Later Meccan Suras II [619 AD – 622 AD]
सूरह 29: अल अंकबूत
[मकड़ी / The Spider]
यह एक मक्की
सूरह है जिसका नाम आयत 41 में बयान हुई
मकड़ी की मिसाल पर पड़ा है। इस सूरह में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ईमान
रखनेवालों की भी परीक्षा ली जायेगी और यह कि उन्हें अपना क़दम मज़बूती से जमाए रखना
चाहिए। विश्वास न रखनेवालों के मन में "वही" [revelation] यानी क़ुरआन के उतरने की प्रक्रिया और रसूल को
लेकर जो ग़लत धारणा बैठी हुई थी, उसका निवारण किया गया है। पिछले गुज़र चुके
नबियों जैसे नूह, इबराहीम, लूत और शुएब अलै. के हवाले भी दिए गए हैं और
साथ में जिन लोगों ने उनकी बात मानने से इंकार किया था उनको मिलने वाली भयानक सज़ा
का विवरण भी दिया गया है। सूरह के अंत में उन लोगों की तारीफ़ की गई है जो अल्लाह
पर पूरा भरोसा रखते हैं और उसके रास्ते में भलाई की कोशिश करते हैं।
विषय:
02-13: ईमानवालों की
परीक्षा ली जायेगी
14-15: नूह (अलै) और
उनकी क़ौम की कहानी
16-27: इबराहीम (अलै)
और उनकी क़ौम की कहानी
28-35: लूत (अलै) और
उनकी क़ौम की कहानी
36-37: शुएब (अलै) और
मदयन के लोगों की कहानी
38: 'आद' और 'समूद' के लोगों की कहानी
39-40: मूसा (अलै) और
फिरऔन, क़ारून और
हामान की कहानी
41-44: मकड़ी की मिसाल
45-47: तीन आसमानी
किताबें
48-49: रसूल ने अपने
हाथ से कोई किताब नहीं लिखी थी
50-52: कोई निशानी
[चमत्कार] दिखाने की माँग
53-55: यातना जल्दी
बुलाने की माँग
56-59: नेकी व भलाई
के लिए इनाम
60-67: विश्वास न
करने वाले असंगत बात करते हैं, और नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते
68-69: (सच्चाई पर)
विश्वास रखने वाले और इंकार करने वाले
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰
मीम॰ (1)
क्या लोगों ने
यह समझ रखा है कि वे इतना कह देने मात्र से छोड़ दिए जाएँगे कि "हम विश्वास
करते हैं" और उनकी परीक्षा नहीं ली जाएगी? (2)
वे लोग जो
इनसे पहले गुज़र चुके हैं, हमने उन सब लोगों
की भी परीक्षा ली थी: अल्लाह उनकी पहचान ज़रूर कर लेगा, कि कौन लोग हैं जो सच्चाई पर हैं, और कौन हैं जो झूठे हैं। (3)
क्या बुरे
कर्म करने वाले ऐसा सोचते हैं कि वे हम से बचकर निकल जाएँगे? (अगर हाँ), तो क्या ही ग़लत अंदाज़ा है उनका! (4)
मगर, वे लोग जो अल्लाह से जा मिलने की उम्मीद में
लगे रहते हैं, तो वह यक़ीन
रखें कि अल्लाह का तय किया हुआ समय ज़रूर आकर रहेगा; और वही हर चीज़ का सुननेवाला, जाननेवाला है। (5)
और जो लोग
(अल्लाह के रास्ते में) संघर्ष करते हैं, तो वे ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करते हैं----
अल्लाह को अपनी सृष्टि में किसी की भी ज़रूरत नहीं है----- (6)
और जो लोग (एक
अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो हम ज़रूर उनके बुरे कर्मों को (उनके
रिकार्ड से) मिटा देंगे, और उन्हें
उनके बेहतरीन कर्मों के हिसाब से (बदले में) इनाम देंगे। (7)
और हमने लोगों
को यह आदेश दिया है कि वे अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करें। किन्तु अगर
तुम्हारे माँ-बाप तुम पर ज़ोर डालें कि तुम मेरे सिवा, किसी ऐसे (देवता) को मेरे बराबर का ठहराओ, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानो: तुम्हें मेरी ही पास
लौटकर आना होगा, फिर मैं
तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुमने किया होगा। (8)
जो लोग ईमान
रखते हैं और अच्छे कर्म करते रहे, तो हम उन्हें अवश्य ही नेक लोगों के दर्जे
में शामिल करेंगे। (9)
लोगों में कुछ
ऐसे हैं जो यह कहते है कि "हम अल्लाह में विश्वास रखते हैं," मगर, जब अल्लाह के रास्ते में उन्हें कोई तकलीफ़
पहुँचती है, तो वे लोगों
की दी हुई सख़्त तकलीफ़ को अल्लाह की दी हुई सज़ा समझ बैठते हैं---- फिर भी, आपके रब की तरफ़ से [ऐ रसूल], जब आपको कोई मदद पहुँचती है, तो वे कहते हैं, "हम तो हमेशा से तुम्हारे साथ हैं।" क्या
जो कुछ दुनियावालों के सीनों में छिपा है, उसे अल्लाह अच्छी तरह नहीं जानता? (10)
अल्लाह ज़रूर
उन लोगों को पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो सचमुच ईमान रखते हैं, और कौन लोग हैं जो पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrite] हैं। (11)
जो लोग
(सच्चाई में) विश्वास नहीं रखते, वे ईमानवालों से कहते हैं, "तुम हमारे मार्ग पर चलो और हम तुम्हारे
गुनाहों (के नतीजे) को झेलने के लिए तैयार रहेंगे", हालाँकि वे ऐसा करने वाले तो हैं नहीं---
सचमुच वे बिल्कुल झूठे हैं। (12)
वे अपने
(गुनाहों का) बोझ अवश्य ही उठाएँगे, और इसके साथ दूसरों के (बोझ भी): क़यामत के
दिन उनके झूठे व फ़र्ज़ी दावों के बारे में ज़रूर पूछताछ होगी। (13)
हमने नूह [Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा। वह पचास कम एक हजार
साल [950 साल] उनके बीच
रहे, मगर जब तूफ़ानी
बाढ़ ने उन्हें घेर लिया, तब तक वे
शैतानियों में ही लगे हुए थे। (14)
फिर हमने उन्हें
और उनके साथ नौका में सवार लोगों को बचा लिया, और उस (घटना) को सारी दुनिया के लिए एक निशानी
बना दिया। (15)
और हमने
इबराहीम [Abraham] को भी भेजा, उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह की बन्दगी करो, और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो:
यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम सचमुच
समझ पाओ। (16)
तुम अल्लाह को
छोड़कर जिसे पूजते हो, वे तो बस
मूर्तियाँ हैं; और जो तुम
गढ़ते रहते हो, वे झूठी बातों
के सिवा कुछ नहीं है। तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, वे तुम्हें रोज़ी देने का कोई अधिकार नहीं
रखते, अतः तुम
अल्लाह से ही रोज़ी मांगा करो, उसी की बन्दगी करो, और उसका शुक्र अदा करो: तुम सभी को उसके पास
लौटकर जाना होगा। (17)
और अगर तुम
कहते हो कि यह बातें झूठी हैं (तो सावधान किया जाता है कि) तुमसे पहले भी कितने ही
समुदायों ने इसे झूठ ही बताया था। हमारे रसूल पर तो बस यही ज़िम्मेदारी है कि वह
साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से (अल्लाह के संदेश द्वारा) सचेत कर दे।" (18)
क्या वे नहीं
देखते कि अल्लाह किस तरह किसी चीज़ को (पहली बार) पैदा करता है, और फिर उसको दोबारा भी पैदा कर देता है? सचमुच यह अल्लाह के लिए बेहद आसान है। (19)
कहें कि, "धरती के बड़े हिस्सों में घूमो-फिरो और देखो
कि किस तरह अल्लाह ने सृष्टि की रचना की है: अगले जीवन में भी वह इसी तरह उन्हें
(दोबारा) पैदा कर देगा। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (20)
वह जिसे चाहे
दंड दे और जिसपर चाहे दया करे। और तुम सबको उसी के पास लौटकर जाना होगा। (21)
तुम न तो धरती
पर उससे बचकर निकल सकते हो, और न आसमानों में; और अल्लाह को छोड़कर कोई न होगा जो तुम्हें
बचा सके या तुम्हारी मदद कर सके।” (22)
और जिन लोगों
ने अल्लाह की उतारी गयी आयतों [Revelations] को और उससे जा मिलने की बात को मानने से
इंकार किया, उन्हें मेरी
तरफ़ से दया किए जाने की कोई आशा नहीं: उन्हें बड़ी दर्दनाक यातना होगी। (23)
इबराहीम [Abraham] की क़ौम के लोगों ने जवाब में बस इतना ही कहा
था, "मार डालो या
जला डालो!” मगर अल्लाह ने
इबराहीम को (नमरूद की लगायी हुई) आग से बचा लिया: विश्वास रखनेवालों के लिए सचमुच
इस (घटना) में (सीखने के लिए) निशानियाँ हैं। (24)
इबराहीम ने
उनसे कहा, "अल्लाह को
छोड़कर तुमने मूर्तियों को (ख़ुदा) चुना है (ताकि तुम्हारे दोस्त ख़ुश रहें), मगर उनसे यह तुम्हारा मेल-मिलाप केवल इसी
सांसारिक जीवन तक ही चल पाएगा: क़यामत के दिन, तुम एक-दूसरे को दोस्त मानने से इंकार करोगे
और एक-दूसरे को बुरा-भला कहोगे। जहन्नम (की आग) ही तुम्हारा ठिकाना होगा और
तुम्हारी मदद करने वाला कोई न होगा।" (25)
लूत [Lot] ने उन [इबराहीम] में विश्वास किया, औऱ कहा, "जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए, मैं यहाँ से उसी जगह जा रहा हूँ: अल्लाह सबसे
प्रभुत्वशाली और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखने वाला है।" (26)
हमने इबराहीम
को इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] (जैसी औलाद) दी, और उसकी संतानों में (कई लोगों को) पैग़म्बरी
[Prophethood] अता की और (कई
आसमानी) किताबें उन पर उतारीं। हमने बदले में उसे इस संसार में भी इनाम दिए और आने
वाली दुनिया [परलोक] में भी वह नेक बंदों में शामिल होगा। (27)
और (याद करें)
लूत [Lot] को: जब उसने
अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ऐसे बेशर्मी के [अश्लील] काम में लगे रहते
हो, जिसे दुनिया
में तुमसे पहले कभी किसी ने नहीं किया। (28)
किस तरह तुम
(मर्द लोग) मर्दों के पास (सेक्स की इच्छा से) जाते हो, यात्रियों का रास्ता रोककर ज़ोर-ज़बरद्स्ती
करते हो और अपने समारोहों में भद्दी हरकतें करते हो?" इस बात पर उसकी क़ौम के लोगों का जवाब बस यही
था, "तुम जो कहते
हो वह अगर सच है, तो ले आओ हम
पर अल्लाह की यातना!" (29)
तो लूत ने दुआ
की, "ऐ मेरे रब!
(समाज में) बिगाड़ पैदा करने वाले लोगों के मुक़ावले में मेरी मदद कर।" (30)
हमारे भेजे
हुए (फ़रिश्ते) जब इबराहीम के पास (उसके यहाँ बेटा होने की) ख़ुशख़बरी लेकर गए थे, तब उन्होंने (इबराहीम को) बताया, "हम उस (लूत के लोगों की) बस्ती [सुदोम] को
बर्बाद करने वाले हैं। निस्संदेह उस बस्ती के लोग शैतानी करने वाले हैं।" (31)
इबराहीम ने
कहा, "मगर वहाँ तो
लूत मौजूद हैं।" फ़रिश्तों ने जवाब दिया, "वहाँ कौन रहता है, यह बात हम आपसे ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं।
हम उसको और उसके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय उसकी पत्नी के: वह उन लोगों में शामिल
होगी जो पीछे छूट जाते हैं।" (32)
फिर जब हमारे
भेजे हुए फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह उनके वहाँ आने के मक़सद को सुनकर परेशान
और दुखी हो गया। फ़रिश्तों ने कहा, "आप डरें नहीं और न दुखी हों: हम आपको और आपके
घरवालों को ज़रूर बचा लेंगे, सिवाय आपकी पत्नी के----- वह उन लोगों में
शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं ---- (33)
हम इस बस्ती
के लोगों पर आसमान से एक भयानक यातना उतारने वाले हैं, इस कारण कि वे गंदे [अश्लील] कर्मों में लगे
हुए हैं।" (34)
हमने उस बस्ती
के कुछ हिस्से [खंडहर] को उन लोगों के लिए एक स्पष्ट निशानी के रूप में छोड़ दिया, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (35)
और मदयन [Midian] की तरफ़ हमने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की इबादत [उपासना] करो, और आने वाले अंतिम दिन [क़यामत] के बारे में
सोचो। शैतानियाँ न करो और धरती में बिगाड़ मत फैलाओ।" (36)
मगर उन्होंने
उसे झूठा कहा और अन्ततः भूकम्प ने उन्हें दबोच लिया। जब सुबह हुई, तो वे सब अपने घरों में मरे पड़े थे। (37)
और (याद करो)
आद और समूद की क़ौम को: (उनकी बर्बादी की कहानी) उनके घरों के बचे हुए खंडहरों को
देखकर तुम साफ़ तौर से समझ चुके हो। शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए सुहावना
बनाकर पेश किया, और उन्हें
सीधे मार्ग से रोक दिया, हालाँकि वे
समझ-बूझ रखनेवाले लोग थे। (38)
और (याद करें)
क़ारून [Korah] और फ़िरऔन [Pharaoh] और हामान को: मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ
लेकर आए, किन्तु
उन्होंने धरती पर बड़े घमंड से काम लिया। मगर वे हमसे बचकर नहीं निकल सकते थे। (39)
और अन्ततः
हमने हर एक को उसके गुनाहों के कारण दंड दिया: उनमें से कुछ पर तो हमने पत्थर
बरसाने वाली भयानक आँधी भेजी; कुछ को अचानक हुई एक ज़ोरदार आवाज़ ने आ लिया; कुछ को हमने ज़मीन में धँसा दिया; और उनमें से कुछ को हमने पानी में डुबा दिया।
अल्लाह तो ऐसा न था कि उन लोगों पर ज़ुल्म करता; मगर वे स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया करते
थे। (40)
जिन लोगों ने
अल्लाह को छोड़कर अपने लिए दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, उनकी मिसाल मकड़ियों जैसी है जो अपने लिए घर
बनाती हैं ---- और सच है कि सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का ही होता है--- काश वे
इस बात को समझ पाते! (41)
वे लोग अल्लाह
को छोड़कर जिस चीज़ [बुतों] को पुकारते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है: वह सबसे
प्रभुत्वशाली और समझ-बूझ रखने वाला है। (42)
हम ऐसी
मिसालें लोगों के (समझाने के) लिए देते हैं, परन्तु इनको समझ वही सकते हैं जो ज्ञान रखते
हैं। (43)
अल्लाह ने
आसमानों और ज़मीन को सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है। जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है। (44)
[ऐ रसूल] उस
किताब को पढ़कर सुनाएं जो आप पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजी गई है; नमाज़ को बराबर अदा करें: बेशक नमाज़ अश्लीलता
और बुरे आचरण से रोकती है। और अल्लाह को याद करते रहना सबसे बेहतर चीज़ है: जो कुछ
तुम करते हो अल्लाह (तुम्हारे) हर काम को जानता है। (45)
और [ऐ
मुसलमानो], किताबवालों
[यहूदी, ईसाई] से जब
बहस करना पड़े तो बेहतरीन ढंग से ही बहस करो, हाँ जो लोग उनमें से अन्याय करते हैं, उनकी बात अलग है। (उनसे) कहो, "हम विश्वास रखते हैं उस (किताब) पर जो हम पर
उतारी गयी, और उस पर भी
ईमान रखते हैं जो तुम पर उतारी गयी थी; हमारा ख़ुदा और तुम्हारा ख़ुदा एक ही है; और हम उसी की आज्ञा माननेवाले हैं।" (46)
इसी तरह हमने
[ऐ रसूल] आप पर किताब उतारी है, तो (मक्का के) लोगों में से जिन्हें [यहूदी व
ईसाई को] हमने पहले से किताब दे रखी थी वे उस (क़ुरआन) में विश्वास रखते हैं, और उन (मक्का के मूर्तिपूजकों) में से भी कुछ
लोग इस पर विश्वास रखते हैं। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं जो
(सच्चाई को) न मानने की ज़िद्द पर अड़े रहते हैं। (47)
[ऐ रसूल] यह
(किताब) जो आप पर उतारी गयी, उससे पहले आपने कभी कोई किताब न तो पढ़ी थी; और न ही कभी कोई किताब अपने हाथ से लिखी थी।
अगर आपने ऐसा किया होता, तो झूठे लोगों
को सन्देह करने का बहाना मिल गया होता। (48)
मगर नहीं, यह (क़ुरआन) तो (अल्लाह द्वारा) उतारी गयी है, और यह बात उन लोगों के दिलों में एकदम स्पष्ट
है जिन्हें ज्ञान दिया गया है। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं
जो शैतानी कामों में डूबे रहते हैं। (49)
वे [काफ़िर]
कहते हैं, "उस (रसूल) के
रब ने उसके पास कोई चमत्कार देकर क्यों नहीं भेजा?" आप कह दें, "चमत्कार तो बस अल्लाह के हाथ में है; मैं तो यहाँ केवल इसीलिए हूँ कि तुम्हें साफ़
तौर से सावधान कर दूँ।" (50)
क्या उन लोगों
के लिए यह बात काफ़ी नहीं कि हमने आप पर किताब उतारी, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है? उन लोगों के लिए सचमुच इसमें बड़ी रहमत [mercy] है, और सीखने के लिए सबक़ है जो ईमान रखते हैं।
(51)
कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह के रूप में
काफ़ी है: जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह (सब) जानता है। जो लोग झूठे (देवताओं) में
विश्वास रखते हैं, और (एक)
अल्लाह को नहीं मानते, वे सख़्त घाटे
में रहेंगे।” (52)
वे आपको (उनके
लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं: अगर अल्लाह ने इसका एक नियत समय पहले
ही तय न कर दिया होता, तो उनपर अब तक
यातना आ चुकी होती, मगर वह आएगी
ज़रूर, और इतनी अचानक
आएगी कि उन्हें ख़बर तक न होगी। (53)
वे आपको (उनके
लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं: सच्चाई से इंकार करने वालों को
जहन्नम अपने घेरे में ले लेगी, (54)
उस दिन जब
यातना उन्हें ऊपर से घेर लेगी और उनके अपने पाँव के नीचे से भी, तब उनसे कहा जाएगा, "अब चखो उसका मज़ा जो कुछ तुम किया करते
थे!" (55)
ऐ मेरे
ईमानवाले बन्दो! मेरी धरती विशाल व बहुत फैली हुई है, अतः तुम मेरी और केवल मेरी ही बन्दगी करो। (56)
हर जान [जीव]
को मौत का मज़ा चखना है, फिर तुम हमारे
ही पास लौटकर आओगे। (57)
जो लोग
(सच्चाई में) विश्वास [ईमान] रखते थे, और अच्छे कर्म करते थे, उन्हें हम बाग़ों [जन्नत] के ऊँचे महलों में
रहने की जगह देंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वे उसमें हमेशा रहेंगे। क्या ही अच्छा इनाम
है उन लोगों के लिए, जो (सही मार्ग
पर चलने के लिए) मेहनत करते हैं, (58)
(सच्चाई पर)
सब्र व धैर्य से जमे रहते हैं, और जो अपने रब पर भरोसा रखते हैं! (59)
कितने
जीव-जंतु ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी जमा करके नहीं रखते! अल्लाह ही उन्हें भी रोज़ी
देता है और तुम्हें भी: वही तो है जो सब कुछ सुनता है, और सब जानता है। (60)
और अगर तुम उन
(विश्वास न करनेवालों) से पूछो कि "किसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और
सूरज और चाँद को काम में लगा दिया?" तो वे ज़रूर कहेंगे, "अल्लाह ने!" तो फिर क्यों वे उस
(अल्लाह) से मुँह मोड़ते हैं? (61)
वह अल्लाह ही
है जो अपने बन्दों में से जिसे चाहता है भरपूर रोज़ी देता है और जिसे चाहता है, रोज़ी में कमी कर देता है: अल्लाह हर एक चीज़
की पूरी जानकारी रखता है। (62)
और अगर तुम
उनसे पूछो कि "कौन है जो आसमान से पानी बरसाता है, और उससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को फिर से ज़िंदा
कर देता है?" तो वे ज़रूर
बोल पड़ेंगे, "अल्लाह!"
आप कहें, "सारी प्रशंसा
अल्लाह ही के लिए है!" किन्तु उनमें से अधिकतर लोग बुद्धि से काम नहीं लेते। (63)
इस दुनिया की
ज़िंदगी तो बस खेल-तमाशा और दिल का भटकाव मात्र है; असल ज़िंदगी तो आने वाली दुनिया [परलोक] में
है, अगर वे सचमुच
जान पाते! (64)
जब कभी वे
पानी के जहाज़ों में सवार होते हैं, तो वे (मुसीबत में अपने देवताओं को छोड़कर)
अपनी पूरी भक्ति केवल अल्लाह में दिखाते हुए उसे ही पुकारते हैं। मगर जैसे ही वह
उन्हें सही-सलामत वापस ज़मीन पर ले आता है, तो क्या देखते हैं कि वे अचानक दूसरों को उस
(अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहराने लग जाते हैं! (65)
जो कुछ (नेमत)
हमने उन्हें दिया है उसके बदले में उन्हें कर लेने दो हमारी नाशुक्री [ingratitude]; और उड़ा लेने दो कुछ मज़े---- जल्द ही उन्हें
पता चल जाएगा। (66)
क्या वे देखते
नहीं कि हमने (उनके शहर मक्का को) एक शांत व सुरक्षित जगह बनाया है, जबकि उसके आसपास की जगहों में लोगों के साथ
छीना-झपटी होती है? तब भी, कैसे वे झूठी चीज़ में विश्वास रखते हैं और
अल्लाह के एहसानों को मानने से इंकार करते हैं? (67)
उस आदमी से
बड़ा शैतान कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता हो, या जब उसके पास सच्ची बात पहुँचे तो उसको
झूठी बताए? क्या (ऐसे)
इंकार करने वालों का ठिकाना जहन्नम नहीं होगा? (68)
जो लोग हमारे
मक़सद के लिए जी-तोड़ कोशिश करते हैं, उन्हें अवश्य ही रास्ता दिखाते हुए हम अपने
मार्ग पर लगा देंगे: अल्लाह हमेशा अच्छा कर्म करने वालों के साथ है। (69)
नोट:
6: मन की इच्छाओं पर क़ाबू पाना, शैतान के बहकावे से अपने को बचाना, अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाते हुए नसीहत
करना, और अल्लाह के रास्ते में लड़ना --- सब इस संघर्ष में शामिल
है।
8: अपने माँ-बाप के साथ हर हाल में अच्छा बर्ताव करना चाहिए; लेकिन अगर वह अल्लाह को छोड़कर किसी और को
ख़ुदा मानने पर मजबूर करें, तो उनकी बात मानना ठीक नहीं है, सो उन्हें नर्मी से मना कर दें।
10: ऐसे पाखंडी लोगों को जैसे ही तकलीफ़ पहुँचती है तो तुरंत
ही उनका विश्वास डगमगा जाता है और वे विश्वास न करने वालों से जा मिलते हैं। लेकिन
अगर मुसलमानों को अल्लाह की मदद से जीत मिल जाए तो ये पाखंडी लोग तुरंत उनसे मिल
जाने की कोशिश करते हैं ताकि उससे कुछ फ़ायदा उठा सकें।
13: जिन लोगों को उन्होंने गुमराह किया होगा, उनके गुनाहों का बोझ भी उन्हें उठाना होगा।
और जिसने गुनाह किया, वह भी सज़ा से बच नहीं पाएगा।
15: नूह (अलै.) की घटना सूरह हूद (11:25) में भी आयी है।
24: इबराहीम (अलै.) की घटना के लिए देखें सूरह अंबिया (21:
51)
26: “जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए”, अगर यह बात हज़रत इबराहीम (अलै.) ने कही है, तो इसका मतलब यह है कि आग से बच जाने के बाद
उन्होंने समझ लिया कि बाबिल (इराक़) में अब उनका रहना ठीक नहीं है जहाँ कोई उनकी
बात पर विश्वास करने वाला नहीं है, एक मात्र हज़रत लूत जो उनके भतीजे/ भांजे थे, उन्होंने ही आप पर विश्वास किया था। फिर
अल्लाह की मर्ज़ी से वह सीरिया की तरफ़ चले गए, उनके साथ लूत भी थे। बाद में अल्लाह ने लूत
अलै. को पैग़म्बर बनाकर सदूम और अमूरा की बस्तियों की तरफ़ अपना संदेश पहुँचाने के
लिए भेजा था।
अगर यह बात हज़रत लूत (अलै.) ने कही है, तो इसका मतलब होगा कि सदूम की तबाही के बाद
अब जहाँ अल्लाह की मर्ज़ी होगी, वहाँ चले जाएंगे।
31: इस घटना का ज़िक्र सूरह हूद (11: 69), और सूरह हिज्र (15: 51) में भी आया है।
37: देखें सूरह अ’राफ़ (7: 84) और सूरह हूद (11: 83)
38: मक्का से चलने वाले कारवाँ हमेशा यमन और सीरिया के
व्यापारिक मार्ग पर इन खंडहरों से होकर गुज़रते थे। देखें सूरह अ’राफ़ (7: 64-72), सूरह हूद (11: 64—72).
वे लोग दुनिया के कामों मे बड़े समझदार और होशियार थे, मगर आख़िरत/ [परलोक] की ज़िंदगी को बिल्कुल
भुलाए बैठे थे।
40: आद की क़ौम के मारे जाने का विवरण: सूरह अ’राफ़ (7: 64)
समूद की तबाही: सूरह क़सस (28: 75)
क़ारून को ज़मीन में धंसा देना: सूरह क़सस (28: 75)
41: बाहर से मकड़ी का जाला इतना कमज़ोर होता है कि वह मकड़ी को
बारिश या तेज़ हवा से बचा नहीं पाता, और अंदर से उनका पारिवारिक ढाँचा भी इतना
कमज़ोर होता है कि उनमें नर-भक्षण की प्रवृति पायी जाती है, जिसमें
मादा नर को खा जाती है, और बच्चे माँ को खा जाते हैं।
44: इस कायनात को बनाने का मक़सद यही है कि दुनिया में लोगों
को आज़माया जाए, और फिर लोगों के कर्मों के अनुसार उन्हें इनाम या सज़ा दी
जाए।
56: जब मक्का में मुसलमानों पर बहुत ज़ुल्म होने
लगा और वहाँ रहते हुए उन्हें अपने दीन पर चलना बहुत मुश्किल लगने लगा, तो इस आयत में यह इशारा किया गया है कि वे
कहीं ऐसी जगह चले जाएं जहाँ शान्ति से रहकर अपने दीन पर क़ायम रहा जा सकता है। इसी
के बाद कुछ लोग अबीसीनिया (हिजरत करके) चले गए थे।
57: यानी दूसरी जगह जाने में अपने लोगों और माल-असबाब छोड़ने
का जो डर होता है, वह बेकार का डर है क्योंकि एक दिन तो सबको मरना ही है और तब
ये सारी चीज़ें छूट जाएंगी।
60: दूसरी जगह चले जाने पर रोज़ी छिन जाने का डर भी होता है, लेकिन अल्लाह ही है जो जानवरों समेत सबको
रोज़ी देने वाला है।
67: मक्का एक सुरक्षित पनाहगाह मान जाता था। इसीलिए वहाँ
लड़ाई-झगड़े की अनुमति नहीं थी, और जो कोई मक्का में दाख़िल हो जाता (ख़ासकर
काबा के नज़दीक) तो वह सुरक्षित हो जाता। यह मक्का का एक ख़ास अधिकार था जो किसी और
शहर को प्राप्त नहीं था।
सूरह 31: लुक़मान
[हकीम लुक़मान / Sage Luqman]
यह एक मक्की
सूरह है, आयत 13-19 में हकीम
लुक़मान, जो कि अफ़्रीक़ा का एक बड़ा अक़्लमंद आदमी था
जिससे अरब के लोग परिचित थे, उसने अपने
बेटे को अल्लाह और लोगों के रिश्ते के हवाले से कुछ नसीहतें की हैं, जिसके नाम पर इस सूरह का नाम रखा गया है।
सूरह की शुरुआत में सच्चाई पर विश्वास करने वालों का विवरण है, और इसमें वैसे लोगों की निंदा की गई है जो
अल्लाह के एहसानों का शुक्र अदा नहीं करते, लोगों को सही
रास्ते से भटकाते हैं,
और मूर्तियों
को अल्लाह के बराबर ठहराते हैं। आगे अल्लाह की बेपनाह ताक़त का बयान है और विश्वास
न करनेवालों को चेतावनी दी गई है कि उनके कर्मों का नतीजा उन्हें भुगतना होगा।
पैग़म्बर साहब से कहा गया है कि वे लोगों द्वारा विश्वास करने से इंकार करने पर
दुखी न रहा करें।
विषय:
01-09: एक किताब जो
रास्ता दिखाने वाली है, उसका मज़ाक़
उड़ाया गया
10-11: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
12-19: अपने बेटे को हकीम लुक़मान की सलाह
20-26: विश्वास न करने वाले शुक्र अदा नहीं करते, और हठधर्म हैं
27: अल्लाह का भेजा संदेश ख़त्म नहीं होने वाला
28: पैदा करना और दोबारा ज़िंदा करके उठाना दोनों
एक-दूसरे से अलग नहीं है
29-32: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
33-34: क़यामत की घड़ी का आना पक्का है
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰
मीम॰ (1)
(जो आयतें उतर
रही हैं) यह गहरी समझ-बूझ से भरी हुई किताब [क़ुरआन] की आयतें हैं, (2)
मार्ग
दिखानेवाली हैं, और उनके लिए
रहमत [mercy] है जो अच्छा
कर्म करते हैं, (3)
जो नमाज़ को
पाबंदी से अदा करते हैं, ज़कात [दान]
देते हैं और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] पर पक्का विश्वास रखते हैं: (4)
वही हैं जिनको
रब ने सही मार्ग दिखाया है, और वही हैं जो कामयाब होंगे। (5)
लोगों में एक
ऐसा आदमी है जो (क़ुरआन से लोगों के) ध्यान को दूर हटा देने वाली चीज़ों [कहानी, खेल तमाशे] पर पैसे ख़र्च करता है, बिना किसी जानकारी के, इस इरादे से कि दूसरों को अल्लाह के रास्ते
से भटका सके, और उस (अल्लाह
के रास्ते का व उसकी निशानियों) का मज़ाक़ उड़ा सके। उसके लिए अपमानित करने वाली
यातना होगी! (6)
जब उसे हमारी
आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो वह नफ़रत व उपेक्षा से पीठ फेरकर चल देता
है, मानो उसने कुछ
सुना ही नहीं, या मानो कानों
से वह बहरा हो। यह ख़बर उसे सुना दें कि उसे बड़ी दर्दनाक यातना होगी! (7)
मगर जो लोग
(सच्चाई में) विश्वास [ईमान] रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए नेमत-भरे बाग़ [जन्नत, Garden of bliss]
हैं, (8)
जहाँ वे
(हमेशा) रहेंगे: यह अल्लाह का सच्चा वादा है, और वह बहुत प्रभुत्वशाली, और गहरी समझ-बूझ रखने वाला है। (9)
उसने आसमानों
को ऐसा बनाया है कि तुम देख सकते हो कि वह बिना किसी सहारे के थमा हुआ है, और उसने ज़मीन में मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया
ताकि तुम्हारे नीचे (की ज़मीन) हिले-डुले नहीं---- और उसमें हर प्रकार के जानवर
चारों ओर फैला दिए। और हमने आसमान से पानी बरसाया, जिससे हमने धरती पर हर प्रकार की अच्छी
वनस्पतियाँ उगा दीं: (10)
यह सभी चीज़ें
अल्लाह की रची हुई हैं। अब तुम ज़रा मुझे दिखाओ कि (अल्लाह को छोड़कर) जिन्हें तुम
पूजते हो, उन्होंने क्या
पैदा कर दिया है! नहीं, यह (सच्चाई
में) विश्वास न करने वाले साफ़ तौर से भटके हुए हैं। (11)
और हमने
लुक़मान को गहरी समझ-बूझ दी थी: “अल्लाह का शुक्र अदा करते रहो: जो कोई उसका
शुक्र अदा करता है, वह अपने ही
फ़ायदे के लिए ऐसा करता है, और वे लोग जो
उसके एहसानों को नहीं मानते ---- (तो वे जान लें कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है) उसे
किसी की ज़रूरत नहीं, वही सारी
प्रशंसा के लायक़ है।” (12)
लुक़मान ने
अपने बेटे को समझाते हुए कहा था, "ऐ मेरे बेटे! किसी को भी अल्लाह का साझेदार [Partner] मत ठहराना। अल्लाह के साथ (उसके अधिकारों में
किसी को) साझेदार ठहराना सचमुच बहुत भारी ग़लती है।" (13)
हमने लोगों को
अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करने पर बहुत ज़ोर दिया है: तकलीफ़-पे-तकलीफ़ सह के, उनकी माँ उन्हें अपने पेट में लिए फिरी, और दो वर्ष लगते हैं (बच्चों को) दूध छुड़ाने
में। सो तुम मेरा शुक्र अदा करो और साथ में अपने माँ-बाप का भी---- (अंत में) सबको
मेरी ही पास लौटकर आना है। (14)
अगर तब भी, वे [माँ-बाप] तुझ पर दबाव डालें कि तू मेरे
साथ किसी और को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [partner] ठहराए, जिसका तुझे (कोई किताबी) ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानना। मगर इसके बावजूद, अपनी ज़िंदगी में तुम उनके साथ भले तरीक़े से
रहना, और उन लोगों
के रास्ते पर चलना जो (पूरी भक्ति से माफ़ी के लिए) मेरी ओर झुकते हैं। और अंत में, तुम सबको मेरे ही पास लौटकर आना है, और फिर मैं तुम्हें वह सब कुछ बता दूँगा जो
तुम ने किया होगा। (15)
[लुक़मान ने यह भी
कहा], "ऐ मेरे बेटे! (याद
रखो) अगर राई के दाने के बराबर भी कोई चीज़ चट्टान के बीच में छिपी हो या आसमानों
और ज़मीन में कहीं भी हो, अल्लाह उसे सामने
हाज़िर कर देगा, क्योंकि अल्लाह
छोटी से छोटी चीज़ को देखनेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (16)
"ऐ मेरे बेटे!
नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो; लोगों को अच्छाई
की तरफ़ प्रेरित करो; बुराई से रोको; जो मुसीबत भी तुम पर पड़े उस पर धीरज से काम लो:
यही वे काम हैं जिन्हें करने का पक्का इरादा करना चाहिए। (17)
लोगों की उपेक्षा
करते हुए उनसे मुँह न मोड़ो, न ज़मीन पर अकड़कर चला करो, क्योंकि अल्लाह किसी अहंकारी और डींग मारने वाले
को पसन्द नहीं करता। (18)
जब चलो तो एक
अंदाज़ की चाल [न धीमी, न तेज़] से चला करो, और अपनी आवाज़ धीमी रखा करो, सचमुच आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों के
रेंकने की होती है।" (19)
[लोगो] क्या
तुम देखते नहीं कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन पर है, उन सबको अल्लाह ने किस तरह से तुम्हारे फ़ायदे
के लिए बनाया है, और उसने तुम
पर अपनी नेमतें [blessings] न्योंछावर कर
दी हैं--- तुम्हारे भीतर भी और तुम्हारे बाहर भी? तब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अल्लाह के विषय में
बहस करते हैं, जबकि न तो
उन्हें कोई जानकारी है, न कोई
मार्गदर्शन है और न उनके पास ऐसी कोई (आसमानी) किताब है जो सही रौशनी दिखा सके। (20)
जब उनसे कहा
जाता है कि "जो चीज़ अल्लाह ने उतारी है, उसको मानते हुए उस रास्ते पर चलो”, तो वे कहते हैं, "नहीं, हम तो उस रास्ते पर चलेंगे जिसपर हमने अपने
बाप-दादा को चलते हुए देखा है।" क्या! यहाँ तक कि शैतान उनको भड़कती हुई
(जहन्नम की) आग की यातना की ओर बुला रहा हो तब भी (वे बाप-दादा के रास्ते पर ही
चलेंगे)? (21)
जो कोई अपने
आपको अल्लाह के सामने पूरी भक्ति के साथ समर्पित करता हो, और वह अच्छे कर्म भी करता हो, तो सचमुच उसने बड़ा मज़बूत सहारा थाम लिया है, क्योंकि सारे मामलों का नतीजा तो अल्लाह ही
के हाथ में है। (22)
और जो कोई ऐसा
करने से इंकार कर दे, तो [ऐ रसूल]
उसका (आपकी बातों को मानने से) इंकार कर देना कहीं आपको बहुत दुखी न कर दे---- वे
सब हमारे ही पास लौटकर आएंगे और फिर जो कुछ वे किया करते थे, हम उन्हें सब बता देंगे---- निस्संदेह अल्लाह
दिलों के अंदर की बात तक जानता है----- (23)
हम उन्हें
(दुनिया में) कुछ समय के लिए थोड़ा मज़ा उड़ाने का मौक़ा देते हैं, मगर फिर हम उन्हें एक कठोर यातना की ओर
खींचकर ले जाएँगे। (24)
अगर आप उनसे
पूछें कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने।" कह दें, "तारीफ़ें भी सब अल्लाह के लिए हैं," मगर अधिकांश लोग नहीं समझते हैं। (25)
हर एक चीज़ जो
आसमानों में और ज़मीन पर है, सब अल्लाह की है। निस्संदेह अल्लाह तो
आत्मनिर्भर है (जिसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी प्रशंसा के लायक़ भी वही है। (26)
ज़मीन पर जितने
पेड़ हैं, अगर वे क़लम
बन जाएँ और सारे समंदर स्याही बन जाएं, और फिर उसके साथ सात समंदर और भी मिल जाएं, (और वह अल्लाह की तारीफ़ें लिखें) तब भी अल्लाह
की बातें समाप्त न हो सकेंगी: अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझ रखने वाला है। (27)
तुम सबको पैदा
करना और फिर दोबारा ज़िंदा करके उठाना (अल्लाह के लिए) तो बस ऐसा है, जैसे किसी एक आदमी को पैदा करना और फिर ज़िंदा
उठाना: अल्लाह सब कुछ सुनता और हर चीज़ देखता है। (28)
क्या आपने [ऐ
रसूल] देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता
है; और यह कि उसने
सूरज और चाँद को काम पर लगा रखा है, हर एक अपने नियत समय तक अपनी कक्षा में चलता
रहता है; और क्या तुम
नहीं जानते कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है? (29)
और यह सब कुछ
इस कारण से है कि अल्लाह ही सत्य है, और उसे छोड़कर जिन (बुतों) को भी वे पुकारते
हैं, वे झूठ हैं।
और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे महान है।
(30)
क्या [ऐ रसूल]
आपने देखा नहीं कि समंदर में नौकाएं अल्लाह की मेहरबानी से चलती हैं, ताकि वह तुम (लोगों) को अपनी कुछ निशानियाँ
दिखाए? सचमुच इसमें
हर उस आदमी के लिए निशानियाँ हैं जो धीरज [सब्र] से काम लेता है, और शुक्र अदा करता है। (31)
(पानी के
जहाज़ों पर) जब समंदर की लहरें किसी विशाल परछायीं की तरह छा जाती हैं, तो (उसमें बैठे हुए) लोग पूरी भक्ति से अपने
आपको केवल अल्लाह के सामने समर्पित करते हुए (मदद के लिए) पुकारते हैं, फिर जब वह उन्हें बचाकर किनारे तक पहुँचा देता
है, तो उनमें से
कुछ लोगों की सोच डगमगा जाती है (और वे अल्लाह को छोड़कर अपने बनाए हुए ख़ुदाओं को
याद करने लगते हैं) ---- हमारी निशानियों को मानने से इंकार केवल वही करता है जो
एक नम्बर का विश्वासघाती, और नाशुक्रा [Ungrateful] हो। (32)
ऐ लोगो! अपने
रब से डरते हुए बुराइयों से बचो, और उस दिन से डरो जब किसी भी तरह से न कोई
माँ-बाप (मदद के लिए) अपने बच्चे की जगह ले पायेगा और न ही कोई बच्चा अपने माँ-बाप
की जगह ले पायेगा। अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः देखना कि यह सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे
में न डाल दे, और न ही अल्लाह
के बारे में कोई (शैतान) धोखेबाज़ तुम्हें धोखे में डाल सके। (33)
निस्संदेह उस [क़यामत की] घड़ी का ज्ञान तो बस
अल्लाह ही को है; वही पानी
बरसाता है और वह जानता है कि माँ की कोख में क्या छुपा है, कोई भी आदमी नहीं जानता कि कल उसके कर्मों का
क्या फल मिलेगा, और कोई आदमी
नहीं जानता है कि उसकी मौत ज़मीन के किस हिस्से में होगी; वह तो अल्लाह है जो सब जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (34)
नोट:
6: मक्का में जिन लोगों ने अभी तक अल्लाह के संदेश को क़बूल
नहीं किया था, वे भी जब कभी क़ुरआन पढ़कर सुनायी जाती, तो उसे छुप-छुपकर सुना करते थे, और इसके नतीजे में कुछ लोग इससे प्रभावित
होकर मुसलमान बन जाते थे। इस सूरत में मक्का के सरदारों ने सोचा कि लोगों को किसी
तरह क़ुरआन से दूर रखा जाए। मक्का में “नज़र बिन हारिस” नाम
का एक व्यापारी था जो व्यापार के सिलसिले में दूर के देशों में जाया करता था, वह ईरान [फारस] से वहाँ के बादशाहों के
क़िस्सों पर आधारित एक किताब लाया था, और कुछ के अनुसार एक नाचने-गानेवाली लौंडी भी
लाया था। उसने लोगों से कहना शुरू किया कि मुहम्मद साहब जो पुराने क़िस्से बताते
हैं, उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प क़िस्से और गाने मैं तुम्हें
सुनाउंगा।
12: हज़रत लुक़मान के बारे में माना जाता है कि वह नबी नहीं
थे, बल्कि एक बहुत ही गहरी समझ-बूझवाले नेक आदमी थे। कुछ लोग
मानते हैं कि वह यमन के रहनेवाले थे, और हज़रत हूद (अलै.) के जो साथी यातना से बच
गए थे, उसमें वह भी शामिल थे, कुछ लोग कहते हैं कि वह हब्शा [इथोपिया] के
रहनेवाले थे। कुछ कहते हैं कि वह हज़रत दाऊद (अलै) के आसपास के ज़माने में थे।
बहरहाल, अरब के लोग उन्हें बहुत क़ाबिल व समझदार मानते थे, और उनके बीच उनकी अक़्लमंदी की बहुत सी बातें
मशहूर थीं।
13: “भारी ग़लती” के
लिए यहाँ "ज़ुल्म" शब्द आया है, ज़ुल्म का मतलब किसी का हक़ छीनकर दूसरे को दे देना होता है।
चूँकि इबादत किए जाने का अधिकार [हक़] केवल अल्लाह का ही है, इसलिए जब अल्लाह के साथ उसकी ख़ुदायी में
दूसरों को साझेदार बनाया जाता है, तो इसे ज़ुल्म कहा गया है।
15: मक्का में जब लोग आहिस्ता-आहिस्ता मुसलमान होने लगे, तो उनके साथ यह समस्या थी कि उनके माँ-बाप तो
अपने पुराने धर्म पर अड़े हुए थे और अपने बच्चों पर दबाव बना रहे थे कि वे भी
इस्लाम छोड़ दें। यहाँ यह बात साफ़ कर दी गयी कि माँ-बाप के साथ तो हर हाल मे अच्छा
व्यवहार करना है, लेकिन अगर वे सच्चाई को छोड़ने की बात पर ज़ोर दें, तो उनकी बात नहीं माननी चाहिए और नर्मी से
मना कर देना चाहिए।
25: मक्का के लोग यह मानते थे कि ज़मीन और आसमान को अल्लाह
ने ही पैदा किया है, मगर यह बात नहीं समझ पाते थे कि फिर इबादत [पूजा] किए जाने
के लायक़ भी केवल अल्लाह ही है।
सूरह 42: अश-शूरा
[राय-मशविरा/परामर्श, Consultation]
यह एक मक्की
सूरह है जिसका नाम आयत 38 से लिया गया है, जिसमें "सलाह-मशविरे [शूरा] की परम्परा को मुस्लिम
समुदाय की ख़ास विशेषताओं में एक बताया गया है। इस सूरह में इस बात की चर्चा की गई
है कि हमेशा से पैग़म्बरों का संदेश एक ही रहा है, मगर इंसानों को मज़हब के मामले में भेदभाव
पैदा करने और आपस में लोगों को बाँट देन की आदत होती है। इसके साथ-साथ अल्लाह की
हर चीज़ पर छायी हुई ताक़त, उसकी गहरी
समझ-बूझ और उसके अंतिम फ़ैसले के बारे में चर्चा की गयी है। सभी मज़हबों के एक होने
पर (आयत 13), और साथ ही पैग़म्बरों के लगातार आने पर भी ज़ोर
दिया गया है (आयत 3). पैग़म्बर साहब को याद दिलाया गया है कि आप
लोगों को सच्चाई पर विश्वास कर लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं, और यह कि लोगों के कर्मों के अनुसार ही फ़ैसला
होगा, और यह कि उनका
काम केवल लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँचा भर देना है। आयतों के उतरने की प्रकृति
का विवरण आयत 51-53 में आया है।
विषय:
03-06: अल्लाह की
महानता
07-08: क़ुरआन का मक़सद
09-12: अल्लाह की
क़ुदरत की निशानियाँ
13-15: बहुदेववादियों
के अलावा सबका एक ही दीन है
16-18: रसूल का
उत्साह बढ़ाना
19-26: (सच्चाई पर)
विश्वास करने वालों और विश्वास न करने वालों का अंजाम
27-35: अल्लाह की
क़ुदरत की निशानियाँ
36-46: ईमान
रखनेवालों और ईमान न रखने वालों का अंजाम
47-48: अपने गुनाहों
की माफ़ी माँगो
49-50: अल्लाह की
बादशाहत और ताक़त
51-53: संदेश उतारने
[Revelation] का ज़रिया
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हा॰ मीम॰ (1)
ऐन॰ सीन॰
क़ाफ़॰ (2)
अल्लाह जो
बहुत ताक़तवाला, और बड़ी गहरी
समझ-बूझ रखने वाला है, आप पर [ऐ
रसूल!], इसी तरह से 'वही'
[revelations] उतारता है
जैसा कि आपसे पहले गुज़र चुके (रसूलों पर) उतारता था। (3)
जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन पर है, सब उसी का है: वही है जो बड़ाई में सबसे ऊँचा
और महान है। (4)
फ़रिश्ते इस
तरह अपने रब की तारीफ़ के साथ उसका गुणगान करते रहते हैं, और धरती पर रहने वालों के लिए माफ़ी की
प्रार्थना करते रहते हैं कि लगता है कि आसमान ऊपर की तरफ़ से (इनके बोझ से) फट
पड़ेगा। (याद रखो!) अल्लाह सचमुच
सबसे बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान
है। (5)
और जिन लोगों
ने अल्लाह को छोड़कर अपने लिए कुछ दूसरे संरक्षक [Protector] बना रखे हैं, अल्लाह उन पर नज़र रखे हुए है; [ऐ रसूल], आप उनके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। (6)
अत: हमने आपकी
ओर अरबी में यह क़ुरआन उतार भेजी है, ताकि आप केंद्रीय शहर [मक्का], और उसके आसपास रहने वाले लोगों को (बुरे कर्मों
के नतीजे से) सावधान कर दें। और उनको उस दिन की (ख़ास करके) चेतावनी दे दें, जिस (क़यामत के) दिन सबको इकट्ठा किया जाएगा, जिसके आने में कोई सन्देह नहीं, जब एक गिरोह बाग़ [जन्नत] में जाएगा और एक गिरोह
(जहन्नम की) भड़कती हुई आग में। (7)
अगर ऐसा अल्लाह
चाहता, तो उन सबको एक
ही समुदाय बना देता, मगर वह जिस किसी
को चाहता है, उसे अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लेता है; शैतानियाँ करने वालों का न तो कोई रखवाला होगा
और न ही कोई मददगार। (8)
उन लोगों ने
अल्लाह को छोड़कर दूसरों को कैसे अपना रखवाला बना रखा है? रखवाला तो बस अल्लाह ही है; वही मुर्दों को जीवित करता है; और उसको हर चीज़ (करने) की ताक़त है। (9)
किसी चीज़ के
बारे में तुम जो कुछ भी मतभेद रखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह को ही करना है। [आप कह
दें], “ऐसा है अल्लाह, मेरा रब। उसी पर मैं भरोसा करता हूँ, और उसी के सामने (अपना
सिर) झुकाता हूँ, (10)
जो आसमानों और
ज़मीन का पैदा करनेवाला है।" उसने तुम लोगों में से ही तुम्हारे लिए जोड़े
बनाए --- और चौपायों के जोड़े भी--- ताकि तुम्हारी नस्ल बढ़ सके। कोई नहीं है जो
उसके जैसा हो: वह हर बात सुनता है, सब कुछ देखता है। (11)
आसमानों और ज़मीन
की सारी कुंजियाँ उसी के क़ब्ज़े में हैं; वह जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को ख़ूब बढ़ा
देता है और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है; उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है। (12)
धर्म के
मामलों में, उसने तुम
(लोगों) के लिए वही नियम-क़ायदे तय किए हैं जैसे आदेश उसने नूह [Noah] को दिए थे, और जो हमने [ऐ रसूल] आपके पास उतारा [revealed] है, और जिसका आदेश हमने इबराहीम [Abraham] और मूसा [Moses] और ईसा [Jesus] को दिया था: "तुम (इसी) दीन [धर्म] पर क़ायम रहो और उसके
अंदर अलग-अलग गुटों में न बँट जाओ" --- फिर भी, बहुदेववादियों [Idolaters] को जिस बात की तरफ़ आप बुला रहे हैं, वह चीज़ उन के लिए बहुत कठिन व भारी है; अल्लाह जिसे चाहता है उसे अपने लिए चुन लेता
है, और जो उसकी ओर
पूरी भक्ति के साथ (गुनाहों की माफ़ी के लिए) झुकता है, उसे अपने तक पहुँचने का रास्ता दिखा देता है।
(13)
आपसी ज़िद व
दुश्मनी के कारण वे लोग (धर्म के मामले में) बँट गए, हालाँकि ऐसा करने के समय तक उनके पास सच्चा
ज्ञान आ चुका था, और, अगर तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि तक के
लिए उन्हें मुहलत दिए जाने का आदेश पहले से ही पारित न हो गया होता, तो अब तक उनका फ़ैसला पहले ही हो चुका होता।
उनके बाद के लोग, जो (आसमानी)
किताब के वारिस [inheritor] हुए, वे उसके बारे
में संदेह के चलते सख़्त उलझन में पड़े हुए हैं। (14)
अतः [ऐ रसूल]
आप उन लोगों को उसी (सच्चे दीन) की ओर बुलाते रहें, और ख़ुद सीधे रास्ते पर चलते रहें, जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है। उन लोगों की
इच्छाओं का पालन न करें, और कह दें, "अल्लाह ने जो भी किताब उतारी है, मैं उसमें विश्वास रखता हूं। मुझे तो आदेश
हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह तो हमारा भी रब है और तुम्हारा भी
रब है --- हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म--- हमारे और तुम्हारे बीच (अब) कोई झगड़ा-बहस
नहीं होना चाहिए ---- अल्लाह हम सबको (एक दिन) एक साथ इकट्ठा करेगा, और अन्ततः उसी के पास सबको लौटकर जाना है।" (15)
रहे वे लोग जो
अल्लाह की पुकार को स्वीकार कर लेने के बाद भी, उस [अल्लाह] के विषय में (अभी तक) बहस करते
रहते हैं, उनके रब के
सामने ऐसी (झूठी) बातों का कोई मोल नहीं है: (अल्लाह का) क्रोध उन पर टूट पड़ेगा और
उनके लिए बड़ी दर्दनाक यातना होगी। (16)
वह अल्लाह ही
है जिसने सच्चाई पर आधारित किताब उतारी और (प्रकृति के नियमों का और इंसाफ़ का)
संतुलन स्थापित किया। तुम्हें क्या मालूम? शायद क़यामत की घड़ी जल्दी ही आ जाए: (17)
जो लोग उस
[क़यामत] में विश्वास नहीं रखते, वे चाहते हैं कि यह घड़ी जल्दी आ जाए, किन्तु जो इसमें विश्वास रखते हैं, वे तो उससे डरे-सहमे रहते हैं। वे जानते हैं
कि यह सत्य है; जो लोग उस घड़ी
के बारे में (सन्देह डालने वाली) बहसें करते रहते हैं, वे सही रास्ते से बहुत ज़्यादा भटके हुए हैं।
(18)
अल्लाह अपने
बन्दों [सभी जीवों] पर बेहद दयालु है; वह जिसे चाहता है रोज़ी (बढ़ा के) देता है; वह बहुत ताक़तवाला, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है। (19)
अगर कोई आदमी
आने वाली दुनिया [आख़िरत/परलोक] में (अपने लिए) फ़सल [harvest] चाहता है, तो हम उसकी फ़सल को और बढ़ाकर देंगे; और अगर कोई (केवल) इसी दुनिया की फ़सल चाहता है, तो हम उसे उसी में से कुछ हिस्सा दे देंगे, मगर (फिर) आने वाली दुनिया में उसका कोई हिस्सा
नहीं होगा। (20)
वे लोग ऐसे
(ठहराए हुए अल्लाह के) साझेदारों [Partners] पर कैसे विश्वास कर सकते हैं, जो उनके लिए दीन [Faith] के ऐसे तरीक़ों का हुक्म देते हैं जिसकी मंज़ूरी
अल्लाह ने दी ही नहीं? अगर अंतिम
निर्णय के बारे में अल्लाह का आदेश पारित न हो गया होता, तो उनके बीच फ़ैसला पहले ही किया जा चुका होता।
शैतानी करने वालों को बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी--- (21)
तुम उन
[ज़ालिमों] को देखोगे कि जो बुरे कर्म उन्होंने कर रखे हैं, उसके नतीजे में डरे-सहमे हुए होंगे: मगर सज़ा तो
उनको मिलकर ही रहेगी--- किन्तु जिन लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, वे (जन्नत में) फूलों से लदे हुए बाग़ों में
होंगे। अपने रब से वे जिस चीज़ की भी इच्छा करेंगे, उन्हें वह सब कुछ मिलेगा: यही सबसे बड़ा इनाम है; (22)
यही तो है वह
चीज़ जिसकी ख़ुशख़बरी अल्लाह अपने उन बंदों को देता है जो ईमान रखते हैं और अच्छे
कर्म करते हैं।
[ऐ रसूल] आप कहें, "मैं इस (अच्छाई की तरफ़ बुलाने के काम) के बदले
में तुमसे कोई मज़दूरी नहीं माँगता, बस नातेदारी के कारण थोड़ा सा स्नेह चाहता हूँ।” अगर कोई आदमी कुछ भलाई का काम करेगा, तो हम उसके लिए उसकी अच्छाई को और बढ़ा देंगे; अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला और (अच्छाई की) बहुत
क़द्र करने वाला है। (23)
वे ऐसा कैसे कह
सकते हैं कि "इस आदमी [रसूल] ने
अल्लाह के नाम से झूठी बातें गढ़कर बना ली हैं?"
अगर अल्लाह चाहता, तो आपके दिल को ठप्पा [Seal]
लगाकर बंद कर देता
और झूठ को मिटा देता:
अल्लाह अपने शब्दों से सच्चाई की पुष्टि करता है। जो कुछ सीनों में छुपा है, वह उसकी पूरी जानकारी रखता है--- (24)
वही तो है जो अपने
बंदों के (गुनाहों से) तौबा करने को क़बूल करता है और बुरे कर्मों को माफ़ करता
है---- (हालाँकि) जो कुछ तुम करते हो, वह सब जानता है। (25)
और वह उन लोगों की
दुआएं सुनता है जो (एक अल्लाह पर) ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और अपनी उदारता से उन्हें और ज़्यादा इनाम देता
है। रहे (सच्चाई से) इंकार करने वाले [काफ़िर], तो उनके लिए दर्दनाक यातना है। (26)
अगर अल्लाह अपने
(पैदा किए हुए) सभी जीवों के लिए रोज़ी को ख़ूब बढ़ा देता, तो वे धरती पर अकड़ते और बदतमीज़ी पर उतर आते। मगर
वह जितनी (रोज़ी) चाहता है, एक सही अंदाज़े के
साथ उतार भेजता है, क्योंकि वह अपने
बन्दों को अच्छी तरह से जानता है, और उनपर नज़र रखता है: (27)
जब लोग सारी
उम्मीद छोड़ चुके होते हैं, तो वही है जो
बारिश से राहत पहुँचाता है और अपनी रहमत [mercy] को दूर-दूर तक फैला देता है। वही है सबका रखवाला, हर प्रशंसा के लायक़। (28)
आसमानों और
ज़मीन की रचना और वे सारे जीवधारी जो उस (अल्लाह) ने इनमें चारों ओर फैला रखे हैं, अल्लाह की निशानियों में से हैं: वह जब कभी
चाहे, उन्हें एक-साथ
इकट्ठा करने की ताक़त भी रखता है। (29)
जो भी मुसीबत
तुम (लोगों) को पहुँचती है, वह तुम्हारे अपने हाथों किए गए कर्मों का
नतीजा है--- अल्लाह तो बहुत कुछ माफ़ कर देता है--- (30)
धरती पर तुम
कहीं भी उससे बचकर निकल नहीं सकते: अल्लाह को छोड़कर न तुम्हारा कोई संरक्षक है और
न कोई मददगार। (31)
उसकी
निशानियों में से हैं समुद्र में चलनेवाले (ऊँचे) जहाज़, जो पानी में तैरते हुए पहाड़ों जैसे लगते हैं: (32)
अगर वह चाहे, तो हवा को ठहरा दे, जिससे वे (जहाज़) समुद्र की सतह पर बिना किसी
हरकत के खड़े रह जाएँ --– सचमुच इसमें बड़ी निशानियाँ हैं हर उस आदमी के
लिए, जो धीरज से
काम लेता हो और शुक्र अदा करने वाला हो ---- (33)
या अगर वह
[अल्लाह] चाहे, तो यात्रियों
के (बुरे) कर्मों के चलते उन (जहाज़ों) को नष्ट कर दे --- वैसे अल्लाह बहुत माफ़
करनेवाला है ---- (34)
तो जो लोग
हमारे संदेशों में झगड़े निकालते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उनके लिए भाग
निकलने की कोई जगह नहीं है। (35)
तुम्हें जो
चीज़ मिली है, वह तो
सांसारिक जीवन की (तेज़ी से) समाप्त होने वाली सुख-सामग्री मात्र है। इससे कहीं
बेहतर और लम्बे समय तक बाक़ी रहने वाली चीज़ तो अल्लाह अपने उन बंदों को देगा, जो अपने रब में विश्वास और भरोसा रखते हैं; (36)
जो बड़े-बड़े
गुनाहों और अश्लील कर्मों [indecencies] से बचते है; जब उन्हें (किसी पर) ग़ुस्सा आता है तो वे
क्षमा कर देते हैं; (37)
अपने रब का
हुक्म मानते हैं; नमाज़ क़ायम
करते हैं; काम-काज के
मामलों में एक दूसरे से सलाह-मशविरा करते हैं; और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है
उसमें से दूसरों पर भी ख़र्च करते हैं; (38)
और जब उन पर
ज़ुल्म किया जाता है तो वे अपनी रक्षा करते हैं। (39)
बुराई
(नुक़सान) के बदले में ठीक उसी के बराबर बुराई (हानि) की जा सकती है, हालाँकि जो कोई माफ़ कर देता है और (मामले
में) सुधार करता है, तो उसका इनाम
उसे ख़ुद अल्लाह से मिलेगा --- वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता। (40)
अपने ऊपर
ज़ु्ल्म होने के बाद, अगर कोई आदमी
अपनी रक्षा करता है, तो उसके ख़िलाफ़
कार्रवाई करने का कोई कारण नहीं है, (41)
मगर उनके
ख़िलाफ़ ज़रूर क़दम उठाना चाहिए जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती पर न्याय की तमाम
सीमाओं को तोड़ डालते हैं---- ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना होगी---- (42)
किन्तु जो
आदमी धीरज से काम लेता है और क्षमा कर देता है, तो यह बहुत हिम्मत (और महानता) का काम है। (43)
जिस आदमी को
अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके बाद
कोई और नहीं होगा जो उसकी मदद कर सके: [ऐ रसूल], आप ज़ालिमों को देखेंगे कि जब वे यातना को देख
लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या अब लौटने का भी कोई रास्ता है?" (44)
और आप देखेंगे
कि उन्हें उस (जहन्नम की) आग के सामने इस हालत में लाया जाएगा कि बेबसी और अपमान
के कारण दबे हुए, और नज़रें चुरा
रहे होंगे। जबकि जो लोग ईमान रखते थे, वे उस समय कहेंगे कि "निश्चय ही असल घाटे में वही हैं जिन्होंने
क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया।" सचमुच! शैतान लोग [ज़ालिम] कभी न ख़त्म
होनेवाली यातना में पड़े होंगे; (45)
और उनके कोई
साथी व मददगार भी न होंगे, जो अल्लाह के
ख़िलाफ़ उनकी मदद कर सकें। (याद रहे) जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके लिए फिर (आगे बढ़ने का) कोई रास्ता
नहीं। (46)
[ऐ लोगो!] अपने
रब की बात उस दिन के आने से पहले-पहले मान लो जिसे अल्लाह की ओर से टाला नहीं जा
सकता--- उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण लेने की जगह होगी और न तुम्हारे लिए (अपने
गुनाहों से) इंकार करना संभव होगा। (47)
अगर वे तब भी
आपकी बातों से मुँह मोड़ें--- तो (याद रखें ऐ रसूल!) कि हमने आपको उन पर निगरानी
रखनेवाला बनाकर तो भेजा नहीं है: आप पर तो केवल संदेश पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी
है। हाल यह है कि जब हम आदमी को अपनी ओर से दयालुता का मज़ा चखाते हैं, तो वह बहुत ख़ुश होकर इतराने लगता है, और अगर ख़ुद अपने हाथों किए गए करतूत के कारण
ऐसे लोगों को जब कोई मुसीबत आ पड़ती है, तो वह बड़ा नाशुक्रा [कृतघ्न /ungrateful] बन जाता है। (48)
अल्लाह की ही
बादशाहत है आसमानों और ज़मीन पर; वह जो चाहता है पैदा करता है--- जिसे चाहता
है लड़की प्रदान करता है, और जिसे चाहता
है लड़का प्रदान करता है, (49)
या लड़के और
लड़कियाँ दोनों मिलाकर देता है, और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है: वह सब
कुछ जाननेवाला, बहुत ताक़तवाला
है। (50)
किसी इंसान की
इतनी हैसियत नहीं कि अल्लाह उससे (सीधे-सीधे) बात करे, बल्कि (अल्लाह की बात) 'वही'
[revelation] के द्वारा, या परदे के पीछे से (बिना दिखे) होती है, या यह कि वह एक संदेश लानेवाला (फ़रिश्ता)
भेज दे, जो अल्लाह के
हुक्म से 'वही' का संदेश पहुँचा दे: वह बहुत ऊँची शानवाला, बहुत समझ-बूझ रखने वाला है। (51)
और इस तरह, [ऐ रसूल] हमने अपने आदेश से आपकी ओर 'वही'
[revelation] के द्वारा एक
रूह [क़ुरआन] उतारी है: आप इससे पहले न यह जानते थे कि किताब क्या होती है और न यह
कि ईमान क्या होता है, मगर हमने इस
किताब [क़ुरआन] को एक रौशनी बनाया, जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे
चाहते हैं, मार्ग दिखाते
हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आप, लोगों को सीधा रास्ता दिखाते हैं, (52)
जो अल्लाह का
मार्ग है, वह अल्लाह, जिसके क़ब्ज़े में वह सब कुछ है जो आसमानों और
ज़मीन में है: हक़ीक़त यह है कि सारे मामले अंत में अल्लाह के ही ओर लौटेंगे। (53)
नोट:
8: यानी अल्लाह चाहता तो सबको ईमानवाला बना देता, मगर ऐसा नहीं है, बल्कि हर इंसान को यह आज़ादी दी गई है कि वह
सोच-समझकर सच्चाई को क़बूल करे या चाहे तो न करे। इसी के अनुसार आख़िरत में उसके
कर्मों का फ़ैसला होगा।
20: यही विषय सूरह इसरा/ बनी इसराईल (17: 18) में भी है, जिसमें कहा गया है कि जो आदमी केवल दुनिया की
भलाई चाहता है, उसको केवल दुनिया की ही नेमतें दी जाएंगी, लेकिन हर माँगी हुई चीज़ भी नहीं मिलती, बल्कि अल्लाह जिसको जितना देना चाहता है, उतना देता है।
23: मक्का के लोगों के साथ मुहम्मद (सल्ल) की रिश्तेदारियाँ थीं, मुहम्मद साहब अल्लाह का संदेश पहुंचाने के
लिए तो कोई फीस नहीं मांगते, बल्कि केवल इतना चाहते हैं कि मक्का के लोग कम से कम
नातेदारी का हक़ निभाते हुए उन्हें तकलीफ़ न पहुंचाएं, और उनके रास्तों में कांटे न बिछाएं।
51: "वही" की एक सूरत यह होती है कि अल्लाह जो बात कहना
चाहता है, वह किसी के दिल में डाल देता है।
52: "रूह" का मतलब (फ़रिश्ता) हज़रत जिबरील (अलै.) भी हो सकता
है, जिन्हें "रूह उल क़ुद्स" भी कहा
जाता है और अल्लाह ने अपने संदेश भेजने के लिए उन्हें ही चुना है।
सूरह 10: यूनुस [Jonah]
यह एक मक्की
सूरह है, जिसका नाम आयत
98 में आए यूनुस
अलै. के ज़िक्र से लिया गया है। इस सूरह में अल्लाह की ताक़त, क़ुरआन की प्रामाणिकता, और शैतानी करनेवाले लोगों के अंजाम के बारे
में ज़ोर दिया गया है। जो लोग अल्लाह द्वारा उतारी गई आयतों की सच्चाई पर और उसकी
निशानियों पर विश्वास करने से लगातार इंकार करते हैं, उन पर अल्लाह का ग़ुस्सा उतरता है, और इस मामले में सही बात यह है कि अगर अल्लाह
ने कर्मों के हिसाब-किताब के लिए क़यामत का एक दिन पहले ही तय न कर दिया होता, तो अब तक इन लोगों की ग़लतियों की सज़ा कबकी
मिल चुकी होती! रसूल को धीरज से काम लेने की सलाह दी गई है, और उन्हें याद दिलाया गया है कि वह लोगों को
विश्वास कर लेने के लिए ज़बरदस्ती मजबूर नहीं कर सकते। पिछली सूरह की तरह इस सूरह
में भी इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अल्लाह तौबा को क़बूल करता है, ख़ासकर यूनुस अलै. की क़ौम का हवाला दिया गया
है (आयत 98). मक्का के
लोगों को सावधान करने के लिए फिरऔन और नूह अलै. की क़ौम की कहानी सुनायी गई है, और फिर इसी को आगे बढ़ाते हुए अगली सूरह में
और विस्तार से चेतावनियाँ दी गई हैं।
विषय:
01 : किताब की
आयतें ज्ञान से भरी हैं
02 : रसूल या जादूगर
03-06: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
07-10: सज़ा और इनाम
11 : गुनाहगार अंधे हैं
12 : लोग शुक्र अदा नहीं करते
13-14: पिछली पीढ़ियों की सज़ा: एक चेतावनी
15-17: विश्वास न करने वाले क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते हैं
18-21: मूर्तिपूजा मूर्खता है
22-23: इस दुनिया की ज़िंदगी थोड़े दिनों की है
24 : इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल
25-27: इनाम और सज़ा
28-30: फ़ैसले के दिन का एक दृश्य
31-36: एक ही अल्लाह होने के प्रमाण
37-44: क़ुरआन केवल अल्लाह की तरफ़ से ही संभव है
45-56: कर्मों का हिसाब-किताब होना तय है
57-65: अल्लाह का फ़ज़ल और उसका ज्ञान
66-67: दूसरे ख़ुदाओं का स्तित्व बस एक ख़्याल है
68-70: अल्लाह की कोई औलाद नहीं
71-73: नूह (अलै) की कहानी
74 : दूसरे रसूल
75-89: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी
90-93: इसराईल की संतानों का मिस्र से निकलना और फिर बसना
94-100: रसूल को आशवासन
101-103: प्रकृति में फैली निशानियाँ और चेतावनियाँ इनके किसी काम की
नहीं
104-107: रसूल का दीन
108 : सच्चाई आ चुकी है
109 : आख़िरी में रसूल को सलाह
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰
रा॰
ये आयतें उस
किताब [क़ुरआन] की हैं, जो ज्ञान से
भरी हुई है। (1)
क्या लोगों के
लिए यह बड़े आश्चर्य की बात है कि हमने उन्हीं में से एक आदमी [मुहम्मद] पर अपनी
आयतें उतारी हैं, ताकि वह लोगों
को (सच्चाई से इंकार और बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे दे, और जो लोग विश्वास रखते हैं, उन्हें ख़ुशख़बरी सुना दे कि उनके रब के यहाँ
उन लोगों का ऊँचा दर्जा है? (तब भी) विश्वास न करनेवाले कहने लगे, "यह आदमी तो सचमुच एक जादूगर है।" (2)
तुम्हारा रब
तो वह अल्लाह है, जिसने आसमानों
और ज़मीन को छः दिनों में पैदा किया, फिर हर चीज़ की शासन-व्यवस्था चलाते हुए अपने
आपको सिंहासन पर स्थापित किया; कोई नहीं है जो उसके सामने सिफ़ारिश कर सके, सिवाय उसके जिसको अल्लाह ने पहले से (बोलने
की) इजाज़त दे रखी हो: यह है अल्लाह, तुम्हारा रब, अतः उसी की इबादत करो। तुम ऐसा कैसे कर सकते
हो कि इस पर ध्यान ही न दो? (3)
उसी के पास
तुम्हें (अंतत:) लौटकर जाना होगा---- यह अल्लाह की तरफ़ से पक्का वादा है। वही तो
है जिसने पहली बार (तुम्हें) पैदा किया था, और वह (मरने के बाद) दोबारा भी वैसे ही
(पैदा) करेगा, ताकि जिन
लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, तो उनके किए का बदला उन्हें न्याय के साथ दे
सके। विश्वास न करने वाले लोगों के पीने के लिए खौलता हुआ पानी और दुख-भरी यातना
होगी, और ऐसा इसलिए
होगा कि वे (सच्चाई को) मानने से इंकार करने के अपने फ़ैसले पर अड़े रहे। (4)
वही (अल्लाह)
है जिसने सूरज को तेज़ चमकता हुआ बनाया और चाँद को (उससे) रौशन बनाया, और (अपनी कक्षा में चलने के लिए) उसकी
मंज़िलें [Phases] निश्चित कर
दीं, ताकि तुम वर्षों
की गिनती और समय का अंदाज़ा मालूम कर सको। अल्लाह ने यह सब चीज़ें बिना किसी सही
मक़सद के यूँ ही नहीं बना दी; वह अपनी निशानियाँ उन लोगों को अच्छे ढंग से
समझाता है जो बातों को समझते हैं। (5)
रात के पीछे
दिन और दिन के पीछे रात के आने में, और जो कुछ अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन में
पैदा किया, इन सबमें उन
लोगों के लिए सचमुच बड़ी निशानियाँ हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते
हैं। (6)
जो लोग (मरने
के बाद) हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, और इसी दुनिया की ज़िंदगी से ख़ुश और उसी पर
संतुष्ट हो रहते हैं, और हमारी
निशानियों की ओर कोई ध्यान नहीं देते, (7)
तो जो कुछ वे
किया करते हैं, उसके नतीजे
में ऐसे लोगों के रहने की जगह (जहन्नम की) आग होगी। (8)
रहे वे लोग जो
ईमान [विश्वास] रखते हैं, और अच्छे कर्म
करते हैं, तो उनका रब
उनके ईमान की वजह से उनको सही रास्ता दिखाएगा। वे नेमतों के बाग़ [जन्नत] में होंगे
और उनके क़दमों तले नहरें बह रही होंगी। (9)
उनकी दुआ वहाँ
यह होगी, "महिमा है तेरी, ऐ अल्लाह (कि तू हर बुराई से पाक है!)", वे एक दूसरे से मिलने पर "सलाम"
[सलामती हो] कहेंगे, और उनकी दुआओं
का अन्त इस पर होगा, "सारी प्रशंसा
अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (10)
और (देखो!)
आदमी अपने फ़ायदे की चीज़ें हासिल करने के लिए जिस तरह जल्दी मचाता है, उसी तरह, अगर अल्लाह (उसके बुरे कर्मों के चलते) उसे
नुक़सान पहुँचाने में जल्दबाज़ी करता, तो उसका समय कबका पूरा हो गया होता!, मगर जो लोग (मरने के बाद) हमसे मिलने की
उम्मीद नहीं रखते, हम उन (सीमा
तोड़नेवालों) को उनकी सरकशी [Excesses] में अंधों की तरह भटकता छोड़ देते हैं। (11)
आदमी पर जब
कोई परेशानी आ जाती है, तो वह करवट
लेटे या बैठे या खड़े (चाहे जिस हाल में हो), हमको पुकारने लग जाता है। मगर जैसे ही हम
उससे उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं तो वह इस तरह (मुंह मोड़े हुए) चल देता है मानो
अपनी परेशानी दूर करने के लिए उसने कभी हमें पुकारा ही न था। इस तरह, ऐसे मर्यादाहीन लोगों की नज़र में उनके (बुरे)
कर्म, सुहावने [Attractive] बना दिए गए हैं। (12)
तुम लोगों से
पहले कितनी पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जब वे शैतानियाँ करने लगीं, तो (नतीजे में) हमने उनको तबाह-बर्बाद कर
दिया---- उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए थे, मगर उन लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर
दिया। तो (देखो!) अपराधियों को हम (उसके अपराध का) बदला इसी तरह दिया करते हैं। (13)
फिर उन
(पीढ़ियों) के बाद, हमने ज़मीन पर
तुम्हें उनका उत्तराधिकारी [successor] बनाया, ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो। (14)
उन लोगों के
सामने जब हमारी स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनायी जाती हैं, तो वे लोग जो (मरने के बाद) हमसे मिलने की
आशा नहीं रखते, कहते हैं, "यह नहीं, कोई दूसरी क़ुरआन ले आओ या इसमें कुछ फेर-बदल
कर दो।" [ऐ रसूल!], कह दें, "मुझे यह अधिकार नहीं है कि मैं अपने मन से
इसमें कोई फेर-बदल करूँ; मैं तो बस उसी
के हुक्म के पीछे चलता हूँ, जो मुझ पर 'वही' [Inspiration] द्वारा उतारी जाती है, क्योंकि अगर मैं अपने रब के हुक्म को न मानूँ, तो मुझे एक बड़े ज़बरदस्त दिन की यातना का डर
है।" (15)
कह दें, "अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो मैंने तुम्हें इस (क़ुरआन) को पढ़कर न
सुनाया होता, और न ही वह
तुम्हें इसकी जानकारी देता। आख़िर इस (क़ुरआन) के आने से पहले, मैं तुम्हारे बीच एक पूरी ज़िंदगी [40 साल] गुज़ार चुका हूँ। तो फिर तुम समझ-बूझ से
काम क्यों नहीं लेते?" (16)
उस आदमी से
ज़्यादा ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़े या उसकी (उतारी
हुई) आयतों को मानने से इंकार करे? (याद रहे) दोषी आदमी कभी फलता-फूलता नहीं
है।" (17)
वे अल्लाह के
साथ-साथ ऐसी चीज़ों को भी पूजते हैं, जो न उनको कोई नुक़सान पहुँचा सकती हैं और न
कोई फ़ायदा, और वे कहते
हैं, "ये अल्लाह के
यहाँ हमारी सिफ़ारिश करनेवाले हैं।" [ऐ रसूल!] कह दें, "क्या तुम सोचते हो कि तुम अल्लाह को कोई ऐसी
बात बता सकते हो, जिसके बारे
में उसे पता है कि आसमानों और ज़मीन में इसका कोई अस्तित्व नहीं है? महिमावान है वह! अल्लाह के साथ वे जिन
साझेदार-ख़ुदाओं को जोड़ते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा है! (18)
शुरू में सभी
इंसान एक ही समुदाय थे, मगर बाद में
वे अलग-अलग हो गए। और अगर आपके रब की तरफ़ से पहले ही (फ़ैसला टाल देने की) बात तय न
कर दी गयी होती, तो जिन बातों
में उनके बीच मतभेद रहा है, उनका फ़ैसला (इसी दुनिया में) पहले ही हो
चुका होता। (19)
वे कहते हैं, "उस (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार
वाली निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" तो [ऐ रसूल!] कह दें, "जिस चीज़ को हम देख नहीं सकते [ग़ैब/Unseen], उसे तो केवल अल्लाह ही जानता है, अत: इंतज़ार करो----- मैं भी (तुम्हारे साथ)
इंतज़ार करता हूँ।" (20)
लोगों को किसी
दु:ख-तकलीफ़ में पड़ जाने के बाद, जैसे ही हम अपनी दयालुता का मज़ा चखाते हैं, तो वे तुरंत हमारी उतारी हुई आयतों के ख़िलाफ़
चालबाज़ियाँ करने लग जाते हैं। [ऐ रसूल] आप कह दें, "(तुम्हारी चालों के जवाब में) अल्लाह योजना
बनाने में ज़्यादा तेज़ है।" (याद रहे) हमारे फ़रिश्ते तुम्हारी सारी
चालबाज़ियों को लिख लेते हैं। (21)
वही तो है
जिसने तुम्हारे लिए थल और जल में यात्रा करना संभव बना दिया, फिर जब कभी ऐसा होता है कि तुम पानी के
जहाज़ों में बैठकर अनुकूल हवा के सहारे चलते हुए जहाज़ का मज़ा ले रहे होते हो, कि अचानक समंदर में तूफ़ान आ जाता है: उस पर
सवार लोगों पर चारों तरफ़ से ऊँची-ऊँची लहरें आने लगती हैं और उन्हें लगने लगता है
कि अब यहाँ से बच पाना मुश्किल है। तब उस समय वे केवल अल्लाह के प्रति अपनी आस्था
दिखाते हुए दिल से उसे पुकारने लगते हैं, "अल्लाह! अगर तू हमें इस (मुसीबत) से बचा ले, तो हम ज़रूर तेरे आभारी [शुक्रगुज़ार]
रहेंगे।" (22)
मगर जैसे ही
वह उनको बचा लेता है, वैसे ही क्या
देखते हैं कि ज़मीन पर (सुरक्षित) वापस आते ही, वे मर्यादा तोड़ने और हर सही चीज़ के ख़िलाफ़
फ़साद मचाने लग जाते हैं। ऐ लोगो! एक सीमा से अधिक जो तुम्हारा उपद्रवी आचरण है, वह ख़ुद तुम्हारे ही विरुद्ध पड़ने वाला है। इस
दुनिया की ज़िंदगी के थोड़े मज़े ले लो; अंत में तो तुम्हें हमारे पास लौटकर आना ही
होगा और तब हम तुम्हें बताएंगे जो कुछ तुमने (दुनिया में) किया होगा। (23)
इस दुनिया की
ज़िंदगी की मिसाल ऐसी है: हमने आसमान से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगने वाली चीज़ें, जिनको आदमी और चौपाये खाते हैं, ख़ूब फली-फूलीं व घनी हो गयीं, मगर जब वह समय आया कि धरती ने (हरियाली के)
सारे ज़ेवर पहन लिए, और (लहलहाते
हुए खेतों व बाग़ों से) धरती सुंदर दिखायी देने लगी, और उसके मालिक समझने लगे कि अब फ़सल हमारे
क़ाबू में आ गयी है, कि अचानक
(उसकी बर्बादी का) हुक्म रात या दिन के समय आ पहुँचा। फिर हमने उसे एक उजड़ी-कटी
हुई फ़सल में बदलकर रख दिया, मानो एक दिन पहले तक वहाँ कोई भरा-पूरा खेत
ही न था। इस तरह, हम उन लोगों
के लिए (सच्चाई की) निशानियाँ [आयतें] खोल-खोलकर बताते हैं, जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (24)
मगर अल्लाह
(हर एक को) सलामती के घर [जन्नत] की तरफ़ बुलाता है, और जिसे चाहता है सीधे मार्ग पर लगा देता है; (25)
जिन लोगों ने
अच्छा व नेक कर्म किया, उनको इसका
बदला भी अच्छा ही मिलेगा, बल्कि इससे
ज़्यादा ही मिलेगा। उनके मुँह न तो (बुराइयों से) काले पड़ेंगे और न ही उनपर
शर्मिंदगी छाएगी: ऐसे ही लोग हैं जन्नत में रहनेवाले, और वे हमेशा वहीं रहेंगे। (26)
रहे वे लोग
जिन्होंने बुरे कर्म किए, तो हर एक
बुराई का बदला भी ठीक वैसा ही होगा, और बेइज़्ज़ती उन्हें चारों ओर से घेर
लेगी-----अल्लाह से उन्हें बचाने वाला कोई न होगा। ऐसा लगेगा मानो उनके चहरों पर
अँधेरी रात की पर्तें चढ़ा दी गयी हैं। ये वे लोग हैं जो (जहन्नम की) आग में रहने
वाले हैं, और वहीं वे
हमेशा रहेंगे। (27)
उस दिन हम उन
सबको एक साथ इकट्ठा करेंगे, फिर जिन लोगों ने अल्लाह के साथ (उसकी खुदायी
में) साझेदार [Partner] ठहरा रखे हैं, उनसे कहेंगे, "ज़रा अपनी जगह ठहरो, तुम भी और तुम्हारे बनाए हुए (ख़ुदा के)
साझेदार [Partner-gods] भी।" फिर
हम उन्हें अलग-अलग (समूह में) कर देंगे, और तब उनके ठहराए हुए (ख़ुदा के) साझेदार
कहेंगे, "हम वह नहीं
हैं जिसको तुम पूजते थे--- (28)
"हमारे और
तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है------ हमें तो कुछ पता ही नहीं था कि तुम
हमें पूजते हो।" (29)
हर आदमी उसी
वक़्त समझ जाएगा कि जो कुछ वह पहले किया करता था, उसकी हक़ीक़त क्या थी। उन्हें अल्लाह के पास
लौटकर जाना होगा, जो कि असली रब
है, और उनके गढ़े
हुए (ख़ुदा) उनको छोड़कर गुम हो जाएंगे। (30)
[ऐ रसूल!] उनसे
पूछें, "कौन है जो
तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है?, कौन है जिसके क़ब्ज़े में तुम्हारा सुनना और
देखना है? वह कौन है जो
ज़िंदा [सजीव] को मुर्दा [निर्जीव] से निकालता है और मुर्दा को ज़िंदा से निकालता है, और हर काम की व्यवस्था कौन करता है?" इस पर वे ज़रूर कह उठेंगे कि, "अल्लाह!" तब कहें, "तो फिर तुम (सच्चाई के इंकार से) डरते क्यों
नहीं?" (31)
यही अल्लाह है
जो तुम्हारा रब है, और यही सच्चाई
है। फिर सच्चाई के अलावा क्या बाक़ी बचता है, सिवाए रास्ता भटकने के? तो फिर तुम (सच्चाई से) मुँह फेरकर किधर चले
जा रहे हो? (32)
इस तरह से, जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया, उनके बारे में आपके रब की बात सही साबित हो
गयी----- वे विश्वास करनेवाले नहीं हैं। (33)
उनसे पूछिए, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए (खुदा के) साझेदारों
[Partner-gods] में कोई है जो
सृष्टि की रचना कर सकता हो, और फिर अंत में, (मरने के बाद) दोबारा उन्हें ज़िंदा कर सकता हो?" बता दें, "यह तो अल्लाह है जिसने पहले-पहल सृष्टि की
रचना की, और वही इसको
दोबारा ज़िंदा करेगा, तो देखो!
तुम्हारी उल्टी चाल तुम्हें कहाँ लिए जा रही है?" (34)
उनसे पूछिए, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए (ख़ुदा के) साझेदारों
[Partner-gods] में कोई है जो
सच्चाई का रास्ता दिखा सकता हो?", आप कहें, "अल्लाह सच्चाई का रास्ता दिखाता है। तो फिर
जो सच्चाई का रास्ता दिखाता हो, क्या वह इस बात का ज़्यादा हक़दार है कि उसकी
बात मानी जाए, या फिर उसकी
जो ख़ुद ही सही रास्ता न पा सके जब तक कि उसे कोई रास्ता न बता दे? (अफ़सोस तुम पर!) तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो?" (35)
उनमें से
अधिकतर लोग तो ऐसे हैं जो केवल (ग़लत) धारणाओं के पीछे चलते हैं, मगर सच्चाई के मुक़ाबले में (झूठी) धारणाओं का
तो कोई मूल्य हो ही नहीं सकता: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है। (36)
ऐसा नहीं हो
सकता कि अल्लाह के सिवा किसी और ने इस क़ुरआन को अपने मन से गढ़ लिया हो। यह तो उन
(आसमानी किताबों) की पुष्टि करती है जो इससे पहले उतारी जा चुकी हैं, और (अल्लाह की) किताब को विस्तार से साफ़-साफ़
बताती है----इस बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए -----यह सारे संसारों के रब की
तरफ़ से है। (37)
क्या फिर भी
वे कहते हैं, "इस आदमी
[मोहम्मद] ने ख़ुद ही इस (किताब) को लिख लिया है?", कह दें, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो इस जैसी एक ही सूरह लिख लाओ, और इस काम में मदद के लिए अल्लाह को छोड़कर, जिस किसी को बुलाना चाहो, बुला लो।" (38)
लेकिन जिस बात
को वे ठीक ढंग से समझ नहीं सकते, उसे मानने से इंकार कर रहे हैं----असल में, इसमें बतायी गयीं भविष्य की बातें अभी उनके
सामने नहीं आयी हैं। इसी तरह, इनसे पहले गुज़र चुके लोगों ने भी विश्वास
करने से इंकार किया था---- फिर देख लो, उन शैतानियाँ करने वालों का अंत कैसा हुआ! (39)
[ऐ रसूल!]
उनमें से कुछ लोग इस (क़ुरआन) पर विश्वास [ईमान] रखते हैं और कुछ लोग ऐसे हैं जो
ईमान नहीं रखते: आपका रब उन लोगों को अच्छी तरह जानता है जो फ़साद मचाते हैं। (40)
अगर वे आप पर
(समझाने के बावजूद) विश्वास न करें, तो [ऐ रसूल!] आप कह दें, "मेरा कर्म मेरे लिए है, और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। जो कुछ मैं
करता हूँ उसके लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं हो, और जो कुछ तुम करते हो उसकी ज़िम्मेदारी मुझ
पर नहीं है।" (41)
उनमें से कुछ
हैं जो आपकी सुनते तो हैं: मगर क्या आप किसी बहरे को सुना सकते हैं, अगर वह अपनी समझ-बूझ का इस्तेमाल नहीं करे? (42)
और उनमें से
कुछ ऐसे हैं, जो आपकी ओर
देखते हैं: मगर क्या आप अंधों को रास्ता दिखा सकते हैं, अगर वह देखें ही नहीं? (43)
सच्चाई यह है
कि अल्लाह लोगों पर ज़रा भी ज़ुल्म नहीं करता (कि उन्हें ज़बरदस्ती बहरा या अंधा बना
दे)---- असल में वही हैं जो अपने आप पर ज़ुल्म करते हैं। (44)
उस (क़यामत के) दिन
जब वह उन सबको (हश्र के मैदान में) इकट्ठा करेगा, तो ऐसा लगेगा जैसे वे (इस दुनिया में) एक घड़ी से
ज़्यादा नहीं ठहरे थे, और वे एक-दूसरे को
पहचान लेंगे। वे लोग बड़े घाटे में रहेंगे, जिन्होंने (आख़िरत में) अल्लाह से होने वाली
मुलाक़ात को मानने से इंकार किया, क्योंकि वे सही मार्ग पर नहीं चलते थे। (45)
[ऐ रसूल!] जिन
सज़ाओं की धमकी हमने उन (मक्का के विश्वास न करनेवालों) को दे रखी है, उनमें से कुछ सज़ाओं को हम चाहें तो (आपके जीवन
में ही) दिखा दें या हो सकता है कि (यातना आने से) पहले ही आपकी मौत आ जाए, लेकिन बहरहाल, उन्हें तो हमारी ओर लौटकर आना ही है: जो कुछ वे
करते हैं, उस पर अल्लाह गवाह
है। (46)
हर समुदाय [उम्मत]
के लिए एक रसूल भेजा गया है, और (क़यामत के दिन) जब उनके रसूल (गवाही देने के
लिए) आ जाएंगे, तो उनके बीच न्याय
के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा; और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (47)
विश्वास न
करनेवाले पूछते हैं, "अगर तुम अपनी बात
में सच्चे हो, तो यह बताओ कि
(अल्लाह की ओर से यातना आने का) वादा कब पूरा होगा?" (48)
[ऐ रसूल!] उनसे कह
दें, "मुझे जो नुक़सान या
फ़ायदा पहुंचता है, उसका नियंत्रण मैं
नहीं करता, बल्कि अल्लाह जो
चाहता है वही होता है। हर एक समुदाय के लिए एक नियत समय निश्चित है, और जब वह समय आ जाता है, तो घड़ी भर न तो उसमें देरी हो सकती है, और न घड़ी भर यह पहले हो सकता है।" (49)
कह दें, "ज़रा सोचो: अगर उसकी भेजी हुई यातना तुम्हारे पास
(अचानक) आ जाए, रात या दिन के
किसी समय, तो वह आख़िर
(यातना का) कौन सा भाग होगा जिसे ये अपराधी लोग चाहते हैं कि वह जल्दी आ जाए? (50)
क्या जब वह
(यातना) आ ही जाएगी, तब विश्वास करोगे? (उस समय तो कहा जाएगा), क्या अब (विश्वास कर लिया?), जबकि (पहले) तो तुम इसी के लिए बहुत जल्दी मचा
रहे थे!" (51)
फिर शैतानियाँ
करनेवालों से कहा जाएगा, "अब हमेशा होने
वाली यातना का मज़ा चख़ो! तुम्हें किसी और चीज़ के लिए बदला क्यों दिया जाएगा, वह तो उन्हीं (बुरे) कर्मों के लिए होगा जैसा कुछ
तुम करते रहे थे?" (52)
[ऐ रसूल!] वे
आप से पूछते हैं, "क्या यह सच है?", कह दें, "हाँ, मेरे रब की क़सम! यह बिल्कुल सच है, और तुम उससे बचकर निकल नहीं सकते।" (53)
(आने वाली
यातना इतनी भयानक होगी कि) हर वह आदमी जिसने ज़ुल्म व शैतानियाँ की हैं, अगर उसके पास धरती की सारी दौलत आ जाए, तो वह अपनी जान के बदले उसे देने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी
तैयार हो जाएगा। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे, मगर उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया
जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा। (54)
याद रखो!
आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब असल में अल्लाह का ही है: अल्लाह का वादा
सच्चा है, लेकिन
ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो यह बात नहीं जानते। (55)
वही है जो
ज़िंदगी भी देता है और मौत भी, और उसी के पास (अंत में) तुम सब को लौटकर
जाना होगा। (56)
ऐ लोगो!
तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से उपदेश [क़ुरआन] आ गया है, जो (तुम्हारे) दिलों के रोग की दवा है, और उन लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली व रहमत
[Mercy] है, जो इस पर यक़ीन रखते हैं। (57)
[ऐ रसूल!] कह
दें, "यह अल्लाह का
फ़ज़ल [Grace] और उसकी रहमत
है, और इस पर ज़रूर
ख़ुशी मनाना चाहिए: यह उन चीज़ों से कहीं बेहतर है, जिसे वे (दुनिया में) जमा करते रहते
हैं।" (58)
कह दें, "जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा की है, उसके बारे में ज़रा सोचो, उसमें से कुछ को तुमने (अपने मन से) हराम
[अवैध] और कुछ को हलाल [वैध] समझ लिया है।" कहें, "क्या अल्लाह ने तुम्हें ऐसा करने की अनुमति
दी है, या तुम अल्लाह
के बारे में झूठी बातें गढ़ रहे हो?" (59)
जो लोग अल्लाह
के बारे में झूठी बातें गढ़ते हैं, उन्होंने क़यामत के दिन को क्या समझ रखा है
(क्या उन्हें वहाँ होने वाले हिसाब-किताब की ख़बर नहीं)? सच यह है कि अल्लाह तो लोगों के लिए बड़ा फ़ज़ल
करनेवाला है, मगर उनमें
ज़्यादातर ऐसे हैं जो उसका शुक्र अदा नहीं करते। (60)
[ऐ रसूल!] आप
चाहे किसी मामले में लगे हुए हों, और क़ुरआन की कोई सी भी आयत पढ़कर सुनाते हों, और (लोगो) चाहे तुम कोई भी काम कर रहे हो, हम तुम्हें उन कामों को करते हुए देख रहे
होते हैं। यहाँ तक कि ज़मीन या आसमान में कोई चीज़ ऐसी नहीं जो आपके रब की नज़र से
ओझल हो, कण-भर हो या
उससे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी: सब कुछ एक स्पष्ट किताब में लिखा हुआ है। (61)
मगर वे लोग जो
अल्लाह की तरफ़ होते हैं, उन्हें न तो
कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (62)
ये वह लोग हैं
जिन्होंने विश्वास कर लिया [ईमान] और ज़िंदगी ऐसे गुज़ारी कि बुराइयों से बचते रहे, (63)
उनके लिए इस
दुनिया में भी (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी है और आने वाली दुनिया [आख़िरत] में
भी------और अल्लाह के किए हुए वादे कभी बदलने वाले नहीं---- यही असल में सबसे बड़ी
कामयाबी है। (64)
[ऐ रसूल!] आप
उन [इंकार करनेवालों] की बातों से दुखी न हो जाएं, सारी ताक़त व इज़्ज़त अल्लाह की ही है; वह सब कुछ सुनता है, सब जानता है; (65)
याद रखो!
आसमानों और ज़मीन में जितने भी जीव हैं, सब अल्लाह के हुक्म के ग़ुलाम हैं। जो लोग
अल्लाह को छोड़कर दूसरों को पुकारते हैं, वे सचमुच किसी ख़ुदा के साझेदार [Partner-gods] को मानते हुए उनके पीछे नहीं चलते; बल्कि वे तो बस अपनी मनगढ़ंत मान्यताओं के
पीछे चल रहे हैं और झूठ बक रहे हैं। (66)
वही है जिसने
तुम्हारे लिए रात का समय बनाया ताकि तुम उसमें आराम कर सको, और दिन को उजाला बनाया ताकि तुम देख
सको------ सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है, जो (सच्चाई को) सुनते हैं। (67)
वे कहते हैं, "अल्लाह औलाद रखता है!" महान है वह! वह
(अपने काम के लिए) किसी पर भी निर्भर नहीं; आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ उसी की है, उसी के लिए है। इस बात को कहने के लिए
तुम्हारे पास कोई प्रमाण [Authority] नहीं। तुम्हारी यह मजाल कि तुम अल्लाह के
बारे में ऐसी बातें कहते हो, जिसकी तुम्हें कोई जानकारी नहीं? (68)
[ऐ रसूल!] कह
दें, "जो लोग अल्लाह
के बारे में अपने मन से झूठी बातें बनाते हैं, वे कभी कामयाबी नहीं पाने वाले।" (69)
उनके पास इस
दुनिया का थोड़ा सुख हो सकता है, मगर फिर तो उन्हें हमारे पास लौटकर आना ही
है। फिर जो (सच्चाई में) विश्वास न करने पर अड़े होंगे, उसके बदले में हम उन्हें कठोर सज़ा का मज़ा
चखाएँगे। (70)
[ऐ रसूल!] आप
उन्हें नूह [Noah] की कहानी
सुनाएं। जब उसने अपनी क़ौम से कहा था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम लोगों के बीच
(मार्गदर्शन के लिए) मेरा मौजूद होना और अल्लाह की निशानियों को तुम्हें याद
दिलाना, अगर तुम्हें
भारी पड़ता है, तो फिर मेरा
भरोसा केवल अल्लाह पर है। मेरे ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई करना चाहते हो उसे आपस में तय
कर लो, तुम और
तुम्हारे ठहराए हुए ख़ुदा के साझेदारों [Partner-gods] ----- और इस बात में सकुचाने या छिपाने की ज़रूरत
नहीं है ---- फिर मेरे ख़िलाफ़ जो कुछ करने का फ़ैसला किया हो, कर डालो और मुझे कोई मुहलत न दो।" (71)
फिर भी तुमने
अगर मुँह मोड़े रखा, तो मैं
(मार्गदर्शन देने के लिए) तुम से कोई मज़दूरी [इनाम] तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के पास है, और मुझे यह आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में
शामिल रहूँ जो अल्लाह पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (72)
मगर उन लोगों
ने नूह [Noah] को मानने से
इंकार कर दिया। हमने नूह को और उन लोगों को, जो उनके साथ नौका में सवार थे, (तूफ़ान में डूबने से) बचा लिया और उन्हें ज़मीन
पर फिर से बसाया; और उन लोगों
को डुबा दिया, जिन्होंने
हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था----- तो देख लो, जिन्हें पहले ही (इंकार के नतीजे से) सावधान
किया गया था, उनका क्या
अंजाम हुआ! (73)
फिर उसके बाद
हमने बहुत सारे रसूलों को उनकी क़ौम के लोगों के पास भेजा जो स्पष्ट निशानियाँ लेकर
आए थे, मगर जिस चीज़
को वे पहले ही मानने से इंकार कर चुके थे, उस बात में (निशानियाँ देखकर भी) वे विश्वास
करनेवाले न थे: हम इसी तरह, हद से ज़्यादा फ़साद करने वालों कॆ दिलों को
मुहर लगाकर बंद [seal] कर देते हैं।
(74)
फिर उनके बाद
हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके दरबारियों के पास भेजा, मगर वे बड़े घमंड से पेश आए---- वे शैतान लोग
थे। (75)
हमारी तरफ़ से
जब सच्चाई उनके सामने आ गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादू है।" (76)
मूसा ने कहा, "क्या यही तुम्हारे विचार हैं सच्चाई के बारे
में, जबकि सच्चाई
अब तुम्हारे सामने आ चुकी है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो कभी फलते-फूलते नहीं हैं।" (77)
उन लोगों ने
कहा, "क्या तू हमारे
पास इसलिए आया है कि हमें उस दीन [Faith] से हटा दे जिस पर हमने अपना बाप-दादा को चलते
हुए पाया है, और इस सरज़मीन
पर तुम दोनों भाइयों की महानता स्थापित हो जाए? हम तो कभी भी तुम में विश्वास करनेवाले नहीं
हैं।" (78)
और फ़िरऔन ने
कहा, "हर क़ाबिल
जादूगर को मेरे पास ले आओ।" (79)
फिर जब जादूगर
आ गए, (और मुक़ाबला
शुरू हुआ) तो मूसा ने उनसे कहा, "(अपने दाँव में) जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो, फेंको।" (80)
फिर जब
जादूगरों ने (अपना दाँव) फेंका, तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ भी लेकर आए हो, वह तो जादू है। अल्लाह अभी दिखा देगा कि यह
सब बनावटी है।
अल्लाह शरारत करनेवालों के काम को कभी कामयाब
नहीं होने देता; (81)
"अल्लाह सच्चाई
को अपने हुक्म से सच कर दिखाता है, चाहे शैतानी करनेवाले उससे कितनी ही नफ़रत
करें।" (82)
मगर मूसा की
बात में किसी ने भी विश्वास न किया, सिवाए उसकी क़ौम के थोड़े से (जवान) लोगों के, क्योंकि उन्हें डर था कि फ़िरऔन और उनके
सरदार उन पर जुल्म ढाएंगे: फ़िरऔन था भी बड़ा दबंग, उसने धरती पर बहुत सिर उठा रखा था, औऱ वह बेहद ज़्यादती करनेवाला था। (83)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अगर तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो
और उसकी आज्ञा मानते हुए उसी के सामने झुकते हो, तो तुम्हें उसी पर अपना भरोसा रखना
चाहिए।" (84)
इस पर वे बोले, "हमने अल्लाह पर ही भरोसा किया है। ऐ हमारे
रब! तू हमें ज़ालिम लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल (कि हम उस ज़ुल्म के मुक़ाबले
में कोई कमज़ोरी दिखाएं) (85)
"हमें अपनी
रहमत [दयालुता] से उन लोगों से बचा ले, जो (तेरे संदेशों को) मानने से इंकार करते
हैं।" (86)
हमने मूसा और
उसके भाई को 'वही' [Revelation] द्वारा यह बताया: "अपने लोगों को मिस्र
के कुछ घरों में बसाओ, और उन घरों को
इबादत करने की जगह बना लो; (उनमें) नमाज़
पाबंदी से पढ़ने की व्यवस्था करो; और ईमान रखनेवालों को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी
दे दो!" (87)
और मूसा ने
(दुआ में) कहा, "हमारे रब!
तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को दुनिया की ज़िंदगी में बड़ी चमक-दमक की चीज़ें और
धन-दौलत दिए हैं, तो ऐ रब! क्या
यह इसीलिए है कि वे लोगों को तेरे मार्ग से भटकाएँ? ऐ हमारे रब! उनकी दौलत को मिटा दे, और उनके दिल को ऐसा कठोर कर दे कि वे उस समय
तक विश्वास न करें जब तक कि दर्दनाक यातना को सामने देख न लें।" (88)
अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों की दुआ क़बूल हो चुकी, अतः सही मार्ग पर डटे रहो, और उन लोगों के रास्ते पर न चलना, जो (सच्चाई को) नहीं जानते।" (89)
हमने इसराईल
की संतानों को (सुरक्षित) समंदर पार करा दिया। फ़िरऔन और उसकी सेना ने घमंड और
आक्रामकता के साथ उनका पीछा किया। मगर जब वह समंदर में डूबने लगा तो उस वक़्त पुकार
उठा, "मुझे विश्वास
हो गया है कि उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान रखती है।
मैं भी (अब) उसकी आज्ञा मानते हुए झुकता हूँ।" (90)
(हमने जवाब
दिया), "अब ईमान लाओगे? तुम तो हमेशा से विद्रोही रहे हो, एक फ़साद मचानेवाले! (91)
"आज हम (केवल)
तेरे शरीर को (डूबने से) बचा लेगें, ताकि तू बाद में आने वालों के लिए एक निशानी
बनकर रह जाए। हालाँकि बहुत-से लोग ऐसे हैं जो हमारी निशानियों की तरफ़ कोई ध्यान
नहीं देते।" (92)
हमने इसराईल
की सन्तानों को (फिलिस्तीन/सीरिया जैसी) अच्छी जगह पर बसा दिया, और उन्हें जीवन चलाने के लिए अच्छी रोज़ी
प्रदान की। फिर (सच्चे दीन पर) उनका आपस में मतभेद जब भी हुआ, उनके पास (कई रसूल) ज्ञान के साथ आते रहे थे।
(फिर भी) उनके बीच जिन बातों को लेकर मतभेद रहा था, आपका रब क़यामत के दिन उसका फ़ैसला कर देगा। (93)
अतः [ऐ रसूल!]
अगर आपको उस संदेश के बारे में कोई संदेह हो, जो हमने आप पर उतारा है, तो आप उनसे पूछ लें जो आपसे पहले से (आसमानी)
किताब पढ़ते रहे हैं। आपके रब की तरफ़ से आपके पास सच्चा संदेश आ चुका है, सो किसी सन्देह में न पड़ें और हमारी
निशानियों को मानने से इंकार न करें---- (94)
अन्यथा आप भी
घाटे में पड़ने वालों में हो जाएंगे। (95)
जिन लोगों के
ख़िलाफ़ आपके रब का फ़ैसला हो चुका है, वे कभी विश्वास नहीं करेंगे, (96)
चाहे उनके पास
हर एक निशानी क्यों न आ जाए, (ये उसी वक़्त विश्वास करेंगे) जब तक वे उस
दर्दनाक यातना को अपनी आँखों से देख न लें। (97)
काश कि कोई एक
भी बस्ती ऐसी होती जिसने (यातना के आने से पहले ही) विश्वास किया होता, और उसका ईमान उसके लिए फ़ायदेमंद सिद्ध होता!
हाँ, केवल यूनुस [Jonah] की क़ौम के लोगों ने ही (यातना से पहले) ऐसा
किया, जब उन लोगों
ने विश्वास कर लिया, तो हमने उस
अपमानजनक यातना को उन पर से टाल दिया जो सांसारिक जीवन में आने वाली थी, और उन्हें एक अवधि तक ज़िन्दगी के मज़े उठाने
का अवसर प्रदान किया। (98)
अगर आपका रब
चाहता तो ज़मीन पर जितने लोग हैं, वे सब के सब (एक अल्लाह में) विश्वास कर
लेते। तो क्या आप लोगों को विश्वास करने पर मजबूर कर सकते हैं? (99)
अल्लाह की
मर्ज़ी के बिना कोई जान ऐसी नहीं जो (सच्चाई में) विश्वास कर ले, और (उसका क़ानून यह है कि) वह उन लोगों की
इज़्ज़त गिरा देता है, जो बुद्धि से
काम नहीं लेते हैं। (100)
कह दें, "देखो ज़रा, आसमानों और ज़मीन में क्या क्या कुछ
है!" लेकिन ये (प्रकृति की) निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के किस काम की
हैं, जो विश्वास
करने वाले नहीं हैं? (101)
वे किस चीज़
के इंतज़ार में लगे हैं, क्या वे उस
सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं जैसी कि सज़ा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों को मिल चुकी
है? कह दें, "ठीक है, तब इंतज़ार करो, मैं भी तुम्हारे साथ इंतज़ार करता हूँ।"
(102)
अंत में (जब
यातना की घड़ी आ जाएगी तो) हम अपने रसूलों और विश्वास रखनेवालों को बचा लेंगे।
हमारी रीति के अनुसार, ईमान
रखनेवालों को बचा लेने की जिम्मेदारी ख़ुद हमारे ऊपर है। (103)
[ऐ रसूल!] आप
कह दें, "ऐ लोगो! अगर
तुम मेरे दीन [Faith] के बारे में
किसी सन्देह में पड़े हो, तो (सुन लो), तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, मैं उनकी इबादत [पूजा] नहीं करता, बल्कि मैं उस अल्लाह की इबादत करता हूँ जो
तुम्हें (एक दिन) मौत दे देगा, और मुझे आदेश हुआ है कि मैं (एक अल्लाह में)
विश्वास करनेवाला रहूँ। (104)
[ऐ रसूल], एक पक्के ईमानवाले की तरह (हर तरफ़ से हटकर)
अपना मुँह अल्लाह के दीन की तरफ़ जमा लें। और उन लोगों में से मत हो जाएं जो अल्लाह
के साथ (उसकी ख़ुदायी में) कोई साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं; (105)
(अल्लाह के
सिवा) किसी भी और (देवता) से दुआ न माँगें, जो न आपको फ़ायदा ही पहुँचा सकता है और न कोई
नुक़सान: अगर आपने ऐसा किया तो आप भी शैतानियाँ करने वालों में गिने जाएंगे। (106)
अगर अल्लाह
आपको किसी तकलीफ़ में डाल दे, तो कोई न होगा जो उसके सिवा उसे दूर सके, और अगर वह आपके लिए भलाई का इरादा कर ले, तो कोई नहीं है जो उसके फ़ज़ल [Bounty] को रोक सके; वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना फ़ज़ल करता है। वह बहुत माफ़
करनेवाला, बेहद दयावान
है।" (107)
आप कह दें, "ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से
सच्चाई पहुँच चुकी है। अब जो कोई सही मार्ग अपनाएगा, तो वह अपने ही भले के लिए ऐसा करेगा, और जो कोई सीधे मार्ग से भटकेगा, तो उससे नुक़सान उसी का होगा: मैं तुम्हारा
कोई अभिभावक [Guardian] नहीं हूँ (कि
तुम्हें मजबूर करूँ)।" (108)
(ऐ रसूल) जो
कुछ आप पर 'वही’ [Inspiration] द्वारा उतारा जा रहा है, आप उस पर चलते रहें, और अपने काम में धीरज के साथ जमे रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला कर दे, और वह फ़ैसला करने वालों में सबसे बेहतर है।
(109)
नोट:
1: "हकीम" का मतलब ज्ञान व समझ-बूझ से भरी
हुई; किसी मामले में फ़ैसला कर देने वाली या यह
बताने वाली कि उसे बिल्कुल सटीक बनाया गया है।
3: ज़मीन और आसमानों को छ: दिनों में पैदा किया, मगर हम जिसे एक दिन समझते हैं ये वैसा नहीं।
देखें 32: 5; और 70: 4
5: अल्लाह ने पूरी कायनात बिना मक़सद के नहीं
बनायी, बल्कि इसलिए बनायी है कि दुनिया में जिन
लोगों ने अच्छे काम किए उन्हें परलोक [आख़िरत] में इनाम मिले और जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, उन्हें सज़ा मिल सके।
19: पहले इंसान आदम (अलै) के समय तो सब एक अल्लाह
के मानने वाले थे, फिर आहिस्ता-आहिस्ता अलग-अलग समुदाय बनते गए
और उनकी मान्यताएं बदलती गईं। मगर अल्लाह ने कायनात की रचना करने से पहले ही यह तय
कर लिया था कि इंसानों के लिए दुनिया एक इम्तिहान की जगह होगी, लोगों को सही रास्ता दिखाने के लिए पैग़म्बरों
को भेजा जाएगा, लेकिन आदमी को यह आज़ादी होगी कि वह अपनी
मर्ज़ी से सही या ग़लत रास्ता चुन ले, फिर वह फ़ैसला
सुनाने में देर करता है,
और अंत में
कर्मों के हिसाब से उसे आख़िरत में इनाम या दंड देगा।
20: मुहम्मद (सल्ल) पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद
अपने मुँह से क़ुरआन पढ़कर सुनाते थे, जो कि ख़ुद ही
बड़ा चमत्कार था, लेकिन लोग विश्वास करने वाले नहीं थे, यहाँ बताया गया है कि चमत्कार दिखाना अल्लाह
की मर्ज़ी पर है, इसलिए उसके लिए इंतज़ार करो।
24: दुनिया की ज़िंदगी और उसकी चमक-दमक में जिसने
अपना दिल लगाया, तो फिर अचानक जब कोई यातना आ जाए या उसके
मरने का समय आ जाता है तो यह सब छोड़ते हुए उसे बहुत दुख-दर्द होगा, फिर तो एक दिन पूरी दुनिया ही ख़त्म हो जाएगी।
31: अरब के वे लोग जो सच्चाई पर विश्वास करने से
इंकार करते थे, वे भी मानते थे कि सारी कायनात की रचना
अल्लाह ने ही की है, मगर साथ में उनकी यह भी मान्यता थी कि अल्लाह
ने अपनी सारी शक्तियाँ अलग-अलग देवी-देवताओं में बाँट रखी हैं, इसलिए वे उन देवताओं को ख़ुश रखने के लिए उनकी
पूजा किया करते थे।
33: यानी उनकी तक़दीर में अल्लाह ने जो बात लिखी
थी कि वे अपनी हठधर्मी और सरकशी के कारण सही रास्ते को नहीं अपनाएंगे और सच्चाई पर
विश्वास नहीं करेंगे,
वही बात सही
साबित हुई।
37: यहाँ अल्लाह की किताब को विस्तार से बताने का
मतलब यह है कि अल्लाह ने जो क़ानून और तरीक़े का हुक्म ईमानवालों के लिए अपनी किताब
(लौह-महफ़ूज़/Preserved Tablet) में लिख रखा है, उसे क़ुरआन साफ़-साफ़ बताती है।
43: यह उन बुतपरस्तों के बारे में है जो सच्चाई
को देखने और सुनने में नाकाम रहे।
59: अरब के विश्वास न करने वाले लोगों ने अपने मन
से कुछ जानवरों को अपने देवताओं के नाम करके उन्हें खाने से मना [हराम] कर दिया था, देखें 6: 138-139
60: अल्लाह का फ़ज़ल यह है कि वह गुनाहों की सज़ा
देने में देर करता है,
और उन गुनाहों
से तौबा करने का समय देता है।
62: अल्लाह की तरफ़ वाले यानी अल्लाह के दोस्त
[औलिया अल्लाह], जो कि हर समय अल्लाह की याद में लगे रहते हैं, और अपने आपको बुराइयों से बचाकर रखते हैं।
इनके बारे में अल्लाह के रसूल ने कहा कि ये ऐसे होते हैं जिन्हें देखने से अल्लाह
की याद आ जाए।
73: नूह (अलै) की क़ौम के बारे में ज़्यादा विस्तार
के लिए देखें 11: 25-49.
87: कहा जाता है कि फ़िरऔन ने इसराइलियों पर काफ़ी
ज़ुल्म मचा रखा था, उनकी इबादतगाहों को तोड़-फोड़ दिया था, सो लोग डरे हुए भी थे, इसलिए उन्हें घरों में ही इबादत करने को कहा
गया।
92: फ़िरऔन की लाश पानी की सतह पर तैरती हुई मिली
थी, जिसे शायद निकाल लिया गया था। आधूनिक रिसर्च
के मुताबिक़ उस फिरऔन का नाम "मुनफ़िताह" [Remesis II] बताया जाता है जिसकी लाश को संभालकर क़ाहिरा [Cairo] के म्यूज़ियम में रखा गया है।
93: मिस्र में, येरुशलम में और दूसरी जगहों पर।
98: तबाही और यातना को आँख से देख लेने के बाद
विश्वास करने से कोई फ़ायदा नहीं है, क्योंकि वह माना
नहीं जाता। यातना आने से ठीक पहले भी अगर कोई सच्चाई पर विश्वास कर ले, तो ठीक है, जैसा कि यूनुस (अलै) की क़ौम ने किया था। जब
यूनुस (अलै) ने अपनी क़ौम को देखा कि वे किसी तरह सच्चाई पर विश्वास करने के लिए
तैयार नहीं हैं, तो उस बस्ती से यातना आने की धमकी देकर चले
गए, उसके बाद उनकी क़ौम के लोगों ने कुछ ऐसी
निशानियाँ देखीं, जिससे उन्हें सचमुच यक़ीन हो गया कि यातना आने
ही वाली है, अत: उन लोगों ने अपने गुनाहों की माफ़ी माँगी, सो अल्लाह ने यातना टाल दी। देखें 37: 139-148; 68: 48-50
99: सभी आदमी को अल्लाह ने यह आज़ादी दी है कि
अपनी मर्ज़ी से जिस दीन को चाहे अपना ले, किसी को एक
अल्लाह में विश्वास कर लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जो अपनी बुद्धि से
सच्चाई पर विश्वास करना चाहे, उसके लिए अल्लाह
रास्ता खोल देता है।
109: मक्का में ईमानवालों पर तरह-तरह के ज़ुल्म किए
जा रहे थे, मगर अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ सब्र व धीरज से
काम लेने के लिए कहा गया है, और लड़ने-मारने
की इजाज़त अभी तक नहीं दी गई है।
सूरह 34: सबा
[यमन में बसे
सबा के लोग, Sheba]
यह एक मक्की
सूरह है जिसका नाम यमन के इलाक़े में बसने वाले सबा के लोगों पर रखा गया है जिन पर
अल्लाह ने बहुत करम किया था, मगर उनके द्वारा शुक्र अदा नहीं करने की वजह
से उन्हें सज़ा मिली (आयत 15-21). पहले तो पैग़म्बर साहब को दाऊद और सुलैमान (अलै) के हवाले से उत्साह बढ़ाया गया
है कि कैसे अल्लाह ने उन पर बड़ा फ़ज़ल किया था। मक्का के विश्वास न करने वालों को
बताया गया है कि धन-दौलत नहीं, बल्कि अल्लाह पर सच्चा विश्वास ही उन्हें
अल्लाह के क़रीब ले जा सकता है, उन्हें क़यामत के दिन होने वाली सज़ा से भी
सावधान किया गया है। रसूल पर दीवानेपन के आरोप के दो हवाले दिए गए हैं (आयत 8 और 46) और फिर उस आरोप को रद्द किया गया है।
विषय:
01-02 : सारी तारीफ़ें
अल्लाह के लिए हैं
03-06: विश्वास न
करने वाले क़यामत के आने पर संदेह करते हैं
07-09: विश्वास न
करने वाले मरने के बाद दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते
10-14: दाऊद और
सुलैमान (अलै.)
15-21: सबा के लोग
22-24: मूर्तिपूजकों
को चुनौती
25 : हर आदमी का
उसके कर्मों के अनुसार फ़ैसला होगा
26 : अल्लाह फ़ैसला
करेगा
27 : मूर्तिपूजकों
को चुनौती
28 : रसूल का मिशन
29-30: क़यामत आने का
मज़ाक़ उड़ाया गया
31-33: कर्मों के
हिसाब-किताब का दृश्य
34-39: धन-दौलत और
ताक़त के नशे में डूबे लोगों पर फ़ैसला
40-42: जिन्नों की
पूजा
43-45: विश्वास न
करने वालों की आपत्तियाँ
46-50: रसूल का जवाब
51-54: कर्मों के
हिसाब-किताब का दृश्य
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हर तरह की प्रशंसा अल्लाह के लिए ही है, जो कुछ आसमानों में है और जो
कुछ ज़मीन में है--- सब अल्लाह का है। और आने वाली दूसरी ज़िंदगी [आख़िरत] में भी सब
तारीफ़ें उसी के लिए हैं। वही है जिसे (अपने हर काम की) गहरी समझ-बूझ है,
और हर चीज़ की ख़बर भी। (1)
वह उन सब
चीज़ों को जानता है जो कुछ धरती के भीतर जाती हैं और जो कुछ उससे बाहर निकलती हैं; और उनको भी जानता है जो आसमान से उतरती हैं
और जो कुछ उस पर चढ़ती हैं। और वही है जो बहुत दया [रहम] करने वाला और बड़ा माफ़
करने वाला है। (2)
तब भी, सच्चाई से इंकार करने पर अड़े हुए लोग [काफ़िर]
यह कहते हैं कि "हम पर क़यामत की घड़ी कभी नहीं आएगी।" कह दें, "क्यों नहीं? मेरे रब की क़सम, (वह ज़रूर आकर रहेगी!) क़सम है उसकी, जो हर अनदेखी चीज़ को जानता है! यहाँ तक कि
आसमानों और ज़मीन में कण-भर भी कोई चीज़ ऐसी नहीं जो उसकी नज़रों से ओझल हो सके, चाहे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी। हर एक चीज़ एक
स्पष्ट किताब [लौह-ए-महफ़ूज़] में लिखी हुई है (3)
ताकि वह
[अल्लाह] उन लोगों को इनाम दे सके जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे
कर्म किए: ऐसे लोगों के गुनाह माफ़ किए जाएंगे और उन्हें दिल खोलकर रोज़ी दी
जाएगी।" (4)
लेकिन जिन
लोगों ने हमारे संदेश [आयतों] के विरोध में काम किया, और उसके मक़सद को नाकाम करने की कोशिश की, उनके लिए बहुत ही दर्दनाक यातना होगी।
(5)
[ऐ रसूल] जिन
लोगों को ज्ञान दिया गया है वे स्वयं देख सकते हैं कि जो कुछ (संदेश) आपके रब की
तरफ़ से आपको भेजा गया है वह सत्य है, और वह उस (अल्लाह) के मार्ग की ओर ले जाता है
जिसके क़ब्ज़े में हर चीज़ की ताक़त है, और जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)
मगर (सच्चाई से)
इंकार करनेवाले [काफ़िर] लोग कहते हैं, "क्या हम तुम्हें एक ऐसे आदमी [रसूल] के बारे
में बताएँ जो यह दावा करता है कि जब तुम (मरने के बाद सड़-गलकर) चूर-चूर हो जाओगे, तब तुम्हें फिर से एक नए जन्म के साथ उठाया
जाएगा? (7)
क्या उसने
अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ ली हैं?, क्या वह दीवाना है?” बिल्कुल नहीं!, बल्कि जो लोग आने वाली दूसरी दुनिया [आख़िरत]
में विश्वास नहीं रखते, वे दर्दनाक
यातना झेलेंगे, क्योंकि वही लोग
हैं जो भारी ग़लती पर हैं। (8)
क्या वे लोग
आसमानों और ज़मीन में मौजूद उन चीज़ों के बारे में नहीं सोचते जो उनके आगे भी हैं और
उनके पीछे भी? अगर हम चाहें तो
उन्हें ज़मीन में धँसा दें या उन पर आसमान से कुछ टुकड़े गिरा दें। इसमें सचमुच एक
निशानी है हर उस बन्दे के लिए, जो (गुनाहों से) तौबा करने के लिए अल्लाह के
सामने झुकने वाला हो। (9)
हमने दाऊद [David] को अपनी तरफ से कुछ ख़ास ख़ूबियाँ दी थीं। हमने कहा, “जब वह [दाऊद] हमारी बड़ाई बयान करें तो ऐ
पर्वतो! तुम भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाया करो, और पक्षियों तुम भी!" हमने उसके लिए
लोहे को नर्म कर दिया था, (10)
और हुक्म दिया
कि "लोहे की कवचें [Chainmail] बनाओ और कड़ियों को ठीक अंदाज़े से जोड़ो, और तुम सब अच्छे कर्म करो, निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, मैं उसे देखता हूँ।” (11)
और (देखो!)
सुलैमान [Solomon] के लिए हमने
हवा को उनके वश में कर दिया था, जिसकी सुबह की यात्रा एक महीने में तय किए गए
रास्ते जितनी होती, और (वापसी
में) शाम की भी यात्रा एक महीने के रास्ते जितनी थी। और हमने उनके लिए पिघले हुए
ताँबे/पीतल का सोता [fountain] बहा दिया, और जिन्नों
में से भी कुछ (को उनके वश में कर दिया था, जो अपने रब के हुक्म से उनके अधीन काम करते
थे। उन (जिन्नों) में से कोई भी अगर हमारे हुक्म से फिरता, तो हम उसे (जहन्नम की) भड़कती आग का मज़ा
चखाते। (12)
वे जिन्न
सुलैमान के लिए वह सब कुछ बनाते जैसा वे चाहते थे ---- बड़े-बड़े (मेहराबवाले) भवन, प्रतिमाएँ, पानी के बड़े-बड़े हौज़ और ज़मीन में जमी हुई
देगें [cauldrons]। हमने कहा, "ऐ दाऊद के ख़ानदानवालो! तुम ऐसे कर्म किया करो
जिससे लगे कि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा करने वाले हो, क्योंकि मेरे बंदों में बहुत कम ही ऐसे लोग
हैं जो सचमुच शुक्र अदा करते हैं।" (13)
फिर जब हमने
सुलैमान की मौत का फ़ैसला किया तो उन (मज़दूरी करने वाले) जिन्नों को उनकी मौत का
पता किसी और से नहीं, बल्कि भूमि के
उस कीड़े से चला जो उनकी लाठी को खा रहे थे, (असल में लाठी पर टेका लगाए हुए उनकी मौत हो
गयी थी, फिर कीड़ों के
खाने से लाठी कमज़ोर पड़कर टूट गयी): फिर जब वह गिर पड़े, तब जाकर जिन्नों को उनके (मरने की) बात समझ
में आयी---- अगर वे (सुलैमान की मौत की) छुपी हुई अंदेखी बातों को जानते होते, तो (उनके मरने के बाद भी) इस अपमानजनक मज़दूरी
में लगे न रहते। (14)
सच्चाई यह है
कि (यमन में आबाद) सबा [Sheba] के लोगों के
लिए ख़ुद उस जगह एक निशानी मौजूद थी जहाँ वे रहा करते थे ---- दो बाग़ थे, एक दाहिनी तरफ़ और दूसरा बायीं तरफ़: "खाओ
अपने रब की दी हुई रोज़ी में से और उसका शुक्र अदा करो, कि एक तो ज़मीन इतनी अच्छी-सी और दूसरे रब
इतना माफ़ करने वाला।" (15)
मगर उन लोगों
ने (मार्गदर्शन पर) कोई ध्यान नहीं दिया, तो (नतीजे में) हमने उन लोगों पर (टूटे हुए)
बाँध का सैलाब छोड़ दिया और उनके दोनों बाग़ों के बदले में उन्हें ऐसे बाग़ दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल, झाऊ के पेड़ [Tamarisk bushes], और कुछ थोड़ी सी काँटेदार बेरियों के पेड़ [Lote tree] थे। (16)
यह दंड हमने
उन्हें इसलिए दिया कि उनलोगों ने नाशुक्री [कृतध्नता] की आदत अपना ली थी --- तो
क्या ऐसा दंड हमने किसी और को दिया सिवाए उनके जो बड़े नाशुक्रे [ungrateful] लोग थे? (17)
और हमने उनके
[यमन के] और उन बरकतवाली बस्तियों [सीरिया व फ़िलिस्तीन के इलाक़े] के बीच कुछ दूसरी
बस्तियाँ बसा रखी थीं जो दूर से दिखायी देती थीं, और उनकी आसानी के लिए सफ़र को कई पड़ावों में
बाँट रखा था --- (और कहा था), "चाहे रात का समय हो या दिन का, इन (बस्तियों) में बिना डरे यात्रा
करो"--- (18)
मगर (तब भी), उन्होंने कहा, "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव
डालने वाली जगहों के बीच बहुत लम्बी दूरी रख दी है।" (इस तरह) उन्होंने स्वयं
अपने आप पर ही ज़ुल्म किया, और अंत में, नतीजा यह हुआ कि हमने उन्हें (अतीत की)
कहानियाँ बना डाला, औऱ उन्हें
टुकड़े-टुकड़े करके बिल्कुल छिन्न-भिन्न कर डाला। सचमुच, इस घटना में हर एक धीरज रखने वाले और शुक्र
अदा करने वाले आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं। (19)
सचमुच, उन लोगों के बारे में शैतान [इबलीस] का विचार
सही साबित हुआ, और सब लोग उसी
(शैतान) के रास्ते पर चल पड़े--- केवल ईमानवालों के एक गिरोह को छोड़कर ---- (20)
हालाँकि उस
(शैतान) का उन लोगों पर कोई क़ब्ज़ा नहीं था। मगर (शैतान को बहकाने की क्षमता इसलिए
दी कि) हम चाहते थे कि जो लोग आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत] पर विश्वास रखते हैं और जो
लोग इसके बारे में सन्देह में पड़े हुए हैं --- उन दोनों के बीच का अंतर साफ़-साफ़
पता चल जाए: [ऐ रसूल] आपका रब हर चीज़ पर निगरानी रखता है। (21)
[ऐ रसूल] आप कह
दें, "पुकारकर देखो
उनको, जिन्हें तुमने
अल्लाह को छोड़कर अपना ख़ुदा बना रखा है: आसमानों और ज़मीन में कण- भर चीज़ भी उनके
नियंत्रण में नहीं है, न ही (किसी
मामले में अल्लाह के साथ) उनका कोई हिस्सा है और न उनमें से कोई अल्लाह के किसी
काम में सहायक है।" (22)
और उस
[अल्लाह] के सामने कोई सिफ़ारिश काम नहीं आएगी, सिवाए उस आदमी के जिसके लिए उसने ख़ुद
(सिफ़ारिश करने की) अनुमति दी हो। (क़यामत के दिन) जब उनके दिलों से घबराहट दूर कर
दी जाएगी, तो उनसे पूछा
जाएगा, "तुम्हारे रब
ने क्या कहा?" वे जवाब देंगे, "सच्ची बात। और वह सबसे ऊँचा, सबसे महान है।" (23)
[ऐ रसूल] आप कह
दें, "कौन है जो
तुम्हें आसमानों और ज़मीन में रोज़ी देता है?" बता दें, "अल्लाह!" (ही देता है!)। अब अवश्य ही हम
(में से कोई एक गिरोह) सही मार्ग पर है और दूसरा साफ़ तौर से सही मार्ग से भटक चुका
है।” (24)
कह दें, "जो अपराध (गुनाह) हम से हुआ हो, उसके बारे में तुम से नहीं पूछा जाएगा, और जो कुछ तुम करते हो, उसके बारे में हम से कोई सवाल नहीं पूछा
जाएगा।" (25)
कह दें, "हमारा रब हम सबको (क़यामत के दिन) एक साथ
इकट्ठा करेगा, फिर हमारे बीच
ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा; और वही तो है
फ़ैसला करने वाला जो सब कुछ जानता है।" (26)
कह दें, "मुझे ज़रा दिखाओ तो कि कौन हैं जिनको तुमने उस
(अल्लाह) के साथ हिस्सेदार [Partner] के रूप में जोड़ रखा है। हरगिज़ नहीं! अल्लाह
तो केवल वही है (उसका कोई साझेदार नहीं), सारी ताक़त भी उसी की, और सारी समझ-बूझ भी उसके ही पास है।" (27)
हमने तो आपको
[ऐ रसूल] भेजा ही इसीलिए है, कि तमाम लोगों को अच्छी ख़बर भी सुना दें और
चेतावनी भी दे दें, मगर अधिकतर
लोग समझते नहीं हैं। (28)
और वे (आपसे)
कहते हैं, "तुम जो भी
कहते हो अगर वह सच है, तो यह (क़यामत
का) वादा कब पूरा होगा?" (29)
कह दें, "तुम्हारे लिए (वादे के मुताबिक़) एक ख़ास दिन
में मिलने का समय तय किया हुआ है, जिसे एक घड़ी भर के लिए भी तुम न तो आगे बढ़ा
सकते हो और न पीछे हटा सकते हो।" (30)
और (सच्चाई
से) इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] कहते हैं, "हम न तो इस क़ुरआन पर विश्वास करेंगे और न ही
उन (आसमानी किताबों) पर जो इससे पहले आ चुकी हैं।" अगर [ऐ रसूल], आप उस वक़्त का हाल देख पाते जब शैतानी
करनेवाले लोग अपने रब के सामने खड़े किए जाएँगे, और कैसे वे एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा रहे
होंगे। जिन लोगों पर कमज़ोर समझकर (दुनिया में) ज़ुल्म किया गया था, वे अपने उन ज़ालिमों से कहेंगे, "यदि तुम न रहे होते, तो हम ज़रूर ही (अल्लाह में) विश्वास रखनेवाले
[believers] होते।" (31)
ज़ालिम लोग
जवाब में उनसे कहेंगे, "जब सही मार्गदर्शन तुम्हारे पास आ चुका था, तो उन्हें अपना लेने से क्या हमने तुम्हें
रोका था? नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही गुनाहगार हो।" (32)
कमज़ोर समझे
गए लोग ज़ालिमों से कहेंगे, "नहीं! बल्कि यह तुम्हारी रात-दिन की मक्कारी ही तो थी (जिसने हमें रोका था) कि
तुम हम पर ज़ोर डालते रहते थे कि हम (एक) अल्लाह में विश्वास न करें और दूसरों को
उसके बराबर का साझेदार [Partner] ठहराएँ।" जब वे यातना देख लेंगे तो अपनी शर्म छुपाते हुए मन ही मन
पछताएँगे, और हम उन
इंकार पर अड़े लोगों की गर्दनों में लोहे का तौक़ [iron collar] डाल देंगे। जो कुछ कर्म उन्होंने किए हैं, किस तरह मुमकिन है कि उसका बदला उन्हें कुछ
और दिया जाए? (33)
और ऐसा हमेशा
ही हुआ कि जब भी हमने किसी बस्ती में कोई सावधान करने वाला [पैग़म्बर] भेजा, तो वहाँ धन-दौलत के नशे में डूबे हुए लोगों
ने यही कहा कि "जो कुछ संदेश देकर तुम्हें भेजा गया है, हम तो उसको नहीं मानते।" (34)
वे यह भी कहते
कि "हम तो धन और संतान में तुमसे कहीं बढ़कर हैं, और हमें कोई यातना मिलने वाली नहीं है।"
(35)
आप कह दें, "इस में शक नहीं कि मेरा रब जिसके लिए चाहता
है रोज़ी को बढ़ा-चढ़ाकर देता है, और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता
है, हालाँकि
अधिकांश लोग यह बात समझते नहीं हैं।" (36)
याद रहे कि न
तुम्हारी धन-दौलत और न तुम्हारी सन्तान ऐसी चीज़ है जो तुम्हें हमसे नज़दीक कर दे।
हाँ, मगर जिन लोगों
ने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों के बदले में कई
गुना इनाम दिया जाएगा, और वे (जन्नत
के) ऊँचे कक्षों में आराम से निश्चिन्त होकर रहेंगे, (37)
रहे वे लोग
जिन्होंने हमारे संदेशों [आयतों] का विरोध किया और उसके प्रभाव को घटाने की कोशिश
में लगे रहे, ऐसे लोगों को
कड़ा दंड देने के लिए वहाँ हाज़िर किया जाएगा। (38)
कह दें, "मेरा रब अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता
है रोज़ी को ख़ूब बढ़ाकर देता है और जिसके लिए चाहता है रोज़ी में तंगी कर देता है; और (अल्लाह के रास्ते में) जो कुछ भी तुम
किसी को देते हो, उसके बदले में
वह तुम्हें और देगा; और वही सबसे
बेहतर रोज़ी देने वाला है।" (39)
और जिस दिन वह उन
सबको एक साथ इकट्ठा करेगा, फिर फ़रिश्तों से
कहेगा, "क्या सचमुच यह लोग
तुम्हारी पूजा करते थे?" (40)
वे जवाब देंगे, "महान है तू! तू ही ऐसे लोगों से हमें बचाने वाला
और मदद करने वाला है! असल बात यह है कि वे जिन्नों [शैतानों] को पूजते थे--- उनमें से अधिकतर उन्हीं [जिन्नों]
पर विश्वास रखते थे।" (41)
"अतः आज तुममें से
किसी को भी यह ताक़त नहीं है कि वह किसी और को कोई भी फ़ायदा या नुक़सान पहुँचा
सके।" फिर हम उन शैतानी करने वालों से कहेंगे, "अब उस आग की यातना का मज़ा चखो, जिसे तुम झूठ बताते थे।" (42)
और जब उनके सामने
हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, जो (अपने मतलब में) स्पष्ट व साफ़ हैं, तो वे (रसूल के बारे में) कहते हैं, "यह तो बस ऐसा आदमी है जो चाहता है कि तुम्हें उन
(देवताओं से) रोक दें जिनको तुम्हारे बाप-दादा पूजते रहे हैं।" और कहते हैं, "यह [क़ुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि उस (पैग़म्बर) की बनायी हुई झूठी बातें
हैं।" (सच्चाई से) इंकार करने वालों [काफ़िरों] के सामने जब सच्चा संदेश आ
पहुँचा, तो उसके बारे में
उन्होंने कहा, "यह तो बस एक
साफ़-साफ़ जादू है।" (43)
हालाँकि हमने उन
(मक्कावालों) के पढ़ने के लिए कोई (आसमानी) किताबें नहीं दी थीं, और न आपसे पहले उनकी ओर कोई (रसूल ही) भेजा था, जो सावधान करने वाला हो। (44)
और जो लोग वहाँ इन
लोगों से पहले रहते थे, उन लोगों ने भी
सच्चाई को मानने से इंकार किया था ---- और जो कुछ हमने उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों
को दिया था, ये लोग तो उसके
दसवें हिस्से को भी नहीं पहुँचे हैं---- तब भी उन्होंने (भी) मेरे रसूलों को मानने
से इंकार कर दिया था। तो फिर देख लो कैसी (सख़्त) रही मेरी यातना! (45)
[ऐ रसूल] कहें, "मैं तुम्हें बस एक चीज़ करने की सलाह देता
हूँ: अल्लाह के सामने (पूरी भक्ति-भाव से) खड़े हो जाओ, जोड़े बनाकर या अकेले-अकेले, फिर (आपस में चर्चा करो या ख़ुद ही) ध्यान से
विचार करो: तुम्हारे साथी [मोहम्मद] में पागलपन का तो कोई निशान भी मौजूद नहीं
है--- वह तो एक कठोर यातना के आ जाने से पहले तुम्हें केवल सावधान करने वाले
हैं।" (46)
कह दें, "अगर मैंने (दी गयी नसीहतों के) बदले में
तुमसे कोई चीज़ माँगी हो, तो वह तुम
अपने पास ही रख सकते हो। वह तो बस अल्लाह है जो मुझे (मेरे काम का) बदला देगा: और
वह हर चीज़ पर गवाह है।" (47)
कह दें, "मेरा रब (तुम्हारे सामने झूठ के ख़िलाफ़)
सच्चाई को ऊपर से भेजता रहता है (ताकि सच दिलों में बैठ जाए और झूठ की हार हो)। और
उस [अल्लाह] को ऐसी सभी चीज़ों का जो अनदेखी हैं, पूरा पूरा ज्ञान है।" (48)
कह दें, "सच्चाई आ चुकी है; और झूठ में कोई दम नहीं होता (न कोई चीज़ शुरू
करने का और न दोबारा करने का)।" (49)
कहें, "अगर मैं रास्ते से भटक जाता हूँ तो इसमें
मेरा ही नुक़सान होगा, और यदि मैं
सीधे मार्ग पर हूँ, तो यह उस 'वही' [revelations] के चलते है जो मेरा रब मेरी ओर भेजता है।
बेशक, वह सब कुछ
सुनता है, बहुत निकट
है।" (50)
[ऐ रसूल] आप
अगर उस (क़यामत के) दिन इन लोगों का हाल देख पाते कि मारे डर के घबराए हुए होंगे; फिर भाग निकलने का कोई रास्ता न होगा और वे
निकट स्थान ही से पकड़ लिए जाएँगे; (51)
वे कहेंगे, "अब हम उस (सच्चाई) पर विश्वास करते हैं", मगर (विश्वास तो दुनिया में करना था) अब वे
इतनी दूर की जगह से उस (विश्वास) को कैसे पा सकते हैं --- (52)
इससे पहले तो
उन्होंने हमेशा (सच्चाई को मानने से) इंकार किया, और बड़े दूर की जगह से ही (अल्लाह और आने वाली
दुनिया के बारे में) अटकल के तीर चलाते रहे थे ---- (53)
(उस समय वे
चाहेंगे कि काश एक बार उन्हें दुनिया में भेज दिया जाता तो वे अल्लाह पर और क़यामत
में विश्वास कर लेते,) मगर तब उनके
और उनकी चाहतों के बीच एक रोक लगा दी जाएगी, जिस तरह इससे पहले उनके जैसे लोगों के साथ
मामला किया गया था। सचमुच वे (फ़ैसले के दिन के बारे में) गहरे शक और डाँवाडोल कर
देने वाले संदेह में पड़े रहे थे। (54)
नोट:
14: सुलैमान (अलै.) ने जिन्नों को “बैतुल
मक़दिस” के निर्माण कार्य में लगा रखा था, ये जिन्न केवल उन्हीं के नियंत्रण में रहते
थे और उनकी निगरानी में ही काम करते थे। अभी यह काम चल ही रहा था कि सुलैमान
(अलै.) की मौत का वक्त आ गया, अब यह डर था कि जिन्नों को जैसे ही यह बात
पता चलेगी, वे काम बंद कर देंगे। इसलिए उन्होंने ऐसा किया कि वह अपनी
लाठी पर टेक लगाकर अपनी इबादतगाह में खड़े हो गए और इसी हाल में उनकी मौत हो गई।
अल्लाह ने उन्हें कई दिनों तक उसी हाल में खड़ा रखा, जिन्न उन्हें देखते और काम करते रहते, जब काम पूरा हो गया तब उनकी लाठी में कीड़ा लग
गया, लाठी कमज़ोर होकर टूट गई और वह गिर पड़े, तब जाकर पूरी बात पता चली।
15: सबा की क़ौम यमन में आबाद थी और एक ज़माने में अपनी
सभ्यता और संस्कृति के लिए जानी जाती थी। ज़मीनें बड़ी उपजाऊ थीं, सड़कों के दोनों तरफ़ फलदार बाग़ों का सिलसिला
था, चारों तरफ़ ख़ुशहाली थी, राजनीतिक स्थिरता भी थी; लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता ये लोग अपनी
अय्याशियों में ऐसे मगन हुए कि अल्लाह और उसके हुक्म को भुला बैठे और उसे छोड़कर
दूसरे देवताओं की पूजा करने लगे, फिर उन्हें सुधारने के लिए अल्लाह ने वहाँ कई
नबियों को कुछ कुछ अंतराल पर भेजा, मगर लोग नहीं माने। फिर अल्लाह ने उन्हें दंड
देने का फैसला किया, हुआ यह कि मआरिब नाम के स्थान पर जो एक बाँध था, जिससे कि सारी ज़मीनों पर सिंचाई होती थी, वह बाँध टूट गया, इस तरह, पूरी बस्ती बाढ़ में घिर गई और सारे बाग़
बर्बाद हो गए।
19: "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव डालने वाली जगहों
के बीच बहुत लम्बी दूरी रख दी है”, इसका अनुवाद कुछ विद्वानों ने ऐसा भी किया है, “हमारे
रब! हमारी यात्रा में आने वाले पड़ावों के बीच के फ़ासले को दूर दूर कर दे", ताकि शायद यात्रा और दिलचस्प और साहसिक बन
सके!
20: जन्नत से निकाले जाने से पहले शैतान का नाम इबलीस था।
उसने आदम (अलै.) की पैदाइश के समय जो विचार रखा था कि मैं आदम की औलाद में
ज़्यादातर को आसानी से बहका दूँगा, देखें (7:16-17; 15:39-40;
और 38:82-83), वह बात इन हुक्म न मानने वालों के लिए सही
निकली कि इन लोगों ने शैतान की बात मान ली।
21: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि शैतान को केवल बहकाने
की सलाहियत दी गई है, मगर कोई आदमी गुनाह करने पर मजबूर नहीं होता। अगर आदमी अपनी
अक़्ल और ईमान पर डटा रहे, तो शैतान उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इंसान की आज़माइश
इसी तरह होती है।
24: एक गिरोह ईमानवालों का और दूसरा गिरोह बहुदेववादियों [Polytheist] का।
45: गुज़रे हुए लोगों जैसे फिरऔन, आद
और समूद के लोगों की सज़ाएं।
सूरह 35: फ़ातिर
[पैदा करनेवाला / The Creator]
यह एक मक्की
सूरह है जिसमें अल्लाह की बेपनाह ताक़त और उसके पैदा करने की सलाहियत पर ज़ोर दिया
गया है, और इसकी तुलना
बहुदेववादियों द्वारा ठहराए गए अल्लाह के "साझेदारों" की सलाहियत से की गई है जिनमें न कोई ताक़त है
और न वे किसी काम के हैं। बुतपरस्तों को जहन्नम में मिलने वाली सज़ा की भी चेतावनी
दी गई है (36-39) और पिछले
पैग़म्बरों के साथ भी हुए बुरे बर्ताव की कहानी सुनाई गई है जबकि उन्हें "झूठा" तक कहा गया था, इसे सुनाकर पैग़म्बर (सल्ल) को सांत्वना दी गई
है। ईमान रखनेवालों को मिलने वाले भारी इनाम की भी चर्चा की गई है (31-35).
विषय:
01-17: अल्लाह की क़ुदरत की
निशानियाँ
18-26: रसूल का उत्साह बढ़ाना
27-28: प्रकृति और लोग
भिन्न-भिन्न तरह के हैं
29-40: इनाम और सज़ाएं
41-45: विश्वास न करने वाले
ज़िद्दी और हठधर्म हैं
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
सारी की सारी
प्रशंसाएं अल्लाह के लिए हैं, जो आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है, जिसने दो-दो, तीन-तीन और चार-चार परोंवाले फ़रिश्तों को
संदेश ले जाने के लिए रखा है। वह जब चाहता है अपनी की हुई रचना में कुछ और चीज़ जोड़
देता है: बेशक अल्लाह हर चीज़ की ताक़त रखता है। (1)
अल्लाह अपनी
रहमत [blessing] को अगर लोगों
के लिए खोल दे, तो कोई नहीं
है जो उसे रोक सके, और जिसे वह
रोक ले, तो कोई नहीं
है जो उसके बाद उसे जारी कर सके: उसे हर चीज़ की ताक़त है, और उसे हर चीज़ की समझ-बूझ है। (2)
ऐ लोगो! याद
करो उन नेमतों को जो अल्लाह ने तुम पर की हैं, क्या अल्लाह को छोड़कर कोई और पैदा करने वाला
है, जो तुम्हें
आसमान और ज़मीन से रोज़ी देता हो? उसके सिवा कोई पूजने योग्य नहीं है। तो आख़िर, तुम किस धोखे में पड़े हुए हो? (3)
[ऐ रसूल] अगर
वे आपको झूठा बता रहे हैं, तो (जान लें
कि) आपसे पहले भी रसूलों को झूठा बताया जा चुका है: सारे मामले अल्लाह की तरफ़ ही
लौटकर जाने वाले हैं। (4)
ऐ लोगो! यक़ीन
करो कि अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः सांसारिक जीवन तुम्हें कहीं धोखे में न
डाल दे। और देखना, कहीं वह
धोखेबाज़ [शैतान] तुम्हें अल्लाह के बारे में धोखे में न डाल पाए: (5)
शैतान
तुम्हारा दुश्मन है---- अतः तुम उसके साथ दुश्मनों जैसा ही बर्ताव करो---- वह तो
अपने माननेवालों को केवल इसीलिए बुलाता है कि उन्हें (जहन्नम की) दहकती आग में
जाने वालों का साथी बना सके। (6)
वे लोग
जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, उनको कठोर दंड दिया जाएगा; किन्तु जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे
कर्म किए--- उनके (गुनाहों को) माफ़ कर दिया जाएगा, और उन्हें बड़ा इनाम दिया जाएगा। (7)
उन लोगों के
बारे में क्या कहा जाए जिनके लिए उनके बुरे कर्मों को आकर्षक बना कर पेश किया गया
हो, ताकि वे उन
कर्मों को (बुरा समझने के बजाए) अच्छा समझें? (तो क्या वे बुराई को छोड़ेंगे)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है, मार्ग से भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है।
अतः [ऐ रसूल] आपको इन लोगों के दुख में घुलकर अपनी जान गँवाने की कोई ज़रूरत नहीं:
अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे करते हैं। (8)
वह अल्लाह ही
है जो हवाएँ भेजता है; वह (हवाएं)
बादलों को ऊपर उठाती हैं; फिर हम उसे
किसी सूखी पड़ी हुई मुर्दा ज़मीन की ओर ले जाते हैं, फिर हम उस (बारिश) के द्वारा मुर्दा ज़मीन में
एक नयी जान डाल देते हैं: इसी तरह (मुर्दा पड़े लोगों को) दोबारा जीवित कर उठाया
जायेगा। (9)
अगर कोई इज़्ज़त
व ताक़त हासिल करना चाहता हो, तो (वह यह जान ले कि) इज़्ज़त व ताक़त तो सारी
की सारी अल्लाह के क़ब्ज़े में है; साफ़ व अच्छी बातें उस [अल्लाह] तक (चढ़कर)
पहुँचती हैं, और वही अच्छे
कर्मों को (दर्जे के मुताबिक़) ऊँचा उठाता है, मगर जो लोग शैतानी चालें चलते रहते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी और उनकी तमाम
चालें बेकार होकर रह जाएंगी। (10)
वह अल्लाह है
जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर उसके बाद एक बूँद (वीर्य, semen) से; फिर तुम्हें (मर्द और औरत के) जोड़े में
बनाया; उसकी जानकारी
के बिना न कोई औरत गर्भवती होती है और न बच्चे को जन्म देती है; न कोई आदमी लम्बी आयु पाकर बुढ़ापे को पहुँचता
है और न किसी की आयु में कमी हो जाती है--- यह सब एक किताब में लिखे अनुसार होता
है: और यह सब अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है। (11)
पानी के दो
सागर एक समान नहीं होते---- एक मीठा, प्यास बुझानेवाला और पीने में मज़ेदार और
दूसरा खारा और कड़ुवा है--- मगर तब भी तुम दोनों से ताज़ा (मछलियों का) माँस खाते
हो और आभूषण (मोती, मूंगा)
निकालते हो जिसे तुम पहनते हो, और दोनों में ही तुम नौकाओं (जहाज़ों) को
देखते हो कि पानी को चीरती हुई उसमें चली जा रही हैं, ताकि तुम उस [अल्लाह] की दी हुई रोज़ी को
(व्यापार द्वारा) तलाश कर सको और (उसकी दी हुई नेमतों का) आभार मानो। (12)
वह रात को दिन
में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है; उसने सूरज और चाँद को (एक व्यवस्था के
अनुसार) काम में लगा रखा है---- (इनमें) प्रत्येक एक नियत अवधि तक के लिए (अपने मार्ग
पर) चल रहा है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है: सारी चीज़ पर उसी का क़ब्ज़ा है। उसको
छोड़कर जिन (देवताओं) को तुम पूजते हो, वे एक खजूर की ग़ुठली के छिलके के बराबर भी
कोई अधिकार नहीं रखते; (13)
अगर तुम
उन्हें पुकारो, तो वे
तुम्हारी पुकार सुनेंगे ही नहीं; और अगर वे सुन पाते, तो भी कोई जवाब नहीं दे पाते; और क़यामत के दिन वे ख़ुद तुम्हारी मूर्तिपूजा
को अस्वीकार करते हुए तुम से अलग हो जाएंगे। [ऐ रसूल] कोई भी आपको ऐसी ख़बर नहीं
बता सकता जैसी कि वह [अल्लाह] बताता है जो हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है। (14)
ऐ लोगो! यह तुम ही
हो जिसे (हर चीज़ के लिए) अल्लाह की ज़रूरत है--- अल्लाह को तो किसी चीज़ की ज़रूरत
नहीं, सारी प्रशंसा के
योग्य वही है--- (15)
अगर वह चाहे तो
तुम्हें मिटा दे और (उसकी जगह) एक नई सृष्टि [creation] ले आए, (16)
और यह काम अल्लाह
के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं। (17)
कोई बोझ उठानेवाला
किसी दूसरे (के गुनाहों) का बोझ नहीं उठाएगा: यहाँ तक कि अगर कोई भारी बोझ से दबा
हुआ आदमी भी मदद के लिए पुकारे, तब भी उसका बोझ कोई नहीं उठाएगा, चाहे वह उसका नज़दीकी सम्बन्धी ही क्यों न हो। मगर
[ऐ रसूल] आप तो केवल उन्हें सावधान कर सकते हैं जो अपने रब से डरते हों, हालाँकि उसे देख भी नहीं सकते, और नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ते हों---- और जिस किसी
ने (बुराइयों से) अपने आपकी शुद्धी की, तो यह काम उसने अपने ही भले के लिए किया--- और हर
चीज़ को लौटकर अल्लाह ही के पास जाना है। (18)
आँख से अंधा और
आँखोंवाला बराबर नहीं होते, (19)
और न अँधेरा और
उजाला, (20)
और न छाया और धूप, (21)
और न ज़िंदा और मरा
हुआ बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है (अपना संदेश) सुनाता है: तुम उन
लोगों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में
पड़े हों। (22)
आप तो बस एक
सावधान करनेवाले हैं---- (23)
हमने आपको सच्चाई
की बात देकर इस तरह भेजा है कि आप (नेक लोगों को) अच्छी ख़बर सुना दें, और (बुरे लोगों को) अल्लाह का डर सुनाकर सावधान
कर दें --- और कोई क़ौम ऐसी नहीं हुई जहाँ उन्हें सावधान करने वाला न आया हो।
(24)
यदि वे [मक्का के
काफ़िर] आपको झूठा बतला रहे हैं, तो जो (काफ़िर लोग) उनसे पहले गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (अपने रसूलों) को झूठा बताया था। कई
पैग़म्बर [messengers] उनके पास स्पष्ट
निशानियाँ, आसमानी सहीफ़े
[ज़बूर/ Psalms] और (ज्ञान से भरी)
रौशन किताब लेकर आए थे, (25)
फिर मैंने (सच्चाई
से) इंकार पर अड़े लोगों को धर दबोचा--- तो फिर देखो कि कैसी भयानक थी मेरी सज़ा! (26)
क्या [ऐ रसूल]
आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने रंग बिरंग के फल निकाले; (इसी तरह) पहाड़ों में भी सफ़ेद और लाल रंगों की
रंग बिरंगी धारियाँ हैं, और कुछ
बिल्कुल काली भी; (27)
और यह कि
इंसानों, जानवरों और
चौपायों के रंग भी तरह तरह के हैं? और अल्लाह से सही मायने में तो उसके वही बंदे
डरते हैं, जो (इन
सच्चाइयों को) अच्छी तरह जानते-समझते हैं। निश्चय ही सारी ताक़त भी अल्लाह के पास
है, और सबसे
ज़्यादा माफ़ करने वाला भी वही है। (28)
जो लोग अल्लाह
की किताब पढ़ते हैं, नमाज़ के
पाबन्द हैं, और जो कुछ
(रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (अच्छे कामों पर) छिपाकर भी और
दिखाकर भी ख़र्च करते हैं, वे एक ऐसे
व्यापार की आशा रख सकते हैं जो कभी मंदा न होगा: (29)
अल्लाह उन्हें
इसका पूरा पूरा इनाम देगा, बल्कि अपने
ख़ज़ाने से और बढ़ाकर देगा। इस में शक नहीं कि वह बहुत माफ़ करनेवाला और अच्छाई की
बहुत क़द्र करनेवाला है। (30)
[ऐ रसूल] हमने
जो किताब आपके पास उतारकर भेजी है, वह सच्ची है और अपने से पहले की (आसमानी)
किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि [confirm] करती है। निश्चय ही अल्लाह अपने बन्दों की
पूरी ख़बर रखता है और सब कुछ देखता है। (31)
फिर हमने अपने
चुने हुए बंदों को इस किताब का उत्तराधिकारी बनाया: उनमें से कुछ तो ऐसे थे
जिन्होंने ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म किया, कुछ थे जो (सही और ग़लत के) बीच-बीच में
रहनेवाले थे, और उनमें कुछ
अल्लाह की कृपा से, अच्छे कामों
में आगे-आगे रहने वाले थे। यही सबसे बड़ा फ़ज़ल [favour] है: (32)
वे हमेशा रहने
वाले बाग़ों [Gardens] में प्रवेश
करेंगे जहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोतियों से सजाया जाएगा, और वहाँ वे रेशम के कपड़े पहनेंगे। (33)
वे कहेंगे, "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे हर तरह के दुख दूर कर दिए! सचमुच
हमारा रब बड़ा माफ़ करनेवाला और (भलाई की) बहुत क़द्र करनेवाला है: (34)
जिसने अपनी
असीम कृपा से, हमें सदैव
रहने के ऐसे घर में ठहराया जहाँ हमें न कोई मशक़्क़त उठानी पड़ेगी और न कोई थकान ही होगी।" (35)
मगर जिन लोगों
ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया, वे जहन्नम की आग में रहेंगे, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर ही जाएँ और
न उनसे जहन्नम की यातना ही कुछ हल्की की जाएगी: और हम ऐसा ही बदला शुक्र न अदा
करनेवाले हर काफ़िर को देते हैं। (36)
वे जहन्नम में
चिल्ला-चिल्लाकर कहेंगे कि "ऐ हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे, और अब हम अच्छे कर्म करेंगे, पहले की तरह (बुरे कर्म) नहीं करेंगे!"—-- (जवाब में कहा जाएगा), "क्या हमने तुम्हें इतनी ज़िंदगी नहीं दी थी कि
अगर तुम समझना चाहते तो उन चेतावनियों को सुनकर होश में आ जाते? और तुम्हारे पास सावधान करनेवाला [रसूल] भी
तो आया था, तो अब चखो मज़ा
अपनी सज़ा का!” शैतानी करने
वालों को मदद करने वाला कोई नहीं होगा! (37)
निस्संदेह
अल्लाह आसमानों और ज़मीन की छिपी हुई तमाम चीज़ों को जानता है; वह तो दिलों के अंदर पैदा होने वाले ख़्याल तक
को जानता है; (38)
वही है जिसने
तुम (लोगों) को ज़मीन में (पहले गुज़र चुके लोगों का) उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा] बनाया।
अब जो सच्चाई को मानने से इंकार करेगा, उसे इसका नतीजा भुगतना होगा: उन लोगों का
इंकार उनके रब के ग़ुस्से को और ज़्यादा भड़का देगा, और इससे उनका नुक़सान ही बढ़ेगा। (39)
[ऐ रसूल] आप
कहें, "क्या तुमने
अपने उन (अल्लाह के) ‘साझेदारों [Partners] के बारे में विचार किया, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे ज़रा दिखाओ उन्होंने धरती का कौन-सा भाग
पैदा किया है? या आसमानों के
कितने भाग के वह मालिक हैं?" क्या हमने उन्हें कोई किताब दे रखी है जिसमें
इन बातों का कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद है? बिल्कुल नहीं! असल में, मुशरिक लोग [Idolaters] आपस में एक-दूसरे से केवल धोखे का वादा करते
हैं। (40)
अल्लाह ने
आसमानों और ज़मीन को इस तरह थाम रखा है कि वे (अपनी जगह और रास्ते से) हट नहीं सकते; और अगर वे हट जाएँ, तो उसके बाद कोई नहीं जो उन्हें थाम सके।
निस्संदेह, वह बहुत
सहनशील, बड़ा माफ़
करनेवाला है। (41)
उन (मुशरिक
लोगों/ The Idolaters] ने बड़ी-बड़ी क़समें खाई थीं कि यदि उनके पास कोई सावधान करने वाला [रसूल] आए, तो वे अन्य दूसरी क़ौमों से बढ़कर सीधे मार्ग
को अपनाएंगे, किन्तु जब
उनके पास एक सावधान करने वाला आ गया, तो वे (सच्चाई से) और ज़्यादा दूर भाग गए, (42)
इसलिए कि ज़मीन में वे (अपने को बड़ा समझते
हुए) और भी घमंडी हो गए, और उनकी
शैतानी चालों में और भी तेज़ी आ गयी--- मगर जो शैतानी चालें चलते हैं, वह ख़ुद ही अपनी चालों के घेरे में आ जाते
हैं। जैसा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के साथ हुआ, क्या वे उससे कुछ अलग बर्ताव की उम्मीद लगाए
बैठे हैं? वैसे तुम
अल्लाह की रीति में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाओगे; और न तुम कभी उसमें कोई फेर-बदल ही पाओगे।
(43)
क्या उन लोगों ने ज़मीन में चल-फिर कर देखा
नहीं कि उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों का कैसा परिणाम हुआ? हालाँकि वे शक्ति में उनसे कही बढ़-चढ़कर थे? और आसमानों और ज़मीन में कोई चीज़ भी ऐसी नहीं
जो अल्लाह को तंग [आजिज़/ frustrate] कर सके: निस्संदेह वह सब जानता है, और हर चीज़ की ताक़त रखता है। (44)
अगर अल्लाह लोगों को उनके ग़लत काम करने के
चलते (उसी समय) दंड देने लग जाए, तो इस ज़मीन की सतह पर एक भी जीव बाक़ी न
बचेगा। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील देता है, और फिर जब उनका नियत समय आ जाता है, तो अल्लाह ख़ुद ही अपने बंदों को देख लेगा। (45)
नोट:
8: यहाँ यह मतलब
नहीं है कि अल्लाह जिसको चाहता है, उसे ज़बरदस्ती गुमराह कर देता है, बल्कि बात यह है कि जब कोई आदमी अपनी ज़िद और
हठधर्मी के चलते ग़लत रास्ता अपना लेने पर अड़ा रहता है, तो फिर अल्लाह भी उसके दिल को ठप्पा लगाकर
बंद कर देता है, और उसे भटकता
छोड़ देता है। देखें सूरह बक़रा [2: 7]
10: अच्छी व भलाई की बातें अल्लाह तक पहुँचती हैं, और वह उन बातों को अच्छे कर्मों के ज़रिये क़बूल करता है।
22: यहाँ मुहम्मद (सल्ल) को तसल्ली दी गई है कि
अगर मक्का के लोग आपके द्वारा लाए गए संदेश की सच्चाई को क़बूल नहीं कर रहे हैं, तो आप दुखी न हों, आप इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।
32: मुसलमानों को किताब का वारिस बनाया गया है, फिर ईमान रखने के बावजूद उनमें भी तीन तरह के
लोग पाए जाते हैं:
(क) जो अल्लाह के हुक्म के अनुसार काम नहीं करते, और हर तरह के गुनाह भी करते रहते हैं, यानी वे अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे हैं।
(ख): जो ज़रूरी हुक्मों को मानते हैं, बुराइयों से भी
बचते हैं, मगर भलाई के बहुत से ऐसे काम हैं जो उन्हें
करने चाहिए, मगर वे नहीं करते। वह बीच के दर्जे के हैं।
(ग): जो वह सारे भलाई के काम करते हैं जो चाहे ज़रूरी हों, या optional हों। वह इबादत
में भी उसी लगन से लगे रहते हैं।
सूरह 7: अल-अ'राफ़
[ऊँची जगह/ The Heights]
इस सूरह की आयत 46 में बताया गया है कि क़यामत के दिन अच्छे व
नेक लोगों और गुनाहगार लोगों के बीच रोक के तौर पर एक "ऊँची सी जगह" होगी जो दोनों तरह के लोगों को अलग-अलग कर
देगी, इसी "ऊँची जगह"[अराफ़] पर इस सूरह का नाम पड़ा है। सूरह के
शुरू में पैग़म्बर साहब को संबोधित करके उन्हें फिर से आश्वस्त किया गया है कि ये
आयतें अल्लाह द्वारा उतारी जा रही हैं और अगर लोग आपकी बात नहीं मान रहे हैं तो
इससे ज़्यादा बेचैन होने की ज़रूरत नहीं है, और सूरह के अंत में इस बात पर ज़ोर दिया गया
है कि जो भी आयतें उतरती हैं, आपका काम केवल उन्हें वैसे ही दुहरा [repeat] देना है। विश्वास न करनेवालों को पुरानी
पीढ़ियों की बर्बादी के क़िस्से सुनाये गए हैं और उनके होने वाले अंजाम की चेतावनी
दी गई है, ताकि वे ध्यान
दें और अपने आप में सुधार लाते हुए गुनाहों की माफ़ी माँगें इससे पहले कि बहुत देर
हो जाए। इन दोनों विषयों की मदद से पैग़म्बर साहब और ईमानवालों का हौसला भी बढ़ाया
गया है। शैतान की अकड़ और आदम अलै. के बहकावे में आ जाने और उसके नतीजे में जन्नत
से निकाले जाने की कहानी विस्तार से यहाँ बतायी गई है, साथ में ईमानवालों को शैतान के बहकावे से
बचकर रहने का सबक़ भी दिया गया है। जन्नत और जहन्नम के बारे में भी बड़े अच्छे अंदाज़ में ज़िक्र (आयत 36-53) आया है।
विषय:
02-03: यह किताब है
04-09: अंतिम फ़ैसला
10-25: आदम (अलै), इबलीस और जन्नत से बाहर निकलना
26-37: आदम की संतानों से संबोधन
38-51: अंतिम फ़ैसले का दृश्य
52-53: किताब और उसमें कही हुई बात पूरी होना
54-58: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
59-64: नूह (अलै) और उसकी क़ौम की कहानी
65-72: हूद (अलै) और आद के लोगों की कहानी
73-79: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी
80-84: लूत (अलै) और उनकी क़ौम के लोगों की कहानी
85-93: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी
94-102 : पिछले रसूलों की कहानियों का निष्कर्ष
103-137: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी
138-157: मूसा (अलै) और इसराईल की संतान
158 : अल्लाह के रसूल पर विश्वास करने पर ज़ोर
159-171: मूसा (अलै) और इसराईल की संतान (जारी)
172-174: आदम की संतानों से अल्लाह का लिया हुआ वचन
175-176: एक रसूल की कहानी जो अपनी ज़िम्मेदारी नहीं
निभा सके
177-179: जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा
दिया
180 : सारे अच्छे नाम अल्लाह के
181-186: जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा
दिया
187-188: (क़यामत की) घड़ी कब आयेगी?
189-198: इंसानों की पैदाइश और मूर्तिपूजा की शुरुआत
199-206: पैग़म्बर को सलाह
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान
है
अलिफ़॰ लाम॰
मीम॰ साद॰ (1)
[ऐ रसूल!] यह
एक किताब [क़ुरआन] है, जो आप पर
उतारी गयी है, ताकि इसकी मदद
से आप (लोगों को) चेतावनी दे सकें और ईमानवालों को (नसीहत की बातें) याद दिला
सकें। तो देखें! ऐसा नहीं होना चाहिए कि इसके चलते आपका दिल बेचैन रहा करे। (2)
"(लोगो!) जो
किताब तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उसी के पीछे चलो; अपने रब को छोड़कर (अपने बनाए हुए) दूसरे
मालिकों के पीछे मत चलो। मगर (अफ़सोस!) तुम नसीहत पर बहुत कम ही ध्यान देते हो! (3)
कितनी ही
बस्तियों को हमने (उनके कर्मों के चलते) बर्बाद कर दिया! उन पर हमारी यातना (अचानक
ही) आ पहुँची, सोयी रात में, या दोपहर के वक़्त जबकि वे आराम कर रहे थे: (4)
फिर जब उनपर
(सचमुच) यातना आ गयी, तो उनके पास
कहने को कुछ न रहा, सिवाए इसके कि
वे पुकार उठे, "हम सचमुच
मुजरिम थे!" (5)
हम उन लोगों
से अवश्य पूछताछ करेंगे जिनके पास रसूलों को भेजा गया था (कि उन्होंने रसूलों की
बात मानी या नहीं)------ और हम उन रसूलों से भी ज़रूर पूछताछ करेंगे (कि उन्होंने
हमारे संदेशों को ठीक-ठीक पहुँचाया या नहीं)- ----- (6)
फिर जो कुछ भी
उन लोगों ने किया होगा, वे सारी बातें
हम उनके सामने बता देंगे, क्योंकि हमें
तो इनकी पूरी जानकारी है, और (इन घटनाओं
के समय) हम कहीं ग़ायब तो न थे। (7)
और उस दिन
कर्मों के वज़न को सही-सही और इंसाफ के साथ तौला जाएगा: जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा
भारी निकला, तो वही हैं जो
कामयाब हो गए, (8)
और जिनके
अच्छे कर्मों का पलड़ा हल्का निकला, तो ये वही लोग होंगे जो हमारे संदेशों को
मानने से इंकार करते रहे, और नतीजे में
अपने आपको घाटे में डाल बैठे। (9)
हमने तुम
(लोगों) को ज़मीन में बसा दिया, और साथ में ज़िंदगी गुज़ारने के सारे सामान भी
दे दिए-----(मगर) शायद ही कभी तुम शुक्र अदा करते हो! (10)
[ऐ इंसानो!], हमने तुम्हें पैदा किया; तुम्हारी शक्ल-सूरत बनायी, उसके बाद, हमने फ़रिश्तों से कहा, "(पहले इंसान) आदम [Adam] के आगे झुक जाओ", और सब (फरिश्ते) झुक गए। मगर इबलीस न झुका:
वह झुकने वालों में शामिल न था। (11)
अल्लाह ने कहा, "तुझे किस बात ने (आदम के सामने) झुकने से रोक
दिया, जबकि मैंने
तुझे आदेश दिया था?", (इबलीस ने) कहा, "मैं उससे बेहतर हूँ: तूने मुझे आग से पैदा
किया और उसे मिट्टी से।" (12)
अल्लाह ने कहा, "उतर जा यहाँ से! यह [जन्नत] तुम्हारे घमंड
करने की जगह नहीं है। निकल जा, दूर हो यहाँ से!, तू उनमें से हो गया जो अपमानित हुए!" (13)
मगर इबलीस ने
कहा, "मुझे उस दिन
तक (ज़िंदा रहने की) छूट दे दे, जिस दिन मरे हुए लोगों को ज़िंदा करके दोबारा
उठाया जाएगा।" (14)
और अल्लाह ने
जवाब दिया, "तुझे छूट दी
गयी।" (15)
और फिर इबलीस
ने कहा, "चूँकि तूने
मुझे ग़लत राह पर लगा दिया है, इसलिए अब मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उन सब
लोगों की ताक में बैठूँगा: (16)
मैं उन पर
(चारों तरफ से) हमले करूँगा---- "उनके सामने से और उनके पीछे से भी, उनके दाएँ से और उनके बाएँ से भी----- और तू
उनमें से अधिकतर को शुक्र अदा करने वाला न पाएगा।" (17)
अल्लाह ने कहा, "निकल जा यहाँ से! बेइज़्ज़त और ठुकराया हुआ!
मुझे क़सम है, कि मैं जहन्नम
को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा जो तेरे पीछे चलेंगे।" (18)
मगर "ऐ
आदम! तुम और तुम्हारी बीवी, दोनों (जन्नत के) बागों में रहो, और जहाँ से जो चीज़ चाहो, खाओ-पियो, लेकिन इस पेड़ के नज़दीक मत जाना, नहीं तो (याद रखो!) तुम भी ग़लती करने वालों
में से हो जाओगे।" (19)
फिर ऐसा हुआ
कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए: उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से
रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा न हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या
कहीं हमेशा की ज़िंदगी न हासिल हो जाए।" (20)
और उसने उनके
सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को
पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (21)
उसने झूठी
बातें बोलकर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते
जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से
नहीं रोका था?, क्या मैंने
तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (22)
उन दोनों ने
जवाब दिया, "हमारे रब! हम
अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं: अगर तूने हमें माफ़ न किया और हम पर दया न
की, तो फिर हम
बर्बाद हो जाएंगे।" (23)
अल्लाह ने कहा, "निकल जाओ यहाँ से तुम सब! तुम [शैतान और
आदमी] एक-दूसरे के दुश्मन हो! अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी और
जीवन-यापन के सामान होंगे---- मगर एक ख़ास अवधि तक।" (24)
और कहा, "वहीं (ज़मीन पर) तुम्हें जीना है, वहीं तुम्हें मरना होगा, और उसी से (मरने के बाद) तुम्हें दोबारा
निकाला जाएगा।" (25)
ऐ आदम की
सन्तान! हमने तुम्हें कपड़ा दिया है ताकि तुम अपने नंगेपन को छिपा सको और यह
तुम्हारे सजने-संवरने का साधन भी है; (मगर अपने भीतर की बुराई छिपाने के लिए) परहेज़
का कपड़ा सब कपड़ों में बेहतर है: यह अल्लाह की निशानियों में से है ताकि वे ध्यान
दे सकें। (26)
ऐ आदम की
सन्तान! देखो! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस तरह उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से
निकलवा दिया था; उनके कपड़े
उतरवा दिए थे, ताकि उनकी
नग्नता उनके सामने खोल दे: वह और उसका गिरोह उस जगह से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते: हमने
शैतानी करने वालों को उन लोगों का साथी व मददगार बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते। (27)
इसके बावजूद, जब ये लोग कोई अश्लील (और बेशर्मी के) कर्म [Indecency] करते हैं, तो कहते हैं कि "हमने अपने बाप-दादा को ऐसा
ही करते हुए देखा है", और, "अल्लाह ने हमें ऐसा करने का आदेश दिया है।"
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह कभी अश्लील
बातों का आदेश नहीं दिया करता। तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कैसे कह सकते हो, जिसके (सच होने की) तुम्हें कोई जानकारी नहीं है?" (28)
कह दें, "मेरे रब ने नैतिक रूप से सही काम करने का आदेश
दिया है। तुम जहाँ कहीं भी इबादत [पूजा[ करो, तो इबादत में तुम्हारा पूरा ध्यान उसी (रब) की
तरफ़ होना चाहिए; अपने दीन [आस्था]
को पूरी भक्ति के साथ उसी पर समर्पित करते हुए, उसे पुकारो। ठीक जैसे उसने तुम्हें शुरू में पैदा
किया, वैसे ही तुम फिर
से ज़िंदा करके उठाए जाओगे।" (29)
(तुममें से) कुछ को
उसने (सीधा) मार्ग दिखा दिया और कुछ की क़िस्मत में (इंकार व बुरे कर्मों के चलते)
भटकना लिख दिया: उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना रखवाला बना लिया, और यह समझते रहे कि वे सीधे मार्ग पर हैं। (30)
ऐ आदम की सन्तान!
जब कभी तुम इबादत किया करो, तो अच्छी तरह कपड़े पहना करो, और (हलाल चीज़ें) खाओ पियो, मगर (ख़र्च करने में) हद से आगे न बढ़ो: बिना
सोचे-समझे, बेकार की चीज़ों
में पैसे उड़ाने वालों को अल्लाह पसन्द नहीं करता। (31)
[ऐ रसूल!] आप कहें, "अल्लाह ने अपने बंदों के लिए जो सजने-सँवरने और
खाने-पीने की चीज़ें दी हैं, उन्हें इस्तेमाल करने से किसने रोका है?" कह दें, "ईमान रखनेवालों के लिए भी इस दुनिया की ज़िंदगी
में ये सब चीज़ें (जायज़) हैं: (मगर) क़यामत के दिन ये चीज़ें केवल ईमानवालों के लिए
ही होंगी।" तो (देखो!) किस तरह हम उन लोगों के लिए अपनी आयतों को साफ़ व
स्पष्ट तरीक़े से बताते हैं, जो बातों को समझते हैं। (32)
[ऐ रसूल!] आप
कहें, "मेरा रब तो
केवल अश्लील व बेशर्मी के कामों को करने से रोकता है------ चाहे वह खुले-आम की
जाएं या ढँके-छिपे की जाएं---- और गुनाह करने से, और बेवजह ज़्यादती करने से, और यह कि तुम किसी को अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराओ जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा, और यह कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें
कहो जिसकी तुम्हें कोई जानकारी न हो।" (33)
हर एक क़ौम के
लोगों के लिए एक नियत समय तय किया हुआ है: वे न तो इसे समय से पहले ही ला सकते हैं, और न ही समय आ जाने पर वे इसे घड़ी भर के लिए
भी टाल सकेंगे। (34)
ऐ आदम की
सन्तान! अगर तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल बनकर आता है, और मेरी आयतें पढ़कर सुनाता है, तो जिसने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको
बुराइयों से बचाए रखा, और नेकी की
ज़िन्दगी गुज़ारी, तो ऐसे लोगों
को न कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (35)
मगर जिन्होंने
हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, और अकड़ दिखाते हुए उनसे नफ़रत की, तो ऐसे ही लोग हैं जिनका घर (जहन्नम की) आग
होगा, जिसमें वे
हमेशा रहेंगे। (36)
उस आदमी से
बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, और उसकी आयतों को मानने से इंकार करता हो? ऐसे लोगों की क़िस्मत में जितनी रोज़ी लिखी हुई
है, उतनी (इस
दुनिया में) उन्हें मिलती रहेगी, मगर उसके बाद, जब हमारे फ़रिश्ते उनकी जान वापस ले जाने के
लिए आएँगे, तो कहेंगे, "कहाँ हैं वे [ख़ुदा] जिन्हें तुम अल्लाह के
बजाए पुकारा करते थे?" वे लोग कहेंगे, "वे तो हमें
छोड़कर गुम हो गए हैं।" वे (अपने ही ख़िलाफ़ गवाही देते हुए) इस बात को मान
लेंगे कि वे (सच्चाई में) विश्वास नहीं करते थे। (37)
अल्लाह कहेगा, "जाओ! तुम भी जिन्नों और इंसानों की उस भीड़
में शामिल हो जाओ जो तुम से पहले (जहन्नम की) आग में जा चुकी हैं।" हर समूह, (जहन्नम में) घुसते समय अपने साथ के दूसरे
समूहों को बुरा-भला कहते हुए घुसेगा, उसके बाद, जब अंदर में वे सब एक साथ जमा हो जाएंगे, तो उनमें से सबसे बाद में आने वाला समूह, अपने पहले आने वालों के बारे में कहेगा, "हमारे रब! इन्हीं लोगों ने हमें गुमराह कर
दिया था: तू इन्हें आग की दुगनी सज़ा दे"----- अल्लाह कहेगा, "तुममें से हर एक के लिए दुगनी सज़ा है, हालाँकि तुम इसे नहीं जानते"---- (38)
उनमें से पहले
आने वाले, आख़िर में आने
वालों से कहेंगे, "तुम भी हम से
किसी मामले में अच्छे तो नहीं थे: (अपने कर्मों से) जो सज़ा तुमने कमायी है, अब उसका मज़ा चखो!" (39)
यक़ीन रखो कि
ऐसे लोगों के लिए आसमान के दरवाज़े कभी नहीं खोले जाएंगे, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार
किया और अपनी अकड़ में उन्हें ठुकरा दिया; उनका जन्नत में दाख़िल होना ऐसा ही है जैसे, ऊँट (या मोटी रस्सी) का सूई के नाके में से
गुज़र जाना। मुजरिमों को हम इसी तरह उनके जुर्म की सज़ा देते हैं---- (40)
जहन्नम उनके
लिए आराम करने की जगह होगी (जहाँ आग का बिस्तर होगा) और उनके ऊपर परत-दर-परत, आग ही की चादर होगी-----शैतानी करने वालों को हम ऐसी ही यातना देते हैं। (41)
मगर जो लोग
ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए --- और (याद रहे कि) हम किसी जान पर
उतना ही बोझ डालते हैं जितना वह सह सके---- तो बस ऐसे ही लोग जन्नतवाले हैं और वे
हमेशा वहीं रहेंगे। (42)
हम उनके दिलों
के अंदर पलने वाली सारी बुरी भावनाओं को निकाल देंगे; उनके पैरों तले नहरें बह रही होंगी। वे
कहेंगे, "सारी प्रशंसा
अल्लाह के लिए है, जिसने हमें इस
(ज़िंदगी का) रास्ता दिखाया: अगर अल्लाह ने हमें रास्ता न दिखाया होता, तो हम कभी भी सही रास्ता न खोज पाते। हमारे
रब के रसूल सच्चाई का संदेश लेकर आए थे।" और फिर उन्हें एक आवाज़ सुनायी देगी, "यह है जन्नत, जो अब तुम्हारा अपना हो चुका है, उन अच्छे कर्मों के नतीजे में जो तुम करते
रहे थे।" (43)
जन्नत के लोग
(जहन्नम के) आगवालों को पुकारकर कहेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुम्हारे रब ने जो
तुम से वादा कर रखा था, तुमने भी उसे
सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतने में एक पुकारने वाला उनके
बीच पुकारेगा, "अल्लाह की
फिटकार है शैतानियाँ करने वालों पर: (44)
जो अल्लाह के
मार्ग से रोकते थे और उसे टेढ़ा करना चाहते थे और जो आख़िरत [Hereafter] का इंकार करते थे।" (45)
इन दोनों समूहों
के बीच एक ओट [Barrier] होगी जो इनको
अलग-अलग कर देगी, और (दोनों के
बीच) ऊँचाई पर कुछ लोग होंगे जो हर एक समूह को उनके निशानों से पहचानते होंगे: वे
जन्नतवालों से पुकारकर कहेंगे, "तुम पर सलामती हो!"--- वे अभी जन्नत में
दाख़िल नहीं हुए होंगे, मगर वे उसके लिए
आस लगाए होंगे, (46)
और जब उनकी
नज़रें आगवाले लोगों पर पड़ेंगी, तो वे कहेंगे, "हमारे रब, हमें शैतानियाँ करने वालों में शामिल न कर
दीजियो!"---- (47)
और ऊँचाई पर
ठहरे लोग कुछ ख़ास (बुरे) लोगों को
जिन्हें ये उनके निशानियों से पहचानते होंगे, पुकारकर कहेंगे, "बताओ! क्या फ़ायदा हुआ तुम्हारी (जमा-पूँजी और)
इतनी बड़ी संख्या में होने का, और तुम्हारी झूठी शान का? (48)
(फिर जन्नतियों
की तरफ़ इशारा करके कहेंगे) "और क्या ये वही लोग हैं ना, जिनके बारे में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह
उनपर कभी अपनी दया-दृष्टि न डालेगा?" (मगर उन लोगों से तो कह दिया गया है कि), "जन्नत में दाख़िल हो जाओ, तुम्हारे लिए न कोई डर है और न तुम दुखी
होगे।" (49)
आगवाले लोग
जन्नत में रहने वालों को पुकारकर कहेंगे ,"थोड़ा पानी हमें भी दे दो, या उन चीज़ों में से ही कुछ दे दो जो अल्लाह
ने तुम्हें दी हैं!" और वे कहेंगे, "अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें इंकार करनेवालों
के लिए मना कर दी हैं"----- (50)
जिन लोगों ने
धर्म को बस एक ध्यान भटकाने, व खेल-तमाशे की चीज़ बना दिया था, और इस दुनिया की ज़िन्दगी ने उन्हें धोखे में
डाल रखा था।” आज हम उन पर
कोई ध्यान नहीं देंगे, जिस तरह
उन्होंने उस (क़यामत के) दिन की होने वाली मुलाक़ात को नज़रअंदाज़ [ignore] कर दिया और हमारी आयतों को मानने से इंकार
करते रहे। (51)
लोगों के लिए
हम एक (आसमानी) किताब लाए हैं---- हमने सच्चे ज्ञान के आधार पर इसमें चीज़ों को
विस्तार से बता दिया है----यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] है, उन लोगों के लिए जो (सच्चाई में) विश्वास
करते हैं। (52)
वे किसी और
चीज़ के नहीं, बल्कि इसी
इंतज़ार में हैं कि कब उस (आख़िरी अंजाम) के बारे में कही हुई बात [Prophecy] पूरी होती है? जिस दिन वह (क़यामत के बारे में) कही हुई बात
पूरी हो जाएगी, तो जिन लोगों
ने इसे नज़रअंदाज़ किया था, वे बोल उठेंगे, "हमारे रब के रसूल ने सच्ची बात कही थी। तो
क्या कोई है जो अब हमारे लिए थोड़ी सिफ़ारिश कर सके? या क्या हमें वापस (उसी दुनिया में) भेजा जा
सकता है ताकि जैसा हम पहले व्यवहार करते थे, उससे (इस बार) कुछ अलग व्यवहार कर सकें?" सचमुच वे अपनी जानें गँवा बैठेंगे, और वे सारी [मूर्तियाँ] जो उन्होंने गढ़ रखी
थीं, वे उन्हें
छोड़कर गुम हो चुकी होंगी। (53)
अल्लाह ही
तुम्हारा रब है, जिसने आसमानों
और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया, फिर (काम-काज की व्यवस्था के लिए) अपने आपको
सिंहासन पर स्थापित किया; उसने रात ऐसी बनायी
है कि वह तेज़ी से पीछा करते हुए दिन को ढँक लेती है; उसने सूरज, चाँद और तारे भी पैदा किए, जो उसके आदेश से काम में लगे रहते हैं; सारी सृष्टि, और सारे आदेश, सब उसी के हैं। महिमा हो उसकी! वह सारे
संसारों का रब है! (54)
अपने रब को
विनम्रता से और चुपके-चुपके पुकारा करो---वह उन्हें पसंद नहीं करता जो मर्यादा की
सीमाएं तोड़ने वाले हैं: (55)
और (देखो!)
ज़मीन पर फैली बुराइयों को ठीक कर देने के बाद इसमें बिगाड़ न पैदा करो---- उसे
(अपनी ग़लतियों से) डरते हुए और (उसकी रहमत की) उम्मीद के साथ पुकारा करो। अल्लाह
की रहमत [mercy] उन लोगों के
नज़दीक होती है जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं। (56)
यह अल्लाह है
जो हवाएं भेजता है, जो उसकी
आनेवाली बरकत [बारिश] की ख़ुशखबरी लेकर आती है, और जब वे ऊपर उठकर बोझल बादलों को इकट्ठा कर
लेती है, तो हम उसे
किसी मुर्दा ज़मीन की तरफ उड़ा ले जाते हैं, जहाँ उससे पानी बरसाते हैं, फिर उससे हर तरह की फ़सलें उग जाती हैं, ठीक इसी तरह, हम मुर्दा लोगों को (धरती से) निकाल खड़ा करेंगे. तो
क्या तुम इस पर विचार नहीं करोगे? (57)
अगर ज़मीन
अच्छी हो, तो अपने रब की
मर्ज़ी से, पेड़-पौधे
काफी मात्रा में निकल आते हैं, लेकिन अगर ज़मीन ख़राब हुई, तो पैदावार होगी भी, तो बहुत ही कम: हम अपनी आयतों [निशानियों] को
उन लोगों के लिए तरह-तरह से बयान करते हैं, जो अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। (58)
हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो:
उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। मैं डरता हूँ कि एक बड़े भयानक दिन की
यातना कहीं तुम्हें न आ पकड़े!" (59)
मगर उसकी क़ौम
के सरदारों ने कहा, "हमें तो ऐसा
लगता है कि तुम गुमराही में काफ़ी दूर जा पड़े हो।" (60)
उन्होंने जवाब
दिया, "ऐ मेरी क़ौम
के लोगों! मेरे बारे में किसी गुमराही का कोई सवाल नहीं है! उल्टा मैं तो सारे
संसारों के रब का भेजा हुआ एक रसूल हूँ। (61)
मैं तो अपने
रब के संदेशों को तुम तक पहुँचा रहा हूँ और तुम्हारे हित में सलाह दे रहा हूँ। मैं
अल्लाह की तरफ़ से उन चीज़ों को जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते। (62)
क्या तुम्हें
यह बड़ा अजीब लगता है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है--- एक ऐसे आदमी के
द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो----जो तुम्हें चेतावनी दे सके और तुम अल्लाह का डर
रखते हुए बुराइयों से बच सको, ताकि तुम पर दया की जा सके?" (63)
मगर उन लोगों
ने नूह को झूठा घोषित कर दिया। हमने उसे बचा लिया, और उन लोगों को भी जो उसके साथ नौका में सवार
थे, और उन लोगों
को डुबा दिया जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था-----वे जानते-बूझते
अन्धे बने हुए थे। (64)
आद की क़ौम के
पास हमने उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो:
उस अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तो क्या तुम इस बात पर ध्यान नहीं
दोगे?" (65)
मगर उसकी क़ौम
के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "हमारा ऐसा मानना है कि तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी
हो" और "हमारी समझ से तुम एक झूठे आदमी भी हो।" (66)
हूद ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझ में बेवक़ूफ़ी की कोई
बात नहीं है! उल्टा, मैं सारे
संसारों के रब की तरफ़ से भेजा हुआ एक रसूल हूँ : (67)
"मैं तो अपने
रब का संदेश तुम तक पहुँचा रहा हूँ। मैं तुम्हारा हित देखते हुए ईमानदारी से सलाह
देता हूँ। (68)
"क्या तुम्हें
यह बात इतनी अनोखी लगती है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है, वह भी एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में
से एक हो, ताकि तुम्हें
(इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे सके? याद करो, किस तरह उसने नूह की क़ौम के बाद तुम्हें
उसका उत्तराधिकारी बनाया, और क़द-काठी
में तुम्हें (दूसरों से) लम्बा-चौड़ा बनाया: अल्लाह की नेमतों [bounties] को याद करो, ताकि तुम कामयाबी पा सको।" (69)
वे कहने लगे, "क्या तुम हमारे पास सचमुच यही बताने के लिए
आए हो कि हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे हैं, उन्हें (पूजना) छोड़ दें? ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो जिस यातना (के आने) की धमकी तुम देते रहते
हो, उसे हम पर ले
आओ।" (70)
हूद ने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की नफ़रत और ग़ुस्से का
क़हर टूट पड़ना तय हो चुका है। क्या तुम मुझसे उन (देवताओं के) नामों के लिए झगड़
रहे हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े हैं, जिन नामों लिए अल्लाह ने कोई मन्ज़ूरी नहीं दी? अच्छा, तो बस अब (आने वाले समय का) इंतजार करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ।" (71)
फिर हमने अपनी
दया दिखाते हुए हूद को, और जो लोग
उसके साथ थे उन्हें बचा लिया; और उन लोगों को बर्बाद कर दिया जिन्होंने
हमारी आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार कर दिया था, और वे विश्वास करने वाले न थे। (72)
(इसी तरह) समूद के
लोगों की तरफ़ हमने उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके
अलावा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तुम्हारे रब की तरफ़ से अब एक स्पष्ट प्रमाण आ
चुका है: यह अल्लाह के नाम पर छोड़ी हुई ऊँटनी है----यह तुम्हारे लिए एक निशानी
है---- सो इसे अल्लाह की धरती पर खाने-चरने के लिए खुला छोड़ दो और देखो! उसे किसी
तरह का कोई नुक़सान मत पहुँचाना, वरना एक दर्दनाक यातना तुम्हें आ लगेगी। (73)
याद करो कि किस
तरह अल्लाह ने आद के बाद तुम्हें उनका उत्तराधिकारी बनाया और उस ज़मीन पर तुम्हें
बसा दिया, जिस ज़मीन पर तुम
अपने लिए महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-काटकर मकान बना लेते हो: अल्लाह की बरकतों
(blessings) को याद करो और
धरती पर फ़साद फैलाते न फिरो।" (74)
मगर उसकी क़ौम के
घमंडी सरदारों ने ईमान रखनेवाले लोगों को, जिसे वे बिल्कुल ही गया-गुज़रा समझते थे, कहा, "क्या तुम सचमुच ऐसा सोचते हो कि सालेह अपने रब का
भेजा हुआ पैग़म्बर [Messenger] है?" उन लोगों ने कहा, "हाँ, हम उस संदेश पर विश्वास करते हैं, जो उनके माध्यम से भेजा जाता है।" (75)
मगर उन घमंडी
सरदारों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम
विश्वास करते हो, उसे हम तो मानने
से इंकार करते हैं", (76)
उसके बाद, उन लोगों ने उस ऊँटनी के (अगले) पाँव को काटकर [hamstrung] मार डाला। फिर अपने रब के आदेश को मानने से साफ़
इंकार कर दिया और बोले, "ऐ सालेह! अगर तुम
सचमुच के रसूल हो, तो हमें जिस यातना
की धमकी देते रहते हो, उसे हम पर अब ले
आओ!" (77)
अन्त में, एक ज़बरदस्त भूचाल ने उन्हें दबोच लिया: सुबह होने
तक वे अपने घरों में मरे पड़े रह गए। (78)
फिर सालेह ने यह
कहते हुए उन लोगों से मुँह फेर लिया, "ऐ मेरे लोगो! मैंने तुम्हें अपने रब का संदेश
पहुँचा दिया और हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए सलाह देता रहा, मगर (अफ़सोस!) तुम नेक सलाह देने वालों को पसंद
नहीं करते।" (79)
हमने लूत [Lot] को भेजा और उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुमने क्यों इस अश्लील काम को अपना लिया है? दुनिया में कोई नहीं है जो इस गंदे काम में
तुमसे आगे हो। (80)
सेक्स के लिए
तुम औरतों के बजाए मर्दों के पीछे जाते हो! तुमने (अपनी हवस में) मर्यादा की सभी
सीमाएं तोड़ डाली हैं!" (81)
उसके लोगों की
तरफ़ से बस इतना ही जवाब मिला कि (वे आपस में) कहने लगे, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो इन (ईमानवाले)
लोगों को! ये लोग अपने आपको बहुत पाक-साफ़ बनते हैं!" (82)
फिर ऐसा हुआ
कि हमने लूत और उसके लोगों को (तबाह होने से) बचा लिया----- सिवाए उसकी बीवी के जो
(शैतानी करने वालों के साथ) पीछे रह गयी---- (83)
और हमने उन
बाक़ी बचे लोगों पर तबाह कर देनेवाली (पत्थरों की) बारिश की। तो देखो! शैतानियाँ
करने वालों का कैसा अंजाम हुआ। (84)
मदयन [Midian] के लोगों के पास हमने उनके भाई, शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो:
उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक स्पष्ट
निशानी आ चुकी है। (जब सामान दो) तो नाप और तौल में पूरा-पूरा दिया करो, और लोगों की चीज़ों को कम करके मत आँका करो; और ज़मीन में सारी व्यवस्था ठीक कर देने के
बाद उसमें गड़बड़ी पैदा न करो: यह तुम्हारे लिए ज़्यादा अच्छा है, अगर तुम ईमानवाले हो। (85)
"(देखो!) हर एक
रास्ते पर न बैठ जाओ, कि (आते-जाते)
लोगों को धमकियाँ देने लगो, और उन लोगों को अल्लाह के मार्ग (पर चलने) से
रोकने लगो, जो उसपर ईमान
रखते हों, और न उस मार्ग
को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, तुम गिनती में कितने थोड़े हुआ करते थे, फिर उसने तुम्हें बढ़ाकर कई गुना कर दिया। ज़रा
उनके अंजाम के बारे में सोचो, जो फ़साद फैलाया करते थे। (86)
"अगर तुममें से
कुछ लोग (अल्लाह के) उस संदेश में विश्वास रखते हों जो मैं लेकर आया हूँ, और कुछ दूसरे लोग (इस पर) विश्वास नहीं करते, तो उस समय तक धीरज से काम लो, जब तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला न कर दे।
और वह फ़ैसला करने वालों में सबसे अच्छा फ़ैसला करता है।" (87)
उसकी क़ौम के
घमंडी सरदारों ने कहा, "ऐ शुऐब! अगर तुम हमारे दीन [Religion] में नहीं लौटे, तो हम तुम्हें और तुम्हारे साथ सारे ईमान
रखने वालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करेंगे।" शुऐब ने कहा, "क्या! अगर यह (तुम्हारा धर्म) हमें बिल्कुल
भी पसंद न हो, तब भी? (88)
"अगर हमें
तुम्हारे दीन में वापस जाना पड़े, जबकि अल्लाह हमें उससे बचा चुका है, तो यह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ने
जैसा होगा: उस (दीन) में अब वापस जाने का तो कोई सवाल ही नहीं है---- हाँ, अगर हमारे रब, अल्लाह की मर्ज़ी कुछ और हो तो बात अलग है। हर
चीज़ को उसने अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। हम तो अल्लाह पर भरोसा करते हैं।
हमारे रब, तू हमारे और
हमारी क़ौम के बीच सच्चाई को उजागर कर दे (और हमारे बीच) फ़ैसला कर दे, कि सचमुच तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला
है।" (89)
उनकी क़ौम के
विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "अगर तुम शुऐब के बताए हुए रास्ते पर चले, तो सचमुच तुम घाटे में पड़ जाओगे"---- (90)
एक ज़बदस्त
भूचाल ने उन्हें धर दबोचा: अगली सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े थे; (91)
शुऐब की बातों
को झूठ मानने वालों का ऐसा हाल हुआ, मानो वे कभी वहाँ बसे ही नहीं थे; जिन लोगों ने शुऐब को मानने से इंकार किया था, असल में वही लोग घाटे में रहे---- (92)
तब शुऐब ने उन
लोगों से यह कहते हुए मुँह मोड़ लिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के
सन्देशों को तुम तक पहुँचा दिया और तुम्हारा हित देखते हुए मैंने तुम्हें सही सलाह
दी, तो जिन लोगों
ने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, ऐसे लोगों (की तबाही) पर दुखी होने का क्या
फ़ायदा है?" (93)
जब कभी हमने
किसी बस्ती में कोई रसूल भेजा, तो वहाँ के (विश्वास न करनेवाले) लोगों को
दु:ख-दर्द और तंगी में डाला, ताकि वे अपने आपको (अल्लाह के सामने) झुका
दें, (94)
फिर उसके बाद
हमने उनकी बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले। लेकिन वे कहने
लगे, "ये तंगहाली और
ख़ुशहाली तो हमारे बाप-दादा ने भी झेली थीं", और नतीजे में हमने अचानक उन्हें धर-दबोचा, जबकि उन्हें इसकी भनक तक न थी। (95)
अगर उन
बस्तियों के लोगों ने विश्वास किया होता, और अपने आपको बुराइयों से बचाया होता, तो हमने उनपर आसमानों और ज़मीन से बरकतों [blessings] की बारिश की होती, मगर उन लोगों ने सच्चाई को ठुकरा दिया, नतीजा यह हुआ कि हमने उन्हें उनके बुरे
कर्मों के चलते दंड दिया। (96)
क्या (मक्का
की) इन बस्तियों के लोगों ने अपने आपको सुरक्षित महसूस कर लिया है और वे सोचते ही
नहीं हैं कि रात के समय जबकि वे सो रहे हों, उस वक़्त भी हमारी यातना आ सकती है? (97)
और यातना दिन
चढ़े भी आ सकती है, जबकि वे
खेल-कूद में मगन हों? (98)
क्या अल्लाह
की (ढील देने की) योजना के ख़िलाफ़ वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं? अल्लाह की योजना से तो केवल घाटे में
पड़नेवाला ही सुरक्षित महसूस कर सकता है। (99)
क्या उन लोगों
को यह बात स्पष्ट नहीं है कि जिन्हें पिछली पीढ़ियों से धरती विरासत में मिल गयी
है, अगर हम चाहें
तो उनके गुनाहों पर उन्हें भी सज़ा दे सकते हैं? और हम उनके दिलों को बंद करके उस पर मुहर [Seal] लगा सकते हैं, ताकि वे कुछ भी सुन ही न सकें। (100)
(ऐ रसूल) हमने
आपको उन बस्तियों की कहानियाँ सुना दी हैं: उनके पास कितने रसूल आए, साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ आयीं, मगर जिस चीज़ को वे पहले ही मानने से इंकार
कर चुके थे, वे उसमें
विश्वास करने वाले न थे। इसी तरह, अल्लाह (हठधर्मी से) विश्वास न करनेवालों के
दिलों को बंद करके उसपर मुहर लगा देता है। (101)
हमने उनमें
ज़्यादातर लोगों को वचन देने के बाद उसको निभाते हुए नहीं पाया; हमने उनमें अधिकतर लोगों को खुले-आम नियमों
को तोड़ते हुए पाया। (102)
फिर इनके बाद
हमने मूसा [Moses] को अपनी
निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसका समर्थन करने वाले बड़े सरदारों के पास
भेजा, मगर उन लोगों
ने उसे मानने से इंकार कर दिया, और देखो! उनका अंजाम क्या हुआ जो फ़साद फैलाया
करते थे! (103)
मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसारों के रब का (भेजा
हुआ) रसूल हूँ, (104)
"मेरा यह फ़र्ज़
बनता है कि मैं अल्लाह के बारे में सिवाए सच कहने के और कुछ न कहूँ, और मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से (सच्चाई की)
स्पष्ट निशानी लेकर आया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तानों को मेरे साथ जाने
दो।" (105)
फ़िरऔन ने कहा, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो उस निशानी को पेश करो, जो तुम लेकर आए हो।" (106)
अत: मूसा ने
अपनी लाठी नीचे फेंकी, देखते ही
देखते वह, नज़र के सामने
अजगर बन गयी, (107)
और फिर उसने
अपना हाथ (अपनी बग़ल से) निकाला, तो अचानक सबके सामने वह सफ़ेद होकर चमकने लगा।
(108)
फ़िरऔन की
क़ौम के सरदार (आपस में) कहने लगे, "अरे, यह तो बड़ा माहिर जादूगर लगता है! (109)
"वह तुम्हें
तुम्हारी धरती से निकाल बाहर करना चाहता है!" फ़िरऔन ने कहा, "तो अब तुम्हारी क्या सलाह है?" (110)
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को थोड़े समय के लिए टाल दो
और इस बीच सभी शहरों में हरकारे [messengers] भेज दो, (111)
"कि वे हर
माहिर जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।" (112)
सो जादूगर
फ़िरऔन के पास पहुँच गए, और कहने लगे, "अगर हम जीत गए तो क्या हमें इनाम मिलेगा?" (113)
उसने जवाब
दिया, "हाँ, ज़रूर मिलेगा, और तुम (मेरे) ख़ास नज़दीकी लोगों में शामिल
हो जाओगे।" (114)
फिर जादूगरों
ने कहा, "ऐ मूसा! तुम
पहले (दांव) फेंकोगे या फिर हम फेंकें?" (115)
मूसा ने कहा, "तुम ही पहले फेंको।" फिर उन्होंने (लाठी
व रस्सियाँ) फेंकी, बस देखनेवालों
की आँखों पर जादू कर दिया, (करतब से)
उनमें डर पैदा कर दिया, और (सचमुच)
उन्होंने ज़बरदस्त जादूगरी दिखायी। (116)
फिर हमने मूसा
को 'वही' [Inspiration] भेजी, "तुम भी अपनी लाठी (नीचे) फेंक दो!"--
फिर देखते ही देखते-- वह लाठी उनके रचे हुए स्वांग को निगल गयी। (117)
इस तरह, सच्चाई साबित हो गयी और जो कुछ उन्होंने
(जादू के असर से) पैदा किया था, वह बेकार होकर रह गए थे: (118)
(फ़िरऔन के)
जादूगरों की हार हो गयी, और वे बुरी
तरह अपमानित हो गए। (119)
फिर ऐसा हुआ
कि सभी जादूगर घुटनों के बल गिर पड़े (120)
और बोले, "हम सारे संसारों के रब पर ईमान लाते हैं, (121)
"मूसा और हारून
के रब पर!" (122)
मगर फ़िरऔन
बोला, "तुम्हारी
हिम्मत कैसे हुई कि बिना मेरी अनुमति के, तुमने उस (रब) पर विश्वास कर लिया! यह तो एक
बड़ी साज़िश है, जो तुम लोगों ने
रची है, ताकि इस शहर
से लोगों को निकाल बाहर कर दो! अच्छा, तो तुम्हें जल्द ही (इसका नतीजा) मालूम हो
जाएगा : (123)
"मैं (तुम
लोगों का) एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ़ का पाँव कटवा दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा!" (124)
जादूगरों ने
(बिना डरे) कहा, "और इस तरह हम
अपने रब के पास लौट जाएंगे----- (125)
"हमारे ख़िलाफ़
तेरी शिकायत बस यही तो है कि जब हमारे रब की निशानियाँ हमारे पास आ गयीं, तो हमने उनपर विश्वास कर लिया। हमारे रब! हम
पर धीरज के साथ जमे रहने की ताक़त डाल दे, और हमें इस दशा में मौत दे कि हम पूरी भक्ति
के साथ तेरी आज्ञा माननेवाले रहें।" (126)
फ़िरऔन की
क़ौम के सरदारों ने उससे कहा, "मगर क्या तुम मूसा और उसके लोगों को ऐसे ही
छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में फ़साद फैलाते रहें और वे तुम्हें और तुम्हारे देवताओं को
छोड़ बैठें?" फिरऔन ने कहा, "हम उनके (बच्चों में से) लड़कों को मार
डालेंगे, और केवल औरतों
को (दासियाँ बनाकर ज़िंदा) छोड़ देंगे: वे हमारी ताक़त से दबे हुए और बेबस हैं।"
(127)
मूसा ने अपनी
क़ौम से कहा, "मदद माँगना हो
तो अल्लाह के सामने झुकते हुए माँगो और धीरज से काम लो: सारी धरती तो अल्लाह की
है---- वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसे उस (संपत्ति) का वारिस बना देता है----और
आने वाला अच्छा समय तो उन लोगों का ही है जो अपने आपको बुराइयों से बचाते
हैं।" (128)
उन लोगों ने
जवाब दिया, "तुम्हारे यहाँ
आने के बहुत पहले से ही हम पर ज़ुल्म किया जा रहा था, और तुम्हारे आने के बाद भी यह (सिलसिला) चल
रहा है।" मूसा ने कहा, "हो सकता है कि तुम्हारा रब तुम्हारे दुश्मनों
को पूरी तरह से मिटा दे, और तुम्हें इस
धरती पर उनका उत्तराधिकारी बना दे, ताकि वह यह देख सके कि तुम कैसा आचरण करते
हो।" (129)
हमने फ़िरऔन
के लोगों को वर्षों तक अकाल और फ़सल की ख़राबी जैसी मुसीबतों में डाला, ताकि शायद वे चेत जाएं व ध्यान दें, (130)
(मगर) फिर, जब उन पर कभी ख़ुशहाली आ जाती, तो वे कहते, "इस पर तो हमारा हक़ बनता था!" और जब
उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती, तो वे उसे मूसा और उसके साथियों का 'अपशगुन' [evil omen] बताते थे, मगर असल में, उनका 'अपशगुन' अल्लाह की तरफ़ से था, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग इस बात को समझ
नहीं पाए। (131)
और वे (मूसा
से) बोले, "हम पर अपना
जादू चलाने के लिए चाहे तू कैसी भी निशानियाँ हमारे सामने ले आए, हम तुझ पर विश्वास करने वाले नहीं हैं," (132)
और इसलिए, हमने उन पर (एक के बाद एक मुसीबतें) छोड़
दीं---- बाढ़, टिड्डियों (के
दल), छोटे (घुन के)
कीड़े [जुएं], मेंढक और
ख़ून-----ये सभी साफ़-साफ़ निशानियाँ थीं। (मगर) वे बड़े घमंडी, और मुजरिम लोग थे। (133)
जब कभी उनपर
(प्लेग के रूप में) यातना आ पड़ती, तो वे कहते थे, "ऐ मूसा, जो वादा तेरे रब ने तेरे साथ कर रखा है, उस आधार पर तू अपने रब से हमारे लिए दुआ कर
दे: अगर तूने हमें इस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दिला दिया, तो हम तुझ पर विश्वास कर लेंगे, और इसराईल की सन्तान को तेरे साथ जाने देंगे," (134)
मगर जब हमने
उन्हें उस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दे दिया और उन्हें एक तय किया हुआ समय भी
दिया (ताकि वे विश्वास करने का वादा पूरा कर सकें)-----तो क्या देखते हैं कि
उन्होंने अपना वादा तोड़ डाला। (135)
और इस तरह, चूँकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से
इंकार कर दिया, और उन्हें
पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, तो फिर हमने उनसे बदला लिया: हमने उन्हें
समंदर में डुबा दिया, (136)
और जिन
(इसराइली) लोगों पर (बरसों से) ज़ुल्म हुआ था, हमने उन्हें उस भू-भाग के पूरब और पश्चिम के
हिस्सों [सीरिया व फ़िलिस्तीन] का वारिस बना दिया, जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी। (इस तरह) तुम्हारे रब ने इसराईल की
सन्तान के साथ जो भलाई का वादा कर रखा था, वह पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धीरज [सब्र] से काम लिया, और हमने फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ
तहस-नहस कर दिया, जिसे वे
(ख़ूबसूरती से) बनाते थे और जिन (ऊँचे भवनों) का निर्माण किया करते थे। (137)
और इसराईल की
सन्तान को हम (सुरक्षित) समंदर पार करा लाए, फिर जब वे ऐसे लोगों को पास से गुज़रे जो
मूर्तियों की पूजा करते थे, तो वे बोले, "ऐ मूसा! उन लोगों के देवताओं जैसा हमारे लिए
भी एक देवता बना दो।" मूसा ने कहा, "तुम सचमुच बड़े ही बेवक़ूफ़ [व जाहिल] लोग हो:
(138)
ये लोग जिन
(देवताओं) की पूजा में लगे हुए हैं, वह तो बर्बाद होकर रहेगा, और जो कुछ ये करते आ रहे हैं, वह व्यर्थ व किसी काम का नहीं है। (139)
मैं तुम्हारे
लिए अल्लाह को छोड़कर किसी और देवता को क्यों ढूढूँ, जबकि उसने दूसरे तमाम लोगों पर तुम्हें
श्रेष्ठता दी है?" (140)
[ऐ इसराईल की
संतानों!] याद करो कि हमने किस तरह तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से बचाया था, जिन्होंने तुम्हें बुरी से बुरी तकलीफ़ों में
डाल रखा था, वे तुम्हारे
बेटों को मार डालते और केवल तुम्हारी औरतों को (ज़िंदा) छोड़ देते थे---- इसमें
तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी कठिन परीक्षा थी। (141)
हमने मूसा के
लिए (सीना/Sinai के पहाड़ पर
इबादत करने को) तीस रातों की अवधि तय की थी, फिर उसमें दस और बढ़ा दिया: उसके रब की ठहराई
हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई। मूसा ने (जाने से पहले) अपने भाई हारून [Aaron] से कहा था, "मेरी (जगह पर) तुम मेरी क़ौम के लोगों को
संभाल लेना: हर मामले में सही तरीक़े से काम करना, और उन लोगों के पीछे न चल पड़ना जो फ़साद
फैलाते हैं।" (142)
जब मूसा तय
किए हुए समय पर (सीना के पहाड़ पर) पहुँचा, और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह कहने लगा, "मेरे रब! मैं तुझे देखना चाहता हूँ: मुझे देख
लेने दे!" अल्लाह ने कहा, "तुम मुझे कभी नहीं देख सकोगे, मगर उस पहाड़ [तूर] को ध्यान से देखो: अगर वह
पहाड़ अपनी जगह मज़बूती से खड़ा रह गया, तो फिर तुम मुझे देख लोगे", और जब उसके रब ने अपने आपको उस पहाड़ पर
प्रकट किया, तो उसे
चकनाचूर कर दिया: मूसा बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया, तो कहा, "महिमावान है तू! मैं (गुनाहों की) तौबा के
लिए तेरी ही ओर झुकता हूँ! और इस बात पर (कि दुनिया में अल्लाह को कोई नहीं देख
सकता है) मैंं सबसे पहले
विश्वास करता हूँ!" (143)
अल्लाह ने कहा, "ऐ मूसा! मैंने तुम्हें अपने संदेश [तोरात/Torah] देकर, और तुमसे सीधे बात करके (तुम्हें चुन लिया है, और) तुम्हारा दर्जा दूसरे लोगों के मुक़ाबले
में ऊँचा कर दिया है: जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है, उसे सँभालकर रखो; और शुक्र अदा करने वालों में से हो
जाओ।" (144)
हमने उनके लिए
तख़्तियों [Tablets] पर (उपदेश की)
हर चीज़ लिख दी थी, जो हर चीज़ को
सिखाती और विस्तार से समझाती भी थी, और कहा, "उनको मज़बूती से थामे रहो, और अपने लोगों को आज्ञा दो कि वे उनकी
बेहतरीन शिक्षाओं को अपनाएँ। मैं तुम्हें ऐसे लोगों का (आख़िरत में) अंत दिखा दूँगा, जो लोग आज्ञा नहीं मानते और उसके ख़िलाफ़ काम
करते हैं। (145)
मैं अपनी
निशानियों से उन लोगों को दूर रखूँगा, जो ज़मीन पर बिना अधिकार के घमंड में चूर रहते
हैं, और वे ऐसे हैं
कि अगर वे हर एक निशानी भी देख लें, तब भी वे उस पर विश्वास नहीं करेंगे; अगर वे सही मार्गदर्शन का रास्ता देख लें, तो वे उस रास्ते को नहीं अपनायेंगे, लेकिन अगर वे गुमराही का मार्ग देख लें, तो उसी रास्ते पर चल पड़ेंगे। यह इसलिए है
क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार किया और उन पर ज़रा भी ध्यान
नहीं दिया: (146)
जिन लोगों ने
हमारी निशानियों को और आख़िरत में (हिसाब-किताब के लिए) होने वाली मुलाक़ात को झूठ
समझकर ठुकरा दिया, तो उनके सारे
कर्म बेकार जाएंगे------ उन्हें जो बदला दिया जाएगा, वह इसके सिवा कुछ न होगा कि उन्हीं के कर्मों
का फल होगा। (147)
और जबकि मूसा
वहाँ मौजूद नहीं था, उसकी क़ौम के
लोगों ने एक बछड़े के आकार की चीज़ की पूजा करना शुरू कर दिया जिसमें से गाय की-सी
आवाज़ निकलती थी-----यह बछड़ा उनके ज़ेवरों (को गलाने) से बनाया गया था। क्या वे
इतना भी नहीं देख पाए कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई रास्ता ही
दिखाता है? तब भी वे उसकी
पूजा करने लगे: वे शैतानी करने वाले लोग थे। (148)
फिर जब ऐसा
हुआ कि वे (शर्म से) हाथ मलने लगे, और उन्हें अपने किए पर पछ्तावा हुआ और उन्हें
इस बात का एहसास हो गया कि वे ग़लत काम कर रहे थे, तो कहने लगे, "अगर हमारे रब ने हम पर दया न की और उसने हमें
माफ़ न किया, तो हम बर्बाद
हो जाएँगे!" (149)
जब मूसा
ग़ुस्से और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम के पास वापस आया, तो उसने कहा, "मेरे यहाँ नहीं होने पर तुम लोगों ने कितना
बुरा और शैतानी काम किया है! क्या तुम अपने रब के फ़ैसले को समय से पहले ले आने के
लिए इतने उतावले हो गए?" फिर उसने (तोरात की) तख़्तियाँ नीचे फेंक दीं और अपने भाई [हारून] का बाल
पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। हारून बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! इन लोगों ने मुझ पर क़ाबू
पा लिया था! और क़रीब-क़रीब मुझे मार ही डाला था! अतः मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने
का मौक़ा न दे और मुझे इन शैतानियाँ करनेवालों का साथी न ठहरा।" (150)
मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे; और हमें अपनी रहमत की छाया में ले ले: तू तो
दया करने वालों में सबसे बड़ा दयावान है।" (151)
जिन लोगों ने
बछड़े की पूजा शुरू कर दी, उनपर उनके रब
का क़हर टूटेगा, और इस जीवन
में वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे।" उन लोगों को हम ऐसा ही बदला देते हैं जो ऐसा
झूठ गढ़ते रहते हैं, (152)
मगर तुम्हारा
रब तो उन लोगों के प्रति बेहद माफ़ करनेवाला और अत्यंत दयावान है, जो अगर ग़लती कर बैठते हैं, तो फिर उसके बाद (अपनी ग़लती सुधारते हुए)
तौबा करते हैं, और सचमुच ईमान
रखते हैं। (153)
जब मूसा का ग़ुस्सा ठंढा हुआ, तो उसने तख़्तियों को उठाया, जिसमें लोगों के मार्गदर्शन की बातें लिखी
हुई थीं, और यह उन
लोगों के लिए रहमत थीं जो अपने रब का डर रखते हैं। (154)
मूसा ने अपने
लोगों में से सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय (पर तूर पहाड़ जाने) के लिए
चुना, फिर जब उन
लोगों को एक थरथराहट ने आ पकड़ा, तो उसने दुआ की, "मेरे रब! अगर तूने यही करने के लिए इन्हें
चुना था, तो तू बहुत
पहले ही इनको, और मुझको भी
मिटा चुका होता। तो क्या अब तू हमें इसलिए बर्बाद कर देगा कि हममें से कुछ बेवक़ूफ़
आदमियों ने ऐसा किया था? यह तो तेरी ओर
से एक परीक्षा मात्र है---- इसके द्वारा तू जिसको चाहे भटकता छोड़ दे और जिसे चाहे
सही रास्ता दिखा दे----- और तू ही हमारी रक्षा करनेवाला है, सो हमें माफ़ कर दे और हम पर दया कर, और तू ही माफ़ करने वालों में सबसे बेहतर
है।" (155)
"[या ख़ुदा!] हमारे
लिए इस संसार में भी अच्छाई लिख दे, और आने वाली दुनिया में भी। हम सच्चे दिल से
तेरी ही तरफ़ लौटते हैं।" अल्लाह ने कहा, "मैं जिस किसी पर चाहता हूं, अपनी यातना ले आता हूं, लेकिन मेरी दयालुता व रहमत का हाल यह है कि
उसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है।
“मैं अपनी रहमत
उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो बुराइयों से बचते हैं, और उचित ज़कात देते है; और जो हमारी आयतों में विश्वास रखते हैं; (156)
और उस रसूल [Messenger] के पीछे चलते हैं, जो ऐसा नबी [Prophet] है कि (न तो यहूदी नस्ल का है, और) न पढ़ा-लिखा है, जिसका ज़िक्र वे अपने यहाँ तौरात [Torah] में लिखा पाते हैं, और इंजील [Bible] में भी---- जो उन्हें अच्छा व सही काम करने
का हुक्म देता है और बुराई व ग़लत काम करने से रोकता है, जो उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल [वैध/ Lawful] और बुरी चीज़ों को हराम [अवैध/ Unlawful] ठहराता है, और उन्हें उनके बोझ से और गले में पड़े हुए उन
लोहे के बन्धनों से मुक्ति देता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः ऐसे ही लोग हैं
जो उस पर ईमान रखते हैं, उसकी इज़्ज़त
करते हैं और उसकी मदद करते हैं, और वह उस रौशनी के पीछे चलते हैं, जो उसके साथ भेजी गयी है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।" (157)
[ऐ मुहम्मद!]
कह दें, "ऐ लोगो! मैं
तुम सब लोगों के लिए अल्लाह का रसूल हूँ, यह उसकी तरफ़ से है जिसके नियंत्रण में
आसमानों और ज़मीन की सल्तनत है; उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है, वही ज़िंदगी और मौत देता है, अतः विश्वास करो अल्लाह पर और उसके रसूल पर, जो ऐसा पैग़म्बर [Prophet] है कि पढ़ा-लिखा नहीं है, जो अल्लाह पर और उसकी बातों पर विश्वास रखता
है। तो उसके बताए हुए रास्ते पर चलो, ताकि तुम्हें शायद मार्गदर्शन मिल जाए।"
(158)
मूसा की क़ौम
में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो सच्चाई का रास्ता दिखाते थे, और उसी के मुताबिक़ इंसाफ़ के साथ काम करते थे।
(159)
हमने उन्हें
बारह क़बीलों में, अलग-अलग
समुदाय के रूप में बाँट दिया था, और, जब मूसा के लोगों ने उससे पीने का पानी माँगा, तो हमने मूसा को 'वही' [Revelation] द्वारा बता दिया कि अपनी लाठी से (एक ख़ास) चट्टान
पर मारो, ताकि उससे
पानी के बारह सोते फूट निकले। हर गिरोह को अपने पीने के घाट मालूम थे; हमने उनपर बादलों से छाया कर दी थी, और उनके (खाने के) लिए 'मन्न' और 'सलवा' [बटेर] उतारा था, [और कहा,] "हमनें तुम्हें जो चीज़े दे रखी हैं, उनमें से अच्छी चीज़ें खाओ।" उन्होंने
(हुक्म न मानकर) हमारा तो कुछ नहीं बिगाड़ा, ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे। (160)
जब उनसे कहा
गया था, "इस बस्ती में
जाकर बस जाओ और इसमें जहाँ चाहो, आराम से खाओ-पियो, मगर यह कहते हुए अंदर जाना, “[हित्ता] यानी हमारा बोझ उतार दे!”, और दरवाज़े से सिर झुकाकर दाख़िल होना: हम तुम्हारे गुनाहों को क्षमा
कर देंगे, और जो अच्छा
काम करते हैं, उनके इनाम और
ज़्यादा बढ़ा देंगे।" (161)
लेकिन जैसा
कहने के लिए उनसे कहा गया था, उनमें से शैतानियाँ करने वालों ने उसके
शब्दों में कुछ फेर-बदल कर (अनर्थ कर) दिया, अत: उनके गुनाहों के चलते हमने आसमान से उनके
लिए यातना भेजी। (162)
[ऐ रसूल!] आप इन
(इसराईल की संतानों) से उस बस्ती के बारे में पूछें जो समंदर के किनारे थी; किस तरह उनके लोगों ने 'सब्त' [Sabbath] के दिन (मछली का शिकार नहीं करने) के मामले में
अपना वचन तोड़ दिया, होता यह था कि
मछलियाँ केवल उसी (सब्त के) दिन उनके पास पानी के ऊपर आ जाती थीं, मगर सप्ताह के दूसरे दिन कभी नहीं आतीं-----इस
तरीक़े से हमने उनकी परीक्षा ली: क्योंकि वे आज्ञा नहीं मानते थे----- (163)
इस बस्ती में से
कुछ लोगों ने (नसीहत करने वालों से) पूछा, "तुम ऐसे लोगों को नसीहत देने के लिए क्यों बेकार
में परेशान होते हो, जिन्हें अल्लाह
(उनकी बुराइयों के कारण) बर्बाद कर देगा या कम से कम कठोर यातना तो देगा ही?" [नसीहत करने वालों ने] जवाब दिया, "यह इसलिए कि तुम्हारे रब की तरफ़ से हम पर कोई
इल्ज़ाम न रहे (कि हमने अपना काम न किया), और इसलिए भी कि शायद वे (नसीहत की) बातों पर
ध्यान दें।" (164)
फिर जब उन लोगों
ने (उन नसीहतों) को भुला डाला, जो उन्हें दी गई थीं, तब हमने उन लोगों को तो बचा लिया जो बुराई करने से
रोकते थे, मगर ग़लत काम करने
वालों को, लगातार आज्ञा न
मानने के कारण, कठोर सज़ा में जकड़
लिया। (165)
फिर जब वे अपने
घमंड में (हदें पार करने लगे, और) वही कुछ करने लगे, जिससे उन्हें रोका गया था, तो हमने उनसे कहा, "बन्दर जैसे हो जाओ! ज़ात बाहर हो जाओ!" (166)
और उसके बाद, तुम्हारे रब ने घोषणा कर दी थी, कि वह क़यामत के दिन तक, उन पर ऐसे लोगों को बैठाता रहेगा, जो उनको दर्दनाक तकलीफ़ें पहुँचाते रहेंगे।
तुम्हारा रब (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत तेज़ है, मगर साथ में वह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयालू
भी है। (167)
हमने उन्हें
अलग-अलग समुदायों में बाँटकर ज़मीन पर फैला दिया----- कुछ उनमें से अच्छे व नेक थे, और कुछ उनमें इन जैसे नहीं थे: हमने उन्हें
अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनको जाँचा-परखा, ताकि शायद वे सभी (अच्छाई की तरफ़) लौट आएँ। (168)
और, उनके बाद जो पीढ़ियाँ आयीं, हालाँकि उन्हें आसमानी किताब [तोरात] विरासत
में मिली थीं, तब भी, वे इसी तुच्छ संसार के थोड़े (समय टिकनेवाले)
फ़ायदे को लेने में ही लगे रहे, और कहते थे, "हमें ज़रूर माफ़ कर दिया जाएगा", और अगर इसी तरह के दूसरे (भ्रष्ट) फ़ायदे भी
उनके हाथ आ जाते, तो (बिना ग़लती
पर पछताए) ज़रूर उसे भी ले लेते। क्या उनसे यह क़सम नहीं ली गयी थी, जो कि किताब में लिखी हुई थी, कि वे अल्लाह के बारे में सिवाए सच के और कुछ
न कहेंगे? और उन लोगों
ने (किताब के) विषयों को अच्छी तरह से पढ़ा था। जिन लोगों ने अल्लाह को अपने ध्यान
में रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया है, उनके लिए आख़िरत का घर कहीं अच्छा है।
"तो तुम अपनी बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते?" (169)
मगर (इसराईल
की संतान में से) जो लोग किताब को मज़बूती से थामे रहे, और पूरी पाबंदी से नमाज़ को क़ायम रखा, तो अच्छे व नेक लोगों के कर्मों का बदला देने
से हम कभी मना नहीं करते हैं। (170)
जब हमने पहाड़
को ऊँचा उठाकर परछाईं की तरह उन लोगों के ऊपर कर दिया, और उन्हें लगने लगा कि वह उनके दम पर
गिरनेवाला है, तो हमने कहा, "जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा है, उसे मज़बूती से थामे रहो, और याद रखो जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, ताकि तुम बुराइयों से बचते रहो।" (171)
[ऐ रसूल! यह याद
दिलाएं], जब आपके रब ने
आदम की सन्तान की पीठों से उनके बच्चों को बाहर निकाला, और उन्हें स्वयं अपना गवाह बनाया, तो अल्लाह ने कहा, "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" और वे जवाब में बोले, "हाँ, हम गवाही देते हैं।" और ऐसा इसलिए किया कि
तुम क़यामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी", (172)
या, यह कहने लगो कि "असल में, हमसे पहले तो, हमारे बाप-दादा थे जिन्होंने अल्लाह के साथ
साझेदार [Partners] ठहरा लिए थे, हम तो बस उनके बाद आने वाली पीढ़ियों में से
हैं: क्या तू हमें बर्बाद कर देगा, इस कारण से उन्होंने झूठी बातें गढ़ीं?" (173)
इस तरह, हम अपने संदेशों को अलग-अलग करके समझाते हैं, ताकि शायद वे सच्चाई के रास्ते की ओर लौट आएं। (174)
[ऐ रसूल!], आप उन्हें उस आदमी की कहानी सुना दें जिसे
हमने अपने संदेश [आयतें] दिए थे: किन्तु वह उनसे जान छुड़ाकर भाग निकला, इस तरह, शैतान ने उसे अपने पीछे चलने वाला बना लिया
और वह सीधे मार्ग से भटककर रह गया---- (175)
अगर हमारी यह
इच्छा रही होती, तो इन
निशानियों का उपयोग करके हम उसका दर्जा ऊँचा कर सकते थे, मगर इसके बजाय वह तो धरती के साथ चिमट गया और
अपनी इच्छा के पीछे चल पड़ा----उसकी मिसाल एक कुत्ते की तरह थी, अब चाहे तुम उसे दौड़ाकर भगाओ या उसे चुपचाप
छोड़ दो, वह ज़बान बाहर
निकालकर हाँफता रहेगा। ऐसी ही है उनकी छवि जो हमारी निशानियों को मानने से इंकार
करते हैं। तो [ऐ रसूल], आप उन्हें यह
कहानी सुना दें, ताकि वे
सोच-विचार कर सकें। (176)
कितनी बुरी
मिसाल है उन लोगों की जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया! वे
ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे: (177)
जिस किसी को
अल्लाह ने मार्ग दिखा दिया, तो वही असल में सीधा व सही मार्ग पानेवाला है, और जिस किसी को वह भटकता छोड़ दे, तो ऐसे ही लोग नुक़सान उठाने वाले हैं। (178)
हमने बहुत-से
जिन्नों और आदमियों को पैदा किया है, जिनकी क़िस्मत में जहन्नम जाना लिखा हुआ है।
उनके पास दिल है मगर वे इसका उपयोग समझने-बूझने में नहीं करते हैं, उनके पास आँखें है, मगर वे देखने के काम नहीं आतीं, उनके पास कान हैं, मगर उसका उपयोग सुनने में नहीं करते। वे
चौपायों की तरह हैं, नहीं, बल्कि वे उनसे भी अधिक भटके हुए हैं: यही लोग
हैं जो पूरी तरह से (नसीहतों को) भुलाए बैठे हैं। (179)
सारे अच्छे
(गुणोंवाले) नाम अल्लाह के ही हैं: तो जब उसको पुकारना हो, तो तुम इन्हीं (नामों से) उसे पुकारो, और उन लोगों से दूर रहो, जो (मतलब बदलने के लिए) इन नामों के साथ
छेड़-छाड़ करते हैं----- जो कुछ वे करते हैं, उसका पूरा-पूरा बदला उन्हें दिया जाएगा। (180)
हमने जिन्हें
पैदा किया, उनमें से कुछ
समूह ऐसे लोगों का है जो सच्चाई का रास्ता दिखाता है और उसी के अनुसार न्याय से
काम लेता है। (181)
मगर जिन लोगों
ने हमारे संदेशों को झुठा बताते हुए ठुकरा दिया, हम उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके, इस तरह उनके अंत की ओर ले जाएँगे कि उन्हें
पता तक न चलेगा: (182)
मैं उन्हें
बीच-बीच में ढील दूँगा, मगर मेरी
योजना बिल्कुल पक्की है। (183)
क्या उनके
दिमाग़ में यह बात नहीं आती कि उनके साथ (वर्षों) रहनेवाला आदमी [मुहम्मद], कोई पागल नहीं है, बल्कि वह तो साफ़-साफ़ चेतावनी दे रहा है? (184)
क्या उन लोगों
ने आसमानों और ज़मीन की सल्तनत और वह तमाम चीज़ें जो अल्लाह ने पैदा की हैं, उन पर कभी विचार नहीं किया, और यह कि इन चीज़ों के समाप्त हो जाने की घड़ी
शायद नज़दीक आ लगी हो? आख़िर इस
(क़ुरआन के संदेश) के बाद अब कौन सी (दूसरी निशानियाँ) हो सकती हैं, जिस पर ये विश्वास करेंगे? (185)
जिन्हें
अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो कोई नहीं
है जो उन्हें सही रास्ता दिखा सकता है: अल्लाह उन्हें अपनी अकड़ में भारी ग़लतियाँ
करने के लिए छोड़ देता है। (186)
[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़ियामत] के बारे में पूछते
हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास
है: केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आएगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी
समय होगा, जब वह (समय)
आएगा, तो तुम पर बस
अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं।
कह दें, "(क़यामत कब
आएगी), इस बात की
जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते
हैं।" (187)
[ऐ रसूल!], आप कह दें, "किसी चीज़ से फ़ायदा या नुक़सान होना, मेरे नियंत्रण में नहीं है, (यहाँ तक कि) ख़ुद मुझे अपने आप पर भी क़ाबू
नहीं, जब तक कि
अल्लाह न चाहे: जो चीज़ छिपी हुई है, अगर मुझे उसकी जानकारी होती, तो मेरे पास ढेर सारी अच्छी चीज़ें होतीं और
मुझे कोई नुक़सान न पहुँचता। मैं इसके सिवा क्या हूँ कि बस (इंकार व बुरे कर्मों के
लिए) चेतावनी देनेवाला, और उन लोगों
को ख़ुशख़बरी सुनानेवाला जो ईमान रखते हैं।" (188)
वही [अल्लाह]
है, जिसने तुम
सबको एक अकेली जान [Soul] से पैदा किया, और उसी से फिर उसका (मादा) जोड़ा बनाया, ताकि वह उसके पास जाकर सुकून पा सके: फिर जब
कोई मर्द अपनी बीवी के साथ सोता है और उसकी बीवी को हल्का सा बोझ [बच्चा] ठहर जाता
है, फिर वह उसे
लिए हुए यहाँ-वहाँ फिरती रहती है, फिर जब (गर्भ बढ़ा) तो वह भारी हो जाती है, तब (मर्द और औरत) दोनों अपने रब, अल्लाह को पुकारते हैं, "हम ज़रूर तेरा शुक्र अदा करनेवाले बनकर
रहेंगे, अगर तू हमें
भला-चंगा बच्चा दे दे।" (189)
लेकिन जब हमने
उन्हें भला-चंगा बच्चा प्रदान कर दिया, तो (बजाए केवल अल्लाह का शुक्र मानने के)
दूसरों को उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहराने लगे। (190)
अल्लाह के साथ
वे जिन्हें उसका साझेदार ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा व महान है! अल्लाह के
साथ आख़िर कैसे वे (ख़ुदायी में) दूसरों को साझेदार ठहरा लेते हैं, जबकि वे कोई चीज़ भी पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो ख़ुद ही पैदा किए गए हैं, (191)
और यह कि वे
उनकी कुछ भी मदद नहीं कर सकते, यहाँ तक कि वे ख़ुद अपनी ही मदद नहीं कर सकते
हैं? (192)
अगर तुम
[ईमानवाले], ऐसे लोगों को
सही मार्ग दिखाने के लिए बुलाओ, तो वे तुम्हारे पीछे नहीं आएँगे: अब चाहे तुम
उन्हें बुलाओ या चुप-चाप रहो, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। (193)
अल्लाह को
छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो, वे भी तुम्हारे ही जैसे (पैदा किए हुए) बन्दे
हैं। अतः उन्हें (परेशानी में) पुकारकर देखो, फिर अगर तुम (अपनी मान्यताओं में) सच्चे हो, तो उन्हें (तुम्हारी पुकार का) जवाब देना
चाहिए! (194)
क्या इन
(पत्थर की मूर्तियों) के पास चलने के लिए पाँव हैं, किसी चीज़ को पकड़ने के लिए हाथ हैं, देखने के लिए आँखें हैं, या उनके पास सुनने के लिए कान हैं? [ऐ रसूल!] आप कह दें, "बुला लाओ उन सब (देवताओं) को, जिन्हें तुमने अल्लाह का साझेदार [Partners] ठहरा रखा है! फिर मेरे ख़िलाफ़ कोई साज़िश रचो!
और मुझे बिल्कुल भी मत छोड़ो! (फिर देखो क्या होता है!) (195)
मेरा रखवाला
तो बस अल्लाह है: उसी ने यह किताब [क़ुरआन] उतारी है, और वही है जो अच्छे व सच्चे लोगों की रक्षा
करता है, (196)
मगर उसे छोड़कर
जिन्हें तुम पुकारते हो, वे तुम्हारी
कोई मदद नहीं कर सकते, अरे वे तो ख़ुद
अपनी भी मदद नहीं कर सकते।" (197)
अगर तुम
[ईमानवाले] ऐसे लोगों को सही मार्ग की ओर बुलाओ, तो वे कभी तुम्हारी पुकार नहीं सुनते हैं। [ऐ
रसूल!] अगर आप उनको देखें, तो ऐसा लगेगा
कि वे आपकी तरफ़ ताक रहे हैं, मगर असल में वे आपको नहीं देखते। (198)
(फिर भी)
उदारता व क्षमा [Tolerance] से काम लें, और जो सही काम है उसका हुक्म देते रहें:
जाहिलों की तरफ़ ध्यान न दें। (199)
अगर शैतान
तुम्हें कुछ (ग़लत) करने पर उकसाए, तो अल्लाह की शरण माँगो---- वह सब कुछ सुनता, सब कुछ जानता है---- (200)
जो लोग अल्लाह
से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उन्हें जब शैतान कुछ (ग़लत) करने पर उकसाता है, तो उन्हें तुरंत अल्लाह का ध्यान हो आता है, और उनकी आँखें खुल जाती हैं; (201)
शैतानों के
पीछे चलने वाले लोगों को, शैतान और अधिक
गुमराही में लगातार घसीटता हुआ लिए जाता है, और फिर वे रुक नहीं सकते। (202)
[ऐ रसूल], जब आप उनके पास कोई नई आयत [निशानी] लेकर
नहीं जाते हैं, तो वे कहते
हैं, "क्या तुम कोई
एक निशानी की माँग नहीं कर सकते?" कह दें, "मेरे रब की तरफ़ से जो 'वही' [Revelation] मुझ पर उतारी जाती है, मैं तो बस उसी को दोहरा देता हूँ: आपके रब की
तरफ़ से उतरी हुई ये आयतें [क़ुरआन], (लोगों में) गहरी समझ बढ़ाती हैं, और ईमान रखनेवालों के लिए यह रास्ता दिखाने
वाली और रहमत हैं," (203)
तो [मुसलमानो], जब क़ुरआन पढ़ी जाए तो उसे ध्यान से और ख़ामोशी
से सुना करो, ताकि तुम पर
दया की जा सके। (204)
[ऐ रसूल!], अपने रब को मन ही मन में याद किया करें, सुबह के वक़्त भी और शाम के वक़्त भी, पूरी विनम्रता और (रब से) डरते हुए, और ज़बान से भी पुकारें, बिना ऊँची आवाज़ किए हुए ----- और उन लोगों
में से न हो जाएं जो इन बातों को बिल्कुल भुलाए बैठे हैं------ (205)
यहाँ तक कि जो
[फ़रिश्ते] आपके रब के सामने मौजूद रहते हैं, वे कभी अपनी अकड़ दिखाते हुए उसकी बंदगी न
करें, ऐसा कभी नहीं
होता: वे उसकी महिमा का बखान (हमेशा) करते रहते हैं और उसके सामने सिर झुकाए रहते
हैं। (206)
नोट:
2: दिल बेचैन
रहने के बारे में देखें 6: 33-36; 20:2
15: शैतान ने
अल्लाह से उस वक़्त तक ज़िंदा रहने की इजाज़त मांगी थी जब तक इंसानों को दोबारा ज़िंदा
करके उठाया जाएगा। मगर उससे कहा गया कि वह अल्लाह द्वारा तय किए वक़्त तक ही ज़िंदा
रहेगा।
23: अल्लाह ने आदम (अलै) को अपनी ग़लतियों की माफ़ी
माँगने के लिए यही कलमे सिखाए थे, देखें सूरह बक़रा
(2: 37). अगर एक तरफ़ अल्लाह ने शैतान को मुहलत देकर
उसे इंसान को बहकाने की सलाहियत दी, तो दूसरी तरफ़
इंसान को तौबा करने और माफ़ी माँगने के तरीक़े भी सिखा दिए। अब अगर आदमी शैतान के बहकावे में आकर कोई गुनाह
कर भी बैठे तो उसे तुरंत अपने किए पर शर्मिंदा होना चाहिए और दोबारा ऐसा न करने का
पक्का इरादा करते हुए अपने गुनाहों की माफी माँगनी चाहिए।
26: जिस तरह कपड़ा बदन के नंगेपन को बाहर से
छिपाता है, उसी तरह अपने अंदर की बुराई को छिपाने के लिए
बुराइयों से बचते रहने वाला "परहेज़ का कपड़ा" सबसे अच्छा होता है।
28: इस आयत में अरब की एक अजीब रस्म की तरफ़ शायद
इशारा है। क़ुरैश क़बीले के लोग चूँकि काबा की देखरेख करते थे, इसलिए पूरे अरब में उनकी बड़ी इज़्ज़त थी, जब दूसरे क़बीले के बुतपरस्त लोग काबा की
तीर्थयात्रा के लिए आते,
तो उसके गिर्द 7 बार चक्कर लगाने [तवाफ़] के लिए क़ुरैश क़बीले
से पवित्र कपड़े माँगते थे,
अगर कपड़े न
मिलते, तो नंगे ही तवाफ़ करते थे क्योंकि उनका मानना
था कि जिन कपड़ों में हमने गुनाह किए हुए हैं, उन कपड़ों में
कैसे तवाफ़ करें। उन लोगों का कहना था कि उनके बाप-दादा भी ऐसा ही करते आए हैं। मज़े
की बात यह थी कि केवल क़ुरैश के लोग ही कपड़े पहनकर तवाफ़ कर सकते थे जबकि गुनाह तो
वे भी करते थे! यहाँ इस रस्म की निंदा की गई है।
32: "सजने-सँवरने" से यहाँ मतलब कपड़ा पहनने
से है, न कि ज़ेवर से है, देखें 7:26. जिस तरह लोगों ने अपने मन-मर्ज़ी से कपड़े पहनकर तवाफ़ करने को मना कर रखा था, उसी तरह खाने की कुछ चीज़ें भी हराम [अवैध] कर
दी थी जिसका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 136, 145,147) में है। .....इस दुनिया की ज़िंदगी के मज़े ईमान रखने वाले
और ईमान न रखने वाले दोनों ही उठाते हैं, जबकि आख़िरत की
ज़िंदगी के मज़े केवल ईमानवालों के लिए हैं।
33: यहाँ "गुनाह की चीज़ों" से मतलब
नशीले पदार्थ से समझा गया है, जिसका संबंध
खाने-पीने की चीज़ों से है और जो अक्सर गुनाह करने पर उभारता है, देखें 2:219.
37: यहाँ साफ़ कर दिया गया है कि दुनिया में
अल्लाह रोज़ी देने के मामले में ईमानवालों और सच्चाई से इंकार करनेवाले [काफ़िरों]
में कोई भेदभाव नहीं करता है। लेकिन अगर किसी बुरे आदमी की रोज़ी बहुत ज़्यादा हो, तो इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उसे अल्लाह
बहुत पसंद करता है जैसा कि मक्का के लोग समझा करते थे।
42: जिस आदमी में जितनी सलाहियत और ताक़त है, उसी के अनुसार ही उसे अच्छे काम करने हैं।
46: जन्नत वाले और जहन्नम वाले दो समूहों के बीच
की ऊँचाई वाली जगह को ही "अ'राफ़" कहा
गया है। जन्नतवाले लोगों के चेहरे चमकते हुए होंगे, जबकि जहन्नमवाले लोगों के चेहरे मुरझाए हुए
होंगे।
53: यानी वे लोग क़यामत के आने का ही इंतज़ार कर
रहे हैं, मगर क़यामत आ जाने के बाद विश्वास कर लेने से
तो कोई फायदा नहीं होगा।
54: ज़मीन और आसमानों को छ: दिनों में बनाया गया, मगर शायद वह एक दिन हमारे एक दिन के बराबर
नहीं होगा, देखें 22: 47; और 32: 5, जहाँ एक दिन हमारे 1000 साल के बराबर बताया गया है। इसी तरह, फ़ैसले का दिन हमारे समय के 50,000 साल के बराबर हो सकता है (देखें 70:4).
इसके साथ ही
अल्लाह ने सिंहासन सँभालते हुए काम-काज की
व्यवस्था जारी कर दी,
मगर चूँकि
अल्लाह का कोई शारीरिक रूप नहीं होता, इसलिए उसके
सिंहासन सँभालने को इस दुनिया में समझा जाने वाला सिंहासन नहीं समझना चाहिए।
55: ऊँची आवाज़ में दिखावा करते हुए दुआ माँगना या
ऐसी चीज़ माँगना जो जायज़ न
हो या मुमकिन न
हो, ये सब मर्यादा तोड़ने वाली चीज़ें हैं।
58: जिन लोगों में सच्चाई को पाने की चाहत होती
है, वे तो अल्लाह की बातों से फ़ायदा उठाते हैं, लेकिन अगर दिलों में ज़िद्द और नफ़रत हुई तो वे
अच्छी बातों से कोई लाभ नहीं उठा सकते।
59: नूह (अलै) ने अपनी क़ौम को क़रीब 950 साल तक सच्चाई की शिक्षा दी (29: 14), मगर कुछ निचले तबक़े के लोगों को छोड़कर
ज़्यादातर लोग सच्चाई को मानने से इंकार करने की ज़िद्द पर अड़े रहे। इस बीच वहाँ
मूर्तिपूजा बहुत बढ़ गई थी,
नूह (अलै) ने
अपने लोगों को आने वाली यातना से भी डराया, मगर वे न माने, अंत में ज़बरदस्त बाढ़ में ईमानवालों को छोड़कर
सब कुछ बह गया जिसका वर्णन बहुत से सूरह में आया है। देखें 11: 25-49; 23: 23; 26: 105; 54: 9 आदि।
65: आद की क़ौम अरब की शुरुआती नस्ल की एक क़ौम थी
जो कि ईसा (अलै) से दो हज़ार साल पहले यमन के हज़रमौत के पास आबाद थी। ये लोग अपने
शारीरिक डील-डौल और पत्थरों को काटने के हुनर के लिए जाने जाते थे। धीरे-धीरे वे
लोग बुत बनाने और उनकी पूजा में लग गए और अपनी ताक़त के घमंड में डूब गए।
72: पहले हूद (अलै) ने अपनी क़ौम के लोगों को बहुत
समझाया, मगर कुछ नेक लोगों को छोड़कर किसी ने उन पर
विश्वास नहीं किया। उसके बाद अकाल पड़ गया, हूद (अलै) ने
बताया कि यह अल्लाह की तरफ़ से चेतावनी है, फिर भी लोग नहीं
माने। अंत में अल्लाह ने एक तेज़ आंधी भेजी जो लगातार 8 दिनों तक चलती, और उसी के नतीजे में पूरी क़ौम तबाह-बर्बाद हो
गयी। देखें 11: 50-89; 23: 32; 26:
124; 41: 15; 46: 21; 54: 18; 69: 6; और 89: 6
73: हज़रत हूद (अलै) की क़ौम आद को जब उनके गुनाहों
के चलते तहस-नहस कर दिया गया, तो जो ईमानवाले
बचा लिए गए थे, उन्हीं की नस्ल से ही समूद के लोग पैदा हुए
थे, ये लोग अरब और सीरिया [शाम] के इलाक़े के बीच
हिज्र नाम की जगह में आबाद थे, जिसे आजकल
"मदायन सालेह" कहते हैं, और आज भी इनके
घरों और महलों के खंडहर मौजूद हैं और पहाड़ों को काटकर बनाई गई इमारतों के निशान
देखे जा सकते हैं। अरब के व्यापारियों का कारवाँ जब सीरिया जाया करता था तो ये
खंडहर रास्ते में पड़ते थे,
और इसी लिए
क़ुरआन में कई जगहों पर उन खंडहरों से सबक़ सीखने के लिए कहा गया है। इस क़ौम के लोग
भी धीरे-धीरे मूर्तियों की पूजा में लग गए और एक ख़ुदा को भूल बैठे। तब उन्हीं की
क़ौम के हज़रत सालेह (अलै) को अल्लाह ने उनके सुधार के लिए पैग़म्बर बनाया, उन्होंने बरसों लोगों के बीच अल्लाह का संदेश
पहुँचाने का काम किया,
मगर कुछ लोगों
को छोड़कर ज़्यादातर लोगों ने उनकी बात को मानने से इंकार कर दिया, अंत में उन लोगों ने यह माँग की कि अगर आप
पहाड़ से एक ऊँटनी को निकालकर दिखा दें तो वे उन पर ज़रूर विश्वास कर लेंगे। फिर जब
सचमुच ऊँटनी प्रकट हो गई,
तब भी कुछ लोगों
को छोड़कर उनके बड़े-बड़े सरदार अपने वादे से फिर गए और सच्चाई को मानने से इंकार कर
दिया और दूसरे लोगों को भी विश्वास करने से रोक दिया। हज़रत सालेह ने अपने लोगों को
बता दिया था कि यह एक ख़ास ऊँटनी है जिसे एक दिन पूरे कुएं का पानी चाहिए, सो उन्होंने पानी पीने की बारी बना दी थी, एक दिन सब लोग कुंएं से पानी लेते, और एक दिन केवल ऊँटनी पानी पीती थी। साथ में
उन्होंने लोगों को सावधान कर दिया था कि अगर अल्लाह की इस ऊँटनी को मार दिया तो एक
ज़बरद्स्त यातना आ सकती है। मगर कुछ दिन बाद लोगों ने उस ऊँटनी को मार डाला। सालेह
(अलै) ने बता दिया कि अब भयानक यातना आने में मात्र तीन दिन रह गए हैं, लोगों ने तब भी अल्लाह से माफ़ी माँगने के
बजाए इसे मज़ाक़ ही समझा और हज़रत सालेह को भी मार देने की योजना बनाने लगे। फिर तीन
दिन गुज़रते ही बड़े ज़ोर का भूचाल आया और आसमान से एक भयानक आवाज़ ने सब लोगों को मार
डाला। देखें 11: 61; 26: 41; 27:
45; 54: 23 आदि।
80: हज़रत लूत, इबराहीम (अलै) के भतीजे थे। जब इबराहीम (अलै)
अपने मुल्क इराक़ को छोड़कर फिलिस्तीन में बसने के लिए निकल खड़े हुए, तो लूत (अलै) भी उनके साथ शामिल हो गए थे।
बाद में, अल्लाह ने लूत (अलै) को जार्डन के शहर सुदोम
[Sodom] के लोगों के बीच पैग़म्बर बनाकर भेजा। सुदोम
एक मुख्य शहर था और उसके आसपास अमूरा और दूसरी कई बस्तियाँ आबाद थीं। यहाँ के लोग भी
एक अल्लाह को छोड़कर देवी-देवताओं की पूजा करने में लगे थे, मगर इसके अलावा सबसे बड़ी ख़राबी जो इनमें हो
गई थी, वह थी Homosexuality की आदत, यानी मर्द सेक्स करने के लिए मर्दों के पास
ही जाते थे। हज़रत लूत के बहुत समझाने और डराने पर भी जब ये लोग नहीं माने, तो अल्लाह की तरफ़ से उन पर पत्थरों की बारिश
हुई और उनकी सारी बस्तियों को तल्ले-ऊपर उलट दिया गया। आज मृत सागर [Dead Sea] के नाम से जो समंदर है, कहा जाता है कि ये बस्तियाँ उन्हीं के आसपास
थीं या उसी सागर में डूब गईं। इस घटना का वर्णन कई जगह आया है, देखें 11: 69-83; 15: 52-76; 26: 160-174; 26: 28-35; 51: 31-37 आदि।
85: मदयन [Midian] एक क़बीले का नाम
था और इसी नाम की एक बस्ती भी थी जिसमें हज़रत शुऐब को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था।
उनका ज़माना मूसा (अलै) से कुछ पहले का है, और कुछ लोगों का
मानना है कि वह मूसा (अलै) के ससुर थे। यह एक हरा-भरा इलाक़ा था, लोग ख़ुशहाल थे, धीरे-धीरे उनमें बहुत सी बुराइयाँ पैदा हो गई
थी, उनमें बहुत से लोग नाप-तौल में धोखा देते थे, कुछ दबंग लोगों ने रास्तों पर चौकियाँ बना
रखी थीं जो हर गुज़रने वालों से टैक्स वसूल करते थे, कुछ लोग डाके भी डालते थे, कुछ थे जो लोगों को शुऐब (अलै) के पास जाने
से रोकते और उन्हें तंग करते थे। हज़रत शुऐब (अलै) बहुत अच्छा भाषण देते थे, उन्होंने अपनी क़ौम को बहुत सुलझे हुए तरीक़े
से समझाने की कोशिश की,
मगर कुछ लोगों
को छोड़कर ज़्यादातर आदमियों पर कोई असर नहीं हुआ। फिर उनकी क़ौम पर भी अल्लाह की
यातना आ पहुँची और वे मारे गए। क़ुरआन में इनके बारे में और जानने के लिए देखें 11: 84-95; और 15: 78.
87: लोग अक्सर ऐसा सोचते थे जो लोग विश्वास नहीं
रखते, वह भी बड़ी ख़ुशहाली की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, अगर उनका तरीक़ा अल्लाह को पसंद नहीं, तो उन्हें ख़ुशहाल क्यों बनाया? यह इसलिए कि दुनिया में रोज़ी देने के मामले में ईमानवाले और काफ़िरों
के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है। लेकिन परलोक में जब अंतिम फ़ैसला होगा, वहाँ ऐसा नहीं होगा।
91: भूचाल के साथ बड़े ज़ोर के धमाके की आवाज़ भी
हुई थी (सूरह हूद)। सूरह शुअरा से पता चलता है कि पहले घने बादल शहर की तरफ़ से आते
दिखाई दिए थे, जिससे आग भी बरसायी गई थी।
95: उनका मानना था कि ज़िंदगी में अच्छे-बुरे दिन
आते रहते हैं, इसलिए वे तंगहाली को सज़ा के रूप में या
ख़ुशहाली को परीक्षा में रूप में नहीं देखते थे--- क्योंकि उनका मत था कि ऐसे हालात
उनके बाप-दादा के साथ भी गुज़रे हैं।
103: हज़रत याक़ूब (अलै) [Jacob] को इसराईल नाम से भी जाना जाता है, और उन्हीं की पुश्तों को इसराईल की संतान
[बनी इसराईल] कहते हैं। उनके बेटे यूसुफ़ (अलै) के ज़माने में इसराईल की संतानें
फ़िलिस्तीन के इलाक़े से मिस्र में जाकर बस गयी थी। मूसा (अलै) याक़ूब (अलै) की चौथी
पुश्त में आते हैं। धीरे-धीरे मिस्र में इसराइलियों के साथ बुरा बर्ताव होने लगा
था, और उन्हें वहाँ के समाज में अलग-थलग कर दिया
गया था। वहाँ का बादशाह जिसे "फ़िरऔन" कहते थे, उसने अपने को ख़ुदा होने का दावा किया, तब मूसा (अलै) को वहाँ नबी बनाकर भेजा गया।
133: पहले बाढ़ आने से सब खेतियाँ बह गयीं, फिर उन लोगों ने मूसा (अलै) से दुआ करायी, खेत बहाल होते ही फिर वे विश्वास करने से
इंकार करने लगे, तो फिर टिड्डी दल ने सारी फ़सल बर्बाद कर दी, उसके कुछ समय के बाद जब फ़सल ठीक हुई तो फिर
ईमान को ठुकराने लगे,
तो फ़सल में घुन
के कीड़े लग गए, इसी तरह फिर न माने तो मेंढक इतनी संख्या में
पैदा हो गए कि खाने के बर्तनों तक में आ जाते और खाना ख़राब कर देते, दूसरी तरफ़ पीने के पानी में ख़ून निकलने लगा
जिससे पानी पीना मुश्किल हो गया।
137: इसराईल की संतानों की उन बरकत वाली जगहों पर
बहुत लम्बी अवधि के बाद हुकूमत क़ायम हुई थी, इस तरह, अल्लाह का किया गया वादा पूरा हुआ, देखें सूरह बक़रा (2: 246-251)
142: फ़िरऔन से छुटकारा मिलने का वर्णन सूरह मायदा
(5: 20-26) में है। जब इसराईल की संतानें सीना के
रेगिस्तान में ठहरी हुई थीं, तब उन लोगों ने
मूसा (अलै) से मांग की कि उन्हें कोई आसमानी किताब अगर अल्लाह की तरफ़ से मिल जाती, तो वे उसके मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी गुज़ारते। सो
अल्लाह ने सीना के पवित्र पहाड़ पर मूसा (अलै) को चालीस रातों तक इबादत और अल्लाह
में ध्यान लगाने के लिए बुलाया, और फिर अंत में
"तोरात" [Torah]
प्रदान की जो
तख़्तियों में लिखी हुई थी।
147: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अल्लाह ने
ऐसे लोगों को अपनी निशानियों से इसलिए दूर कर दिया क्योंकि उन लोगों ने उन
निशानियों को झूठ समझकर ठुकरा दिया और ग़लत रास्ते पर अपनी मर्ज़ी से चलते रहे। तो
फिर अल्लाह ने भी उनकी क़िस्मत में उसी रास्ते पर चलना लिख दिया। अंत में जो उन्हें
सज़ा मिलेगी, वह उन्हीं के कर्मों का फल होगा।
148: इस बछड़े का ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 51) और सूरह ताहा (20: 88) में है कि कैसे सामरी नाम के जादूगर ने इसे
बनाया था जिसको इसराईल की संतानें पूजने लगी थीं।
155: जब मूसा (अलै) तोरात लेकर अपने लोगों के पास
पहुँचे, तो उनमें से कुछ लोग कहने लगे कि उन्हें कैसे
यक़ीन आए कि यह (किताब) अल्लाह की तरफ़ से उतरी है। फिर अल्लाह के हुक्म से मूसा
(अलै) अपने लोगों में से 70
बड़े-बूढ़े लोगों
को लेकर तूर पहाड़ पहुँचे जहाँ उन्हें अल्लाह का कलाम सुनाया गया, सूरह बक़रा (2: 55-56) और सूरह निसा (4: 153) से पता चलता है कि उन लोगों ने यह माँग कर दी
कि उन्हें अल्लाह को सामने से देखना है, तभी वे मानेंगे। इस पर ज़ोर से बिजली की कड़क
हुई जिससे भूचाल सा आ गया और वे सब थरथराहट के साथ बेहोश हो गए। मूसा (अलै) समझ गए
कि यह लोगों के लिए एक परीक्षा थी, सो उन्होंने
अल्लाह से इन लोगों को फिर से ज़िंदा करने और उनके गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ
माँगी।
156: अल्लाह की रहमत [दयालुता] हर चीज़ पर छाई हुई
है, और इस दुनिया में अच्छे-बुरे हर आदमी को उसकी
नेमतें व रोज़ी मिलती रहती है, और वह हर बुरे
कर्म की सज़ा नहीं देता,
बल्कि अपने
हिसाब से जिसे उचित समझता है, सज़ाएं देता रहता
है और बहुत से गुनाह माफ़ भी करता रहता है।
157: यहाँ रसूल से मतलब मुहम्मद (सल्ल) से है, जिन्हें "उम्मी" कहा गया है जिसका
मतलब "पढ़ा-लिखा न होना" या 'जो यहूदी न हो'[Gentile]. कुछ मुस्लिम विद्वान बाइबल में मुहम्मद
(सल्ल) के ज़िक्र का उदाहरण देते हैं, जैसे Deuteronomy में 18: 15-18 और 33: 2; Isaiah 42; और John 14-16. हालाँकि बाइबल
के विद्वान इन आयतों का अलग ढंग से मतलब निकालते हैं। मुहम्मद (सल्ल) का नाम Gospel of Barnabas में कई बार आया है, मगर ईसाई विद्वान इसे संदेह की दृष्टि से
देखते हैं।
........ यहूदियों पर पहले से चले आ रहे
"बोझ" और "लोहे के बंधनों" से आज़ाद करने से मतलब यह है कि
तोरात के मुताबिक़ कुछ तो कड़े हुक्म उनकी नाफ़रमानी
की सज़ा के तौर पर दिए गए थे, और बहुत से नियम
ख़ुद उनके उलेमा ने गढ़ लिए थे। बताया जा रहा है कि मुहम्मद (सल्ल) इन कड़े हुक्मों
को अपने माननेवालों के लिए ख़त्म कर देंगे।
160: मिस्र से निकलने के बाद जब इसराइल की संतानें
लगातार भटकती रहीं, इस दौरान उनके खाने के लिए अल्लाह ने "मन्ना (आसमान से उतरी रोटी), और "सलवा" (मुर्ग़ की तरह की
चिड़िया--बटेर का गोश्त) उतारा।
163: लाल सागर के किनारे "एला" [Aylah] नामक एक पुराना शहर था, जिसके लोगों को "सब्त"[शनिवार] के
दिन मछली पकड़ने से मना किया गया था। अजीब बात यह थी कि सब्त [Sabbath] के दिन चारों तरफ ख़ूब सारी मछलियाँ दिखायी
देती थीं जबकि सप्ताह के बाक़ी दिन कोई मछली नहीं दिखती थी। कुछ लोगों ने इसका उपाय
यह किया कि वे शुक्र्वार को पानी में जाल बिछा देते, और रविवार को जाल में फँसी मछलियों को निकालकर
जमा कर लेते थे। जो लोग इस तरह के काम के विरोधी थे, वे दो समूह में बंटे हुए थे: पहले समूह ने
सब्त के दिन मछली पकड़ने वालों को समझाना-बुझाना शुरू किया मगर जब देखा कि उन पर
कोई असर न हुआ तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। दूसरा समूह सब्त के दिन मछली पकड़ने
के ख़िलाफ लगातार सलाह-मशविरा देता रहा। अंत मेंं,सब्त का नियम तोड़ने वालों को सज़ा दी गई, जबकि बाक़ी दो
समूह को बचा लिया गया।
166: या तो सचमुच बंदर जैसे हो गए या उन्हें
बंदरों से उपमा दी गई है। देखें 2:65
176: कुत्ते की मिसाल देने का मतलब यह है कि आप
चाहे उन्हें सावधान करें या न करें, वे सच्चाई पर
विश्वास करने वाले नहीं हैं।
180: वे लोग जो अल्लाह के नाम बिगाड़कर अपने झूठे
ख़ुदाओं को पुकारते हैं,
जैसे
"अल्लात" उनके एक बुत का नाम है जो 'अल्लाह' शब्द से निकला है, "अल-उज़्ज़ा" भी 'अल-अज़ीज़' (बहुत शक्तिवाला) से निकला है, और "मनात" भी 'अल-मन्नान' (यानी देनेवाला) से निकला था।
188: रसूल ने कहा कि अगर उन्हें छिपी हुई सारी
चीज़ों का पता होता, तो वह ढेर सारी अच्छी चीज़ें जमा कर लेते और
उन्हें किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचता, क्योंकि सारी
बातें उन्हें पहले ही से पता होतीं। मगर उन्हें तो असल में उतना ही मालूम होता है
जितना अल्लाह उन्हें "वही" के द्वारा बताता है।
189: एक अकेली जान यानी 'आदम' (अलै), और उससे उनका
जोड़ा यानी 'हव्वा' (अलै) को पैदा
किया।
195: असल में मक्का के इंकार करने वाले लोग यह
कहकर मोहम्मद साहब को डराया करते थे कि आप जो यह कहते हैं कि हमारे देवताओं में
कोई ताक़त नहीं है, तो वे देवता आपको सज़ा देंगे। यह आयत इसी के
जवाब में है।
201: नेक और बुराइयों से बचने वाले लोग भी शैतान
के बहकावे में कभी-कभी आ जाते हैं, लेकिन उन्हें गुनाह करते ही अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है, और वे अल्लाह से तुरंत माफ़ी माँग लेते हैं और
गुनाह से तौबा करते हैं।
203: जो आयत अल्लाह की तरफ़ से उतरती है, "मैं तो इसे केवल दुहरा देता हूँ", इसके लिए देखें 75:18
204: क़ुरआन जब पढ़ी जा रही हो, तो उसे चुपचाप ध्यान से सुनना चाहिए, हाँ मगर पढ़ने वाले को भी ऐसी जगह पर इसे ज़ोर
से नहीं पढ़ना चाहिए जहाँ लोग अपने काम में लगे हों।
सूरह 46: अल-अहक़ाफ़
[रेत के टीले, The Sand Dunes]
यह एक मक्की
सूरह है। इसका नाम आयत 21 में ज़िक्र किए गए "बालू के टीले" से लिया गया है, जहाँ "आद" के लोग रहा करते थे, और जहाँ वे अपने नबी की चेतावनी नहीं मानने के नतीजे में तबाह व बर्बाद कर
दिए गए (21-28)। इस सूरह का
सबसे अहम और मुख्य विषय है: जो लोग सच्चाई को मानने और दोबारा ज़िंदा उठाए जाने से
इंकार करते हैं, उनके लिए एक
ऐसी सज़ा उनका इंतज़ार कर रही है जिसे टाला नहीं जा सकता। इस सच्चाई पर ज़ोर दिया गया
है कि आज के मक्का के लोगों से भी ज़्यादा स्थापित लोगों के समुदायों को किस तरह
बर्बाद कर दिया गया, और यह भी सच
है कि जिन्नों ने मक्का के विश्वास न करने वालों की तुलना में पहली बार ही क़ुरआन
सुनकर उसकी सच्चाई पर विश्वास कर लिया था। अंत में पैग़म्बर साहब को अपना क़दम जमाए
रखने, और विश्वास न
करने वालों के लिए अल्लाह के फ़ैसले का इंतज़ार करने को कहा गया है।
विषय:
02: यह किताब
अल्लाह की तरफ़ से है
03-06: मूर्तिपूजा
करने की मूर्खता
07-08: अल्लाह के
संदेश को मानने से इंकार
09: एक रसूल जो अल्लाह की तरफ़ से लोगों को सावधान
करने आया है
10-14: रसूल की लाई
हुई किताब [क़ुरआन], मूसा की किताब
[तौरात] जैसी है
15-18: माँ-बाप के
साथ प्यार से पेश आना
19-20: हर एक
अपने-अपने कर्मों से परखा जाएगा
21-28: 'आद' की क़ौम की कहानी
29-32: जिन्नों का
क़ुरआन सुनकर उसपर विश्वास कर लेना
33-35: क़यामत में
दोबारा उठाया जाना और सबका हिसाब-किताब होना तय है
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हा॰ मीम॰ (1)
इस किताब
[क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। (2)
हमने आसमानों
और ज़मीन, और जो कुछ उन
दोनों के बीच मौजूद है, उनकी रचना एक
ख़ास मक़सद और एक तय की हुई अवधि तक के लिए ही की है, इसके बावजूद जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से
इंकार किया है, वे उन
चेतावनियों पर ध्यान नहीं देते जो उन्हें दी जाती रही हैं। (3)
[ऐ रसूल] आप
कहें, "तुम अल्लाह को
छोड़कर जिनकी पूजा करते हो, क्या तुमने उनके बारे में कभी सोचा है: मुझे
दिखाओ तो सही कि इस धरती का कौन सा हिस्सा है जिसे उन्होंने पैदा किया है या बताओ
कि आसमानों में क्या कोई हिस्सा है जो इनके क़ब्ज़े में है; मेरे पास इस [क़ुरआन] से पहले की कोई किताब [Scripture] ले आओ या दिव्य ज्ञान की कोई बची हुई
मान्यताओं को ही (सबूत में) पेश करो---- अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो।" (4)
उस आदमी से
बढ़कर ग़लती पर और कौन होगा जो अल्लाह को छोड़कर उन (गढ़े हुए देवताओं) को पुकारता हो, जो क़यामत के दिन तक उसकी पुकार का जवाब नहीं
दे सकते, उन्हें तो यह
भी ख़बर नहीं कि उन्हें कोई पुकार रहा है; (5)
और जब सारे
लोग (क़यामत के दिन) इकट्ठा किए जाएँगे तो वे [गढ़े हुए देवता] ख़ुद उस आदमी के
दुश्मन हो जाएंगे और उसके द्वारा की गयी पूजा को न मानते हुए उससे अलग हो जाएंगे! (6)
जब हमारी (क़ुरआन
की) आयतें उन्हें पढ़कर स्पष्ट रूप से सुनाई जाती हैं तो वह सच्चाई जो उन लोगों तक
पहुँचती है, उसके बारे में
इंकार करनेवाले लोग [काफ़िर] यह कह देते हैं कि "यह तो सचमुच जादू है।" (7)
या वे कहते हैं
कि, "उस [रसूल] ने इस
(क़ुरआन) को स्वयं अपनी तरफ़ से गढ़ लिया है?" [ऐ रसूल] आप कह दें, "अगर मैंने इसे सचमुच गढ़ा है तो तुम मुझे अल्लाह
की पकड़ से ज़रा भी नहीं बचा सकते। जिसके बारे में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह [अल्लाह] उसे भली-भाँति जानता है। और वह
मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (8)
कह दें, "मैं अल्लाह के रसूलों में कोई पहला (या अलग)
रसूल तो नहीं हूँ। मैं (निजी तौर पर) नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न
यह मालूम है कि तुम्हारे साथ क्या होगा; (अल्लाह की ओर से) जो भी “वही” [revelation] मुझे भेजी जाती है, मैं बस उसी का अनुसरण करता हूँ; और मैं सीधे-सीधे (अल्लाह की ओर से) सावधान
करनेवाला हूँ।" (9)
आप कहें, "क्या तुमने सोचा भी है: क्या होगा अगर यह
क़ुरआन सचमुच अल्लाह की तरफ़ से हुई और फिर भी तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया? क्या होगा अगर इसराईल की सन्तानों में से कोई
इस किताब को पुरानी आसमानी किताबों [तोरात, इंजील] से मिलती जुलती होने की गवाही दे दे, और उसमें विश्वास करने लगे, मगर तब भी तुम घमंड में इतने पड़े रहो (कि
विश्वास न कर सको)? सचमुच अल्लाह
शैतानियाँ करने वालों को मार्ग नहीं दिखाता।" (10)
जो लोग सच्चाई
से इंकार करने पर अड़े रहे, वे विश्वास
रखनेवालों के बारे में कहते हैं, "अगर इस (क़ुरआन) में कुछ भी अच्छा होता, तो हम लोगों से पहले उन (गरीब दबे-कुचले
लोगों) ने इसमें विश्वास न किया होता", और चूँकि उन [काफ़िरों] ने उससे मार्गदर्शन
लेने से इंकार कर दिया, सो अब वे कहते
हैं, "यह तो वही
पुराना झूठ है!" (11)
हालाँकि इससे
पहले मूसा [Moses] की किताब
[तोरात/Torah] एक रास्ता
दिखानेवाली और रहमत [mercy] के रूप में
उतारी जा चुकी थी, और यह (क़ुरआन)
अरबी भाषा में एक ऐसी किताब है जो उस (तोरात) के सही व सच्ची होने की पुष्टि करती
है, ताकि बुरे
कर्म करनेवालों को सावधान कर दे, और अच्छा कर्म करनेवालों के लिए ख़ुशख़बरी ले
आए। (12)
इसमें शक नहीं
कि जिन लोगों ने कह दिया, "हमारा रब अल्लाह है, "फिर वे सीधे मार्ग पर जमे रहे, तो उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे
दुखी होंगे: (13)
वही जन्नतवाले
लोग हैं, वहाँ वे हमेशा
के लिए रहेंगे-- यह उन कर्मों का इनाम [reward] है जो वे (दुनिया में) किया करते थे। (14)
हमने आदमी को
अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है: उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर
उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की
अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा
और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस एहसान
का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तुने मुझ पर और मेरे माँ-बाप पर किया है; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू
ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को
भी अच्छा व नेक बना। मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से
तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (15)
ऐसे ही लोगों
के द्वारा किए गए कर्मों में से बेहतरीन कामों को हम क़बूल कर लेते हैं, और हम उनके बुरे कर्मों को (माफ़ करते हुए)
उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। वे जन्नतवालों में शामिल होंगे---- यह सच्चा वादा है जो
उनसे किया गया है। (16)
किन्तु एक आदमी है
जो अपने माँ-बाप से कहता है, "उफ़्फ़! क्या आप सचमुच मुझे डरा रहे हैं कि मैं
अपनी क़ब्र से ज़िंदा उठाया जाऊँगा, हालाँकि कितनी ही नस्लें हैं जो गुज़र चुकी हैं
और मुझ से पहले जा चुकीं?" उसके माँ-बाप
अल्लाह से फ़रियाद करते हैं, और (बेटे से) कहते हैं, "अफ़सोस है तुमपर! विश्वास करो! निस्संदेह अल्लाह
का वादा सच्चा है।" मगर तब भी वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की झूठी कहानियाँ हैं और
कुछ नहीं।" (17)
ऐसे सभी लोगों (की
सज़ाओं) का फ़ैसला तय हो चुका है, और इनमें ऐसे सभी गिरोह शामिल हैं जो उनसे पहले
गुज़र चुके हैं—चाहे वे जिन्न हों
या इंसान: सचमुच वे बड़े घाटे में रहे। (18)
(अच्छे और बुरे)
कर्मों के मुताबिक़ हर एक का दर्जा तय किया जाएगा और जो कुछ उन्होंने किया है, अल्लाह उन्हें उसका पूरा-पूरा बदला दे देगा: और
उनपर कोई ज़ुल्म नहीं होगा। (19)
और एक दिन आएगा जब
सच्चाई से इंकार करनेवाले लोगों को (जहन्नम की) आग के सामने पेश किया जाएगा, और उनसे कहा जाएगा, "तुम अपने सांसारिक जीवन में अपने हिस्से की अच्छी
चीज़ों को बेकार [waste] कर चुके और उनका
मज़ा ले चुके हो, अतः आज के दिन
तुम्हें अपमानित करने वाली सज़ा दी जाएगी: क्योंकि तुम धरती पर बिना किसी अधिकार के
घमंड करते रहे और तुमने (मर्यादा) की सभी सीमाएं तोड़ डालीं।" (20)
[ऐ रसूल] आद के
भाई [हूद] की चर्चा करें: जब उन्होंने (यमन में स्थित) रेत के टीलों के बीच
बसनेवाले आद के लोगों को सावधान किया था, और ऐसा सावधान करनेवाले उनसे पहले भी और उनके
बाद भी कई आए और कई गुज़र चुके थे --- (सब एक ही बात कहते कि), "अल्लाह को छोड़कर किसी की उपासना [इबादत] न
करो। मुझे तुम्हारे लिए डर है कि एक भयानक दिन में तुम्हें दंडित किया
जाएगा।" (21)
मगर उन्होंने
कहा, "क्या तुम
हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको अपने देवताओं से अलग-थलग कर दो? तुम अगर अपनी बात में सच्चे हो, तो फिर ले आओ हम पर वह सज़ा, जिसकी धमकी तुम हमें देते हो!" (22)
हूद ने कहा, "यह तो केवल अल्लाह ही जानता है कि वह दिन कब
आएगा: मैं तो तुम्हें बस वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है, मगर मैं देख रहा हूँ कि तुम बड़े अक्खड़ व
जाहिल लोग हो।" (23)
फिर जब उन
लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आते हुए देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसने वाला है!', (हूद ने कहा), "नहीं!, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने
जल्दी मचा रखी थी: यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (24)
जो अपने
रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस-नहस कर देगी।" (अगली
सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था:
अपराधियों को हम ऐसा ही बदला देते हैं। (25)
[ऐ मक्का के
लोगो!] हमने (आद की क़ौम के) लोगों को कुछ चीज़ों में ऐसी ताक़त व सलाहियत दे रखी थी, कि वैसी ताक़त तुम्हें नहीं दी; हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे, इसके बावजूद न तो उनके कान, न उनकी आँखें और न उनके दिल ही उनके किसी काम
आ सके, क्योंकि वे
अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करते थे। जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी यातना ने उन्हें आ घेरा। (26)
हम तुम्हारे
आस-पास बसी हुई दूसरे समुदायों की बस्तियों को भी तबाह-बर्बाद कर चुके हैं----
हमने उन्हें भी अपनी बहुत सारी निशानियाँ दी थीं, ताकि वे सही रास्ते पर वापस आ सकें--- (27)
(वे कहते थे
कि) अल्लाह से नज़दीकी हासिल करने के लिए उन लोगों ने कुछ देवताओं को अल्लाह के
बजाए अपना ख़ुदा बना लिया था, (अगर यह नज़दीकी वाली बात सच होती तो) फिर
क्यों उनके देवताओं ने उनकी कोई मदद नहीं की? बिल्कुल नहीं! बल्कि वे (देवता) उन्हें छोड़कर
ख़ुद ही चले गए: असल में यह एक झूठी बात थी जो ख़ुद उन्हीं लोगों ने गढ़कर बना ली थी। (28)
और याद करें [ऐ
रसूल], जब हमने जिन्नों
के एक समूह को आपके पास क़ुरआन को सुनने के लिए भेजा था, तो जब वे वहाँ पहुँचकर उसे सुनने लगे तो उन
लोगों ने (एक दूसरे से) कहा, "चुप हो जाओ!" फिर जब उस (क़ुरआन) का पाठ
पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर लौट गए और उन्हें (अल्लाह की ओर से) चेतावनियाँ
दीं। (29)
उन (जिन्नों) ने
कहा, "ऐ मेरी क़ौम के
लोगो! हमने एक ऐसी किताब [क़ुरआन] सुनी है, जो मूसा (की तौरात) के बाद उतारी गई है, जो अपने से पहले उतारी गयी किताबों को सच्चा
मानती है, और सच्चाई और
सीधे मार्ग की तरफ़ मार्गदर्शन करती है। (30)
(आगे कहा) ऐ
लोगो! उसकी बात मान लो जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाता है। उस (अल्लाह) में
विश्वास करो: अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें दर्दनाक यातना से
बचा लेगा।” (31)
और जो कोई
अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाले की बात नहीं मानता, तो वह धरती पर कहीं भी अल्लाह के क़ाबू से बच
निकलने वाला नहीं है, और न कोई अल्लाह
से उसकी रक्षा करने वाला होगा: ऐसे लोग सचमुच रास्ता भटककर दूर जा पड़े हैं। (32)
क्या इंकार पर
अड़े लोग [काफ़िर] यह नहीं समझते कि वह अल्लाह जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, और जो ऐसा करने में ज़रा थका भी नहीं, उसमें इतनी ताक़त नहीं है कि वह मरे हुए लोगों
को फिर से ज़िंदा कर दे? क्यों नहीं!
बेशक, हर एक चीज़
उसके क़ब्ज़े में है। (33)
और जिस दिन इंकार
पर अड़े काफ़िरों को जहन्नम की आग के सामने लाया जाएगा, (और उनसे पूछा जाएगा), "क्या यह (जहन्नम) सचमुच असली नहीं है?" वे जवाब देंगे, "हमारे रब की क़सम! यह सचमुच असली है", तब अल्लाह कहेगा, "सच्चाई से इंकार करने के नतीजे में अब चखो
मज़ा अपनी सज़ा का!” (34)
अत: [ऐ
मुहम्मद] आप धीरज रखते हुए अपने काम पर जमे रहें! जिस तरह (आप से पहले) पक्के
इरादोंवाले रसूलों [नूह, इबराहीम, मूसा, ईसा] ने धीरज से काम लिया था। आप उन [इंकार
पर अड़े काफ़िरों] के लिए सज़ा माँगने में जल्दी न करें: जिस दिन वे लोग उस चीज़ को
देख लेंगे जिसके बारे में उन्हें सावधान किया जाता था, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक
घड़ी भर से ज़्यादा (इस दुनिया में) नहीं ठहरे थे। यह एक (चेतावनी-भरा) संदेश है।
अब कौन है जो बर्बाद होगा सिवाए हर बात का विरोध करनेवाले और आदेश न माननेवालों के? (35)
नोट:
6: बहुदेववादियों [Idolaters] की कई तरह की मान्यताएं होती थीं। कुछ लोगों ने दुनिया से
जा चुके कुछ इंसानों को अपना ख़ुदा बना लिया था, उन इंसानों को पता ही नहीं होता कि उनकी पूजा
की जा रही है, इसलिए वे इंकार कर देंगे, और जिनको पता होगा, वे यह कहेंगे कि असल में ये हमारी नहीं बल्कि
अपनी इच्छाओं के पुजारी थे। कुछ दूसरे लोग वे थे जो फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटी
मानते हुए उनकी पूजा करते थे, सूरह सबा (34: 40-41) में है कि जब अल्लाह उन फ़रिश्तों से पूछेगा, तो वे कहेंगे कि ये तो जिन्नों और शैतानों की
पूजा करते थे, क्योंकि उन्होंने ही इन लोगों को बहकाया था।
तीसरी तरह के वे लोग होंगे जो पत्थर के बुतों को पूजते थे, तो उनके बारे में तो ज़ाहिर है कि वे बेजान
पत्थर हैं, तो उन्हें तो कुछ पता ही नहीं होगा। इस तरह, ये लोग जिन-जिन की पूजा करते थे, वे सभी यही कहेंगे कि ये लोग हमारी इबादत
नहीं करते थे।
12: अरबी ज़बान में होने का ख़ास तौर पर ज़िक्र इसलिए हुआ है कि
इसके पहले की आसमानी किताबें अरबी में नहीं थीं, और उन किताबों को मुहम्मद (सल्ल) के पढ़ने की
कोई संभावना नहीं थी क्योंकि वह उन भाषाओं को नहीं जानते थे। इसके बावजूद अगर वह
उन किताबों की बातें बता रहे हैं, तो ज़ाहिर है कि उसका ज्ञान उन्हें "वही" द्वारा ही मिलता होगा।
15: इंसान को यह बताया गया है कि वह अपने माँ-बाप के साथ हर हाल
में अच्छा व्यवहार करे। मक्का में ऐसा हुआ था कि कुछ लोगों ने सच्चाई पर विश्वास
कर लिया और मुसलमान हो गए, मगर उसके माँ-बाप सच्चाई का इंकार करते रहे।
हाँ, जहाँ तक हो सके, उनसे अच्छा व्यवहार करें, लेकिन अगर वे अल्लाह को छोड़कर किसी और की
इबादत करने को कहें या किसी गुनाह के काम करने को कहें, तो नर्मी से ऐसी बातें मानने से मना कर देना
चाहिए, जैसा कि सूरह अंकबूत (29: 8) में आया है।
गर्भ ठहर जाने से बच्चे के पैदा होने की कम
से कम अवधि 6 मास होती है, और दूध पिलाने की ज़्यादा से ज़्यादा अवधि 24 महीने होती है।
21: "अहक़ाफ़" का मतलब 'रेत के लम्बे टीले' होता
है, और जहाँ आद की क़ौम रहती थी, वहाँ इस तरह के टीले बड़ी संख्या में पाए जाते
थे। कुछ लोगों का कहना है कि असल में उस जगह का नाम ही अहक़ाफ़ था जो यमन में स्थित
था। हज़रत हूद के बारे में सूरह अ'राफ़
(7: 65) में आया है।
27: आसपास की बस्तियों से यहाँ मतलब समूद की क़ौम और हज़रत लूत
(अलै.) की क़ौम की बस्तियाँ हैं जो सीरिया जाते हुए अरबों के व्यापारिक रास्ते में
पड़ती थीं।
29: मुहम्मद (सल्ल) इंसानों के साथ-साथ जिन्नों के लिए भी
पैग़म्बर बनाए गए थे। इस आयत में उस घटना का वर्णन है जब मुहम्मद साहब अल्लाह का
संदेश पहुँचाने के लिए "तायफ़" नामक शहर गए थे, जहाँ उनके साथ बहुत बुरा सलूक किया गया, वहाँ से जब वह दुखी होकर मक्का वापस आ रहे थे
तो रास्ते में "नख़ला" नाम की जगह पर रुके, जहाँ उन्होंने सुबह की नमाज़ में जब क़ुरआन पढ़ना शुरू किया तो
जिन्नों का एक दल जो वहाँ से गुज़र रहा था, रुक कर ध्यान से सुनने लगा था।
सूरह 6: अल-अना'म
[चौपाये/
Livestock]
यह एक मक्की सूरह है जिसका
शीर्षक आयत 136-139 में आए मवेशियों के वर्णन से लिया गया है। इस सूरह में
अल्लाह की ताक़त और उसके बेहिसाब ज्ञान को दर्शाया गया है, और बुतपरस्तों की कई रीतियों और ख़ासकर
मवेशियों के बारे में उनके झूठे दावों का यहाँ विस्तार से जवाब दिया गया
है। हलाल [वैध] और हराम [अवैध] खानों को पिछली सूरह से अधिक विस्तार से यहाँ बताया
गया है। कुल मिलाकर इस सूरह में साफ़ किया गया है कि वह अल्लाह ही है जो हर चीज़ को
पैदा करता है, उसे नियंत्रित करता है, और उसकी देखरेख करता है, और जब हम किसी मुश्किल में फँस जाते हैं, तो उसी के सामने झुकते हैं। इसके साथ-साथ नबी
का रोल भी साफ़-साफ़ बताया गया है कि जब तक अल्लाह की मर्ज़ी न हो, नबी अपने मन से कोई काम नहीं कर सकता है। इस
तरह, इस सूरह में बहुदेववादियों के दावों को बड़े विस्तार से रद्द
किया गया है। अंत में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि हर एक को अपने कर्मों का हिसाब
देना होगा।
विषय:
01-05: अल्लाह ही हर चीज़ का पैदा करने वाला है
06-11: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
12-18: अल्लाह की क़ुदरत
19-24: अल्लाह गवाह है
25-32: विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा
33-36: रसूल का उत्साह बढ़ाना
37-41: कोई निशानी [चमत्कार] दिखाने की माँग
42-45: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
46-55: विश्वास न करने वालों को चेतावनी
56-58: रसूल केवल अल्लाह की ही बंदगी करता है
59-67: अल्लाह सबसे ताक़तवर है
68-70: मूर्खता की बातों पर चर्चा करने से बचें
71-73: अल्लाह ही सही रास्ता दिखानेवाला है
74-90: इबराहीम (अलै) और उनके उत्तराधिकारियों की कहानी
91 : किसी आम आदमी पर अल्लाह का संदेश [वही] आना?
92-93: किताब [क़ुरआन] रसूल पर उतारी जा रही है?
93-94: अंतिम फ़ैसले का दृश्य
95-99: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
100-108: मूर्तिपूजा करना मूर्खता है
109-111: कोई निशानी (चमत्कार) दिखाने की माँग
112-117: रसूल का विरोध
118-122: खाने से जुड़े हुए नियम-क़ायदे
123-127: अपराधियों के सरदार
128-135: हिसाब-किताब का दृश्य : जिन्न और इंसान
136-140: मूर्तिपूजा और बच्चियों को मार डालने की कड़ी निंदा
141-150: खाने-पीने से जुड़े नियम-क़ायदे
151-153: धार्मिक ज़िम्मेदारियों का निष्कर्ष
154-158: जो किताबें मूसा(अलै) और रसूलों को दी गईं
159-161: इबराहीम का दीन ही रसूल (सल्ल) का दीन है
162-165: अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब
पर मेहरबान है, अत्यंत
दयावान है
सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और
अँधेरा और उजाला बनाया; फिर भी विश्वास न करनेवाले लोग (ख़ुदायी में) दूसरों को अपने
रब के बराबर ठहराते हैं! (1)
वही है जिसने तुम्हें गीली मिट्टी से पैदा
किया, फिर (तुम्हारे जीवन की) एक अवधि तय कर दी और साथ में एक और
समय (क़यामत का) तय कर दिया, जिसकी जानकारी केवल उसी [अल्लाह] को है; फिर भी तुम संदेह करते हो! (2)
वही अल्लाह है, आसमानों में भी और ज़मीन पर भी, वह तुम्हारे छिपे राज़ भी जानता है और उसे भी
जो तुम ज़ाहिर करते हो, और जो कुछ भी तुम करते हो, वह सब जानता है; (3)
मगर (इंकार पर अड़े लोगों
का हाल यह है कि) जब भी उनके रब की कोई निशानी उनके पास आती है, हर बार वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं। (4)
इस तरह, जब सच्चाई (का संदेश) उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने उसे मानने से इंकार कर दिया, मगर जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाया करते थे, जल्द ही वह चीज़ (हक़ीक़त बनकर) उनके सामने आ
जाएगी। (5)
क्या वे इस बात को नहीं
मानते, कि हम उनसे पहले कितनी पीढ़ियों को बर्बाद कर चुके हैं? हमने उन्हें ज़मीन पर तुम से ज़्यादा मज़बूती से
जमा रखा था, उनके ऊपर आसमान से काफ़ी पानी बरसाया और उनके क़दमों तले
नदियाँ बहा दीं, इसके बावजूद हमने उन्हें उनके बुरे कर्मों के चलते बर्बाद
कर दिया और उनके बाद दूसरी पीढ़ियों को ला खड़ा किया। (6)
[ऐ
रसूल!] यहाँ तक कि अगर हमने आप पर चमड़े के काग़ज़ पर लिखी-लिखाई किताब उतार दी
होती, और उसे उन्होंने अपने हाथों से छूकर देखा भी होता, तब भी, विश्वास न करने वालों ने यही कहा होता, "यह कुछ और नहीं, बल्कि साफ़ जादूगरी है।" (7)
वे कहते हैं, "इस (रसूल का साथ देने के लिए) कोई फ़रिश्ता
क्यों नहीं उतारा गया?" लेकिन अगर हमने फ़रिश्तों को उतारा होता, तो फिर उनकी तरफ़ से तुरंत ही फ़ैसला हो गया
होता, वह भी बिना कोई मुहलत दिए हुए। (8)
सचमुच अगर हम फ़रिश्तों को
(नबी के रूप में) भेजते, तब भी हमने फ़रिश्ते को आदमी के ही रूप में भेजा होता, और इस तरह, उनका संदेह और बढ़ गया होता। (9)
[ऐ मुहम्मद!] आपसे पहले भी रसूलों की हँसी
उड़ायी जा चुकी है, लेकिन हँसी उड़ानेवाले लोग जिस (धमकी-भरी) बात
की हँसी उड़ाते थे (कि बुरे कर्म का नतीजा बुरा होगा), उसी बात ने उन्हें आ घेरा। (10)
आप (उन लोगों से) कहें, "धरती पर घूम-फिरकर (पुरानी पीढ़ियों के
खंडहरों को) देखो कि सच्चाई को ठुकराने वालों का क्या अंजाम हुआ!" (11)
आप पूछें, "आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, वह किसका है?", आप बता दें, "अल्लाह का ही है। उसने अपने ऊपर यह बात ज़रूरी ठहरा ली है कि वह दया [रहम] का
भाव रखेगा। इस बात में कोई शक नहीं है कि वह तुम्हें क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा।
जिन लोगों ने अपने-आपको धोखे में डाल रखा है, वे
विश्वास नहीं करेंगे। (12)
वह सारी चीज़ें जो रात के
समय और दिन में ठहर जाती हैं, उसी
के क़ब्ज़े में है, और वह हर बात सुनता है, सब कुछ जानता है।" (13)
कह दें, "क्या मैं अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना
रखवाला [Protector] बना लूँ?, उस अल्लाह को जो आसमानों और ज़मीन का पैदा
करनेवाला है, जो सबको खिलाता है, मगर किसी का नहीं खाता।" कह दें, "मुझे यही आदेश हुआ है कि (तुममें) सबसे पहले मैं पूरी भक्ति
के साथ उसके आगे झुक जाऊँ। अल्लाह के साथ किसी और को उसकी (ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहराने वालों में से न हो जाना।" (14)
कह दें, "अगर मैं अपने रब की आज्ञा न मानूँ, तो मुझे एक बड़े (भयानक) दिन की यातना का डर
है।" (15)
उस दिन जिसके सिर से यातना
टल गयी, तो उस पर अल्लाह ने सचमुच दया की: (आदमी के लिए) यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (16)
[ऐ
रसूल] अगर अल्लाह आपको कोई तकलीफ़ देनी चाहे, तो
सिवाय उसके, कोई नहीं है जो इसे टाल सके, और अगर वह आपको कोई भलाई पहुँचाना चाहे, तो उसे हर चीज़ करने की ताक़त है: (17)
वह अपने सभी बन्दों का
सबसे बड़ा व असली मालिक है, वह बेहद ज्ञानवाला, व हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (18)
आप पूछें, "एक गवाह के लिए सबसे बड़ी बात क्या होती है?", कहें, "अल्लाह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह है। इस क़ुरआन को मेरी
तरफ़ उतारा गया है, ताकि मैं इसके द्वारा तुम (लोगों) को और जहाँ
तक यह (संदेश) पहुँचे, उनमें से हर एक को (सच्चाई का इंकार करने और बुरे कर्मों के नतीजे
से) सावधान कर दूँ। क्या सचमुच तुम इस बात की गवाही देते हो कि अल्लाह के साथ
दूसरे देवता भी हैं?" कहें, "मैं ख़ुद तो (ऐसी किसी चीज़ की) गवाही नहीं देता।" कह दें, "वह तो बस एक अकेला अल्लाह है, और तुम जिस किसी को भी (उसकी ख़ुदायी के साथ)
जोड़ते हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।" (19)
जिन (यहूदी व ईसाई) लोगों को हमने (आसमानी)
किताब दी है, वे उन [मुहम्मद] को इतनी अच्छी तरह पहचानते
हैं, जैसे वे अपने बेटों को पहचानते हैं। जिन
लोगों ने (अपने हाथों) अपने को तबाह कर लिया, वे कभी विश्वास नहीं करेंगे। (20)
अब इससे ज़्यादा ग़लत काम और क्या हो सकता है, कि कोई अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़े या
उसकी आयतों को मानने से इंकार कर दे? जो लोग ऐसे ग़लत काम करते हैं, वे कभी फल-फूल नहीं सकेंगे। (21)
जब हम उन सबको एक साथ
इकट्ठा करेंगे और फिर एक से ज़्यादा देवताओं के माननेवालों [Polytheists] से पूछेंगे, "कहाँ है वे लोग जिनके बारे में तुम दावा करते
थे कि वे (ख़ुदायी में) अल्लाह के साझेदार [Partner] हैं?" वे घोर निराशा में होंगे, (22)
वे केवल इतना ही कहेंगे, "अपने रब, अल्लाह की क़सम! हमने उस (अल्लाह) के साथ किसी
और को उसका साझेदार नहीं ठहराया था!" (23)
देखो, कि किस तरह वे अपने ही ख़िलाफ़ झूठ बोलने लगे, और कैसे उन लोगों ने जिन (देवताओं को) गढ़ा था, वे उन्हें छोड़कर गुम हो गए। (24)
उनमें कुछ लोग ऐसे हैं जो
(ऐसा लगता है कि) आपकी बातें सुनते हैं, मगर
(उनकी हठधर्मी के कारण) हमने उनके दिलों पर परदे डाल रखे हैं----इसीलिए वे क़ुरआन को समझते नहीं हैं----- और
उनके कानों में बहरेपन का बोझ है। यहाँ तक कि अगर वे हर एक निशानी भी देख लेते, तब भी उनमें विश्वास नहीं करते। अत: जब वे
आपके पास आते हैं, तो आपसे बहस करते हैं: विश्वास न करनेवाले
कहते हैं, "यह और कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने के लोगों की कहानियाँ हैं।" (25)
और वे दूसरों को भी (क़ुरआन) सुनने से रोकते
हैं, और वे स्वयं भी उससे दूर रहते हैं। मगर वे किसी और को नहीं
बल्कि ख़ुद को ही बर्बाद करते हैं, हालाँकि वे इस बात को नहीं समझते। (26)
काश कि तुम देख पाते, जब उन्हें (जहन्नम की) आग के सामने खड़ा किया
जाएगा, तो किस तरह वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमें (दुनिया में)
वापस भेज दिया जाता, तो (इस बार) हम अपने रब की आयतों को मानने से इंकार नहीं
करते, बल्कि विश्वास करनेवालों में शामिल हो जाते।" (27)
नहीं! बल्कि जिस सच्चाई को वे छिपाया करते थे, वह उनके सामने और भी स्पष्ट हो जाएगी। अगर उन्हें (दुनिया
में) वापस लाया भी जाता, तो फिर से ये उन्हीं कामों में लग जाते, जिससे उन्हें रोका गया था---- वे कितने बड़े
झूठे हैं! (28)
वे कहते हैं, "इस दुनिया की ज़िंदगी के बाद (परलोक की
ज़िंदगी) कुछ भी नहीं है: हम लोगों को मरने के बाद दोबारा नहीं उठाया जाएगा।" (29)
काश कि आप देख पाते, जब उन्हें अपने रब के सामने खड़ा किया जाएगा, तो किस तरह अल्लाह कहेगा, "क्या यह हक़ीक़त नहीं है?" वे कहेंगे, "हाँ, सचमुच है, हमारे रब की क़सम!", वह कहेगा, "ठीक है, तो विश्वास न करने के नतीजे में अब हमारी यातना का मज़ा चखो।" (30)
बड़े घाटे में पड़ गए वे लोग, जिन्होंने अल्लाह से होने वाली मुलाक़ात को
मानने से इंकार किया, यहाँ तक कि जब अचानक (क़यामत की) वह घड़ी आ
जाएगी, तो वे कहेंगे, "अफ़सोस हम पर कि
हमने यह बात नहीं मानी!
"उनका
हाल यह होगा कि वे अपने बोझ अपनी पीठों पर लादे हुए होंगे। कितना बुरा होगा वह
बोझ! (31)
इस दुनिया की ज़िंदगी तो बस एक खेल और भटकाव के सिवा कुछ भी नहीं है; जबकि आख़िरत [परलोक] का घर उन लोगों के लिए
सबसे अच्छा है, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।
तो क्या तुम समझ से काम नहीं लोगे? (32)
[ऐ रसूल!] हम अच्छी तरह जानते हैं कि जो कुछ
वे कहते हैं, उससे आपको दुख पहुँचता है। मगर असल में ऐसा नहीं है कि वे
आप पर विश्वास नहीं करते: ये शैतानियाँ करनेवाले तो अल्लाह की आयतों को मानने से
इंकार करते हैं। (33)
आपसे पहले दूसरे रसूलों पर भी विश्वास नहीं किया गया था, और उन्होंने बड़े धीरज [सब्र] के साथ अपने
ठुकराए जाने को और कष्ट पहुँचाए जाने को उस वक़्त तक सहन किया जब तक कि उन्हें
हमारी सहायता न पहुँच गई---- कोई नहीं है जो अल्लाह के किए हुए वादे को बदल सके।
आपके पास तो इन रसूलों के क़िस्से पहले ही पहुँच चुके हैं। (34)
अगर आपको इन विश्वास न करनेवालों द्वारा ठुकराया जाना इतना असहनीय
लगता है, तो अगर आपसे हो सके, तो धरती में कोई सुरंग बना लें, या आसमान में सीढ़ी लगा लें, और उनके लिए कोई निशानी ले आएं: अगर अल्लाह ऐसा चाहता तो उन सबको सीधे मार्ग
पर ला सकता था। अतः आप जाहिलों के साथ शामिल न हो जाएं। (35)
आपकी पुकार का केवल वही लोग जवाब देंगे, जो सुन सकते हैं; रहे मुर्दा लोग, तो अल्लाह उन्हें (क़यामत के दिन) उठा खड़ा
करेगा, और उसी के पास उन सबको लौटकर जाना होगा। (36)
वे यह भी कहते हैं, "इस (रसूल) पर उसके रब की तरफ़ से कोई निशानी
क्यों नहीं उतारी गयी?"
कह
दें, "अल्लाह को तो निश्चय ही इस बात की ताक़त है कि
कोई निशानी उतार दे", हालाँकि उनमें ज़्यादातर लोग समझते नहीं
हैं": (37)
ज़मीन पर रेंगनेवाले सभी जीव और वे सारे पक्षी जो अपने परों के सहारे उड़ते हैं, ये सब भी तुम्हारी ही तरह के समुदाय हैं।
हमने (हिसाब रखनेवाली) किताब में कोई भी चीज़ छोड़ी नहीं है---- अंत में तो वे सब
अपने रब के सामने इकट्ठे किए जाएँगे। (38)
जिन लोगों ने हमारी निशानियों को मानने से
इंकार कर दिया, वे बहरे, गूँगे और घटाटोप अँधेरों में पड़े हुए हैं। अल्लाह जिसे चाहता है, (उसकी हठधर्मी के चलते) उसे भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है, उसे सीधे मार्ग पर लगा देता है। (39)
कहें, "ज़रा सोचो: अगर अल्लाह की यातना, या (क़यामत की) घड़ी तुम्हारे सामने आ जाए, तो बताओ, क्या अल्लाह को छोड़कर (मदद के लिए) किसी और
को पुकारोगे, बोलो अगर तुम सच्चे हो? (40)
"बिल्कुल नहीं, बल्कि तुम उसी (अल्लाह) को पुकारोगे। फिर जिस
परेशानी में पड़कर तुमने उसे पुकारा था, अगर वह [अल्लाह] चाहता, तो उसे दूर कर देता, और तब तुम उन्हें भूल जाते जिन (देवताओं) को
अभी (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहराते हो।" (41)
[ऐ रसूल!] आपसे पहले हमने बहुत सी क़ौमों के पास
रसूल भेजे और (अपने क़ानून के मुताबिक़) उनके लोगों को मुसीबत और तंगी [hardship] में डाला, ताकि वे
(अपनी अकड़ छोड़कर) झुकना सीख सकें। (42)
जब हमारी तरफ़ से उन पर सख़्त मुसीबत आयी, तब भी काश कि उन्होंने झुकना सीखा होता! मगर नहीं, उनके दिल तो और कड़े हो गए, और शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए बड़ा
मनमोहक बना दिया था। (43)
इस तरह, जो कुछ चेतावनियाँ उन्हें दी गयी थीं, वे उन्हें पूरी तरह भुला बैठे थे, फिर हमने उन पर हर तरह (की ख़ुशहालियों) के
दरवाज़े खोल दिए। फिर, जो कुछ उन्हें मिला था, वे उसकी ख़ुशियाँ मनाने में मगन ही थे कि अचानक हमारी यातना ने उन्हें आ पकड़ा
और वे निराशा में चुपचाप देखते रह गए। (44)
इस तरह, शैतानियाँ करनेवाले लोगों की जड़ काट दी गयी:
सारी प्रशंसा अल्लाह की ही हैं, जो सारे
संसारों का रब है। (45)
[ऐ
रसूल!] आप कहें, "ज़रा सोचो: अगर अल्लाह तुम्हारे सुनने की और
तुम्हारी देखने की शक्ति छीन ले और तुम्हारे दिलों पर ठप्पा लगा दे (कि कुछ
सोच-समझ न सको), तो अल्लाह को छोड़कर कौन है जो तुम्हें ये
नेमतें वापस दिला सकता है?"
देखिए, कैसे हम अपनी आयतों को समझाने के लिए तरह-तरह
से बताते हैं, फिर भी ये लोग मुँह फेर लेते हैं। (46)
आप कहें, "ज़रा सोचो: अगर तुम पर अल्लाह की यातना एकदम
से अचानक आ जाए या बताकर आए, तो
क्या शैतानियाँ करनेवाले लोगों के सिवा कोई और गिरोह होगा जिसे बर्बाद किया जाएगा?" (47)
हम रसूलों को केवल इसीलिए
भेजते हैं कि वे (ईमान व नेक कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुना दें और (इंकार व बुरे कर्मों
के नतीजे से) सावधान कर दें। सो जिस किसी ने विश्वास कर लिया और अपने आपको सुधारते
हुए नेक कर्म किए, तो ऐसे लोगों को न कोई डर होगा और न वे दुखी
होंगे। (48)
रहे वे लोग, जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार
कर दिया, तो हमारी आज्ञा का खुले आम विरोध करने के
नतीजे में, वे निश्चय ही हमारी यातना की लपेट में आ
जाएंगे। (49)
आप कह दें, "मेरे पास न तो अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न मैं नज़रों से ओझल चीज़ों की (पूरी) जानकारी
रखता हूँ, और न ही मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस उसी
बात पर चलता हूँ जो मुझे 'वही' [Revelation] द्वारा बतायी जाती है।" कहें, "क्या कोई अंधा और वह जो देख सकता हो, दोनों एक जैसे हो सकते हैं? क्या तुम सोच-विचार से काम नहीं लेते?" (50)
आप इस क़ुरआन के द्वारा उन
लोगों को सावधान कर दें,
जो
इस बात का डर रखते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने इकट्ठा किया जाएगा-----उस
(अल्लाह) के सिवा कोई न होगा जो उन्हें बचा सके और न कोई सिफ़ारिश करने वाला होगा
---- शायद कि ये बुराइयों से बचने वाले हो जाएं। (51)
[ऐ रसूल!] आप (अपनी मजलिस से) उन लोगों को
बाहर न निकाल दें, जो लोग केवल अपने रब की ख़ुशी व मंज़ूरी के लिए
सुबह और शाम उसे पुकारते रहते हैं। आप किसी भी तरह उनके कामों के लिए ज़िम्मेदार
नहीं हैं, और न आपके कामों के लिए वे ज़िम्मेदार हैं; अगर आपने (अमीर सरदारों के कहने पर) उन
ईमानवालों को (मजलिस से) बाहर निकाल दिया, तो
आप भी ज़्यादती करने वालों में से हो जाएंगे। (52)
हमने उनमें से कुछ लोगों
को, दूसरे लोगों की परीक्षा के लिए बनाया है, ताकि विश्वास न करनेवाले कहें, "क्या हममें से यही लोग मिले थे, जिन पर अल्लाह ने अपना ख़ास करम किया?" क्या अल्लाह उन्हें अच्छी तरह नहीं जानता जो
शुक्र अदा करने वाले हैं?
(53)
[ऐ
रसूल!] जब आपके पास ऐसे लोग आएँ, जो हमारी आयतों पर विश्वास [ईमान] रखते हैं, तो कहें, "सलामती हो तुमपर! तुम्हारे रब ने रहम [दया]
करने को अपने ऊपर ज़रूरी ठहरा लिया है: तुममें से कोई नासमझी में अगर कोई बुरा काम
कर बैठे, और फिर उसके बाद (ग़लती पर) पछताए और अपना
सुधार कर ले, तो अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, और बेहद दयावान है।" (54)
इसी तरह हम अपनी आयतें
अच्छी तरह समझाकर बता देते हैं, ताकि
(नेकी का रास्ता भी स्पष्ट हो जाए, और)
गुनाहगारों का रास्ता भी खुलकर सामने आ जाए। (55)
आप कह दें, "तुम लोग अल्लाह को छोड़कर जिन (देवताओं) को
पुकारते हो, उनकी पूजा करने से मुझे मना किया गया है।" कहें, "मैं तुम्हारी बेकार ख़्वाहिशों के पीछे नहीं चलूँगा, क्योंकि अगर मैंने ऐसा किया, तब तो मैं मार्ग से भटक जाऊंगा और उन लोगों
में नहीं रह जाऊंगा जिन्हें सही मार्ग दिखाया गया है।" (56)
कह दें, "मैं अपने रब की तरफ़ से एक स्पष्ट प्रमाण पर
क़ायम हूँ, हालाँकि तुम उसे मानने से इंकार करते हो। जिस
(यातना) को जल्दी लाने की तुम माँग कर रहे हो, उसकी ताक़त मेरे हाथ में नहीं है। फ़ैसला करना
तो बस अल्लाह के हाथ में है: वह सच बोलता है, और फ़ैसला करने वालों में वह सबसे बेहतर है।" (57)
कह दें, "जिस चीज़ [यातना] को ले आने की तुम्हें जल्दी
पड़ी हुई है, वह अगर मेरे हाथ में होती, तो मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला हो चुका होता, मगर अल्लाह ग़लत काम करने वालों को ख़ूब अच्छी
तरह जानता है।" (58)
अनदेखी चीज़ों की कुंजियाँ
उसी के पास हैं: उसके सिवा कोई नहीं जो उन्हें जानता हो। जल और थल में जो कुछ है, वह सब जानता है। बिना उसकी जानकारी के एक
पत्ता तक नहीं गिरता, और धरती के अँधेरों में पड़ा हुआ कोई दाना हो, या कोई भी चीज़, ताज़ी (गीली) हो या मुरझायी (सूखी) हुई, ऐसी नहीं जो एक स्पष्ट किताब में न लिखी हुई
हो। (59)
वही (अल्लाह) है जो रात के
समय (नींद में) तुम्हारी रूह को वापस बुला लेता है, यह जानते हुए कि दिन भर तुमने क्या क्या किया
है, फिर वह (एक नये) दिन में तुम्हें दोबारा
(ज़िंदा) उठा देता है,
ताकि
(अपनी उम्र की) निश्चित अवधि पूरी कर सको। उसी के पास अंत में, तुम्हें लौटना होगा, और तब वह तुम्हें बता देगा कि तुम क्या क्या
किया करते थे। (60)
वह अपने बन्दों का सबसे
बड़ा मालिक है (जिसे हर चीज़ पर पूरा नियंत्रण है), वह तुम पर निगरानी रखने के लिए लिखनेवाले
(फ़रिश्तों) को उस समय तक भेजता है, जब
तक कि तुममें से किसी की मौत न आ जाती हो, फिर हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उसकी रूह ले लेते हैं------ वे अपने काम में कभी कोई चूक नहीं करते। (61)
उसके बाद उन सबको अल्लाह
के पास लौटकर जाना होगा, जो उनका असली रब है। असली फ़ैसला तो उसी का
होता है, और वह हिसाब लेने में सबसे तेज़ है। (62)
[ऐ
रसूल!] आप कहें, "कौन है जो तुम्हें थल और जल की अँधेरी
गहराइयों से बचा लेता है,
जब
तुम गिड़गिड़ाते हुए और चुपके-चुपके (यह कहते हुए) उसे पुकारने लगते हो, "अगर वह हमें इस (मुसीबत) से बचा ले, तो हम सचमुच ही शुक्र अदा करने वालों में हो
जाएंगे?" (63)
कहें, "अल्लाह तुम्हें इस (मुसीबत) से और हर तकलीफ़
से बचाता है; इसके बावजूद तुम उस (अल्लाह) के अलावा दूसरों
की भी पूजा करते हो।"
(64)
कह दें, "वह इस बात की पूरी ताक़त रखता है कि तुम पर तुम्हारे ऊपर से या
तुम्हारे पैरों के नीचे से कोई यातना भेज दे, या
तुम्हें अलग-अलग गुटों में बाँटकर एक दूसरे से भिड़ा दे और किसी एक को दूसरे की
मारपीट का मज़ा चखाए।"
देखिए, किस तरह हम अपनी आयतों को तरह-तरह से समझाते हैं, ताकि वे समझ सकें, (65)
[ऐ
रसूल!] इसके बावजूद आपकी क़ौम के लोग अब भी इस [क़ुरआन] को मानने से इंकार करते हैं, हालाँकि यह सच्ची (किताब) है। कह दें, "मुझे कोई तुम्हारी देखरेख करने के लिए नहीं बैठाया
गया है। (66)
हर रसूल द्वारा दी गयी
(चेतावनियों की) ख़बरों के पूरा होने का समय तय है: जल्द ही तुम्हें मालूम हो
जाएगा।" (67)
जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो हमारी आयतों को बुरा-भला कह रहे हों, तो (बजाय बहस करने के) वहाँ से उस वक़्त तक के
लिए किनारे हट जाओ, जब तक कि वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ।
और अगर कभी शैतान तुम्हें (उनसे दूर हटने की बात से) भुलावे में डाल दे, तो याद आ जाने के बाद, ऐसे लोगों के साथ न बैठो जो ग़लत काम कर रहे
हों। (68)
नेकी की राह चलने वालों को
किसी भी तरह से, ग़लत काम करने वालों के लिए ज़िम्मेदार नहीं
ठहराया जाएगा; उनके ज़िम्मे तो बस इतना है कि उन्हें नसीहत [Remind] करते रहें, ताकि वे (बुराइयों से) बच सकें। (69)
छोड़ दें ऐसे लोगों को
उनके हाल पर, जिन्होंने अपने धर्म को खेल-तमाशा और भटकाव
की चीज़ बना लिया है और उन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा है, मगर उन्हें (क़ुरआन द्वारा) नसीहत करते रहें, कि कहीं ऐसा न हो कि कोई इंसान अपने (बुरे)
कर्मों के कारण तबाही में पड़ जाए----- कोई न होगा जो उसे अल्लाह से बचा सके, और न ही कोई सिफ़ारिश करनेवाला होगा; वह अपने छुटकारे के बदले में जो कुछ भी [ransom] देना चाहे, उसे क़बूल नहीं किया जाएगा। ऐसे ही लोग हैं जो
अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में छोड़ दिए गए: उनके पीने के लिए खौलता हुआ
पानी होगा और दर्दनाक यातना होगी, क्योंकि
वे (सच्चाई का) इंकार करते रहे थे। (70)
आप कहें, "क्या हम अल्लाह को छोड़कर उसे पुकारने लग
जाएँ जो न तो हमें कोई फ़ायदा पहुँचा सकता हो, और
न कोई नुक़सान? जबकि अल्लाह हमें सीधा रास्ता दिखा चुका है, तब भी हम (गुमराही की तरफ़) उलटे पाँव फिर
जाएँ, और उस आदमी की तरह हो जाएं जिसे शैतानों ने रेगिस्तानी
खड्डों [Desert ravine] में भटका दिया हो, और वह हैरान-परेशान होकर फिरता हो, हालाँकि उसके कुछ साथी उसे सही मार्ग की ओर
बुला रहे हों (और कहते हों), 'हमारे पास चला आ!'?" आप कह दें, "अल्लाह का दिखाया हुआ मार्ग ही असल में सच्चा
मार्गदर्शन है, और हमें आदेश हुआ है कि हम सारे संसार के रब
के आगे पूरी भक्ति से अपना सिर झुका दें, (71)
पाबंदी से नमाज़ क़ायम
करें और अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहें।" वही है, जिसके पास तुम सब इकट्ठे ले जाए जाओगे। (72)
वही है जिसने आसमानों और
ज़मीन को एक सही मक़सद के साथ पैदा किया। और उस दिन जब वह कहेगा, 'हो जा', तो बस वह हो जाएगा: उसकी कही बात बिल्कुल सच है। जिस (क़यामत
के) दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, उस दिन सारा नियंत्रण [Control] उसी का होगा। वह हर चीज़ जो दिखायी न देती हो
और जो दिखायी देती हो, सब का जाननेवाला है: वह बड़ा ज्ञानी, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (73)
(देखो!)
जब ऐसा हुआ था कि इबराहीम
[Abraham] ने
अपने बाप, आज़र से कहा था, "तुम पत्थर की मूर्तियों को अपना ख़ुदा कैसे
मान सकते हो? मैं तो तुम्हें और तुम्हारी क़ौम के लोगों को
पूरी तरह गुमराही में पड़ा देख रहा हूँ।" (74)
और इसी तरह हम इबराहीम को
आसमानों और ज़मीन में अपनी ताक़तवर हुकूमत के जलवे दिखाते थे, ताकि उसका विश्वास पक्का हो जाए। (75)
फिर जब ऐसा हुआ कि उस पर
रात का अंधेरा छा गया,
तो
उसने एक तारा देखा और कहा,
"यह
मेरा रब है", फिर जब वह डूब गया, तो उसने कहा, "मैं डूब जाने वाली चीज़ पसंद नहीं करता।" (76)
और जब उसने चाँद को निकलता
हुआ देखा, तो कहा, "यह मेरा रब है", मगर जब वह भी डूब गया, तो उसने कहा, "अगर मेरे रब ने मुझे रास्ता न दिखाया होता, तो मैं भी उन लोगों में शामिल हो जाता जो
सीधे रास्ते से भटक जाते हैं।" (77)
उसके बाद जब उसने सूरज को
उगते हुए देखा, तो पुकार उठा, "यह मेरा रब है! यह तो ज़्यादा बड़ा है", मगर जब वह भी डूब गया, तो उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह के साथ जिस किसी को तुम
पूजते हो, मैं उन सबसे अपना संबंध तोड़ता हूँ। (78)
मैंने (हर तरफ़ से अपना
मुँह मोड़कर) एक पक्के ईमानवाले के रूप में, अपना
चेहरा उसी की ओर कर लिया है, जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है। मैं उनमें से नहीं
हूँ जो (अल्लाह के साथ) दूसरे देवताओं को पूजते हैं।" (79)
उसकी क़ौम के लोग उससे
झगड़ने लगे, और उसने कहा, "तुम मुझ से अल्लाह के बारे में क्यों झगड़ते
हो, जबकि उसने मुझे (सीधा) मार्ग दिखा दिया है? मैं ऐसी किसी चीज़ से नहीं डरता, जिन्हें तुम उस (अल्लाह) के साथ (साझेदार के
रूप में) जोड़ते हो: जब तक कि मेरा रब न चाहे (कोई नुक़सान नहीं हो
सकता)। मेरे रब ने हर चीज़ को अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। फिर क्यों तुम इस
पर ध्यान नहीं देते? (80)
"मैं उन हस्तियों से क्यों डरूँ, जिन्हें तुमने उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहरा लिया है? मगर तुम इस बात से क्यों नहीं डरते कि तुमने
उन चीज़ों को अल्लाह के साथ जोड़ रखा है, जिसके लिए उसने तुम पर कोई सनद नहीं उतारी? अब बताओ, अगर तुम्हें जवाब पता हो, कि दोनों में से किस गुट को ज़्यादा सुरक्षित
महसूस करना चाहिए? (81)
"असल में जो लोग ईमान रखते हैं, और अपने ईमान के साथ (अल्लाह को छोड़कर) किसी
दूसरी हस्तियों की मिलावट नहीं करते, तो वे सुरक्षित होंगे, और
यही वे लोग हैं जो सीधे मार्ग पर हैं।" (82)
तो (देखो!) ऐसा था हमारा
वह तर्क जो हमने इबराहीम को उसकी क़ौम के मुक़ाबले में दिया था----- हम जिसे चाहते
हैं उसका दर्जो ऊँचा कर देते हैं---- तुम्हारा रब हर चीज़ की गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है, सब कुछ जानता है। (83)
और हमने उसे [इबराहीम को]
इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] दिए, उनमें
से हर
एक को सीधा मार्ग दिखाया, जैसे इससे पहले हमने नूह [Noah] को सीधा रास्ता दिखाया था, और उसके वंशजों में दाऊद [David], सुलैमान [Solomon], अय्यूब [Job], यूसुफ़ [Joseph], मूसा [Moses] और हारून [Aaron] थे------- इसी तरह अच्छा कर्म करने वालों को हम बदले में
इनाम दिया करते हैं----- (84)
ज़करिया [Zachariah], यह्या [John], ईसा [Jesus] और इलयास [Elijah] ------- इनमें से हर एक बहुत नेक था------ (85)
इसमाईल [Ishmael], अल यसा' [Elisha], यूनुस [Jonah] और लूत [Lot]। इनमें से हर एक को हमने संसार के दूसरे लोगों के मुक़ाबले
में श्रेष्ठता दी थी, (86)
और साथ में, उनमें से कुछ के बाप-दादा, उनकी सन्तानों और उनके भाई-बन्धुओं को भी:
हमने उन्हें चुना और उन्हें सीधा मार्ग दिखाया था। (87)
यह है अल्लाह का
मार्गदर्शन, जिसके द्वारा वह अपने बन्दों में से जिसको
चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। अगर
उन लोगों ने कहीं अल्लाह के साथ दूसरे ख़ुदाओं को जोड़ा होता, तो उनका सब किया-धरा बेकार हो जाता। (88)
ये वह लोग हैं जिन्हें
हमने (आसमानी) किताब, फ़ैसला करने की समझ-बूझ, और पैग़म्बरी [Prophethood] प्रदान की थी। भले ही अब (अरब के) ये लोग
इनमें [मुहम्मद में] विश्वास करने से इंकार करें, मगर हमने इसकी ज़िम्मेदारी ऐसे लोगों को सौंपी
है जो (सच्चाई से) इंकार नहीं करते। (89)
वे [पिछले पैग़म्बर] ऐसे
लोग थे, जिन्हें अल्लाह ने सच्चाई का मार्ग दिखाया था, तो '[ऐ रसूल], उन्हें जो ज्ञान की रौशनी मिली थी, आप उन्हीं के पीछे चलें।' आप कहें, "मैं तुमसे इसके लिए कोई मज़दूरी [reward] नहीं माँगता: यह [क़ुरआन] तो सारी दुनिया के
लोगों के लिए सीखने का एक सबक़ [Lesson] है।" (90)
और (देखो!) जब उन लोगों ने
कहा, "अल्लाह ने किसी (मर-खप जानेवाले) इंसान पर कोई
ऐसी चीज़ [किताब] नहीं उतारी है", तो उन्हें
अल्लाह की ख़ुदायी का जो अंदाज़ा करना चाहिए था, वह उन्होंने नहीं किया। [ऐ रसूल] आप कहें, "फिर कौन था जिसने वह किताब [तौरात] उतारी थी, जो मूसा लेकर आया था, जो लोगों के लिए रौशनी और रास्ता दिखानेवाली थी, जिसे तुम अलग-अलग पन्नों में रखते हो, जिसमें से कुछ को दिखाते हो, मगर बहुत-सा छिपा जाते हो? तुम्हें वह चीज़ें पढ़ायी गयीं, जिसे न तुम और न तुम्हारे बाप-दादा ही जानते थे।" कह दें, "अल्लाह (ने उतारी है यह किताब)," फिर छोड़ दो उन्हें, कि वे बेकार की बातों में उलझे रहें। (91)
यह [क़ुरआन] बहुत बरकतवाली [Blessed] किताब है जो हमने उतारी है, ताकि इससे पहले जो किताबें उतर चुकी हैं, उनकी (सच्चाई की) पुष्टि हो जाए, ताकि तुम इसके द्वारा शहर के केंद्र [मक्का] और
उसके आसपास बसने वाले लोगों को सावधान कर दो। जो लोग आने वाली दुनिया [परलोक/आख़िरत] में
विश्वास करते हैं, वह इस किताब पर भी विश्वास करते हैं। और जो लोग
आख़िरत पर ईमान रखते हैं, वे इस पर भी ईमान रखते हैं, और वे अपनी नमाज़ों से लापरवाही नहीं करते हैं। (92)
उस आदमी से बढ़कर बदमाश कौन हो
सकता है, जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, या यह दावा करता हो कि, "मुझ पर 'वही' [Revelations] उतरी है, जबकि
असल में उसके पास कोई 'वही' नहीं भेजी गयी हो, या यह कहता हो, "मैं भी अल्लाह की 'वही' के बराबरी में कुछ उसी तरह की 'वही' उतार
सकता हूँ। और अगर आप देख पाते, कि मौत की सख़्ती में घिरे हुए अत्याचारियों का क्या हाल होता है, जब फ़रिश्ते उनकी तरफ़ अपने हाथ, यह कहते हुए बढ़ाते हैं, "अपनी रूहों को त्याग दो! अल्लाह के बारे में झूठी
बातें बोलने और अपनी अकड़ में उसकी आयतों को ठुकरा देने के नतीजे में आज तुम्हें
अपमानित करने वाली यातना दी जाएगी।" (93)
[क़यामत
के दिन अल्लाह कहेगा],
"आख़िर
तुम लौटकर हमारे पास आ ही गए, वह भी एकदम अकेले, जिस तरह हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था:
हमने तुम्हें जो कुछ दे रखा था, तुम सब कुछ पीछे छोड़ आए
हो, और
तुम्हारे वे सिफ़ारिश करने वाले भी कहीं दिखायी नहीं पड़ते हैं जिनके बारे में तुम
दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) अल्लाह के साझेदार [Partner] हैं।" तुम्हारे बीच के सारे बंधन टूट चुके हैं, और जिन (देवताओं) के बारे में तुम ऐसे दावे किया
करते थे, वे सब
तुम्हें छोड़ चुके हैं। (94)
यह अल्लाह है जो दाने और गुठली को फाड़कर
निकालता है: वह सजीव [जानदार] चीज़ों को निर्जीव [बेजान] चीज़ों से निकाल
लाता है और बेजान चीज़ को जानदार चीज़ों से निकालने वाला है---- वही अल्लाह है -----
तो फिर तुम सच्चाई से कैसे मुँह मोड़कर जा सकते हो? (95)
उसी के हुक्म से सुबह को पौ फटती है; उसी ने रात बनायी है आराम के लिए; और उसी ने सूरज और चाँद को एक नपे-तुले
अंदाज़े से बनाया है। यह सब उस हस्ती की बनायी हुई योजना है, जो बहुत ताक़तवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (96)
वही है जिसने सितारों को बनाया, ताकि धरती और समंदर में अँधेरे के समय वे
तुम्हें रास्ता दिखा सकें: हमने अपनी निशानियाँ उन लोगों के लिए स्पष्ट कर दी हैं, जो जानकारी रखते हैं। (97)
वही है, जिसने तुम्हें पहली बार एक अकेली जान से पैदा किया, फिर (इस दुनिया) में ठहरने के लिए एक जगह दी, और (मरने के बाद) आराम की एक जगह दी। हमने
अपनी आयतें उन लोगों के लिए स्पष्ट
कर दी हैं, जो समझ-बूझ रखते हैं। (98)
वही (अल्लाह) है जो आसमान से पानी बरसाता है।
फिर उसी के द्वारा हम हर एक पौधे की कोंपल उगाते हैं, फिर उससे हरी-भरी टहनियाँ निकल आती हैं, फिर उससे दाने निकल आते हैं, एक दाने से दूसरा दाना मिला हुआ।
और (इसी तरह) खजूर के पेड़ों पर खजूरों के
गुच्छे लदे होते हैं, जो (उसके बोझ से) झुके पड़ते हैं। और अंगूर, ज़ैतून और अनार के बाग़ पैदा किए, जो देखने में एक जैसे भी लगते हैं, और एक-दूसरे से अलग भी। उनके फलों को बढ़ते
और पकते हुए देखो! निस्संदेह ईमान रखनेवाले लोगों के लिए इनमें बड़ी निशानियाँ
हैं। (99)
इसके बावजूद, लोगों ने जिन्नों को (ताक़त में) अल्लाह का
साझेदार [Partner] ठहरा रखा है, हालाँकि उसी ने उनको भी पैदा किया है, और बिना सही जानकारी के, उस [अल्लाह] के लिए बेटे और बेटियाँ भी बना
लेते हैं! वह इन चीज़ों से कहीं महान है जो ये उसके बारे में बयान करते हैं! (100)
वह आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है!
उसकी कोई औलाद कैसे हो सकती है, जबकि उसका कोई जोड़ा (spouse) है ही नहीं? उसी ने सारी चीज़ों को पैदा किया है, और उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है। (101)
यह अल्लाह है, तुम्हारा रब, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, हर चीज़ का पैदा करनेवाला, अतः उसी की बन्दगी करो; वह हर चीज़ की देखरेख करनेवाला है। (102)
(आदमी की) निगाहें उसे नहीं देख सकतीं, मगर वह (हमारी) निगाहों से दिखने वाली हर चीज़
को देखता है। वह छोटी से छोटी चीज़ की भी पूरी ख़बर रखनेवाला है। (103)
(देखो!) अब तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से
स्पष्ट प्रमाण आ चुका है: अगर कोई उसे देखता है, तो वह उसके ही फ़ायदे के लिए होगा; और अगर कोई इससे अंधा बना रहा, तो उससे नुक़सान भी उसी का होगा-----(कह दें)
“मैं
तुम्हारी देखरेख करने वाला नहीं हूँ। (104)
इस तरह हम अपनी आयतें तरह-तरह से समझा कर
बयान करते हैं-----(कि वे सुनें), हालांकि वे यही कहेंगे, "तुम [मुहम्मद] कहीं से पढ़-पढ़ा लेते हो" --- ताकि उनके लिए यह स्पष्ट हो जाए, जो समझ रखते हैं। (105)
(ऐ रसूल) आपके रब की तरफ़ से 'वही’ [Revelation] द्वारा आप पर जो (क़ुरआन) उतारी गयी है, आप उसी के पीछे चलें, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है। उन लोगों से आप
मुंह मोड़ लें जो अल्लाह के साथ दूसरों को (उसकी ख़ुदायी में) जोड़ देते हैं। (106)
अगर अल्लाह की यही मर्ज़ी होती, तो उन लोगों ने ऐसा न किया होता, मगर हमने आपको उनकी देखरेख के लिए नहीं बनाया, और न ही आप उनके रखवाले हैं। (107)
(ईमानवालो!) भले ही वे अपनी दुश्मनी और जिहालत
में अल्लाह को बुरा-भला कहें, मगर वे जिन्हें अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, तुम उन्हें बुरा-भला न कहो। इसी प्रकार हमने
हर गिरोह के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है, मगर अंत में उन्हें अपने रब के पास ही लौटना
है और फिर वह उन्हें बता देगा, जो कुछ वे करते रहे होंगे। (108)
उन लोगों ने अल्लाह की क़सम
खाते हुए कड़ी प्रतिज्ञाएं ली हैं कि अगर उनके पास कोई चमत्कारिक निशानी आ जाए, तो उसपर वे ज़रूर विश्वास कर लेंगे। [ऐ रसूल]
आप कह दें, "निशानियों (को दिखाने) की ताक़त तो केवल
अल्लाह के ही पास है।"
और
(मुसलमानो!) तुम्हें क्या पता कि अगर (चमत्कार वाली) निशानी आ भी जाए, तब भी वे विश्वास नहीं करेंगे। (109)
और हम उनके दिलों और
निगाहों को फेर देंगे,
जिस
तरह वे पहली बार ईमान नहीं लाए थे। और हम उन्हें छोड़ देंगे कि वे अपनी ज़िद व
हठधर्मी में भटकते रहें, (110)
यहाँ तक कि अगर हम उनके पास फ़रिश्ते भी उतार
भेजते, और मुर्दें भी उनसे बातें करने लगते, और हम सारी चीज़ों को उनके बिल्कुल सामने
लाकर खड़ा कर देते, तो भी वे विश्वास नहीं करते, जब तक कि अल्लाह न चाहे, मगर अधिकतर लोग (इस बात से) अनजान हैं। (111)
इसी तरह से, हर एक रसूल के साथ हमने एक दुश्मन लगा दिया
था, शैतान आदमियों और शैतान जिन्नों के रूप में। वे धोखा देने
के लिए एक दूसरे के मन में चिकनी-चुपड़ी बातें डाला करते थे----- [ऐ रसूल!], अगर आपके रब ने न चाहा होता, तो वे ऐसा नहीं कर पाते: छोड़ दें उन्हें
(झूठ) गढ़ने के लिए----(112)
ताकि जो लोग परलोक [आख़िरत]
में विश्वास नहीं करते,
उनके
दिल उसके छल व धोखे से भरी बातों की ओर झुक सकें, वे उसी में मगन रहें, और जो भी (ग़लत) काम करना चाहें, कर गुज़रें। (113)
(आप कहें), "क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और को (अपने
बीच) फ़ैसला करने वाला बना लूँ, जबकि
वही है जिसने तुम (लोगों) के लिए एक किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है, जिसमें बातें समझा-समझाकर बता दी गयी हैं?" जिन [यहूदी व ईसाई] लोगों को हमने किताब दी
थी, वे भी जानते हैं कि यह [क़ुरआन] आपके रब की
तरफ़ से सच्चाई के साथ उतारी गयी है, तो आप उन लोगों में से न हो जाएं जो (अल्लाह के फ़ैसले पर)
सन्देह करते हैं। (114)
आपके रब की बात सच्चाई और
इंसाफ़ में बिल्कुल पक्की है, कोई
नहीं जो उसकी बातों (व नियमों) को बदल सके: वह सब कुछ सुननेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (115)
इस धरती पर ज़्यादातर लोग
ऐसे हैं कि अगर आप उनके कहने पर चले, तो
वे अल्लाह के मार्ग से आपको दूर ले जाएंगे। वे किसी और चीज़ के नहीं, केवल अटकल के पीछे चलते हैं; और बस (ख़्याली) अंदाज़े [Guess] ही लगाते रहते हैं। (116)
तुम्हारा रब अच्छी तरह से
जानता है, कि कौन उसके मार्ग से भटक रहा है, और कौन है जो सीधे मार्ग पर है। (117)
अतः [ऐ ईमानवालो!], जिस (जानवर को काटते समय) अल्लाह का नाम लिया
गया हो, उसे बे-हिचक खाओ, अगर तुम उसकी आयतों में विश्वास रखते हो। (118)
तुम ऐसे जानवरों को क्यों
नहीं खाते हो, हालाँकि जो कुछ उसने तुम्हें खाने से मना
किया है, वह तो अल्लाह ने पहले ही विस्तार से बता दिया
है, हाँ, अगर
भूख से मजबूर हो जाओ, तो बात अलग है? लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जो बिना पूरी
जानकारी के, केवल अपनी इच्छाओं [ग़लत विचारों] के चलते
दूसरों को सीधे रास्ते से भटका देते हैं। [ऐ रसूल!] आपका रब उन लोगों को भली-भाँति
जानता है, जो मर्यादा तोड़ डालते हैं। (119)
गुनाह करने से बचो, चाहे खुले-आम किया जाए या छिप-छिपकर, क्योंकि गुनाह करने वालों को उसका बदला दिया
जाएगा, जो कुछ वे करते हैं, (120)
ऐसा कोई (जानवर) न खाओ, जिसपर (काटते समय) अल्लाह का नाम न लिया गया
हो, क्योंकि यह तो क़ानून तोड़ना होगा।
शैतानों का यह काम है कि वे अपने मानने वालों
को भड़काते रहते हैं कि वे तुम से बहस करें: अगर तुम उनकी बातें सुनने लग जाओगे, तो तुम भी मूर्तियों को पूजनेवाले हो जाओगे।
(121)
क्या एक मरा हुआ आदमी जिसको हमने दोबारा
ज़िंदगी दी हो, और उसके साथ एक रौशनी दी हो जिसके सहारे वह लोगों के बीच चलता-फिरता
हो, उस आदमी के बराबर हो जाएगा, जो गहरे अंधकार में फँसा हुआ हो, और उसके बाहर निकलने का कोई रास्ता न हो? इस तरह से, विश्वास न करनेवालों की नज़रों में वही बातें
बहुत लुभावनी मालूम पड़ती हैं, जो कुछ कुकर्म वे करते रहते हैं। (122)
और इसी तरह हमने हर बस्ती में वहाँ के
अपराधियों के सरदारों को लगा दिया है कि वहाँ वे अपनी चालें (ईमानवालों के ख़िलाफ़)
चला करें----मगर वे जितनी भी चालें चलते हैं, वह दरअसल अपने ही ख़िलाफ़ चलते हैं, मगर इस बात को समझ नहीं पाते। (123)
जब उनके सामने कोई आयत
[निशानी] लायी जाती है, तो वे कहते हैं, "हम उस वक़्त तक इस पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि हमारे ऊपर भी वैसी ही आयत न उतारी
जाए, जैसी कि अल्लाह के रसूलों पर उतारी गयी हैं।" मगर अल्लाह ही बेहतर जानता है कि वह अपने
संदेशों को पहुँचाने के लिए किसे अपना पैग़म्बर [Prophet] चुनता है: जिन अपराधियों ने ऐसी बातें कही
हैं, उनकी गंदी चालों के बदले में उन्हें, अल्लाह के यहाँ भारी अपमान और कठोर यातना का
सामना करना पड़ेगा। (124)
जब अल्लाह किसी को सीधा
मार्ग दिखाना चाहता है,
तो
उसका सीना केवल अपनी भक्ति [इस्लाम] के लिए खोल देता है; और जिसे (उसकी ज़िद्द के कारण) गुमराही में
पड़ा रहने देता चाहता है,
उसके
सीने को इतना तंग और सिकुड़ा हुआ कर देता है (कि उनके लिए विश्वास करना इतना मुश्किल
होता है कि) मानो वे आसमानों पर चढ़ रहे हों। इस तरह जो लोग (सच्चाई पर) ईमान नहीं
रखते, अल्लाह उन लोगों की बुराइयों को उन्हीं
पर मार देता है, (125)
[ऐ रसूल!], यह आपके रब का रास्ता है, जो बिल्कुल सीधा बनाया गया है। हमने (सच्चाई
के रास्ते की) निशानियाँ,
ध्यान
देने वालों के लिए विस्तार से समझा दी हैं। (126)
उन लोगों के लिए उनके रब
के यहाँ सलामती व शांति का घर होगा, और
उनके अच्छे कर्मों के बदले वह उनकी ख़ूब देखभाल करेगा। (127)
एक दिन आएगा जब अल्लाह उन सब
(जिन्नों) को घेरकर इकट्ठा करेगा, (और
कहेगा), "ऐ जिन्नों के गिरोह! तुमने तो इंसानों की बहुत
बड़ी संख्या को बहका डाला।"
और इंसानों
में से जो उनके माननेवाले साथी होंगे, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमने एक-दूसरे से बहुत फ़ायदा उठाया
है, मगर अब हमारे लिए तय किया हुआ समय पूरा हो गया है, जो तूने हमारे लिए ठहराया था।" अल्लाह कहेगा, "अब तुम्हारा ठिकाना आग [नरक/जहन्नम] है, और उसी में तुम्हें रहना होगा"----सिवाय इसके, कि
अल्लाह अगर कुछ और चाहे: [ऐ रसूल!] आपका रब बहुत समझ-बूझ रखनेवाला, और हर चीज़ की जानकारी रखता है। (128)
इस तरीक़े से, हम कुछ शैतानियाँ करने वालों को उनके कुकर्मों के
कारण, एक दूसरे पर ताक़त व अधिकार दे देते हैं। (129)
"ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! क्या तुम्हारे
पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे, जो
तुम्हें मेरी आयतें पढ़कर सुनाते थे, और
तुम्हें इसी दिन का सामना करने से सावधान करते थे?" वे कहेंगे, "(हाँ! रसूल तो आए थे) आज हम स्वयं अपने ख़िलाफ़ गवाही देते हैं।" इस दुनिया की ज़िंदगी ने उन्हें धोखे में रखा, मगर वे ख़ुद अपने विरुद्ध गवाही देंगे कि उन्होंने
सच्चाई को मानने से इंकार किया था: (130)
तुम्हारा रब कभी बस्तियों को
उनके गुनाहों के कारण बर्बाद नहीं करता, अगर
उनमें रहनेवाले लोगों को (किसी रसूल द्वारा) पहले से सावधान न कर दिया गया हो। (131)
कर्मों के अनुसार हर एक का
(अलग-अलग) दर्जा ठहरा दिया गया है; और जो
कुछ वे करते हैं, तुम्हारा रब उससे अनजान नहीं है। (132)
तुम्हारा रब किसी भी चीज़ के
लिए, किसी पर भी निर्भर नहीं है, और वह बेहद दयावान है। अगर वह चाहे तो तुम्हें (दुनिया से) हटा दे, और तुम्हारी जगह जिस (गिरोह) को चाहे तुम्हारे
बाद ले आए, ठीक वैसे ही, जैसे उसने दूसरों की नस्ल से तुम्हें उठा खड़ा
किया है। (133)
जिस चीज़ का तुमसे वादा किया
जाता है, उसे तो आना ही है, और तुम उसे टाल नहीं सकते। (134)
[ऐ रसूल!] कह दें, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह (अपने तरीक़े
से) काम करते रहो, मैं अपना काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम
हो जाएगा कि आख़िरत [परलोक] में किस का अंजाम अच्छा रहा।" शैतानियाँ करनेवाले
कभी फलते-फूलते नहीं। (135)
जो कुछ अल्लाह ने खेतियों
और चौपायों में से पैदा किया है, उनमें
से एक हिस्सा [share], ये अल्लाह के लिए तय कर देते हैं, और कहते हैं, "यह अल्लाह के लिए है"---- या ऐसा दावा
करते हैं!------ "और यह (हिस्सा) हमारे देवताओं [अल्लाह के साझेदारों] के लिए
है।" उनके देवताओं का हिस्सा तो अल्लाह तक नहीं पहुँचता (यानी अल्लाह के लिए ख़र्च नहीं होता), मगर अल्लाह का हिस्सा ज़रूर उनके देवताओं तक
पहुँच जाता है: कितना बुरा फ़ैसला करते हैं ये लोग! (136)
इसी तरह से, उनके देवताओं (या शैतानों) ने अपने कई
माननेवालों [बहुदेववादी] के दिल में यह बात सुझायी कि अपने बच्चों की हत्या करना
बड़ा अच्छा काम है, इससे उनके बीच तबाही आयी और उनके धर्म में
भ्रम व उलझन की स्थिति बनी: अगर अल्लाह ने ऐसा न चाहा होता, तो उन लोगों ने यह न किया होता, अत: [ऐ रसूल] आप उन्हें उनके हाल पर छोड़
दें। (137)
वे कहते हैं, "इन चौपायों और फ़सलों (के आम इस्तेमाल) पर
पाबंदी है, और इन्हें केवल वही खा सकता है, जिसे हम अनुमति दें" ---- वे ऐसा कहते हैं! कुछ जानवर ऐसे हैं, जिनकी पीठों को (सवारी या सामान लादने के लिए) हराम ठहरा लिया
है, और कुछ जानवर ऐसे हैं कि (काटते समय) उन पर
अल्लाह का नाम नहीं लेते, इन सारी रस्मों को झूठे तरीक़े से अल्लाह के
नाम से जोड़ रखा है: जैसा झूठ वे गढ़ते रहते हैं, जल्द ही वह उन्हें इसका बदला देगा। (138)
वे यह भी कहते हैं, "इन जानवरों के पेट में से जो बच्चा ज़िंदा
निकले, तो वह केवल मर्दों के लिए हलाल होगा, और हमारी औरतों के लिए वर्जित [हराम] है। अगर
बच्चा मरा हुआ निकला, तो फिर उसे सब (मर्द-औरत) मिलकर खा सकते हैं।" जो झूठी बातें वे अल्लाह के नाम से जोड़ते हैं, उसके लिए वह उन्हें जल्द ही सज़ा देगा:
(सचमुच) वह बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है, सब
कुछ जानता है। (139)
सचमुच बर्बाद हो गए वे लोग
जिन्होंने बिना किसी जानकारी के, अपनी मूर्खता के कारण अपने बच्चों को (अपने
ही हाथों) मार डाला, और जो कुछ अल्लाह ने उनके लिए रोज़ी दी थी, उसे (अल्लाह के नाम से झूठ गढ़कर) अपने ऊपर
हराम ठहरा लिया: वे रास्ते से बहुत दूर भटक चुके हैं, और वे सीधे रास्ते पर चलने वाले न थे। (140)
(वही
अल्लाह) है जिसने तरह-तरह के बाग़ पैदा किए; कुछ जालियों पर चढ़ाए जाते हैं (जैसे अंगूर की बेलें) और
कुछ बिना सहारे के बढ़ते हैं, और
खजूरों के पेड़ और खेतियाँ, जिनके फल स्वाद में अलग-अलग तरह के होते हैं, और इसी तरह ज़ैतून और अनार जो देखने में
एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं, फिर
भी अलग हैं। तो जब उसमें फल लग जाएं, तो
उसका कुछ फल शौक़ से खाओ, और उस (फ़सल) की कटाई के दिन, उस पर जो (ग़रीबों का) हक़ बनता है, दे दिया करो, और (देखो) फ़ज़ूलख़र्ची न किया करो: अल्लाह
फ़ज़ूलख़र्च [wasteful] करने वालों को पसंद नहीं करता। (141)
उसी ने चौपाया जानवर दिए, उनमें से कुछ जो बड़े हैं, वह बोझ उठाने के काम आते हैं, और कुछ ज़मीन से लगे हुए छोटे जानवर हैं जो
खाने के काम भी आते हैं। अत: अल्लाह ने जो कुछ तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ और शैतान के पीछे न चलो: वह
तुम्हारा बड़ा पक्का दुश्मन है। (142)
(अल्लाह
ने तुम्हें) आठ मवेशी दिए हैं, चार
जोड़े [Pairs], एक जोड़ा भेड़ों का और एक जोड़ा बकरियों
का----[ऐ रसूल!], आप पूछें उनसे, "क्या अल्लाह ने दोनों नर हराम किए हैं या
दोनों मादा को? या उसको जो इन दोनों मादा के पेट में हो? अपने ज्ञान के आधार पर मुझे बताओ, अगर तुम सच बोल रहे हो।" (143)
और एक जोड़ा ऊँट का, और एक जोड़ा गाय का----- [ऐ रसूल!], उनसे पूछें, "क्या उसने हराम किए हैं दोनों नरों को या
दोनों मादाओं को? या उस बच्चे को जो इन दोनों मादाओं के पेट
में हो? क्या तुम मौजूद थे, जब अल्लाह ने तुम्हें ये आदेश दिए थे? (नहीं), तो
फिर उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता है, वह भी बिना किसी जानकारी के, ताकि लोगों को सीधे रास्ते से भटका सके? शैतानियाँ करनेवालों को अल्लाह सीधा रास्ता
नहीं दिखाता। (144)
[ऐ रसूल!] उनसे कह दें, "जो कुछ मुझ पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजा गया है, उसमें तो मैंने कोई चीज़ ऐसी नहीं पायी जो
लोगों के खाने के लिए मना [हराम] हो, सिवाय
इसके कि वह मरे हुए जानवर का सड़ा-गला मांस हो, या बहता हुआ ख़ून हो या सुअर का मांस हो
----कि ये गंदी (नापाक) चीज़ें हैं---- या वह (बलि चढ़ा हुआ) गुनाह का जानवर हो, जिसपर अल्लाह के बदले किसी और का नाम लिया
गया हो।" "लेकिन अगर कोई भूख के मारे (इन चीज़ों को खाने पर) मजबूर हो
जाए, और वह ऐसा जान-बूझकर न करे और न ही भूख
मिटाने से ज़्यादा खाए, तो फिर अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (145)
यहूदियों के लिए हमने हर
नाख़ुनवाला [Claws] जानवर खाने से मना कर दिया था, और गाय और भेड़-बकरियों में से इनकी चरबियाँ [fat] उनके लिए हराम कर दी थीं, सिवाय उस चरबी के जो उनकी पीठ और आँतों से
लगी हुई हों, या जो किसी हड़्डी के साथ मिली हुई हो। इस
तरह से हमने उन्हें आज्ञा न मानने के कारण सज़ा दी थी: हम अपनी बात में बिल्कुल
सच्चे हैं। (146)
[ऐ
रसूल!], अगर वे [विश्वास न करनेवाले] आप पर झूठ बोलने
का आरोप लगाएं, तो आप कह दें, "तुम्हारे रब की रहमत [दया] ने हर चीज़ को अपने
घेरे में ले रखा है, मगर शैतानियाँ करनेवालों से उसकी यातना टाली
नहीं जा सकती।" (147)
(अरब
के) मूर्तिपूजा करनेवाले [Idolaters] कहेंगे, "अगर अल्लाह चाहता, तो
हमने (ख़ुदायी में) उसका साझेदार [Partner] न ठहराया होता---और न हमारे बाप-दादा ने--- और न ही हमने किसी चीज़ को (बिना आदेश के)
हराम ठहराया होता।" ठीक इसी तरह, इनसे पहले गुज़र चुके लोग भी (सच्चाई को)
मानने से लगातार इंकार करते रहे थे, यहाँ तक कि उन्हें हमारी सज़ा का मज़ा चखना
पड़ा। कहें, "क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा ज्ञान है जिसे तुम
हमारे सामने दिखा सकते हो?
तुम
(लोग) केवल अपनी (झूठी) मान्यताओं के पीछे चलते हो और सिर्फ़ झूठ बोलते हो।" (148)
आप कह दें, "फ़ैसला कर देने वाला तर्क तो केवल अल्लाह के
पास है। अगर वह ऐसा चाहता, तो तुम सबको सीधा मार्ग दिखा देता।" (149)
कह दें, "अपने उन गवाहों को बुलाओ, जो इसकी गवाही दें कि अल्लाह ने सचमुच इन
(जानवरों) को हराम कर दिया है।" फिर अगर उनके (झूठे गवाह) गवाही दे भी दें, तो आप उनके साथ गवाही देने वालों में शामिल न
हो जाएं। उन लोगों की इच्छाओं के पीछे हरगिज़ न चलें जिन्होंने हमारी आयतों को
मानने से इंकार कर दिया, जो आख़िरत [परलोक / Hereafter] पर विश्वास नहीं रखते, और जो दूसरों को (ख़ुदायी में) अपने रब के
बराबर ठहराते हैं। (150)
[ऐ
रसूल!] उनसे कहें, "आओ! मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे रब ने
तुम्हें क्या क्या करने से मना किया है। किसी भी चीज़ को अल्लाह का साझेदार [Partner] न ठहराओ; अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करो; ग़रीबी की डर से अपने बच्चों को न मार डालो---- हम तुम्हें भी रोज़ी देंगे और उन्हें भी-----
अश्लील कामों [Indecencies] से अपने आपको बिल्कुल दूर रखो, चाहे वे खुल्लम-खुल्ला हों या छिप-छिपकर हों; बे-वजह किसी की जान न मार डालो, जिसे अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है सिवाय इसके, कि अपने (क़ानूनी) हक़ के लिए ऐसा करना पड़े।
ये वह बातें है, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता
है: शायद कि तुम समझ-बूझ से काम लो। (151)
(इसी तरह) अनाथों के माल से दूर ही रहो, सिवाय (उनको फ़ायदा पहुँचाने की) अच्छी नीयत
के, मगर यह भी उसी वक़्त तक जब तक कि वह अपनी
युवावस्था को न पहुँच जाएं; जब
(सामान) दो, तो इंसाफ़ के मुताबिक़, नाप और तौल में पूरा-पूरा दो----- हम किसी
जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना कि वह उठा सकने की ताक़त रखता हो------जब बात
कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो; और अल्लाह के नाम से जो प्रतिज्ञा करो, उसे पूरी करो। ये वह बातें हैं, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता
है, ताकि तुम ध्यान दे सको"----- (152)
यही है मेरा रास्ता, सीधा ले जाने वाला, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे रास्तों पर न
चलो: वे तुम्हें इस सीधे रास्ते से हटा देंगे----- ये हैं वह बातें जिन्हें करने का अल्लाह ने तुम्हें हुक्म
दिया है, ताकि तुम ग़लत कामों से बच सको। (153)
एक बार फिर (बता दें), हमने मूसा को किताब [तौरात] दी, ताकि नेक कर्म करने वालों पर हम अपनी नेमतें
पूरी कर दें, और (किताब में) हर चीज़ को स्पष्ट रूप से
समझा दें, जो लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] हो, ताकि वे लोग (मरने के बाद) अपने रब से होने
वाली मुलाक़ात पर विश्वास कर सकें। (154)
यह [क़ुरआन] भी एक बरकतवाली [Blessed] किताब है, जिसे हमने उतारा है----- तो तुम इसके बताए हुए रास्ते पर चलो और
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो, ताकि
तुम पर दया की जाए----- (155)
[ऐ
अरब के लोगो!] (यह किताब इसलिए भेजी गयी), कि
कहीं तुम यह न कहने लगो कि, "हमसे पहले आसमानी किताबें तो केवल दो समुदायों [यहूदी व
ईसाई] पर ही उतारी गयी थीं: उन्होंने क्या कुछ पढ़ा, हमें तो इसकी कोई जानकारी न थी।" (156)
या यह कि, "अगर हम पर भी किताब उतारी गयी होती, तो हम उन (यहूदियों व ईसाइयों) से ज़्यादा
सीधे मार्ग पर होते।"
तो
अब तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से (क़ुरआन के रूप में) एक स्पष्ट प्रमाण, मार्गदर्शन और रहमत आ चुकी है। अब उससे बड़ा
ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार कर दे और उनसे मुँह मोड़े? (याद रहे!) जो लोग (हमारी निशानियों से) मुँह
मोड़ते हैं, बदले में उन्हें हम दर्दनाक सज़ा देंगे। (157)
क्या ये लोग इसी इंतज़ार
में हैं कि उनके पास (आसमान से उतरकर) फ़रिश्ते आ जाएँ या स्वयं तुम्हारा रब उनके
सामने आ खड़ा हो, या उसकी कुछ निशानियाँ ज़ाहिर हो जाएं? मगर जिस दिन तुम्हारे रब की तरफ़ से (क़यामत
की) कुछ निशानियाँ प्रकट हो गयीं, तो
फिर (उस दिन निशानियाँ देखकर) विश्वास करने का किसी को कोई फ़ायदा न होगा अगर वह
पहले से विश्वास [ईमान] न रखता हो, या
जिसने अपने ईमान (की हालत में) कुछ नेकी न कमा रखी हो। कह दें, "अगर तुम इंतज़ार ही करना चाहते हो तो करो, हम भी इंतज़ार कर रहे हैं।" (158)
[ऐ
रसूल!] जिन लोगों ने अपने धर्म में मतभेद फैलाया और अलग-अलग गिरोहों में बँट गए, तो उनसे आपका कोई लेना-देना नहीं है। उनका
मामला अल्लाह के हवाले है: समय आने पर वह उन्हें बता देगा कि जो कुछ वे करते रहे
हैं, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (159)
(याद
रखो!) जिस किसी ने एक अच्छा काम किया, तो
(क़यामत के दिन, फ़ैसले के वक़्त) उसे उसका दस गुना बदला मिलेगा, लेकिन जिस किसी ने एक बुरा काम किया, तो उसे बदले में उतनी ही सज़ा दी जाएगी जितनी
बुराई की होगी---- उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (160)
कह दें, "मेरे रब ने तो मुझे सीधा रास्ता दिखा दिया है, वही सही व बिल्कुल ठीक दीन है, यानी इबराहीम [Abraham] का तरीक़ा, कि वह (ईमान का पक्का था,) पूरी भक्ति से बस एक (अल्लाह) का हो गया था। वह कई देवताओं को मानने वालों [Polytheist] में से न था।" (161)
कह दें, "मेरी नमाज़ और क़ुर्बानी, मेरा जीना और मरना, सब कुछ अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है; (162)
"(ख़ुदायी में) उसका कोई साझेदार [Partner] नहीं है। इसी बात का मुझे आदेश मिला है, और मैं आज्ञा मानते हुए, (तुममें) सबसे पहले उसके सामने सिर झुकानेवाला
हूँ।" (163)
आप पूछें, "क्या (तुम चाहते हो कि) मैं अल्लाह को छोड़कर
कोई दूसरा रब ढूँढ लूँ, जबकि वही हर चीज़ का पालनहार है?" और (देखो!) हर एक आदमी अपने कर्मों के लिए
ख़ुद ज़िम्मेदार है; कोई आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं
उठाएगा। फिर तुम सब को अंत में, अपने
रब के पास लौटकर जाना है, और तब वह तुम्हें बता देगा कि जिन बातों में
तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (164)
वही है जिसने तुम्हें ज़मीन
पर (एक दूसरे का) ख़लीफ़ा [उत्तराधिकारी/Successors] बनाया, और तुममें से कुछ लोगों के दर्जे दूसरों से
ऊँचे रखे, ताकि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उनमें वह तम्हारी परख कर सके। [ऐ रसूल!] आपका
रब सज़ा देने में बहुत तेज़ है, मगर
इसके साथ, वह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (165)
नोट:
1: क़ुरआन में जब कभी "रौशनी"[नूर]
शब्द का प्रयोग हुआ है,
हमेशा उसे एक
वचन में लिखा गया है जबकि "अंधेरा"[ज़ुलमात] हमेशा बहुवचन में आया है।
रौशनी को आम तौर पर सही मार्गदर्शन के लिए और अंधेरे को तरह-तरह की गुमराही के
अर्थ में प्रयोग किया गया है।
8: इस दुनिया में सच्चाई पर विश्वास करने की
शर्त यही है कि बिना अल्लाह या उसके फ़रिश्ते को देखे हुए रसूल की बातों पर विश्वास
कर लिया जाए। अगर आदमी मौत के फ़रिश्ते को देखकर विश्वास कर भी ले, तो उसका कोई फ़ायदा नहीं। फ़रिश्ते अगर सचमुच आ
गए, तो वे बिना मुहलत दिए हुए विश्वास न करने
वालों को हलाक कर देंगे।
11: अरब के लोग अपने व्यापारिक कारवाँ के साथ जब
सीरिया का सफ़र करते थे तो रास्ते में समूद की क़ौम और लूत (अलै) की क़ौम के खंडहरों के
पास से गुज़रते थे, अत: उन्हें उन पुराने लोगों की तबाही से सबक़ सीखने के लिए कहा गया है।
23: शुरू में तो वे
साफ़ झूठ बोल देंगे, लेकिन फिर ख़ुद उनके हाथ-पाँव उनके ही ख़िलाफ़
गवाही देंगे और उनका सारा झूठ खुल जाएगा, देखें 36: 65; और 41: 21.
35: मक्का के
विश्वास न करने वाले लोग अक्सर मुहम्मद साहब से नित नए चमत्कार या निशानियाँ
दिखाने की माँग करते रहते थे, कभी कभी मुहम्मद
(सल्ल) को भी लगता कि अगर कोई निशानी दिखा दी जाए, तो शायद यह लोग सच्चाई पर विश्वास कर लें और
गुनाहों से बच जाएं। मगर जैसा कि अल्लाह ने बताया है कि ये लोग अपनी ज़िद्द और
हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं करते और चाहे आप कोई भी निशानी ले आएं, तब भी ये लोग विश्वास नहीं करेंगे। अल्लाह ने
फिर से मुहम्मद (सल्ल) को समझाया है कि अगर अल्लाह चाहता तो सब लोग एक ही दीन को
अपना लेते, लेकिन असल मक़सद दुनिया में लोगों की परीक्षा
है कि वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर सही रास्ता चुनें, सच्चाई की निशानियाँ चारों तरफ़ बिखरी पड़ी हैं, इसके साथ पैग़म्बरों और आसमानी किताबों का
मार्गदर्शन भी है, मगर सही रास्ता चुनना आदमी का काम है। इसके
लिए उसे बताया जा सकता है,
मगर उसे मान
लेने पर मजबूर नहीं किया जा सकता।
37: अल्लाह तो कभी
भी कोई ऐसी निशानी उतार सकता है जिसकी मांग मक्का के लोग करते रहते थे, मगर उस निशानी को दिखा देने के बाद भी अगर
लोगों ने विश्वास नहीं किया तो इसके नतीजे में हमेशा यही हुआ है कि सच्चाई न मानने
वाले लोगों को हलाक कर दिया गया है।
38: हिसाब रखने वाली
किताब का मतलब वह "सुरक्षित पट्टिका" [लौह ए महफ़ूज़] है जिसमें अल्लाह ने
अपने पैदा किए हुए हर एक प्राणी की तक़दीर लिख रखी है।
39: यानी ग़लत रास्ते
को चुनने के कारण भटकते-भटकते सच्चाई को सुनने और कहने की सलाहियत खो बैठे हैं।
41: अरब के
बहुदेववादी भी यह मानते थे कि इस कायनात की रचना अल्लाह ने ही की है, मगर साथ में वे यह भी मानते थे कि उसकी
ख़ुदायी में बहुत से दूसरे देवता भी इस तरह शामिल हैं कि ख़ुदा की बहुत सी शक्तियाँ
उनको मिली हुई हैं। इसीलिए वे उन देवताओं को ख़ुश करने के लिए उनकी पूजा करते थे, मगर जब कोई बहुत बड़ी मुसीबत पड़ जाती तो
अल्लाह को ही मदद के लिए पुकारते थे।
51: अल्लाह के सामने
कोई किसी के लिए सिफ़ारिश नहीं कर पाएगा, अलबत्ता अगर
अल्लाह ही इसकी इजाज़त दे तो सिफ़ारिश हो सकती है, देखें सूरह बक़रा (2: 255)
52: मक्का में क़ुरैश
के कुछ सरदारों ने कहा था कि मुहम्मद साहब के आसपास ग़रीब और निचले दर्जे के लोगों
की भीड़ होती है जो अपनी इज़्ज़त बढाने या धन की लालच में आते हैं, और ऐसे लोगों के साथ उनकी मजलिस में बैठने को
वे अपनी तौहीन समझते थे।
59: अनदेखी चीज़ों की
पाँच कुंजियों का ज़िक्र 31:34
में आया है।
61: निगरानी रखने
वाले फ़रिश्ते वह भी हो सकते हैं जो इंसान के कर्मों को लिखने वाले होते हैं, और वह भी जो हर इंसान की शारीरिक हिफ़ाज़त के
काम में लगे रहते हैं,
देखें सूरह रा'द (11: 13)
73: आसमान और ज़मीन
को बनाने का असल मक़सद क्या है? यही कि जो लोग यहाँ
अच्छा काम करें उन्हें इनाम दिया जाए, और जो लोग बुरे
काम और अत्याचार करें,
उन्हें सज़ा दी
जाए, मगर यह इनाम और सज़ा देने के लिए एक अलग ही
दुनिया होगी [आख़िरत/परलोक], जहाँ लोगों को
अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए दोबारा ज़िंदा किया जाएगा, और यह करना अल्लाह के लिए बहुत आसान है।
फ़ैसले के दिन एक फ़रिश्ता नरसिंघा बजा देगा---और सब लोग मर जाएंगे, फिर दोबारा
नरसिंघा बजेगा, और सब लोग हिसाब देने के लिए ज़िंदा होकर उठ
खड़े होंगे, (देखें 39:68).
यूँ तो दुनिया में भी असली बादशाही व नियंत्रण तो अल्लाह का ही
है, मगर ऊपर से हम देखते हैं कि हर देश का
अलग-अलग राजा या राष्ट्र अध्यक्ष है, लेकिन क़यामत आते
ही ऐसे सारे नियंत्रण भी ख़त्म हो जाएंगे, और तब पूरा
नियंत्रण अल्लाह का ही होगा, देखें 3:26.
76: हज़रत इबराहीम
(अलै) इराक़ के जिस इलाक़े नैनवा के रहनेवाले थे, वहाँ के लोग बुतों के साथ सूरज, चाँद, तारे आदि की
पूजा करते थे। इबराहीम (अलै) की ज़बानी इनकी मान्यताओं को रद्द किया गया है।
80: ऐसा लगता है कि
लोगों ने इबराहीम (अलै) को इस बात से डराया था कि वह उनके देवताओं और चाँद, तारों आदि के बारे में अगर बुरा-भला कहेंगे
तो वे उन्हें सज़ा देंगे।
82:
सर्वशक्तिमान अल्लाह की इबादत में झूठे ख़ुदाओं को शामिल
नहीं करते यानी शिर्क [Idolatory] नहीं करते जो कि ज़ुल्म या शैतानी करने
जैसा है।
91: यहूदियों के एक
सरदार ने एक बार मुहम्मद (सल्ल) से बहस करते हुए कहा था कि अल्लाह ने इंसानों पर
कोई किताब नहीं उतारी।
92: "मक्का" को 'शहरों की माँ' [उम्मुल क़ुरा] कहा गया है, ऐसा उसकी धार्मिक विशेषता के चलते कहा गया है
क्योंकि ज़मीन पर अल्लाह की इबादत के लिए बनाया गया यह सबसे पहला घर है, और शायद इसलिए भी कि यह केंद्र में स्थित है।
95: जानदार चीज़ से
बेजान चीज़ निकालना, जैसे मुर्ग़ी से अंडा निकालना, और बेजान चीज़ से जानदार निकालना, जैसे अंडे से मुर्ग़ी का निकालना।
100: यहाँ जिन्नों से
मतलब शैतानों से है, जो कि बिना धुएं की आग से पैदा किए गए हैं, और इंसानों की
तरह इनकी भी अलग ज़िंदगी है, और उन्हें भी इंसानों की तरह आज़ादी दी गई है
कि वे अपनी मर्ज़ी से सही या ग़लत रास्ता चुन लें, देखें 38: 76; 55: 15. ........... ईसाइयों ने हज़रत ईसा (अलै) को अल्लाह का बेटा
कहना शुरू किया, कुछ यहूदी उज़ैर [Ezra] (अलै) को अल्लाह का बेटा मानते थे, और अरब के बहुदेववादी फ़रिश्तों को अल्लाह की
बेटियाँ मानते थे।
103: इस दुनिया में
तो अल्लाह को कोई नहीं देख सकता है, लेकिन क़ुरआन और
मुहम्म्द (सल्ल) की शिक्षाओं [हदीस] से यह पता चलता है कि फ़ैसले के दिन ईमानवाले
अपने रब को देख सकेंगे।
104: यानी रसूल पर यह
ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है कि सच्चाई पर विश्वास नहीं करने वालों को ज़बरदस्ती
विश्वास कर लेने पर मजबूर किया जाए और उनको इंकार करने के नुक़सान से बचा लिया जाए।
रसूल का काम केवल समझा देना है, मानना न मानना
तो उन लोगों का काम है।
105:
मक्का के लोग अच्छी तरह से जानते थे कि मुहम्मद (सल्ल)
पढ़े-लिखे आदमी नहीं, सो क़ुरआन जैसा कलाम वह
लिख नहीं सकते, इसलिए कहते थे कि कोई
उन्हें सिखा-पढ़ा देता है, कभी-कभी वे एक लोहार का नाम भी लेते थे
कि वह उन्हें सिखा देता है, देखें 16: 103.
कुछ लोग हमेशा यह भी आरोप
लगाते थे कि क़ुरआन में पुरानी आसमानी किताबों, जैसे बाइबल, तौरात आदि से नक़ल कर लिया
गया है, क्योंकि पुराने नबियों की
बहुत सी बातें मिलती-जुलती थीं। हालाँकि उस ज़माने तक बाइबल या तौरात के अरबी
अनुवाद का कोई सबूत नहीं मिलता। इस्लामी मान्यता के अनुसार क़ुरआन की बातें दूसरी
आसमानी किताबों से मिलती-जुलती इसलिए हैं कि ये सभी किताबें अल्लाह की तरफ़ से ही
उतारी गई हैं।
107: अगर अल्लाह
चाहता तो सारे लोगों को एक ही धर्म [दीन] का मानने वाला बना देता, मगर यह बात बार-बार स्पष्ट की गयी है कि यह
दुनिया परीक्षा देने की जगह है, चारों तरफ़
अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ मौजूद हैं, पैग़म्बरों को
भेजा गया कि वे उन निशानियों की तरफ़ लोगों का ध्यान खींच सकें, आसमानी किताबें भेजी गयीं जिससे उनका सही
मार्गदर्शन हो सके और परीक्षा देना आसान हो सके। यहाँ हर आदमी को अपने मन से रास्ता चुनने का अधिकार है, और वह ख़ुद ही अपने कर्मों के लिए ज़िम्मेदार
होगा।
108: यहाँ साफ़ तौर से
मुसलमानों को इस बात से मना किया गया है कि वे उन लोगों के देवी-देवताओं को
बुरा-भला न कहें, भले ही वे अल्लाह के बारे में बुरी बातें कह
दें।
111: ये वही चमत्कार
दिखाने की बातें थीं जिनकी माँग मक्का के लोग करते रहते थे, देखें 25: 21.
113: शैतान और उसकी
चिकनी-चुपड़ी बातें सब लोगों की आज़माइश और परीक्षा के लिए हैं, जिसके अंदर सच्चाई को पाने की चाह होगी, वह इसमें से अपने लिए सही राह निकाल लेगा।
119: जो जानवर अपनी
मौत मर जाता है, तो उसके (सड़े-गले) गोश्त को खाना हराम है, क्योंकि उसके मरने के समय उस पर अल्लाह का
नाम नहीं लिया गया और दूसरा कि पता नहीं वह कब से मरा हुआ था। जिन जानवरों को खाने
से मना किया गया है, उनका वर्णन सूरह नहल (16: 115) में आ चुका है।
120: छिपे हुए गुनाह
में ईर्ष्या, जलन, पीठ पीछे बुराई, झूठ, दिखावा करना, घमंड आदि भी शामिल हैं।
121: मुसलमानों को
ऐसे ही जानवरों के गोश्त खाने की इजाज़त है जिसको सही तरीक़े से ज़बह किया गया हो, और वह मरा या सड़ा-गला न हो। इस बारे में
मक्का के बुतपरस्त लोग मुसलमानों से
अक्सर बहस करते थे कि वे ख़ुद से काटकर मारे गए गोश्त को तो खाते हैं, लेकिन उसे नहीं
खाते जो अपनी मौत मर गया हो, या उनके देवताओं के नाम से काटकर बलि चढ़ाया
हुआ हो।
122: क़ुरआन में अक्सर
सच्चाई पर विश्वास न करने को "मौत और अंधेपन" से उपमा दी गई है, जबकि विश्वास करने को "ज़िंदगी और देख
पाने की सलाहियत" से उपमा दी गई है। जब तक आदमी को सही मार्गदर्शन नहीं मिलता, वह मरे हुए आदमी जैसा है। फिर उसे ज़िंदा कर
देना और उसे रौशनी देने का मतलब है, उसे क़ुरआन
द्वारा सही मार्गदर्शन मिल जाना जिससे वह लोगों के बीच भलाई के काम करता हो, उसके विपरीत जिन लोगों ने सच्चाई पर विश्वास
नहीं किया, वे अँधेरों में भटकते फिरते हैं, और सारे बुरे कर्म उन्हें बहुत लुभावने लगते
हैं।
125:
"इस्लाम" का मतलब अल्लाह की मर्ज़ी के आगे पूरी तरह झुक जाना।
128:
जिन्नों के पीछे चलने वाले इंसानों ने उनके बहकावे में आकर
अपने मन की इच्छाओं के पीछे चलते हुए गुनाह किए और उनसे मज़ा उठाया (जैसे जिन्नों
ने इंसानों को जादू करने के काम में मदद की), और इस झूठी उम्मीद में रहे कि ये जिन्न उन्हें हर तरह के
नुक़सान से बचा लेंगे। दूसरी तरफ़ जिन्नों ने भी अपने मानने वालों की बड़ी संख्या को
देखते हुए अपने आपको बहुत ताक़तवर महसूस किया।
136: अरब के
बहुदेववादियों में अजीब-अजीब सी रस्में थीं। वे अपनी पैदावार और जानवरों के गोश्त
या दूध का एक हिस्सा
"अल्लाह के लिए" निकालते थे (जो दोस्तों और मेहमानों के लिए
था), और एक हिस्सा अपने देवताओं के लिए था जो
मंदिरों पर चढ़ाते थे (जो मंदिर की देखरेख करने वालों के लिए था)। अगर देवताओं का
हिस्सा कम पड़ जाता, तो वे अल्लाह के हिस्से में से ले लेते थे, मगर अल्लाह के हिस्से की भरपाई नहीं करते थे।
137: देवताओं के
सेवकों ने या जिन्नों ने उन्हें बच्चों को मार देने की बात सुझाई थी।
138: यहाँ अरब में
प्रचलित कुछ और रस्मों के बारे में बताया गया है। अपने देवी-देवताओं को ख़ुश करने
के लिए कुछ मनगढ़ंत मान्यताएं बना ली गयी थीं और उसे अल्लाह के नाम से जोड़ दिया गया
था।
140: "बिना किसी
जानकारी के", यानी बिना किसी आसमानी किताब के प्रमाण के।
141: मक्का की ज़िंदगी
में आम नियम यह था कि फ़सल की कटाई के समय जो भी ग़रीब आ जाए, उसे कुछ दे दिया जाए। बाद में मदीना में जाकर
यह पक्का नियम बना कि जहाँ dry farming होती हो, वहाँ फ़सल में से
पैदावार का 10% गरीबों का हिस्सा होगा, और अगर सिंचाई वाली ज़मीन हो, तो पैदावार का 5% ग़रीबों का हिस्सा होगा।
145: इन जानवरों के
अलावा मुहम्मद (सल्ल) ने हर तरह के दरिंदे जानवरों का माँस [Carnivorous beasts & birds] खाना भी हराम [अवैध] बताया है।
148: अल्लाह किसी को
ज़बरद्स्ती सच्चाई पर विश्वास कर लेने पर मजबूर नहीं करता, क्योंकि दुनिया लोगों की परीक्षा लेने के लिए
बनाई गई है कि कौन अपनी समझ और अपनी मर्ज़ी से सही रास्ता चुनता है, जिसके मार्गदर्शन के लिए इतने सारे पैग़म्बर
समय-समय पर भेजे गए।
149: दुनिया में आए
पैग़म्बरों ने हर तरह से लोगों को सच्चाई पर विश्वास कर लेने की शिक्षा दी, अब यह आदमी की मर्ज़ी है कि वह उनकी बात मानते
हुए उसे क़बूल कर ले या उसे मानने से इंकार कर दे। अल्लाह नहीं चाहता कि वह हर किसी को ज़बरदस्ती
सही रास्ता दिखा दे।
151:
किसी भी चीज़ को यानी चाहे मूर्तियों को, न सूरज-चाँद-सितारों को, और न ही जिन्नों को
अल्लाह का साझेदार ठहराना। .....जान-बूझकर किए गए क़त्ल का
बदला लेने का हक़ तो है, मगर उसे क़ानूनी तरीक़ों से लिया जाना
चाहिए।
154: एक बार फिर..
आयत 91-93 में कही गई बात को दोबारा ज़ोर देकर कहा गया
है जो कि इस ग़लत बात के जवाब में है कि अल्लाह ने कोई "वही" [आसमाने किताब]
कभी उतारी ही नहीं है।
158:
कहा जाता है कि यह आयत उन ईमानवालों के बारे में है जिन्होंने
न कोई अच्छा काम किया और न ही अपनी मौत से पहले या क़यामत आने से पहले अपने
गुनाहोंं से तौबा की।
164:
मक्का के वे लोग
जो सच्चाई पर विश्वास न करने पर अड़े हुए थे, वे कभी-कभी
मुसलमानों से कहते थे कि तुम लोग हमारे दीन को अपना लो, अगर किसी अपराध की सज़ा तुम्हें मिलनी होगी तो
तुम्हारे हिस्से का अपराध हम अपने सिर ले लेंगे [29: 12], हालाँकि हर आदमी को अपने अंत की फ़िक्र ख़ुद ही
करनी चाहिए क्योंकि कोई भी आदमी किसी दूसरे को मिलने वाली सज़ा से नहीं बचा सकता।
ऐसी ही बात कई जगह आयी है,
देखें 17: 15; 35: 18; 39: 7; और 53: 38.
सूरह 13: अर-रा'द
[बादल की
गरज / Thunder]
यह
एक मदनी सूरह है, जिसका नाम आयत 13 में ज़िक्र किए गए "बादल की गरज" से लिया गया है जो असल में अल्लाह की बड़ाई
बयान करती है। इस सूरह की सबसे ख़ास बात इसमें अल्लाह की बेपनाह ताक़त, उसके ज्ञान, और अपने नबियों को दिया जाने वाला पूरा
समर्थन है, जिसे बड़े प्रभावशाली अंदाज़ में वर्णन किया गया है। नबियों
की लम्बी परम्परा में मुहम्मद सल्ल. का स्थान, यह बात कि कोई भी नबी अपने मन से कोई चमत्कार
नहीं दिखा सकता, और मुहम्मद सल्ल. के रोल पर ज़ोर दिया गया है कि उनका असल
काम अल्लाह के संदेश को लोगों तक केवल पहुँचा देना है। अल्लाह वह है जो लोगों को
अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए बुलाएगा, और वही है जो अपने संदेशों की सच्चाई का गवाह
है।
विषय:
01 : यह किताब की आयतें हैं
02-04: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
05-06: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते
07 : चमत्कार दिखाने की माँग
08-17: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
18 : इनाम और सज़ा
19-29: ईमानवाले और इंकार करने वाले एक समान नहीं हो सकते
30-32: रसूल का उत्साह बढ़ाना
33-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दंड
35 : बाग़ या आग
36-43: रसूल का उत्साह बढ़ाना
अल्लाह के नाम से शुरू जो
सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ रा॰
ये (अल्लाह की) किताब
[क़ुरआन] की आयतें हैं। [ऐ रसूल], जो कुछ (आयतें) आपके रब की ओर से आप पर उतारी
गयी हैं, वह सब सच हैं, फिर भी अधिकतर लोग (इस पर) विश्वास नहीं कर
रहे। (1)
यह अल्लाह ही है जिसने
आसमानों को इतना ऊँचा बनाया, और तुम देखते हो कि वह बिना किसी पाये के
टिका हुआ है, और फिर अल्लाह ने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित कर लिया (और
आदेश जारी हो गए); उसने सूरज और चाँद को (इस तरह से) काम पर लगा रखा है कि हर
एक अपने नियत समय तक (अपनी कक्षा में) चला जा रहा है; वह सारी चीज़ों को नियमित करता है, और वह अपनी आयतें [निशानियाँ] साफ़ व स्पष्ट
तरीक़े से बयान करता है ताकि तुम्हें यक़ीन हो जाए कि (एक दिन हिसाब देने के लिए)
अपने रब से मिलना है; (2)
वही है जिसने ज़मीन की सतह
फैला दी, उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमाया और नदियाँ बहा दीं, और उसमें हर तरह के फलों के दो-दो क़िस्म उगा
दिए; वही है जो दिन की रौशनी पर रात की चादर ओढ़ा देता है। सचमुच
इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (3)
(और
आसपास के इलाक़े को देखो!), धरती पर एक दूसरे से सटे हुए ज़मीन के टुकड़े हैं, उनमें अंगूरों के बाग़ हैं, (अनाज की) खेतियाँ हैं, खजूर के पेड़ हैं जिनमें कुछ तो झुंड में लगे
होते हैं, कुछ अकेले खड़े होते हैं, सबको एक ही पानी से सींचा जाता है, फिर भी हम उनमें से कुछ फलों का मज़ा दूसरे
फलों से बेहतर बना देते हैं: सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (4)
[ऐ
रसूल!], अगर
कोई चीज़ आपको आश्चर्य में डालती हो, तो आपको इस बात पर ज़रूर आश्चर्य होना चाहिए
जब वे [इंकार करनेवाले] पूछते हैं, "क्या? जब हम मरके (सड़-गलकर) मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या हम फिर नये सिरे से पैदा किए जाएंगे?" यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब (की शक्ति
को मानने से) इंकार किया, जिनकी गर्दनों मे लोहे के तौक़ [collars] पड़े होंगे और वही हैं जो (जहन्नम की) आग में
रहने वाले हैं, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है। (5)
[ऐ
रसूल!], वे (दया या माफ़ी जैसे) अच्छे बदले की गुहार लगाने के बजाय
आपसे (व्यंग्य करते हुए) यातना को जल्दी ले आने के लिए कहते हैं, हालाँकि उनसे पहले गुज़र चुकी कई क़ौमों की
(बर्बादी की) मिसालें उनके सामने रही हैं----- आपका रब लोगों को उनकी ग़लतियों व
गुनाहों के बावजूद
माफ़ कर देता है, मगर (याद रहे!) वह सज़ा देने में भी सचमुच बहुत कठोर है। (6)
विश्वास न करने वाले
[काफ़िर] कहते हैं, "उस (रसूल) पर उसके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार क्यों नहीं
उतारा गया?" मगर आपका तो बस काम यही है कि आप लोगों को (इंकार व बुरे
कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें: (पहले ग़ुज़र चुकी) हर क़ौम के पास कोई रास्ता
दिखाने वाला ज़रूर हुआ है। (7)
हर एक मादा की कोख में
क्या (जन्म ले रहा) है, अल्लाह उसे जान रहा होता है, और यह भी कि उनके गर्भ कितने सिकुड़ते हैं या
कितने फूल जाते हैं ---- उसके यहाँ हर चीज़ का एक अन्दाज़ा ठहराया हुआ है; (8)
वह उसे भी जानता है जो चीज़
दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो दिखायी देती है; वह महान है, सबसे ऊँचा है। (9)
(अल्लाह
को) इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुममें से कोई चुपके से कोई बात कहता हो या
ज़ोर से, चाहे तुम रात के अंधेरे में छिपे हुए हो या दिन की रौशनी
में चल-फिर रहे हो, उसके लिए सब (स्थितियाँ) बराबर हैं: (10)
हर आदमी के आगे और पीछे
देखभाल करनेवाले फ़रिश्ते लगे होते हैं, जो अल्लाह के हुक्म से (दिन और रात में)
बारी-बारी उसकी निगरानी करते रहते हैं। अल्लाह किसी क़ौम के लोगों की हालत उस वक़्त
तक नहीं बदलता, जब तक कि वे ख़ुद अपने हालात में बदलाव न ले आएं, लेकिन अगर वह किसी क़ौम को (उसके कुकर्मों के
नतीजे में) नुक़सान पहुँचाना चाहे, तो कोई नहीं है जो इसे टाल सकता हो ------
उसके सिवा कोई नहीं, जो उनकी रक्षा कर सके। (11)
वही है जो तुम्हें बिजली
की चमक दिखाता है, जो दिलों में डर भी पैदा करती है और (बारिश की) आशा भी
जगाती है; वह (पानी की बूंदों से) बोझिल बादलों को बनाता है; (12)
गरजते हुए बादल भी उसी का
गुणगान करते हैं, और फ़रिश्ते भी जो उसके डर से सहमे रहते हैं; वही कड़कती हुई बिजलियाँ भेजता है, और जिस किसी पर चाहता है, गिरा देता है। इसके बावजूद इंकार करनेवाले
[काफ़िर] अल्लाह (की क़ुदरत) के बारे में बहसें करते रहते हैं------ उसकी ताक़त बड़ी
ज़बरदस्त और अटल है। (13)
सच्ची भक्ति से पुकारना हो, तो केवल वही है जिसे पुकारना चाहिए: अल्लाह
को छोड़कर जिनको वे पुकारते हैं, वे उनकी पुकार का कोई जवाब नहीं देते। यह ऐसा
ही है जैसे कोई (प्यासा) अपने दोनों हाथ पानी की ओर फैला भर दे और सोचे कि पानी
उसके मुँह में (अपने आप) पहुँच जाएगा ------ ऐसा नहीं हो सकता: (सच्चाई से) इंकार
करने वालों की दुआ व पुकार इसके सिवा कुछ नहीं कि बेकार रास्तों में भटकती फिरे। (14)
वह तमाम चीज़ें जो आसमानों
और ज़मीन में हैं, केवल अल्लाह के ही आगे (सज्दे में) झुकती हैं, चाहे अपनी मर्ज़ी से झुकें या मजबूरी से, और यही हाल उनकी परछाइयों का भी है, जो सुबह में और शाम में (सज्दे में) झुक जाती
हैं। (15)
(ऐ
रसूल) आप (इंकार करनेवालों से) पूछें, "आसमानों और ज़मीन का रब कौन है?" आप कहें, "वह अल्लाह है", कह दें, "फिर उसे छोड़कर तुमने दूसरों को क्यों अपना
रखवाला बना रखा है, यहाँ
तक कि जो न तो अपने आपको कोई फ़ायदा पहुँचा सकता है और न ही कोई नुक़सान?" कह दें, "क्या आँख से अंधा उन लोगों के बराबर हो सकता है
जो देख सकते हों? और
क्या गहरा अँधेरा और उजाला बराबर हो सकता है?" वे जिन्हें अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराते हैं, क्या उन्होंने भी अल्लाह की तरह किसी चीज़ की
रचना की है जिसे देखकर दोनों (रचनाओं) में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है?" कह दें, "अल्लाह ही हर चीज़ को पैदा करने वाला है: वह
अकेला है, सब पर
छाया हुआ है!" (16)
वह आसमान से पानी बरसाता है
जिससे नदी-नाले अपनी-अपनी समाई के अनुसार भरकर बह निकलते हैं। पानी के बहाव के साथ
नदी की सतह पर झाग की परतें जमा हो जाती हैं, ऐसा ही झाग तब भी उठता है जब ज़ेवर और औज़ार
बनाने के लिए किसी धातु को आग में पिघलाया जाता है: अल्लाह इस तरीक़े से सच और झूठ
की मिसाल बयान करता है ---- जो झाग है वह तो सूखकर ग़ायब हो जाता है, मगर जो कुछ आदमी के फ़ायदे की चीज़ है, वह बची रह जाती है ---- अल्लाह ऐसी ही मिसालें
दिया करता है। (17)
जो लोग अपने रब की पुकार
सुनकर उसके हुक्म मान लेते हैं, उनके लिए बेहतरीन इनाम होगा; मगर वे लोग जिन्होंने उसकी पुकार का कोई जवाब न
दिया, तो
(क़यामत के दिन) अगर उनके पास वह सब कुछ हो जो ज़मीन में है, बल्कि उसका दुगना भी हो, तब भी अपनी मुक्ति के बदले में वे ख़ुशी-ख़ुशी
सब दे डालें, क्योंकि
उनसे जो हिसाब लिया जाएगा, वह बड़ा भयानक होगा। जहन्नम ही उनका घर होगा, और उनके आराम करने के लिए दुःख भरा बिछौना होगा।
(18)
भला वह आदमी जो जानता है कि जो कुछ आप पर आपके
रब की तरफ़ से उतरा है वह सच्चाई है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अंधा हो? परन्तु समझते तो वही हैं जो बुद्धि और समझ
रखते हैं; (19)
जो लोग अल्लाह के नाम से
किए गए क़रार (Agreement) को पूरा करते हैं, और अपनी की गयी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ते; (20)
जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ
जिन रिश्ते को जोड़ने का आदेश दिया, उन्हें जोड़े रखते हैं; जो अपनॆ रब से डरते रहते हैं और (होने वाले)
हिसाब की कठोरता के ख़्याल से घबराये रहते हैं; (21)
जो लोग अपने रब की ख़ुशी
की चाहत में अपनी (ग़लत) इच्छाओं को मारते हुए धीरज से काम लेते हैं; जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं; जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से ढँके-छिपे भी और सबके सामने भी
ख़र्च करते हैं; जो भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं। तो यही लोग हैं
जिनके लिए (आख़िरत में असली) घर का इनाम मिलेगा: (22)
वे हमेशा रहने के बाग़
[जन्नत] में ख़ुद भी दाख़िल होंगे और साथ में उनके बाप-दादा, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से
जो नेक होंगे, वे भी (वहाँ जगह पाएंगे); वहाँ हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास आएंगे, (23)
(और
कहेंगे) "चूँकि तुमने (दुनिया में) धीरज व सब्र से काम लिया था, इसलिए (आज) तुम पर सलामती हो!" तुम्हारा
घर तुम्हारे लिए क्या बेहतरीन इनाम है! (24)
मगर जो लोग अल्लाह के नाम
से किए गए पक्के क़रार को तोड़ डालते हैं, अल्लाह ने जिन रिश्तों को जोड़ने का आदेश
दिया, उसे काट डालते हैं और जो ज़मीन में फ़साद पैदा करते हैं:
वही हैं जिनके लिए (आख़िरत में) बहुत बुरा घर होगा ---- (25)
अल्लाह जिसको चाहता है, भरपूर रोज़ी देता है, औऱ जिसकोे चाहता है बहुत थोड़ी देता है ----
और हालांकि वे इस दुनिया की ज़िन्दगी में मौज-मस्ती कर सकते हैं, मगर आने वाली ज़िन्दगी के मुक़ाबले में यह तो
बस बहुत थोड़े समय का आराम है। (26)
(सच्चाई
से) इंकार करने वाले कहते हैं, "इन (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई
(चमत्कारिक) निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह जिसे चाहता है उसे (सही रास्ते से
दूर) भटकता छोड़ देता है, और जो उसकी तरफ़ भक्ति-भाव से जाता है, उसे वह अपनी तरफ़ बढ़ने का रास्ता दिखा देता है, (27)
वे लोग जो ईमान रखते हैं, और जिनके दिलों को अल्लाह की याद से शांति
मिलती है ----- सचमुच अल्लाह का ज़िक्र व उसकी याद ही ऐसी चीज़ है जिससे दिलों को
सुकून व शांति मिलती है ----- (28)
जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं: वहां उनके लिए
ख़ुशियाँ हैं जो उनके इंतज़ार में हैं, और उनका आख़िरी पड़ाव बेहद शानदार होगा।"
(29)
अत: [ऐ रसूल!], हमने आपको एक उम्मत [समुदाय] के पास भेजा है
----- दूसरी उम्मतें उनसे बहुत पहले गुज़र चुकी हैं----- ताकि जो कुछ हमने आप पर ('वही' द्वारा) उतारा है, उसे आप उन्हें पढ़कर सुना दें। फिर भी वे दया
करने वाले रब [रहमान] पर विश्वास नहीं करते। कह दें, "वही मेरा रब है: उसके सिवा कोई पूजने के लायक़
ख़ुदा नहीं। उसी पर मैंने भरोसा किया है और उसी के पास मुझे लौटकर जाना है।" (30)
अगर कोई ऐसी भी क़ुरआन
उतरती जिससे पहाड़ चलाए जाते या ज़मीन फाड़ दी जाती या उसके द्वारा मुर्दों से बात कर
ली जाती [तो वह यही क़ुरआन होती! मगर तब भी ये लोग ईमान नहीं लाते!], मगर हर चीज़ सचमुच अल्लाह के ही अधिकार में
है। फिर क्या ईमान रखने वाले इस बात को नहीं समझते कि अगर अल्लाह ने ऐसा ही चाहा
होता, तो सारे ही इंसानों को सीधे मार्ग पर लगा देता? और (याद रखो!) इंकार करने वालों पर, उनकी करतूतों के बदले में, कोई न कोई मुसीबत निरंतर आती ही रहेगी, या उनके घर के नज़दीक ही कहीं उस वक़्त तक
(बलाएं) उतरती रहेंगी, जब तक कि अल्लाह का वादा पूरा न हो जाए: अल्लाह कभी भी अपने
वादे के विरुद्ध नहीं जाता।" (31)
[ऐ
रसूल!], आपसे
पहले भी कितने ही रसूलों की हँसी उड़ायी जा चुकी है, मगर मैंने विश्वास न करने वालों को पहले मुहलत दी
थी: अंत में, मैंने
उन्हें अपनी पकड़ में ले लिया ----- तो (देखो!) मेरी सज़ा कितनी दर्दनाक थी! (32)
भला क्या वह हस्ती जो हर एक
जान के हर अच्छे-बुरे कर्म पर नज़र रखती है (उसे किसी साझेदार [Partner] की ज़रूरत है)? फिर भी, वे लोग अपनी इबादत में अल्लाह के साथ दूसरों को
जोड़ देते हैं। आप कहें, "ज़रा उनके नाम तो बताओ", या क्या तुम उस (अल्लाह) को ज़मीन से जुड़ी कोई ऐसी
बात बता सकते हो जिसके अस्तित्व की उसे ख़बर तक नहीं, या क्या ये (देवता) बस शब्दों का दिखावा मात्र
हैं?" मगर मक्कारी की बातें बनाने वालों की बातें (सच्चाई से) इंकार करने वालों के
लिए बड़ी लुभावनी बना दी गयी हैं और उन्हें सही मार्ग पर चलने से रोक दिया गया है:
जिसे अल्लाह (ही) भटकता छोड़ दे, उसे कोई सही रास्ते पर नहीं ला सकता। (33)
उनके लिए इस दुनिया में भी सज़ा
है, मगर आने
वाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] में उनकी सज़ा बहुत ही कठोर होगी ---- अल्लाह (की यातना) से उन्हें बचाने वाला
कोई न होगा। (34)
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए
बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए जिस जन्नत का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी है: एक बाग़ है, उसके नीचे बहती हुई नहरें हैं, उसके फल हैं जो कभी ख़त्म नहीं होते, और पेड़ों की छाँव है जो हर समय बनी रहती है। यह
इनाम उन लोगों के लिए है, जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं; जबकि विश्वास न करने वालों का बदला (जहन्नम की)
आग है! (35)
[ऐ
रसूल!], जिन
लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी है, वे (क़ुरआन की) उन बातों से ख़ुश होते हैं जो आप
पर उतारी गयी है; जबकि
उन (यहूदी
व ईसाई) में
कुछ गुट ऐसे भी हैं जो उस (क़ुरआन) की कुछ बातों को मानने से इंकार करते हैं। आप कह
दें, "मुझे तो बस यह हुक्म हुआ है कि मैं अल्लाह की इबादत [worship] करूँ, और उसकी इबादत में किसी और को शामिल न करूँ: उसी
की (बातों की) तरफ़ मैं तुम्हें बुलाता हूँ और उसी के पास मुझे लौटकर जाना
है।" (36)
इस तरह, हमने इस (क़ुरआन) को अरबी ज़बान में फ़ैसला कर
देने के लिए उतार भेजा है। [ऐ रसूल!], अब वह ज्ञान जो आपके पास आ चुका है, इसके बाद भी, अगर आप उन लोगों की इच्छाओं के पीछे चलें, तो कोई न होगा जो आपकी रक्षा कर सके या आपको
अल्लाह से बचा सके। (37)
[ऐ
रसूल!], हमने
आपसे पहले (अपने संदेश के साथ) कई रसूल भेजे और हमने उन्हें बीवियाँ और बच्चे भी
दिए थे; किसी
भी रसूल को यह शक्ति नहीं दी गयी थी कि वह बिना अल्लाह की अनुमति के, कोई चमत्कार (या एक आयत) लाकर दिखा सके। हर
ज़माने (में रास्ता दिखाने) के लिए एक आसमानी किताब [Scripture] रही है: (38)
(अपने
हुक्म में से) अल्लाह जो चाहता है मिटा देता है, और जो चाहता है, उसकी पुष्टि कर देता है, और मूल किताब तो उसी के पास है। (39)
हमने (विश्वास न करने वालों
को) जिस (बुरे) नतीजे की धमकी दे रखी है, हो सकता है कि उसमें से कुछ हिस्सा, [ऐ रसूल] आपको दिखा दें, या (उससे पहले ही) आपको दुनिया से उठा लें, मगर आपका कर्तव्य तो बस (सच्चाई का) सन्देश
पहुँचा देना है: हिसाब लेने का काम तो हमारा है। (40)
क्या वे [मक्का के इंकार
करनेवाले] नहीं देखते कि हम (उनकी) सरज़मीन पर किस तरह चले आ रहे हैं, और उनकी सीमाएं सिकुड़ती जा रही हैं? अल्लाह फ़ैसला करता है ---- कोई उसका फ़ैसला उलट
नहीं सकता ---- और वह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (41)
जो लोग इनसे पहले गुज़र चुके
हैं, वे भी
(सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चला करते थे, मगर (याद रहे!) सारी चालें तो अल्लाह ही के
क़ब्ज़े में हैं: हर एक आदमी जो कुछ भी करता है, अल्लाह सब जानता है। अंत में, (सच्चाई से) इंकार करने वालों को मालूम हो जाएगा
कि (परलोक में) किसके हिस्से में सबसे बेहतर घर आया। (42)
[ऐ
रसूल!], (सच्चाई
से) इंकार करने वाले कहते हैं, "तुम अल्लाह की तरफ़ से भेजे हुए (रसूल) नहीं
हो।" आप कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह की ---- और जिस किसी को आसमानी
किताबों [Scripture] का (सही) ज्ञान है, उनकी ---- गवाही काफ़ी है।" (43)
नोट:
2: अल्लाह ने अपने आपको "सिंहासन पर स्थापित कर लिया", इसका मतलब दुनिया की तरह किसी गद्दी पर बैठ
जाना नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने हर चीज़ की व्यवस्था
संभाल ली और आदेश जारी होने लगे।
3: हर वनस्पति यानी पौधों के भी जोड़े (नर और
मादा) होते हैं, फल मीठे और कड़वे होते हैं, आदि।
5: जब अल्लाह ने पहली बार कायनात की रचना की थी, तब कुछ भी नहीं था, तो जो अल्लाह बिना किसी चीज़ के ऐसी रचना कर
सकता है, तो उसके लिए मुदों को फिर से ज़िंदा करना क्या मुश्किल हो
सकता है, सचमुच यह बात आश्चर्य करने की है। जैसे कि अगर किसी के गले
में लोहे का तौक़ [Iron-collar] पड़ा हो तो वह इधर-उधर नहीं देख पाता, इसी तरह ये लोग अल्लाह की ताक़त और उसकी क़ुदरत
को न ठीक से देख पाए और न समझ पाए।
7: मुहम्मद (सल्ल) को यूँ तो कई निशानियाँ दी गई
थीं, मगर मक्का के विश्वास न करनेवाले उनसे बराबर नए चमत्कार
दिखाने की माँग किया करते थे, जैसा कि मूसा (अलै) की लाठी थी। मगर
क़ुरआन ने यह बात साफ कर दी है कि जब तक अल्लाह न चाहे, कोई रसूल अपनी तरफ़ से चमत्कार नहीं दिखा सकता, वैसे भी उनका काम लोगों को (सच्चाई से) इंकार
और बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान करना है।
8: अल्लाह सब जानता है कि माँ की कोख में बच्चा
ठहर जाएगा या गर्भपात हो जाएगा, बच्चा नौ महीने से पहले होगा या बाद में, एक
होगा या जुड़वाँ होगा, वह लड़का होगा या लड़की, लम्बा होगा या नाटा, स्वस्थ होगा या बीमार, इत्यादि। सबसे अहम बात कि बच्चे की तक़दीर में
क्या है। गर्भ [womb] के घटने और बढ़ने से मतलब यह है कि वह यह भी जानता है कि
बच्चा कितने दिनों तक कोख में रहेगा।
13: गरजते हुए बादल भी अल्लाह की बड़ाई का गुणगान
करते रहते हैं, इसे literal अर्थ में भी लिया जा सकता है जिसे आम लोग
नहीं समझते, देखें 17: 44. और इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो भी आदमी
बादलों के गरज-चमक के कारणों पर और उसके होने वाले नतीजे पर
ध्यान देगा कि किस तरह दुनिया के कोने-कोने में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई
है, तो वह हैरत में पड़कर उसके पैदा करने वाले की बड़ाई और गुणगान
करने पर मजबूर हो जाएगा और समझ जाएगा कि उस मालिक को अपनी ख़ुदायी के लिए किसी
साझेदार [Partner] की ज़रूरत नहीं है।
15: हर एक चीज़ अल्लाह की मर्ज़ी के आगे झुक जाती
है।
16: चूँकि मक्का के बहुदेववादियों [Idolaters] के बारे में पता था कि अगर उनसे पूछा जाए कि
आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो सिवाय "अल्लाह" कहने के उनके पास कोई और जवाब न था, इसीलिए उनसे यह पूछने को कहा गया।
.......... क़ुरआन में आम तौर से सच्चाई पर
विश्वास न करने को 'अंधापन
और अंधेरे' से तुलना की गई है, जबकि 'देखने की क्षमता और रौशनी' की तुलना अल्लाह पर पक्का विश्वास रखने से की
गई है।
17: "झूठ" चाहे थोड़ी देर के लिए हावी भी हो जाए, मगर वह झाग की तरह गंदा व बेकार होता है और
मिट जाता है, जबकि "सच्चाई" उस साफ़ पानी या शुद्ध धातु की तरह है जो
फ़ायदामंद है और बाक़ी रहने वाला है। देखें 17:81.
21: अल्लाह ने इंसानों से रिश्ता बनाए रखने पर
ज़ोर दिया है, जिसमें अपने ख़ानदानी रिश्तेदारों के साथ और ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के साथ रिश्ता निभाना
ज़रूरी है।
25: बहुत बुरा घर मतलब जहन्नम की आग!
26: किसी को बहुत रोज़ी देना और किसी को तंगी देना, यह पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है, मगर अच्छी रोज़ी और ख़ुशहाली मिलने से यह शक
नहीं होना चाहिए कि उसके कर्म को भी अल्लाह ने पसंद कर लिया हो, क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है। इस तरह विश्वास न
करने वाले दुनिया की ज़िंदगी में मस्त रह सकते हैं मगर आने वाली ज़िंदगी के मुक़ाबले
यह थोड़ी देर का ही आराम है!
27: असल मेंं वे मुहम्मद (सल्ल) से कोई सचमुच की
हमेशा दिखने वाली "निशानी" चाहते थे, जैसे कि मूसा (अलै) की लाठी थी।
30: अल्लाह के लिए यहाँ "रहमान"आया है।
देखें 17: 110; 25:60
31: यहाँ उन चमत्कारों का ज़िक्र किया गया है
जिसकी मांग मक्का के विश्वास न करनेवाले लोग बराबर किया करते थे, वे मुहम्मद साहब को कहते थे कि अगर तुम मक्का
के आसपास के जो पहाड़ हैं उनको हटा दो, या ज़मीन को फाड़कर उसमें से दरिया बहा दो या
हमारे बाप-दादाओं को ज़िंदा करके उनसे हमारी बात करवा दो, तब हम तुम्हारी बातों पर ज़रूर ईमान लाएंगे।
यहाँ अल्लाह ने बताया है कि अगर ये सारी मांगें पूरी कर भी दी जाएं, तब भी ये लोग हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं
करने वाले। इसी तरह की मांगों का ज़िक्र सूरह अल-इसरा (17: 90-93) में भी आया है।
कभी-कभी ईमान रखनेवाले भी ऐसा सोचते थे कि
अगर ये चमत्कार दिखा दिए जाते तो वे लोग विश्वास कर लेते। मगर उन्हें समझना चाहिए
कि अल्लाह नहीं चाहता कि हर आदमी ज़बरदस्ती ईमान लाए, बल्कि दुनिया को एक इम्तिहान की जगह बनाया
गया है जहाँ हर आदमी अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर फ़ैसला करे, उसे रास्ता दिखाने के लिए नबी और किताबें हैं, अब अगर वह सच्चाई पर विश्वास करके अच्छे काम करता है, तो उसे इनाम मिलेगा, और अगर वह अविश्वास पर अड़ा रहता है और बुरे
कर्म करता है, तो उसे दंड झेलना होगा।
33: जब कोई आदमी इस ज़िद्द पर अड़ा रहे कि जो कुछ
भी वह कर रहा है, वही अच्छा काम है, और उसके मुक़ाबले में बड़ी से बड़ी दलील को भी
सुनने और मानने के लिए तैयार न हो, तो अल्लाह उसको गुमराही में भटकता छोड़ देता
है, और फिर उसके बाद कोई उसे सीधे रास्ते पर लाने वाला नहीं
है।
36: जिन लोगों को किताब [क़ुरआन] दी गई यानी
मुहम्मद (सल्ल) के सहाबी [companions] और वे लोग जिन्होंने इसकी सच्चाई पर विश्वास
कर लिया था, ऐसे लोग तो क़ुरआन की बातों से ख़ुश होते थे, मगर यहूदियों और ईसाइयों में कुछ गिरोह ऐसे
थे जो क़ुरआन की उन बातों को तो मानते थे जो कि तौरात और बाइबिल के आदेशों से
मिलती-जुलती थी, पर जो बातें ख़ासकर इस्लाम से जुड़ी हुई थीं, उन्हें इन लोगों ने मानने से इंकार कर दिया
था, जैसे मुहम्मद (सल्ल) का पैग़म्बर [Prophet] होना।
37: क़ुरआन अरबों की ज़बान में सच और झूठ के बीच
फ़ैसला कर देनेवाली किताब है या यह कहें कि यह नियम-क़ायदे [Rulings] बताने वाली है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि
मुहम्मद (सल्ल) केवल अरबों के लिए या जो अरबी [Arabic] जानते हैं, उन्हीं के लिए रसूल बनाकर भेजे गए थे, बल्कि वह सारे इंसानों के लिए रसूल बनाए गए
थे (34:28).
क़ुरआन अरबी ज़बान में इसलिए उतरी, क्योंकि अल्लाह ने अपना संदेश लोगों तक
पहुँचाने के लिए एक अरब के आदमी [मुहम्मद सल्ल] को रसूल बनाया, और हर रसूल अपनी क़ौम की ज़बान में ही संदेश
देता है ताकि वह लोगों को बात ठीक ढंग से समझा सके (14:4).
38: कुछ लोगों ने यह आपत्ति जतायी थी कि यह कैसा
रसूल है जिसके बीवी-बच्चे हैं? क़ुरआन में दूसरी जगहों पर यह भी आया है कि यह
कैसा रसूल है "जो खाता-पीता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है!"
(25:7)
39: मूल किताब यानी "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved
Tablet] शुरू
से अल्लाह के पास है, उसमें से हर ज़माने में लोगों के मार्गदर्शन के लिए किताबें
उतरती रही हैं, और चूँकि हर ज़माने में हालात थोड़े बहुत बदलते रहते हैं, इसलिए पुराने हुक्मों में से कुछ को मिटा
दिया जाता है और कुछ को वैसा ही छोड़ दिया जाता है। इस किताब में हर जानदार की तक़दीर लिखी हुई
है। देखें 6: 38.
41: अरब में विश्वास न करने वालों का धीरे-धीरे
प्रभाव घटता जा रहा था, पहले मदीना में मुसलमानों की आज़ाद हुकूमत बनीं और फिर
आहिस्ता-आहिस्ता आसपास के इलाक़ों पर उनका दबदबा बढ़ता चला गया, इस तरह, मक्का के उन विश्वास न करने वालों की सीमाएं
सिकुड़ती चली गईं।
सूरह 112: अल-इख़्लास
[ईमान की शुद्धता, Purity of Faith]
यह सूरह इस मामले में बाक़ी सारी सूरतों से अलग है कि इसमें सूरह का नाम "इख़्लास" पूरी आयतों में कहीं भी नहीं आया है। इख़्लास का मतलब है अपने मज़हब के प्रति ईमानदारी और एक सच्चे ख़ुदा की पूरी भक्ति। इस तरह, यह सूरह बहुदेववाद, मूर्तिपूजा, तीन में से एक ख़ुदा, नास्तिकता जैसी सभी चीज़ों का खंडन करती है। केवल एक अल्लाह ही इबादत के लायक़ है, और बुराइयों से बचने के लिए उसी को पुकारना चाहिए जो आगे की दो सूरह में बताया गया है। इस्लाम में इस विषय के महत्व को देखते हुए रसूल ने कहा था कि यह सूरह इतनी छोटी होने के बावजूद एक-तिहाई क़ुरआन के बराबर है।
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल] आप कह दें, “अल्लाह हर तरह से एक है, (1)
अल्लाह ही ऐसा है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं
[self sufficient], मगर सब अपनी ज़रूरतों के लिए उस पर निर्भर हैं (और वह हमेशा बाक़ी रहनेवाला [eternal] है, (2)
न उसका कोई बाल-बच्चा है, और न ही उसको किसी ने पैदा किया है। (3)
और उसके जोड़ का कोई नहीं है [Unique]।” (4)
नोट:
1: कुछ
काफ़िरों ने मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा था कि आप जिस ख़ुदा की इबादत करते हैं, वह कैसा है? उसके ख़ानदान का परिचय कराएं। इसके जवाब में
यह सूरह उतरी।
अल्लाह का “हर तरह से एक
होने” का मतलब यह है कि वह अपनी ज़ात में भी एक है, और अपनी विशेषताओं में भी एक है।
3: अरब के
काफिर लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहते थे, या ईसाई और यहूदी लोग हज़रत ईसा (अलै.) या
उज़ैर (अलै.) को अल्लाह का बेटा मानते थे।
4: इस सूरह की
चार छोटी आयतों में अल्लाह के बारे में बहुत ही सुंदर और ठोस तरीक़े से वर्णन किया गया है।
पहली आयत में उन लोगों की सोच को रद्द किया गया है जो एक से ज़्यादा ख़ुदा को मानते
हैं, दूसरी आयत में
उन लोगों की सोच को रद्द किया गया है जो अल्लाह को मानने के बावजूद किसी और को भी
अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वाला मानते हैं, तीसरी आयत में उन लोगों की सोच रद्द
की गई है जो अल्लाह के लिए औलाद मानते हैं, और चौथी आयत में उन लोगों का रद्द किया गया
है जो अल्लाह की किसी भी विशेषता में किसी और की बराबरी के क़ायल हैं, जैसे कुछ मजूसियों [Magians] का कहना यह था कि रौशनी को पैदा करने वाला कोई और है, और अँधेरे को बनाने वाला कोई और है। इस तरह
इस छोटी सी सूरह में अल्लाह की ख़ुदायी में किसी भी साझेदारी [Partnership] को पूरी तरह
रद्द करके शुद्ध तौहीद पर ज़ोर दिया गया है। एक हदीस में इस सूरह को क़ुरआन का
एक-तिहाई हिस्सा क़रार दिया है।
सूरह 113: अल-फ़लक़
[सुबह-सवेरे, Daybreak]
यह एक मक्की/मदनी सूरह है, यह असल में एक दुआ है जिसे हर तरह के शैतानी बहकावे के ख़िलाफ़ अल्लाह की मदद मांगने के लिए किया जाता है।
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल], आप कह दें कि “मैं सुबह-सवेरे के रब की पनाह [शरण] माँगता
हूँ (1)
हर उस चीज़ की बुराई (और नुक़्सान) से जो उसने पैदा की है, (2)
और (ख़ास करके) अंधेरी रात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा
जाए, (3)
और गाँठों [गिरहों, Knots] में फूँक मारने वाली जादूगरनियों (और जादूगरों) की बुराई से, (4)
और हर हसद-जलन [ईर्ष्या] करने वाले की बुराई से जब वह ईर्ष्या करे।” (5)
नोट:
1: यह आख़िरी
दो सूरह उस समय उतरी थीं जब कुछ यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) पर जादू करने की कोशिश
की थी, और उसके कुछ
प्रभाव आप पर ज़ाहिर भी हुए थे। इन दोनों सूरह में आपको जादू-टोने से बचने के लिए
अल्लाह से पनाह माँगने को कहा गया है। कई हदीसों से पता चलता है कि इन दो सूरह को
पढ़कर फूँकने से जादू का असर ख़त्म हो जाता है।
3: आम तौर पर
जादूगरों की कार्रवाइयाँ रात के अंधेरों में हुआ करती हैं, इसीलिए अँधेरी रात की बुराइयों से भी पनाह
माँगी गई है।
4: ऐस मर्द या
औरत, जो धागे के
गंडे बनाकर उसमें गाँठें लगाते जाते थे और उन पर कुछ पढ़-पढ़कर
फूँकते रहते थे और इस तरह
जादू कर देते थे, उनकी बुराइयों
से भी पनाह माँगी गई है।
सूरह 114: अन-नास
[आदमी लोग, People]
यह मक्की/मदनी सूरह है, पिछली सूरह की तरह यह भी एक दुआ है जिसे शैतान या इंसानों व जिन्नों की बुराई के ख़िलाफ अल्लाह की पनाह मांगने के लिए किया जाता है। यह आख़िरी सूरह इस बात पर ज़ोर देती है कि अल्लाह सबका रब है और उसके पास हर चीज़ की ताक़त है, और यह कि हमें केवल उसी से मदद मांगनी चाहिए, इस तरह यह पहली सूरह के केंद्रीय विषय से जुड़ जाती है।
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल] आप कह दें कि “मैं (सब) इंसानों के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं, (1)
जो (सब) लोगों का मालिक [Controller] है, (2)
सब लोगों का ख़ुदा है (जिसकी बंदगी की जाती है),
(3)
(पनाह माँगता हूँ) चुपके-चुपके मन में बुराई की सोच डालने वाले
(शैतान) की बुराई से, जो (अल्लाह को याद करने से) पीछे को छुप जाता है ------ (4)
जो लोगों के दिलों में बुराई की सोच बैठा
देता है ------- (5)
चाहे वह (बुराई पर उकसाने वाला शैतान) जिन्नों में से हो (जो दिखायी न देता हो) या आदमियों में से।” (6)
नोट:
1: इस सूरह के अलावा चार और ऐसी सूरह हैं जो इसी
तरह से शुरु हुई हैं कि "आप कह दें", देखें 72, 109, 112 और 113.
4: मन में बुराई की सोच डालने वाले शैतान के
बारे में देखें 7:20; 20:120; 22:52; 50:16.
6: सूरह अनाम
(6: 112) में बताया गया है कि शैतान जिन्नों में से भी होते हैं और इंसानों में से
भी। हाँ, जो शैतान
जिन्नों में से होता है, वह दिखायी
नहीं देता और वह दिलों में बुराइयाँ बैठा देता है, लेकिन इंसानों में से जो शैतान होते हैं, वह नज़र आते हैं और उनकी बातें ऐसी होती हैं
कि उनकी बातें सुनकर इंसान के दिल में तरह-तरह के बुरे विचार आ जाते हैं, इसलिए इस आयत में मन के अंदर दोनों प्रकार की
बुराई डालने वालों से पनाह माँगी गई है। शैतान की चालें कमज़ोर होती हैं और उसमें
इतनी ताक़त नहीं है कि वह इंसान को गुनाह करने पर मजबूर कर सके। यह तो इंसान की
आज़माइश है कि वह इंसान को बहकाने की कोशिश करता है, लेकिन जो बंदा उसके बहकावे में आने से इंकार
करके अल्लाह की पनाह माँग ले, तो शैतान उसका
कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।
क़ुरआन की
शुरुआत सूरह फातिहा से हुई थी जिसमें अल्लाह की तारीफ़ के बाद अल्लाह से ही सीधे
रास्ते के मार्गदर्शन की दुआ की गई है, और इसका अंत सूरह नास पर हुआ है जिसमें शैतान
की बुराइयों से पनाह माँगी गई है, क्योंकि सीधे
रास्ते पर चलने में उसकी बुराई से जो रुकावट पैदा हो सकती थी, उसे दूर करने का तरीक़ा बता दिया गया है।
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