सूरह समूह IV
उप समूह “क”:
सूरह 51: अज़-ज़ारियात
[उड़ाकर बिखेर देने वाली हवा, Scattering winds]
यह एक मक्की सूरह है, इसमें प्रकृति की बहुत सारी निशानियाँ बतायी गई हैं जिन्हें क़यामत के दिन दोबारा ज़िंदा करने को सबूत के तौर पर पेश किया गया है, उनमें से वह हवाएं भी हैं जो चीज़ों को बिखेरकर रख देती हैं (आयत 1), जिसके नाम पर इस सूरह का नाम पड़ा है। विश्वास न करनेवालों को पिछली पीढ़ियों द्वारा हुक्म न मानने की विद्रोही प्रवृति के चलते होने वाले भयानक अंजाम याद दिलाए गए हैं, और पैग़म्बर साहब से कहा गया है कि वह लोगों को अच्छे काम की नसीहत करने के अपने मिशन में लगे रहें।
विषय:
1-19: जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला होना पक्का है, और यह होकर रहेगा।
20-23: अल्लाह की ताक़त की निशानियाँ और जीने के लिए रोज़ी
24-37: इबराहीम अलै. और उनके यहाँ आए हुए मेहमानों का क़िस्सा
38-40: मूसा (अलै.) और फ़िरऔन
41-46: आद, समूद और नूह' की क़ौम
47-51: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
52-55: पहले के रसूलों की बात को भी ठुकराया गया था
56-58: जिन्नों और इंसानों को अल्लाह की बंदगी करने के लिए पैदा किया गया है
59-60: विश्वास न करने वालों को सज़ा मिलेगी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है उन (हवाओं) की, जो दूर दूर तक फैल जाती हैं, (1)
और उनकी, जो बारिश की बूंदों से लदी होती हैं, (2)
जो आसानी से तेज़ गति के साथ चलती रहती हैं, (3)
जो उन (बारिशों) को बाँट देती हैं जैसा कि उन्हें हुक्म हुआ हो! (4)
जिस चीज़ का तुम (लोगों) से वादा किया जा रहा है, वह बिल्कुल सच्चा है: (5)
(कर्मों का) फ़ैसला ज़रूर होगा--- (6)
आसमान की क़सम जहाँ (तारों से भरे) रास्ते हैं, (7)
तुम [लोग] (मरने के बाद के जीवन पर) अलग-अलग व परस्पर विरोधी बातों में पड़े हुए हो ---- (8)
इस [परलोक की हक़ीक़त] से जो लोग मुँह मोड़ते हैं, वे सच्चाई को समझने में (पूरी तरह) धोखा खा चुके हैं। (9)
तबाह हो जाएँ वे, (जो बिना किसी आधार के) यूँ ही अटकलें लगाते और झूठी बातें बनाया करते हैं; (10)
जो ग़लतियों में ऐसे डूबे हुए हैं कि सब कुछ भुलाए बैठे हैं और उन्हें कुछ ख़बर नहीं! (11)
वे (व्यंग्य से) पूछते है, "वह फ़ैसले का दिन कब आएगा?" (12)
(कह दें), उस दिन आएगा, जब वे (जहन्नम की) आग पर तपाए जाएँगे, (13)
"चखो मज़ा अब अपनी सज़ा का! यही है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।" (14)
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले लोग (जन्नत के) बाग़ों और (बहते हुए) पानी के सोतों (springs) में (मज़े कर रहे) होंगे। (15)
उनका रब जो कुछ नेमत उन्हें देगा, वे उसे (ख़ुशी-ख़ुशी) ले रहे होंगे, क्योंकि वे इससे पहले (दुनिया में) अच्छे कर्म करने वाले थे: (16)
रातों को कम ही सोते थे, (17)
भोर के समय इबादत करते हुए अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते थे, (18)
और अपनी दौलत में से माँगनेवाले और ठुकराए हुए लोगों को बाक़ायदा हिस्सा देते थे। (19)
पक्का विश्वास रखने वालों के लिए इस धरती पर बहुत-सी निशानियाँ हैं--- (20)
और स्वयं तुम्हारे अंदर भी! तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता?--- (21)
तुम्हारी रोज़ी [sustenance] आसमान में (तय होती) है, और वह चीज़ [अंतिम फ़ैसला] भी, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है। (22)
क़सम है आसमान और ज़मीन के रब की! सचमुच यह बात ऐसी ही पक्की [Real] है जैसे तुम (अपने मुँह से) अभी बोल रहे हो। (23)
[ऐ रसूल!] क्या आपने इबराहीम के इज़्ज़तवाले मेहमानों का क़िस्सा सुना है? (24)
जब वे [फ़रिश्ते] इबराहीम के पास आए, तो "सलाम” कहा, (जवाब में इबराहीम ने भी) “सलाम” कहा, (और मन में सोचा)
"ये तो अजनबी लोग हैं।" (25)
फिर वह जल्दी से अपने घरवालों के पास गए, और एक मोटा-ताज़ा बछड़े (का भूना हुआ मांस) ले आए (26)
और उसे मेहमानों के सामने पेश किया। कहने लगे, "क्या आप लोग नहीं खाएंगे?" (27)
(इबराहीम को) उनसे डर महसूस होने लगा, मगर उन लोगों ने कहा, "डरिए नहीं", और उन्हें एक लड़के [इसहाक़] के होने की ख़ुशख़बरी दी, और कहा कि वह बड़े ज्ञानवाला होगा, (28)
इस पर उनकी बीवी [सारा] चिल्लाती हुई वहाँ आयीं, और वह (चकित व झेंपते हुए) अपने मुँह पर हाथ मारते हुए कहने लगीं, "एक बूढ़ी बाँझ औरत (बच्चा जनेगी!)!"
(29)
मेहमानों ने कहा, "ऐसा ही होगा, तेरे रब ने यही कहा है, और वह गहरी समझ-बूझ रखने वाला [Wise], सब कुछ जानने वाला है।" (30)
इबराहीम ने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) फ़रिश्तो, आप लोगों के यहाँ (धरती पर) आने का क्या मक़सद है?" (31)
उन्होंने कहा, "हमें ऐसे लोगों [लूत की क़ौम] के पास भेजा गया है जो गुनाहों में डूबे हुए हैं; (32)
"ताकि हम उनके ऊपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ, (33)
जिन पर (गुनाहों की) सीमा पार कर जाने वालों के लिए आपके रब की तरफ़ से ख़ास निशान भी लगा होगा।" (34)
फिर ऐसा हुआ कि उस बस्ती में जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने वहाँ से बाहर निकाल लिया; (35)
किन्तु हमने वहाँ केवल (लूत का) एक ही घर ऐसा पाया जिसमें रहने वाले अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले थे ---- (36)
इस तरह, हमने वहाँ (हमेशा के लिए) एक निशानी छोड़ दी, उन लोगों के लिए जो दर्दनाक यातना से डरते हों। (37)
मूसा [Moses] (की घटना) में भी ऐसी ही निशानियाँ हैं: हमने उन्हें फ़िरऔन [Pharaoh] के पास स्पष्ट प्रमाण [Clear Authority] के साथ भेजा था, (38)
किन्तु उस [फ़िरऔन] ने अपने सहायकों समेत सच्चाई से मुँह फेर लिया और (अपनी ताक़त के घमंड में) कहने लगा, (यह मूसा)
"जादूगर है या कोई दीवाना," (39)
अतः हमने उसे और उसकी सेना को धर-दबोचा और उन्हें समंदर में फेंक दिया: दोष भी उसी का था। (40)
और आद (की क़ौम की तबाही) में भी तुम्हारे लिए निशानी है जबकि हमने उन पर ज़िंदगी तबाह करने वाली आँधी भेजी, (41)
वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर करके भूंसा बना डाला। (42)
और समूद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए ऐसी ही निशानी है): जबकि उनसे कहा गया था, "थोड़े समय तक मज़े कर लो!"
[न सुधरे, तो तबाही आएगी] (43)
मगर उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर एक धमाकेदार कड़क ने उन्हें आ दबोचा और वे देखते ही रह गए: (44)
हाल यह हुआ कि अपना बचाव करना तो दूर, वे तो खड़े तक न रह पाए। (45)
और इससे भी पहले, नूह [Noah] की क़ौम को भी हमने अपनी पकड़ में लेकर तबाह किया था। वे सचमुच बड़े गुनाहगार लोग थे! (46)
हमने अपने हाथों (की क़ुदरत) से आसमानों को बनाया है और उसे बहुत विस्तार से फैलाया है, (47)
और धरती को हमने (रहने के लिए) बिछा दिया --- तो क्या ही अच्छे ढंग से हमने इसे सँवारा और बिछाया है! (48)
और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम [लोग] ध्यान दो और समझो। (49)
[अतः ऐ रसूल, आप उन लोगों से कह दें कि], “अल्लाह के आगे (गुनाहों की माफ़ी के लिए) जल्दी से झुक जाओ----
(यक़ीन करो), मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ ---
(50)
और किसी भी दूसरे देवता को अल्लाह के साथ बराबरी का न ठहराओ। मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ!” (51)
इसी तरह, उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के पास भी जब कभी कोई रसूल आया, तो उन्होंने भी (रसूलों को) "जादूगर या दीवाना कहा!"
(52)
क्या उन्होंने एक-दूसरे को ऐसा कहने के लिए पहले से तय कर रखा था? नहीं! बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने सारी हदें पार कर दी हैं, (53)
अतः [ऐ रसूल] उनकी तरफ़ ध्यान न दें --- अब आपका कोई दोष नहीं, (54)
और आप (लोगों को) बराबर नसीहतें देते रहें, क्योंकि याद दिलाते रहना ईमानवालों के लिए अच्छा होता है। (55)
मैंने तो जिन्नों और इंसानों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ही बन्दगी [worship] करें: (56)
मैं उनसे किसी तरह की रोज़ी (कमाई) तो नहीं चाहता, और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे (खाना) खिलाएँ --- (57)
अल्लाह तो ख़ुद ही है रोज़ी देनेवाला, बेहद ताक़तवाला, सबसे मज़बूत! (58)
जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है, और (उन जैसे) उनके साथी जो पहले गुज़र चुके हैं, उनके लिए तो यातनाओं का हिस्सा तय किया हुआ है ----
वे मुझसे जल्दी (यातनाओं के आने) की माँग न करें --- (59)
सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए उस दिन के कारण बड़ी ख़राबी होगी, जिसका उनसे वादा किया जा रह है। (60)
नोट:
4: यहाँ क़समें खाकर जो बात बयान की गई है, वह यह है कि क़यामत ज़रूर आएगी और कर्मों के अनुसार इनाम और सज़ा का फ़ैसला ज़रूर होगा। हवाओं की क़सम खाकर इस ओर ध्यान खींचा गया है कि जो अल्लाह इन हवाओं और उनके नतीजे में बरसने वाले पानी को नई ज़िंदगी का ज़रिया बनाता है, वह इस बात पर ज़रूर सक्षम है कि मुर्दा पड़े इंसानों को दोबारा ज़िंदा करके उठाए।
7: यहाँ उन रास्तों के बारे में कहा गया है जो हमें दिखाई नहीं देते, लेकिन फ़रिश्तों का आना जाना इन्हें रास्तों से होता है। कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि कभी कभी आसमान शब्द का प्रयोग हर ऊपर वाली चीज़ के बारे में होता है, और यहाँ ऊपर की वह जगह बतायी गयी है जिनमें तारों के नियत रास्ते बने हुए हैं।
8: यानी एक तरफ़ यह मानते हो कि अल्लाह ने ही सारी सृष्टि की रचना की है, और दूसरी तरफ़ उसकी यह क़ुदरत मानने से इंकार करते हो कि वह मरने के बाद इंसन को दोबारा ज़िंदा कर सकता है।
19: माँगने वाला तो वह है जो कि अपनी ज़रूरतों के लिए किसी से मुँह खोलकर माँगता हो, और ठुकराए हुए वे हैं जो ज़रूरतमंद होने के बावजूद किसी से कुछ नहीं माँगते।आदमी इनको जो कुछ देता है, वह कोई एहसान नहीं करता, बल्कि यह असल में उनका हक़ है जो उन्हें मिलना ही चाहिए था, क्योंकि अल्लाह ने धनदौलत में ज़रूरतमंदों का हिस्सा देने का हुक्म दिया है।
8: फ़रिश्ते कुछ खाते पीते नहीं हैं, इसलिए जब इबराहीम (अलै.) ने देखा कि वे कुछ खा नहीं रहे, तो उन्हें डर महसूस हुआ कि हो सकता है कि ये कोई दुश्मन हों।
32: हज़रत लूत (अलै.) की क़ौम पर जो भारी यातना आयी, उसका विवरण सूरह हूद (11:76--83) और सूरह हिज्र (15: 51--77) में भी आया है।
41: आद की क़ौम का विवरण सूरह अ'राफ़ (7:65) में और समूद की क़ौम का विवरण सूरह अ'राफ़ (7: 73) में विस्तार से हुआ है।
46: इस घटना का विस्तार से वर्णन सूरह हूद (11: 25--48) में आया है।
सूरह 69: अल-हाक़्क़ा
[वह सच्चाई जिससे इंकार न किया जा सके/ ज़रूर आनेवाली घड़ी, The Sure Reality/ The inevitable
Hour]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें पिछली पीढ़ियों के लोगों (आद, समूद, फिरऔन, लूत आदि) को इस दुनिया में मिलने वाली सज़ाओं का भी वर्णन है (आयत 4-12) और आने वाली दुनिया की सज़ाओं का भी उल्लेख है (13-18). ईमानवालों को जन्नत में मिलने वाले परम आनंद की तुलना जहन्नम की भयानक यातनाओं से की गई है (आयत 19-37). आयत 38 से 52 तक अल्लाह ने क़ुरआन और पैग़म्बर साहब की सच्चाई की पुष्टि करते हुए उन लोगों की दलीलों को रद्द किया है।
विषय:
01-12: विश्वास करने से इंकार करने वाले लोगों की बर्बादी
13-18: आख़िरी दिन [क़यामत] की दहशत
19-37: जन्नत और जहन्नम का दृश्य
38-52: क़ुरआन की सच्चाई
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
वह घड़ी [Inevitable Hour] जो ज़रूर आकर रहेगी (जिसकी सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता)! (1)
यह कौन सी घड़ी है जो ज़रूर आकर रहेगी? (2)
और [ऐ रसूल], आप क्या जानें कि वह ज़रूर आने वाली घड़ी क्या है? (3)
समूद [Thamud] और आद ['Ad] की क़ौम के लोगों ने इस बात को मानने से इंकार किया था कि (एक दिन तोड़-फोड़कर रख देने वाली) धमाकेदार टक्कर की घटना [क़यामत] होगी: (4)
समूद की क़ौम के लोग तो एक कान फाड़ देने वाले धमाके से मार डाले गए (जिससे उनके कलेजे फट गये थे); (5)
आद की क़ौम के लोग एक ऐसी तेज़ और बेक़ाबू आंधी से मार दिए गए (6)
जिसे अल्लाह ने उन पर सात रातों और आठ दिनों तक लगातार चलाए रखा, सो तुम (अगर वहाँ होते तो) उन लोगों को (उस अवधि) में (इस तरह) मरे पड़े देखते जैसे वे खजूर के गिरे हुए पेड़ों की खोखली जड़ें हों। (7)
क्या तुम इनमें से किसी को भी अब बाक़ी बचा हुआ देखते हो? (8)
फ़िरऔन ने भी, और जो उसके पहले थे, और (लूत के लोगों की) खंडहर हुई बस्तियों (में रहने वाले): इन लोगों ने बड़े भारी गुनाह किए थे (9)
और अपने रब के रसूल का कहना नहीं माना, सो अल्लाह ने उन्हें बहुत सख़्त पकड़ में ले लिया। (10)
मगर जब (नूह के सामने) बहुत ज़ोर का सैलाब [flood] उठा, तो हमने तुम्हें एक तैरती हुई नाव में सवार करके बचा लिया, (11)
और इस (घटना) को तुम्हारे लिए (याद रखनेवाली) नसीहत [Reminder] बना दिया: ध्यान से सुनने वाले कान उसे (सुनकर) याद रखें। (12)
जब नरसिंघे [trumpet] में एक बार फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, (13)
जब ज़मीन और उसके पहाड़ों को ऊँचा उठाया जाएगा और फिर एक ही झटके में चूर-चूर कर दिया जाएगा, (14)
सो उस दिन (क़यामत की) वह महान घटना सामने आ खड़ी होगी। (15)
उस दिन आसमान (सारे पिंडों के साथ) फट जाएगा, और वह बहुत कमज़ोर पड़ जाएगा। (16)
और फरिश्ते उसके सभी किनारों पर खड़े होंगे और, उनमें से आठ फ़रिश्ते आपके रब के सिंहासन को उस दिन, अपने ऊपर उठाए हुए होंगे। (17)
उस दिन तुम (अपने कर्मों के) फ़ैसले के लिए अल्लाह के सामने पेश किए जाओगे, और तुम्हारी कोई भी राज़ की बात, छुपी नहीं रहेगी। (18)
फिर जिस किसी को उसके कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह (खुशी से) कहेगा, “लोगो, यह मेरे कर्मों का हिसाब है, आओ इसे पढ़ लो। (19)
मैं तो पहले से जानता था कि मुझे (अपने कर्मों के) हिसाब का सामना करना होगा,” (20)
और इस तरह वह सुखी व मनपसंद ज़िंदगी गुज़ारेगा (21)
(जन्नत के) उस ऊँचे बाग़ में, (22)
जिसके फलों के गुच्छे (लदे होने के कारण) झुके पड़े होंगे। (23)
(उनसे कहा जाएगा): "खूब मज़े से खाओ और पियो उन (अच्छे कर्मों) के बदले, जो तुमने गुज़रे हुए (जीवन के) दिनों में किए थे।" (24)
रहा वह आदमी जिसके कर्मों का हिसाब उसके बाएं हाथ में दिया जाएगा, तो वह कहेगा, “काश! मुझे मेरे कर्मों का हिसाब दिया ही न जाता (25)
और मैं अपने हिसाब-किताब के बारे में कुछ नहीं जानता। (26)
काश! कि मेरी मौत पर ही मेरा काम तमाम हो चुका होता! (27)
(आज) मेरी दौलत मेरे किसी काम की न रही, (28)
और मेरी शक्ति (और सत्ता भी) खो चुकी है।” (29)
(आदेश होगा), “पकड़ो उसे, और उसके गले में तौक़ [Collar] पहना दो, (30)
और उसे ले जाकर जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में झोंक दो, (31)
और उसे ऐसी ज़ंजीर में जकड़ दो जिसकी लम्बाई सत्तर हाथ हो : (32)
वह बड़ी महिमावाले अल्लाह पर ईमान नहीं रखता था, (33)
वह कभी भी ग़रीब मुहताज को खाना खिलाने पर नहीं उभारता था, (34)
सो आज के दिन यहाँ उसका कोई भी असली दोस्त व मददगार नहीं है, (35)
और खाने के लिए उसके पास सिवाय पीप के और कुछ नहीं (36)
जिसे केवल गुनाहगार खाते हैं,” (37)
सो मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की, जो तुम देख सकते हो, (38)
और उन चीजों की (भी) जिन्हें तुम नहीं देख सकते: (39)
बेशक यह (क़ुरआन) एक बहुत इज़्ज़तवाले व महान रसूल पर (अल्लाह द्वारा उतारी गयी) वाणी है, (40)
ये किसी कवि के शब्द नहीं हैं ---- (मगर अफ़सोस!) तुम कितना कम विश्वास करते हो! ---- (41)
न ही किसी भविष्य-वक्ता की कही हुई बातें हैं ---- (मगर) तुम सोच-विचार कितना कम करते हो! (42)
यह (क़ुरआन) सारे जहाँनों के रब की तरफ से भेजा गया संदेश है: (43)
अगर (मान लो कि) यह पैग़म्बर [Prophet] हमारी वाणी में कोई (एक) बात भी झूठी गढ़कर कह देते, (44)
तो (याद रखो!) हम ज़रूर उनका दाहिना हाथ पकड़ लेते, (45)
और उनकी मुख्य रग [life artery] काट डालते, (46)
फिर तुम में से कोई भी उनका बचाव नहीं कर पाता। (47)
यह (क़ुरआन) अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वालों के लिए एक नसीहत [Reminder] है। (48)
हम जानते हैं कि तुम में से कुछ लोग इस (सच्चाई) को झुठ मानते हैं ---- (49)
विश्वास न करनेवालों के लिए यह (क़ुरआन) एक दुखद पछतावे (का कारण) है ---- (50)
मगर असल में यह एकदम सच है। (51)
सो (ए रसूल!) आप महानता वाले रब के नाम का गुणगान करते रहें। (52)
नोट:
5: सूरह अ'राफ़ (7: 73-79) में समूद की क़ौम के बारे में वर्णन आया है। हज़रत सालेह (अलै.) को झुठलाने के कारण उन पर ज़बरदस्त यातना आई थी।
7: आद की कौम के बारे में भी सूरह अ'राफ़ (7: 65-72) में वर्णन हुआ है। चूँकि ये लोग बड़े डील-डौल वाले थे, इसलिए जमीन पर गिरी हुई उनकी लाशों को खजूर के तनों से उपमा दी गई है।
9: खंडहर हुई बस्तियों से मतलब शायद सदोम और गोमोरह [Sodom & Gomorrah] नाम की बस्तियाँ हैं जो लूत (अलै) के ज़माने में तबाह की गईं।
11: हज़रत नूह (अलै.) पर ईमान रखने वालों को भयानक बाढ़ से बचाने के लिए अल्लाह ने उन्हें नौका में सवार कर दिया था, जिसका वर्णन सुरह हूद (11: 36-48) में आया है।
13: क़यामत के दिन की घोषणा एक बार नरसिंघे [सूर] में फूँक मारकर की जाएगी (देखें 6: 73; 18: 99; 20: 102), फिर दूसरी बार सूर फूँका जाएगा (देखें 39:68)
38: "मैं क़सम खाता हूँ ..... अल्लाह द्वारा विभिन्न चीज़ों की क़सम खाने का ज़िक्र कई जगह आया है (देखें 56:75; 75: 1, 2; 81: 15-18; 84: 16-18; 90: 1, 3)
39: कुछ विद्वानों का मत है कि "जिसे तुम देखते हो" से तात्पर्य मुहम्मद (सल्ल.) हैं, और " जिसे तुम नहीं देखते हो" से मतलब हज़रत जिबरील (अलै.) हैं, जो 'वही' [revelation] लेकर आते थे।
42: भविष्य-वक्ता [काहिन] उसे कहते थे जो भविष्य में घटने वाले धार्मिक मामले के सवालों का जवाब जादू-मंतर और दिव्य शक्ति के माध्यम से दिया करता था, और उसके लिए पैसे भी वसूल करता था।
50: आख़िरत [परलोक] में जब यातना उनके सामने आएगी, तो उन्हें पछतावा होगा कि काश हमने क़ुरआन पर विश्वास किया होता।
सूरह 68: अल-क़लम
(क़लम / The Pen)
यह मक्का के शुरुआती ज़माने की सूरह है जिसमें मक्का के बुतपरस्त लोगों द्वारा मुहम्मद साहब को अल्लाह का रसूल नहीं मानने और उन्हें "दीवाना" कहे जाने की बात कही गई है (आयत 2-6). जिन लोगों के पास दुनिया के ऐश व आराम की चीज़ें थी, वे अपने घमंड में इतने चूर थे कि वे अल्लाह की तरफ़ से उतारी गई किताब को मानने से इंकार कर बैठे, इस रवैये को ग़लत बताया गया है (आयत 10-16) और उनके होने वाले नतीजे से सावधान किया गया है। ऐसे लोगों का उदाहरण दिया गया है जिन्हें अपने घमंड और अहंकार पर बाद में पछताना पड़ा (आयत 17-33). अंत में पैग़म्बर साहब को धीरज से अपने क़दम जमाए रखने के लिए कहा गया है (48-52).
विषय:
01-09: रसूल दीवाने नहीं हैं
10-16: एक नीच, क्रूर और मक्कार विरोधी
17-33: उजड़े हुए बाग़ की मिसाल
34-43: इनाम और सज़ा
44-47: अल्लाह विश्वास न करने वालों को सज़ा देगा
48-52: रसूल को सब्र से काम पर जमे रहना चाहिए
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
”नून”
क़सम है क़लम की, और उन (विषयों) की जो वे (फरिश्ते) लिखते हैं! (1)
[ऐ रसूल!] आपके रब की कृपा से आप (हरगिज़) दीवाने नहीं हैं: (2)
बेशक आप के लिए ऐसा इनाम है जो कभी समाप्त नहीं होने वाला ---- (3)
सचमुच आप बेहतरीन और मज़बूत चरित्र के मालिक हैं ---- (4)
सो बहुत जल्द आप (भी) देख लेंगे और वे (भी) देख लेंगे, (5)
कि तुम में से कौन है जो दीवानेपन से ग्रसित है। (6)
आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसकी सीधी राह से भटक गया है, और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया है। (7)
अत: आप उन लोगों के दबाव में न आएं, जो इस (सच्चाई) को झूठ मानते हुए इससे इंकार करते हैं, ---- (8)
वे तो चाहते हैं कि (धर्म के मामले में) आप थोड़ा ढीले पड़ जाएं (और उनके बुतों की बुराई न करें) तो वे भी (ईमानवालों को सताने में) नर्मी करेंगे ---- (9)
आप किसी ऐसे आदमी की बातों में बिल्कुल न आएं जो बहुत क़समें खाने वाला, अत्यंत नीच है, (10)
(जो) ताना देने, दूसरों की कमियाँ निकालने (और) लोगों में अशांति फैलाने के लिए चुग़लख़ोरी करता फिरता है, (11)
(जो) भलाई के काम से रोकने वाला, ज़ुल्म की सीमा पार करने वाला (और) सख़्त पापी है, (12)
(जो) बहुत क्रूर है, और सबसे बढ़कर मक्कार [imposter] है (या जो नाजायज़ पैदा हुआ है)। (13)
आप केवल इसलिए (उसकी बात को महत्व न दें) कि वह बड़ा धनवान और औलाद वाला है, (14)
जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं (तो) कहता है: “यह (तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!" (15)
जल्द ही हम उसकी सूंड (जैसी नाक) पर दाग़ लगा देंगे! (16)
बेशक हमने (इन मक्का के लोगों) को (उसी तरह) आज़माइश में डाला है जिस तरह हमने (यमन के) एक बाग़वालों को उस वक़्त परीक्षा में डाला था जब उन्होंने क़सम खाई थी कि हम सुबह-सवेरे ज़रूर उस (बाग़ के) फल तोड़ लेंगे (17)
और उन्होंने (यह क़सम लेते हुए) किसी और के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी (न अल्लाह की मर्ज़ी की और न ग़रीबों के हिस्से की): (18)
फिर ऐसा हुआ कि जिस वक़्त वे सो रहे थे, उस वक़्त आपके रब की ओर से एक बला [disaster] उस बाग़ पर फेरा लगा गयी। (19)
सो वह (लहलहाता फलों से लदा हुआ बाग़) सुबह कटी हुई फ़सल की तरह उजाड़ हो गया। (20)
फिर सुबह होते ही वे एक दूसरे को पुकारने लगे, (21)
“कि अपने खेत की तरफ सवेरे-सवेरे चले चलो अगर तुम सारे फल तोड़ना चाहते हो”, (22)
सो, वे लोग चल पड़े और वे आपस में चुपके-चुपके कहते जाते थे (23)
कि "ध्यान रखो! आज उस बाग़ में तुम्हारे पास कोई ग़रीब माँगने वाला आने न पाए!" ----- (24)
और वे सुबह-सवेरे अपनी योजना पर अड़े हुए, तेज़ क़दमों से (बाग़ की तरफ़) चल पड़े ----- (25)
फिर जब उन्होंने उस (वीरान बाग़) को देखा, तो कहने लगे: “हम ज़रूर रास्ता भूल गए हैं!” (यह तो हमारा बाग़ नहीं है), (26)
(थोड़ी देर बाद जब ध्यान से देखा तो पुकार उठे): “नहीं! हम तो लुट गए, बर्बाद हो गए”। (27)
उनमें सबसे अक़्लमंद आदमी ने कहा: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था, "क्या तुम (अल्लाह की) याद और उसकी बड़ाई का गुणगान नहीं करोगे?” ---- (28)
(तब) वे कहने लगे कि “हमारा रब पाक व महान है!, सचमुच हम ही शैतानी के काम कर रहे थे!" ------ (29)
फिर उसके बाद वे एक दूसरे के सामने खड़े होकर आपस में एक दूसरे को बुरा-भला कहने लगे। (30)
(फिर सब मिलकर) कहने लगे: “अफ़सोस है हम सब पर! बेशक हम ने बहुत भारी ग़लती की है, (31)
मगर हो सकता है हमारा रब हमें इस (बाग़) के बदले में उससे अच्छा प्रदान कर दे: हम आशा करते हुए, अपने रब के आगे पूरी भक्ति से झुकते हैं”। (32)
(इस जीवन में तो) ऐसा दंड [punishment] है, मगर आने वाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक / Hereafter] की यातना (इससे) कहीं बढ़कर है, काश! वे जानते होते, (33)
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए उनके रब के पास नेमतों से भरे हुए बाग़ हैं। (34)
भला क्या हम आज्ञा मानने वालों को गुनाहगारों [sinners] की तरह (वंचित) कर देंगे? (35)
तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसी बातें तय कर लेते हो? (36)
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जो तुम्हें बताती है, (37)
कि वहाँ (परलोक में) तुम्हें वही कुछ मिलेगा जो तुम पसंद करोगे? (38)
क्या तुमने हम से क़यामत तक बाक़ी रहने वाली क़समें ले रखी हैं (जिनके द्वारा हम बाध्य हैं) कि तुम्हें वही कुछ मिलेगा जिसे तुम ख़ुद (अपने लिए) तय करोगे? (39)
[ऐ रसूल] उनसे पूछिए कि उनमें से कौन है जिसने इस बात की ज़मानत ले रखी है? (40)
या (अल्लाह के अलावा) ख़ुदायी में क्या उनके ठहराये हुए कोई साझेदार [partner] हैं (जो यह ज़मानत लेते हों)? तो फिर उन्हें चाहिए कि ले आएं अपने उन साझेदारों को, अगर वे सच्चे हैं। (41)
जिस दिन ‘पिंडली खोल दी जाएगी’ [यानी क़यामत की ज़बरदस्त मुसीबत और हलचल आ जाएगी] और वे [इंकार करने वाले] लोग अल्लाह के सामने (सज्दे में) झुकने के लिए बुलाए जाएंगे, तो वे (सज्दा) नहीं कर सकेंगे। (42)
उनकी आँखें (डर और लज्जा के कारण) झुकी हुई होंगी (और) उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी: वे (दुनिया में) सज्दे (में झुकने) के लिए बुलाए जाते थे, जबकि वे भले-चंगे थे (लेकिन फिर भी वे सज्दा करने से इंकार करते थे)। (43)
अत: [ए रसूल!] जो लोग इन आयतों [Revelation] को झुठ कहकर ठुकरा रहे हैं, आप उन्हें मुझ पर छोड़ दें: हम उन्हें धीरे-धीरे (विनाश की ओर) इस तरह ले जाएंगे कि उन्हें पता तक नहीं चलेगा; (44)
और मैं उन्हें (बुराइयों के लिए) ढील दे रहा हूँ, बेशक मेरी योजना बहुत मज़बूत है। (45)
क्या आप उनसे (धर्म प्रचार के लिए) कोई मज़दूरी मांग रहे हैं कि वे क़र्ज़ (के बोझ) से दबे जा रहे हैं? (46)
या उन लोगों के पास छुपी हुई चीज़ों का ज्ञान है कि वह (इस आधार पर) लिखते हैं? (47)
इसलिए आप अपने रब के आदेश के इंतज़ार में सब्र किये जाएं: "मछलीवाले" [पैग़म्बर यूनुस/Jonah] की तरह मत हो जाएं, जब उन्होंने (अपनी क़ौम से तंग होकर और) दुख से घुट-घुटकर हमें [अल्लाह को] पुकारा था: (48)
अगर उनके रब की अनुकंपा ने उनको [यूनुस को] संभाल न लिया होता, तो वह ज़रूर दोषी के रूप में उस उजाड़ साहिल पर फेंक दिए जाते (लेकिन अल्लाह ने उन्हें इससे बचाए रखा), (49)
मगर उनके रब ने उनको चुन लिया और उन्हें (अपनी ख़ास नज़दीकी प्रदान करके) नेक बंदों में (शामिल) कर लिया। (50)
वे लोग जो सच्चाई से इंकार करने पर तुले हुए हैं, जब क़ुरआन सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि वे अपनी (तेज़ व जलन भरी) नज़रों से आपको डगमगा देंगे, और वे कहते हैं कि "यह आदमी तो दीवाना है!" (51)
मगर यह [कुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए नसीहत [Reminder] है। (52)
नोट:
2: मक्का के काफ़िर लोग मुहम्मद साहब को 'दीवाना' कहा करते थे, यानी जिस पर जिन्न का असर हो गया हो। अगली आयत में इस बात को रद्द करते हुए तक़दीर के क़लम की और तक़दीर के उन फ़ैसलों की क़सम खायी गई है जो फ़रिश्ते लिखते हैं कि मुहम्मद साहब दीवाने नहीं हैं। यानी उनका पैग़म्बर होना और मक्का में पैदा होना तक़दीर में पहले से लिखा जा चुका था। एक मतलब यह भी हो सकता है कि क़लम से लिखना जानने वाले भी इस तरह के उच्च कोटि के विषयों पर नहीं लिख सकते, तो जो आदमी पढ़ा लिखा नहीं है, वह कैसे इतने उच्च कोटि का कलाम लिख सकता है!
9: मक्का के काफ़िरों की तरफ़ से कई बार इस तरह के सुझाव पेश किए गए थे कि अगर मुहम्मद साहब अल्लाह के संदेशों को लोगों तक पहुंचाने में थोड़ी ढिलाई बरतें और हमारे देवी-देवताओं को झूठा ना बताएं, तो हम भी उन्हें सताना छोड़ देंगे। यह उनके इसी सुझाव की तरफ इशारा है।
10: कहा जाता है कि यह बातें वलीद इब्ने अल मुग़ीरा के बारे में हैं जो रसूल (सल.) का घोर विरोधी था (देखें 74:11-26); जो लोग मुहम्मद साहब के विरोध में आगे-आगे थे और उनको अपने दीन का प्रचार-प्रसार करने से रोकना चाहते थे, उनमें से कई ऐसे थे जिनमें ऐसे बुरे आचरण पाए जाते थे जिनका वर्णन आयत 10 से 12 में किया गया है।
16: यहां सूंड से मतलब "नाक" है जिसे व्यंग्य के तौर पर सूंड से उपमा दी गई है। मतलब यह है कि क़यामत के दिन ऐसे आदमी की नाक को दाग़ कर इस पर एक बदनुमा धब्बा लगा दिया जाएगा जिससे उसकी और भी बेइज़्ज़ती होगी।
17: मक्का के कुछ धनवान लोग अपने घमंड में ऐसा मानते थे कि अगर अल्लाह उनसे नाराज़ होता तो उन्हें धन-दौलत से मालामाल न करता, जैसा कि सूरह मोमिनून (23:56) में आया है। अल्लाह कभी-कभी किसी को धन-दौलत उसे आज़माने के लिए देता है और अगर वह इस पर उसका शुक्र अदा करने के बजाय नाशुक्री करे, तो उस पर दुनिया ही में यातना आ जाती है। इस सिलसिले में एक घटना बताई गई है जो अरब के लोगों में मशहूर थी। यमन के शहर सना से कुछ दूरी पर स्थित एक जगह है जिसका नाम ज़रवान है, वहाँ पर हरियाली के बीच काले पत्थरों वाला वीरान और उजड़ा हुआ इलाक़ा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यही उस बाग़ की जगह थी।
18: इसका एक मतलब तो यह हो सकता है कि उन्होंने यह इरादा किया था कि सारे का सारा फल हम तोड़ लेंगे, और गरीबों का कोई हिस्सा नहीं छोड़ेंगे। या यह कि जब उन लोगों ने यह कहा था कि सुबह होते ही हम फल तोड़ लेंगे तो उस वक्त "इंशा अल्लाह" यानी 'अगर अल्लाह ने चाहा तो', नहीं कहा था (देखें 18: 24).
25: इसका अनुवाद यह भी हो सकता है कि, "वह यह सोचकर सवेरे रवाना हुए कि वह गरीबों को मना करने में सफल हो जाएंगे।"
28: उन भाइयों में से एक जो उनमें अच्छा था, उसने पहले भी भाइयों से कहा था कि अल्लाह का ज़िक्र करो, और ग़रीबों को आने से मना न करो, लेकिन बाद में वह भी दूसरे भाइयों के साथ शामिल हो गया था।
38: कुछ काफ़िर यह कहते थे कि अगर मान लिया जाए कि हमें मरने के बाद दोबारा जिंदा किया गया, तब भी अल्लाह हमें जन्नत की नेमतें देगा, जैसाकि सूरह हा.मीम. सज्दा (41: 50) में आया है। यहाँ इस विचार को रद्द किया गया है।
42: "पिंडली का खुल जाना" अरबी में एक मुहावरा है जो जंग छिड़ जाने या बहुत सख़्त मुसीबत आ जाने के लिए बोला जाता है।
48: "मछलीवाले" से मतलब यहाँ पर हज़रत यूनुस (अलै.) है, जिनका वर्णन सुरह यूनुस (10: 98), सूरह अंबिया (21: 87-88) और सूरह अस-साफ़्फ़ात (37: 139-148) में आया है।
49: इसका अभिप्राय वह समुद्र के किनारे की उजाड़ जगह है जहाँ हज़रत यूनुस (अलै.) को मछली उगलकर चली गई थी। मछली के पेट से निकलने के बावजूद वह इतने कमज़ोर हो चुके थे कि उनका जिंदा रहना बहुत मुश्किल था, लेकिन अल्लाह ने उन्हें संभाला और वह दोबारा स्वस्थ हो गए।
उप समूह “ख”:
सूरह 55: अर-रहमान
[रहम करनेवाला रब, The Lord of Mercy]
यह एक मक्की सूरह मानी जाती है जिसमें दुनिया में पायी जाने वाली अल्लाह की अद्भुत नेमतों को उजागर किया गया है, और जन्नत की बहारों को बड़े ही मनमोहक अंदाज़ में पेश किया गया है। फिर जहन्नम के दुख-भरे दृश्य की तुलना (आयत 43-44) जन्नत में नेक लोगों को मिलने वाली ख़ुशियों से की गई है। इस सूरह में इंसानों और जिन्नों को पुकारा गया है कि वे अल्लाह द्वारा दी गई बेपनाह नेमतों को मानते हुए उसका शुक्र अदा करें। इस सूरह की एक ख़ास बात यह है कि इसमें एक वाक्य "फिर तुम अल्लाह की किन-किन नेमतों से इंकार करोगे" इकत्तीस बार दुहराया गया है। फ़ैसले के दिन इंसानों और जिन्नों को तीन वर्ग में बाँटा गया है: विश्वास न करने वाले (41-45), विश्वास करने वालों में सबसे बेहतर (46-61), और सामान्य विश्वास करने वाले (62-77).
विषय:
01-32: अल्लाह की नेमतें [Blessings]
33-45: गुनाहगारों की सज़ा: जहन्नम
46-78: नेक व अच्छे लोगों का इनाम: (जन्नत के) दो बाग़
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
वह तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है (1)
जिसने क़ुरआन को पढ़ना (और समझना) सिखाया। (2)
उसी ने आदमी को पैदा किया (3)
और उसे अपनी बात कहना और दूसरे की बात समझना सिखाया। (4)
सूरज और चाँद एक हिसाब के मुताबिक़ अपने-अपने रास्ते [courses] पर चलते हैं; (5)
पौधे और पेड़ उस(की इच्छा) के आगे झुके रहते हैं; (6)
उसने आसमान को ऊँचा किया। उसने संतुलन [balance] स्थापित किया (7)
ताकि तुम उस संतुलन में बिगाड़ न पैदा कर सको: (8)
न्याय के साथ वज़न करो और तौलने में कमी न करो। (9)
धरती को उसने सभी जीव-जंतुओं [creatures] के लिए (रहने के अनुकूल) बनाया, (10)
उसी में तरह तरह के फल हैं, और खजूर के पेड़ हैं जिनके फलों के गुच्छे आवरणों में लिपटे होते हैं, (11)
और इसके भूंसेवाले अनाज और ख़ुशबूदार बेल-बूटे व फूल भी। (12)
तो फिर बताओ [ऐ जिन्न और इंसानो!], तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (13)
उसने आदमी को मिट्टी के बर्तन जैसी सूखी-खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया; (14)
और जिन्न को बिना धुएं की आग से पैदा किया। (15)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings]
को मानने से इंकार करोगे? (16)
वह [उगते हुए सूरज और चाँद के] दो पूरब का रब है और [सूरज व चाँद के डूबते] दो पश्चिम का रब भी। (17)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (18)
उसने [मीठे और नमकीन] दो दरियाओं को प्रवाहित कर दिया, जो आपस में मिलते तो हैं, (19)
फिर भी, उन दोनों के बीच एक रोक लगी हुई है, जिसके पार वे नहीं जा सकते (और पूरी तरह घुलमिल नहीं सकते)। (20)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (21)
उन (समुद्रों) से मोतियाँ निकलती हैं: बड़ी-बड़ी, और छोटी चमकती हुईं मोतियाँ [मूँगा]। (22)
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किसको झुठलाओगे? (23)
उसी के वश में हैं वे जहाज़ जो समुद्रों में तैरते फिरते हैं, जो देखने में पहाड़ों की तरह ऊँचे लगते हैं। (24)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (25)
इस धरती पर बसने वाले हर एक का नाश होना है; (26)
कुछ अगर बाक़ी रहने वाला है तो बस तुम्हारे रब का चेहरा जो बड़े प्रतापवाला, और उदारता से देने वाला है। (27)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (28)
आसमानों और ज़मीन में बसने वाला हर एक, उसी से (अपनी ज़रूरतें) माँगता है; हर दिन वह अपने काम में लगा रहता है। (29)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (30)
ऐ [आदमी व जिन्न की] दो बड़ी भारी फ़ौज [armies]!
जल्द ही हम तुम्हारे (हिसाब-किताब के) निपटारे पर ध्यान देने वाले हैं। (31)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (32)
ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! अगर तुममें इतना दम है कि आसमान और ज़मीन की सीमाओं को पार कर सको, तो पार करके दिखाओ: तुम कभी भी बिना हमारी इजाज़त [authority] के पार नहीं कर सकते। (33)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (34)
तुम दोनों पर आग के शोले और धुएँवाला अंगारा छोड़ दिया जाएगा, फिर तुम्हारी मदद को कोई नहीं पहुँचेगा। (35)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (36)
फिर जब आसमान फट पड़ेगा और लाल चमड़े की तरह एकदम लाल-सुर्ख़ हो जाएगा। (37)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (38)
फिर उस दिन न किसी इंसान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन्न से। (39)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (40)
अपराधी अपने चेहरों (की निशानियों) से पहचान लिए जाएँगे, फिर उन्हें माथे और टाँगों से पकड़ लिया जाएगा। (41)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (42)
यही वह जहन्नम है जिसे अपराधी लोग झूठ ठहराते थे! (43)
वे उस (जहन्नम की) लपटों के और खौलते हुए पानी के बीच चक्कर लगा रहें होंगे। (44)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (45)
(इस दुनिया में) जो आदमी अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) खड़े होने से डरता था, उसके लिए दो बाग़ होंगे। (46)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (47)
(दोनों बाग़) छायादार डालियोंवाले होंगे। (48)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (49)
उन (दोनो बाग़ों) में पानी के दो बहते हुए सोते [flowing spring] होंगे। (50)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (51)
और साथ में हर तरह के फल की दो-दो क़िस्में होंगी।
(52)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (53)
[जन्नती लोग] गाढ़े रेशम के बिस्तर पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे, और दोनों बाग़ों के फल झुके हुए नज़दीक ही होंगे। (54)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (55)
उन्हीं (बाग़ों) में नज़रें बचाकर रखने वाली (जवान) हसीनाएँ होंगी, जिन्हें उन (जन्नतियों) से पहले न किसी आदमी ने छुआ होगा और न किसी जिन्न ने। (56)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (57)
वे ऐसी होंगी मानो लाल [याकूत, Rubies] और चमकती मोतियाँ [मूँगा] हों! (58)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (59)
अच्छाई का बदला अच्छाई के सिवा और क्या हो सकता है?
(60)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (61)
इन दोनों बाग़ों के नीचे (कुछ कम दर्जे के जन्नतियों के लिए) दो और बाग़ होंगे। (62)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (63)
दोनों बहुत ज़्यादा हरे-भरे होंगे; (64)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (65)
उन (दोनों बाग़ो) में दो उबलते हुए पानी के सोते [gushing spring] होंगे।
(66)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (67)
फलों से भरे हुए -— खजूर और अनार के पेड़ होंगे। (68)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (69)
उनमें अच्छी स्वभाववाली कुँवारी हसीनाएँ होंगी। (70)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (71)
काली-आँखोंवाली जवान हसीनाएं [हूरें] जो ख़ेमों [pavilions] में सँभालकर रखी गयी हैं। (72)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (73)
जिन्हें उससे पहले न किसी आदमी ने हाथ लगाया होगा और न किसी जिन्न ने। (74)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (75)
वे सभी हरे रेशमी गद्दों और बेहतरीन क़िस्म की क़ालीनों पर तकिया लगाए (बैठे) होंगे; (76)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (77)
बहुत बरकतवाला [Blessed] नाम है तुम्हारे रब का, जो बड़े ही प्रतापवाला और उदारता से देनेवाला है।
(78)
नोट:
1: मक्का के बहुदेववादी लोग अल्लाह के नाम
"रहमान" [रहम करनेवाला] को न तो जानते थे और न ही मानते थे, जैसा कि सूरह फ़ुरक़ान (25: 60) में आया है। ऐसा लगता है कि
"रहमान" के नाम से उन्हें चिढ़ थी, इसलिए कि अगर हर तरह की रहमत केवल अल्लाह के लिए ही मान लिया जाए तो फिर उन ख़ुदाओं का क्या होता जिसे वे पूजते थे और दया की आस लगाते थे। इस सूरह में अल्लाह ने बताया है कि रहमान उसी अल्लाह का नाम है जिसकी रहमतों [blessings] से यह पूरी कायनात भरी हुई है। उसके सिवा कोई नहीं जो तुम्हें रोज़ी, औलाद या कोई और नेमत दे सकता है।
17: इसका एक और मतलब बताया गया है। जिस जगह से सूरज निकलता है और जिस जगह पर सूरज डूबता है, वह जगह सर्दी और गर्मी में बदल जाती है, शायद इसलिए भी इनको दो पूरब और दो पश्चिम कहा गया है।
29: अल्लाह के रसूल से किसी ने पूछा:
"अल्लाह हर दिन किस काम में लगा रहता है?" जवाब दिया, "वह हर वक़्त गुनाहों को माफ करने या किसी की परेशानी को दूर करने में लगा रहता है।"
32: यहाँ से आयत 44 तक जहन्नम की यातनाओं का वर्णन है, मगर इसके साथ बार-बार यह भी कहा जा रहा है कि तुम कौन-कौन सी नेमतों को मानने से इंकार करोगे? इसका एक मतलब तो यह है कि अल्लाह तुम्हें पहले से ही इस भयानक अंत की जो ख़बर दे रहा है, वह भी अपने आप में एक नेमत है, और दूसरा यह कि अल्लाह की नेमतों को झुठलाने का यह अंजाम होने वाला है, क्या इस अंजाम को जानने के बाद भी तुम नेमतों को ऐसे ही झुठलाने पर अड़े रहोगे?
39: यानी उस समय पूछताछ का चरण ख़त्म हो चुका होगा, क्योंकि ख़ुद हर आदमी को अपना अंजाम मालूम होगा, और हर अपराधी अपने चेहरे की निशानियों से ही पहचान लिया जाएगा।
62: विद्वानों के अनुसार आयत 46 में जिन दो बाग़ों का वर्णन हुआ है, वह अल्लाह के चहीते व परहेज़गार बंदों के लिए है, जिसका ज़िक्र सूरह वाक़िया [56: 7--56] में दोबारा आया है। अब आयत 62 से जिन दो बाग़ों की चर्चा हो रही है, वह आम ईमानवालों के लिए होगा, जो उनसे थोड़ा कमतर दर्जे का होगा।
72: इन ख़ेमों [Pavilions] के बारे में हदीस में है कि ये मोती से बने हुए बड़े लम्बे-चौड़े ख़ेमे होंगे।
सूरह 56: अल-वाक़िया
[आने वाली घड़ी, That which is Coming]
यह एक मक्की सूरह है जिसका मुख्य विषय शुरुआती आयतों से ही स्पष्ट है जहाँ से इसका नाम लिया गया है: फ़ैसले के दिन [क़यामत] का आना निश्चित है जो लोगों को इस तरह छाँट देगा कि किसी को तो अपमानित करके रख देगा और किसी को बड़ा भारी इनाम मिलेगा। पिछली सूरह की तरह लोगों को तीन दर्जे में रखा गया है: जिन्हें अल्लाह के नज़दीक लाया जाएगा (ईमानवालों में सबसे बेहतर), जो दाहिनी तरफ़ होंगे (सामान्य ईमानवाले), और जो बायीं तरफ़ होंगे (विश्वास न करनेवाले). अल्लाह की ताक़त और उसकी क़ुदरत के बहुत से प्रमाण दिय गए हैं और उसके नतीजे में मरे-पड़े लोगों को दोबारा ज़िंदा उठाने की उसकी सलाहियत का भी ज़िक्र आया है (57-72).
विषय:
01-10: क़यामत की घड़ी सामने आ जाएगी
11-26: जन्नत की तरफ़ सबसे आगे चलने वाले
27-40: दाहिने हाथवाले (सौभाग्यशाली) लोग
41-56: बायीं हाथवाले (दुर्भाग्यशाली) लोग
57-74: अल्लाह की क़ुदरत व रोज़ी की निशानियाँ
75-80: यह प्रतिष्ठित क़ुरआन है
81-96: फ़ैसले की घड़ी का आना सच्ची और पक्की बात है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आने वाली घड़ी [क़यामत] सामने आ जाएगी, (1)
तो उस घड़ी के आ जाने का कोई भी इंकार न कर पाएगा, (2)
किसी को नीचे ले जाएगी, किसी को ऊँचा उठा देगी। (3)
जब धरती भूँचाल से बुरी तरह डोलने लगेगी (4)
और पहाड़ टूटकर चूर-चूर हो जाएँगे (5)
यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे (6)
और तब, तुम लोगों को तीन दर्जों में छाँटा जाएगा। (7)
तो जो दाहिने हाथवाले [सौभाग्यशाली] हैं---क्या कहना उन दाहिने हाथवालों का! (8)
और बाएँ हाथवाले [दुर्भाग्यशाली]--- तो क्या बताना उन बाएँ हाथवालों (के बुरे हाल) का! (9)
और (तीसरे) जो सामने होंगे, वे तो हैं ही वरीयता में आगे चलने वाले! (10)
यही वे लोग हैं जो अल्लाह के सबसे नज़दीक रहेंगे; (11)
नेमत से भरी (परम आनंद वाली) जन्नतों में: (12)
शुरू की पीढ़ियों में से तो बहुत-से होंगे, (13)
किन्तु बाद की पीढ़ियों [later generations] में से कम ही (होंगे)। (14)
ऊँचे तख़्तों पर जिस पर सोने के तारों से बुने हुए कपड़े (बिछे होंगे); (15)
तकिया लगाए, आमने-सामने बैठे होंगे। (16)
सदाबहार नौजवान लड़के (उनकी सेवा में) उनके बीच घूमते रहेंगे, (17)
प्याले, (चमकते) जग और (पीने की) शुद्ध शराब से भरा हुआ जाम लिए हुए, (18)
जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनके होश उड़ेंगे, (19)
(और वहाँ होंगे) हर एक फल जो वे पसन्द करें; (20)
और चिड़ियों का मांस जो वे चाहें; (21)
और (साथ निभाने के लिए) बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत (कुँवारी) हूरें! (22)
ऐसी मानो छिपाकर सुरक्षित रखे हुए मोती हों (23)
यह सब कुछ उन (अच्छे) कामों के बदले में उन्हें मिलेगा, जो कुछ वे (दुनिया में) किया करते थे। (24)
उस जन्नत में वे न कोई बेकार की बात सुनेंगे और न कोई गुनाह की बात; (25)
हाँ जो बात होगी, वह बेहद अच्छी, साफ़-सुथरी और सलामती वाली होगी! (26)
और जो दायीं हाथवाले होंगे [सौभाग्यशाली लोग], तो क्या कहना उन दायीं हाथवालों का! (27)
(वे मज़े करेंगे) बिन काँटों के बेरियों में; (28)
और गुच्छेदार केले से लदे पेड़ों में; (29)
दूर तक फैली हुई छाँव में; (30)
लगातार बहते हुए पानी में; (31)
बहुत-सारे फलों व मेवों में (32)
जो न कभी ख़त्म होंगे और न उन्हें खाने की कोई रोक-टोक होगी (33)
ऐसे जीवन-साथियों के साथ जिनकी तुलना नहीं हो सकती (34)
जिन्हें हमने ख़ास तौर से पैदा किया है --- (35)
कुँवारियाँ, (36)
प्रेम दर्शानेवाली और उम्र में बराबर!--- (37)
उन लोगों के लिए जो दायीं हाथवाले [सौभाग्यशाली] हैं, (38)
(जिनमें) बहुत से शुरू की पीढ़ियों से होंगे (39)
और बहुत से बाद की पीढ़ियों से। (40)
लेकिन जो लोग बायीं हाथवाले [दुर्भाग्यशाली] हैं, तो क्या बताएं कि कैसे (बुरे लोग) हैं बायीं हाथवाले! (41)
वे होंगे तपती हुई गर्म हवा और खौलते हुए पानी में; (42)
और काले धुएँ की छाँव में, (43)
जो न ठंडी होगी और न लाभप्रद। (44)
वे इससे पहले बड़े सुख-सम्पन्न थे; (45)
और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे, (46)
वे कहा करते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (47)
"और क्या हमसे पहले गुज़रे हुए बाप-दादाओं को भी?" (48)
[ऐ रसूल] कह दें, "निश्चय ही सब अगली और पिछली पीढ़ियों के लोग (49)
एक पहले से नियत दिन और समय पर अवश्य ही इकट्ठे कर दिए जाएँगे, (50)
"तो तुम (लोग) जो रास्ता भटके हुए हो, और सच्चाई का इंकार करने वाले हो (51)
ज़क्कूम के कड़ुवे पेड़ में से खाओगे; (52)
"और उसी से पेट भरोगे; (53)
"और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीना पड़ेगा; (54)
"और पियोगे भी इस तरह जैसे प्यास की बीमारी वाले ऊँट पीते हैं" (55)
तो बदला दिए जाने [फ़ैसले] के दिन, इसी तरह होगा उनका स्वागत! (56)
हमने तुम्हें पैदा किया है, फिर तुम इसका यक़ीन क्यों नहीं करते? (57)
तो क्या तुमने विचार किया जो [वीर्य/Semen]
तुम टपकाते हो? (58)
क्या तुम उसे पैदा करते हो, या पैदा करने वाले हम हैं? (59)
और हमने ही तुम्हारे बीच मौत को तय कर रखा है। हमें कोई नहीं रोक सकता (60)
कि हम चाहें तो तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में दोबारा पैदा करें जिसे तुम जानते नहीं (61)
तुम तो जान चुके हो कैसे तुम पहली बार पैदा किए गए थे: फिर तुम इससे कोई सीख क्यों नहीं लेते? (62)
अच्छा यह बताओ कि जो कुछ तुम ज़मीन में बोते हो, (63)
क्या उसे तुम उगाते हो, या उगाने वाले हम हैंं? (64)
यदि हम चाहें तो उस फ़सल को भूसा बना दें, फिर तुम हैरान परेशान होकर चिल्लाते रह जाओ (65)
कि "हम पर तो क़र्ज़ का बोझ पड़ गया, (66)
बल्कि हम वंचित होकर रह गए!" (67)
अच्छा यह बताओ कि जो पानी तुम पीते हो--- (68)
क्या उसे वर्षावाले-बादलों से तुमने उतारा है या उतारने वाले हम हैंं? (69)
अगर हम चाहें, तो उसे अत्यन्त खारा बनाकर रख दें, फिर तुम कृतज्ञता क्यों नहीं दिखाते? (70)
अच्छा बताओ कि यह आग जिसे तुम सुलगाते हो--- (71)
क्या पेड़ की लकड़ियों को तुमने बनाया है या बनाने वाले हम हैंं? (72)
हमने उस आग को नसीहत का ज़रिया बनाया (ताकि जहन्नम की आग से डरें) और मरुभुमि के मुसाफ़िरों (और वहाँ रहने वालों) के लिए काम की चीज़ बनाया (73)
अतः [ऐ रसूल] आप अपने महान रब के नाम का गुणगान करें। (74)
मैं क़सम खाता हूँ सितारों की स्थितियों की --- (75)
और यह बहुत बड़ी क़सम है, यदि तुम जानो-- (76)
कि सचमुच यह बड़ा ही प्रतिष्ठित क़ुरआन है (77)
एक सुरक्षित किताब में (पहले से) लिखा हुआ है (78)
उसे केवल पाक-साफ़ लोग ही हाथ लगाते हैंं (79)
इसे सारे संसार के रब की ओर से (थोड़ा थोड़ा करके) उतारा जा रहा है। (80)
फिर किस तरह तुम इस (पवित्र) बयान की उपेक्षा कर सकते हो? (81)
और तुम्हें जो रोज़ी दी गयी है उसका (शुक्रिया अदा करने के) बजाय तुम कैसे इसे मानने से इंकार कर सकते हो? (82)
फिर ऐसा क्यों नहीं होता जब (किसी के) प्राण (निकलते हुए) गले तक पहुँच जाते हैं (83)
जबकि उस समय तुम (बेबसी से) देख रहे होते हो ---- (84)
हम तुमसे ज़्यादा उसके निकट होते हैं, मगर तुम हमें नहीं देखते -– (85)
अगर तुम्हारा हिसाब-किताब नहीं होना है तो फिर ऐसा क्यों नहीं होता (86)
कि तुम उसके (प्राण को) लौटा दो, अगर तुम्हारी बातें सच्ची हैं। (87)
फिर अगर वह (मरने वाला) उन लोगों में हुआ, जिन्हें अल्लाह के नज़दीक वाली जगह मिलेगी; (88)
तो (उसके लिए) आराम है, सुकून है, और नेमतोंवाला बाग़ है; (89)
यदि वह उन लोगों में हुआ जो दाहिने हाथवालों [भाग्यशालियों] में से हैं, (90)
तो (उससे कहा जाएगा), "तुम्हारे लिए सलामती ही सलामती है कि तुम दाहिने हाथवालों में से हो।" (91)
और यदि वह उनमें से हुआ जिसने सच्चाई को मानने से इंकार किया और गुमराह हो गया; (92)
तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा (93)
फिर उसे (जहन्नम की) आग में जलना है। (94)
निस्संदेह यह बिल्कुल सच्ची और पक्की बात है। (95)
अतः तुम अपने महान रब का नाम लेकर उसका गुणगान करो। (96)
नोट:
14: यानी ऊँचे दर्जे के लोगों में अधिकतर नबियों और बड़े परहेज़गार [Pious] लोगों का समूह होगा, और बाद के ज़माने में भी हालाँकि इस दर्जे के लोग होंगे, मगर कम।
28: जन्नत के फलों के नाम जाने-पहचाने इसलिए बताए गए हैं ताकि हमें समझने में आसानी हो, लेकिन उनकी शक्ल और उनकी लज़्ज़त यहाँ से अलग और बेहद अच्छी होगी।
34: एक दूसरा अनुवाद "ऊँचे रखे हुए फ़र्शों पर .... जन्नत में बैठने की ऊँची जगह पर शायद ऐसे फ़र्श बिछे हुए होंगे।
35: कुछ विद्वानों का मानना है कि ख़ास तौर से पैदा की गई हूरों के अलावा उनमें नेक लोगों की वह दुनिया वाली नेक बीवियाँ भी साथ रहेंगी, जिन्हें ख़ूब हसीन बना दिया जाएगा।
जो औरतें दुनिया में बिन-ब्याही रह गई थीं, उनको भी नया हुस्न देकर किसी से शादी कर दी जाएगी।
46: भारी गुनाह से मतलब अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार [Partner] ठहराना और अल्लाह के संदेश को मानने से इंकार करना।
52: जहन्नम के इस पेड़ 'ज़क़ूम' का वर्णन सूरह साफ़्फ़ात (37: 62), और सूरह दुख़ान (44: 43) में भी आया है।
72: इससे मतलब 'मुर्ख़' और 'अफ़्फ़ार' के पेड़ हैं, जो अरब में पाए जाते थे, और जिनकी डालियों को रगड़ने से आग पैदा होती थी। इसका ज़िक्र सूरह यासीन (36: 80) में भी है।
75: यहाँ तारों की स्थितियों यानी इसके डूबने या गिरने की जगह की क़सम खायी गई है। मक्का के कुछ काफ़िर लोग मुहम्मद (सल्ल) को काहिन (तांत्रिक) कहते थे, और यह कि क़ुरआन काहिनों का कलाम है। काहिनों के बारे में माना जाता था कि वे भविष्य की बातें जिन्नों और शैतानों की मदद से बताते हैं। क़ुरआन में कई जगह पर बताया गया है कि शैतानों और जिन्नों को आसमान के करीब जाकर वहां की बातें सुनने से रोक दिया गया है। अगर कोई शैतान आसमान के क़रीब जाकर सुनने की कोशिश करता, तो उसपर आग का अंगारा छोड़ दिया जाता है। देखें सूरह हिज्र (15: 18) और सूरह साफ़्फ़ात (37: 10). अत: क़ुरआन किसी काहिन का कलाम नहीं हो सकता है। चूंकि आम बोलचाल में आसमान में आग के अंगारे को "तारा टूटना" कहते हैं, इसीलिए अल्लाह ने तारे का ज़िक्र करते हुए यह भी कहा कि इनको शैतानों से हिफ़ाज़त के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। देखें सूरह मुल्क (67: 5) और सूरह साफ़्फ़ात ( 37: 7).
79: पाक-साफ़ लोग से मतलब यहाँ पर फ़रिश्तों को समझा जाता है, जो कि ऊपर की दुनिया की उस "सुरक्षित किताब" [लौह-ए महफ़ूज़] को छू सकते हैं। उसी तरह, ज़मीन पर क़ुरआन को केवल पाक-साफ़ आदमी ही वज़ू करके छू सकता है।
सूरह 53: अन-नज्म
[चमकीला तारा, The Star (Sirius)]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें इस बात की पुष्टि की गई है कि पैग़म्बर द्वारा दिए जा रहे संदेश अल्लाह की ही तरफ़ से उतारे गए हैं, और रात की उस यात्रा [मेराज, सूरह 17] की भी पुष्टि की गई है जिसमें मुहम्मद सल्ल. पहले मक्का से येरुशलम और वहाँ से सातवें आसमान पर गए थे (आयत 1-18). यह सूरह विश्वास न करने वालों द्वारा अपनी इबादतों में उन देवियों और फ़रिश्तों के बारे में किए जाने वाले दावों को रद्द करती है (19-28), और आगे अल्लाह की ताक़त की बहुत सी सच्चाइयों को इंगित करती है। सूरह का अंत इस बात पर हुआ है कि फ़ैसले की घड़ी [क़यामत] हर हाल में आकर रहेगी। सूरह के शुरू में तारे की क़सम खायी गई है, जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा है।
विषय:
01-18: दो ख़्वाब [Visions]
19-25: मुश्रिकों [बहुदेववादियों] की देवियों की खुली निंदा
26-31: फ़रिश्ते देवियाँ नहीं हैं
32: अल्लाह सब जानता है
33-55: मूसा (अलै.) और इबराहीम (अलै.) की (आसमानी) किताबें
56-62: क़यामत की घड़ी आने ही वाली है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है चमकीले तारे की, जब वह डूबता है (1)
[ऐ मक्का-वासियो!] तुम्हारे ही साथ रहने वाले [मुहम्मह] साहब न रास्ता भूले हैं, न उन्हें कोई धोखा हुआ है; (2)
और वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं बोलते हैं; (3)
यह (क़ुरआन) तो बस एक "वही" [Revelation] है, जो (अल्लाह द्वारा) भेजी जाती है (4)
उन्हें बड़ी शक्तियोंवाले (फ़रिश्ते जिबरील/Gabriel) ने सिखाया है, (5)
जो ज़बरदस्त ताक़त रखता है। और (एक दिन) वह [फ़रिश्ता] सामने खड़ा था, (6)
क्षितिज [Horizon] के ऊँचे छोर पर,
(7)
फिर वह उस (रसूल) की तरफ़ बढ़ा ---- और नीचे उतर आया (8)
यहाँ तक कि वह (रसूल से) दो कमानों के बराबर की दूरी या उससे भी नज़दीक हो गया ----- (9)
इस तरह, अल्लाह को अपने बन्दे की ओर जो 'वही' अवतरित [Reveal] करनी थी, वह उतार दी गयी।
(10)
जो कुछ उस (रसूल) ने देखा, उनके दिल को इसे समझने में कोई धोखा नहीं हुआ; (11)
फिर भी क्या तुम उनसे उस चीज़ पर झगड़ा करोगे, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा था?
(12)
(सच्चाई यह है कि) वह उस (फरिश्ते) को दूसरी बार भी (मेराज के सफ़र में) देख चुके हैं: (13)
उस बेर के पेड़ [Lote tree] के किनारे जिसकी सीमा के आगे कोई नहीं जा सकता है ['सिदरतुल मुन्तहा'], (14)
'जन्नतुल मावा' [सुकूनवाले बाग़] के नज़दीक, (15)
उस वक़्त बेर के पेड़ पर ऐसी अजीब चमक छाई हुई थी जिसकी न तो कल्पना की जा सकती है और न वर्णन! (16)
(रसूल की) निगाह न तो इधर उधर बहकी और न हद से आगे बढ़ी, (17)
और उन्होंने (वहाँ) अपने रब की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं। (18)
[विश्वास न करनेवालो!], भला क्या तुमने “लात” और “उज़्ज़ा”(नामक देवियों) (19)
और तीसरी एक और (देवी) “मनात” पर विचार किया? (20)
क्या तुम्हारे लिए तो बेटे हों और अल्लाह के लिए बेटियाँ? (21)
तब तो यह बहुत अन्यायपूर्ण बँटवारा हुआ! (22)
सच तो यह है कि ये तो बस कुछ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं, अल्लाह ने उनके लिए कोई सनद नहीं उतारी। असल में, वे [काफ़िर] लोग तो केवल अटकल के सहारे अपने मन की इच्छा के पीछे चल रहे हैं, हालाँकि उनके पास उनके रब की ओर से मार्गदर्शन आ चुका है। (23)
(क्या उनकी देवियाँ उनके लिए सिफ़ारिश कर सकती हैं?) या आदमी वह सब कुछ पा लेगा, जिसकी वह कामना करता है,
(24)
(नहीं!) क्योंकि इस दुनिया और आने वाली दुनिया का मालिक तो अल्लाह ही है? (25)
आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, मगर उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; हाँ, यह तभी काम आ सकती है जब ख़ुद अल्लाह जिसे चाहे इसके लिए अनुमति दे दे, और जिसकी बात को मान ले। (26)
जो लोग आने वाली दुनिया को नहीं मानते, वे फ़रिश्तों को देवियों के नाम से याद करते हैं, (27)
हालाँकि इस विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं जिसका कोई आधार हो: वे केवल अटकल के पीछे चलते है। हक़ीक़त यह है कि सच्चाई के मामले में केवल अंदाज़ा लगाने से कोई लाभ नहीं होता। (28)
अतः [ऐ रसूल!] आप ऐसे लोगों पर ध्यान न दें जो हमारी (उतारी हुई) नसीहतों से मुँह मोड़ता है, और जो इस सांसारिक जीवन के सिवा कुछ और चाहता ही नहीं। (29)
ऐसे लोगों के ज्ञान की पहुँच बस यहीं तक है। तुम्हारा रब उसे बहुत अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसके मार्ग से भटक गया और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया। (30)
अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। तो जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा, और जिन लोगों ने नेक काम किए, उन्हें ख़ूब अच्छा बदला देगा; (31)
रहे वे लोग जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं, हाँ अगर संयोगवश कोई छोटी-मोटी बुराई उनसे हो भी जाए, तो निश्चय ही तुम्हारा रब माफ़ करने में बहुत बड़ा है। वह तुम्हें उस समय से जानता है, जबकि उसने तुम्हें धरती से पैदा किया और जबकि तुम अपनी माओं के पेट में बच्चे के रूप में छुपे हुए थे। अतः अपने मन की पवित्रता का दावा न करो: वह अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है। (32)
[ऐ रसूल!], क्या आपने उस आदमी को देखा जिसने (सच्चाई से) मुँह मोड़ लिया: (33)
उसने (भलाई के काम में) थोड़ा-सा ही ख़र्च किया और फिर हाथ रोक लिया। (34)
क्या उसके पास अनदेखी [Unseen] चीज़ों का ज्ञान है? क्या वह [आने वाली दुनिया को] देख सकता है? (35)
क्या उसे बताया नहीं गया है जो कुछ मूसा की (आसमानी) किताबों में लिखा हुआ था, (36)
और इबराहीम की (किताबों में) भी, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया: (37)
कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा; (38)
और यह कि आदमी को (बदले में) बस वही कुछ मिलेगा जिसके लिए उसने कोशिश की होगी; (39)
और यह कि उसकी हर कोशिश देखी जाएगी (40)
फिर अंत में (उसकी हर कोशिश का) उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा; (41)
और यह कि अन्त में (सबको) आपके रब के पास पहुँचना है; (42)
और यह कि वही है जो हँसाता और रुलाता है; (43)
और यह कि वही है जो मौत भी देता है और ज़िंदगी भी; (44)
और यह कि उसी ने नर और मादा के जोड़े पैदा किए, (45)
(वह भी बस) एक बूँद [Sperm] से, जब वह (मादा के अंदर) टपकाई जाती है; (46)
और यह कि (मरने के बाद) दोबारा ज़िंदा उठाना भी उसी के ज़िम्मे है; (47)
और यह कि वही है जो धनवान बनाता है और पूँजी को सुरक्षित बनाता है; (48)
और यह कि वही है जो “शेअरा” [Sirius, नाम का तारा जिसे अरब के लोग पूजते थे] का रब है (49)
और यह कि वही है जिसने पुराने ज़माने में आद की क़ौम को पूरी तरह से तबाह व बर्बाद कर दिया; (50)
और समूद को भी। फिर किसी को बाक़ी न छोड़ा। (51)
और उससे पहले नूह की क़ौम को भी (तबाह कर दिया), बेशक वे ज़ालिम और हद से बढ़े हुए थे। (52)
और (लूत के क़ौम की) जो बस्तियाँ औंधी पड़ी थीं, उनको भी उसी ने उठाकर नीचे दे पटका था,
(53)
फिर (पत्थरों की बारिश ने) उन्हें ढँक लिया, और वह उन्हें ढँक कर ही रही; (54)
तो फिर [ऐ इंसान] तू अपने रब की कौन कौन सी नेमतों में संदेह करेगा? (55)
यह (रसूल के द्वारा दी जाने वाली) एक चेतावनी है, ठीक वैसी ही चेतावनी [Reminder] जैसी पिछले ज़मानों में भी भेजी जा चुकी हैं। (56)
(क़यामत की) वह घड़ी जो आनी ही है, निकट आ पहुँची है (57)
और अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो उस [क़यामत] को सामने ला खड़ा करे। (58)
अब क्या तुम [लोग] इसी बात पर आश्चर्य करते हो; (59)
और (उसका मज़ाक़ बनाकर) हँसते हो, जबकि तुम्हें रोना चाहिए! (60)
तुम क्यों (घमंड में चूर होकर खेल-तमाशे में ऐसे मगन हो कि) इस ओर ध्यान नहीं देते? (61)
अब (भी) झुक जाओ अल्लाह के सामने और उसकी बन्दगी करो। (62)
नोट:
1: तारे की क़सम खाने से मतलब यह है कि जिस तरह तारे से रौशनी की पहचान होती है, और अरब के लोग इसी से रास्ते का पता लगाते थे, इसी तरह मुहम्मद (सल्ल.) लोगों के लिए रौशनी और सही रास्ता दिखाने वाले हैं। इसके अलावा तारों की यात्रा के लिए अल्लाह ने जो रास्ते निर्धारित कर दिए हैं, वे उससे थोड़ा भी इधर-उधर नहीं होते, और न उससे भटकते हैं। इसी तरह आगे कहा गया है कि मुहम्मद साहब न रास्ता भूले हैं, न भटके हैं।
2: मुहम्मद साहब मक्का में ही बचपन से रहे थे, वह कहीं बाहर से नहीं आ गए थे। उनकी ज़िंदगी वहाँ के लोगों के सामने खुली किताब की तरह रही थी और वे उन्हें हमेशा सच बोलने वाले के रूप में जानते थे।
7: मक्का के कुछ लोगों का कहना था कि मुहम्मद साहब के पास जो फ़रिश्ता अल्लाह का संदेश लेकर आता है, वह इंसान की शक्ल में आता है, इसलिए आपको कैसे पता चला कि वह कोई फ़रिश्ता ही है! इसी के जवाब में कहा गया है कि आपने उस फ़रिश्ते को कम से कम दो बार उसके असली रूप में भी देखा है। इनमें से एक घटना का ज़िक्र तो इस आयत में है जबकि मुहम्मद साहब ने उस फ़रिश्ते [हज़रत जिबरील] से आग्रह किया था कि वह अपनी असली सूरत में आपके सामने आएं, सो वह क्षितिज पर आपको दिखायी दिए।
9: “दो कमानों की दूरी” अरबी में एक मुहावरा है, जब दो आदमी आपस में दोस्ती का क़रार करते, तो अपनी कमानें एक दूसरे से मिला लेते थे, इसी कारण अधिक नज़दीक आने के लिए इसे प्रयोग किया जाता है।
15: यहाँ दूसरी बार फ़रिश्ते को असली रूप में देखने का बयान है, जब मुहम्मद साहब मेराज के सफ़र में ऊपर के आसमानों में ले जाए गए। वहाँ बेर का एक बहुत बड़ा पेड़ है और इसी के पास जन्नत स्थित है जो ईमानवालों का ठिकाना होगा [जन्नत-उल-मावा]। कुछ विद्वानों का मानना है कि इस आयत में मुहम्मद साहब ने बेर के पेड़ के पास फ़रिश्ते जिबरील को नहीं, बल्कि अल्लाह को देखा था, और वह भी दो कमानों की दूरी से जिसका वर्णन यहां किया गया है।
20: “लात, उज़्ज़ा और मनात” तीनों अरब के अलग-अलग क़बीलों की देवियाँ थी जिन्हें वे लोग पूजते थे। यहाँ बता दिया गया कि वे बेजान पत्थर के सिवा कुछ नहीं हैं।
21: लोग फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ मानते थे, जबकि ख़ुद बेटियों को पसंद नहीं करते थे।
33: इस आयत के बारे में कहा जाता है कि एक काफ़िर आदमी ने क़ुरआन सुनकर उसपर विश्वास कर लिया था, उसके एक दोस्त ने पूछा कि तुम अपने बाप-दादा का दीन क्यों छोड़ रहे हो? उसने कहा कि वह आख़िरत [परलोक] की यातना से डरता है, इस पर उसके दोस्त ने कहा कि अगर वह मुझे कुछ पैसे दे तो मैं यह ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि अगर आख़िरत में तुम्हें यातना हुई तो वह गुनाह अपने सर ले लेगा। इस आयत में बताया गया है कि यह बेकार की बातें हैं, कोई आदमी किसी दूसरे के गुनाहों का बोझ नहीं उठायेगा।
37: देखें सूरह बक़रा (2: 123).
सूरह 52: अत-तूर
[तूर पहाड़ / Mountain Tur/ Sinai]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें मक्का के विश्वास न करनेवालों द्वारा पैग़म्बर साहब के सामने दी जाने वाली कई सारी दलीलों का जवाब दिया गया है (29-49). विश्वास करनेवालों को जन्नत में जो परम आनंद का मज़ा मिलेगा, उसकी तुलना जहन्नम में मिलने वाली भयानक यातना से की गई है, और पैग़म्बर साहब से कहा गया है कि वह शांति से सही समय का इंतज़ार करें, और अल्लाह के संदेश को लोगों तक पहुँचाते रहें, और अल्लाह के फ़ैसले का पूरे यक़ीन से इंतज़ार करें। अल्लाह ने इस सूरह में कई चीज़ों की क़समें खायी हैं, जिनमें तूर पहाड़ की क़सम भी शामिल है, जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा है, कि फ़ैसले के दिन [क़यामत] का आना बिल्कुल तय है।
विषय:
01-16: कर्मों का फ़ैसला होना ही है
17-28: जन्नत की नेमतें और ख़ुशियाँ
29-47: विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा
48-49: पैग़म्बर को दी गई अंतिम बात
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है तूर पहाड़ [Mountain Sinai] की, (1)
और क़सम है उस लिखी हुई किताब की (2)
(जो) खुले हुए झिल्ली के पन्नों [Unrolled parchment] में (लिखी हुई है), (3)
और उस घर [काबा] की क़सम जहाँ (बड़ी संख्या में) हाज़िर होते हैं; (4)
और ऊँची की हुई छत [आसमान] की; (5)
और भरे हुए समुद्र की क़सम, (6)
[ऐ रसूल!] आपके रब की यातना अवश्य आकर रहेगी --- (7)
कोई नहीं है जो इसे टाल सके --- (8)
जिस दिन आसमान थरथराहट के साथ बुरी तरह डगमगा उठेगा (9)
और पहाड़ (अपनी जगह छोड़कर बिखरने लगेंगे और बादलों की तरह) उड़ते फिरेंगे। (10)
तो उस दिन तबाही होगी उनकी जो सच्चाई (को मानने) से इंकार करते हैं, (11)
जो बेकार की बातों में डूबे हुए खेल तमाशे में लगे रहते हैं: (12)
उस दिन वे धक्के दे-देकर जहन्नम की आग में ढकेले जाएँगे। (13)
(कहा जाएगा), "यही है वह आग जिसे तुम झुठलाया करते थे, (14)
अब (बताओ) यह कोई जादू है? क्या तुम्हें अब भी दिखायी नहीं देता? (15)
जाओ, आग के अंदर (झुलसो!) --- तुम इसे सहन करने में धीरज से काम लो या न लो, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता --- तुम्हें तो उन्हीं कामों का बदला दिया जाएगा, जो तुम करते रहे थे।" (16)
अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचने वाले बाग़ों [जन्नत] में और परम आनंद [Bliss] में होंगे, (17)
उनके रब के दिए हुए तोहफ़े का मज़ा ले रहे होंगे: उस [रब] ने उन्हें भड़कती हुई आग की यातना से बचा लिया, (18)
(उनसे कहा जाएगा), "ख़ूब मज़े से खाओ-पियो और मौज करो, ये इनाम है उन अच्छे कर्मों का जो तुम करते रहे थे।"
(19)
वे एक क़तार में लगे हुए तख़्तो पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे; हम बड़ी-बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत कुँआरी औरतों [हूरों] से उनका विवाह कर देंगे; (20)
हम ईमान रखनेवाले लोगों के साथ उनकी सन्तान को भी (जन्नत में) साथ मिला देंगे, अगर संतान ने भी ईमान में अपने माँ-बाप का रास्ता अपनाया होगा (चाहे उनकी संतान के कर्म अपने माँ-बाप के कर्मों के स्तर के न भी हों)
---- हम उनके कर्मों के इनाम में से कुछ भी कमी नहीं करते: हर आदमी की जान अपने (अच्छे/ बुरे) कर्मों के बदले में गिरवी रखी हुई है ---- (21)
हम उन्हें कोई भी फल (मेवे) या गोश्त, जिसकी भी वे इच्छा करेंगे, देते रहेंगे। (22)
वे वहाँ आपस में (शराब ए तहूर के) प्याले हाथों-हाथ ले रहे होंगे, जिसके पीने से न कोई बेहूदा बातें होंगी और न कोई गुनाह। (23)
और उनकी सेवा में तन-मन से ऐसे नौजवान लगे हुए होंगे जो देखने में ऐसी मोतियों की तरह लगेंगे जिन्हें छुपाकर रखा गया हो, (24)
और वे एक दूसरे से मिलकर हाल पूछेंगे, (25)
कहेंगे, "जब हम पहले अपने घरवालों के साथ (दुनिया में) रहते थे, तो (अल्लाह की यातना से) डरे-सहमे रहा करते थे ---
(26)
अल्लाह ने हम पर बड़ा एहसान किया और हमें (जहन्नम की) झुलसा देने वाली हवा की यातना से बचा लिया --- (27)
(इससे पहले भी) हम उससे दुआएं माँगा करते थे: वह बहुत अच्छा, बेहद दयावान है।" (28)
अतः (ऐ रसूल) आप (लोगों को) नसीहत देते रहें।
अपने रब के फ़ज़ल [Grace] से (ऐ रसूल), न आप काहिन [ढोंगी भविष्यवक्ता/Oracle] हैं और न दीवाने। (29)
अगर वे लोग कहते हैं, "वह [मुहम्मद] तो केवल एक कवि हैं: हम उनके अंत होने का इंतज़ार करेंगे," (30)
आप कह दें, "अगर तुम इंतज़ार करना चाहते हो तो करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ"-----
(31)
क्या उनकी बुद्धि [अक़्ल] उन्हें सचमुच यही सब करने को कहती है, या वे हैं ही बाग़ी [insolent] लोग? (32)
क्या वे कहते हैं, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को स्वयं ही गढ़ लिया है" ---- वे सचमुच (ज़िद के कारण) विश्वास नहीं करते
----- (33)
अच्छा अगर वे अपने दावे में सच्चे हैं, तो इस (क़ुरआन) जैसी आयत (गढ़कर) ले आएँ। (34)
क्या वे लोग बिना किसी ज़रिए [Agent] के अपने आप पैदा हो गए? या उन्होंने ख़ुद ही अपनी सृष्टि कर ली? (35)
या क्या उन्होंने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है? नहीं! असल में वे (सच्चाई पर) ईमान [faith] नहीं रखते। (36)
क्या उनके पास तुम्हारे रब के खज़ाने हैं या वही (उनके दारोग़ा बनकर) उसे अपने नियंत्रण में लिए हुए हैं? (37)
या क्या उनके पास कोई सीढ़ी है जिस पर चढ़कर वे (ऊपर की दुनिया की गुप्त बातें) सुन लेते हैं? फिर उनमें से जिसने सुन लिया हो तो, वह ले आए स्पष्ट प्रमाण! (38)
क्या अल्लाह के पास (फ़रिश्तों के रूप में) तो बेटियाँ हैं, जबकि तुम्हारे पास बेटे हैं? (39)
या क्या [ऐ रसूल!] आप उनसे कोई मज़दूरी माँगते हैं कि वे क़र्ज़ के बोझ से दबे जा रहे हैं? (40)
या क्या उनके पास अनदेखी चीज़ों की जानकारी है, जिसे ये लिख लेते हों? (41)
या क्या वे समझते हैं कि वे आपको अपने जाल में फँसा लेंगे? असल में तो (सच्चाई पर) विश्वास न करने वाले लोग हैं जो जाल में फँसा दिए गए हैं। (42)
क्या अल्लाह के अतिरिक्त सचमुच उनका कोई और ख़ुदा [प्रभु] है? वे जिसे भी अल्लाह के बराबरी का ठहराते हैं, अल्लाह ऐसी तमाम चीज़ों से कहीं अधिक ऊँचा व महान है। (43)
अगर वे आसमान का कोई टुकड़ा भी अपने ऊपर गिरता हुआ देख लें, तो कहेंगे, "यह तो बस परत-दर-परत (गहरे) बादल हैं", (44)
अतः (ऐ रसूल) आप उन्हें (उनके हाल पर) छोड़ दें, यहाँ तक कि वे उस दिन का सामना करें जिस दिन उनके होश जाते रहेंगे, (45)
जिस दिन उनकी कोई चाल उनके कुछ भी काम न आएगी, जब उन्हें कोई सहायता नहीं मिलेगी। (46)
बेशक जो लोग ज़ुल्म कर रहे हैं, उन (बदमाशों) के लिए एक और यातना इंतज़ार कर रही है, मगर उनमें से अधिकतर लोग इसे नहीं जानते। (47)
अपने रब का फ़ैसला आने तक [ऐ रसूल], आप धीरज रखते हुए इंतज़ार करें: आप हमारी निगरानी में हैं। जब आप उठें, तो अपने रब की तारीफ़ों का गुणगान करें। (48)
और रात की कुछ घड़ियों में भी उसका गुणगान [glorify] करें, और सितारों के डूबने के समय (सुबह-सवेरे) भी। (49)
नोट:
7: यहाँ अल्लाह ने चार चीज़ों की क़सम खायी है, पहले तूर पहाड़ की, जिसमें इशारा है कि परलोक में अल्लाह के हुक्म न मानने वालों पर यातना होना कोई नई बात नहीं है, बल्कि तूर पहाड़ पर जो किताब मूसा (अलै.) को दी गयी थी, वह भी इस बात की गवाह है। दूसरी क़सम एक किताब की खायी गयी है, जो कि शायद तोरात, या क़ुरआन या सुरक्षित स्लेट [Preserved Tablet], जो कि हर आसमानी किताब की स्रोत है, के बारे में हो सकता है। इसका एक और मतलब आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा भी हो सकता है, जिसके मुताबिक कर्मों का बदला मिलेगा। तीसरी क़सम अल्लाह के घर की खाई गयी है, जिसका मतलब या तो काबा है, या काबा की तरह वह घर है जो आसमानों में फ़रिश्तों की इबादत करने की जगह है। चौथी क़सम आसमान की और पाँचवीं क़सम भरे हुए समंदर की खाई गयी है, इसमें यह इशारा है कि अगर इनाम या सज़ा न मिले, तो इस कायनात में जहाँ आसमान और समंदर जैसी अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हैं, उनको पैदा करने का मक़सद नहीं रहता, और यह कि जो हस्ती इतनी महान चीज़ें पैदा करने में सक्षम है, वह इंसानों को दूसरी ज़िंदगी देने में भी सक्षम है।
21: गिरवी उस सामान को कहते हैं, जो किसी उधार देने वाले ने अपने उधार की अदायगी की ज़मानत के तौर पर क़र्ज़दार से लेकर अपने पास रख लिया हो। अल्लाह ने हर इंसान को जो सलाहियतें दी हैं, वह इंसान के पास उधार हैं। यह उधार इसी सूरत में उतर सकता है जब इंसान अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ इन सलाहियतों को इस्तेमाल करे यानी दुनिया में वह सच्चाई पर ईमान रखे और नेक अमल करके दिखाए। अगर वह ऐसा करता है तो वह दुनिया में अपना उधार चुका देगा और परलोक [आख़िरत] में उसकी जान को आज़ादी मिल जाएगी। यहाँ यह बात वैसे ईमानवालों के लिए कही गयी है जिन्होंने नेक कर्म किए और वे तो जन्नत में जाएंगे ही, साथ में उनकी ईमानवाली औलाद भी उनके साथ जाएगी, इस तरह, उन्होंने अपना उधार उतार दिया। याद रहे कि बाप की नेकी की वजह से उसकी ईमानवाली औलाद का दर्जा भी बढ़ जाएगा, लेकिन औलाद के बुरे कर्मों की सज़ा बाप को नहीं मिलेगी, क्योंकि हर आदमी की जान खुद अपने कर्मों की कमाई के लिए गिरवी है, दूसरे की कमाई के लिए नहीं।
30: मुहम्मद (सल्ल) के बारे में कुछ क़ुरैश के लीडरों ने यह कहा था कि जिस तरह दूसरे कवियों की शायरी उनके मरने के साथ ही समाप्त हो गई, इसी तरह ये साहब भी मर जाएंगे तो फिर इनकी बातें भी इन्हीं के साथ ख़त्म हो जाएंगी।
34: क़ुरआन ने ऐसा चैलेंज कई जगह पर किया है, जैसे देखें सूरह बक़रा (2: 23), सूरह यूनुस (10: 38), सूरह अल-इसरा (17: 88), लेकिन इस चैलेंज को किसी ने स्वीकार नहीं किया।
37: मक्का के लोग यह कहा करते थे कि अगर अल्लाह को पैग़म्बर भेजना ही था, तो मक्का या तायफ़ के किसी बड़े सरदार को पैग़म्बर क्यों नहीं बनाया। देखें सूरह ज़ुख़रुफ़ (43: 13), मगर अल्लाह जिसको चाहे अपना पैग़म्बर बना दे, उसकी रहमत के ख़ज़ाने किसी इंसान की इच्छाओं के अधीन नहीं है।