Monday, March 6, 2023

Later Meccan I

 Later Meccan Suras I [615 AD – 619 AD]

 

सूरह 32: अस-सज्दा

[नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]



यह एक मक्की सूरह है, सच्चे ईमानवालों का अपनी इबादतों में अल्लाह के आगे झुकने [सज्दा] का जो विवरण (आयत 15) आया है, उसी हवाले से इस सूरह का नाम पड़ा है। सूरह की शुरुआत में क़ुरआन की सच्चाई पर ज़ोर दिया गया है, और बताया गया है कि अल्लाह ही अकेला सारी सृष्टि को पैदा करने वाला है और वही उसे दोबारा भी ज़िंदा करेगा। अंत में रसूल से कहा गया है कि अगर विश्वास न करने वाले अल्लाह की निशानियों के महत्व को नहीं देख पा रहे हैं, तो उस पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। 

विषय:

 

01-03: किताब [क़ुरआन] और सावधान करने वाला 

04-09: अल्लाह को हर चीज़ पैदा करने की ताक़त 

10-14: विश्वास न करने वाले क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते 

15-22: इनाम और सज़ा 

23-25: मूसा की किताब और इसराईल की संतानें 

26-30: ईमानवालों को प्रमाण मिल जाना 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)

 

यह किताब [क़ुरआन], जो हर तरह के संदेह से परे है, सारे संसार के रब की ओर से उतारी जा रही है। (2)

 

इसके बावजूद, वे यही कहते हैं, "मुहम्मद ने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है!" बिल्कुल नहीं!, यह तो वह सच्चाई (की बातें) हैं जो [ऐ रसूल], आपके रब की तरफ़ से आपके लिए हैं, जिससे आप उन (मक्का के) लोगों को सावधान कर दें जिनके पास इससे पहले सावधान करने वाला कोई नहीं आया था, ताकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा सके।  (3)

 

यह तो अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को और वह सारी चीज़ें जो दोनों के बीच में हैं, छह दिनों में पैदा किया। फिर उसने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया। तुम (लोगों) के पास उस (अल्लाह) के सिवा कोई नहीं जो तुम्हारी रक्षा कर सके, और न कोई है जो तुम्हारे लिए सिफ़ारिश कर सके। तो फिर क्यों तुम (नसीहत पर) ध्यान नहीं देते? (4)

 

वह आसमान से लेकर ज़मीन तक, हर एक चीज़ को सही ढंग से चलाता है, और अंत में, एक दिन हर एक चीज़ चढ़कर उसके पास पहुँच जाएगी, और वह (क़यामत का) दिन तुम्हारे हिसाब से एक हज़ार साल के बराबर का होगा। (5)

 

वह ऐसा है जो सब जानता है --- वह चीज़ भी जो दिखायी नहीं देती हो और वह भी जो दिखायी देती हो, वह बहुत प्रभुत्वशाली व हर एक पर दयावान है,  (6)

 

जिसने हर एक चीज़ को बिल्कुल सही [Perfect] रूप दिया है। उसने आदमी को पहले मिट्टी से बनाया,  (7

 

फिर उसकी नस्लों को मामूली से तरल पदार्थ [वीर्य, Semen] के सत [extract] से बनाया।  (8)

 

फिर उसके (शरीर के आकार को) ठीक-ठाक किया; और फिर उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी; उसने तुम्हें सुनने की, देखने की, और सोचने की क्षमता दी। मगर, तुम बदले में बहुत कम ही (मेरा) शुक्र अदा करते हो!  (9)

 

वे कहते हैं, "क्या? जब हम (मर के) मिट्टी में मिल चुके होंगे, तो फिर क्या सचमुच हम नए सिरे से पैदा किए जाएंगे?” असल में, वे अपने रब से होने वाली मुलाक़ात को मानने से इंकार करते हैं।  (10)

 

कह दें, "मौत का फ़रिश्ता जो तुम पर नियुक्त है, वह तुम्हें फिर से अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, और फिर तुमको अपने रब के पास लाया जाएगा।" (11)

 

[ऐ रसूल] काश आप शैतानी करने वालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे): "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (12

 

अगर हमने ऐसा चाहा होता, तो हमने ज़रूर हर आदमी को (पहले से ही) सच्चे व सही रास्ते पर चलाया होता, मगर मेरी कही हुई बात ही सच हुई है, (जब मैंने कहा था) कि "मैं जहन्नम को अवश्य ही जिन्नों और इंसानोंसब से भर दूँगा।" (13

 

जिस तरह तुम उस (क़यामत के) दिन हम से होने वाली मुलाक़ात को भुलाए बैठे थे, अब हम भी तुम्हें (उसी तरह) भुला देंगे: जो कुछ भी तुम किया करते थे, उसके बदले में अब चखो मज़ा कभी न ख़त्म होने वाली यातनाओं का!” (14)

 

 

हमारी आयतों [संदेशों] पर तो बस वही लोग सच्चा ईमान रखते हैं, जिन्हें उन (आयतों) के द्वारा जब नसीहत दी जाती है, तो वे हमारे सामने (सज्दे में) अपनी गर्दन झुका देते हैं, अपने रब की बड़ाई का गुणगान करते हैं, और घमंड में अपने आपको बड़ा नहीं समझते।  (15)

 

(रात में सोते हुए) वे अपने बिस्तरों को छोड़कर उठ जाते हैं, डर और उम्मीद (के मिले-जुले भाव) के साथ अपने रब की इबादत करते हैं; और जो भी हमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ दूसरों को भी देते हैं।  (16

 

किसी (जान) को भी मालूम नहीं कि जो कुछ (अच्छे कर्म) वे करते हैं, उसके बदले इनाम में उन्हें कितनी ख़ुशी मिलेगी जो छुपाकर ख़ास तौर से रखी गयी है।  (17)

 

भला जो आदमी (अल्लाह पर) ईमान रखता हो, वह उस आदमी के बराबर कैसे हो सकता है जो अल्लाह को मानता ही न हो? नहीं, वे बराबर नहीं हो सकते!  (18)

 

जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, उनके लिए बाग़ों [जन्नत] में हमेशा रहने का घर होगा, और यह इनाम होगा उन (नेक) कर्मों का जो उन्होंने किया होगा।  (19)

 

रहे वे लोग जो अल्लाह के हुक्म को नहीं मानते, उनका घर (जहन्नम की) आग होगा। जब कभी वे वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे, उन्हें पकड़कर फिर उसी (आग) में डाल दिया जाएगा और उनसे कहा जाएगा, "चखो उस आग की यातना का मज़ा, जिसे तुम हमेशा झूठ समझते थे।" (20)

 

हम उन्हें (परलोक की) बड़ी यातना से पहले, (इसी दुनिया में) छोटी यातना का मज़ा चखाएँगे, ताकि शायद वे (विचार करें और) सही मार्ग पर (वापस) आ जाएं।  (21)

 

उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम [ज़ुल्म] करने वाला कौन होगा जिसके सामने जब उसके रब की आयतों को पढ़कर सुनाया जाता है, तो वह उनसे मुँह मोड़कर चला जाए? निश्चय ही हम अपराधियों को कड़ी सज़ा देंगे।  (22)

 

 

हमने मूसा [Moses] को (आसमानी) किताब [तोरात/Torah] दी थी --- अतः [ऐ मुहम्मद] आपको इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि आपको भी (आसमानी) किताब दी जा रही है---- और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को सही रास्ता दिखाने वाली बनाया था।  (23)

 

जब वे धीरज रखते हुए (सच्चाई पर) जम गए, और हमारी आयतों पर पक्का विश्वास करने लगे, तब हमने उनमें से नायकों [leaders] को उठाया, जो हमारे आदेश से (लोगों को) मार्ग दिखाते थे। (24)

 

[ऐ रसूल], आपका रब है जो क़यामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं।  (25)

 

 

क्या उनके लिए यह सी़ख लेने की चीज़ नहीं कि (वे देखते कि) उनसे पहले, कितनी ही नस्लों को हम बर्बाद कर चुके हैं, जिनके रहने-बसने की जगहें (अब खंडहर बन चुकी हैं), जिनके बीच से वे चलते-फिरते हैं? सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं---- फिर क्या वे सुनते नहीं? (26)

 

क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम किस तरह बारिश को सूखी बंजर ज़मीन की ओर खींचकर ले जाते हैं। फिर उसके द्वारा खेती उगाते हैं, जिसमें से उनके चौपाए भी खाते है और वे ख़ुद भी खाते हैं? तो क्या उन्हें सूझता नहीं? (27)



वे कहते हैं कि "यह फ़ैसला कब होगा, बताओ अगर तुम सच्चे हो?" (28

 

कह दें कि "(सच्चाई से) इंकार करने वाले अगर फ़ैसले के दिन, विश्वास कर भी लें, तब भी उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा; उन्हें कोई ढील नहीं दी जाएगी।" (29)

 

सो [ऐ रसूल], आप उनसे मुंह मोड़कर अलग हो जाएं, और इंतज़ार करें: वे भी इंतज़ार कर रहे हैं।  (30)







नोट:



3: मक्का के इलाक़े में जब से मूर्तियों की पूजा शुरू हुई और ज़्यादातर लोग बहुदेववादी हो गए,  उस समय से वहाँ कोई नबी नहीं आया था जो अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाता। हाँकुछ लोग ज़रूर निजी स्तर पर एक अल्लाह की सच्चाई का संदेश देते रहते थे।

4: अरब के लोग देवी-देवताओं की पूजा इसलिए करते थे कि वे उनकी ज़रूरतों के लिए अल्लाह से सिफ़ारिश करेंगेजैसा कि सूरह यूनुस (10:18) में आया है।

13: जिन्नों और इंसानों को पहली बार बनाने का मक़सद ही यह था कि उन्हें दुनिया में भेजकर आज़माया जाए। उसी समय यह बात तय कर दी गई थी कि अगर वे नबियों के मार्गदर्शन को मानते हुए सही रास्ते पर चलते हैं तो उन्हें जन्नत मिलेगीऔर जो कोई सच्चाई को मानने से इंकार करेगाउसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा।

26: अरब के व्यापारियों का कारवाँ अक्सर पुरानी क़ौमों के खंडहरों से होकर गुज़रता थाजैसे समूद की क़ौम के टूटे-फूटे खंडहर इन्हीं रास्तों में पड़ते थे।

 

 

सूरह 41: फ़ुस्सिलत/अस-सज्दा 

[स्पष्ट आयतें, Verses made distinct]

 

यह एक मक्की सूरह है जिसमें विश्वास न करने वालों द्वारा ग़लत चीज़ पर अड़े रहने के बारे मेंक़ुरआन की सच्चाई के बारे मेंएक अल्लाह के होने मेंऔर क़यामत के हर हाल में आने के बारे में विवरण आया है। इस सूरह का नाम आयत और फिर 44 में आए एक शब्द पर रखा गया है जो क़ुरआन के लिए इस्तेमाल हुआ है। इस सूरह में ऐसे बहुत से हवाले दिए गए हैं जिनमें कहा गया है कि विश्वास न करने वालों ने अपने  आँख-कान बंद कर रखे हैं (5, 20-22, 44), जिसके चलते वे इस दुनिया में सच्चाई को पहचानने में असमर्थ रहेक़यामत के दिन ये आँख-कान व दूसरे अंग अपने 'मालिकोंके ख़िलाफ़ गवाही देंगेऔर यह भी वर्णन किया गया है कि जब सब कुछ ठीक रहता हैतब लोग अपने घमंड दिखाते हैंऔर इसके विपरीत जब मुश्किलें पड़ती हैं तब विनम्र और दुखी हो जाते हैं (49-51). "आदऔर "समूदके घमंडी और नाशुक्रे लोगों की तबाही के हवाले भी दिए गए हैं जिनके खंडहरों से होकर अरब के कारवाँ अक्सर सीरिया और यमन की यात्रा के दौरान गुज़रते थे। 

 

 

विषय:

 

02-03: यह क़ुरआन अरबी में है

04-08: अल्लाह के रसूल और उनका संदेश 

09-12: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

13-18: 'आदऔर 'समूदकी मिसालें 

19-23: कर्मों का हिसाब-किताब

24-25: विश्वास न करने वालों की हठधर्मी 

26-28: विश्वास न करने वाले क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते हैं 

29-32: कर्मों का हिसाब-किताब: फ़ैसले का दृश्य 

33-36: रसूल को सलाह 

37-40: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

41-44: रसूल पर 'वही'[revelation] का आना पहले के नबियों जैसा है

   45: मूसा (अलै) की किताब पर भी मतभेद 

   46: हर एक अपने कर्म के लिए ज़िम्मेदार है

47-48: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य 

49-51: लोग नाशुक्रे हैं 

   52: विश्वास न करना एक संजीदा मामला है 

53-54: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 

हा॰ मीम॰ (1)

 

सब पर मेहरबानी करने वालेबेहद दयावान [रब] की ओर से यह (किताब) उतारी [reveal] जा रही है;  (2)

 

अरबी में क़ुरआन के रूप में एक ऐसी किताबजिसकी आयतों को स्पष्ट और अलग पहचानवाली बनाया गया हैउन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं,  (3)

 

जो अच्छी ख़बर देने वाली और सावधान करने वाली (किताब) है। फिर भी उनमें से अधिकतर लोगों ने इससे मुँह मोड़ रखा हैसो वे सुनते ही नहीं हैं। (4)

 

वे [रसूल से] कहते हैं कि "जिस चीज़ (पर विश्वास कर लेने) के लिए तुम हमें बुलाते होउसके ख़िलाफ़ तो हमारे दिलों पर परत चढ़ी हुई हैहमारे कान बहरे हैंहमारे और तुम्हारे बीच (रोक के लिए) एक पर्दा है। अतः तुम जो कुछ चाहते हो करोहमें जो अच्छा लगेगा वह हम करेंगे।" (5)

 

[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो तुम्हारे जैसा ही एक इंसान हूँ, (मगर) मुझ पर यह बात उतारी गयी है कि तुम्हारा ख़ुदा असल में एक ही ख़ुदा है। अतः तुम उसी (ख़ुदा) की ओर जाने वाले सीधे रास्ते को अपनाओ और उसी से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो। बड़ी तबाही है उन [मुशरिकों/Idolaters] कीजो एक अल्लाह के साथ (दूसरों को) उसका साझेदार [Partner] ठहराते हैं, (6)

 

जो ज़कात [दान] नहीं देते और आने वाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] को मानने से इंकार करते हैं!  (7)

 

वे लोग जो ईमान रखते हैंऔर अच्छे कर्म करते रहते हैंतो उनके लिए (बदले में) ऐसा इनाम है जिसका सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं।" (8)

 



कह दें, "तुम उस (अल्लाह) का इंकार कैसे कर सकते होजिसने धरती को दो दिनों [कालों] में पैदा कियातुम दूसरों को उस (अल्लाह) के बराबर का कैसे ठहरा सकते होवह तो सारे संसारों का पालनहार है!  (9)

 

उसने उस (धरती) में ठोस पहाड़ों को जमा दिया जो उभरे रहते हैंऔर उसके अंदर (खनिज पदार्थ आदि से) बरकत [blessing] डाल दीऔर उसमें उन सब के लिए जो उन्हें पाना चाहते होंठीक अंदाज़े के साथ क़िस्म-क़िस्म के खाने-पीने व जीवन जीने के सामान रख दिए --- और यह सब कुछ चार दिन [काल] में हो गया। (10)

 

फिर उस [अल्लाह] ने आसमान की ओर ध्यान दियाजो कि उस समय मात्र धुआँ था-- और उसने उस [आसमान] से और ज़मीन से कहा, 'चले आओ (हमारा आदेश मानते हुए)खुशी के साथ या अनिच्छा से।उन्होंने कहा, 'हम ख़ुशी-ख़ुशी आते हैं--- '  (11)

 

और उसने दो दिनों में (अपने फ़ैसले के मुताबिक़) सात आसमानों को बना डालाऔर प्रत्येक आसमान में उस (की व्यवस्था) से सम्बन्धित आदेश भेज दिए। हमने इस दुनिया से सबसे नज़दीक वाले आसमान को दीपों [तारों व ग्रहों] से सजाया और उसे ख़ूब सुरक्षित कर दिया। ऐसी है व्यवस्थाअत्यंत प्रभुत्वशाली और सब कुछ जानने वाले (रब) की।" (12)

 

 

(फिर भी) अगर वे लोग ध्यान न दें और मुँह मोड़ें तो आप कह दें, "मैंने तुम्हें उस कड़कदार धमाके [thunderbolt] से सावधान कर दिया हैजैसा धमाका ‘आद और समूद’ पर आ पड़ा था": (13)

 

जब उन लोगों के पास रसूलों के संदेश आए, (कभी) उनके आगे से और (कभी) उनके पीछे से [हर दृष्टिकोण से उन्हें समझाया गया] कि "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो", मगर उन्होंने कहा, "अगर हमारा रब चाहता तो उसने फ़रिश्तों को भेज दिया होता। अतः जिस संदेश के साथ तुम्हें भेजा गया हैहम उस पर विश्वास नहीं करते।" (14)

 

आद' की क़ौम के लोग ज़मीन पर हर जगह घमंड में चूर रहे और वह सब किया जिसका उन्हें कोई अधिकार न थाऔर कहते थे, "कौन है जो हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्हें यह नहीं सूझा कि जिस अल्लाह ने उन्हें पैदा कियावह उनसे शक्ति में कहीं बढ़कर हैवे हमारी आयतों को मानने से इंकार ही करते रहे,  (15)

 

सो हमने उन लोगों पर कुछ दिनों के लिए (तबाह कर देने वाली) एक अत्यंत तेज़ आँधी छोड़ दीताकि उन्हें सांसारिक जीवन में अपमानित करने वाली यातना का मज़ा चखा देंहालाँकि आने वाले जीवन [आख़िरत/परलोक] की यातना तो इससे कहीं बढ़कर अपमानित करने वाली होगीऔर उनको कोई सहायता भी नहीं दी जाएगी। (16)

 

और रहे 'समूद' (के लोग)तो हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया थामगर सही मार्ग अपनाने के बजाए उन्होंने अन्धा रहना ही ज़्यादा पसन्द किया। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ (बुरे कर्मों की) कमायी वे करते रहे थेउसके बदले में एक कड़कदार धमाके ने उन्हें जकड़ लिया जो बेइज्ज़त कर देने वाला दंड था।  (17)

 

और हमने उन लोगों को बचा लिया जो (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखते थे और बुरे कामों से बचते थे। (18)

 

 

 

एक दिन आएगाजब अल्लाह के शत्रुओं को इकट्ठा करके (जहन्नम की) आग की ओर हँकाया जाएगाफिर उन्हें श्रेणियों में बाँटकर खड़ा किया जाएगा, (19)

 

यहाँ तक कि जब वे उस (आग) के पास पहुँच जाएँगेतो उनके कानउनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगीजो कुछ (बुरे कर्म) वे करते रहे थे। (20)

 

वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने बोलने की शक्ति दी हैजिसने हर चीज़ को बोलने की ताक़त दी है-- उसी ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी के पास तुम्हें वापस लाया गया है--  (21)

 

तब भीतुमने अपने आपको अपने कानों सेअपनी आँखों से और अपनी खालों से छुपाने की कोशिश नहीं कीताकि तुम अपने कानोंआँखों और खालों को अपने ही विरुद्ध गवाही देने से रोक पाते। तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही नहीं है जो कुछ तुम करते रहे थे, (22)

 

 

इस तरहअपने रब के बारे में जो तुमने एक (ग़लत) सोच पाल रखी थीवही तुम्हें बर्बादी की ओर ले गयीऔर तुम उन लोगों में शामिल हो गए जो पूरी तरह घाटे में पड़ गए।” (23)

 

अब चाहे वे धीरज रखते हुए (यातना) झेलने के लिए तैयार होंतब भी (जहन्नम की) आग ही उनका ठिकाना हैऔर अगर वे अपनी ग़लतियों को सुधारने के लिए मौक़ा दिए जाने का निवेदन करेंतब भी उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।  (24)

 

हमने (दुनिया में) उन (विश्वास न रखने वालों) के लिए कुछ साथियों [शैतानों] को नियुक्त कर दिया है जो उनके बीते हुए कल और आज के समय को इस तरह दिखाते हैंजो उनको सही और सुहावना लगने लगता हैमगर उनके लिए सज़ाओं का फ़ैसला पहले ही तय हो चुका हैइनमें जिन्नों और इंसानों की वे पीढ़ियाँ भी शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं: वे घाटा उठानेवालों में से थे।  (25)

 

 

जिन लोगों ने इंकार कियाउन्होंने (एक दूसरे से) कहा, "इस क़ुरआन को सुनो ही मतऔर (अगर कोई इसे सुना रहा हो तो) इसके बीच में बेकार बातों से हल्ला-ग़ुल्ला मचा दिया करोताकि तुम अपनी बड़ाई बनाए रख सको।" (26)

 

 

अतः हम अवश्य ही विश्वास न रखनेवालों को कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे। हम उनके कर्मों का बदलाउनके द्वारा किए गए सबसे बुरे कर्मों के हिसाब से देंगे---  (27)

 

 

अल्लाह के दुश्मनों के लिए यही (उचित) बदला है--– (जहन्नम की) आग ही उनके लिए हमेशा रहने का ठिकाना होगाहमारी आयतों को ठुकराने की यही मज़दूरी है। (28)

 

 

जिन लोगों ने इंकार किया [काफिर]वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमें उन जिन्नों और आदमियों को दिखा देजिन्होंने हमको रास्ते से भटका दिया थाताकि हम उन्हें अपने पैरों तले ऐसा कुचल डालें कि वे सबसे नीचे वालों में जा पड़ें।”  (29)

 

 

(दूसरी तरफ़) जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है"फिर उसकी तरफ़ जाने वाले सीधे रास्ते पर जमे रहेतो बेशक उन पर फ़रिश्ते (यह कहते हुए) उतरेंगे कि "अब न दिल में कोई डर रखो और न किसी बात पर दुखी होबल्कि उस जन्नत (के पाने) की ख़ुशियाँ मनाओजिसका तुमसे वादा किया जाता था। (30)

 

 

हम इस संसार में भी और आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भीतुम्हारे दोस्त व मददगार हैंऔर वहाँ [जन्नत में] तुम्हारे दिल में जिस चीज़ की भी इच्छा होगी और जिस चीज़ की भी तुम माँग करोगेतुम्हारे लिए वह सब कुछ (हाज़िर) होगा---- (31)

 

एक तोहफ़े के रूप मेंजो तुम्हारे स्वागत में सबसे ज़्यादा माफ़ करनेवाले और बड़ी मेहरबानी करने वाले [रब] की तरफ़ से दिया जाएगा।" (32)

 

बातचीत करने में उस आदमी से अच्छा कौन हो सकता है जो लोगों को अल्लाह की ओर बुलाएऔर अच्छे कर्म करे और कहे, "मैं उन लोगों में से हूँ जो एक अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले [मुस्लिम] हैं?" (33)

 

अच्छाई और बुराई के काम बराबर नहीं हो सकते। [ऐ रसूल]आप बुराई [बुरे व्यवहार] का जवाब अच्छे से अच्छे व्यवहार से दिया करेंऔर आप देखेंगे कि आपका दुश्मन भी आपके पुराने और घनिष्ठ दोस्त जैसा हो गया,  (34)

 

 

मगर केवल वही लोग ऐसी अच्छाई (के मुक़ाम) तक पहुँचेंगेजो धीरज रखते हुए (भलाई के) काम में लगे रहते हैंऔर जिन पर (अल्लाह ने) नेकी के रास्ते पर चलने के लिए ख़ास करम [blessing] किया है। (35)

 

 

अगर शैतान (तुम्हारे ग़ुस्से को) इस तरह से उकसा दे कि तुम भड़क उठोतो अल्लाह की शरण [पनाह] माँग लिया करो: वह सब कुछ सुनता है और सब जानता है।  (36)

 

 

 

यह रातयह दिनयह सूरजयह चाँदये तो उस (अल्लाह) की केवल चंद निशानियाँ हैं। सूरज या चाँद के आगे पूजा करने के लिए मत झुक जाया करोबल्कि उस अल्लाह के सामने सिर झुकाओजिसने उन्हें पैदा कियाअगर सचमुच तुम उसी (अल्लाह) की बन्दगी करते हो।  (37)

 

अगर विश्वास न रखनेवाले [काफ़िर]इतने ही घमंडी हैं (कि मेरे सामने झुक नहीं सकते), [तो याद रखेंऐ रसूलकि]आपके रब के पास जो (फ़रिश्ते) हैंवे रात-दिन बिना थके व उकताए हुए उसका गुणगान करते ही रहते हैं।  (38)

 

उसकी अन्य निशानियों में यह भी है: तुम देखते हो कि धरती (सूखे से) मुरझाई पड़ी हैफिर ज्यों ही हमने उस पर पानी बरसाया कि उसमें हलचल आ गयी और फिर फलने-फूलने लगी। हक़ीक़त यह है कि जिसने उस (मुरझाई हुई) धरती को फिर से ज़िंदा कर दियावही मुर्दों को भी (क़यामत में दोबारा) ज़िंदा करने वाला है। वह हर चीज़ (करने) की ताक़त रखता है।  (39)

 

जो लोग हमारी आयतों (के मतलब) के साथ छेड़-छाड़ करते हैंवे हमसे छिपे हुए नहीं हैं। भला बताओ कि जो आदमी जहन्नम की आग में झोंक दिया जाएवह अच्छा है या वह जो क़यामत के दिन बिना किसी डर-भय के आराम से आएगातुम्हारा जो जी चाहे वह करोमगर तुम जो भी करते होयाद रखो कि अल्लाह हर काम को देख रहा है। (40)

 

 

जिन लोगों ने क़ुरआन (की नसीहतों) को मानने से इंकार कियाजब वह उनके बीच (चर्चा में) आयी -- हालाँकि वह एक बड़ी इज़्ज़तवाली (व हर तरह की त्रुटियों से दूर) किताब है!, (41)

 

 

जिसे असत्य (न आगे से और न पीछे से) किसी भी तरफ़ से छू भी नहीं सकतायह उस [रब] की ओर से उतारी गयी है जो बहुत समझ-बूझ रखनेवाला और हर प्रशंसा के योग्य है--  (42)

 

 

(आप इस बात को याद रखेंऐ रसूल! कि) आपसे ऐसी कोई बात नहीं कही जा रही हैजो आप से पहले गुज़र चुके रसूलों को नहीं कही गयी थीं: आपका रब तो (गुनाहों की) माफ़ी देनेवाला रब हैमगर (साथ में) वह दर्दनाक दंड देनेवाला भी है। (43)

 

 

यदि हम इस (क़ुरआन) को अरबी छोड़कर किसी दूसरी भाषा में लातेतो वे कहते कि "काशकि उसकी आयतें (हमारी भाषा में) स्पष्ट तरीक़े से बयान की जातीं! यह क्याकि वाणी तो किसी अलग भाषा में है और आदमी अरबी?" कह दें, "जो लोग ईमान रखते हैंउन लोगों के लिए यह (क़ुरआन) तो सही रास्ता दिखाने वाली और दर्द पर मरहम लगाने वाली हैकिन्तु जो लोग (एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखतेउनके कानों पर यह (क़ुरआन) बोझ हैवे इस पर थोड़ा भी ध्यान नहीं देतेऐसा लगता है मानो उनको किसी बड़े दूर की जगह से पुकारा जा रहा हो।" (44)

 

हमने मूसा [Moses] को भी किताब दी थीपर उसमें भी झगड़े निकाले गए--- अगर पहले ही उस (फ़ैसले के समय) पर तुम्हारे रब की ओर से फ़रमान जारी न हो गया होतातो उनके बीच अब तक फ़ैसला हो चुका होता —--- और हक़ीक़त यह है कि वे अभी तक उस (क़ुरआन) के बारे में ऐसे सन्देह में पड़े हुए हैं जो उलझन में डाल देने वाला है।  (45)

 

 

जिस किसी ने अच्छा कर्म किया तो अपने ही फ़ायदे के लिए किया और जिस किसी ने बुराई कीतो अपने ही नुक़सान के लिए की: तुम्हारा रब अपने बंदों पर कभी भी नाइंसाफ़ी नहीं करता।  (46)

 

 

(क़यामत की आने वाली) घड़ी की जानकारी केवल अल्लाह को ही हैऔर बिना उसकी जानकारी के न तो कोई फल अपने शगूफ़े [कोष/ sheath] से निकलता हैन कोई मादा गर्भवती होती हैऔर न ही बच्चा जनती है। जिस दिन वह उन (काफ़िरों) से पूछेगा, "कहाँ हैं मेरी (ख़ुदायी के) साझेदार [Partner]?" वे जवाब देंगे, "हम तेरे सामने इस बात को स्वीकार करते हैं कि हममें से कोई भी उन [गढ़े हुए साझेदारों] को देख नहीं पा रहा है": (47)

 

 

जिन ख़ुदाओं को वे पहले पुकारा करते थेवह सब वहाँ से ग़ायब हो चुके होंगेऔर वे समझ लेंगे कि उनके लिए अब कोई भागने की जगह नहीं है।  (48)

 

आदमी का हाल यह है कि वह (अपने लिए) भलाई माँगने से नहीं थकताकिन्तु अगर उसे कोई तकलीफ़ छू जाती हैतो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है।  (49)

 

उसकी तकलीफ़ व परेशानी के बादजब कभी हम उसे अपनी थोड़ी सी रहमत [दयालुता] का मज़ा उठाने देते हैंतो वह यह बात ज़रूर कहता है, "यह सब तो मेरी ही कोशिशों का नतीजा है: मैं नहीं समझता कि क़यामत की घड़ी कभी आने वाली हैलेकिन अगर मुझे अपने रब की ओर वापस ले जाया भी गयातो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए सबसे अच्छा इनाम होगा।मगर हम उन काफ़िरों को ज़रूर बताएंगे जो कुछ कर्म उन्होंने किए होंगेऔर हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे।  (50)

 

जब कभी हम आदमी पर अपनी ख़ास कृपा करते हैं तो वह मुँह मोड़ लेता है और अकड़कर हम से दूर चला जाता हैलेकिन जैसे ही उसे कोई तकलीफ़ छू जाती हैतो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है। (51)

 

[ऐ रसूल] कह दें, "क्या तुमने कभी विचार कियाकि अगर यह उतारी हुई (क़ुरआन की) आयतें सचमुच अल्लाह की ओर से ही हुईंऔर इसके बावजूद तुमने उसको मानने से इंकार कर दियातो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन हो सकता है जो (अल्लाह से) अपने संबंध काटकर दूर जा पड़ा हो?" (52)

 

हम उन्हें पृथ्वी के हर एक क्षेत्र में अपनी निशानियाँ दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भीयहाँ तक कि उन पर यह बात खुलकर सामने आ जाएगी कि यह (क़ुरआन) सत्य है। क्या यह बात काफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब सारी चीज़ों का गवाह है?  (53)

 

तब भी उन्हें इस बात पर संदेह है कि सचमुच उन्हें अपने रब से मिलना होगासचमुचअल्लाह (की जानकारी और ताक़त) हर चीज़ पर छायी हुई है।  (54)

 

 

नोट:

10: जैसा कि पिछली आयत में कहा गया कि दो दिन में ज़मीन पैदा की गयी और दो दिन में इस ज़मीन पर पहाड़ और दूसरी ज़रूरत की चीज़ें और खाने-पीने का सामान पैदा किया गया। इस तरह ज़मीन और उसके ऊपर की चीज़ें बनाने में कुल चार दिन लगे, और दो दिन में सातों आसमान पैदा किए गए। इस तरह, पूरी कायनात बनाने में कुल छ: दिन लगेदेखें सूरह सज्दा (32: 4). मगर अल्लाह के दिन की गिनती हमारे हिसाब की तरह नहीं होती; देखें सूरह हज्ज (22:47). 

 

11: "चले आओ...  ख़ुशी से या अनिच्छा से।" यानी ज़मीन व आसमान को अल्लाह ने इंसानों की तरह आज़ादी नहीं दी है कि अगर किसी चीज़ को करने की इच्छा नहीं है, तो न करेबल्कि उसे वह काम करना ही होगा, चाहे मन से करे या बेमन से। 

 

20: शुरू में मुश्रिक लोग [Idolaters] झूठ बोल जाएंगे कि उन्होंने कभी अल्लाह के साथ किसी को साझेदार नहीं बनाया था, जैसा कि सूरह अना'म (6: 23) में है। फिर अल्लाह ख़ुद उन्हीं के जिस्म के अंगों से उनके ख़िलाफ़ गवाही दिलवाएगा। 

 

25: "साथियों" को नियुक्त किया है.... देखें सूरह ज़ुख़रुफ़ (43:36), और सूरह क़ाफ़ (50: 27).

 

सूरह 45: अल-जासिया 

[घुटनों के बल बैठना, Kneeling]

 

यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम आयत 28 में आए एक हवाले से लिया गया हैजहाँ बताया गया है कि फ़ैसले के दिन सभी समुदाय के लोग कमर के बल झुकी हुई अवस्था में रहेंगे। इस सूरह में उन लोगों की दलीलों का भी जवाब दिया गया है जो क़ुरआन की सच्चाई को और दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को संदेह से देखते हैं। प्रकृति में चारों ओर फैली हुई अल्लाह की निशानियों पर भी ज़ोर डाला गया हैऔर यह बताया गया है कि किस तरह फ़ैसले के दिन इन सच्चाइयों पर संदेह करने वालों को दर्दनाक सज़ा होगी। विश्वास न करने वालों का गुमराही में डूबा हुआ जो घमंड है (आयत 8, 31), उसकी तुलना अल्लाह की सच्ची महानता से की गई है (आयत 37); सूरह की शुरुआत और अंत अल्लाह की गहरी समझ-बूझ और उसकी महिमा से की गई है।

 

 

 

विषय:

 

   02: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है

03-13: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

14-15: अल्लाह के दिनों का डर

16-19: इसराईल की संतानों का एक रास्ता है, रसूल (सल्ल) का अलग रास्ता है 

20-26: क़यामत में दोबारा उठाया जाना और सबका हिसाब-किताब होना तय है

27-35: कर्मों का हिसाब-किताब 

36-37: आख़िर में अल्लाह की तारीफ़ 

 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 

हा॰ मीम॰ (1)

 

इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा हैजो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवालागहरी समझ-बूझ रखनेवाला है।  (2)

 

सचमुच आसमानों और ज़मीन में विश्वास रखनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं:  (3)

 

ख़ुद तुम्हारी रचना मेंऔर सभी जीव-जंतुओं में जिनकी रचना करके अल्लाह ने धरती पर फैला रखा हैइनमें उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो पक्का ईमान रखते हैं;  (4

 

रात और दिन के बारी-बारी आने जाने मेंऔर उस बारिश में जिसे अल्लाह आसमान से नीचे बरसाता हैजिससे मरी हुई धरती फिर से ज़िंदा हो उठती हैऔर (इसी तरह) हवाओं की दिशा बदल देने में भी उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं।  (5)

 

[ऐ रसूल!] ये अल्लाह की निशानियाँ हैंजिनके द्वारा हम आपको सच्चाई (दिखा और) सुना रहे हैं। अब अगर वे अल्लाह और उसकी उतारी गयी आयतों को भी मानने से इंकार करते हैंतो आख़िर ये किस बात पर विश्वास करेंगे? (6)

तबाह हो जाए हर झूठ बोलने वाला गुनहगार आदमी, (7)

 

जिसके सामने जब अल्लाह की उतारी गयी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैंतो वह सुन लेता हैमगर तब भी वह घमंड के साथ (अपने इंकार पर) अड़ा रहता है मानो उसने कभी कुछ सुना ही नहीं---- अतः उसको दर्दनाक यातना की “सूचना” दे दें! --- (8)

 

और जब वह हमारी उतारी गयी आयतों में से किसी बात को भी अगर जान लेता हैतो वह उसकी हँसी उड़ाता है! ऐसे लोगों के लिए बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना होगी:   (9)

 

जहन्नम उनके पीछे (घात में लगी) हैजो भी (धन) उन्होंने कमायान तो वह उनके कुछ काम आएगा और न ही वे (झूठे देवता) काम आएंगे जिन्हें इन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने संरक्षक ठहरा रखे हैं --- एक ज़बरदस्त यातना उनके इंतज़ार में है। (10)

 

यह [क़ुरआन] एक दम सच्चा व सही मार्गदर्शन हैऔर जिन लोगों ने अपने रब की आयतों को मानने से इंकार कियाउन्हें हिला देनेवाली दर्दनाक यातना होगी।  (11)

 

वह अल्लाह ही है जिसने समुद्र को तुम्हारे लिए काम पर लगा दिया है--- उसके आदेश से उसमें जहाज़ें चलती हैं ताकि तुम उससे अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको और उस (अल्लाह) का शुक्र अदा कर सको--- (12)

 

उसने अपनी तरफ़ से तोहफ़े के रूप मेंआसमान और ज़मीन में जो कुछ भी हैउन सबको तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं।  (13)

 

[ऐ रसूल!] जो लोग ईमान रखते हैं उनसे कह दें कि, "वे उन लोगों (द्वारा किए गए बुरे सुलूक) को क्षमा कर दें जो लोग अल्लाह के (इस दुनिया में दंड देनेवाले) दिनों का डर नहीं रखते----जैसे भी कर्म उन लोगों ने किए हैंवह [अल्लाह] उन लोगों को उसका उचित बदला देगा।  (14)

 

जो कोई भी अच्छा कर्म करता है तो अपने ही फ़ायदे के लिए करता हैऔर जो कोई बुरा कर्म करता है तो वह अपना ही नुक़सान करता है: तुम सब को अपने रब की ओर ही लौटकर जाना होगा। (15)

 

 

हमने इसराईल की सन्तानों को किताब, (नियम-क़ानून की) समझ-बूझ और पैग़म्बरी [Prophethood] प्रदान की थीऔर हमने उन्हें अच्छी चीज़ों से रोज़ी दी और उन्हें सारे संसारवालों पर श्रेष्ठता दी थी; (16)

 

हमने इस (धर्म के) मामले में उन्हें साफ़ व स्पष्ट प्रमाण दिए थे। मगर इन (तोरात के आदेशों) को जान लेने के बाद भीआपसी दुश्मनी और जलन के कारण ही उन लोगों का आपस में मतभेद हो गया: आपका रब क़यामत के दिन उन बातों का फ़ैसला कर देगाजिनमें वे आपस में मतभेद रखते थे। (17)

 

अब हमने आपको [ऐ रसूल] इस (धर्म के) मामले में साफ़ रास्ते [शरीअत] पर डाल दिया हैअतः आप उसी रास्ते पर चलते जाएं। और उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें जो सच्चाई की जानकारी नहीं रखते--- (18)

 

वे अल्लाह के मुक़ाबले में वैसे भी आपके कुछ काम नहीं आ सकते। हक़ीक़त यह है कि ग़लत काम करने वालों के पास बस एक दूसरे का ही सहारा हैजबकि अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचने वालों का मददगार ख़ुद अल्लाह है। (19

 

यह [क़ुरआन] लोगों में गहरी समझ-बूझ पैदा करनेवालीसही रास्ता दिखानेवालीऔर पक्का विश्वास रखनेवाले लोगों के लिए (अल्लाह की) रहमत [mercy] है। (20)

 

क्या वे लोग जो बुरे कर्म करते रहते हैंवे सचमुच ऐसा समझ बैठे हैं कि हम उनके साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ करेंगे जो (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैंऔर यह कि उन (अच्छे और बुरे कर्म करने वालों) का जीना और मरना एक बराबर हो जाएगा? (अगर उनका यही फ़ैसला है तो) कितना ग़लत है उनका फ़ैसला!  (21)

 

अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है: ताकि हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार बदला दिया जाएऔर देते समय उन पर अन्याय न किया जाए।  (22)

 

[ऐ रसूल]आप उसके बारे में विचार करें जिसने अपने अंदर की इच्छाओं को ही अपना ख़ुदा बना लिया हैजिसे अल्लाह ने उसकी हालत जानते हुए भटकता छोड़ दियाऔर उसके कानों और दिल को ठप्पा लगाकर बंद कर दियाऔर उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया--- अब अल्लाह (की ऐसी मर्ज़ी) के बाद कौन है जो उसे मार्ग पर ला सकता हैतो क्या तुम (लोग) इससे शिक्षा नहीं लोगे? (23)

 

 

वे कहते हैं, "जो कुछ हमारी ज़िंदगी है वह तो बस इसी संसार की ज़िंदगी है: (इसी में) हम मरते हैंजीते हैंऔर कोई और नहीं बल्कि हमें तो काल (समय) ही मार डालता है।हालाँकि इस बात की उनके पास कोई जानकारी नहीं हैवे तो बस अटकलें ही दौड़ाते हैं।  (24)

 

और जब उनके सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनायी जाती हैंतो वे अपने तर्क में केवल यही कहते हैं, "यदि तुम सच्चे होतो हमारे बाप-दादाओं को (ज़िंदा करके) ले आओ।" (25

 

[ऐ रसूल] आप कह दें, "अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता हैफिर वहीं तुम्हें मौत देता हैफिर वही तुम सब को क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा जिसमें कोई संदेह नहींमगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझतेI” (26)

आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह के नियंत्रण व क़ाबू में है। जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगीउस दिन असत्य पर जमे रहनेवाले भारी घाटा उठाएंगे।  (27

 

और (उस दिन) तुम हर एक गिरोह को देखोगे कि वह घुटनों के बल झुका हुआ है। हर गिरोह को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए बुलाया जाएगा: "आज तुम्हें उन कर्मों का बदला दिया जाएगाजो तुम किया करते थे। (28)

 

"यह हमारा (तैयार किया हुआ कर्मों का) बही-खाता हैजो तुम्हारे बारे में सच-सच बता रहा है: तुम जो कुछ भी करते थेहम वह सब कुछ लिखवाते रहे हैं।" (29)

 

अतः जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किएउन्हें तो उनका रब (दया दिखाते हुए) अपनी रहमत [mercy] में दाख़िल कर लेगा ----- यही सबसे स्पष्ट कामयाबी है --- (30)

 

रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया व कुफ़्र पर अड़े रहे (उनसे पूछा जाएगा), “तुम्हारे सामने जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती थींतो क्या उस वक़्त तुम घमंड में चूर और कुकर्मों में डूबे हुए न थे?  (31)

 

और जब तुम से कहा जाता था, “अल्लाह का वादा सच्चा है: उस (क़यामत की) घड़ी में कोई संदेह नहीं है,” तो तुम जवाब में ऐसा नहीं कहते थे कि, "हम नहीं जानते कि वह घड़ी क्या हैहमारे विचार में तो बस यह अटकल लगाने जैसा लगता हैसो हम इसे सच नहीं मानते?“ (32)

 

(एक दिन आएगा कि) जो कुछ कुकर्म वे करते रहे थेउसकी बुराइयाँ खुलकर उनके सामने आ जाएंगीऔर जिस (दंड) की वे हँसी उड़ाया करते थेवही उन्हें घेर लेगा।  (33)

 

और उनसे कह दिया जाएगा कि "आज हम तुम्हें ठीक वैसे ही भुला देंगे जैसे कि (दुनिया में) तुम इस बात को भुलाए बैठे थे कि तुम्हें इस दिन का सामना करना पड़ेगा। तुम्हारा ठिकाना अब (जहन्नम की) आग है और अब कोई तुम्हारी मदद करने वाला नहीं है,  (34)

 

यह सब इसलिए कि तुमने अल्लाह की आयतों [संदेशों] की हँसी उड़ाई थी और सांसारिक जीवन ने तुम्हें धोखे में डाल रखा था।अतः उस दिन न तो ऐसे लोगों को उस (आग) से बाहर निकाला जाएगा और न उन्हें अपनी ग़लती सुधारने का कोई मौक़ा ही दिया जाएगा। (35)

 

 

अतः सारी तारीफ़ें अल्लाह के ही लिए हैं जो ज़मीन और आसमानों का मालिक है और सारे जहानवालों का पालनेवाला है। (36)

 

आसमानों और ज़मीन में असली महानता उसी की है: वह बहुत ताक़तवाला और (अपनी हर बात में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (37)

 

 

 

नोट:

14: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि मक्का के लोगों द्वारा किए जा रहे बुरे सलूक और हर तरह की तकलीफ़ें पहुँचाने के बावजूद मुसलमानों को धीरज से काम लेने और उन्हें क्षमा कर देने के लिए कहा जा रहा है। अभी तक उन्हें जवाब में हाथ उठाने से मना किया गया था।

35: अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगने और तौबा करने का दरवाज़ा इंसान के लिए सारी ज़िंदगी खुला रहता हैलेकिन मरने के बाद और परलोक [आख़िरत] पहुँचने के बाद यह दरवाज़ा बंद हो जाता हैऔर वहाँ माफ़ी माँगने का कोई फ़ायदा नहीं।

 

 

 

 

सूरह 16: अल-नह्ल 

[मधु-मक्खी,The Bee]





यह एक मक्की सूरह है, इस सूरह का नाम मधुमक्खी के ज़िक्र से लिया गया है जो आयत 68-69 में आया है, जहाँ बताया गया है कि अल्लाह ने कैसे मधुमक्खी के दिल में यह बात डाल दी कि उसे फूलों से रस चूसना है। यह तो अल्लाह के फ़ज़ल का मात्र एक उदाहरण है, अल्लाह की दी हुई ऐसी बहुत सारी नेमतें हैं जिसके लिए इंसानों को उसका शुक्र अदा करना चाहिए। यह सूरह मक्का के बुतपरस्तों की कड़ी निंदा करती है, जो अल्लाह की दी हुई नेमतों को दूसरे देवी-देवताओं से जोड़ते हैं, झूठे ख़ुदाओं की पूजा करते हैं, और अपनी बेटियों को पैदा होते ही ज़िंदा दफ़्न कर देते हैं (आयत 58-59) अंत में मुसलमानों के सामने इबराहीम अलै. की मिसाल पेश की गई है, जो कि बहुत ही शुक्र अदा करनेवाले बंदे थे, उनके बताए हुए रास्ते पर सभी ईमानवालों को चलना चाहिए। आयत 88 तक यह देखा गया कि ये आयतें बुतपरस्तों के बारे में है; जबकि आयत 90 से आगे की आयतें मुसलमानों को कई तरीक़े से सीख देती है। आयत 89 दो अलग हिस्सों को जोड़ती है--- जहाँ मुहम्मद सल्ल को अपने समुदाय के विश्वास करनेवाले और सच्चाई का इंकार करनेवाले के लिए गवाह के रूप में लाया जाएगा। 



विषय :

01 : अंतिम फ़ैसला होकर रहेगा 

02 : "वही" लेकर फ़रिश्ते का उतरना 

03-18: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

19-23: अल्लाह सब जानता है 

24-29: अंतिम फ़ैसले का दृश्य: विश्वास न करने वालों के लिए 

30-32: अंतिम फ़ैसले का दृश्य: विश्वास करने वालों के लिए

33-34: विश्वास न करने वाले अपने आपको ही नुक़सान पहुँचाते हैं 

35-37: मूर्तिपूजकों के पास कोई बहाना नहीं है 

38-40: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

41-42: घर-बार छोड़कर मदीना आए हुए लोगों [मुहाजिरों] को इनाम मिलेगा 

43-44: रसूल और उनपर उतरी किताबें 

45-47: सुरक्षित रहने की झूठी आशा 

48-50: अल्लाह की पैदा की हुई हर चीज़ अल्लाह से डरी-सहमी रहती है 

51-55: अल्लाह एक है 

56-64: बुतों की पूजा और बच्चियों को मार देने की निंदा 

65-74: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

75-76: दो मिसालें 

77 : फ़ैसले की घड़ी 

78-83: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

84-89: अंतिम फ़ैसले के दृश्य 

90 : अल्लाह न्याय करने का आदेश देता है 

91-97: प्रतिज्ञा करना और शपथ लेना 

98-100  : क़ुरआन का पढ़ना 

101   : अल्लाह द्वारा एक आयत से दूसरी आयत को बदलना 

102-105: क़ुरआन का उतारा जाना 

106-109: ईमानवाले को विश्वास करने से इंकार करने पर कड़ी सज़ा होगी 

110-111: घर-बार छोड़कर मदीना आये हुए लोगों को इनाम मिलेगा 

112-113: विश्वास न करने की मिसाल 

114-119: खाने-पीने की चीज़ों के नियम 

120-123: इबराहीम हनीफ़ (अलै) 

124 : सब्त का दिन 

125 : रसूल के लिए हुक्म 

126-128: सब्र करना बदला लेने से अच्छा है 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 

अल्लाह का फ़ैसला बस आ पहुँचा है, अत: उसे और जल्दी ले आने के लिए मत कहो। महान है वह! अल्लाह ऐसी किसी भी चीज़ से कहीं ऊँचा है जिसे वे उसकी ख़ुदायी के साथ (साझेदार के रूप में) जोड़ते हैं! (1)

 

 वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, चुन लेता है, और उस पर अपने हुक्म से वही’[रूह, Inspiration] भेजता है जिसे फ़रिश्ते लेकर उतरते हैं, ताकि लोगों को (उसकी ओर से) चेतावनी दे दें: मेरे सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। अतः तुम मुझ से डरो (और सच्चाई से इंकार करना व बुरे कर्म करना छोड़ दो)।" (2)

 

उसने आसमानों और ज़मीन को एक सही मक़सद के साथ पैदा किया, और वह ऐसी किसी भी चीज़ से कहीं ऊँचा है जिसे वे उसकी ख़ुदायी के साथ (साझेदार/Partner के रूप में) जोड़ते हैं! (3)

 

 उसने इंसान को (वीर्य, Sperm की) एक बूँद से पैदा किया है, इसके बावजूद क्या देखते हैं कि इंसान खुले-आम उस [अल्लाह] को ही चुनौती देने लग गया! (4)

 

और रहे पालतू जानवर---- तो उसी ने इन्हें भी पैदा किया उनकी (खाल और ऊन से ठंड के समय) तुम्हें गर्मी मिलती है, और उनसे दूसरे फ़ायदे भी हैं: उनमें से कुछ (का मांस) तुम खाते भी हो; (5)

 

 जब तुम शाम को उन्हें (मैदानों से चराकर) घर वापस लाते हो और जब सुबह में उन्हें चराने के लिए (मैदानों में) ले जाते हो, तो यह दृश्य तुम्हारी आँखों को कितना ख़ूबसूरत लगता है। (6)

 

और यही जानवर हैं जो तुम्हारा बोझ लादे हुए (दूर के) शहरों तक ले जाते हैं,  जहाँ तुम जी-तोड़ मेहनत व थकान के बिना नहीं पहुँच सकते थे---निस्संदेह तुम्हारा रब बड़ा ही उदार व दया करनेवाला है----(7)

 

घोड़े, ख़च्चर और गधे (अल्लाह ने पैदा किए) हैं जो तुम्हारे लिए सवारी का काम देते हैं, इनसे शोभा भी बढ़ती है, और ऐसी बहुत सी चीज़ें पैदा करता रहता है जिनके बारे में तुम (अभी) कुछ नहीं जानते। (8)

 

और सही रास्ता बता देना अल्लाह का काम है, (मगर लोग भटक जाते हैं) क्योंकि कुछ टेढ़े रास्ते ग़लत मंज़िल की तरफ़ ले जाते हैं: (हालाँकि) अगर वह चाहता, तो तुम सबको (एक ही) सही मार्ग दिखा सकता था। (9)

 

 

वही है जो आसमान से पानी बरसाता है, इसमें से कुछ तो तुम्हारे पीने के काम आता है, और उसी से पेड़ व झाड़ियाँ उग जाती हैं, जिनमें तुम अपने जानवरों को चराते हो। (10)

 

और इसी पानी से वह तुम्हारे लिए (अनाज की) फ़सलें, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और हर तरह के फल उगा देता है। सचमुच सोच-विचार करनेवालों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (11)

 

और (देखो!) उसने अपने हुक्म से रात और दिन को, सूरज और चाँद को और इसी तरह तारों को भी तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं। (12)

 

और ज़मीन पर तुम्हारे फ़ायदे के लिए उसने रंग-बिरंग की चीज़ें बिखेर रखी हैं सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है जो सोचने-समझनेवाले हैं। (13

 

वही है जिसने समंदर को तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है: तुम उसमें से मछलियों के ताज़ा मांस निकालकर खाते हो, और (सजने-सँवरने के लिए क़ीमती) ज़ेवर भी निकालते हो; तुम देखते हो कि पानी के जहाज़ किस तरह लहरों को चीरते हुए चलते हैं, (ताकि तुम इसमें सवार होकर) उसकी कृपा से रोज़ी ढूंढ सको और उसकी (नेमतों का) शुक्र अदा कर सको। (14)

 

और (देखो!) उसने ज़मीन पर पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया, ताकि तुम्हारे नीचे की ज़मीन हिलने-डुलने से बची रहे, और नदियाँ बहा दीं और रास्ते निकाल दिए, ताकि तुम (जल व थल के रास्ते) अपनी मंज़िल तक पहुँच सको,  (15)

 

और लोगों को रास्ते की पहचान के लिए (तरह तरह के) ख़ास निशान [Landmarks] बनाए, और (रात में) तारों से भी लोग मार्ग पा लेते हैं। (16)

 

अब बताओ कि वह [अल्लाह] जो हर चीज़ को पैदा करता है, क्या उसकी तुलना उससे हो सकती है जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकता? फिर क्या तुम समझते-बूझते नहीं? (17)

 

अगर तुम अल्लाह की नेमतों [Blessings] को गिनना चाहो, तो वह इतनी हैं कि कभी गिन न सको: सचमुच अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दया करनेवाला है। (18)

 

और अल्लाह सब कुछ जानता है; वह भी जो कुछ तुम छिपाते हो और वह भी जो कुछ तुम (सबके सामने) बता देते हो। (19)

 

जिन (देवताओं) को वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी भी चीज़ को पैदा नहीं करतेबल्कि वे तो स्वयं पैदा किए गए हैं। (20)

 

वे बेजान हैं मरे हुए, उनमें कोई जान नहीं है, उन्हें तो यह भी मालूम नहीं कि वे कब (मौत से) उठाए जाएँगे। (21)

 

तुम्हारा ख़ुदा तो एक ही ख़ुदा है (इसके सिवा कोई नहीं)। वे लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] में विश्वास नहीं रखते, उनके दिल सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, और वे अपने घमंड में चूर हैं। (22)

 

इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह ख़ूब जानता है, जो कुछ वे (अपने दिल में) छिपाते हैं और जो कुछ (ज़बान से) बता देते हैं। और वह घमंड करनेवालों को पसंद नहीं करता। (23)

 

 

 और जब उनसे पूछा जाता है कि "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है?" तो कहते हैं, "(कुछ नहीं), बस पिछले लोगों की कहानियाँ हैं।" (24)

 

 (नतीजा यह होगा कि) वे क़यामत के दिन अपने (गुनाहों का) बोझ तो पूरा-पूरा उठाएँगे ही, साथ में उन लोगों के बोझ का भी एक हिस्सा उठाना होगा जिन्हें वे बिना सही जानकारी के भटका रहे हैं। क्या ही बुरा बोझ है जिसे वे अपने ऊपर लादेंगे! (25)

 

उनसे पहले जो लोग गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चली थीं, मगर उन्होंने (अपने ख़्यालों का) जो महल बना रखा था, अल्लाह ने उनके महल की नीवों को ही हिलाकर रख दिया। उनकी (ही बनायी हुई) छत उनके ही दम पर आ गिरी: बस ऐसी दिशा से यातना आ गयी जिसके बारे में उन्होंने कल्पना तक न की थी। (26)

 

अंत में, क़यामत के दिन, अल्लाह उन्हें यह कहते हुए अपमानित करेगा, "कहाँ गए मेरे वे 'साझेदार [Partners]' (जिनको तुमने ख़ुदा बना रखा था), जिनकी ख़ातिर तुम (मेरा) विरोध करते थे?" जिन्हें ज्ञान दिया गया था, वे (उस दिन) कहेंगे, "निश्चय ही आज इंकार करनेवालों [काफ़िरों] के लिए शर्म और बदहाली से डूब मरने का दिन है!" (27)

 

ऐसे (काफ़िर) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (इंकार पर अड़े होने के चलते) ख़ुद अपने आप पर ज़ुल्म कर रहे होते हैं, पर इस मौक़े पर वे आज्ञा माननेवाले बन जाएंगे (और कहेंगे): "हम तो कोई शैतानी के काम नहीं कर रहे थे।" (उनसे कहा जाएगा), "बिल्कुल, तुम कर रहे थे: तुमने जो कुछ किया है, अल्लाह उसे बहुत अच्छी तरह जानता है, (28)

 

तो बस अब जहन्नम के दरवाज़े में घुस जाओ। तुम्हें हमेशा के लिए इसी में रहना है----सचमुच घमंड करनेवालों का कितना बुरा ठिकाना है!" (29)

 

 

लेकिन, जब नेक व सच्चे लोगों से पूछा जाता है, "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है? "वे कहेंगे, "सारी चीज़ें जो अच्छी हैं।" जो लोग अच्छा काम करते हैं, उनके लिए तो इस दुनिया में भी अच्छा बदला है, मगर आख़िरत [परलोक] में उनका घर कहीं अच्छा है: नेक व सच्चे लोगों का क्या ही अच्छा घर होगा। (30)

 

 वे हमेशा-के-लिए रहने के बाग़ में दाख़िल होंगे, जिनके बीच बहती हुई नहरें होंगी, वे जो कुछ चाहेंगे, वहाँ हर एक चीज़ मौजूद होगी। अल्लाह अपने अच्छे बंदों को इसी तरह इनाम देता है, (31)

 

 ऐसे (परहेज़गार) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (ईमान व मन की शांति के कारण) ख़ुशहाल होते हैं। फ़रिश्ते उन्हें कहते हैं, "तुम पर सलामती हो! जन्नत में दाख़िल हो जाओ, यह उन कामों का इनाम है जो तुम किया करते थे।" (32)

 

[ऐ रसूल!] क्या विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] अब इसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि फ़रिश्ते उनके पास उतर आएं या आपके रब का (तय किया हुआ) फ़ैसला ही सामने आ जाए? ऐसा ही उन लोगों ने भी किया था, जो इनसे पहले गुज़र चुके हैं। अल्लाह ने उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे। (33)

 

 इस तरह, (नतीजा यह हुआ कि) जो बुरे कर्म उन्होंने किए थे उनकी बुराइयों का अंजाम उन्हें भुगतना पड़ा, और जिस चीज़ का वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, उसी चीज़ ने उन्हें आ घेरा। (34)

 

 

जो लोग अल्लाह के साथ दूसरों की भी पूजा करते थे, वे कहते हैं, "अगर अल्लाह चाहता तो कभी ऐसा नहीं होता कि हम या हमारे बाप-दादा उसे छोड़कर दूसरी हस्तियों की पूजा करते, और न हम बिना उसकी मंज़ूरी के किसी चीज़ को (अपने मन से) हराम [forbidden] ठहरा देते।" मगर उनसे पहले के लोगों ने भी ऐसी ही बात कही थी। तो फिर (बताओ) रसूलों की ज़िम्मेदारी इसके सिवा और क्या है कि साफ़-साफ़ (अल्लाह का) सन्देश पहुँचा दें? (35)

 

यह सच्चाई है कि हमने हर समुदाय में कोई न कोई रसूल ज़रूर भेजा, ताकि वह यह संदेश सुना दे, "अल्लाह की बन्दगी करो और (शैतान या बुत जैसे) झूठे ख़ुदाओं से बचो।" फिर उन (समुदायों) में से कुछ तो अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चले; जबकि कुछ दूसरे (समुदाय) सही रास्ते से भटककर रह गए। अत: ज़मीन पर ज़रा घूम-फिरकर देखो कि (सच्चाई से) इंकार करनेवालों का अंत में कैसा अंजाम हुआ। (36)

 

[ऐ रसूल] आप हालाँकि मन से बहुत चाहते हैं कि ये लोग सीधे रास्ते पर आ जाएं, मगर अल्लाह जिसे (सच्चाई से इंकार व दूसरों को बहकाने के कारण) भटकता छोड़ दे, उसे वह मार्ग नहीं दिखाया करता, और कोई न होगा जो ऐसे लोगों की मदद करेगा। (37)

 

 उन लोगों ने अल्लाह की क़समें खाकर कड़ी प्रतिज्ञाएं ली हैं कि मरे हुए लोगों को अल्लाह दोबारा (ज़िंदा करके) नहीं उठाएगा। मगर वह ऐसा ज़रूर करेगा--- यह तो एक पक्का व अटूट वादा है, मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझते----(38)

 

 और यह इसलिए होगा ताकि जिस बात पर वे मतभेद रखते हैं, वह उनके सामने स्पष्ट हो जाए और यह भी कि (सच्चाई से) इंकार करनेवाले मान सकें कि वे जो कहते थे, वह झूठ था। (39)

 

जब हम किसी चीज़ के होने या करने का इरादा करते हैं, तो बस इतना ही कहते हैं कि "हो जा!" और वह हो जाती है। (40)

 

 और जिन लोगों ने दूसरों के ज़ुल्म सहने के बाद अल्लाह के लिए अपने घर-बार छोड़ दिए और दूसरी जगह जा बसे, उन्हें हम इस दुनिया में अच्छा ठिकाना तो देंगे ही, मगर काश! कि वे यह जान पाते कि आख़िरत [परलोक] में उनका इनाम कहीं बड़ा होगा। (41)

 

ये वे लोग हैं जो मज़बूती से जमे रहते हैं, और वे अपने रब पर पूरा भरोसा रखते हैं। (42)

 

 

[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले भी (किसी फ़रिश्ते को नहीं, बल्कि) इंसानों को ही रसूल बनाकर भेजा था, जिन पर हमने वही’[Revelation] उतारी थी: तुम (लोग) अगर नहीं जानते, तो उन (यहूदी/ईसाई) लोगों से पूछो जो (आसमानी किताबों) के बारे में जानते हैं। (43)

हमने उन्हें स्पष्ट निशानियों और आसमानी किताबों के साथ भेजा था, (इसी तरह) हमने आप पर भी अपना संदेश [क़ुरआन] उतारा है, ताकि जो संदेश लोगों के लिए भेजा गया है, आप उन्हें अच्छी तरह से समझा सकें, और ताकि लोग इस पर सोच-विचार कर सकें। (44

 

फिर क्या वे लोग जो शैतानी योजनाएं बनाते हैं, उन्हें इस बात का पक्का यक़ीन है कि अल्लाह उन्हें कभी धरती के भीतर नहीं धँसा सकता है या उन पर कोई ऐसी जगह से यातना नहीं आ सकती जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न हो, (45

या (किसी दिन) आते-जाते उन्हें अचानक वह अपनी पकड़ में नहीं ले सकता----क्योंकि वे अल्लाह को (अपनी चालों से) रोक तो नहीं सकते---- (46

या कि ऐसा हो वह उन्हें पहले डरा के और फिर धीरे धीरे अपनी पकड़ में नहीं ले सकता? बेशक तुम्हारा रब बहुत मेहरबान और बड़ा ही दयावान है। (47)

क्या अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों को उन (विश्वास न करनेवालों) ने ध्यान से नहीं देखा कि अल्लाह के सामने किस तरह उनकी परछाइयाँ विनम्र भाव से झुकी हुई दाएँ और बाएँ ढलती रहती हैं? (48)

यह अल्लाह है कि जिसके सामने आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ झुकती है,  हर एक चलता फिरता जानवर, यहाँ तक कि फ़रिश्ते भी ---- उनमें घमंड नहीं होता: (49)

वे अपने रब से डरते रहते हैं जो उनके ऊपर मौजूद है, और वही करते हैं जैसा उन्हें आदेश दिया जाता है। (50)

 

अल्लाह ने कहा, "पूजने के लिए दो-दो ख़ुदा न बना बैठो---- क्योंकि वह तो बस एक ही ख़ुदा है। केवल मैं ही अकेला ख़ुदा हूँ जिससे तुम्हें डरना चाहिए।" (51

आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ उसी की है: (सबके लिए) उसकी आज्ञा का सदा पालन करना ज़रूरी है। तो फिर क्या अल्लाह के सिवा तुम किसी और के बारे में सोचोगे? (52)

 जो कुछ भी अच्छी चीज़ें तुम्हारे पास हैं वह अल्लाह की तरफ़ से आती हैं, फिर जब तुम्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो तुम सिर्फ़ उसी को मदद के लिए पुकारते हो, (53

फिर जब वह उस मुसीबत को तुमसे टाल देता है--- तो देखो!---कि तुममें से कुछ लोग अपने रब के साथ दूसरों (को ख़ुदायी में) साझेदार [Partners] ठहराने लगते हैं। (54

जो कुछ मेहरबानियाँ हमने उन पर की हैं, इसके बदले में उन्हें नाशुक्री [Ingratitude] कर लेने दो; ठीक है, ज़िंदगी के थोड़े दिन कुछ मज़े कर लो---- जल्द ही तुम्हें (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा। (55)

 

 

फिर (देखो!) जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसमें से कुछ हिस्सा वे (मूर्तियों के लिए) अलग कर लेते हैं, जिनकी हक़ीक़त उन्हें मालूम तक नहीं। क़सम है अल्लाह की! जो झूठ तुमने गढ़े हैं उसके बारे में तुमसे ज़रूर पूछताछ की जाएगी। (56)

 

(फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटी मानते हुए) वे बेटियों को अल्लाह के साथ जोड़ते हैं----महान है वह!--- (अल्लाह के लिए बेटियाँ!) और ख़ुद अपने लिए वे (बेटा) चाहते हैं। (57)

 

और जब उनमें से किसी को बेटी के पैदा होने की ख़बर दी जाती है, तो सुनकर उसका चेहरा काला पड़ जाता है और वह उदास हो जाता है। (58)

इस बुरी ख़बर को सुनने के बाद वह मारे शर्म के अपने ही लोगों से छिपता फिरता है, और (मन ही मन में सोचता रहता है) कि अपमान सहन करके उस बच्ची को रहने दे या उसे मिट्टी में गाड़ दे। देखो, वे कितना बुरा फ़ैसला करते हैं! (59)

 

जो लोग आख़िरत [परलोक] को नहीं मानते, उन्होंने अपने दिल में (अल्लाह की विशेषताओं के बारे में) बहुत बुरी तस्वीर [image] बना रखी है, हालाँकि  अल्लाह के लिए कल्पना में भी जो तस्वीर उभरती है वह सबसे बेहतरीन होनी चाहिए:  वह  बहुत ताक़तवाला और  बहुत समझ-बूझ  रखनेवाला है। (60)

अगर  अल्लाह लोगों को उनकी शैतानियों  पर तुरंत सज़ा देने लगता, तो ज़मीन पर कोई भी जीव ज़िंदा नहीं बच पाता, किन्तु वह उन्हें एक निश्चित समय तक ढील देता  है:  फिर जब उनका  समय आ जाता है तब  उसे घड़ी भर के लिए भी टाला नहीं जा सकता और न ही नियत समय को ही बढ़ाया जा सकता है। (61)

(और देखो!) ये लोग  अल्लाह के लिए (बेटियों के रूप में) ऐसी बातें ठहराते हैं, जिसे ख़ुद अपने लिए पसन्द  नहीं करते, जबकि वे ख़ुद अपनी  ज़बान से सफ़ेद  झूठ बोलते  हैं कि सारी बेहतरीन चीज़ [बेटा] उन्हीं के हिस्से में आयी है। इसमें कोई शक नहीं कि उनके हिस्से में तो (जहन्नम की)  आग है: वहाँ (आग में) ये सबसे पहले जानेवाले हैं। (62)

 

क़सम है अल्लाह की!  [ऐ रसूल] हम आपसे पहले दूसरे  समुदायों  के पास भी अपने रसूल भेज चुके हैं, मगर शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए  बड़ा लुभावना  बनाकर पेश किया। वह  आज भी (मक्का के) विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] का संरक्षक बना हुआ है, और अंत में, उन सबके लिए  एक दर्दनाक यातना तैयार है। (63)

हमने यह किताब [क़ुरआन]  आप पर  इसीलिए उतारी  है ताकि जिन बातों में  वे मतभेद रखते हैं, वे बातें अच्छी तरह  उन्हें समझा दी जाएं और जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए यह (किताब) रास्ता दिखानेवाली  और रहमत [mercy] है। (64)

 

यह  अल्लाह  है जो आसमान  से पानी बरसाता है और  इसी (पानी के)  द्वारा  मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है। सचमुच  इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बात सुनते हैं। (65)

और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए एक सबक़ है -----  हम पेट के तत्वों में से तुम्हारे लिए  पीने की चीज़ देते हैं, उनके पेट में जो गोबर और ख़ून है, उसके बीच से हम तुम्हें साफ़ सुथरा  दूध निकाल  देते हैं जो पीनेवालों के लिए बेहद प्रिय है, (66)

 खजूरों और अंगूरों के फलों से तुम मीठे रस [शराब/ शरबत/ सिरका]  बना लेते हो, और यह एक भरपूर  रोज़ी है। सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बुद्धि से काम लेते है। (67)

और तुम्हारे रब ने मुधमक्खी के दिल  में यह बात डाल दी कि "तू पहाड़ों में, पेड़ों  में और लोगों के बनायी हुई (फूलों की) छत्रियों  में अपने लिए घर [छत्ते]  बना। (68)

और हर क़िस्म  के फल-फूलों को  अपनी ख़ुराक बना  और फिर उन रास्तों पर चल जिस पर चलना तेरे रब ने तेरे लिए आसान बना दिया है।" (इस तरह) उसके पेट से विभिन्न रंगों  का एक पेय [शहद] निकलता है, जिसमें लोगों की बीमारियों का इलाज है। सचमुच  ही सोच-विचार करनेवाले लोगों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (69)

 

यह अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया है और समय पूरा हो जाने पर वह तुम्हें मौत दे देता है। तुममें से कोई ऐसा भी होता है कि बुढ़ापे की ऐसी निरीह अवस्था तक पहुँच जाता है  जहाँ एक अच्छी समझ-बूझ रखनेवाला आदमी भी नासमझ होकर रह जाता है: सचमुच अल्लाह सब जाननेवाला, हर चीज़ की ताक़त रखनेवाला है। (70)

 

और (देखो!) अल्लाह ने तुममें से कुछ को दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा अच्छी रोज़ी दे रखी है। मगर जिन्हें (कमाई में) ज़्यादा दिया गया है वह यह नहीं चाहते कि अपनी रोज़ी का हिस्सा अपने अधीन ग़ुलामों को भी दें, ताकि वह भी इनके बराबर हो जाएँ। तो फिर कैसे ये लोग अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार कर सकते हैं? (71)

 

यह अल्लाह है जिसने तुम ही में से तुम्हारे लिए जोड़े [पति/पत्नियाँ] बना दिए और फिर इनके द्वारा तुम्हारे लिए बेटे/बेटियाँ और पोते/पोतियाँ पैदा कर दिए और तुम्हें अच्छी-अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी गयी; फिर भी यह कैसे हो सकता है कि वे झूठ में विश्वास करें और अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार करें?   (72)

 

अल्लाह को छोड़कर जिनकी ये पूजा करते हैं, उनमें कोई ताक़त नहीं है कि वह आसमान या ज़मीन से उन्हें कुछ भी रोज़ी दे सकें: वे कुछ नहीं कर सकते। (73)

 

अतः (राजाओं को देखकर) अल्लाह के बारे में कोई तस्वीर न बना डालो: अल्लाह जानता है, तुम कुछ नहीं जानते। (74)

 

 

अल्लाह एक मिसाल बयान करता है: एक ग़ुलाम है जो अपने मालिक के नियंत्रण में है और उसे किसी भी चीज़ का कोई अधिकार नहीं है, और एक दूसरा आदमी है जिसे हमारी कृपा से अच्छी रोज़ी मिली हुई है और उसमें से वह ढके-छिपे भी और सबके सामने भी (जिस तरह चाहता है) दान देता रहता है। (अब बताओ) क्या वे दोनों बराबर हो सकते हैं? सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग हैं जो इस बात को नहीं मानते। (75)

 

(देखो!) अल्लाह ने एक और मिसाल बयान की है: दो आदमी हैं, उनमें से एक गूँगा है, कोई काम नहीं कर सकता, वह अपने मालिक पर एक बोझ है--- उसका मालिक जो भी काम करने को कहता है, वह कुछ भी ढंग से नहीं कर पाता----- क्या ऐसा आदमी उस दूसरे आदमी के बराबर हो सकता है जो लोगों को इंसाफ़ की बातों का आदेश देता है और स्वयं भी सीधे मार्ग पर हो? (76)

 

आसमानों और ज़मीन की वे सारी चीज़ें जो नज़रों से ओझल हैं, उनके (रहस्यों की) जानकारी अल्लाह ही के पास है। और उस फ़ैसले की घड़ी का (अचानक) आना ऐसा होगा जैसे आँखों का झपकना या इससे भी जल्दी: हर एक चीज़ अल्लाह के क़ाबू में है। (77)

 

(और देखो!) अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माँओ के पेट से इस हाल में निकाला कि तुम कुछ भी नहीं जानते थे। फिर उसने तुम्हें सुनने, देखने, और सोचने-समझने की ताक़त दी ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको। (78)

 

क्या वे चिड़ियों को आसमान में नहीं देखते कि किस तरह हवाओं के बीच उड़ती फिरती हैं? अल्लाह के सिवा कौन है जो उन्हें (हवा में) थामें हुए होता है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (सच्चाई में) विश्वास रखते हैं। (79)

 

यह अल्लाह है जिसने तुम्हारे घरों को तुम्हारे लिए आराम करने की जगह बना दिया, और जानवरों की खालों से भी तुम्हारे लिए ऐसे घर [ख़ेमा,Tent] बना दिए जिन्हें हल्का-फुल्का होने के कारण तुम सफ़र में भी अपने साथ लिए फिरते हो और जहाँ चाहते हो पड़ाव भी डाल लेते हो; फिर चौपायों के ऊन से, रोवों [Fur] से और बालों से कितने ही घरेलू सामान और ज़रूरी चीज़ें बना दीं कि एक अवधि तक काम देती हैं। (80)

 

यह अल्लाह है जिसने अपनी पैदा की हुई चीज़ों से तुम्हारे लिए छाँव बनायी और पहाड़ों में पनाह लेने की जगहें बनायीं; ऐसे कपड़े दिए जो तुम्हें गर्मी से बचाते हैं और कुछ ऐसे भी (लोहे के) कपड़े दिए जो युद्ध में तुम्हारे लिए बचाव का काम करते हैं। इस तरह, अल्लाह तुम पर अपनी नेमतें [blessings] पूरी करता है, ताकि तुम पूरी भक्ति से उसके आगे झुक सको। (81)

 

 फिर भी अगर वे [काफ़िर] मुँह मोड़ते हैं तो [ऐ रसूल!], आपकी ज़िम्मेदारी तो बस इतनी ही है कि (अल्लाह के) संदेश को उन तक साफ़-साफ़ पहुँचा दें।  (82

 

ये लोग अल्लाह की नेमतों को जानते हैं, मगर उसे पहचानने से इंकार करते हैं: उनमें अधिकतर ऐसे हैं (जो शुक्र अदा नहीं करते और) जिन्हें सच्चाई से इंकार है। (83)

 

 

एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, फिर जिन्होंने (सच्चाई में) विश्वास करने से इंकार किया होगा उन्हें इस बात की कोई अनुमति न होगी कि वे कोई बहाने बना सकें या अपनी भूल-चूक में सुधार कर सकें। (84)

 

जब शैतानियाँ करनेवाले लोग अपनी सज़ा भुगतेंगे, तो न उनके लिए सज़ा हल्की की जाएगी और न उन्हें थोड़ी देर की राहत ही मिलेगी। (85)

 

जिन लोगों ने (ख़ुदायी में) अल्लाह के साथ साझेदार [Partner] ठहराए, (क़यामत के दिन) जब वे अपने बनाए हुए साझेदारों को देखेंगे, तो कहेंगे, "हमारे रब! ये हैं हमारे वे साझेदार जिन्हें हम तेरे सिवा पुकारा करते थे।" इस पर वे [साझेदार] तुरंत पलटकर जवाब देंगे, "तुम बिलकुल झूठे हो।" (86)

 

 उस दिन वे सब आज्ञाकारी बने हुए अल्लाह के आगे सिर झुका देंगे: उनके बनाए हुए झूठे ख़ुदा उन्हें अकेला छोड़ जाएंगे। (87)

 

जो लोग अविश्वास पर अड़े रहे, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोकते रहे थे, उन लोगों ने फ़साद [corruption] मचा रखा था, और इसीलिए हम उनके लिए यातना पर यातना बढ़ाते रहेंगे  (88)

 

 

एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से उन लोगों के ख़िलाफ़ एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, और हम [ऐ रसूल] आपको इन (मक्का के) लोगों के ख़िलाफ़ गवाह के रूप में लाएंगे, क्योंकि हमने आप पर किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है जिसमें हर चीज़ को खोल-खोलकर बता दिया गया है, यह उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शन [Guidance] है, रहमत [Mercy] है, और अच्छी ख़बर सुनानेवाली है जो लोग पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकते हैं (89

 

 बेशक अल्लाह (सबके साथ) न्याय करने का, भलाई करने का और रिश्तेदारों को (उनके हक़) देते रहने का आदेश देता है और गंदी व अश्लील बातों से, हर तरह की बुराइयों से और अत्याचार व ज़्यादती करने से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम ध्यान दो व समझो। (90)

 

 अल्लाह के नाम से अगर कोई प्रतिज्ञा करो, तो उसे पूरा किया करो  और (इसी तरह) अगर किसी चीज़ की पक्की शपथ ले लो तो उसे मत तोड़ो, क्योंकि तुम अल्लाह को अपना गवाह बना चुके हो: अल्लाह हर एक चीज़ जानता है जो कुछ तुम करते हो। (91)

 

 तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो----(प्रतिज्ञा करके अपने ही हाथों मत तोड़ दो, और) उस औरत की तरह न हो जाओ जो अपना सूत मेहनत से कातने के बाद उसे उधेड़कर धागा-धागा अलग कर देती है---केवल इसलिए कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से गिनती व ताक़त में बढ़ गया। बात केवल यह है कि अल्लाह इस प्रतिज्ञा के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेता है और जिस बात पर तुम आपस में मतभेद रखते हो, उसकी सच्चाई तो वह क़यामत के दिन अवश्य ही तुम पर खोल देगा। (92)

 

 

अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो तुम सबको एक ही (दीन माननेवालों का) समुदाय बना देता, मगर वह जिसको चाहता है (उसकी हठधर्मी के कारण) उसको भटकता छोड़ देता है, और जिसको चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। तुम जो कुछ भी करते हो उसके बारे में तुमसे अवश्य पूछताछ होगी। (93)

 

तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे क़दम मज़बूती से जम जाने के बाद लड़खड़ा जाएं। और कहीं ऐसा न हो कि अल्लाह के मार्ग से दूसरों को रोकने के बदले में तुम्हें दंड का मज़ा चखना पड़े, और तुम्हें एक भयानक यातना झेलनी पड़ जाए। (94)

 

अल्लाह के नाम से की गयी किसी प्रतिज्ञा को (थोड़े से फ़ायदे के लिए) मामूली दाम पर मत बेच दो: अल्लाह के पास (देने के लिए) जो है वह तुम्हारे लिए कहीं बेहतर है, काश कि तुम इस बात को समझ पाते।  (95)

 

 जो तुम्हारे पास है वह तो (एक दिन) समाप्त हो जाएगा, मगर जो अल्लाह के पास है वह बाक़ी रहनेवाला है। जिन लोगों ने धैर्य [सब्र] से काम लेते हुए (दुनिया की मुसीबतें झेल ली) होंगी, हम उन्हें उनके बेहतरीन कर्मों के मुताबिक़ उनका इनाम ज़रूर प्रदान करेंगे। (96)

 

 जो कोई मर्द हो या औरत, अगर अच्छे कर्म करता है, और ईमान भी रखता है, तो हम उसे (दुनिया में) अवश्य अच्छी ज़िंदगी देंगे और उनके बेहतरीन कर्मों के मुताबिक़ (आख़िरत में भी) उन्हें इनाम देंगे। (97)

 

 

अतः [ऐ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़ा करें, तो दुत्कारे हुए [Outcast] शैतान (के बहकावे) से अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह से दुआ माँग लिया करें। (98)

 

 उस [शैतान] का उन लोगों पर कोई ज़ोर नहीं चलता जो ईमानवाले हैं और अपने रब पर भरोसा रखते हैं; (99)

 

 उसका ज़ोर तो बस उन्हीं लोगों पर चलता है जो उसे अपना साथी बनाते हैं और जो उसी (शैतान) के चलते, अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं। (100)

 

 जब हम एक आयत की जगह दूसरी आयत बदलकर लाते हैं----- और अल्लाह ही बेहतर जानता है जो कुछ वह उतारता [Reveal] है---- तो वे कहते हैं, "तुम तो बस अपने मन से ही इसे बना लेते हो!", मगर उनमें से अधिकतर लोगों को हक़ीक़त की कोई जानकारी नहीं है। (101)

 

[ऐ रसूल] बता दें, "इस (क़ुरआन) को तो पवित्र आत्मा [जिबरील फ़रिश्ते] ने तुम्हारे रब की ओर से थोड़ा-थोड़ा करके ठीक-ठीक उतारा है, ताकि ईमानवालों के दिल मज़बूती से जमे रहें, और आज्ञा माननेवाले बंदों [मुस्लिम] के लिए मार्गदर्शन और ख़ुशख़बरी का सामान हो। (102)

 

[ऐ रसूल] हम अच्छी तरह से जानते हैं जो ये (आपके बारे में) कहते हैं, "उसको तो एक आदमी है जो (ये बातें) पढ़ा देता है।" हालाँकि जिसकी ओर वे संकेत करते हैं उसकी भाषा विदेशी है, जबकि यह [क़ुरआन] साफ़ अरबी भाषा में है। (103)

 

 जो लोग अल्लाह की आयतों में विश्वास नहीं रखते, अल्लाह उनको सही रास्ता नहीं दिखाता, और उन्हें तो दर्दनाक यातना होगी। (104)

 

 असल में, झूठ तो उन्हीं लोगों ने गढ़ा है जो अल्लाह की आयतों में विश्वास नहीं रखते: वे बिल्कुल झूठे हैं। (105)

 

 जो कोई (अल्लाह पर) ईमान लाने के बाद अल्लाह को मानने से इंकार कर बैठा, और उसका दिल इस इंकार पर जम गया, तो ऐसे लोगों पर अल्लाह का सख़्त ग़ुस्सा टूट पड़ेगा और उनके लिए बड़ी दर्दनाक यातना तैयार है। मगर हाँ, उनकी बात अलग है जिन्हें (डरा-धमकाकर) यह कहने पर मजबूर किया गया हो कि वे ईमान नहीं रखते, हालाँकि उनके दिलों में ईमान मज़बूती से जमा हुआ हो (तो उनकी पकड़ नहीं होगी)। (106)

 

यह (यातना) इसलिए होगी कि उन्हें आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की अपेक्षा इस सांसारिक जीवन से बहुत लगाव है, और अल्लाह (का क़ानून है कि वह) उन्हें सही रास्ता नहीं दिखाता जो उसे मानने से इंकार करते हैं। (107)

 

 ये ऐसे लोग हैं (जो अक़्ल से काम नहीं लेते और) जिनके दिलों को, कानों को और आँखों को अल्लाह ने बंद करके मुहर लगा दी है : वे (अपने अंजाम को) बिल्कुल भुलाए बैठे हैं, (108)

 

 और इस बात में कोई शक नहीं कि आख़िरत में वे बड़े घाटे में रहेंगे। (109)

 

 जिन लोगों ने अपने ऊपर हुए ज़ुल्म के बाद घर-बार छोड़ा, फिर (सच्चाई के रास्ते में) संघर्ष [जिहाद] किया और (मुश्किल के बावजूद) दृढता से जमे रहे, तो ऐसे लोगों के लिए तुम्हारा रब बड़ा माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (110)

 

एक दिन आएगा जब हर एक जान (केवल) अपने-अपने बचाव की दलीलें लेकर आएगी, तब हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार पूरा पूरा बदला चुका दिया जाएगा--- किसी के साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (111)

 

 अल्लाह एक ऐसे शहर की मिसाल बताता है जो अमन-चैन की जगह थी। ज़रूरत का हर सामान बड़ी मात्रा में सब जगह से आता रहता था। फिर ऐसा हुआ कि (वहाँ के लोगों ने) अल्लाह की नेमतों [blessings] पर शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तब अल्लाह ने भी उनकी करतूतों के कारण उन पर भूख और डर का साया डाल दिया। (112)

 

फिर उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आए, मगर उन लोगों ने उसे झूठा कहा। अन्ततः भयानक यातना ने उन्हें उस वक़्त धर-दबोचा जबकि वे शैतानियाँ करने में मगन थे। (113)

 

 

 अतः जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें रोज़ी दे रखी है, उसमें से अच्छी और हलाल [Lawful] चीज़ें खाओ-पिओ, और (साथ में) अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करो, अगर तुम सचमुच उसी की इबादत [पूजा] करते हो। (114)

 

 उसने (खाने की) केवल इन चीज़ों को तुम्हारे लिए मना [हराम] किया है: मरे जानवर का सड़ा हुआ गोश्त, ख़ून, सुअर का मांस और जिस जानवर को अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लेकर काटा गया हो। लेकिन, अगर (हलाल खाना न मिलने पर) कोई भूख से एकदम मजबूर हो जाए, हालाँकि उसे इच्छा न हो, और बस (जान बचाने के लिए) उतना ही-सा खा ले जिससे उसकी उस वक़्त की ज़रूरत पूरी हो जाए (तो उसे खा सकता है) और अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (115)

 

 और अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हुए ऐसी ग़लत बातें मत कहा करो, "यह हलाल [Lawful] है और यह हराम [Forbidden] है": जो लोग अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ते हैं, वे कभी कामयाब नहीं होंगे---- (116)

 

वे थोड़ा सा मज़ा (इस दुनिया में) उठा सकते हैं, मगर उन्हें (आख़िरत में) दर्दनाक यातना मिलने वाली है (117)

 

 और [ऐ रसूल] यहूदियों के लिए हमने जो चीज़ें हराम की थीं, उसके बारे में हम आपको पहले ही (क़ुरआन में) बता चुके हैं। हमने (पाबंदी लगाकर) उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया था, बल्कि वे ख़ुद ही अपने ऊपर ज़ुल्म करते रहे थे। (118)

 

मगर जो लोग अनजाने में ग़लतियाँ कर बैठते हैं, फिर इनसे तौबा कर लेते हैं, और उसमें सुधार करते हैं, तो उनके लिए तुम्हारा रब बड़ा क्षमा करनेवाला, बेहद मेहरबान है। (119)

 

 

सचमुच  इबराहीम की मिसाल पूरे समुदाय जैसी थी: वह पूरी भक्ति से झुककर अल्लाह की आज्ञा मानने वाला और ईमान का पक्का  था। वह मूर्तियों को पूजनेवाला था; (120)

वह अल्लाह की रहमतों का शुक्र अदा करनेवाला था, अल्लाह ने उसे चुन लिया था और उसे (सच्चाई का) सीधा मार्ग  दिखाया था। (121

और हमने उस पर दुनिया में भी अपनी ख़ास कृपा-दृष्टि रखी और आख़िरत में भी वह अच्छे नेक लोगों मे से होगा। (122)

फिर [ऐ रसूल] हमने आप पर अपना संदेश उतारा कि, "इबराहीम के तरीक़े पर चलो, जो ईमान का बिल्कुल पक्का था, और (एक अल्लाह को छोड़कर) कई देवी-देवताओं को माननेवालों [Idolators] में से था।" (123)

 'सब्त' [Sabbath] मनाने का दिन तो केवल उन लोगों पर अनिवार्य कर दिया गया था जिन्हें उसके बारे में आपस में मतभेद था। क़यामत के दिन तुम्हारा रब उनके बीच फ़ैसला कर देगा, जिन बातों में उन्हें आपस में मतभेद था। (124

 

( रसूल) लोगों को अपने रब के मार्ग की ओर जब बुलाया करें तो ज्ञान  और अच्छी शिक्षा के साथ बुलाएं। और उनसे आदर के साथ वाद-विवाद करें, कि आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो सही मार्ग से भटक गया है और कौन है जो सही  मार्ग पर है (125)

( ईमान वालो) अगर तुम अपने ऊपर किए गए किसी हमले का बदला लो, तो बदला उतना ही होना चाहिए जितना तुम्हें कष्ट पहुँचा हो, लेकिन अगर तुम सब्र कर लो और (बदला न लो) तो निश्चय ही यह ज़्यादा अच्छा होगा। (126)

अतः ( रसूल) आप सब्र से काम लें: और आपको सब्र केवल अल्लाह ही की मदद से मिलेगा। उनके हाल पर दुखी हों और उनकी विरोधी चालों से मायूस हों, (127)

क्योंकि अल्लाह उनके साथ है जो उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं और अच्छा काम करते रहते हैं। (128)

 

  

नोट:

 1: मक्का के विश्वास न करने वालों को जब मुहम्मद (सल्ल)  इस बात के लिए डराते थे कि विश्वास न करने और दूसरे ख़ुदाओं को अल्लाह का साझेदार मानने के नतीजे में यातना आने वाली हैतो शुरू में तो कुछ दिन उन लोगों ने इंतज़ार कियाफिर जब देखा कि कोई यातना नहीं आयीतो इसका मज़ाक़ उड़ाते हुए उस यातना को जल्दी लाने को कहते थे। 

 4: अल्लाह ने इंसान को एक नापाक बूंद से बनाया हैफिर उसे सभी जीवों में सबसे उत्तम बनायामगर इंसान केवल उसी अल्लाह को नहीं मानताबल्कि उसका साझेदार ठहरा लेता हैजो कि एक तरह से अल्लाह को चुनौती देने जैसा है।  

 9: जब यह सूरह उतरीउस ज़माने में ऐसी बहुत सी सवारियाँ नहीं थीजो आज मौजूद हैंउदाहरण के लिये बसरेलगाड़ीजहाज़ आदि। आगे आने वाले समय में भी नई सवारियाँ आ सकती हैं जिनके बारे में  अभी हम सोच भी नहीं सकते।

 23: चूंकि अल्लाह घमंड करने वालों को पसंद नहीं करताइसलिए उन्हें दंड भी ज़रूर देगाऔर इसके लिए परलोक में होने वाले हिसाब-किताब को मानना और विश्वास करना ज़रूरी है।

35: उनका यह कहना कि अगर वे अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं की उपासना करते हैंतो इसमें भी ज़रूर अल्लाह की मर्ज़ी होगी,  केवल उनकी ज़िद्द और हठधर्मिता के कारण ही था। इसलिए मुहम्मद साहब को बताया गया है कि आपका काम ऐसे ज़िद्दी लोगों को रास्ते पर लाने का नहीं हैबल्कि उन लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुंचा देने भर का हैमगर वे अपने हिसाब से कर्म करने के लिए आज़ाद हैं। उन लोगों ने यह भी कहा कि अगर अल्लाह न चाहतातो हमने कुछ जानवरों का मांस खाना हराम (forbidden) न किया होतायह उन जानवरों की तरफ़ इशारा है जो उन लोगों ने कुछ देवताओं के नाम से हराम कर रखा थाजिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 139-145) में आया है।

37: जो दूसरों को बहकाते हैंउसके नतीजे के लिए देखें आयत 25.

 40:  मरे पड़े लोगों को दोबारा ज़िंदा किए जाने पर लोगों को यक़ीन नहीं थायहां बताया गया है कि यह अल्लाह के लिए बहुत ही आसान हैउसे कुछ करने के लिए केवल इरादा करना होता है।

 41: यह उन ईमानवाले लोगों के बारे में है जो मक्का में ज़ुल्म से तंग आकर हब्शा [इथोपिया] जाकर बस गए थे।

 47: अल्लाह चूंकि बहुत दयावान हैइसलिए वह एक बार में दंड नहीं देगाबल्कि धीरे-धीरे उनकी ताक़त कम करता चला जाएगा।

56: लोग अपनी पैदावार और अपने जानवरों में से एक हिस्सा अपने देवताओं के नाम पर चढ़ावा देते थेजिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 136) में आया है।

57: अरब के कुछ बहुदेववादी,  फ़रिशतों को अल्लाह की बेटी मानकर पूजते थेजबकि ख़ुद अगर उनको बेटी हो जाती थीतो शर्म से मुंह छुपाते थेऔर कुछ क़बीले तो बेटियों को ज़िंदा गाड़ तक देते थे! इस रस्म को इस्लाम ने ख़त्म किया। देखें 6:151 और 81: 8-9

63: मक्का के बहुदेववादी अपने देवताओं [मूर्तियों] की क़समें खाते थेइसलिए यहाँ अल्लाह ने ख़ुद की क़सम खायी है।

 67: मक्का में जिस समय यह सुरह उतरी थीउस समय तक शराब पीना मना नहीं हुआ था। बाद में इसे तीन चरणों में मना किया गया, देखें 2:219, 4:43 और अंत में 5: 90-91

 68: शहद की मक्खी से किस तरह शहद बनता हैइस पर विचार करने पर पता चलता है कि यह अल्लाह की क़ुदरत का कमाल है।

 71: जिस तरह कोई आदमी अपने ग़ुलाम को अपने बराबर का हिस्सेदार कभी नहीं बनाताउसी तरह जिन देवताओं को तुम अल्लाह का दास समझकर पूजते होतो अल्लाह अपने दासों को किस तरह अपना हिस्सेदार बना सकता है!

72: उन लोगों का यह विश्वास था कि ये नेमतें उनके ठहराए हुए देवताओं की तरफ़ से हैं।

74: मक्का के लोगों ने दुनिया के राजाओं को देखकर अल्लाह के बारे में भी यह कल्पना कर रखी थी कि जिस तरह राजा अपने काम अलग-अलग विभागों में बांट देता हैउसी तरह शायद अल्लाह ने भी अलग-अलग कामों के लिए छोटे छोटे देवताओं को लगा रखा होगा।

76: इन दो मिसालों से साफ़ है कि अल्लाह आसमानों और ज़मीन के सारे मामले का निपटारा बड़ी महारत से करता है, जबकि झूठे ख़ुदाओं में किसी चीज़ की ताक़त नहीं, इसलिए इबादत के लायक़ केवल अल्लाह ही है। 

84: क़यामत के दिन हर समुदाय के रसूल को इस बात की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा कि उन्होंने ईमानदारी से अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुंचा दिया थाऔर उनके समुदाय के लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया था।

 86: उस दिन उन देवताओं [गढ़े गए बुतों और शैतानों] को इकट्ठा किया जाएगाजिन्हें ये लोग पूजते थेमगर वे देवता इस बात से साफ़ इंकार कर देंगे कि ये लोग उनको पूजते थे। हो सकता है कि उस समय उन बुतों को भी अल्लाह बोलने की शक्ति दे देगा। 

92: अल्लाह के नाम से कोई प्रतिज्ञा करके उसे तोड़ देने की मिसाल एक औरत से दी गई है। कहा जाता है कि मक्का में "ख़रक़ानाम की एक दीवानी औरत थी जो दिनभर बड़ी मेहनत से सूत कातती थीऔर फिर रात में धागा-धागा अलग कर देती थीयानी अपने ही हाथों अपनी सारी मेहनत बर्बाद कर देती थी।

93: जो लोग सच्चाई की तलाश में सच्चे मन से लगे रहते हैं, अल्लाह उन्हें सीधा रास्ता दिखा देता है। 

96: धीरज [सब्र] से काम लेने का मतलब अपने मन की इच्छाओं को क़ाबू में रखना भी होता हैऔर तकलीफ़ को चुपचाप झेलना भी होता है।

 98: हर अच्छे काम में शैतान आदमी को बहकाता है। यहां बताया गया है कि क़ुरआन को पढ़ने से पहले शैतान के बहकावे से बचने के लिए अल्लाह से पनाह मांग लेनी चाहिए।

 101: अल्लाह ने हालात के मुताबिक कभी-कभी अपने दिए हुए आदेश में बदलाव किए थेजैसे जेरूसलम के "बैतुल मक़दिसकी जगह काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ने का आदेश देनाजो कि सूरह बक़रा में आया है। इस पर लोगों का कहना था कि अल्लाह का अगर आदेश होतातो उसमें बदलाव नहीं आतायह ज़रूर मुहम्मद साहब की तरफ़ से होगा जो अपने हिसाब से इसमें फेरबदल कर देते हैं। मगर यह अल्लाह ही जानता है कि उसे कब कौन सा आदेश देना हैऔर कब किसमें बदलाव करना है।

 103: मक्का में एक लोहार थाजो कि मुहम्मद सल्ल की बातें बड़े ध्यान से सुनता थाइसलिए आप (सल्ल) कभी कभी उसके पास जाते थे। वह कभी कभी आपको इंजील की कुछ बातें सुना देता थाइसी वजह से मक्कावालों ने यह कहना शुरू किया कि वही मुहम्मद सल्ल को कुछ सिखा-पढ़ा देता हैमगर वह आदमी अरब का नहीं थाऔर अरबी अच्छी तरह नहीं जानता थाजबकि क़ुरआन साफ़ और बेहतरीन अरबी भाषा में है।

 106:  कहा जाता है कि यह "अम्मार इब्ने यासिर" के बारे में है जो मुसलमान हो गया था, और उस पर मक्का के लोग ख़ूब ज़ुल्म करते थे ताकि वह इस्लाम छोड़ दे। उसने अपनी जान बचाने के लिए झूठ कह दिया कि उसने इस्लाम छोड़ दिया हैजब उसने यह घटना मुहम्मद (सल्ल) को सुनायी, तब यह आयत उतरी जिसमें उसे आश्वस्त किया गया है कि उसका ईमान सही-सलामत है।

112कुछ लोग कहते हैं कि यहां शायद मक्का शहर की मिसाल दी गई हैजो कि काफ़ी ख़ुशहाल जगह थीफिर आहिस्ता-आहिस्ता लोगों ने अल्लाह की दी हुई नेमतों का शुक्र अदा करना छोड़ दियानतीजे में बड़ा भारी अकाल पड़ालोग चमड़ा तक खाने के लिए मजबूर हुएफिर मुहम्मद साहब की दुआ से अकाल ख़त्म हुआ। देखें सूरह दुख़ान।

114: लोगों की जिस नाशुक्री की पीछे की आयतों में निंदा की गई हैउनकी एक सूरत यह भी थी कि बहुत सी खाने की नेमतों को अपने मनघड़ंत तरीके से हराम कर रखा थाजिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 139-145) में आया है।

115: इसका विस्तार से वर्णन सूरह मायदा (5: 3) में देखें।

118: यहां बताया गया है कि मक्का के विश्वास न करने वाले भी अपने को इबराहीम के दीन का मानने वाला कहते थे। हालांकि जिन चीजों को इन लोगों ने खाने से रोक रखा थावह चीज़ें इबराहीम अलै के ज़माने से ही हलाल चली आयी थी। हांयहूदियों को सज़ा के तौर पर कुछ चीजों को जरूर हराम किया गया थाजिसका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 146) में आया है। बाक़ी चीज़ें हमेशा से ही हलाल चली आयी थीं।

124: यह दूसरी चीज़ थी जो इबराहीम अलै के बाद यहूदियों के लिए हराम (वर्जित) की गई थीऔर वह थी सब्त यानी शनिवार के दिन कोई भी ऐसा काम न करना जिससे कोई आमदनी या आर्थिक लाभ होता हो। इस हुक्म को भी किसी ने मानाकिसी ने नहीं माना! यह उन यहूदियों के लिए था जो यह दावा करते थे कि इबराहीम (अलै) यहूदी थे, देखें 3: 65-68. 

 128: यहां हर तरह का अच्छा काम करने को [एहसान]कहा गया है, इसमें अल्लाह की इबादत भी शामिल है जो इस तरह से होनी चाहिए कि मानो आप अल्लाह को देख रहे हों या  कम से कम यह अहसास हो कि अल्लाह आपको देख रहा है।

 

 

 

सूरह 30: अर-रुम 

[पूर्वी रोमन साम्राज्य, The Byzantines]

यह एक मक्की सूरह है जिसके शुरू में 7वीं सदी की दो महाशक्तियों यानी रोमन बाइज़ेंटाइनी साम्राज्य और फ़ारस साम्राज्य के बीच सीरिया के इलाक़े में युद्ध का ज़िक्र आया है जिसमें फ़ारस के हाथों रूमियों [Byzantines] की हार (614 ई.) हुई थी। मक्का के बुतपरस्तों ने ईसाई रूमियों की हार पर ख़ुशियाँ मनायी थींक्योंकि फ़ारस वाले आग की पूजा करते थे। उसी समय आयत 1-5 उतरी थीजिसमें कहा गया कि रूमियों की फ़ारस पर अगले तीन से नौ साल के बीच में जीत होगी। फिर आठ साल के बाद रूमियों की फ़ारस पर एक निर्णायक जीत हुई और क़रीब उसी समय बद्र की जंग में मुसलमानों ने मक्का के बुतपरस्तों को हरा दिया और इस ज़बरदस्त जीत की ख़ुशियाँ मनाईं। सूरह में लोगों से इस बात पर आग्रह किया गया है कि वे अपनी पैदाइश के बारे मेंआसमान और ज़मीनऔर अल्लाह के बनाए हुए ब्रह्मांड में फैली हुई प्रकृति की रचना के बारे में सोच-विचार किया करें। एक बंजर मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को दोबारा हरियाली में बदल देने की अल्लाह की ताक़त को फिर से दुहराया गया हैजो कि इस बात का संकेत है कि अल्लाह के लिए मुर्दा लोगों को क़यामत के दिन फिर से उठा खड़ा करना कोई मुश्किल नहीं हैऔर यह कि अल्लाह इंसानों पर बहुत दया करने वाला है। विश्वास न करने वालों को चेतावनी दी गई है कि वे जल्दी से सच्चाई पर विश्वास कर लें इससे पहले कि बहुत देर हो जाएपैग़म्बर साहब को कहा गया है कि वह अपने काम में पूरी लगन से लगे रहें और विश्वास न करने वालों की टीका-टिप्पणी पर ध्यान न दें। 

 

 विषय:

 

 02-05: रोम [पूर्वी रोमबाइज़ेंटाइन] की सेना

06-19: क़यामत और दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाना तय है 

20-27: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

 28   : एक ग़ुलाम की मिसाल 

29-45: सही और सच्चे दीन की स्थापना करो 

46-54: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

55-57: फ़ैसले के दिन का दृश्य 

58-60: रसूल को धीरज से काम लेने की सलाह  

 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)

 

रोम (साम्राज्य की सेना) को (फ़ारस के हाथों) हार हुई है, (2)

 

नज़दीक के देश [सीरिया के आसपास हुए युद्ध] में। (मगर देखना) वे अपनी हार को जीत में बदल देंगे,  (3)

 

कुछ ही साल [3-9 वर्ष] की अवधि में (रोम की सेना की जीत होगी) --- हर मामले में अल्लाह को ही पूरा अधिकार है, पहले भी और आख़िर में भी। और उस दिन ईमान रखने वाले अल्लाह की मदद से होने वाली (रोमियों की फ़ारस पर) जीत की ख़ुशियां मनाएंगे। (4)

 

वह जिसकी चाहता है, मदद करता है: वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है।  (5)

 

यह अल्लाह का वादा है: अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है। मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं जानते: (6)

 

वे तो इस सांसारिक जीवन के केवल बाहरी रूप को ही जानते हैं। किन्तु आने वाली दुनिया [आख़िरत] के बारे में वे बिलकुल ही अनजान बने हुए हैं। (7)

 

क्या उन्होंने ख़ुद अपने बारे में सोच-विचार नहीं किया? अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है, उन्हें बिना किसी ख़ास मक़सद के और बिना एक तय की हुई अवधि के, यूँ ही नहीं पैदा कर दिया है, मगर फिर भी, सचमुच बहुत-से लोग इस बात को मानने से इंकार करते हैं कि उन्हें (एक दिन) अपने रब के सामने जाना होगा। (8)

 

 

क्या वे ज़मीन पर यहाँ-वहाँ चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का क्या अंजाम हुआ जो उनसे पहले वहाँ रहते थे? वे ताक़त में इन लोगों से कहींं अधिक ज़ोर रखते थे: उन्होंने धरती में खेतों की अधिक जुताई की थी और उस पर बस्तियों के निर्माण भी कहीं अधिक किए थे। उनके पास भी उनके रसूल साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे: (मगर उन्होंने सच्चाई को न माना और तबाह हुए), सो अल्लाह तो ऐसा न था कि उन पर ज़ुल्म करता, किन्तु वे स्वयं ही अपने आप पर ज़ुल्म करने वाले थे।  (9)

 

बाद में शैतानी करने वाले लोगों का अंजाम बहुत बुरा हुआ, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झूठ माना और उनकी (बराबर) हंसी उड़ाते रहे।  (10)

 

अल्लाह ही सृष्टि करके जीवन की शुरुआत करता है, फिर वही उसको दोबारा पैदा करेगा, और फिर उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना होगा।  (11)

 

 

और जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन गुनाहगार एकदम से निराश हो जाएँगे।  (12)

 

उन लोगों ने जिनको (शक्ति में) अल्लाह के बराबर का साझेदार [Partners] मान रखा था, उनमें से कोई भी उनके लिए सिफ़ारिश करने वाला न होगा---- और वे स्वयं ही इन (झूठे) साझेदारों को मानने से इंकार कर देंगे। (13)

 

और जब (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन लोगों को अलग-अलग (समूह में) बाँट दिया जाएगा: (14)

 

अतः जिन लोगों ने ईमान रखा था और अच्छे कर्म किए थे, वे बाग़ [जन्नत] में खुशियाँ मनाएंगे,  (15)

 

किन्तु जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया था, और हमारी आयतों [संदेशों] को और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में हमारे सामने होने वाली पेशी को झूठ जाना था, वे सज़ा के लिए वहाँ पकड़कर लाए जाएँगे। (16)

 

 

अतः अल्लाह की महानता का गुणगान करो, शाम में भी और सुबह में भी ---- (17)

 

और आसमानों और ज़मीन में सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं, ---- सो (अल्लाह का गुणगान करो) तीसरे पहर सूरज ढलने के समय भी और दोपहर में भी। (18)

 

वह बेजान चीज़ से जीवित चीज़ को निकाल लाता है, और जीवित चीज़ से बेजान चीज़ को निकाल लाता है। वह मुर्दा पड़ी हुई धरती में (बारिश के द्वारा) फिर से जान डाल देता है, इसी तरह तुम भी (क़ब्रों से ज़िंदा) निकाले जाओगे। (19)

 

यह उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया---- और फिर देखते देखते तुम आदमी बन गए, और धरती पर दूर दूर तक फैल गए। (20)

 

और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हीं लोगों में से तुम्हारे लिए (मर्द-औरत के रूप में) जोड़े पैदा कर दिए, ताकि तुम उनके साथ शान्ति व सुकून से रह सको: और उसने तुम्हारे बीच आपस में प्रेम और दया का भाव पैदा कर दिया। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं।  (21)

 

 

उसकी एक और निशानियों में से है आसमानों और ज़मीन को बनाना, और उसमें पायी जानेवाली विविधता -- तुम्हारी भाषाओं की और तुम्हारे (शरीर के) रंगों की। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं जो जानकारी रखते हैं।  (22)

 

और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन के समय का सोना, और (रोज़ी के लिए) उसके फ़ज़ल [bounty] की तलाश करना भी है। सचमुच ही इसमें निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सुनना चाहते हों।  (23)

 

और उसकी निशानियों में से यह भी है कि वह तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है जिससे डर भी लगता है और उम्मीद भी जागती है; और वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है। सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं।  (24)

 

और उसकी निशानियों में से यह भी है कि आसमान और ज़मीन उसके आदेश से मज़बूती से जमे हुए हैं। आख़िर में, जब वह तुम्हें एक बार ज़मीन से पुकारेगा, उसी वक़्त तुम सब (उसकी ओर) निकल पड़ोगे। (25)

 

आसमानों और ज़मीन में हर एक चीज़ का वही मालिक है, और तमाम चीज़ें उसकी इच्छा का पालन करती हैं। (26)

 

वही (अल्लाह) है जिसने सृष्टि की पहली बार रचना की थी। फिर वही उसको दोबारा बना देगा---- और यह उसके लिए पहले से ज़्यादा आसान होगा। वह आसमानों और ज़मीन में किसी भी तरह की तुलना से परे है; वह सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है।  27)

 

 

वह तुम्हें एक उदाहरण देता है, जो ख़ुद तुम्हारी ज़िंदगी से लिया गया है: जो कुछ माल हमने तुम्हें दे रखा है, क्या तुम अपने ग़ुलाम को (अपने माल में) बराबर-बराबर का हिस्सेदार [Partner] बना सकते हो? क्या तुम उनसे (बिना पूछे ख़र्च करने से पहले) ऐसे ही डरोगे जैसे आपस में (अपने हिस्सेदारों से) डरते हो? इसी तरह से हम अपने संदेशों [आयतों] को उन लोगों के लिए साफ़ व स्पष्ट रूप से पेश करते हैं जो समझ-बूझ से काम लेते हैं।  (28)

 

और तब भी (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [बहुदेववादी, Idolaters] बिना (सच्चाई की) जानकारी के अपनी इच्छाओं के पीछे भागते फिरते हैं। मगर जिसे अल्लाह ही भटकता छोड़ दे, उसे कौन मार्ग दिखा सकता है? कोई नहीं होगा जो इनकी मदद कर सके। (29)

 

अतः [ऐ रसूल], पक्के ईमानवाले होने के नाते, अपने मज़हब [दीन] पर पूरी भक्ति से मज़बूती के साथ जमे रहें। यह एक प्राकृतिक स्वभाव [फ़ितरत] है जिसे अल्लाह ने हर आदमी में डालकर पैदा किया है--- अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती--- यही सीधा व सही दीन है, किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं हैं। (30)

 

तुम सब, पूरी भक्ति से (तौबा के लिए) केवल उसी की ओर झुका करो। तुम्हें उससे डरते हुए बुराइयों से बचते रहना चाहिए; नमाज़ को पाबंदी से पढ़ा करो; और उन लोगों के साथ शामिल न हो जाओ जो अल्लाह के साथ उसका साझेदार [partner] ठहराते हैं, (31)

 

या जिन्होंने अपने दीन [धर्म] को कई फ़िरक़ों [sects] में बाँट दिया, हर फ़िरक़े के पास जो कुछ है, उसी में ख़ुश और मगन है। (32)

 

और जब लोगों को कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वे अपने रब को पुकारते हैं और मदद के लिए उसी की ओर झुकते हैं, मगर जैसे ही वह उन्हें अपनी दयालुता का रस चखाता है--- तो क्या देखते हैं कि --- उनमें से कुछ लोग अचानक (किसी और को) अपने रब का साझेदार [partners] ठहराने लगते हैं,  (33)

 

और (ऐसा लगता है कि) जो कुछ हमने उन्हें दिया था, उसके बदले में वे जान-बूझकर शुक्र तक अदा करना नहीं चाहते। "अच्छा तो मज़े उड़ा लो, जल्द ही तुम्हें पता चल जाएगा!" (34)

 

या क्या हमने उन पर ऐसा कोई प्रमाण उतारा है जो अल्लाह के साथ (किसी को) साझेदार ठहराने की अनुमति देता हो?  (35)

 

 

और हम जब लोगों को अपनी रहमत [mercy] का मज़ा चखने देते हैं, तो वे उस पर बहुत ख़ुश हो जाते हैं, मगर जब उनके साथ कोई बुरी घटना घट जाती है ----और वह भी उन्हीं के करतूतों के कारण--- तो वे बहुत जल्द पूरी तरह निराश हो जाते हैं। (36)

 

क्या वे नहीं देखते कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा-चढ़ाकर देता है और (जिसके लिए चाहता है) रोज़ी को घटा देता है? सचमुच इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो ईमान रखते हैं। (37)

 

अतः रिश्तेदार को, ज़रूरतमंद को और (ग़रीब) मुसाफ़िर को उनका हक़ देते रहो---- यह उनके लिए बेहतर है जिनका मक़सद अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना हो: यही वह लोग हैं जो कामयाब होंगे।  (38)

 

जो कुछ क़र्ज़ तुम ब्याज पर देते हो, ताकि लोगों के धन के ज़रिये तुम्हारी सम्पत्ति बढ़ जाए, तो वह अल्लाह की नज़रों में नहीं बढ़ती; मगर अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने की इच्छा से जो कुछ तुम दान (ज़कात) में देते हो, तो बदले में (अल्लाह के यहाँ) तुम कई गुना इनाम कमा लोगे। (39)

 

वह अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें रोज़ी दी, वह तुम्हें मौत भी देगा और उसके बाद तुम्हें दोबारा जीवित करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए (अल्लाह के) साझेदारों [Partners] में से कोई भी है जो इनमें से एक काम भी कर सके? महान है अल्लाह, और वह उनसे बहुत ऊँचा व बड़ा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार मानते हैं। (40)

 

लोगों के ग़लत कामों के चलते थल [land] और जल [sea] में बिगाड़ [फ़साद/corruption] पैदा हो गया है, और अल्लाह उनके कुछ बुरे कामों के नतीजे में उन्हें अपनी सज़ा का मज़ा चखाएगा, ताकि वे उन (बुरे कामों) से अपने को रोक सकें।  (41)

 

कह दें, "धरती में यहाँ-वहाँ चल-फिरकर देखो कि जो लोग तुमसे पहले गुज़रे हैं, उन लोगों का अंत किस तरह हुआ-- --- उनमें अधिकतर बहुदेववादी [Idolaters] ही थे।" (42)

 

अतः [ऐ रसूल] आप एक सच्चे व सही दीन की भक्ति में मज़बूती से जमे रहेंइससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसे टाला न जा सके। उस दिन, मानव-जाति को अलग-अलग बाँट दिया जाएगा:  (43)

 

जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया था तो उनको इंकार करने का नतीजा भुगतना होगा, और जिन लोगों ने अच्छे कर्म किए थे तो उन्होंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली होगी।  (44)

 

अल्लाह अपने फ़ज़ल [bounty] से उन लोगों को इनाम देगा जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए; वह उन्हें पसंद नहीं करता जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं।  (45)

 

 

और अल्लाह की निशानियों में से यह (भी) है कि वह (वर्षा की) ख़ुशख़बरी सुनाने वाली हवाएँ भेजता है, ताकि तुम उसकी रहमत [grace] का मज़ा उठा सको, और उसके हुक्म से (हवा के द्वारा) पानी में नौकाएं चल सकें, और तुम (उसमें यात्रा करके) अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको। (46)

 

[ऐ रसूल] आपसे पहले, हम हर रसूल को उनकी अपनी क़ौमों के पास भेज चुके हैं: वे उनके पास साफ़ व स्पष्ट प्रमाण लेकर आए, (मगर वे लोग न माने) और उसके बाद, हमने शैतानी करने वालों को दंड दिया। मगर ईमानवालों की मदद करना तो हमारा कर्तव्य बनता है।  (47)

 

अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है; फिर वे बादलों में हलचल मचा देती हैं; फिर वह जिस तरह चाहता है उन बादलों को आसमान में फैला देता है; फिर उन परतोंवाली घटाओं के टुकड़े कर देता है, और तब तुम देखते हो कि उनके बीच से बारिश की बूँदें टपकी चली आती हैं। वह अपने बन्दों में से जिन पर चाहता है, पानी बरसाता है, और जब ऐसा होता है तो देखो कि कैसे वे ख़ुशियाँ मनाने लगते हैं,  (48)

 

हालाँकि इससे पहले जब तक उन पर बारिश नहीं हुई थी, वे सारी उम्मीद छोड़ चुके थे।  (49)

 

अब ज़रा देखो, अल्लाह की दयालुता [रहमत] की निशानियाँ! वह किस तरह से मुर्दा पड़ी हुई धरती में फिर से एक नई जान डाल देता है: वही अल्लाह मुर्दा पड़े हुए लोगों को भी (उसी तरह) फिर से ज़िंदा कर देगा---- और तमाम चीज़ें उसी के क़ब्ज़े में हैं।  (50)

 

अगर हम एक (जला देने वाली गर्म) हवा भेज दें, जिसके नतीजे में वे अपनी फ़सल को पीली पड़ी हुई देखे लें, तब भी वे विश्वास न करने पर अड़े रहेंगे।  (51)

 

अतः [ऐ रसूल] आप मुर्दों को अपनी बात नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेरे चले जा रहे हों; (52)

 

और न आप अंधों को ग़लत रास्ते से फेरकर सही मार्ग पर ला सकते हैं: आप तो केवल उन्हीं को अपनी बात सुना सकते हैं जो हमारी आयतों मॆं विश्वास रखते हैं और पूरी भक्ति के साथ (हमारे सामने) झुकते हैं। (53)

 

वह अल्लाह ही है जिसनें तुम्हें कमज़ोर पैदा किया, फिर कमज़ोरी के बाद तुम्हें ताक़त दी, ताक़त के बाद (बुढ़ापे में) फिर से कमज़ोरी दी और तुम्हारे बाल पक गए: वह जो कुछ चाहता है पैदा करता है, वह सब जाननेवाला, हर चीज़ पर क़ाबू रखनेवाला है। (54)

 

 

जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, गुनाहगार लोग क़समें खाएँगे कि वे (क़ब्रों में) घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरे----(सचमुच) वे दुनिया में हमेशा से ही धोखे में पड़े रहे थे ---- (55)

 

किन्तु जिन लोगों को ज्ञान और ईमान दिया गया था, वे कहेंगे, "अल्लाह के लिखे हुए रिकार्ड के मुताबिक़ तो तुम असल में दोबारा उठाए जाने के दिनतक (दुनिया में) ठहरे रहे थे: यही तो है ज़िंदा उठाए जाने का दिन’ [Day of Resurrection], मगर तुम तो समझते ही न थे।" (56)

 

उस दिन शैतानी करनेवालों के कोई भी बहाने उनके किसी काम न आएंगे: उन्हें (अपनी ग़लतियों में) सुधार करने का कोई मौक़ा नहीं दिया जाएगा। (57)



हमने इस क़ुरआन में लोगों के सामने हर क़िस्म की मिसालें पेश कर दी हैं, इसके बावजूद अगर [ऐ रसूल], आप इनके सामने कोई चमत्कार भी लाकर दिखाएं, तब भी विश्वास न करनेवाले यही कहेंगे, "तुम तो बस झूठ गढ़ते हो।" (58)

 

इस तरह से, अल्लाह उन इंकार पर अड़े हुए लोगों के दिलों को ठप्पा [seal] लगा (कर बंद कर) देता है जो समझते ही नहीं हैं।  (59

 

अतः धीरज [सब्र] से काम लें, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है: ऐसे लोगों से निराश होने की ज़रूरत नहीं है जो लोग पक्का विश्वास नहीं रखते।  (60)









नोट:

4: 7वीं सदी में रोमन साम्राज्य और फ़ारस साम्राज्य दो महाशक्ति थी। यहाँ सन 613-14 ई. में सीरिया के नज़दीक फ़ारस के हाथों जो पूर्वी रुमियों [Byzantines] की हार हुई थी, उसी का वर्णन है। फ़ारस के बहुदेववादियों की जीत पर मक्का के बुतपरस्तों ने ख़ुशियाँ मनायी थीं और उसे एक ख़ुदा के माननेवालों की हार माना था। इसी समय यह आयत उतरी थी जिसमें भविष्यवाणी की गई है कि तीन से नौ सालों के अवधि में पूर्वी रुमियों की फ़ारस पर जीत होगी, और तब ईमानवाले ख़ुशियाँ मनाएंगे। फिर ऐसा ही हुआ कि क़रीब 8 साल के बाद रूमियों की फ़ारस पर जीत हुई, बताया जाता है कि उसी साल बद्र की लड़ाई में ईमानवालों की मक्का के बहुदेववादियों पर भी जीत हुई। 

8: अगर 'आख़िरत' [परलोक] को न माना जाए, तो मतलब यह होगा कि यह दुनिया बिना किसी मक़सद के पैदा की गयी है, और किसी ज़ालिम और बुरे आदमी को हो सकता है कि कोई सज़ा ही न मिले और न  ही अच्छा कर्म करने वालों को कोई इनाम ही मिले। इसके साथ यह भी बताया गया है कि यह दुनिया यूँ ही असीमित काल तक नहीं चलती रहेगी।

11: अल्लाह ने ही हर चीज़ को पहली बार पैदा किया है, सो उसे दोबारा पैदा करना कोई मुश्किल नहीं है, अत: मक्का के लोगों का यह मानना कि आदमी मर जाने के बाद सड़‌‌ गलकर दोबारा पैदा नहीं हो सकता, ग़लत है।

17/18: यहाँ पाँचों समय की नमाज़ पढ़ने का ज़िक्र आया है।

19: बेजान चीज़ से जानदार [सजीव] को निकालना जैसे अंडे से मुर्ग़ी का निकलना, और जानदार चीज़ से बेजान चीज़ को निकालना जैसे मुर्ग़ी से अंडा।

28: आदमी भी अपने से कमतर को अपने धन का हिस्सेदार नहीं बनाता, तो फिर अल्लाह की ख़ुदायी में ऐसे हिस्सेदार ठहरा लेना कहाँ तक सही है जिनमें कोई शक्ति न हो।  

29: ध्यान रहे कि जब आदमी अपनी ज़िद और हठधर्मी के कारण सच्चाई को मानने से इंकार करने पर अड़ा रहता है, तब अल्लाह उसे सही रास्ता दिखाना बंद करके उसे भटकता छोड़ देता है। 

32: आदमी के पैदा होने के साथ उसकी फ़ितरत में यह बात डाल दी गयी है कि वह अल्लाह के दीन की सच्चाई को पहचान सके, लेकिन फिर लोगों ने अलग-अलग तरीक़े अपना लिए और अपने आपको अलग-अलग मज़हब [फ़िरक़े/ sects] में बाँट लिया। 

37: जब रोज़ी में तंगी आ जाए, तो मायूस होकर अल्लाह की नाशुक्री करने के बजाय उसे अल्लाह से ही मदद मांगनी चाहिए, क्योंकि यह सब अल्लाह के ही हाथ में है। इसके साथ ही रोज़ी में बेहतरी के लिए और ज़्यादा कोशिश करनी चाहिए।

39: यह सूरह मक्का में उतरी थी जिसमें ब्याज [Interest] की बुराई बतायी गई हैमगर उस समय तक ब्याज लेने को हराम घोषित नहीं किया गया था। 

 

 

सूरह 11: हूद [Hud]

यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम पैग़म्बर हूद पर रखा गया है जिनकी कहानी आयत 50-60 में आयी है। नूह अलै. के बारे में सूरह 10 और सूरह 7 से ज़्यादा विस्तार से इस सूरह में बताया गया है। शुरुआत में बताया गया है कि पैग़म्बर को भेजने का मक़सद यह है कि वह बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान कर दे और अच्छा कर्म करनेवालों को इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दे, मगर सूरह के बड़े हिस्से में अरब के लोगों को बुराई से सावधान करने पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है: अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखता है, और जो कुछ भी आदमी करता है, अल्लाह हर चीज़ को जानता है (5-6; 111-112; 123). पहले गुज़र चुके बहुत से नबियों के क़िस्से सुनाए गए हैं जिनका मक़सद विश्वास न करने पर अड़े लोगों को सावधान करना, और उससे पैग़म्बर साहब का दिल मज़बूत करना था, देखें आयत (120). 

विषय:

 

01 : यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है 

02-04: रसूल और अल्लाह का संदेश 

05-07: अल्लाह का ज्ञान और उसकी क़ुदरत 

07-11: विश्वास न करने वालों की मन-मौजी सोच

12-16: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

17   : रसूल के पास अल्लाह का संदेश आता है 

18-24: बुरे और अच्छे लोगों के दो समूह 

25-49: नूह (अलै) और उनके लोगों की कहानी 

50-60: हूद (अलै) और "'" के लोगों की कहानी 

61-68: सालेह (अलै) और "समूद" के लोगों की कहानी 

69-76: इबराहीम (अलै) और दूसरे रसूलों की कहानी

77-83: लूत (अलै) और उनके लोगों की कहानी 

84-95: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी 

96-99: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी 

100-109: पिछले रसूलों की कहानियों का निचोड़ 

110-111: मूसा की किताब के बारे में मतभेद 

112-123: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 

अलिफ़॰ लाम॰ रा॰

यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें (मतलब में स्पष्ट, और दलीलों में) बिल्कुल सही बनायी गयी हैं, फिर इसे उस [अल्लाह] की तरफ़ से साफ़-साफ़, विस्तार से बता दिया गया है, जो (हर चीज़ की) गहरी समझ-बूझ रखनेवाला, और हर बात जाननेवाला है।  (1)

 

[ऐ रसूल! कह दें], "अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मैं उस (अल्लाह) की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजा गया हूँ ताकि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दूँ, और (अच्छे व नेक कर्म करनेवालों को) ख़ुशख़बरी सुना दूँ। (2)

 

अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (उन गुनाहों को आगे न करने की) तौबा करते हुए उसकी ओर पलट आओ। वह तुम्हें एक तय की हुई अवधि तक (जीवन के) भरपूर मज़े उठाने का मौक़ा प्रदान करेगा, और (अच्छाइयाँ करने की) क़ाबिलियत [merit] रखनेवाले हर एक आदमी को (उसके कर्मों के मुताबिक़) बदले में इनाम दिया जाएगा। लेकिन अगर तुम (अल्लाह से) मुँह फेरते हो, तो फिर मुझे डर है कि कहीं तुम उस भयानक दिन की दर्दनाक यातना में न फँस जाओ:  (3)

 

यह अल्लाह ही है, जिसके पास तुम्हें लौटकर जाना है, और हर चीज़ उसके क़ाबू में है।" (4)

 

देखो! इन इंकार करनेवाले (काफ़िरों) को, कि किस तरह अपने सीनों को (कपड़ों से लपेटकर) ढँक लेते हैं ताकि वे उस [अल्लाह] से अपनी भावनाएं छिपा सकें। मगर चाहे वे अपने आपको कपड़ों से कितना भी ढँक लें, वह उसे भी जानता है जो कुछ वे छिपाते हैं और उसे भी जो कुछ वे सबके सामने बताते हैं: वह तो सीने के अंदर के छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है। (5)

 

ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसको रोज़ी देने की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने न ले रखी हो। वह (सब) जानता है कि कहाँ वह (प्राणी) रहता है और कहाँ उसका (आख़िरी) पड़ाव होना है: सारी चीज़ों का लेखा-जोखा साफ़-साफ़ लिखा हुआ (मौजूद) है।  (6)

 

वह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिनों में पैदा किया ---- उसके नियम-क़ायदे पानी पर भी लागू होते हैं----- ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें से कर्म के हिसाब से कौन सबसे अच्छा है।

 

तब भी [ऐ रसूल] अगर आप उनसे कहें कि "मरने के बाद तुम्हें दोबारा उठाया जाएगा," तो इंकार करनेवाले ज़रूर कहने लगेंगे, "यह और कुछ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जादू की बातें हैं।" (7)

 

अगर हम उनकी सज़ाओं को एक नियत अवधि तक के लिए टालते हैं, तो वे ज़रूर कहेंगे, "आख़िर किस चीज़ ने (उस सज़ा को आने से) रोक रखा है?" मगर (याद रखो!) जिस दिन वह (यातना) उनपर आ गयी तो फिर किसी के टाले नहीं टलेगी; जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते रहते हैं, वही चीज़ उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी। (8)

 

जब हम आदमी को अपनी रहमत [दयालुता] का मज़ा लेने देते हैं और फिर उसे (देने से) रोक लेते हैं, तॊ आदमी (निराश होकर) बेचैन हो जाता है, और (एहसानों को भूलकर) नाशुक्रा [ungrateful] बन जाता है! (9)

 

और जब उसे कोई तकलीफ़ पहुँची हो, और फिर उसके बाद अगर हम उसे अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह यही कहता है, "दुर्भाग्य की छाया मुझ से दूर हट गयी।" वह (ज़रा सी बात में) ख़ुशी से फूला नहीं समाता और डींगें मारने लगता है। (10)

 

हाँ, मगर उनकी बात अलग है, जो धीरज से काम लेते हैं और अच्छे व नेक कामों में लगे रहते हैं: उनके (गुनाह) माफ़ कर दिए जाएंगे, और उन्हें बड़ा भारी इनाम मिलेगा। (11)

 

तो [ऐ रसूल!], जो (संदेश) आप पर उतारा जा रहा है, क्या ऐसा हो सकता है कि आप उसमें से कुछ भाग छोड़ दें, और उन लोगों की बातों से अपना दिल तंग (व दुखी) कर बैठें, क्योंकि वे कहते हैं, ‘उसपर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतारा गया?' या उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया?" (याद रहे!) आपका काम तो केवल सावधान कर देना है; वह अल्लाह है जो हर चीज़ का अधिकार रखता है। (12)

 

अगर वे कहते हैं कि, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को ख़ुद ही गढ़ लिया है", तो कह दें, "ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो तो इस जैसी दस सूरतें गढ़कर ले आओ, और (इस काम में मदद के लिए) अल्लाह को छोड़कर जिस किसी को बुलाना चाहो, बुला लो।" (13)

 

फिर अगर वे तुम्हारी बात का जवाब न दे पाएं, तो तुम सबको यह मालूम हो जाना चाहिए कि ये ज्ञान की बातें [क़ुरआन] अल्लाह की जानकारी के साथ उतारी गयी हैं, और यह कि अल्लाह के सिवा कोई ख़ुदा नहीं जिसे पूजा जाए। तो फिर, क्या तुम अल्लाह की आज्ञा मानते हुए उसके आगे समर्पण करोगे? (14)

 

अगर कोई आदमी केवल इसी दुनिया की ज़िंदगी और उसकी सज-धज को ही पाना चाहता है, तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला हम इसी दुनिया में दे देते हैं---- और उनको देने में कोई कमी नहीं की जाती------ (15)

 

मगर ऐसे लोगों के पास आने वाली दुनिया [आख़िरत/परलोक] में सिवाए (जहन्नम की) आग के कुछ भी न होगा: उनके यहाँ के सारे काम बेकार साबित होंगे, और उनका सब किया-धरा अकारत जाएगा।  (16)

 

क्या ऐसे लोगों की तुलना उनसे की जा सकती है जिनके पास अपने रब की तरफ़ से साफ़ व स्पष्ट प्रमाण [क़ुरआन] हो, जिसे अल्लाह की ओर से एक गवाह [जिबरईल फ़रिश्ता] पढ़कर सुनाता हो, और जिनके पास इससे पहले मार्गदर्शन और रहमत के रूप में मूसा की किताब [तोरात/Torah] रही है? ये वे लोग हैं जो इस (किताब) में विश्वास रखते हैं, जबकि लोगों का वह गिरोह जो इसे सच मानने से इंकार करता है, उनके लिए (जहन्नम की) आग का वादा किया जाता है। अतः [ऐ रसूल!] आपको इसके बारे में कोई सन्देह नहीं होना चाहिए: यह आपके रब की तरफ़ से एक सच्चाई है, हालाँकि ज़्यादातर लोग यह बात नहीं मानते। (17)

 

उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम करने वाला कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें बनाए? ऐसे लोगों को उनके रब के सामने लाया जाएगा, और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब के बारे में झूठी बातें बनायी थीं।" अल्लाह की फिटकार [Rejection] है उन लोगों पर, जो ऐसे बुरे काम करते हैं, (18)

 

जो अल्लाह के मार्ग से दूसरों को रोकते हैं, उसमें टेढ़ापन पैदा करना चाहते हैं, और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] को मानने से इंकार करते हैं। (19)

 

वे ज़मीन पर बचकर कहीं नहीं जा सकेंगे और न अल्लाह के सिवाए कोई और मददगार होगा जो उनको बचा सके। उनकी सज़ा दुगनी कर दी जाएगी। न वे (सच्चाई की बातें) सुन सके और न (सच्चाई को) देख ही सके। (20)

 

ये वह लोग हैं जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डाल दीं, और (सच के ख़िलाफ़) जो कुछ झूठी बातें वे गढ़ा करते थे, (आख़िरत में) वह सब उन्हें छोड़ जाएंगी।  (21)

 

और इस बात में कोई शक नहीं कि यही लोग हैं जो आनेवाली (आख़िरत की) ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा नुक़सान में रहेंगे। (22)

 

मगर जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास रखा, अच्छे कर्म किए, और अपने रब के सामने (पूरी भक्ति से) झुक गए, तो वही लोग जन्नत में बसने वाले हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। (23)

 

ये दोनों पक्ष ऐसे हैं कि जैसे कोई अन्धा और बहरा आदमी हो, और उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से की जाए जो अच्छी तरह देखता भी हो और सुनता भी: क्या दोनों एक समान हो सकते हैं? तुम फिर भी इस बात पर ध्यान क्यों नहीं देते? (24)

 

हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास इस संदेश के साथ भेजा, "मैं तुम्हारे पास (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) साफ़-साफ़ चेतावनी देने आया हूँ: (25)

 

अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मुझे डर है कि कहीं एक दुख-भरे दिन में तुम्हारे ऊपर कोई दर्दनाक यातना न आ जाए।" (26)

 

मगर विश्वास न करनेवाले लोगों के सरदार ने कहा, "हम देखते हैं कि तुम कुछ और नहीं, बल्कि हमारे ही जैसे (मर-खप जानेवाले) मामूली आदमी हो, हम यह भी साफ तौर से देखते हैं कि तुम्हारे पीछे बस वही लोग चल रहे हैं जो हम लोगों में सबसे छोटे व तुच्छ लोग हैं। हमें यह नहीं समझ में आ रहा है कि आख़िर तुम किस मामले में हम लोगों से बेहतर हो? सच तो यह है कि हम तुम्हें झूठा समझते हैं।" (27)

 

नूह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो: अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की स्पष्ट निशानी है, और उसने मुझे (नबी बनाकर) अपनी ख़ास रहमत [grace] प्रदान की हो, मगर वह तुम्हें दिखायी न दे (तो मैं क्या कर सकता हूँ?), क्या हम तुम्हें तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ इसे मान लेने पर मजबूर कर सकते हैं? (28)

 

और मेरे लोगो! मैं इस काम के बदले तुम से कोई इनाम तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं विश्वास रखनेवालों को दूर नहीं भगाउंगा: उन्हें तो अपने रब से मिलने का यक़ीन है। (तुम लोग तो समझने को ही तैयार नहीं हो) मुझे लगता है कि तुम (लोग) ही नासमझ हो। (29)

 

ऐ लोगो! अगर मैं विश्वास रखनेवालों को दूर भगा दूँ, तो अल्लाह के ख़िलाफ़ कौन है जो मेरी सहायता करेगा? तो क्या तुम इस पर ध्यान नहीं दोगे? (30)

 

और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, या मुझे ऐसी चीज़ की कोई जानकारी है जो हमसे छिपी हुई है, या यह कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। और न मैं यह कहता हूँ कि जो लोग तुम्हारी नज़र में छोटे व तुच्छ हैं, अल्लाह उनके लिए कोई भलाई न देगा: जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे ख़ुद बहुत अच्छी तरह जानता है। अगर मैं ऐसा कहूँ, तब तो मैं ज़ालिमों में से हो जाउँगा।" (31)

 

उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे बहुत लम्बे समय से बहस करते रहे हो। अब अगर तुम सच बोल रहे हो, तो जिस यातना की तुम हमें धमकी देते रहते हो, उसे हम पर ले ही आओ।" (32)

 

नूह ने कहा, "यह तो अल्लाह (के हाथ में) है, अगर वह चाहेगा, तो तुम पर यातना ले आएगा, और तब तुम (उसकी पकड़ से) भाग नहीं पाओगे। (33)

 

अगर अल्लाह तुम्हें तुम्हारे भ्रम के साथ भटकता छोड़ देना चाहे, तो मेरी नसीहत तुम्हारे कोई काम नहीं आएगी: वही तुम्हारा रब है और उसी के पास तुम्हें लौटकर जाना होगा।" (34)

 

अगर (मक्का के विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] यह कहते हैं, "उस (मुहम्मद) ने ख़ुद ही इस (क़ुरआन) को गढ़ लिया है?" तो आप कह दें, "अगर मैंने इसे ख़ुद से बना लिया है, तो मेरे इस अपराध की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी है, मगर जो अपराध तुम कर रहे हो, मैं उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ।"(35)

 

वही’ [Revelation] के द्वारा नूह को बता दिया गया कि "जो लोग पहले ईमान ला चुके हैं, उनके अलावा अब तुम्हारी क़ौम में कोई आदमी विश्वास करने वाला नहीं है, अतः जो कुछ वे कर रहे हैं, उसपर तुम दुखी न हो। (36)

 

अब तुम हमारी देखरेख में और हमारी ओर से भेजी गयी वहीके अनुसार एक नाव [Ark] बनाओ। और जिन लोगों ने शैतानियाँ की हैं, उनके लिए मुझ से पैरवी मत करो---- वे अब पानी में डुबा दिए जाएंगे।" (37)

 

इस तरह, उसने नाव बनाना शुरू कर दिया, उसकी क़ौम के सरदार जब कभी उसके पास से गुज़रते, तो (उसको नाव बनाते देख) उसकी हँसी उड़ाया करते थे। उसने कहा, "अभी तुम मेरी जितनी हँसी उड़ाना चाहो उड़ा लो, लेकिन (एक दिन) हम भी तुम्हारी (मूर्खता पर) हँसेंगे: (38)

 

तुम्हें जल्द ही पता चल जाएगा कि किसे ऐसी सज़ा मिलेगी जो उसे अपमानित कर देगी, और किस पर हमेशा रहनेवाली यातना का क़हर टूट पड़ेगा।” (39)

 

जब (यातना के लिए) हमारा आदेश आ पहुँचा, और धरती से तेज़ धार के साथ पानी फूट पड़ा, तो हमने (नूह से) कहा, "(धरती के) हर प्रजाति में से एक-एक जोड़ा नाव पर चढ़ा लो और साथ में अपने घरवालों को भी-----सिवाए उन लोगों के, जिनके बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका है ------और उन्हें भी (बैठा लो) जो ईमान रखते हैं", हालाँकि उसके साथ ईमान रखनेवाले बहुत थोड़े ही थे। (40)

 

नूह ने (साथियों से) कहा, "इस नाव पर सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से यह पानी में तैरती हुई चलेगी, और (सुरक्षित) लंगर डालकर ठहर जाएगी। निस्संदेह मेरा रब बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (41)

 

फिर वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहरों के बीच चलने लगी और नूह ने अपने बेटे को पुकारा जो पीछे रह गया था, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इंकार करनेवालों के साथ न रह।" (42)

 

मगर उसने जवाब दिया, "मैं पानी से बचने के लिए किसी पहाड़ में पनाह ले लूँगा।" नूह ने कहा, "आज अल्लाह के हुक्म (फ़ैसले) से कोई बचने की जगह नहीं है, सिवाए उसके कि जिस पर वह दया कर दे।" (इतने में) दोनों के बीच एक ज़ोर की लहर आ गयी और वह भी डूबनेवालों के साथ डूब गया। (43)

 

फिर हुक्म हुआ, "ऐ धरती! अपना पानी पी ले और ऐ आसमान! तू थम जा," और पानी उतर गया, आदेश का पालन कर दिया गया। वह नाव जूदी पहाड़ पर ठहर गयी, औऱ कहा गया, "गए वे लोग जो शैतानी करते थे!" (44)

 

नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से था, हालांकि (मेरे परिवार को बचा लेने का) तेरा वादा सच्चा है, और तू फ़ैसला करने वालों में सबसे ज़्यादा इंसाफ़ करनेवाला है।" (45)

 

अल्लाह ने कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह सही नहीं था। मुझ से उन चीज़ों के बारे में मत पूछो जिनके बारे में तुम्हें कोई जानकारी नहीं। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूं कि तुम बेवक़ूफ़ों में शामिल न हो जाओ।" (46)

 

उसने कहा, "मेरे रब! मैं ऐसी चीज़ों के बारे में पूछने से तेरी पनाह माँगता हूँ कि जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। अगर तूने मुझे माफ़ न किया, और मुझ पर दया न दिखायी, तो मैं घाटा उठाने वालों में हो रहूँगा।" (47)

 

और उनसे कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सकून व सलामती के साथ (नाव से) उतर जा, शुभकामनाएं व बरकतें (blessings) हों तुझ पर, और कुछ उन समुदायों पर जो उनसे फले-फूलेंगी, जो तेरे साथ आए हैं। बाद में आने वाले कुछ और लोग भी होंगे जिन्हें हम थोड़े समय के लिए जीवन का मज़ा उठाने का मौक़ा देंगे, मगर उसके बाद (उनके कर्मों के नतीजे में) हमारी ओर से एक दर्दनाक यातना उन्हे पकड़ लेगी।" (48)

 

(ऐ रसूल) ये घटनाएं जो आपको बतायी गयीं, ये उन बातों का हिस्सा थीं जो आपके ज्ञान से परे है। हमने उन बातों को वही”[Revelation] के द्वारा आप पर उतारा। अब से पहले न आप और न आपके लोग इनके बारे में कुछ जानते थे, अतः धीरज [सब्र] से काम ल़ें: आनेवाला दिन तो उन लोगों का है जो अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको (बुराइयों से) बचाते हैं। (49)

 

'आद' की क़ौम के लोगों के पास हमने उनके भाई 'हूद' को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत [पूजा] करो। उसको छोड़कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है; तुम तो केवल झूठी बातें बना रहे हो। (50)

 

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस (नसीहत के लिए) तुमसे कोई मजदूरी नहीं माँगता। मेरा इनाम तो बस उसी के पास है जिसने मुझे पैदा किया। तो फिर तुम बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते? (51)

 

ऐ मेरे लोगो! अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (तौबा करके) उसकी ओर लौट आओ। वह तुम्हारे लिए आसमान से काफ़ी मात्रा में पानी बरसायेगा (और अकाल के बाद खेत लहलहा उठेंगे), और तुम्हें और अधिक शक्ति देगा। तुम यूँ मुँह न फेरो और अपने गुनाहों में बिल्कुल गुम न हो जाओ।" (52)

 

उन्होंने जवाब दिया, "ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आए हो। सिर्फ़ तुम्हारे कह देने भर से हम अपने देवी‌‌-देवताओं को नहीं छोड़ सकते और न ही हम तुम पर विश्वास करनेवाले हैं। (53)

 

हम तो यही कह सकते हैं कि ऐसा लगता है कि हमारे ख़ुदाओं में से किसी की तुम पर मार पड़ गयी है (जो ऐसी बातें करते हो)।" हूद ने कहा, "मैं तो गवाही के लिए अल्लाह को पुकारता हूँ, और तुम भी मेरे गवाह रहो, कि जिन हस्तियों को तुमने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] बना रखा है, उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।  (54)

 

अतः तुम सब मिलकर, मेरे ख़िलाफ़ जैसी चालें चल सकते हो, चल लो, और मुझे ज़रा भी मुहलत न दो। (55)

 

मैं अपना भरोसा अल्लाह पर रखता हूँ, जो मेरा भी रब है, और तुम्हारा भी। ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं, जिसका नियंत्रण उसके हाथ में न हो। निस्संदेह मेरा रब (सच्चाई व इंसाफ़ के) सीधे रास्ते पर है। (56)

 

लेकिन फिर भी अगर तुम मुँह मोड़ते हो, तो जिस संदेश के साथ मुझे तुम्हारे पास भेजा गया था, वह तो मैं तुम तक पहुँचा ही चुका हूँ, और मेरा रब तुम्हारी ज़गह किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा। तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते: वह मेरा रब है, जो हर चीज़ की निगरानी करता है।" (57)

 

और इस तरह, जब हमारे फ़ैसले की घड़ी आ गयी, तो हमने हूद और उसके साथ ईमान रखनेवालों को अपने फ़ज़ल [Grace] से बचा लिया। हमने उन्हें ऐसी यातना से बचा लिया जो बड़ी ही कठोर यातना थी। (58)

 

ये आद की क़ौम के लोग थे: इन लोगों ने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया, उसके रसूलों की आज्ञा भी नहीं मानी, और हर अड़ियल ज़ालिम की आज्ञा मानते हुए उसके पीछे चलते रहे। (59)

 

(नतीजा यह हुआ कि) वे इस दुनिया में भी रद्द कर दिए गए, और क़यामत के दिन भी वे (बरकतों से) दूर कर दिए जाएंगे। "हाँ! आद के लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार कर दिया----- तो ऐ हूद की क़ौम, आद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी!" (60)

 

समूद के लोगों के पास उनके भाई सालेह को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसा दिया, अतः उससे (अपने गुनाहों की) माफ़ी माँगो; और उसकी ओर (गुनाहों की तौबा करते हुए) पलट आओ: मेरा रब (हर एक के) नज़दीक है, और वह दुआओं को सुनने के लिए तैयार रहता है।" (61)

 

लोगों ने कहा, "ऐ सालेह! हम लोगों ने तो पहले तुम से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं। तुम हमें उनकी पूजा करने से रोकते हो, जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं? तुम हमें जिस चीज़ को करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे तो हमें गहरा संदेह है, यह बात हमारे दिल में उतरती नहीं।" (62)

 

सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो: अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की तरफ़ से पक्का प्रमाण है, और अगर उसने ख़ास अपनी रहमत से मुझे (रसूल) बनाया है, और अगर तब भी मैं उसकी आज्ञा न मानूँ, तो अल्लाह से मुझे कौन बचा सकता है? तुम तो (मेरी बात न मान कर) लगता है कि नुक़सान को और बढ़ा दोगे। (63)

 

ऐ मेरे लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी है जो तुम्हारे लिए एक निशानी बनकर आयी है। इसे खुला छोड़ दो ताकि अल्लाह की धरती पर चरती फिरे, और (देखो!) इसे कोई नुक़सान पहुँचाने की कोशिश मत करना, वरना तुरंत ही यातना तुम्हें पकड़ लेगी।" (64)

 

मगर उन लोगों ने उस (ऊँटनी) को (उसके पाँव काटकर) मार डाला, इस पर सालेह ने कहा, "अपने घरों में (ज़िंदगी के) तीन दिन और मज़े ले लो: यह चेतावनी झूठी साबित नहीं होगी।" (65)

 

और जब हमारी (ठहरायी हुई) बात के पूरे हो जाने का समय आ गया, तो हमने अपनी दयालुता दिखाते हुए सालेह और उसके साथ ईमान रखनेवालों को सुरक्षित रखते हुए उस दिन के अपमान से बचा लिया। [ऐ रसूल!] तुम्हारा रब बहुत मज़बूत, ज़बरदस्त ताक़तवाला है। (66)

 

और शैतानियाँ करनेवालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ दबोचा और (जब सुबह हुई तो) वे अपने घरों में मुर्दा पड़े थे, (67)

 

मानो वे वहाँ न कभी बसते थे, न फले फूले थे। "हाँ! समूद ने अपने रब को मानने से इंकार किया-----तो ऐ समूद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी।" (68)



 

और जब ऐसा हुआ कि अच्छी ख़बर का संदेश लेकर हमारे फ़रिश्ते, इबराहीम [Abraham] के पास आए, और कहा, "सलाम हो!", इबराहीम ने जवाब में कहा, "सलाम हो”, और बिना देर किए हुए वह उनके (खाने के) लिए भुना हुआ बछड़े (का गोश्त) ले आया। (69)

 

जब इबराहीम ने देखा कि उनके हाथ खाने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं, तो यह बात उसे बड़ी अजीब लगी, और वह (मन ही मन) उनसे डरने लगा। लेकिन वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत [Lot] की क़ौम के ख़िलाफ़ भेजे गए हैं।" (70)

 

इबराहीम की बीवी पास ही खड़ी थी, वह (ख़बर सुनकर) हँस पड़ी। (असल में) हमने उसको इसहाक़ [Isaac] (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी सुनायी थी, और इसकी कि इसहाक़ के बाद याक़ूब [Jacob] होगा। 

 (71)

 

वह बोली, "अफ़सोस मुझ पर! मैं बच्चे को कैसे जन सकती हूँ, जबकि मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, और यह जो मेरे पति हैं, वह भी बूढ़े आदमी हैं? यह तो बड़ी अजीब चीज़ होगी!" (72)

 

फ़रिश्तों ने कहा, "क्या अल्लाह के फ़ैसले पर तुम आश्चर्य करती हो? तुम पर और इस घर के लोगों पर अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों! कि वह सारी तारीफ़ों के लायक़ है, और उसके लिए हर तरह की बड़ाइयाँ हैं।" (73)

 

फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे अच्छी ख़बर का पता चल गया, तो उसके बाद, वह (लूत के लोगों की होने वाली तबाही से चिंतित हो गया) और लूत की क़ौम के पक्ष में हम से वकालत करने लगा, (74)

 

इसमें शक नहीं कि इबराहीम बड़ा ही सहनशील, नरम दिल, और हमारी भक्ति में पूरी तरह समर्पित था। (75)

 

(फ़रिश्तों ने कहा), "ऐ इबराहीम! (उनके लिए) वकालत करना बंद कर दो: तुम्हारे रब का फ़ैसला हो चुका है; यातना उन पर बस आ ही पहुँची है, और अब इसे टाला नहीं जा सकता है।" (76)

 

और फिर जब ऐसा हुआ कि हमारे फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह (उनकी इज़्ज़त की ख़ातिर) परेशान हो उठा, उनकी (इज़्ज़त) बचाने में अपने आपको असहाय महसूस करने लगा, और कहने लगा, "सचमुच यह बड़ी मुसीबत का दिन है!" (77)

 

उसकी क़ौम के लोग (मेहमानों के आने की ख़बर सुनकर) दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे; वहाँ (के मर्दों को सेक्स के लिए मर्द ही पसंद थे), वे पहले से ही इस बुरे कर्म में लगे हुए थे। लूत ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं। ये तुम्हारे लिए अधिक भरी पूरी व पवित्र हैं (इनके साथ प्रेम करो), और अल्लाह का कुछ तो डर रखो, और मेरे मेहमानों के साथ मुझे बेइज़्ज़त मत करो। क्या तुममें से एक आदमी भी ऐसा नहीं जो सही समझ रखता?" (78)

 

उन लोगों ने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं। और तू अच्छी तरह जानता है कि हमें क्या चाहिए।" (79)

 

लूत ने कहा, "काश कि मुझमें इतनी ताक़त होती कि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों से) रोक पाता, या कोई मज़बूत सहारे का ही आसरा होता!" (80)

 

फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के संदेश के साथ आए हैं। (चिंता न करो) वे तुम तक नहीं पहुँच सकेंगे। अतः तुम सोयी रात में अपने घरवालों को लेकर निकल पड़ो, और (ख़बरदार!) तुममें से कोई पीछे मुड़कर न देखे। केवल तुम्हारी बीवी (पीछे रह जाएगी, और) उसको, दूसरे लोगों की तरह, बुरा अंजाम भुगतना होगा। उनकी (तबाही के लिए) सुबह-सवेरे का समय तय हो चुका है: क्या सुबह के आने में देर लगेगी?" (81)

 

और इस तरह, जब हमारे तय किए हुए फ़ैसले की घड़ी आ पहुँची, तो हमने उनकी बस्ती को ऊपर से नीचे पटक कर रख दिया (ऊँचे-ऊँचे भवन ज़मीन में आ रहे), और परत-दर-परत [layer], उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर लगातार बरसाए, (82)

 

जिन पर तुम्हारे रब की तरफ़ से (इसी काम के लिए) निशान लगे हुए थे। और यह (जगह मक्का के) शैतानियाँ करने वालों से ज्यादा दूर नहीं है। (83)

 

और मदयन [Midian] (के क़बीले) में उनके भाई शुऐब को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत करो, उसको छोड़कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। (और देखो!) किसी को देते समय नाप और तौल में कमी न किया करो। मैं तो तुम्हें ख़ुशहाली की हालत में देख रहा हूँ, मगर मुझे डर है कि कहीं तुम पर एक ऐसे दिन की यातना न आ जाए, जो तुम सबको चारों तरफ़ से घेर ले। (84)

 

ऐ मेरे लोगो! देते समय, नाप और तौल में इंसाफ़ के साथ, पूरा-पूरा दिया करो। और लोगों को उनकी चीज़ें (उनके हक़ से) कम मत दो, और ज़मीन पर ग़लत तरीक़ों से भ्रष्टाचार [corruption] मत फैलाओ। (85)

 

अगर तुम ईमानवाले हो, तो जो (काम-काज के बाद) अल्लाह का दिया बाक़ी बच जाए, वही तुम्हारे लिए सबसे बेहतर है: मैं तुम्हारे ऊपर कोई रखवाली करनेवाला तो हूँ नहीं।" (86)

 

वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी इबादत तुझे यही सिखाती है कि हम उन्हें छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए हैं, और यह कि हम अपनी ही संपत्ति को मनमाने ढंग से उपभोग [consume] भी न करें? बस तुम्हीं एक बड़े सहनशील, और नेक-चलन आदमी रह गए हो!" (87)

 

शुऐब ने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम देखते नहीं? क्या होना चाहिए अगर मैं अपने रब की तरफ़ से एक पक्के प्रमाण के हिसाब से काम कर रहा हूँ? और उसने खुद मुझे अच्छी रोज़ी दे रखी है: जिस चीज़ को करने से मैं तुम्हें रोक रहा हूँ, ख़ुद मैं वह नहीं कर सकता, बल्कि जहाँ तक मुझ से हो सके, मैं तो बस चीज़ों में सुधार लाना चाहता हूँ। मगर अल्लाह की मदद के बिना मैं कामयाब नहीं हो सकता: उसी पर मैं भरोसा करता हूं, और उसी के सामने (तौबा के लिए) झुकता हूँ। (88)

 

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे लिए तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अंजाम तक न पहुंचा दे कि तुम पर भी वही बीते जो नूह या हूद या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है; और लूत की क़ौम (जिस जगह रहती थी, वह मक्का से) कोई ज़्यादा दूर नहीं है। (89)

 

अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगोऔर फिर तौबा करके उसकी ओर झुक जाओ:  मेरा रब तो बड़ा रहम करनेवाला, और (अपने बंदों से) बहुत प्यार करनेवाला है।" (90)

 

उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तुम्हारी बहुत-सी बातें हमारी समझ में नहीं आती हैं, और हम देखते हैं कि तुम हम लोगों में बहुत कमज़ोर आदमी हो। अगर तुम्हारे साथ तुम्हारा घर-परिवार न होता, तो हम तुझे पत्थर से मार डालते, क्योंकि हमारे सामने तुम्हारी कोई औक़ात नहीं है।" (91)

 

उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे अंदाज़े के मुताबिक़ मेरा परिवार अल्लाह से भी ज़्यादा मज़बूत है? और क्या तुमने अल्लाह को बिल्कुल ही पीछे डाल दिया है? तुम जो कुछ भी करते हो, मेरे रब ने उसे अपने (ज्ञान के) घेरे में ले रखा है। (92)

 

ऐ लोगो! जो तुम्हारा मन चाहेअपनी जगह काम करते रहो, मैं भी उसी तरह अपने काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि किस पर अपमान-भरी यातना आती हैऔर कौन है जो झूठा है! इंतज़ार करो, और मैं भी तुम्हारी तरह इंतज़ार कर रहा हूँ।" (93)

 

फिर जब वह (ठहरायी हुई) बात का समय आ पहुँचातो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान रखनेवालों को बचा लिया, मगर अत्याचार करने वालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ पकड़ा। सुबह होने तक वे अपने अपने घरों में मरे पड़े थे, (94)

 

मानो वे वहाँ न कभी बसे और न कभी फले-फूले थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई थी!"(95)

 

इसी तरह, हमने मूसा को भी अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ(96)

 

फ़िरऔन और उसके मानने वालों  के पास भेजा था, मगर वे फ़िरऔन के आदेश पर ही चले, हालाँकि फ़िरऔन के आदेश मार्ग से भटका देने वाले थे। (97)

 

क़यामत के दिन वह अपनी क़ौम के लोगों में आगे आगे होगा, वह उन्हें रास्ता दिखाते हुए आग में ला उतारेगा, और क्या ही बुरा घाट है वह उतरने का! (98)

 

यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़यामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह, जो किसी को दिया जाए! (99)

 

(ऐ रसूल!) हम इसी तरह आपको कुछ पुरानी बस्तियों की घटनाएं  सुनाते हैं: इनमे सें कुछ तो आज भी खड़ी दिखायी देती हैं और कुछ पूरी तरह उजड़ गयीं; (100)

 

हमने उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया; बल्कि, उन्होंने स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया। तो (देखो) जब आपके रब की (ठहरायी हुई) बात आ पहुंची, तो उनके वे सारे देवी-देवता जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारा करते थेउनके कुछ भी काम न आ सके; वे केवल विनाश को ही बढ़ाने का कारण बने। (101)

 

आपके रब की सज़ा ऐसी ही होती है, जब वह किसी बस्ती को गुनाह करते हुए पकड़ता है: उसकी सज़ा बड़ी दर्दनाक, बहुत कठोर होती है। (102)

 

सचमुच ही इसमें हर उस आदमी के लिए एक निशानी है, जो आख़िरत (Hereafter) की यातना का डर रखता हो। (आख़िरत का दिन)  ऐसा दिन होगा, जब सारे इंसानों को एक साथ इकट्ठा किया जाएगा, यह वह दिन है जो सबको देखना है। (103)

 

हम उस (दिन) को केवल एक नियत अवधि के लिए टाल रहे हैं; (104)

 

जब वह दिन आ जाएगा,  तो किसी की मजाल नहीं होगी कि बिना अल्लाह की अनुमति के कोई मुंह खोल सके, फिर (इंसानों में) कुछ तो ऐसे होंगे जो बड़े दुखी व अभागे होंगे और कुछ बड़े ख़ुश व भाग्यशाली। (105)

 

तो जो अभागे होंगे वे (जहन्नम की) आग में होंगे, चीख़ते चिल्लाते हुए, (106)

 

वे उसी में रहेंगे, उस समय तक जब तक कि आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, और जब तक कि आपका रब ही कुछ दूसरी बात न चाहे: आपका रब जो चाहता है, वही करता है। (107)

 

रहे वे लोग जिन पर ख़ास करम हुआ है, तो वे लोग तो जन्नत में होंगेवे उसी में रहेंगे, उस समय तक जब तक कि आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, और जब तक कि आपका रब ही कुछ दूसरी बात न चाहे------यह एक ऐसा उपहार है, जो कभी ख़त्म न होगा। (108)

 

(ऐ रसूल) ये लोग जिनको पूजते हैं, उनके बारे में आपको कोई संदेह न हो: ये तो बस उसी तरह पूजा करते हैं, जिस तरह इससे पहले इनके बाप-दादा करते आए थे, और हम उन्हें (इनके कर्मों के नतीजे का) हिस्सा बिना किसी कमी के पूरा-पूरा देनेवाले हैं। (109)

 

आपसे पहले हमने मूसा को किताब दी थी, लेकिन इसमें भी मतभेद पैदा हो गए थे, और अगर आपके रब की ओर से एक बात पहले ही  से तय न कर दी गई होती (कि उनको पूरी यातना परलोक/आख़िरत् में दी जाएगी), तो उनके बीच (इसी दुनिया में) फ़ैसला कर दिया गया होताहालांकि वे  उसके बारे में गहरे संदेह में पड़े हुए थे। (110)

 

जो कुछ भी कर्म उन्होंने किया होगा, तुम्हारा रब हर एक को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है। (111)

 

अतः आप और आपके साथ वे लोग जो (गुनाहों से तौबा करके) अल्लाह की ओर झुके हैंउन्हें चाहिए कि सही रास्ते पर जमे रहें, जैसा आपको आदेश दिया गया है, और मर्यादा की सीमा को न तोड़ें, क्योंकि जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। (112)

 

जो लोग शैतानियां करते हैं, उन पर भरोसा करते हुए उनकी तरफ़ न झुक पड़ें, नहीं तो हो सकता है कि (नज़दीकी के चलते) आग आपको भी छू जाए, और तब कोई न होगा जो आपको अल्लाह से बचा सके, और न ही आप कोई मदद पाएंगे। (113)

 

[ऐ रसूल!] नमाज़ की पाबंदी करें, उस वक़्त जब दिन शुरू होने को हो, और उस वक़्त जब ख़त्म होने को हो [सुबह और अस्र/मग़रिब की नमाज़]और रात के कुछ हिस्सों में भी, क्योंकि (याद रहे) अच्छी चीज़ें बुरी चीज़ों को दूर कर देती हैं---- यह याद दिलाने वाली [Reminder] है उन लोगों को, जो इससे नसीहत लेना चाहते हैं।  (114)

 

(अच्छाई के कठिन रास्ते में) धीरज से काम लें: अच्छा व नेक काम करनेवालों का बदला अल्लाह कभी बेकार नहीं जाने देता, (115)

 

फिर आपसे पहले जो पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं उनमें काश कि ऐसे भले-समझदार लोग होते, जो ज़मीन पर फ़साद [corruption] पैदा करने से रोक पाते! हमने उनमें से बहुत थोड़े लोगों को तो (यातना से) बचा लिया, जबकि अत्याचारी लोग तो भरपूर मौज-मस्ती में ही लगे रहे, और अपने गुनाहों पर जमे रहे। (116)

 

और (याद रहे कि) अगर किसी बस्ती के लोग सही रास्ते पर चल रहे होंतो तुम्हारा रब ऐसा नहीं है कि बिना वजह उस (बस्ती) को तबाह-बर्बाद कर दे। (117)

 

अगर तुम्हारा रब चाहता तो उसने सारे लोगों को एक ही उम्मत [समुदाय] बना दिया होता, (लेकिन उसने ऐसा नहीं चाहा), सो आपस में उनके मतभेद चलते ही रहेंगे ----- (118)

 

सिवाए उनके जिन पर तेरे रब ने ख़ास रहम किया है (तो वह सच्चाई को समझते हुए आपस में नहीं लड़ेंगे)----- क्योंकि उसने उन्हें इसी तरह पैदा किया है, और फिर (इस मतभेद का नतीजा यह होगा कि) तुम्हारे रब की बात तय हो चुकी है, "मैं जहन्नम को अपराधी जिन्नों और आदमियों से भर दूंगा।" (119)

 

अत: [ऐ रसूल!] हमने आपको (पिछले) रसूलों की कहानियाँ इसलिए सुनायी हैं ताकि इसके द्वारा हम आपके दिल को मज़बूत कर सकें और इन घटनाओं के बयान में सच्चाई की जो दलीलें आपके सामने आ गयीं हैं, वह ईमान रखने वालों की (नसीहत के लिए) एक  सबक़ [lesson] भी हैं और याद दिलाते रहने की चीज़ [reminder] भी। (120)

 

जो लोग विश्वास नहीं  रखतेउनसे कह दें, "तुम्हें जो भी करना है तुम किए जाओ: हमें  भी जो करना है, वह हम कर रहे हैं",  (121)

 

और "(नतीजे का) इंतज़ार करो:  हम भी इंतज़ार कर रहे हैं।" (122)

 

आसमानों और ज़मीन में छिपी हुईं तमाम चीजें अल्लाह की ही हैंऔर (हर चीज़ का अधिकार उसी के पास है) सारे मामले उसी की ओर लौटते  हैं। अतः [ऐ रसूल] आप उसी की इबादत में लगे रहें और उसी पर अपना पूरा भरोसा रखें: जो कुछ तुम (लोग) करते होउससे आपका रब कभी भी बेख़बर नहीं है। (123)













नोट:



5: क़ुरआन से मक्का के कुछ लोगों को बहुत नफ़रत थी, इसलिए जैसे ही इसे सुनते थे, अपने कानों को बंद कर लेते, सीनों पर कपड़ा लपेट लेते और वहाँ से खिसक लेते, ताकि कुछ सुन न सकें। कुछ लोग ऐसे भी थे कि जब गुनाह करते, तो अपने आपको कपड़ों से छिपा लेते थे। 

 

7: आसमानों और ज़मीन को छ: दिनों में पैदा होने की बात के लिए देखें 22: 47;  32: 4; 41: 9 .............                         

"उसके 'नियम-क़ायदे' [अर्श] पानी पर भी लागू होते हैं" [देखें 21: 30], इसका एक अनुवाद यह भी है कि "जबकि उसका सिंहासन [अर्श] पानी पर था", इससे पता चला कि आसमान व ज़मीन बनाने से पहले पानी पैदा हो चुका था। असल में "अर्श" का एक मतलब नियम-क़ायदा [Rule] भी होता है, और सिंहासन भी होता है।

 

12: मक्का के वे लोग जो मुहम्मद (सल्ल) की बातों पर विश्वास नहीं करते थे, वे कहते थे कि आप क़ुरआन से उन भागों को हटा दें जिनमें उनके देवी-देवताओं की निंदा की गई है, तो हमारा और आपका कोई झगड़ा नहीं रहेगा। वे मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का नबी मानने से इंकार करते थे और रोज़ तरह-तरह की बातें बनाया करते थे जिससे मुहम्मद (सल्ल) दुखी और तंग रहने लगे थे। मगर यह तो मुमकिन ही नहीं था कि वह अपने मन से क़ुरआन के किसी भाग को छोड़ देने के लिए सोच भी सकें।

 

15: जिसके लिए इस दुनिया की ही ज़िंदगी सब कुछ है, उसके द्वारा किए गए भलाई के कामों का बदला इसी दुनिया में दे दिया जाता है। याद रखें कि जो भी भलाई के काम अगर दिखावा करने के लिए किए जाते हैं, और उसकी नीयत दुनिया में नाम कमाने की हो, तो ऐसे किसी काम का बदला परलोक में नहीं मिलने वाला, वहाँ तो उसी काम का इनाम मिलेगा जो सच्चे दिल से अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किया गया हो। 

 

18: गवाही देनेवाले वे फ़रिश्ते भी होंगे जो कर्मों का हिसाब लिखते रहते हैं, और वे नबी भी होंगे जो अपनी उम्मत की गवाही के लिए बुलाए जाएंगे।



27: आम तौर से हमेशा ऐसा ही हुआ है कि नबियों को माननेवाले शुरू-शुरू में ज़्यादातर ग़रीब और मामूली आदमी होते हैं जो नबियों को अपने मददगार के रूप में देखते हैं, जबकि अमीर और ऊँची श्रेणी में आने वाले लोग हमेशा नबियों को मानने से हिचकिचाते हैं और उन्हें यह डर होता है कि कहीं नयी विचारधारा से उनका महत्व न घट जाए!

 

36: नूह (अलै) क़रीब 950 साल दुनिया में रहे और लोगों के बाच अल्लाह का संदेश पहुँचाते रहे, मगर बहुत कम ही लोगों ने उन पर विश्वास किया। 

 

40: हर प्रजाति के जानवरों और चिड़ियों के नर व मादा (जोड़े) को भी सवार किया गया। ......."जिन लोगों के बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका" मतलब नूह (अलै.) की बीवी (देखें 66: 10) और उनका बेटा जिनको नौका में नहीं बैठाना था।  

 

42: उनका एक बेटा, जिसका नाम कनान बताया जाता है, ईमान नहीं रखता था, वह भी डूब गया। 

 

44: बताया जाता है कि "जूदी पहाड़" ईराक़ के उत्तर में स्थित है, यह उन पहाड़ों का भाग है जिसका  सिलसिला कुर्दिस्तान से आर्मीनिया तक चला गया है। बाइबल में इसका नाम "अरारात" [Mt. Ararat] आया है जिसकी पहचान आज के तुर्की का पूर्वी पहाड़ी इलाक़ा है। 

 

50: हूद (अलै) की कहानियाँ क़ुरआन में कई जगह पर आयी हैं, देखें 7: 65-72; 26: 123-139; 46: 21-25. हूद (अलै.) अरब के इलाक़े के पैग़म्बर थे, जिनका बाइबल में ज़िक्र नहीं मिलता है, यह नूह (अलै.) की वंशजों में थे। आद की क़ौम के बारे में माना जाता है कि ये लोग दक्षिणी अरब के इलाक़े, जो कि हज़रमौत और ओमान की घाटियों के बीच में है, से आए थे। ये क़बाइली लोग थे और मूर्तियों की पूजा करते थे। 

 

53: स्पष्ट प्रमाण से मतलब वैसे चमत्कार [मोजज़े] दिखाना जिसकी वे लोग माँग करें। 

 

58: उस कठोर यातना यानी बहुत तेज़ आँधी और तूफ़ान का ज़िक्र 7: 72; 54: 20; 46: 24-25. आदि में आया है। 

 

61: सालेह (अलै) की कहानियों के लिए देखें 7: 73-79; 15: 80-84; 26: 141-158; 54: 23-31. ... सालेह (अलै) भी अरब के इलाक़े में पैग़म्बर हुए था जिनका उल्लेख बाइबल में नहीं मिलता। इनकी क़ौम समूद पश्चिमी अरब के पत्थरीले इलाक़े में रहती थी जो हिजाज़ और सीरिया के बीच में पड़ता है। ये लोग भी नूह (अलै) के वंशजों में माने जाते हैं। 

 

62: सालेह (अलै) अपनी क़ौम के बीच बड़े शरीफ़, समझदार और सरदार की नज़र से देखे जाते थे।

64: वह ऊँटनी पहाड़ से निकलकर आयी थी जो उन लोगों के लिए एक निशानी थी।

 

67: बताया जाता है कि पहले ज़ोर का भूकंप आया था, और उसके बाद भयानक धमाका हुआ था।  देखें 7: 77-78

 

70: असल में इंसानों के रूप में फ़रिश्ते आए थे, इसीलिए वे खा नहीं रहे थे, मगर इबराहीम (अलै) को लगा कि ये लोग दुश्मन हैं और किसी बुरे इरादे से आए हैं। 

 

74: असल में इबराहीम (अलै) नहीं चाहते थे कि उनके भतीजे लूत (अलै) की क़ौम को अभी तबाह कर दिया जाए, इसलिए वह उन्हें अभी बर्बादी से रोकने की वकालत करने लगे। 

 

77: लूत (अलै) के पास जो फ़रिश्ते आए थे, वे असल में ख़ूबसूरत नौजवानों की शक्ल में आए थे, और इसीलिए वहाँ के लोग उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते थे। 

 

80: मज़बूत सहारे का मतलब उनके क़बीले या ख़ानदान के आदमी से है, असल में लूत (अलै.) तो इराक़ के रहने वाले थे और बाद में सदूम की बस्ती में नबी के रूप में भेजे गए थे। 

 

84: मदयन की ज़मीन उपजाऊ थी और लोग ख़ुशहाल थे, मगर धोखेबाज़ी से पैसे कमाते और अल्लाह का शुक्र नहीं अदा करते थे। 

 

85: इस क़ौम के लोग बाहर से आने वालों से ज़बरदस्ती टैक्स वसूला करते थे, और कुछ लोग यात्रियों को लूट लेते थे। देखें 7: 85

 

87: हर ज़माने में लोगों की यही सोच रही है कि जो सम्पत्ति मेरी है, उसे मैं मनमाने तरीक़े से ख़र्च करूँ, लेकिन सारी सम्पत्ति का असल मालिक अल्लाह है, वह कुछ दिनों के लिए ज़रूर किसी को इसका मालिक बना देता है, मगर चाहता है कि इस सम्पत्ति का बंटवारा न्याय के हिसाब से हो।

 

94: शुऐब (अलै) की क़ौम की तबाही के लिए देखें 7: 19 

 

107: वे जहन्नम में उस समय तक रहेंगे जबतक आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अभी के जो आसमान और ज़मीन हैं, वे तो क़यामत के आने से ख़त्म हो जाएंगे, मगर परलोक में कोई दूसरा ही आसमान व ज़मीन होगा, जो शायद हमेशा ही रहेगा, और इसलिए जन्नत और जहन्नम भी हमेशा ही रहेगी। देखें 14: 48; 24: 74. .... हाँ, अगर अल्लाह चाहे तो गुनाहगारों को भी माफ़ कर सकता है। ईमानवालों में गुनाह की वजह से जो जहन्नम में जाएंगे, वे अपनी सज़ा पूरी होनी पर वहाँ से बाहर निकल आएंगे।

 

114: यहाँ पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ने के बारे में आया है। नेकी और भलाई के काम छोटे-छोटे गुनाह को मिटाते रहते हैं। देखें 4: 31.

 

119: अल्लाह चाहता तो सभी लोगों को एक ही दीन और समुदाय को मानने वाला बना देता, मगर आदमी को दुनिया में यह आज़ादी दी गयी है कि वह अच्छाई और बुराई को पहचानते हुए अपना रास्ता चुन ले, अंत में इसी के अनुसार इनाम या दंड मिलेगा। 



 

सूरह 14: इबराहीम [Abraham]

यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम इबराहीम अलै. के नाम पर पड़ा हैजिनका ज़िक्र आयत 35-41 में आया हैउन्होंने अल्लाह से मक्का की ख़ुशहाली की दुआ की थी,  ताकि वहाँ के लोग अल्लाह के शुक्रगुज़ार रहेंऔर एक अल्लाह की इबादत करते रहें। पूरी सूरह में उन लोगों की निंदा की गई है जो अल्लाह का शुक्र अदा नहीं करतेऔर उनकी तारीफ़ की गई है जो उसका शुक्र अदा करते हैं। इबराहीम अलै. ने यह भी चाहा था कि उनकी आने वाली पीढ़ियाँ मूर्तिपूजा से बची रहेंमगर इन आयतों के उतरने के समय तक उनमें मूर्तिपूजा रच-बस चुकी थी। इस बात का ज़िक्र करके मक्कावालों को याद दिलाया गया है कि वे मूर्तिपूजा को पूरी तरह छोड़ दें।

 

विषय:

 

01-03: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है 

04     : रसूलों ने हमेशा अपनी क़ौम के लोगों की ज़बान बोली है

05     : मूसा (अलै) का मिशन 

06-08: मूसा (अलै) ने अपने लोगों से अपील की 

09-17: पहले भेजे गए रसूल

18     : विश्वास न करने वालों की मिसाल

19-20: अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है 

21-23: कर्मों के फ़ैसले का दृश्य 

24-27: अच्छे और बुरे पेड़ की मिसाल 

28-30: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम 

31     : ईमानवालों के लिए पाबंदी से नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने का हुक्म  

32-34: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

35-41: इबराहीम (अलै) की दुआ  

42-51: विश्वास न करने वालों की सज़ा निश्चित है 

52     : अल्लाह का संदेश सबके लिए एक नसीहत है 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत  दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
 [ऐ रसूल!] यह [क़ुरआन] एक किताब है जिसे हमने आप पर उतारा  हैताकि आप अपने रब के हुक्म से लोगों को गहरे अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ला सकें, उस रास्ते की तरफ़ ला सकें जो सबसे ज़्यादा ताक़तवाले और तमाम तारीफ़ों के योग्य (रब) का बताया हुआ रास्ता है,  (1)

वह अल्लाह, कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सबका मालिक है। और उन लोगों पर बहुत ही सख़्त यातना होगी जो उस (अल्लाह) को नहीं मानते, (2)

 
वह लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी के मुक़ाबले इस सांसारिक जीवन को ज़्यादा पसंद करते हैं, जो दूसरों को अल्लाह के रास्ते पर चलने से रोकते हैं, और उसे टेढ़ा बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं: ऐसे ही लोग हैं जो गुमराही में बहुत दूर जा पड़े हैं। (3)

 
हमने कभी भी कोई रसूल ऐसा नहीं भेजाजिसने लोगों के सामने (हमारे संदेशों को) स्पष्ट कर देने के लिए उन्हीं की भाषा का प्रयोग न किया हो, मगर इसके बावजूद (वे नहीं समझते), फिर अल्लाह जिसे चाहता है उसे भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है उसे सीधा मार्ग दिखा देता है: वह बड़ी ताक़तवाला, गहरी समझ-बूझवाला है। (4)


 और (देखो!) हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ भेजा था: "अपनी क़ौम के लोगों को गहरे अँधेरों से रौशनी की तरफ़ निकाल लाओ। और उन्हें अल्लाह के उन दिनों की याद दिलाओ (जब अल्लाह ने उन पर अपनी ख़ास कृपा की थी या जब उन्हें परेशानी में डालकर आज़माया था): सचमुच इन बातों में हर उस आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (परेशानी में) धीरज से  काम लेता है और (अच्छे समय में) शुक्र अदा करता है। (5)

फिर जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "अल्लाह ने जो तुम पर मेहरबानियाँ की थी, उन्हें याद करो कि जब उसने तुम्हें फ़िरऔन [pharaoh] के लोगों (की ग़ुलामी) से बचाया था, जो तुम्हें कैसी भयानक यातनाएं दिया करते थेतुम्हारे बेटों को मार डालते थे और केवल तुम्हारी औरतों को (दासियों के रूप में) ज़िंदा रहने देते थे--- वह तुम्हारे रब की ओर से अत्यंत कड़ी परीक्षा थी!" (6)

याद करो जब अल्लाह ने तुम से अपना नियम बताया था, अगर तुम शुक्र अदा करते रहे तो मैं तुम्हें और अधिक नेमतें दूँगालेकिन अगर तुमने शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तो (याद रखो) मेरी यातना बहुत कठोर होती है।  (7

और मूसा ने कहा, "अगर तुम, और ज़मीन में रहने वाला हर एक आदमी एक साथ नाशुक्री करे, तब भी (अल्लाह को तो किसी की ज़रूरत नहीं) वह तो आत्म-निर्भर [self sufficient] है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है।" (8)


क्या आपने उन लोगों के बारे में नहीं सुना जो आपसे पहले गुज़र चुके हैंनूह [Noah] की क़ौम के लोग, आद, समूद और उनके बाद बसने वाले वे लोग जिनको अल्लाह के सिवा (अब) कोई नहीं जानताउनके पास उनके रसूल साफ़-साफ़ प्रमाण लेकर आए थेमगर उन लोगों ने उन (रसूलों) का मुँह बंद कराने की कोशिश की और कहने लगे, "तुम जिस संदेश के साथ भेजे गए होहम उसमें विश्वास नहीं करते। और तुम जो भी हमें करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे में हम गहरे संदेह में हैं।" (9)

उनके रसूलों ने जवाब दिया, "क्या अल्लाह के बारे में कोई संदेह कर सकता है जिसने आसमानों और ज़मीन की रचना की हैवह तुम्हें अपनी तरफ़ बुलाता हैताकि तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर दे और तुम्हें एक नियत घड़ी तक ज़िंदगी का मज़ा उठाने दे।" मगर उन लोगों ने कहा, "तुम तो बस हमारे ही जैसे एक (मामूली) इंसान हो। तुम चाहते हो कि हमारे बाप-दादा जिनकी पूजा करते आए हैं, उनसे हमें रोक दो। (अच्छाअगर तुम ला सकते हो, तो) हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर आओ।" (10)

उनके रसूलों ने जवाब दिया, "हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे आदमी हैंमगर अल्लाह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना ख़ास एहसान [favour] करके चुन लेता है। हम अपनी तरफ़ से कोई प्रमाण नहीं ला सकते, जब तक कि अल्लाह इसकी इजाज़त न दे दे, इसलिए विश्वास [ईमान] रखनेवालों को अल्लाह ही पर पूरा भरोसा रखना चाहिए---- (11)

 
और हम अल्लाह पर भरोसा क्यों न करेंजबकि उसी ने हमें वह (सीधा) रास्ता दिखाया है जिन पर हम चलते हैंतुम हमें चाहे जो भी तकलीफ़ पहुँचा लो, निश्चय ही हम इसे पूरे धैर्य के साथ सह लेंगे। और भरोसा करनेवालों को तो बस अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"(12)



 इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने अपने रसूलों से कहा, "अगर तुम हमारे धर्म में लौटकर नहीं आए, तो हम तुम्हें अपने देश से निकाल बाहर करेंगे।" मगर तब उनके रब ने उन रसूलों की तरफ़ संदेश भेजे: "अब हम शैतानियाँ करनेवालों [ज़ालिमों] को बर्बाद कर देंगे, (13)

 
और उनके बाद उस ज़मीन पर बसने के लिए तुम्हें छोड़ जाएंगे। यह उन लोगों के लिए इनाम होगा, जो मुझ से (हिसाब-किताब के दिन) मिलने से और मेरी चेतावनियों से डरे रहते हैं।" (14

उन (रसूलों) ने अल्लाह से (ज़ालिमों के ख़िलाफ़) फ़ैसले की माँग की, और (नतीजा यह हुआ कि सच्चाई के मुक़ाबले में) हर ज़िद्दी-अड़ियल और ज़ालिम बुरी तरह असफल हुआ---- (15)

 जहन्नम उनमें से हर एक के इंतज़ार में है; वहाँ उसे पीने के लिए गंदा, पीप-मिला पानी दिया जाएगा, (16)

 
जिसे वह घूँट-घूँट पीने की कोशिश करेगा, मगर उसे गले के नीचे उतार न पाएगा; मौत उसे हर तरफ़ से घेर लेगी, मगर वह मरेगा भी नहीं; उसके आगे और अधिक कठोर यातना मौजूद होगी। (17)

 
जिन लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार [कुफ़्र] किया, उनके कर्मों का हाल उस राख के ढेर जैसा होगा, जिसे किसी तूफ़ानी दिन में हवा का तेज़ झोंका उड़ा ले जाता है: जो कुछ भी उन्होंने (अपने कर्मों से) हासिल किया होगा, उनमें से कुछ भी उनके हाथ न आएगा। यही है (असल में) गुमराही में बहुत दूर जा पड़ना! (18)



[ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि आसमानों और ज़मीन को अल्लाह ने एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया हैअगर वह चाहे, तो तुम सबको सिरे से मिटा दे, और बदले में एक नई सृष्टि की रचना कर दे:  (19

 

और ऐसा करना अल्लाह के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। (20)

जब सारे लोग (क़यामत के दिन) अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे, तो (समाज में) अपनी ताक़त की धाक जमानेवालों से कमज़ोर लोग कहेंगे, "हम तो (दुनिया में) तुम्हारे पीछे चलते थे, तो क्या अब तुम अल्लाह की किसी भी यातना से हमें बचा सकते हो!?” वे जवाब में कहेंगे, "अगर अल्लाह ने हमें बच निकलने का कोई रास्ता दिखाया होता, तो हम भी तुम्हें वह रास्ता दिखा देते। अब चाहे हम चिल्ला-चिल्ली करें या धैर्य [सब्र] से बर्दाश्त कर लें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला: बच निकलने का अब कोई उपाय नहीं है।" (21)

 (
क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा, तब शैतान (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त न थी, सिवाय इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम न धरोबल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आपको ही मलामत करो। (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और न ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदार [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी,  (22)

 
मगर जो लोग ईमान रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए थे, उन्हें ऐसे बाग़ों में लाया जाएगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, अपने रब के हुक्म से वे उनमें हमेशा के लिए रहेंगे: वहाँ (हर तरफ़ से) उनका अभिवादन 'तुम पर सलामती होकी दुआ से होगा। (23)



 [ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि अल्लाह कैसी मिसालें पेश करता हैएक अच्छी बात उस पाकीज़ा पेड़ की तरह है जिसकी जड़ गहरी जमी हुई हो और उसकी टहनियाँ आसमान में फैली हुई हों, (24)

और वह (पेड़) अपने रब के हुक्म से हर मौसम में फल दे रहा हो---- अल्लाह लोगों के लिए ऐसी मिसालें इसलिए पेश करता हैताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें--- (25)

 
मगर एक बुरी (व गंदी) बात की मिसाल एक सड़े हुए पेड़ की तरह है (कि जड़ें खोखली हों और) जिसे ज़मीन की सतह से ही उखाड़ लिया जाए, जिसे स्थिरता व जमाव न मिला हो। (26)

 
जो लोग मज़बूत जमी हुई बात [क़ुरआन] पर विश्वास रखते हैं, अल्लाह उन्हें मज़बूती से जमा देता है, इस दुनिया में भी और आनेवाली [आख़िरत/परलोक] दुनिया में भी, मगर शैतानियाँ करने वालों को अल्लाह भटकता छोड़ देता है: अल्लाह (अपनी समझ से) जो चाहता हैकरता है। (27)



 [ऐ रसूल!] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो, अल्लाह की मेहरबानियों (पर शुक्र करने के बजाय) उल्टा उसकी केवल नाशुक्री करते हैं और अपनी क़ौम के लोगों को बर्बादी के घर में ला उतारते हैं,  (28

यानी जहन्नम मेंजिसमें वे जलाए जाएँगे? और रहने के लिए (जहन्नम) क्या ही बुरा ठिकाना है! (29)

 
वे (झूठे ख़ुदाओं को) अल्लाह के बराबर ठहराते हैं ताकि लोगों को उसके सही मार्ग से भटका सकें। कह दें, "अभी थोड़े दिन मज़े कर लो, मगर तुम्हारा अंतिम पड़ाव तो (जहन्नम की) आग है।" (30)

 
मेरे वह बन्दे जो ईमान लाए हैं उनसे कह दें कि इससे पहले कि वह [क़यामत का] दिन आ जाए जिस दिन न तो किसी सामान का लेन-देन हो सकेगा, न किसी से दोस्ती काम आएगी, (अत: इसके लिए तैयारी कर लें) वे नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ा करें, और हमने जो कुछ उन्हें दे रखा है उसमें से (अच्छे कामों पर) छिपकर और सबके सामने भी ख़र्च किया करें  (31)



यह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा कियाआसमान से (ज़मीन पर) पानी बरसाया और  फिर उसके द्वारा तुम्हारे खाने-पीने के लिए तरह-तरह के फल (व फ़सलें) उगा दींउसने जहाज़ को तुम्हारे लिए उपयोगी बनायाजो उसके हुक्म से समंदर में तैरती चलती हैऔर नदियों को भी (तुम्हारे फ़ायदे की चीज़ बनाया); (32)

उसने सूरज और चाँद को भी तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी बनायावे अपने रास्ते पर (नियत चाल से) चलते रहते हैं उसने रात औऱ दिन को भी तुम्हारे लिए बड़े काम का बनाया है  (33)

और (अपनी ज़रूरत के लिए) जो भी तुमने उससे माँगा हैहर चीज़ में से कुछ हिस्सा तुम्हें ज़रूर  दिया गया है। अगर तुम अल्लाह की नेमतों [favours] को गिनना चाहो तो कभी भी उन्हें गिन नहीं सकोगे: इंसान सचमुच बड़ा ही ना-इंसाफ़ी करनेवाला [unjust] और ना-शुक्रा [ungrateful] है। (34



याद करो जब इबराहीम ने (दुआ में) कहा था, "मेरे रब! इस शहर [मक्का]  को अमन की जगह [safe] बना दे! और मुझे और मेरी सन्तान को इस बात से बचाते रहना कि मूर्तियों की पूजा करने लग जाएं,  (35)

मेरे रब! इन (मूर्तियों) नॆ बहुत से लोगों को (सच्चाई के) रास्ते से भटका दिया है! तो जो कोई मेरे पीछे चला तो वह मेरे साथ हैमगर जिस किसी ने मेरे तरीक़े को मानने से इंकार किया---तो (उसका फ़ैसला तेरे हाथ है) बेशक तू बड़ा माफ़ करनेवालाबेहद  रहम करनेवाला है।   (36)

हमारे रब! (तू देख रहा है कि) मैंने अपनी कुछ संतानों को एक ऐसी घाटी में लाकर बसाया है जहाँ खेती-बाड़ी नहीं होतीवह जगह तेरे पवित्र घर [काबा] से नज़दीक हैहमारे रब! (यह इसलिए किया) ताकि वे वहाँ नमाज़ क़ायम करें। अत: लोगों के दिलों को तू उनकी ओर झुका देऔर उनके लिए फलों की पैदावार से रोज़ी प्रदान करताकि वे तेरा शुक्र अदा करने वाले बन सकें।   (37)

हमारे रब! जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ हम ज़ाहिर करते हैंउसे तू अच्छी तरह जानता है: कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो अल्लाह से छिपी होन ज़मीन में और न आसमान में। (38)

(इबराहीम ने कहा:) प्रशंसा है उस अल्लाह कीजिसने बुढ़ापे की अवस्था में भी मुझे इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] (जैसे बेटे) प्रदान किए: मेरा रब सारी दुआएं सुनता है! (39)

मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तानों को पाबंदी से नमाज़ पढ़नेवाला बना दे। ऐ हमारे रब! मेरी दुआओं को क़बूल कर ले। (40)

ऐ हमारे रब! जिस दिन (कर्मों का) हिसाब लिया जाएगाउस दिन मुझेमेरे माँ-बाप को और सब ईमान रखनेवालों को माफ़ कर देना।" (41)



[ऐ रसूल!] आप यह न समझें कि जो कुछ (मक्का के) ये इंकार करनेवाले [काफ़िर] कर रहे हैंउसकी ख़बर अल्लाह को नहीं है: वह तो इन्हें बस उस दिन तक की मुहलत दे रहा है जिस दिन मारे डर के उनकी आँखे फटी-की-फटी रह जाएँगी, (42)

हैरान, घबराए हुए, अपनी गर्दनें उठाए हुए वे भागे चले जा रहे होंगेनज़रें एक जगह से हटा भी न पाएंगेऔर उनके दिल (डर के चलते विचारों से) ख़ाली हो रहे होंगे।  (43)

[ऐ रसूल! आप] लोगों को उस दिन से डराएंजब यातना उनके पास आ पहुंचेगीउस समय इंकार करनेवाले कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ा-सा समय और दे दे: हम तेरे संदेश की पुकार को ज़रुर मान लेंगेऔर रसूलों का अनुसरण करेंगे।" (उनसे कहा जाएगा), "क्या तुम वही नहीं हो जो अब से पहले क़समें खा-खाकर कहा करते थे कि हमारी ताक़त तो कभी ख़त्म होनेवाली नहीं है?" (44)

तुम भी दूसरों की तरह उन्हीं बस्तियों में रह-बस चुके थेजिन्होंने ख़ुद अपने ऊपर अत्याचार किया थाऔर तुम्हें साफ़ तौर से दिखाया गया था कि उनके साथ हमने कैसा सलूक किया----फिर हमने तुम्हें समझाने के लिए तरह-तरह की मिसालें बयान कर दीं (फिर भी तुमने शैतानी नहीं छोड़ी!)।" (45)

उन लोगों ने (अपनी शैतानी चालों से हर तरह का) जाल बिछाया थामगर उनका जाल चाहे पहाड़ को भी अपनी जगह से क्यों न हटा देतातब भी अल्लाह के पास तो उनकी हर चाल का जवाब था।  (46)

 

अतः (ऐ रसूल) आप यह न सोचें कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए वादे को तोड़ देगा:  अल्लाह बेहद ताक़तवाला और सख़्त सज़ा देने की पूरी सलाहियत रखता है। (47)

एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगाऔर सब के सब  लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है----  (48)

उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए होंगे,  (49)

उनके कपड़े तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों को घेरे हुए होगी, (50)

(सबका फ़ैसला कर दिया  जाएगा) ताकि अल्लाह हर एक जान को (उसके कर्मों का) बदला दे सके जिसका वह हक़दार है: अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।   (51)



यह सभी इंसानों के लिए एक सन्देश हैऔर इसलिए भेजा गया है कि लोगों को इसके द्वारा सावधान कर दिया जाएऔर वे जान लें कि वही अकेला अल्लाह हैऔर इसलिए भी कि जो समझ-बूझ रखते हैं, वे इससे नसीहत ले सकें। (52)

 

 

 

 

 

नोट: 

3: रास्ते को टेढ़ा बनाने का मतलब यह है कि दीन के तरीक़े में कोई न कोई कमी तलाश करना ताकि उस पर आपत्ति की जा सकेया क़ुरआन में कोई ऐसी बात खोजना जिससे उनकी झूठी धारणाओं को बल मिल जाए। 

 4: अरब के कुछ लोगों का कहना था कि क़ुरआन अरबी ज़बान के बदले किसी और ज़बान में उतरी होतीतब हम उसे चमत्कार मानते। ....... जो कोई सच्चाई की खोज के लिए इस किताब को पढ़ता हैउसे अल्लाह सीधा रास्ता दिखा देता हैमगर जो कोई इसे अपनी ज़िद्द और दुर्भावना के इरादे से पढ़ता हैउसे अल्लाह भटकता हुआ छोड़ देता है। 

 10/11: स्पष्ट प्रमाण से मतलब लोगों की माँग पर कोई "मोजज़ा" [चमत्कार] दिखाना जिससे लोग हैरान रह जाएं.......  यह अल्लाह की  रहमत है कि वह सज़ा देने में जल्दी नहीं करता, बल्कि मौत आने तक देर करता है, जो कि एक नियत समय में आती है।  

 18: जो लोग अपने रब को नहीं पहचानते और सच्चाई को मानने से इंकार कर देते हैं [काफ़िर]वे भी दुनिया में कुछ अच्छे और भलाई के कर्म करते हैंउनके अच्छे कर्मों का बदला उन्हें इस दुनिया में तो दे दिया जाता हैमगर परलोक में उन्हें कर्मों का कुछ भी बदला नहीं मिलेगा क्योंकि उन लोगों ने रब को मानने से ही इंकार कर दिया। 

 19: अल्लाह द्वारा इस कायनात को बनाने का ख़ास मक़सद यही है कि जो उसके हुक्म को मानते हुए इस दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारेउसे बदले में इनाम मिलेऔर जो उसके आदेशों को मानने से इंकार करता है और बुरे कामों में लगा रहता हैउसे बदले में दंड मिलना चाहिए। ...... अरब के लोग मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किए जाने को भी नहीं मानते थेहालाँकि जिस तरह अल्लाह ने सबको पहली बार बिना किसी चीज़ के पैदा कर दियातो दोबारा पैदा करना उसके लिए तो बहुत आसान है। 

24: "अच्छी बात" [कल्मा तैय्यबा] यानी एक अल्लाह के सिवा कोई ख़ुदा नहींकी सही समझ जब इंसान में पैदा हो जाती हैतो चाहे उसे जिस तरह से भी बहकाया जाए या तकलीफ़ें दी जाएंवह अपनी सोच पर एक मज़बूत पेड़ की तरह क़ायम रहता हैऔर उसकी नेकियाँ ऊपर अल्लाह तक पहुँचती हैं और क़बूल की जाती हैं। 

 29: यहाँ मक्का के बड़े-बड़े सरदारों की तरफ़ इशारा है जिन्हें अल्लाह ने हर तरह की नेमतें दे रखी थींमगर वे लोग उसका शुक्र अदा करने बजाय हमेशा नाशुक्री करते रहेऔर इसके नतीजे में ख़ुद भी तबाही मोल ली और अपनी क़ौम को भी तबाही के रास्ते पर ले गए। 

34: यहाँ "इंसान" से तात्पर्य केवल वे लोग हैं जो अल्लाह की मेहरबानियों को मानने से इंकार करते हैं। 

35: इबराहीम (अलै.) ने जिस जगह अपनी बीवी हाजरा और बेटे इस्माईल को अल्लाह के हुक्म से छोड़ा थावह तब रहने लायक़ नहीं थीफिर वहाँ ज़मज़म का कुंआँ बन गयाउसके कुछ समय बाद पानी के चलते जुरहम नाम का क़बीला वहाँ आबाद हुआफिर धीरे-धीरे वहाँ मक्का शहर बस गया। ............... मक्का के विश्वास न करने वाले भी इबराहीम (अलै.) को अपना बड़ा मानते थेइसीलिए यहाँ उनकी दुआ नक़ल की गई है जिसमें उन्होंने मूर्तिपूजा से अपनी संतानों को बचाए रखने की दुआ की थीमगर उनकी संतानें उलटा उसी में लगी हुई थीं।

37: मक्का में हज के दिनों के अलावा भी सालों भर लोग बड़े शौक़ से जाते रहते हैंऔर फलों की पैदावार की दुआ भी शायद इस तरह पूरी हुई कि मक्का के नज़दीक तायफ़ में खजूर काफ़ी मात्रा में पैदा होती हैइसके अलावा दुनिया भर से वहाँ हर तरह के फल आते रहते हैं।

45: अरब के व्यापारी सीरिया जाते वक़्त 'आद' की बस्तियों और यमन जाते समय 'समूद' की खंडहर बनी बस्तियों में थोड़ी देर आराम करने के लिए रुकते थे। 

 

 

 

सूरह 12: यूसुफ़ [Joseph]

यह एक मक्की सूरह है जिसमें मुख्य रूप से पैग़म्बर यूसुफ़ अलै. की कहानी सुनाई गई है, जिसे "कहानियों में सबसे बेहतर" कहा गया है। यह सूरह मुहम्मद सल्ल. की ज़िंदगी के ऐसे मोड़ पर उतरी थी जब आपकी बीवी ख़दीजा (रज़ि) और चचा अबु तालिब का देहांत हो गया था जो कि आपके मुख्य मददगार थे। इस सूरह की संरचना इस तरह की गई है कि पहली तीन आयतों में क़ुरआन के बारे में परिचय है, और 10 आयतों के एक उपसंहार में मक्का के विश्वास न करनेवालों की प्रतिक्रिया, और फिर पहले के विश्वास न करनेवालों को मिलने वाली सज़ाओं का ज़िक्र है, और साथ में पैग़म्बर साहब का उत्साह भी बढ़ाया गया है। जिस तरह यूसुफ़ अलै. को अपना शहर छोड़ना पड़ा, फिर वह मिस्र के बाज़ार में ग़ुलाम के रूप में बेचे गए, उन पर झूठे इल्ज़ाम लगाए गए, उन्हें जेल हुई, और फिर अल्लाह के करम से एक दिन वह मिस्र के सबसे ख़ास मंत्री [अज़ीज़] बन गए, उसी तरह मुहम्मद सल्ल. को भी मक्का छोड़कर जाना पड़ा, उनपर भी तरह-तरह के झूठे इल्ज़ाम लगाए गए, लोगों ने उन्हें बुरा-भला कहा, तकलीफ़ें दीं, मगर फिर अल्लाह के फ़ज़ल से वह एक दिन पूरे अरब के शासक बन बैठे, और उन्होंने मक्का के अपने विरोधियों को माफ कर दिया, और वही आयत दुहरायी जो यूसुफ़ अलै ने अपने भाइयों को माफ़ करते हुए कही थी (आयत 92).  

विषय:

01-02: यह स्पष्ट किताब अरबी ज़बान में है 



03     : यूसुफ़ (अलै) की कहानी का परिचय 

04-06: यूसुफ़ का ख़्वाब 

07-22: यूसुफ़ और उनके भाई-बंधु 

23-34: यूसुफ़ और मिस्र के अज़ीज़ की बीवी 

35-42: यूसुफ़ क़ैदख़ाने में 

43-49: यूसुफ़ ने बादशाह के ख़्वाब का मतलब बताया 

50-57: यूसुफ़ की क़ैद से रिहाई और मिस्र में ऊँचा दर्जा हासिल करना 

58-69: यूसुफ़ के भाइयों का मिस्र आना 

70-87: यूसुफ़ का अपने भाइयों को बुद्धू बनाना 

88-101: याक़ूब (अलै) और उनके ख़ानदान का मिस्र आना 

102-108: यूसुफ़ (अलै) का ख़्वाब पूरा होना, कहानी की समाप्ति 

109-111: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

111       : क़ुरआन कोई झूठी बनाई हुई बात नहीं है 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 

अलिफ़॰ लाम॰ रा॰

ये आयतें उस किताब [क़ुरआन] की हैं जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती हैं----   (1

 

हमने इस क़ुरआन को अरबी ज़बान में उतार भेजा है ताकि तुम (लोग) इसे समझ सको।  (2)

 

[ऐ रसूल!] हम इस क़ुरआन को आप पर उतारने के साथ-साथ आपको वह कहानी बताते हैं, जो बेहतरीन कहानियोँ में से है। इससे पहले आप भी उन लोगों में से थे जो इन (कहानियों) के बारे में कुछ नहीं जानते थे। (3)

 

(और देखो!) जब ऐसा हुआ कि यूसुफ़ [Joseph] ने अपने बाप [याक़ूब/Jacob] से कहा, "बाबा! मैंने ख़्वाब में ग्यारह सितारे, सूरज और चाँद को देखा: मैंने उन सबको देखा कि वे मेरे आगे झुके हुए हैं।" (4)

 

याक़ूब [Jacob] ने जवाब दिया, "ऐ मेरे बेटे! अपने इस ख़्वाब के बारे में अपने भाइयों को मत बताना, वरना हो सकता है कि वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए तुम्हारे विरुद्ध कोई चाल चलें-----(याद रहे!) शैतान तो आदमी का खुला हुआ दुश्मन है।  (5)

 

(ऐ मेरे बेटे!) यह बात इस बारे में है कि किस तरह तेरा रब तुझे (नबी बनाने के लिए) चुन लेगा, तुझे (बातों और) ख़्वाबों का सही मतलब निकालना सिखाएगा और अपनी नेमतें [blessings] तुझ पर और याकूब के घरवालों पर उसी तरह पूरी करेगा, जिस तरह इससे पहले वह तेरे पूर्वज इबराहीम [Abraham] और इसहाक़ [Isaac] पर पूरी कर चुका है: तेरा रब सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।" (6)



 

सचमुच यूसुफ़ और उनके भाइयों की कहानी में उन सभी लोगों के लिए बड़ा सबक़ है, जो जानना चाहते हैं, (7)

 

(ऐसा हुआ कि यूसुफ़ के सौतेले) भाइयों ने (एक दूसरे से) कहा, "हालाँकि हम (लोग) गिनती में काफ़ी बड़े हैं (यानी पूरे दस हैं), फिर भी, यूसुफ़ और उसका (छोटा) भाई हमारे बाप को हमसे कहीं ज़्यादा प्यारा है------सचमुच हमारे बाबा साफ़ तौर से ग़लती पर हैं। (8)

 

(उनमें से एक ने कहा),यूसुफ़ को मार डालो या उसे किसी दूसरी जगह फेंक आओताकि तुम्हारे बाप का सारा ध्यान तुम्हारी ही ओर हो जाए। इसके बाद, तुम फिर से अच्छे व नेक बन जाना।" (9)

 

(उस पर दूसरा भाई बोला), "नहीं, यूसुफ़ को क़त्ल न करो, बल्कि अगर कुछ करना ही है तो उसे किसी अँधे कुएँ में डाल दो, हो सकता है कि वहाँ से कोई कारवाँ गुज़रे और उसे उठा ले जाए।" (10)

 

(फिर सब मिलकर अपने बाप के पास गए), उन भाइयों ने कहा, "बाबा! यह आपको क्या हो गया है कि यूसुफ़ के मामले में आप हम पर भरोसा नहीं करते? हालाँकि हम तो उसका भला ही चाहते हैं,  (11)



हमारे साथ कल उसे जाने दीजिए ताकि वह कुछ मौज-मस्ती कर सके और खेले-कूदे -हम लोग अच्छी तरह उसकी देखभाल करेंगे।" (12)



बाप ने जवाब दिया,  “तुम उसको साथ ले जाना चाहते हो, इस ख़्याल से मुझे चिंता हो रही है: मुझे डर है कि कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका ध्यान न रख सको और भेड़िया उसे खा जाए।" (13)

 

वे बोले, "हम गिनती में इतने सारे हैं, फिर भी अगर उसे भेड़िए ने खा लिया, तब तो हम सचमुच ही सब कुछ गँवा बैठनेवाले (निकम्मे) होंगे!" (14)

 

(किसी तरह बेटों ने बाप को मना लिया और) फिर वे यूसुफ़ को अपने साथ लेकर चल दिए, जैसा उन सब ने तय कर ही रखा था, उसे एक अँधे कुएँ में फेंक दिया। फिर हमने यूसुफ़ पर यह कहते हुए वही’ [Inspiration] भेजी,  "(एक दिन आएगा) जब तू उन्हें उनके इस कर्म के बारे में बताएगा और वे समझ नहीं पाएंगे (कि तू कौन है)!"---- (15

 

और कुछ रात गए वे रोते हुए अपने बाप के पास वापस आए। (16

 

कहने लगे, "बाबा! हम आपस में दौड़ का मुक़ाबला करते हुए दूर निकल गए थे,  यूसफ़ को हमने अपने सामान के साथ वहीं छोड़ दिया था, कि इतने में भेड़िया ने उसे खा लिया। आप तो हम पर विश्वास करेंगे नहीं, हालाँकि हम सच बोल रहे हैं!" (17)

 

और (सबूत के तौर पर) उन्होंने यूसुफ़ की क़मीज़ दिखायी, जिस पर चकमा देने के लिए (किसी भेड़िए के) ख़ून के धब्बे लगा दिए गए थे। उनके बाप याक़ूब ने (रोते हुए) कहा, "नहीं, (यह सच नहीं!),  बल्कि तुम्हारे जी ने तुम्हें ग़लत काम करने को उकसाया है! अब मेरे लिए सबसे बेहतर यही है कि मैं सब्र करूं: जो बात तुम बता रहे हो, उसे बर्दाश्त करने के लिए बस अल्लाह ही की मदद चाहता हूँ।" (18)



 

(और फिर, उधर से) एक कारवाँ का गुज़र हुआ। उन्होंने किसी को कुएं से पानी निकालने के लिए भेजा। उसने अपना डोल नीचे डाला, (जब खींचकर डोल ऊपर लाया) तो देखकर हैरान रह गया और बोला, "अरे! कितनी ख़ुशी की बात है! यह तो एक लड़का है!" उन्होंने यूसुफ़ को इस तरह छिपाकर रख लिया जैसे वह कोई ख़रीदने-बेचने का सामान हो--- किन्तु जो कुछ वे कर रहे थे, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता था--- (19)

 

 और फिर उन्होंने उसे बड़े सस्ते दाम में, चाँदी के चंद सिक्कों [दिरहम] के बदले (मिस्र के बाज़ार में) बेच डाला: उन लोगों ने उसकी बड़ी ही कम क़ीमत लगायी!  (20)

 

मिस्र के जिस आदमी [अज़ीज़/Governor] ने यूसुफ़ को ख़रीदा, उसने अपनी बीवी [ज़ुलैख़ा] से कहा, "इसकी अच्छी तरह देखभाल करो! यह हमारे काम आ सकता है, या हो सकता है कि हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" इस तरह हमने (मिस्र की) सरज़मीन पर यूसुफ़ के क़दम जमा दिए और बाद में हमने उसे ख़्वाबों का सही मतलब निकालना सिखा दिया: अल्लाह तो अपना काम करके रहता है, हालाँकि अधिकतर लोग समझते नहीं हैं। (21)

 

और जब यूसुफ़ पूरी तरह जवान हो गया, तो हमने उसे (सही) फ़ैसला करने की सलाहियत और (भरपूर) ज्ञान प्रदान किया: अच्छा काम करने वालों को बदले में हम ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (22)

 

(फिर ऐसा हुआ कि) यूसुफ़ जिस औरत [ज़ुलैख़ा] के घर में रहता था, वह उस पर (रीझ गयी और) डोरे डालने लगी: (एक दिन) उसने दरवाज़े अंदर से बन्द कर लिए, और कहने लगी, "लो, अब आ भी जाओ!" यूसुफ़ ने कहा, "अल्लाह की पनाह! मेरे मालिक ने हमेशा मेरे साथ अच्छा सलूक किया है; ग़लत काम करने वाले कभी फलते-फूलते नहीं हैं।" (23

 

वह यूसुफ़ की तरफ़ (बुरी नीयत से) बढ़ी, यूसुफ़ भी वासना का शिकार हो गया होता अगर उसने अपने रब की निशानी न देख ली होती---- हमने उसे वह (निशानी) इसलिए दिखायी ताकि हम उसे बुराई और अश्लीलता से दूर रख सकें, कि सचमुच वह हमारे चुने हुए बन्दों में से था। (24)

 

(यूसुफ़ और उसके पीछे वह औरत) दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े, (भागते हुए) औरत ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ डाला---- दरवाज़े पर दोनों ने उस औरत के पति को खड़ा पाया। (अचानक अपने पति को देखकर उसने बात बनायी), वह बोली, "जो कोई तुम्हारी घरवाली की इज़्ज़त लूटने की कोशिश करे, उसका बदला इसके सिवा और क्या होगा कि उसे बन्दी बनाया जाए या फिर कोई दर्दनाक सज़ा दी जाए?" (25)

 

मगर यूसुफ़ ने (अपने बचाव में) कहा, "असल में यही मुझे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहती थीं।" उस औरत के घरवालों में से एक आदमी ने सुझाव दिया, "अगर यूसुफ़ का कुर्ता आगे से फटा है, तो वह झूठा है और औरत सच बोल रही है, (26)

 

और अगर उसका कुर्ता पीछे से फटा है, तो वह सच्चा है, औरत झूठ बोल रही है।" (27)

 

फिर जब उसके पति ने देखा कि यूसुफ़ का कुर्ता पीछे से फटा है, तो उसने कहा, "यह औरतों के छ्ल-कपट की एक और मिसाल है: तुम्हारी मक्कारी सचमुच बड़े ग़ज़ब की है! (28)

 

यूसुफ़! इस मामले को भूल जाओ, मगर [ऐ बीवी] तू अपने गुनाह की माफ़ी माँग--- ग़लती तेरी ही है।" (29)



 

 (फिर इस बात के चर्चे होने लगे), शहर की कुछ औरतें आपस में कहने लगीं, "अज़ीज़ [Governor] की बीवी अपने ग़ुलाम को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहती है! उस नौजवान की मुहब्बत उसके दिल में घर कर गयी है! हमें तो लगता है कि वह पूरी तरह से बहक चुकी है।" (30)

 

फिर जब उस [अज़ीज़ की बीवी] ने अपनी बदनामी की बातें सुनीं, तो उसने (शहर की) उन औरतों को (अपने घर पर) एक शानदार दावत में बुलवाया, और उनमें से हरेक को (फल काटने के लिए) एक-एक चाक़ू दिया गया। फिर उसने (यूसुफ़ से) कहा, "ज़रा बाहर निकलो और इनके सामने आ जाओ!" और जब औरतों ने उसे देखा तो वे उसकी ख़ूबसूरती देखकर दंग रह गयीं! (हैरानी में) उन्होंने अपने हाथ काट लिए और कहने लगीं, "अल्लाह की पनाह! यह कोई आदमी नहीं हो सकता! यह ज़रूर कोई बड़े इज़्ज़तवाला फ़रिश्ता होगा!‍" (31)

 

अ‍ज़ीज़ की बीवी ने कहा, "यह वही है जिसका नाम लेकर तुम मुझ पर अंगुलियाँ उठा रही थीं। हाँ, मैंने इसे अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की थी, मगर इसने अपनी इज़्ज़त बचाए रखी, लेकिन अब मैं जैसा आदेश दूँगी, अगर इसने वैसा न किया, तो इसे ज़रूर क़ैदख़ाने में डाल दिया जाएगा और वह अपमानित होकर रहेगा।” (32) 

 

यूसुफ़ ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे क़ैद हो जाना ज़्यादा अच्छा लगेगा, बजाए उस काम के जिस को करने के लिए ये औरतें मुझे बुला रही हैं अगर तूने मुझे उनकी मक्कारियों के जाल [Treachery] से न बचाया, तो मुझे डर है कि कहीं मेरा दिल उनकी ओर झुक न जाए और (मजबूर होकर जाहिलों की तरह) मैं कोई ग़लती न कर बैठूं।" (33

 

और उसके रब ने उसकी दुआ सुन ली और उसे उन औरतों की गंदी चालों से बचाए रखा---- वही है जो सब कुछ सुनता है, सब कुछ जानता है।  (34)

 

फिर आख़िर में, अज़ीज़ और उसके घरवालों ने, यूसुफ़ के निर्दोष पाए जाने की सभी निशानियों को देख लेने के बाद भी, यही बेहतर समझा कि कुछ अवधि के लिए उसे क़ैद में डाल दिया जाए। (35)

 

यूसुफ़ के साथ-साथ क़ैदख़ाने में दो जवान लड़कों ने भी प्रवेश किया। उनमें से एक ने (यूसुफ़ से) कहा, "मैंने यह सपना देखा है कि मैं (शराब बनाने के लिए) अंगूरों को निचोड़ रहा हूँ"; दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको चिड़ियाँ खा रही हैं।" [वे बोले],हमें इस सपने का मतलब बता दीजिए----हमें तो आप बहुत ही नेक व क़ाबिल आदमी नज़र आते हैं।" (36)

 

 यूसुफ़ ने कहा, "(चिंता न करो) तुम्हारा भोजन आने से पहले ही मैं तुम्हें इसका मतलब बता सकता हूँ: यह उस ज्ञान का एक हिस्सा है, जो मेरे रब ने मुझे सिखाया है। मैं तो उन लोगों के दीन से इंकार करता हूँ, जो अल्लाह में विश्वास नहीं रखते और जो आनेवाली दुनिया [परलोक/आख़िरत] को भी नहीं मानते,  (37)

 

मैं तो अपने पूर्वज इबराहीम [Abraham], इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] के बताए हुए तरीक़े [दीन] पर चलता हूँ। चूँकि हम पर, और पूरी मानवता पर अल्लाह का फ़ज़ल [grace] है, हम अल्लाह को छोड़कर किसी और चीज़ को कभी नहीं पूज सकते। मगर ज़्यादातर लोग (उसकी नेमतों का) शुक्र अदा नहीं करते। (38)

 

मेरे क़ैदख़ाने के साथियों! क्या ढेर सारे, अलग-अलग क़िस्म के देवता बेहतर होंगे या एक अकेला अल्लाह, जो तमाम शक्ति का मालिक है? [नहीं, बिल्कुल नहीं]  (39)

 

उस (अल्लाह) के बजाए तुम जिन-जिन की भी पूजा करते हो, वे तो महज़ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने गढ़ लिए हैं, ऐसे नामों के लिए तो अल्लाह ने कभी अपनी कोई मंज़ूरी नहीं भेजी। सत्ता और अधिकार तो बस अल्लाह का है, और वह आदेश देता है कि किसी की बन्दगी न करो सिवाय उसकी: यही सीधा, सच्चा दीन [faith] है, लेकिन अधिकतर लोग ऐसे हैं जो नहीं समझते। (40

 

मेरे साथियो! [अब अपने ख़्वाब का मतलब सुनो], तुममें से एक (जो ख़्वाब में अंगूर निचोड़ रहा था) तो (क़ैद से छूटकर) अपने मालिक को शराब पिलाएगा; रहा दूसरा (जिसने देखा था कि उसके सर पर रोटी है) तो उसे सूली पर चढ़ाया जाएगा और परिंदे उसका सिर (नोचकर) खाएँगे। और अब इस (ख़्वाब) का फ़ैसला हो चुका है, जिसके बारे में तुमने मेरी राय माँगी थी।" (41

 

यूसुफ़ ने उस आदमी से कहा जिसके बारे में उसे पता था कि वह बच जाएगा, "(यहाँ से जाने के बाद) अपने मालिक से मेरे हाल की चर्चा कर देना", मगर शैतान के चलते वह अपने मालिक से उसकी चर्चा करना भूल गया, और इस तरह, यूसुफ़ को कई साल क़ैदख़ाने में रहना पड़ा (42)

 

(फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मिस्र का) बादशाह कहने लगा, "मैंने ख़्वाब में देखा कि सात मोटी गायों को सात दुबली गायें खा रही हैं; और अनाज की सात बालें हरी हैं और दूसरी (सात) सूखी। ऐ दरबारियो! अगर तुम ख़्वाबों के मतलब बता सकते हो, तो मुझे मेरे ख़्वाब का मतलब बताओ।" (43)

 

उन्होंने जवाब में कहा, "ये तो भटके हुए ख़्याल लगते हैं, वैसे भी हम ख़्वाबों का मतलब बताने में माहिर नहीं हैं।" (44)

 

मगर वह क़ैदी जो रिहा हो गया था, उसे आख़िर में यूसुफ़ की याद आ ही गई, और उसने कहा, "मैं आपको इस ख़्वाब का मतलब समझा दूँगा, बस मुझे (यूसुफ़ के पास) जाने की अनुमति दीजिए।" (45)

 

(सो वह क़ैदख़ाने में आकर बोला), "यूसुफ़, ऐ सच्चाई के मूरत! हमें इस (ख़्वाब) का मतलब बता कि सात मोटी गायें है, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं, और अनाज की सात हरी बालें है और दूसरी (सात) सूखी’, ताकि मैं लोगों के पास वापस जाकर उन्हें (इसका मतलब) बता सकूँ।" (46)

 

यूसुफ़ ने बताया, "सात वर्षों तक लगातार, तुम पहले की तरह खेती करोगे। ऐसा करना कि तुम जब फ़सल काटो तो अपने खाने की ज़रूरत भर अनाज छोड़कर, उसका बड़ा हिस्सा उसकी बालियों में ही रहने देना (ताकि सड़े नहीं) और जमा करके रखते जाना, (47)

 

उसके बाद आएगा मुश्किलों भरा (अकाल का) सात साल, जिसमें सब खाकर ख़त्म हो जाएगा, सिवाए उस थोड़े-से हिस्से के, जो तुमने बचा रखा होगा;  (48)

 

फिर उसके बाद आएगा एक ऐसा साल, जिसमें लोगों के लिए ख़ूब बारिश होगी (और फ़सल अच्छी होगी) और लोग (शराब के लिए) अंगूर के रस निचोड़ेंगे।" (49)

 

जब बादशाह ने (उस सपने का मतलब सुना, तो) कहा, "यूसुफ़ को मेरे पास ले आओ।" मगर जब दूत (यह संदेश लेकर) क़ैदख़ाने में पहुँचा, तो यूसुफ़ ने उससे कहा, "तुम अपने बादशाह के पास वापस चले जाओ और उनसे पूछो कि उन औरतों का क्या मामला है, जिन्होंने (मुझे देखकर) अपने हाथ काट लिए थे---- मेरा रब उन (औरतों) के सारे छल-कपट को अच्छी तरह जानता है।" (50)

 

(फिर औरतों को बुलाया गया, और) बादशाह ने उनसे पूछा, "जब तुम लोगों) ने यूसुफ़ को रिझाने की कोशिश की, तो उस समय क्या हुआ था?" उन (औरतों) ने जवाब दिया, "अल्लाह की पनाह! हम उसके बारे में कोई बुरी बात नहीं जानते।" (अंत में) अज़ीज़ [Governor] की बीवी (अपने आपको रोक न सकी और) बोल उठी, "सच्चाई अब सामने आ चुकी है: वह मैं ही थी जिसने यूसुफ़ को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहा था-----वह तो एक सच्चा व ईमानदार आदमी है।" (51)

 

[यूसुफ़ ने कहा, "ऐसा इसलिए किया] ताकि मेरा मालिक [अज़ीज़] यह बात जान सके कि मैंने पीठ पीछे उसको धोखा नहीं दिया: अल्लाह कपट से भरी शरारत करने वालों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता।  (52)

 

मैं यह नहीं कहता कि मुझ में कोई बुराई नहीं है-----अगर मेरा रब दया न करे तो आदमी का जी तो उसे बुराई पर उभारता ही रहता है: वह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (53)

 

बादशाह ने कहा, "यूसुफ़ को मेरे पास ले आओ: मैं उसे ख़ास अपने काम के लिए साथ में रख लूँगा", और फिर उसके बाद, जब बादशाह ने उससे बातचीत कर ली, तो उसने कहा, "आज से हमारे यहाँ तुम्हारा ऊँचा स्थान होगा, और तुम पर पूरा विश्वास किया जाएगा।" (54)

 

यूसुफ़ ने (बादशाह से) कहा, "आप मुझे देश के भंडार-घरों (ख़ज़ानों) का अधिकारी बना दीजिए: मैं इस काम की देखरेख पूरी समझदारी और ध्यान से करूँगा।" (55)

 

इस तरह, हमने यूसुफ़ के क़दम (मिस्र की) ज़मीन पर जमा दिए, अब वह जहाँ चाहता अपने लिए रहने का ठिकाना बना सकता था: हम जिसे चाहते हैं, उसे अपनी रहमत [mercy] अता करते हैं; और जो अच्छा कर्म करते हैं उनका इनाम हम कभी बेकार नहीं जाने देते। (56)

 

जो लोग ईमान रखते हैं और जो बुराइयों से बचते रहते हैं, उनके लिए आख़िरत का इनाम सबसे बेहतर है।  (57

 

फिर (जब अकाल पड़ गया, तब) यूसुफ़ के भाई (मिस्र में अनाज ख़रीदने के लिए) आए और उसके सामने हाज़िर हुए, यूसुफ़ ने तो उन्हें (देखते ही) पहचान लिया---- मगर वे उसे पहचान न सके---- (58)

 

जब यूसुफ़ ने उनके लिए (अनाज से भरा) सामान तैयार करा दिया, तो जाते समय कहा, "(अब की बार आना तो) अपने उस (सौतेले) भाई को भी लेते आना जिसे तुम अपने बाप के पास छोड़ आए हो! क्या तुमने नहीं देखा कि मैं दिल खोलकर व पैमाना भरकर देता हूँ और मैं मेहमानों का बहुत ज़्यादा ख़्याल भी रखता हूँ?" (59

 

लेकिन अगर तुम उस (भाई) को मेरे पास नहीं लाए, तो तुम्हें मेरी तरफ़ से कोई अनाज नहीं दिया जाएगा, और तुम्हें मेरे पास आने की अनुमति तक नहीं दी जाएगी।" (60)

 

वे बोले, "हम उसके बाप को इस बात के लिए मनाने की पूरी कोशिश करेंगे कि (अगली बार) वह उसे हमारे साथ यहाँ भेजने के लिए राज़ी हो जाएं, और हम यह काम ज़रूर करेंगे।" (61

 

यूसुफ़ ने अपने सेवकों से कहा, "(अनाज के बदले में) उनका दिया हुआ माल उनके सामान के साथ बोरियों में रख दो, ताकि जब ये अपने घरवालों के पास लौटें और सामान देखें तो इसे पहचान सकें, और फिर लौटकर (अनाज लेने के लिए) जल्दी आएँ।" (62

 

फिर जब वे अपने बाप के पास लौटकर पहुँचे, तो कहा, "बाबा! हमें अब और अनाज देने से मना कर दिया गया है, लेकिन अगर आप हमारे भाई [बेंयमैन] को हमारे साथ (मिस्र) भेज दें, तो फिर से पैमाना भरके अनाज मिल जाएगा। हम (यक़ीन दिलाते हैं कि) पूरे ध्यान से उसकी हिफ़ाज़त करेंगे।" (63)

 

उनके (बाप याक़ूब) ने कहा, "क्या मैं उसके बारे में तुम पर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा कि पहले उसके भाई (यूसुफ़) के मामले में तुम पर कर चुका हूँ? अल्लाह ही सबसे बढ़कर हिफ़ाज़त करनेवाला, और सबसे बढ़कर दयावान है।" (64)

 

जब उन्होंने अपना सामान खोलातो देखा कि (अनाज के बदले) जो सामान वहाँ दिया था, वह उन्हें वापस दे दिया गया है। वे बोले, "बाबा, हमें अब (अनाज के लिए बदले में) और सामान जुटाने की ज़रूरत नहीं है: यह देखिए, हमारा सामान भी हमें लौटा दिया गया है। (बस हमें बेंयमैन के साथ वापस जाने दीजिए) अब हम अपने घरवालों के लिए और अनाज ले आएंगे; हम अपने भाई को भी सुरक्षित रखेंगे; हम फिर से एक ऊँट-भर अनाज के हक़दार होंगे। कितनी आसानी से (अनाज का) एक अतिरिक्त हिस्सा मिल गया!" (65)

 

 उनके बाप ने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ भेजने वाला नहीं जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दे दो कि तुम उसे मेरे पास हर हालत में वापस लेकर आओगे, सिवाए इसके कि तुम (सचमुच) घेर लिए जाओ और बेबस हो जाओ।" फिर जब उन्होंने अपने बाप को पक्का वचन दे दिया, तो बाप ने कहा, "हमारे बीच जो बात तय हुई है, उस पर अल्लाह गवाह है।" (66)

 

(जाने के समय) उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! (जब मिस्र शहर में दाख़िल होना तो) तुम सब एक ही दरवाज़े से अंदर मत चले जाना ----- बल्कि अलग अलग दरवाज़े से प्रवेश करना (कि अपनी तरफ़ से सचेत रहना चाहिए), वैसे कोई चीज़ अगर अल्लाह की मर्ज़ी से होने वाली हो, तो मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता: तमाम शक्ति तो अल्लाह के ही हाथ में है। उसी पर मैंने भरोसा किया है; और हर एक आदमी को उसी पर भरोसा करना चाहिए।" (67

 

और जब उन भाइयों ने (मिस्र में अलग-अलग दरवाज़ों से) प्रवेश किया, जैसा कि उनके बाप ने उन्हें बताया था, तो (देखो!) यह बात अल्लाह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ तो कोई काम आने वाली न थी, मगर हाँ, याक़ूब के दिल में एक बात आयी थी जो पूरी हो गयी। बेशक वह काफ़ी कुछ जानता था जो कुछ हमने उसे सिखाया थामगर अधिकतर लोग (इसकी हक़ीक़त) नहीं जानते।  (68)

 

फिर, जब वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो यूसुफ़ अपने (छोटे) भाई को किनारे ले गया और बता दिया कि, "मैं तेरा भाई हूँ, जो कुछ ये (सौतेले भाई) तेरे साथ करते आए हैं, उसपर अब दुखी न हो",  (69)

 

फिर जब उनका (अनाज से भरा हुआ) सामान तैयार कर दिया गया, तो यूसुफ़ ने अपने (सगे) भाई की बोरी में पीने का एक शाही प्याला रख दिया। (इधर क़ाफ़ला चल पड़ा, और उधर शाही प्याले की खोज शुरू हुई, तब उन्हें उन लोगों पर शक हुआ) फिर एक आदमी ने पुकारकर कहा, "ऐ कारवाँ के लोगो! रुको! हो न हो तुम (लोग) ही चोर हो!" (70)

 

वे उसकी ओर मुड़ते हुए बोले, "तुम्हारी क्या चीज़ खो गयी है?" (71

 

पीछा करने वालों ने जवाब दिया, "पीने का शाही प्याला कहीं दिखायी नहीं दे रहा है”, और,जो कोई उसे वापस ला दे उसको एक ऊँट-भर (अनाज) इनाम में मिलेगा”, और, मैं इसके लिए वचन देता हूँ।" (72

 

उन भाइयों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! तुम लोग जानते हो कि हम तुम्हारे देश में कोई शरारत करने नहीं आए हैं: हम कोई चोर नहीं हैं।" (73)

 

उन लोगों ने पूछा, "अगर हमने पाया कि तुम झूठ बोल रहे हो, तो फिर इसके लिए क्या दंड होना चाहिए?" (74)

 

उन्होंने जवाब दिया, "उसका दंड तो यही है कि जिसकी बोरी में वह शाही प्याला मिल जाए, उसे (ग़ुलाम बनाकर) रख लिया जाए: जुर्म करने वालों को हम ऐसा ही दंड देते हैं।" (75)

 

(फिर यूसुफ़ ने एक-एक करके) उनके सामानों की तलाशी लेना शुरू की, फिर अपने भाई [बेंयमैन] का सामान देखने लगा, और उसकी बोरी में से शाही प्याला बरामद कर लिया।

 

इस तरह हमने यूसुफ़ के लिए (बेंयमैन को रोकने की) एक योजना बनायी थी ---- अगर अल्लाह ने ऐसा नहीं चाहा होता, तो शाही क़ानून के मुताबिक़ यूसुफ़ अपने भाई को दंड के रूप में वहाँ रोक नहीं सकता था। हम जिसे चाहते हैं, उसका दर्जा ऊँचा कर देते हैं, हर एक आदमी जो कुछ ज्ञान रखता है, उसके ऊपर भी एक हस्ती है [अल्लाह की], जो सबसे बड़ा ज्ञानी है।  (76)

 

उन भाइयों ने कहा, "अगर यह (बेंयमैन) चोर है तो यह अजीब बात नहीं, चोरी तो इससे पहले इसका अपना भाई (यूसुफ़) भी कर चुका है", किन्तु यूसुफ़ इस बात पर चुपचाप रहा और उसने अपने आपको उनपर प्रकट नहीं किया। उसने कहा, "तुम इस समय बहुत बुरी हालत में हो। अल्लाह ही बेहतर जानता है कि तुम अपने दावे में कितने सच्चे हो।" (77)

                                               

उन्होंने कहा, "ऐ अज़ीज़! इसका बाप बहुत ही बूढ़ा आदमी है। इसलिए इसके बदले हममें से किसी को रख लीजिए। हमारी नज़र में तो आप बड़े ही उपकार करनेवाले आदमी हैं।" (78)

 

उसने कहा, "अल्लाह की पनाह! कि जिसके पास हमने अपना माल पाया है, उसे छोड़कर हम किसी दूसरे को पकड़ लें: फिर तो यह हमारी तरफ़ से अन्याय होगा।" (79)

 

जब वे यूसुफ़ को (मनाने की) उम्मीद छोड़ बैठे, तो आपस में सलाह-मशविरा करने के लिए अलग जा बैठे: उनमें जो सबसे बड़ा था, वह कहने लगा, "क्या तुम्हें याद नहीं कि तुम्हारे बाप ने (बेंयमैन के बारे में) अल्लाह के नाम पर तुमसे पक्का वचन ले रखा है और उससे पहले यूसुफ़ के मामले में तुम अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में असफल हो चुके हो? मैं तो इस शहर से जाने वाला नहीं हूं, जब तक कि ख़ुद मेरे बाबा मुझे अनुमति न दें या अल्लाह ही मेरे हक़ में कोई दूसरा फ़ैसला कर दे----बेशक वही सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है। (80)

 

अत: तुम लोग अपने बाप के पास लौट जाओ और कह देना, "(हम क्या करें) आपके बेटे ने (पराए देश में) चोरी की। हम तो वही कह सकते हैं जो हमने देखा, जिस चीज़ का पहले से अंदाज़ा न हो, उससे कैसे बचा जा सकता था? (81)

 

(यह भी कह देना कि) हम जहाँ ठहरे थे, आप उस बस्ती में पता लगा लीजिए, आप उन लोगों से भी पूछ लीजिए जो कारवाँ में हमारे साथ गए थे: हम सच बोल रहे हैं।" (82)

 

(सारी बातें सुनने के बाद) उनके बाप ने कहा, "नहीं, बल्कि (यह चोरीवाली बात) ऐसी है कि ख़ुद तुम्हारे दिलों ने एक झूठी बात बना ली है! ख़ैर! अब सबसे बेहतर यही है कि मैं धीरज से काम लूँ: बहुत सम्भव है कि अल्लाह उन सब (भाइयों) को मेरे पास ले आए----वही तो है जो सब जानता है, सारा ज्ञान रखता है।" (83)

 

और उनके बाप ने उनकी ओर से मुंह फेर लिया, (पुराना दर्द फिर से जाग उठा) और कहने लगा, "हाय अफ़सोस, यूसुफ़ की जुदाई पर!दुःख के मारे (रोते-रोते) उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गयीं और वह ग़म में डूबा हुआ था। (84)

 

बेटों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! अगर आपने अब भी यूसुफ़ के बारे में सोचना बंद न किया तो आपकी सेहत ख़राब हो जाएगी, या आपकी जान चली जाएगी।" (85)

 

बाप ने कहा, "मैं तो अपनी परेशानी और दुःख दर्द की फ़रियाद अल्लाह ही से करता हूँ। और अल्लाह की तरफ़ से मैं वह बात जानता हूँ जो तुम (लोगों) को मालूम नहीं। (86)

 

मेरे बेटो! (फिर से मिस्र) जाओ और जाकर यूसुफ़ और उसके भाई का पता लगाओ और अल्लाह की रहमत से निराश न हो---  अल्लाह की रहमत से तो केवल वही निराश होते हैं, जो विश्वास नहीं रखते।" (87)

 

(मिस्र पहुँचकर) फिर जब वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो कहा, "ऐ अज़ीज़! बड़ी सख़्ती के दिन हैं, बदक़िस्मती ने हमें और हमारे घरवालों को घेर रखा है। हम अपने साथ बहुत ही थोड़ी पूँजी लेकर आए हैंमगर आप (कृपा करके) हमें पैमाना भरकर (अनाज) दे दें। हमें आप दान (समझ कर ही) दे दें: अल्लाह दान करने वालों को अच्छा इनाम देता है।" (88)

 

(उनका यह हाल देखकर) यूसुफ़ ने कहा, "क्या तुम्हें इस बात का अब भी कोई एहसास है कि तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या किया था, जबकि तुम्हें उस समय सूझ-बूझ न थी?" (89)

 

वे (चौंकते हुए) बोले, "क्या आप यूसुफ़ हैं?" उसने कहा, "हाँ, मैं यूसुफ़ हूँ और यह (बेंयमैन) मेरा भाई है। अल्लाह हम पर बहुत मेहरबान रहा है: जो कोई बुराइयों से बचता है, और कठिन समय में धीरज से काम लेता है, तो अल्लाह भी अच्छा काम करने वालों का बदला कभी बेकार नहीं जाने देता।" (90)

 

(यह सुनकर भाइयों के सर शर्म से झुक गए) उन्होंने कहा, "क़सम है अल्लाह की! अल्लाह ने हममें से सबसे ज़्यादा आप पर करम किया है और सचमुच (क़सूर हमारा था और) हम ही लोग ग़लती पर थे।" (91)

 

यूसुफ़ ने कहा, "आज के दिन तुम (मेरी तरफ़ से) कोई बुरी बात नहीं सुनोगे (कि जो होना था, हो गया)। अल्लाह तुम्हें माफ़ करे: वह सब रहम करने वालों से बढ़कर रहम करनेवाला है। (92)

 

मेरा यह कुर्ता अपने साथ ले जाओ और इसे मेरे बाबा के चेहरे पर डाल दो: उनकी आँखों की रौशनी लौट आएगी फिर अपने सब घरवालों को मेरे यहाँ ले आओ।" (93)

 

इधर जब (मिस्र से) कारवाँ चल दिया, तो (दूर कनान में) उनके बाप ने कहा, "तुम भले ही ऐसा समझो कि मैं बुढ़ापे में बहकी-बहकी बातें करता हूं, मगर मुझे साफ़ यूसुफ़ की महक आ रही है," (94)

 

लेकिन लोगों ने कहा, "अल्लाह की क़सम! आप तो अभी तक अपने उसी पुराने धोखे में पड़े हुए हैं!" (95)

 

फिर जब (कारवाँ कनान पहुँच गया और) अच्छी ख़बर सुनानेवाला आया तो उसने यूसुफ़ के कुर्ते को उसके बाप [याक़ूब] के मुँह पर डाल दिया, तुरंत ही उनकी आंखों की रौशनी लौट आयी और याक़ूब ने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की तरफ़ से जिस चीज़ की जानकारी मुझे है, वह तुम नहीं जानते।" (96)

 

फिर (भाइयों ने) कहा, "ऐ हमारे बाबा! आप हमारे गुनाहों की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करें---  सचमुच हम ही ग़लती पर थे।" (97)

 

उन्होंने जवाब दिया, "मैं अपने रब से तुम लोगों की माफ़ी के लिए (ज़रूर) दुआ करूँगा: वह बहुत क्षमा करनेवाला, बड़ा ही दयावान है।" (98)

 

फिर जब (यूसुफ़ के माँ-बाप और भाई कनान से मिस्र पहुँचे, और) वे यूसुफ़ के सामने हाज़िर हुए, तो उसने अपने माँ-बाप को (सम्मान के साथ) अपने पास जगह दी---  औऱ कहा: "आप सबका मिस्र में स्वागत है: अल्लाह ने चाहा तो आप सब यहाँ अमन-चैन से रहेंगे"---  (99)

 

और वह अपने माँ-बाप को (अपने) सिंहासन तक ले गया। वहाँ मौजूद (उसके ग्यारह भाई, माँ और बाप) सब (मिस्र के रिवाज के अनुसार) उसके आगे झुक गए और तब उसने कहा, "बाबा! बरसों पहले मैंने जो ख़्वाब देखा था, वह आज पूरा हो गया। मेरे रब ने इसे सच्चा कर दिखाया और वह मुझ पर बहुत मेहरबान रहा है--- उसने मुझे क़ैदख़ाने से छुटकारा दिलाया और आप लोगों को रेगिस्तान से निकाल कर यहां पहुंचा दिया---जबकि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच झगड़े का बीज बोया था। निस्संदेह मेरा रब जो करना चाहता है उसके लिए बड़ा महीन उपाय करता है; वास्तव में वह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने सारे कामों में) गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। (100)

 

(फिर यूसुफ़ ने दुआ की): मेरे रब! तूने मुझे शक्ति व अधिकार दिए; तूने मुझे ख़्वाबों का मतलब समझना सिखाया; तू ही आसमानों और ज़मीन को पैदा करनेवाला है, तू ही मेरी रक्षा करनेवाला है-- इस दुनिया में भी और आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी। जब मेरी मौत हो, तो इस हाल में हो कि मैं पूरी भक्ति से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] रहूँ और तू मुझे नेक व अच्छे बंदों में शामिल कर ले।" (101)

 

(ऐ रसूल!) यह जो कहानी बतायी गयी, ये उन बातों में से है जो आपके ज्ञान से परे थी। हमने आप पर (यह बात) वही’[Revelation] द्वारा उतारी: (वरना) आप तो यूसुफ़ के भाइयों के साथ मौजूद नहीं थे, जब उन्होंने मिलकर ऐसी छल-कपट से भरी योजना बनायी थी। (102)

 

(याद रहे कि) आप चाहे उनके साथ कितनी ही कोशिश कर लें, अधिकतर लोग ऐसे हैं जो विश्वास करने वाले नहीं। (103)

 

हालाँकि आप इस बात के लिए तो बदले में उनसे कोई मज़दूरी नहीं माँगते: यह तो दुनिया के सभी लोगों के लिए एक नसीहत का संदेश (Reminder) है। (104)

 

और आसमानों और ज़मीन में (प्रकृति की) कितनी ही निशानियाँ हैं, जिन से होकर वे गुज़र जाते हैं, मगर उनकी ओर नज़र उठाकर देखते तक नहीं ---- (105)

 

इनमें अधिकतर लोग अल्लाह को अगर मानते भी हैं, तो इस तरह कि वे दूसरों को भी अल्लाह के बराबर जोड़ देते हैं। (106)

 

क्या उन्हें इस बात का पक्का यक़ीन है कि उन पर अल्लाह की तरफ़ से कोई छा जानेवाली यातना नहीं आ पड़ेगी, या यह कि अचानक वह अंतिम घड़ी [क़यामत] उनपर नहीं आएगी, जबकि वे बिल्कुल बेख़बर पड़े हों? (107)

 

[ऐ रसूल!] कह दें, "यह है मेरा रास्ता: स्पष्ट प्रमाण के आधार पर, मैं लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाता हूँ, और साथ में वे लोग जो मेरे पीछे चलने वाले हैं, वे भी (इसी तरह) बुलाते हैं ---- महिमावान है अल्लाह! ---- मैं अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) दूसरों को नहीं जोड़ता।" (108)

 

आपसे पहले भी हमने जितने रसूल बनाकर भेजेवे (फ़रिश्ते नहीं, बल्कि) सब आदमी ही थे, जिन पर हम वही’ [Revelation] उतारते थे, और वे सभी उन्हीं के शहरों के आदमी थे। फिर क्या वे (इंकार करनेवाले) धरती पर चले-फिरे नहीं कि देखते कि उनका कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं? जो लोग अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ (बुराइयों से) बचते हैं, उनके लिए आख़िरत का घर ही सबसे अच्छा है। तो क्या तुम (लोग) बुद्धि से काम नहीं लेते?  (109)

 

जब रसूलों ने (अपनी क़ौम से) सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं, और वे समझ चुके थे कि लोगों ने उन्हें पूरी तरह से नकारते हुए झूठा घोषित कर दिया, तो फिर (अचानक) उन तक हमारी मदद आ पहुँची: फिर हमने जिस किसी को चाहा उसे बचा लिया, मगर अपराधी लोगों पर से हमारी यातना कभी टलती नहीं है। (110)

 

सचमुच ऐसे लोगों की कहानियों में उन लोगों के लिए एक सबक़ [lesson] है, जो समझ-बूझ रखते हैं। यह वही’ [Revelation] जो उतारी गयी है, कोई झूठी बनायी हुई बात नहीं है: जो सच्चाई पहले भेजी जा चुकी है, यह (क़ुरआन) उसकी पुष्टि करनेवाली है; हर चीज़ को अच्छी तरह समझानेवाली; ईमान रखनेवालों को रास्ता दिखानेवाली और उनके लिए बड़ी रहमत [blessing] वाली है।  (111)









नोट:



5: ख़्वाब सुनकर हज़रत याक़ूब [अलै.) समझ गए थे कि यूसुफ़ को एक दिन इतना ऊँचा दर्जा मिलने वाला है कि एक समय उनके ग्यारह (11) भाई, माँ और बाप उसके सामने आदर से झुक जाएंगे। यूसुफ़ को यह बात उन्होंने अपने भाइयों को बताने से इसलिए मना किया था कि असल में उनका सगा एक ही भाई बेन्यामिन था, बाक़ी दस भाई सौतेले थे, जो यूसुफ़ से जलन के चलते हो सकता था कि कुछ ग़लत क़दम उठाने के लिए सोचते। 



7: मक्का के विश्वास न करने वाले लोग बीच-बीच में मुहम्मद (सल्ल) को परखने के लिए उनसे कुछ पूछते रहते थे कि अगर वह सच्चे नबी हैं तो उन्हें पुरानी बातें पता होनी चाहिए, सो ऐसा ही एक सवाल उनसे पूछा गया था कि इसराईल की संतानें फ़िलिस्तीन के इलाक़े से मिस्र में जाकर क्यों आबाद हो गयी थीं? असल में यह सूरह उसी के जवाब में उतरी है। 



8: बेंयामिन यूसुफ़ के सगे भाई थे, जबकि बाक़ी भाई सौतेले थे। बचपन में ही उनकी माँ का देहांत हो जाने के कारण उनके बाबा उन दोनों का ज़्यादा ध्यान रखते थे जिससे उनके बाक़ी भाई जलते थे।



21: जिसने मिस्र के बाज़ार में यूसुफ़ को ख़रीदा, वह वहाँ का गवर्नर था जो शायद भंडार मंत्री भी था, जिसे मिस्र में "अज़ीज़" कहा जाता था। 



24: उस वक़्त अल्लाह ने यूसुफ़ (अलै.) को क्या निशानी दिखाई जिससे वह गुनाह करने से बच गए, यह बात बताई नहीं गई है, बहरहाल, जो नेक बंदे होते हैं वह हर वक़्त अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, एक पल के लिए ग़लत काम का ख़्याल आ भी जाए, तो दूसरे ही पल अल्लाह से डरते हुए उससे रुक जाते हैं।



41: यहाँ "मालिक" का मतलब मिस्र के बादशाह से है, यह आदमी बादशाह को शराब पिलाया करता था।



43: बाइबल में उस वक़्त के मिस्र के बादशाह को 'फिरऔन' कहा गया है, जबकि क़ुरआन ने 'बादशाह' कहा है। मिस्र के इतिहास में 1700-1550 ईसा पूर्व के बीच फ़िरऔन के बजाय हिक्सोस राजाओं की हुकूमत थी। यूसुफ़ जब मिस्र गए उस ज़माने में हिक्सोस की हुकूमत थी जिन्हें बादशाह कहा जाता था और उनके शासनकाल में बाहर के कई लोगों को ऊँचे पद पर बैठाया गया था। (यहूदी इंसाइक्लोपीडिया, खंड 7)



50: हज़रत यूसुफ़ (अलै.) बिना अपनी बेगुनाही साबित हुए जेल से नहीं जाना चाहते थे, और उनका असल मक़सद अपने मालिक [अज़ीज़] को यह जताना था कि उन्होंने पीठ पीछे उनके साथ कोई धोखा नहीं किया [आयत 52] 



53: यूसुफ़ (अलै.) ने अपनी बेगुनाही साबित हो जाने के बाद भी अल्लाह का शुक्र अदा किया कि अगर उसने दया न की होती, तो गुनाह से बचना बहुत कठिन होता। 



55: जब यूसुफ़ (अलै) ने बादशाह को आने वाले अकाल की तैयारियों के बारे में ज़रूरी सुझाव दिए, तो सुनकर बादशाह बहुत ख़ुश हुआ, मगर उसको यह चिंता हुई कि वैसे समय में कौन इस काम की सही देखरेख कर पाएगा, इस पर यूसुफ़ (अलै.) ने अपने नाम की पेशकश की, क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि मुश्किल समय में ग़रीब लोगों के साथ ज़ुल्म किया जाएगा। 



56: आयत 21 में भी मिस्र में यूसुफ़ (अलै) के क़दम जमाने की बात आयी है, और साथ में यह भी है कि उन्हें ख़्वाबों का सही मतलब निकालने का हुनर भी सिखा दिया। यह आयत उससे जुड़ी हुई है, क्योंकि उसके बाद कई इम्तेहानों से गुज़रने के बाद जब यूसुफ़ (अलै) ने ख़्वाब का सही मतलब बताया, तो बादशाह ने ख़ुश होकर उन्हें बड़ा पद दे दिया, और फिर अज़ीज़ के मरने के बाद उन्हें "अज़ीज़" बना दिया गया जो बादशाह के बाद सबसे बड़ा पद था, इस तरह अल्लाह ने उनके पाँव मिस्र में मज़बूती से जमा दिए। 



58: अकाल पड़ जाने के बाद जब लोगों को पता चला कि मिस्र में अनाज सही दाम पर मिल रहा है, तो दूर-दूर से लोग आने लगे। यूसुफ़ (अलै) के बाबा और भाई तो फ़िलिस्तीन के इलाक़े कनान में रहते थे, वहाँ से उनके भाई भी अनाज लेने मिस्र आए। ...... यूसुफ़ को उनके भाइयों ने जब कुएं में डाला था, तब वे बहुत छोटे (शायद 7 साल के) थे, इसलिए जब इतने सालों के बाद मिले तो उनके भाइयों ने उन्हें नहीं पहचाना।



59: असल में वहाँ दस भाई गए थे और उन लोगों ने अपने एक और (सौतेले) भाई [बेंयामिन] के लिए भी राशन के हिसाब से अनाज माँगा जो वहाँ नहीं आया था, इसलिए कहा गया कि अगली बार उसे ज़रूर लाना, ताकि उसका हिस्सा मिल सके और यह पता चल जाए कि तुम लोग झूठ नहीं बोल रहे हो। 



67: कुछ लोगों का मानना है कि याक़ूब (अलै) ने सभी भाइयों को अलग-अलग दरवाज़ों से दाख़िल होने के लिए इसलिए कहा था ताकि वे बुरी नज़र से बच सकें। 



100: यूसुफ़ (अलै) ने बचपन से कैसी-कैसी तकलीफ़ों का सामना किया, लेकिन यहाँ उन्होंने अपनी परेशानी के बारे में नहीं कहा, बल्कि केवल Positive बातें कहीं, और अल्लाह का शुक्र अदा किया। 



102: जैसा कि ऊपर आयत: 7 में बताया गया कि मक्का के लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से एक सवाल पूछा था, और उन्हें लगता था कि वह इसका जवाब नहीं बता पाएंगे, मगर अल्लाह ने "वही" द्वारा पूरी कहानी बता दी, मगर फिर भी वे लोग विश्वास करने वाले नहीं थे। 



सूरह 40: मोमिन/ ग़ाफ़िर 

[माफ़ करनेवाला / The forgiver]



यह एक मक्की सूरह है जिसमें दो विषय बार-बार आए हैं: अल्लाह द्वारा उतारी गई सच्चाई पर विवाद करना (4, 35, 69), और अल्लाह को पुकारना (14, 49, 50, 60, 65, 73). शुरुआती आयतों में अल्लाह को बड़ा माफ़ करने वाला और तौबा क़बूल करने वाला बताया गया हैमगर साथ में कठोर सज़ा देने वाला भी कहा गया हैयह जो अल्लाह की दुहरी विशेषता है वह इस सूरह में उभरकर सामने आयी है। दूसरी तरफ़ आदमी या तो अल्लाह का शुक्र अदा करने वाला होता है या नाशुक्रा होता है। इस सूरह के बीच के हिस्से में फ़िरऔन और मूसा अलै. की कहानी बयान हुई है (आयत 23-54) : एक की तबाही और दूसरे की जीतजैसा कि आयत 45 और 51 में कहा गया है। रसूल को धीरज से अपने क़दम जमाए रखने और विश्वास न करनेवालों के व्यंग्य को नज़रअंदाज़ करने पर ज़ोर दिया गया है (आयत 55 और 77). 

 

 

 

विषय:



02-03: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है

04-06: विश्वास न करने वालों को चेतावनी 

07-09: फ़रिश्ते ईमानवालों के लिए दुआ करते हैं 

10-12: फ़ैसले के दिन का दृश्य 

13-14: केवल अल्लाह को ही पूरी भक्ति से पुकारो 

15-20: अल्लाह फ़ैसला करेगा 

21-22: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

23-50: मूसा (अलै.) और फ़िरऔन की कहानी

51-55: अल्लाह अपने रसूलों और उनके माननेवालों की मदद करता है

56-68: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

69-76: क़यामत में फ़ैसले का दृश्य 

77-78: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

79-81: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

82-85: पिछली पीढ़ियों को दी गई सज़ाएं: एक चेतावनी 

 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

यह किताब अल्लाह की तरफ़ से उतारी जा रही है जो सबसे ज़्यादा ताक़तवाला, सब कुछ जाननेवाला है, (2)

जो गुनाहों को माफ़ करने वाला, तौबा [repentance] क़बूल करने वाला, दंड देने में कठोर और बेहिसाब इनाम देनेवाला है। उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं; अन्ततः उसी की पास सबको लौटकर जाना है। (3)

अल्लाह की आयतों में बस वही लोग झगड़े पैदा करते हैं जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते। [ऐ रसूल] आप ज़मीनों पर उन लोगों को जो (व्यापार से संपत्तियाँ बनाने के लिए) आते-जाते देखते हैं, तो वह (उनकी ख़ुशहाली) कहीं आपको धोखे में न डाल दे।  (4)

उनसे पहले नूह [Noah] की क़ौम ने सच्चाई को ठुकरा दिया था, और उनके बाद दूसरे गिरोहों ने भी (अपने-अपने रसूलों की बातों को) मानने से इंकार किया: हर समुदाय के लोगों ने अपने रसूलों को बर्बाद करने की योजनाएं बनायीं (कि उन्हें क़त्ल कर दें या क़ैद कर लें) और उन्होंने झूठ का सहारा लेकर सच्चाई को ग़लत साबित करने की कोशिश की; मगर वह तो मैं था, जिसने (उल्टा) उन्हें बर्बाद कर दिया। तो (देखो!) कैसी भयानक रही मेरी दी हुई सज़ा! (5)

और इसी तरह, आपके रब की ओर से इंकार करने पर अड़े लोगों के ख़िलाफ़ सज़ा तय की जा चुकी है कि ऐसे लोगों का ठिकाना (जहन्नम की) आग में होगा। (6)

जो (फ़रिश्ते) सिंहासन को उठाए हुए हैं, और जो उसको घेरे रहते हैं, अपने रब की बड़ाई के बयान के साथ उसका गुणगान करते रहते हैं और उस पर विश्वास रखते हैं: वे ईमानवालों के लिए माफ़ी की प्रार्थना करते रहते हैं कि, "ऐ हमारे रब! तेरी दया और तेरी जानकारी हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुई है। अतः जिन लोगों ने (गुनाहों से) तौबा कर ली और तेरे बताए हुए रास्ते पर चल पड़े हैं, उन्हें माफ़ कर दे और उन्हें जहन्नम की (दर्दनाक) यातना से बचा ले (7)

और ऐ हमारे रब! उन्हें ऐसे बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दे जो हमेशा बाक़ी रहने वाले हैं, जिनका तूने उनसे वादा किया है, और साथ में उनके पूर्वजों, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक हों, उन्हें भी (उनके साथ दाख़िल कर दे): निस्संदेह! तू ही है जो सबसे ज़्यादा ताक़त रखने वाला, और (अपने हर काम में) गहरी समझ-बूझ रखने वाला है।  (8)

उन्हें हर तरह के बुरे कर्मों से बचा: उस दिन जिन्हें तू बुरे कामों (की मिलने वाली सज़ा) से बचा लेगा, तो निश्चय ही उन्हें तेरी दया [रहमत] नसीब हो गई ----- और यही सबसे बड़ी कामयाबी है।" (9)

मगर जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, उनसे कहा जाएगा, "(जहन्नम में आज) तुम्हें जितनी नफ़रत अपने आपसे हो रही है, उससे ज़्यादा बेज़ारी [disgust] अल्लाह को तुम से उस समय होती थी जब तुम्हें ईमान की ओर बुलाया जाता था और तुम (उस पर विश्वास करने से) इंकार करते थे।" (10)

वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! तूने हमें दो बार बेजान [एक पैदा होने से पहले का वजूद और एक मरने के बाद] रखा और दो बार ज़िंदा कर दिया। अब हम अपने गुनाहों को स्वीकार करते हैं, तो क्या अब (जहन्नम से) बच निकलने का भी कोई रास्ता है?" (11)

(उनसे कहा जाएगा, “तुम्हारी यह हालत इसलिए है कि जब अकेले अल्लाह का नाम लिया जाता था तो तुम उसे मानने से इंकार कर देते थे, किन्तु उस (अल्लाह) के साथ जब दूसरों को साझेदार [Partner] ठहराया जाता था, तो तुम (उनमें) विश्वास कर लेते थे।" फ़ैसला तो अल्लाह के ही हाथ में है, जो सबसे बड़ा, सबसे महान है।   (12)

 

वही (अल्लाह) है जो तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है और तुम्हारे लिए आसमान से (वर्षा के रूप में) रोज़ी उतारता है, किन्तु इससे सीख तो बस वही लोग हासिल करते हैं जो उसकी ओर (तौबा करने के लिए) सच्चे दिल से झुकें। (13)

अतः [ऐ लोगो] तुम अल्लाह को इस तरह पुकारो कि पूरी भक्ति और समर्पण केवल उसी के लिए हो, चाहे यह बात इंकार करने वालों को कितनी ही बुरी लगे: (14)

वह [अल्लाह] बहुत ऊँचे दर्जेवाला, सिंहासन का मालिक है। वह अपने बन्दों में से जिसे चाहे, उस पर "वही" [Revelations] द्वारा अपनी शिक्षाओं को भेजता है, ताकि वह मुलाक़ात के दिन [क़यामत] से (लोगों को) सावधान कर दे, (15)

जिस दिन सब लोग (क़ब्रों से) निकलकर सामने हाज़िर होंगे, उनकी कोई चीज़ अल्लाह से छिपी न रहेगी, (पूछा जाएगा) "आज किसकी बादशाही है?" (जवाब होगा), "उसी एक अल्लाह की, जो सब पर क़ाबू रखने वाला है। (16)

आज के दिन हर आदमी को उसके (कर्मों की) कमाई का बदला दिया जाएगा; आज कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। निश्चय ही अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।" (17)

 

[ऐ रसूल] आप उन्हें निकट आते जा रहे (क़यामत के) दिन से सावधान कर दें, जब कलेजे मुँह को आ लगेंगे और दम घुटने लगेगा। ज़ालिमों का न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफ़ारिशी, जिसकी बात मानी जाए। (18)

वह [अल्लाह] नज़रों के धोखे तक को जानता है, और उन (सारी चीज़ों) को भी जिसे सीने (अपने दिल के अंदर) छिपाए रखते हैं। (19)

अल्लाह (सच्चाई के साथ) ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा। रहे वे (देवता) जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी चीज़ का भी फ़ैसला नहीं कर सकते। निस्संदेह अल्लाह ही है जो हर बात सुनता है, सब कुछ देखता है। (20)

 

क्या वे लोग धरती में घूमे-फिरे नहीं और देखा नहीं कि जो लोग उनसे पहले गुज़र चुके हैं उन लोगों का क्या अंजाम हुआ? वे [पुराने लोग] ताक़त में भी इनसे कहीं ज़्यादा थे, और ज़मीन पर अधिक प्रभावशाली निशानियाँ छोड़ गए थे, फिर भी उनके गुनाहों के कारण अल्लाह ने उन्हें तबाह कर डाला --- और उनके पास कोई न था जो उन्हें अल्लाह से बचा पाता ---- (21)

यह सब कुछ इसलिए हुआ कि उनके पास (अल्लाह के भेजे हुए) रसूल स्पष्ट प्रमाण [Clear signs] लेकर बराबर आते रहे, फिर भी उन लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया। (अन्ततः) अल्लाह ने उन्हें तबाह कर डाला: निश्चय ही वह बड़ी शक्तिवाला, सज़ा देने में बड़ा कठोर है। (22)

और हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण [Clear authority] के साथ भेजा (23)

फ़िरऔन [Pharaoh], हामान [फ़िरऔन का दरबारी] और क़ारून [Korah] के पास, किन्तु उन्होंने कहा, "यह तो जादूगर है, बड़ा झूठा है!" (24)

फिर जब वह [मूसा] उनके सामने हमारी तरफ़ से सच्चाई का संदेश लेकर आए, तो उस [फ़िरऔन] ने कहा, "जो लोग उन [मूसा] के साथ (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, उनके बेटों को मार डालो औऱ उनकी औरतों को ज़िंदा छोड़ दो"---  किन्तु सच्चाई से इंकार करने वालों की चाल तो (ग़लत ही पड़ती है और) भटकने के लिए ही होती है ----- (25)

और फ़िरऔन ने कहा, "छोड़ दो मुझे, ताकि मैं मूसा को मार डालूँ! ---- और वह भी अपने रब को (अपनी सहायता के लिए) बुला ले ---- मुझे डर है कि ऐसा न हो कि वह तुम्हारे धर्म को बदल डाले या यह कि वह [मिस्र] देश में बिगाड़ [disorder] पैदा कर दे।" (26)

मूसा ने कहा, "मैं अपने और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ, हर उस ज़ालिम व घमंडी आदमी से, जो हिसाब-किताब के दिन [क़यामत] पर विश्वास नहीं रखता।" (27)

 

फ़िरऔन के ख़ानदान में से (अल्लाह पर) विश्वास रखने वाले एक आदमी ने, जिसने अपने ईमान को अभी तक छिपा रखा था, बोल उठा, ‘क्या तुम एक आदमी को केवल इसलिए मार डालोगे कि वह कहता है कि मेरा रब अल्लाह है?” और वह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से खुली निशानियाँ भी लेकर आया है --- अगर वह झूठा है, तो उसके झूठ का वबाल उसी पर पड़ेगा--- लेकिन अगर वह सच्चा है, तो जिस चीज़ की वह तुम्हें धमकी दे रहा है, उसमें से कुछ न कुछ तो तुम पर पड़कर रहेगा। अल्लाह उसको मार्ग नहीं दिखाता जो मर्यादा (की सीमा) लांघनेवाला और बड़ा झूठा हो| (28)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! आज तुम्हारी हुकूमत है, (मिस्र की) धरती पर तुम्हारा राज है, किन्तु अल्लाह की यातना अगर आ जाए, तो कौन है जो उसके मुक़ाबले में हमारी सहायता कर सके?" फ़िरऔन ने कहा, "मैं जो ठीक समझता हूँ वह मैंने तुम्हें बता दिया है; और मैं तुम्हारा मार्गदर्शन सही रास्ते की तरफ़ कर रहा हूँ।" (29)

 

उस आदमी ने, जो ईमान रखता था, (आगे) कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे डर है कि तुम पर (विनाश का) ऐसा दिन न आ पड़े, जैसा उन सभी समुदायों पर आ पड़ा था (जिन्होंने अपने रसूलों का विरोध किया था):  (30)

जैसे नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके बाद के लोगों का हाल हुआ था----  अल्लाह तो अपने बन्दों पर कभी नाइंसाफ़ी नहीं करना चाहता। (31)

और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे तुम्हारे लिए उस दिन का डर है जिस [क़यामत के] दिन लोग एक दूसरे को चिल्ला-चिल्लाकर पुकार रहे होंगे, (32)

जिस दिन तुम पीठ फेरकर भागोगे, और तुम्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा! जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, उसे मार्ग दिखाने वाला कोई न होगा।  (33)

सच्चाई यह है कि इससे पहले तुम्हारे [मिस्र के लोगों के] पास यूसुफ़ [Joseph] साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे, तब भी जो संदेश लेकर वे आए थे, उसके बारे में तुम बराबर सन्देह में पड़े रहे, फिर जब उनकी मृत्यु हो गई, तो तुम कहने लगे, "उनके बाद अल्लाह अब कोई रसूल नहीं भेजेगा।"

 

इसी तरह अल्लाह संदेह में डूबे हुए बाग़ियों को भटकता छोड़ देता है---  (34)

जो लोग (बिना किसी स्पष्ट प्रमाण के) अल्लाह की आयतों में झगड़े निकाला करते हैं, जबकि उन्हें ऐसा करने का अधिकार [authority] नहीं दिया गया है, तो यह (काम) अल्लाह की नज़र में अत्यन्त अप्रिय है, और उन लोगों की नज़र में भी, जो उस पर विश्वास रखते हैं। इस तरह अल्लाह हर अहंकारी और अत्याचारी आदमी के दिल पर ठप्पा लगा (कर उसे बंद कर) देता है।"  (35)

फ़िरऔन ने (व्यंग्य करते हुए अपने वज़ीर से) कहा, "ऐ हामान! मेरे लिए एक ऊँचा भवन [tower] बना दो, ताकि मैं (उस पर चढ़कर) उस रस्सी तक पहुँच सकूँ, (36)

जो आसमानों तक चली जाती है, फिर मैं (वहाँ) मूसा के ख़ुदा को झाँककर देख सकूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।" इस तरह फ़िरऔन के कर्मों की बुराइयाँ उसकी नज़रों में सुहावनी बना दी गयीं और उसे सही मार्ग पर जाने से रोक दिया गया--- उसकी चालें उसे बर्बादी की ओर ही ले गयीं|  (37)

उस ईमान रखने वाले आदमी ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, मेरी बात मानो! मैं तुम्हे भलाई का सही रास्ता दिखाऊँगा (38)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह सांसारिक जीवन तो बस थोड़े समय के लिए मज़ा लेने की जगह है; यक़ीन करो, कि स्थायी रूप से रहने-बसने का घर तो आख़िरत [परलोक] ही है।  (39)

जिस किसी ने बुराई की होगी तो उसे उसी के बराबर बदला मिलेगा; किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया और वह (एक अल्लाह में) विश्वास रखता हो, तो वह मर्द हो या औरत, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और वहाँ उसे बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी।  (40)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह मेरे साथ क्या मामला है कि मैं तो तुम्हें मुक्ति की ओर बुला रहा हूँ जबकि तुम मुझे (जहन्नम की) आग की ओर बुला रहे हो? (41)

तुम मुझसे चाहते हो कि मैं अल्लाह में विश्वास करने से इंकार कर दूँ और उसके साथ ऐसी चीज़ों को उसका साझेदार [Partner] मान लूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं; जबकि मैं तुम्हें उसकी ओर बुला रहा हूँ जो प्रभुत्वशाली, बड़ा माफ़ करने वाला है। (42)

इसमें कोई शक नहीं कि तुम मुझे जिसकी ओर बुला रहे हो, वह न तो इस दुनिया में पुकारे जाने के क़ाबिल हैं और न आने वाली दुनिया [परलोक] में: सच तो यह है कि हमें लौटना तो अल्लाह ही की ओर है, और असल में जो लोग मर्यादा (की सीमा) लाँघने वाले हैं, वही (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं।  (43)

[एक दिन] तुम मुझे याद करोगे, जो कुछ मैं तुमसे अभी कह रहा हूँ, अत: मैं अपना मामला अल्लाह को सौंपता हूँ: अल्लाह अपने बंदों को अच्छी तरह से जानता है।"  (44)

अन्ततः अल्लाह ने उस (ईमानवाले) को उन लोगों की बुरी योजनाओं से बचा लिया।

 

और फ़िरऔन के लोगों को भयानक यातना ने आ घेरा; (45)

उन्हें सुबह व शाम (जहन्नम की) आग के सामने लाया जाएगा; जिस दिन (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, (तो आदेश होगा), "झोंक दो फ़िरऔन के लोगों को अत्यंत बुरी यातना में!" (46)

वे आग के भीतर एक-दूसरे से झगड़ रहे होंगे: तो कमज़ोर लोग उन (घमंडी) लोगों से, जो बड़े बनते थे, कहेंगे, "हम तो तुम्हारे पीछे चलने वाले थे, तो क्या अब तुम हम पर से आग का कुछ भाग हटा सकते हो?" (47)

मगर वे लोग (जो बड़े बनते थे) कहेंगे, "हम सब ही इसी (आग) में पड़े हैं। निश्चय ही अल्लाह बंदों के बीच फ़ैसला कर चुका है।" (48)

आग में पड़े हुए लोग जहन्नम के पहरेदारों से कहेंगे कि "अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर से एक दिन की तकलीफ़ में कुछ कमी कर दे!" (49)

मगर वे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे रसूल सच्चाई का खुला प्रमाण लेकर नहीं आते रहे थे?" (जहन्नमी) कहेंगे, "बेशक! (आए तो थे)!" और पहरेदार कहेंगे, "फिर तो तुम्हीं फ़रियाद करो, मगर हाँ, इंकार करने वालों [काफ़िरों] की फ़रियाद तो बस (हमेशा) अनसुनी ही रह जाती है (50)

 

हम अपने रसूलों की और उन लोगों की जो ईमान रखते हैं, अवश्य सहायता करते हैं, सांसारिक जीवन में भी और उस दिन (भी करेंगे) जबकि गवाही देने वाले खड़े होंगे। (51)

जिस दिन शैतानी करने वालों के (अपनी सफ़ाई में) किए गए बहाने, उन्हें कुछ भी लाभ न पहुँचाएंगे, बल्कि उनके लिए तो फटकार होगी और रहने के लिए सबसे बुरा घर होगा।  (52)

मूसा को हमने (तोरात द्वारा) मार्ग दिखाया, और उस किताब को इसराईल की सन्तान तक पहुँचाकर उन्हें उस (किताब) का वारिस बनाया, (53)

जो बुद्धि और समझवालों के लिए रास्ता दिखाने वाली और नसीहत [Reminder] की चीज़ थी। (54)

अतः ऐ रसूल, आप धीरज से काम लें, कि अल्लाह ने जो वादा किया है, वह ज़रूर पूरा होकर रहेगा। अपनी गलतियों की माफ़ी माँगते रहें; और शाम के समय और सुबह-सवेरे की घड़ियों में अपने रब की बड़ाई करते रहें।   (55)

जो लोग बिना किसी अधिकार [authority] के, अल्लाह की आयतों में झगड़े निकालते हैं, उनके सीनों में और कुछ नहीं बल्कि महान बनने की लालसा है, मगर उस (बड़ाई के मुक़ाम) तक वे कभी पहुँचने वाले नहीं। अतः आप (उनकी बुराइयों से) अल्लाह की शरण माँगते रहें। निश्चय ही वह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है। (56)

आसमानों और ज़मीन को पैदा करना, मानव-जाति को पैदा करने की अपेक्षा कहीं बड़ा (कठिन) काम है, हालाँकि अधिकतर लोग यह (छोटी सी बात) नहीं जानते। (57)

आँखों से अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं होते, ठीक वैसे ही जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और जो लोग बुरे कर्म करने वाले हैं, वे बराबर नहीं हो सकते: (मगर अफ़सोस!) तुम इन बातों पर कितना कम ध्यान देते हो! (58)

इस बात में कोई शक नहीं कि (क़यामत की) अंतिम घड़ी ज़रूर आकर रहेगी, मगर अधिकतर लोग इस पर विश्वास नहीं करते!  (59)

तुम्हारा रब कहता है, "तुम मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी पुकार का जवाब दूँगा; जो लोग इतने घमंडी हैं कि वे मेरी बंदगी नहीं कर सकते, वे बे-इज़्ज़त होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।”  (60)

अल्लाह ही तो है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें आराम पा सको, औऱ दिन बनाया ताकि (उसके उजाले में) तुम देख सको। अल्लाह लोगों के लिए सचमुच बड़ा उदार व मेहरबान [bountiful] है, मगर ज़्यादातर लोग उसका शुक्र अदा नहीं करते।  (61)

ऐसा है अल्लाह, तुम्हारा रब, हर चीज़ का पैदा करने वाला: उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। तुम (ग़लत चीज़ों को सही समझकर) कैसे इतना बहक सकते हो? (62)

 

इस तरह जो अल्लाह के संदेशों को मानने से इंकार करते हैं, वे (सच्चाई से) बहके हुए हैं। (63)

अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को रहने की जगह बनाया, और आसमान को एक छत बनाया। तुम्हें शक्ल-सूरत दी, तुम्हारी सूरतों को अच्छे रूप दिए, और तुम्हें अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी। ऐसा है अल्लाह, जो तुम्हारा रब है। तो बड़ी बरकतवाला है अल्लाह, जो सारे संसारों का रब है। (64)

 

वह सदा ज़िंदा रहने वाला है, उसके सिवा कोई ख़ुदा पूजने के लायक़ नहीं। अतः धर्म (भक्ति) को उसी के लिए पूरी तरह समर्पित करके, (अपनी ज़रूरतों के लिए) उसी को पुकारो। सारी बड़ाई अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का रब है। (65)

आप कह दें [ऐ रसूल], "चूँकि मेरे पास मेरे रब की ओर से खुले प्रमाण आ चुके हैं, अत: मुझे उनकी बंदगी करने से मना किया गया है जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो: मुझे तो हुक्म हुआ है कि मैं सारे संसार के रब के आगे अपना सर झुका दूँ।" (66)

 

वही है जिसने तुम्हें (पहली बार) मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य [Sperm] की एक बूँद से, फिर चिपके हुए ख़ून के लोथड़े से; फिर वह तुम्हें (माँ के पेट से) एक बच्चे के रूप में बाहर लाता है, फिर तुम्हें बढ़ाता है ताकि अपनी जवानी को पहुँच जाओ, फिर मुहलत देता है कि तुम्हें बुढ़ापा आ जाए ----- हालाँकि तुममें से कई इससे पहले ही मर जाते हैं ----- ताकि तुम एक नियत अवधि तक पहुँच जाओ और ऐसा इसलिए है कि तुम सोच-विचार कर सको। (67)

 

वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है, और जब वह किसी काम का फ़ैसला करता है, तो उसके लिए बस इतना ही कहता है: 'हो जा' और बस वह हो जाता है। (68)

क्या आपने [ऐ रसूल] देखा, कि वे कितने बहके हुए लोग हैं जो अल्लाह के संदेश [आयतों] में झगड़े निकालते हैं ----  (69)

 

जिन लोगों ने हमारे रसूलों द्वारा लायी गयी किताब [Scripture] और उसके संदेशों को मानने से इंकार किया? तो उन्हें पता चल जाएगा, (70)

जब उनकी गरदनों में तौक़ [iron collars] और ज़ंजीरें होंगी, और वे घसीटे जा रहे होंगे,  (71)

खौलते हुए पानी में, फिर (जहन्नम की) आग में झोंक दिए जाएँगे, (72)

फिर उनसे कहा जाएगा, "अब कहाँ हैं वे (बुत) जिन्हें तुम पूजते थे, (73)

अल्लाह को छोड़कर?” वे कहेंगे, "वे हमें छोड़कर गुम हो गए: बल्कि हम इससे पहले जिसे पूजते रहे थे, वे असल में कोई चीज़ ही न थे।" इसी तरह अल्लाह इंकार करनेवालों को भटकता छोड़ देता है, (74)

 

यह सब इसलिए हुआ कि तुम ज़मीन पर बेकार व झूठी चीज़ों की ख़ुशियों में मस्त रहते थे और बेलगाम इतराते फिरते थे।  (75)

[उनसे कहा जाएगा], “जहन्नम के दरवाज़ों से भीतर चले जाओ, वहाँ हमेशा रहने के लिए--- अहंकारियों के रहने के लिए क्या ही बुरा ठिकाना है!” (76)

अतः [ऐ रसूल] आप धीरज से काम लें, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है: जिस (यातना) का हम इन [विश्वास न करने वालों] से वादा कर चुके हैं, चाहे हम आपको उसका कुछ हिस्सा इसी दुनिया में दिखा दें, या हम आपकी जान को पहले ही वापस बुला लें, हर हाल में उन्हें हमारे पास ही लौटकर आना होगा। (77)

हम आपसे पहले कितने ही रसूल भेज चुके हैं--- उनमें से कुछ तो वे हैं जिनका उल्लेख हमने आपसे किया है, और कुछ वे हैं जिनका ज़िक्र हमने नहीं किया है--- और किसी रसूल के लिए भी यह (संभव) न था कि वह अल्लाह की इजाज़त के बिना कोई (चमत्कार या) निशानी ले आए। फिर जब [उस दिन] अल्लाह का आदेश आ जाएगा, तो उनके बीच सच्चाई व इंसाफ़ के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा: उस समय, झूठ के पीछे चलनेवाले भारी घाटा उठाएंगे।  (78)

अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए मवेशी [livestock] बनाए, ताकि उनमें से कुछ पर तुम सवारी करो, और उनमें से वह भी हैं जिन्हें तुम खाते हो; (79)

उनमें तुम्हारे लिए और भी कई फ़ायदे हैं। अपनी ज़रूरत के लिए जहाँ भी तुम्हारा दिल चाहे, तुम उस पर (सवार होकर) अपनी मंज़िल तक पहुँच सकते हो: वे तुम्हें सवार करके ले जाते हैं जिस तरह नौकाएं तुम्हें (दरिया में) सवारी कराती हैं।  (80)

वह [अल्लाह] तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है: तुम अल्लाह की किन-किन निशानियों को पहचानने से अब भी इंकार करोगे? (81)

क्या उन लोगों ने धरती पर (यहाँ-वहाँ) चल-फिरकर देखा नहीं कि उनसे पहले गुज़र चुके लोगों का कैसा अंजाम हुआ? वे उनसे गिनती में भी अधिक थे, शक्ति में भी ज़्यादा थे और ज़मीन पर अपनी छोड़ी हुई निशानियों की दृष्टि से भी बढ़-चढ़कर थे, इसके बावजूद, जो कुछ भी उन्होंने हासिल किया, वह उनके कुछ भी काम न आया। (82)

फिर जब उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए, तब भी वे अपने उस ज्ञान पर गर्व करते रहे जो उनके पास था, और जिस यातना का वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, उसी ने उनको आ घेरा:  (83)

जब उन्होंने हमारी यातना अपनी आँखों से देख ली, तो कहने लगे, "(अब) हम विश्वास करते हैं उस अल्लाह पर जो अकेला है; और हम जिसको भी अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराते थे, उन सबको मानने से इंकार करते हैं।" (84)

मगर हमारी (दी गयी) यातना को देख लेने के बाद (अल्लाह पर) विश्वास कर लेने से (अब) उन्हें कोई भी फ़ायदा नहीं होने वाला --- यही अल्लाह की रीति है, जो उसके बंदों (को जाँचने) के लिए हमेशा से रही है ---- उस समय, विश्वास न करनेवाले भारी घाटे में पड़ गए।  (85)

 

 

 

 

नोट:

11: दो बार ज़िंदा करना यानी जब कोई वजूद न था, तब ज़िंदगी देकर एक बार पैदा किया और फिर मरने के बाद दोबारा हिसाब देने के लिए ज़िंदा करना ---- वे कहेंगे कि मरने के बाद दोबारा जी उठने का विश्वास जो पहले नहीं थाअब हो गया। देखें 2:28 

25: मूसा अलै. जो संदेश लेकर आए थेजब उसे धीरे-धीरे कुछ लोग क़बूल करने लगेतो उसे रोकने के लिए यह सलाह दी गई थी कि उनके बेटों को क़त्ल कर दो और उनकी औरतों को दासी बना लो ताकि वे डर जाएं।

28: कहा जाता है कि वह ईमानवाला आदमी फ़िरऔन का चचेरा भाई था।

34: "तुम संदेह में रहे"... यहाँ "तुम" से मतलब तुम्हारे बाप-दादा, क्योंकि यूसुफ़ (अलै) का ज़माना मूसा (अलै) से कोई 400 साल पहले का है। हज़रत यूसुफ़ अलै. ने अपने ज़माने में मिस्र के लोगों के सामने जब अल्लाह का संदेश पेश कियातो वे उनके नबी होने की बात से इंकार करते रहेऔर जब वह चल बसे तो उनके कारनामे याद करके कहने लगे कि अब उन जैसा रसूल पैदा नहीं हो सकता! इस तरह आगे आने वाले किसी रसूल को मानने का रास्ता भी बंद कर दिया।

37: (28:38) भी देखें..... फ़िरऔन अपने को ख़ुदा होने का दावा करता थाउसने मूसा (अलै.) से कहा था कि अगर तुमने मेरे सिवा किसी और को ख़ुदा माना तो मैं तुम्हें क़ैद कर लूँगा।देखें सूरह शुअरा [26: 29]

46: सुबह और शाम कहने से मतलब हर समयहो सकता है।  

51: फ़ैसले के दिन लोगों के कर्मों की गवाही के लिए फ़रिश्तों और नबियों आदि को गवाह के रूप में बुलाया जाएगा।

52: सबसे बुरा घर या ठिकाना, जहन्नम की आग है। 

55: सभी दूसरे रसूलों की तरह अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को भी गुनाहों से बचाकर रखा था। यहाँ "ग़लती" से मतलब फ़ैसला करने में होने वाली चूक [misjudgement] से है, जैसे रसूल द्वारा एक अंधे आदमी की बात पर दी गई प्रतिक्रिया (80: 1-10), यूनुस (अलै) का अपने शहर से बिना अल्लाह की इजाज़त लिए चले जाना (21: 87-88), या दो आदमी का दाऊद (अलै) के घर पर दीवार तड़पकर आ जाने पर उनका शक करना (38: 21-25) आदि।फिर भी वह छोटी से छोटी ग़लतियों के लिए भी हर समय माफ़ी माँगते रहते थेउनके मानने वालों को भी ज़्यादा से ज़्यादा माफ़ी माँगते रहना चाहिए।

सुबह और शाम बड़ाई करने का मतलब हर समय बड़ाई करना हो सकता है।  

74: जब उनसे बुतों को पूजने के बारे में पूछा जाएगातो पहले तो वे झूठ बोलते हुए इंकार करेंगे [6: 23]फिर अपनी ग़लती मान लेंगे।

78: मक्का के लोग अल्लाह के रसूल से अक्सर कोई चमत्कार दिखाने की माँग करते रहते थेलेकिन एक तो यह अल्लाह की इजाज़त के बिना मुमकिन नहींमगर इससे अहम बात यह है कि पहले भी रसूलों ने बहुत सारे चमत्कार या निशानियाँ दिखाईंमगर तब भी लोगों ने विश्वास नहीं किया और उसे जादू समझकर टाल दिया। 

80: मवेशियों से और भी कई फ़ायदे हैं, जैसे दूध, ऊन और उनकी खाल।

83: यानी वे रसूलों द्वारा लाए गए दिव्य ज्ञान का मज़ाक़ उड़ाते रहे।     

 

 

सूरह 28: अल-क़सस

 [कहानी / The Story]

यह एक मक्की सूरह है, इसके केंद्र में मूसा (अलै.) के बचपन की कहानी (आयत 25) बतायी गई है, साथ में उनके हाथ से एक इसराइली की मौत हो जाना और फिर भागकर उनका मदयन चले जाना, इसी संदर्भ से इस सूरह का नाम "क़िस्सा" रखा गया है। इस सूरह का केंद्रीय विषय यह है कि जो लोग बहुत घमंडी होते हैं, और समाज में बिगाड़ पैदा करते हैं, जैसे फ़िरऔन और क़ारून, तो उनका अंत बड़ा ख़राब होता है। पूरी सूरह में जगह-जगह बहुदेववाद की आलोचना की गई है (45-75) --- और इनका संबंध मक्का के विश्वास करने वालों से जोड़ा गया है। पैग़म्बर साहब को याद दिलाया गया है कि वह हर एक आदमी  को विश्वास करने पर मजबूर नहीं कर सकते हैं (आयत् 56), अंत में मुहम्मद सल्ल. से कहा गया है कि उन्हें अपना क़दम मज़बूती से जमाए रखना चाहिए (आयत 87).

विषय:

01-02: किताब की आयतें (निशानियाँ) 

03-06: मूसा (अलै) की कहानी: परिचय 

07-14: मूसा का बचपन और उनकी शुरुआती ज़िंदगी 

15-28: मूसा की जवानी के दिन 

29-35: मूसा को पुकारा गया 

36-42: मूसा का फिरऔन के साथ संघर्ष 

43-51: मूसा की कहानी की (सच्चाई की) पुष्टि [confirmation]

52-55: जिन्हें पहले किताब दी गई थी, वे क़ुरआन पर विश्वास करते हैं 

56-59: मक्कावालों को मुहम्मद (सल्ल) का रास्ता अपनाने से नुक़सान का डर 

60-61: इस सांसारिक जीवन से आने वाली (आख़िरत की) ज़िंदगी कहीं बेहतर होगी 

62-67: फ़ैसले के दिन के दो दृश्य 

68-73: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

74-75: फ़ैसले का एक दृश्य

 

76-82: क़ारून की कहानी 

83-84: आख़िरत [परलोक] का घर

85-88: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ता॰ सीन/ सीम॰ मीम॰ (1)

यह (आसमानी) किताब की आयतें हैं जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट कर देती हैं: (2)

[ऐ रसूल] हम आपको सच्चाई से जुड़ी हुई, मूसा [Moses] और फ़िरऔन [Pharaoh] की कहानी का कुछ हिस्सा सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं। (3)

सचमुच फ़िरऔन ने धरती पर अपने आपको बहुत ही ऊँचा और ताक़तवर बना लिया था और वहाँ के लोगों को अलग अलग गिरोहों में बाँट रखा था: उनमें से एक गिरोह [इसराईल की संतानों] को उसने एकदम दबाकर रखा था, उनके बेटों को मार डालता और उनकी औरतों को ज़िंदा रहने देता--- सचमुच ही वह (समाज में) फ़साद व बिगाड़ [corruption] पैदा करने वालों में से था ----(4)

मगर हम यह चाहते थे कि उन लोगों पर उपकार करें जिन्हें ज़मीन पर इतना दबाकर रखा गया था, उन्हें नायक बनाएँ, और उन्हें (उस धरती का) वारिस बनाएं,  (5)

और ज़मीन पर उनके क़दम मज़बूती से जमा दें, और उनके द्वारा फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को वही चीज़ दिखा दें, जिसका उन्हें डर था।  (6)

 

हमने यह कहते हुए मूसा की माँ के दिल में यह बात डाल दी कि, "इस (बच्चे) को दूध पिलाओ, फिर जब तुम्हें उसकी सुरक्षा ख़तरे में लगे, तो उसे (बक्से में रखकर) दरिया में डाल देना: डरो नहीं, और न ही दुखी हो, कि हम उसे ज़रूर तुम्हारे पास वापस भेज देंगे और उसे (एक दिन अपने) रसूलों में से एक बनाएँगे।" (7)

इस तरह, फ़िरऔन के लोगों ने उस बच्चे को (दरिया से) उठा लिया---- जो बाद में, उनका दुश्मन, और उनके लिए दुख व परेशानी का कारण बनने वाला था: सचमुच फ़िरऔन, हामान और उनकी सेनाओं में जो लोग थे वे ग़लती पर थे---- (8)

फ़िरऔन की पत्नी ने कहा, "इस (बच्चे को) देखकर मेरे और तुम्हारे मन में कितनी ख़ुशी हो रही है! (सचमुच यह हमारी आँखों की ठंढक है), इसकी हत्या न करो, शायद हमें इससे कुछ फ़ायदा पहुँचे, या हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" (मगर उस समय) उन्हें मालूम न था कि वे क्या (भूल) कर बैठे थे! (9)

अगले दिन, मूसा की माँ ने अपने दिल में एक अजीब ख़ालीपन व बेक़रारी महसूस की---- अगर हमने (उस वक़्त) उनके दिल को मज़बूत करके उन्हें हमारी बातों में विश्वास रखने वाला न बनाया होता, तो मुमकिन था कि वह (बच्चे के बारे में) सब राज़ की बातें उगल देतीं---- (10)

मूसा की माँ ने उसकी बहन से कहा, "तू उसके पीछे-पीछे जा।" सो वह उसे दूर ही दूर से देखती रही, इस तरह कि उन्हें पता न चले  (11)

और हम यह तय कर चुके थे कि वह [मूसा] किसी भी दूध पिलानेवालियों का दूध पीने को तैयार नहीं होंगे। फिर मूसा की बहन ने उनके पास जाकर कहा कि "क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों का पता बताऊँ, जो तुम्हारे लिए इस (बच्चे) की परवरिश करें और इसकी ख़ूब अच्छी तरह देखभाल करें?" (12)

इस तरह हमने बच्चे को उसकी माँ के पास वापस पहुँचा दिया, ताकि उसका मन शांत हो सके, वह दुखी न रहे और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा होता है, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते।  (13)

 

और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और पूरी तरह परिपक्व [mature] हो गए, तो हमने उन्हें (सही फ़ैसला करने की) गहरी समझ-बूझ [wisdom] प्रदान कर दी: और हम अच्छा कर्म करने वालों को ऐसा ही इनाम देते हैं। (14)

(एक दिन) मूसा जब शहर [मिस्र] में दाख़िल हुए, उस समय किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते हुए पाया: एक तो उनकी बिरादरी के लोगों में से था और दूसरा उनके दुश्मन क़ौम का था। जो उनकी बिरादरी में से था, उसने अपने दुश्मन के मुक़ाबले में, उन्हें मदद के लिए पुकारा। इस पर मूसा ने उस (दुश्मन) को ऐसा घूँसा मारा कि वह मर ही गया। (मूसा अपने किए पर पछताने लगे) उन्होंने कहा, "यह ज़रूर किसी शैतान का काम है: सचमुच ही वह ऐसा दुश्मन है जो (आदमी को) बहका देता है।" (15)

उन्होंने कहा, "ऐ मेरे रब, मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गयी। तू मुझे क्षमा कर दे,” सो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया; सचमुच वह बेहद क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (16)

मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! जिस तरह तूने मुझ पर अपनी ख़ास मेहरबानी [blessings] की है, अब मैं भी कभी शैतानी करने वालों का मददगार नहीं बनूँगा।" (17)

 

अगले दिन, वह डरते हुए और चौकन्ना होकर शहर में चले जा रहे थे, कि अचानक क्या देखते हैं कि कल जिसकी मदद की थी, वही आदमी फिर उन्हें मदद के लिए पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहा, "अरे तुम तो सचमुच बड़े बदमाश आदमी हो।” (18)

फिर जैसे ही मूसा ने इरादा किया कि वह उस आदमी को पकड़ ले, जो उन दोनों का शत्रु था, तो वह आदमी कहने लगा, "ऐ मूसा, क्या तू चाहता है कि मुझे भी मार डाले, जिस तरह तूने कल एक आदमी को मार डाला? धरती में सचमुच तू एक निर्दयी अत्याचारी बनकर रहना चाहता है; तू उन लोगों जैसा नहीं जो चीज़ों में सुधार लाते हैं।" (19)

फिर ऐसा हुआ कि शहर के दूरवाले इलाक़े से एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और उसने कहा, "ऐ मूसा, कुछ सरदार तेरे बारे में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें, अतः तू यहाँ से निकल जा--- मेरी सलाह मान कि मैं तेरा भला चाहता हूँ।" (20)

सो मूसा डरते हुए और ख़तरा भाँपते हुए वहाँ से निकल खड़े हुए, और दुआ की, "ऐ मेरे रब! मुझे शैतान लोगों से बचा ले।" (21)



जब मूसा मदयन [Midian] जाने वाले रास्ते पर चल पड़े, तो उन्होंने कहा था, "आशा है, मेरा रब मार्गदर्शन करते हुए मुझे सही रास्ते पर डाल देगा।" (22)

और जब वह मदयन के कुंएँ पर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने लोगों के एक गिरोह को देखा कि वे अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे, और उनके अलावा वहाँ दो औरतों को भी देखा, जो अपने जानवरों को रोके खड़ी थीं। मूसा ने उनसे कहा, "तुम दोनों का क्या मामला है?" उन्होंने कहा, "हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने भेड़ों को लेकर चले नहीं जाते: हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।" (23)

तब मूसा ने उनकी ख़ातिर उनके जानवरों को पानी पिला दिया, और वहाँ से छायादार जगह के पास चले गए और दुआ की, "ऐ मेरे रब, जो कुछ भी अच्छी चीज़ हो सके, तू मेरी तरफ़ भेज दे, मैं उसका बहुत ज़रूरतमंद हूँ।" (24)

 

थोड़ी देर बाद, उन दो औरतों में से एक ज़रा शर्मायी हुई चाल से चलती हुई उनके पास आयी, और कहने लगी, "मेरे बाबा आपको बुला रहे हैं: आपने हमारे लिए जानवरों को जो पानी पिलाया है, उसके लिए वह आपको कुछ इनाम देना चाहते हैं।"

फिर जब मूसा उनके (बाबा के) पास पहुँचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनायी, तो उस बूढ़े आदमी ने कहा, "अब डरो नहीं, ग़लत काम करने वालों से बचकर तुम सुरक्षित जगह आ गए हो।" (25)

उनमें से एक औरत ने कहा, "बाबा! इनको मज़दूरी पर रख लीजिए: मज़दूरी पर रखने के लिए सबसे सही आदमी वही होता है, जो मज़बूत और भरोसेमंद हो।" (26)

उसके बाप ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूँ कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहाँ नौकरी करो: और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी अपनी इच्छा होगी। मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता: अगर अल्लाह ने चाहा तो तुम मुझे सही व नेक आदमी पाओगे।" (27)

मूसा ने कहा, "तो मेरे और आपके बीच यह बात तय रही --- इन दोनों अवधियों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ, तो मेरे साथ कोई अन्याय नहीं होगा ---- और जो कुछ हम कह रहे हैं, उसपर अल्लाह गवाह है।" (28)

एक बार जब मूसा तय की हुई अवधि पूरी कर चुके थे और अपने परिवारवालों को लेकर जा रहे थे, कि अचानक उन्हें तूर नामक पहाड़ के किनारे एक आग-सी दिखायी दी। उन्होंने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो (यहाँ), मैंने एक आग देखी है। शायद मैं वहाँ से तुम्हारे पास (रास्ते की) कोई ख़बर ले आऊँ या तुम्हारे लिए एक जलती हुई लकड़ी मिल जाए जिससे तुम अपने आपको गर्मा सको।" (29)

मगर जब वह वहाँ पहुँचे, तो घाटी के दाहिनी तरफ़, एक पवित्र ज़मीन पर (लगे हुए) पेड़ से उन्हें पुकारती हुई आवाज़ आयी: "मूसा! मैं अल्लाह हूँ, सारे जहाँनों का पालनेवाला (रब!)। (30)

अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" फिर जब मूसा ने देखा कि उनकी लाठी किसी साँप की तरह हिल-डुल रही है, तो वह मारे डर के पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर भी न देखा। फिर (से उन्हें पुकारा गया), "ऐ मूसा! सामने आओ और डरो नहीं! निस्संदेह तुम उनमें से हो जो पूरी तरह सुरक्षित हैं। (31)

अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो और फिर बाहर निकालो तो वह सफ़ेद चमकता हुआ हो जाएगा, और वह भी बिना किसी ख़राबी (या नुक़सान) के--- और डर भगाना हो तो अपने बाज़ू को अपने बदन से सटा लेना। ये फ़िरऔन और उसके दरबारियों के लिए तेरे रब की ओर से दो निशानियाँ [लाठी व चमकता हाथ] होंगी; सचमुच वे बड़े शैतान लोग हैं।" (32)

मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने उनके एक आदमी को मार डाला था, और मुझे डर है कि वे कहीं मुझे मार न डालें। (33)

मेरे भाई हारून [Aaron] मुझसे कहीं अधिक साफ़ व प्रभावशाली भाषा बोलते हैं: उन्हें भी मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजें ताकि वह मेरी बातों का समर्थन करें--- मुझे डर है कि वे (लोग) मुझे झुठा कहेंगे।" (34)

अल्लाह ने कहा, "हम तुम्हारे भाई के द्वारा तुम्हारा हाथ मज़बूत कर देंगे; और हमारी निशानियों के साथ, तुम दोनों को इस तरह ताक़त व अधिकार देंगे कि वे तुम्हारे नज़दीक भी नहीं पहुँच सकेंगे। (अंत में) तुम और तुम्हारे माननेवालों की ही जीत होगी।" (35)

फिर जब मूसा उनके पास हमारी साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ लेकर पहुँचे, तो उन्होंने कहा, "यह तो बस बनावटी जादू के करतब हैं; हमने तो यह बात अपने बाप-दादा से कभी नहीं सुनी।" (36)

मूसा ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके यहाँ से मार्गदर्शन लेकर आता है, और किसके पास (परलोक में) रहने का अंतिम ठिकाना [Final Home] होगा: ग़लत काम करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।" (37)

फ़िरऔन ने (व्यंग्य से) कहा, "दरबारियो, अपने अलावा तो मैं तुम्हारे किसी देवता को नहीं जानता। ऐ हामान! तू मेरे लिए मिट्टी की ईंटों को आग में पकवाकर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना कि मैं उसपर चढ़कर मूसा के ख़ुदा तक पहुँच सकूँ: मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह झूठ बोल रहा है।" (38)

फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने बिना किसी अधिकार के धरती पर घमंड भरा व्यवहार किया---- और समझा कि उन्हें हमारे पास वापस नहीं लाया जाएगा-----  (39)

अन्त में हमने उसे और उसकी सेनाओं को अपनी पकड़ में ले लिया और उन्हें समंदर में फेंक दिया। अब देख लो कि ग़लत काम करने वालों का क्या नतीजा हुआ! (40)

और हमने उन्हें (दूसरों को जहन्नम की) आग की ओर बुलानेवालों का नेता बना दिया: क़यामत के दिन उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी।  (41)

और हमने इस दुनिया में उनके पीछे लानत [श्राप] लगा दी और क़यामत के दिन वे घृणित लोगों में शामिल होंगे। (42)

पिछली नस्लों को बर्बाद कर देने के बाद हमने मूसा को एक किताब [तोरात/ Torah] दी थी, जिसमें लोगों के लिए समझदारी की बातें, मार्गदर्शन और दयालुता [रहमत/Mercy] थी, ताकि वे उस पर ध्यान दें और इससे नसीहत ले सकें।  (43)

[ऐ रसूल] आप तो (तूर) पहाड़ के पश्चिमी किनारे पर मौजूद नहीं थे, जब हमने मूसा को अपने धर्म आदेश [commandments] दिए थे: आप वहाँ इस घटना को देखने वालों में भी नहीं थे--- 44)

बल्कि हमने बहुत-सी नस्लें पैदा कीं, जिन्होंने इस दुनिया में बहुत लम्बी ज़िंदगियाँ गुज़ारीं --- आप तो मदयन [Midian] के लोगों के बीच (भी) नहीं रहते थे, और न ही आपने हमारे संदेश [आयतें] उन लोगों को सुनाए----हमने लोगों के पास अपने रसूलों को (अपने संदेश के साथ) हमेशा ही भेजा है---- (45)

और न ही आप सीना की पहाड़ी [Mount Sinai] के किनारे ही मौजूद थे, जब हमने मूसा को पुकारा था। मगर आपको रब की तरफ़ से रहमत [grace] के रूप में भेजा गया है, ऐसे लोगों को सावधान करने के लिए जिनके पास आपसे पहले कोई सावधान करने वाला नहीं आया, ताकि वे ध्यान दें व नसीहत ले सकें।  (46)

और उनके हाथों द्वारा किए गए करतूतों के नतीजे में अगर कोई बड़ी आफ़त उन पर आ जाए, तो वे यह न कह सकें कि, "ऐ हमारे रब, अगर तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता तो शायद हमने तेरी आयतों का अनुसरण किया होता और हम भी विश्वास करनेवालों में [मोमिन] शामिल हो जाते?" (47)

मगर अब, जबकि हमारी तरफ़ से सच्चाई उनके पास आ चुकी है, तब भी वे कहते हैं, "उनको [मोहम्मद] क्यों नहीं वैसी निशानियाँ दी गयीं, जैसी कि मूसा को मिली थीं?" मगर जो (निशानियाँ) इससे पहले मूसा को दी गयी थीं, क्या उन लोगों ने उस सच्चाई को भी मानने से इंकार नहीं कर दिया था? वे कहते हैं, "दोनों [क़ुरआन व तोरात] दो क़िस्म के जादू हैं, जो एक-दूसरे की (सच्चाई की) पुष्टि करते हैं", और "हम तो दोनों में किसी एक को भी मानने से इंकार करते हैं।" (48)

[ऐ रसूल] आप कहें, "ठीक है, अगर तुम सच कहते हो, तो ले आओ अल्लाह के यहाँ से कोई ऐसी किताब, जो इन दोनों से ज़्यादा सही रास्ता दिखानेवाली हो, ताकि मैं भी उसका अनुसरण करूँ?" (49)

अब अगर वे आपकी बात का जवाब न दे पाएं, तो जान लें कि वे केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलने वाले हैं। उस आदमी से बढ़कर भटका हुआ कौन होगा जो अल्लाह के मार्गदर्शन के बिना, केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलता हो? सचमुच अल्लाह ग़लत काम करनेवालों को सही मार्ग नहीं दिखाता। (50)

हम उनके पास अपनी वाणी [क़ुरआन] पहुँचाते रहते हैं, ताकि वे ध्यान से सोच-विचार करें।  (51)

जिन लोगों को हमने इससे पहले (आसमानी) किताब दी थीं, वे इस [क़ुरआन] में विश्वास कर लेते हैं।  (52)

और जब यह उनके सामने पढ़कर सुनायी जाती है, तो कहते हैं, "हम इस पर विश्वास [ईमान] रखते हैं, सचमुच हमारे रब की ओर से यह सत्य है। हम तो इसके आने के पहले से ही उस [अल्लाह] पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] थे।" (53)

ऐसे लोगों को दुगना इनाम दिया जाएगा, क्योंकि वे सब्र के साथ जमे रहते हैं, भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी है, उसमें से दूसरों को भी देते हैं, (54)

और जब कभी वे बेकार की फ़ालतू बातें सुनते हैं, तो यह कहते हुए वहाँ से किनारे हट जाते हैं कि "हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। तुम पर सलामती हो! हम जाहिल लोगों के साथ (उलझना) नहीं चाहते।" (55)

[ऐ रसूल] आप जिसे चाहें, हर एक को सच्चाई की राह पर नहीं ला सकते; यह तो अल्लाह है कि जिसे चाहता है राह दिखा देता है: वह अच्छी तरह जानता है कि वे कौन लोग हैं जो बताए गए सही रास्ते पर चलेंगे।  (56)

वे कहते हैं, "अगर हम आप [मोहम्मद] के साथ आपके बताए हुए रास्ते पर चलेंगे, तो हमें अपनी ज़मीन से उखाड़कर फेंक दिया जाएगा।" क्या हमने उनके लिए (मक्का के रूप में) एक सुरक्षित जगह [sanctuary] की स्थापना नहीं की, जहाँ हमारी ओर से रोज़ी के रूप में हर क़िस्म की पैदावार (और फल) लाए जाते हैं? मगर ज़्यादातर लोग समझते नहीं हैं।  (57)

हम कितनी ही बस्तियों को बर्बाद कर चुके हैं, जो कभी अपने बेहिसाब धन-दौलत और आराम की ज़िंदगी के लिए जानी जाती थीं: उस वक़्त से लेकर आज तक, कुछ एक को छोड़कर, वे बस्तियाँ शायद ही फिर कभी दोबारा आबाद हो पायीं--- अन्ततः हम ही इसके वारिस हुए!  (58)

आपका रब कभी भी बस्तियों को उस वक़्त तक तबाह-बर्बाद नहीं करता जब तक कि पहले उनकी बस्ती में से कोई रसूल [Messenger] न ख़ड़ा कर दे, जो हमारे संदेशों [आयतों] को उनके सामने सुनाए। और न ही हम बस्तियों को उस वक़्त तक बर्बाद करते हैं, जब तक कि वहाँ के रहनेवाले शैतानी न करने लग जाएं।  (59)

जो भी चीज़ें तुम्हें इस संसार में दी गई हैं, वह तो बस (कुछ ही दिनों के लिए) इसी जीवन की ख़ुशियाँ हैं और उनकी सजावट के सामान हैं: और जो कुछ अल्लाह के पास है वह कहीं बेहतर और कहीं अधिक समय तक रहने वाला है--- तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (60)

भला वह आदमी जो उस अच्छे वादे को पूरा होता हुआ देखेगा जो हमने उसके साथ कर रखा था, क्या उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से हो सकती है जिसे हमने इस सांसारिक जीवन में थोड़ी सी ख़ुशियाँ दे रखी हों, और फिर वह क़यामत के दिन पकड़कर (सज़ा के लिए) पेश किया जाने वाला हो? (61)

एक दिन आएगा जिस दिन अल्लाह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ हैं मेरे वे (ख़ुदायी में) साझेदार [Partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे?" (62)

और वे [बड़े सरदार] जिनके ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना दिया जाएगा, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! ये वे लोग हैं जिन्हें हमने बहका दिया था। चूँकि हम स्वयं बहके हुए थे, सो हमने इन्हें भी बहका दिया, लेकिन अब हम तेरे सामने इनसे अपना सम्बन्ध तोड़ते हैं: सच बात तो यह है कि ये हमारी बन्दगी करते ही नहीं थे।" (63)

उसके बाद उन (काफिरों) से कहा जाएगा, "पुकारो उन सबको, जिन्हें तुम (अल्लाह के) साझेदार [Partners] के रूप में पूजते थे," तो वे उन्हें पुकारेंगे, मगर उन्हें कोई जवाब नहीं मिलेगा। वे अपनी आँखों से उस दी जा रही यातना को देखेंगे, और सोचेंगे कि काश उन्होंने सही मार्गदर्शन को मान लिया होता! (64)

और उस दिन अल्लाह उन्हें अपने सामने बुलाकर पूछेगा, "तुमने हमारे रसूलों को क्या जवाब दिया था?" (65)

उस दिन सारी दलीलें उन्हें बेमानी लगेंगी; वे एक दूसरे से सलाह मशविरा भी नहीं कर पाएंगे।  (66)

मगर हाँ, जिस किसी ने (गुनाहों से) तौबा कर ली, (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखा, और अच्छे कर्म किए, तो वह सफल होने वालों में अपने आपको शामिल करने की आशा रख सकता है। (67)

तेरा रब जो चाहता है पैदा करता है, और जिसे चाहता है चुन लेता है--- चुनने का उन्हें कोई अधिकार नहीं--- सो अल्लाह महान है, और उनके ठहराए हुए अल्लाह (के झूठे) साझेदारों [Partners] से कहीं ऊँचा व बड़ा है!  (68)

तेरा रब वह भी जानता है जो कुछ उनके सीनों के अंदर छिपा होता है, और वह भी जो वे सामने बता देते हैं। (69)

वह अल्लाह है; उसको छोड़कर कोई भी बंदगी के लायक़ नहीं; सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं —--- इस जीवन में भी और आनेवाले जीवन [परलोक] में भी; अंतिम फ़ैसले का अधिकार उसी के हाथ में है और उसी के पास तुम को लौटकर जाना होगा।  (70)

‍‍[ऐ रसूल] आप कहें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत के दिन तक तुम्हारे ऊपर लगातार रात कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे लिए रौशनी ला सके? तो क्या तब भी, तुम सुनते नहीं?" (71)

कह दें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत तक तुम्हारे ऊपर लगातार दिन कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे आराम के लिए रात ला सके? तो क्या तब भी, तुम देखते नहीं? (72)

यह तो उसकी रहमत है कि उसने तुम्हें रात और दिन दिए हैं, ताकि तुम रात में आराम पा सको, और दिन के समय रोज़ी तलाश कर सको, और ताकि तुम शुक्र अदा कर सको।" (73)

एक दिन आएगा जिस दिन वह उन्हें बुलाएगा और कहेगा, "कहाँ है मेरी (ख़ुदायी में) गढ़े हुए साझेदार [partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे ?"(74)

और हम हर एक समुदाय में से एक गवाह को बुलाएंगे और कहेंगे, "पेश करो अपना सबूत।" और तब वे जान लेंगे कि सच्चाई तो केवल अल्लाह के पास है; और उनके द्वारा गढ़े हुए ख़ुदा उन्हें छोड़ देंगे। (75)

क़ारून [Korah] मूसा की क़ौम में से था, मगर वह उनपर बड़े ज़ुल्म करता था। हमने उसे इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी कुंजियों को रखना मज़बूत लोगों के दल के लिए भी बड़ा भारी काम था। (याद करो जब) उसकी क़ौम के लोगों ने उससे कहा, "इतराओ मत! क्योंकि सचमुच अल्लाह इतरानेवालों को पसन्द नहीं करता।  (76)

और जो कुछ अल्लाह ने तुझे दे रखा है, उसकी मदद से आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी अपने लिए अच्छा ठिकाना माँगो, और इस दुनिया में भी तुम्हारी क़िस्मत से जो हिस्सा मिला है, उसे भी नज़रअंदाज़ न करो। दूसरों के साथ भलाई करो, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है। और धरती पर गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश मत करो, निश्चय ही अल्लाह गड़बड़ी [corruption] पैदा करने वालों को पसन्द नहीं करता", (77)

लेकिन उसने जवाब दिया, "मुझे तो यह दौलत मेरे अपने ज्ञान के कारण मिली है।" क्या वह नहीं जानता था कि अल्लाह ने उससे पहले कितनी ही नस्लों को तबाह कर दिया, जो ताक़त में उससे बढ़-चढ़कर थीं और धन-दौलत भी उन्होंने ज़्यादा जमा कर रखा था? अपराधियों से तो उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाएगा (बल्कि उन्हें बताया जाएगा)।  (78)

फिर (एक दिन) वह अपनी क़ौम के सामने पूरी आन-बान से निकला, और जिन लोगों का मक़सद इसी सांसारिक जीवन को पाना था, उन्होंने कहा, "काश हमें भी कुछ ऐसी चीज़ें दी गयी होतीं, जैसी कि क़ारून को मिली हैं: सचमुच वह बड़ा ही भाग्यशाली आदमी है।" (79)

मगर जिनको ज्ञान दिया गया था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुम पर! अल्लाह का इनाम उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जो विश्वास [ईमान] रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं: मगर यह केवल उन्हीं को हासिल होगा जो धीरज व सब्र से जमे रहते हैं।" (80)

अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया: उसके पास कोई न था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न ही ख़ुद वह अपना बचाव कर सका।  (81)

अगले दिन, वही लोग, जिन्होंने एक दिन पहले यह कामना की थी कि काश वे उसकी जगह होते, कहने लगे, "अफ़सोस [तुम पर, क़ारून!], यह तो अल्लाह ही है कि जो चाहता है देता है, किसी को ज़्यादा तो किसी को कम, और अपने बंदों में जिसे चाहता है, उसे देता है: अगर अल्लाह ने हम पर उपकार न किया होता तो हमें भी धरती में धँसा देता। अफ़सोस उस पर! सच्चाई को मानने से इंकार करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।"(82)

 

यह वो आख़िरत [परलोक, Hereafter] का घर है जिसे हम उन लोगों को देना मंज़ूर करेंगे, जो ज़मीन पर अपनी बड़ाई नहीं चाहते, और न ही गड़बड़ी [corruption] फैलाते हैं: अच्छा अंत तो उन्हें ही मिलेगा, जो अपने दिल में अल्लाह का डर रखता हो और बुराइयों से बचता हो।  (83)

जो कोई भी अल्लाह के सामने अच्छे कर्म लेकर आया, तो उसे बदले में उससे कहीं अच्छा इनाम मिलेगा; और जो कोई बुरे कर्मों को लेकर आएगा, तो उस कुकर्मी को वैसी ही सज़ा दी जाएगी जैसा कि उसने कर्म किया होगा। (84)

जिसने इस क़ुरआन की ज़िम्मेदारी [ऐ रसूल] आप पर डाली है, वह आपको वापस (आपके) असली घर तक ज़रूर पहुँचा देगा। अत: कह दें, "मेरा रब उसे अच्छी तरह से जानता है कि कौन मार्गदर्शन लेकर आया, और कौन है जो खुली गुमराही में पड़ा है।" (85)

आपको ख़ुद ही यह उम्मीद नहीं थी कि आप पर किताब उतारी जाएगी; ऐसा तो केवल आपके रब की रहमत [दयालुता, mercy] के कारण हआ। अतः आप (सच्चाई से) इंकार करने वालों के मददगार न बनें। (86)

अब जबकि आप पर (अल्लाह की) आयतें [revelations] उतारी जा चुकी हैं, तो देखना ऐसा न हो कि वे आपको अल्लाह की आयतों से मुँह मोड़ने पर मजबूर करें। आप लोगों को अपने रब की ओर बुलाएं। और कभी भी उनमें से न हो जाएं जो हमारी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] बना लेते हैं। (87)

अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को न पुकारो, क्योंकि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। हर चीज़ एक दिन ख़त्म हो जाएगी सिवाए उस (अल्लाह) के स्वरूप के। आख़िरी फ़ैसला उसी के हाथ में है, और उसी के पास तुम सबको वापस ले जाया जाएगा।  (88)

 

 

 

नोट: 

4: फ़िरऔन के एक भविष्यवक्ता ने उसे बताया था कि इसराईल की संतानों में से एक आदमी तुम्हारी सल्तनत समाप्त करेगाइसीलिए उसने हुक्म दिया था कि उनके यहाँ जो भी बेटा पैदा होउसे मार दिया जाए।

6: ऐसा माना जाता है कि फिरऔन के दरबार में भवन बनाने का मुख्य अधिकारी हामान था। फिरऔन को अपने पुराने ख़्वाब के पूरे हो जाने का डर लगा रहता था कि कोई इसराइलियों का बच्चा उसकी हुकूमत को ख़त्म कर देगा। 

7: दरिया यानी नील नदी।

12: फ़िरऔन की बीवी का नाम आसिया’ बताया जाता हैजब उन्होंने तय कर लिया कि बच्चे को पालना हैतो दूध पिलाने वालियों की खोज शुरू हुई। इतने में वहाँ मूसा (अल.) की बहन पहुँच गईं।

17: फ़िरऔन की हुकूमत में मिस्र के लोग इसराइलियों पर ख़ूब अत्याचार किया करते थेइस घटना के बाद मूसा (अलै.) ने फ़ैसला किया कि अब वे फिरऔन और उनके कारिंदों से अलग-थलग हो जाएंगे और उनकी कोई मदद नहीं करेंगे।

19: मूसा (अलै) ने शायद अपना हाथ उस मिस्री की तरफ़ उठाया था ताकि उसे एक इसराइली को मारने से रोक सकें।

22: फ़िरऔन की सल्तनत के बाहर मदयन नाम की एक बस्ती थी जहाँ की क़ौम के बीच हज़रत शोएब (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था।

24: मूसा (अलै) को अचानक ही मिस्र छोड़ना पड़ा था, वे बड़े बुरे हाल में मदयन पहुँचे, न उनके पास खाने-पीने की चीज़ थी और न धन। फिर उन्होंने दुआ कि और अल्लाह ने उन्हें उसी दिन घर भी दिया, काम भी दिया और एक बीवी भी दे दी।

26: मज़दूरीयानी जानवरों को चराने और उनको पानी पिलाने का काम।

29: मूसा (अलै) और उनके परिवार के लोग मदयन से मिस्र जाने के रास्ते में जब अंधेरे में रास्ता भूल गए थे। 

34: जैसा कि सूरह ताहा (20: 25) में आया है कि बचपन में मूसा (अलै.) ने ग़लती से एक अंगारा ज़बान पर रख लिया थाजिसकी वजह से उनकी ज़बान थोड़ी सी लड़खड़ाती थी।

44: मक्का के बुतपरस्तों को क़ुरआन में बार-बार याद दिलाया गया है कि ये घटनाएं सदियों पहले हुई थीं जिन्हें मुहम्मद (सल्ल) ने होते हुए नहीं देखा था। मिसाल के तौर पर यूसुफ़ के साथ कैसे षडयंत्र हुआ (12:102), कौन मरियम की देखरेख करेगा (3:44), और बाढ़ में नूह के बेटे का बह जाना (11:49). क़ुरआन के उतरने से पहले अरब के लोगों को इन चीज़ों के बारे में इतना नहीं पता था। इससे पता चलता है कि यह बातें अल्लाह की तरफ से उतारी गई हैं। 

48: मूसा (अलै.) को पूरी तोरात एक ही बार में दी गयी थी, कुछ लोग यह कहते थे कि क़ुरआन भी उसी तरह एक ही बार में क्यों नहीं उतरी? कुछ लोग यह भी कहते थे कि मूसा की लाठी की तरह मुहम्मद (सल्ल) को कोई पक्की निशानी क्यों नहीं दी गई? कुछ मक्का के बुतपरस्त लोग यहूदियों के जानकार लोगों के पास गए और उनसे रसूल के संदेश के बारे में पूछा, जवाब में उन लोगों ने बताया कि तौरात में मुहम्मद साहब का हवाला मिलता है। नतीजा यह हुआ कि  बुतपरस्तों ने तौरात और क़ुरआन दोनों को रद्द कर दिया और इन्हें जादू क़रार दिया। 

51: क़ुरआन के हिस्से ज़रूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा करके उतरते थे।

52: यानी यहूदी और ईसाई जिनको आसमानी किताबें दी गयी थींउनमें से कुछ लोग क़ुरआन पर विश्वास कर लेते थे।

57: मक्का के बहुदेववादियों को लगता था कि काबा में जो इतने बुत हैं उन्हीं की वजह से पूरे अरब में उनकी इज़्ज़त हैऔर अगर उन लोगों ने इस्लाम अपना लिया तो उनकी इज़्ज़तव्यापार आदि सब ख़त्म हो जाएगा और उन्हें वहाँ से निकाल बाहर किया जाएगा।

68: यहाँ रसूल या पैग़म्बर चुनने की बात हो रही हैमक्का के लोग यह भी कहते थे कि अल्लाह ने अगर चुना भी तो मुहम्मद को ही क्यों चुनामक्का या तायफ़ के बड़े सरदारों को क्यों नहीं!

80: क़ुरआन में सब्रका मतलब यह है कि इंसान को चाहिए कि अपने मन की बेजा इच्छाओं को नियंत्रण में रखते हुए अपने आपको अल्लाह की आज्ञाओं को मानने वाला और उसपर जमे रहना वाला बनाना चाहिए।  

85: असली घर या लौटने की जगहसे मतलब यहाँ मक्का बताया गया है। यह आयत उस समय उतरी जब मुहम्मद (सल्ल) मक्का से (हिजरत करके) मदीना जा रहे थेजब आप जुहफ़ापहुँचे जहाँ से मक्का का रास्ता अलग होता थातो आपको अपना घर छोड़ने का दर्द हुआयहाँ आपको तसल्ली दी गयी है कि आपको आपके असली घर में पहुँचा दिया जाएगा। आख़िर में आपने मक्का फ़तह किया और वहाँ के लोगों ने इस्लाम क़बूल किया। कुछ विद्वानों ने लौटने की जगह का मतलब जन्नत से लिया है जहाँ आपको अंत में पहुँचा दिया जाएगा।

 

 

सूरह 39: अज़-ज़ुमर 

[लोगों के समूह / The Throngs]

 



यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम आख़िरी की आयतों में आए उस ज़िक्र पर पड़ा है जिसमें बताया गया है कि फ़ैसले के दिन लोग एक के बाद एक समूहों में जन्नत और जहन्नम में जा रहे होंगे। इस सूरह का केंद्रीय विषय दो तरह के लोगों के बीच तुलना करना है: एक तरफ़ तो जो सच्चे व पक्के ईमान रखने वाले हैंऔर दूसरी तरफ़ वे लोग हैं जो अल्लाह के साथ उसकी ख़ुदाई में "साझेदार" [Partner] ठहराते हैं। इस सूरह में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि लोगों को अच्छाई व बुराई का रास्ता चुनने का पूरा अधिकार हैचाहे तो वे सच्चाई पर विश्वास कर लें या विश्वास न करें (आयत 41), मगर इस बात पर बहुत ज़ोर डाला गया है कि वह सीधे व सही रास्ते पर चलना शुरू कर देंऔर समय रहते अपनी ग़लतियों को मानते हुए गुनाहों से तौबा कर लें (53-61). 

 

 

विषय:



01-02: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है

03-04: अल्लाह एक है

05-07: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

08-20: सच्चाई पर पक्का विश्वास और उसका इनाम 

21:    अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

22:    विश्वास रखनेवाले और विश्वास न रखनेवाले दोनों बराबर नहीं 

23:    एक किताब जो सही रास्ता दिखाने वाली है 

24-26: ईमानवाले और ईमान न रखनेवाले की तुलना 

27-29: कई ख़ुदाओं को माननेवाले की मिसाल कई मालिक वाले ग़ुलाम से 

30-37: अल्लाह फ़ैसला करेगा 

38-40: सिर्फ़ अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए 

41   : अल्लाह के संदेश को मानने या ठुकराने के लिए हर आदमी ज़िम्मेदार है

42   : अल्लाह ही मौत देता है 

43-44: सिफ़ारिश अल्लाह के अधिकार में है

45-48: अल्लाह फ़ैसला करेगा 

49-52: ख़ुशहाली और बदहाली दोनों आज़माइश हैं 

53-59: गुनाहों से तौबा करना 

60-63: अल्लाह फ़ैसला करेगा 

64-66: रसूल को केवल अल्लाह की बंदगी करना 

67-75: क़यामत के दिन फ़ैसले का दृश्य 



 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा है, जो बहुत प्रभुत्वशाली, बड़ी समझ-बूझ रखने वाला है। (1)

 

[ऐ रसूल!], यह हम हैं, जिसने यह किताब पूरी सच्चाई के साथ आपकी ओर उतारी है, इसलिए पूरी भक्ति के साथ केवल अल्लाह की ही इबादत [उपासना] करें: (2)

 

(याद रहे), सच्ची भक्ति तो केवल अल्लाह के लिए होती है। (रहे वे लोग) जिन्होंने उस [अल्लाह] को छोड़कर दूसरे (देवताओं को) अपना संरक्षक [Protector/Guardian] बना रखा है, (वे बातें बनाते हुए) कहते हैं, "हम तो केवल उनकी पूजा इसीलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से और ज़्यादा नज़दीक ले आते हैं" --- उनके बीच (क़यामत के दिन) अल्लाह उन बातों का ख़ुद ही फ़ैसला कर देगा जिनमें वे (सच्चाई से) मतभेद रखते हैं। अल्लाह उसे मार्ग नहीं दिखाता जो कभी शुक्र अदा नहीं करता हो और बड़ा झूठा हो। (3)

 

अगर अल्लाह अपने लिए कोई सन्तान चाहता तो वह अपने पैदा किए हुए में से किसी को भी चुन सकता था, लेकिन वह इस चीज़ से (कि उसकी संतान हो) कहीं महान व ऊँचा है! वह अल्लाह है, अकेला, सब पर क़ाबू रखनेवाला, (4)

 

उसने आसमानों और ज़मीन को सही मक़सद के साथ पैदा किया; वह रात को दिन पर लपेटता जाता है और दिन को रात पर लपेटता जाता है; उसने सूरज और चाँद को (एक व्यवस्था के अंदर) काम पर लगा रखा है, हर एक नियत समय तक (अपने बने हुए रास्ते पर) चल रहा है। सचमुच वह बहुत प्रभुत्वशाली, बड़ा माफ़ करनेवाला है। (5)

 

उसने तुम सबको अकेली जान [आदम/Adam] से पैदा किया; फिर उसी से उसका जोड़ा बनाया और तुम्हारे लिए चार तरह के मवेशियों के जोड़े [ऊँट, गाय, भेड़ औए बकरी] पैदा कर दिए। वह तुम्हें तुम्हारी माँओं के पेट में इस तरह बनाता है कि तीन क़िस्म के अँधेरे पर्दों के भीतर तुम बनावट के एक चरण के बाद दूसरे चरण से गुज़रते हो। ऐसा है अल्लाह, तुम्हारा रब! सारी बादशाही [control] उसी की है, उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं। फिर (भी) तुम अपना मुँह कैसे मोड़ सकते हो? (6)

 

यदि तुम विश्वास नहीं करते (और शुक्र अदा नहीं करते), तो याद रखो अल्लाह को तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है, तब भी वह अपने बन्दों में (इंकार और) नाशुक्री को पसन्द नहीं करता; हाँ अगर तुम शुक्र अदा करते हो, तो वह [अल्लाह] उसे तुम्हारे अंदर देखकर ख़ुश होता है। कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों का) बोझ नहीं उठाएगा। फिर अंत में तुम सबको लौटकर (हिसाब-किताब के लिए) अपने रब के पास ही जाना है और (उस वक़्त) वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम (दुनिया में) किया करते थे: वह दिलों (के अंदर छुपी) हुई बातें (तक) अच्छी तरह जानता है। (7)

जब आदमी पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वह पूरे दिल से अपने रब की तरफ़ झुकता है और उसे (मदद के लिए) पुकारने लगता है, फिर जब (अल्लाह) उसपर अपनी अनुकम्पा [favour] कर देता है, तो वह उसको भूल जाता है जिसे पहले पुकार रहा था और (दूसरे देवताओं को) अल्लाह के बराबर का ठहराने लगता है, जिसके नतीजे में वह दूसरे लोगों को भी उसके (सही) मार्ग से भटका देता है। कह दें, "तुम (सच्चाई से) इंकार करने का मज़ा थोड़े दिन और उठा लो! तुम (जहन्नम की) आग में रहने वालों में ज़रूर शामिल होगे।" (8)

 

उस आदमी के बारे में क्या कहा जाए जो रात की घड़ियों में दिल लगाकर इबादत करता है, सजदे में झुकता है, (नमाज़ में) खड़ा रहता है, यहाँ तक कि मौत के बाद की ज़िंदगी से भी डरता रहता है, और अपने रब से अपने लिए रहम व दया की आशा रखता है? कह दें, "क्या वे लोग जो जानते हैं (कि एक दिन उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा) और वे लोग जो नहीं जानते, दोनों बराबर होंगे? (मगर) शिक्षा तो वही ग्रहण करते हैं जो बुद्धि और समझ-बूझ रखते हैं।" (9)

 

कह दें कि (अल्लाह कहता है), "ऐ मेरे ईमानवाले बन्दो! अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचो। जो लोग इस दुनिया में अच्छे काम करते हैं, उनके लिए बदले में अच्छाई होगी--- और अल्लाह की धरती बहुत लम्बी-चौड़ी है---- और जो लोग (नेक कामों में) सब्र के साथ जमे रहते हैं, तो उनको इसका पूरा-पूरा और बेहिसाब बदला [इनाम] दिया जाएगा।" (10)

 

कह दें, "मुझे तो आदेश दिया गया है कि मैं अल्लाह की इबादत [उपासना] करूँ, इस तरह कि मेरी बंदगी [भक्तिभाव व निष्ठा] सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी के लिए हो (11)

 

और मुझे आदेश दिया गया है कि मैं (अल्लाह के सामने) पूर्ण समर्पण करनेवाला [मुस्लिम] पहला आदमी बनूँ।" (12)

 

कह दें, "अगर मैं अपने रब के आदेशों को न मानूँ तो मुझे एक बड़े ज़बरदस्त दिन [क़यामत] की यातना का डर है।" (13)

 

कह दें, "मेरी पूरी भक्ति केवल अल्लाह के लिए ही समर्पित है और मैं तो बस उसी की इबादत करता हूँ, (14)

 

अब तुम उसे [अल्लाह को] छोड़कर जिसकी चाहो पूजा करो, कह दें, "वास्तव में घाटे में पड़ने वाले तो वही हैं, जो क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को हरा बैठेंगे: याद रखो, असल घाटा यही है। (15)

 

ऐसे लोगों के लिए उनके ऊपर (भी) आग की कई पर्तें होंगी और उनके नीचे भी।यही वह यातना है, जिससे अल्लाह अपने बन्दों को डराता है: "ऐ मेरे बन्दो! तुम मेरा डर रखो।" (16)

 

रहे वे लोग जो गढ़े हुए देवताओं या शैतान की पूजा से बचते रहे, और अल्लाह की ओर (पूरी भक्ति से) झुकते रहे, उनके लिए शुभ सूचना है, अतः मेरे उन बन्दों को [ऐ रसूल!] आप ख़ुश्ख़बरी दे दें, (17)

 

जो बात को ध्यान से सुनते हैं और अच्छी बातों पर अमल करते हैं। यही वे लोग हैं, जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखाया है; और वही बुद्धि और समझवाले हैं। (18)

 

भला जिस व्यक्ति पर यातना की सज़ा तय हो चुकी है, क्या आप [ऐ रसूल] उसे छुड़ा लेंगे जो आग के अंदर पहुँच चुका है?  (19)

 

अलबत्ता जिन्होंने दिलों मे अपने रब का डर रखा है, उनके रहने के लिए (जन्नत में) तल्ले-ऊपर बने हुए ऊँचे-ऊँचे भवन होंगे, उनके नीचे नहरें बह रही होंगी। यह अल्लाह का वादा है: अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है। (20)

 

(ऐ इंसान) क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने किस तरह आसमान से पानी उतारा, फिर धरती में उसके सोते [springs] बहा दिए; फिर वह उस पानी के द्वारा अलग अलग रंगों की हरियाली व खेतियाँ उगा देता है; फिर वह (तैयार होकर) सूखने लगती हैं; फिर तुम देखते हो कि वह (फ़सल पकने के बाद) पीली पड़ गई; फिर उसके हुक्म से वह दब दबाकर चूर हो जाती हैं? निस्संदेह इन बातों में उन लोगों के लिए बड़ी शिक्षा है जो बुद्धि और समझ रखते हैं।  (21)

 

भला क्या वह व्यक्ति जिसका सीना [हृदय] अल्लाह ने अपनी पूर्ण भक्ति [इस्लाम] के लिए खोल दिया, जिसके नतीजे में वह अपने रब की ओर से दी गयी रौशनी में आ चुका है, (उस व्यक्ति के समान होगा जो कठोर हृदयवाला और अल्लाह को भुलाए बैठा है)? हाँ, अफ़सोस! उन लोगों के लिए जिनके दिल अल्लाह का नाम लेने से कठोर हो चुके हैं! ये लोग पूरी तरह से रास्ता भटक चुके हैं। (22)

अल्लाह ने (अपने द्वारा भेजी गयी शिक्षाओं में) सबसे अच्छी वाणी उतार भेजी है: एक ऐसी किताब जिसके विषय एक दूसरे से (आपस में और दूसरी आसमानी किताबों से भी) मिलते-जुलते हैं, जिसकी बातें बार-बार दुहरायी गयीं हैं; (इन बातों को सुनकर) वे लोग जो दिलों में अपने रब का डर रखते हैं, उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फिर अल्लाह को याद करने के नतीजे में उनकी खालें (शरीर) और उनके दिल नर्म पड़ जाते हैं: यह है अल्लाह का मार्गदर्शन; उसके द्वारा वह जिसको चाहता है सीधे मार्ग पर ले आता है, और जिसको अल्लाह रास्ते में भटकता छोड़ दे, तो फिर उसे कोई सीधे रास्ते पर लाने वाला नहीं। (23)

 

अब भला (उसका क्या हाल होगा) कि क़यामत के दिन (उसके दोनों हाथ बँधे होंगे और) अपने आपको भयानक यातना [आग] से बचाने के लिए केवल उसका खुला चेहरा होगा? और ज़ालिमों से कहा जाएगा, "चखो मज़ा उस (बुरे कर्म द्वारा की गयी) कमाई का, जो तुम करते रहे थे!" (24)

 

जो लोग उनसे पहले थे उन्होंने भी (रसूलों की बातों को) झूठ माना, अन्ततः उनपर उस जगह से यातना आ पहुँची, जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न था:  (25)

 

फिर अल्लाह ने उन्हें सांसारिक जीवन में भी बेइज़्ज़ती का मज़ा चखाया; और आख़िरत [परलोक, Hereafter] की यातना तो इससे भी कहीं बड़ी होगी। काश, वे लोग जानते!  (26)

 

सच्चाई यह है कि हमने इस क़ुरआन में लोगों (को समझाने) के लिए हर तरह की मिसालें बता दी हैं, ताकि वे याद रखें व इनसे सीख ले सकें --- (27)

एक ऐसी अरबी (भाषा की) क़ुरआन से, जिसमें कोई गड़बड़ी (उलझाव) नहीं है, ताकि लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बच सकें।  (28)

 

(समझाने के लिए) अल्लाह एक मिसाल पेश करता है: एक (ग़ुलाम) आदमी है जिसके एक से ज़्यादा मालिक हैं जो आपस में खींचातानी करने वाले हैं, और एक आदमी वह है जो पूरे का पूरा एक ही मालिक का ग़ुलाम है। क्या दोनों का हाल एक जैसा होगा? (बिल्कुल नहीं! एक मालिकवाला ग़ुलाम कहीं बेहतर होगा!), सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, हालाँकि उनमें से अधिकांश लोग नहीं जानते। (29)

यह बात पक्की है कि (ऐ रसूल) आपको भी मरना है और उन्हें भी मरना है (30)

फिर, तुम सब क़यामत के दिन अपने रब के सामने आपस में झगड़ा व विवाद करोगे (31)

तो फिर उस से बढ़कर बुरा व ग़लत आदमी कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता है, और जब सच्चाई उसके सामने आ चुकी हो, तो वह उसे (झूठ समझकर) मानने से इंकार कर देता है? क्या (सच्चाई से) इंकार करने वालों का (सज़ा के लिए उचित) ठिकाना जहन्नम नहीं है? (32)

 

और (दूसरी तरफ़) एक आदमी है जो सच्चाई लेकर आता है और जो उसे सच मानते हुए स्वीकार कर लेता है, तो ऐसे ही लोग हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले हैं: (33)

उनको उनके रब के पास वह सब कुछ (नेमतें) मिलेंगी, जो भी वे चाहेंगे। यह इनाम है उन लोगों के लिए जो अच्छा कर्म करते हैं:   (34)

यहाँ तक कि अल्लाह उनके सबसे बुरे कर्म को भी माफ़ कर देगा और नेकी का बदला उनके द्वारा किए गए सबसे अच्छे कर्म के हिसाब से उन्हें प्रदान करेगा।  (35)

क्या अल्लाह अपने बंदों के लिए काफ़ी नहीं है? फिर भी वे आपको [ऐ रसूल] उन (बुतों) से डराते हैं जिन्हें ये अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं। अगर अल्लाह (सच्चाई से इंकार के नतीजे में) किसी को रास्ते से भटकता छोड़ दे, तो फिर उसे मार्ग दिखानेवाला कोई नहीं; (36)

 

और जिसे अल्लाह सीधे मार्ग पर ले आए उसे रास्ते से भटकाने वाला भी कोई नहीं। क्या अल्लाह ज़बरदस्त ताक़तवाला और बदला लेने में सक्षम नहीं है? (37)

 

यदि आप [ऐ रसूल] उनसे पूछें कि "आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने," तो कह दें, “ज़रा विचार करो कि अल्लाह को छोड़कर जिन (बुतों) को तुम (मदद के लिए) पुकारते हो: यदि अल्लाह मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचानी चाहे तो क्या ये (बुत) मेरी उस तकलीफ़ को दूर कर सकते हैं? या अगर अल्लाह मुझ पर कोई दया [रहम] करना चाहे तो क्या ये उसकी रहमत को रोक सकते है?" कह दें, "मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है। भरोसा करने वाले उसी पर भरोसा करते हैं।" (38)

 

कह दें, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारे अधिकार में जो कुछ है उसके हिसाब से तुम अपने काम किए जाओ-- मैं भी (अपने तरीक़े से) काम करता रहूँगा। तुम्हें पता चल जाएगा (39)

कि किसे (इस दुनिया में) भारी बेइज़्ज़ती झेलनी पड़ेगी और किस पर (आख़िरत में) कभी समाप्त न होने वाली यातना उतरती है।" (40)

हमने लोगों के (मार्गदर्शन के) लिए [ऐ रसूल], आप पर सच्चाई के साथ  किताब उतारी है। अतः जिस किसी ने सीधा मार्ग अपनाया तो अपने ही फ़ायदे के लिए अपनाया, और जो उससे भटक गया तो वह भटककर अपने को ही हानि पहुँचाता है: आप उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।  (41)

 

अल्लाह ही मरे हुए लोगों की रूहों [प्राणों] को अपने पास ले लेता है और ज़िंदा लोगों की रूहों को भी ले जाता है जबकि वे नींद की हालत में होते हैं--- फिर जिसकी मौत का फ़ैसला उसने कर दिया है उसकी रूह को (वहीं) रोक लेता है और दूसरे (ज़िंदा लोगों की) रूहों को एक नियत समय तक के लिए वापस छोड़ देता है-- निश्चय ही इसमें सोच-विचार करने वालों के लिए कितनी ही निशानियाँ हैं।  (42)

(इसके बावजूद) उन्होंने अल्लाह से हटकर दूसरे (गढ़े हुए देवताओं) को सिफ़ारिशी [Intercessor] बना रखा है!  (उनसे) कहें, "चाहे वे किसी चीज़ का न तो अधिकार रखते हों और न कुछ समझते ही हों तब भी?" (43)

कह दें, "सिफ़ारिश तो सारी की सारी अल्लाह के ही अधिकार में है। उसी के क़ब्ज़े में आसमानों और ज़मीन की बादशाही है। फिर उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।"(44)

और जब कभी अल्लाह का ज़िक्र अलग से किया जाता है, तो जो लोग आख़िरत [hereafter] पर ईमान नहीं रखते, उनके दिल नफ़रत से कुढ़ने लगते हैं, मगर जब उसके सिवा दूसरे (देवताओं) का ज़िक्र होता है (जिन्हें वे पूजते हैं) तो वे खुशी से खिल उठते हैं;   (45)

 

कहें, "ऐ अल्लाह! आसमानों और ज़मीन को पैदा करनेवाले! हर ढकी-छुपी चीज़ और सामने दिखायी देने वाली चीज़ के जाननेवाले!, तू ही अपने बन्दों के बीच उस चीज़ का फ़ैसला करेगा, जिसमें वे मतभेद करते रहे हैं।" (46)

 

अगर बदमाश/शैतान लोगों को वह सब कुछ [माल-असबाब] मिल जाए जो धरती में है और उसके साथ उतना ही और भी (मिल जाए), तो भी वे क़यामत के दिन बुरी यातना से बचने के लिए अपनी जान के बदले में वह सब कुछ दे डालने के लिए तैयार होंगे: (मगर) अल्लाह की ओर से उनके सामने कुछ ऐसी चीज़ सामने आयेगी जिसके बारे में उन लोगों ने कभी सोचा तक न होगा (47)

उनके कर्मों की बुराइयाँ उन पर प्रकट हो जाएँगी, और वही चीज़ें उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी जिनकी वे हँसी उड़ाया करते थे। (48)

(आदमी का हाल यह है कि) जब उस पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वह हमें पुकारने लगता है, फिर जब हम उस पर अपनी दया दिखाते हुए कोई नेमत दे देते हैं, तो कहता है, "यह तो मुझे अपने (हुनर और) ज्ञान के कारण प्राप्त हुआ है"---- नहीं! बल्कि यह तो एक परीक्षा है, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते। (49)

 

ऐसी ही बात उनसे पहले गुज़र चुके (कुछ) लोगों ने कही थी। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ कमाई वे करते थे, वह उनके कुछ काम न आई (50)

 

फिर जो कुछ उन्होंने (अपने कर्मों से) कमाया था, उसकी बुराइयाँ उन पर ही आ पड़ीं। और (इसी तरह) आजकल भी जिन (अरब के) लोगों ने शैतानियाँ कर रखी हैं, उन्हें अपने कर्मों का बुरा प्रभाव भुगतना पड़ेगा: वे (अल्लाह की पकड़ से) बचकर नहीं जा सकते। (51)

क्या उन्हें मालूम नहीं कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को ख़ूब बढ़ा देता है, और जिसके लिए चाहता है (रोज़ी में) तंगी कर देता है? इसमें उन लोगों के लिए सचमुच बड़ी निशानियाँ है जो ईमानवाले हैं।  (52)

कह दें, "[अल्लाह कहता है] ऐ मेरे वह बन्दो, जिन्होंने (गुनाहों से) अपने आप पर ज़्यादती करके अपनी हानि की है, अल्लाह की रहमत [दयालुता] से निराश न हो। अल्लाह सारे ही गुनाहों को क्षमा कर देता है: वह बड़ा माफ़ करने वाला, अत्यन्त दयावान है।”  (53)

 

(गुनाहों से तौबा करने के लिए) अपने रब का ध्यान लगाओ। उसके आज्ञाकारी बन जाओ इससे पहले कि तुम पर यातना आ जाए, (क्योंकि) फिर तुम्हारी सहायता नहीं की जाएगी  (54)

 

और उस बेहतरीन शिक्षा [क़ुरआन] का अनुसरण करो जो तुम्हारे रब ने तुम्हारी ओर उतारी है, इससे पहले कि तुम पर अचानक यातना आ जाए और तुम्हें इसकी ख़बर भी न हो" (55)

और तुम्हारी आत्मा यह कह उठे, "हाय, अफ़सोस मुझ पर! जो उपेक्षा अल्लाह के हक़ में मुझ से हुई। और सच तो यह है कि मैं (अल्लाह के आदेशों का) मज़ाक़ उड़ाने वालों में शामिल रहा" (56)

 

या, कोई कहने लगे कि "यदि अल्लाह मुझे मार्ग दिखाता तो अवश्य ही मैं डर रखने वालों में से होता!" (57)

या, जब वह यातना अपनी आँखों से देख ले, तो कहने लगे, "काश! मुझे एक बार (दुनिया में) वापस जाने का मौक़ा मिल जाए, तो मैं नेक लोगों में शामिल हो जाऊँ!" (58)

[रब कहेगा] "हरगिज़ नहीं!  मेरी आयतें तेरे पास आ चुकी थीं, किन्तु तूने उनको मानने से इंकार कर दिया: तू अपनी बड़ाई के घमंड में पड़ गया और इंकार करने वालों [काफ़िरों] में शामिल हो गया।”  (59)

और क़यामत के दिन आप [ऐ रसूल] उन लोगों को देखेंगे जिन्होंने अल्लाह के ख़िलाफ झूठी बातें गढ़ी थीं, कि उनके चेहरे काले पड़ गए हैं। क्या अहंकारियों का ठिकाना जहन्नम में नहीं है?" (60)

 

(इसके विपरीत) जिन लोगों ने अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया होगा, अल्लाह उन लोगों को उनकी आख़िरी मंज़िल [मुक्ति] तक सुरक्षित पहुँचा देगा: न उन्हें कोई तकलीफ़ छू सकेगी और न उन्हें किसी बात का ग़म होगा। (61)

अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है; और वही हर चीज़ का रखवाला है;  (62)

 

उसी के पास आसमानों और ज़मीन की कुंजियाँ हैं। और जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार किया, वही हैं जो घाटे में रहेंगे।  (63)

कह दें, "ऐ बेवक़ूफ़ लोगो! क्या फिर भी तुम मुझसे कहते हो कि मैं अल्लाह के सिवा किसी और की बन्दगी करूँ?" (64)

 

[ऐ रसूल] आप पर और आपसे पहले गुज़र चुके (नबियों) पर पहले ही यह बात "वही" [Revelation] के द्वारा उतारी जा चुकी है: "अगर तुमने अल्लाह का कोई साझेदर [partner] ठहराया, तो तुम्हारे द्वारा किए गए अच्छेबुरे सब कर्म बर्बाद व अकारथ हो जायेंगे: तुम अवश्य ही घाटे में पड़ने वालों में शामिल हो जाओगे। (65)

नहीं! बल्कि केवल एक अल्लाह की बन्दगी करो और उसका शुक्रिया अदा करने वालों में शामिल हो जाओ।”  (66)

इन लोगों ने न अल्लाह की सही हक़ीक़त समझी और न उसकी क़द्र जानी, जैसी क़द्र के वह लायक़ था। हालाँकि क़यामत के दिन पूरी की पूरी ज़मीन उसकी मुट्ठी में होगी। आसमानों को लपेटकर वह अपने दाएँ हाथ में रख लेगा---  महान है वह! और वह हर उस ज़ात से कहीं ऊँचा और बड़ा है जिसे वे (प्रभुत्व में अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं। (67)

 

और जब सूर [नरसिंघा] फूँका जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन में जितने हैं, वे सब बेहोश हो जायेंगे, सिवाए उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दूबारा फूँका जाएगा, तो वे सब लोग सहसा खड़े होकर देखने लगेंगे।  (68)

 

अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोलकर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा। और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा: उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी।  (69)

और हर एक को उसके कर्मों का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा। और वह [अल्लाह] भली-भाँति जानता है, जो कुछ वे करते हैं।  (70)

 

जिन लोगों ने सच्चाई से इंकार किया, वे गिरोह के गिरोह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो उसके द्वार खोल दिए जाएँगे और उसके प्रहरी उनसे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे लोगों में से रसूल नहीं आए थे जो तुम्हें तुम्हारे रब की आयतें पढ़कर सुनाते हों और तुम्हें इस दिन की मुलाक़ात से सचेत करते हों?" वे कहेंगे, "क्यों नहीं (वे तो आए थे)।" मगर सच्चाई से इंकार करने वालों के जुर्मों की सज़ा पहले ही दी जा चुकी होगी। (71)

कहा जाएगा, "जहन्नम के दरवाज़े में प्रवेश करो: वहीं तुम्हें सदैव रहना है।" तो क्या ही बुरा ठिकाना है अहंकारियों का! (72)

 

जो लोग अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचते थे, वे गिरोह के गिरोह जन्नत की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो पायेंगे कि उसके दरवाज़े पहले से खुले हैं। और उसके प्रहरी उनसे कहेंंगे, "सलाम हो तुमपर! बहुत अच्छे रहे! आओ, अंदर आ जाओ: तुम्हें अब यहीं सदैव रहना है” (तो उनकी ख़ुशियों का क्या हाल होगा!) (73)

 

और वे कहेंगे, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमारे साथ अपना वादा सच कर दिखाया, और हमें इस ज़मीन का वारिस बनाया कि हम जन्नत में जहाँ चाहें वहाँ रहें-बसे।" अतः क्या ही अच्छा इनाम [reward] है नेकी के रास्ते में मेहनत करने वालों का! (74)

 

और आप [ऐ रसूल], फ़रिश्तों को देखेंगे कि वे सिंहासन के गिर्द घेरा बाँधे हुए, अपने रब का गुणगान कर रहे हैं। और लोगों के बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाएगा और कहा जाएगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (75)

 

 

 

नोट: 

3: अरब के बहुदेववादियों का भी यह मानना था कि सारा ब्रह्मांड अल्लाह ने ही पैदा किया है, लेकिन उन लोगों ने कुछ देवताओं को गढ़ लिया था और उनकी मूर्तियों को यह मानकर पूजते थे कि ये अल्लाह से हमारी सिफ़ारिश करेंगे और उनके द्वारा अल्लाह से हमारी नज़दीकी बढ़ेगी। यहाँ यह बताया गया है कि चूँकि इन देवताओं की कोई हक़ीक़त नहीं है, इसलिए सिफ़ारिश की बात सिरे से ग़लत हैऔर इबादत किए जाने का अकेला हक़दार तो केवल अल्लाह है। ...... अंत में अल्लाह यह फ़ैसला कर देगा कि कौन था जो केवल अकेले अल्लाह की भक्ति करता था और कौन था जो अल्लाह के साथ दूसरे ख़ुदाओं को भी जोड़ता था।  

 

6: चार मवेशियों के जोड़े का ज़िक्र सूरह अनाम (6: 142-144) में आया है, यानी भेड़, बकरी, ऊँट और गाय के जोड़े (नर व मादा)।

 

तीन क़िस्म के अँधेरे पर्दे -- एक पर्दा पेट का, फिर उसके अंदर कोख का, और उस झिल्ली का (amniotic sac) जिसमें बच्चा लिपटा होता है। 

 

बनावट के चरण --- वीर्य, फिर ख़ून, फिर लोथड़ा, फिर हड्डियाँ आदि। सूरह हज्ज (22: 5), सूरह मोमिनून (23:14) 

 

10: "अल्लाह की धरती बहुत लम्बी-चौड़ी है" (29: 56--60); इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अगर सच्चाई के रास्ते पर चलने में मुश्किल आ रही हो, तो वहाँ से कहीं और चले जाना चाहिए जहाँ दीन पर चलना कुछ आसान हो, और अपने देश छोड़ने पर धीरज से काम लेना चाहिए। 

 

15: कोई अगर अल्लाह को छोड़कर किसी और को पूजना चाहे, तो उसे आज़ादी दी गयी है, उसे एक अल्लाह पर विश्वास कर लेने के लिए ज़बरदस्ती मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका नतीजा यह होगा कि क़यामत के दिन वह अपना सब कुछ हार बैठेगा।



18: आदमी जो कुछ सुनता है, उस पर यह आयत लागू की जा सकती है, ख़ासकर क़ुरआन के मतलब समझने पर, जैसे कोई आदमी अगर बदला लिए जाने की आयत पढ़े, और फिर कई आयतें माफ़ कर देने के बारे में भी पढ़े, और फिर वह माफ़ कर देने का फ़ैसला करे।



29: ऐसी हालत में तो ग़ुलाम अपने कई मालिकों के हुक्मोंं को सुनकर परेशान हो जाएगा कि कौन सी बात माने और किसकी बात पहले माने---- ठीक इसी तरह, कई ख़ुदाओं को मानने वाले भी कभी सुकून नहीं पा सकते। इस मिसाल से कई ख़ुदा के होने के विरुद्ध तर्क दिया गया है। ऐसा ही तर्क 23:91 में भी है।



50: जैसा कि क़ारून ने कहा था। देखें 28: 76-81

 

53: मरने से पहले-पहले जब भी इंसान अपने आपको सुधारने का पक्का इरादा कर ले और सच्चे दिल से अपने गुनाहों से तौबा कर ले, तो उसके लिए माफ़ी के दरवाज़े खुले रहते हैं, क्योंकि गुनाह चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, वह अल्लाह की रहमत से बड़ा नहीं हो सकता। 4:48 के अनुसार एक ही गुनाह ऐसा है जिसे माफ़ नहीं किया जाएगा कि अगर कोई अल्लाह पर विश्वास न रखता हो और उसी हालत में मर जाए या वह इबादत में अल्लाह के साथ किसी और को भी जोड़ता हो।

 

74: इस बात पर 21:105 में भी ज़ोर दिया गया है। अल्लाह ईमानवालों को इनाम के तौर पर जन्नत में हमेशा के लिए बसा देगा। कुछ विद्वान कहते हैं कि जब अल्लाह ने जन्नत और जहन्नम बनाई तो दोनों में सभी इंसानों के लिए रहने की जगह बनाई थी, इसीलिए वहाँ रहने वालों को "वारिस" कहा गया है।

 

 

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