Chronological
Quran : 3rd Year of Revelation
[Nov 13, 611 AD --- Oct 31, 612 AD]
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : तीसरे वर्ष में उतरी आयतें
[मुहर्रम 1, 11 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 29, 11 हिजरी पूर्व]
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : तीसरे वर्ष में उतरी आयतें
[मुहर्रम 1, 11 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 29, 11 हिजरी पूर्व]
सूरह 80 : अबस [He Frowned]
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1.
(रसूल सल. के) चेहरे पर बल पड़ा और (उन्होंने)
मुँह फेर लिया o
2.
इस कारण कि उनके पास एक नेत्रहीन (आदमी) आया
(जिसने चलती हुई बातचीत के बीच में आपको टोका) o
3.
और आपको( ऐ रसूल) क्या खबर कि शायद वह (आपके
ध्यान देने से और अधिक निखर के) पाक साफ हो जाता o
4. या (आपकी) नसीहत स्वीकार करता तो नसीहत उसे (और) लाभ देती o
5. लेकिन जिस व्यक्ति को (धर्म की) कोई परवाह नहीं है o
6. तो आप उसको (इस्लाम कबूल कराने के) लिए ज़्यादा पीछे लगे रहते हैं o
7. हालाँकि अगर वह अपने आपको (ईमान की पाकीज़गी से) न सुधार ले तब भी आप पर कोई जिम्मेदारी (का बोझ) नहीं o
8. और जो आपके पास (स्वयं अच्छाई की तलाश में) कोशिश करता हुआ आया o
9. और वह (अपने रब से) डरता भी है o
10. तो आप उस पर ध्यान नही दे रहे हैं o
11. (ऐ रसूल! ऐसे लोगों के पीछे पड़ने की ज़रूरत नहीं) हरगिज़ नहीं, बेशक यह (क़ुरआनी आयतें) तो नसीहत हैं o
12. सो जो व्यक्ति चाहे उसे स्वीकार (और याद) कर ले (और जो चाहे कान बंद कर ले) o
13. (यह) प्रतिष्ठित और बहुत बाइज़्ज़त पन्नों में (लिखी हुई) है o
14. जिनका स्थान बहुत बुलंद है (और ये) बेहद पवित्र हैं o
15. ऐसे लिखने वालों के हाथों से (आगे पहुंची) हैं o
16. जो बड़े इज़्ज़तदार बुज़ुर्ग (और) नेकी करने वाले (फ़रिश्ते) हैं o
17. नष्ट हो जायें (वे सभी इंकार करनेवाले), इंसान कैसा एहसान फ़रामोश है (जो इतनी महान नेमत पाकर भी उसका मान नहीं रखता) o
18. (वह ज़रा सोचे कि) अल्लाह ने उसे किस चीज़ से पैदा किया o
19. छोटी सी बूँद (वीर्य, sperm droplet) में से पैदा किया, फिर साथ ही उसकी बनावट को ठीक ठीक अनुपात में (जींस, genes और लिंग के अनुसार) निर्धारित कर दिया o
20. फिर (ज़िंदगी जीने और अल्लाह तक पहुँचने का) रास्ता उसके लिए आसान कर दिया o
21. फिर उसे मौत दी, फिर उसे कब्र में (दफन) कर दिया o
22. फिर जब वह चाहेगा उसे (दोबारा ज़िंदा कर के) उठा खड़ा करेगा o
23. सचमुच इस (नाफरमान आदमी) ने अपना वह (कर्तव्य) पूरा नहीं किया जिसका उसे (अल्लाह ने) आदेश दिया था o
24. इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने भोजन की ओर देखे (और विचार करे) o
25. बेशक हमने खूब ज़ोर से पानी बरसाया o
26. फिर हमने जमीन को फाड़कर चीर डाला o
27. फिर हमने इसमें अनाज उगाया o
28. और अंगूर और तरकारी o
29. और जैतून और खजूर o
30. और घने घने बाग o
31. और (तरह तरह के) फल मेवे और (जानवरों का) चारा o
32. खुद तुम्हारे और तुम्हारे पशुओं के लिए (जीवन में काम आने वाले) सामान o
33. फिर जब कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ (क़यामत) आ ही जाएगी o
34. उस दिन आदमी भागेगा अपने भाई से o
35. अपनी माँ और अपने पिता से (भी) o
36. अपनी पत्नी और अपने बच्चों से (भी) o
37. उस दिन हर व्यक्ति ऐसी (मुसीबतों में) पड़ा होगा कि उसे (एक दूसरे की) कोई परवाह न होगी o
38. उसी दिन कई चेहरे (ऐसे भी होंगे जो नूर से) चमक रहे होंगे o
39. (वह) मुस्कुराते हँसते (और) खुशियाँ मनाते होंगे o
40. और कई चेहरे ऐसे होंगे जिन पर उस दिन धूल पड़ी होगी o
41. (और) उन (चेहरों) पर कालिख छाई होगी o
42. यही लोग काफ़िर (अल्लाह का इंकार करने वाले), मनमानी करने वाले (और) दुराचारी लोग होंगे o
सूरह 97
: अल क़द्र
[क़द्र
की रात, The Night of
Glory]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत
दयावान है
1. बेशक हमने (इस क़ुरआन) को क़द्र की रात में उतारा है.
2. और आपको क्या मालूम (कि) क़द्र की रात क्या है?
3. क़द्र की रात [फ़ज़ीलत(merit), बरकत blessings), इनाम(reward) और सवाब (पुण्य, recompense) में] एक हज़ार महीनों से भी बेहतर है ;
4. इस (रात) में फ़रिश्ते और रूह [जिबरील] अपने रब की आज्ञा से (साल भर की) हर बात का हुक्म लेकर बार बार उतरते हैं ;
5. सुबह पौ फटने तक वह रात पूरी तरह से शांति व सलामती वाली है.
सूरह 91: अश शम्स
[सूरज, The Sun]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. सूरज की क़सम और उसकी फैली हुई रौशनी की क़सम
2. और चाँद की क़सम जब वह सूरज के पीछे पीछे चले (यानी उसकी रौशनी से चमके),
3. दिन की क़सम जब वह सूरज को चमकता हुआ दिखाये
4. और रात की क़सम जब वह छा जाए और सूरज को ढक ले,
5. आसमान की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे (एक ब्रह्मांड के रूप में) बनाया
6. और पृथ्वी की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे फैला दिया,
7. और इंसानी जान की क़सम कि कैसे उसे (ठीक-ठाक) कर के सँवार दिया,
8. फिर उस (अल्लाह) ने उसको बुरे कर्मों (से बचने) और परहेज़गारी करने की समझ-बूझ दी !
9. बेशक उस व्यक्ति ने सफलता पा ली जिसने अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़ सुथरा रखा o
10. और निश्चित रूप से वह व्यक्ति नाकाम हो गया जिसने अपनी जान को (गुनाहों में) धँसा लिया o
11. समूद के (ज़ालिम) लोगों ने अपनी बाग़ी प्रवृत्ति के कारण अपने (पैग़म्बर सालेह अलैहिस्सलाम को) झूठा कहा,
12. जब उनमें से सब से दुष्ट आदमी (उनके विरोध में) उठ खड़ा हुआ o
13. उससे अल्लाह के पैग़म्बर ने कहा: “ख़बरदार! अल्लाह की (इस) ऊँटनी का और उसे पानी पिलाने (वाले दिन) की बारी का पूरा ध्यान रखना” o
14. फिर भी उन्होंने (पैग़म्बर) को झूठा कहा, और और उस (ऊँटनी) का पाँव काट (कर मार) डाला. तो उनके रब ने उनके अपराध की वजह से उन पर तबाही डाल दी, और सबको (तहस नहस कर के) बराबर [levelled] कर दिया o
15. और अल्लाह को दंड देने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती (और न तबाही के नतीजों का कोई भय होता है) o
सूरह 85 : अल बुरूज [ The Towering Constellations]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. तारों की राशियों [कहकशाँ, galaxy] वाले आसमान की क़सम o
2. और उस दिन [क़यामत] की क़सम जिसका वादा किया गया है o
3. (उस दिन) हाज़िर होनेवाले (यानी रसूल और आदमी के कर्मों के गवाह) की और जो कुछ हाज़िर किया जाएगा (यानी लोगों के कर्म) उसकी क़सम! (यह सब गवाही देते हैं कि क़यामत हो कर रहेगी) o
4. (इसलिए) मारे गए खाई (खोदने) वाले o
5. (यानी वे लोग जिन्होंने) भड़कती आग (से भरी खाइयाँ बनायी थीं) जो बड़े ईंधन से (जलाई गई) थी o
6. जब वे उस (खाई के) किनारों पर बैठे थे o
7. और वे खुद गवाह हैं जो वह ईमानवालों के साथ कर रहे थे (यानी उन्हें आग में फेंक फेंक कर जला रहे थे) o
8. और उन्हें (ईमानवालों) से कोई और शिकायत नहीँ थी, बल्कि सिर्फ़ यही बात बुरी मालूम होती थी कि वह अल्लाह पर ईमान रखते थे जो बहुत ही प्रभुत्वशाली (और) प्रशंसा योग्य है o
9. जिसके क़ब्ज़े में आकाश और पृथ्वी की (सारी) बादशाहत है, और अल्लाह हर चीज़ को देख रहा है o
10. बेशक जिन लोगों ने ईमानवाले पुरुषों और महिलाओं को यातनाएं दी फिर तौबा [Repent] (भी) न की तो उनके लिए जहन्नम [ नरक] की यातना है और उनको (विशेषकर) आग में जलने की सज़ा दी जायेगी o
11. हाँ, बेशक जो लोग ईमान लाये और अच्छा कर्म करते रहे उनके लिए बाग़ (garden) हैं जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी, यही बड़ी कामयाबी है o
12. बेशक (ऐ रसूल) आपके रब की पकड़ बहुत सख़्त है o
13. बेशक वही पहली बार पैदा करता है और वही दोबारा पैदा करेगा o
14. और वह बड़ा क्षमा करने वाला और बहुत प्यार करने वाला है o
15. (पूरे विश्व के) सिंहासन सत्ता का मालिक [Lord of the Throne] है, बड़ी शान वाला है o
16. जो कुछ भी इरादा करता है (उसे) कर डालता है o
17. क्या आपके पास उन लशकरों [Forces] की खबर (नहीं) पहुंची है ? o
18. फ़िरऔन और समूद (के लशकरों) की ?o
19. इसके बावजूद काफ़िर लोग सच्चाई को झुठलाने में लगे हुए हैं o
20. जबकि अल्लाह ने उनको घेरे में ले रखा है o
21. (उनके क़ुरआन को न मानने से क्या होगा) यह बड़ा गौरवशाली एवं पवित्र क़ुरआन है o
22. (जो अल्लाह के पास) सुरक्षित पट्टिका [preserved tablet] में (लिखा हुआ) है 0
सूरह 95 : अत् तीन
[अंजीर, The Fig]
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. अनजीर की क़सम और ज़ैतून की क़सम,
2. और सीना के (पहाड़, Mount Sinai) तूर की क़सम,
3. और इस शांति वाले शहर (मक्का) की क़सम,
4. बेशक हमने इंसान को सर्वोत्तम (सही अनुपात और संतुलित) साँचे में ढाल कर पैदा किया है o
5. फिर हम उसे नीचे वालों में सबसे गिरी हुई हालत में कर देते हैं o
6. सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाये, और अच्छे कर्म करते रहे तो उनके लिए कभी समाप्त न होने वाला इनाम है-----
7. फिर उसके बाद, (ऐ इंसान!) वह क्या चीज़ है जो तुम्हें अंतिम फ़ैसले (इनाम व सज़ा) को झूठा मानने पर मजबूर कर रही है ?
8. क्या अल्लाह सब हाकिमों से सबसे ज़बरदस्त (फ़ैसला करने वाला) हाकिम नहीं है ? (बेशक है!)
सूरह 106 : क़ुरैश
[क़ुरैश क़बीला, The Tribe of Quraysh]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1.(का’बा की देखरेख करने के कारण अल्लाह ने ऐसी इज़्ज़त बढायी) जिससे क़ुरैश [क़बीले के लोग] (अपने कारवाँ को लूटे जाने से) ख़ुद को सुरक्षित महसूस करने लगे,
2.सुरक्षित कर दिया उन[क़ुरैश] के जाड़े (में यमन) और गर्मी (में सीरिया) को जाने वाले (व्यापारिक) कारवाँ को (जो उनकी ख़ुशहाली का ज़रिया थे)
3.अत: (इस करम के बदले) उन्हें चाहिये कि उस घर (का’बा) के रब की इबादत करें :
4.जिसने उनको भूख (की हालत में) खाना दिया, और (दुशमनों के) डर से अमन शांति दी.
सूरह 101 :अल क़ारियह
[The Crashing Blow]
1. (ज़मीन और आसमान की सारी कायनात को) तोड़-फोड़ कर रख देनेवाला कड़कदार झटका !
2. वह (हर चीज़ को) तोड़-फोड़ कर रख देनेवाला कड़कदार झटका क्या है?
3. और आपको क्या मालूम कि तोड़-फोड़ कर रख देनेवाले कड़कदार झटके का मतलब क्या है ?
4. (इसका मतलब क़यामत का) वह दिन है, जिस दिन (सारे) लोग (मैदाने हश्र में) फतिंगों (टिड्डियों) की तरह हर तरफ़ बिखरे हुए होंगे
5. और पहाड़ रंग बिरंग की धुनकी हुई ऊन के से हो जाएँगे,
6. तो वो आदमी जिसके (अच्छे कर्मों) के पल्ले भारी होंगे
7. उसका जीवन मन पसंद खुशी में होगा,
8. और जिस आदमी के (अच्छे कर्मों) के पल्ले हल्के होंगे
9. तो उसका ठिकाना हाविया [बिना तल का गड्ढा, Bottomless Pit] होगा------
10. और आप क्या समझे कि हाविया क्या है?----
11. (जहन्नम की) एक सख़्त दहकती हुई आग (का बहुत ही गहरा गड्ढा) है!
सूरह 75 : अल
क़ियामह [The Resurrection]
1. मैं क़सम खाता हूँ क़यामत के दिन की o
2. और मैँ कसम खाता हूँ (बुराइयों पर) कचोटने वाली आत्मा की o
3. क्या इंसान यह विचार रखता है कि हम उसकी हड्डियों को (जो मरने के बाद चूर चूर होकर बिखर जाएगी) कभी फिर से इकट्ठा नहीं करेंगे ? o
4. क्यों नहीं! हम तो यहाँ तक सक्षम हैं कि उसकी उंगलियों के एक एक जोड़ और पोर पोर [fingertips] तक को (दोबारा) ठीक ठाक कर दें o
5. मगर मनुष्य यह चाहता है कि आगे के (जीवन में) भी पाप करता रहे o
6. वह (व्यंग से) पूछता है कि “क़यामत का दिन कब होगा ?”o
7. फिर जब आँखें चौंधिया जाएंगीo
8. और चांद (अपनी) रौशनी खो देगा o
9. और सूरज और चाँद इकट्ठे (बे नूर) किये जाएंगे o
10. उस दिन मनुष्य पुकार उठेगा कि “ भाग कर कहाँ जायें” o
11. हरगिज़ नहीं! शरण लेने की कोई जगह नहीं होगीo
12. उस दिन तुम्हारे रब के ही पास ठिकाना होगा (जहाँ लौट के जाना होगा) o
13. उस दिन आदमी को (उसके कर्मों के बारे में) बता दिया जाएगा जो उसने आगे भेजे थे और जो (प्रभाव अपनी मृत्यु के बाद दुनिया में) पीछे छोड़े थे o
14. बल्कि (सच तो यह है कि) आदमी अपने मन के भीतर (ज़िंदगी में किये गये अच्छे बुरे कर्मों के बारे में स्वयं ही) जानता है o
15. चाहे वह अपनी ओर से कितने ही बहाने पेश करे o
16. (ए रसूल!) आप (कुरआन को याद करने की) जल्दी में (क़ुरआन के टुकड़े उतरने के साथ साथ) अपनी ज़बान को न चलाया करें o
17. बेशक उसे (आपके सीने में) जमा करना और (आपकी ज़बान से) पढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है o
18. तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ चुकें तो आप भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह पढ़ा करेंo
19. फिर बेशक इन (के अर्थों) को समझाकर बताना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है o
20. सच तो यह है तुम लोग जल्द मिलने वाली चीज़ (दुनिया की ज़िंदगी) से बहुत लगाव रखते हो
o
21. और तुम आख़िरत [इस दुनिया के बाद वाली दुनिया,hereafter] को छोड़े बैठे हो o
22. (एक तरफ) बहुत से चेहरे उस दिन खिले हुए और चमकते हुए होंगे o
23. और अपने रब (की नेमतों) को देख रहे होंगे o
24. और कितने ही चेहरे उस दिन बिगड़ी हुई हालत में (उदास और काले पड़ गये) होंगे o
25. वे समझ रहे होंगे कि उनके साथ ऐसी सख़्ती की जाएगी जो उनकी कमर तोड़ देगी o
26. नहीं नहीं, जब जान (बदन से निकलकर) गले तक आ पहुँचे o
27. (और) कहा जा रहा हो कि (इस समय) कोई है झाड़-फूंक से इलाज करने वाला ? o
28. और (मरने वाला) समझ ले कि (अब सबसे) जुदाई का समय है o
29. और पैर से पैर लिपटने लगे o
30. तो उस दिन आपके रब की तरफ प्रस्थान करना होगा o
31. तो (कितनी बदनसीबी है) कि उसने न (अल्लाह और रसूल की बातों को) सत्य माना और न नमाज़ पढ़ी o
32. बल्कि वह झुठलाता रहा और (ईमान से) मुँह मोड़ता रहा o
33. फिर अकड़ता हुआ अपने परिवार की ओर चल दिया o
34. तबाही है तुम्हारे लिए (मरते समय), फिर तबाही है (मरने के बाद की हालत में)o
35. फिर तबाही है तुम्हारे लिए (क़यामत के दिन), फिर तबाही है तुम्हारे लिए (जहन्नम की)o
36. क्या इंसान यह समझता है कि उसे यूँ ही (बिना हिसाब किताब लिए) छोड़ दिया जाएगा?o
37. क्या वह (अपने जीवनकाल के शुरू में) वीर्य (sperm) की एक बूँद मात्र न था जो (औरत के गर्भ में टपका दिया जाता है o
38. फिर वह (गर्भ में जाल की तरह जमा हुआ) एक लोथड़ा बन गया, फिर अल्लाह ने (उस अस्तित्व को इंसानी रूप में) पैदा किया, फिर शरीर के सभी अंगों को (सही अनुपात में) ठीक ठाक किया o
39. फिर ये कि उसने (उसी वीर्य के ही द्वारा) उसके दो प्रकार बनाए: मर्द और औरतo
40. तो क्या वह इस बात में सक्षम नहीं कि मुर्दों को फिर से जीवित कर दे?o
सूरह104 : अल हुमज़ह
[पीठ पीछे बुराई करनेवाला, The Backbiter]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1.हर उस आदमी के लिये तबाही है जो (मुँह पर) ताना देने वाला हो और पीठ पीछे दूसरों की बुराई निकालने वाला हो
2.(ख़राबी और तबाही है उस आदमी के लिये भी है) जो माल को जमा करता हो और गिन गिन कर रखता हो, (जायज़ और नाजायज़ माल का हिसाब किये बिना)
3.वह समझता है कि उसका माल उसे हमेशा ज़िन्दा बाक़ी रखेगा.
4.हरगिज़ नहीं! वह तो ज़रूर हुतमा [चूर चूर कर देने वाली चीज़ , Crusher] में फेंक दिया जाएगा !
5.और आपको क्या मालूम हुतमा क्या है?
6.वह ख़ुदा की भड़काई हुई आग है,
7.जो (तलवे से लगी तो) दिलों तक (पूरी तकलीफ़ के साथ) चढ़ जाएगी.
8. बेशक वह(आग) उन लोगों पर ढाँक कर हर तरफ़ से बंद कर दी जायेगी
9.जबकि वह (भड़कते हुए) लम्बे लम्बे शोलों में घिरे हुए होंगे.
सूरह 77 : अल मुरसलात [WINDS- SENT FORTH]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर महरबान है, अत्यंत दयावान है
1. हौले से चलनेवाली सुखद हवाओं की क़सम जो रह
रह के चलायी जाती हैं o
2. फिर तेज़ हवाओं की क़सम जो ज़बरदस्त झोंकों से चलती हैंo
3. और उन(हवाओं) की क़सम जो बादलों को लाकर हर तरफ फैला देती हैं o
4. फिर उन हवाओं की क़सम जो (उन्हें) फाड़कर अलग अलग कर देती हैं o
*या उन (फरिशतों) की क़सम जो
सही और ग़लत को अलग अलग कर देते हैं.
5. फिर (दिलों में अल्लाह की) याद डालने वाली हवाओं की क़सम o
* या फिर नसीहत की बातें (अल्लाह की ओर से) ले
कर आते हैं.
6. (इंकार करने वालों के सामने अच्छाई और बुराई की) सभी बातों को सबूत के तौर पर बताने के लिए (ताकि बाद में कोई ये न कह सके कि उसे चेताने वाला कोई आया न था) या चेतावनी देने के लिए o
7. बेशक जो वादाٔ (क़यामत के दिन का) तुम से किया जा रहा है वह जरूर पूरा हो कर रहेगाo
8. फिर (वह घटना तब होगी) जब सितारों की रौशनी खत्म कर दी जाएगी o
9. जब आसमान फट जायेगा o
10. जब पहाड़ (चूर चूर कर के) उड़ा दिए जाएंगे o
11. जब सभी पैगम्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों (communities) पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे o
12. (तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि निर्धारित की गयी है?o
13. फैसले के दिन के लिए o
14. और आपको क्या मालूम कि फैसले का दिन क्या है o
15. उस दिन झुठलाने वालों के लिए खराबी (और तबाही) है! o
16. क्या हमने पुरानी पीढी के (झुठलाने वाले) लोगों को तबाह व बर्बाद नहीं कर डाला था?
17. फिर उन्हीं लोगों के पीछे हम बाद के (इंकार करने वाले) लोगों को भी (तबाही के रास्ते पर) चला देते हैं o
18. हम अपराधियों के साथ ऐसा ही करते हैं o
19. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी खराबी (व तबाही) है! o
20. (फिर तुम क्यों सच्चाई से इंकार करते हो) क्या हमने तुम्हें मामूली पानी (की एक बूँद) से पैदा नहीं किया ? o
21. फिर उसे सुरक्षित टिकने की जगह (यानी माँ की कोख) में रखा o
22. एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक o
23. हम (बच्चा ठहर जाने से लेकर पैदा होने तक के सभी चरणों के लिए) एक अवधि तय कर देते हैं, और इस अवधि का निर्धारण (हम) कितनी खूबी से करते हैं o
24. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी तबाही है! o
25. क्या हमने धरती को (घर की तरह) समेट लेने वाली नहीं बनाया ? o
26. (जो समेटती है) ज़िंदा लोगों को (भी) और मुर्दों को (भी) o
27. हमने इस पर ऊँचे और मजबूत पहाड़ जमा कर रख दिए और हमने तुम्हें मीठा पानी पिलाया o
28. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी बर्बादी होगी! o
29. चलो (अब) तुम उस (अज़ाब) की तरफ जिसे तुम झुठलाया करते थे !o
30. तुम (जहन्नम के धुएं की) उस छाया की तरफ चलो जिसके तीन भाग (मौत, दोबारा ज़िंदा होना और फिर अल्लाह का फैसला) हैं !o
31. जो न (तो) ठंडी छाया है और न ही आग की ज्वाला से बचाने वाली है o
32. बेशक उसमें (जहन्नम में) आग की लपटें व शोले ऐसे (ऊँचे ऊँचे) होंगे जैसे कि महल (या जलता हुआ विशाल पेड़ का तना)o
33. (यूं भी लगता है) जैसे वह (आग के शोले) पीले रंग वाले (चमकते) ऊंट (या ताँबा या एक बड़ी व मोटी रस्सी) हैं o
34. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी तबाही है! o
35. यह ऐसा दिन है कि वे (कुछ) बोल भी न सकेंगे o
36. और न ही उन्हें अनुमति दी जाएगी कि वे कोई बहाने पेश कर सकें o
37. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी तबाही है! o
38. (लोगों से कहा जाएगा) यह फैसले का दिन है: हमने तुम्हें और (सभी) पहले (पीढियों के गुज़रे हुए गुनाहगार) लोगों को इकट्ठा किया है o
39. अगर तुम्हारे पास (अज़ाब से बचने का) कोई दांव-पेंच है तो (वह) दांव मुझ पर चला लो o
40. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी तबाही है! o
41. [अब इसके विपरीत] बेशक अल्लाह को हर वक़्त ध्यान में रखनेवाले लोग [मुत्तक़ी,God conscious] ठंडे साए और पानी के सोतों [spring] में (आराम और खुशी के साथ) होंगे o
42. और फल और मेवे जिसकी भी वे इच्छा करेंगे (उनके लिए मौजूद होंगे) o
43. (उनसे कहा जाएगा :) “ तुम खूब मज़े से खाओ पियो उन (अच्छे व नेक) कर्मों के बदले जो तुम (दुनिया में) करते रहे थे” o
44. बेशक हम इसी तरह नेक काम करनेवालों को बदले में इनाम दिया करते हैं o
45. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी खराबी है! o
46. (ऐ सच्चाई को न माननेवालो) “तुम थोड़ा समय खा लो और आनंद कर लो, बेशक तुम अपराधी हो” o
47. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी तबाही है! o
48. और जब उनसे कहा जाता है कि तुम (अल्लाह के सामने) झुको तो वे नहीं झुकते o
49. उस दिन झुठलाने वालों के लिए बड़ी तबाही है ! o
50. आखिर वे इस (कुरआन) के बाद और (अल्लाह की ओर से उतरी) किस बात पर विश्वास करेंगे ?
सूरह 50 : क़ाफ़
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़ाफ़॰; क़ुरआन मजीद की क़सम! (कि मुर्दा आदमियों को ज़रूर दोबारा उठाया जाएगा) - (1)
मगर विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके पास (आनेवाली दुनिया/ आख़िरत से) सावधान करनेवाला, उन्हीं मे से एक आदमी (कैसे) आ गया, सो वे कहने लगे, "यह तो हैरानी की बात है ! (2)
कि जब हम मर जाएँगे और मिट्टी हो जाएँगे, तो फिर हम वापस (जीवित होकर) उठ खड़े होंगे ? यह वापसी तो समझ से बहुत दूर की बात है!" (3)
धरती (मरे हुए शरीर का हिस्सा खा कर) उसमें जितनी भी कमी कर देती है, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं : हम एक किताब में इसका पूरा हिसाब रखते हैं . (4)
मगर विश्वास न करनेवालों के सामने जब सच्चाई पहुँचती है, तो वे उसे मानने से इंकार कर देते हैं ; असल में वे उलझन की हालत में पड़े हुए हैं. (5)
अच्छा तो क्या उन लोगों ने अपने ऊपर आसमान को नहीं देखा--- कि हमने उसे कैसा बनाया और किस तरह उसे सजाया है कि उसमें कोई दरार तक नहीं है ; (6)
और किस तरह हमने धरती को फैलाया और उसमे मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया, और उसमें हर प्रकार की सुन्दर वनस्पतियाँ उगा दीं, (7)
(और यह सब) आँखें खोलने और याद दिलाते रहने के उद्देश्य से है--- हर उस बन्दे के लिए जो पूरी भक्ति से अल्लाह की तरफ़ झुकनेवाला हो ; (8)
और कैसे हमने आसमान से बरकत से भरी बारिश भेजी और उससे बाग़ और अनाज की फ़सलें उगाईं ; (9)
और खजूरों के गुच्छों से लदे हुए ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़--- (10)
हर एक आदमी की रोज़ी के रूप में ; तो देखो कैसे पानी के द्वारा बेजान पड़ी हुई धरती को हम नया जीवन दे देते हैं? ठीक इसी तरह, मरे हुए लोग (अपनी क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे. (11)
इन(मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] से बहुत पहले, नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, इसी तरह 'अर्-रस'[यमामा के अंधे कुँए वाले], समूद [सालेह अलै. की क़ौम], (12)
आद [हूद अलै. की क़ौम], फ़िरऔन [मिस्र के राजा] , लूत के भाई [सदूम व अमूरह के लोग], (13)
'अल-ऐका' [जंगलों में रहनेवाली शोऐब अलै. की क़ौम] और तुब्बा [यमन के बादशाह अलहमैरी] के लोग भी थे : इन सभी लोगों ने अपने-अपने पैग़म्बरों [messengers] की बातों में विश्वास नहीं किया, अन्ततः जिस सज़ा की चेतावनी मैंने दे रखी थी वह सच हो कर रही. (14)
तो क्या हम पहली बार सारी सृष्टि को पैदा करने में असमर्थ रहे? बिल्कुल नहीं! मगर तब भी वे दोबारा पैदा किए जाने के बारे में सन्देह में पड़े हैं. (15)
हमने मनुष्य को पैदा किया है--- हम उसके दिल में पैदा होनेवाली बातों को भी जानते हैं : और हम उसके गर्दन की रग [Jugular vein] से भी ज़्यादा उससे नज़दीक हैं--- (16)
क्योंकि (हर अच्छे बुरे कर्म की जानकारी) प्राप्त करनेवाले दो (फ़रिशते), लिखने के लिए बैठे रहते हैं, एक उस आदमी के दायीं तरफ़, और दूसरा उसके बायीं तरफ़ : (17)
आदमी हर वक़्त उन (फ़रिश्तों) की निगरानी में होता है, कोई एक शब्द मुँह से निकला नहीं कि उसे लिख लिया जाता है. (18)
और मौत की बेहोशी अपने साथ सच्चाई को साथ ले आएगी : “ यही वह चीज़ है जिससे तू भागने की कोशिश करता था.” (19)
और नरसिंघे को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा : “ यही है वह दिन जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी.” (20)
हर आदमी इस हाल में आएगा कि उसके साथ एक (फ़रिश्ता) हँका कर लानेवाला होगा और दूसरा गवाही देनेवाला : (21)
“ तुम ने इस (दिन) की हक़ीक़त पर कभी ध्यान नहीं दिया; तुम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था, और आज हमने तुमसे वह पर्दा हटा दिया, सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ हो गई है.” (22)
उसके साथ रहनेवाला (फ़रिश्ता) कहेगा, "यह है (इसके कर्मों का लेख-जोखा) जो मैंने तैयार कर रखा है---- (23)
(दोनों फ़रिश्तों को हुक्म होगा), "फेंक दो, जहन्नम में! ज़िद पर अड़े हुए हर उस विश्वास न करने वाले [काफ़िर] को, (24)
जो हर एक को भलाई से रोकता था, मर्यादा की सीमाएं तोड़ता था और (सच्चाई की बातों में) लोगों को सन्देह में डालता था, (25)
जिसने अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं को अपना प्रभु बना रखा था। फेंक दो उसे कठोर यातना में! "--- (26)
उसका (शैतान) साथी कहेगा, "ऐ हमारे रब! मैंने इसे नहीं बहकाया था, बल्कि वह ख़ुद पहले से ही बहुत ज़्यादा भटका हुआ था ।" (27)
अल्लाह कहेगा, "मेरे सामने झगड़ा मत करो। मैंने तो तुम्हें (यातना की) चेतावनी भेजी थी (28)
और मेरी कही हुई बात बदला नहीं करती : और मैं अपने किसी बन्दे पर कोई अन्याय नहीं करता।" (29)
उस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अब और कोई नहीं है?" (30)
लेकिन नेक लोगों के लिए जन्नत नज़दीक लायी जाएगी, इतनी नज़दीक कि अब कुछ भी दूरी न रहेगी : (31)
"यही है वह चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था--- यह हर उस आदमी के लिए है जो पूरे मन से अक्सर अल्लाह की तरफ़ (तौबा के लिए) झुकता हो और हर समय उसे अपने मन में बसाए रखता हो; (32)
"जो बेहद दयालु रब से डरता हो, हालाँकि उसे देखा नहीं जा सकता, और जब उसके सामने आता हो तो उसका दिल पूरी भक्ति भाव से उसके आगे झुकता हो--- (33)
"तो अब सलामती के साथ दाख़िल हो जाओ इस (जन्नत) में, वह दिन कभी ख़त्म न होनेवाली ज़िंदगी का दिन होगा.” (34)
उनके लिए वहाँ (जन्नत में) वह सब कुछ होगा जिस चीज़ की भी वे इच्छा करेंगे, और हमारे पास (देने के लिए) उससे अधिक भी है. (35)
इन (मक्का के काफ़िरों) से पहले हम काफ़िरों की इनसे भी अधिक मज़बूत नस्लों को तहस-नहस कर चुके हैं, वे धरती के बड़े हिस्से पर मारे फिरे--- मगर क्या भागने की कोई जगह थी? (36)
सचमुच इसमें हर उस आदमी के लिए सीखने और याद रखने का सामान है जिसके पास दिल हो, और जो कोई ध्यान लगा कर सुनता हो. (37)
हमने आसमानों, ज़मीन और जो कुछ उनके बीच में है, सब कुछ छः दिनों[कालों] में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान न हुई. (38)
अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, उस पर आप धैर्य से काम लें; और सूरज के निकलने से पहले भी और सूरज के निकलने के बाद भी अपने रब की प्रशंसा का गुणगाण करते रहें; (39)
और रात की घड़ियों में भी उसकी बड़ाई का बखान करें, और हर नमाज़ [सजदों] के बाद भी; (40)
और ध्यान से सुनो उस दिन की बात जिस दिन एक पुकारनेवाला बहुत पास से पुकारेगा, (41)
वे लोग उस दिन (अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच सुनेंगे। (42)
हम ही तो हैं जो ज़िंदगी भी देते हैं और मौत भी, और अंत में सबको हमारी ही पास लौट कर आना है। - (43)
जिस दिन धरती को फाड़ दिया जाएगा, वे [मुर्दा लोग] बहुत तेज़ी से बाहर निकल पड़ेंगे--- यह इकट्ठा करना हमारे लिए बेहद आसान है. (44)
जो कुछ भी वे [मक्का के काफ़िर] कहते हैं, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं. [ऐ रसूल] आप उन्हें ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने के लिए तो हैं नहीं । अतः आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें, हर उस आदमी को जो हमारी चेतावनी से डरता हो. (45
सूरह 90: अल-बलद
[मक्का शहर, The City]
1. मैं
इस शहर (मक्का) की क़सम खाता हूँ---
2. और आप [ए रसूल!] इसी शहर में तो रहते हैं ---
3. (और क़सम खाता हूँ आपके) बाप [आदम अलैहिस्सलाम] की और (उनकी) संतानों की,
4. बेशक हमने मनुष्य को कष्ट में (फंसा रहने वाला) बनाया है o
5. क्या वह यह समझता है कि इस पर किसी का बस नहीं चलेगा?
6. वह (बड़े गर्व से) कहता है कि “ मैंने ढेरों माल उड़ा डाला है” o
7. क्या वह यह सोचता है कि उसे (बेकार चीज़ों में खर्च करते हुए) किसी ने देखा नहीं ?,
8. क्या हमने उसे दो आंखें नहीं दीं ?,
9. और (उसे) एक ज़बान और दो होंठ (नहीं दिए) ?,
10 और हमने इसे (अच्छाई और बुराई के) दोनों रास्ते साफ़-साफ़ दिखा दिए o
11. वह तो (धर्म का पालन करने और अच्छे कर्मों को करने के लिये) कठिन रास्तों वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं o
12. और आप क्या जानें कि वह घाटी क्या है ? o
13. किसी की गर्दन को (गुलामी या क़र्ज़ से) आज़ाद कराना,
14. या भूख वाले दिनों में (यानी अकाल और गरीबी के दौर में गरीबों और लाचार व असहाय लोगों को) खाना खिला देना,
2. और आप [ए रसूल!] इसी शहर में तो रहते हैं ---
3. (और क़सम खाता हूँ आपके) बाप [आदम अलैहिस्सलाम] की और (उनकी) संतानों की,
4. बेशक हमने मनुष्य को कष्ट में (फंसा रहने वाला) बनाया है o
5. क्या वह यह समझता है कि इस पर किसी का बस नहीं चलेगा?
6. वह (बड़े गर्व से) कहता है कि “ मैंने ढेरों माल उड़ा डाला है” o
7. क्या वह यह सोचता है कि उसे (बेकार चीज़ों में खर्च करते हुए) किसी ने देखा नहीं ?,
8. क्या हमने उसे दो आंखें नहीं दीं ?,
9. और (उसे) एक ज़बान और दो होंठ (नहीं दिए) ?,
10 और हमने इसे (अच्छाई और बुराई के) दोनों रास्ते साफ़-साफ़ दिखा दिए o
11. वह तो (धर्म का पालन करने और अच्छे कर्मों को करने के लिये) कठिन रास्तों वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं o
12. और आप क्या जानें कि वह घाटी क्या है ? o
13. किसी की गर्दन को (गुलामी या क़र्ज़ से) आज़ाद कराना,
14. या भूख वाले दिनों में (यानी अकाल और गरीबी के दौर में गरीबों और लाचार व असहाय लोगों को) खाना खिला देना,
15. किसी
नज़दीकी रिश्तेदार यतीम (अनाथ) को,
16. या सख़्त गरीबी के मारे हुए मोहताज जो धूल में पड़े होते हैं (और बेघर है),
17. फिर (शर्त यह है कि ऐसे काम करने वाला) वह व्यक्ति उन लोगों में से हो जो ईमान लाये हैं और एक दूसरे को धैर्य से जमे रहने की नसीहत करते हैं और आपस में दया भाव रखने पर ज़ोर देते हैं o
18. यही लोग दाहिने ओर वाले (यानी अच्छी क़िस्मत वाले और क्षमा किये गये) हैं,
19. और जिन लोगों ने हमारी आयतों को मानने से इन्कार किया वह बायीं ओर वाले हैं (यानी बदक़िस्मत और पापी) हैं,
20 उनको आग में डालकर हर तरफ से बंद कर दिया जाएगा !
16. या सख़्त गरीबी के मारे हुए मोहताज जो धूल में पड़े होते हैं (और बेघर है),
17. फिर (शर्त यह है कि ऐसे काम करने वाला) वह व्यक्ति उन लोगों में से हो जो ईमान लाये हैं और एक दूसरे को धैर्य से जमे रहने की नसीहत करते हैं और आपस में दया भाव रखने पर ज़ोर देते हैं o
18. यही लोग दाहिने ओर वाले (यानी अच्छी क़िस्मत वाले और क्षमा किये गये) हैं,
19. और जिन लोगों ने हमारी आयतों को मानने से इन्कार किया वह बायीं ओर वाले हैं (यानी बदक़िस्मत और पापी) हैं,
20 उनको आग में डालकर हर तरफ से बंद कर दिया जाएगा !
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. आसमान (के ज़बरदस्त फैलाव और असीमित अंतरिक्ष) की क़सम और रात को (नज़र) आने वाले की क़सम o
2. और आपको क्या मालूम कि रात को (नज़र) आने वाला क्या है ? o
3. चमकते हुए तारे ! (जो चमक कर आकाश को रौशन कर देता है) o
4. कि कोई जान ऐसी नहीं जिस पर एक निगरानी करने वाला [watcher] (नियुक्त) नहीं है o
5. इसलिए मनुष्य को सोच विचार करना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा किया गया है? o
6. वह ज़ोर से उछलते हुए पानी (यानी शुक्राणु, sperm) से पैदा किया गया है o
7. जो (माता की) पीठ और सीने की हड्डियों के बीच ( माँ के कोख में) से गुजर कर बाहर निकलता है : o
8. (जिस तरह माँ के कोख से निकलता है, उसी तरह क़ब्र से भी ज़िंदा निकलेगा !) बेशक वह [अल्लाह] इसे दोबारा पैदा करने में पूरी तरह सक्षम है o
9. जिस दिन (दिलों में छुपी हुई) राज़ की बातों को परखा जायेगा o
10. फिर मनुष्य के पास न (स्वयं) कोई ताक़त होगी और न कोई (उसको) मदद करने वाला होगा o
11. क़सम है बारिश बरसाने वाले आकाश की o
12. और क़सम है फट जाने वाली धरती की (जो बारिश के बाद कोंपल निकलने से फट जाती है, उसी तरह क़यामत के दिन आदमी के क़ब्र से बाहर निकलने पर फटेगी) o
13. बेशक यह निर्णायक फरमान है (जो हो के रहेगा) o
14. और यह हंसी मज़ाक़ की बात नहीं है o
15. बेशक वे (काफ़िर लोग) अपनी चाल चलने में लगे हुए हैं o
16. और मैं अपनी तदबीर [strategy] में लगा हूँ o
17. इसलिये आप (ऐ रसूल) काफिरों (इनकार करने वालों) को (ज़रा) मोहलत दे दीजिए, (अधिक नहीं बस) उन्हें थोड़ी सी ढील (और) दे दीजिए o
सूरह 54 : अल क़मर [चाँद, The Moon]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़यामत की घड़ी निकट आ पहुँची है, और चाँद दो टुकड़े हो गया; (1)
किन्तु उन (मक्का के काफिरों) का हाल यह है कि यदि वे कोई निशानी [चमत्कार] देखते हैं तो मुँह मोड़ लेते हैं और कहते हैं, "यह तो वही पुराना जादू है जो पहले से चला आ रहा है!" (2)
उन्होंने सच्चाई [रसूल की निशानियों] को मानने से इंकार किया और अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े--- किन्तु हर मामले के लिए एक नियत समय ठहरा दिया गया है। (3)
हालाँकि उनके पास (पिछ्ली क़ौमों की) ऐसी चेतावनी भरी घटनाओं की खबरें आ चुकी थीं जिनसे सबक़ लेते हुए बुराइयों(व अवज्ञा) से बचना चाहिए था----- (4)
(क़ुरआन में) दिल में उतर जाने वाली समझदारी व ज्ञान की बातें हैं, किन्तु इन चेतावनियों का उनपर कुछ असर नहीं हो रहा है! - (5)
अतः [ए रसूल!] आप उनकी परवाह न करें - जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक अत्यन्त अप्रिय घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा; (6)
वे अपनी आँखें झुकाए हुए अपनी क्रबों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली टिड्डियाँ हों; (7)
दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर! --- यही (क़यामत का) इनकार करनेवाले कहेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (8)
इनसे पहले नूह की क़ौम ने भी सच मानने से इंकार किया था. उन्होंने हमारे बन्दे को झूठा ठहराया और कहा, "यह तो दीवाना है!" और उन्हें बुरी तरह झिड़का गया (9)
अन्त में उसने अपने रब को पुकारा कि "मैं बेबस हो चुका हूँ, अब आप ही बदला लीजिए।" (10)
तब हमने मूसलाधार बरसते हुए पानी के साथ आकाश के द्वार खोल दिए; (11)
और धरती के भीतर से पानी के सोते [gushing spring] प्रवाहित कर दिए, और इस तरह (आकाश और धरती का) सारा पानी उस काम के लिए एक साथ मिल गया जो (उनकी तबाही के लिए) नियति में तय हो चुका था (12)
और हमने उन्हें [नूह अलै. व उनके साथियों को] एक तख़्तों और कीलोंवाली (नौका) पर सवार किया, (13)
जो हमारी देख-रेख में (सुरक्षित) चल रही थी - यह बदला था उस व्यक्ति [नूह अलै.] के लिए जिसको मानने से इंकार किया गया था। (14)
बेशक हमने इस [घटना/नौका] को एक निशानी के रूप में छोड़ दिया : फिर क्या कोई है जो नसीहत हासिल करे ? (15)
तो अब सोचो कि कैसी रही मेरी (भयानक) यातना और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ ! (16)
और हक़ीक़त यह है कि हमने क़ुरआन को सबक़ सीखने [शिक्षा ग्रहण] के लिए आसान बना दिया है : फिर क्या कोई है जो नसीहत हासिल करे? (17)
आद की क़ौम ने भी (पैग़म्बर के संदेश को) झुठलाया, तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) यातना और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ ! (18)
निश्चय ही हमने एक तबाही वाले मनहूस दिन उन लोगों पर भयानक आवाज़ वाली एक प्रचंड आँधी भेज दी थी (19)
जो लोगों को (इस तरह) उखाड़ फेंकती थी मानो वे उखड़े हुए खजूर के तने हों (20)
तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) यातना और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ ! (21)
और हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए अनुकूल और सहज बना दिया है। फिर क्या है कोई नसीहत हासिल करनेवाला? (22)
समूद की क़ौम ने भी (पैग़म्बर सालेह अलै. द्वारा दी गयी) चेतावनियों को मानने से इंकार किया; (23)
और कहने लगे, "क्या? (हमारे जैसा) एक आदमी? क्या हम उस अकेले आदमी के पीछे चलेंगे, जो हम में से ही है?, तब तो वास्तव में हम बड़ी गुमराही और दीवानेपन में पड़ जाएंगे !” (24)
"क्या हमारे बीच वह ही एक आदमी बचा था जिस पर (अल्लाह की ओर से) नसीहतें उतारी गयीं हैं? नहीं, बल्कि वह तो बड़ा झूठा और घमंडी है! " (25)
(तब हम ने पैग़म्बर सालिह अलै से कहा कि) "कल ही उन्हें पता चल जायेगा कि कौन बड़ा झूठा, और डींगें मारनेवाला है, (26)
हम उनकी परीक्षा लेने के लिए ऊँटनी को उनके पास भेज रहे है : अतः आप उन्हें देखते जाएं और धैर्य से काम लें (27)
"और उन्हें बता दें कि उनके (और ऊँटनी के) बीच पानी का बँटवारा होगा : और हर एक हिस्सेदार को उसकी बारी आने पर ही पानी मिलेगा।" (28)
अन्ततः उन्होंने (क़दार नामक) अपने साथी को पुकारा, उसने (तलवार खींची और) ऊँटनी के पाँव की कूचें [Hamstrung] काट कर उसे मार डाला (29)
तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) यातना और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ ! (30)
फिर हमने उनपर एक बड़ा भयानक और ज़ोर का धमाका छोड़ा, और वे ऐसे हो गए मानो किसी बाड़वाले [fence maker] की सूखी लकड़ियों के चूर हों (31)
हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए आसान बना दिया है। फिर क्या है कोई नसीहत हासिल करनेवाला? (32)
लूत की क़ौम ने भी चेतावनियाँ देने वालों को मानने से इंकार किया (33)
सो हमने उनपर पथराव करनेवाली तेज़ आँधी भेज दी, (मगर) लूत(अलै.) के घरवालों को छोड़्कर, जिन्हें हमने भोर होने से पहले बचा लिया था, (34)
यह हमारी तरफ से ख़ास करम था : हम शुक्र अदा करनेवालों को ऐसा ही इनाम दिया करते हैं (35)
(लूत) ने लोगों को हमारी पकड़ से सावधान कर दिया था, किन्तु उनलोगों ने चेतावनियों को मानने से सिरे से इंकार कर दिया---- (36)
यहाँ तक कि उन लोगों ने लूत के मेहमानों को भी उनके हवाले कर देने की माँग की---- , जिस पर हमने उनकी आँखों को अंधा कर दिया कि, "लो, अब चखो मज़ा मेरी (भयानक) यातनाओं और चेतावनियों (के पूरा होने) का!" (37)
सुबह सवेरे ही एक ऐसी भयानक यातना ने उन्हें आ घेरा जिनके निशान आज भी बाक़ी हैं (38)
"लो, अब चखो मज़ा मेरी यातनाओं और चेतावनियों (के पूरा होने) का!" (39)
और (सच यह है कि) हमने क़ुरआन को नसीहत हासिल करने के लिए आसान बना दिया है। फिर क्या है कोई नसीहत हासिल करनेवाला? (40)
और फ़िरऔन के लोगों के पास भी (मूसा अलै. द्वारा) चेतावनियाँ आयीं; (41)
उनलोगों ने हमारी सारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, तो (इसके नतीजे में) हमने उन्हें इस तरह धर-दबोचा, जिस तरह एक ज़बरदस्त ताक़त व प्रभुत्ववाले की पकड़ होती है (42)
क्या तुम्हारे (मक्का के) काफ़िर उन (पहले के) लोगो से अच्छे है या (ख़ुदा की) किताबों में तुम्हारे लिए कोई छुटकारा लिखा हुआ है? (43)
या शायद वे कहते है, "हम एक मज़बूत दल हैं और हम (रसूल के साथ मुक़ाबले में) विजयी होंगे?" (44)
(सच्चाई यह है कि) शीघ्र ही वह दल बुरी तरह पराजित होकर रहेगा और वे पीठ दिखाकर भाग खड़े होंगे (45)
यही नहीं, बल्कि उनसे असल वादा उस (क़यामत की) नियत घड़ी का है, और वह घड़ी बहुत अधिक मुसीबत वाली और बेहद कटु होगी! (46)
निस्संदेह, अपराधी लोग बड़ी गुमराही और दीवानेपन में पड़े हुए है (47)
जिस दिन उनको मुँह के बल आग में घसीटा जायेगा,(उस दिन उन्हें होश आ जायेगा, कहा जाएगा) "चखो मज़ा आग में जलने का!" (48)
बेशक, हमने हर चीज़ को उसके सही अनुपात में पैदा किया है, (49)
हम जिस चीज़ का आदेश देते हैं, वह तो बस पलक झपकते ही (पूरा) हो जाता है, (50)
हम तुम्हारे जैसे बहुत लोगों को (पहले) तबाह-बर्बाद कर चुके है। फिर क्या है कोई, जो नसीहत हासिल करे ? (51)
जो जो काम उन्होंने किए हैं, वह सब कुछ (कर्मों की बही में) लिखा हुआ है : (52)
छोटा हो या बड़ा, हर एक काम का हिसाब लिख कर रखा जाता है (53)
हाँ, सच्चे व बुराइयों से बचनेवाले लोग (सुकून से) बाग़ो और नहरों के बीच रहेंगे, (54)
सच्ची प्रतीष्ठावाले (सुरक्षित) स्थान पर !, उस बादशाह के निकट जिसके क़ब्ज़े में सब तरह की शक्तियाँ हैं (55)
सूरह 38: साद [Saad]
अल्लाह
के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
साद।
मगर, (सच्चाई से)
इंकार करने पर अड़े लोग-- अपनी बड़ाई के घमंड, ज़िद्द और
दुश्मनी के भाव में डूबे हुए हैं (2)
उनलोगों से पहले हम कितनी ही पीढ़ियों
को मिटा चुके हैं ! (मुसीबत देख कर) वे सभी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाये थे, मगर बचकर निकल जाने के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी. (3)
उन (मक्का के) विश्वास न करनेवालों को यह बात
अजूबा लगी कि उन्हें सावधान करने के लिए एक रसूल उन्हीं के बीच का कैसे आ गया है :
वे कहने लगे, "यह बड़ा झूठा जादूगर है. (4)
वह यह दावा कैसे कर सकता है कि सारे भगवानों
के बदले केवल एक भगवान[ख़ुदा] होता है ? निस्संदेह यह तो
बहुत अचम्भेवाली बात है!" (5)
और उनके सरदार यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि
"चलो यहाँ से! और अपने भगवानों की आस्था में जमे रहो! निस्संदेह तुम सब को
ऐसा ही करना चाहिए. (6)
क्या हम सबमें
से (चुनकर) केवल इसी के पास अल्लाह का संदेश भेजा गया है?" नहीं! सच्चाई यह है कि उन्हें मेरी धमकियों पर संदेह है; असल में उन्होंने अभी तक मेरी यातना का मज़ा चखा ही नहीं है! (8)
आपका रब जो बड़ी ताक़तवाला और बड़ा दाता है, क्या उसकी रहमत [दयालुता] के सारे ख़ज़ाने उन्हीं के पास हैं ? (9)
या आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है, उन सब चीज़ों पर क्या उन्हीं का क़ब्ज़ा है ? (अगर है, तो) उन्हें रस्सियाँ बाँध कर ऊपर (आसमान में) चढ़ जाना चाहिए. (10)
उनसे पहले नूह की क़ौम और आद और मज़बूती से
जमे हुए फ़िरऔन के लोगों ने रसूलों को मानने से इंकार किया. (12)
और समूद ने और
लूत की क़ौम ने और 'ऐकावाले'(जंगल मे
रहनेवाले शुएब के लोग) भी—इनमें से हर एक ने (रसूलों के) विरोध में गुट
बनाए . (13)
उन सभी ने रसूलों को (झूठा बताते हुए) मानने
से इंकार कर दिया, और वे इसी लायक़ थे कि मेरी यातना उनपर टूट
पड़े : (14)
और यह (मक्का के) विश्वास न करनेवाले[ काफ़िर]
लोग भी बस एक धमाके के इंतेज़ार में हैं, (समय आ जाने
पर) जिसे टाला नहीं जा सकता है. (15)
वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब!
हिसाब के दिन[क़यामत] से पहले ही हमारे हिस्से की सज़ा हमें जल्दी से जल्दी दे
दे ! " (16)
वे जो कुछ कहते
हैं, उस पर [ऐ रसूल] आप धैर्य व सब्र से काम लें.
हमारे बन्दे दाऊद [David] को याद करें, जो बड़ा ताक़तवर
आदमी था और बेशक वह हमेशा (तौबा के लिए) हमारी ओर भक्ति भाव से झुकता था. (17)
हमने पर्वतों को इस तरह उसके वश में कर दिया था कि सूरज के निकलते वक़्त और डूबते
वक़्त (पर्वत भी) उसके साथ मिलकर हमारा गुणगान करेते थे; (18)
हमने उसकी सल्तनत को मज़बूती प्रदान की थी, उसे ज्ञान व समझ-बूझ दिया था और बात कहने का ऐसा अंदाज़ दिया था कि उनकी बातें
निर्णायक होती थी . (20)
और क्या आपने उन दो विवाद करनेवालों की कहानी
सुनी है जब वे दीवार पर चढ़कर उस [दाऊद] के एकान्त कक्ष मे घुस आए थे? (21)
जब वे दाऊद के पास पहुँचे, तो वह (अचानक उन्हें देखकर) घबरा गया, वे बोले, "डरिए नहीं, हम दो विवादी हैं। हममें से एक ने दूसरे पर
ज़्यादती की है : तो अब आप हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दीजिए--- नाइंसाफ़ी मत
कीजिए--- और हमें सही मार्ग दिखा दीजिए. (22)
यह मेरा भाई है।
इसके पास निन्यानवे भेड़ें हैं और मेरे पास एक ही भेड़ है। अब इसका कहना है कि ‘ इसे भी मुझे सौंप दो ’ और बातचीत में (यह इतना तेज़ है कि) इसने मुझे
दबा लिया है।" (23)
दाऊद ने कहा, "इसने अपनी भेड़ों
के झुंड में तेरी भेड़ को मिला लेने की माँग करके निश्चय ही तुझपर ज़ुल्म किया है।
साथ मिलकर काम करनेवाले बहुत सारे लोग एक-दूसरे पर ज़्यादती करते हैं. हाँ, जो लोग ईमान के पक्के हैं और अच्छे कर्म करते हैं, वे ऐसा नहीं करते, मगर ऐसे लोग बहुत कम हैं ।"
[तब ही] दाऊद को बात समझ में आ गयी कि असल में
हम उसकी परीक्षा ले रहे थे। अतः उसने अपने रब से माफ़ी माँगी, घुटनों के बल गिर पड़ा और (गुनाहों से) तौबा की : (24)
तो हमने उसका(क़सूर) माफ़ कर दिया। इनाम में
उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की
बेहतरीन जगह है. (25)
"ऐ दाऊद! हमने धरती पर तुम्हें मालिक [ख़लीफ़ा, उत्तराधिकारी] बनाया है। अतः तुम लोगों के बीच इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करना. अपनी
इच्छाओं के पीछे मत भागते चलना, कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें अल्लाह के
मार्ग से भटका दे : याद रखो,
जो लोग उसके
मार्ग से भटक जाते हैं, निश्चय ही उनके लिए दर्दनाक यातना होगी
क्योंकि वे हिसाब के दिन[क़यामत] को भुला बैठते हैं .” (26)
हमने आसमान व
ज़मीन और उनके बीच की हर एक चीज़ को, यूँ ही बिना
मक़सद के नहीं पैदा कर दिया है। हाँ, भले ही (सच्चाई
से) इंकार करनेवाले[काफ़िर] ऐसा मान सकते हैं ---ओह (जहन्नम की) आग में कैसी
दुर्गति होगी उनकी !---- (27)
मगर, जो ईमान रखते
हैं और अच्छे कर्म करते हैं,
क्या हम उनके
साथ ठीक वैसा ही सलूक करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ जो धरती पर बिगाड़ पैदा करते
हैं ? वे जो बुराइयों से बचते हैं व जिनके ध्यान
में हर समय अल्लाह होता है, और वे जो बेधड़क सारी सीमाओं को तोड़ डालते
हैं—क्या हम दोनों के साथ एक समान सलूक करेंगे? (28)
यह किताब [क़ुरआन] एक वरदान है जो [ऐ रसूल!]
आप पर उतारी गयी है, ताकि लोग इसके संदेशों पर सोच-विचार कर सकें
और समझदार लोग इसे ध्यान से सुनें और उस पर अमल करें । (29)
और हमने दाऊद को सुलैमान[Solomon] (जैसा बेटा) दिया। वह बहुत अच्छा बन्दा था और
हमेशा ही (तौबा के लिए) अल्लाह के सामने झुकता था। (30)
(ऐसा हुआ कि) जब दिन ढलने के समय उसके सामने
अच्छी नस्ल के, तेज़ दौड़नेवाले उम्दा घोड़ों की परेड करायी
गयी, (31)
तो वह (देखकर)कहता जाता, " मेरा इन उम्दा चीज़ों के प्रति प्रेम, असल में अपने रब
को याद करने का एक ज़रिया है !" यहाँ तक कि वे (घोड़े) नज़रों से ओझल हो
गए---- (32)
निश्चय ही हमने सुलैमान को भी परीक्षा में
डाला, और हमने उसे (इतना कमज़ोर कर दिया कि वह) अपने
तख़्त पर एक ढाँचा मात्र रह गया था।(34)
फिर वह मेरी ओर (तौबा के लिए) झुका, और उसने दुआ की : "ऐ मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे!
और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद फिर किसी की
ऐसी हुकूमत न हो---- इसमें शक नहीं कि तू सबसे ज़्यादा दिल खोलकर देनेवाला
है।"(35)
तब हमने हवा को उसके वश में कर दिया, इस तरह जहाँ कहीं भी वह जाना चाहता, हवा उसकी इच्छा के अनुसार हौले-हौले चला करती थी. (36)
और जिन्नों (व शैतानों) को भी (उसके वश में
कर दिया)----- जिनमें हर तरह के निर्माण करनेवाले और
ग़ोताख़ोर थे, (37)
"यह हमारी तरफ़ से तोहफ़ा है, अब तुम्हारी मर्ज़ी--- चाहो तो इसमें से कुछ दो या अपने पास रखो ! इस पर कोई
हिसाब-किताब नहीं होगा।" (39)
हमारे बन्दे अय्यूब[Job] को याद करो, जब उसने अपने रब को(मुसीबत में) पुकारा था "शैतान ने
मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी है।" (41)
और(इस तरह) हमने उसे उसके
परिवारवालों से दोबारा मिला दिया, और साथ में उनके जैसे और लोगों को भी: यह एक निशानी थी हमारी रहमत
[दयालुता] की और सबक़ था उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं। (43)
(हम ने उससे कहा) "और अपने हाथ में तिनकों का एक छोटा मुट्ठा लो और उससे (अपनी
पत्नी को) मारो और अपनी क़सम मत तोड़ो।" हमने उसे बुरे वक़्तों में भी बड़ा
धैर्य व सब्र करनेवाला पाया, क्या ही अच्छा बन्दा था वह ! निस्संदेह वह भी हमेशा अल्लाह
के सामने(तौबा के लिए) झुकनेवाला था. (44)
हमारे बन्दों में इब्राहीम[Abraham], इसहाक़[Isaac] और याक़ूब[Jacob] को भी याद करो, यह सभी (नेक अमल की) ताक़त और (सूझ-बूझ की)
नज़र रखते थे. (45)
हम ने उन्हें दिल से (परलोक के) आख़िरी घर की
याद करनेवाला बनाया था, जो हम पर पूरी भक्तिभाव से समर्पित थे : (46)
हमारे बंदों में
इस्माईल[Ishmael], अल-यसा’[Elisha]और ज़ुलकिफ़्ल[Dhu’l-Kifl] को भी याद करो, इनमें से सभी बेहतरीन लोगों में से थे. (48)
यह एक नसीहत से भरा संदेश है। बेशक जिनके
ध्यान में अल्लाह बसा होता है, उनके लिए (जन्नत में) लौट कर जाने का अच्छा
ठिकाना होगा : (49)
उनमें वे (आराम से) तकिया लगाए हुए
बैठे होंगे; वे बहुत-से फल-मेवे और पीने की चीज़ें
मँगवाते होंगे; (51)
हिसाब-किताब[क़यामत] के दिन के लिए यही वह
(नेमतों से भरी) चीज़ है, जिसका तुमसे वादा किया जाता है. (53)
(उनके नेताओं से कहा जाएगा),
"यह लोगों का एक और बड़ा दल है
जो तुम्हारे पास दौड़ा चला आ रहा है.” (जवाब
मिलेगा), “ कोई आवभगत उनके लिए नहीं! वे तो आग में जलनेवाले हैं
।" (59)
वे (नेता) उनसे कहेंगे,
"तुम्हारा यहाँ कोई स्वागत नहीं
होगा! तुम्हीं तो हो जो यह(मुसीबत) हमारे ऊपर ले कर आए हो, रहने के लिए बहुत ही बुरा
ठिकाना(दुखदायी अंत) , " (60)
हक़ीक़त में बिल्कुल ऐसा ही होगा : (जहन्नम की) आग में
रहनेवाले एक दूसरे पर इसी तरह इल्ज़ाम लगाएंगे. (64)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो बस यहाँ
चेतावनी देने के लिए हूँ। उस एक अल्लाह के सिवा कोई (ख़ुदा) इबादत के लायक़ नहीं, ताक़त
में वह सबसे बड़ा है ; (65)
वह आसमानों और ज़मीन का, और
हर चीज़ जो इन दोनों के बीच है उन सबका मालिक है, सारी चीज़ उसके क़ब्ज़े में है, और वह बहुत माफ़
करनेवाला है।" (66)
मुझे ऊपर (फ़रिश्तों) की दुनिया की कोई जानकारी
नहीं कि वे आपस में किस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे : (69)
मुझे तो वही[revelation] के
द्वारा बस यही बताया गया है, मेरा काम यहाँ साफ़ व खुले तौर पर चेतावनी देना
है।" (70)
तो जब मैं उसको पूरी तरह ठीक-ठाक कर दूँ औऱ
उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो उसके आगे सज्दे में झुक जाना।" (72)
अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तूझे
किस चीज़ ने उस आदमी के सामने झुकने से रोक दिया जिसे मैंने ख़ुद अपने हाथों से
बनाया है ? क्या तू अपने आप को महान या कोई ऊँची हस्ती
समझता है?" (75)
मगर इबलीस ने कहा, "ऐ मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए(जीने की) मोहलत दे, जबकि लोग (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे," (79)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं इस (संदेश को पहुँचाने) के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, और न मैं अपने बारे में ऐसा कोई दावा करता हूँ, जो मैं नहीं
हूँ" : (86)
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