Tuesday, November 29, 2022

मक्का के शुरुआती काल की सूरतें/ सूरह समूह 1:

 मक्का के शुरुआती काल की सूरतें

 

सूरह समूह 1:

 

उप समूह :

 

सूरह 93: अज़-ज़ुहा,

[सुबह की रौशनी, The Morning Brightness]



यह मक्का के शुरुआती ज़माने की सूरह है जिसमें "तुम या आप"  से सम्बोधित किया गया है, जिसे आम तौर से माना जाता है कि  यह रसूल यानी मुहम्मद साहब को  सम्बोधित है,  जो अनाथ थे,  उन्हें फिर से भरोसा दिलाया गया है कि भले ही अल्लाह की तरफ़ से कुछ  अवधि के लिए कोई सूरह नहीं   उतरीमगर अल्लाह ने आपको छोड़ा नहीं हैजैसा कि मक्का के लोग व्यंग्य से कहते थे।

 

विषय: 

01-05:  रसूल को दोबारा भरोसा दिलाना

06-08:  पहले भी अल्लाह का ख़ास करम रहा है

09-11:  अंत में दिया गया हुक्म 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 

                 क़सम है दिन के पहले पहर की रौशनी की,  (1)

 

और क़सम है रात की जब (उसका सन्नाटा) छा जाए,  (2)


कि आपके रब ने आपको [ रसूल], छोड़ा है और ही आप से नाराज़ हुआ है,  (3)

 

और आगे आनेवाले हालात आपके लिए पहले के हालात से (बड़ाई और दर्जे में) बेहतर होंगे;  (4)

 

यक़ीन रखें कि आपका रब आपको (इतना कुछ) देगा कि आप पूरी तरह संतुष्ट हो जाएंगे।  (5)

 

क्या उस [रब] ने आपको यतीम [अनाथ] नहीं पाया था और फिर (आपको अच्छा) ठिकाना [shelter] दे दिया?  (6)

 

क्या उसने आपको (सच्चाई की खोज में) भटकते हुए नहीं देखा था और फिर सही मार्गदर्शन दे दिया?  (7)

 

क्या उसने आपको ज़रूरतमंद नहीं पाया था और फिर आपको आत्म-निर्भर [self-sufficient] बना दिया?  (8)



अत: आप भी किसी अनाथ पर सख़्ती करें,  (9)

 

और (अपने दरवाज़े पर आये) किसी माँगने वाले को झिड़कें; (10)

 

और अपने रब की नेमतों का (ख़ूब) बखान करते रहें।  (11)



नोट:



3: मुहम्मद (सल्ल) के नबी  होने के बाद शुरु-शुरु में कुछ अवधि ऐसी भी गुज़री जिसमें आप पर अल्लाह की तरफ़ से वही[Revelation] का आना बंद हो गया था,  इस पर आपके प्रमुख विरोधी अबु लहब की बीवी ने ताना मारते हुए कहा था कि तुम्हारे रब ने नाराज़ होकर तुम्हें छोड़ दिया है। इसी के बाद यह सूरह उतरी थी। अल्लाह के द्वारा यहाँ चढ़ते दिन की रौशनी और अंधेरी रात की क़सम खाने से शायद मतलब यह है कि रात को चाहे जितना भी अंधेरा हो जाएइसका मतलब यह नहीं है कि दिन की रौशनी नहीं आएगी। इसी तरहअगर किसी कारण से वही नहीं आयी हैतो इसका मतलब यह नहीं है कि अल्लाह आपसे नाराज़ हो गया है। 

 

4: या बेशक आपके लिए अंत [आख़िरत] आपकी शुरुआत [दुनिया की ज़िंदगी] से बेहतर होगा 

7: मुहम्मद साहब सच की तलाश में अक्सर गुफ़ा में जाकर सोच-विचार करते रहते थेतो अल्लाह ने आपको नबी बनाकर दीन के सभी नियम-क़ायदे सिखाए।

8: हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) के साथ जब आपने उनके कारवाँ व्यापार में हिस्सा लियातो उससे आपको काफ़ी लाभ हुआ जिससे आपकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई थी। 



  

सूरह 94: अल-इंशिराह

[Expand, दिल का फैलना / Relief, राहत] 



यह भी मक्की सूरह है जिसमें लगता है कि पिछली सूरह 93 से आगे बात कही गई हैइसमें भी संबोधन मुहम्मद सल्ल. से ही है और यहाँ उन्हें मक्का शहर में लगातार मदद का फिर से   भरोसा दिलाया गया है और उनका उत्साह भी बढ़ाया गया है।  

 

विषय:  

01-08: रसूल को और ज़्यादा भरोसा दिलाना 

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है 

 
 [
 रसूलक्या हमने आपके लिए आपका दिल (ज्ञान की रौशनी और समझ-बूझ सेफैला नहीं दिया (जिससे आपको राहत मिल गयी),   (1) 

 

और हमने आप पर से (नबी होने की शुरूआती ज़िम्मेदारी काबोझ  उतार दिया,  (2) 

  

जिस (बोझने आपकी कमर तोड़ रखी थी,  (3) 

  

और हमने (आपकी इज़्ज़त इस तरह बढ़ायी कि लोगों के लिए)  आपको याद किए जाने [remembrance] को ऊँचा दर्जा दे दिया?  (4) 

 

तो सचमुच जहाँ कहीं कठिनाई होती हैउसके साथ आसानी भी  (आतीहै;  (5) 

 
निश्चय ही हर कठिनाई के साथ आसानी (भीहोती है।  (6) 

 
तो जैसे ही आप (अपने लोगों कीज़िम्मेदारियों से फ़ुर्सत पा लेंतो    (अल्लाह की याद  इबादत मेंमेहनत किया करें,  (7) 

 

और हर चीज़ के लिए अपने रब से ही दिल लगाया करें। (8)



नोट:


3: जब हज़रत मुहम्मद (सल्ल) को नबी होने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयीतो शुरुआत में आपने उनका ज़बरदस्त बोझ महसूस कियाइस बोझ की वजह से आप बेचैन रहते थे। लेकिन फिर अल्लाह ने आपको वह हौसला दिया जिसके नतीजे में आपने कठिन-से-कठिन काम बड़े आराम से कर लिए। यहाँ अल्लाह के इसी इनाम का वर्णन है।

4: अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) के मुबारक नाम को इतना ऊँचा दर्जा दे दिया कि दुनिया में हर जगह आपका नाम अल्लाह के नाम के साथ लिया जाता हैऔर आपके काम का ज़िक्र करना इबादत का हिस्सा माना जाता है।  

6: मुहम्मद साहब को यहाँ तसल्ली दी गयी है कि शुरु में अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाने में जो मुश्किलें रही हैंवह जल्द ही आसान हो जाएंगी। इसके साथ ही आम इंसानों को भी यह सबक़ दिया गया है कि जब भी मुश्किल समय आए तो धीरज से काम लें और समझ जाएं कि इसके बाद आसानी का समय भी आएगा।

7: मुहम्मद साहब दिन भर अल्लाह के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के काम में व्यस्त रहते थे। हालाँकि यह काम भी इबादत में ही शामिल थापर इसके बावजूद यह कहा गया है कि जब इन कामों से फुर्सत मिल जाएतो असल इबादत (नमाज़ या ज़िक्र आदि) में भी मेहनत करेंइसी से अल्लाह के साथ रिश्ता मज़बूत होता है और हर काम में बरकत पैदा होती है। 

 
 


सूरह 97: अल-क़द्र

[क़द्र की रात, The Night of Glory or Power]


यह एक मक्की सूरह है जिसमें उस रात की महानता का बयान है जिस रात क़ुरआन पहली बार सन 610 . में रमज़ान महीने के आख़िरी हफ़्ते में उतरी थी।

 

विषय:

01-05: क़द्र [Decree] की रात जब क़ुरआन उतरी


 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 

बेशक हमने (पहली बार इस क़ुरआन) को क़द्र की रात में उतारा।  [1]

 

और तुम्हें क्या मालूम (कि) क़द्र की रात क्या है?  [2]

 

क़द्र की रात (में की गयी इबादत) एक हज़ार महीनों से भी बेहतर है;  [3]

 

इस (रात) में फ़रिश्ते और रूह [जिबरील] अपने रब की आज्ञा से (अगले साल होने वाले) हर काम के लिए (हुक्म लेकर) बार-बार उतरते हैं;  [4]

 

सुबह पौ फटने तक, वह रात पूरी तरह से शांति सलामती [Peace] वाली है।  [5]



नोट:

1: एक मतलब तो यह है कि क़द्र की रात में पूरी क़ुरआन लौह--महफ़ूज़ [सुरक्षित स्लेट/Preserved Tablet] से सबसे नीचे वाले आसमान में उतारी गई, फिर (फ़रिश्ता) हज़रत जिबरील इसे थोड़ा-थोड़ा करके 23 साल तक मुहम्मद (सल्ल.) पर उतारते रहे (2:97), दूसरा मतलब यह हो सकता है कि मुहम्मद साहब पर क़ुरआन के उतरने की शुरुआत सबसे पहले इसी रात में हुई। यह रात रमज़ान के महीने की आख़िरी 10 विषम [Odd] रातों यानी 21, 23, 25, 27, या 29वीं तारीख़ में से कोई रात थी।

4: इस रात में फ़रिश्तों के उतरने के दो मक़सद होते हैं। एक यह कि जो लोग इस रात इबादत में लगे रहते हैं, फ़रिश्ते उनके लिए दुआ करते हैं, और दूसराहर काम के लिए उतरनेका मक़सद यह है कि अल्लाह इस रात में साल भर के फ़ैसले फ़रिश्तों के हवाले कर देता है, ताकि वे अपने-अपने समय पर उन पर अमल करते रहें (देखें 44:4).

 

 

 

सूरह 108: अल-कौसर

[बहुत ज़्यादा भलाई, Abundance]

 

जब पैग़म्बर साहब के आख़िरी बेटे की मौत हो गईतो उनके विरोधियों ने जो उनसे बहुत नफ़रत करते थेतंज़ करना शुरू किया कि अब वह "अबतरहो गए यानी अब उनकी नस्ल आगे नहीं चल पाएगी और कुछ दिनों बाद वह भुला दिए जाएंगे। इस मक्की सूरह में उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया है और उनके दुश्मनों को जवाब दिया गया है।  

 

विषय:

01-03: पैग़म्बर (सल्ल) के लिए अच्छी ख़बर 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


बेशक [ रसूल!], हमने आपको बहुत ज़्यादा भलाई [abundance] (और नेमतें) दी हैं  ------ (1)

सोआप केवल अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ा करें और उसी के लिए क़ुर्बानी दिया करें------- (2)

वह जो आपसे नफ़रत करता हैअसल में वही अपनी जड़ से कटा हुआ होगा (जिसका तो कोई नाम बाक़ी रहेगा और ही उसके ख़ानदान को कोई जानेगा)  (3)


 

नोट:

1: "कौसर" का मतलब कुछ विद्वानों ने जन्नत की एक नदी से भी लिया है। कुछ कहते हैं कि यह उनके पीछे चलनेवालों को कहा गया है जो बहुत अधिक थे। कुछ कहते हैं कि 'बहुत सारी आयतों' के उतरने को "कौसर" कहा गया है

3: अरब के लोग ऐसे आदमी को अबतरकहते थे जिसकी नस्ल आगे चले यानी जिसका  कोई लड़का हो। जब मुहम्मद (सल्ल) के बेटे की मौत हो गईतो आपके दुश्मनों ने ताना मारते हुए आपको अबतरयानी ‘जड़ से कटा हुआ’  कहना शुरू किया जिसका कोई नाम लेने वाला होगा।

 

 


सूरह 105: अल-फ़ील

[हाथीवाले, The Elephant]

 

इस सूरह में एक घटना का हवाला दिया गया है जो 570 . में घटी थीउसी साल मुहम्मद सल्ल. की पैदाइश हुई थी।  हुआ यूँ था कि अबरहा नाम का एक ईसाई राजा था जो यमन के शहर "सनामें रहता थावह मक्का पर चढ़ायी करने के लिए एक बहुत बड़ी सेना लेकर निकला जिसमें बहुत सारे हाथी भी थे। उसका असल मक़सद "काबाको ध्वस्त     करना था ताकि उस क्षेत्र के बहुत सारे लोग जो हर साल तीर्थयात्रा के लिए काबा जाते थेवे   वहाँ  जाकर "सनाजाएं जहाँ उसने बहुत भव्य चर्च बनवाया था। यहाँ उसकी सेना की बर्बादी का क़िस्सा सुनाया गया है ताकि ईमानवालों का   उत्साह बढ़ सके और विश्वास  करनेवालों को चेतावनी दी जा सके।  

 

विषय: 

01-05: अल्लाह द्वारा काबा की हिफ़ाज़त 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


[ रसूल] क्या आपने नहीं देखा कि आपके रब ने हाथीवालों [यमन से आए अबरहा के लश्कर] के साथ क्या किया (जो काबा को तहस-नहस करने के इरादे से आए थे)?  (1) 

क्या उस [अल्लाह] ने उनकी तमाम चालों को पूरी तरह से बेकार नहीं कर दिया था?  (2)

और उसने उन पर (हर तरफ़ से) चिड़ियों के झुंड-के-झुंड भेज दिये थे,  (3)

जो उन पर ठोस पकी-मिट्टी की कंकरियाँ फेंक रही थीं:  (4)

(अल्लाह नेउन्हें ऐसा कर डाला जैसे चबाया हुआ भूसा!  (5)

 

 

 नोट:

1: अबरहा जो कि यमन का बादशाह थावह अपने लशकर के साथ हाथियों पर सवार होकर काबा पर चढ़ायी करने के लिए आया था। उसने यमन में आलीशान चर्च का निर्माण करवाकर यमन के लोगों में यह घोषणा कर दिया था कि आगे से कोई आदमी हज के लिए मक्का जाएबल्कि इसी चर्च को अल्लाह का घर समझे। अरब के लोग हालाँकि मूर्तिपूजक थेलेकिन हज़रत इबराहीम (अलै.) की शिक्षा से काबा की शान गौरव उनके दिलों में रच-बस गई थी। इस घोषणा से उनमें दुख और ग़ुस्से की लहर दौड़ गई और उनमें से किसी ने रात के समय उस चर्च  में जाकर गंदगी फैला दी और कुछ लोग कहते हैं कि उसके कुछ हिस्सों में आग भी लगा दी। अबरहा को जब यह मालूम हुआ तो वह एक बड़ा लशकर तैयार करके मक्का की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में कई क़बीलों ने उसके साथ युद्ध कियामगर उनकी हार हुईअंत में यह लशकर मक्का के बहुत क़रीब तक पहुँच गयालेकिन अगली सुबह उसने काबा की तरफ़ बढ़ना चाहा तो उसके हाथी ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया और उसी समय समंदर की तरफ़ से अजीब क़िस्म के परिंदों का एक बड़ा झुंड आया और पूरे लशकर के ऊपर छा गया। हर चिड़िये की चोंच में तीन-तीन कंकर थे जो उन चिड़ियों ने फौज पर बरसाएजिस पर भी यह कंकरी लगतीउसके पूरे जिस्म को छेदती हुई ज़मीन में घुस जाती थीयह यातना देखकर सारे हाथी भाग खड़े हुए। लशकर के सिपाहियों में कुछ तो वहीं मारे गएऔर कुछ भाग निकलेवे रास्ते में मरेऔर अबरहा के शरीर में ज़हर ऐसा घुल गया कि उसका एक-एक जोड़ सड़-गलकर गिरने लगाइसी हालत में उसे यमन लाया गयाऔर वहीं उसकी मौत हो गई। 

यह घटना मुहम्मद सल्ल.) के पैदा होने के कुछ ही दिन पहले की है। इस घटना का वर्णन करके मुहम्मद साहब को तसल्ली दी गयी है कि अल्लाह की क़ुदरत बहुत बड़ी हैइसलिए जो लोग आपकी दुश्मनी पर कमर बाँधे हुए हैंअंत में वह भी हाथीवालों की तरह मुँह की खाएंगे। 

 

 

 

 सूरह 106: क़ुरैश

[क़ुरैश का क़बीला, The Tribe of Quraysh] 

 

यह मक्की सूरह पिछली सूरह से इस तरह जुड़ी हुई है कि अबरहा की सेना की चढ़ायी के   नतीजे में जिस तरह मक्का पर ख़तरा मंडराया थाउसे अल्लाह ने दूर कर दिया और अबरहा की पूरी सेना तबाह हो गई। इस तरहअल्लाह ने मक्का को सुरक्षित कर दिया और अब क़ुरैश के ख़ानदान वाले शांति से अपने व्यापारिक कारवाँ पर सीरिया और यमन की     तरफ़ जा सकते थे जो उनकी ख़ुशहाली का ज़रिया था। इसके लिए मक्का के बुतपरस्तों को अल्लाह का शुक्र्गुज़ार होना चाहिए था और पूरी भक्ति से एक अल्लाह को मानना चाहिए था। 

 

विषय:

01-04: मक्का के लोगों पर अल्लाह का ख़ास करम

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


(अल्लाह ने ऐसा किया कि) क़ुरैश [क़बीले के लोग] ख़ुद को सुरक्षित महसूस करने लगे, (1)

सुरक्षित कर दिया उन [क़ुरैश] के जाड़े (में यमन) और गर्मी (में सीरिया) को जाने वाले (व्यापारिककारवाँ को (जो उनकी ख़ुशहाली का ज़रिया थे) (2)

अत: (इस करम के बदलेउन्हें चाहिए कि उस घर [काबा] के रब की इबादत करें:  (3)

जिसने उनको भूख (की हालत) में खाना दियाऔर (दुश्मनों केडर से अमन-शांति दी।  (4)

 

 

नोट:

1 : या, [अल्लाह ने ऐसा करम किया] ताकि वे अपनी परम्परा के अनुसार व्यापारिक कारवाँ में जाते रहेंऔर उसे बंद करें।

2: इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में अरब में क़त्ल और लूटमार का बाज़ार गर्म था, और कोई आदमी शांति के साथ सफ़र नहीं कर पाता था, क्योंकि रास्ते में चोर-डाकू या दुश्मन क़बीले के लोग उसे मारने या लूटने के लिए घात लगाए रहते थे। लेकिन क़ुरैश का क़बीला चूँकि अल्लाह के घर [काबा] के पास रहता था और इसी क़बीले के लोग काबा की सेवा करते थे, इसलिए सारे अरब के लोग इनकी इज़्ज़त करते थे, और जब वे सफ़र करते थे, तो कोई उन्हें लूटता नहीं था। इस कारण उनका व्यापारिक कारवाँ सुरक्षित आता जाता था, वे व्यापार के लिए सर्दियों में यमन जाते और गर्मियों में सीरिया का सफ़र करते थे, इसी व्यापार से उनकी रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई थी, और हालाँकि मक्का में खेत थे, बाग़, लेकिन इसी व्यापार के चलते वे खुशहाल थे। अल्लाह ने इस सूरह में उन्हेंं याद दिलाया है कि उनको सारे अरब में जो इज़्ज़त हासिल है और जिस की वजह से उनकी व्यापारिक यात्रा आराम से होती है, यह सब कुछ अल्लाह के घर, काबा की बरकत से है। अत: उन्हें चाहिए कि इस घर के मालिक यानी अल्लाह की ही इबादत करें और मूर्तियों को पूजना छोड़ दें।  

 

 

उप समूह

 

सूरह 102: अत-तकासुर

[ज़्यादा पाने की लालसा, Striving For More] 

 

यह एक मक्की सूरह है जिसमें इंसानों की इस बात की निंदा की गई है कि वह दुनिया की धन-दौलत इकट्ठा करने में हर समय लगा रहता हैऔर इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि आदमी को क़यामत के दिन कर्मों के हिसाब-किताब के लिए बुलाया जाएगा। 

 

विषय: 

01-08: बेकार चीज़ों में ज़िंदगी बर्बाद करना

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


ज़्यादा से ज़्यादा (धन-दौलत और ऐश आराम) हासिल करने की लालसा ने तुम लोगों को (आख़िरत/Hereafter] सेभटका रखा है  (1)

यहाँ तक कि तुम लोग अपनी क़ब्रों में जा पहुंचते हो।  (2)

 हरगिज़ नहीं! (धन-दौलत तुम्हारे काम नहीं आएगी)तुम्हें जल्द ही सब पता चल जाएगा।  (3)

 फिर (तुम्हें चेताया जाता है), (ऐसा) हरगिज़ नहीं (है जैसा तुम्हारा ख़्याल है)! तुम्हें अंत में (अपना अंजाममालूम हो जाएगा। (4)

हरगिज़ नहीं!अगर तुम पक्के यक़ीन के साथ जानते होते (तो दुनिया में मस्त होकर आख़िरत [परलोक] को इस तरह भूलते)  (5)

तुम (अपनी लालच के नतीजे मेंज़रूर जह्न्नम की आग को देख लोगे,  (6)

 फिर तुम उसे पक्के यक़ीन के साथ देख लोगे। (7)

फिर उस दिन तुमसे (अल्लाह की दी हुई) नेमतों [Pleasures] के बारे में ज़रूर पूछ्ताछ की जाएगी (कि तुमने उन्हें कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे ख़र्च किया था)  (8)

 

 

नोट: 

6: जो लोग जन्नत में जाएंगेउन्हें भी जहन्नम दिखाई जाएगीताकि उन्हें जन्नत की सही क़ीमत [value] मालूम हो सके। 

 

 

 

सूरह 107: अल माऊन

[मामूली चीज़ों से मदद, Common Kindnesses]

 

यह एक मक्की सूरह हैजिसका नाम आयत से लिया गया है जिसमें एक ऐसे आदमी की 

कुछ विशेषताएं बतायी गई हैं जो कर्मों के हिसाब-किताब और  होने  वाले फ़ैसले से इंकार करता हैक्योंकि उसके मन में अल्लाह के प्रति भक्ति का भाव नहीं है  और  ही ज़रूरतमंदों को कुछ देने के लिए मन में करुणा है।  

 

विषय: 

 01-03: फ़ैसले के दिन को मानने से इंकार: ग़लत आचरण 

04-07: इबादत में दिखावा करना



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


[ रसूल], क्या आपने उस आदमी को देखा है जो (अंतिम) फ़ैसले के दिन (मिलने वाले इनाम या दंड) को मानने से इंकार करता है?  (1)

ये तो वही (कमबख़्त आदमीहै जो यतीम [अनाथ] को धक्के देता है, (और उनकी ज़रूरतों को नहीं देखता)  (2)

और मुहताजों/ ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए (लोगों कोप्रोत्साहित नहीं करता।  (3)

तो बस अफ़सोस (और ख़राबी हैउन नमाज़ पढ़नेवालों के लिए  (4)

जिनका दिल असल में नमाज़ों में नहीं लगता; (कि सही नीयत से नमाज़ नहीं पढ़तेऔर कुछ पढ़ते तो हैं मगर उनके दिल इंसानियत और ग़रीबों की सेवा-भाव से बिल्कुल ख़ाली हैं)  (5)

वे लोग (इबादतमें दिखलावा करते हैं,  (6)

और वे रोज़मर्रा की मामूली चीज़ें भी माँगने पर किसी को नहीं देते।  (7)

 

 

नोट:

6: यानी अगर नमाज़ पढ़ते भी हैं तो उसे दिखावा करने के लिए पढ़ते हैं। असल में यह काम पाखंडियों [मुनाफ़िक़/hypocrites] का था जो मदीने में थे और दिखावे के लिए मुसलमान हो गए थेमगर अंदर से वे ईमान नहीं रखते थे। हालाँकि यह सूरह मक्का में उतरी बतायी जाती है। हो सकता है कि यह आयतें मदीना में उतरी हों।

7: रोज़मर्रा की मामूली छोटी-मोटी चीज़ें जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर लोग अपने पड़ोसियों से माँग लिया करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें ज़कात भी शामिल है जो आदमी के धन का मामूली (चालीसवाँ) हिस्सा होता है।  

 

 


सूरह 111: अल-लहब/ अल-मसद

[आग में जलनेवाला, Flame Man / खजूर की छाल, Palm-fibre]


यह एक मक्की सूरह है जिसमें पैग़म्बर साहब के चचा (अबु लहबऔर उसकी बीवी का हवाला दिया गया है जो उनके सबसे बड़े विरोधी थे। उसने मुहम्मद सल्ल. को "तब्बक यदक" (यानी तुम्हारे हाथ बर्बाद हो जाएंकहकर बेइज़्ज़ती की थीयह सूरह  उसी के जवाब में उतरी थी। 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


अबु लहब के दोनों हाथ बर्बाद हो जाएँ! और वह ख़ुद भी बर्बाद हो जाए! (1) 

तो (विरासत में मिली हुईदौलत ही उसके काम आएगी और वह धन जो उसने कमाया:  (2)

वह जल्द ही (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में जा पड़ेगा----  (3)

और साथ में उसकी (बदमाश) पत्नी (भी), जो (काँटेदारलकड़ियों का बोझा उठाए फिरती है, (और हमारे रसूल को सताने के लिए रास्तों में बिछा देती है)  (4)

(क़यामत के दिन) उसकी गर्दन में खजूर की छाल का (वही) रस्सा होगा (जिससे वह काँटों का गट्ठर बाँधती है)  (5)


 

नोट: 

1: अबु लहबयानी "अब्दुल उज़्ज़ा" मुहम्मद (सल्ल) का चचा थावह आपका उस समय से घोर विरोधी हो गया था जब से आपने लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाना शुरू कियाऔर फिर वह आपको तरह-तरह से तकलीफ़ें पहुँचाता था। जब मुहम्मद (सल्ल) ने पहली बार अपने ख़ानदान के लोगों को सफ़ापहाड़ पर जमा करके उनको अल्लाह का संदेश सुनायातो अबु लहब ने कहा था: बर्बादी हो तुम्हारी! क्या इसी काम के लिए तुमने हमें जमा किया था?” इसके जवाब में यह सूरह उतरीऔर इसमें पहले तो अबु लहब को बद-दुआ दी गई है कि वह बर्बाद हो जाए! उसके बाद आगे कहा गया है कि उसकी बर्बादी हो ही गई! चुनांचे बद्र की जंग के सात दिन बाद वह महामारी का शिकार हो गयाअरब के लोग छूत-छात मानते थे और जिसे यह बीमारी होती थीउसे हाथ भी नहीं लगाते थेफिर वह इसी हाल में मर गया और उसकी लाश सड़कर महकने लगीयहाँ तक कि लोगों ने किसी लकड़ी के सहारे से उसे एक गड्ढे में गाड़ दिया।

3: भड़कते शोले को अरबी में लहबकहते हैंअबु लहब उसको इसीलिए कहते थे कि उसका चेहरा शोले की तरह लाल था। क़ुरआन ने यहाँ जहन्नम के शोलों के लिए भी यही शब्द प्रयोग किया है। इसी से इस सूरह का नाम भी सूरह अल-लहब है।

 

 


 सूरह 104: अल-हुमज़ह

[पीठ-पीछे बुराई करनेवाला, The Backbiter]

 

यह एक मक्की सूरह है जिसमें पीठपीछे बुराई करनेवाले एक लालची इंसान का ज़िक्र आया हैऔर साथ में जहन्नम का भी विवरण आया है। 

 

विषय:

01-09: किसी को बदनाम करना या पीठ-पीछे बुराई करने वालों को चेतावनी 

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

हर उस आदमी के लिए तबाही हैजो (मुँह पर) ताना देने वाला और पीठ-पीछे दूसरों की बुराई करने वाला हो,  (1)

(बड़ी ख़राबी है उस आदमी के लिए भीजो माल को जमा करता हो और गिन-गिनकर रखता हो, (जायज़ और नाजायज़ माल का हिसाब किए बिना),  (2)

वह समझता है कि उसका माल उसे हमेशा ज़िन्दा बाक़ी रखेगा।  (3)

हरगिज़ नहीं! वह तो ज़रूर चूर-चूरकर देने वाली चीज़ [हुतमा] में झोंक दिया जाएगा!  (4)

और आपको क्या मालूम कि "हुतमा" क्या है?  (5)

वह अल्लाह की भड़काई हुई आग है,  (6)

जो (तलवे से लगी तो) दिलों तक चढ़ जाएगी।  (7)

बेशक वह (आग) उन लोगों को चारों तरफ़ से अपने घेरे में ले लेगी,   (8)

जबकि वह (भड़कते हुए) लम्बे-लम्बे शोलों में घिरे हुए होंगे।  (9)

 

 

नोट: 

1: पीठ पीछे दूसरों की बुराई करने [ग़ीबत] को क़ुरआन में घिनौना गुनाह कहा हैऔर किसी के मुँह पर ताने देना जिसे उसका दिल दुखेउससे भी बड़ा गुनाह है।

3: जायज़ तरीक़े से धन कमाना कोई गुनाह नहीं हैलेकिन उसकी ऐसी मुहब्बत कि हर समय आदमी उसी के फेर में लगा रहेउसे गुनाह करने पर उकसाता है। और किसी आदमी पर अगर धन की मुहब्बत इस तरह सवार हो जाए कि वह समझने लगे कि उसकी हर मुश्किल धन से ही दूर होगीऔर हर समय मौत को भूलकर दुनियादारी की योजनाएं बनाता रहे जैसे कि यह धन उसे हमेशा ज़िंदा रखेगा, तो यह भारी भूल है।  

 

 

 

उप समूह

 

सूरह 103: अल-अस्र

[ढलता हुआ दिन, The Declining Day]

 

यह एक मक्की सूरह है जिसमें इंसानों की मुक्ति का रास्ता दिखाया गया है।यहाँ एक गुज़रते हुए दिन का नक़्शा खींचा गया हैजब ऐसे लोग जो अपने बचे हुए समय में   बहुत कुछ करना चाहते हैंमगर दिन के किसी एक पहर मेंया ज़िंदगी में उन्हें ऐसा लगता है कि काम के लिए अब थोड़ा ही समय बचा है।तो आनेवाली दुनिया में वही लोग कामयाब होंगे जिन्होंने अपनी छोटी सी ज़िंदगी में    समय का सही उपयोग करते हुए ज़्यादा से ज़्यादा भलाई का काम किया। 

 

विषय:

01-03: इंसानियत को ग़फ़लत से जगाना

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


ढलते हुए दिन की क़सम (या ढलती उम्र की क़सम)  (1)

बेशक इन्सान (बड़े) घाटे में है (कि वह अपनी क़ीमती उम्र गँवा रहा है),  (2)

सिवाय उन लोगों के जो ईमान रखते हैंअच्छे काम करते हैं, (समाज में) एक दूसरे को सच्चाई की नसीहत करते रहते हैंऔर (बुराइयों से बचने मेंअच्छे कर्म करने में और आनेवाली मुसीबतों मेंएक दूसरे को सब्र [धैर्य] के साथ जमे रहने पर ज़ोर देते हैं।  (3)

 

 

नोट:

1: कि जब दिन का हिस्सा या ज़िंदगी कम ही बची रहती है,  

या ज़माने की क़सम! ज़माने का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जो लोग सच्चाई पर विश्वास नहीं रखते और नेक कर्मों से दूर रहते हैंवे बड़े घाटे में हैंइसलिए कि बहुत सी क़ौमों को दुनिया में ही आसमानी यातना झेलनी पड़ीऔर हर ज़माने में अल्लाह की उतारी हुई किताबें और उसके भेजे हुए पैग़म्बर लोगों को बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान करते रहे हैं।

2: और अच्छे कर्म करने का समय घटता जा रहा है।

3: ख़ुद नेक बन जाना ही काफ़ी नहीं हैबल्कि अपने प्रभाव में आए हुए लोगों को भी सच्ची बात और धीरज से अच्छाई पर जमे रहने पर ज़ोर देना भी ज़रूरी है। सब्र या धीरज एक क़ुरआन का term है जिसका मतलब यह है कि जब इंसान के दिल की इच्छाएं उसे किसी सही काम को करने से रोक रही हों या कोई गुनाह करने पर उकसा रही होंउस समय उन इच्छाओं को कुचला जाएऔर जब आपके साथ कोई बुरी चीज़ घट जाएतो अल्लाह के फ़ैसले पर अंगुली उठाने से बचा जाए।   

 

 

 

सूरह 99: अज़-ज़िलज़ाल

[अंतिम भूकंप/ The Earthquake]

 

 यह एक मदनी सूरह है जिसमें फ़ैसले के दिन के कई दृश्य दिखाए गए हैं, जब कर्मों के बही-खाते खोल दिए जाएंगे और उनका हिसाब-किताब होगा। सूरह 81, 82, 101 और दूसरी सूरतों से भी तुलना करें।

  

 विषय:

01-08: फ़ैसले के दिन की दहशत



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ (आख़िरी) भूकंप से झिंझोड़ दी जाएगी, (1)

जब धरती अपने अन्दर के (सब) बोझ [मुर्दे] निकाल बाहर कर डालेगी,  (2)

जब आदमी पुकार उठेगा, “इस [धरती] को आख़िर क्या हो गया है”? (कि इतनी ज़ोर से काँप रही है);  (3)

उस दिनवह [धरती] अपने सब हालात ख़ुद बता देगी,  (4)

क्योंकि तुम्हारा रब उसको (ऐसा ही करने का) हुक्म देगा।  (5)

उस दिनलोग अलग-अलग टोली में (अपनी क़ब्रों से) निकलकर आएंगेताकि उन्हें उनके किए गए कर्मों को दिखाया जाए: (6)

जिस किसी ने कण-भर भी अच्छाई की होगीवह इसे देख लेगा, (7)

और जिस किसी ने कण-भर भी बुराई की होगीतो वह उसे (भी) देख लेगा। (8)

 

 

नोट:

2: यानी सारे मुर्देऔर साथ में सारे खनिज-पदार्थ और ख़ज़ाने जो ज़मीन के अंदर गड़े हुए हैंसब बाहर जाएंगे। एक हदीस में है कि जिस किसी ने दौलत के चलते किसी को क़त्ल किया होगाया रिश्तेदारों का हक़ मारा होगाया चोरी की होगीवह सारे माल को देखकर कहेगा कि ये है वह माल जिसके चलते मैंने ये गुनाह किए थे। फिर कोई उस सोने-चाँदी की तरफ़ ध्यान नहीं देगा।

8: यहाँ बुराई का मतलब ऐसी बुराइयों से है जिसके लिए तौबा की गई होक्योंकि सच्ची तौबा से गुनाह माफ़ हो जाते हैं। सच्ची तौबा में यह बात भी शामिल है कि जिस गुनाह की भरपाई मुमकिन होउसकी भरपाई कर दी जाएउदाहरण के लिए किसी का हक़ मारा थातो उसे दे दिया जाएया उससे माफ़ करा लिया जाएया कोई फ़र्ज़ नमाज़ छूटी हुई थीउसे पढ लिया जाए आदि। 

 

 


सूरह 100: अल-आदियात

[हाँफते-दौड़ते घोड़े, The Charging Steeds]

 

यह मक्का के शुरुआती ज़माने की सूरह है जिसमें अल्लाह ने जंग में लड़नेवाले घोड़ों की क़सम खायी है जिसे अल्लाह ने इंसानों के फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा हैमगर इंसान अल्लाह की मेहरबानियों का शुक्र अदा नहीं करता और   गुमराह हो जाता है। 

 

विषय: 

01-11: इंसान (अल्लाह का) शुक्र अदा नहीं करता 


 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

(युद्ध के मैदान में) सरपट दौड़ते हुए और हाँफते हुए घोड़ों की क़सम,  (1)

फिर जो पत्थरों पर ठोकर मारकर चिंगारियाँ उड़ाते हैं,  (2)

फिर जो सुबह होते ही (दुश्मन पर) अचानक छापा मारते हैं,  (3)

फिर (हमले वाली) जगह के चारों ओर धूल-गर्द उड़ाते हैं,  (4)

फिर उसी समय (दुश्मन के) लश्कर में जा घुसते हैं।  (5)

बेशक इंसान अपने रब का शुक्र अदा नहीं करता [Ungrateful] है (जबकि एक घोड़ा भी अपनी जान की परवाह किए बिना आदमी से वफ़ादारी निभाता है) --- (6)

और वह (इस नाशुक्री) पर ख़ुद ही गवाह है-----  (7)

और सच्चाई यह है कि वह [इंसान] धन के मोह में बहुत पक्का है।  (8)

तो क्या उसे पता नहींजब क़ब्रों के भीतर जो कुछ (मरे-पड़े लोग] हैंउन्हें फाड़कर बाहर निकाल दिया जाएगा,  (9)

और जो (राज़) सीनों में छुपे होंगेवह सामने  जाएंगे, (10)

उनका रब उस दिनउन सबके (कर्मों) से अच्छी तरह परिचित होगा।   (11)

 


नोट:

5: यहाँ उन घोड़ों का ज़िक्र जिनपर बैठकर युद्ध लड़ा जाता था,  उनकी क़समें खाने में यह इशारा है कि ये घोड़े अपने मालिकों के इतने वफ़ादार होते थे कि अपनी जान को ख़तरे में डालकर अपने मालिकों का हुक्म भी मानते थेऔर उनकी जान की रक्षा भी। अल्लाह ने इतने मज़बूत जानवर को इंसान के वश में कर दिया हैयहाँ इंसानों को याद दिलाया जा रहा है कि अपने मालिक और पैदा करनेवाले के इस एहसान का शुक्र अदा करने के बजाए वह उसके हुक्म को नहीं मानता और अपने पालनहार का इतना भी वफ़ादार नहीं जितने उसके घोड़े उसके वफ़ादार हैं।

8: धन का मोह ऐसा होता है कि आदमी अच्छाई के कामों से दूर हो जाता हैया गुनाह करने में लग जाता है।

9: क़यामत के दिन सारे लोग क़ब्र फाड़कर बाहर निकल आएंगे (देखें 82:4). 

 

 

 

सूरह 101: अल-क़ारियह  

[तोड़-फोड़कर रख देने वाली धमाकेदार टक्कर / The Crashing Blow]

 

यह एक मक्की सूरह है जिसमें दोबारा ज़िंदा उठाए जाने और कर्मों के अनुसार फ़ैसले के कुछ दृश्य दिखाए गए हैंइसके नतीजे में यह तय होगा कि कौन जन्नत में जाएगा और कौन जहन्नम में।  


विषय:

01-11: नेक और बुरे आदमी का अंजाम


 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

(ज़मीन और आसमान की सारी कायनात को) "तोड़-फोड़कर रख देने वाली धमाकेदार टक्कर!" (1)

वह (हर चीज़ को) तोड़-फोड़कर रख देने वाली धमाकेदार टक्कर (की घटना) क्या है? (2)

और आपको क्या मालूम कि उस "धमाकेदार टक्कर" का मतलब क्या है?  (3)

(इसका मतलब क़यामत का) वह दिन हैजिस दिन (सारे) लोग (हश्र के मैदान में) फतिंगों [moth] की तरह इधर-उधर बिखरे हुए होंगे (4)

और पहाड़ रंग-बिरंग की धुनी हुई ऊन [tufts of wool] की तरह हो जाएँगे,  (5)

तो वह आदमी जिसके (अच्छे कर्मों) के पल्ले भारी होंगे,  (6)

उसका जीवन मनपसंद खुशी में होगा,  (7)

मगर जिस आदमी के (अच्छे कर्मों) के पल्ले हल्के होंगे,  (8)

तो उसका ठिकाना हाविया” [बिना तल का गहरा गड्ढा/ Bottomless Pit] होगा---(9)

और आप क्या समझे कि हावियाक्या है?----  (10)

(जहन्नम की) एक सख़्त दहकती हुई आग (का बहुत ही गहरा गड्ढा) है!  (11)

 

 

 

सूरह 95: अत तीन

 [अंजीर, The Fig] 

 

यह एक मक्की सूरह हैअल्लाह ने इंसानों को इज़्ज़त दी मगर इंसान ने अपने आपको इतना  गिरा लिया कि वह कर्मों के हिसाब- किताब होने से ही इंकार कर बैठा! इस सूरह में सच्चाई पर विश्वास करने [ईमान] और अच्छे  भलाई के काम करने के महत्व पर ज़ोर दिया गया है।

 

विषय: 

 01-08: नाशुक्रे और सच्चाई को मानने से इंकार करने वालों का बदला 


 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 

 अंजीर [Fig] की क़सम और ज़ैतून [Olive] की क़सम, (1)

 

और सीना के (पहाड़, Mount Sinai) तूर की क़सम,  (2)

 

और इस अमन-शांतिवाले शहर [मक्का] की क़सम,   (3)

 

बेशक हम इंसान को बेहतरीन (अनुपात और संतुलित) साँचे में ढालकर पैदा करते हैं  (4)

 

फिर हम उसे नीचे वालों में सबसे गिरी हुई हालत [बुढ़ापे] में पहुँचा देते हैं,  (5)

 

सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए,  और अच्छे कर्म करते रहे ---- तो उनके लिए कभी समाप्त  होने वाला इनाम है‌‌  (6)

 

फिर उसके बाद, [ इंसान!]किस चीज़ ने तुम्हें अंतिम फ़ैसले [इनाम और सज़ा] को मानने से इंकार करने पर मजबूर कर दिया?  (7)

 

क्या अल्लाह (जिसने सबको पैदा किया) सब हाकिमों से सबसे ज़बरदस्त (फ़ैसला करने वाला) हाकिम नहीं है?  (8)

 

 

नोट :

                                  

1: अंजीर और ज़ैतून के पेड़ ज़्यादातर फिलिस्तीन और सीरिया में पाए जाते हैंजिनका संबंध ईसा अलै. से है, जहाँ वह नबी बनाए गये थे और उन्हेंं इंजील दी गयी थी।

2: सीना का पहाड़तूर का संबंध मूसा अलै. से है, जहाँ उनको नबी बनाया गया और उन्हेंं तौरात दी गयी। देखें 52:1

3: अमन वाले शहर यानी "मक्का" (देखें 2:126), जहाँ मुहम्मद (सल्ल.) नबी बनाए गए और उन्हें क़ुरआन दी गयी। 

6: यह इनाम उन्हें दूसरी ज़िंदगी में जन्नत के रूप में दिया जाएगा। 

            

7: या कौन कह सकता था कि [ रसूल]आप अंतिम फ़ैसले के बारे में झूठ बोल रहे हैं?

 

 

 

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