Chronological Quran : 1st Year of Revelation
[August17, 610 AD --- November23, 610 AD]
क़ुरआन : कालक्रम के अनुसार : पहले वर्ष में उतरी आयतें
[रमज़ान 21, 13 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 30, 13 हिजरी पूर्व]
उसने पैदा किया इंसान को (माँ के पेट में जोंक की तरह) सटे हुए ख़ून के लोथड़े से। (2)
पढिये! कि आपका रब सबसे अधिक करम करनेवाला [Bountiful] है (3)
जिसने कलम के सहारे (लिखने पढ़ने का) ज्ञान सिखाया, (4)
जिसने इंसान को वह (कुछ) सिखा दिया जो वह नहीं जानता था। (5)
क्योंकि उसने अपने आपको (दुनिया में) आज़ाद समझ लिया है जो किसी पर निर्भर नहीं है : (7)
[ऐ रसूल], सबको आपके रब के ही पास लौटकर जाना है। (8)
क्या आपने उस आदमी को देखा जो रोकता है, (9)
(हमारे) बंदे को जब वह नमाज़ पढ़ता है? (10)
या वह (लोगों को) बुराइयों से बचने व नेक काम करने को प्रोत्साहित करता हो (तो क्या ऐसे आदमी को रोकना उचित है)? (12)
अब बताइए! अगर वह (रोकने वाला) सच्चे धर्म को मानने से इंकार करता हो, और उससे मुँह मोड़ता हो? (13)
क्या वह नहीं समझता कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है? (14)
ख़बरदार! अगर उसने अपने को (रसूल की बेइज़्ज़ती और सच्चे धर्म से दुश्मनी करने से) नहीं रोका, तो हम ज़रूर (उसे नरक में) माथे के बल पकड़ कर घसीटेंगे----- (15)
वह माथे जो झूठे (और) गुनाहगार हैं। (16)
अब वह अपने साथियों को (सहायता के लिए) बुला ले; (17)
हम भी नरक के रक्षकों को बुला लेंगे। (18)
हरगिज़ नहीं! आप [ऐ रसूल] उसकी बात न मानें : सजदे में सर झुकाते रहें और (हमसे ज़्यादा) क़रीब होते जाएं। (19)
[August17, 610 AD --- November23, 610 AD]
क़ुरआन : कालक्रम के अनुसार : पहले वर्ष में उतरी आयतें
[रमज़ान 21, 13 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 30, 13 हिजरी पूर्व]
(1) सूरह 96 : अल अलक़
[सटे हुए ख़ून का लोथड़ा, The Clinging Form]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] पढिये! अपने रब का नाम लेकर जिसने (हर चीज़ को) पैदा किया : (1)
उसने पैदा किया इंसान को (माँ के पेट में जोंक की तरह) सटे हुए ख़ून के लोथड़े से। (2)
पढिये! कि आपका रब सबसे अधिक करम करनेवाला [Bountiful] है (3)
जिसने कलम के सहारे (लिखने पढ़ने का) ज्ञान सिखाया, (4)
जिसने इंसान को वह (कुछ) सिखा दिया जो वह नहीं जानता था। (5)
(लेकिन) सच्चाई यह है कि इंसान (बुराइयों की) सभी हदों को तोड़ डालता है (6)
क्योंकि उसने अपने आपको (दुनिया में) आज़ाद समझ लिया है जो किसी पर निर्भर नहीं है : (7)
[ऐ रसूल], सबको आपके रब के ही पास लौटकर जाना है। (8)
क्या आपने उस आदमी को देखा जो रोकता है, (9)
(हमारे) बंदे को जब वह नमाज़ पढ़ता है? (10)
भला देखिए अगर वह (नमाज़ पढने वाला) सीधे मार्ग पर हो, (11)
या वह (लोगों को) बुराइयों से बचने व नेक काम करने को प्रोत्साहित करता हो (तो क्या ऐसे आदमी को रोकना उचित है)? (12)
अब बताइए! अगर वह (रोकने वाला) सच्चे धर्म को मानने से इंकार करता हो, और उससे मुँह मोड़ता हो? (13)
क्या वह नहीं समझता कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है? (14)
ख़बरदार! अगर उसने अपने को (रसूल की बेइज़्ज़ती और सच्चे धर्म से दुश्मनी करने से) नहीं रोका, तो हम ज़रूर (उसे नरक में) माथे के बल पकड़ कर घसीटेंगे----- (15)
वह माथे जो झूठे (और) गुनाहगार हैं। (16)
अब वह अपने साथियों को (सहायता के लिए) बुला ले; (17)
हम भी नरक के रक्षकों को बुला लेंगे। (18)
हरगिज़ नहीं! आप [ऐ रसूल] उसकी बात न मानें : सजदे में सर झुकाते रहें और (हमसे ज़्यादा) क़रीब होते जाएं। (19)
(2) सूरह 68 : अल क़लम (क़लम / The Pen)
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
”नून”
क़सम है कलम की, और उन (विषयों) की जो वे (फरिश्ते) लिखते हैं! (1)
[ऐ रसूल!] आपके रब की कृपा से आप (हरगिज़) दीवाने नहीं हैं : (2)
बेशक आप के लिए ऐसा इनाम है जो कभी समाप्त नहीं होने वाला ---- (3)
सचमुच आप बेहतरीन और मज़बूत चरित्र के मालिक हैं ---- (4)
सो बहुत जल्द आप (भी) देख लेंगे और वे (भी) देख लेंगे, (5)
कि तुम में से कौन है जो दीवानेपन से ग्रसित है. (6)
आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसकी सीधी राह से भटक गया है, और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया है। (7)
अत: आप उनलोगों के दबाव में न आएं, जो इस (सच्चाई) को झूठ मानते हुए इससे इंकार करते हैं, ---- (8)
वे तो चाहते हैं कि (धर्म के मामले में) आप थोड़ा ढीले पड़ जाएं (और उनके बुतों की बुराई न करें) तो वे भी (ईमान वालों को सताने में) नर्मी करेंगे ---- (9)
आप किसी ऐसे आदमी की बातों में बिल्कुल न आएं जो बहुत क़समें खानेवाला, अत्यंत नीच है, (10)
(जो) ताना देने, दूसरों की कमियाँ निकालने (और) लोगों में अशांति फैलाने के लिए चुग़लखोरी करता फिरता है, (11)
(जो) भलाई के काम से रोकनेवाला, ज़ुल्म की सीमा पार करनेवाला (और) सख़्त पापी है, (12)
(जो) बहुत क्रूर है, और सबसे बढ़कर मक्कार [imposter] है (या जो नाजायज़ पैदा हुआ है। (13)
* कहा जाता है कि यह बातें वलीद इब्ने अल मुग़ीरा के बारे में है जो रसूल (सल.) का घोर विरोधी था.
आप केवल इसलिए (उसकी बात को महत्व न दें) कि वह बड़ा धनवान और औलाद वाला है, (14)
जब उसके सामने हमारी आयतें पढकर सुनाई जाती हैं (तो) कहता है: “यह (तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!" (15)
जल्द ही हम उसकी सूंड (जैसी नाक) पर दाग़ लगा देंगे! (16)
बेशक हमने (इन मक्का के लोगों) को (उसी तरह) आज़माइश में डाला है जिस तरह हमने (यमन के) एक बाग़ वालों को उस वक़्त परीक्षा में डाला था जब उन्होंने क़सम खाई थी कि हम सुबह सवेरे ज़रूर उस (बाग़ के) फल तोड़ लेंगे (17)
और उन्होंने (यह क़सम लेते हुए) किसी और के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी (न अल्लाह की मर्ज़ी की और न ग़रीबों के हिस्से की) : (18)
फिर ऐसा हुआ कि जिस वक़्त वे सो रहे थे, उस वक़्त आपके रब की ओर से एक बला [disaster] उस बाग़ पर फेरा लगा गयी। (19)
सो वह (लहलहाता फलों से लदा हुआ बाग़) सुबह कटी हुई फसल की तरह उजाड़ हो गया। (20)
फिर सुबह होते ही वे एक दूसरे को पुकारने लगे, (21)
“कि अपने खेत की तरफ सवेरे सवेरे चले चलो अगर तुम सारे फल तोड़ना चाहते हो”, (22)
सो, वे लोग चल पड़े और वे आपस में चुपके-चुपके कहते जाते थे (23)
कि "ध्यान रखो! आज उस बाग में तुम्हारे पास कोई ग़रीब माँगने वाला आने न पाए!" ----- (24)
और वे सुबह सवेरे अपनी योजना पर अड़े हुए, तेज़ क़दमों से (बाग़ की तरफ़) चल पड़े ----- (25)
फिर जब उन्होंने उस (वीरान बाग) को देखा, तो कहने लगे: “हम ज़रूर रास्ता भूल गए हैं!” (यह तो हमारा बाग नहीं है), (26)
(थोड़ी देर बाद जब ध्यान से देखा तो पुकार उठे): “नहीं! हम तो लुट गए, बर्बाद हो गए”। (27)
उनमें सबसे अक़्लमंद आदमी ने कहा: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था, "क्या तुम (अल्लाह की) याद और उसकी बड़ाई का गुणगान नहीं करोगे?” ---- (28)
(तब) वे कहने लगे कि “हमारा रब पाक व महान है!, सचमुच हम ही शैतानी के काम कर रहे थे!" ------ (29)
फिर उसके बाद वे एक दूसरे के सामने खड़े होकर आपस में एक दूसरे को बुरा भला कहने लगे। (30)
(फिर सब मिलकर) कहने लगे: “अफसोस है हम सब पर! बेशक हम ने बहुत भारी ग़लती की है, (31)
मगर हो सकता है हमारा रब हमें इस (बाग़) के बदले में उससे अच्छा प्रदान कर दे : हम आशा करते हुए, अपने रब के आगे पूरी भक्ति से झुकते हैं”। (32)
(इस जीवन में तो) ऐसा दंड [punishment] है, मगर आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक / Hereafter] की यातना (इससे) कहीं बढ़कर है, काश! वे जानते होते, (33)
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए उनके रब के पास नेमतों से भरे हुए बाग़ हैं। (34)
भला क्या हम आज्ञा माननेवालों को गुनाहगारों [sinners] की तरह (वंचित) कर देंगे? (35)
तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसी बातें तय कर लेते हो? (36)
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जो तुम्हें बताती है, (37)
कि वहाँ (परलोक में) तुम्हें वही कुछ मिलेगा जो तुम पसंद करोगे? (38)
क्या तुमने हम से क़यामत तक बाक़ी रहने वाली क़समें ले रखी हैं (जिनके द्वारा हम बाध्य हैं) कि तुम्हें वही कुछ मिलेगा जिसे तुम ख़ुद (अपने लिए) तय करोगे? (39)
[ऐ रसूल] उनसे पूछिए कि उनमें से कौन है जिसने इस बात की ज़मानत ले रखी है? (40)
या (अल्लाह के अलावा) ख़ुदायी में क्या उनके ठहराये हुए कोई साझीदार [partner] हैं (जो यह ज़मानत लेते हों)? तो फिर उन्हें चाहिए कि ले आएं अपने उन साझीदारों को, अगर वे सच्चे हैं। (41)
जिस दिन ‘पिंडली खोल दी जायेगी’[यानी क़यामत की ज़बरदस्त मुसीबत और हलचल आ जाएगी] और वे [इंकार करनेवाले] लोग अल्लाह के सामने (सजदे में) झुकने के लिए बुलाए जाएंगे, तो वे (सजदा) नहीं कर सकेंगे। (42)
उनकी आँखें (डर और लज्जा के कारण) झुकी हुई होंगी (और) उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी : वे (दुनिया में) सजदे के लिए बुलाए जाते थे, जबकि वे भले चंगे थे (लेकिन फिर भी वे सजदा करने से इंकार करते थे)। (43)
अत: [ए रसूल!] जो लोग इन आयतों [Revelation] को झुठ कहकर ठुकरा रहे हैं, आप उन्हें मुझ पर छोड़ दें : हम उन्हें धीरे धीरे (विनाश की ओर) इस तरह ले जाएंगे कि उन्हें पता तक नहीं चलेगा; (44)
और मैं उन्हें (बुराइयों के लिए) ढील दे रहा हूँ, बेशक मेरी योजना बहुत मजबूत है। (45)
क्या आप उनसे (धर्म प्रचार के लिए) कोई मज़दूरी मांग रहे हैं कि वे क़र्ज़ (के बोझ) से दबे जा रहे हैं? (46)
या उन लोगों के पास छुपी हुई चीज़ों का ज्ञान है कि वह (इस आधार पर) लिखते हैं? (47)
इसलिए आप अपने रब के आदेश के इंतजार में सब्र किये जाएं : "मछली वाले" [पैग़म्बर यूनुस / Jonah] की तरह मत हो जाएं, जब उन्होंने (अपनी क़ौम से तंग होकर और) दुख से घुट-घुट कर हमें [अल्लाह को] पुकारा था : (48)
अगर उनके रब की अनुकंपा ने उनको [यूनुस अलै.को] संभाल न लिया होता, तो वह ज़रूर दोषी के रूप में उस उजाड़ साहिल पर फेंक दिए जाते (लेकिन अल्लाह ने उन्हें इससे बचाए रखा), (49)
मगर उनके रब ने उनको चुन लिया और उन्हें (अपनी ख़ास नज़दीकी प्रदान कर) नेक बंदों में (शामिल) कर लिया। (50)
वे लोग जो सच्चाई से इंकार करने पर तुले हुए हैं, जब कुरआन सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि वे अपनी (तेज़ व जलन भरी) नज़रों से आपको डगमगा देंगे, और वे कहते हैं कि "यह आदमी तो दीवाना है!" (51)
मगर यह [कुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए नसीहत [Reminder] है। (52)
(3) सूरह 73 : अल-मुज़म्मिल [चादर से लिपटे हुए / Enfolded]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ चादर में लिपटे हुए [रसूल!] (1)
आप उठकर रात भर (नमाज़ में) खड़े रहा करें, मगर थोड़ी रात (आराम भी कर लिया करें), (2)
(नमाज़ के लिए) आधी रात या इससे थोड़ा कम कर लें, (3)
या इस (अवधि) से थोड़ा बढ़ा लें; और कुरआन खूब ठहर ठहर कर (साफ़-साफ़) पढ़ा करें। (4)
[ऐ रसूल!], हम जल्द ही आप पर एक भारी फ़रमान [क़ुरआन] उतारनेवाले हैं, (5)
रात में उठकर की गयी इबादत, दिलों पर गहरा असर छोड़ती है, और (शांत माहौल में क़ुरआन के) शब्दों को सही ढंग से पढ़ना (और समझना) आसान होता है ----- (6)
दिन में लम्बे समय तक आप बहुत सारे कामों में व्यस्त रहते हैं ---- (7)
अत: आप अपने रब के नाम को (दिल और ज़बान से) याद करते रहें, और हर एक से अलग होकर पूरी भक्ति से बस उसी के हो रहें। (8)
वह पूरब और पश्चिम का मालिक है, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, सो उसी को (अपना) अभिभावक व रखवाला [protector] बना लें। (9)
जो कुछ वे [काफ़िर लोग] कहते रहते हैं, आप उन (बातों) पर धीरज रखें, और भले तरीक़े से उनका साथ छोड़कर किनारे हो जाएं, (10)
और उनलोगों को आप मुझ पर छोड़ दें, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं और बड़े ऐश-आराम [luxury] में रहते हैं. कुछ और समय तक (उनके साथ नर्मी बरतें) और उन्हें बर्दाश्त कर लें; (11)
हमारे पास उनके लिए भारी बेड़ियाँ हैं, और (जहन्नम की) भड़कती हुई आग है, (12)
गले में अटक जाने वाला खाना है, और उनके लिए बहुत दर्दनाक यातना [अज़ाब] है, (13)
उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे, (14)
[ऐ मक्का वासियो!] बेशक हमने तुम (लोगों) के पास एक रसूल [मोहम्मद सल्.] भेजा है जो तुम्हारे मामले में गवाह होगा, जैसा कि हमने फ़िरऔन [Pharaoh] की तरफ एक रसूल [मूसा अलै] को भेजा था, (15)
मगर फ़िरऔन ने हमारे रसूल [मूसा अलै.] का कहना मानने से इंकार किया, सो हमने उसको तबाह कर देने वाली चपेट में धर-दबोचा। (16)
अगर तुम भी (हमारी बातों को मानने से) इंकार करते रहे, तो उस दिन (की यातना) से अपने आपको कैसे बचा पाओगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगी, (17)
वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा? अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (18)
यह [कुरआन] एक नसीहत [Reminder] है. अब जो कोई चाहे, अपने रब तक पहुंचने का रास्ता अपनाले। (19)
[ऐ रसूल], आपका रब अच्छी तरह जानता है कि आप कभी-कभी दो तिहाई रात के करीब (तह्ज्जुद की नमाज़ में) खड़े होते हैं ----- और (कभी) आधी रात और (कभी) एक तिहाई रात (नमाज़) पढ़ते हैं ---- आपके (पीछे चलनेवाले) साथियों में से भी कुछ लोग है जो ऐसा ही करते हैं।
अल्लाह ही रात और दिन (के घटने और बढ़ने) का सही अंदाज़ा रखता है। वह जानता है कि तुम कभी उसका ठीक ठीक हिसाब नहीं रख सकोगे, तो उसने तुम सब पर (कष्ट में कमी करके) मेहरबानी कर दी, सो जितना आसानी से हो सके कुरआन पढ़ लिया करो,
वह जानता है कि तुम में से (कुछ लोग) बीमार होंगे और (कुछ) दूसरे लोग ऐसे होंगे जो अल्लाह के फज़ल [bounty] की खोज में (काम-काज के लिए) ज़मीन पर इधर-उधर यात्रा कर रहे होंगे, और (कुछ) अन्य लोग अल्लाह की राह में युद्ध कर रहे होंगे : सो जितना आसानी से हो सके उतना (ही) पढ़ लिया करो,
पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, निर्धारित ज़क़ात [alms] देते रहो, और अल्लाह को क़र्ज़ दिया करो, अच्छा वाला क़र्ज़! [बिना दिखावा किए और केवल अल्लाह की ख़ुशी के लिए नेक काम के लिए देना],
जो कुछ भलाई व नेकी तुम अपने लिए जमा करते हो, उसके बदले तुम्हें अल्लाह के पास कहीं बेहतर और ज़्यादा इनाम मिलेगा,
और अल्लाह से माफी मांगते रहो, (विश्वास रखो) अल्लाह बहुत माफ करनेवाला और बेहद रहम करनेवाला है। (20)
(4) सूरह 74 : अल मुदस्सिर
[चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ (मेरे) चादर ओढ़े हुए (रसूल!), (1)
उठें और (लोगों को अल्लाह की) चेतावनी सुना दें! (2)
और अपने रब की बड़ाई (और महानता) की घोषणा कर दें; (3)
अपने आपको (मन के भीतर की और बाहर की गंदगियों से) साफ़-सुथरा रखें; (4)
और हर तरह (के पापों) की गंदगी से दूर रहें; (5)
किसी को (केवल इस नीयत से) न दें, कि उससे ज़्यादा पाने की चाहत हो; (6)
और आप अपने रब के काम में धीरज [सब्र] से काम लिया करें. (7)
फिर जब (क़यामत की घोषणा के लिए) नरसिंघे [trumpet] में फूंक मारी जाएगी, (8)
सो वह [क़यामत का दिन] बहुत ही परेशानी का दिन होगा। (9)
(सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के लिए (वह दिन) कोई आसान न होगा। (10)
[ऐ रसूल], आप उस आदमी का मामला मुझ पर छोड़ दें, जिसे मैंने बेसहारा पैदा किया था, (11)
* इसका नाम अल वलीद इब्न अल मुग़ीरह बताया जाता है जो रसूल के कट्टर विरोधियों मे था
फिर उसे दूर-दूर तक फैली हुई ढेर सारी धन-संपत्ति दी थी, (12)
उसे बेटे दिए थे जो (उसके सामने) हाजिर रहते थे, (13)
और उसके लिए हर काम के रास्ते आसान बना दिए थे ----- (14)
इसके बावजूद, वह अब भी यह उम्मीद रखता है कि मैं उसे और अधिक दूँगा। (15)
(अब और) नहीं!, वह हमारी (भेजी गयी) आयतों [revelation] का कट्टर विरोधी रहा है : (16)
बहुत जल्द मैं उसे बेहद थका देनेवाली (चढ़ाई की) यातना दूंगा, (17)
उसने सोच-विचार किया और एक साज़िश तैयार कर ली ---- (18)
लानत हो उस पर, उसने कैसी शैतानी साज़िश रची! (19)
इस पर लानत हो, उसने (यह) कैसी क्रूरता से भरी साज़िश की! ----- (20)
फिर उसने (आसपास) देखा, (21)
और त्योरी चढ़ाई और मुंह बिचकाया, (22)
फिर (सच्चाई की बातों से) पीठ फेर ली और घमंड में अकड़ गया, (23)
और कहने लगा, “यह [कुरआन] कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने से चला आ रहा जादू है, (24)
“बस इंसान की कही हुई बात है” (अल्लाह का कलाम नहीं है)। (25)
में उसे (जहन्नम की) भड़कती आग [सक़र] में झोंक दूंगा। (26)
और आपको किसने बताया है कि "सक़र" [जहन्नम की आग] क्या है? (27)
वह (ऐसी आग है जो) न किसी को बाक़ी बचा रखती है न (तरस खाकर) छोड़ती है; (28)
(वह) आदमी के बदन की खाल को झुलसाकर काला कर देने वाली है; (29)
उस पर उन्नीस पहरेदार नियुक्त हैं। ---- (30)
और हमने जहन्नम की पहरेदारी के लिए किसी और को नहीं, बल्कि फरिश्तों को ही नियुक्त किया है ----- और हमने इनकी संख्या [Number] विश्वास न करनेवालों [काफिरों] को केवल परखने के लिए निर्धारित की है। अत: जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी हैं, उन्हें इस बात पर विश्वास हो जाएगा, और जो लोग ईमान रखते हैं उनका विश्वास और बढ़ जाएगा : न तो उन्हें जिनको किताब दी गयी है और न ही ईमानवालों को इसकी (सच्चाई में) कोई संदेह होगा, मगर वे जिनके दिलों में रोग है और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, वे लोग यह कहेंगे, "भला इस (खास संख्या के) उदाहरण से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?"
इस तरह, अल्लाह (एक ही बात से) जिसे चाहता है गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है ----- आपके रब के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह (वर्णन) आदमी को सावधान करने के लिए ही है। (31)
हां ---- चाँद की क़सम! (32)
और रात की क़सम जब वह पीठ फेर कर विदा होने लगे! (33)
और सुबह की क़सम जब वह रौशन हो जाए! (34)
बेशक यह (जहन्नम) बहुत बड़ी आफ़तों से एक है, (35)
इंसानों को सावधान करने वाली, (36)
तुम में से हर उस आदमी के लिए जो (भलाई में) आगे बढ़ना चाहे या जो (बुराई में फंस कर) पीछे रह जाए। (37)
हर आदमी अपने (कर्मों द्वारा) की गयी कमाई के बदले (अल्लाह के पास) गिरवी है, (38)
दाएँ हाथ वालों [Companions of the right] को छोड़ कर, (39)
जो बाग़ों [जन्नत] में होंगे और वे पूछते होंगे, (40)
अपराधियों से, (41)
(वे पूछेंगे): ”तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम (की भड़कती आग) में ले गई?” (42)
वे जवाब देंगे, “हम नमाज़ पढ़ने वालों में नहीं थे”; (43)
“और हम ग़रीबों को खाना नहीं खिलाते थे”; (44)
“हम दूसरे लोगों के साथ (मिलकर) मौज-मस्ती करते (और ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाया करते थे)”; (45)
“और हम फ़ैसले के दिन को झूठ बताया करते थे”, (46)
“(और हम यूँ ही रहे) यहां तक कि हम पर वह (मौत) आ पहुँची जिसका आना निश्चित था”, (47)
सो (उस समय) सिफारिश करने वालों की सिफारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (48)
तो उन (काफिरों) को क्या हो गया है? क्यों वे इस चेतावनी से बिदक कर मुँह मोड़ लेते हैं, (49)
मानो वे घबराए हुए (जंगली) गधे हों, (50)
जो शेर से (डर कर) भाग खड़े हुए हों? (51)
उनमें से हर एक आदमी यह चाहता है कि उस पर सीधे (आसमानी) किताब उतार दी जाए जो उसकी आँख के सामने खोली जाए ---- (52)
नहीं! बल्कि (सच यह है कि) वे (आगे आने वाली) परलोक (की ज़िंदगी) से डरते ही नहीं। (53)
मगर सचमुच यह [कुरआन] एक नसीहत [Reminder] है. (54)
अब जिसका जी चाहे, इस (नसीहत) पर ध्यान दे और याद रखे : (55)
वे लोग तभी इसे याद रखने पर ध्यान देंगे, अगर अल्लाह ऐसा चाहे. सचमुच वही इस योग्य है कि उसकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाए, और वही है जो माफ़ी देनेवाला है। (56)
(5) सूरह 1 : अल फ़ातिहा [The Opening]
अल्लाह
के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है,
अत्यंत दयावान है (1)
सारी
तारीफ़ें अल्लाह की हैं, जो सारे संसारों का रब है, (2)
सब
पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है, (3)
(और)
जो फ़ैसले के दिन का मालिक है. (4)
[ऐ
अल्लाह!] हम तेरी ही इबादत करते हैं; और तुझ से ही (ज़रूरत पड़ने पर) मदद माँगते हैं. (5)
हमें
सीधे रास्ते पर चला : (6)
उन
लोगों के रास्ते पर जिन पर तू ने इनाम किया है, उनके रास्ते पर नहीं जिन पर (तेरा)
ग़ुस्सा उतरा हो, और न उनके जो सीधे रास्ते से भटक गए हों. (7)
(6) सूरह 111 : अल-लहब/ अल-मसद
[आग में जलने वाला, Flame Man / खजूर की छाल, Palm-fibre]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अबु लहब के दोनों हाथ बर्बाद हो जाएँ! और वह ख़ुद भी बर्बाद हो जाए! (1)
न तो (विरासत में मिली हुई) दौलत ही उसके काम आएगी और न वह धन जो उसने कमाया : (2)
वह जल्द ही (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में जा पड़ेगा---- (3)
और साथ में उसकी बदमाश) पत्नी (भी), जो (काँटेदार) लकड़ियों का बोझा उठाए फिरती है, (और हमारे रसूल को सताने के लिए उनके रास्तों में बिछा देती है) (4)
(क़यामत के दिन) उसकी गर्दन में खजूर की छाल का (वही) रस्सा होगा (जिससे वह काँटों का गट्ठर बाँधती है). (5)
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