास रहने वाले यहूदियों के क़बीले: बनु नज़ीर और बनु क़ुरैज़ा के साथ मुहम्मद (सल्ल) ने शांति संधि की थी, जिसमें यह शर्त थी कि वे एक दूसरे के दुश्मन का साथ नहीं देंगे, मगर इन दोनों क़बीलों ने संधि की शर्तों को तोड़ते हुए मक्का के विश्वास न करनेवालों के साथ ख़ुफ़िया सांठ-गांठ कर ली थी। 

58: जिसके साथ संधि [Treaty] की गई है, अगर ऐसी आशंका है और यह पता चलता है कि उसने धोखा देते हुए [Treachery] उसकी शर्तों को तोड़ा है, तो मुसलमानों को चुपके से कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, बल्कि साफ़ तौर से संधि को तोड़ने की घोषणा कर देनी चाहिए। हाँ, अगर दूसरा पक्ष उसकी शर्तों को खुले आम तोड़ देता है, तो फिर मुसलमानों को भी इस संधि को तोड़ने की घोषणा करना ज़रूरी नहीं है। 

59: यह उन मक्का के (काफ़िर) लोगों के बारे में है जो बद्र की लड़ाई में बचकर भाग निकले थे। 

60: "ऐसे लोगों को चेतावनी दे सको जिन्हें तुम नहीं जानते.." इसका मतलब ऐसे पाखंडी लोग हो सकते हैं जिनके बारे में अभी पता नहीं था कि वे असल में दुश्मन हैं, या वे दुश्मन जिनसे बाद में लड़ाइयाँ होंगी जैसे फ़ारस और बाइज़ेंटाइन की सेनाओं से।

65-66: मक्का में क़रीब 13 साल मुसलमानों ने विश्वास न करने वालों के ज़ुल्म व अत्याचार सहे, मगर हथियार नहीं उठाया। फिर वे अपना घर-बार छोड़कर मदीना जाने के लिए मजबूर हुए। वहाँ मुसलमानों की छोटी सी रियासत क़ायम हुई, पर चारों तरफ़ से ख़तरा मंडरा रहा था, ऐसे में बद्र की लड़ाई हुई जिसमें मुसलमानों को जीत हासिल हुई, मगर ज़ाहिर है कि दुश्मन चुपचाप बैठने वाला न था, बल्कि वह पूरी ताक़त से फिर हमला करने वाला था। इसलिए लोगों को लड़ाई के लिए तैयार रहने के लिए उभारा गया है।

अगर दोनों पक्ष सब चीज़ में बराबर हों, यानी साज़-सामान, हथियार, साधन [resources] आदि में, तो एक ईमानवाला दस विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] पर भारी पड़ेगा, और इसका कारण है कि उसके पास ईमान की ताक़त होती है, वह मौत से नहीं डरता, उसे दुनिया का कोई लोभ नहीं होता, उसे पता है कि उसे जन्नत में कभी ख़त्म न होने वाला आनंद मिलेगा, और ये सारी ख़ूबियाँ काफ़िरों में नहीं होती। मगर जिस समय यह आयत उतरी, यानी बद्र की लड़ाई के बाद, उस वक़्त मुसलमानों के पास न तो सही तरीक़े से लड़ने के साधन थे और न ही उनके पास लड़ने की ट्रेनिंग थी। इसीलिए वे इन कमज़ोरियों के चलते लड़ाई में अपने से केवल दुगनी ताक़त के ही दुश्मन को हरा सकते थे। बद्र की लड़ाई में वह अपने से तीन गुना ताक़त वाली सेना को हरा पाए क्योंकि मुसलमानों को अल्लाह ने फ़रिश्तों से भी मज़बूती दी थी। बहरहाल, जब मुसलमान भी साज़ व सामान, साधन और लड़ने की ट्रेनिंग आदि में दुश्मन के बराबर हो गए, तो उसके बाद लड़ी गई जंगों में उन्होंने दुश्मन की 5 गुना, 10 गुना और 20 गुना ज़्यादा मज़बूत सेना को भी हराया था। 

67: यहाँ बद्र की लड़ाई में 70 आदमियों को क़ैदी बना लेने के बाद उनकी जान के बदले धन [ransom] लेकर छोड़ देने को नापसंद किया गया है, हुआ यूँ था कि मुहम्मद (सल्ल) ने लोगों से राय मांगी थी कि क़ैदियों को धन के बदले छोड़ दिया जाए या इन्हें मार डाला जाए, ज़्यादातर लोगों ने धन लेकर छोड़ने की बात की थी क्योंकि एक तो वे अपने  घर-बार छोड़कर आए थे और उन्हें हर काम के लिए धन की ज़रूरत थी और दूसरे उम्मीद थी कि इनमें से कुछ लोग ईमानवाले हो जाएंगे, लेकिन चूँकि बद्र की जंग पहली पहली जंग थी, इसलिए इस मौक़े पर सही यही होता कि दुश्मनों की ताक़त को पूरी तरह कुचल डाला जाता जिससे आगे के लिए भी उनकी कमर टूट जाती, और वे आगे लड़ने से डरते, मगर उन्हें धन लेकर रिहा कर देने से यह हुआ कि उन लोगों ने फिर से जाकर अपनी सेना को मज़बूती दी।

68: यह मुसलमानों के लिए पहली जंग थी, और इससे पहले तक नबियों के लिए यही हुक्म था कि युद्ध में लूटा हुआ माल नहीं लेना चाहिए बल्कि उसे नष्ट कर देना चाहिए, इसी तरह क़ैदियों को भी उस ज़माने में आम तौर से मार दिया जाता था, जैसा कि ऊपर बताया गया कि बद्र की जंग के मौक़े पर मुसलमानों द्वारा किए गए ये दोनों काम यानी माल लूटना और धन के बदले क़ैदियों को छोड़ना अल्लाह ने पसंद नहीं किया था, और इसके लिए वह उन्हें कोई सज़ा देता मगर चूँकि अल्लाह ने यह दोनों काम आगे के लिए वैध कर देना पहले ही तय कर लिया था, इसीलिए उन्हें इस गलती के लिए माफ़ कर दिया।

69: युद्ध के बाद हाथ आ गया माल चाहे वह लूटा हुआ हो या क़ैदियों को छोड़ने के बदले हो, दोनों को अब अल्लाह ने वैध [lawful] कर दिया, इसलिए उससे उचित तरीक़े से फ़ायदा उठाने की अनुमति दे दी गई।

70: यानी अगर क़ैदियों में अल्लाह और उसकी सच्चाई पर विश्वास करने की इच्छा दिखाई दी, तो जो कुछ धन उनसे रिहा करने के लिए लिया गया है, उससे कहीं ज़्यादा आखिरत में उन्हें गुनाहों की माफ़ी की सूरत में इनाम दिया जाएगा।

72: यहाँ ध्यान देने की बात है कि किस तरह संधि की शर्तों को मानने पर ज़ोर दिया गया है। अगर मदीना के मुसलमानों ने मक्का के विश्वास न करनेवालों के साथ युद्धबंदी की कोई संधि कर रखी हो, तो फिर चाहकर भी मक्का के ईमानवालों की मदद नहीं की जा सकती थी।   

73: यहाँ मदीना के मुसलमानों को मक्का के उन ईमानवालों की मदद करने को कहा गया है जो कि मक्का में ही रुके रह गए और जहाँ वे काफिरों के हाथों अत्याचार सह रहे थे।

75: जब (मुहाजिर) मुसलमान मक्का से हिजरत करके मदीना गए, तो वहाँ के (अंसार) लोगों ने उन्हें शरण दी और भाइयों जैसा बर्ताव किया, और अपनी चीज़ों में उन (मुहाजिरों) को भी हिस्सा दिया, यहाँ तक कि आपस में ख़ून का रिश्ता नहीं होने के बावजूद वे एक दूसरे के वारिस बने, फिर कुछ दिनों के बाद मुहाजिर जब अपने पैरों पर खड़े हो गए, तो फिर आपस में विरासत के हक़ की ज़रूरत नहीं रही, आहिस्ता-आहिस्ता कुछ ईमानवाले जो अभी तक मक्का में रुके हुए थे वे भी मदीना आते गए। तब भी मुहाजिरों और अंसारियों में भाइयों के रिश्ते बने रहे और अपने माल में हिस्सेदारी और लेन-देन चलती रही। मगर हाँ, जहाँ तक "विरासत" यानी मरने के बाद संपत्ति के बंटवारे [Inheritance] का सवाल था, वह तो इस्लाम के क़ानून के मुताबिक़ नज़दीकी रिश्तेदारों को ही मिलना था, लेकिन अगर नज़दीकी रिश्तेदारों के अलावा किसी और को हिस्सा देना है तो उसे "वसीयत" करके दिया जा सकता है मगर यह कुल माल के एक तिहाई से ज़्यादा नहीं होना चाहिए।  देखें 4: 7, 11-13, 32-33. और 176.







सूरह 47: मुहम्मद 

[Muhammad/ अल्लाह के रसूल]


यह एक मदनी सूरह है जिसमें युद्ध से जुड़े मामले बयान किए गए हैं, और उन लोगों की बात की गई है जो दूसरे लोगों को इस्लाम अपनाने या अल्लाह के हुक्म को मानने से रोकते हैं (यह मदनी सूरह का एक आम विषय है), और इसमें पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के अंजाम से भी परिचित कराया गया है। इसमें ख़ास तौर से उन लोगों का ज़िक्र आया है जिन्होंने अधर्म का रास्ता अपनाते हुए मुहम्मद साहब को मक्का से निकलने पर मजबूर किया, यह भी बताया गया है कि विश्वास न करने वाले अल्लाह और उसके रसूल के ख़िलाफ़ चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, वे इसमें कामयाब नहीं होंगे। इसमें ज़ोर दिया गया है कि मुसलमानों को हर हाल में अल्लाह का हुक्म मानते हुए अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करना चाहिए और ज़रूरतमंदों को ज़्यादा से ज़्यादा दान देना चाहिए, ताकि फ़ैसले के दिन विश्वास न करने वालों और पाखंडियों की तरह कहीं ऐसा न हो कि उनके सब अच्छे कर्म बेकार हो जाएं। आयत 2 में आए मुहम्मद साहब के ज़िक्र पर इस सूरह का नाम रखा गया है।

 

विषय:

01-03: ईम्मानवालों और विश्वास न रखनेवालों के साथ अल्लाह का रवैया 

04-14: विश्वास न रखने वालों के साथ (बचाव में) लड़ो 

   15: जन्नत की ख़ुशियाँ और जहन्नम की मुसीबतें 

16-19: रसूल को सलाह

20-38: युद्ध के लिए जाने से आना-कानी करने की निंदा 

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

जो लोग विश्वास नहीं रखते और (दूसरों को) अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, अल्लाह ऐसे लोगों के (अच्छे) कर्मों को भी बर्बाद कर देगा,  (1)

मगर जो लोग ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और उस चीज़ पर विश्वास रखते हैं जो मुहम्मद (सल्ल.) पर उतारी गयी है--- यानी तुम्हारे रब की तरफ़ से भेजी गयी सच्चाई [क़ुरआन] पर, तो (याद रहे) अल्लाह ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को भी अनदेखा कर देगा, और उनकी हालत सँवार देगा। (2)

ऐसा इसलिए है कि विश्वास न करनेवाले झूठ के पीछे चलते हैं, जबकि ईमानवाले अपने रब की तरफ़ से आयी हुई सच्चाई के पीछे चलते हैं, इस तरह अल्लाह लोगों को उनका असली रूप दिखा देता है। (3)


जब जंग में विश्वास न करनेवालों से तुम्हारी मुठभेड़ हो, तो उनकी गरदनों पर वार करो, और जब वे पूरी तरह (जंग में) हरा दिए जाएं, तो उन्हें क़ैद करके मज़बूती से बाँध दो------ बाद में या तो उन्हें एहसान करते हुए छोड़ दो या फिर उनकी जान की क़ीमत वसूल करके छोड़ दो, यहाँ तक कि युद्ध के बचे-खुचे प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएं। यही सही तरीक़ा है। अगर अल्लाह चाहता, तो उसने ख़ुद ही उन्हें हरा दिया होता, मगर (इस जंग से) उसका मक़सद दूसरे लोगों के द्वारा तुममें से कुछ लोगों की परीक्षा लेना है। जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे जाते हैं, अल्लाह उनके कर्मों को कभी बेकार नहीं जाने देगा; (4)

वह उनको सही रास्ता दिखा देगा और उनको अच्छी हालत में डाल देगा;  (5)

वह उन्हें जन्नत में दाख़िल कर देगा, जिसके बारे में वह उन्हें पहले ही बता चुका है। (6)

तुम (लोग) जो ईमान रखते हो! अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे, तो वह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हारे क़दम जमा देगा। (7)


रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, तो वे कितने दुख व निराशा की हालत में होंगे! अल्लाह ने उनके सब किए-धरे कर्मों को बेकार कर दिया है। (8)

अल्लाह के द्वारा उतारी गयी चीज़ [क़ुरआन] से नफ़रत करने की वजह से ऐसा हुआ कि अल्लाह ने उनके कर्मों को बेकार कर दिया है। (9)

क्या लोगों ने ज़मीन पर घूम-फिरकर देखा नहीं कि उन लोगों का क्या नतीजा हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं? अल्लाह ने उन्हें पूरी तरह तहस-नहस कर दिया: विश्वास करने से इंकार करनेवालों का नतीजा भी कुछ ऐसा ही होगा! (10)

यह इसलिए कि ईमान रखनेवालों की रक्षा तो अल्लाह करता है, जबकि विश्वास न करनेवालों का कोई नहीं जो उन्हें बचा सके:  (11)

जो लोग ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें अल्लाह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं; जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, वे इस दुनिया में भरपूर मज़े उड़ा लें, और खा-पी लें, जैसे पालतू जानवर खाते हैं, मगर (जहन्नम की) आग उनका (आखिरी) ठिकाना होगी।  (12)

कितने ही शहरों को हम तबाह-बर्बाद कर चुके हैं, जो [ऐ रसूल] आपके अपने शहर [मक्का] से भी ज़्यादा मज़बूत थे------ वह शहर जिससे आपको निकाल दिया गया----- और उनके पास कोई न था जो उनकी मदद कर पाता।  (13)


जो लोग अपने रब की तरफ़ से आए हुए स्पष्ट प्रमाण (को मानते हुए उस) के पीछे चलनेवाले हैं, क्या उनकी तुलना ऐसे लोगों के साथ की जा सकती है, जिनके कुकर्मों को उनके लिए लुभावना बना दिया गया हो, और वे लोग जो अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हों? (14)

बुराइयों से बचनेवाले नेक लोगों से, जिस (जन्नत के) बाग़ का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी होगी: हमेशा साफ़ व शुद्ध रहनेवाली पानी की नहरें, हमेशा ताज़ा रहनेवाली दूध की नहरें, पीनेवालों के मज़े व मस्ती के लिए शराब की नहरें, साफ़ किए गए शुद्ध शहद की नहरें, सब उसके अंदर बह रही होंगी; उन्हें वहाँ हर तरह के फल मिलेंगे; और उन्हें अपने रब की तरफ़ से गुनाहों की माफ़ी मिल जाएगी। इनकी तुलना उन लोगों के अंजाम के साथ आख़िर किस तरह की जा सकती है, जो (जहन्नम की) आग में फँस के रह गए हों, और जिन्हें पीने के लिए ऐसा खौलता हुआ पानी मिलेगा, जो उनकी आँतों को फाड़कर रख देगा? (15)


इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं, जो [ऐ रसूल] आपकी बातें सुनते तो हैं, मगर जैसे ही वे आपके पास से उठकर जाते हैं, तो उन लोगों से जिन्हें ज्ञान दिया गया है, मज़ाक़ उड़ाते हुए पूछते हैं, "उस (रसूल) ने अभी-अभी क्या कहा था?" यही वे लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने ठप्पा लगाकर बंद कर दिया है (कि अब उन पर कोई असर होनेवाला नहीं है), वे तो बस अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हैं।  (16)

जो लोग सीधे रास्ते पर चलते हैं, अल्लाह ने अपना मार्गदर्शन बढ़ाते हुए उनका (सही रास्ते पर) चलना और आसान कर दिया है, और उन्हें बुराइयों से बचने की तौफ़ीक़ दी है।  (17)

विश्वास न करनेवाले लोग अब और किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं, सिवाए (क़यामत की) घड़ी का, जो उन पर इस तरह (अचानक) आ जाएगी कि उन्हें पता तक न होगा? उस (क़यामत) की निशानियाँ तो आ चुकी हैं, मगर जब वह घड़ी सचमुच आ जाएगी, उस वक़्त नसीहत मान लेने का भला क्या फ़ायदा होगा? (18)

अतः [ऐ रसूल!] आप जान लें कि अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो पूजा के लायक़ हो, सो आप अपनी भूल-चूक की माफ़ी के लिए भी दुआ करें, और ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों के गुनाहों की माफ़ी के लिए भी दुआ करें। अल्लाह सब जानता है---- तुम्हारे चलने-फिरने को भी और तुम्हारे एक जगह ठहरे रहने को भी।  (19)


जो लोग ईमान रखते हैं, वे पूछते हैं कि (दुश्मनों से युद्ध के बारे में) कोई सूरह क्यों नहीं उतारी गयी है? मगर जब (युद्ध करने के बारे में) कोई स्पष्ट सूरह उतारी जाती है, तो [ऐ रसूल] आप देखते हैं कि जिनके दिलों में रोग है, वे आपकी तरफ़ इस तरह देखते हैं मानो मरने के डर से उन पर बेहोशी छा गई हो ----- उनके लिए बेहतर यही होगा (20)

कि (अल्लाह की) आज्ञा को मानें और (रसूल के लिए) उचित बात कहें; जब युद्ध करने का फ़ैसला हो चुका है, तो उनके लिए यह और भी बेहतर होगा अगर वे अल्लाह के प्रति सच्चे बने रहें।  (21)

"अब अगर तुम (युद्ध करने से) मुँह मोड़ते हो, तो शायद ऐसा हो सकता है कि तुम सारी ज़मीन पर फ़साद [corruption] फैलाते फिरो और अपने रिश्ते-नातों को तोड़ डालो?" (22)

ये वे लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) ठुकरा दिया है, और उन्हें कानों से बहरा और आँखों से अंधा कर दिया है।  (23)

तो क्या वे क़ुरआन पर सोच-विचार नहीं करेंगे? क्या उनके दिलों पर ताले लगे हैं? (24)

सही मार्ग दिखाने के बाद भी जो लोग पीठ-फेरकर चल देते हैं, वे ऐसे ही लोग हैं जो शैतान के धोखे व बहकावे में आ जाते हैं, और उन्हें झूठी उम्मीदें दिलाते हैं। (25)

वे [पाखंडी] लोग, उन लोगों से जो अल्लाह की भेजी गयी (आयतों से) नफ़रत करते हैं, कहते हैं, "हम कुछ मामलों में तुम्हारी बात मान लेंगे।" अल्लाह उनकी ख़ुफ़िया चालों को अच्छी तरह जानता है। (26)


उस समय उन्हें कैसा लगेगा जब फ़रिश्ते उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते हुए उनकी जान निकालकर ले जाएंगे, (27)

यह इसलिए कि वे ऐसे तरीक़े के पीछे चले जिस पर अल्लाह सख़्त नाराज़ हुआ, और उन लोगों ने उसे ख़ुश करने की ज़रूरत भी नहीं समझी? सो उसने उनके सारे किए-धरे कर्मों को बेकार कर दिया। (28)

क्या भ्रष्ट दिलवाले लोग यह मान कर चल रहे हैं कि (रसूल के प्रति) उनके अंदर की नफ़रत व दुश्मनी [malice] को अल्लाह कभी सबके सामने ज़ाहिर नहीं करेगा? (29)

(ऐ रसूल!) अगर हम चाहते, तो आपको उन [पाखंडी/मुनाफ़िक़ लोगों] के बारे में बता देते, और फिर आप उन्हें उनके लक्षणों से पहचान सकते थे, मगर आप वैसे भी उनकी बातचीत के ढंग से उन्हें पहचान ही लेंगे। जो कुछ तुम (लोग) करते हो, अल्लाह सब जानता है। (30)

हम तुम्हारी जांच-परख ज़रूर करेंगे, यह देखने के लिए कि तुममें से कौन है जो सबसे जमकर (अपनी जान-माल से) संघर्ष [जिहाद] करता है और अपने क़दम धीरज से जमाए रखता है; हम यह भी परखेंगे कि तुम अपने दावे में कितने सच्चे थे। (31)

जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया, और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, और रसूल का विरोध किया जबकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा चुका था, तो ऐसे लोग अल्लाह को किसी भी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। वह उनके सब किए-कराए कर्मों को बेकार कर देगा------(32)

ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो: अपने कर्मों को यूँ बर्बाद न होने दो-----  (33)

जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया, दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, और बिना विश्वास किए ही मर गए, तो अल्लाह ऐसे लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगा। (34)


अतः (ऐ ईमानवालो!) हिम्मत न हार बैठो और तुरंत सुलह [संधि] करने में न लग जाओ। तुम तो उन पर भारी पड़ रहे हो: अल्लाह तुम्हारे साथ है। वह तुम्हारे (अच्छे) कर्मों के इनाम को कभी कम नहीं करेगा: (35)

इस दुनिया की ज़िन्दगी तो बस एक खेल-तमाशा है, लेकिन अगर तुम विश्वास [ईमान] रखो, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, तो वह तुम्हें इसका पूरा-पूरा बदला देगा। वह तुमसे अपनी (सारी) संपत्ति दे देने को नहीं कहता ----- (36)

अगर अल्लाह ने तुमसे ऐसा कहा होता, और तुम्हें (अपनी दौलत) दे देने पर ज़ोर दिया होता, तो तुम कंजूसी करने लगते, और वह तुम्हारे मन के खोट को उजागर कर देता ------ (37)

हालाँकि अब तुम्हें अल्लाह की राह में (थोड़ा-बहुत) देने के लिए बुलाया जा रहा है, मगर तुममें से कुछ लोग हैं जो देने में कंजूसी कर रहे हैं। हालाँकि जो कोई भी कंजूसी करता है तो वह असल में अपने आप से ही कंजूसी करता है: अल्लाह ही तो सारे धन-दौलत का स्रोत [source] है, और तुम तो ज़रूरतमंदों में से हो। अगर तुमने मुंह मोड़ा, तो वह तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ले आएगा, और वे तुम्हारे जैसे (कंजूस) न होंगे। (38)




नोट:

1: जो लोग सच्चाई पर विश्वास नहीं करते, उनके द्वारा किए गए भलाई के कामों का बदला उन्हें दुनिया में ही अल्लाह दे देता है, मगर आख़िरत [परलोक] में उनके सारे अच्छे काम अकारत हो जाएंगे, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार कर दिया था। 

4: यह सूरह बद्र की जंग के बाद उतरी थी। यहाँ कहा जा रहा है कि जब दुश्मन लड़ाई में पूरी तरह से हरा दिए जाएं, और उनकी ताक़त कुचल दी जाए, तो फिर जंग में जो दुश्मन के क़ैदी गिरफ़्तार हो गए हों, उन पर एहसान करते हुए या तो उन्हें छोड़ दिया जाए, या फिर उनकी जान की क़ीमत वसूल करके छोड़ देना चाहिए, साथ में यहाँ अपने क़ैदियों के बदले [exchange] में छोड़ना भी शामिल है। मगर उन पर रहम करते हुए छोड़ देना ही ज़्यादा पसंदीदा तरीक़ा माना जाता है। 

 इससे पहले बद्र की जंग में मक्का के 70 जंगी सिपाहियों को क़ैदी  बनाया गया था, जिन्हें उनकी जान की क़ीमत वसूल करके रिहा कर दिया गया था, मगर इस फ़ैसले को अल्लाह ने पसंद नहीं किया था, देखें सूरह अंफ़ाल (8: 67-68), जहाँ यह बताया गया था कि अभी दुश्मनों की ताक़त पूरी तरह कुचली नहीं गई थी, इसलिए उनको छोड़ देने से फिर से दुश्मनों को मज़बूत हो जाने का डर था। 

इस तरह, उस ज़माने में मुस्लिम हाकिमों के पास कई विकल्प थे जिसे उसको हालात के मुताबिक़ फ़ैसला करना होता था: चाहे तो उन्हें सीधे-सीधे रिहा कर दे, या जान की क़ीमत लेकर छोड़ दे, या उन्हें अपने क़ैदियों के बदले में रिहा करे, या अगर युद्ध की हालत बनी हुई हो तो क़त्ल कर दे, या कुछ को ग़ुलाम बना ले। 

जंग के द्वारा अल्लाह ईमानवालों की भी परीक्षा लेता है ताकि पता चल जाए कि अल्लाह के दीन के लिए कौन अपनी जान-माल जोखिम में डालता है। 

16: यहाँ मदीना के पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrites] लोगों के बारे में बताया गया है। 

19: अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को मासूम बनाया था जिनसे गुनाह होने की कोई संभावना नहीं थी, मगर इंसान होने के नाते छोटी-मोटी भूल-चूक हो जाती थी जिसके लिए वह हमेशा माफ़ी माँगते रहते थे, मुसलमानों को भी अपने हर छोटे-बड़े गुनाह के लिए अल्लाह से माफ़ी माँगते रहना चाहिए। 

20: जो पक्के ईमानवाले लोग थे, वे तो इस इंतज़ार में रहते थे कि कब अल्लाह की राह में लड़्ने का मौक़ा मिल जाए, मगर जो मुसलमानों के बीच पाखंडी लोग थे, वे भी कभी-कभी दिखावा करने के लिए कह देते थे कि अगर सच्चाई के लिए लड़ना पड़े, तो वे भी तैयार रहेंगे, मगर जब उनसे लड़ने के लिए कहा जाता, तो लगता कि वे बेहोश हो जाएंगे। 

22: अल्लाह के रास्ते में लड़ने का मक़सद यह है कि ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी ख़त्म हो जाए, तो अगर कोई इस फ़साद को ख़त्म करने के लिए नहीं उठता, तो एक तरह से वह भी इस ज़ुल्म और फ़साद फैलाने वालों में शामिल है, और इसके नतीजे में एक सूरत रिश्ते-नाते का टूटना भी हो सकता है क्योंकि उनके हक़ भी मारे जाएंगे। 

35: युद्ध में किसी से डर के सुलह नहीं करनी है, हाँ अगर दुश्मन सुलह करना चाहे, तो सुलह कर लेनी चाहिए, देखें सूरह अंफ़ाल [8: 61] 

38: अल्लाह के रास्ते में देने से कंजूसी करने का मतलब यह है कि उससे होने वाले फ़ायदे से अपने आपको वंचित करना। 















 


Medina Surah: H3



सूरह 61: अस-सफ़ 

[मज़बूत क़तारें, Solid Lines]


यह एक मदनी सूरह है जिसमें ईमानवालों का हौसला बढ़ाते हुए अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करने और एक-जुट रहने की बात कही गई है (आयत 4 में आए ज़िक्र पर इसका नाम पड़ा है). यह उन लोगों की निंदा करती है जो अपने किए हुए वादे से मुकर गए (आयत 3), और जो ईमान के विरोध में बहस किया करते थे (आयत 7-8). मूसा और ईसा अलै. को रसूलों में मिसाल के तौर पर पेश किया गया है जिनकी क़ौमें बंट गई थीं: उनमें आदेश न मानने वाले बाग़ी लोगों को भटकता छोड़ दिया गया और जो आज्ञाकारी लोग थे उन्हें कामयाबी दी गई (आयत 5-6, 14). जो लोग अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करते हैं, उनको मिलने वाले इनाम के बारे में थोड़ा विस्तार से बताया गया है (आयत 11-13). 

 

विषय:


  1: अल्लाह की महानता

02- 04:  जो कहो, वह करो

05-09:  इसराईल की संतानों की तरफ़ से विरोध 

10-13:  ईमानवालों का अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करना 

 14:  ईमान रखने वालों को अल्लाह (के दीन) का मददगार होना




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है--- वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)


ऐ ईमानवालो! तुम ऐसी बातें क्यों कहते हो, जिन्हें बाद में करते नहीं हो? (2)


यह बात अल्लाह को सख़्त नापसंद है कि तुम जो बात कहते हो, उन्हें करते नहीं हो; (3)


अल्लाह उन लोगों को सचमुच बहुत पसंद करता है जो उसकी राह में मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, मानो वे सीसा पिलाई हुए (ठोस) दीवार हों। (4)


और (देखो) जब मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम मुझे क्यों दुख देते हो, हालांकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ?" फिर जब वे सच्चाई के रास्ते से भटक गए, तो अल्लाह ने भी उनके दिलों को भटकता छोड़ दिया: अल्लाह बग़ावत करनेवालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता। (5)


और (देखो) जब मरयम [Mary] के बेटे ईसा [Jesus] ने कहा, "ऐ इसराईल की संतानों! मैं अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारे पास (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ, ताकि मैं तौरात [Torah] की (सच्चाई की) पुष्टि कर दूं, जो मुझसे पहले आयी थी, और मेरे बाद एक रसूल के आने की ख़ुशख़बरी भी दे दूं, जिसका नाम 'अहमद' होगा।" इसके बावजूद, जब वह [ईसा] उनके पास स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो वे लोग कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादूगरी है।" (6)


उस आदमी से ज़्यादा ग़लती पर कौन होगा, जो (लोगों को बहकाने के लिए) अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, जबकि उसे अल्लाह के आगे झुक जाने के लिए बुलाया जाए? ग़लत काम करने वालों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता है: (7)


वे चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [मार्गदर्शन/क़ुरआन] को अपने मुँह से फूँक मारकर बुझा दें। लेकिन अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी (तरह फैला) कर रहेगा, भले ही (सच्चाई में) विश्वास न करनेवाले इससे कितनी ही नफ़रत करते हों; (8)


वही है जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन [क़ुरआन] और सच्चाई के दीन [धर्म] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दूसरे सभी (झूठे) धर्मों से बढ़कर है, चाहे बहुदेववादियों को ये बात कितनी ही बुरी लगे। (9)


ऐ ईमानवालो! क्या मैं तुम्हें (एक चीज़ के बदले में) एक ऐसे फ़ायदे का काम [व्यापार] बताऊँ, जो तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा ले? (10)

(वह यह है कि) अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और अपनी जान व माल से अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करो----ये (ईमान व जिहाद) तुम्हारे लिए (जान व माल से) बेहतर है, अगर तुम समझ पाओ----- (11)


और वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, तुम्हें [जन्नत के] ऐसे बाग़ों में ले जाएगा जहाँ नहरें बह रही होंगी, और उन ख़ुशनुमा घरों में बसा देगा जो सदाबहार बाग़ों [Garden of Eternity] में होंगे। यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (12)


और (इसके अलावा इस दुनिया में) वह तुम्हें कुछ और भी देगा जिससे तुम सचमुच ख़ुश हो जाओगे: अल्लाह की ओर से मदद और जल्द ही मिलने वाली जीत! [ऐ रसूल] ईमानवालों को (इस बात की) ख़ुशख़बरी सुना दें! (13)


ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह के (दीन के) मददगार बन जाओ। जैसा कि मरयम के बेटे ईसा [Jesus] ने अपने ख़ास शिष्यों [Disciples] से कहा था, "कौन है जो अल्लाह के काम में मेरी मदद करेगा?" उनके शिष्यों ने कहा, "अल्लाह के काम में हम मददगार होंगे।" फिर इसराईल की संतान में से कुछ ने तो विश्वास कर लिया जबकि कुछ ने विश्वास नहीं किया: जो विश्वास [ईमान] रखनेवालों के दुश्मन थे, हमने उनके ख़िलाफ़ विश्वास रखनेवालों का साथ दिया, सो वही लोग थे जिनकी जीत हुई। (14)

 

 

 नोट:

1: आसमान और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, भले ही हम इंसान इसे समझ नहीं पाते। देखें 24:36; 59:24; 17:44. 

2: बताया जाता है कि कुछ मुसलमानों ने मदीना में यह इच्छा जतायी थी कि "अगर उन्हें मालूम हो जाए कि अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद क्या काम है, तो वे वही काम करेंगे!" उस समय जंग का माहौल था, अल्लाह का आदेश आया कि "उसकी राह में जो मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, अल्लाह उन्हें बहुत पसंद करता है" (आयत 4), मगर जब उहुद की जंग (625 ई) में लड़ने की बारी आयी, तो इसमें से कुछ लोग भाग खड़े हुए, देखें 3:121; 3:155. इसीलिए, यहाँ उन्हें ऐसी बात कहने से मना गया है जो वे करते नहीं हैं।

5: मूसा (अलै) की क़ौम ने उन्हें बहुत दुख़ दिए (33:69)। कभी लोगों ने कहा कि हमें सामने-सामने अल्लाह को दिखा दो (4:153), कभी बछड़े की पूजा करने लगे (2: 92-93), कभी आसमान से उतरने वाले "मन व सलवा" खाने से मना कर दिया (2:61), और तो और जब इसराईल में दाख़िल होने के लिए लड़ने को कहा गया तो उससे भी इंकार कर दिया (5:24). 

6: अल्लाह के पैग़म्बरों का तरीक़ा रहा है कि उन्होंने अपने से पहले की उतरी किताबों की सच्चाई की पुष्टि की है और आने वाले पैग़म्बरों के बारे में ख़बर दी है। सो ईसा (अलै) ने भी तौरात की सच्चाई की पुष्टि की और 'अहमद' नाम के आने वाले पैग़म्बर [Paraclete] की ख़बर बाइबल में दी (देखें John 14:16; 26; 15:26; 16:7)। "अहमद" और मुहम्मद नाम का मतलब "तारीफ़ के लायक़" होता है, और आपके कई नामों में से अहमद नाम भी मशहूर है, और इसकी पहचान विद्वानों ने शुरू से ही मुहम्मद (सल्ल) से की है।

 ...... ईसा (अलै) ने स्पष्ट निशानियाँ दिखायी थीं, जैसे मिट्टी की चिड़िया में साँस फूँककर उड़ा देना, अंधे और कोढ़ी आदमी को ठीक कर देना, मुर्दे को ज़िंदा कर देना [5:110], मगर फिर भी इसराइली लोगों ने इसे जादूगरी माना और ठुकरा दिया।

7: जब कोई पैग़म्बर लोगों को अल्लाह के सामने झुक जाने के लिए बुलाए, और लोग उसकी बात न सुनें और उसे पैग़म्बर मानने से इंकार कर दें, तो यह एक तरह से अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ने जैसा है। 

8: लोग चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [क़ुरआन] को कभी जादूगरी, या शायरी या तांत्रिक की बातें कहकर बुझा दें। यह बात 9:32 में भी कही गई है। 

10: व्यापार में जैसे कोई सामान देकर उसकी क़ीमत वसूल की जाती है, उसी तरह एक मुसलमान अपनी जान और माल अल्लाह के हवाले करता है, तो अल्लाह इसके बदले में जन्नत और यातना से उसे रिहाई दे देता है। देखें सूरह तौबा (9:111) 

13: जल्दी ही मिलने वाली जीत से मतलब मक्का की जीत है, या मुहम्मद (सल्ल) की मृत्यु के कुछ साल बाद मिलने वाली बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत। 






सूरह 3: आल-इमरान

[इमरान का ख़ानदान/The Family of Imran]


आयत 33 में "इमरान के ख़ानदान" का ज़िक्र आया है, वहीं से इस सूरह का नाम पड़ा है। सूरह के शुरू में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि क़ुरआन अपने से पहले आयी हुई आसमानी किताबों की सच्चाई की पुष्टि करती है, और आगे चलकर यह बताया गया है कि ईमान का केंद्रीय सिद्धांत एक अल्लाह की भक्ति है (आयत 19-20). ज़करिया, मरियम और ईसा (अलै) की पैदाइश की कहानियाँ आयत 35-64 में आई हैं, और इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि आदम (अलै) की तरह ईसा (अलै) भी बिना बाप के पैदा किए गए थे। ईसा अलै. के बारे में ईसाइयों की मान्यता को चुनौती दी गई है। मक्का के बुतपरस्तों के साथ बद्र और उहुद की लड़ाइयों के कई पहलुओं पर बात हुई है, ख़ासकर उहुद की लड़ाई (625 ई./ 3 हिजरी) में मुसलमानों द्वारा अपने रसूल के हुक्म को पूरी तरह न मानने के नतीजे में हार का मुंह देखने पर भी चर्चा की गई है। इस सूरह में मुसलमानों और कुछ ख़ास ईसाइयों और यहूदियों के बीच बढ़ते हुए तनाव के बारे में बयान हुआ है (65-85 और 98-101), और अंत में मुसलमानों और कुछ किताबवालों के बीच ईमान और आचरण में एकता की बात कही गई है, और यह बताया गया है कि इन सभी लोगों को अल्लाह की तरफ़ से इनाम दिया जाएगा (आयत 199).

  

विषय:


02-09: सच्चाई के साथ किताब उतारी गई है 

10-17: विश्वास रखने वालों और इंकार करने वालों का अंजाम 

18-20: इस्लाम ही सच्चा दीन है 

21-27: यहूदियों की कड़ी निंदा 

28-32: विश्वास न करने वालों के साथ गठजोड़ करने पर चेतावनी 

33-34: अल्लाह के चुने हुए लोग 

35-41: मरियम, ज़करिया और यहया (अलै) की कहानी 

42-47: ईसा (अलै) की पैदाइश की ख़बर सुनाना 

48-58: ईसा (अलै) का मिशन और उनकी दिखाई गई निशानियाँ 

59-63: ईसा इंसान हैं, ख़ुदा के बेटा नहीं 

64-68: किताबवाले लोगों से अपील: इबराहीम मुस्लिम थे 

69-85: किताबवाले लोगों की निंदा 

86-91: सच्चाई पर विश्वास करके फिर इंकार करने वालों को चेतावनी 

92 : अपनी पसंदीदा चीज़ अल्लाह के रास्ते मे दे देना 

93-95: यहूदियों के खाने-पीने के नियम 

96-97: हज करना ईमानवालों का कर्तव्य है

98-99: किताबवाले लोगों को चेतावनी 

100-109: ईमानवालों को चेतावनी 

110-112: मुस्लिम सभी समुदायों में से सबसे अच्छा है

113-117: किताबवालों में से अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखने वाले लोग भी हैं 

118-120: बाहर के लोगों के साथ घनी दोस्ती का रिश्ता न रखो 

121-129: जंग (उहुद) में हार जाने  के बाद का संबोधन 

130-131: ब्याज पर क़र्ज़ देने की निंदा 

132-136: जन्नत का वादा 

137-138: सज़ा की धमकी 

139-151: जंग में हार के बाद का संबोधन (जारी) 

152-155: हार की व्याख्या 

156-160: मौत पर मातम मनाने वालों को दिलासा 

161-165: निष्ठा दिखाने की अपील 

166-175: हार की व्याख्या (जारी) 

176-180: विश्वास न करने वालों को धमकी, ईमानवालों का उत्साह बढ़ाना 

181-189: यहूदियों की निंदा 

190-195: ईमानवालों की दुआ क़बूल हुई 

196-198: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

199 : किताबवालों में से ईमानवाले भी हैं 

200 : अंतिम बात  




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है



अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)


अल्लाह के सिवा कोई पूजने के लायक़ (ख़ुदा) नहीं: हमेशा ज़िंदा रहनेवाला, पूरी कायनात को सम्भाले रखनेवाला और हर चीज़ पर नज़र रखनेवाला है। (2)


(ऐ रसूल), उसने आप पर सच्चाई के साथ (थोड़ा-थोड़ा करके) किताब उतार भेजी हैजो पहले आयी हुई (किताबों) की सच्चाई की पुष्टि करती है: उसने (इससे) पहले तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] उतारी थी (3)


और उसी ने (अब) लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और (सही और ग़लत के बीच) अंतर को स्पष्ट कर देनेवाली "फ़ुरक़ान" [क़ुरआन] भी उतार भेजी है। जो लोग अल्लाह की आयतों (की सच्चाई) को मानने से इंकार करते हैं, तो वे (सही को छोड़कर ग़लत का साथ देने के नतीजे में) कठोर यातना झेलेंगे: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपराधियों को) कड़ी सज़ा देनेवाला है। (4)


आसमान या ज़मीन की कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह से छिपी हुई हो: (5)


वही है जो माँ की कोख में, जिस तरह चाहता है, तुम सबकी शक्ल-सूरत बना देता है। उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, वह बहुत ताक़तवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है: (6)


वही है जिसने [ऐ रसूल], आप पर किताब उतारी है। इस (किताब) की कुछ आयतें तो ऐसी हैं जिनके मतलब साफ़ व स्पष्ट हैं और वही इस किताब की असली बुनियाद हैं। कुछ  दूसरी आयतें ऐसी हैं जिनके मतलब स्पष्ट और अटल नहीं हैं। तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ेपन का रोग है, वे ऐसी ही आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जिनके मतलब सीधे व स्पष्ट नहीं हैं, ताकि वे गड़बड़ी फैला सकें, और लोगों को उन (आयतों) के मन-मर्ज़ी के मतलब मान लेने पर ज़ोर दे सकें: सही मतलब तो केवल अल्लाह ही जानता है। मगर जो लोग पक्का ज्ञान रखते हैं, वे (उन आयतों के पीछे नहीं पड़ते जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं, बल्कि) कहते हैं, "हम उन पर ईमान रखते हैं; ये सब कुछ हमारे रब की ओर से है" ----- सच्चाई की बातों से तो केवल वही लोग शिक्षा लेते हैं जो सचमुच समझ-बूझ रखते हैं -----  (7)

 

 (ऐसे लोगों की यही दुआ होती है),  "हमारे रब! हमें सीधे व सही रास्ते पर लगा देने के बाद हमारे दिलों को डांवाडोल न कर, और हम पर अपनी ख़ास दया कर: सचमुच तू हमेशा देनेवाला है, कि देने में तुझसे बढ़कर कोई नहीं!  (8)


हमारे रब! इस बात में कोई शक नहीं कि तूने उस (क़यामत के) दिन सब लोगों को अपने सामने (हिसाब-किताब के लिए) इकट्ठा करने का वादा कर रखा है: अल्लाह अपना वादा कभी नहीं तोड़ता।"  (9)



(सच्चाई से) इंकार करनेवालों को अल्लाह के मुकाबले में न तो उनकी धन-दौलत किसी काम आएगी और न ही उनकी औलाद। ये वह लोग हैं जो (जहन्नम की) आग का ईंधन बनकर रहेंगे,  (10)


ठीक वैसे ही जैसे फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों और उनसे पहले के लोगों ने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, और अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों की सज़ा दी: (याद रहे!) अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है।  (11)


[ऐ रसूल!], विश्वास न करनेवालों से कह दें, "तुम (सच्चाई की ताक़त से) जल्द ही हरा दिए जाओगे और जहन्नम की तरफ़ एक साथ हँकाए जाओगे, और जहन्नम क्या ही बुरा ठिकाना है!" (12)


तुम तो पहले ही एक निशानी देख चुके हो जब (बद्र की) लड़ाई में दो सेनाएं एक दूसरे के आमने-सामने हुई थीं, उनमें एक दल तो अल्लाह के रास्ते में लड़ रहा था, जबकि दूसरा दल विश्वास न करनेवालों का था। [ईमानवालों ने] अपनी आँखों से देखा कि विश्वास न करनेवालों की संख्या दोगुनी है (फिर भी वे जंग में हार गए), मगर अल्लाह जिसे चाहता है, उसकी मदद कर देता है। जो देखने की नज़र रखते हैं, उन सभी लोगों के लिए इस (घटना) में सीखने का सचमुच एक बड़ा सबक़ है। (13)


(इस दुनिया में) मनपसंद चीज़ों से होने वाले लगाव को आदमी के लिए बड़ा लुभावना बनाया गया है ----- औरतें, बच्चे, सोने-चाँदी के ढेर, निशान लगे (चुने हुए) घोड़े, चौपाए और खेती-बाड़ी---- ये चीज़ें इस दुनिया के मज़े उठाने के लिए हो सकती हैं, मगर लौटकर जाने की सबसे अच्छी जगह तो अल्लाह के पास ही है। (14)


[ऐ रसूल], उनसे कह दें, "क्या मैं तुम्हें ज़िंदगी के उन (फ़ायदे की) सारी चीज़ों से भी बेहतर चीज़ बता दूँ?" जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनका रब उन्हें (जन्नत के ऐसे) बाग़ अता करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। पाक-साफ़ (मियाँ/बीवी के) जोड़े उनके साथ होंगे, और (सबसे बढ़कर) अल्लाह की ख़ुशी उन्हें प्राप्त होगी ----- अल्लाह अपने बन्दों का पूरा हाल जानता है---- (15)


ये वह बंदे हैं जो कहते हैं, "हमारे रब, हम ईमान रखते हैं, अतः तू हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हमें (जहन्नम की) आग की यातना से बचा ले," (16)


ये वह लोग हैं जो (मुसीबत में) धैर्य से काम लेनेवाले, सच बोलनेवाले, और भक्ति में सचमुच डूबे हुए हैं, जो (अल्लाह के रास्ते में) दूसरों को देते हैं और रात की अंतिम घड़ियों में (सोने के बजाय) अल्लाह के सामने (नमाज़ के लिए) खड़े होकर माफ़ी की दुआ करते हैं।"  (17)


अल्लाह ख़ुद इस बात की गवाही देता है कि उसके सिवा कोई (पूजने के लायक़) ख़ुदा नहीं, फ़रिश्ते भी इसी की गवाही देते हैं, और वे लोग भी जो ज्ञान रखते हैं। उसी ने (पूरी कायनात को) इंसाफ़ के साथ सम्भाल रखा है। उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है, वह ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।   (18)


अल्लाह की नज़र में सच्चा दीन (धर्म) तो "इस्लाम" ही है: (यानी केवल अकेले अल्लाह की भक्ति)। जिन लोगों को किताब दी गयी थी, उन्होंने दुश्मनी के चलते अपनी असहमति जताई, और वह भी तब, जबकि उन्हें इसके बारे मेें ज्ञान दिया जा चुका था ----- अगर कोई भी अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करेगा, तो (याद रखो), अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।  (19)


(ऐ रसूल), अगर वे आपसे बहस करें, तो आप कह दें, "मैंने तो अपने आपको केवल एक अल्लाह की भक्ति में समर्पित कर दिया है, और ऐसा ही मेरे पीछे चलने वालों ने भी किया है।" उन लोगों से पूछें जिन्हें किताब दी गयी थी, और उनसे भी जिन्हें किताब नहीं दी गयी है कि "क्या तुम भी अपने आपको केवल एक अल्लाह की भक्ति में समर्पित करते हो?" अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें सीधा मार्ग दिखा दिया जाएगा, लेकिन अगर वे मुँह मोड़ें, तो आपका काम तो केवल संदेश पहुँचा देना है। अल्लाह अपने बन्दों को जानता है। (20)



उन लोगों को दर्दनाक यातना की ख़बर सुना दें, जो लोग अल्लाह की आयतों पर ध्यान नहीं देते, जो नबियों को अन्यायपूर्ण तरीक़े से क़त्ल करते हैं, और उनकी भी हत्या  करते हैं जो (लोगों के साथ) न्याय करने का हुक्म देते हैं: (21)


ऐसे लोगों का सब किया-धरा, इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी, अकारथ गया, और उनकी मदद करनेवाला कोई न होगा। (22)


[ऐ रसूल], क्या आपने उन (यहूदी) लोगों को नहीं देखा जिन्हें (अल्लाह की) किताब का एक हिस्सा दिया गया था? जब उनसे कहा जाता है कि वे अल्लाह की किताब से होने वाले फ़ैसले को स्वीकार कर लें, तो उनमें से कुछ लोग पीठ फेरकर वहाँ से चल देते हैं,  (23)


यह सब इसलिए कि वे कहते थे, "(जहन्नम की) आग हमें गिनती के कुछ दिनों के सिवा, छू ही नहीं सकती।" जो झूठ उन्होंने गढ़ रखा है, उसने दीन के मामले में उन्हें धोखे में डाल रखा है। (24)


उस वक़्त उनका क्या हाल होगा, जब उस (क़यामत के) दिन, जिसके आने में कोई शक नहीं, हम उन्हें अपने सामने इकट्ठा करेंगे और जब हर एक जान ने अपने कर्मों से जो कुछ कमाया होगा, उसका पूरा-पूरा बदला मिल जाएगा, और किसी के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (25)



[ऐ रसूल!] आप कहें, "ऐ अल्लाह! ऐ हर चीज़ पर नियंत्रण रखनेवाले बादशाह! तू जिसे चाहे राज-पाट दे दे और जिससे चाहे राज-पाट छीन ले; जिसे चाहे उसका दर्जा बढ़ाकर इज़्ज़त दे दे और जिसको चाहे उसकी इज़्ज़त गिरा दे। सारी भलाई तेरे ही हाथ में है: तुझे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (26)


"तूने रात ऐसी बनायी कि दिन से लिपटती जाती है, और दिन रात से लिपटता जाता है; तू बेजान चीज़ से जीवित चीज़ को निकाल लाता है और जानदार चीज़ से बेजान चीज़ को निकाल लाता है; तू जिसे चाहता है, बेहिसाब देता है।" (27)




ईमानवालों को चाहिए कि वे दूसरे ईमानवालों को छोड़कर विश्वास न करनेवालों को अपना रखवाला या मददगार न बनाएँ ---- जो कोई ऐसा करेगा, वह अपने आपको अल्लाह से पूरी तरह अलग-थलग कर लेगा ----- सिवाय इसके कि जब तुम्हें उन (के ज़ुल्म) से अपने आपको बचाने की नौबत आ जाए (तो ऐसा कर सकते हो)। अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि उससे डरकर रहो: अंत में (सबको) लौटकर उसी के पास जाना है।  (28)


(ऐ रसूल) आप कह दें, "जो कुछ तुम्हारे दिलों के अंदर है, उसे अल्लाह जानता है, चाहे तुम उसे छिपाओ या सबके सामने ज़ाहिर कर दो; वह आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ जानता है; अल्लाह की ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है।" (29)


एक दिन आएगा जिस दिन किसी आदमी ने भलाई का जो भी काम (दुनिया में) किया होगा, (उसका बदला) वह अपने सामने मौजूद पाएगा, और बुराई का भी जो काम किया होगा (उसे भी सामने देखकर) वह कामना करेगा कि काश! उसके और उसके बुरे कर्मों के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता (कि ऐसा दर्दनाक नतीजा उसके सामने न आता!)अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि तुम उससे डरकर (बुराई से बचते) रहो, मगर अल्लाह अपने बंदों के लिए बड़ी मेहरबानी रखनेवाला है। (30)


आप उन लोगों से कह दें, "अगर तुम सचमुच अल्लाह से प्यार करते हो, तो तुम्हें चाहिए कि मेरे बताए हुए तरीक़े पर चलो, (अगर तुमने ऐसा किया) तो अल्लाह भी तुमसे प्यार करने लगेगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा; अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (31)


कह दें, "अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, "लेकिन अगर वे मुँह मोड़ लें तो (जान लो), अल्लाह उन लोगों से प्यार नहीं करता, जो (उसके हुक्म को) मानने से इंकार करते हैं। (32)



अल्लाह ने आदम [Adam], नूह [Noah], इबराहीम [Abraham] के ख़ानदान, और इमरान के ख़ानदान को तमाम दूसरे लोगों के मुक़ाबले में चुन लिया था,  (33)


एक नस्ल के रूप में, जिसमें से एक पीढ़ी, दूसरी पीढ़ी से पैदा हुई ----- अल्लाह सब (दुआएं) सुननेवाला, सब जाननेवाला है। (34)


(जब ऐसा हुआ था कि) इमरान की बीवी ने दुआ की, "मेरे रब! जो बच्चा मेरे पेट में पल रहा है उसे मैं (दुनिया के कामों से अलग करके) पूरी तरह से तुझे अर्पित करती हूं; अतः तू उसे मेरी तरफ़ से स्वीकार कर। तू ही है जो सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाला है।" (35)


मगर जब उसके यहाँ बच्ची ने जन्म लिया, तो कहने लगीं, "मेरे रब! मैंने तो एक लड़की को जन्म दिया है" ----- अल्लाह तो जानता ही था कि उसके यहाँ क्या पैदा हुआ था: और लड़का तो लड़की के जैसा नहीं होता ---- "मैंने उसका नाम मरयम [Mary] रखा है और मैं उसे और उसकी नस्ल को तेरी शरण में देती हूँ, ताकि ठुकराए हुए शैतान से सुरक्षित रहे।" (36)


उसके रब ने बड़ी ख़ुशी से उसे स्वीकार कर लिया और बड़े अच्छे माहौल में उसे परवान चढ़ाया; और ज़करिया [Zachariah] को उसके देखभाल की ज़िम्मेदारी दे दी। जब कभी ज़करिया उससे मिलने के लिए उसके हुजरे [sanctuary] में जाता (जहाँ वह इबादत करती थी), तो उसके पास खाने-पीने की चीज़ें पाता। उसने पूछा, "ऐ मरयम! ये चीज़ें तुझे कहाँ से मिलती हैं?" उसने जवाब दिया, "यह अल्लाह की तरफ़ से है: अल्लाह जिसे चाहता है, बेहिसाब देता है।” (37)


उसी वक़्त ज़करिया ने अपने रब से यह कहते हुए दुआ की,  "ऐ मेरे रब! तू अपने फ़ज़ल से मुझे नेक व अच्छी औलाद प्रदान कर: बेशक, तू हर दुआ का सुननेवाला है।" (38)



फिर फ़रिश्तों ने ज़करिया को आवाज़ दी, जबकि वह इबादत की जगह [मेहराब] में खड़ा नमाज़ पढ़ रहा था, "अल्लाह, तुझे यह्या [John] (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी देता है, जो अल्लाह के शब्दों [Words] (यानी ईसा) की पुष्टि करनेवाला होगा। वह लोगों का सरदार होगा और (सेक्स की) इच्छाओं को क़ाबू में रखने वाला होगा, नबी होगा, और नेक व अच्छे लोगो में से एक होगा।" (39)


उसने पूछा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे पैदा हो सकता है जबकि मैं बूढ़ा हो चुका हूँ, और मेरी बीवी बाँझ है?" (एक फ़रिश्ते ने) कहा, "ऐसा ही होगा: अल्लाह जो चाहता है, करता है।" (40)


उसने कहा, "मेरे रब, इस बारे में मुझे कोई निशानी बता दे।"  (फ़रिश्ते ने) कहा, "तुम्हारे लिए निशानी यह होगी कि तुम तीन दिन तक किसी से भी कोई बातचीत नहीं करोगे, सिवाय इशारों से बात बताने के। (इस दौरान) अपने रब को ज़्यादा से ज़्यादा याद करो; और उसकी बड़ाई शाम के समय और सुबह-सवेरे भी बयान करते रहो।" (41)



(उस समय का हाल सुनें) जब फ़रिश्तों ने मरयम से कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह ने तुम्हें चुन लिया है और तुम्हें (बुराइयों से) पवित्र कर दिया है: उसने सचमुच तुम्हें दुनिया की सारी औरतों के मुक़ाबले में चुनकर तुम्हारा दर्जा बढ़ाया है।  (42)


 "ऐ मरयम! पूरी निष्ठा के साथ अपने रब की भक्ति में लगी रहो, इबादत में अपने आपको (रुकू में) झुकाओ, और नमाज़ में झुकने वालों के साथ तुम भी (सज्दे में) झुकती रहो।" (43)


[ऐ रसूल], हमने आपको जो यह हाल सुनाया, वह आपकी जानकारी में नहीं था जिसे हमने 'वही' [Revelation] द्वारा आपको बताया: आप उस वक़्त उन लोगों के बीच मौजूद न थे जब उन (पुजारियों) ने इस बात को तय करने के लिए कि कौन मरयम की देखभाल करेगा, पाँसे [lots] फेंके थे, और आप उस वक़्त भी नहीं थे जब वे (मरयम के बारे में) आपस में झगड़ रहे थे।  (44)



(और फिर) जब ऐसा हुआ कि फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह तुझे अपने 'कलाम' [Word] के द्वारा (एक लड़के की) ख़ुशख़बरी  देता है, जिसका नाम मसीह [Messiah], ईसा [Jesus] होगा और वह 'मरयम का बेटा' कहलाएगा, जिसकी इस दुनिया में और आने वाली दुनिया में भी बड़ी इज़्ज़त होगी, और वह अल्लाह के यहाँ बड़ा पहुँचा हुआ और उसके नज़दीकी बंदों में से होगा। (45)


वह लोगों से उस वक़्त भी बात करेगा जब वह छोटा बच्चा होगा, और तब भी जब जवान होगा। वह नेक व अच्छे लोगों में से होगा।  (46)


(मरयम यह सुनकर) कहने लगी, "ऐ मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे हो सकता है, जबकि मुझे किसी मर्द ने छुआ तक नहीं?" (फ़रिश्ते ने) कहा, "अल्लाह जो चाहता है, इसी तरह पैदा कर देता है: वह जब किसी काम को करने का फ़ैसला कर लेता है, तो बस इतना ही कहता है, 'हो जा', और वह हो जाता है।”   (47)


और अल्लाह उस (होने वाले बच्चे) को किताब और समझ-बूझ की शिक्षा देगा, और तौरात [Torah] और इंजील Gospel] का भी ज्ञान देगा,  (48)


 "वह उसे रसूल बनाकर इसराईल की संतान की ओर भेजेगा: (वह कहेगा),  "मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक निशानी लेकर आया हूँ: मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से चिड़िये जैसी आकृति बनाउंंगा, फिर उसमें फूँक मारुंगा और, अल्लाह के हुक्म से वह सचमुच की चिड़िया बन जाएगी; मैं अंधे और कोढ़ी को भला-चंगा कर दूँगा, और मुर्दे को अल्लाह की इजाज़त से फिर से ज़िंदा कर दूँगा; और मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ अपने घरों में इकट्ठा करके रखते हो। अगर तुम सचमुच ईमानवाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है।"    (49)


"मैं तौरात, जो मुझ से पहले आयी है, की सच्चाई की पुष्टि करता हूँ और इसलिए आया हूँ कि तुम्हारे लिए (आसानी पैदा करते हुए खाने की) कुछ उन चीज़ों को हलाल [वैध/ lawful] कर दूँ जो हराम [forbidden] हुआ करती थीं। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक निशानी लेकर आया हूँ। तो अल्लाह से डरो, और मेरी आज्ञा मानो:  (50)


"अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है, अतः तुम उसी की बन्दगी करो ----- यही सीधा मार्ग है।" (51)



फिर जब ईसा ने महसूस किया कि (उनकी बातों पर अभी तक) वे विश्वास नहीं करते, तो उसने कहा, "कौन है जो अल्लाह के रास्ते में मेरी मदद करेगा?" इस पर उनके शिष्यों [हवारियों] ने कहा, "हम अल्लाह के (काम में) मददगार होंगे; हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं ----- और आप गवाह रहें कि उसकी भक्ति में हमारा सिर झुक गया है।   (52)


ऐ रब! तूने जो कुछ उतारा है, हम उसपर विश्वास करते हैं और तेरे रसूल के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं: अत: हमारी भी गिनती उन लोगों में हो जो (सच्चाई की) गवाही देने वाले हैं।" (53)


फिर ऐसा हुआ कि उन यहूदियों ने (मसीह के ख़िलाफ़) अपनी चालें चलीं, तो अल्लाह ने भी अपनी चालों से उसका तोड़ किया, और अल्लाह (अगर चाल चलने पर आए, तो उस) से अच्छी चाल कोई नहीं चल सकता।  (54)



(और फिर) जब अल्लाह ने कहा, "ऐ ईसा! मैं तुझे (दुनिया से) वापस ले लूँगा और तुझे अपनी ओर उठा लूँगा: मैं तुझे विश्वास न करनेवालों (द्वारा दिए जाने वाले दर्द) से तुझे आज़ाद [पाक] कर दूँगा। तेरे मानने वालों को क़यामत के दिन तक उन लोगों से ऊँचा रखूँगा, जिन्होंने विश्वास नहीं किया। फिर तुम सबको लौटकर मेरे ही पास आना है और फिर मैं तुम्हारे बीच उन बातों का फ़ैसला कर दूँगा, जिनके बारे में तुम मतभेद रखते हो।  (55)


"तो जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया, उन्हें इस दुनिया में और आने वाली दुनिया में भी कड़ी यातना झेलनी पड़ेगी; (इस यातना से बचाने में) उनकी कोई मदद नहीं करेगा।" (56)


जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, अल्लाह उनके कर्मों का उन्हें पूरा-पूरा बदला देगा; अल्लाह अत्याचार करने वालों को पसन्द नहीं करता। (57)



(ऐ मुहम्मद), ये अल्लाह की आयतें हैं, समझ-बूझ की, याद दिलाने वाली और फ़ैसला कर देनेवाली बातें हैं जो हम आपको सुना रहे हैं।   (58)


अल्लाह की नज़रों में ईसा [Jesus] की मिसाल ठीक आदम [Adam] जैसी है: अल्लाह ने आदम को मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, "हो जा", और वह हो गया। (59)


यह तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई है, अत: तुम उनमें से न हो जाना जो संदेह में पड़े रहते हैं।  (60)


[ऐ रसूल], अब जबकि आपको (ईसा के इंसान होने की) बात की जानकारी दे दी गयी, अगर इस बात पर (कि वह ख़ुदा थे) कोई आपसे बहस करता है, तो कह दें, "आओ, हम अपने बेटों को बुला लें और तुम भी अपने बेटों को बुला लो, हम अपनी औरतों को बुला लें और तुम भी अपनी औरतों को बुला लो, हम अपने लोगों को और तुम अपने लोगों को ले आओ, फिर (सब मिलकर) सच्चे मन से दुआ करें और हममें से जो झूठ बोल रहा हो, उस पर अल्लाह की फिटकार [rejection] हो!" (61)


(ऊपर जो बताया गया) यही है इस मामले की सच्चाई: अल्लाह के अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं; अल्लाह महान, और फ़ैसला करनेवाला है। (62)


अगर वे (सबको जमा करने के तरीक़े से) मुँह मोड़ते हैं, तो (जान रखो) कि जो कोई भी बिगाड़ पैदा करता है, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (63)


आप कहें, "ऐ किताबवालो [यहूदी और ईसाई], आओ हम मिलकर एक ऐसी विचारधारा बनाएं, जो हम सबके लिए एक समान और मान्य हो: हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें, हम अल्लाह के साथ किसी को साझेदार [Partner] न ठहराएँ और हममें से कोई भी अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना रब न बनाए।" फिर अगर वे (इस बात से) मुँह मोड़ें, तो कह दें, "गवाह रहना, हम तो अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकनेवाले हैं।" (64)



"ऐ किताबवालो! तुम इबराहीम के बारे में क्यों बहस करते हो (कि वह यहूदी था कि ईसाई)? जबकि तौरात और इंजील तो उसके समय के बहुत बाद तक भी नहीं उतरी थी? क्या तुम (इतनी मोटी सी बात) नहीं समझते? (65)


"जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ जानकारी रखते हो, उन चीज़ों पर तो तुम बहस करते ही हो, मगर जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते, उन पर क्यों झग़ड़ते हो? अल्लाह (सब कुछ) जानता है, तुम कुछ नहीं जानते।" (66)


इबराहीम न तो यहूदी था और न ईसाई। वह तो एक सीधा और सच्चा आदमी था, जिसने अल्लाह की भक्ति में अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, और वह कभी किसी और को अल्लाह के साथ जोड़ने वाला [मुशरिक] न था,   (67)


और इबराहीम से सबसे ज़्यादा नज़दीक तो वे लोग हैं जो उनके बताए हुए रास्ते पर सचमुच चलते हैं, यह नबी हैं, और (सच्चे) ईमानवाले लोग हैं------ अल्लाह (सच्चे) ईमानवालों के नज़दीक होता है। (68)



किताबवालों में से कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी दिली तमन्ना है कि तुम्हें [ईमानवालों को] किसी तरह सही रास्ते से भटका दें, मगर वे ऐसा करके केवल अपने-आपको  ही गुमराह कर रहे हैं, हालाँकि उन्हें इसका एहसास नहीं है।  (69)


ऐ किताबवालो! तुम अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार क्यों करते हो, जबकि तुम देख सकते हो कि ये सच हैं? (70)


ऐ किताबवालो, तुम सच और झूठ को आपस में मिला क्यों देते हो? तुम सच्चाई को छिपाते क्यों हो, जबकि तुम जानते हो (कि असलियत क्या है)? (71)


किताबवालों में से कुछ लोग कहते हैं, "इन ईमानवालों [मुसलमानों] पर जो कुछ (संदेश) उतरा है, उस पर सुबह सवेरे के समय विश्वास कर लो, और फिर शाम ढले उसे ठुकरा दो, ताकि ईमानवाले भी (अपने दीन से) पीठ फेर लें,  (72)


[वे आगे कहते हैं], मगर मन से किसी पर भी उस वक़्त तक विश्वास न कर लेना, जब तक कि वह तुम्हारे अपने दीन के रास्ते पर न चलने लगें" ----- [ऐ रसूल], उनसे कह दें, "सच्चा मार्गदर्शन तो वही है जो अल्लाह का दिया हुआ मार्गदर्शन है"-------[वे कहते हैं], "इस चीज़ पर विश्वास मत कर लेना कि किसी और को भी (अल्लाह की तरफ़ से) वैसी ही किताब दी जा सकती है जैसी किताब तुम्हें दी गयी थी, या यह कि वे तुम्हारे रब के सामने इस (किताब) का इस्तेमाल तुम्हारे ख़िलाफ़ बहस करने में कर सकें।" [ऐ रसूल], कह दें, "(किसी पर) अपना फ़ज़ल व करम [grace] करना, पूरा का पूरा अल्लाह के हाथ में है: वह जिसे चाहता है उसे मालामाल  कर देता है------ वह बड़े फैलाववाला, सब कुछ जाननेवाला है---- (73)


और वह जिसे चाहता है अपनी रहमत [दयालुता] के लिए चुन लेता है। उसके फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है।" (74)



किताबवाले लोगों में कुछ तो ऐसे हैं कि अगर [ऐ रसूल], आप उनके पास अमानत के तौर पर सोने का ढेर भी रख दें, तो वे आपको पूरा का पूरा लौटा देंगे, मगर उनमें से कुछ दूसरे ऐसे भी हैं जिनके पास अगर एक दीनार भी अमानत में रख दें, तो जबतक कि आप उनके सिर पर सवार न हों, वे उसे आपको नहीं लौटाएंगे, यह इसलिए कि वे कहते हैं, "जो (अरब के) लोग किताबवाले नहीं हैं, उनके साथ लेन-देन में हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।" इस तरह, वे अल्लाह के नाम से झूठ बोलते हैं, और वे ऐसा जान-बूझकर करते हैं। (75)


(ज़िम्मेदारी कैसे) नहीं? अल्लाह तो उन्हें  पसंद करता है, जो (किसी के साथ भी लेन-देन में) अपना वचन निभाते हैं और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं,  (76)


मगर वे लोग जो अल्लाह से की गयी प्रतिज्ञा और अपनी क़समों को मामूली दाम में बेच देते हैं, उनका आनेवाली दुनिया में कोई हिस्सा नहीं होगा। क़यामत के दिन अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न उनकी तरफ़ देखेगा----- न वे (गुनाहों से) पाक-साफ़ किए जाएंगे ----- दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है।  (77)


उन [किताबवालों] में कुछ लोग ऐसे हैं जो किताब [तौरात] पढ़ते हुए अपनी ज़बानों को इस तरह से तोड़ते-मरोड़ते हैं, ताकि तुम (लोग) यह समझो कि वे जो कुछ कह रहे हैं, वह किताब का हिस्सा होगा, जबकि असल में वह किताब में से नहीं होता; वे कहते हैं, "यह अल्लाह की तरफ़ से है, जबकि असल में वह (अल्लाह की तरफ़ से) नहीं है; वे अल्लाह का नाम लेकर झूठी बातें थोपते हैं और वे ऐसा जान-बूझकर करते हैं।   (78)



कोई भी आदमी जिसे अल्लाह ने किताब, समझ-बूझ, और पैग़म्बरी दी हो, वह कभी भी लोगों से भला ऐसा कहेगा कि, "तुम अल्लाह के नहीं, मेरे बन्दे बनो?" [बल्कि वह तो यही कहेगा कि], "तुम्हारी भक्ति तो केवल अल्लाह के लिए होनी चाहिए, इसलिए कि तुम जो किताब पढ़ाते रहे हो और तुमने ख़ुद से जो पढ़ा और समझा है, उसका नतीजा तो यही होना चाहिए।" (79)


वह कभी भी तुम्हें इस बात का हुक्म नहीं दे सकता कि तुम फ़रिश्तों और नबियों को अपना रब बना लो। वह ऐसा हुक्म कैसे दे सकता है कि तुम विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] बन जाओ, जबकि तुम ख़ुद अपना सिर एक अल्लाह के सामने झुका चुके हो? (80)



याद करो जब अल्लाह ने नबियों से वचन लिया था और कहा था, "मेरी तरफ़ से तुम पर किताब और समझ-बूझ [हिकमत] उतारने के बाद, अगर ऐसा हो कि कोई (दूसरा) रसूल उस किताब की पुष्टि करता हुआ आ जाए जो किताब तुम्हारे पास है, तो तुम्हें उस पर विश्वास करना चाहिए और उसकी सहायता करनी चाहिए। क्या तुम मेरी कही गई बात को स्वीकार करते हुए मुझसे पक्की प्रतिज्ञा लेते हो?” उन्होंने कहा, "हाँ, हम लेते हैं।" अल्लाह ने कहा, "अच्छा तो गवाह रहना और मैं भी गवाह रहूँगा।" (81)


अब इसके बाद जो मुंह मोड़ ले, तो ऐसे ही लोग हैं जो प्रतिज्ञा तोड़ने वाले हैं।  (82)


क्या वे एक अल्लाह के सामने झुकने के बजाए किसी और दीन को पाना चाहते हैं? आसमानों और ज़मीन में हर एक उसी के आगे झुकता है, चाहे अपनी मर्ज़ी से झुके या मजबूर होकर; वे सब उसी के पास लौटकर जाएंगे। (83)



(ऐ रसूल) आप कहें, "हम [मुस्लिम] अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उस (किताब) पर जो हम पर उतारी गयी है, और उस पर भी जो इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael], इसहाक़ [Isaac], याकूब़ [Jacob] और उनकी सन्तान पर उतारी गयी। हम उस पर भी ईमान रखते हैं जो मूसा [Moses], ईसा Jesus], और दूसरे नबियों को उनके रब की तरफ़ से दिया गया। हम उन (नबियों) के बीच (दर्जे के हिसाब से) कोई अंतर नहीं करते। वह अल्लाह है, जिसके आगे हम ख़ुद को पूरी भक्ति से झुकाते हैं।" (84)


और (देखो!) अगर कोई पूरी भक्ति से अपना सिर (एक) अल्लाह के सामने झुकाने [इस्लाम] के बजाय किसी दूसरे दीन (धर्म) को पाना चाहता है, तो वह कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा: वह आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में उन लोगों में से होगा जो सख़्त नुक़सान उठाने वाले होंगे।  (85)


अल्लाह क्यों ऐसे लोगों को सही रास्ता दिखाएगा, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, हालाँकि वे पहले विश्वास कर चुके थे और उन्होंने यह मान लिया था कि यह रसूल सच्चा है, और जबकि उन्हें स्पष्ट प्रमाण दिखा दिया गया था? अल्लाह शैतानी करनेवालोंं को सही रास्ता नहीं दिखाता:  (86)


ऐसे लोगों (के ज़ुल्म) का बदला यही है कि उन्हें अल्लाह, फ़रिश्तों और सारे लोगों द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, (87)


और वे इसी हालत में रहेंगे, उनकी यातना न तो हल्की होगी और न ही उन्हें कोई मुहलत दी जाएगी।  (88)


हाँ, जो लोग इसके बाद तौबा [repent] कर लें और अपने आपको सुधार लें ---- तो अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है -----  (89)


जो लोग विश्वास कर लेने के बाद, ऐसे हो गए कि फिर अपने अविश्वास [कुफ़्र] में बढ़ते चले गए, उनकी तौबा स्वीकार नहीं की जाएगी। यही वे लोग हैं जो सीधे रास्ते से बहुत दूर जा पड़े हैं:  (90)


जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया और फिर इंकार की हालत में ही मर गए, तो वे किसी हालत में भी बच नहीं पाएंगे चाहे वे अपनी जान के बदले में पूरी धरती के बराबर सोना ही क्यों न दे दें। ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना रखी हुई है, और उनकी मदद करने वाला कोई न होगा। (91)


(ईमानवालो), तुममें से कोई भी उस वक़्त तक सही मायने में नेकी [piety] का दर्जा हासिल नहीं कर सकता, जब तक कि तुम उस चीज़ को (अल्लाह के रास्ते में) न दे दो, जो तुम्हें बहुत पसंद हो: जो कुछ भी तुम देते हो, उसके बारे में अल्लाह अच्छी तरह जानता है.  (92)



तौरात [Torah] के उतारे जाने के पहले इसराईल की संतान के लिए खाने की सारी चीज़ें हलाल [वैध/ lawful] थीं, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें इसराईल [याक़ूब अलै.] ने ख़ुद अपने लिए हराम [forbidden] कर लिया था। आप (यहूदियों से) कह दें, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो तौरात ले आओ और (उसकी प्रासंगिक बातें) पढ़कर सुनाओ। (93)


जो कोई इसके बाद भी झूठी बातें बनाने में लगा रहे और उन्हें अल्लाह के नाम से जोड़ दे, तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं।"  (94)


[ऐ रसूल], कह दें, "अल्लाह सच कहता है; अतः इबराहीम के बताए हुए तरीक़े पर चलो: वह ईमान का पक्का था और वह कभी भी अल्लाह के साथ किसी और को उसका साझेदार [Partner] माननेवाला नहीं था।"  (95)


"लोगों (की इबादत) के लिए जो सबसे पहला घर स्थापित किया गया, वह "मक्का" में था। यह बड़ी बरकतवाली [blessed] जगह है; और सारे लोगों के लिए सही रास्ता दिखाने का ज़रिया है;  (96)


"इसमें स्पष्ट निशानियाँ हैं; यह वह जगह है जहाँ इबराहीम नमाज़ के लिए खड़ा होता था; जो कोई इसके अंदर चला जाता है, वह सुरक्षित हो जाता है। जो लोग वहाँ तक जाने में समर्थ हैं, अल्लाह के प्रति उनका कर्त्तव्य है कि वह इस घर का हज करें। जो (इस जगह का महत्व नहीं समझते और) वहाँ जाने से इंकार करते हैं (उन्हें मालूम होना चाहिए कि) अल्लाह को किसी की ज़रूरत नहीं है।" (97)


आप कहें, "ऐ किताबवालो! तुम अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार क्यों करते होजो कुछ तुम करते हो, उसे अल्लाह देखता है।" (98)


कह दें, "ऐ किताबवालो! तुम ईमान रखनेवालों को अल्लाह के रास्ते से क्यों हटा देना चाहते हो और तुम उसके रास्ते में क्यों टेढ़ापन पैदा करना चाहते हो, जबकि तुम्हें ख़ुद ही सच्चाई की गवाही देनी चाहिए? और (याद रखो!) जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।" (99)



ऐ ईमानवालो! अगर तुम किताबवालों में से कुछ लोगों की बात मानने लगे, तो (याद रखो!) वे तुम्हें (सच्चाई के रास्ते से) भटका देंगे और ईमान रखने के बाद इंकार करनेवाला बनाकर छोड़ेंगे।  (100)


तुम (अब फिर) विश्वास करने से इंकार कैसे कर सकते हो, जबकि तुम्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाई जा रही हैं और उसका रसूल तुम्हारे बीच मौजूद है? (याद रखो), जिस किसी ने अल्लाह को मज़बूती से थाम लिया, उसे सीधा रास्ता दिखा दिया जाएगा। (101)


ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह का डर रखो, जैसा कि उससे डरने का हक़ है, और मरते दम तक, (एक) अल्लाह के आगे अपना सिर झुकानेवाले बनकर रहो।  (102)


और (देखो!) सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो; आपस में (मतभेद करके) टुकड़ों में न बंट जाओ। याद करो उन मेहरबानियों को जो अल्लाह ने तुम पर कीं: तुम तो एक-दूसरे के दुश्मन थे और फिर उसने तुम्हारे दिलों को आपस में जोड़ दिया और तुम उसकी कृपा से भाई-भाई बन गए; तुम आग के एक गड्ढे में गिरने ही वाले थे, और उसने तुम्हें इसमें गिरने से बचा लिया----- अल्लाह इसी तरह तुम्हें अपनी आयतों के मतलब समझाता है, ताकि तुम सही रास्ता पा सको।  (103)


(देखो!) तुम एक ऐसे समुदाय का हिस्सा बनो जो (लोगों को) अच्छाई की तरफ़ बुलाए, जो चीज़ सही है उसे करने का हुक्म दे, और जो ग़लत है उसे करने से रोके: जो लोग ऐसा करते हैं, वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं।  (104)


और (देखो!) तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्हें (अल्लाह की किताब जैसी) खुली निशानियाँ दी गयी थीं, इसके बावजूद वे (दीन के मामलों में) टुकड़ों में बँट गए और आपस में झगड़ने लगे: ऐसे लोगों को बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी।  (105)


एक दिन आएगा जब कुछ चेहरे चमक रहे होंगे और कुछ चेहरे काले पड़ जाएँगे, तो जिनके चेहरे काले पड़ गए होंगे, उनसे कहा जाएगा,  "एक बार (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने के बाद तुम कैसे ईमान को ठुकरा सकते हो? तो ऐसा करने के नतीजे में अब यातना का मज़ा चखो," (106)


मगर वे लोग जिनके चेहरे चमकते होंगे, वे अल्लाह की रहमत की छाया में होंगे, वे उसी में हमेशा के लिए रहेंगे।  (107)


ये अल्लाह की आयतें हैं: [ऐ रसूल], हम इसे सच्चाई के साथ आपको सुना रहे हैं। अल्लाह संसारवालों पर किसी तरह का अन्याय करना नहीं चाहता।  (108)


(याद रखो!) आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है; और सारी चीज़ें अंत में अल्लाह की तरफ़ ही लौटने वाली हैं। (109)



[ईमानवालो], तुम एक बेहतरीन उम्मत [समुदाय] हो, जिसे लोगों (की भलाई) के लिए चुन लिया गया है: तुम उस काम का हुक्म देते हो जो सही है, और उस काम से रोकते हो जो ग़लत है, और अल्लाह पर (सच्चा) ईमान रखते हो। अगर किताबवाले लोगों ने भी विश्वास किया होता, तो यह उनके लिए बहुत बेहतर होता। हालाँकि उनमें से कुछ लोग तो (सच्चाई पर) ईमान रखते हैं, मगर ज़्यादातर लोग (अल्लाह का) क़ानून तोड़ने वाले हैं  ------- (110)


वे तुम्हारा ज़्यादा कुछ बिगाड़ नहीं सकते: अगर वे तुमसे लड़ने के लिए आएं भी, तो जल्द ही तुम्हें पीठ दिखाकर भाग जाएँगे; उन्हें कोई मदद नहीं मिलेगी -----  (111)


और, वे [यहूदी] जहाँ कहीं भी पाए जाएं, उन्हें अपमानित होने का ख़तरा मंडराता रहेगा, हाँ, अगर उन्हें अल्लाह की तरफ़ से या दूसरे इंसानों की तरफ़ से कोई सहारा मिल जाए जिसे वे मज़बूती से थाम लें तो और बात है। उन लोगों ने ख़ुद ही अपने ऊपर अल्लाह को ग़ुस्सा होने का मौक़ा दिया है। उनकी कमज़ोरियों ने भी उन्हें बदतर हाल में पहुँचाया है, यह इसलिए हुआ कि वे अल्लाह की आयतों को मानने से लगातार इंकार करते रहे, और नबियों को बिना किसी अधिकार के क़त्ल करते रहे, और यह जो कुछ हुआ, सब इस कारण से कि वे आज्ञा नहीं मानते थे, और उन्होंने (मर्यादा की) सारी हदें तोड़ रखी थीं। (112)


मगर वे सब एक जैसे नहीं हैं। किताबवालों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सीधे मार्ग पर हैं, वे रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं, और वे अल्लाह के सामने सिर झुकाए रहते हैं, (113)


वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, भलाई के काम करने का हुक्म देते हैं और बुराई के काम से रोकते हैं, और जो अच्छाई के कामों में तेज़ी दिखाते हैं। यही हैं जो अच्छे व नेक लोगों में से हैं  (114)


और जो कुछ वे नेकी के काम करते हैं, उसके इनाम से उन्हें वंचित नहीं किया जाएगा: अल्लाह को ठीक-ठीक मालूम है कि कौन उससे डरते हुए बुराइयों से बचनेवाला है। (115)



रहे वे लोग जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, तो अल्लाह के मुक़ाबले में न तो उनके माल कुछ काम आ सकेंगे और न उनकी सन्तान कोई मदद कर सकेगी ‌‌‌‌---- वे तो (जहन्नम की) आग में जाने वाले लोग हैं, उसी में वे हमेशा रहेंगे----  (116)


जो कुछ वे इस सांसारिक जीवन में ख़र्च करते हैं, वह सब बेकार हो जाएगा: उसकी मिसाल ऐसी है जैसे एक तेज़ बर्फ़ीली हवावाली आँधी आए और वह उन लोगों की खेती को बर्बाद कर जाए। (याद रहे!), अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि ख़ुद यही लोग अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे हैं। (117)



ऐ ईमानवालो! तुम बाहर के ऐसे लोगों को अपना घना दोस्त (और हमराज़) न बना लो, जो तुम्हें बर्बाद करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते और वे तुम्हें तकलीफ़ में फँसा देखना चाहते हैं: उनकी नफ़रत उनके मुँह से ज़ाहिर हो जाती है, मगर जो कुछ उनके दिलों में छिपा होता है, वह तो इससे कहीं ज़्यादा बुरा है। हमने अपनी आयतें तुम्हारे सामने स्पष्ट कर दी हैं; तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे?  (118)


ये मामला ऐसा ही है: देखो, तुम तो उन्हें पसंद करते हो, मगर वे तुम्हें पसंद नहीं करते; तुम सभी (आसमानी) किताबों पर ईमान रखते हो और वे जब तुम से मिलते हैं, तो कहने को तो कहते हैं कि "हम विश्वास करते हैं," मगर जब वे अकेले होते हैं, तो तुम पर क्रोध के मारे दाँतों से उँगलियाँ काटने लगते हैं। [ऐ रसूल], आप कह दें, "(अगर तुम ऐसा ही चाहते हो, तो) तुम अपने क्रोध में ही मर जाओ!" (याद रखो!) हर एक के दिलों में क्या है, अल्लाह को इसकी सटीक जानकारी है।" (119)


[ईमानवालो], अगर तुम्हारे साथ कुछ अच्छा हो जाए, तो वे दुखी हो जाते हैं और अगर कुछ बुरा हो जाए, तो वे बड़े ख़ुश हो जाते हैं। लेकिन (याद रखो!) अगर तुमने (मुसीबत में) धीरज से काम लिया और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहे, तो उनकी कोई चाल तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकेगी: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह ने उसे अपने धेरे में ले रखा है। (120)



[ऐ रसूल!] याद करें जब आप सुबह-सवेरे अपने घर से निकलकर (उहुद के मैदान में) लड़ाई  के लिए ईमानवालों को युद्ध के मोर्चों पर लगा रहे थे: अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।  (121)


(फिर जब ऐसा हुआ था कि) तुम्हारे [ईमानवालों के] दो गिरोह बस हिम्मत हारने ही वाले थे (कि मैदान छोड़ दें) और अल्लाह ने उन्हें बचा लिया था ----- ईमान रखनेवालों को (हर हाल में) अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए---- (122)


और (देखो!) बद्र (की जंग) में अल्लाह ने तुम्हारी मदद की थी, जबकि तुम्हारी हालत बहुत कमज़ोर थी। अतः (केवल) अल्लाह से डरो, ताकि तुम (उसकी नेमतों का) शुक्र अदा करने वाले बन सको। (123)


याद करें जब आप ने (बद्र की जंग में) ईमानवालों से कहा था, "अगर तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतारकर तुम्हारी सेना को मज़बूत कर दे, तो क्या तुम्हें संतोष हो जाएगा?" (124)


हाँ, देखो! अगर तुम धीरज के साथ अपने क़दम जमाए रखो और अल्लाह से डरते रहो, तो अगर दुश्मन अचानक भी तुम पर चढ़ आएँ, तो तुम्हारा रब (तीन हज़ार के बजाय) पाँच हज़ार झपट्टा मारनेवाले फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद कर देगा!" (125)


और अल्लाह ने यह व्यवस्था (इसलिए) की, जिसमें तुम्हारे लिए आशा का एक संदेश हो, ताकि तुम्हारे दिलों को चैन मिल जाए ------ मदद (और जीत) तो बस अल्लाह की ही तरफ़ से आती है, जिसकी ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है, और वह (हर काम में) बेहद समझ-बूझ रखनेवाला है -----  (126)


(और बद्र की लड़ाई में ऐसा इसलिए हुआ) ताकि विश्वास न करनेवालों की फ़ौज के एक हिस्से को बेकार कर दें और वे तंग हो जाएं, उन्हें ऐसी बुरी तरह हार हो कि वे मैदान छोड़कर लौट जाएं।  (127)


अब अल्लाह चाहे उनके साथ नर्मी बरते या उन्हें सज़ा दे, [ऐ रसूल!] इसका फ़ैसला आपके अधिकार में नहीं है: वे ज़ालिम हैं।  (128)


आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, सब अल्लाह का है। वह जिसे चाहे माफ़ कर दे और जिसे चाहे सज़ा दे: (याद रहे), अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (129)



ऐ ईमानवालो! क़र्ज़ के साथ ब्याज [interest] की कमाई से अपना पेट न भरो, जो (मूलधन से) दो गुना, चौगुना हो जाता है। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, ताकि तुम (अपने मक़सद में) कामयाब हो सको -----  (130)


और (देखो!) उस आग की यातना से बचो जो (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के लिए तैयार की गयी है ----- (131)


और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, ताकि तुम पर दया की जाए। (132)


अपने रब की तरफ़ (गुनाहों की) माफ़ी के लिए जल्दी से बढ़ो, और उस जन्नत [बाग़] की तरफ़ भी बढ़ो जिसका फैलाव इतना है कि उसमें सारे आसमान और ज़मीन समा जाएं, और वह उन लोगों के लिए तैयार की गयी है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं,   (133)


जो ख़ुशहाली में हों या तंगी में, दोनों हालतों में लोगों को देते रहते हैं, जो अपने ग़ुस्से को क़ाबू में रखते हैं, और लोगों की ग़लतियों को माफ़ कर देते हैं ------  अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद करता है, जो अच्छे काम करते हैं ----- (134)


ये वे लोग हैं जो कभी ग़लती से अगर कोई शर्मनाक गुनाह कर बैठते हैं, या अपनी जानों को मुसीबत में डाल लेते हैं, तो तुरंत ही उन्हें अल्लाह याद आ जाता है और वे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने लगते हैं ---- और अल्लाह के सिवा कौन है, जो गुनाहों को माफ़ कर सके? ---- और वे कभी भी जानते-बूझते अपनी ग़लती पर अड़े नहीं रहते।  (135)


ऐसे लोगों का इनाम उनके रब की तरफ़ से (उनके) गुनाहों की माफ़ी है, और ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उसी में वे हमेशा रहेंगे। और क्या ही अच्छा बदला है जो (नेक) कर्म करनेवालों को मिलेगा!  (136)



तुमसे पहले के ज़माने में भी अल्लाह की तरफ़ से लोगों के लिए नियम-क़ायदे रहे हैं: ज़मीन पर घूमो-फिरो और देखो कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों का अंजाम क्या हुआ।  (137)


यह लोगों की सीख के लिए साफ़ व स्पष्ट सबक़ है, और अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए मार्गदर्शन और शिक्षा लेने की चीज़ है। (138)


और (देखो!) हिम्मत न हारो और न दुखी हो ----- अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो (अंत में) तुम्हीं हावी रहोगे ------ (139)


अगर तुमने (उहुद की लड़ाई में) ज़ख्म खाया है, तो दुश्मनों को भी वैसा ही ज़ख्म (बद्र की लड़ाई में) लग चुका है। यह तो (हार-जीत के) आते जाते दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच बारी-बारी बदलते रहते हैं, ताकि अल्लाह को पता लग जाए कि कौन है जो सच्चा ईमान रखता है, और ताकि वह तुम्हारे बीच से शहीदों को चुन सके (जो सच्चाई की गवाही दे सकें) ----- और अल्लाह ज़ुल्म करने वालों को पसंद नहीं करता -------  (140)


और ताकि अल्लाह ईमान रखनेवालों को (उनकी कमज़ोरियों और भूल-चूक से) निखार दे और (सच्चाई से) इंकार करनेवालों को बर्बाद कर दे। (141)


[ईमानवालो], क्या तुमने यह समझ रखा था कि (केवल ईमान का दावा करके) तुम यूँ ही जन्नत में चले जाओगे, बिना अल्लाह द्वारा जाँचे-परखे हुए कि तुममें से कौन लोग हैं जो उसके रास्ते में जी-तोड़ संघर्ष [जिहाद] करने वाले हैं और कितने हैं जो (सख़्त मुश्किल में) अपने क़दम मज़बूती से जमाए रखने वाले हैं?  (142)


जब तक तुम्हारा सामना मौत से नहीं हुआ था, तुम (सच्चाई के रास्ते में) अपनी जान देने की कामना करते थे। लो, अब तो तुमने उसे अपनी आँखों से देख लिया है। (143)



मुहम्मद तो बस अल्लाह के एक रसूल हैं जिनके पहले भी बहुत से रसूल (अपने-अपने वक़्तों में) आए और गुज़र गए। अगर उनकी मौत हो जाए या उनकी हत्या कर दी जाए (जैसा कि उहुद की लड़ाई में अफ़वाहें फैली थीं), तो क्या तुम (सच्चाई का रास्ता छोड़कर) अपने पुराने तरीक़े पर फिर से लौट जाओगे? अगर किसी ने ऐसा किया, तो वह (अपना ही नुक़सान करेगा) अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा। जो लोग (नेमतों का) शुक्र अदा करनेवाले हैं, अल्लाह उन्हें जल्द ही इनाम देगा।  (144)


और (याद रखो!) अल्लाह की अनुमति के बिना कोई जान मर नहीं सकती, और हर जान के मरने का समय पहले से निर्धारित है। अगर कोई इस दुनिया के फ़ायदे को पाने की कोशिश में लगा रहता है, तो हम उसे इस दुनिया में से कुछ दे देंगे। अगर कोई आनेवाली दुनिया [आख़िरत] के फ़ायदे पर नज़र रखता है, तो हम उसे आख़िरत में से कुछ देंगे: हम (नेमतों का) शुक्र अदा करने वालों को ज़रूर इनाम देंगे। (145)


कितने नबियों ने बहुत सारे अल्लाहवाले बंदों के साथ मिलकर (सच्चाई के रास्ते में) युद्ध किया है, मगर ऐसा कभी नहीं हुआ कि अल्लाह के मार्ग में जो कुछ भी मुसीबत उन्हें झेलनी पड़ी, उससे उन्होंने हिम्मत हारी हो, कभी कमज़ोर पड़े हों या समर्पण किया हो: अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो (मुसीबत में) मज़बूती से जमे रहते हैं।  (146)


(कितनी मुसीबतें झेलीं, मगर) उन्होंने ज़बान से बस इतना ही कहा कि "ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे, हम से हमारे काम में जो ज़्यादतियाँ हो गई हों, उन्हें भी माफ़ कर दे। हमारे क़दम (सच्चाई की राह में) जमा दे, और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले लोगों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर," (147)


और इस तरह अल्लाह ने (उनके कर्मों को देखते हुए) इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में भी उन्हें बेहतरीन बदला दिया: अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो नेक काम करते हैं।  (148)



ऐ ईमानवालो! अगर तुम उन लोगों के कहने पर चलोगे जिन्होंने (सच्चाई से) इंकार करने का रास्ता अपनाया है, तो वे तुम्हें (सही रास्ते से हटाकर) तुम्हारे पुराने तरीक़े पर लौट जाने के लिए मजबूर कर देंगे और (नतीजे में) तुम बड़े घाटे में पड़नेवाले हो जाओगे। (149)


हरगिज़ (ये सच्चाई के दुश्मन तुम्हारे दोस्त) नहीं! यह तो अल्लाह है जो तुम्हारा रखवाला है: वह मदद करने वालों में सबसे अच्छा है। (150)


वह दिन दूर नहीं जब हम विश्वास न करनेवालों के दिलों में डर बैठा देंगे, इसलिए कि वे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) दूसरों को भी साझेदार [Partner] ठहराते हैं, जिनके लिए अल्लाह ने कोई सनद नहीं उतारी: उनका ठिकाना (जहन्नम की) आग होगा---- जो ज़ालिम हैं, उनका ठिकाना क्या ही बुरा ठिकाना है!  (151)


और (देखो!) अल्लाह ने (उहुद की जंग के लिए) तुम से (जीत का) जो वादा किया, उसे (शुरू में) पूरा कर दिखाया था: तुम अल्लाह की अनुमति से, उन (दुश्मनों) का सफ़ाया करने में लगे थे, और अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी पसंद की मंज़िल के इतने नज़दीक पहुँचा दिया था कि जीत दिखायी देने लगी थी, मगर उसके बाद तुम ढीले पड़ गए, (टीले वाले मोर्चे पर डटे रहने के) दिए गए निर्देश पर तुम आपस में झगड़ने लगे, और तुमने (अपने सरदार का) हुक्म नहीं माना ------ तुममें कुछ लोग ऐसे थे जो (युद्ध में लूट के सामान के रूप में) इस दुनिया का फ़ायदा चाहते थे और कुछ ऐसे थे जो (युद्ध में डटे रहे और शहीद हुए, कि वे) आनेवाली दुनिया के फ़ायदे चाहते थे ------और फिर अल्लाह ने तुम्हें सज़ा देने के लिए तुम को उन पर (जीत हासिल करने से) रोक दिया। (बहरहाल), अब उसने तुम्हें माफ़ कर दिया है: सचमुच अल्लाह ईमानवालों पर बहुत ही मेहरबान है। (152)


(उहुद की जंग याद करो) जब तुम लोग (जंग के मैदान से) भागे चले जा रहे थे और कोई पीछे मुड़कर देखता तक न था जबकि अल्लाह के रसूल तुम्हें पीछे से पुकार रहे थे, सो अल्लाह ने भी बदले में तुम्हें (पराजय देकर) दुख पर दुख दिया। (उसने अब तुम्हें माफ़ कर दिया है)  ताकि तुम उस चीज़ के लिए दुखी न हो, जो तुम्हारे हाथ से निकल जाए और न उस मुसीबत पर दुखी हो जो तुम्हारे सिर पर आ पड़े। और (याद रखो!), तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (153)


फिर इस दुख के बाद, (बेचैनी व डर दूर करने के लिए) अल्लाह ने तुम पर 'सुकून' [Calm] उतारा, एक नींद जो तुममें से कुछ लोगों पर छा गयी थी। 

  

तुम में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें अपनी जानों की ही पड़ी थी। वे अल्लाह के बारे में झूठे व ग़लत विचार रखते थे, जो जाहिलियत [Ignorance] के समय के अधर्मियों [Pagans] के विचार से मिलता-जुलता था, वे (पाखंडी) कहते थे, "जो कुछ हुआ, इन मामलों में हमारा कुछ भी अधिकार है क्या?" [ऐ रसूल], कह दें, "मामले तो सब के सब अल्लाह के (हाथ में) हैं।" असल में, जो कुछ उनके दिलों में होता है, वह आप पर ज़ाहिर नहीं करते। वे कहते हैं, "इस मामले में अगर हमारा कुछ अधिकार होता, तो हममें से कोई भी वहाँ मारा न जाता।" आप कह दें, "अगर तुम अपने घरों में भी बैठे होते, तब भी जिन लोगों का क़त्ल होना भाग्य में तय था, वे घर से निकलकर अपने मारे जाने की जगह पहुँच ही जाते।" और यह सब इसलिए हुआ ताकि जो कुछ तुम्हारे भीतर है, अल्लाह उसे जाँच-परख ले और तुम्हारे दिलों में क्या कुछ है, वह साबित हो जाए। अल्लाह दिलों के अंदर छिपी हुई बात को भी अच्छी तरह जानता है।  (154)


तुममें से जिन लोगों ने उस दिन युद्ध से मुँह मोड़ लिया था जब दोनों सेनाएं युद्ध में टकरायी थीं, तो असल में (धन और दुनिया के सामान से) उनके कर्मों में कुछ ऐसी कमज़ोरी पैदा हो गयी थी जिसके चलते शैतान ने उनके क़दम डगमगा दिए थे। अल्लाह ने अब उन्हें माफ़ कर दिया है: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और (ग़लतियों के प्रति) सहनशील है।  (155)



ऐ ईमानवालो! तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया और अपने उन भाइयों के बारे में, जो सफ़र में बाहर गए हुए हों या युद्ध में लगे हों (और उनकी वहाँ मौत हो जाए), तो कहते हैं, "अगर वे घर से न निकलते और हमारे पास ही ठहरे रहते, तो वे न तो मरे होते और न ही मारे गए होते," नतीजा यह कि अल्लाह ऐसे विचारों को उनके दिलों में पीड़ा [agony] का कारण बना देता है। यह तो अल्लाह है जो ज़िंदगी और मौत देता है; तुम जो कुछ भी करते हो, वह अल्लाह की नज़र से छिपा नहीं है।  (156)


और (देखो!) चाहे तुम अल्लाह के रास्ते में मारे गए या अपनी मौत मर गए, तो अल्लाह की तरफ़ से जो माफ़ी और उसकी दयालुता [रहमत] तुम्हारे हिस्से में आएगी, वह उस पूँजी से कहीं बेहतर है, जिसे लोग बटोरने में लगे रहते हैं। (157)


अब चाहे तुम अपनी मौत मरो या मारे जाओ, तो हर हाल में होना यही है कि तुम अल्लाह के पास ही इकट्ठा किए जाओगे। (158)



(इन घटनाओं के बाद भी) यह अल्लाह की बड़ी रहमत हुई, कि [ऐ रसूल] आप उनके साथ नर्मी से पेश आते हैं ----- अगर आप उनके साथ सख़्ती से पेश आते, और कठोर दिल के होते, तो ये सब आपके पास से खिसक लेते और आपको छोड़कर चले गए होते ------ अतः आप उनकी ग़लतियाँ माफ़ कर दें, और उनके लिए माफ़ी की दुआ करें। इनके साथ इस तरह के (युद्ध व शांति के) मामलों में सलाह-मशविरा किया करें, फिर जब आप कोई क़दम उठाने का फ़ैसला कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा करें: अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उसी पर अपना भरोसा करते हैं।  (159)


[ईमानवालो], अगर अल्लाह तुम्हारी मदद करे, तो तुम पर कोई हावी नहीं हो सकता; और अगर वह तुम्हें छोड़ दे, तो फिर कौन है जो तुम्हारी मदद कर सकता है? अतः ईमानवालों को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए।  (160)

 


और (देखो!) ऐसी बात सोचना भी मुश्किल है कि कोई नबी कभी भी युद्ध में हाथ आए लूट के माल में से बेईमानी करके कुछ ले लेगा। जो कोई ऐसा करता है, तो वह क़यामत के दिन अपने साथ उस चीज़ को लेकर हाज़िर होगा (जो उसने ग़लत तरीक़े से लिया होगा), फिर हर जान को उसके कर्मों के मुताबिक़ पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएगा: किसी के साथ कोई ज़ुल्म न होगा। (161)


क्या वह आदमी जो अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने में लगा रहता है, उस आदमी जैसा हो सकता है जो (अपने कुकर्मों से) अल्लाह को नाराज़ करके आया हो और जिसका ठिकाना जहन्नम हो ----  क्या ही बुरा ठिकाना है वह!? (162)


अल्लाह की नज़र में वे एक अलग ही दर्जे [class] में हैं; जो भी वे करते हैं, अल्लाह उसे देखता है।  (163)



अल्लाह का ईमानवालों पर सचमुच बड़ा एहसान रहा है कि उसने एक ऐसा रसूल उनके पास भेज दिया जो ख़ुद उन्हीं में से है, जो उन्हें (अल्लाह की) आयतें सुनाता है, हर तरह की बुराइयों से उन्हें निखारता है, और उन्हें किताब और सही समझ-बूझ की शिक्षा देता है ------- इससे पहले सचमुच वे लोग सही रास्ते से भटके हुए थे।  (164)


[ऐ ईमानवालो!], जब (उहुद की लड़ाई में) तुम पर एक बड़ी मुसीबत आ पड़ी, तो इसके बावजूद कि तुम (अपने दुश्मनों को बद्र की लड़ाई में) दोगुनी क्षति पहुँचा चुके हो, फिर भी तुम कहने लगे कि, "यह मुसीबत कहाँ से आ गई?" [ऐ रसूल], उनसे कह दें, "यह तो ख़ुद तुम्हारे ही हाथों आयी है।" (याद रहे), अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है: (165)


और (देखो!) [उहुद की जंग में] दोनों फ़ौजों की मुठभेड़ के दिन जो कुछ मुसीबत तुम्हारे सामने आयी, वह अल्लाह की आज्ञा से ही आयी थी, ताकि यह पता चल जाए कि सच्चे ईमानवाले कौन हैं  (166)


और ईमान का ढोंग करनेवाले [मुनाफ़िक़/ Hypocrites] कौन लोग हैं?, जब उन (मुनाफ़िक़ों) से कहा गया था कि "आओ, अल्लाह के रास्ते में (बाहर निकलकर) युद्ध करो या कम से कम अपनी रक्षा में लड़ो", तो (दुश्मनों की बड़ी सेना को देखकर) कहने लगे, "अगर हम देखते कि (बराबरी की) लड़ाई होने वाली है, तो हम ज़रूर तुम्हारे साथ हो लेते।" उस दिन वे ईमान के मुक़ाबले (सच्चाई से) इंकार करने [कुफ़्र] के ज़्यादा निकट थे। वे अपने मुँह से ऐसी बातें कहते हैं, जो उनके दिलों में नहीं होती: जो कुछ वे छिपाते है, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (167)



वे (पाखंडी) लोग जो (युद्ध के समय) स्वयं तो (घर) बैठे रहे, और अपने भाइयों के बारे में कहने लगे, "अगर उन लोगों ने हमारी बात मान ली होती, तो वे कभी (युद्ध में) मारे न जाते।" [ऐ रसूल], आप उनसे कह दें, "अच्छा, तुम जो कह रहे हो अगर वह सच है, तो जब तुम्हारी मौत आएगी, तब तुम उसे अपने ऊपर से टालकर दिखाना।" (168)


[ऐ रसूल!], जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे गए हैं, आप उन्हें मुर्दा न समझें, वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं, अपनी रोज़ी पा रहे हैं,  (169)


अल्लाह ने अपने फ़ज़ल से जो कुछ उन्हें दे रखा है, वे उस पर बहुत ख़ुश हैं; और उन लोगों के लिए भी ख़ुश हो रहे हैं जिन्हें वे (दुनिया में) पीछे छोड़ आए हैं जो अभी उनके साथ (शहीदों में) शामिल नहीं हुए हैं, कि न तो उनके लिए कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे; (170)


वे अल्लाह के फ़ज़ल [Favour] और उसकी नेमतों [Blessings] से भी (ख़ुश हो रहे हैं), और इस बात से कि (उन्होंने देख लिया कि) अल्लाह ईमान रखनेवालों का बदला कभी बेकार नहीं जाने देता।  (171)


(उहुद में) हार झेलने के बाद भी जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की पुकार का जवाब दिया (और फिर जंग के लिए तैयार हो गए), इसी तरह, जो अच्छा व नेक काम करते हैं, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए बड़ा भारी इनाम होगा। (172)


उन ईमानवालों का ईमान और ज़्यादा बढ़ गया, जब (उन्हें डराने के लिए) लोगों ने कहा, "अपने दुश्मनों से डरो: तुम्हारे ख़िलाफ़ उन लोगों ने एक बड़ी सेना इकट्ठा कर ली है", (मगर डरने के बजाय) ईमानवालों ने जवाब दिया, "हमारे लिए तो बस अल्लाह ही काफ़ी है: वह सबसे अच्छा रखवाला है," (173)


वे (बिना किसी भय के निकले और) अल्लाह के फ़ज़ल और उसकी नेमतों के साथ वहाँ से लौट आए; उन्हें कोई नुक़सान न हुआ। वे लोग अल्लाह को ख़ुश करने की चाहत में लगे रहे। अल्लाह का करम होना सचमुच बहुत बड़ी बात है।  (174)


यह तो शैतान है जो तुम पर ज़ोर डालता है कि तुम उसके पीछे चलनेवालों से डरो; अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तुम उनसे न डरो, बल्कि मुझ से डरो। (175)


[ऐ रसूल], उन लोगों के लिए आप दुखी न हों जो लोग (सच्चाई से) इंकार करने में जल्दी दिखाते हैं। वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते; अल्लाह चाहता है कि उनके लिए आख़िरत (की नेमतों) में कोई हिस्सा न रखे ---- एक बड़ी दर्दनाक यातना उनके लिए तैयार है।  (176)


जिन लोगों ने इंकार की राह चलने के लिए अपना ईमान बेच दिया, वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते; उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है। (177)


विश्वास न करनेवाले यह न समझ बैठें कि हम जो (उनके कामों में) उन्हें ढील दिए जाते हैंयह उनके लिए बड़ा अच्छा है: हम जब उन्हें ज़्यादा समय देते हैं, तो वे अपने गुनाहों में और अधिक बढ़ जाते हैं ----  उनके लिए तो बेहद अपमानित कर देने वाली यातना होगी।  (178)


अल्लाह ऐसा नहीं कर सकता कि बिना सही [मोमिन] और ग़लत [मुनाफ़िक़/ढोंगी] को अलग-अलग किए, तुम जिस हालत में थे, उसी हालत में तुम्हें छोड़ दे। (दूसरी तरफ़), अल्लाह तुम (लोगों) को वह चीज़ भी नहीं बता सकता जो नज़र से छिपी हुई हैअल्लाह जिस किसी को चाहता है, अपने रसूल के रूप में चुन लेता है (और उसे ही छिपी चीज़ें बताता है)। अतः अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखो: अगर तुम विश्वास रखो और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, तो तुम्हें बहुत बड़ा इनाम मिलेगा।  (179)


अल्लाह ने अपने फ़ज़ल से जिन लोगों को (माल) दे रखा है, उन्हें इसे ख़र्च करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए, वे यह न समझें कि ऐसा करना उनके लिए कोई भलाई की बात है; उल्टा यह उनके लिए बहुत बुरा है। जो कुछ (माल) वे कंजूसी से बचा-बचाकर रखते हैं उसे क़यामत के दिन उनकी गर्दनों के गिर्द लटका दिया जाएगा। (याद रहे!), वह अल्लाह ही है जो (अंत में) आसमानों और ज़मीन का अकेला वारिस होगा: हर चीज़ जो तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (180)

 


अल्लाह ने उन लोगों की बात निश्चय ही सुन ली है जो (अल्लाह के नाम से चंदा लिए जाने के बारे में) हँसी उड़ाते हुए कहते हैं, "तो अल्लाह ग़रीब है और हम धनवान हैं।" हम उनकी कही हुई हर बात (उनके कर्मों के खाते में) लिख लेंगे, और साथ में उसे भी लिखेंगे जबकि सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए उन लोगों ने नबियों को मार डाला--- और हम उनसे कहेंगे, "लो, (अब) भड़कती हुई आग की यातना का मज़ा चखो। (181)


यह उसका बदला है जो ख़ुद तुमने अपने हाथों से अपने लिए जमा कर रखा था: अल्लाह अपने बन्दों के साथ कभी भी अन्याय नहीं करता।” (182)


लोग यह कहते हैं, "अल्लाह ने हमें हुक्म दिया है कि हम किसी रसूल पर विश्वास न करें, जब तक कि वह हमारे सामने ऐसी कु़र्बानी न चढ़ाए जिसे (आसमान से आकर) आग खा लेती हो।" (ऐ रसूल), कह दें, "तुम्हारे पास मुझ से पहले कितने ही रसूल खुली निशानियाँ लेकर आ चुके हैं, और साथ में उन्होंने वह चीज़ भी दिखायी थी जिसके लिए तुम कह रहे हो। फिर अगर तुम सच्चे थे, तो तुमने उन्हें क़त्ल क्यों किया?" (183)


अगर वे आपको मानने से इंकार करते हैं, तो आप से पहले भी दूसरे रसूलों को वे झुठा मानते हुए ठुकरा चुके हैंहालाँकि वे स्पष्ट प्रमाण लेकर आए थे, साथ में गहरी समझ-बूझ की (लिखी हुई) किताबें, और सच्चाई को रौशन कर देनेवाली (आसमानी) किताब भी लेकर आए थे।  (184)


हर जीव को मौत का मज़ा चखना होगा, और जो कुछ तुम्हारे कर्मों का बदला मिलना है, वह क़यामत के दिन ही पूरा-पूरा मिलेगा। जिस किसी को (जहन्नम की) आग से दूर रखा गया और बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दिया गया, वह कामयाब हो गया। इस दुनिया में तो केवल धोखे की खुशियाँ हैं: (185)


आपके माल और आपके लोगों के ज़रिए आपकी परीक्षा ज़रूर ली जाएगी, और यह बात पक्की है कि जिन्हें आपसे पहले किताब दी गई थी और जो (अरब के) लोग अल्लाह के साथ दूसरों को जोड़ते हैं, उनसे आपको बहुत-सी ऐसी बातें सुननी पड़ेंगी जो दिल को चोट पहुँचाने वाली होंगी। अगर आप सब्र के साथ जमे रहें और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहेंतो वह बड़ी हिम्मत व पक्के इरादे की बात होगी। (186)



जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी थी, उनसे अल्लाह ने वचन लिया था कि ----- "लोगों को इसके बारे में साफ़-साफ़ बताओ; इसकी बातों को छिपाना नहीं" ----- मगर उन लोगों ने अपनी ली हुई प्रतिज्ञा तोड़ डाली, और (दुनिया के फ़ायदे के लिए) मामूली दाम पर उसका सौदा कर बैठे: कितना बुरा सौदा उन्होंने कर डाला! (187)


जो लोग अपने किए पर ख़ुशी में मगन हैं, और चाहते हैं कि जो काम उन्होंने नहीं किए, उन पर भी उनकी प्रशंसा की जाए, तो ऐसे लोगों के बारे में [ऐ रसूल], आप यह न सोचें कि वे (आने वाली) यातना से बच जाएँगे; दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है।  (188)



और (देखो!) आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के ही पास है; अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है।  (189)


जो लोग समझ-बूझ रखते हैं, उनके लिए  सचमुच आसमानों और ज़मीन को पैदा करने में, और दिन रात के बारी-बारी आने-जाने में बड़ी निशानियाँ हैं, (190)


जो खड़े, बैठे और लेटे हुए अल्लाह को याद करते रहते हैं, और आसमानों और ज़मीन की रचना के बारे में सोच-विचार करते हैं: (फिर वे पुकार उठते हैं,) "हमारे रब! तूने यह सब बिना किसी मक़सद के नहीं पैदा किया है---- तू इन चीज़ों से कहीं ऊँचा है! ---- अतः हमें आग की यातना से बचा ले।"   (191)


"हमारे रब, तू जिन्हें आग में डालने का इरादा कर लेगाउन्हें अपमानित कर देगा। ऐसे ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा।" (192)


"हमारे रब! हमने एक पुकारनेवाले को ईमान की ओर बुलाते सुना, ---- “लोगो! अपने रब पर विश्वास करो”---- और हमने विश्वास कर लिया है। हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे, हमारी बुराइयों को मिटा दे, और जब हम दुनिया से जाएं, तो हमें नेक और अच्छे लोगों के साथ शामिल कर दे।" (193)


"हमारे रब! वह सारी चीज़ जिनका वादा तूने अपने रसूलों के द्वारा किया है, हमें प्रदान कर और क़यामत के दिन हमें बेइज़्ज़त होने से बचा ---- बेशक, तू अपना वादा कभी नहीं तोड़ता।" (194)


उनके रब ने उनकी पुकार सुनकर जवाब दिया: "मैं तुममें से किसी के भी कर्मों को बेकार जाने नहीं दूँगा, चाहे मर्द हो या औरत, (कर्मों का बदला पाने में) तुम सब एक दूसरे के बराबर हो। मैं उन लोगों के बुरे कर्मों को ज़रूर मिटा दूँगा, जो लोग घर-बार छोड़कर (मदीना) चले गए, अपने घरों से निकाले गए, जिसने मेरे रास्ते में नुक़सान उठाया, जो (दुश्मनों से) लड़े और मारे गए। मैं उन्हें अवश्य ही ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, यह उनके कर्मों का बदला होगा: सबसे अच्छा बदला अल्लाह के ही पास है।" (195)



(ऐ रसूल), विश्वास न करने पर अड़े लोगों का अपने (फ़ायदेमंद) व्यापार के लिए शहरों में जो आना-जाना लगा रहता है, वह आपको किसी धोखे में न डाल दे: (196)


यह तो बहुत थोड़ी देर की सुख-सामग्री है, फिर तो जहन्नम ही उनका ठिकाना होगा ----वह रहने की कितनी बुरी जगह है! (197)


मगर जो लोग अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचते रहेतो उनके रब की तरफ़ से इनाम के तौर पर, उन्हें ऐसे बाग़ दिए जाएंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी और वे उसी में (हमेशा) रहेंगे। जो कुछ अल्लाह के पास है वह नेक और अच्छे  लोगों के लिए सबसे बेहतर है।  (198)



किताबवालों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अल्लाह पर सच्चा ईमान रखते हैं, और उस किताब पर भी (ईमान रखते हैं) जो तुम पर उतारी गयी है, और उन किताबों पर भी जो उन पर उतारी गयी थी: उनके दिल अल्लाह के आगे झुके रहते हैं, वे कभी भी अल्लाह की आयतों को मामूली दामों में नहीं बेचेंगे। इन लोगों को उनके रब के पास से अच्छा इनाम मिलेगा: (याद रहे), अल्लाह (कर्मों का) हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (199)


ऐ ईमान रखनेवालो! धीरज [सब्र] से काम लो, धीरज रखने में दूसरों से आगे बढ़ जाओ; (नमाज़ के लिए और हमले को बेकार करने के लिए) तैयार रहा करो; (हर हाल में) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहोताकि तुम (अपने मक़सद में) कामयाब हो सको। (200)

 

 

 

नोट:

 

4: सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ स्पष्ट कर देनेवाली चीज़ "फ़ुरक़ान" यानी 'क़ुरआन' का ज़िक्र 5:48 और 25:1 में भी देखें।


6: माँ की कोख में बच्चे का किस तरह से विकास होता है, इसका वर्णन 22:5 में विस्तार से आया है।

 

7: क़ुरआन में बहुत सी आयतों में "इशारे" में बातें कही गई हैं जिनके एक से ज़्यादा मतलब निकाले जा सकते हैं, या कुछ बातें ऐसी हैं जिनको आदमी अपनी अक़्ल से नहीं समझ सकता, क्योंकि उसे ऐसी चीज़ों का कोई अनुभव नहीं है। जैसे "अल्लाह का हाथ" या "अल्लाह का चेहरा" जिसे आदमी को अपने जैसा नहीं सोचना चाहिए, या हज़रत ईसा (अलै) को क़ुरआन में "अल्लाह की रूह" या "अल्लाह के शब्द" कहा गया है जिससे ईसाइयों ने यह मतलब निकाला कि वह "अल्लाह के बेटे" हैं, या जैसे कुछ सूरह के शुरुआत में ऐसे अक्षर आए हैं जैसे "अलिफ़, लाम, मीम" जिनका सही मतलब अल्लाह ही जानता है। यहाँ यह बताया गया है कि जो बातें बहुत साफ़ और स्पष्ट नहीं हैं, उनके ज़्यादा पीछे नहीं पड़ना चाहिए और अपनी मर्ज़ी के मतलब नहीं निकालने चाहिए, बल्कि हमें उन पर विश्वास होना चाहिए कि ये अल्लाह की तरफ़ से हैं।


13: देखें 8: 43-44. ... इसके बारे में ऐसे भी समझा जा सकता है कि विश्वास न करने वालों को ऐसा लगा कि जंग के मैदान में मुसलमानों की संख्या उनसे दोगुनी है।

19: कोई भी समुदाय 'विश्वास करने वालों' और 'विश्वास करने से इंकार करने वालों' के बीच नहीं बँट सकता, जब तक कि उनके बीच कोई रसूल आकर उन्हें इस बात का सही ज्ञान न दे दे।


27: बेजान चीज़ से जानदार चीज़ निकालना जैसे अंडे से चूज़ा निकलता है, और जानदार चीज़ से बेजान चीज़ निकालना जैसे चिड़ियों से अंडा निकलता है।


28: असल में मदीना के हालात देखते हुए इस आयत में ईमानवालों को छोड़कर दूसरे लोगों के साथ राजनीतिक गठबंधन [Allies] करने से मना किया गया है, जैसाकि पता चला था कि मदीना के कुछ पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग मक्का के लोगों के साथ मुसलमानों के ख़िलाफ़ गठबंधन कर रहे थे या मदीना के कुछ मुसलमानों की यहूदियों के साथ गहरी दोस्ती थी जिससे कुछ राज़ की बातें विरोधियों को पता चल जाती थीं। इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिए कि दूसरे लोगों के साथ आम दिनों में दोस्ती और अच्छे रिश्ते रखना मना है। 


33: हज़रत मरयम के बाबा का नाम इस्लामिक परम्पराओं में "इमरान" है, जबकि बाइबल में इनका कोई नाम नहीं बताया गया है। ज्ञात हो कि हज़रत मूसा (अलै) के बाबा का नाम हिब्रू में "अमरम" आया है और उन्हें भी इस्लामिक परम्परा में "इमरान" के नाम से जानते हैं।


35: बताया जाता है कि हज़रत मरयम के पैदा होने से पहले ही उनके बाबा चल बसे थे, उनकी माँ "हना" [Anne] ने दुआ की थी कि बच्चे को पूरी तरह मंदिर [बैतुल मक़दिस] की सेवा में लगायेंगे। मगर मंदिर की सेवा के काम में परम्परा के अनुसार मर्दों को लगाया जाता था, इसलिए कहा गया है कि "लड़का तो लड़की जैसा नहीं होता"।


37: इस्लामी परम्परा के अनुसार हज़रत ज़करिया की पत्नी रिश्ते में हज़रत मरयम की मौसी [ख़ाला] लगती थीं। उनका नाम बाइबल में एलिज़ाबेथ आया है (Luke 1: 5)  


39: हज़रत यह्या (अलै), ईसा (अलै) से बड़े थे और उन्होंने हज़रत ईसा के पैग़म्बर होने की पुष्टि की थी। हज़रत ईसा को "कल्मतुल्लाह" [a Word from God] यानी 'अल्लाह के शब्द' से जाना जाता है, क्योंकि वह बिना बाप के इस तरह पैदा हुए कि अल्लाह ने कहा "कुन"[हो जा], और बस माँ की कोख में उनका वजूद हो गया।


44: इस आयत से पता चलता है कि हज़रत मरयम की देखभाल की ज़िम्मेदारी जो हज़रत ज़करिया को दी गई थी, उसका फ़ैसला पाँसे के द्वारा हुआ था।


49: देखें 5: 110 


50: हज़रत ईसा (अलै) से पहले जो नियम-क़ायदे [शरीअत] इसराईल की संतानों के लिए थे, उसमें खाने की कुछ चीज़ों को हराम [अवैध] कर दिया गया था, जैसे ऊँट का गोश्त, चर्बी, कुछ चिड़ियाँ, मछ्लियों की कुछ क़िस्में आदि, जिसे ईसा (अलै) ने अपने माननेवालों के लिए हलाल [वैध] कर दिया। 


55: मुसलमानों की मान्यता के अनुसार, हज़रत ईसा (अलै) के विरोधियों ने उन्हें सूली पर चढ़ाने की योजना बनाई थी, मगर अल्लाह ने ईसा (अलै) को आसमान पर उठा लिया, और जो लोग आपको पकड़ने वाले थे उनमें से जो असल मुजरिम था जिसने आपको घोखा दिया था, उस आदमी की शक्ल को हूबहू हज़रत ईसा (अलै) जैसी बना दिया, जिसे ईसा समझकर सूली चढ़ा दिया गया। ईसाइयों की तरह मुसलमान भी ईसा (अलै) के दोबारा दुनिया में आने को मानते हैं


58: क़ुरआन को "ज़िक्र" कहा गया है जिसका मतलब सिर्फ़ भूली हुई चीज़ को याद दिलाना ही नहीं है बल्कि किसी चीज़ को बार-बार याद दिलाना ताकि वह हर समय ध्यान में रहे, नसीहत करना, फटकार लगाना, यहाँ तक कि चेतावनी देना (जैसे 73:19; 76:29). रसूल का काम याद दिलाना या नसीहत करना होता है (88:21). अत: 50:45 में रसूल को कहा गया है कि आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें (6:70; 51:55; 52:29; 87:9; 88:21)


59: आदम और ईसा (अलै) दोनों अल्लाह के शब्द "कुन" [हो जा!] से पैदा किए गए थे।  उसी तरह, फिर अल्लाह ने आदम में अपनी रूह फूँकी थी (15:29; 32:9; 38:72), और पवित्र रूह से ईसा को मज़बूती प्रदान की (2:87,253; 5:110) और मरयम भी एक पवित्र रूह से गर्भवती हुईं (19:17; 21:91; 66:12), इसके बावजूद क़ुरआन के मुताबिक़ आदम और ईसा दोनों इंसान थे। 


61: जब कोई विरोधी आदमी आपकी दलीलों को मान लेने के बजाए हठधर्मी पर तुल जाए, तो फिर आख़िरी चारा यह है कि उसके साथ "मुबाहिला" करना चाहिए जिसका तरीक़ा यहाँ बताया गया है। असल में यमन के नजरान शहर से ईसाइयों का एक प्रतिनिधिमंडल आया हुआ था जिसके सामने रसूल (सल्ल) ने उनके हर तरह के सवाल के जवाब दिए, मगर फिर भी वे नहीं माने, तब आपने उनसे मुबाहिला में शामिल होने को कहा और ख़ुद अपने नज़दीकी घरवालों के साथ मैदान में जमा हो गए, मगर ईसाइयों का दल इसके लिए तैयार नहीं हुआ।


63: यहाँ बिगाड़ से मतलब ईमान [Beliefs] का बिगाड़ और उससे पैदा होनेवाली सब चीज़ों से है।


70-71: यह आयतें 2: 42 से मिलती-जुलती हैं, आम तौर से समझा जाता है कि ये आयतें उन यहूदियों और ईसाइयों के बारे में हैं जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) को पैग़म्बर मानने से इंकार किया और उनकी पवित्र किताबों में साफ़-साफ़ भविष्यवाणी के बावजूद सच्चाई को जान-बूझकर छुपाया (7: 157).

 

72:  कुछ यहूदियों और ईसाइयों ने यह तरीक़ा सोचा था जिससे ईमानवाले संदेह और शक में पड़ जाएं कि जो लोग सुबह में सच्चाई पर विश्वास कर लेते हैं, वे शाम होते उसे ठुकरा क्यों देते हैं!


75: "जो किताबवाले नहीं हैं" से मतलब अरब के बुतपरस्त लोग [Pagans]...... , एक "दिनार" एक "दिरहम" (12: 20) से ज़्यादा होता था, क़ुरआन में इन्हीं दो सिक्कों का नाम आया है। 18:19 में भी सिक्के की बात आयी है जो शायद कागज़ की मुद्रा हो सकती है।


79: यहाँ ईसाइयों की मान्यताओं को रद्द किया गया है जो हज़रत ईसा को ख़ुदा या ख़ुदा का बेटा मानने का दावा करते थे, जैसे कि ख़ुद हज़रत ईसा (अलै) ने उन्हें अपनी इबादत करने को कहा हो! यही हाल यहूदियों के कुछ समूह का था जो हज़रत उज़ैर (अलै) को ख़ुदा का बेटा मानते थे। इस आयत में यह साफ़ कर दिया गया है कि कोई भी नबी (और ख़ासकर ईसा अलै.) एक आदमी के सिवा कुछ नहीं थे। 


81: नबियों से वचन लेने की बात 33: 7 में भी आयी है। 


86: एक बार सच्चाई पर विश्वास करने के बाद फिर विश्वास करने से इंकार कर देना बहुत ही गम्भीर मामला है, हालाँकि तब भी तौबा किया जाए तो अल्लाह माफ़ कर सकता है (देखें 3:89)


92: सूरह बक़रा 2: 267 में है कि जब दान (सदक़े) में कोई चीज़ दो तो बेकार या रद्दी चीज़ न दो। यहाँ उससे आगे जाकर यह कहा जा रहा है कि अगर नेकी हासिल करना चाहते हो, तो अल्लाह के रास्ते में जब ख़र्च करो तो उन चीज़ों में से दो जो तुम्हें बहुत ज़्यादा पसंद हों। 


93: कुछ यहूदियों ने मुसलमानों पर आपत्ति की थी कि एक तरफ़ तो ये लोग अपने आपको हज़रत इबराहीम (अलै) के तरीक़ों को माननेवाला बताते हैं और दूसरी तरफ़ ऊँट का गोश्त खाते हैं और उसका दूध पीते हैं, जो तौरात के आने के पहले से ही हराम [अवैध] था। यहाँ इस बात का जवाब दिया गया है कि असल में हज़रत इबराहीम (अलै) के ज़माने में खाने की सब चीज़ें हलाल थीं। बताया जाता है कि बाद में हज़रत याक़ूब [Jacob], जिन्हें इसराईल भी कहते हैं, को सायटिका [Sciatica] बीमारी हुई थी जिसके कारण उन्होंने ख़ुद ही अपने ऊपर ऊँट का गोश्त व दूध हराम [अवैध] कर लिया था, मगर बाक़ी दूसरों के लिए हराम नहीं था। बाद में, इसराईल की संतानों को अल्लाह की आज्ञा न मानने की सज़ा के तौर पर कुछ और चीज़ों को भी हराम क़रार दिया गया। यहाँ यह चैलेंज किया गया है कि ऊँट का गोश्त तौरात उतरने के पहले हलाल [lawful] था।


96: यहूदियों को एक और आपत्ति थी कि पहले से सभी नबियों का तरीक़ा यही रहा था कि वे "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके इबादत किया करते थे, जबकि मुसलमानों ने अपनी इबादत की जगह बदलकर "काबा" की तरफ़ कर दिया। यहाँ यह दावा किया गया है कि "काबा" तो बैतुल मक़दिस के बनने से काफ़ी पहले बन चुका था, और वह हज़रत इबराहीम (अलै) की निशानी है। 

यहाँ "बक्का" शब्द आया है जिसे मक्का का पुराना नाम माना जाता है। "पहला घर" मतलब काबा है।


97: जो कोई उस पाक (पवित्र) जगह चला जाता है, वह सुरक्षित हो जाता है, क्योंकि उस जगह ख़ून बहाना बिल्कुल मना है। ज़िंदगी में कम से कम एक बार हज करना हर एक मुसलमान के लिए ज़रूरी है अगर आदमी शारीरिक और आर्थिक रूप से इसकी सलाहियत रखता हो।

 

99: मदीना में दो बड़े क़बीले "ओस और ख़ज़रज" नाम के थे जिनमें इस्लाम से पहले काफ़ी दुश्मनी रहती थी, फिर दोनों क़बीले मुसलमान होकर मेल-मिलाप से रहने लगे। यह बात यहूदियों को पसंद नहीं आई, उन लोगों ने उनकी एक महफिल में ऐसा किया कि दोनों क़बीले से कहा कि तुम लोग पुराने वक़्तों की शायरियाँ सुनाओ, शायरी में दोनों क़बीले की आपसी दुश्मनी का वर्णन था जिससे पुरानी दुश्मनी फिर से जाग उठी। मुहम्मद (सल्ल) को पता चला तो उन्होंने बीच-बचाव करके इसे ख़त्म किया और नसीहत की कि तुम्हें अपने आपको अच्छे कामों और दीन के प्रचार-पसार में लगाना चाहिए। 


105: यहाँ इशारा यहूदियों और ईसाइयों की तरफ़ है।


106: एक बार सच्चाई पर विश्वास कर लेने के बाद अगर कोई उसे ठुकरा दे, तो उसका नतीजा बहुत बुरा होगा, चाहे वह पाखंडी [मुनाफ़िक़] हो जो केवल ऊपर से दिखावे के लिए ईमान रखता था या कोई भी हो।


112: इसराइलियों द्वारा नबियों को बिना अधिकार के क़त्ल करने का ज़िक्र कई जगह पर आया है, देखें 3: 121,181; 2:61


113: किताबवाले यानी यहूदियों और ईसाइयों में कई लोग ऐसे थे जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) और उनकी शिक्षाओं पर विश्वास किया था। शायद यहाँ ईसाइयों के बारे में कहा गया है।


117: जो लोग सच्चाई पर विश्वास नहीं रखते, उनके द्वारा दुनिया में किए गए अच्छे कर्मों का बदला इसी दुनिया में ही दे दिया जाता है, मगर उन्हें आने वाली दुनिया में कुछ नहीं मिलेगा। इसकी मिसाल ऐसी है जैसे किसी के पास अच्छा-ख़ासा खेत हो जिसमें फ़सल लगी हुई हो, और उस पर (सच्चाई से इंकार करने के चलते) बर्फ़ीली हवा की आँधी आ जाए और सब फ़सल बर्बाद हो जाए।

 

118: मदीना में "ओस और ख़ज़रज" नाम के दो क़बीले बहुत ज़माने से आबाद थे जिनके यहूदियों से अच्छे रिश्ते थे, जब इन क़बीले के लोग मुसलमान हो गए तब भी वे लोग वहाँ के यहूदियों के साथ दोस्ती निभाते रहे। वहाँ के यहूदी लोग भी ऊपर से तो दोस्ती ज़ाहिर करते थे, लेकिन अंदर से वे मुसलमानों से बहुत चिढ़ते थे। इसलिए उनके साथ ज़्यादा नज़दीकी रखने और राज़ की बात न बताने की सलाह दी गई है।


122: 3 हिजरी/625 ई. में मक्का से तीन हज़ार के लश्कर ने मदीना पर हमला किया, मुहम्मद (सल्ल) ने अपनी एक हज़ार फ़ौज के साथ मदीना शहर से बाहर निकलकर क़रीब 8 कि.मी दूर उहुद के पहाड़ के पास जाकर मुक़ाबला करने का फैसला किया। पाखंडियों का सरदार, अब्दुल्लाह बिन उबी का विचार था कि मुक़ाबला शहर में रहकर किया जाए, मगर जब फ़ैसला उल्टा हुआ तो वह अपने 300 आदमियों की टुकड़ी को लेकर फ़ौज से अलग हो गया। यह सोचकर कि 3000 के मुक़ाबले केवल 700 आदमी कैसे लड़ेंगे, मुसलमानों के भी दो क़बीले "बनु हारिसा और बनु सलमा" के दिल डगमगा गए थे, लेकिन अल्लाह की मदद से अंत में वे जंग में शामिल हुए।


123: बद्र की लड़ाई में मुसलमानों की संख्या केवल 313 थी, और उनके पास मात्र 70 ऊँट और दो घोड़े थे।


125: यह भी बद्र की जंग के बारे में है, जब दुश्मनों की संख्या तीन गुना थी। अल्लाह ने शुरू में तीन हज़ार फ़रिश्तों से मदद करने की ख़बर दी थी, फिर बीच में पता चला कि दुश्मनों का एक और बड़ा लश्कर आने वाला है, तब अल्लाह ने वादा किया था कि अगर वह लश्कर आया, तो पाँच हज़ार फ़रिश्तों से मदद की जाएगी।

  

130: बताया जाता है कि मक्का वालों ने ब्याज पर धन लेकर फ़ौज तैयार की थी, यहाँ मुसलमानों को फिर से ब्याज (सूद) लेने से मना किया गया है। पहले सूरह बक़रा 2: 275-281 में भी इसके बारे में आदेश आ चुके थे।


137: आने-जाने के रास्ते में पिछले लोगों के टूटे-फूटे खंडहर उस समय तक बाक़ी थे जिनसे सबक़ सीखा जा सकता था। 

 

139: उहुद की जंग के शुरुआती हिस्से में मुसलमानों की जीत हुई और मक्का वालों की फ़ौज मैदान से भाग खड़ी हुई थी, इसके बाद मुस्लिम फ़ौज के लोग दुश्मनों के छोड़े हुए साज़-व-सामान लूटने में लग गए, एक टीले पर 50 तीरंदाज़ों को तायनात किया गया था, उन्हें भी लगा कि युद्ध ख़त्म हो गया सो वे भी लूट में शामिल हो गए। इसी बीच दुश्मनों ने वापस आकर ज़बरदस्त हमला किया जिसमें 70 मुसलमान शहीद हो गए, ख़ुद मुहम्मद (सल्ल) लहू-लुहान हो गए और उनका दाँत भी शहीद हो गया। मुसलमानों की फ़ौज तितर-बितर हो गई, फिर बड़ी मुश्किल से दोबारा फ़ौज जमा हो पाई और मुक़ाबला हुआ जिससे दुश्मनों को मैदान छोड़ना पड़ा। मगर इस लड़ाई में हुए ज़बरदस्त नुक़सान से मुसलमान काफ़ी दुखी हुए। यहाँ उन्हें हिम्मत न हारने और अपनी ग़लतियों को सुधारने की शिक्षा दी गई है।


140: बद्र की लड़ाई में मक्का के दुश्मनों में से 70 सरदार मारे गए थे और 70 लोगों को क़ैद कर लिया गया था। 

"शहीद" का मतलब सच्चाई की गवाही देनेवाला। वह इस दुनिया में अल्लाह द्वारा चुन लिए जाते हैं जो आसमानों में अल्लाह के सामने गवाही देंगे, इस तरह उन्हें यहाँ मौक़ा दिया जाता है कि वह दुनिया की ज़िंदगी त्यागकर अपने ईमान की गहराई की गवाही दे सकें। क़यामत के दिन रसूलों के साथ वे भी गवाही देंगे। 


141: हराने का असल मक़सद ईमानवालों के बीच से सच्चाई से इंकार करने वालों को हटा देना था।


144: "मुहम्मद" नाम क़ुरआन में चार बार आया है, यहाँ पहली बार आया है, देखें 33:40; 47:2; 48:29; और 61:6 (अहमद)।


152: मुहम्मद (सल्ल) ने अपने तीरंदाज़ों को एक ऊँचे टीले पर मोर्चा बनाकर युद्ध के आख़िर तक वहीं टिके रहने का हुक्म दिया था। मगर शुरुआती कामयाबी से उन्हें लगा कि उनकी फ़ौज की जीत हो चुकी है, इसलिए वे आपस में बहस करने लगे कि टीले पर बने रहें या नहीं। फिर उनमें ज़्यादातर लोग युद्ध में छोड़े गए सामान को लूटने के लिए दौड़ पड़े, इससे दुश्मन की फ़ौज को दोबारा इकट्ठा होने और पीछे से हमला करने का मौक़ा मिल गया, और इस तरह उनकी जीत हुई।


154: मदीना के पाखंडियों का कहना था कि हमारा तो कोई अधिकार है ही नहीं, क्योंकि अगर हमारी बात मानी जाती और मदीना से बाहर निकलकर दुश्मन का मुक़ाबला करने के बजाए शहर में रहकर उसकी सुरक्षा की जाती तो इतने सारे लोग मारे न जाते। मगर याद रहे कि हर आदमी की मौत का समय पहले से तय है। देखें 3: 145


155: जब उहुद में पीछे से दुश्मनों ने दोबारा ज़बरदस्त हमला किया, तो ऐसी अफ़रा-तफ़री मची कि बहुत से मुसलमान मैदान से भाग खड़े हुए, कुछ डर से, और कुछ यह अफ़वाह सुनकर कि मुहम्मद (सल्ल) नहीं रहे। उन्हें शैतान ने बहकाकर और ग़लती करने पर मजबूर किया था। 


165: यह माना जाता है कि मुसलमानों ने उहुद की लड़ाई में अपने जितने लोग खो दिए, उससे दोगुना लोगों को उन लोगों ने बद्र की लड़ाई में मारा था। 


169: जो अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए मारे जाते हैं, वह सीधे जन्नत में जाते हैं, और उन्हें क़यामत तक का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। देखें 2: 154.


173: उहुद की जंग में मक्का के विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग मुसलमानों पर भारी पड़े थे, फिर उन लोगों ने मक्का की तरफ़ वापस जाते हुए उहुद से नज़दीक एक जगह पर पड़ाव डाला, उन लोगों ने सोचा कि वापस जाने के बजाय उन्हें मुसलमानों को पूरी तरह कुचल देना चाहिए ताकि उनका ज़ोर हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए। इस बीच, मुसलमानों का थका-हारा व ज़ख़्मी लशकर जब मदीना पहुँचा, तो मुहम्मद (सल्ल) को एहसास हुआ कि मदीना अब असुरक्षित हो गया है। अत: अगले ही दिन दुश्मनों का पीछा करने के इरादे से वे अपने कुछ साथियों के साथ निकल खड़े हुए। रास्ते में कुछ लोगों ने मुसलमानों की फ़ौज को डराया कि मक्का वालों का एक बहुत बड़ा लश्कर उनकी तरफ़ आ रहा है, मगर वे लोग नहीं घबराए बल्कि उनका इरादा और भी पक्का हो गया। इसी हौसले की वजह से मक्का की फ़ौज घबरा गई और फिर से मुक़ाबला करने के बजाय वापस चली गई।   


180: जिन चीज़ों पर अल्लाह ने ख़र्च करने का हुक्म दे रखा है, जैसे "ज़कात" देना, अगर उन पर आदमी ख़र्च न करे, तो ऐसी कंजूसी हराम है।

 

181: जब "ज़कात" देने का हुक्म आया तो मदीना के कुछ यहूदियों ने इसका मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा था कि इसका मतलब यह हुआ कि "अल्लाह ग़रीब है और हम मालदार हैं।" 

नबियों को मार डालने की बात 3: 21 और 2: 61 में भी आयी है।


183: पुराने नबियों के ज़माने में क़ायदा यह था कि जब वे किसी जानवर की क़ुर्बानी करते थे, तो उसका गोश्त उन्हें खाना मना था, बल्कि उस जानवर के गोश्त को किसी मैदान या टीले पर रख दिया जाता था, और अगर आसमान से आग आकर उसे खा लेती थी, तो यह माना जाता था कि अल्लाह ने वह क़ुर्बानी क़बूल कर ली। बाइबल में कई नबियों के बारे में आया है जिन्होंने ऐसी क़ुर्बानियाँ की थीं, जैसे एलिजाह (1 किंग्स 18: 22-38), दाऊद (अलै) आदि। कुछ यहूदियों ने भी मुहम्मद (सल्ल) से ऐसी क़ुर्बानी करने की माँग की थी।

184: जैसे मूसा (अलै) की तौरात, दाऊद (अलै) की ज़बूर, ईसा (अलै) की इंजील जैसी आसमानी किताबें आयीं।

186: ईमानवालों की हमेशा ही परीक्षा ली जाती रहती है, चाहे उनके जान-माल का नुक़सान हो, या किसी क़िस्म की बीमारी हो जाए, ज़ख़्मी हो जाए इत्यादि।

193: यहाँ "पुकारनेवाला" से मतलब मुहम्मद (सल्ल) हैं।

 

199: ऊपर देखें 3: 113


200: क़ुरआन में "सब्र" [धीरज] कई अर्थों में आया है। अल्लाह का आदेश मानते हुए हर तरह की मुसीबत-परेशानी झेलना, और गुनाह करने की इच्छा को दबाना लेना भी सब्र में शामिल है।  











सूरह 59: अल हश्र 

 [फ़ौजों का जमा होना/The Gathering (of forces)]


यह एक मदनी सूरह है, इसके बड़े हिस्से में यहूदियों के क़बीले बनु नज़ीर के हवाले से बात कही गई है, जिन लोगों ने मुसलमानों के मदीना आते ही मुहम्मद सल्ल. से एक शांति-समझौता किया था जिसके मुताबिक़ वे इन शर्तों पर तैयार हुए थे कि न वे मुसलमानों की तरफ़ से और न उनके विरुद्ध किसी युद्ध में भाग लेंगे। मगर जब उन लोगों ने उहुद की लड़ाई में मुसलमानों की हार देखी, तो वे जाकर मक्कावालों से गठबंधन कर बैठे। उन लोगों ने मुहम्मद सल्ल को मार डालने की भी कोशिश की जब वह उनके इलाक़े में गए हुए थे। मुहम्मद सल्ल ने उन लोगों से मदीना छोड़ देने के लिए कहा और वे मान गए, मगर मदीना के पाखंडियों के सरदार, इब्ने उबई ने उन यहूदियों से वादा किया कि अगर वे मुसलमानों से लड़ें तो वह और उसका दल उनके साथ लड़ेगा (11-13), और अगर उन्हें मदीना से जाना ही पड़ा, तो वे भी अपने लोगों के साथ मदीना छोड़ देंगे। चूंकि बनु-नज़ीर ने कई बार समझौते की शर्तों को तोड़ा था, इसलिए मुसलमानों ने मदीना में (626 ई./4 हिजरी) उनकी घेराबंदी कर दी, इब्ने उबई ने यहूदियों को किया हुआ वादा नहीं निभाया, और अंत में बनु-नज़ीर मदीना छोड़कर जाने के लिए तैयार हो गए, कुछ लोग सीरिया चले गए और कुछ लोग ख़ैबर। इस सूरह में यह बताया गया है कि युद्ध के नतीजे में जो कुछ माल हाथ आ जाता है, वह सब अल्लाह का दिया हुआ होता है, इसलिए उसका बंटवारा भी अल्लाह द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार ही होना चाहिए (आयत 6-10). सूरह के आख़िर में, अल्लाह के हुक्म को मानने और उससे डरकर रहने पर ज़ोर दिया गया है (21-24). सूरह का नाम आयत 2 में ज़िक्र हुए "सैन्य बलों के जमा होने" पर रखा गया है। 


 विषय:

   1:  अल्लाह की महानता

  2-4:  किताबवाले (यहूदियों) को देश-निकाला

 5-10:  यहूदियों को देश से निकाले जाने के नतीजे में हाथ आ गए माल का बटवारा 

11-17: पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग बुज़दिल हैं

18-21: लोगों को अल्लाह से डरने की नसीहत 

22-24: अल्लाह की महानता


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की तारीफ़ बयान करती है; और वह बेहद ताक़तवाला, समझ-बूझवाला [wise] है। (1)


वही है जिसने उन किताबवाले [यहूदी] लोगों में से जिन [बनू-नज़ीर के क़बीले के] लोगों ने विश्वास तोड़ा था, उनको उस समय घरों से निकाल बाहर किया, जब पहली बार (मुस्लिम फ़ौज) वहाँ (मदीने में) जमा हुई थी-----[ऐ ईमानवालो!] तुमने कभी सोचा भी न था कि वे (वहाँ से) चले जाएंगे, और वे ख़ुद भी यही समझते थे कि उनके मज़बूत क़िले उन्हें अल्लाह (की पकड़) से बचा लेंगे। मगर अल्लाह (की यातना) ने उन्हें ऐसी जगह से आ लिया जिसके बारे में उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था और फिर उनके दिलों में डर बैठा दिया: (नतीजा यह हुआ कि) उनके घर ख़ुद उनके ही हाथों, और ईमानवालों के हाथों बर्बाद हो गए। अतः तुम सब जो नज़र रखते हो, सबक़ सीखो इस (घटना) से!  (2)


अगर अल्लाह ने उनकी क़िस्मत में (पहले ही) देश निकाला न लिख दिया होता, तो उन्हें इस दुनिया में (और भी दर्दनाक) यातना देता। आख़िरत [परलोक] में उनके लिए आग की यातना होगी, (3)


यह इसलिए कि उन्होंने ख़ुद अपने आपको अल्लाह और उसके रसूल के विरोध में खड़ा कर लिया: जिस किसी ने अल्लाह का विरोध करने की ठान ली, तो निश्चय ही अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (4)



[ईमानवालो! बनू नज़ीर के यहाँ घेरा डालने के दौरान] जो कुछ भी तुमने (उनके) खजूर के पेड़ों के साथ किया----चाहे उन्हें काट डाला या उन्हें जड़ों पर खड़ा रहने दिया-----यह सब तो अल्लाह की मर्ज़ी से ही हुआ, ताकि जिन लोगों ने उसकी आज्ञा मानने से इंकार किया, उन्हें बेइज़्ज़त कर सके। (5)


जो कुछ भी माल (बनू-नज़ीर के लोगों के वहाँ से चले जाने पर) हाथ आ गया, वह तो अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल को दिलवा दिया, उसको पाने के लिए [ऐ ईमानवालो!], न तो तुम्हें अपने घोड़े दौड़ाने पड़े और न अपने ऊँट। अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, उस पर अपने रसूलों को अधिकार [Authority] प्रदान कर देता है: अल्लाह को सारी चीज़ों की सामर्थ्य प्राप्त है। (6)


जो कुछ माल बस्तीवालों (के वहाँ से चले जाने) से हाथ आ गया, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल को दिलवाया, उस पर अधिकार है अल्लाह का, उसके रसूल का, (ग़रीब) नातेदारों का, अनाथों का, ज़रूरतमंदों का और ग़रीब मुसाफ़िरों का ----- यह इसलिए ताकि वह (माल) केवल उन्हीं लोगों में न घूमता रहे, जो तुम में से अमीर हैं ---- अत: तुम्हारे  रसूल जो कुछ तुम्हें दे दें, उसे स्वीकार कर लो, और जिस चीज़ से तुम्हें मना कर दें, उससे रुक जाओ। और अल्लाह से डरते रहो: अल्लाह दंड देने में बहुत कठोर है। (7)



(इस माल के हक़दार) वे ग़रीब मुहाजिर [प्रवासी/emigrant] भी हैं, जो (मक्का से) अपने घरों और अपनी जायदादों से निकाल बाहर किए गए, जो अल्लाह की मेहरबानी और उसकी मंज़ूरी चाहते हैं, वे लोग जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल की मदद की---- यही लोग हैं जो सच्चे हैं। (8)


वे लोग [अंसार] (भी हक़दार हैं) जो पहले से ही (मदीना में) पक्के ईमान के साथ, अपने घरों में मज़बूती से जमे हुए थे, वे उन लोगों से मुहब्बत करते हैं जिन्होंने (मक्का से) हिजरत करके वहाँ पनाह ले ली है, और जो कुछ भी उन (मुहाजिरों) को दिया जाता है, वे अपने दिलों में उसे (पाने की) कोई इच्छा नहीं रखते। (बल्कि) वे उन [मुहाजिरों] को अपने मुक़ाबले में वरीयता [Preference] देते हैं, हालाँकि वे ख़ुद ही बहुत ग़रीब हैं: जो लोग अपने मन के लोभ से बचे रहे, वही असल में कामयाब हैं।  (9)


और (इस माल में उनका भी हिस्सा है) जो लोग उन [अंसार व मुहाजिर] के बाद आए, वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हमारे उन भाइयों के गुनाहों को भी माफ़ कर दे जिन्होंने हम से पहले (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया था, और हमारे दिलों में विश्वास [ईमान] रखनेवालों के प्रति कोई बुरी भावना [malice] न रख। ऐ रब! तू सचमुच बड़ा करुणामय, बेहद दया करनेवाला है।" (10)



[ऐ रसूल!] क्या आप ने उन पाखंड करनेवाले [मुनाफ़िक़/Hypocrites] लोगों को नहीं देखा, जो अपने उन किताबवाले साथियों से कहते हैं जो ईमान से ख़ाली हैं, कि "अगर तुम्हें यहाँ से निकाला गया, तो हम भी तुम्हारे साथ निकल जाएँगे----- हम ऐसे आदमी की कभी कोई बात नहीं सुनेंगे, जो तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहेगा-----और अगर तुम पर हमला होता है, तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद को आएंगे?" अल्लाह गवाही देता है कि वे बिल्कुल झूठे हैं: (11)

अगर वे बाहर निकाले गए, तो ये (पाखंडी) लोग कभी उनके साथ नहीं निकलेंगे; अगर उन पर हमला हो, तो ये कभी उनकी मदद के लिए नहीं आएंगे। और अगर कभी ये उनकी मदद के लिए आए भी, तो जल्द ही दुम दबाकर भाग खड़े होंगे----- अंत में उन्हें कोई मदद नहीं मिलने वाली।  (12)

उनके दिलों में [ऐ ईमानवालो] अल्लाह से ज़्यादा, तुम्हारा डर समाया हुआ है क्योंकि ये ऐसे लोग हैं जिनमें समझदारी बिल्कुल नहीं है। (13)

यहाँ तक कि अगर वे एकजुट हों, तब भी वे तुमसे कभी जंग नहीं करेंगे, और अगर कभी लड़ें भी, तो मज़बूत क़िले के अंदर से या ऊँची दीवारों के पीछ से (लड़ेंगे)। उनकी आपस में सख़्त लड़ाई है: तुम सोचते होगे कि वे एकजुट हैं, मगर उनके दिल टुकड़ों में बँटे हुए हैं, और यह इसलिए है कि ये ऐसे लोग है जो बुद्धि से काम नहीं लेते। (14)

इनकी हालत उन्हीं लोगों [बनू क़ैनूक़ा] जैसी है, जो उनसे ठीक पहले (वहाँ से बाहर निकाले) गए थे, वे अपने कर्मों के वबाल का मज़ा चख चुके हैं, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में है। (15)

इन (पाखंडियों) की मिसाल शैतान जैसी है जो आदमी से कहता है, "(सच्चाई पर) ईमान [विश्वास] मत रखो!" मगर फिर, जब आदमी कुफ़्र [विश्वास करने से इंकार] कर देता है, तो शैतान कह देता है, "मैं तुम से अलग होता हूँ; मैं अल्लाह से डरता हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (16)

उन दोनों को अंत में (जहन्नम की) आग में जाना है, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। शैतानियाँ करनेवालों का यही बदला है।  (17)



ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरते रहो, और हर आदमी को यह बात ध्यान से सोचना चाहिए कि उसने कल (क़यामत के दिन] के लिए क्या (पुण्य) आगे भेजा है; अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो, क्योंकि वह सारी चीज़ें जो तुम करते हो, अल्लाह उन्हें अच्छी तरह जानता है। (18)

और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अल्लाह को भूल जाते हैं, अत: अल्लाह उन्हें ऐसा कर देता कि वे स्वयं अपनी जानों को भुला बैठते हैं: यही वे लोग हैं जो आज्ञा न माननेवाले, बाग़ी [rebellious] हैं-----(19)

(जहन्नम की) आग में रहने वालों और (जन्नत के) बाग़ में रहने वालों के बीच कोई तुलना हो ही नहीं सकती है----- और बाग़ [जन्नत] में रहनेवाले ही कामयाब लोग हैं। (20)

अगर हमने इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारा होता, तो [ऐ रसूल] आप देखते कि वह अल्लाह के दबदबे व डर से झुक जाता और टूट-फूट जाता: हम ये मिसालें लोगों के सामने इसलिए पेश करते हैं ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें। (21)



वही अल्लाह है: उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं। वही है जो छिपी हुई चीज़ों को भी जानता है, और सामने दिखाई देनेवाली चीज़ों को भी जानता है, वह सब पर मेहरबान है, बेहद दया करने वाला है। (22)

वही अल्लाह है: उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं, वह बादशाह [नियंत्रक] है, बेहद पवित्र है, शांति (सुकून) देनेवाला, सुरक्षा देनेवाला, सबकी देखरेख करनेवाला, बेहद ताक़तवाला, गड़बड़ी को ठीक करनेवाला, सचमुच बहुत बड़ाईवाला है; अल्लाह उन चीज़ों से कहीं महान और ऊँचा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं।  (23)

वही अल्लाह है: (हर चीज़ का) पैदा करनेवाला, अस्तित्व देनेवाला, रूप देनेवाला। सब अच्छे नाम उसी के हैं। आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसकी बड़ाई बयान करती है: वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझवाला है।  (24)


नोट:

2: मदीना में यहूदियों की बड़ी आबादी थी, उनके एक क़बीले बनु नज़ीर के साथ मुहम्मद (सल्ल) ने एक संधि कर ली थी कि मदीना में हमला होने की सूरत में एकसाथ मिलकर उसकी रक्षा करेंगे या कम से कम विरोधियों के साथ मिलकर नहीं लड़ेंगे। इसके बावजूद, मक्का के हाथों उहुद की जंग में हार के बाद भी यहूदियों ने मक्का के लोगों के साथ मिलकर मदीना के मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करनी शुरू की, और उनसे यह वादा कर लिया कि अगर वे लोग मदीना पर हमला करें तो वे उनका साथ देंगे। इसके अलावा, मुहम्मद (सल्ल) बनु नज़ीर क़बीले के पास संधि की कुछ शर्तों पर अमल कराने के लिए बातचीत करने गए, तो उन लोगों ने उन्हें मार देने की साज़िश रची, जिसका उन्हें पता चल गया और वह वहाँ से बच निकले। इस घटना के बाद आपने बनु नज़ीर क़बीले के साथ संधि समाप्त करने का संदेश भेज दिया और उन्हें कुछ समय दे दिया जिसके अंदर उन्हें मदीना छोड़कर चले जाने का हुक्म दिया गया, अन्यथा मुसलमान उन पर हमला करने के लिए आज़ाद होंगे। इधर कुछ पाखंडियों [मुनाफिक़] ने जाकर बनु नज़ीर को यक़ीन दिलाया कि आप लोग डटे रहें, अगर मुसलमानों ने हमला किया, तो वे आप लोगों का साथ देंगे। बनु नज़ीर की तरफ़ से बार-बार संधि की शर्तों को तोड़ने के कारण मुसलमानों ने बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी कर दी (4 हिजरी/626 ई.)। जब बनु नज़ीर ने कहीं से कोई मदद आती नहीं देखी तो हथियार डाल दिए, उनसे कहा गया कि हथियार छोड़कर वे अपनी सारी दौलत अपने साथ ले जा सकते हैं। अत: वे लोग अपने घरों के दरवाज़े तक उखाड़कर वहाँ से ले गए, और जाकर सीरिया और ख़ैबर में बस गए।  

6: बनु नज़ीर के मदीने से चले जाने के बाद उनकी ज़मीनें, खजूरों के बाग़ और मकान आदि जो हाथ आ गए, वह असल में बिना युद्ध लड़े ही हासिल हो गए थे। 

12: जब बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी की गई तो कोई पाखंडी [मुनाफिक़] उनकी मदद को नहीं आया। 

15: इससे पहले एक और यहूदी क़बीला "बनु क़ैनूक़ा" था, उसने भी मुसलमानों के साथ शांति समझौता किया था, मगर फिर ख़ुद ही लड़ाई मोल ले ली, और हार जाने के बाद देश से निकाले गए। 

16: शैतान की यह आदत है कि शुरू में वह आदमी को गुनाह पर उकसाता है, जब उसके नतीजे में बात मानने वाले आदमी को कोई तकलीफ़ उठानी पड़्ती है, तो फिर वह उनसे अलग हो जाता है। आख़िरत में तो वह काफ़िरों की ज़िम्मेदारी लेने से साफ मुकर जाएगा, जैसा कि सूरह इबराहीम (14: 22) में आया है। इसी तरह, पाखंडी लोग शुरू में  यहूदियों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ उकसाते रहे, मगर जब समय आया, तो साफ़ मुकर गए। 

19: अल्लाह को भूल बैठने के नतीजे में वह ऐसे हो जाते हैं कि वह इस बात की कोई परवाह नहीं करते कि ख़ुद उनकी जानों के लिए कौन सी बात फ़ायदे की है और कौन सी बात नुक़सान की। वह इस तरह अपने आपको भूलकर वही काम करने लगते हैं जो उन्हें तबाही की तरफ़ ले जाने वाले हैं।

24: इस आयत में अल्लाह के बहुत से नाम बताए गए हैं। यहाँ उनका अनुवाद दिया गया है। मुहम्मद (सल्ल) ने अल्लाह के निन्यानवे नाम बताए हैं जिन्हें असमा ए हसना [ख़ूबसूरत नाम] बताया गया है। 




सूरह 57: अल-हदीद

[लोहा/ Iron]


यह एक मदनी सूरह है जिसमें ईमानवालों से ज़ोर देकर कहा गया है कि वे अल्लाह की राह में ख़र्च करें और इंसाफ़ से काम लें ---- आयत 25 में लोहे का ज़िक्र आया है, जिसे ताक़त के साथ उतारा गया है, ख़ासकर यह देखने के लिए कि कौन है जो अल्लाह के लिए खड़ा हो सकता है, इसी के नाम पर इस सूरह का नाम पड़ा है। अल्लाह की ताक़त, उसका ज्ञान, उसका नियंत्रण, और उसकी महानता, हर चीज़ पर छाई हुई है, और इसको ज़ोर देकर इसलिए बताया गया है कि मुसलमानों का हौसला बुलंद हो सके, और वे सही कार्रवाई कर सकें। इसके साथ ही मदीना के पाखंडियों का होने वाला अंजाम भी बताया गया है। पिछले पैग़म्बरों का ज़िक्र भी आया है (26-27), ख़ासकर नूह, इबराहीम और ईसा (अलै.) के बारे में बताया है कि उनकी क़ौम के लोगों की उनके द्वारा लाए गए संदेश के प्रति कैसी प्रतिक्रिया रही। सूरह के अंत में किताबवाले लोगों [यहूदी + ईसाई] को दावत दी गई है कि वे अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करें। 

   

विषय:

01-06: अल्लाह की बड़ाई 

07-11: अल्लाह पर विश्वास करने और उसके रास्ते में ख़र्च करने की अपील 

12-15: फ़ैसले का दृश्य: ईमानवालों और पाखंडियों का अंजाम 

16-24: ईमान रखने और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने का इनाम

25-27: अल्लाह के रसूल और उनके मानने वाले

28-29: अंत में ईमानवालों को अपने क़दम जमाए रखने पर ज़ोर




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती है---- वह बेहद ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (1)

आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] उसी के हाथ में है; वही ज़िंदगी भी देता है, और मौत भी; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (2)

वही पहला भी है और आख़िर भी [जब कुछ न था तो वह था, जब कुछ नहीं रहेगा, तो वह रहेगा]; वही बाहर (फैली हुई निशानियों में) भी है और अंदर (छिपी चीज़ों में) भी; और उसे हर चीज़ की जानकारी है। (3)

वही तो है जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया और फिर अपने आपको सिंहासन पर जमाया। जो कुछ ज़मीन में दाख़िल होता है, और जो कुछ उससे बाहर निकलता है, वह उसे जानता है; और उसे भी (जानता है) जो कुछ आसमान से नीचे उतरता है, और जो कुछ ऊपर को चढ़ता है। तुम जहाँ कहीं भी हो, वह तुम्हारे साथ होता है; और जो कुछ तुम करते हो, वह सब देखता है; (4)

आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [बादशाही] उसी के पास है; और सारे मामले अल्लाह के पास ही वापस लाए जाते हैं। (5)

वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है। वह दिलों के अंदर की (छिपी) बात को भी जानता है। (6)



अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और उस (माल) में से ख़र्च करो, जो अल्लाह की तरफ से तुम्हें (अमानत के रूप में) दिया गया है: तुममें से जो लोग विश्वास [ईमान] रखते हैं और (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते हैं, उनके लिए बड़ा इनाम होगा।  (7)

तुम अल्लाह पर विश्वास क्यों नहीं करते, जबकि (हमारे) रसूल तुम्हें अपने रब पर विश्वास करने के लिए अपने पास बुलाते हैं---- और अल्लाह तो तुम्हारे साथ पहले ही पक्का वचन ले चुका है----- अगर तुम ईमान रखते हो?  (8)

वही (अल्लाह) है जिसने अपने बन्दे पर साफ़ व स्पष्ट आयतें उतार भेजी हैं, ताकि वह तुम्हें गहरे अँधेरे से उजाले की तरफ़ ले आए। और सचमुच अल्लाह तुम पर बहुत नर्मी दिखानेवाला, बेहद दयावान है। (9)

और यह क्या हुआ कि तुम अल्लाह के रास्ते में ख़र्च नहीं करते, जबकि आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, उसका अकेला वारिस तो अल्लाह ही होगा? जिन लोगों ने (मक्का की) जीत से पहले (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं, वे दूसरों के बराबर नहीं हैं: वे लोग दर्जे [Rank] में उन लोगों से बड़े हैं जिन्होंने बाद में (अपना माल) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं। मगर अल्लाह ने उन सबसे अच्छे इनाम का वादा कर रखा है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (10)



कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ दे सके, अच्छा वाला क़र्ज़!? अल्लाह उस (क़र्ज़) को देनेवाले के लिए कई गुना बढ़ा देगा और उसे दिल खोलकर इनाम देगा। (11)

[ऐ रसूल!] (क़यामत का) एक दिन आएगा जब आप ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को देखेंगे कि उनकी रौशनी उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी। (उनसे कहा जाएगा),  "आज तुम्हारे लिए बड़ी अच्छी ख़बर यह है कि तुम (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में हमेशा रहोगे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, असल में यही सबसे बड़ी कामयाबी है!" (12)

उसी दिन पाखंड करनेवाले [Hypocrites] मर्द और औरतें, ईमान रखनेवालों से कहेंगे, "हमारा इंतज़ार करो! थोड़ी सी अपनी रौशनी हमें भी लेने दो!" उनसे कहा जाएगा, "वापस चले जाओ और फिर रौशनी की तलाश करो!" फिर उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी, जिसमें एक दरवाज़ा होगा: उसके भीतर रहमत [mercy] होगी और उसके बाहर यातना खड़ी होगी। (13)

पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] ईमानवालों को पुकारकर कहेंगे, "क्या हम तुम्हारे साथी नहीं थे?" वे जवाब देंगे, "हाँ, थे तो सही! मगर तुमने ख़ुद अपने आपको ग़लत रास्ते पर डाल लिया, और (ईमानवालों की हार या मुसीबत की) प्रतीक्षा करते रहे, सन्देह में पड़े रहे और झूठी आशाओं ने तुम्हें धोखे में डाले रखा, यहाँ तक कि अल्लाह का आदेश आ पहुँचा---- धोखा देनेवाले [शैतान] ने अल्लाह के बारे में तुम्हें धोखे में डाले रखा। (14)

"आज के दिन तुमसे या उन (काफ़िर) लोगों से जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उनकी जानों के बदले कोई क़ीमत [फ़िदया/ ransom] स्वीकार नहीं की जाएगी: तुम्हारे रहने की जगह (जहन्नम की) आग है----- वही (तुम्हारी रक्षक है, और) तुम्हारे लिए सही जगह है---- किया ही बुरा ठिकाना है वह!" (15)



क्या ईमान रखनेवालों के लिए अब भी वह समय नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की याद के लिए और जो सच्चाई [क़ुरआन] उतारी गयी है, उसके लिए पसीज जाएँ, वे उन लोगों की तरह न हो जाएँ, जिन्हें उनसे पहले किताब दी गई थी, फिर उनके समय-काल को भी बढ़ाया गया, मगर उनके दिल कठोर हो गए और अब उनमें से बहुत सारे लोग क़ानून तोड़नेवाले हैं?  (16)

याद रहे कि अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से (हरी भरी करके) ज़िंदा कर देता है; हमने तुम्हारे लिए अपनी आयतें साफ़ और स्पष्ट तरीक़े से बयान कर दी हैं, ताकि तुम अपनी बुद्धि से काम ले सको। (17)

दान देनेवाले मर्द और दान देनेवाली औरतें, जो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देते हैं, उसे उनके लिए कई गुना कर दिया जाएगा, और उनको दिल खोलकर इनाम दिया जाएगा। (18)

जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, वे सच्चे लोग हैं और वे अपने रब के सामने गवाह होंगे: उनके लिए उनका इनाम होगा और (साथ में) उनकी रौशनी होगी। मगर जिन लोगों ने विश्वास नहीं किया और हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वालेे हैं। (19)

यह बात दिमाग़ में रहे कि सांसारिक जीवन तो बस एक खेल-तमाशा है, एक भटकाव है, एक आकर्षण है, तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर बड़ाई जताने का एक कारण है, और दौलत और सन्तान में परस्पर एक-दूसरे से बढ़ा हुआ दिखाने की एक होड़ का नाम है। यह तो उन पौधों की तरह हैं जो बारिश के बाद (जगह जगह) उग आते हैं: पौधा लगाने वाला शुरू शुरू में ऐसे पौधों को बढ़ते हुए देखकर बहुत ख़ुश हो जाता है, मगर फिर तुम उन्हें देखते हो कि वे मुरझा जाते हैं, पीले पड़ जाते हैं, फिर वह चारा [Stubble] होकर रह जाते हैं। आगे आनेवाली (आख़िरत की) ज़िन्दगी में दर्दनाक यातना भी है और अल्लाह की तरफ़ से माफ़ी और मंजूरी भी; इस दुनिया की ज़िन्दगी तो केवल धोखे की खुशियाँ (देने वाली) है। (20)

इसलिए तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से माफ़ी मांगने में और जन्नत हासिल करने में तुम एक-दूसरे से बाज़ी ले जाने की कोशिश करो, वह जन्नत जो लम्बाई-चौड़ाई में आसमानों और ज़मीन के बराबर है, जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हों: यह अल्लाह का फ़ज़ल व करम (bounty) है, वह जिसे चाहता है, देता है। और अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है। (21)



कोई भी दुर्घटना घट नहीं सकती, चाहे वह ज़मीन पर हो या ख़ुद तुम्हारी जानों पर हो, जबतक कि वह पहले ही से एक किताब [लौह-ए-महफ़ूज़/ Preserved Tablet] में लिखी हुई न हो, और (ये उस समय से लिखी हुई है) जब हम उनको अस्तित्व [वजूद] में लाए तक न थे ----और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है----- (22)

अत: जो चीज़ तुम्हारे हाथ न आ सकी, उस चीज़ का अफ़सोस न करो, और जो चीज़ तुम्हें हासिल हो जाए, उस पर इतराते न फिरो। अल्लाह ऐसे आदमी को पसंद नहीं करता जो घमंड में चूर रहता हो (और) डींगें हाँकता हो, (23)

(और) वे लोग जो कंजूस हों, और जो दूसरों को भी कंजूसी करने के लिए कहते हों। अगर कोई आदमी (दान करने से) मुँह मोड़ ले, तो याद रखो कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (उसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी तारीफ़ों के लायक़ है।  (24)

हमने अपने रसूलों को स्पष्ट निशानियों के साथ भेजा, और उनके साथ (आसमानी) किताब भी उतारी, और (सही-ग़लत को तोलने के लिए) पैमाना भी भेजा, ताकि लोग न्याय स्थापित कर सकें: हमने लोहा भी उतारा, जो (लड़ने के सामान में) बेहद मज़बूत होता है, और बहुत सारी चीज़ों में लोगों के काम आता है, ताकि अल्लाह उन लोगों की पहचान कर सके जो अल्लाह (के दीन की) और उसके रसूलों की मदद करेंगे, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते। सचमुच अल्लाह बहुत ताक़तवाला, प्रभुत्वशाली है। (25)



हमने नूह [Noah] और इबराहीम [Abraham] को भेजा, और उनकी सन्तानों को पैग़म्बरी [Prophethood] दी और उन पर (आसमानी) किताब उतारी: उनमें से कुछ तो ऐसे थे जो सही रास्ते पर चलने वाले थे, मगर बहुत सारे ऐसे थे जो नियमों को तोड़ने वाले थे।  (26)

फिर हमने (उन पैग़म्बरों के बाद) उनके क़दमों के निशान पर चलने के लिए दूसरे रसूलों को भेजा। उनके बाद हमने मरयम के बेटे ईसा [Jesus] को भेजा: हमने उन्हें इंजील [Gospel] प्रदान की, और उनके मानने वालों के दिलों में करुणा [kindness] और दया रख दी। लेकिन (बाद में) जीवन से संन्यास लेकर अलग-थलग रहने की परम्परा [Monasticism] एक ऐसी चीज़ थी जो इन्होंने ख़ुद से शुरू कर दी------ हमने उन्हें ऐसा करने का कोई हुक्म नहीं दिया था-----(ऐसा करके) वे केवल अल्लाह की ख़ुशी चाहते थे, और अगर ऐसा था तब भी, वे उसको ठीक ढंग से निभा न सके। अतः उनमें से जिन लोगों ने विश्वास कर लिया था, हमने उन्हें उसका इनाम दिया, मगर उनमें से ढेर सारे लोग नियमों को तोड़ने वाले थे। (27)

ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो, और उसके रसूल पर ईमान [विश्वास] रखो: अल्लाह तुम्हें अपनी रहमत [mercy] का दोहरा हिस्सा देगा; वह तुम्हारे लिए रौशनी कर देगा ताकि तुम उसके सहारे (सही रास्ते पर) चल सको; वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा-----अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (28)

किताब रखनेवालों [यहूदी/ईसायी] को यह जानना चाहिए कि अल्लाह की किसी मेहरबानी [grace] पर उनका कोई ज़ोर नहीं चल सकता, और यह कि किसी पर मेहरबानी करना तो केवल अल्लाह के ही हाथ में है: वह जिसको (मेहरबान होकर) देना चाहे, देता है। अल्लाह की मेहरबानियाँ बेहिसाब हैं।  (29)


नोट:

7:  सभी माल और दौलत का असली मालिक अल्लाह है। वह इसमें से इंसानों को उनकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए देता है, मगर चाहता है कि आदमी इस माल को उसके हुक्म के मुताबिक़ ख़र्च करे। इस हक़ीक़त की तरफ़ भी इशारा किया गया है कि दौलत कभी एक हाथ में नहीं रहती, बल्कि हमेशा एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती रहती है। इसलिए आदमी को चाहिए कि उस दौलत को उसके सही हक़दार को देता रहे। 

8: अल्लाह ने आदम (अलै) को पैदा करने से पहले ही सारे इंसानों की रूहों से वचन लिया था,   देखें 7: 172. यही वजह है कि हर इंसान के अंदर सच्चाई को पहचानने की सलाहियत मौजूद होती है, अगर वह मार्गदर्शन पर ध्यान से विचार करे। 

10: मक्का की जीत से पहले (8 हिजरी) मुसलमानों की संख्या और उनके साधन कम थे, और दुश्मन भी ज़्यादा थे, तो उस ज़माने में जिसने अल्लाह के रास्ते में जान और माल दिया, उनकी क़ुर्बानियाँ भी ज़्यादा थींइसलिए उनका दर्जा भी अल्लाह की नज़र में ऊँचा है। मक्का की जीत के बाद मुसलमानों की संख्या और साधनों भी बढ़ोतरी हुई और तब जान और माल की क़ुर्बानियाँ भी कम देनी पड़ीं, इसलिए बाद में ईमान लाने वालों का दर्जा थोड़ा कम होगा, मगर हाँ, जन्नत की नेमतें दोनों ही दर्जे के लोगों को मिलेंगी। 

11: इंसान जो कुछ दुनिया में ज़रूरतमन्दों को दान-दक्षिना, सदक़ा-ख़ैरात आदि देता है या अच्छे कामों में ख़र्च करता है, उसको अल्लाह ने क़र्ज़ कहा है, और उसके बदले में अल्लाह उस इंसान को दुनिया और आख़िरत में इस तरह देगा जैसे कि कोई क़र्ज़दार अपना क़र्ज़ वापस करता है। "अच्छावाला क़र्ज़" से मतलब अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए साफ़ मन से बिना दिखावा किए हुए किसी को देना। देखें 2: 245;  5: 12. 

12: शायद यह उस समय की बात है जब सारे लोग "पुल सिरात" से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर इंसान का ईमान रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा। 

13: पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] दुनिया में चूँकि अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते थे, इसलिए आख़िरत में भी पहले वे मुसलमानों के साथ लग जाएंगे, लेकिन जब असली मुसलमान तेज़ी से आगे निकल जाएंगे और उनके साथ उनकी रौशनी भी आगे

बढ़ जाएगी, तब ये लोग अंधेरे में पीछे छूट  जाएंगे। 

17: यानी जिन मुसलमानों से अब तक कुछ ग़लतियाँ हुई हैं और वे पूरी तरह ईमान के तक़ाज़ों को पूरा नहीं कर पाए, उन्हें मायूस नहीं होना चाहिए; जिस तरह अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से हरी-भरी कर देता है, उसी तरह, वह गुनाहों से तौबा करने वालों के गुनाह माफ़ करके उन्हें नई ज़िंदगी दे देता है। 

19: "सच्चे लोग" [सिद्दीक़] वे होते हैं जो अपनी बात में और अपने काम में सच्चे होते हैं, इसीलिए उनका दर्जा बहुत ऊँचा होता है। ऐसे लोग अपने रब के सामने गवाह [शहीद] होंगे और वे क़यामत के दिन सारे नबियों के गवाह के तौर पर पेश किए जाएंगे [2: 143] ; गवाह होने का एक मतलब यह भी है कि सच्चाई की तरफ़ लोगों को बुलाना और उन्हें इसकी तालीम देते रहना जिस तरह मुहम्मद (सल्ल) ने अपने मानने वालों को यह शिक्षा दी थी। 

22: किताब से मतलब वह "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] है जिसमें अल्लाह ने क़यामत तक होने वाली घटनाओं को पहले से ही लिख रखा है। 

23: जिस आदमी को इस बात पर ईमान होता है कि जो कुछ भी होता है वह तक़दीर में लिखे अनुसार ही होता है, वह हर बुरी से बुरी घटना पर भी धीरज से काम लेता है। इसी तरह अगर उसके साथ कोई अच्छी चीज़ हो जाए, तो बजाए इतराने के, उसे अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसे भी तक़दीर का लिखा ही मानना चाहिए। 

24: जो लोग तक़दीर पर विश्वास नहीं करते, वह अपने सारे माल को अपनी कोशिशों से हासिल किया हुए समझते हैं और उस पर इतराते हैं, और उसे अल्लाह के रास्ते में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों पर ख़र्च करने से कंजूसी करते हैं। 

25: चाहे सांसारिक मामला हो या सही या ग़लत के बीच फ़ैसला करना हो, हमेशा हर चीज़ में इंसाफ़ [न्याय] के साथ काम होना चाहिए। नबियों की शिक्षाएं और उनकी लायी हुई किताबों पर अगर सही तरीक़े से अमल हो, तो हर मामले में न्याय हो सकता है। लेकिन साथ में बुराई की ताक़तें हमेशा फ़साद फैलाती रहती हैं और अन्याय होता रहता है, जिसे दूर करने के लिए इंसानों को लोहा दिया गया है जिससे दूसरे फ़ायदे के साथ जंगी सामान भी बनते हैं, ताकि उन शैतानी ताक़तों से लड़कर न्याय बहाल किया जा सके, साथ में यह भी पता चल जाए कि कौन है जो सच्चाई का साथ देने वाला है। 

27: हज़रत ईसा (अलै) के जाने के बाद उनके सच्चे शिष्यों और उनकी शिक्षाओं पर चलने वालों पर उस ज़माने के राजाओं ने बहुत ज़ुल्म किए, उससे बचने और अपना दीन बचाने के लिए उन लोगों ने शहरों से दूर अलग-थलग रहना शुरू किया जहाँ ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं बहुत कम थीं, वहाँ monasteries स्थापित कर ली गई, और धीरे-धीरे इसी तरह जीवन बिताने को इबादत समझ लिया। बाद में, जब उन पर ज़ुल्म होना बंद हो गया और ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं मिलने लगीं, तब भी उन लोगों ने इनसे दूर ही रहकर कठिन जीवन बिताना चाहा, उनकी शादी-ब्याह भी नहीं होती थी, हालाँकि अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म नहीं दिया था। हालाँकि ऐसा उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किया था, मगर बाद में उनकी monastery system में बहुत सी गड़बड़ियाँ पैदा होने लगीं, चूँकि इस तरह का जीवन जीना प्रकृति के ख़िलाफ़ था, इसलिए छुप-छुपकर वे आपस में  यौन संबंध भी बनाने लगे, इस तरह, वे इस तरीक़े को ठीक ढंग से निभा न सके। 

28: यहाँ उन किताबवाले यहूदियों और ईसाइयों का ज़िक्र है जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) के रसूल होने पर विश्वास कर लिया था, इसके लिए अल्लाह उन्हें दोहरा सवाब देगादेखें 28: 54. 

29: यहूदी या ईसाई लोग जो कि किताब वाले थे, केवल अपनी जलन और नफ़रत की वजह से मुहम्मद सल्ल पर ईमान नहीं ला पाए, और वे यही सोचते रहे कि आख़िरी नबी इसराइल की संतानों में न होकर इस्माइल की संतानों में कैसे हो गया! हालांकि नबी बनाने का काम पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है। 

ईसाइयों में एक ज़माने में एक अजीब तरीका प्रचलित हो गया था, उनके पादरी पैसे

लेकर लोगों को माफ़ी के परवाने जारी कर देते थे, जिसे मरने वाले के साथ ही उनकी क़ब्रों में  गाड़ दिया जाता था, और यह मान लिया जाता था कि मरने वाले के गुनाह माफ़ हो जाएंगे। यहाँ यह बताया गया है कि अल्लाह किसके साथ मेहरबानी करेगा, यह पूरी तरह उसके ही हाथ में है। 







सूरह 64: अत-तग़ाबुन 

[एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना/ Mutual Neglect]


यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 9 में आए फ़ैसले के दिन यानी "जीत और हार के दिन" [या एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करने के दिन] के ज़िक्र पर रखा गया है। यह सूरह अल्लाह की ताक़त, उसकी गहरी समझ-बूझ और उसके बेपनाह ज्ञान के वर्णन से शुरू होती है (आयत 1-4). विश्वास न करने वालों को याद दिलाया गया है कि कैसे उनसे पहले के विश्वास न करने वालों का अंत हुआ (आयत 5-6), और दोबारा ज़िंदा उठाए जाने से इंकार करने की सोच को ज़ोरदार ढंग से ग़लत साबित किया गया है (आयत 7). ईमानवालों को होशियार रहने पर ज़ोर दिया गया है, मगर उन्हें अपने उन दुश्मनों को माफ कर देने को कहा गया है क्योंकि हो सकता है कि वे उसके ही ख़ानदान से हों (आयत 14-15), और मुसलमानों को चेतावनी दी गई है कि वे अपने क़दम धीरज से जमाए रखें, और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करते रहें। 



विषय:

01-04: अल्लाह की महानता, उसकी ताक़त और उसका ज्ञान 

05-06:  चेतावनी पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा से 

07-10: (सच्चाई पर) विश्वास करने वाले और विश्वास न करने वालों का अंजाम 

11-18: ईमानवालों की आज़माइश और उन्हें ग़लत चीज़ करने पर उकसाना 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह की बड़ाई बयान करती है; सारा नियंत्रण [बादशाही], और सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं; उसके पास हर चीज़ की ताक़त है।  (1)


वही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर भी तुममें से कुछ (लोग) विश्वास नहीं करते [काफ़िर] हैं, और कुछ (लोग) विश्वास करनेवाले [मोमिन] हैं: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ को देख रहा होता है। (2)


उसने आसमानों और ज़मीन को सही मक़सद के साथ पैदा किया; उसने तुम्हारा रूप बनाया, और (देखो) कितना अच्छा रूप बनाया: तुम सबको (अंत में) उसी के पास लौटकर जाना होगा।  (3)


जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह उसे जानता है; वह उसे भी जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ तुम सामने बता देते हो; अल्लाह तो हर दिल के अंदर छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है! (4)



[विश्वास न करनेवाले, काफ़िरो!] क्या तुमने उन लोगों के बारे में नहीं सुना, जिन्होंने तुम से पहले (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था? उन्होंने (दुनिया में) अपने काम के बुरे नतीजे का मज़ा चखा, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है। (5)


वह इसलिए हुआ कि उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाण लेकर आते रहे, मगर इसके बावजूद, वे कहते थे, "क्या (मर-खप जानेवाले मामूली) आदमी हमें मार्ग दिखाएँगे?", उन्होंने (हमारे संदेश को) मानने से इंकार किया, और मुँह फेर लिया। मगर अल्लाह को तो उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी: वह तो हर तरह से आत्मनिर्भर है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)



विश्वास न करनेवाले यह दावा करते थे कि मरने के बाद वे दोबारा नहीं उठाए जाएँगे। (ऐ रसूल) आप कह दें, "हां, क़सम है मेरे रब की! तुम ज़रूर उठाए जाओगे, और तब तुम्हें वे सारी चीज़ें बता दी जाएंगी, जो कुछ तुमने किया होगा: अल्लाह के लिए यह बहुत आसान काम है।" (7)



अतः ईमान रखो अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और (रास्ता दिखानेवाली) उस रौशनी [क़ुरआन] पर, जिसे हमने भेजा है: तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (8)


(एक दिन) जब वह तुम (सब) को जमा करेगा, उस ‘इकट्ठा किए जानेवाले दिन' [क़यामत] पर, जो "एक-दूसरे के मुक़ाबले में हार-जीत का दिन (या एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन)" [तग़ाबुन] होगा, तो जिसने अल्लाह पर ईमान रखा होगा, और अच्छे कर्म किए होंगे, उनके गुनाहों को वह मिटा देगा: वह उन्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (9)


मगर वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, और हमारी निशानियों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, उसी में वे (हमेशा) रहेंगे---- वह कितना बुरा ठिकाना है!  (10)



मुसीबतें बिना अल्लाह की अनुमति के नहीं आ सकती हैं ---- जो कोई अल्लाह पर ईमान रखता है, तो अल्लाह उसके दिल को सही रास्ता दिखा देगा: अल्लाह हर चीज़ जानता है----(11)


अतः अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करो। अगर तुम उससे मुँह मोड़ते हो, तो याद रखो, हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी बस हमारे संदेशों को साफ़-साफ़ पहुँचा देने की है। (12)


अल्लाह! कि उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है, अतः ईमानवालों को अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए। (13)


ऐ ईमानवालो, यहाँ तक कि तुम्हारे पति/ पत्नियों और तुम्हारे बच्चों में से कुछ ऐसे हैं जो तुम्हारे दुश्मन हैं ----- उनसे होशियार रहो----- लेकिन अगर तुम उनकी ग़लतियों को अनदेखा करो, उन पर ग़ुस्सा न करो, और उन्हें माफ़ कर दो, तो फिर अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (14)



तुम्हारी धन-दौलत और तुम्हारे बाल-बच्चे, तुम्हारे लिए केवल एक आज़माइश हैं। और वह अल्लाह है जिसके पास बड़ा इनाम है: (15)

 

जहाँ तक तुम से हो सके, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो; सुनो और आज्ञा का पालन करो; और (ज़रूरतमंदों पर) ख़र्च करो---- यह तुम्हारे ख़ुद के लिए अच्छा होगा। जो अपने मन के लोभ से बचा रहा, वही कामयाब लोगों में से होगा:  (16)


अगर तुम साफ़ दिल से अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें माफ़ कर देगा। अल्लाह हमेशा अच्छाई की क़द्र करनेवाला, और सहनशील है, (17)


अल्लाह उसे भी जानता है, जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो चीज़ दिखायी देती है; वह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (18)





नोट:

9: क़यामत के दिन को "तग़ाबुन" का दिन कहा गया है। तग़ाबुन के कई मतलब हैं, एक-दूसरे को नुक़सान में डाल देना, किसी चीज़ के न मिलने का दुख होना, एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना आदि। चूंकि क़यामत के दिन लोगों को अपनी-अपनी पड़ी होगी, इसलिए यह एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन होगा, फिर यह कि जहन्नम में जाने वाले लोग जन्नतियों को देखकर अफ़सोस करेंगे कि काश उन्होंने भी अच्छे काम किए होते, तो यह एक-तरह से हार-जीत का भी दिन होगा। 


11: ईमानवालों को इस बात पर यक़ीन होना चाहिए कि कोई भी मुसीबत बिना अल्लाह के हुक्म के नहीं आती, इसलिए हर मुसीबत को धीरज [सब्र] के साथ बर्दाश्त करना चाहिए। इसे भी देखें 57:22


14: जो बीवी-बच्चे आदमी को अल्लाह के हुक्म के ख़िलाफ़ काम करने पर उकसाएं, वे आदमी के एक तरह से दुश्मन हैं, हाँ, अगर वे अपने ग़लत काम से तौबा करते हुए माफ़ी माँग लें,  तो उन्हें माफ़ कर देना चाहिए।


15: धन-दौलत और बाल-बच्चों के मोह में अल्लाह के हुक्म को भूल नहीं जाना चाहिए।


17: अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देने का मतलब यह है कि नेक कामों में पूरे दिल से ख़र्च करना, बिना नाम कमाने की चाहत या दिखावा किए हुए। 













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