Friday, December 15, 2017

Chronological Quran in Hindi : 2nd Year of Revelation


Chronological Quran : 2nd Year of Revelation
[Nov 24, 610 AD --- Nov 12, 611 AD]
 क़ुरआन : कालक्रम के अनुसार : दूसरे वर्ष में उतरी आयतें
 [मुहर्रम 1, 12 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 29, 12 हिजरी पूर्व]






सूरह 81 : अत-तकवीर [अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 जब सूरज लपेट कर अँधेरा कर दिया जाएगा,  (1)

 जब सितारे मद्धिम पड़ जाएंगे (और टूट-टूट कर गिर पड़ेंगे),  (2)

 जब पहाड़ (धूल बनाकर वातावरण में) चला दिए जाएंगे, (3)

  जब (दस महीने की) गर्भवती ऊँटनियाँ बेकार मारी फिरेंगी (क़ीमती  होते हुए भी कोई उनको पूछनेवाला न होगा),  (4)

 जब जंगली जानवर (डर के मारे बदहवास हो जाएंगे और फिर अल्लाह के सामने) इकट्ठा कर दिए जाएंगे,  (5)

 जब समंदर उबल पड़ेंगे (और अपनी हदें तोड़ देंगे),  (6)

 जब आत्माओं को (बुरे और अच्छे लोगों के) दर्जों में अलग-अलग छाँट कर रखा जाएगा,  (7)

 जब ज़िंदा गाड़ दी गयी लड़की से पूछा जाएगा  (8)

 कि वह किस गुनाह के कारण मार दी गई थी,  (9)

 जब कर्मों के बही-खाते (record of deeds) खोल दिए जाएंगे,  (10)

 जब आसमान से पर्दा हटा दिया जाएगा,  (11)

 और जब जहन्नम (की आग) भड़कायी जाएगी  (12)

 और जब जन्नत नज़दीक कर दी जाएगी :  (13)

  (लोगो! तुम में से) हर आदमी जान लेगा जो कुछ (कर्मों का लेखा  जोखा) वह लेकर आया है.  (14)

   तो मैं कसम खाता हूँ उन [ग्रहों/Planets] की, जो (अपने नियत पथ पर चलते हुए) दूर चले जाते हैं,  (15)

  जो (एक ख़ास गति से) चलते रहते हैं, और (फिर कभी इतने दूर चले जाते हैं कि नज़रों से) ओझल हो जाते हैं,  (16)

 और रात की क़सम जब उसका अंधेरापन जाने लगे,  (17)

  और सुबह की क़सम जब (हल्की सी रौशनी में) वह साँस ले :  (18)

  यह [कुरआन] संदेश लानेवाले बड़े सम्मानीय फरिश्ते [जिबरईल/ Gabriel] द्वारा (पढी हुई) वाणी [speech] है,  (19)

  जो बड़ी ताक़त रखता है, और सिंहासन के मालिक [अल्लाह] के यहाँ उसका बड़ा सम्मान और रूतबा है ------ (20)

  (साथी फरिश्तों में) उसका आदेश माना जाता है, और वह (अल्लाह  के नज़दीक) बहुत  भरोसे के लायक़ [trustworthy] है. (21)

  और (ऐ मक्का के लोगो!) तुम्हारे साथी [मुहम्मद सल.], दीवाने नहीं  हैं :  (22)

  उन्होंने सचमुच उस (जिबरईल नामी फरिश्ते को) साफ-खुले हुए  आसमान के किनारे (क्षितिज/ horizon) पर देखा था. (23)

   और (जो भी संदेश 'वही' [Revelation] के द्वारा भेजा    जाताहै), वह [मुहम्मद सल.] उन चीज़ों को बताने में कोई कमी नहीं  करते हैं (और न किसी बात को अपने तक छुपा कर रखते हैं).  (24)

( याद रहे), यह [कुरआन] किसी धुतकारे हुए शैतान की लायी हुई बात (वाणी) नहीं है.  (25)


  फिर तुम (लोग इतनी बड़ी चीज़ को छोड़कर) कहाँ चले जा रहे हो?  (26)

  यह [कुरआन] तो सारे लोगों के लिए एक संदेश है;  (27)

  हर उस आदमी के लिए जो सीधी राह चलना चाहता हो. (28)

  मगर तुम ऐसा तभी चाहोगे, जब अल्लाह की मर्ज़ी हो, जो सारे जहाँनों का रब है.  (29)







सूरह 87 : अल-आला [सबसे ऊँचा / The Most High]
   

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल], अपने रब के नाम की बड़ाई बयान करें जो सबसे ऊँचा है, (1)

जिसने (हर चीज़ को, ठीक जैसी ज़रूरत थी) सही अनुपात [due proportion] में पैदा किया;  (2)

और जिसने (हर एक चीज़ के लिए) कानून ठहरा दिया, और फिर (इसे अपने अपने सिस्टम के अनुसार रहने और चलने का) रास्ता भी बता दिया;  (3)

और जिसने (धरती से) हरा हरा चारा [Green pastures] उगाया  (4)
 
फिर उसे सूखा काला कूड़ा बना दिया.  (5)


[ए रसूल!], हम आपको (इस तरह से क़ुरआन) पढ़ाएँगे कि आप (कभी) नहीं भूलेंगे -----  (6)

जब तक अल्लाह न चाहे; सचमुच वह उन चीज़ों को भी जानता है जो सबके सामने हैं, और उन्हें भी जो छुपी हुई हैं -------  (7)

और हम आपको आसान तरीक़े [शरीयत] पर चलने का आसान रास्ता दिखा देंगे.  (8)

इसलिए आप नसीहत देते रहिए, अगर (सुनने वालों को) इस नसीहत [Reminding] से लाभ हो ------  (9)

लेकिन नसीहत तो वही क़बूल [स्वीकार] करेगा जिसके दिल में अल्लाह का डर होगा,  (10)

मगर जो बेहद बदमाश आदमी [wicked person] होगा, वह इस (नसीहत) पर कोई ध्यान नहीं देगा,  (11)

जो (क़यामत के दिन) सबसे बड़ी आग में प्रवेश करेगा,  (12)

जहाँ न तो वह मर सकेगा और न जी सकेगा.  (13)


बेशक वही कामयाब हुआ जिसने (अपनी इंद्रियों को क़ाबू में रखा और पाप की गंदगियों से) अपने को बचाए रखा,  (14)

और अपने रब के नाम को याद करता रहा और (पाबंदी से) नमाज़ पढ़ता रहा.  (15)

लेकिन इसके बावजूद, तुम [लोग] (अल्लाह से लगाव बढाने के बजाए) सांसारिक जीवन (के आनंद) को अपना लेते हो,  (16)

हालांकि आखिरत [hereafter] (की राहत और वहाँ का आनंद) बेहतर और हमेशा बाक़ी रहने वाला है. (17)

बेशक यह (शिक्षा) पहले की किताबों [Scriptures] में (भी लिखी हुई मौजूद) हैं,  (18)

(जो) इबराहीम [Abraham] और मूसा [Moses] की किताबें [scriptures] हैं. (19)







सूरह 92 : अल-लैल [रात, The Night]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

रात की क़सम जब वह छा जाए (और हर चीज़ को अपने अंधेरे में छुपा ले),  (1)

और दिन की क़सम जब उसका उजाला फैल जाए,  (2)

और उस हस्ती (की) क़सम जिसने (हर चीज में) नर और मादा को पैदा किया!  (3)

(ऐ लोगो, अपने मक़सद को पाने के लिए) तुम्हारे कर्म व प्रयास अलग अलग तरह के हैं.  (4)

अब जिस किसी ने (अपना माल अल्लाह के रास्ते में) दिया, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहा,  (5)

और उसने अच्छाई की बात को दिल से माना----  (6)

तो हम उसे आराम की मंज़िल [जन्नत] तक पहँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे।  (7)

और जिस किसी ने (अपने माल को अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने में) कंजूसी की, और अपने आप में ऐसा मगन रहा (जैसे उसे किसी की ज़रूरत नहीं),   (8)

और उसने अच्छाई की बात को मानने से इंकार किया-----  (9)
 
तो हम उसे तकलीफ़ की मंज़िल [जहन्नम] तक पहुँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे  (10)

और जब वह तबाही (के गड्ढे) में गिरेगा तो उसका माल उसके किसी काम नहीं आएगा।  (11)

बेशक (सच्ची और सही) राह दिखाना हमारे ज़िम्मे है -----  (12)

और यह भी सच है कि हम आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] और इस दुनिया दोनों ही के मालिक हैं-------  (13)

सो मैंने तुम्हें (जहन्नम की) भड़कती हुई आग से सावधान कर दिया है, (14)

इस (आग) में कोई और नहीं, बल्कि जो अत्यंत दुष्ट व शैतान है, वही जलेगा,  (15)

जिसने (सच्चाई) को मानने से इंकार किया और (रसूल की बातों से) मुँह मोड़ लिया।  (16)

और जो बहुत नेक और बुराइयों से बचनेवाला आदमी होगा, उसे उस (आग) से दूर रखा जाएगा------  (17)

जो अपने मन की शुद्धि [self-purification] के लिए अपना माल (अल्लाह के रास्ते में) देता है,  (18)

हालाँकि उस पर किसी का कोई उपकार नहीं था जिसका वह बदला चुकाता है,  (19)

बल्कि (वह) तो केवल अपने महान रब की खुशी के लिए (माल खर्च करता है) ----- (20)

यक़ीन जानो, जल्द ही वह (अल्लाह द्वारा दी हुई चीज़ों से) बहुत ख़ुश हो जाएगा।  (21)









सूरह 89 : अल-फ़ज्र [सुबह-सवेरे, Daybreak]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


क़सम है सुबह सवेरे के समय की,  (1)

मतलब शायद बक़रीद के महीने की दसवीं तारीख की सुबह से है
 
और क़सम है दस (मुबारक) रातों की,  (2)
 
मतलब  शायद  बक़रीद के महीने की पहली 10 रातें हैं जो बड़ी बरकत वाली मानी जाती हैं. जिनका संबंध हज से है .

और क़सम है जोड़े वाली [Even] (चीज़) की और बिना-जोड़े वाली [Odd] चीज़ों की, *  (3)

जफ़्त [सम या जोड़ा] का अर्थ शायद कुल प्राणी है जो जोड़ों के रूप में पैदा किये गये हैं, और ताक़ [विषम या अकेले] का अर्थ शायद अल्लाह की ज़ात है जिसने कायनात बनायी. इस सम और विषम का मतलब बक़रीद की 10वीं और 9 वीं तारीख भी बतायी गयी है.

और गुज़रती हुई रात की क़सम! (कि इंकार करनेवालों को ज़रूर दंड दिया जाएगा) ------  (4)

क्या एक समझदार (को विश्वास दिलाने) के लिए ये क़समें काफी नहीं हैं? (5)


क्या आपने [ऐ रसूल] नहीं देखा कि आपके रब ने “आद” (की क़ौम) के साथ क्या सलूक किया?  (6)

(जो) ऊँचे ऊँचे स्तंभों वाले शहर, “इरम” (में बसते) थे, (7)
 
उनके जैसे लोग इस धरती पर कहीं भी कभी पैदा नहीं किए गए, (8)

और "समूद" (के लोगों के साथ क्या सलूक हुआ) जिन्होंने (क़ुरा नाम की) घाटी में चट्टानों को काट (कर पत्थरों से घरों का निर्माण कर) डाला था, (9)

और फ़िरऔन [Pharaoh] (का क्या हश्र हुआ) जो बड़े ताक़तवर और मज़बूत लशकरों वाला (या लोगों को खूंटों (Stakes) से दंड देने वाला) था?  (10)

यह वे लोग थे जिन्होंने (अपने अपने) इलाक़ों में ज़्यादतियाँ [सरकशी] कर रखी थीं,  (11)

और उनमें बड़े फसाद मचा रखे थे :  (12)

तो आपके रब ने उन पर यातना का कोड़ा बरसा दिया.  (13)
 
बेशक आपका रब सब (ज़्यादती करनेवालों और आदेश न माननेवालों) पर हमेशा कड़ी नज़र रखता है।  (14)


मगर इंसान (ऐसा है) कि जब उसका रब उसे (आराम व ठाठ देकर) आज़माता है और इज़्ज़त और नेमतें [blessings] प्रदान करता है, तो वह (घमंडी हो जाता है) कहता है,  “मेरे रब ने मुझे इज़्ज़त दी है,” (15)

लेकिन जब वह उसे (तकलीफ़ और मुसीबत देकर) आज़माता है और उसकी रोज़ी को सीमित कर देता है, तो वह कहता है,  “मेरे रब ने मुझे अपमानित कर दिया।” (16)

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! मगर (सच्चाई यह है कि सम्मान और धन दौलत मिलने पर) तुम लोग अनाथों को मान नहीं देते, (17)

और न ही तुम (लोग) गरीबों को खाना खिलाने के लिए (समाज में) एक दूसरे को उभारते हो,  (18)

और विरासत का सारा माल (inherited wealth) समेट कर (स्वयं) खा जाते हो (और इसमें से अनाथों और गरीब लोगों का हिस्सा नहीं निकालते),  (19)

और तुम धन दौलत से हद से ज़्यादा लगाव रखते हो।  (20)


हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! जब धरती कूट कूट कर चूर चूर कर दी जाएगी,  (21)

जब आपका रब और साथ में फरिश्ते क़तार दर क़तार लगाये हुए (हश्र के मैदान में) आएंगे,  (22)

और उस दिन जहन्नम (नरक) को सामने लाया जाएगा‌--- उस दिन इंसान  को समझ आएगी, मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा?  (23)

वह कहेगा “ ऐ काश! मैंने अपने (इस आने  वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!)” (24)

सो उस दिन वह [अल्लाह] ऐसा दंड देगा कि वैसा दंड दूसरा कोई नहीं दे सकता, (25)

और न उसके जकड़ने की तरह कोई दूसरा जकड़ने वाला होगा।  (26)

(मगर अल्लाह की याद में सुकून पानेवाले लोगों से कहा जाएगा कि) “ऐ संतुष्ट आत्मा :  (27)

तू अपने रब की तरफ इस हाल में लौट आ कि तू उससे खुश हो और वह तुझ से राज़ी हो;  (28)

और तू शामिल हो जा, मेरे (नेक) बन्दों में;  (29)

और दाख़िल हो जा मेरी जन्नत [Garden] में।"  (30)






सूरह 93 : अज़ ज़ुहा,
[सुबह की रौशनी, The Morning Brightness]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

          क़सम है दिन के पहले पहर की रौशनी की,  (1)

और क़सम है रात की जब (उसका सन्नाटा) छा जाए,  (2)

कि आपके रब ने आपको [ऐ रसूल], न छोड़ा है और न ही आप से नाराज़ हुआ है,  (3)

और आगे आने वाले हालात आपके लिए पहले के हालात से (बड़ाई और दर्जे में) बेहतर होंगे;  (4)

यक़ीन रखें कि आपका रब आपको (इतना कुछ) देगा कि आप पूरी तरह संतुष्ट हो जाएंगे।  (5)

क्या उस [रब] ने आपको यतीम [अनाथ] नहीं पाया था और फिर (आपको अच्छा) ठिकाना [shelter] दिया?  (6)

क्या उसने आपको (सच्चाई की खोज में) भटकते हुए नहीं देखा था और फिर सही मार्गदर्शन दे दिया?  (7)

क्या उसने आपको ज़रूरतमंद नहीं पाया था और फिर आपको आत्म-निर्भर [self-sufficient] बना दिया?  (8)

अत: आप भी किसी अनाथ पर सख़्ती न करें,  (9)

और (अपने द्वार पर आये) किसी माँगनेवाले को न झिड़कें; (10)

और अपने रब की नेमतों का (खूब) बखान करते रहें।  (11)





सूरह 94 : अल-इंशिराह

 [Expand, दिल का फैलना / Relief, राहत]
  

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] क्या हमने आपके लिये आपका दिल (ज्ञान की रौशनी और समझ-बूझ से) फैला नहीं दिया (जिससे आपको राहत मिल गयी),   (1)

और हमने आप पर से (नबी होने की शुरूआती ज़िम्मेदारी का) बोझ उतार दिया,  (2)

जिस (बोझ) ने आपकी कमर तोड़ रखी थी,  (3)

और (लोगों के लिए) हमने आपको याद किए जाने [remembrance] को ऊँचा स्थान दे दिया?  (4)

तो सचमुच जहाँ कहीं कठिनाई होती है, उसके साथ आसानी भी (आती) है;  (5)

निश्चय ही हर कठिनाई के साथ आसानी (भी) होती है।  (6)

तो जैसे ही आप (अपने लोगों की) ज़िम्मेदारियों से फुर्सत पा लें, तो (अल्लाह की याद व इबादत में) मेहनत किया करें,  (7)

और हर चीज़ के लिए अपने रब से ही दिल लगाया करें। (8)





सूरह 103 : अल अस्र
[ढलता हुआ दिन, The Declining Day]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ढलते हुए दिन की क़सम (या ढलती उम्र की क़सम, कि जब दिन का हिस्सा या ज़िंदगी कम ही बची रहती है)  (1)

बेशक इन्सान (बड़े) घाटे में है (कि वह अपनी क़ीमती उम्र गँवा रहा है और अच्छे कर्म करने का समय घटता जा रहा है),  (2)

सिवाए उन लोगों के जो ईमान रखते हैं, अच्छे काम करते हैं, (समाज  में) एक दूसरे को सच्चाई की नसीहत करते रहते हैं, और (बुराइयों से बचने में, अच्छे कर्म करने में और आने वाली मुसीबतों में) एक दूसरे को सब्र [धैर्य] के साथ जमे रहने पर ज़ोर देते हैं।  (3)


                      


सूरह 100 : अल आदियात
[हाँफते-दौड़ते घोड़े, The Charging Steeds]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

(युद्ध के मैदान में) सरपट दौड़ते हुए और हाँफते हुए घोड़ों की क़सम,  (1)

फिर जो पत्थरों पर ठोकर मारकर चिंगारियाँ उड़ाते हैं,  (2)

फिर जो सुबह होते ही (दुश्मन पर) अचानक छापा मारते हैं,  (3)

फिर (हमले वाली) जगह के चारों ओर धूल-गर्द उड़ाते हैं,  (4)

फिर उसी समय (दुश्मन के) लश्कर में जा घुसते हैं।  (5)

बेशक इंसान अपने रब का शुक्रा अदा नहीं करता [Ungrateful] है (जबकि एक घोड़ा भी अपनी जान की परवाह किए बिना आदमी से वफ़ादारी निभाता है) ------   (6)

और वह (इस नाशुक्री) पर ख़ुद ही गवाह है-----  (7)

और सच्चाई यह है कि वह [इंसान] धन के मोह में बहुत पक्का है।  (8)

तो क्या उसे पता नहीं, जब क़ब्रों के भीतर जो कुछ (मरे पड़े लोग] हैं, उन्हें फाड़ कर बाहर निकाल दिया जाएगा,  (9)

और जो (राज़) सीनों में छुपे होंगे, वह सामने आ जाएंगे, (10)

उनका रब उस दिन, उन सबके (कर्मों) से अच्छी तरह परिचित होगा।   (11)





सूरह 108 : अल-कौसर
[बहुत ज़्यादा भलाई, Abundance] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

बेशक [ऐ रसूल!], हमने आपको बहुत ज़्यादा भलाई [abundance] (और नेमतें) दी हैं (यहाँ तक कि जन्नत की एक नदी “कौसर” भी आपके लिए है) -------  (1)

सो, आप केवल अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ा करें और उसी के लिए क़ुर्बानी दिया करें------- (2)

वह जो आपसे नफ़रत करता है, असल में वही अपनी जड़ से कटा हुआ होगा (जिसका न तो कोई नाम बाक़ी रहेगा और न ही उसके ख़ानदान को कोई जानेगा)।  (3)





सूरह 102 : अत-तकासुर
[ज़्यादा पाने की लालसा, Striving For More] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ज़्यादा से ज़्यादा (धन-दौलत और ऐश व आराम) हासिल करने की लालसा ने तुम लोगों को (आख़िरत/Hereafter] से) भटका रखा है  (1)

यहाँ तक कि तुम लोग अपनी क़ब्रों में जा पहुंचते हो।  (2)

हरगिज़ नहीं! (धन-दौलत तुम्हारे काम नहीं आएगी), तुम्हें जल्द ही सब पता चल जाएगा।  (3)

फिर (तुम्हें चेताया जाता है), 

(ऐसा) हरगिज़ नहीं (है जैसा तुम्हारा ख़्याल है)! तुम्हें अंत में (अपना अंजाम) मालूम हो जाएगा। (4)

हरगिज़ नहीं!, अगर तुम पक्के यक़ीन के साथ जानते होते (तो दुनिया में मस्त होकर आख़िरत [परलोक] को इस तरह ना भूलते)।  (5)

तुम (अपनी लालच के नतीजे में) ज़रूर जह्न्नम की आग को देख लोगे,  (6)

फिर तुम उसे पक्के यक़ीन के साथ देख लोगे। (7)

फिर उस दिन तुमसे (अल्लाह की दी हुई) नेमतों [Pleasures] के बारे में ज़रूर पूछ्ताछ की जाएगी (कि तुमने उन्हें कहाँ कहाँ और कैसे कैसे खर्च किया था)।  (8)









सूरह 107 : अल माऊन
[मामूली चीज़ों से मदद, Common Kindnesses] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल], क्या आपने उस आदमी को देखा है जो (अंतिम) फ़ैसले के दिन (मिलने वाले इनाम या दंड) को मानने से इंकार करता है?  (1)

ये तो वही (कमबख़्त आदमी) है जो यतीम [अनाथ] को धक्के देता है, (और उनकी ज़रूरतों को नहीं देखता)  (2)

और मोहताजों/ ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए (लोगों को) प्रोत्साहित नहीं करता।  (3)

तो बस अफ़सोस (और ख़राबी है) उन नमाज़ पढने वालों के लिए  (4)

जिनका दिल असल में नमाज़ों में नहीं लगता; (कि सही नीयत से नमाज़ नहीं पढते, और कुछ पढते तो हैं मगर उनके दिल इंसानियत और ग़रीबों की सेवा भाव से बिल्कुल ख़ाली हैं)  (5)

वे लोग (इबादत) में दिखलावा करते हैं,  (6)

और वे रोज़मर्रा की मामूली चीज़ें भी माँगने पर किसी को नहीं देते।  (7)







सूरह 109 : अल काफ़िरून
[काफ़िर लोग, The Disbelievers]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!] आप कह दें, “ऐ सच्चाई से इंकार करनेवाले (काफ़िरो) :  (1)

मैं उन (बुतों) की इबादत [worship] नहीं करता जिन्हें तुम पूजते हो,  (2)

और न तुम उस (ख़ुदा) की पूजा करने वाले हो जिसकी मैं इबादत करता हूं, (3)

और न (ही) मैं (आगे कभी) उनकी इबादत करने वाला हूं जिन (बुतों) की तुम पूजा करते हो,  (4)

और न तुम कभी उसकी पूजा करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ :  (5)

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है, और मेरे लिए मेरा धर्म।"  (6)






सूरह 105 : अल-फ़ील
[हाथीवाले, The Elephant]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] क्या आपने नहीं देखा कि आपके रब ने हाथी वालों [यमन से आए अबरहा के लश्कर] के साथ क्या किया (जो काबा को तहस नहस करने के इरादे से आए थे)?  (1) 

क्या उस [अल्लाह] ने उनकी तमाम चालों को पूरी तरह से बेकार नहीं कर दिया था?  (2)

और उसने उन पर (हर तरफ़ से) चिड़ियों के झुंड के झुंड भेज दिये थे,  (3)

जो उन पर ठोस पकी मिट्टी की कंकरियाँ फेक रही थीं :  (4)

(अल्लाह ने) उन्हें ऐसा कर डाला जैसे चबाया हुआ भूसा!  (5)









सूरह 113 : अल-ख़लक़
[सुबह-सवेरे, Daybreak]
  

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल], आप कह दें कि “मैं सुबह सवेरे के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं  (1)

हर उस चीज़ की बुराई (और नुक़सान) से जो उसने पैदा की है,  (2)

और (ख़ास कर) अंधेरी रात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए,  (3)

और गाँठों [गिरहों, Knots] में फूँक मारनेवाली जादूगरनियों (और जादूगरों) की बुराई से,  (4)

और हर हसद-जलन [ईर्ष्या] करने वाले की बुराई से जब वह ईर्ष्या करे.”  (5)





सूरह 114 : अन-नास
[आदमी लोग, People]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
  
[ऐ रसूल] आप कह दें  कि “मैं (सब) इंसानों के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं,  (1)
                   
जो (सब) लोगों का मालिक [Controller] है,  (2)

सब लोगों का ख़ुदा है (जिसकी बंदगी की जाती है),  (3)  

(पनाह माँगता हूँ) चुपके-चुपके मन में बुराई की सोच डालनेवाले (शैतान) की बुराई से जो (अल्लाह को याद करने से) पीछे को छुप जाता है ------ (4)

जो लोगों के दिलों में बुराई की सोच बैठा देता है -------  (5)

चाहे वह (बुराई पर उकसाने वाला शैतान) जिन्नों में से हो (जो दिखायी न देता हो) या आदमियों में से.”  (6)





सूरह 112 : अल इख़्लास
[ईमान की शुद्धता, Purity of Faith] 

  
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] आप कह दें, “अल्लाह हर तरह से एक है, (1)     

अल्लाह ही ऐसा है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं [self sufficient], मगर सब अपनी ज़रूरतों के लिये उस पर निर्भर हैं (और वह हमेशा बाक़ी रहने वाला है [eternal],   (2) 

न उसका कोई बाल-बच्चा है, और न ही उसको किसी ने पैदा किया है.  (3)

और उसके जोड़ का कोई नहीं है [Unique].”  (4)






सूरह 53 : अन नज्म [चमकीला तारा, The Star (Sirius)]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क़सम है चमकीले तारे की, जब वह डूबता है (1)

[ऐ मक्का वासियो!] तुम्हारे ही साथ रहनेवाले [मुहम्मह सल्ल॰] न रास्ता भूले हैं, न उन्हें कोई धोखा हुआ है; (2)

वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं बोलते हैं; (3) 

यह (क़ुरआन) तो बस एक "वही" [Revelation] है, जो (अल्लाह द्वारा) भेजी जाती है (4) 

उन्हें बड़ी शक्तियोंवाले (फ़रिश्ते जिब्रील) ने सिखाया था, (5)

जो ज़बरदस्त ताक़त रखता है. और (एक दिन) वह [फ़रिश्ता] सामने खड़ा था, (6)

क्षितिज [Horizon] के ऊँचे छोर पर,  (7) 

फिर वह उस (रसूल) की तरफ़ बढा ---- और नीचे उतर गया (8)

यहाँ तक कि वह (रसूल से) दो कमानों के बराबर की दूरी या उससे भी नज़दीक हो गया ----- (9)

इस तरह, अल्लाह को अपने बन्दे की ओर जो 'वही' अवतरित [Reveal] करनी थी, वह उतार दी गयी।  (10) 

जो कुछ उस (रसूल) ने देखा, उनके दिल को इसे समझने में कोई धोखा नहीं हुआ; (11)

फिर भी क्या तुम उनसे उस चीज़ पर झगड़ा करोगे, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा था?  (12)

(सच्चाई यह है कि) वह उस (फरिश्ते) को दूसरी बार भी (मेराज के सफ़र में) देख चुके हैं :  (13)

उस बेर के पेड़ [Lote tree] के किनारे जिसकी सीमा के आगे कोई नहीं जा सकता है ['सिदरतुल मुन्तहा'],  (14)

'जन्नतुल मावा' (सुकूनवाले बाग़) के नज़दीक, (15)

उस वक़्त बेर के पेड़ पर ऐसी अजीब चमक छाई हुई थी जिसकी न तो कल्पना की जा सकती है और न वर्णन! (16)

(रसूल की) निगाह न तो इधर उधर बहकी और न हद से आगे बढ़ी, (17)

और उन्होंने (वहाँ) अपने रब की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं. (18)


[विश्वास न करनेवालो!], भला क्या तुमने “लात” और “उज़्ज़ा”(नामक देवियों) (19)

और तीसरी एक और (देवी) “मनात” पर विचार किया? (20)

क्या तुम्हारे लिए तो बेटे हों और अल्लाह के लिए बेटियाँ? (21)

तब तो यह बहुत अन्यायपूर्ण बँटवारा हुआ! (22)

सच तो यह है कि ये तो बस कुछ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं, अल्लाह ने उनके लिए कोई सनद नहीं उतारी। असल में, वे [काफ़िर] लोग तो केवल अटकल के सहारे अपने मन की इच्छा के पीछे चल रहे हैं, हालाँकि उनके पास उनके रब की ओर से मार्गदर्शन आ चुका है। (23)

(क्या उनकी देवियाँ उनके लिए सिफ़ारिश कर सकती हैं?) या आदमी वह सब कुछ पा लेगा, जिसकी वह कामना करता है,  (24)

(नहीं!) क्योंकि इस दुनिया और आने वाली दुनिया का मालिक तो अल्लाह ही है?  (25)

आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, मगर उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; हाँ, यह तभी काम आ सकती है जब खुद अल्लाह जिसे चाहे इसके लिए अनुमति दे दे, और जिसकी बात को मान ले। (26) 

जो लोग आनेवाली दुनिया को नहीं मानते, वे फ़रिश्तों को देवियों के नाम से याद करते हैं, (27)


हालाँकि इस विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं जिसका कोई आधार हो : वे केवल अटकल के पीछे चलते है। हक़ीक़त यह है कि सच्चाई के मामले में केवल अंदाज़ा लगाने से कोई लाभ नहीं होता। (28)


अतः [ऐ रसूल!] आप ऐसे लोगों पर ध्यान न दें जो हमारी(उतारी हुई) नसीहतों से मुँह मोड़ता है, और जो इस सांसारिक जीवन के सिवा कुछ और चाहता ही नहीं। (29) 

ऐसे लोगों के ज्ञान की पहुँच बस यहीं तक है। तुम्हारा रब उसे बहुत अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसके मार्ग से भटक गया और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया।  (30)

अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। तो जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा, और जिन लोगों ने नेक काम किए, उन्हें ख़ूब अच्छा बदला देगा; (31)

रहे वे लोग जो बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं, हाँ अगर संयोगवश कोई छोटी-मोटी बुराई उनसे हो भी जाए, तो निश्चय ही तुम्हारा रब माफ़ करने में बहुत बड़ा है। वह तुम्हें उस समय से जानता है, जबकि उसने तुम्हें धरती से पैदा किया और जबकि तुम अपनी माओं के पेट में बच्चे के रूप में छुपे हुए थे। अतः अपने मन की पवित्रता का दावा न करो : वह अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है।  (32)


[ऐ रसूल!], क्या आपने उस आदमी को देखा जिसने (सच्चाई से) मुँह मोड़ लिया : (33) 

उसने (भलाई के काम में) थोड़ा-सा ही ख़र्च किया और फिर हाथ रोक लिया. (34)

क्या उसके पास अनदेखी [Unseen] चीज़ों का ज्ञान है? क्या वह [आनेवाली दुनिया को] देख सकता है?  (35)

क्या उसे बताया नहीं गया है जो कुछ मूसा की (आसमानी) किताबों में लिखा हुआ था, (36) 

और इबराहीम की (किताबों में) भी, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया :  (37)

कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा; (38)

और यह कि आदमी को (बदले में) बस वही कुछ मिलेगा जिसके लिए उसने कोशिश की होगी; (39)

और यह कि उसकी हर कोशिश देखी जाएगी  (40)

फिर अंत में (उसकी हर कोशिश का) उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा; (41)

और यह कि अन्त में (सबको) आपके रब के पास पहुँचना है; (42)

और यह कि वही है जो हँसाता और रुलाता है; (43) 

और यह कि वही है जो मौत भी देता है और ज़िंदगी भी; (44)

और यह कि उसी ने नर और मादा के दो जोड़े पैदा किए, (45) 

(वह भी बस) एक बूँद [Sperm] से, जब वह (मादा के अंदर) टपकाई जाती है; (46)

और यह कि (मरने के बाद) दोबारा ज़िंदा उठाना भी उसी के ज़िम्मे है; (47) 

और यह कि वही है जो धनवान बनाता है और पूँजी को सुरक्षित बनाता है; (48)

और यह कि वही है जो “शेअरा” [Sirius, नाम का तारा जिसे अरब के लोग पूजते थे] का रब है (49)

और यह कि वही है जिसने पुराने ज़माने में आद की क़ौम को पूरी तरह से तबाह व बर्बाद कर दिया ; (50) 

और समूद को भी। फिर किसी को बाक़ी न छोड़ा। (51)

और उससे पहले नूह की क़ौम को भी (तबाह कर दिया), बेशक वे ज़ालिम और हद से बढे हुए थे। (52)

और (लूत के क़ौम की) जो बस्तियाँ औंधी पड़ी थीं, उनको भी उसी ने उठाकर नीचे दे पटका था,  (53) 

तो फिर (पत्थरों की बारिश ने) उन्हें ढँक लिया, और वह उन्हें ढँक कर ही रही; (54)

तो फिर [ऐ इंसान] तू अपने रब की कौन कौन सी नेमतों में संदेह करेगा? (55)


यह (रसूल के द्वारा दी जानेवाली) एक चेतावनी है, ठीक वैसी ही चेतावनी [Reminder] जैसी पिछले ज़मानों में भी भेजी जा चुकी हैं। (56) 

(क़यामत की) वह घड़ी जो आनी ही है, निकट आ पहुँची है (57)

और अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो उस [क़यामत] को सामने ला खड़ा करे.   (58)

अब क्या तुम [लोग] इसी बात पर आश्चर्य करते हो; (59) 

और (उसका मज़ाक़ बनाकर) हँसते हो, जबकि तुम्हें रोना चाहिए!  (60)

तुम क्यों (घमंड में चूर होकर खेल-तमाशे में ऐसे मगन हो कि) इस ओर ध्यान नहीं देते?  (61)

अब (भी) झुक जाओ अल्लाह के सामने और उसकी बन्दगी करो।  (62)













 

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