सूरह समूह III
उप समूह “क”:
सूरह 73: अल-मुज़म्मिल
[चादर से लिपटे हुए / Enfolded]
इस सूरह का एक हिस्सा मक्का के शुरुआती ज़माने का है, जबकि एक छोटा हिस्सा मदनी है (आयत 20). यह आयत बताती है कि किस तरह अल्लाह ने पैग़म्बर के लिए शुरू में रात के बड़े हिस्से में नमाज़ पढ़ने का जो पहले हुक्म दिया था, बाद में उसमें थोड़ी आसानी कर दी गई (आयत 1-9), ताकि वह आगे के भारी संदेशों के लिए तैयार हो सकें। पैग़म्बर साहब को धीरज रखने के लिए कहा गया है (10-11),
जहन्नम में मक्का के विश्वास न करने वालों को मिलने वाली भयानक यातना (12-14),
और फिरऔन की ज़िंदगी में मिलने वाली सज़ा को याद दिलाया गया है (15-16).
विषय:
01-08: रात में उठकर क़ुरआन और नमाज़ पढ़्ना
09-14: सच्चाई पर विश्वास न करने वालों को अल्लाह पर छोड़ना
15-19: सच्चाई पर विश्वास करने की अपील और विरोध के नतीजे की चेतावनी
20 : रात में उठकर नमाज़ पढ़ने की अवधि में आसानी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ चादर में लिपटे हुए [रसूल!] (1)
आप उठकर रात भर (नमाज़ में) खड़े रहा करें, मगर थोड़ी रात (आराम भी कर लिया करें), (2)
(नमाज़ के लिए) आधी रात या इससे थोड़ा कम कर लें, (3)
या इस (अवधि) से थोड़ा बढ़ा लें; और क़ुरआन ख़ूब ठहर-ठहरकर (साफ़-साफ़) पढ़ा करें। (4)
[ऐ रसूल!], हम जल्द ही आप पर एक भारी फ़रमान [क़ुरआन] उतारने वाले हैं, (5)
रात में उठकर की गयी इबादत, दिलों पर गहरा असर छोड़ती है, और (शांत माहौल में क़ुरआन के) शब्दों को सही ढंग से पढ़ना (और समझना) आसान होता है ----- (6)
दिन में लम्बे समय तक आप बहुत सारे कामों में व्यस्त रहते हैं ---- (7)
अत: आप अपने रब के नाम को (दिल और ज़बान से) याद करते रहें, और हर एक से अलग होकर पूरी भक्ति से बस उसी के हो रहें। (8)
वह पूरब और पश्चिम का मालिक है, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, सो उसी को (अपना) अभिभावक व रखवाला [protector] बना लें। (9)
जो कुछ वे [काफ़िर लोग] कहते रहते हैं, आप उन (बातों) पर धीरज रखें, और भले तरीक़े से उनका साथ छोड़कर किनारे हो जाएं, (10)
और उन लोगों को आप मुझ पर छोड़ दें, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं और बड़े ऐश-आराम [luxury] में रहते हैं। कुछ और समय तक (उनके साथ नर्मी बरतें) और उन्हें बर्दाश्त कर लें; (11)
हमारे पास उनके लिए भारी बेड़ियाँ हैं, और (जहन्नम की) भड़कती हुई आग है, (12)
गले में अटक जाने वाला खाना है, और उनके लिए बहुत दर्दनाक यातना [अज़ाब] है, (13)
उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे, (14)
[ऐ मक्का वासियो!] बेशक हमने तुम (लोगों) के पास एक रसूल [मुहम्मद] भेजा है जो तुम्हारे मामले में गवाह होगा, जैसाकि हमने फ़िरऔन [Pharaoh] की तरफ एक रसूल [मूसा] को भेजा था, (15)
मगर फ़िरऔन ने हमारे रसूल [मूसा] का कहना मानने से इंकार किया, सो हमने उसको तबाह कर देने वाली चपेट में धर-दबोचा। (16)
अगर तुम भी (हमारी बातों को मानने से) इंकार करते रहे, तो उस दिन (की यातना) से अपने आपको कैसे बचा पाओगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगी, (17)
वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा? अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (18)
यह [क़ुरआन] एक नसीहत [Reminder] है। अब जो कोई चाहे, अपने रब तक पहुंचने का रास्ता अपना ले। (19)
[ऐ रसूल], आपका रब अच्छी तरह जानता है कि आप कभी-कभी दो तिहाई रात के करीब (तह्ज्जुद की नमाज़ में) खड़े होते हैं ----- और (कभी) आधी रात और (कभी) एक तिहाई रात (नमाज़) पढ़ते हैं ---- आपके (पीछे चलने वाले) साथियों में से भी कुछ लोग हैं जो ऐसा ही करते हैं।
अल्लाह ही रात और दिन (के घटने और बढ़ने) का सही अंदाज़ा रखता है। वह जानता है कि तुम कभी उसका ठीक-ठीक हिसाब नहीं रख सकोगे, तो उसने तुम सब पर (कष्ट में कमी करके) मेहरबानी कर दी, सो जितना आसानी से हो सके, क़ुरआन पढ़ लिया करो,
वह जानता है कि तुममें से (कुछ लोग) बीमार होंगे और (कुछ) दूसरे लोग ऐसे होंगे जो अल्लाह के फज़ल [bounty]
की खोज में (काम-काज के लिए) ज़मीन पर इधर-उधर यात्रा कर रहे होंगे, और (कुछ) अन्य लोग अल्लाह की राह में युद्ध कर रहे होंगे: सो जितना आसानी से हो सके उतना (ही) पढ़ लिया करो,
पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, ज़कात [alms]
देते रहो, और अल्लाह को क़र्ज़ दिया करो, अच्छावाला क़र्ज़!,
जो कुछ भलाई व नेकी तुम अपने लिए जमा करते हो, उसके बदले तुम्हें अल्लाह के पास कहीं बेहतर और ज़्यादा इनाम मिलेगा,
और अल्लाह से माफी मांगते रहो, (विश्वास रखो) अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला और बेहद रहम करने वाला है। (20)
नोट:
1: "ऐ चादर में लिपटे हुए", यह प्यार भरा संबोधन मुहम्मद साहब (सल्ल.) के लिए है (74:1)। हिरा नामक गुफा में जब आप पर पहली बार अल्लाह का संदेश उतारा गया, तब आप बुरी तरह घबरा गए और घर पहुंचते ही अपनी बीवी खदीजा (रज़ि.) से कहने लगे कि "मुझे चादर उढ़ा दो, मुझे चादर उढ़ा दो।"
2: इस आयत में रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज़ [तहज्जुद] का आदेश दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह नमाज न केवल मुहम्मद साहब पर बल्कि उनके सभी साथियों पर फ़र्ज़ [ज़रूरी] कर दी गई थी, और इसकी अवधि कम से कम एक तिहाई रात तय की गई थी। शायद यह सिलसिला 1 साल तक चला, बाद में इसी सूरह की आयत 20 उतरी जिसमें रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज की अवधि में आसानी कर दी गई, और अब यह नमाज़ ज़रूरी [फ़र्ज़] नहीं रह गई।
6: रात को उठकर नमाज पढ़ने से अपने मन की इच्छाओं पर क़ाबू पाना आसान हो जाता है।
8: सबसे अलग हो रहने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया के सारे रिश्ते-नाते छोड़ दिए जाएं, बल्कि भक्ति केवल अल्लाह के लिए ही होनी चाहिए।
10: मक्का की ज़िंदगी में हमेशा यही हुक्म दिया गया कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों की तकलीफ़ पहुंचाने वाली बातों पर धीरज से काम लें, और उनसे लड़ाई करने के बजाय ख़ूबसूरती से अलग हो जाएं।
20: यह आयत, बाक़ी आयतों (1--19) से कम से कम एक साल बाद उतरी थी, कुछ विद्वान इस आयत को मदनी मानते हैं, इसके द्वारा रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज़ [तह्ज्जुद] के हुक्म में आसानी पैदा की गई। शुरू में यह नमाज़ रात के एक तिहाई अवधि तक पढ़नी पड़ती थी। उस समय घड़ी न होने के कारण मुहम्मद साहब और उनके कुछ साथी यह नमाज़ कभी आधी रात तक और कभी दो-तिहाई रात की अवधि तक पढ़ते थे। इस आयत के बाद इस नमाज़ को पढ़ना ज़रूरी नहीं रहा, मगर जितनी देर आसानी से हो सके, पढ़ना बहुत अच्छा माना जाता है। वैसे इसका सबसे बेहतर समय रात के पिछले पहर उठकर पढ़ने का है।
"ज़कात" यानी ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को दान करना।
"अच्छावाला क़र्ज़" का मतलब बिना दिखावा किए और केवल अल्लाह की ख़ुशी के लिए देना (2:245; 5:12; 30:39;57:11; 64:17).
सूरह 74: अल-मुदस्सिर
[चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]
मक्का शहर के किनारे पर हिरा नाम की गुफा में पहली बार जब मुहम्मद साहब का सामना फ़रिश्ते जिबरील से हुआ जो अल्लाह का संदेश लेकर उतरे थे, तब वह बुरी तरह घबरा गए थे और भागते हुए अपने घर पहुँचे और उन्होंने अपनी बीवी से उन्हें चादर उढ़ाने के लिए कहा था। इस मक्की सूरह की शुरुआती आयतें तभी उतरी थीं (आयत 1-7).
इस सूरह का बाक़ी हिस्सा थोड़ा बाद का है, जिसमें मुहम्मद साहब को अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। इसमें मक्का के ज़िद्दी व हठधर्म, विश्वास न करने वाले लोगों को फ़ैसले के दिन का अंजाम याद दिलाया गया है (8-10), और पैग़म्बर साहब के एक ख़ास विरोधी को अलग से निशाना बनाया गया है (11-31). सूरह के अंत में क़ुरआन के उतरने के प्रति और क़यामत के प्रति विश्वास न करने वालों का जो रवैया है, उसे मूर्खतापूर्ण बताया गया है (39-53).
विषय:
01-10: उठें और सावधान कर दें
11-26: विरोधियों से अल्लाह निबट लेगा
27-31: जहन्नम के पहरेदार
32-37: एक चेतावनी
38-48: गुनाहगारों का अंजाम
49-56: नसीहत [Reminder] को ठुकरा देना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ (मेरे) चादर ओढ़े हुए (रसूल!), (1)
उठें और (लोगों को अल्लाह की) चेतावनी सुना दें! (2)
और अपने रब की बड़ाई (और महानता) की घोषणा कर दें; (3)
अपने आपको (मन के भीतर की और बाहर की गंदगियों से) साफ़-सुथरा रखें; (4)
और हर तरह (के पापों) की गंदगी से दूर रहें; (5)
किसी को (केवल इस नीयत से) न दें, कि उससे ज़्यादा पाने की चाहत हो; (6)
और आप अपने रब के काम में धीरज [सब्र] से काम लिया करें। (7)
फिर जब (क़यामत की घोषणा के लिए) नरसिंघे [trumpet] में फूंक मारी जाएगी, (8)
सो वह [क़यामत का दिन] बहुत ही परेशानी का दिन होगा। (9)
(सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों के लिए (वह दिन) कोई आसान न होगा। (10)
[ऐ रसूल], आप उस आदमी का मामला मुझ पर छोड़ दें, जिसे मैंने ख़ुद पैदा किया था, (11)
फिर उसे दूर-दूर तक फैली हुई ढेर सारी धन-संपत्ति दी थी, (12)
उसे बेटे दिए थे जो (उसके सामने) हाज़िर रहते थे, (13)
और उसके लिए हर काम के रास्ते आसान बना दिए थे ----- (14)
इसके बावजूद, वह अब भी यह उम्मीद रखता है कि मैं उसे और अधिक दूँगा। (15)
(अब और) नहीं!, वह हमारी (भेजी गयी) आयतों [revelation] का कट्टर विरोधी रहा है: (16)
बहुत जल्द मैं उसे बेहद थका देने वाली (चढ़ाई की) यातना दूंगा, (17)
उसने सोच-विचार किया और एक साज़िश तैयार कर ली ---- (18)
लानत हो उस पर, उसने कैसी शैतानी साज़िश रची! (19)
इस पर लानत हो, उसने (यह) कैसी क्रूरता से भरी साज़िश की! ----- (20)
फिर उसने (आसपास) देखा, (21)
और त्योरी चढ़ाई और मुंह बिचकाया, (22)
फिर (सच्चाई की बातों से) पीठ फेर ली और घमंड में अकड़ गया, (23)
और कहने लगा, “यह [क़ुरआन] कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने से चला आ रहा जादू है, (24)
“बस इंसान की कही हुई बात है” (अल्लाह का कलाम नहीं है)। (25)
में उसे (जहन्नम की) भड़कती आग [सक़र] में झोंक दूंगा। (26)
और आपको किसने बताया है कि "सक़र" [जहन्नम की आग] क्या है? (27)
वह (ऐसी आग है जो) न किसी को बाक़ी बचा रखती है न (तरस खाकर) छोड़ती है; (28)
(वह) आदमी के बदन की खाल को झुलसाकर काला कर देने वाली है; (29)
उस पर उन्नीस पहरेदार नियुक्त हैं। ---- (30)
और हमने जहन्नम की पहरेदारी के लिए किसी और को नहीं, बल्कि फरिश्तों को ही नियुक्त किया है ----- और हमने इनकी संख्या [Number] विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को केवल परखने के लिए निर्धारित की है। अत: जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी हैं, उन्हें इस बात पर विश्वास हो जाएगा, और जो लोग ईमान रखते हैं उनका विश्वास और बढ़ जाएगा: न तो उन्हें जिनको किताब दी गयी है और न ही ईमानवालों को इसकी (सच्चाई में) कोई संदेह होगा, मगर वे जिनके दिलों में रोग है और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, वे लोग यह कहेंगे, "भला इस (ख़ास संख्या के) उदाहरण से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?"
इस तरह, अल्लाह (एक ही बात से) जिसे चाहता है गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है ----- आपके रब के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह (वर्णन) आदमी को सावधान करने के लिए ही है। (31)
हां ---- चाँद की क़सम! (32)
और रात की क़सम जब वह पीठ फेरकर विदा होने लगे! (33)
और सुबह की क़सम जब वह रौशन हो जाए! (34)
बेशक यह (जहन्नम) बहुत बड़ी आफ़तों में से एक है, (35)
इंसानों को सावधान करने वाली, (36)
तुममें से हर उस आदमी के लिए जो (भलाई में) आगे बढ़ना चाहे या जो (बुराई में फंसकर) पीछे रह जाए। (37)
हर आदमी अपने (कर्मों द्वारा) की गयी कमाई के बदले (अल्लाह के पास) गिरवी है, (38)
दाएँ हाथ वालों [Companions of the right] को छोड़कर, (39)
जो बाग़ों [जन्नत] में होंगे और वे पूछते होंगे, (40)
अपराधियों से, (41)
(वे पूछेंगे): ”तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम (की भड़कती आग) में ले गई?” (42)
वे जवाब देंगे, “हम नमाज़ पढ़ने वालों में नहीं थे”; (43)
“और हम ग़रीबों को खाना नहीं खिलाते थे”; (44)
“हम दूसरे लोगों के साथ (मिलकर) मौज-मस्ती करते (और ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाया करते थे)”; (45)
“और हम फ़ैसले के दिन को झूठ बताया करते थे”, (46)
“(और हम यूँ ही रहे) यहाँ तक कि हम पर वह (मौत) आ पहुँची जिसका आना निश्चित था”, (47)
सो (उस समय) सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (48)
तो उन (काफ़िरों) को क्या हो गया है? क्यों वे इस चेतावनी से बिदककर मुँह मोड़ लेते हैं, (49)
मानो वे घबराए हुए (जंगली) गधे हों, (50)
जो शेर से (डरकर) भाग खड़े हुए हों? (51)
उनमें से हर एक आदमी यह चाहता है कि उस पर सीधे (आसमानी) किताब उतार दी जाए जो उसकी आँख के सामने खोली जाए ---- (52)
नहीं! बल्कि (सच यह है कि) वे (आने वाली) परलोक (की ज़िंदगी) से डरते ही नहीं। (53)
मगर सचमुच यह [क़ुरआन] एक नसीहत [Reminder] है। (54)
अब जिसका जी चाहे, इस (नसीहत) पर ध्यान दे और याद रखे: (55)
वे लोग तभी इसे याद रखने पर ध्यान देंगे, अगर अल्लाह ऐसा चाहे। सचमुच वही इस योग्य है कि उसकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाए, और वही है जो माफ़ी देने वाला है। (56)
नोट:
1: ह्दीसों से साबित है कि सबसे पहले मुहम्मद (सल्ल.) पर सूरह अलक़ (96: 1--5) की पहली 5 आयतें उतरी थीं। उसके बाद कुछ अवधि तक "वही" [Revelation] उतरने का सिलसिला बंद रहा, फिर यह सूरह उतरी।
7: जब मुहम्मद (सल्ल.) को लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाने का आदेश हुआ, तो इस बात की आशंका थी कि विश्वास न करनेवाले आपको सताएंगे। इसलिए बिना लड़ाई-झगड़ा किए हुए धीरज से काम लेने की सलाह दी गई है। उनके अत्याचारों की असल सज़ा उन्हें क़यामत में दी जाएगी।
11: बताया जाता है कि यह 'वलीद बिन मुग़ीरा' के बारे में आया है जो मक्का का बड़ा धनी सरदार था जिसकी सम्पत्ति मक्का से तायफ़ शहर तक फैली हुई थी। उसने एक बार क़ुरआन सुनी और उसके कलाम से इतना प्रभावित हुआ कि बोल उठा कि यह किसी इंसान का नहीं हो सकता। मक्का के सरदार और मुहम्मद साहब के प्र्मुख विरोधी अबु जहल को यह जानकर डर हुआ कि कहीं वलीद भी मुसलमान न हो जाए। उसने वलीद को ताव दिलाया कि जब तक तुम क़ुरआन के विरोध में नहीं बोलोगे, तब तक लोग तुम्हें धन का लालची समझेंगे। वलीद कहने लगा कि मैं क़ुरआन को न तो शायरी कह सकता हूँ, न ही काहिनों का कलाम कह सकता हूँ और न ही मुहम्मद को दीवाना कह सकता हूँ, क्योंकि यह बातें चल नहीं पाएंगी। फिर कुछ सोचते हुए कहने लगा कि उस कलाम को "जादू" कह सकते हैं, क्योंकि जिस तरह जादूगर मियाँ-बीवी के बीच झगड़े लगा देता है, उसी तरह यह कलाम घरों में माँ-बाप के बीच, बाप-बेटे के बीच, भाई-भाई के बीच मतभेद पैदा कर देता है।
18: मतलब यह है कि क़ुरआन के बारे में सोच समझकर एक बात बनाई गई कि यह एक जादू है।
31: जब यह आयत उतरी कि जहन्नम की पहरेदारी के लिए 19 फ़रिश्ते नियुक्त हैं, तो मक्का के काफ़िरों ने इसका मज़ाक़ उड़ाना शुरू किया, और एक ने यहाँ तक कहा कि "19 में से 17 के लिए तो मैं ही काफ़ी हूँ, बाक़ी 2 से तुम निपट लेना।" मगर यहाँ एक ख़ास संख्या बताने का मक़सद भी लोगों को आज़माना था कि क्या वे उसे सही समझते हुए मान लेते हैं या उसका मज़ाक़ बनाते हैं।
36: जहन्नम जैसी बड़ी आफ़त का ज़िक्र लोगों को होश में लाने के लिए है, जो मरने के बाद की ज़िंदगी को भुलाए बैठे थे। यह बताने के लिए पहले चाँद की क़सम खाई गई है कि जिस तरह चाँद पहले हर दिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है, फिर रोज़ थोड़ा-थोड़ा घटते-घटते महीने के अंत में ग़ायब हो जाता है, इसी तरह इंसान की ताक़त पहले बढ़ती है, फिर बुढ़ापे में घटनी शुरू हो जाती है, यहाँ तक कि इंसान एक दिन मर जाता है, और दुनिया की हर चीज़ का यही हाल है। फिर अल्लाह ने उस समय की क़सम खाई है जब रात ढलने लगती है, और सुबह का उजाला हो जाता है, यह शायद इस तरफ़ इशारा है कि अभी सच्चाई से इंकार करनेवालों के सामने बेफ़िक्री का अंधेरा छाया हुआ है, फिर एक समय आएगा जब यह अंधेरा दूर होगा और सच्चाई सबके सामने ज़ाहिर होकर माहौल को रौशन कर देगी।
38: जिस तरह क़र्ज़ की गारंटी के तौर पर कोई चीज़ गिरवी रखी जाती है कि अगर क़र्ज़ चुकता नहीं हुआ तो उस गिरवी रखे हुए सामान को बेचकर असल क़ीमत वसूल की जा सकती है, उसी तरह सच्चाई से इंकार करनेवाला भी गिरवी रखा होता है कि या तो वह सही रास्ता अपना ले, नहीं तो उसका पूरा अस्तित्व जहन्नम [नरक] का ईंधन बनेगा।
52: यहाँ उन काफ़िरों का बयान है जो यह कहते थे कि क़ुरआन मुहम्मद (सल्ल.) पर ही क्यों उतारी गई, अगर अल्लाह को मार्गदर्शन के लिए कोई किताब उतारनी थी, तो हममें से हर आदमी पर अलग किताब आनी चाहिए थी!
53: इसमें साफ़ बता दिया गया कि किताब तो केवल पैग़म्बर पर ही उतारी जाती है ताकि वह किताब का सही मतलब लोगों को बता सके, और उसमें बतायी गई बातों पर अमल करने का तरीक़ा भी बता सके।
सूरह 80: अबसा
[उनकी भौहें तन गयीं/ He Frowned]
यह एक मक्की सूरह है। एक बार मुहम्मद सल्ल. विश्वास न करने वालों के सरदारों से इस मक़सद से बातचीत कर रहे थे कि शायद वे लोग सच्चाई पर विश्वास कर लें, उसी समय एक मुसलमान आदमी जो कि अंधा था, वहाँ कुछ सीखने की चाहत में आ गया। पैग़म्बर साहब उन सरदारों से बातचीत में ऐसे मगन थे कि उस अंधे आदमी का बीच में बार-बार टोकना उन्हें पसंद नहीं आया और उन्होंने अपनी त्योरी चढ़ा ली। यह चीज़ अल्लाह को नापसंद हुई कि विश्वास न करने वाले लोगों के पीछे इतना समय लगाना और एक मुसलमान जो सीखने का इरादा रखता हो, उसे नज़रअंदाज़ करना सही नहीं है। आगे अल्लाह का शुक्र अदा न करने पर इंसानों की निंदा की गई है: आदमी अपने आपको आत्म-निर्भर समझने लगता है और वह भूल जाता है कि कैसे वह इस दुनिया में आया था और मरने के बाद एक दिन उसे अल्लाह के सामने जाना है।
विषय:
01-10: रसूल को उनके बर्ताव पर चेताना
11-16: लिखी हुई किताब की शक्ति
17-32: लोग एहसान नहीं मानते
33-42: अंतिम दिन
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
(रसूल सल. नाराज़ हुए तो) उनकी भौहें तन गयीं, और (उन्होंने) मुँह फेर लिया (1)
जब उनके पास एक अंधा (आदमी) आया (जिसने दूसरों के साथ चल रही चर्चा के बीच में आपको टोक दिया) ---- (2)
और आपको [ऐ रसूल] क्या मालूम, कि शायद (आपके ध्यान देने से) उसकी सोच में और निखार आ जाता, (3)
या वह (आपकी) नसीहत की बातों पर विचार करता जो उसके लिए लाभकारी होती। (4)
वह जो अपने आपसे संतुष्ट आदमी है (जिसे लगता है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं!), (5)
उसे (रास्ते पर लाने के लिए) तो आप उसके पीछे पड़े रहते हैं------- (6)
हालाँकि अगर उसकी सोच में अच्छाई की भावना की कमी रहती है, तो इसके लिए [ऐ रसूल], आप दोषी नहीं होंगे ------ (7)
मगर वह जो आपके पास (स्वयं अच्छाई की तलाश में) पूरी लगन से आया, (8)
और (अपने रब से) डरा हुआ (आया), (9)
तो आपने उस पर ध्यान नहीं दिया। (10)
(ऐ रसूल! जो सीखना न चाहे उसके पीछे पड़ने की ज़रूरत नहीं), हरगिज़ नहीं! बेशक यह (क़ुरआनी आयतें) तो नसीहत हैं, (11)
जिसे उन लोगों को सीखना चाहिए, जो सचमुच यह चाहते हैं कि उन्हें सिखाया जाए, (12)
(यह) प्रतिष्ठित और बहुत बाइज़्ज़त पन्नों में (लिखी हुई) है, (13)
जिनका स्थान बहुत बुलंद है (और ये) बेहद पवित्र हैं, (14)
ऐसे लिखने वालों के हाथों से (आगे पहुंची) हैं, (15)
जो बड़े इज़्ज़तदार बुज़ुर्ग (और) नेकी करनेवाले (फ़रिश्ते) हैं। (16)
नष्ट हो जायें (वे सभी इंकार करने वाले)! इंसान कैसा एहसान-फ़रामोश है! (जो इतनी महान नेमत पाकर भी उसका मान नहीं रखता) (17)
(वह ज़रा सोचे कि) अल्लाह उसे किस चीज़ से पैदा करता है?, (18)
छोटी सी बूँद (वीर्य, sperm droplet) से पैदा किया, फिर साथ ही उसकी बनावट को ठीक-ठीक अनुपात में (जींस/genes और लिंग के अनुसार) निर्धारित कर दिया, (19)
फिर (ज़िंदगी जीने और अल्लाह तक पहुँचने का) रास्ता उसके लिए आसान कर दिया। (20)
फिर उसे मौत दी, फिर उसे क़ब्र में (दफ़न) कर दिया, (21)
फिर जब वह चाहेगा उसे (दोबारा ज़िंदा करके) उठा खड़ा करेगा। (22)
सचमुच इस (नाफ़रमान आदमी) ने अपना वह (कर्तव्य) पूरा नहीं किया जिसका उसे (अल्लाह ने) आदेश दिया था। (23)
आदमी जो कुछ खाता है, उस पर ही विचार कर ले! (24)
हम काफ़ी मात्रा में पानी बरसाते हैं (25)
और फिर हम ज़मीन को चीर डालते हैं। (26)
फिर हम इसमें अनाज उगाते हैं, (27)
और अंगूर और तरकारी, (28)
और ज़ैतून और खजूर, (29)
और घने-घने बाग़, (30)
और (तरह-तरह के) फल-मेवे और (जानवरों का) चारा: (31)
ये सारी चीज़ें तुम और तुम्हारे पालतू जानवरों के लिए ज़िंदगी के मज़े लेने के हैं। (32)
फिर जब कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ [क़यामत] आ जाएगी ---- (33)
उस दिन आदमी भाग खड़ा होगा अपने भाई से, (34)
अपनी माँ और अपने बाप से, (35)
अपनी पत्नी और अपने बच्चों से (भी): (36)
उस दिन हर एक को अपनी-अपनी ही पड़ी होगी: (37)
उस दिन कई चेहरे (ऐसे भी होंगे जो नूर से) चमक रहे होंगे, (38)
(वह) मुस्कुराते, हँसते (और) खुशियाँ मनाते होंगे, (39)
मगर कई चेहरे ऐसे होंगे जिन पर उस दिन धूल पड़ी होगी, (40)
(और) उन (चेहरों) पर कालिख छायी होगी: (41)
यही लोग काफ़िर [सच्चाई का इंकार करने वाले], मनमानी करने वाले (और) दुराचारी होंगे। (42)
नोट:
1: यह आयत एक ख़ास घटना के बारे में उतरी थी। हुआ यह कि एक दिन मुहम्मद साहब (सल्ल) क़ुरैश कबीले के कुछ बड़े सरदारों को अल्लाह का संदेश पहुँचाने के लिए उनके साथ बातें कर रहे थे कि इतने में आपके पास एक साहब आ गए जो आँख से देख नहीं सकते थे, उन्होंने आते ही मुहम्मद साहब से कुछ सिखाने का अनुरोध शुरू कर दिया जो आपको पसंद नहीं आया क्योंकि दूसरों के साथ चल रही बातचीत में उन्होंने व्यवधान डाला था। मुहम्मद साहब की भौवें तन गयीं और आपने उनकी बात का जवाब नहीं दिया और मक्का के सरदारों के साथ अपनी बातचीत जारी रखी। जब वे लोग चले गए तो यह सूरह उतरी जिसमें अल्लाह ने मुहम्मद साहब के इस बर्ताव को नापसंद किया जो उन्होंने एक अंधे आदमी के साथ किया था, जबकि वह आपके पास सच्चाई की तलाश में कुछ सीखने के लिए आया था। दूसरी तरफ़ आप जिन मक्का के सरदारों से बातचीत करके उन्हें समझाना चाहते थे, उनमें सच्चाई को पहचानने और मानने की कोई तलब नहीं थी।
13: यानी यह पन्ने "सुरक्षित पट्टिका " [लौह ए महफ़ूज़/ Preserved Tablet"] में लिखी हुई है, जो क़ुरआन समेत सभी आसमानी किताबों का स्रोत है। या इसका मतलब ख़ुद क़ुरआन हो सकता है जो कि पन्नों [leaves/ sheet,सुहुफ़] में जमा की जा रही थी। 'सुहुफ़' शब्द कई बार इबराहीम और मूसा (अलै) पर उतरी किताबों के बारे में आया है (53:36-37; 87:18-19; 20:133), और साथ में यह आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा के लिए भी आया है (74:52; 81:10).
सूरह 79: अन-नाज़ियात
[वे (फ़रिश्ते) जो हवा में तैरते हुए जाते हैं / Those Who Fly Out]
यह एक मक्की सूरह है जिसका मुख्य विषय क़यामत के आने की संभावना और उसकी निश्चितता, उससे पैदा होने वाले नतीजे, और उसके आने के समय के बारे में है। मूसा अलै. और फिरऔन की बर्बादी की कहानी सुनाने का मक़सद पैग़म्बर साहब का उत्साह बढ़ाना और विश्वास न करने वालों को सावधान करना है।
विषय:
01-14: दोबारा उठाए जाने का दिन
15-26: मूसा (अलै) का कहानी
27-33: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
34-41: सज़ा और इनाम
42-46: क़यामत घड़ी कब आएगी?
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
उन (फ़रिश्तों) की क़सम, जो (काफ़िरों की आत्मा) सख़्ती से खींच लेते हैं, (1)
और उन (फ़रिशतों) की क़सम, जो (ईमानवालों की रूह) आसानी से निकाल ले जाते हैं, (2)
जो (ज़मीन और आसमान के बीच) तेज़ी से तैरते हुए जाते हैं, (3)
और जो (आदेश को पूरा करने के लिए) दौड़ते हुए (दूसरों से) आगे बढ़ जाते हैं, (4)
ताकि उन कामों को पूरा कर दें, (जो उन्हें सौंपा जाता है), (5)
उस दिन जब (अचानक एक ज़ोरदार धमाके के साथ) भूँचाल आ जाएगा, (6)
उसके बाद एक और ज़ोर का झटका आएगा (और क़यामत आ जाएगी), (7)
लोगों के दिल (मारे डर और घबराहट के) बुरी तरह धड़क रहे होंगे (8)
और उनकी आँखें झुकी होंगी। (9)
(मक्का के विश्वास न करने वाले लोग) कहते हैं: “क्या? हमें (पहले की तरह) फिर से ज़िंदगी दी जाएगी, (10)
जबकि हम सड़ी-गली हड्डियों में बदल चुके होंगे?" (11)
और वे कहते हैं, “(पुरानी हालत में लौटना मुमकिन नहीं!) अगर ऐसा हुआ, तो यह बड़े घाटे की वापसी होगी।" (12)
मगर (यह कोई मुश्किल नहीं), बस एक ही धमाका काफ़ी होगा, (13)
और वे सब खुले मैदान में (अपनी पुरानी हालत में) लौटकर इकट्ठा हो जाएंगे। (14)
(ऐ रसूल!) क्या आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी है? (15)
जब उनके रब ने (सीना/Sinai के रेगिस्तान में) तुवा [Tuwa] की पवित्र घाटी में उन्हें पुकारा था: (16)
(और आदेश दिया था कि) फ़िरऔन [Pharaoh] के पास जाओ कि उसने लोगों पर ज़ुल्म व अत्याचार करने की हर सीमा पार कर दी है, (17)
और (उससे) पूछो, “क्या तू चाहता है कि तू (गुनाहों से) पाक-साफ़ हो जाए? (18)
और क्या तू चाहता है कि मैं तेरे रब की तरफ तेरा मार्गदर्शन करूँ, ताकि तू (उसके सामने झुके और उससे) डरने लगे?” (19)
फिर मूसा ने उसे बड़ी ज़बरदस्त निशानी दिखाई (जब लाठी साँप में बदल गयी और उनका हाथ चमकने लगा), (20)
मगर फ़िरऔन ने इन (निशानियों) को ठुकरा दिया, और विश्वास करने से इंकार कर दिया। (21)
उसने (सच्ची बातों से) मुँह मोड़ लिया और जल्दी जल्दी (मूसा के विरोध में), (22)
उसने (लोगों को) जमा किया और पुकारकर कहने लगा, (23)
“मैं तुम्हारा सबसे बड़ा स्वामी हूँ,” (24)
नतीजा यह हुआ कि अल्लाह ने उसे दोहरी सज़ा में पकड़ लिया, आने वाली ज़िन्दगी में भी और इस ज़िंदगी में भी: (25)
सचमुच इस (घटना) में हर उस आदमी के लिए बड़ी शिक्षा है जो अल्लाह का डर रखता हो। (26)
किसे पैदा करना ज़्यादा कठिन काम है: तुम लोगों को या पूरे आसमान [ब्रह्मांड] को, जिसे उसने बनाया, (27)
उसने आकाश के सभी पिंडों को (पैदा करके) बुलंद किया, फिर (उनकी संरचना और चक्कर लगाने की गतियों में संतुलन पैदा करके) उन्हें ठीक-ठाक किया, (28)
फिर रात को अंधेरी बनाया और सुबह को चमकदार उजाले के साथ निकाला, (29)
उसी ने ज़मीन को भी (रहने लायक़ बनाने के लिए) बिछा दिया, (30)
ज़मीन (के अंदर) से उसका पानी और चारा [pastures] निकाला, (31)
और ज़मीन में ठोस पहाड़ों को जमा दिया, (32)
(ये सब कुछ) तुम्हारे और तुम्हारे चौपायों के फ़ायदे के लिए किया। (33)
फिर जब हर चीज़ पर छा जाने वाली आफ़त [क़यामत] आ जाएगी, (34)
उस दिन आदमी अपना सब किया-धरा याद करेगा, (35)
और हर देखने वाले के लिए जहन्नम ज़ाहिर कर दी जाएगी। (36)
फिर जिस आदमी ने सारी सीमाएं तोड़ी [सरकशी की] होंगी (37)
और इसी संसार की ज़िंदगी को (आख़िरत/परलोक के मुक़ाबले) ज़्यादा पसंद किया होगा, (38)
तो जहन्नम ही (उसका) ठिकाना होगा; (39)
और जो आदमी अपने रब के सामने खड़े होने से डरता रहा, और उसने (अपने) मन को (बुरी) इच्छाओं से रोके रखा, (40)
तो जन्नत ही (उसका) ठिकाना होगा। (41)
विश्वास न करने वाले लोग) आप [पैग़म्बर] से क़यामत के बारे में पूछते हैं कि, “वह घड़ी कब आएगी?”, (42)
मगर आप उन्हें यह कैसे बता सकते हैं? (43)
उस (क़यामत) के आने का ठीक समय तो केवल आपके रब को ही मालूम है; (44)
आप तो केवल इसलिए भेजे गए हैं ताकि आप उन लोगों को सावधान कर दें, जो इस (क़यामत) से डरते हों। (45)
जिस दिन वे उसको देख लेंगे, तो उन्हें ऐसा लगेगा मानो वे (दुनिया में) एक शाम या उसकी सुबह से अधिक ठहरे ही नहीं थे। (46)
नोट:
1: अरबी भाषा में किसी बात में ज़ोर पैदा करने के लिए क़सम खायी जाती थी। यहाँ शायद फ़रिश्तों की क़सम खाई गई है जिसका मतलब यह है कि वे इस बात के गवाह हैं कि जिस तरह अल्लाह फ़रिश्तों के द्वारा इंसानों की आत्माओं को निकाल लेता है, उसी तरह फ़रिश्तों से नरसिंघा बजवाकर इंसानों को दोबारा ज़िंदा भी कर सकता है।
6: यह पहली बार नरसिंघे [सूर] को फूँक मारकर बजाने के बारे में है, इससे हर जीव को मौत आ जाएगी, और सारा संसार उलट-पलट जाएगा।
12: यानी अगर हमें सचमुच दोबारा ज़िंदा किया गया तो यह हमारे लिए तो घाटे का सौदा होगा, क्योंकि इस दूसरी ज़िंदगी के लिए हमने कोई तैयारी नहीं कर रखी है।
16: "तूर" पहाड़ के नीचे जो घाटी है, उसका नाम "तुवा" आया है (देखें 20:12), जहाँ पहली बार हज़रत मूसा (अलै.) को पैग़म्बर बनाया गया, इसका विवरण विस्तार से सूरह ताहा (20: 9-36) में देखें।
20: देखें सूरह ताहा (20: 17-22)
25: इस ज़िंदगी की यातना तो यह हुई कि उसे और उसके पूरे लश्कर को अल्लाह ने डुबो दिया, देखें सूरह शुअरा (26: 16--64) और आनेवाली ज़िंदगी की यातना जहन्नम होगी।
27: अरब के काफ़िर लोग मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किए जाने की बात पर विश्वास नहीं करते थे, क्योंकि उन्हें यह असंभव काम लगता था। अल्लाह पूछता है कि ब्रह्मांड की दूसरी चीज़ों जैसे ज़मीन और आसमान को पैदा करना ज़्यादा मुश्किल है या मरे हुए इंसान को दोबारा ज़िंदा करना? (इसे भी देखें 37:11; 40:57)
32: "पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया".... ज़मीन असल मेंं समंदर की सतह पर तैरती है, और उसे हिलने-डुलने से रोकने के लिए अल्लाह ने ज़मीन पर पहाड़ों को मज़बूती से गाड़ दिया (देखें 16:15; 21:31; 31:10)
उप समूह “ख”:
सूरह 75: अल-क़ियामह
[क़यामत/ The Resurrection]
यह एक मक्की सूरह है, जिसमें क़यामत के दिन के बारे में वर्णन है, और आदमी द्वारा उस दिन का इंकार करने के बारे में भी चर्चा की गई है। अल्लाह की ताक़त को बड़े प्रभावशाली तर्कों द्वारा छोटे-छोटे पैराग्राफ में बयान किया गया है (3-4, 26-30, 34-40), तीसरे पैराग्राफ़ (आयत 16-19) में मुहम्मद साहब को यह आदेश दिया गया है कि क़ुरआन जब उतर रहा हो तो उसे याद करने के लिए वह जल्दी-जल्दी दुहराने के बजाय पहले शांति से सुना करें। और इस तरह, इस बात पर ज़ोर डाला गया है कि क़ुरआन सचमुच अल्लाह के शब्द हैं।
विषय:
01-15: क़यामत के दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाएगा
16-19: क़ुरआन को पढ़ने का तरीक़ा
20-30: क़यामत का आना तय है
31-40: एक विश्वास न करने वाले की कड़ी निंदा
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
मैं क़सम खाता हूँ क़यामत के दिन की (1)
और मैँ कसम खाता हूँ (बुराइयों पर) कचोटने वाली आत्मा की! (2)
क्या इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियों को (जो मरने के बाद चूर-चूर होकर बिखर जाएगी) कभी फिर से इकट्ठा नहीं करेंगे? (3)
क्यों नहीं! हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि उसकी उंगलियों के पोर-पोर [fingertips] तक को (दोबारा) ठीक (वैसा ही) कर दें। (4)
इसके बावजूद, आदमी उस (जीवन) से इंकार करना चाहता है, जो उसके आगे (आख़िरत/ Hereafter में) आने वाला है: (5)
वह (व्यंग्य से) पूछता है, “तो वह क़यामत का दिन कब होगा?” (6)
जब आँखें चौंधिया जाएंगी (7)
और चाँद (अपनी) रौशनी खो देगा, (8)
जब सूरज और चाँद इकट्ठे कर दिए जाएंगे, (9)
उस दिन आदमी पुकार उठेगा, “भागकर जाएं तो कहाँ जाएं?” (10)
नहीं! सचमुच, छिपने की कोई जगह नहीं होगी: (11)
उस दिन तुम्हारे रब के पास ही ठिकाना होगा जहाँ लौटकर सबको जाना होगा। (12)
उस दिन आदमी को बता दिया जाएगा, जो कुछ (दुनिया में कर्म करके) उसने आगे भेजा था और जो कुछ (कर्मों का असर मरने के बाद) उसने पीछे छोड़ा था। (13)
बल्कि, सच तो यह है कि आदमी (अपने किए गए अच्छे-बुरे कर्मों पर) ख़ुद ही गवाह है, (14)
चाहे वह अपनी ओर से कितने ही बहाने पेश करे। (15)
[ए रसूल!] आप (कुरआन की) आयतों को याद करने की हड़बड़ी में, अपनी ज़बान को जल्दी-जल्दी न चलाया करें: (16)
बेशक उसे (आपको) याद कराना और (आपकी ज़बान से) पढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है। (17)
तो जब हम उस आयत को (जिबरील की ज़बानी) पढ़कर सुना दें, तब आप भी उसे (उसी तरह) पढ़कर दोहरा लिया करें (18)
और फिर इन (आयतों) के मतलब समझाना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है। (19)
सचमुच, तुम लोग बहुत थोड़े समय चलने वाली दुनिया (की ज़िंदगी) से बहुत लगाव रखते हो (20)
और तुम इसके बाद आने वाली दुनिया [आख़िरत/ Hereafter] को भुलाए बैठे हो। (21)
(एक तरफ़) बहुत से चेहरे उस दिन खिले हुए और चमकते हुए होंगे, (22)
और अपने रब (की नेमतों) को देख रहे होंगे, (23)
और कितने ही चेहरे उस दिन बिगड़ी हुई हालत में (उदास और काले पड़ गये) होंगे। (24)
वे समझ जाएंगे कि उनके ऊपर भारी मुसीबतों का पहाड़ टूटने ही वाला है। (25)
सचमुच, जब जान [soul] (निकलती हुई) गले तक आ पहुँचेगी; (26)
जब यह कहा जाएगा, "कि है कोई जो झाड़-फूंक करके जान बचा सके?"; (27)
जब वह समझ जाए कि (अब सबसे) जुदाई का समय आ गया है; (28)
जब उसके पैरों को एक साथ (कफ़न लपेटने के लिए) लाया जाएगा: (29)
उस दिन उसे अपने रब की तरफ़ हँकाकर ले जाया जाएगा। (30)
उसने न (अल्लाह और रसूल की बातों पर) विश्वास किया और न नमाज़ पढ़ी, (31)
बल्कि उसने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया और (ईमान से) मुँह मोड़ लिया, (32)
फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की तरफ़ शान से चल दिया। (33)
तुम से (क़यामत की घड़ी) नज़दीक से और नज़दीक आती जा रही है। (34)
तुम से और नज़दीक, और ज़्यादा नज़दीक! (35)
क्या इंसान यह समझता है कि उसे यूँ ही (बिना हिसाब-किताब लिए) छोड़ दिया जाएगा? (36)
क्या वह (अपने जीवनकाल के शुरू में) वीर्य [sperm] की एक टपकी हुई बूँद मात्र न था, (37)
जो कि (कोख में) जोंक की तरह चिपका हुआ एक लोथड़ा बन गया, फिर अल्लाह ने उसे (इंसानी) शक्ल-सूरत दे दी, फिर सभी अंगों को (सही अनुपात में) ठीक-ठाक किया, (38)
फिर उसी से दो तरह के लिंग [Gender] बनाए: मर्द और औरत? (39)
तो क्या वह [अल्लाह] जो यह सब कर सकता है, उसे इस बात की ताक़त नहीं कि मुर्दों को फिर से ज़िंदा कर दे? (40)
नोट:
1: अल्लाह ने क़ुरआन में कई चीज़ों की क़समें खाई हैं.... (देखें 56:75; 69:38-39; 81:15-18; 84:16-18; 90:1, 3)
2: "कचोटने वाली आत्मा" से मतलब इंसान का वह ज़मीर है जो उसे गलत कामों पर कचोटता है। अल्लाह ने हर इंसान के अस्तित्व के अंदर यह एहसास [ज़मीर] रखा है। इंसान को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आख़िर इस ज़मीर को क्यों रखा गया है? अगर आने वाली आख़िरत [परलोक] की जिंदगी न होती, जहाँ इंसान को उसके अच्छे बुरे कर्मों का बदला मिलने वाला है, तो भला, बुराई से रोकने के लिए इस ज़मीर की क्या आवश्यकता थी!
4: अंगुलियों के पोरों का ख़ास करके ज़िक्र इसलिए किया गया है कि इन पोरों मेंं जो महीन-महीन लकीरें होती हैं, वह हर इंसान की दूसरे से अलग होती हैं, यहाँ तक कि करोड़ों लोगों की अंगुलियों की लकीरें भी एक दूसरे से नहीं मिलती। इनकी लकीरों के अंतर को याद रखकर दोबारा वैसी ही लकीरें बना देना अल्लाह के सिवा किसी से संभव नहीं है।
13: यानी कौन से काम वह दुनिया में कर आया है जो उसके कर्मों के लेखा-जोखा में दर्ज हो चुके हैं और कौन से काम वह छोड़ आया है जो उसे करने चाहिए थे लेकिन उसने नहीं किए।
14: आदमी ख़ुद अपने किए गए अच्छे-बुरे कर्मों की गवाही देगा ..... इस बात को समझने के लिए देखें 24:24; 36:65; 41:20.
29: या (मरने के क़रीब) जब एक पैर दूसरे से मिल जाएगा....
34: इसका एक अनुवाद यह भी हो सकता है "तबाही है तुम्हारे लिए (मरते समय), फिर तबाही है (मरने के बाद की हालत में)।
35: या यह भी अनुवाद हो सकता है, " फिर तबाही है तुम्हारे लिए (क़यामत के दिन), फिर तबाही है तुम्हारे लिए (जहन्नम की)।
36: इंसान बनने के सभी चरणों का वर्णन सूरह मोमिनून (23:14) में भी आया है।
सूरह 70: अल-मआरिज
[आसमान पर चढ़नेवाले रास्ते, The Ways of Ascent]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें फ़ैसले के दिन [क़यामत] का वर्णन किया गया है (आयत 8-18). पैग़म्बर साहब के एक विरोधी ने उन्हें सज़ाओं को जल्दी ले आने की चुनौती दी जिनसे उन्हें डराया जाता था (आयत 1), अत: यहाँ विश्वास न करने वालों द्वारा क़यामत के आने से इंकार करने की बेवक़ूफ़ी (आयत 6) को और ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाने को उजागर किया गया है (आयत 36-44). उन लोगों का भी वर्णन किया गया है जिन्हें जन्नत मिलेगी (22-35). वह रास्ता जिससे होकर फ़रिश्ते ऊपर चढ़कर अल्लाह के पास जाते हैं, उसका ज़िक्र आयत 3-4 में आया है और इसी पर इस सूरह का नाम रखा गया है।
विषय:
01-18: क़यामत जल्द ही आने वाली है
19-35
: नेक व अच्छे लोगों की ख़ासियत
36-44
: रसूल का मज़ाक़ उड़ाने वालों को नज़रअंदाज़ करना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
एक आदमी ने (मज़ाक़ उड़ाते हुए) सज़ा दिए जाने की मांग की थी। (1)
यह विश्वास न करने वालों पर आ पड़ेगी ----- कोई नहीं है जो इसे टाल सके ---- (2)
(वह यातना) अल्लाह की तरफ़ से आएगी जो चढ़ने वाले तमाम आसमानी रास्तों का मालिक है, (3)
(जिससे होकर) फरिश्ते और रूह [जिबरील], उस (अल्लाह) तक एक दिन में चढ़कर जाते हैं, जिस दिन की लम्बाई (इस दुनिया के हिसाब से) पचास हज़ार साल की है। (4)
तो (ऐ रसूल!), आप धीरज से काम लें, जो आपके लिए बहुत अच्छा होगा। (5)
विश्वास न करने वाले (तो) उस (क़यामत के दिन) को दूर समझते हैं, (6)
मगर हम जानते हैं कि वह (दिन) नज़दीक ही है। (7)
(वह यातना उस दिन आएगी) जिस दिन आसमान पिघले हुए ताम्बे (या तेल की तलछट) की तरह हो जाएगा, (8)
और पहाड़ (धुनी हुई) रंगीन ऊन की तरह हो जाएंगे, (9)
जब कोई दोस्त अपने किसी दोस्त तक को पूछेगा भी नहीं, (10)
यहाँ तक कि वह एक दूसरे की नज़र के सामने दिखायी भी दे जाएंगे। अपराधी आदमी यह इच्छा करेगा कि उस दिन की यातना (से रिहाई) के बदले में अपने बेटे को क़ुर्बान कर दे, (11)
अपनी पत्नी, अपने भाई (दे डाले), (12)
अपना (पूरा) ख़ानदान (भी दे दे) जो उसे शरण देता था, (13)
और जितने लोग भी ज़मीन में रहते हैं, इन सबको (बदले में देकर) अपने आपको (यातना से) बचा ले। (14)
लेकिन नहीं! वह (जहन्नम) तो एक भड़कती हुई आग है, (15)
(सिर और बदन के) सभी अंगों की खाल उतार देने वाली है, (16)
वह हर उस आदमी को बुला लेगी जिसने (सच्चाई से) पीठ फेरी और मुँह मोड़ा होगा, (17)
और (जिसने) धन-दौलत इकट्ठा की, फिर उसे जमा कर-करके रखा [लोगों को बाँटा नहीं]। (18)
सचमुच इंसान बड़ा अधीर (और लालची) पैदा हुआ है: (19)
जब उसे कोई मुसीबत (या हानि) पहुंचती है, तो बहुत घबरा जाता है। (20)
और जब उसके पास भलाई (या ख़ुशहाली) आती है, तो कंजूसी करने लगता है। (21)
मगर नमाज़ अदा करने वाले (लोगों की बात अलग है), (22)
जो अपनी नमाज़ की हमेशा पाबंदी करते हैं; (23)
जो अपने धन में से उचित हिस्सा देते हैंं (24)
मांगने वाले और ज़रूरतमंदों को; (25)
जो फ़ैसले के दिन पर विश्वास रखते हैं, (26)
और जो अपने रब की यातना से डरे-सहमे रहते हैं ---- (27)
इस (यातना) से कोई भी अपने आपको पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता ----- (28)
जो लोग अपनी इज़्ज़त [chastity] (सभी से) बचाकर रखते हैं, (29)
अपनी पत्नियों या अपने अधिकार में आयी हुई दासियों [लौंडियों] को छोड़कर ---- क्योंकि इस (तरह के रिश्तों) में उन लोगों पर कोई दोष नहीं है, (30)
सो जिस किसी ने (अपनी बीवी या दासी के साथ शारीरिक संबंध के) अतिरिक्त किसी और से (रिश्ता बनाना) चाहा, तो ऐसे ही लोग सचमुच मर्यादा तोड़ने वाले हैं ---- (31)
जो अपने पास रखी गयी अमानतों [trusts] की हिफ़ाज़त करते हैं, और (किए गए) वादों को निभाते हैं; (32)
जो अपनी गवाहियों को ठीक-ठीक ईमानदारी से देते हैं और उन पर क़ायम रहते हैं (33)
और अपनी नमाज़ों को पाबंदी से व सही तरीक़े से पढ़ा करते हैं। (34)
तो यही लोग हैं जिनकी परम आनंद के बाग़ों [जन्नतों] में बड़ी इज़्ज़त होगी। (35)
[ऐ रसूल!] इन काफ़िरों को क्या हो गया है कि (आप को क़ुरआन पढ़ते देख) आपकी ओर चढ़े चले आ रहे हैं, (36)
दाएँ से (भी) और बायीं ओर से (भी), टोलियाँ बना-बनाकर? (37)
क्या उनमें से हर आदमी यह लालसा रखता है कि वह (बिना ईमान और अच्छे कर्म किए) नेमतों वाली जन्नत में चला जाए? (38)
कभी नहीं! हमने उन्हें उस चीज़ से पैदा किया है जिसे वह (ख़ुद भी) जानते हैं, (39)
और, मैं क़सम खाता हूँ पूरब और पश्चिम के सभी स्थानों के रब की (जहाँ से सितारे निकलते और डूबते हैं), कि बेशक हम पूरा सामर्थ्य रखते हैं, (40)
इस बात पर, कि उन लोगों की जगह उनसे बेहतर लोग ले आएं ---- और ऐसा करने से कोई हमें रोक नहीं सकता। (41)
सो आप उन्हें छोड़ दीजिए कि वे बेकार की बातों और खेल तमाशों में पड़े रहें, यहाँ तक कि उस दिन से उनका सामना हो जाए, जिसका उनसे वादा किया जा रहा है, (42)
उस दिन वह अपनी क़ब्रों से इस तरह हड़बड़ाते हुए बाहर निकल आएंगे, जैसे वे किसी झंडे के पीछे दौड़े जा रहे हों, (43)
उनकी आँखें (शर्म से) झुकी होंगी और ज़िल्लत उन पर छायी होगी: यही वह दिन होगा जिसके बारे में उन्हें चेतावनी दी जाती थी। (44)
नोट:
2: एक काफ़िर ने इस्लाम का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि अगर क़ुरआन की बात सच्ची है तो हम पर आसमान से पत्थर बरसाइए, या कोई दूसरी यातना हम पर ले आइए, जैसा कि सूरह अंफ़ाल (8:32) में आया है। कहा जाता है कि यह बात नज़र बिन हारिस के बारे में कही गई थी।
3: चढ़ने के रास्तों से मतलब वह रास्ते हैं जिनसे चढ़कर फरिश्ते ऊपर की दुनिया में पहुंचते हैं। अगली आयत में उन्हीं फरिश्तों के चढ़ने का वर्णन है।
4: विद्वानों के अनुसार यह क़यामत का वह दिन होगा जो काफ़िरों को हिसाब-किताब की सख़्ती की वजह से पचास हज़ार साल का महसूस होगा, शायद उसी दिन को सूरह अस-सज्दा (32: 5) और सूरह हज (22: 47) में एक हज़ार साल के बराबर भी कहा गया है। कुछ विद्वान कहते हैं कि काफ़िरों के सामने जब यह कहा जाता था कि (सच्चाई से) इंकार करने के नतीजे में उनपर अल्लाह की ओर से दुनिया और आख़िरत में यातना आएगी तो वे उसका मजाक उड़ाते थे, और कहते थे कि यह यातना आ क्यों नहीं जाती? मगर यातना के आने का उचित समय तो अल्लाह ही तय करेगा। अगर उन्हें लगता है कि इसके आने में बहुत देर हो गई है, तो वे जिसे एक हज़ार या पचास हज़ार साल समझते हैं, वह अल्लाह के नजदीक केवल 1 दिन के बराबर है।
18: अल्लाह ने माल के हक़दार तय कर दिए हैं, और हक़दारों को माल में से तय किया गया हिस्सा ज़रूर मिलना चाहिए, बिना हक़दारों को दिए हुए माल जमा करना ग़लत है।
24: धन में से ज़कात और दूसरी निर्धारित राशियाँ देना ज़रूरी है। यह स्पष्ट किया गया है कि ज़कात देना गरीबों पर कोई एहसान नहीं है बल्कि यह उनका हक है।
25: ज़रूरतमंद वह है जो अपनी ज़रूरत होते हुए भी माँगते नहीं हैं।
37 : जब मोहम्मद (सल्ल.) साहब कुरआन पढ़ते थे, तो काफ़िर लोग टोलियां बना बनाकर आपके आसपास जमा हो जाते, और मजाक उड़ाते हुए कहते कि अगर यह साहब जन्नत में जाएंगे तो हम इनसे पहले ही वहाँ चले जाएंगे। इस आयत में इसी की तरफ़ इशारा है।
39: इंसान को वीर्य [Sperm] की बूंद से बनाया गया है, हालाँकि वीर्य से जीता-जागता इंसान बनने तक बहुत से चरण से गुज़रना पड़ता है। जब अल्लाह वीर्य से इंसान बना सकता है, तो उसकी लाश को दोबारा जिंदा करना क्या मुश्किल है।
40: यहाँ अल्लाह ने ख़ुद अपनी ही क़सम खाई है। ऐसी क़समें क़ुरआन मेंं कई जगहों पर देखी जा सकती है, देखें 4:65; 15:92; 16:56, 63; 19:68.
सूरह 78: अन-नबा
[(क़यामत की) घोषणा / The Announcement]
यह एक मक्की सूरह है। विश्वास न करने वाले अक्सर मज़ाक़ व अविश्वास से पूछते थे कि क़यामत कब आएगी। इस सूरह में अल्लाह की क़ुदरत की अद्भुत निशानियाँ दिखायी गयी हैं, और यह साबित किया गया है कि मुर्दा लोगों को दोबारा ज़िंदा करना अल्लाह के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। फिर यह बताया गया है कि क़यामत के दिन क्या होगा, और विश्वास करने वालों और विश्वास न करने वालों का क्या अंजाम होगा।
विषय:
1-05: क़यामत का आना पक्का है
06-16: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
17-40: फ़ैसले का दिन
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ये (काफ़िर) लोग आपस में किस (चीज़) के बारे में सवाल कर रहे हैं? (1)
उस सबसे महत्वपूर्ण घोषणा [क़यामत] की (2)
जिसके बारे में वे मतभेद रखते हैं। (3)
(यह घोषणा इंकार के योग्य) नहीं! उन्हें (सच्चाई का) पता लग जाएगा। (4)
अंत में उन्हें सचमुच पता लग जाएगा। (5)
क्या हमने धरती को फ़र्श की तरह (आराम करने के लिए) बिछा नहीं दिया, (6)
और इसका संतुलन बनाए रखने के लिए (इसमें) पहाड़ों को गाड़ दिया? (7)
क्या हमने तुम्हें (नस्ल बढ़ाने के लिए) जोड़े में पैदा नहीं किया, (8)
हमने (थकान से) आराम के लिए तुम्हें नींद दी, (9)
रात को (उसके अंधेरे के कारण) पर्दा डाले हुई बनाया, (10)
और हमने दिन को रोज़ी-रोटी कमाने का (समय) बनाया? (11)
और (देखो!) क्या हमने तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आसमान) नहीं बनाए, (12)
और (सूरज को) रौशनी और ताप का (ज़बरदस्त) स्रोत बनाया? (13)
क्या हमने भरे बादलों से मूसलाधार पानी नहीं बरसाया (14)
ताकि हम इस (बारिश) के द्वारा (धरती से) अनाज और वनस्पति उगाएँ, (15)
और घने-घने उद्यान (उगाएँ)? (16)
फ़ैसले के दिन [क़यामत] के लिए एक समय तय किया हुआ है: (17)
जिस दिन नरसिंघा [Trumpet] फूँककर बजा दिया जाएगा, तो तुम गिरोह के गिरोह (अल्लाह के सामने) चले आओगे, (18)
और जब आसमान (की पर्तें को) फाड़ दिया जाएगा, तो (फटने से जैसे) वह चौड़े-चौड़े दरवाजों की तरह खुल जाएगा, (19)
और जब पहाड़ (धुआँ बनकर उड़ा दिए जाएंगे, तो वे) मिरीचिका [mirage] की तरह (नज़र का धोखा मात्र होकर) ग़ायब हो जाएंगे। (20)
जहन्नम (बुरे लोगों की ताक में) घात लगाकर बैठी हुई है, (21)
(सच्ची बातों को न मानने वाले) ज़ालिमों का यही घर होगा, (22)
(जहाँ) उन्हें बहुत लम्बे-लम्बे समय तक पड़े रहना है, (23)
न वे इसमें (किसी तरह की) ठंढक का मज़ा चखेंगे, और न किसी पीने की चीज़ का, (24)
सिवाय खौलते हुए पानी और (जहन्नमियों के घावों से) बहती हुई पीप के ---- (25)
यही (उनके कर्मों का) एकदम सही बदला है, (26)
क्योंकि वे (फैसले के दिन होने वाले) हिसाब-किताब से बिल्कुल नहीं डरते थे, (27)
और उन्होंने हमारे संदेशों [आयतों] को झुठ मानते हुए ठुकरा दिया। (28)
हमने हर (छोटी बड़ी) चीज़ को लिखकर खाते में सुरक्षित कर रखा है। (29)
(ऐ इंकार करने वालो!), “अब तुम (अपने किए का) मज़ा चखो: हमारी तरफ़ से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, सिवाय और अधिक यातना के।” (30)
जो लोग अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले हैं, उनके लिए सबसे बड़ी कामयाबी है: (31)
(उनके लिए) निजी बाग़ होंगे और अंगूर (के बाग़ीचे), (32)
ख़ूबसूरत भरी-पूरी, बराबर उम्र की साथी (companions) (होंगी), (33)
और (तहूर के) छलकते हुए जाम (होंगे)। (34)
वहाँ वे (लोग) कोई बेकार या झूठी बात नहीं सुनेंगे: (35)
यह तुम्हारे रब की तरफ से इनाम होगा, और (कर्मों के हिसाब से) एक उपयुक्त तोहफ़ा होगा, (36)
उस रब की तरफ़ से जो आसमानों और ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच में है, (सब) का पालनहार है, बड़ी ही रहमतवाला है।
(लेकिन क़यामत के दिन) उन्हें अल्लाह के सामने कुछ बोलने की अनुमति नहीं होगी। (37)
उस दिन जब जिबरील [रूहुल अमीन] और (सभी) फरिश्ते क़तार में खड़े होंगे, वे कुछ नहीं बोलेंगे सिवाय उनके, जिन्हें रहम करनेवाले रब [रहमान] ने बोलने की इजाज़त दी हो, और जो वही बात कहेगा जो सही हो। (38)
वह (फैसले का) दिन तो सच्चाई का दिन है। अत: जो कोई (कामयाबी) चाहता है, उसे ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए जो उसके रब के पास ले जाता हो। (39)
हमने तुम्हें उस यातना से सावधान कर दिया है जो जल्द ही आने वाली है, उस दिन जब हर आदमी उन (कर्मों) को अपनी आँखों से देख लेगा जो उसके हाथों ने आगे भेज रखे हैं, और जब विश्वास न रखने वाला कहेगा, "काश! मैं मिट्टी होता! (कि यातनाओं से बच जाता!)" (40)
नोट:
3: इससे मतलब यहां पर क़यामत और परलोक की जिंदगी है। अरब के काफ़िर लोग क़यामत के बारे में तरह-तरह की बातें बनाया करते थे, कोई उसका मज़ाक़ उड़ाता, कोई बेकार की बहस करता, कोई मुसलमानों से इसकी विस्तार से जानकारी चाहता कि यह् कब होगी, मगर सवाल पूछने का मकसद सच्चाई की खोज नहीं था बल्कि उसकी हंसी उड़ाना था। इन आयतों में उनके इसी तरीके की तरफ इशारा है।
इसके बाद अल्लाह ने ब्रह्मांड में फैली हुई अपनी निशानियों का ज़िक्र किया है कि जब तुम यह मानते हो कि यह सब कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, तो फिर इस बात को क्यों नहीं मानते कि अल्लाह इस दुनिया को एक बार ख़त्म करके दोबारा पैदा कर देगा।
18: नरसिंघे को फूंक मारकर बजाना : अंतिम दिन [क़यामत] की घोषणा करना (देखें 6:73; 18:99; 20:102; दोबारा बजाना 39:68; 69:13; 74:8).
23: सच्चाई को ना मानने वाले ज़ालिम लोग जहन्नम में बहुत लंबे लंबे समय तक रहेंगे या वह इसमें से बाहर नहीं निकल पाएंगे। कुछ लोगों का विचार है कि शायद एक लंबा समय गुजारने के बाद जहन्नम से बाहर निकल आएंगे, हालांकि कुरआन में बहुत सारी जगहों पर यह उल्लेख मिलता है कि वह जहन्नम से कभी नहीं निकलेंगे बल्कि वह सदा इसी में रहेंगे, देखें सूरह मायदा (5: 37).
37: यानी जिसको जो कुछ इनाम में दे दिया जाएगा, उसके विरुद्ध किसी को बोलने की अनुमति नहीं होगी।
40: कुछ हदीसों से मालूम होता है कि जिन जानवरों ने दुनिया में एक दूसरे पर जुल्म किया था, क़यामत के दिन हश्र के मैदान में उनको भी जमा करके उनसे उनके जुल्म का बदला दिलवाया जाएगा, यहां तक कि अगर किसी सींगवाली बकरी ने किसी बिना सींगवाली बकरी को सींग मारा था तो उसका भी बदला दिलवाया जाएगा और जब यह बदला पूरा हो जाएगा तो इन जानवरों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा। उस वक्त वे काफ़िर लोग जिन्हें जहन्नम का अंजाम नजर आ रहा होगा, वे यह तमन्ना करेंगे कि काश! हम भी मिट्टी हो जाते।
सूरह 88: अल-ग़ाशियह
[छा जानेवाली घटना / The Overwhelming Event]
यह मक्की सूरह है जिसमें विश्वास न करनेवालों को चेतावनी दी गई है, रसूल और ईमानवालों का उत्साह बढ़ाया गया है, और उन्हें विश्वास न करने वालों की ज़िम्मेदारी से मुक्त किया गया है। सूरह का नाम पहली आयत में आए फ़ैसले के दिन की घटनाओं के ज़िक्र से लिया गया है, और उस दिन विश्वास न रखनेवालों के मुरझाए हुए चेहरों की तुलना ईमानवालों के चमकते हुए चेहरों से की गई है।
विषय:
01-16: छा जाने वाली (क़यामत) की घटना
17-20: अल्लाह की ताक़त की निशानियाँ
21-26: सावधान कर दें
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क्या [ऐ रसूल!] आपको (हर चीज पर) छा जाने वाली घटना [क़यामत] की खबर पहुंची है? (1)
उस दिन कितने ही चेहरे अपमानित और उतरे हुए होंगे, (2)
(सांसारिक फ़ायदे के लिए) मुसीबत झेलते हुए, थकान से चूर! (3)
वे (जहन्नम की) दहकती हुई आग में जा गिरेंगे (4)
और उन्हें खौलते हुए सोते [spring] से (पानी) पिलाया जाएगा, (5)
उनके लिए काँटेदार सूखी ज़हरीली झाड़ियों के अलावा कुछ खाना नहीं होगा (6)
जो न बदन को मोटा [nourish] करेगा और न भूख ही मिटायेगा। (7)
(इसके विपरीत) उस दिन बहुत से चेहरे ऐसे भी होंगे जो ख़ुशी से चमकते और खिले-खिले होंगे, (8)
(दुनिया में अच्छे काम के लिए) अपनी की हुई मेहनत के नतीजे में बहुत खुश होंगे, (9)
आलीशान जन्नत में (ठहरे) होंगे, (10)
जहाँ कोई बेकार और व्यर्थ बात न सुनेंगे, (11)
बहते हुए पानी के सोतों [spring] के बीच, (12)
ऊँचे (बिछे हुए) तख़्त होंगे, (13)
प्याले (सजाकर) सामने रखे हुए होंगे,(14)
और गाओ-तकिये लाइन से लगे होंगे, (15)
और (मुलायम व नफ़ीस [refined]) क़ालीनें बिछी होंगी। (16)
क्या विश्वास न करनेवाले देखते नहीं कि ऊँट किस तरह (अजीब ढाँचे का) पैदा किया गया है? (या क्या ये लोग बारिश से भरे हुए बादलों को नहीं देखते कि वे कैसे तैयार होते हैं), (17)
आसमान को कैसे (ज़बरदस्त विस्तार के साथ) उठाया गया है, (18)
पहाड़ों को कैसे (ज़मीन से उभारकर) खड़ा किया गया है, (19)
पृथ्वी कैसे (गोलाई के बावजूद) बिछाई गई है? (20)
इसलिए (ऐ रसूल!) आप उन्हें चेतावनी दे दें: आपका तो काम ही नसीहत करना है, (21)
आपका काम उन लोगों पर नियंत्रण [control] रखना नहीं है (कि लोगों को ईमान लाने पर मजबूर करें)। (22)
रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई से) मुँह मोड़ा और विश्वास करने से इंकार किया, (23)
तो अल्लाह उन पर ज़बरदस्त यातना थोप देगा। (24)
हमारे ही पास उन सबको लौटकर आना है, (25)
और फिर (उनके कर्मों का) हिसाब लेने की ज़िम्मेदारी हमारी है। (26)
नोट:
17: अरब के लोग आमतौर से मरुस्थलों में ऊंट पर सफ़र करते थे। ऊँटों की रचना में जो अजीब विशेषताएं होती हैं, वे उनसे परिचित थे। इसके अलावा ऊँटों पर सफ़र करते वक्त उन्हें आसमान, जमीन, और पहाड़ नजर आते थे। अल्लाह कहता है कि यह लोग अगर अपने आसपास की चीजों पर ही विचार कर लेंं, तो उन्हें पता चल जाए कि जिस हस्ती ने यह आश्चर्यजनक चीज़ें पैदा की हैं, उसे अपनी ख़ुदायी में किसी साझेदार [Partner] की ज़रूरत नहीं है, और अगर वह संसार की सारी चीज़ों को पैदा करने में सक्षम है, तो वह इंसानों को मरने के बाद दोबारा जिंदा करने और उनसे उनके कर्मों का हिसाब लेने में भी पूरी तरह सक्षम है। उसने संसार की रचना बिना किसी मक़सद के नहीं की है, बल्कि उसका उद्देश्य यही है कि दुनिया में नेक कर्म करने वालों को अच्छे काम का इनाम दिया जाए और बुरे कर्म करने वालों को उनकी बुराई की सज़ा दी जाए।
22: सच्चाई पर विश्वास न करनेवालों की हठधर्मी पर मुहम्मद (सल्ल) को तकलीफ़ होती थी, सो यहाँ आपको तसल्ली दी गयी है कि आपकी ज़िम्मेदारी केवल लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँचा देना है, उन्हें ज़बरद्स्ती मुसलमान बनाना नहीं है। यहाँ से यह उसूल निकलता है कि जो कोई भी अल्लाह के दीन को लोगों तक पहुँचाना चाहता है, उस पर यह ज़िम्मेदारी नहीं डाली गयी है कि वह किसी को अपनी बात ज़बरदस्ती मनवा ले।
उप समूह “ग”:
सूरह 83: अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन
[जो लोग नाप-तौल में कमी करते हैं / Those Who Give Short Measure]
यह एक मक्की सूरह है। मक्का में उस ज़माने में ऐसा लगता है कि नाप-तौल में धोखाधड़ी करने का चलन था, जिसकी यहाँ सख़्ती से निंदा की गई है, और क़ुरआन में दूसरी जगहों पर भी इसे बुरा कहा गया है (11:84-88; 7:85). इस सूरह में धोखेबाज़ों और विश्वास न करने वालों के अंजाम की तुलना भलाई करने वालों की ख़ुशियों-भरे अंजाम से की गई है। सूरह के अंत में कहा गया है कि विश्वास न करनेवालों को ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाने का बदला दिया जाएगा।
विषय:
01-17: नाप-तौल में कमी करने वाले और लोगों को घटाकर देने वाले
18-28: अच्छे व नेक लोग
29-36: कौन हैं जो (ईमानवालों पर) हँस रहे हैं?
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
बर्बादी है नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए, (1)
यह लोग जब (दूसरे) लोगों से नापकर (कुछ) लेते हैं, तो (उनसे) पूरा-पूरा लेते हैं, (2)
और जब उन्हें (स्वयं) नापकर या तौलकर देते हैं, तो घटाकर देते हैं! (3)
क्या ये लोग इस बात का यक़ीन नहीं रखते कि वह (मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करके) उठाए जाएंगे, (4)
एक बड़े भारी (क़यामत के) दिन में, (5)
जिस दिन सब लोग तमाम जहानों के रब के सामने (हिसाब देने के लिए) खड़े होंगे? (6)
हरगिज़ नहीं! दुराचारियों [wicked] के नामों का लेखा-जोखा “सिज्जीन" में है ---- (7)
और आप क्या जानें कि “सिज्जीन” क्या है? ----- (8)
यह (एक साफ़-साफ़) लिखी हुई किताब है जिसमें (जहन्नम में जाने वालों के) नामों की सूची है। (9)
उस दिन (सच्चाई को) झुठलाने वालों के लिए तबाही होगी, (10)
जो लोग फ़ैसले के दिन को मानने से इंकार करते हैं! (11)
उस (दिन) से केवल वही इंकार करता है जो हद से बढ़ा हुआ पापी हो: (12)
उसे जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो कहता है, “(यह तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!” (13)
(ऐसा) बिल्कुल नहीं! (बल्कि) जो कुछ वे किया करते थे, उन (बुरे) कर्मों का ज़ंग [rust] उनके दिलों पर चढ़ गया है (इसलिए ये आयतें उनके दिल पर असर नहीं करतीं)। (14)
बिल्कुल नहीं! उस दिन वे अपने रब (की रहमत से और उसके दर्शन) से रोक दिए जाएंगे, (15)
फिर वे जहन्नम (की आग) में जलेंगे, (16)
और उनसे कहा जाएगा, “यही है वह (जहन्नम की यातना), जिसे तुम झूठ बताते थे।” (17)
बिल्कुल नहीं! जो सचमुच अच्छे लोग हैं, उनके नामों की सूची ‘इल्लीयीन” में है----- (18)
और आप क्या जानें कि “इल्लीयीन” क्या है?----- (19)
यह एक साफ़-साफ़ लिखी हुई किताब है जिसमें उन जन्नतवालों के नाम (और उनके कर्मों का लेखा-जोखा) दर्ज है, (20)
जिसे वे (फरिश्ते, और चुने हुए बंदे) देखते हैं जिन्हें अल्लाह की नज़दीकी हासिल होगी। (21)
जो सचमुच नेक लोग होंगे, वे (नेमतोंवाले जन्नत में) परम आनंद में होंगे, (22)
(आरामदेह) तख़्तों पर बैठे हुए इधर-उधर देख रहे होंगे। (23)
तुम उनके चेहरों पर ख़ुशी की चमक से ही पहचान लोगे। (24)
उन्हें मुहर लगी हुई [sealed] बड़ी लज़ीज़ व शुद्ध शराब [तहूर] पिलायी जाएगी (25)
उसकी मुहर कस्तूरी (जैसी खुशबूदार चीज़) की होगी ----- जो लोग कुछ पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, उन्हें चाहिए कि वे इसे पाने की (भरपूर) कोशिश करें ---- (26)
उस (शराब) में ‘तसनीम’ के पानी की मिलावट होगी, (27)
यह (तसनीम) एक ऐसा बड़ा पानी का सोता [Spring] है, जहाँ से केवल वही लोग पियेंगे जिन्हें अल्लाह से नज़दीकी हासिल है। (28)
शैतानी करने वाले लोग (दुनिया में) ईमान रखने वालों का मज़ाक उड़ाया करते थे ---- (29)
जब वे ईमानवालों के पास से गुज़रते, तो आपस में आँखों से इशारेबाज़ी करते थे, (30)
और जब वे अपने लोगों के बीच वापस जाते, तो ईमानवालों के बारे में हँसी-मज़ाक़ करते थे, (31)
और जब वे उन (कमजोर-हाल मोमिनों) को देखते, तो कहते: “ये लोग सही रास्ते से भटक गए हैं,” (यानी यह दुनिया गँवा बैठे हैं और परलोक तो है ही केवल गढ़ी हुई कहानी!) (32)
हालाँकि वे उन (मुसलमानों) के हाल पर निगरानी करने वाले [keeper] बनाकर तो भेजे नहीं गए थे ----- (33)
सो आज (क़यामत के दिन) देखो, ईमानवाले, विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] पर हँस रहे हैं, (34)
सजे हुए तख़्तों पर बैठे हुए (अपनी खुशहाली और काफ़िरों की बदहाली को) देख रहे हैं। (35)
तो क्या विश्वास न करने वालों [काफिरों] को उन कर्मों का पूरा बदला (नहीं) दे दिया गया जो कुछ वे किया करते थे? (36)
नोट:
7:
"सिज्जीन" का शाब्दिक अर्थ क़ैदख़ाना होता है। यह उस जगह का नाम है जहाँ मरने के बाद बुरे लोगों की रूहों को रखा जाता है, वहीं पर उनके कर्मों का लेखा-जोखा भी रखा जाता है।
18: "इल्लीयीन" का शाब्दिक अर्थ ऊपर का कमरा होता है। यह उस जगह का नाम है जहाँ मरने के बाद ईमानवालों की रूहें भेजी जाती हैं, वहीं पर उनके कर्मों के खाते भी रखे जाते हैं।
सूरह 77: अल-मुरसलात
[हवाएं-- जो भेजी जाती हैं / WINDS- SENT FORTH]
यह एक मक्की सूरह है। यहाँ यह बात साफ़ की गई है कि जिस तरह अल्लाह को हर चीज़ पैदा करने की ताक़त है, उसी तरह उसके लिए मुर्दा आदमी को दोबारा ज़िंदा करना बहुत आसान है। इसमें फ़ैसले के दिन के बारे में वर्णन है: इसका आना एक दिन तय है, इसके आने के बारे में वाद-विवाद, वह घटनाएं जो क़यामत आने की निशानियाँ बताएंगी, और इसके साथ ही विश्वास रखने वालों और विश्वास न रखने वालों का अंजाम भी बताया गया है।
विषय:
01-07: क़यामत ज़रूर आयेगी
08-13: अंतिम दिन की निशानियाँ
14-50: फ़ैसले के दिन इंकार करने वालों की तबाही
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर महरबान है, अत्यंत दयावान है
उन (हवाओं) की क़सम जो एक के बाद एक भेजी जाती हैं, (1)
फिर जो आँधी बनकर ज़बरदस्त झोंकों से चलती हैं, (2)
और जो (बादलों को) लाकर दूर-दूर तक फैला देती हैं, (3)
फिर जो (उन्हें) फाड़कर अलग अलग कर देती हैं, (4)
जो (दिलों में अल्लाह की) याद दिलाती हैं,
(5)
(अच्छाई और बुराई को) सबूत के तौर पर बताने के लिए, या (सच्चाई से इंकार करने के नतीजों से) सावधान करने के लिए: (6)
जिस (क़यामत का) तुमसे वादा किया जा रहा है, वह घटना ज़रूर हो कर रहेगी। (7)
जब सितारों की रौशनी मद्धिम पड़ जाएगी (8)
और जब आसमान को फाड़ दिया जायेगा, (9)
जब पहाड़ (चूर चूर करके) उड़ा दिए जाएंगे, (10)
जब सभी पैग़म्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों /communities पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे ------ (11)
(तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि तय कर दी गयी है? (12)
फ़ैसले के दिन के लिए, (13)
और आपको क्या मालूम कि फ़ैसले का दिन क्या है? (14)
उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए बड़ी तबाही है! (15)
क्या हमने पहले (आयी क़ौम के) लोगों को बर्बाद नहीं कर दिया? (16)
फिर हम उन्हीं के पीछे-पीछे, बाद के (इंकार करने वाले) लोगों को भी (तबाही के रास्ते पर) चला देंगे: (17)
हम अपराधियों के साथ ऐसा ही करते हैं। (18)
सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए बड़ी तबाही है उस दिन! (19)
(फिर तुम क्यों सच्चाई से इंकार करते हो) क्या हमने तुम्हें मामूली पानी (की एक बूँद) से पैदा नहीं किया, (20)
जिसे एक सुरक्षित टिकने की जगह [माँ की कोख] में रख दिया, (21)
एक निश्चित अवधि तक? (22)
हम (बच्चा ठहर जाने से लेकर पैदा होने तक) एक अवधि तय कर देते हैं: और हम इसको कितनी ख़ूबी से तय करते हैं! (23)
बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (24)
क्या हमने धरती को घर की तरह (समेट लेने वाली) नहीं बनाया, (25)
ज़िंदा के लिए भी और मुर्दों के लिए भी? (26)
क्या हमने इस पर ऊँचे और मजबूत पहाड़ों को नहीं जमा दिया, और हमने तुम्हें मीठा पानी पिलाया? (27)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (28)
(उनसे कहा जाएगा), "जाओ (अब) तुम उस (आग) की तरफ़, जिसे तुम झूठ समझकर मानने से इंकार किया करते थे! (29)
जाओ उस (जहन्नम के) धुएं की छाया में! ये (धुआँ) तीन ऊँची-ऊँची लपटों से उठता है; (30)
जो न (तो) ठंडी छाया है और न ही आग के शोलों से बचाने वाली है; (31)
इस (आग) से जो चिंगारियाँ निकलती हैं, वह इतनी बड़ी-बड़ी होंगी जैसे कि पेड़ का तना (या महल) हो, (32)
और इतनी चमकीली होंगी जैसे कि ताँबा (या पीले रंग का ऊँट)। (33)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (34)
यह ऐसा दिन होगा कि वे (कुछ) बोल भी नहीं सकेंगे, (35)
और न ही उन्हें कोई मौक़ा दिया जाएगा कि वे कोई बहाने पेश कर सकें। (36)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (37)
(लोगों से कहा जाएगा), "यह फ़ैसले का दिन है: हमने तुम्हें और पहले गुज़री हुई सभी पीढ़ियों [Generations] को इकट्ठा किया है। (38)
अगर तुम मेरे ख़िलाफ़ कोई दांव-पेंच चलना चाहते हो, तो (वह) दांव मुझ पर अभी चला लो।" (39)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (40)
मगर जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, वे ठंडी छाँव और पानी के सोतों [spring] में मज़े कर रहे होंगे,
(41)
और कोई भी फल या मेवे जिसकी वे इच्छा करेंगे (उनके लिए मौजूद होगा); (42)
(उनसे कहा जाएगा), “जी भर के खाओ और पियो, उन (अच्छे व नेक) कर्मों के बदले जो तुम (दुनिया में) करते रहे थे: (43)
हम इसी तरह नेक काम करने वालों को बदले में इनाम दिया करते हैं।" (44)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (45)
[ऐ सच्चाई से इंकार करनेवालो!], “(तुम) थोड़ा समय खा-पी लो और मज़े उठा लो, सचमुच तुम शैतानी करने वाले (मुजरिम) हो। (46)
बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (47)
जब उनसे बोला जाता है, "तुम (अल्लाह के सामने) झुको", तो वे नहीं झुकते। (48)
बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (49)
आख़िर वे इस (कुरआन) के बाद, और (अल्लाह की ओर से उतरी) किस बात पर विश्वास करेंगे? (50)
1: पहली पाँच आयतों में आने वाले तूफ़ानी हवाओं की क़सम खाई गई है, जो कि शायद आने वाले 'फ़ैसले के दिन' को दर्शाता है।
3: इस दुनिया में जो हवाएं चलती हैं, उनमें से कुछ तो ऐसी होती हैं जो इंसान को फ़ायदा पहुँचाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो आँधी-तूफ़ान बनकर इंसान के लिए नुक़सान का कारण बनती हैं। इसी तरह, फ़रिश्ते जो अल्लाह का संदेश लेकर इंसानों के पास आते हैं, वे नेक लोगों के लिए ख़ुश्ख़बरी और बुरे लोगों को सावधान करने का सामान लेकर आते हैं। इस सूरह में पहली तीन आयतों में हवाओं की क़सम खाई गई है, और कुछ विद्वानों के अनुसार बाद की तीन आयतों मेंं फ़रिश्तों की क़सम खा गई है।
4: या उन (फरिश्तों) की क़सम जो सच और झूठ को अलग-अलग कर देते हैं।
5: या फिर नसीहत की बातें (अल्लाह की ओर से फ़रिश्ते) लेकर आते हैं।
12: विश्वास न करनेवाले अक्सर पूछा करते थे कि अगर यातना आनी है तो अभी आ क्यों नहीं जाती, देर क्या है? हालाँकि उसके आने का समय तय किया हुआ है!
13: "फ़ैसले का दिन" यानी अच्छे और बुरे लोगों को अलग-अलग कर देने का दिन (देखें 37:21; 44:40; 78:17).
17: यानी जिस तरह पिछले ज़माने के (सच्चाई पर) विश्वास न करने वाले तबाह कर दिए गए, उसी तरह अरब के ये विश्वास न करने वाले लोग जो मुहम्मद साहब को झुठला रहे हैंं, ये भी बर्बाद कर दिए जाएंगे।
49: "बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!" यह बात इस सूरह में बार-बार (9 बार) आई है।
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