Chronological Quran : 5th Year of Revelation
[Oct 22, 613 AD --- Oct 10, 614 AD]
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : पाँचवें वर्ष में उतरी आयतें
[मुहर्रम 1/ 9 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 29/ 9 हिजरी पूर्व]
सूरह 35: फ़ातिर [पैदा करनेवाला, The Creator]
सारी की सारी प्रशंसाएं अल्लाह के लिए हैं, जो आकाशों और
धरती का पैदा करनेवाला है, जिसने दो-दो, तीन-तीन और चार-चार परोंवाले फ़रिश्तों को संदेश ले जाने के लिए रखा है। वह जब
चाहता है अपनी की हुई रचना में कुछ और चीज़ जोड़ देता है : बेशक अल्लाह हर चीज़ की
ताक़त रखता है. (1)
अल्लाह अपनी रहमत [blessing] को अगर लोगों के लिए खोल दे, तो कोई नहीं है जो उसे रोक सके और जिसे वह रोक ले तो कोई नहीं है जो उसके बाद
उसे जारी कर सके : उसे हर चीज़ की ताक़त है और हर चीज़ का ज्ञान है . (2)
ऐ लोगो! याद करो उन नेमतों को जो अल्लाह ने तुम पर की हैं, क्या अल्लाह को
छोड़ कर कोई और पैदा करनेवाला है, जो तुम्हें आसमान
और ज़मीन से रोज़ी देता हो ? उसके सिवा कोई
पूजने योग्य नहीं है। तो आख़िर, तुम किस धोखे में पड़े हुए हो? (3)
[ऐ रसूल] अगर वे आपको झूठा बता रहे हैं, तो(जान लें कि)
आपसे पहले भी रसूलों को झूठा बताया जा चुका है : सारे मामले अल्लाह की तरफ़ ही लौट कर जाने वाले हैं (4)
ऐ लोगो! यक़ीन करो कि अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः सांसारिक
जीवन तुम्हें कहीं धोखे में न डाल दे. और देखना, कहीं वह धोखेबाज़[शैतान] तुम्हें अल्लाह के बारे में धोखे में न डाल पाए : (5)
शैतान तुम्हारा दुश्मन है---- अतः तुम उसके साथ
दुश्मनों जैसा ही बर्ताव करो---- वह तो अपने माननेवालों को केवल इसीलिए बुलाता है
कि उन्हें (जहन्नम की) दहकती आग में जानेवालों का साथी बना सके. (6)
वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया उनको कठोर दंड दिया जाएगा ; किन्तु जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए-- उनके(गुनाहों को)
माफ़ कर दिया जाएगा, और उन्हें बड़ा इनाम दिया जाएगा. (7)
उनलोगों के बारे में क्या कहा जाए जिनके लिए उनके
बुरे कर्मों को आकर्षक बना कर पेश किया गया हो ताकि वे उन कर्मों को (बुरा समझने
के बजाए) अच्छा समझें ? (तो क्या वे
बुराई को छोड़ेंगे)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है मार्ग से भटकता छोड़ देता है और जिसे चाहता है
सीधा मार्ग दिखाता है। अतः [ऐ रसूल] आपको इन लोगों के दुख में घुल कर अपनी जान गँवाने की कोई ज़रूरत नहीं : अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे
करते हैं. (8)
वह अल्लाह ही है जो हवाएँ भेजता है; वह (हवाएं)
बादलों को ऊपर उठाती हैं ; फिर हम उसे किसी सूखी पड़ी हुई मुर्दा ज़मीन की ओर ले जाते
हैं , फिर हम उस (बारिश) के द्वारा मुर्दा ज़मीन में एक नयी जान
डाल देते हैं : इसी तरह (मुर्दा पड़े लोगों को) दोबारा जीवित कर उठाया जायेगा
. (9)
अगर कोई इज़्ज़त व ताक़त हासिल करना चाहता हो, तो(वह यह जान ले
कि) इज़्ज़त व ताक़त तो सारी की सारी अल्लाह के क़ब्ज़े में है ; साफ़ व अच्छी
बातें उस [अल्लाह] तक (चढ़ कर) पहुँचती हैं, और वही अच्छे
कर्मों को (दर्जे के मुताबिक़) ऊँचा उठाता है, मगर जो लोग
शैतानी चालें चलते रहते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी और उनकी तमाम चालें
बेकार हो कर रह जाएंगी. (10)
वह अल्लाह है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर उसके बाद एक
बूँद (वीर्य, semen) से; फिर तुम्हें (मर्द और औरत के) जोड़े में बनाया; उसकी जानकारी के
बिना न कोई औरत गर्भवती होती है और न बच्चे को जन्म देती है; न कोई आदमी लम्बी
आयु पाकर बुढापे को पहुँचता है और न किसी की आयु में कमी हो जाती है--- यह
सब एक किताब में लिखे अनुसार होता है : और यह सब अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है. (11)
पानी के दो सागर एक समान नहीं होते---- एक मीठा, प्यास बुझानेवाला
और पीने में मज़ेदार और दूसरा खारा और कडुवा है--- मगर तब भी तुम दोनों से
ताज़ा (मछलियों का) माँस खाते हो और आभूषण(मोती,मूंगा) निकालते हो जिसे तुम पहनते हो, और दोनों में ही
तुम नौकाओं (जहाज़ों) को देखते हो कि पानी को चीरती हुई उसमें चली जा रही हैं, ताकि तुम
उस[अल्लाह] की दी हुई रोज़ी को तलाश कर सको और (उसकी दी हुई नेमतों का) आभार मानो. (12)
वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला
देता है; उसने सूरज और चाँद को (एक व्यवस्था के अनुसार) काम में लगा
रखा है---- (इनमें) प्रत्येक एक नियत अवधि तक के लिए(अपने मार्ग पर) चल रहा है।
वही अल्लाह तुम्हारा रब है: सारी चीज़ पर उसी का क़ब्ज़ा है। उसको छोड़कर जिन
(देवताओं) को तुम पूजते हो, वे एक खजूर की ग़ुठली के छिलके के बराबर भी कोई अधिकार नहीं
रखते; (13)
अगर तुम उन्हें पुकारो, तो वे तुम्हारी
पुकार सुनेंगे ही नहीं; और अगर वे सुन पाते, तो भी कोई जवाब
नहीं दे पाते; और क़यामत के दिन वे ख़ुद तुम्हारी मूर्तिपूजा को अस्वीकार
करते हुए तुम से अलग हो जाएंगे । [ऐ रसूल] कोई भी आपको ऐसी ख़बर नहीं बता सकता जैसी
कि वह [अल्लाह] बताता है जो हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है. (14)
ऐ लोगो! यह तुम ही हो जिसे (हर चीज़ के लिए) अल्लाह की ज़रूरत है--- अल्लाह को
तो किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, सारी प्रशंसा के
योग्य वही है--- (15)
अगर वह चाहे तो
तुम्हें मिटा दे और (उसकी जगह) एक नई सृष्टि [creation] ले आए, (16)
और यह काम अल्लाह के
लिए कुछ भी मुश्किल नहीं. (17)
कोई बोझ उठानेवाला
किसी दूसरे (के गुनाहों) का बोझ नहीं उठाएगा : यहाँ तक कि अगर कोई भारी बोझ से दबा
हुआ आदमी भी मदद के लिए पुकारे, तब भी उसका बोझ कोई नहीं उठाएगा, चाहे वह उसका नज़दीकी
सम्बन्धी ही क्यों न हो। मगर [ऐ रसूल] आप तो केवल उन्हें सावधान कर सकते हैं
जो अपने रब से डरते हों, हालाँकि उसे देख भी
नहीं सकते,
और नमाज़ को पाबन्दी से पढते हों---- और जिस किसी ने (बुराइयों से) अपने आपकी
शुद्धी की,
तो यह काम उसने अपने ही भले के लिए किया--- और हर चीज़ को लौटकर अल्लाह ही के
पास जाना है. (18)
आँख से अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं होते, (19)
और न अँधेरा और उजाला, (20)
और न छाया और धूप, (21)
और न ज़िंदा और मरा
हुआ बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है (अपना संदेश) सुनाता है : तुम उन
लोगों को नहीं सुना सकते,
जो क़ब्रों में पड़े हों । (22)
आप तो बस एक सावधान करनेवाले हैं---- (23)
हमने आपको सच्चाई की
बात दे कर इस तरह भेजा है कि आप (नेक लोगों को) अच्छी ख़बर सुना दें और (बुरे लोगों
को) अल्लाह का डर सुना कर सावधान कर दें --- और कोई क़ौम ऐसी नहीं हुई जहाँ उन्हें
सावधान करने वाला न आया हो. (24)
यदि वे [मक्का के
काफ़िर] आपको झूठा बतला रहे हैं, तो जो (काफ़िर लोग) उनसे पहले गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (अपने
रसूलों) को झूठा बताया था। कई पैग़म्बर [messengers] उनके पास स्पष्ट
निशानियाँ, आसमानी सहीफ़े [ज़बूर, Psalms] और (ज्ञान से भरी)
रौशन किताब लेकर आए थे (25)
फिर मैंने (सच्चाई
से) इंकार पर अड़े लोगों को धर दबोचा--- तो फिर देखो कि कैसी भयानक थी मेरी सज़ा!) (26)
क्या [ऐ रसूल] आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी
बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने रंग बिरंग के फल निकाले; (इसी तरह)
पहाड़ों में भी सफ़ेद और लाल रंगों की रंग बिरंगी धारियाँ हैं, और कुछ बिल्कुल
काली भी; (27)
और यह कि इंसानों, जानवरों और
चौपायों के रंग भी तरह तरह के हैं ? और अल्लाह से
सही मायने में तो उसके वही बन्दे डरते हैं, जो (इन सच्चाइयों
को) अच्छी तरह जानते-समझते हैं. निश्चय ही सारी ताक़त भी अल्लाह के पास है, और सबसे ज़्यादा
क्षमा करनेवाला भी वही है. (28)
जो लोग अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, नमाज़ के पाबन्द
हैं, और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (अच्छे
कामों पर) छिपा कर भी और दिखा कर भी ख़र्च करते हैं, वे एक ऐसे
व्यापार की आशा रख सकते हैं जो कभी मंदा न होगा : (29)
अल्लाह उन्हें इसका पूरा पूरा इनाम देगा, बल्कि अपने
ख़ज़ाने से और बढा कर देगा। इस में शक नहीं कि वह बहुत क्षमा करनेवाला और अच्छाई की
बहुत क़द्र करनेवाला है. (30)
[ऐ रसूल] हमने जो किताब आपके पास उतार कर भेजी है, वह सच्ची है और
अपने से पहले की (आसमानी) किताबों की पुष्टि [confirm] करती है। निश्चय
ही अल्लाह अपने बन्दों की पूरी ख़बर रखता है और सब कुछ देखता है. (31)
फिर हमने अपने चुने हुए बन्दों को इस किताब का उत्तराधिकारी
बनाया : उनमें से कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म किया, कुछ थे जो (सही
और ग़लत के) बीच बीच में रहनेवाले थे, और उनमें कुछ, अल्लाह की कृपा
से, अच्छे कामों में आगे-आगे रहनेवाले थे। यही सबसे बड़ा फ़ज़ल [favour] है : (32)
वे हमेशा रहने वाले बाग़ों [Gardens] में प्रवेश
करेंगे जहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोतियों से सजाया जाएगा, और वहाँ वे रेशम
के कपड़े पहनेंगे. (33)
वे कहेंगे, "सब प्रशंसा
अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे हर तरह के दुख दूर कर दिए ! सचमुच हमारा रब बेहद
क्षमा करनेवाला और (भलाई की) बहुत क़द्र करनेवाला है :
(34)
जिसने अपनी असीम कृपा से, हमें सदैव रहने
के ऐसे घर में ठहराया जहाँ हमें न कोई मशक़्क़त उठानी पड़ेगी और न कोई थकान ही होगी।" (35)
मगर जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया, वे जहन्नम की आग
में रहेंगे, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर ही जाएँ और न उनसे जहन्नम
की यातना ही कुछ हल्की की जाएगी : और हम ऐसा ही बदला शुक्र न अदा करनेवाले हर
काफ़िर को देते हैं. (36)
वे जहन्नम में चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे कि "ऐ हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे, और अब हम अच्छे कर्म करेंगे, पहले की तरह (बुरे कर्म) नहीं करेंगे!"—(जवाब में कहा जाएगा) "क्या हमने तुम्हें इतनी ज़िंदगी नहीं दी थी कि अगर तुम
समझना चाहते तो उन चेतावनियों को सुन कर होश में आ जाते? और तुम्हारे पास
सावधान करनेवाला [रसूल] भी तो आया था,
तो अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!” शैतानी करनेवालों को मदद करनेवाला कोई नहीं होगा ! (37)
निस्संदेह अल्लाह आकाशों और धरती की छिपी हुई तमाम
चीज़ों को जानता है; वह तो दिलों के अंदर पैदा होने वाले ख़्याल तक को जानता है; (38)
वही है जिसने तुम(लोगों) को ज़मीन में (पहले गुज़र चुके
लोगों का) उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा] बनाया। अब जो सच्चाई को मानने से इंकार करेगा,
उसे इसका नतीजा भुगतना होगा : उन लोगों का इंकार उनके
रब के ग़ुस्से को और ज़्यादा भड़का देगा, और इससे उनका नुक़सान ही बढेगा . (39)
[ऐ रसूल] आप कहें, "क्या तुमने अपने
उन (अल्लाह के) ‘ साझीदारों’ के बारे में विचार किया, जिन्हें तुम
अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे दिखाओ उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है
? या आसमानों के कितने भाग के वह मालिक हैं?" क्या हमने उन्हें
कोई किताब दे रखी है जिसमें इन बातों का कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद है ? बिल्कुल नहीं!
असल में, मुशरिक लोग [Idolaters] आपस में
एक-दूसरे से केवल धोखे का वादा करते हैं . (40)
अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को इस तरह थाम रखा है कि वे
(अपनी जगह और रास्ते से) हट नहीं सकते; और अगर वे हट
जाएँ तो उसके बाद कोई नहीं जो उन्हें थाम सके। निस्संदेह, वह बहुत सहनशील, क्षमा करनेवाला
है . (41)
उन(मुशरिक लोगों, The Idolaters] ने बड़ी-बड़ी
क़समें खाई थीं कि यदि उनके पास कोई सावधान करनेवाला[रसूल] आए, तो वे अन्य दूसरी
क़ौमों से बढ़कर सीधे मार्ग को अपनाएंगे, किन्तु जब उनके
पास एक सावधान करनेवाला आ गया तो वे (सच्चाई से) और ज़्यादा दूर भाग गए, (42)
इसलिए कि ज़मीन में वे (अपने को बड़ा समझते
हुए) और भी घमंडी हो गए, और उनकी शैतानी चालों में और भी तेज़ी आ गयी--- मगर जो शैतानी चालें चलते
हैं,
वह ख़ुद ही अपनी चालों के घेरे
में आ जाते हैं। जैसा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के साथ हुआ, क्या वे उससे कुछ अलग बर्ताव की उम्मीद लगाए बैठे
हैं ? वैसे तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाओगे; और न तुम कभी उसमें कोई फेर-बदल ही पाओगे . (43)
क्या उन लोगों ने ज़मीन में चल-फिर कर देखा नहीं कि उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों
का कैसा परिणाम हुआ?
,
हालाँकि वे शक्ति में उनसे कही
बढ़-चढ़कर थे?
और आसमानों और ज़मीन में कोई चीज़
भी ऐसी नहीं जो अल्लाह को तंग [frustrate]
कर सके : निस्संदेह वह सब
जानता है, और हर चीज़ की ताक़त रखता है.(44)
अगर अल्लाह लोगों को उनके ग़लत काम करने के चलते (उसी समय) दंड देने लग जाए तो
इस ज़मीन की सतह पर एक भी जीव बाक़ी न बचेगा। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील
देता है और,
फिर जब उनका नियत समय आ जाता है, तो अल्लाह ख़ुद ही अपने बन्दों को देख लेगा. (45)
सूरह 19 : मरयम [Mary]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
काफ॰ हा॰ या॰ ऐन॰ साद॰ (1)
[ऐ रसूल] यह आपके रब की उस
दयालुता[रहमत] का बयान है, जो उसने अपने बंदे ज़करिया[Zachariah] पर दिखायी थी, (2)
जब उसने अपने रब
को मन ही मन में (दबी आवाज़ से) पुकारा था, (3)
"ऐ मेरे रब! मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं, और मेरे सिर के बाल बुढापे से बिल्कुल सफ़ेद हो गए हैं, मगर ऐ रब!, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने तुझ से कोई दुआ माँगी हो
और तू ने मेरी माँग पूरी न की हो : (4)
मुझे अपने मरने के बाद अपने भाई-बन्धुओं की ओर से डर है (कि पता नहीं वे क्या
करेंगे), और मेरी पत्नी तो बाँझ है। अतः तू मुझे अपने पास से
एक उत्तराधिकारी[Successor] प्रदान कर----जो तेरी ओर से एक इनाम हो---- (5)
जो मेरा भी वारिस[heir] हो और याक़ूब[Jacob] के वशंज का भी वारिस हो। और ऐ रब! उसे ऐसा बना देना कि (तू और तेरे बंदे) सब
उसे पसंद करें।" (6)
(जवाब मिला,) "ऐ ज़करिया! हम तुझे एक लड़के (के पैदा होने) की
ख़ुशख़बरी सुनाते हैं, जिसका नाम यह्या[John] होगा---- इससे पहले हमने किसी के लिए भी यह नाम नहीं चुना।" (7)
उसने(हैरान होकर) कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे हो सकता है! मेरी
पत्नी बाँझ है और मैं बूढ़ा और बहुत कमज़ोर हो चुका हूँ?" (8)
कहा गया, ‘ ऐसा ही होगा!
तेरा रब कहता है: “यह मेरे लिए कोई
मुश्किल बात नहीं, इससे पहले मैं ख़ुद तुझे पैदा कर चुका हूँ, हालाँकि (उस समय) तेरे वजूद का कोई अता पता न था।"’ (9)
इस पर ज़करिया ने कहा, "मेरे रब! मेरे लिए इस बारे में कोई निशानी ठहरा दे
।" कहा, "तेरे लिए निशानी यह है कि तू तीन (दिन और) रात तक लोगों से बात न कर
पायेगा।" (10)
अतः वह इबादतगाह से बाहर निकलकर अपने लोगों के पास आया और (बिना मुँह से बोले
हुए) उनसे इशारों में कहा कि सुबह शाम अल्लाह की बड़ाई का बखान करते रहो।" (11)
(हम ने कहा), "ऐ यह्या! अल्लाह
की किताब को मज़बूती से थाम ले।" वह अभी छोटा लड़का ही था कि हमने उसे ज्ञान व
समझ-बूझ दे दी थी, (12)
और ख़ास अपने पास से दिल की नरमी और मन की शुद्धि भी दे दी थी। सचमुच वह बड़ा
परहेज़गार था, (13)
अपने माँ-बाप की सेवा करनेवाला था, कड़े मिज़ाज का और आज्ञा न माननेवाला न था. (14)
"सलामती थी उस पर, जिस दिन वह पैदा हुआ और जिस दिन उसकी मृत्यु हो गयी, और सलामती होगी उस पर जिस दिन वह फिर से ज़िंदा उठाया जाएगा!" (15)
[ऐ रसूल] इस
क़ुरआन में मरयम की कहानी को बयान करें. ऐसा हुआ कि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक
ऐसी जगह चली गयीं जो पूरब की तरफ़ थी (16)
और वहाँ वह एकांत में सबसे अलग थलग हो गयीं;
तब हमने उसके पास अपनी रूह (फ़रिश्ते) को भेजा जो
उसके सामने एक पूरे आदमी के रूप में प्रकट हुआ (17)
(मरयम उसे देख कर
घबरायीं और) बोलीं, "मैं रहम करनेवाले रब[रहमान] के नाम से तुझ से अपनी
हिफ़ाज़त माँगती हूँ : अगर तुझे(अल्लाह का) कुछ भी
डर है (तो मुझ से दूर हट जा)!" (18)
मगर फ़रिश्ते ने
कहा, "मैं तो केवल तेरे रब का संदेश लेकर आया हूँ, ताकि तुझे तोहफ़े में एक नेक बेटा दे सकूँ।" (19)
मरयम ने कहा, "मुझे बेटा कैसे हो सकता है जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं? और न ही मैं बदचलन हूँ, " (20)
फरिश्ते ने कहा, "मगर होगा ऐसा ही! तेरा रब कहता है: “यह मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं---हम उसे सारे लोगों
के लिए एक निशानी बना देंगे, जो हमारी तरफ़ से
एक रहमत[blessing] होगी।“ और यह ऐसी बात थी जिसका होना पहले से ही तय हो चुका था : (21)
फिर उसे उस (होनेवाले बच्चे) का गर्भ ठहर गया. वह लोगों से अलग हटकर एक
दूर के स्थान पर चली गई (22)
और, फिर प्रसव के दर्द[Labour pain] की बेचैनी उसे एक खजूर के पेड़
के नीचे ले आई. (जहाँ वह उसके तने के सहारे बैठ गयी) वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही
मर चुकी होती और लोग मुझे भूल जाते!" (23)
उस समय(पहाड़ी के) नीचे से एक पुकारनेवाले (फ़रिश्ते) की आवाज़ सुनाई दी, "चिंता न करो : तेरे रब ने तेरे क़दमों तले पानी का एक सोता[Stream] बहा दिया है (24)
और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा
पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (25)
अतः खाओ, पियो और ख़ुश रहो, फिर अगर कोई आदमी नज़र आ जाए (जो कुछ पूछ बैठे) तो उसे (इशारे से) कह देना: “मैंने अपने रब [रहमान] के लिए (चुप रहने के) रोज़े[मौन व्रत] की मन्नत मान रखी
है, इसलिए मैं आज किसी आदमी से बातचीत नहीं कर सकती।" (26)
फिर(ऐसा हुआ कि)
वह उस बच्चे को साथ लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस आई।(लड़के को गोद में
देखकर) वे बोल उठे, "मरयम, यह तूने क्या कर डाला! (27)
ऐ हारून की बहन!
न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी!" (28)
इस पर मरयम ने लड़के की तरफ़ इशारा किया (कि यही बताएगा). वे कहने लगे, "भला हम एक बच्चे से कैसे बात कर सकते हैं?" (29)
(मगर लड़का) बोल
उठा, "मैं अल्लाह का बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब[Scripture] प्रदान की; मुझे नबी[Prophet] बनाया; (30)
मुझे बरकतवाला[blessed] बनाया चाहे मैं जहाँ भी रहूँ. और जब तक मैं ज़िंदा रहूँ, मुझे हुक्म दिया
नमाज़ पढ़ने का, (ग़रीबों को) ज़कात[alms] देने का, (31)
और अपनी माँ
की(प्यार से) देखभाल करने का। उसने मुझे पत्थर-दिल या बेरहम नहीं बनाया.(32)
(अल्लाह की ओर
से) सलामती थी मुझपर जिस दिन मैं पैदा हुआ और उस दिन भी मुझ पर सलामती होगी जिस
दिन मैं मरूँगा और जिस दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाऊँगा!" (33)
ऐसा था मरयम का
बेटा, ईसा !
यह है असल में
सच्ची बात जिसके बारे में वे सन्देह में पड़े हुए हैं : (34)
अल्लाह के लिए यह बात कभी भी उपयुक्त नहीं कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। वह इन चीज़ों
से बहुत ऊँचा है: उसकी शान तो यह है कि जब वह कोई
काम करने का फ़ैसला करता है तो बस हुक्म देता है, "हो जा!" तो बस वह हो जाता है। (35)
और (ईसा यही तो
कहते थे), "निस्संदेह अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो: यही (सच्चाई का) सीधा मार्ग है।" (36)
मगर फिर उसके बाद
विभिन्न गिरोहों[factions] का आपस में मतभेद होने लगा, तो जिन लोगों ने सच्चाई की बातों (पर
संदेह किया) और उसे मानने से इंकार किया, उनकी हालत पर अफ़सोस! वे कितनी दर्दनाक मुसीबत में पड़ जाएंगे जिस दिन वह भयानक
दिन आ जाएगा ! (37)
जिस दिन वे हमारे सामने हाज़िर होंगे, उनके कान और उनकी आँखें सुनने और देखने में कितनी तेज़ होंगी, मगर अभी इन ज़ालिमों का हाल यह है कि यह रास्ते से पूरी तरह भटके हुए हैं ! (38)
[ऐ रसूल] आप
उन्हें ‘पछतावे के दिन’[Day of Remorse] से सावधान कर दें, जब इन मामलों का फ़ैसला कर दिया जाएगा, मगर उनका हाल यह है कि वे इन बातों पर
ध्यान ही नहीं देते और उनको भुलाए बैठे हैं, और वे ईमान भी नहीं रखते हैं. (39)
हम ही (अंतत:)
ज़मीन के वारिस होंगे, और उन सभी लोगों के भी (वारिस) होंगे जो इस ज़मीन पर
बसे हुए हैं, और हमारे ही पास सबको लौट कर आना है.(40)
इस क़ुरआन में इबराहीम की कहानी को भी बयान करें। निस्संदेह वह सच्चाई की
मूर्ति था, अल्लाह का नबी था. (41)
जब उसने अपने बाप से कहा, "ऐ बाबा! आप उस
चीज़ को क्यों पूजते हैं, जो न सुन सकती है, न देख सकती है, और न आपके किसी काम आ सकती है? (42)
बाबा! मैं सच कहता हूं, ज्ञान की एक रौशनी जो आपको नहीं मिल पायी थी, वह मुझे मिल गई है, अतः आप मेरे पीछे चलें : मैं आपको सीधा मार्ग
दिखाऊँगा।(43)
बाबा! शैतान की बन्दगी न कीजिए---- शैतान तो दयालु रब (रहमान) की आज्ञा को मानने से ही इंकार
कर चुका है। (44)
बाबा! मैं डरता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि आपको रहम
करने वाले (रहमान) की तरफ़ से कोई यातना आ पकड़े और आप (जहन्नम में) शैतान के साथी
होकर रह जाएँ।" (45)
बाप ने (यह बातें सुनकर) कहा, "ऐ इबराहीम! क्या तू मेरे देवताओं को रद्द करता है? याद रख! अगर तू ऐसी बातों से बाज़ न आया तो मैं तुझे पत्थर मरवाउंगा। अगर तू
अपनी जान चाहता है, तो मेरे रास्ते से अलग हट जा!" (46)
इबराहीम ने कहा, "अच्छा तो सलाम है आपको : (आप से अलग हो कर भी) मैं आपके लिए रब से क्षमा की
दुआ करूँगा---- वह तो मुझपर बहुत मेहरबान है ---(47)
मगर अब मैं आप सब को छोड़ता हूँ और उन (मूर्तियों) को
भी जिन्हें अल्लाह को छोड़ कर आप लोग पुकारा करते हैं, और मैं तो अपने रब को पुकारूँगा। मुझे भरोसा है कि अपने रब को पुकारकर मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।" (48)
फिर जब वह उन लोगों से और उन सब से जिन्हें वे अल्लाह
के सिवा पूजते थे, अलग हो गया, तो हमने (उसकी नस्ल में बरकत दी और) उसे इसहाक़ और (इसहाक़ का बेटा) याक़ूब
प्रदान किया और उन दोनों को हमने नबी बनाया था : (49)
हम ने उन पर अपनी ख़ास दया दृष्टि डाली थी, और उन सब को सच्चाई की आवाज़ें बुलंद करने वाला बना कर बड़ी प्रतिष्ठा दी। (50)
और इस किताब[क़ुरआन] में मूसा की कहानी भी बयान कर दें।
निस्संदेह वह ख़ास चुना हुआ बंदा था, जो एक रसूल(Messenger) और
नबी (Prophet)
था : (51)
हमने उसे 'तूर' पहाड़
के दाहिनी ओर से पुकारा और (वही द्वारा) रहस्य की बातें करने के लिए उसे
अपने से नज़दीक किया ;
(52)
और अपनी रहमत से उसके भाई हारून[Aaron] को(उसकी
मदद के लिए) नबी बनाकर उसे दिया (53)
और (ऐ रसूल) इस किताब(क़ुरआन) में इसमाईल [Ishmael] की
भी चर्चा करें। निस्संदेह वह अपने वायदे का पक्का था और (अल्लाह का) रसूल और नबी
था। (54)
वह अपने घर के लोगों को नमाज़ पढ़ने और (ग़रीबों को) ज़कात
देने का हुक्म देता था और वह (अपनी सारी बातों में)अपने रब के यहां बहुत पसंद किया
जाता था ।(55)
और (ऐ रसूल) इस किताब में इदरीस की भी चर्चा करें। बेशक वह
भी सच्चाई की मूर्ति था,
और एक नबी था। (56)
और हमने उसे बड़े ही ऊंचे दर्जे तक पहुंचा दिया था। (57)
ये लोग उन नबियों में से थे जिन पर अल्लाह ने ख़ास
कृपा की थी---आदम की सन्तान में से, और उन लोगों के वंशज में से जिनको हमने नूह के साथ (नौका में) सवार किया था, और इबराहीम और इसराईल (याक़ूब) के वंशज में से----और उन गिरोहों में से जिनको
हमने सीधा मार्ग दिखाया और (अच्छाई के लिए) चुन लिया। ये वे लोग हैं कि जब उन्हें
दयालु रब (रहमान) की आयतें सुनाई जाती थी तो वे सुनते ही सजदे में झुक जाते थे और
उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते थे, (58)
मगर फिर उनके बाद ऐसे बुरे लोगों की कई पीढ़ियां
गुज़रीं, जो नमाज़ की (हक़ीक़त) को भुला बैठे और मन की इच्छाओं
के पीछे बढ़ चले। अतः जल्द ही ऐसा होगा कि उनकी गुमराही (के नतीजे) उनके सामने आ
जाएं, (59)
मगर हां, जो कोई(गुनाहों से) तौबा कर ले, ईमान लाए और अच्छे कर्मों में लग जाए, तो बेशक ऐसे लोगों के लिए कोई डरने की बात नहीं। वे जन्नत में प्रवेश करेंगे।
उनके हक़ के साथ थोड़ी सी भी नाइंसाफी नहीं होगी : (60)
वे सदाबहार रहने वाली जन्नत में दाख़िल होंगे , जिसका वादा दयालु रब (रहमान) ने अपने बन्दों से कर रखा है---- और वह वादा एक
अनदेखी चीज़ का है (जिसे इस ज़िन्दगी में वे महसूस नहीं कर सकते, मगर) उसका वादा तो ऐसा है जैसे एक बात घट चुकी है।(61)
उस (जन्नत की ज़िन्दगी में) कोई व्यर्थ बात उनके
कानों में नहीं पड़ेगी। जो कुछ सुनेंगे,वह बस सलामती की ही आवाज़ होगी ; वहां सुबह-शाम उनकी रोज़ी उन्हें बराबर मिला करेंगी। (62)
यह है वह जन्नत जिसका वारिस हम अपने बन्दों में से हर
उस आदमी को बनाएँगे, जो परहेज़गार (devout) हो (63)
(फ़रिश्ता जिब्राइल रसूल से कहेंगे), “हम तुम्हारे रब की आज्ञा के बिना तुम्हारे पास(वही लेकर) नहीं आते----- जो कुछ हमारे सामने है, और जो कुछ हमारे पीछे गुज़र चुका है और जो कुछ इन
दोनों वक़्तों के बीच हुआ, सब उसी के हुक्म से है----और तुम्हारा रब कभी भी कोई
चीज़ भूलने वाला नहीं है। (64)
वह आसमानों और ज़मीन का रब है और उन सबका भी रब है जो
इन दोनों के बीच है, अतः(ऐ रसूल) आप उसी की बन्दगी पर जमे रहें : उसकी
बंदगी की राह में जो कुछ घटे, उसे सहते रहें।
क्या तुम्हारी जानकारी में उस जैसा कोई है? (65)
और (सच्चाई से बेख़बर) इंसान कहता है, "क्या! जब मैं मर गया तो फिर क्या ऐसा होने वाला है कि फिर से ज़िंदा उठाया
जाऊँ?" (66)
मगर क्या इंसान को यह बात याद नहीं रही कि हम ने उसे
पहली बार तब पैदा किया था, जब उसका कोई वजूद न था? (67)
अतः (ऐ रसूल) आपके रब की क़सम, हम उन सबको और उनके साथ सारे शैतानों को ज़रूर इकट्ठा करेंगे। फिर उन सबको जहन्नम के गिर्द हाज़िर होने का आदेश देंगे, इस दशा में कि वे घुटनों के बल झुके होंगे ; (68)
फिर हर गिरोह में से उन लोगों को (चुन चुन कर) अलग कर
लेंगे जो (अपनी ज़िंदगी में) रहमान (कृपाशील
रब) की बनायी गयी सीमाओं को तोड़ने वाला होगा----(69)
फिर यह बात भी हम ही जानते हैं कि कौन जहन्नम में
झोंके जाने के सबसे ज़्यादा योग्य है --- (70)
याद रखो) तुममें से हर एक को इस मंज़िल से गुज़रना ही
पड़ेगा, यह एक तय किया हुआ फ़ैसला है जिसे पूरा करना तेरे रब
ने ज़रूरी ठहरा लिया है। (71)
फिर हम ऐसा करेंगे कि जो परहेज़गार होंगे, उन्हें तो हम बचा लेंगे और जो शैतानी करनेवाले ज़ालिम हैं, उन्हें छोड़ देंगे जहन्नम में घुटनों के बल पड़े हुए। (72)
और(देखो) जब हमारी आयतें लोगों को स्पष्ट करके सुनाई जाती हैं, तो जिन लोगों ने कुफ़्र अपना लिया है, वे ईमान वालों से कहते हैं, "दोनों गिरोहों में ज़्यादा अच्छी स्थिति में कौन है? और किस गिरोह के पीछे चलने वाले अधिक हैं?" (73)
उनसे पहले हम कितनी ही कौमों को बर्बाद कर चुके हैं जो तरह तरह के सामान, धन दौलत और बाहरी चकाचौंध में इनसे कहीं आगे थीं! (74)
(ऐ रसूल) कह दें, "जो कोई गुमराही में पड़ा तो दयालु रब(रहमान) का क़ानून यही है कि उसे उस वक़्त तक बराबर ढील देता जाता है जब तक कि वह अपनी आंखों से वह बात देख न ले जिसका उनसे वादा किया गया था---चाहे (इसी जीवन की) यातना हो या क़यामत की घड़ी (का फ़ैसला)--- तो वे उस समय जान लेंगे कि कौन था जिसकी स्थिति सबसे बदतर हुई और किसका गिरोह सबसे कमज़ोर निकला।" (75)
मगर जिन लोगों ने (सही) मार्ग पा लिया, तो अल्लाह उन्हें और ज़्यादा (कामयाबी की) राह दिखा देता है। और तुम्हारे रब की
नज़र में तो बाक़ी रहनेवाली नेकियाँ ही बेहतर हैं-- सवाब (पुण्य) के हिसाब से भी
और (अन्तिम) परिणाम के हिसाब से भी।(76)
(ऐ रसूल) क्या आपने देखा उस आदमी का क्या हाल है जिसने
हमारी आयतों को (मानने से) इंकार किया और कहा, "ख़ुदा की क़सम! मैं (परलोक में भी) ज़रूर धन दौलत पाऊंगा, मैं ज़रूर औलाद पाऊंगा" ?(77)
वह जो ऐसा कहता है तो क्या उसने (छिपी हुई) अनदेखी
चीज़ को झाँककर देख लिया है, या दयालु रहमान
से कोई वचन ले रखा है कि उसे ऐसा करना ही पड़ेगा ? (78)
कदापि नहीं (ऐसा कभी नहीं हो सकता!), हम इसे भी लिख लेंगे जो कुछ वह कहता है और उसकी यातना को बढ़ाते चले जाएँगे : (79)
यह जिस माल व औलाद का दावा करता है (अगर वह उसे मिल
भी जाए तो अंत में) वह सब हमारे ही कब्ज़े में आएगा, औऱ उसे तो हमारे सामने एकदम अकेले ही हाज़िर होना है! (80)
उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को अपना प्रभु
बना लिया है, ताकि वे उनके मददगार हों, (81)
लेकिन (क़यामत के दिन) उनके प्रभु उनकी पूजा किए जाने
से साफ़ इंकार कर देंगे, बल्कि उल्टे और वे उनके विरोधी बन जाएँगे। (82)
(ऐ रसूल) क्या आपने देखा नहीं कि हमने शैतानों को
इंकार करनेवालों (काफ़िरों) पर छोड़ रखा है, जो उन्हें बराबर (गुनाह करने पर) उक्साते रहते हैं ? (83)
अतः उनके लिए आपको उतावला होने की कोई ज़रूरत नहीं :
हम तो बस उनके लिए (नियत किए गए) समय गिन रहे हैं। (84)
उस दिन हम नेक व परहेज़गार इंसानों को अपने रब
(रहमान) के सामने मेहमानों के रूप में इकट्ठा करेंगे (85)
और अपराधियों को जहन्नम की ओर प्यासे जानवरों की तरह हँका के ले जाएँगे। (86)
उस दिन सिफ़ारिश करना कराना किसी के अधिकार में न होगा, सिवाय उनके जिन्होंने दयालु रब (रहमान) से इसकी अनुमति पा ली हो।(87)
और उन (मक्का के काफ़िरों ने) कहा , "ख़ुदा [रहमान] की कोई औलाद है।" (88)
यह अत्यन्त भारी बात है, जो तुम कहते हो : (89)
कहीं ऐसा न हो कि आकाश फट पड़े, धरती फट के टुकड़े-टुकड़े हो जाए और पहाड़ टूट कर
गिर पड़ें, (90)
इस बात पर कि लोग ख़ुदा (रहमान) के लिए औलाद रखने का
दावा कर रहे हैं! (91)
यह बात ख़ुदा (रहमान) की शान के बिल्कुल ख़िलाफ़ है
कि उसकी कोई औलाद हो : (92)
आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है वह इसीलिए है कि
ख़ुदा(रहमान) के सामने बंदगी में सर झुकाए हुए हाज़िर हो---(93)
उसने अपनी (क़ुदरत से) उन्हें घेर रखा है और (अपने ज्ञान से) हर एक को ठीक ठीक गिन रखा है--- (94)
और क़यामत के दिन हर एक उस ख़ुदा (रहमान) के सामने बिल्कुल
अकेले आ खड़ा होगा। (95)
मगर जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्मो में लगे रहते हैं, तो
उनके लिए यह बात पक्की है कि ख़ुदा (रहमान) उनलोगों को अपना प्यार देगा : (96)
इसीलिए (ऐ रसूल) हमने इस क़ुरआन को आपकी भाषा (अरबी) में
उतार कर आसान कर दिया ,
ताकि अल्लाह को हर समय अपने मन में बसानेवालों[मुत्तक़ी] को
(कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दें , और जो गिरोह सच्चाई
के विरुद्ध अड़ियल रवैया अपनाने वाला है, उसे
(इंकार व सीमा तोड़ने के नतीजे से) सावधान कर दें (97)
मगर इन सीमा तोड़ने वालो से पहले, विभिन्न
कौमों के कितने दौर गुज़र चुके हैं जिन्हें हम ने (बुरे कर्मों के नतीजे में)
बर्बाद कर दिया ! क्या उनमें से किसी की हस्ती भी अब तुम महसूस करते हो, या
क्या उनकी कोई भनक भी
सुनाई देती है ? (98)
सूरह 20 : ता हा
[Ta Ha]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ हा॰। (1)
[ऐ रसूल] हमने आप पर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारी कि आप चिंता व तकलीफ़ में पड़
जाएं, (2)
यह तो इसलिए उतारी गयी है कि जो लोग (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे में)
अल्लाह से डरनेवाले हैं, उनके लिए नसीहत हो, (3)
यह उस हस्ती की तरफ़ से उतारी जा रही है जिसने ज़मीन और ऊंचे आसमानों को पैदा
किया है, (4)
वह (हस्ती) रहम करनेवाला रब [रहमान] है, जो अपने तख़्त पर
विराजमान है.(5)
जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है,
और जो कुछ इन दोनों के बीच में है, और जो कुछ धरती
के नीचे है--- सब कुछ उसी (अल्लाह) का है. (6)
तुम चाहे कोई बात ऊँची आवाज़ में कहो (या चुपके से), वह तुम्हारे राज़ [secret] की बातें भी
जानता है, और यहाँ तक कि तुम्हारे (दिल के अंदर) छिपी हुई बातें भी जानता है.(7)
वह अल्लाह--- कि उसके सिवा
कोई पूजने के लायक़ नहीं--- सारी ख़ूबियोंवाले अच्छे नाम उसी के लिए हैं । (8)
[ऐ रसूल] क्या आपने मूसा[Moses] की कहानी सुनी ? (9)
जब उसने (दूर से) आग देखी तो अपने घरवालों से कहा, "तुम लोग यहीं
ठहरो! मुझे (दूर में) आग दिखायी दी है। शायद तुम्हारे(आग तापने के) लिए उसमें से
एक अंगारा ले आऊँ या उस अलाव पर सही मार्ग का पता चल जाए।" (10)
फिर जब वह आग के पास पहुँचा, तो (एक आवाज़ ने) उसे पुकारा, "ऐ मूसा! (11)
मैं तेरा रब हूँ। अपने जूते उतार दे : तू इस वक़्त ‘तुवा’ की पवित्र घाटी
में खड़ा है. (12)
मैंने (अपना संदेश पहुँचाने के लिए) तुझे चुन लिया
है। अतः जो बात ‘वही’[revelation] के द्वारा कही जा रही है, उसे ध्यान लगा कर सुनो. (13)
निस्संदेह मैं ही अल्लाह हूँ ;
मेरे सिवा कोई भी पूजने के लायक़ नहीं। अतः तू मेरी ही
बन्दगी कर और (पाबंदी से) नमाज़ अदा कर ताकि तू मुझे याद करता रहे. (14)
वह (नियत) घड़ी जल्द आनेवाली है----- हालाँकि मैं उस (समय) को अभी छिपाए रखना
चाहता हूँ ---ताकि हर आदमी को उसके द्वारा की गयी कोशिशों का बदला मिल सके. (15)
देखो! ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई आदमी जो इस (नियत घड़ी) में विश्वास न करता हो और अपनी
इच्छाओं के पीछे भागता हो, वह तुम्हें इससे बहका दे, और तुम्हारी बर्बादी का कारण बन जाए.” (16)
“ ऐ मूसा! यह तेरे दाहिने हाथ
में क्या है?" (17)
उसने कहा, "यह मेरी लाठी है। मैं इसपर टेक लगाता हूँ ; इससे अपनी बकरियों के लिए पेड़ों के पत्ते झाड़ता हूँ ; और इससे मेरी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती हैं।" (18)
अल्लाह ने कहा, "मूसा! इसे नीचे फेंक दे!" (19)
उसने (लाठी) नीचे फेंक दी, और
सहसा क्या देखता है कि वह एक तेज़ दौड़ता हुआ साँप बन गयी! (20)
अल्लाह ने कहा, "इसे पकड़ लो और डरो मत : हम इसे
फिर इसकी असली हालत पर लौटा देते हैं. (21)
(फिर आदेश हुआ) : अब अपने हाथ को अपनी बग़ल [armpit] के नीचे रखो और बाहर निकालो, वह बिना
किसी ख़राबी के, सफ़ेद (चमकता हुआ) निकलेगा : (लाठी के अलावा) यह दूसरी
निशानी होगी . (22)
(यह दोनों निशानियाँ इसलिए दीं
कि) आनेवाले समय में हम तुझे अपनी निशानियों में से कुछ बड़ी निशानियाँ दिखा सकें. (23)
[आदेश हुआ] : ऐ मूसा!
फ़िरऔन[मिस्र का राजा] के पास जाओ, कि
सचमुच वह बहुत ज़ालिम हो गया है।" (24)
मूसा ने कहा, "मेरे रब! मेरे
दिल में उम्मीद व जोश जगा दे (ताकि बड़े से बड़ा बोझ उठा सकूँ) (25)
और मेरे काम को मेरे लिए आसान
बना दे. (26)
मेरी ज़बान की लड़खड़ाहट ठीक कर
दे (27)
ताकि मेरी बात लोगों की समझ में
आ जाए, (28)
और मेरे घरवालों में से मेरे लिए एक
सहायक दे दे, (29)
हारून[Aaron] के रूप में, जो मेरा
भाई है --- (30)
उसके द्वारा मेरी ताक़त बढ़ा दे. (31)
और उसे मेरे काम में हाथ बँटानेवाला बना दे, (32)
ताकि हम अधिक से अधिक तेरी बड़ाई
का बखान कर सकें (33)
और अक्सर तेरी याद में लगे रहें
: (34)
तू तो
हमेशा ही हम पर नज़र रखनेवाला है।" (35)
अल्लाह ने कहा, "मूसा, जो कुछ तूने माँगा
है, मैंने मंज़ूर कर
लिया.(36)
(तू जानता है) हम तुझ पर पहले भी एक बार एहसान
कर चुके हैं (37)
जब हमने तेरी माँ के दिल में यह बात डालते हुए कहा था, (38)
“ तुम अपने बच्चे को
बक्से में रख दो, फिर उसे (नील) नदी
में डाल दो. नदी उस बक्से को बहाते हुए स्वंय किनारे पर लगा देगी, और फिर वह उस (बच्चे) को उठा लेगा जो मेरा दुश्मन है और उस बच्चे का भी
दुश्मन है.” मैंने तुझपर अपना ख़ास प्यार बरसाया था (कि जो देखता तुम से प्यार कर बैठता), और ऐसी योजना बनायी थी ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी ख़ास
निगरानी में हो सके. (39)
तेरी बहन (घर से) बाहर निकली, और (फ़िरऔन की लड़की से) कहने लगी, “ क्या मैं तुम्हें उस (औरत) का पता बता दूँ जो इस (बच्चे) को दूध पिला सकती है”, इस तरह, हमने तुझे फिर तेरी
माँ के पास(सुरक्षित) पहुँचा दिया, ताकि खुशी में उसकी आँख ठंड़ी रहें और वह दुखी न रहे। कुछ समय बाद तुम ने
(मिस्र में) एक आदमी को मार डाला था, लेकिन हमने तुझे उस चिंता व परेशानी से मुक्ति दी थी और फिर तुझे और भी कई
तरीक़े से परखा। फिर तुम कई सालों तक मदयन [Midian] के लोगों के बीच रहे, और उसके बाद मेरे तय
किए हुए इरादे के मुताबिक़, ऐ मूसा, तुम यहाँ आ पहुँचे. (40)
हमने तुझे अपने (संदेश पहुँचाने के) लिए चुन लिया है. (41)
अब तुम और तुम्हारा भाई, दोनों मेरी निशानियो के साथ जाओ, और देखो! इस बात का ध्यान रहे कि मुझे याद करते रहना.
(42)
दोनों मिलकर फ़िरऔन के पास जाओ, कि उसने (मर्यादा की) तमाम हदें तोड़ डाली हैं. (43)
मगर देखो, उससे नर्मी से बात करना, शायद कि वह उस पर ध्यान दे या कुछ आदर दिखलाए ।" (44)
दोनों ने कहा, "ऐ हमारे रब! हमें
डर है कि कहीं वह हमें कोई बड़ा नुक़सान न पहुँचाए या मर्यादा की सीमाएं न तोड़
डाले।"(45)
अल्लाह ने कहा,
"डरो नहीं,
मै तुम दोनों के साथ हूँ। मैं सब सुनता भी हूँ और
देखता भी हूँ. (46)
जाओ और जा कर उससे कहो, “ हम तेरे रब के भेजे हुए रसूल[Messengers] हैं, अत: इसराईल की सन्तान को हमारे साथ भेज दे,
और उनके साथ ज़ुल्म न कर। हम तेरे पास तेरे रब की
निशानी लेकर आए हैं, और जो कोई भी सीधे रास्ते पर चले, उसके लिए सलामती है ; (47)
हमें ‘वही’[Revelation] द्वारा (अल्लाह की तरफ़ से) यह बात बतायी गयी है कि जो कोई भी सच्चाई को मानने से इंकार करेगा और उससे मुँह फेरेगा, तो उसके ऊपर
यातना आ पड़ेगी।" (48)
फ़िरऔन ने पूछा, "अच्छा, तुम दोनों का रब कौन है, मूसा?" (49)
मूसा ने कहा, "हमारा रब वह है जिसने हर चीज़ को उसकी सही आकृति[Form] दी, फिर उसके (विकास के) लिए ज़रूरी
रास्ता भी बता दिया ।"(50
फ़िरऔन ने कहा, "अच्छा
तो उन पीढ़ियों का क्या होगा, जो पहले
गुज़र चुकी हैं ?" (51)
मूसा ने कहा, "इन सब
का ज्ञान तो केवल मेरे रब के पास ही है, जो एक
किताब में लिखा हुआ है ; मेरा रब न चूकता है और न भूलता
है।" (52)
"वह (अल्लाह) है जिसने तुम्हारे
लिए ज़मीन को फ़र्श की तरह बिछा दिया, और
उसमें से रास्ते निकाल दिए. उसने आसमान से बारिश उतार
भेजी। इसी पानी से हमने तरह तरह के पेड़-पौधे निकाले, (53)
अत: ख़ुद भी खाओ, और अपने
चौपायों को भी चराओ! निस्संदेह इन सब में समझदार लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ
हैं. (54)
इसी ज़मीन (की मिट्टी) से हमने
तुम्हें पैदा किया था, इसी के अंदर हम तुम्हें वापस
ले जाएंगे, और फिर इसी से दूसरी बार उठाए
जाओगे।" (55)
हक़ीक़त यह है कि हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखायीं, मगर उसने
उन्हें झुठलाया और मानने से इंकार कर दिया।(56)
उसने कहा,
"ऐ मूसा! क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि अपने जादू
से हमको अपनी ज़मीन से निकाल बाहर कर दे? (57)
अच्छा, हम भी तेरे जादू का मुक़ाबला जादू से ही करेंगे : एक (मुनासिब) जगह ठहरा लो जिस
पर दोनों पक्ष राज़ी हों, और (मुक़ाबले का) एक समय तय कर लो जिसे हम दोनों में से कोई भी तोड़ न पाए
।"(58)
मूसा ने कहा,
"ठीक है, हमारे बीच वह दिन तय रहा, जिस दिन उत्सव मनाया जाता है,
और यह कि लोग दिन चढ़े वहाँ इकट्ठे हो जाएँ।"(59)
फ़िरऔन
(वहाँ से) चला गया, फिर उसने अपने सारे (शैतानी) हथकंडे जुटाए,
और (नियत समय पर) आ गया. (60)
मूसा ने उन लोगों से कहा, "ख़बरदार! अल्लाह के बारे में झूठी बातें न गढ़ो,
वरना वह[अल्लाह] तुम्हें ऐसी सज़ा देगा कि तुम बर्बाद
हो जाओगे. याद रहे, जिस किसी ने भी झूठ गढ़ा, वह असफल रहेगा।" (61)
इसपर वे आपस में अपनी योजना के बारे में विचार-विमर्श करने लगे, और चुपके-चुपके
कानाफूसी करते हुए, (62)
कहने लगे, "ये दोनों जादूगर हैं, इनका मक़सद है कि अपने जादू से तुम्हें अपनी ज़मीनों से निकाल बाहर कर दें और
तुम्हारी उत्तम संस्कृति को बर्बाद कर डालें।" (63)
अतः अपने सभी हथकंडों[resources] को जुटा लो, फिर मुक़ाबले के लिए पंक्तिबद्ध हो जाओ। आज जो भी जीतेगा, असल कामयाबी उसी
की होगी।" (64)
जादूगरों ने कहा,
"ऐ मूसा! पहला दांव तुम चलोगे या फिर हम चलें?”(65)
मूसा ने कहा,
"तुम्हीं पहले चलो।" फिर (जादूगरों ने अपने दांव
फेंके), अचानक जादू के असर से उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ(साँप की तरह) दौड़ती हुई
महसूस होने लगीं ! (66)
मूसा अपने जी में थोड़ा डरा, (67)
मगर हमने कहा,
"डरो मत! निस्संदेह तुम ही (मुक़ाबले में) भारी पड़ोगे। (68)
तुम्हारे दाहिने हाथ में जो (लाठी) है, उसे नीचे फेंक दो : जो कुछ (जादू से) उन्होंने रचा है, वह उसे निगल
जाएगी। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह तो बस जादूगर के करतब हैं, और जादूगर चाहे किसी रास्ते से आए , उसे कभी कामयाबी नहीं मिलती।" (69)
[ऐसा ही हुआ, और] सारे जादूगर घुटनों के बल (सजदे में) गिरा दिए गए. वे बोले, "हम ईमान लाते हैं, हारून और मूसा के रब पर ।" (70)
फ़िरऔन ने (जादूगरों से) कहा, "मेरी इजाज़त लेने
से पहले ही तुम्हारी यह मजाल कि तुम इनके रब पर ईमान ले आए ? यह ज़रूर तुम्हारा
उस्ताद होगा, जिसने तुम्हें
जादू सिखाया है। अब अवश्य ही मैं तुम्हारा एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ का पाँव
कटवा दूँगा, और खजूर के तनों पर तुम्हें सूली चढ़ा दूँगा। तब तुम्हें अवश्य ही मालूम हो
जाएगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कठोर और लम्बे समय तक रहनेवाली है!" (71)
जादूगरों ने कहा, "हम यह कभी नहीं कर सकते कि जो (सच्चाई की) स्पष्ट निशानियाँ (अल्लाह की तरफ़
से) हमारे सामने आ चुकी हैं, उन्हें छोड़ कर तेरा आदेश मान लें, और न ही जिस अल्लाह ने हमें पैदा किया है,
उससे मुँह फेर कर तेरा हुक्म मान लें : अत: तू जो
चाहे, फ़ैसला कर ले : वैसे भी तू तो बस इसी सांसारिक जीवन के मामलों का ही फ़ैसला कर
सकता है----- (72)
हम ने तो अपने रब पर विश्वास कर लिया,
(इस आशा में) कि शायद वह हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे
औऱ इस जादूगरी को भी जिसे दिखाने के लिए तूने हमें मजबूर किया---- अल्लाह ही सबसे
अच्छा और हमेशा बाक़ी रहनेवाला है।" (73)
शैतानियाँ करनेवाले लोग जब अपने रब के पास लौट कर
आएंगे, तो (अपने कर्मों के) बदले में जहन्नम पाएंगे : वहीं उन्हें (हमेशा) रहना है, जहाँ वे न मर
सकेंगे, न जी सकेंगे. (74)
मगर वे लोग जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास
रखा और अच्छे कर्म किए, जब अपने रब के पास लौट कर आएंगे,
तो इनाम में उनके लिए ऊँचे से ऊँचा दर्जा होगा, (75)
बहती हुई नहरों के बीच, फैले हुए सदा बहार (परम आनंदवाले)बाग़ होंगे, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। यह इनाम है उन लोगों के लिए, जिसने स्वयं को
(बुराइयों से) बचाए रखा था. (76)
हमने मूसा को ‘वही’[Revelation] भेजी, "रातों रात मेरे
बन्दों[इसराईल की संतान] को लेकर (मिस्र से) निकल पड़ो, और उनके लिए दरिया
में सूखा मार्ग निकाल लो। और देखो, तुम्हें न तो (फ़िरऔन द्वारा) पीछा किए जाने व पकड़े जाने का डर हो ,और न कोई चिंता व
दुख तुम्हें सताए ।" (77)
फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया और अन्ततः दरिया की लहरें उनपर इस
तरह छा गयीं कि पूरी तरह से डुबा कर रख दिया. (78)
फ़िरऔन ने सचमुच अपनी क़ौम के लोगों को पथभ्रष्ट किया; उन्हें सही मार्ग
न दिखाया. (79)
ऐ इसराईल की सन्तान! हमने तुम्हें तुम्हारे दुश्मनों से बचा लिया. तूर पहाड़ के
दाहिनी तरफ़ जब तुम से(बरकतों का) वादा किया था,
और फिर (सीना के रेगिस्तान में खाने के लिए) तुमपर ‘मन्ना’ और ‘सलवा’ [quails] उतारा, (80)
(तुम्हें कहा गया), "जो कुछ रोज़ी हम ने दे रखी है, उसमें से अच्छी चीज़ें खाओ, मगर (मर्यादा की) एक हद से आगे न बढ़ो, वरना मेरा ग़ुस्सा तुम पर आ गिरेगा. और जिस किसी पर
मेरा ग़ुस्सा उतरा, तो सचमुच वह बहुत नीचे गिर गया. (81)
इसके बावजूद, मैं उनलोगों को बेहद माफ़ करनेवाला हूँ, जो (अपने किए पर) तौबा करते हैं,
ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और सीधे मार्ग पर जमे रहते हैं ।" (82)
[मूसा अपनी क़ौम को
हारून की निगरानी में छोड़ कर तूर पहाड़ पर ध्यान लगाने आए थे, तब अल्लाह ने
कहा], "ऐ मूसा! अपनी क़ौम को पीछे छोड़कर तुझे इतनी जल्दी यहाँ आने पर किस चीज़
ने उभारा?"(83)
उसने कहा, "वे मेरे मार्ग का
अनुसरण करते हुए पीछे-पीछे चले आ रहे हैं, ऐ रब! मैं तेरे पास लपक कर आ गया, ताकि तू ख़ुश हो जाए।" (84)
लेकिन अल्लाह ने कहा,
"तेरी अनुपस्थिति में हमने तेरी क़ौम के लोगों की
परीक्षा ली : सामरी ने उन्हें बहका दिया है।" (85)
तब मूसा बेहद ग़ुस्सा और दुखी मन से अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस गया
. उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! क्या तुम्हारे रब ने तुम से अच्छा वादा नहीं किया था? क्या इस बात को
हुए बहुत लम्बा समय गुज़र गया था या तुम यही चाहते ही थे कि तुमपर तुम्हारे रब का
प्रकोप टूट पड़े? इसीलिए तुमने मुझ से किए हुए वादे को तोड़ डाला?" (86)
उन्होंने कहा, "हमने आपसे किए हुए वादे को जान बूझ कर नहीं तोड़ा, बल्कि असल में
(मिस्र से निकलते समय) लोगों के पास भारी भारी ज़ेवरात थे जिसके बोझ तले हम दबे हुए थे, (और फिर सफ़र की मुसीबतों से बचने व ईमान की सफ़ाई के लिए ज़ेवरों को फेंक देना तय
हुआ) अत: हमने उनको फेंक दिया था, फिर सामरी ने (उन्हें जमा कर के आग में) डाल दिया था।" (87)
फिर सामरी ने उस (पिघले हुए ज़ेवरों) से एक बछड़े की
मूर्ति बना दी, जिसमें से गाय के पुकारने जैसी आवाज़ आती थी, और लोग देख कर
कहने लगे, "यही तुम्हारा
ख़ुदा है और मूसा का भी ख़ुदा यही है,
मगर वह [मूसा] भूल गए हैं।" (88)
क्या उन्होंने नहीं देखा था कि वह (बछड़ा आवाज़ तो निकालता है, पर) उनकी किसी
बात का जवाब नहीं देता था, और यह कि उसमें न तो किसी को हानि पहुँचाने की ताक़त थी और न लाभ की ? (89)
हारून ने हालाँकि उन्हें बता दिया था,
"ऐ मेरी क़ौम के लोगों! यह बछड़ा तुम लोगों के लिए एक परीक्षा है, तुम्हारा असल रब
तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है, अतः तुम मेरे पीछे चलो, और मेरा आदेश मानो।" (90)
मगर उन्होंने जवाब दिया, "जब तक मूसा लौटकर
हमारे पास न आ जाएं, तब तक हम इसकी भक्ति करना नहीं छोड़ेंगे।" (91)
मूसा ने कहा,
"ऐ हारून! जब तुम समझ गए कि ये पथभ्रष्ट हो चुके हैं, तो किस चीज़ ने
तुम्हें रोके रखा था (92)
मेरे पीछे पीछे चले आने से? तुम मेरे आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते हो?" (93)
हारून ने कहा,
"ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी और मेरा सिर न
नोच!---- मुझे डर था कि तू कहेगा, “तू ने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।" (94)
(मूसा ने) कहा, "और ऐ सामरी! तेरा क्या मामला था ?" (95)
उसने जवाब दिया,
"मैंने कुछ ऐसा देखा था, जो इनलोगों ने नहीं देखा; मैंने रसूल की कुछ शिक्षाएं तो ली थीं, मगर फिर उन्हें (अपने मन से) निकाल कर एक तरफ़ डाल दिया : मेरे जी ने ही मुझे
ऐसा करने के लिए उकसाया था।" (96)
मूसा ने कहा,
"चला जा यहाँ से! अब इस जीवन में तेरे लिए यही है कि
तू कहता रहे, “मत छूओ मुझे!” मगर हाँ, तेरे लिए (अल्लाह के सामने हाज़िर होने का) एक निश्चित समय तय किया हुआ
है, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। देख अपने इस प्रभु को जिसकी भक्ति में
तू जमा बैठा था---- हम इसे चूर चूर करके दरिया में बिखेर देंगे।" (97)
“ [लोगो] तुम्हारा असल ख़ुदा तो बस एक अल्लाह है,
जिसके अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं----- उसके ज्ञान
ने हर चीज़ को घेर रखा है।" (98)
इस तरह से [ऐ रसूल] हम पुराने ज़माने की कहानियों से
आपका रिश्ता जोड़ देते हैं. हमने आपको अपनी तरफ़ से एक नसीहत का सामान [क़ुरआन] दिया
है.(99)
जिस किसी ने इससे मुँह मोड़ा, वह निश्चय ही क़यामत के दिन (अपने जुर्म का) बड़ा भारी बोझ उठाएगा (100)
वे इसी बोझ तले दबे रहेंगे. कैसा भयानक बोझ है जो क़यामत के दिन यह लिए
फिरेंगे! (101)
जिस दिन नरसिंघे को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा,
और हम मुजरिमों को अंधों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (102)
वे आपस में चुपके-चुपके पूछेंगे कि "हम (क़ब्रों
में) दस दिन से ज़्यादा क्या रहे होंगे?"---- (103)
जो कुछ वे कह रहे होंगे, हम उसे अच्छी तरह जानते हैं---- मगर उनमें से सबसे समझदार आदमी कहेगा, "हम बहुत रहे
होंगे तो बस एक दिन रहे होंगे।" (104)
[ऐ रसूल] वे आपसे पहाड़ों के बारे में पूछते हैं : कह दें, "(क़यामत के दिन)
मेरा रब उन पहाड़ों को (चूर-चूर कर के) धूल की तरह उड़ा देगा (105)
और धरती को एक समतल मैदान बनाकर छोड़ेगा,
(106)
जिसमें न तो कोई ऊँचाई दिखेगी और न ही
पस्ती।" (107)
उस दिन सब लोग पुकारनेवाले के पीछे पीछे चल पड़ेंगे, और उससे बच
निकलने का कोई रास्ता न होगा; रहम करनेवाले रब[रहमान] के सामने हर एक आवाज़ दब कर रह जाएगी; बस केवल
फुसफुसाने की आवाज़ ही सुनाई देगी.(108)
उस दिन किसी की सिफ़ारिश काम न आएगी सिवाय उसके जिसको रब [रहमान] ख़ास इजाज़त दे
दे, और जिसकी बात को मंज़ूर कर ले ---- (109)
जो कुछ लोगों के सामने है और जो उनके पीछे गुज़र चुका, वह सारी बातों
को जानता है, हालाँकि वे उस[अल्लाह] को पूरी तरह समझ नहीं सकते---- (110)
सभी चेहरे उस हमेशा ज़िंदा रहनेवाले,
हर समय निगरानी रखनेवाले[अल्लाह] के आगे झुकें होंगे। ऐसे लोग जिन पर बुरे कर्मों का बोझ होगा, वे निराशा में
डूब जाएंगे, (111)
पर जिस किसी ने अच्छे कर्म किए हैं, और ईमान रखा है, तो उसे न तो किसी
नाइंसाफ़ी का डर होगा और न हक़ मारे जाने का.” (112)
हमने क़ुरआन को अरबी ज़बान में उतारा है,
और हमने इसमें हर तरह से (इंकार व बुरे कर्मों के
नतीजे की) चेतावनियाँ दे दी हैं, ताकि वे(भटकने से) सावधान रह सकें या इस पर ध्यान दे सकें--- (113)
बड़ी ऊँची शान है अल्लाह की, जिसे हर एक चीज़
पर पूरा नियंत्रण है.
[ऐ रसूल] जब क़ुरआन (की आयतें) उतारी जा रही हों,तो उसे पूरी तरह
उतरने से पहले ही पढ़ने में जल्दी न किया करें,
बल्कि कहें, "मेरे रब, मेरे ज्ञान में बढ़ोत्तरी कर दे !" (114)
असल में हमने आदम को पहले से ही बता कर शपथ ले ली थी, फिर वह भूल गया
और हमने उसमें इरादे की मज़बूती न पाई.(115)
जब हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब झुक गए थे, मगर इबलीस ने (झुकने से) इंकार किया,
(116)
इसपर हमने कहा, "ऐ आदम! (देख लो) इबलीस तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का दुश्मन : कहीं ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को
जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ. (117)
तुम्हारे लिए अब ऐसी ज़िंदगी है कि (जन्नत के) बाग़ में तुम न कभी भूखे
रहोगे, और न ही नंगापन महसूस करोगे, (118)
न प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।" (119)
लेकिन फिर शैतान ने आदम को बहकाया, और कहने लगा, "ऐ आदम! क्या मैं तुझे एक ऐसे पेड़ का पता दे दूँ जिससे जीवन अमर हो जाए और ऐसी
शक्ति मिल जाए जो कभी घटे नहीं ?" (120)
और(फिर आदम व उसकी पत्नी) दोनों ने उस(पेड़) में से
कुछ खा लिया, जिसके नतीजे में उन्हें (शर्म से) अपने जिस्म को छिपाने की ज़रूरत महसूस हुई, और वे बाग़ के
पत्तों से अपने जिस्म को ढकने लगे। आदम अपने रब के कहने पर न चला और वह (जन्नत की
ज़िंदगी से) भटक गया----- (121)
लेकिन बाद में, उसका रब उसे फिर अपने नज़दीक ले आया, उसकी तौबा [repentance] क़बूल कर ली, और उसका मार्गदर्शन किया ---- (122)
अल्लाह ने कहा,
" तुम दोनों इस जन्नत से चले जाओ!, (आदम और शैतान)
तुम दोनों एक दूसरे के दुश्मन होगे।
(अब धरती पर) अगर मेरी ओर से तुम(लोगों) को कोई
मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन को अपनाया,
वह न तो गुमराह होगा और न किसी तकलीफ़ में पड़ेगा. (123)
और जिस किसी ने मेरी नसीहत से मुँह मोडा़ तो उसका जीवन सख़्त परेशानी में
गुज़रेगा. क़यामत के दिन हम उसे अंधा कर के खड़ा करेंगे" (124)
वह कहेगा,
"ऐ मेरे रब! तू मुझे यहाँ अंधा कर के क्यों लाया ? पहले तो मैं देख
सकता था !" (125)
अल्लाह कहेगा,
"ऐसा ही होना था : जब हमारी निशानियाँ [आयतें] तेरे
पास आती थीं, तो तू उन्हें नज़रअंदाज़ [ignore] कर देता था, अत: आज तुझे भी भुला दिया जाएगा।" (126)
जो कोई मर्यादा को तोड़ कर बहुत आगे चला जाता है, और अपने रब की आयतों पर विश्वास नहीं रखता, तो इसी तरह हम उसे बदला देते हैं. और आख़िरत[Hereafter] की सज़ा तो बेहद कठोर और देर तक रहनेवाली है. (127)
पहले की कितनी ही पीढ़ियों को हम (उनके जुर्मों
के नतीजे में) बर्बाद कर चुके हैं जिनके खंडहरों से हो कर तुम लोग आते जाते हो, तो क्या उनसे कोई सबक़ नहीं सीखते ? समझदार आदमी के लिए सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ
हैं ! (128)
[ऐ रसूल] अगर आपके रब ने (सज़ा देने के समय) की बात
पहले से ही तय न कर दी होती, तो अब तक उन्हें तबाह कर दिया गया होता. उनका समय तय हो चुका है, (129)
अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, आप उसपर सब्र व धैर्य से काम लें----
मन से अपने रब का गुणगान करें, सूरज निकलने और
डूबने से पहले, और रात की घड़ियों में भी उसका गुणगान करें,
और दिन के शुरू और ख़त्म होने पर[दो पहर के लगभग] भी, ताकि आपको संतोष
मिल सके ---- (130)
हमने उनमें से कुछ लोगों को इस जीवन के बहार लूटने और मज़े करने का मौक़ा दिया
है : हम उसके द्वारा उनकी परीक्षा लेते हैं, मगर आप इन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें, आपके रब की दी हुई रोज़ी उत्तम भी है और देर तक रहनेवाली भी. (131)
आप अपने लोगों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दे दें, और स्वयं भी उसपर
जमे रहें । हम आपसे कोई रोज़ी नहीं माँगते;
रोज़ी तो हम ही देते हैं, और आख़िरत का इनाम
तो उन्हीं लोगों के लिए है जो (अल्लाह की) भक्ति में डूबे होते हैं.(132)
विश्वास न करनेवाले कहते हैं, "यह (रसूल)
अपने रब की ओर से हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं लाते ?" मगर क्या उन्हें
स्पष्ट प्रमाण (के रूप में क़ुरआन) नहीं दिया गया,
जो पहले की (आसमानी) किताबों में लिखी हुई बातों की पुष्टि
करती है? (133)
अगर इस रसूल के आने से पहले, हम सज़ा के तौर पर इन्हें तबाह व बर्बाद कर देते,
तो वे ये कहते "ऐ हमारे रब, काश, तूने हमारे पास
कोई रसूल भेजा होता, तो हम अपमानित और बदनाम होने से पहले ही तेरी आयतों के अनुसार चलते!" (134)
[ऐ रसूल] कह दें, "हम सब (आनेवाले समय का) इंतेज़ार कर रहे हैं,
अतः तुम भी इंतेज़ार करो : जल्द ही तुम्हें मालूम हो
जाएगा कि कौन सीधे मार्ग पर चलनेवाला है और कौन मंज़िल तक पहुँचता है।" (135)
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आने वाली घड़ी [क़यामत] सामने आजायेगी, (1)
तो उस घड़ी के आ जाने का कोई भी इंकार न कर पाएगा,(2)
किसी को नीचे ले जाएगी, किसी को ऊँचा उठा देगी. (3)
जब धरती भूँचाल से बुरी तरह डोलने लगेगी (4)
और पहाड़ टूटकर चूर्-चूर हो जाएँगे (5)
यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे (6)
और तब, तुम लोगों को तीन दर्जों में छाँटा जाएगा . (7)
तो जो दाहिने हाथ वाले [सौभाग्यशाली] हैं---क्या कहना उन दाहिने हाथ वालों का ! (8)
और बाएँ हाथ वाले [दुर्भाग्यशाली]---क्या बताना उन बाएँ हाथ वालों (के बुरे हाल) का! (9)
और (तीसरे) जो सामने होंगे, वे तो हैं ही वरीयता में आगे चलनेवाले! (10)
यही वे लोग हैं जो अल्लाह के सबसे नज़दीक रहेंगे ; (11)
नेमत से भरी (परम आनंद वाली) जन्नतों में: (12)
शुरू की पीढियों में से तो बहुत-से होंगे, (13)
किन्तु बाद की पीढियों [later generations] में से कम ही (14)
ऊँचे तख़्तों पर जिस पर सोने के तारों से बुने हुए कपड़े (बिछे होंगे) ; (15)
तकिया लगाए आमने-सामने बैठे होंगे. (16)
सदा बहार नौजवान लड़्के (उनकी सेवा में) उनके बीच घूमते रहेंगे (17)
प्याले, जग और विशुद्ध पेय से भरा हुआ जाम लिए हुए (18)
- जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनके होश उड़ेंगे (19)
(और वहाँ होंगे) हर एक फल जो वे पसन्द करें; (20)
और चिड़ियों का मांस जो वे चाहें ;(21)
और (साथ निभाने के लिए) बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत हूरें! (22)
ऐसी मानो छिपा कर सुरक्षित रखे हुए मोती हों (23)
यह सब कुछ उन (अच्छे) कामों के बदले में उन्हें मिलेगा जो कुछ वे (दुनिया में) किया करते थे (24)
उस जन्नत में वे न कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न कोई गुनाह की बात; (25)
हाँ जो बात होगी, वह बेहद अच्छी, साफ़-सुथरी और सलामती वाली होगी! (26)
और जो दायीं हाथ वाले होंगे [सौभाग्यशाली लोग], तो क्या कहना उन दायीं हाथवालों का! (27)
(वे मज़े करेंगे) बिन काँटों के बेरियों में;(28)
और गुच्छेदार केले से लदे पेड़ों में; (29)
दूर तक फैली हुई छाँव में; (30)
लगातार बहते हुए पानी में; (31)
बहुत-सारे फलों व मेवों में (32)
जो न कभी ख़त्म होंगे और न उन्हें खाने की कोई रोक-टोक होगी(33)
ऐसे जीवन-साथियों के साथ जिनकी तुलना नहीं हो सकती (34)
जिन्हें हमने ख़ास तौर से पैदा किया है ---(35)
कुँवारियाँ, (36)
प्रेम दर्शानेवाली और उम्र में बराबर!--- (37)
उन लोगों के लिए जो दायीं हाथवाले [सौभाग्यशाली] हैं, (38)
(जिनमें) बहुत से शुरू की पीढियों से होंगे (39)
और बहुत से बाद की पीढियों से. (40)
लेकिन जो लोग बायीं हाथवाले [दुर्भाग्यशाली] हैं, तो क्या बताएं कि कैसे (बुरे लोग) हैं बायीं हाथवाले! (41)
वे होंगे तपती हुई गर्म हवा और खौलते हुए पानी में; (42)
और काले धुएँ की छाँव में, (43)
जो न ठंडी होगी और न लाभप्रद. (44)
वे इससे पहले बड़े सुख-सम्पन्न थे; (45)
और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे (46)
वे कहा करते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (47)
"और क्या हम से पहले गुज़रे हुए बाप-दादाओं को भी?" (48)
[ऐ रसूल] कह दें, "निश्चय ही सब अगली और पिछली पीढियों के लोग (49)
एक पहले से नियत दिन और समय पर अवश्य ही इकट्ठे कर दिए जाएँगे, (50)
"तो तुम(लोग) जो रास्ता भटके हुए हो और सच्चाई का इंकार करने वाले हो (51)
ज़क्कूम के कड़ुवे वृक्ष में से खाओगे; (52)
"और उसी से पेट भरोगे; (53)
"और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीना पड़ेगा; (54)
"और पियोगे भी इस तरह जैसे प्यास की बीमारी वाले ऊँट पीते हैं " (55)
तो बदला दिए जाने [फ़ैसले] के दिन, इसी तरह होगा उनका स्वागत ! (56)
हमने तुम्हें पैदा किया है, फिर तुम इसका यक़ीन क्यों नहीं करते? (57)
तो क्या तुमने विचार किया जो [वीर्य, Semen] तुम टपकाते हो? (58)
क्या तुम उसे पैदा करते हो, या पैदा करने वाले हम हैं ? (59)
और हमने ही तुम्हारे बीच मौत को तय कर रखा है. हमें कोई नहीं रोक सकता (60)
कि हम चाहें तो तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में दोबारा पैदा करें जिसे तुम जानते नहीं (61)
तुम तो जान चुके हो कैसे तुम पहली बार पैदा किए गय थे : फिर तुम इससे कोई सीख क्यों नहीं लेते? (62) अच्छा यह बताओ कि जो कुछ तुम ज़मीन में बोते हो, (63)
क्या उसे तुम उगाते हो या उगाने वाले हम हैंं ? (64)
यदि हम चाहें तो उस फ़सल को भूसा बना दें, फिर तुम हैरान परेशान होकर चिल्लाते रह जाओ (65)
कि "हमपर तो क़र्ज़ का बोझ पड़ गया, (66)
बल्कि हम वंचित होकर रह गए!" (67)
अच्छा यह बताओ कि जो पानी तुम पीते हो--- (68)
क्या उसे वर्षावाले-बादलों से तुमने उतारा है या उतारनेवाले हम हैंं ? (69)
यदि हम चाहें तो उसे अत्यन्त खारा बनाकर रख दें, फिर तुम कृतज्ञता क्यों नहीं दिखाते? (70)
अच्छा बताओ कि यह आग जिसे तुम सुलगाते हो--- (71)
क्या पेड़ की लकड़ियों को तुमने बनाया है या बनानेवाले हम हैंं ? (72)
हमने उस आग को नसीहत का ज़रिया बनाया (ताकि जहन्नम की आग से डरें) और मरुभुमि के मुसाफ़िरों और ज़रूरतमन्दों के लिए लाभप्रद बनाया (73)
अतः [ऐ रसूल] आप अपने महान रब के नाम का गुणगान करें. (74)
मैं क़सम खाता हूँ सितारों की स्थितियों की --- (75)
और यह बहुत बड़ी क़सम है, यदि तुम जानो-- (76)
कि सचमुच यह बड़ा ही प्रतिष्ठित क़ुरआन है (77)
एक सुरक्षित किताब में (पहले से) लिखा हुआ है (78)
उसे केवल पाक-साफ़ व्यक्ति ही हाथ लगाते हैंं (79)
इसे सारे संसार के रब की ओर से (थोड़ा थोड़ा कर के) उतारा जा रहा है। (80)
फिर किस तरह तुम इस (पवित्र) बयान की उपेक्षा कर सकते हो? (81)
और तुम्हें जो रोज़ी दी गयी है उसका (शुक्रिया अदा करने के) बजाय, तुम कैसे इसे मानने से इंकार कर सकते हो? (82)
फिर ऐसा क्यों नहीं होता जब (किसी के) प्राण (निकलते हुए) गले तक पहुँच जाते है (83)
जबकि उस समय तुम (बेबसी से) देख रहे होते हो --(84)
हम तुम से ज़्यादा उसके निकट होते हैंं मगर तुम हमें नहीं देखते -– (85)
अगर तुम्हारा हिसाब किताब नहीं होना है तो फिर ऐसा क्यों नहीं होता (86)
कि तुम उसके (प्राण को) लौटा दो, यदि तुम्हारी बातें सच्ची हैं. (87)
फिर यदि वह (मरने वाला) उन लोगों में हुआ जिन्हें अल्लाह के नज़दीक वाली जगह मिलेगी ; (88)
तो (उसके लिए) आराम है, सुकून है, और नेमतोंवाला बाग़ है ; (89)
यदि वह उन लोगों में हुआ जो दाहिने हाथवालों [ भाग्यशालियों] में से है, (90)
तो (उससे कहा जाएगा) "तुम्हारे लिए सलामती ही सलामती है कि तुम दाहिने हाथ वालों में से हो।" (91)
और यदि वह उनमें से हुआ जिसने सच्चाई को मानने से इंकार किया और गुमराह हो गया; (92)
तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा (93)
फिर उसे (जहन्नम की) आग में जलना है (94)
निस्संदेह यह बिल्कुल सच्ची और पक्की बात है (95)
अतः तुम अपने महान रब का नाम लेकर उसका गुणगान करो. (96)
सूरह 26 : अश शु’अरा [कविगण, The Poets]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰ मीम॰ (1)
ये उस किताब की आयतें हैं, जो सच्चाई को
स्पष्ट कर देती हैं : (2)
[ऐ रसूल], क्या आप यह सोच सोच कर अपनी जान ही दे देंगे कि आख़िर
वे लोग (आपकी बातों में) विश्वास क्यों नहीं करते ? (3)
अगर हम ऐसा चाहते, तो उनपर आसमान
से एक ऐसी निशानी उतार देते, कि फिर उसके आगे उनकी गर्दनें झुकी की झुकी रह
जातीं.(4)
जब कभी दयालु रब की तरफ़ से उनके पास नयी नसीहतें [आयतें]
भेजी जाती हैं, वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं : (5)
वे इसे (मानने से) इंकार करते हैं, मगर जल्द ही
उन्हें उसकी हक़ीकत मालूम हो जाएगी, जिसका वे मज़ाक़
उड़ाते रहे हैं . (6)
क्या उन्होंने धरती को नहीं देखा कि हमने उसमें कैसी कैसी
(वनस्पतियों की) क़िसमें उगा दीं ? (7)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि उनमें से
अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (8)
और तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है (9)
(उस समय का हाल सुनो) जबकि तुम्हारे रब ने मूसा [Moses] को पुकार कर कहा
था, "ग़लत काम करनेवाले [ज़ालिम] लोगों के पास जाओ, (10)
यानी फ़िरऔन [Pharaoh] की क़ौम के पास
- क्या वे (अल्लाह की बातों पर) ध्यान नहीं देंगे ?" (11)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे
डर है कि वे मुझे झूठा कहेंगे, (12)
और मैं दुखी हो जाऊँगा और मेरी ज़बान बंद हो जाएगी, इसलिए (मेरे
भाई) हारून [Aaron] को भी मेरे साथ भेज दें; (13)
इसके अलावा, मेरे ख़िलाफ़ उन
लोगों ने एक (क़त्ल का) इल्ज़ाम भी लगा रखा है ।
इसलिए मैं डरता हूँ कि कहीं वे मुझे मार ही न डालें।" (14)
अल्लाह ने कहा, " नहीं[वे ऐसा नहीं कर
सकते]! तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ--- यक़ीन रखो, हम तुम्हारे साथ
रहेंगे, और सब सुनते रहेंगे. (15)
अतः तुम दोनो फ़िरऔन को पास जाओ और कहो, “ हम सारे संसार के रब की तरफ़ से संदेश ले कर आए हैं : (16)
इसराईल की सन्तानों को हमारे साथ जाने दो।" (17)
फ़िरऔन ने कहा, "क्या हमने
तुम्हें अपने यहाँ रख कर पाला नहीं था जब तुम बच्चे थे ? क्या तुम ने
हमारे साथ रहते हुए अपनी उम्र के कई साल नहीं गुज़ारे थे ? (18)
और फिर तुम ने अपने हाथ से वह अपराध कर डाला था : तुम बड़े
एहसान फ़रामोश [ungrateful] हो।" (19)
मूसा ने जवाब दिया, “जब मैंने वह (घूँसा मारने का) काम किया, उस वक़्त मुझे
धोखा हुआ था (20)
और मैं तुम्हारे डर से यहाँ से भाग़ खड़ा हुआ था; बाद में, मेरे रब ने मुझे
सही ज्ञान दिया और मुझे अपने रसूलों में शामिल कर लिया. (21)
और क्या यही बड़ा काम किया है तुम ने --- कि इसराईल की
सन्तान को ग़ुलाम बना रखा है--- जो तुम मुझ पर अपना एहसान जता रहे हो ?।" (22)
फिर फ़िरऔन ने
पूछा, "और यह सारे संसार का रब क्या होता है?" (23)
मूसा ने जवाब दिया, "वह सारे आसमानों
का, ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उन सबका रब है, अगर तुम सचमुच
विश्वास कर सको !" (24)
फ़िरऔन ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा, "क्या तुम ने सुना, जो कुछ इस ने
कहा?" (25)
मूसा ने कहा, "वह तुम्हारा भी
रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है ।" (26)
फ़िरऔन ने कहा, "यह रसूल, जो तुम्हारी ओर
भेजा गया है, सचमुच ही पागल है।" (27)
मूसा ने आगे कहा, "वह पूरब और
पश्चिम का भी रब है और जो कुछ उनके बीच है उसका भी रब है, (समझ जाओगे) अगर
तुम अपनी बुद्धि से काम लो! " (28)
मगर फिरऔन ने (मूसा से) कहा, "अगर तूने मेरे
सिवा किसी और को पूजने के क़ाबिल माना, तो मैं तुझे ज़रूर
बन्दी बना लूँगा", (29)
इस पर मूसा ने पूछा, "क्या तब भी, अगर मैं तुम्हें
कोई ऐसी चीज़ दिखा दूँ जिसे (देख कर) तुम मान जाओ ?" (30)
“अच्छा ठीक है, दिखाओ, अगर तुम सच बोल
रहे हो”, फ़िरऔन ने कहा. (31)
अत: मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, देखते ही देखते
वह अजगर साँप बन गयी. (32)
फिर उसने अपना हाथ (बग़ल से) खींच कर निकाला, तो वह पल भर में देखनेवालों के सामने सफ़ेद हो कर चमकने लगा. (33)
फ़िरऔन ने अपने आसपास मौजूद सरदारों से कहा, "यह आदमी तो बड़ा
ही माहिर जादूगर है! (34)
ऐसा लगता है कि यह अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी ज़मीन से
निकाल बाहर करना चाहता है! तो अब तुम्हारी क्या राय है?" (35)
उन्होंने जवाब दिया, "इसे और इसके भाई
को अभी कुछ समय के लिए टाल दें, और सभी शहरों में संदेशवाहकों को भेज दें, (36)
ताकि सभी मँझे हुए जादूगरों को आपके पास लाया जा सके।"
(37)
जादूगरों को एक ख़ास दिन में एक नियत समय पर जमा होना था (38)
और लोगों से पूछा गया था,(39)
"क्या तुम सब लोग
(देखने) आ रहे हो? अगर जादूगरों की जीत होती है, तो हम उनके बताए
हुए रास्ते पर चल सकते हैं. " (40)
फिर जादूगरों ने वहाँ पहुँच कर फ़िरऔन से कहा, "अगर हम जीत
जाएंगे, तो क्या हमें कोई इनाम दिया जाएगा ?" (41)
उसने कहा, "हाँ,हाँ, तुम हमारे क़रीबी
दरबारियों में शामिल कर लिए जाओगे।" (42)
मूसा ने उनसे कहा, "फेंको, जो कुछ तुम
फेंकना चाहते हो।" (43)
तब जादूगरों ने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकी और बोले, "फ़िरऔन की इज़्ज़त
व ताक़त की क़सम! हम ही विजयी रहेंगे।" (44)
मगर मूसा ने अपनी लाठी जैसे ही ज़मीन पर फेंकी, तो क्या देखते
हैं कि वह (अजगर बन कर) उस स्वांग से रची गयी चीज़ों को निगल गया (45)
और इस पर जादूगर घुटनों के बल (सजदे में) गिरा दिए गए, (46)
और बोल उठे, "हम ने सारे संसार
के रब पर विश्वास कर लिया, (47)
जो मूसा और हारून का रब है !" (48)
फ़िरऔन ने कहा, "तुम्हारी हिम्मत
कैसे हुई कि मेरी अनुमति लिए बिना ही, तुम ने इस पर
विश्वास भी कर लिया? यह ज़रूर तुम सबका उस्ताद है, जिसने तुमको जादू
सिखाया है! अच्छा, तो अभी तुम्हें मालूम हुआ जाता है: मैं तुम्हारे एक तरफ़ के
हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव कटवा दूँगा, और तुम सब को
सूली पर चढ़ा दूँगा! " (49)
जादूगरों ने कहा, "हमारा तो इससे
कोई नुक़सान नहीं होगा, क्योंकि यह बात पक्की है कि हम को अपने रब के पास लौट कर जाना है. (50)
उम्मीद है कि हमारा रब हमारे गुनाहों को क्षमा कर
देगा, क्योंकि सबसे पहले हम ने विश्वास कर लिया था।" (51)
हमने मूसा को वही[revelation]भेज कर अपनी बात
बतायी, "मेरे बन्दों को लेकर रातों-रात निकल जाओ, अवश्य ही
तुम्हारा पीछा किया जाएगा !" (52)
इस बीच फ़िरऔन ने शहरों में संदेशा देनेवालों को यह कहते
हुए भेजा, (53)
"यह (इसराईल की संतानें) कमज़ोर और थोड़े से लोगों की
एक टोली है--- (54)
उनलोगों ने हमें ताव दिलाया है--- (55)
और हम एक बड़ी सेना हैं, हमेशा तैयार
रहने वाली।" (56)
अंत में, ऐसा हुआ कि उन (फिरऔन के लोगों) को --- अपने बाग़ों
और पानी के सोतों को, (57)
अपने ख़जानों, और रहने के
बेहतरीन मकानों को--- छोड़कर निकलना पड़ा. (58)
हम ने ऐसी चीज़ें (बाद में) इसराईल की सन्तानों को दे दी. (59)
सुबह-तड़के ही फ़िरऔन और उसके लोगों ने उनका पीछा किया, (60)
फिर जैसे ही दोनों तरफ़ के लोग (नज़दीक पहुंचे) और
एक-दूसरे को दिखाई देने लगे, तो मूसा के माननेवालों ने कहा, "अब हम ज़रूर
पकड़े जाएंगे !" (61)
मूसा ने कहा, " नहीं, मेरा रब मेरे साथ
है: वह अवश्य रास्ता दिखाएगा", (62)
और हमने मूसा को वही भेजी "अपनी लाठी समंदर
पर मारो।" समंदर दो हिस्सों में फट गया - - हर एक हिस्सा ऊँचे पहाड़
की तरह खड़ा हो गया (और रास्ता बन गया) - - - (63)
और हम दूसरों[फ़िरऔन व उसके साथियों] को भी उसी जगह ले आए :(64)
और हमने मूसा को और उनके सभी साथियों को बचा लिया, (65)
और बाक़ी बचे(फ़िरऔन के) लोगों को डुबा दिया. (66)
सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है, मगर अधिकतर लोग
विश्वास नहीं करते : (67)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे ताक़तवाला, सब पर दयावान है.
(68)
और [ऐ रसूल]
उन्हें इबराहीम[Abraham] की कहानी सुनाएं, (69)
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किसे पूजते
हो?" (70)
उन्होंने कहा, "हम मूर्तियों की
पूजा करते हैं, और हम तो उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।" (71)
उसने पूछा, "क्या ये तुम्हारी बात सुनते हैं, जब तुम पुकारते
हो, (72)
क्या ये तुम्हारी कुछ मदद या हानि पहुँचाते हैं?" (73)
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हमने तो
अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है।" (74)
इब्राहीम ने कहा, "कभी तुम ने यह
सोचा कि तुम किसकी पूजा करते रहे हो, (75)
तुम और तुम्हारे बाप-दादा, (76)
वे सब तो मेरे लिए दुश्मन हैं; मगर सारे संसार
के रब की बात अलग है, (77)
जिसने मुझे पैदा किया. फिर वही है जो मुझे सीधा रास्ता
दिखाता है ; (78)
और वही है जो मुझे खिलाता और पिलाता है; (79)
जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे ठीक
कर देता है; (80)
और वही है जो मुझे मौत देगा, और फिर मुझे
दोबारा ज़िंदगी देगा ; (81)
और वही है जिससे मुझे उम्मीद है कि फ़ैसले के दिन वह मेरी
ग़लतियाँ माफ़ कर देगा. (82)
ऐ मेरे रब! मुझे ज्ञान व समझ-बूझ दे; और मुझे नेक
लोगों के साथ शामिल कर ले; (83)
और मुझे बाद में आनेवाली नस्लों में भी अच्छे नामों
से याद किया जाता रहे; (84)
और मुझे उनमें से बना जिन्हें नेमतों वाली जन्नत[Garden of bliss] दी जाएगी--- (85)
और मेरे बाबा को क्षमा कर दे, कि वह उन लोगों
में से हैं जो सही रास्ते से भटक चुके हैं——(86)
और मुझे उस दिन की बेइज़्ज़ती से बचा, जब सब लोग जीवित
करके दोबारा उठाए जाएँगे : (87)
उस दिन न माल काम आएगा और न बाल बच्चे ही कोई मदद कर सकेंगे, (88)
और उस दिन केवल वही सुरक्षित बच पाएगा, जो अल्लाह के
सामने ऐसा दिल लेकर आया हो, जो पूरी भक्ति से उस पर समर्पित हो।" (89)
जब (जन्नत के) बाग़ को सही रास्ते पर चलनेवाले नेक लोगों के नज़दीक लाया
जाएगा,
(90)
और (जहन्नम की) आग
भटके हुए लोगों के ठीक सामने खड़ी कर दी जाएगी, (91)
और तब
उनसे पूछा जाएगा,
"कहाँ हैं वे जिन्हें तुम पूजते थे (92)
अल्लाह को छोड़ कर ? क्या वे अब तुम्हारी
सहायता कर सकते हैं या अपना बचाव ही कर सकते हैं?" (93)
और उसके बाद, उन सब को जहन्नम में
फेंक दिया जाएगा, साथ में उन लोगों को
भी जो उन्हें सीधे रास्ते से भटका देते थे, (94)
और इबलीस[शैतान] के
सारे समर्थक भी (आग में डाले जाएंगे) । (95)
वहाँ वे आपस में तू
तू मैं मैं करते हुए, अपने (गढ़े हुए)
ख़ुदाओं से कहेंगे,
(96)
"अल्लाह की क़सम! हम
उस समय सचमुच बड़ी गुमराही में थे, (97)
जब हम ने तुम्हें
सारे संसार के रब के बराबर ठहराया था. (98)
वे शैतानियाँ
करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (99)
और अब हमारे लिए न तो
कोई सिफ़ारिश करनेवाला है,
(100)
और न कोई सच्चा दोस्त
है. (101)
काश! अगर हम अपनी
ज़िंदगी दोबारा जी पाते, तो हम पक्के
ईमानवाले [मोमिन] हो जाते !" (102)
सचमुच ही इसमें एक
बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग
विश्वास नहीं करते : (103)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है. (104)
नूह[Noah] की क़ौम ने भी रसूलों को झुठा
बताया. (105)
उनके भाई नूह ने उनसे कहा, "क्या तुम अपने ध्यान में अल्लाह के हर समय होने का अहसास
नहीं रखोगे ? (106)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल
हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ
: (107)
हर
समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा मानो. (108)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम
नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके
पास है जो सारे संसार का पालनहार है: (109)
हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा मानो।" (110)
उन्होंने जवाब दिया, " हम तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास कर लें
जबकि तुम्हारे पीछे चलने वाले तो बिल्कुल ही नीच क़िस्म के लोग हैं?" (111)
नूह
ने कहा, "मुझे क्या मालूम कि वे क्या
करते थे ? (112)
उनका हिसाब लेने का काम तो बस
मेरे रब के हाथ में है---काश तुम समझ पाते--- (113)
और जिन लोगों ने(मेरी बात पर)
विश्वास कर लिया, मैं उन्हें धुत्कारनेवाला तो
हूँ नहीं। (114)
मैं तो बस यहाँ इसीलिए हूँ कि
लोगों को साफ़ साफ़ चेतावनी दे दूँ ।" (115)
इस पर उनलोगों ने कहा, "ऐ नूह! अगर तुम ने अपनी हरकतें
बंद नहीं की, तो तुम्हें ज़रूर पत्थरों से
मार डाला जाएगा।" (116)
नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोगों
ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया है, (117)
इसलिए
अब मेरे और उनके बीच दो टूक फ़ैसला कर दे, और मुझे और मेरे ईमानवाले साथियों को बचा
ले!" (118)
इस तरह, हमने उसे और उसके माननेवाले जो
भरी हुई नौका में थे, बचा लिया, (119)
और बाक़ी बचे लोगों को डुबा दिया. (120)
सचमुच
ही इसमें एक बड़ी निशानी है,
हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (121)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है. (122)
आद के लोगों ने भी रसूलों को झूठा बताया. (123)
उनके भाई हूद ने उनसे कहा, "क्या तुम अपने
ध्यान में अल्लाह के हर समय होने का अहसास नहीं रखोगे ? (124)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास
भेजा गया हूँ : (125)
हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा
मानो. (126)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा
इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (127)
क्या तुम दिखावे के लिए हर ऊँची जगह पर बेकार के स्मारक ही
बनाते फिरोगे? (128)
क्या तुम इस आशा में क़िले बनवाते रहते हो कि जैसे तुम्हें
यहाँ हमेशा ज़िंदा रहना है? (129)
और जब किसी पर हमला करते हो तो बिल्कुल निर्दयी ज़ालिम क्यों बन जाते हो? (130)
अतः हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा
मानो; (131)
उस(अल्लाह) के होने का अहसास रखो जिसने तुम तक वह सारी
चीज़े पहुँचाई हैं जिन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो--- (132)
उसने तुम्हें चौपाए और बाल-बच्चे दिए हैं, (133)
और बाग़ व पानी के सोते[Springs] भी--- (134)
इस कारण मुझे सचमुच डर है
कि एक बड़े दर्दनाक दिन की यातना तुम्हें घेर लेगी।" (135)
जवाब में वे बोले, "चाहे तुम हमें
सावधान करो या न करो, हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है, (136)
क्योंकि हम तो केवल वही करेंगे, जैसा कि हमारे
बाप-दादा किया करते थे: (137)
हमें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी।" (138)
उनलोगों ने हूद को खुले आम झूठा घोषित कर दिया, जिसके नतीजे में
हम ने उन्हें बर्बाद कर दिया। सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर
लोग विश्वास नहीं करते : (139)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है.
(140)
समूद के लोगों ने भी रसूलों को झुठा कहा. (141)
उनके भाई सालेह
ने उनसे कहा, "क्या तुम अपने ध्यान में अल्लाह के हर समय होने का अहसास
नहीं रखोगे ? (142)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (143)
हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा
मानो. (144)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा
इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (145)
(क्या तुम सोचते हो कि) यहाँ जो कुछ है उनके बीच, तुम हमेशा के लिए
सुरक्षित छोड़ दिए जाओगे--- (146)
इन बाग़ों और पानी के सोतों, (147)
खेतों और फलों से लदे हुए खजूर के पेड़ों के बीच--- (148)
और पहाड़ों को काट-काटकर नफ़ासत से बनाए हुए घरों के
बीच (क्या सदा के लिए रहोगे) ? (149)
अतः हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा
मानो : (150)
और उन मर्यादा को तोड़नेवालों का कहना बिल्कुल न मानो, (151)
जो धरती में गड़बड़ी फैलाते रहते हैं, बजाय इसके कि
चीज़ों को सुधारते व सही काम करते।" (152)
उन्होंने कहा, "तुम पर तो जादू कर
दिया गया है! (153)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही
जैसे एक आदमी हो। अगर तुम सच बोल रहे हो तो कोई निशानी दिखाओ।" (154)
सालेह ने कहा, "(ठीक है,लो) यह ऊँटनी है, पानी पीने की
बारी इसकी अलग होगी, और तुम्हारी बारी अलग होगी, और हर एक के लिए
पीने का एक नियत दिन होगा. (155)
सो देखना, उस (ऊँटनी) को कोई नुक़सान नहीं होना चाहिए, अन्यथा एक बड़े
भयानक दिन की यातना तुम्हें आ पकड़ेगी।" (156)
मगर उनलोगों ने उसके पाँव की कूचें [hamstring] काट डालीं। सुबह
में वे(अपनी ग़लती पर) पछताते रह गए : (157)
यातना ने उन्हें आ दबोचा था। सचमुच ही इसमें एक बड़ी
निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (158)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है.
(159)
लूत[Lot] की क़ौम के लोगों ने भी रसूलों को झुठा बताया. (160)
उनके भाई लूत ने उनसे कहा, "क्या तुम अपने
ध्यान में अल्लाह के हर समय होने का अहसास नहीं रखोगे? (161)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (162)
हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा
मानो. (163)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा
इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (164)
क्या दूसरे लोगों से तुम अलग-थलग हो कि (सेक्स के लिए)
मर्दों के पास जाते हो, (165)
और अपनी पत्नियों को तुमने छोड़ रखा है, जिन्हें अल्लाह
ने तुम्हारे लिए पैदा किया है ? तुम तो सारी सीमाएं तोड़ रहे हो।" (166)
मगर उनलोगों ने जवाब दिया, " ऐ लतू! अगर तुम
ने सचमुच अपनी बातें बंद नहीं कीं, तो तुम्हें
अवश्य ही निकाल बाहर किया जाएगा।" (167)
सो लूत ने कहा, "जो हरकत तुम करते
हो, उससे मुझे नफ़रत है : (168)
ऐ मेरे रब! जो कुछ ये करते हैं, उससे मुझे और
मेरे परिवार के लोगों को बचा ले।" (169)
फिर हमने उसे और उसके परिवार के सारे लोगों को बचा
लिया; (170)
सिवाय एक बुढ़िया के जो पीछे रह जानेवालों में थी, (171)
फिर दूसरे सभी लोगों को हमने बर्बाद कर दिया, (172)
और हमने उनपर एक तबाहीवाली बारिश बरसाई--- और कितनी भयानक
बारिश थी वह, उनलोगों के लिए जिन्हें पहले सावधान किया जा चुका था ! (173)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर
लोग विश्वास नहीं करते : (174)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है.
(175)
अल-ऐका[जंगल में
रहनेवालों] ने भी रसूलों को झुठा कहा. (176)
शुऐब ने उनसे कहा, "क्या तुम अपने
ध्यान में अल्लाह के हर समय होने का अहसास नहीं रखोगे? (177)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (178)
हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, और मेरा कहा
मानो. (179)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा
इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है. (180)
नाप-तौल के मुताबिक़ पूरा दिया करो : दूसरों को बेचते समय
(नाप से) कम न दो. (181)
सही व ठीक तराज़ू से तौलो: (182)
लोगों को उनकी चीज़ों में कमी कर के न दो. धरती पर गड़बड़ी व लूटमार[corruption] न मचाओ. (183)
हर समय अल्लाह के मौजूद होने का अहसास रखो, जिसने तुम्हें
और पिछली नस्लों को पैदा किया", (184)
मगर उनलोगों ने जवाब दिया, "तुम पर तो जादू
कर दिया गया है ! (185)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही
जैसे एक आदमी हो। असल में तो हम तुम्हें झूठा समझते हैं. (186)
अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हम पर आकाश
का कोई टुकड़ा ही गिरा के दिखा दो।" (187)
शुऐब ने कहा, " मेरा रब अच्छी
तरह से जानता है जो कुछ तुम करते हो।" (188)
उनलोगों ने उसे झुठा कहा, और इस तरह
छायावाले दिन की यातना ने उन्हें आ दबोचा--- वह एक बड़े भयानक
दिन की यातना थी! (189)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर
लोग विश्वास नहीं करते : (190)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है.
(191)
सचमुच इस क़ुरआन को सारे संसार के रब ने उतार भेजा है : (192)
एक भरोसेमंद रूह [जिबरईल] इसे लेकर आए, (193)
और इसको आपके दिल पर [ऐ रसूल] उतारा गया, ताकि आप चेतावनी
दे सकें, (194)
साफ़ अरबी ज़बान में. (195)
यह पिछले धर्मों की आसमानी
किताबों में पहले ही बता दिया गया था. (196)
क्या उनके लिए यह सबूत काफ़ी नहीं कि इसराईल की संतानों में पढ़े-लिखे लोगों ने इसे पहचान लिया है? (197)
अगर हम इसे किसी ऐसे आदमी पर उतारते, जो अरब का न
होता, (198)
और वह इसे पढ़कर उन्हें सुनाता, तब भी उनलोगों
ने इस पर विश्वास नहीं किया होता. (199)
इस तरह, हम ने अपराधियों के दिलों में ये बातें डाल दीं, जो उनके दिल से
होती हुई सीधे गुज़र जाती हैं, (200)
वे उस वक़्त तक इस में विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि
दर्दनाक यातना ख़ुद न देख लें, (201)
फिर वह (यातना) अचानक उन पर आ जाएगी, और उन्हें इसके
आने की ख़बर तक न होगी, (202)
और तब वे कहेंगे, "क्या हमें कुछ
मुहलत मिल सकती है?" (203)
तो फिर कैसे यह लोग माँग करते हैं कि हमारी यातना उन तक
जल्दी से जल्दी ले आयी जाए ? (204)
ज़रा सोचो, अगर हम उन्हें इस जीवन में कुछ सालों तक मज़ा उठाने
दें ; (205)
फिर उन पर वह यातना आ जाए, जिससे उन्हें
डराया जाता है; (206)
तो जो सुख(पहले) उन्हें मिला होगा, उसका उन्हें
क्या फ़ायदा होगा ? (207)
हमने कभी भी किसी बस्ती को उस वक़्त तक तबाह बर्बाद
नहीं किया, जब तक कि पहले रसूलों को उनके
पास सावधान करने के लिए नहीं भेज दिया, (208)
जो हमारी तरफ़ से उन्हें याद
दिला दें [reminder] : हम कभी ना-इंसाफ़ी नहीं करते
हैं. (209)
वह कोई जिन्न [या शैतान] नहीं है जो इस क़ुरआन को लेकर उतरा है :(210)
न तो वे इस काम के लायक़ हैं, और न ही उन्हें ऐसा करने की शक्ति है, (211)
सच तो यह है कि वे इसके सुनने
से भी दूर रखे गए हैं. (212)
अतः [ऐ रसूल] आप अल्लाह के अलावा दूसरे ख़ुदाओं को कभी
न पुकारें, अन्यथा आप भी सज़ा पानेवालों में
होंगे, (213)
और अपने नज़दीकी नातेदारों को
सावधान कर दें, (214)
और जो भी विश्वास रखनेवाले आपके
रास्ते पर चलते हैं, उनके लिए स्नेह दिखाते हुए अपने
कंधे झुका दें. (215)
अगर वे आपकी आज्ञा न मानें,
तो कह दें, "जो कुछ तुम करते हो, उसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं
हूँ।" (216)
उस प्रभुत्वशाली और बेहद दया
करनेवाले पर भरोसा रखें, (217)
जो आपको देख रहा होता है,
जब आप (नमाज़ के लिए) खड़े होते हैं (218)
और जब सजदे में झुकनेवालों के
पास आते-जाते हैं : (219)
वह सब कुछ सुनता है,
सब जानता है. (220)
क्या मैं बताऊँ कि शैतान किन
लोगों पर उतरते हैं? (221)
वे हर ढोंग रचनेवाले झूठे व
गुनाहगार पर उतरते हैं, (222)
जो सुनी सुनायी बातों पर कान
लगाते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं: (223)
और कवियों के पीछे तो केवल वही
लोग चलते हैं जिन्होंने अपने आपको ग़लतियों में गुम कर लिया हो।- (224)
क्या तुमने देखा नहीं कि वे हर
घाटी में बेमक़सद भटकते फिरते हैं ; (225)
और ये कि, वह जो बात कहते हैं, करते नहीं?
- (226)
हाँ,
उन (कवियों) की बात अलग है जो (रसूल की बातों में)
विश्वास करते हैं, अच्छे कर्म करते हैं,
और अल्लाह को अक्सर याद करते हैं, और जब भी बदमाशों ने उन पर निशाना साधा, तो(कविता के द्वारा) वे अपना बचाव करते हैं. शैतानियाँ करनेवालों को जल्द ही
पता चल जाएगा कि वे किस अंजाम की तरफ़ लौट कर जानेवाले हैं. (227)
सूरह 27 : अन- नम्ल [चीटियाँ, The Ants]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰।
ये आयतें हैं क़ुरआन की ---- एक ऐसी किताब की, जो चीज़ों को
स्पष्ट कर देती है; (1)
ईमान रखनेवालों को सही रास्ता दिखानेवाली और खुशख़बरी
सुनानेवाली, (2)
(ईमानवाले वे हैं) जो नमाज़ को पाबंदी से अदा करते हैं, और (ज़रूरतमंदों
को) ज़कात [alms] देते हैं, और आनेवाले जीवन[आख़िरत, परलोक] में
पक्का विश्वास रखते हैं . (3)
रहे वे लोग जो आनेवाले जीवन [Hereafter] में विश्वास नहीं
रखते, उनकी नज़रों में हमने उनके कर्मों को बड़ा लुभावना बना दिया
है, अतः वे (अंधों की तरह) भटकते फिरते हैं : (4)
यही वे लोग हैं, जिनके लिए बहुत
बुरी यातना होगी, और वे आनेवाले जीवन में सबसे ज़्यादा नुक़सान उठानेवालों में
रहेंगे. (5)
निश्चय ही [ऐ रसूल] आप इस क़ुरआन को पा रहे हैं, उस (अल्लाह) की
तरफ़ से जो बड़े ही ज्ञानवाला, और सब जाननेवाला है. (6)
याद करो जब मूसा[Moses] ने अपने घरवालों से कहा
"मैंने एक आग-सी देखी है। मैं वहाँ से (रास्ते की) कोई ख़बर लेकर आता
हूँ, या तुम्हारे लिए कोई जलती हुई
लकड़ी लेकर आता हूँ, ताकि तुम अपने आपको गरमा
सको।" (7)
फिर जब वह आग के नज़दीक पहुँचे, तो एक आवाज़ ने उन्हें पुकारा
"बरकतवाला[Blessed] है वह, जो इस आग के नज़दीक है, और वह भी[फ़रिश्ते] जो इसको
घेरे हुए हैं; महान है अल्लाह, सारे संसार का रब! (8)
ऐ मूसा! मैं अल्लाह हूँ, अत्यन्त प्रभुत्वशाली, बहुत ज्ञान वाला ! (9)
अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" जब मूसा ने देखा कि वह
(लाठी) हिल-डुल रही है जैसे कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर न देखा। (फिर आवाज़
आयी) "ऐ मूसा, डरो नहीं! मेरी मौजूदगी में
रसूलों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं, (10)
मैं सचमुच बड़ा माफ़ करनेवाला, और बहुत दया करनेवाला हूँ उन
लोगों पर, जो ग़लती करते हैं, और फिर की गयी बुराई को अच्छाई
में बदल देते हैं. (11)
अपना
हाथ गिरेबान में डालो, और फिर (बाहर निकालो) तो वह
बिना किसी ख़राबी के सफ़ेद चमकता हुआ बाहर निकलेगा। यह(दो निशानियाँ) उन
नौ(9)निशानियों में से हैं जिन्हें फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सामने जाकर आपको दिखाना
होगा; वे सचमुच हद से आगे बढ़ हुए
हैं। " (12)
मगर जब आँखें खोल देनेवाली हमारी निशानियाँ उनके पास आयीं, तो उन्होंने कहा, "यह तो साफ़ तौर से
जादू मात्र है ! " (13)
हालाँकि उन्होंने दिल में इन (निशानियों) को सच जाना था, मगर उनलोगों ने
शैतानी और घमंड के कारण उसे मानने से इंकार कर दिया। अब देख लो इन गड़बड़ी[corruption] फैलानेवालों का
परिणाम क्या हुआ? (14)
हमने दाऊद[David] और सुलैमान[Solomon] को बहुत ज्ञान
दिया था, (उन्होंने उसके महत्व को समझा) और उन दोनों ने कहा था, "सारी प्रशंसा
अल्लाह की, जिसने अपने बहुत-से ईमानवाले बन्दों में हम पर ख़ास तौर से
मेहरबानी[favour] की।" (15)
दाऊद के बाद सुलैमान उनका वारिस हुआ. उसने कहा, "ऐ लोगो! हमें
चिड़ियों की बोली सिखायी गई है, और हमें हर चीज़ में हिस्सा दिया गया है : यह सचमुच
(अल्लाह की) ख़ास मेहरबानी है।" (16)
(एक बार) सुलैमान के सामने जिन्नों, आदमियों और
चिड़ियों से तैयार की हुई सेना एक ख़ास वरीयता के अनुसार क़तारों में खड़ी [marshalled] की गई, (17)
और जब सेना चींटियों की घाटी में पहुँची, तो एक चींटी ने
कहा, "ऐ चींटियों! अपने अपने घरों में घुस जाओ। कहीं सुलैमान और
उसकी सेना तुम्हें अंजाने में कुचल ही न डालें ।" (18)
सुलैमान उसकी बात सुनकर ज़ोर से मुस्कराए और कहा, "मेरे रब! मुझ में
ऐसा गुण दे दे कि जो नेमतें[blessings] तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को दी हैं, मैं उनका शुक्र
अदा करता रहूँ, और यह कि अच्छे कर्म करूँ जिसे तू ख़ुश हो जाए ; और अपने करम से
मुझे अपने नेक व अच्छे बन्दों के दर्जे में शामिल कर ले ।"(19)
(एक बार) सुलैमान ने चिड़ियों की उपस्थिति की जाँच की
और कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद[Hoopoe] को नहीं देख रहा
हूँ ?, क्या वह यहाँ हाज़िर नहीं? (20)
अगर उसने अपने यहाँ मौजूद न होने का कोई सही कारण न बताया, तो मैं उसे कठोर
दंड दूँगा या उसे मार ही डालूँगा।"(21)
लेकिन हुदहुद ने बाहर
में ज़्यादा देर नहीं लगायी: उसने (आकर) कहा, "मुझे कुछ ऐसी बात
पता चली है जो आपको मालूम नहीं है : मैं सबा[Sheba] से आपके पास एक
पक्की ख़बर लेकर आया हूँ. (22)
मैंने वहाँ एक औरत को उन लोगों पर शासन करते हुए पाया, जिसे हर चीज़ का
एक हिस्सा दिया गया है---- उसका एक ज़बरदस्त सिंहासन है--- (23)
(मगर) मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को अल्लाह के बजाए
सूरज की पूजा करते हुए पाया। शैतान ने उनपर कुछ ऐसा किया है कि उन लोगों को
अपने(बुरे) कर्म बहुत भले मालूम होते हैं, और उन्हें सही
मार्ग से भटका रखा है : वे सही मार्ग पर नहीं चल सकते। (24)
क्या उन्हें उस अल्लाह की इबादत नहीं करनी चाहिए, जो आसमानों और
ज़मीन में कहीं भी दबी-छिपी चीज़ें बाहर निकाल लाता है, और वह जानता है—उसे भी जो कुछ तुम छिपाते हो और उसे भी जो कुछ तुम सामने
बता देते हो ? (25)
वह अल्लाह है, उसके सिवा कोई
पूजने के लायक़ नहीं, ज़बरदस्त सिंहासन का मालिक है।" (26)
सुलैमान ने कहा, " हम देखेंगे कि
तू सच कह रहा है या झूठ बोल रहा है . (27)
मेरा यह ख़त लेकर जा, और इसे उन लोगों
तक पहुँचा दे, फिर उनके पास से अलग हट जाना, और देखना कि वे
क्या जवाब भेजते हैं।" (28)
सबा की मल्लिका
ने कहा, "ऐ सरदारो! एक बड़ा ही शानदार ख़त मेरे पास भेजा गया है. (29)
वह सुलैमान की तरफ़ से है और उसमें यूँ लिखा है, “ अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा मेहरबान, अत्यन्त दयावान
है, (30)
अपने आपको मुझ से ऊपर न समझो, और मेरे पास चली
आओ (अल्लाह के सामने) झुकते हुए ।" (31)
सबा की रानी ने कहा, "ऐ सरदारो! मेरे
सामने जो मामला आया है, इस पर आप मुझे सही सलाह दें : (आप तो जानते हैं कि) मैं
सारे मामलों का फ़ैसला हमेशा आप लोगों की मौजूदगी में ही करती हूँ।" (32)
उन्होंने जवाब दिया, "हमारी सेना बहुत
तगड़ी है और हम पूरी ताक़त से युद्ध लड़ते हैं, मगर कमान तो
आपके हाथ में है, अतः आप सोच लें कि आपको क्या आदेश देना है।" (33)
सबा की रानी ने कहा, " जब भी कभी राजा
किसी शहर में (सेना के साथ) घुसते हैं, तो उसे खंडहर
बना देते हैं और वहाँ के सरदारों को अपमानित करते हैं ---- वे भी ऐसा ही करेंगे. (34)
मगर मैं उनके पास एक
तोहफ़ा भेजने जा रही हूँ; फिर देखती हूँ कि मेरे दूत क्या उत्तर लेकर लौटते
हैं।" (35)
फिर जब वह दूत सुलैमान के पास पहुँचा, तो सुलैमान ने उससे कहा, "क्या! तुम क्या मुझे
धन-दौलत देना चाहते हो?
जो कुछ अल्लाह ने मुझे दे रखा है वह उससे कहीं उत्तम है, जो उसने तुम्हें दिया
है,
मगर तब भी तुम लोग अपने इस तोहफ़े से बड़े ख़ुश मालूम होते हो!(36)
अपने लोगों के पास
वापस चले जाओ : अब हम उन पर ज़रूर अपनी सेना के साथ चढ़ायी करेंगे जिसे रोक पाना
उनके बस का नहीं, उन्हें अपमानित करके
व नीचा दिखाते हुए हम उन्हें उस ज़मीन से खदेड़ देंगे ।"(37)
फिर सुलैमान ने कहा, "ऐ सरदारो! इससे पहले
कि वे लोग हमारे पास झुके हुए आएँ, तुममें से कौन है जो उस(रानी) का सिंहासन लेकर मेरे
पास आ सकता है?" (38)
एक ताक़तवर और चालाक
जिन्न ने जवाब दिया "
इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठें, मैं उस(सिंहासन) को आपके पास ले आऊँगा।मैं मज़बूत भी
हूँ, और भरोसे के लायक़
भी।" (39)
मगर उनमें से एक आदमी
जिसे आसमानी किताब का ज्ञान था, कहने लगा, "मैं पलक झपकते
ही उसे आपके पास ले आऊँगा।"
फिर जब सुलैमान ने उस सिंहासन को अपने पास रखा हुआ
देखा तो कहा, "यह मेरे रब का मुझ पर एहसान है, ताकि वह मेरी
परीक्षा करे कि मैं उसका शुक्र अदा करता हूँ या नहीं : अगर कोई शुक्र अदा
करता है तो वह अपने ही फ़ायदे के लिए करता है, और अगर कोई उसका
शुक्र अदा नहीं करता, तो मेरा रब किसी पर निर्भर तो नहीं, बल्कि देने में
वह बड़ा उदार[generous] है।" (40)
फिर उसने कहा, "उसके सिंहासन का
रूप बदल दो, फिर देखेंगे कि वह उसे पहचान पाती है या नहीं।" (41)
जब सबा की रानी वहाँ पहुँचीं तो उनसे पूछा गया, "क्या यह सिंहासन
आपका है?" उसने कहा, "हाँ, देखकर लगता तो है”, (सुलैमान ने
कहा), “हमें तो इस रानी से पहले ही ज्ञान दे दिया गया था और हम
अल्लाह के सामने भक्ति-भाव से झुकते थे"; (42)
मगर चूँकि अल्लाह के
बजाए वह किसी और को [सूरज को] पूजती थी, इसलिए (अल्लाह में) विश्वास रखने [ईमान] से रानी अब तक रुकी रही थी, असल में वह एक
इंकार करनेवाली[काफ़िर] क़ौम में से थी.(43)
फिर सबा की रानी से कहा गया, "महल में
दाख़िल हों ।" मगर जब उसने वहाँ देखा, तो उसे ऐसा लगा
कि पानी का एक गहरा हौज़ है और इसीलिए वह (अपने पाँव का कपड़ा उठाते हुए) नंगे पैर
हो गयी। सुलैमान ने समझाया, "यह तो बस शीशे से बना हुआ महल है।" रानी बोली, "ऐ मेरे रब!
निश्चय ही मैंने(अब तक ग़लती करके) अपने आप पर ज़ुल्म किया : अब मैं, सुलैमान के साथ
पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकती हूँ, जो सारे संसार का
रब है।" (44)
समूद के लोगों की ओर हमने उनके भाई, सालेह, को यह कहते हुए
भेजा कि "केवल अल्लाह की बन्दगी करो, " मगर वे
लोग दो विरोधी गुटों में बँट गए. (45)
सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के
लोगो, तुम अच्छाई के बदले बुराई को ले आने की जल्दी क्यों मचा रहे
हो? तुम अल्लाह से (अपनी ग़लतियों की) माफ़ी क्यों नहीं मांगते, ताकि तुमपर दया
की जा सके।" (46)
लोगों ने कहा, "हम तुम्हें और
तुम्हारे माननेवालों को ‘बुरा शगुन’[ evil omen] समझते हैं।" सालेह ने जवाब दिया, "कोई भी शगुन जो
तुम देखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह ही करेगा : असल में तुम लोगों की परीक्षा ली जा रही है।" (47)
उस शहर में नौ(9) लोग ऐसे थे जो ज़मीन पर गड़बड़ी[corruption] फैलाते रहते थे, और ग़लत चीज़ों को
सुधारते न थे. (48)
वे बोले, “ क़सम अल्लाह की :
हम सालेह और उसके घरवालों पर रात के समय हमला करेंगे, फिर उसके वारिस
(परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के विनाश के समय वहाँ मौजूद ही नहीं थे।
और यह कि हम सच बोल रहे हैं।" (49)
इस तरह उन्होंने एक शैतानी योजना बनायी थी, मगर एक योजना तो
हमने भी बनायी जिसकी उन्हें कोई ख़बर तक न थी. (50)
अब देखो कि उनकी चालों का कैसा अंजाम हुआ : हमने उन्हें और
उनके सभी लोगों को पूरी तरह से तबाह-बर्बाद करके रख दिया. (51)
यह उनके कुकर्मों का नतीजा है कि आज भी उनके घर उजाड़ खंडहर
के रूप में पड़े हुए हैं--- सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है, उन लोगों के लिए
जो जानते हैं---- (52)
मगर हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान रखते थे और हर तरह
की बुराइयों से बचते थे. (53)
हमने लूत[Lot] को भी उनकी क़ौम
के लोगों के पास (पैग़म्बर बना कर) भेजा, उसने अपनी क़ौम
के लोगों से कहा, "कैसे खुली आँखों देखते हुए भी तुम ऐसे अश्लील कर्म करते हो? (54)
कैसे तुम (सेक्स के लिए) औरतों को छोड़कर मर्दों के पीछे
जाते हो? कैसे जाहिल लोग हो तुम!" (55)
उनके लोगों ने इस बात का एक ही जवाब दिया, और कहा, "अपनी बस्ती से
निकाल बाहर करो लूत के माननेवालों को! ये लोग (सेक्स के मामले में) बहुत पवित्र
बनते हैं !" (56)
फिर हमने उन्हें और उनके परिवारवालों को तो बचा लिया----
केवल उनकी पत्नी को छोड़कर जिसे हमने तय कर रखा था कि वह पीछे रह जानेवालों में से
होगी--- (57)
और हमने उनपर एक ज़बरदस्त बारिश बरसाई. और कैसी भयानक बारिश
थी वह, जो उन लोगों पर बरस पड़ी जिन्हें सावधान किया जा
चुका था! (58)
[ऐ रसूल] कह दें, "प्रशंसा तो
अल्लाह के लिए है और सलामती हो उसके उन बन्दों पर जिन्हें उसने(पैग़म्बरके रूप में)
चुन लिया। बताओ कौन बेहतर है : अल्लाह बेहतर है या वे जिनको उन लोगों ने
अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार[Partners] ठहरा रखा है ? (59)
आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया ? आसमान से तुम्हारे लिए पानी कौन बरसाता है--- जिसकी मदद से हम ने
ख़ुशनुमा बाग़ उगा दिए: तुम्हारे बस का नहीं था कि तुम उनमें पेड़ों को उगा पाते---
क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर कुछ लोग हैं
जो दूसरों को अल्लाह के बराबर का ठहराते हैं ! (60)
कौन है जिसने धरती को रहने की एक स्थायी जगह बनायी, और किसने उसके
बीच से नदियाँ बहा दीं ? किसने इस पर ऐसे पहाड़ जमा दिए जो हिल नहीं सकते और किसने
दो समंदरों के बीच एक आड़ बना दी ? क्या अल्लाह के
अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर अधिकतर लोग जानते ही नहीं! (61)
कौन है वह जो परेशानी में
घिरे हुए लोगों की पुकार सुनकर जवाब देता है ? कौन उनकी
तकलीफ़ों को दूर करता है ? कौन तुम्हें धरती पर उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा,successors] बनाता है? क्या अल्लाह के
अलावा कोई और ख़ुदा है? तुम कोई ध्यान ही नहीं देते! (62)
कौन है जो थल और जल के अँधेरों में भी तुम्हें रास्ता
दिखाता है ? कौन है जो अपनी रहमत (बारिश) भेजने से पहले हवाओं को (बारिश
की) ख़ुशख़बरी ले कर भेजता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? अल्लाह के अलावा
वे जिनको उसका साझेदार[Partners] ठहराते हैं, अल्लाह उनसे
कहीं ऊँचा व महान है ! (63)
कौन है जो (हर चीज़ को पैदा करके) जीवन देता है, और फिर उसको
दोबारा पैदा करता है? कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है? क्या अल्लाह के
साथ कोई और भी ख़ुदा है? (फिर भी अगर नहीं मानते, तो) कहें, "अगर तुम अपनी बात
में सच्चे हो, तो इसका कोई प्रमाण ले आओ।" (64)
कहें, " अल्लाह को छोड़कर, आसमानों और ज़मीन
में कोई नहीं जिसे(सामान्य बुद्धि से परे) अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों की जानकारी हो.” वे नहीं जानते कि मुर्दा पड़े हुए लोग कब दोबारा उठाए जाएँगे
: (65)
वे अपने ज्ञान से आख़िरत [परलोक] के बारे में नहीं समझ सकते; वे इसके बारे
में संदेह में पड़े हैं, बल्कि वे (शक में) अंधे हो चुके हैं. (66)
सो जिन लोगों ने इंकार किया[काफ़िर], वे कहते हैं, "क्या! जब
हम और हमारे बाप-दादा (मर के) धूल-मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या वास्तव
में हमें (ज़िंदा करके) उठाया जाएगा? (67)
ऐसे वादों के बारे में हमलोगों ने पहले भी सुन रखा है, और हमारे
बाप-दादाओं ने भी। ये तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (68)
[ऐ रसूल] आप कहें "ज़मीन पर यहाँ वहाँ घूमो-फिरो और देखो
कि शैतानियाँ करनेवालों का कैसा अंजाम हुआ।" (69)
[ऐ रसूल] आप उन लोगों के लिए दुखी न हों; और न उनकी
मक्कारी की चालों से परेशान हों। (70)
वे यह भी कहते हैं, "अगर तुम्हारी बात
सच है, तो यह बताओ कि यह वादा कब पूरा होगा ?" (71)
कह दें, "जिस चीज़ के आने की तुम जल्दी मचा रहे हो, बहुत सम्भव है कि
उसका कोई हिस्सा तुम्हारे बिल्कुल पास आ लगा हो।" (72)
निश्चय ही तुम्हारा रब तो लोगों पर बहुत उदार है, मगर सच यह है कि
उनमें से अधिकतर लोग शुक्र अदा नहीं करते. (73)
वह हर उस चीज़ को
जानता है जो लोगों के सीनों में छिपी होती हैं, और हर वह चीज़ भी
जानता है जो वे सामने बता देते हैं : (74)
आसमानों या ज़मीन पर छिपी हुई कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो एक
स्पष्ट किताब में लिखी हुई न हो. (75)
सच्चाई यह है कि यह क़ुरआन इसराईल की सन्तानों को ऐसी
अधिकतर बातें स्पष्ट कर देती है जिनके विषय में वे[यहूदी व ईसाई] मतभेद रखते हैं. (76)
और इसमें शक नहीं कि यह ईमानवालों के लिए सही रास्ता
दिखानेवाली है, और रहमत है. (77)
निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच अपने ज्ञान से फ़ैसला कर
देगा---- वह बड़ी ताक़तवाला, सब कुछ जानने वाला है--- (78)
अतः [ऐ रसूल], आप अल्लाह पर
भरोसा रखें, आप बिल्कुल सच्चे व सही रास्ते पर हैं. (79)
आप मरे हुए आदमी को अपनी बात नहीं सुना सकते, और न बहरों को
अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेर कर चले जा रहे हों, (80)
और न आप अंधों को उनकी गुमराही से बचाकर राह पर ला सकते हैं
: आप किसी को भी अपनी बात नहीं सुना सकते सिवाय उसके, जो हमारी
आयतों[निशानियों] में विश्वास रखता हो, और हमारे सामने
पूरी भक्ति से झुकता हो । (81)
जब उनलोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो जाएगा, तब हम धरती में
से एक जानवर सामने लाएँगे जो उन्हें बता देगा कि वे लोग हमारी आयतों पर विश्वास
नहीं करते थे. (82)
एक दिन आएगा जब हम प्रत्येक समुदाय में से ऐसे लोगों का एक
गिरोह जमा करेंगे, जिन लोगों ने हमारी आयतों को
झूठ जानकर विश्वास नहीं किया, फिर उन्हें अलग अलग समूहों में ले जाया जाएगा, (83)
यहाँ तक कि वे (अल्लाह के) सामने पहुँच जाएँगे, तो फिर अल्लाह
कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों[संदेशों] को बिना ठीक से समझे-बूझे
ही मानने से इंकार कर दिया ? या फिर तुम कर क्या रहे थे ?" (84)
फिर उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला कर दिया जाएगा, क्योंकि उनलोगों
ने सख़्त ग़लतियाँ की थीं: वे कुछ बोल नहीं पाएंगे. (85)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके आराम करने लिए
(अँधेरी) रात बनायी है, और दिन को उजालेवाला बनाया (ताकि काम-काज हो सके)? सचमुच इसमें उन
लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो ईमान रखते हैं.? (86)
और जिस दिन नरसिंघे[Trumpet] को फूँक मारकर
बजा दिया जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन पर बसनेवाला हर एक बुरी तरह डर
जाएगा---- सिवाय उनके जिन्हें अल्लाह चाहे --- और सब अपनी गर्दन झुकाए हुए
उसके सामने हाज़िर होंगे. (87)
तुम पहाड़ों को देखोगे, तो तुम्हें लगेगा
कि वे मज़बूती से जमे हुए हैं, मगर वे (उस समय) बादलों की तरह उड़ते फिरेंगे: यह सब
अल्लाह की कारीगरी है, जिसने सारी चीज़ों को एकदम सही व सटीक बनाया है। तुम
जो भी करते हो, वह उसकी पूरी ख़बर रखता है : (88)
जो कोई भी अच्छे कर्म लेकर आएगा, तो बदले में उसको
उससे भी अच्छा इनाम मिलेगा, और वह उस दिन के ख़ौफ़ से बचा रहेगा, (89)
मगर जो कोई भी बुरे कर्मों को लेकर आया, तो ऐसे लोगों को
मुँह के बल आग में डाल दिया जाएगा। (और उनसे पूछा जाएगा) "जो कुछ (दुनिया
में) तुम करते रहे थे, क्या तुम उन्हीं चीज़ों का बदला पा रहे हो या किसी और चीज़
का ?" (90)
[ऐ रसूल आप कह दें] मुझे जो करने का आदेश मिला है, वह यह है कि मैं
इस नगर (मक्का) के रब की बन्दगी करूँ, जिसने इस(पवित्र
नगर) को कभी न मिटनेवाली इज़्ज़त दी है। हर चीज़ उसी की है; और मुझे आदेश
मिला है कि मैं उनलोगों में से रहूँ जो उस (अल्लाह) के सामने पूरी भक्ति से झुके
रहते हैं; (91)
मुझे यह हुक्म हुआ है कि मैं क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ.” जो कोई भी सीधे
रास्ते पर चलना पसंद करता है, तो वह ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करता है। और जो कोई
भी इस[सीधे रास्ते] से भटकता है, उससे कह दें, "मैं तो बस सावधान
ही करनेवाला हूँ।" (92)
और कहें, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है : जल्द ही वह तुम्हें
अपनी निशानियाँ दिखा देगा और तुम उन्हें पहचान लोगे.” और जो कुछ तुम सब
करते हो, तुम्हारा रब उससे कभी भी बेख़बर नहीं है ।" (93)