सूरह समूह II
उप समूह “क”
सूरह 89: अल-फ़ज्र
[सुबह-सवेरे, Daybreak]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें अल्लाह ने क़समें खाकर इस बात पर ज़ोर दिया है कि रसूल के ज़माने के अत्याचारी [ज़ालिम] भी वैसे ही हैं जैसे पिछले ज़मानों में ज़ालिम रहे थे। इस तरह, याद दिलाया गया है कि आद, समूद और फ़िरऔन के लोगों को जो भयानक सज़ाएं मिली, वैसी सज़ा अरब के लोगों को भी मिल सकती है। फ़ैसले के दिन शैतानी करनेवाले लोग पछतायेंगे, और अच्छा काम करनेवालों को इनाम दिया जाएगा। वैसे लोगों की निंदा की गई है जो अल्लाह की नेमतों को दूसरेलोगों को नहीं देते (17-20). सूरह में शुक्र न अदा करने वालों के अंजाम की तुलना उन लोगों से की गई है जिनकी रूहें अल्लाह की याद से सुकून पा जाती हैं।
विषय:
01-05: क़सम
06-14: पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा: चेतावनी
15-20: इंसानों को धन-दौलत की लालच
21-30: जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है सुबह-सवेरे के समय की, (1)
और क़सम है दस (मुबारक) रातों की, (2)
और क़सम है जोड़ेवाली [Even] (चीज़) की और बिना-जोड़ेवाली [Odd] चीज़ों की, (3)
और गुज़रती हुई रात की क़सम! (कि इंकार करने वालों को ज़रूर दंड दिया जाएगा) ------ (4)
क्या एक समझदार (को विश्वास दिलाने) के लिए ये क़समें काफ़ी नहीं हैं? (5)
क्या आपने [ऐ रसूल] नहीं देखा कि आपके रब ने “आद” (की क़ौम) के साथ क्या सलूक किया? (6)
(जो) ऊँचे-ऊँचे स्तंभोंवाले शहर, “इरम” (में बसते) थे, (7)
उनके जैसे (डील-डौल वाले) लोग इस धरती पर कहीं भी कभी पैदा नहीं किए गए, (8)
और "समूद" (के लोगों के साथ क्या सलूक हुआ) जिन्होंने (क़ुरा नाम की) घाटी में चट्टानों को काट (कर पत्थरों से घरों का निर्माण कर) डाला था, (9)
और फ़िरऔन [Pharaoh] (का क्या हश्र हुआ) जो बड़े ताक़तवर और मज़बूत लशकरोंवाला (या लोगों को खूंटों (Stakes) से दंड देनेवाला) था?
(10)
यह वे लोग थे जिन्होंने (अपने-अपने) इलाक़ों में ज़्यादतियाँ [सरकशी] कर रखी थीं,
(11)
और उनमें बड़े फ़साद मचा रखे थे: (12)
तो आपके रब ने उन पर यातना का कोड़ा बरसा दिया। (13)
बेशक आपका रब सब (ज़्यादती करनेवालों और आदेश न माननेवालों) पर हमेशा कड़ी नज़र रखता है। (14)
मगर इंसान (ऐसा है) कि जब उसका रब उसे (आराम व ठाठ देकर) आज़माता है और इज़्ज़त और नेमतें [blessings] प्रदान करता है, तो वह (घमंडी हो जाता है) कहता है, “मेरे रब ने मुझे इज़्ज़त दी है,” (15)
लेकिन जब वह उसे (तकलीफ़ और मुसीबत देकर) आज़माता है और उसकी रोज़ी को सीमित कर देता है, तो वह कहता है, “मेरे रब ने मुझे अपमानित कर दिया।” (16)
हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! मगर (सच्चाई यह है कि सम्मान और धन-दौलत मिलने पर) तुम लोग अनाथों को मान नहीं देते, (17)
और न ही तुम (लोग) ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए (समाज में) एक दूसरे को उभारते हो, (18)
और विरासत का सारा माल (inherited wealth) समेटकर (स्वयं) खा जाते हो (और इसमें से अनाथों और ग़रीब लोगों का हिस्सा नहीं निकालते), (19)
और तुम धन-दौलत से हद से ज़्यादा लगाव रखते हो। (20)
हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! जब धरती कूट-कूटकर चूर-चूर कर दी जाएगी, (21)
जब आपका रब और साथ में फरिश्ते क़तार-दर-क़तार लगाये हुए (हश्र के मैदान में) आएंगे, (22)
और उस दिन जहन्नम [नरक] को सामने लाया जाएगा--- उस दिन इंसान को समझ आएगी, मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा? (23)
वह कहेगा “ऐ काश! मैंने अपने (इस आने वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!)” (24)
सो उस दिन वह [अल्लाह] ऐसा दंड देगा कि वैसा दंड दूसरा कोई नहीं दे सकता, (25)
और न उसके जकड़ने की तरह कोई दूसरा जकड़नेवाला होगा। (26)
(मगर अल्लाह की याद में सुकून पाने वाले लोगों से कहा जाएगा कि) “ऐ संतुष्ट आत्मा: (27)
तू अपने रब की तरफ इस हाल में लौट आ कि तू उससे खुश हो और वह तुझ से राज़ी हो; (28)
और तू शामिल हो जा, मेरे (नेक) बन्दों में; (29)
और दाख़िल हो जा मेरी जन्नत [Garden] में।" (30)
नोट:
1: सुबह-सवेरे की क़सम इसलिए खायी गई है कि हर सुबह सारी चीज़ों में एक
नई ऊर्जा लेकर आती है। दूसरा मतलब शायद बक़रीद (के महीने की दसवीं तारीख की) सुबह से है।
2. मतलब शायद बक़रीद के महीने की पहली 10 रातें हैं जो बड़ी बरकतवाली मानी जाती हैं, जिनका संबंध हज से है।
3. जफ़्त [सम या जोड़ा] का अर्थ शायद कुल प्राणी है जो जोड़ों के रूप में पैदा किये गये हैं, और ताक़ [विषम या अकेले] का अर्थ शायद अल्लाह की ज़ात है जिसने कायनात बनायी। इस सम और विषम का मतलब बक़रीद की 10वीं और 9वीं तारीख भी बतायी गयी है जिनकी बड़ी अहमियत मानी जाती है।
4: यहाँ ख़ास दिन और रात का हवाला शायद इसलिए दिया गया है कि अरब के वैसे लोग भी इन ख़ास दिन-रात को पवित्र व आदरणीय मानते थे, जो सच्चाई पर विश्वास नहीं रखते थे। तो जैसे इतने दिन-रात में कुछ ही दिन बड़े आदरणीय होते हैं, उसी तरह सारे लोगों के साथ अल्लाह एक समान सलूक नहीं करेगा, बल्कि अच्छे कर्म करनेवालों को इनाम देगा और बुरे कर्म करनेवालों को सज़ा देगा।
7: कुछ लोगों का मानना है कि "इरम" आद के दादा का नाम था, और उस क़ौम के लोग बड़े लम्बे डील-डौल वाले होते थे। अरब की प्रचलित क़िस्सों में है कि "इरम" 'आद' की क़ौम का एक मशहूर शहर था जिसे आद के बेटे शद्दाद ने सोने-चांदी और जवाहिरात से बनवाया था। कुछ लोग कहते हैं कि 'इरम' बाइबिल के "अरम" से मिलता है जो कि दक्षिणी सीरिया के आरमियाई साम्राज्य (11वीं --8वीं सदी ई.पूर्व) का हिस्सा था, जिसकी राजधानी दमश्क़ थी जिसको असीरियन फौज ने 732 ई.पूर्व में बर्बाद कर दिया था। इस क़ौम के पास हज़रत हूद (अलै) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 65-72) और सूरह हूद (11: 50)
9: समूद के लोगों के पास हज़रत सालिह (अलै) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 73-79)
10: फ़िरऔन को "खूंटोंवाला" इसलिए कहा गया है कि वह लोगों को सज़ा देने के लिए उनके हाथ-पांव में खूंटें गाड़ दिया करता था।
17: अल्लाह ने रोज़ी का बंटवारा अपनी गहरी समझ-बूझ के अनुसार किया है, अत: अगर रोज़ी में कमी हो, तो उसे अपनी तौहीन समझना भी ग़लत है, और रोज़ी में अगर बढ़ोत्तरी हो, तो उसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लेना भी ग़लत है, क्योंकि इस दुनिया में अल्लाह ने बहुत से ऐसे लोगों को धन-दौलत दी है जो अच्छे व नेक नहीं हैं।
23: मरने से पहले ही या क़यामत से पहले तक अगर किसी ने (असल) सच्चाई पर विश्वास कर लिया, तब तो उसका ईमान रखना लाभदायक होगा, क्योंकि क़यामत हो जाने के बाद विश्वास करने का कोई फ़ायदा नहीं है।
सूरह 91: अश-शम्स
[सूरज, The Sun]
यह एक मक्की सूरह है। इसका मुख्य विषय यह है कि आदमी को राह चुनने की छूट दी गई है, वह चाहे तो अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़-सुथरा रखे या अपनी जान को (गुनाहों के दलदल में) धँसा ले। समूद की क़ौम की मिसाल दी गई है कि कैसे ग़लत रास्ता चुनते हुए उनमें बिगाड़ पैदा हुआ, और नतीजे में वे बर्बाद हुए।
विषय:
01-10: अपने आपको बुराई से बचाए रखना या बुराई में पड़ जाना
11-15: समूद की कहानी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
सुबह की रौशनी में चमकते हुए सूरज की क़सम [1]
और चाँद की क़सम जो उस (सूरज) के पीछे-पीछे चले, [2]
दिन की क़सम जब वह सूरज को तेज़ चमकता हुआ दिखाए [3]
और रात की क़सम जब वह छा जाए और सूरज को छिपा ले, [4]
आसमान की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे (एक ब्रह्मांड के रूप में) बनाया [5]
और ज़मीन की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे बिछा दिया, [6]
और इंसानी जान की क़सम कि कैसे उसने उसे (ठीक-ठाक) करके सँवार दिया [7]
और फिर उस (अल्लाह) ने उसके दिल में वह बात भी डाल दी जो उसके लिए नैतिकता से गिरी हुई है, और वह बात भी जो बुराइयों से बचने की हैं! [8]
जिसने अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़-सुथरा रखा, उसने कामयाबी पा ली [9]
और जिसने अपनी जान को (गुनाहों के दलदल में) धँसा लिया, वह असफल हो गया। [10]
"समूद" [Thamud] (की क़ौम) के लोगों ने अपने घमंड और क्रूरता में आकर अपने (रसूल सालेह को) झूठा कहा, [11]
जब उनमें से सब से दुष्ट आदमी (उनके विरोध में) उठ खड़ा हुआ। [12]
अल्लाह के रसूल ने उन लोगों से कहा: “(देखो!) अल्लाह की (इस) ऊँटनी को (हाथ न लगाना और इसको) पानी पीने के लिए खुला छोड़ दो,” [13]
मगर उन लोगों ने उन्हें [रसूल को] झूठा कहा, और उस (ऊँटनी) का पाँव काट (कर मार) डाला। तो उनके रब ने उनके अपराध की वजह से उनको तबाह-बर्बाद कर डाला, और सबको (जड़ से उखाड़ करके) बराबर [level] कर दिया। [14]
(याद रहे) अल्लाह को उन्हें दंड देने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई (और न तबाही के नतीजों का उसे कोई डर होता है)। [15]
नोट:
1: इस सूरह में असल विषय यह बयान किया गया है कि अल्लाह ने हर इंसान के दिल में अच्छाई और बुराई दोनों चीजें पैदा की है, अब इंसान का काम है कि वह अच्छाई के काम करे और बुराई से अपने आप को रोके। इस बात को कहने के लिए सूरज, चांद, दिन और रात की कसमें खाई गई हैं। शायद इसलिए कि जिस तरह अल्लाह ने सूरज की और दिन की रोशनी पैदा की है, उसी के साथ रात का अंधेरा भी बनाया है। इसी तरह इंसान को अच्छे काम करने की भी सलाहियत दी है, और बुरे काम करने की भी।
7: समूद के बारे में ज़्यादा विस्तार से देखें 7: 73-79
9: आत्मा को साफ़-सुथरा रखने का मतलब यह है कि इंसान के दिल में जो भलाई की इच्छाएं पैदा होती हैं, वे उन्हें उभारकर उस पर अमल करे और जो बुरी इच्छाएं पैदा होती हैं, उन्हें दबाकर रखे। इसकी लगातार कोशिश करने से आत्मा [नफ़्स] की सफ़ाई होती है।
13: ऊँटनी... और उसके पानी पीने का मामला: इसकी कहाँई के लिए देखें 26: 155-156; 54: 27-28.
14: समूद की क़ौम की मांग पर अल्लाह ने एक ऊँटनी पैदा की थी, और लोगों से कहा था कि कुएंं से पानी एक दिन यह ऊँटनी पिएगी और दूसरे दिन तुम पानी भर लिया करना। लेकिन उस क़ौम के एक पत्थर दिल आदमी ने ऊंटनी को मार डाला, उसके बाद उस क़ौम पर बड़ी भारी यातना आई और सब कुछ तबाह-बर्बाद हो गया। देखें सूरह आराफ़ (7: 73).
सूरह 92: अल-लैल [रात/The Night]
यह एक मक्की सूरह जिसमें यह दिखाया गया है कि आदमी जो अच्छा या बुरा रास्ता चुनता है उसका नतीजा भी उसे देखना है। इसमें अल्लाह के मार्गदर्शन और विश्वास न करने वालों को चेतावनी देने पर ज़ोर दिया गया है। ईमानवालों को मिलने वाले इनाम को भी उजागर किया गया है जिससे वे संतुष्ट हो जाएंगे (आयत 21).
विषय:
01-13: अच्छाई और बुराई का रास्ता
14-21: नेक और दुष्ट आदमी को मिलने वाला बदला
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
रात की क़सम जब वह छा जाए (और हर चीज़ को अपने अंधेरे में छुपा ले), (1)
दिन की क़सम जब उसका उजाला फैल जाए, (2)
और उस हस्ती (की) क़सम जिसने (हर चीज में) नर और मादे को पैदा किया! (3)
(अपने मक़सद को पाने के लिए) तुम्हारे रास्ते [कर्म व प्रयास] काफ़ी अलग अलग तरह के हैं। (4)
अब जिस किसी ने (अल्लाह की राह में) अपना माल दिया, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहा, (5)
जिसने अच्छाई की बात को दिल से माना — (6)
तो हम उसे आराम की मंज़िल [जन्नत] तक पहँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे। (7)
और जिस किसी ने (अपने माल को अल्लाह की राह में ख़र्च करने में) कंजूसी की, और (अल्लाह से) अलग होकर अपने आप में मगन रहा, (8)
जिसने अच्छाई की बात को मानने से इंकार किया—- (9)
तो हम उसे तकलीफ़ की मंज़िल [जहन्नम] तक पहुँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे, (10)
और जब वह तबाही (के गड्ढे) में गिरेगा तो उसका माल उसके किसी काम नहीं आएगा। (11)
यह सच है कि (सच्ची और सही) राह दिखाना हमारे ज़िम्मे है—- (12)
(याद रहे!), कि हम इस दुनिया और आनेवाली दुनिया, दोनों के ही मालिक हैं——- (13)
अत: मैं तुम्हें (जहन्नम की) भड़कती हुई आग से सावधान करता हूँ, (14)
जिसमें कोई और नहीं, वही अत्यंत दुष्ट व अभागा जलेगा, (15)
जिसने (सच्चाई) को मानने से इंकार किया और (रसूल की बातों से) मुँह फेर लिया। (16)
उस (आग) से ऐसे बेहद परहेज़गार [Pious] आदमी को दूर रखा जाएगा—— (17)
जो अपने मन के मैल को दूर करने के लिए अपना माल (अल्लाह की राह में) देता है, (18)
हालाँकि किसी का उस पर कोई उपकार नहीं था जिसका वह बदला चुकाता है, (19)
बल्कि (वह) तो केवल अपने महान रब की खुशी के लिए (माल खर्च करता है) —– (20)
और वह (अल्लाह के इनाम से) बहुत ख़ुश हो जाएगा। (21)
नोट:
4: इंसानों के कर्म अलग-अलग तरह के होते हैं, अच्छे भी और बुरे भी, और उनके कर्मों के नतीजे भी उसी हिसाब से अलग-अलग होते हैं, जैसाकि आगे बताया गया है। यह बात कहने के लिए रात और दिन की क़सम खाने का शायद मक़सद यह है कि जिस तरह रात और दिन के नतीजे अलग-अलग होते हैं, उसी तरह नेकी और बुराई के नतीजे भी भिन्न-भिन्न होते हैं। और जिस तरह अल्लाह ने नर और मादे की विशेषताएं अलग-अलग रखी हैं, उसी तरह कर्मों की विशेषताएं भी अलग-अलग हैं।
6: अच्छाई की बात का मतलब अल्लाह के संदेशों की सच्चाई पर विश्वास कर लेना।
7: सचमुच जन्नत ही असल आराम की जगह है, और वहाँ पहुँचने का रास्ता आसान करने का मतलब यह है कि अल्लाह ऐसे आदमियों को भलाई के काम करने की तौफ़ीक़ दे देगा।
10: असल तकलीफ़ की जगह “जहन्नम" है। अल्लाह कहता है़ कि जो गुनाहों में लगा रहना चाहता है, उसे भी गुनाह करने के लिए छूट दी जाएगी।
13: अत: यह हक़ अल्लाह ही को हासिल है कि वह इंसान को दुनिया में रहने के लिए मार्गदर्शन और आदेश दे और फिर अंत में इंसानों के कर्मों के अनुसार इनाम या दंड दे।
21: ऐसा आदमी जन्नत में अपने कर्मों के चलते अल्लाह द्वारा मिलने वाले इनाम से बहुत ख़ुश हो जाएगा।
सूरह 90: अल-बलद
[मक्का शहर / The City]
यह एक मक्की सूरह है। इस सूरह में बताया गया है कि आदमी को इसलिए पैदा किया गया है कि वह अपनी मर्ज़ी से अच्छा या बुरा कर्म चुन सके, जिसके आधार पर उसका फ़ैसला होगा। इसलिए आदमी को चाहिए कि वह अच्छे कर्म करने की कोशिश में लगा रहे ताकि कामयाब हो सके, न कि बुरे कर्मों में फँसकर घमंडी और बेकार हो जाए।
विषय:
01-11: अच्छाई और बुराई के दो रास्ते
12-17: कठिन रास्तों वाली घाटी का वर्णन
18-20: दाहिने और बायीं तरफ़वाले
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
मैं इस शहर [मक्का] की क़सम खाता हूँ--- (1)
और आप [ऐ रसूल!] इसी शहर के रहने वाले हैं --- (2)
(और क़सम खाता हूँ) बाप की और उनके बच्चों की, (3)
कि हमने इंसान को कष्ट में (फंसा रहने वाला) बनाया है। (4)
क्या वह यह समझता है कि उस पर किसी का बस नहीं चलेगा? (5)
वह (बड़े गर्व से) कहता है, “मैंने ढेरों माल उड़ा डाला है”, (6)
क्या वह सोचता है कि उसे (बेकार चीज़ों में ख़र्च करते हुए) कोई नहीं देखता? (7)
क्या हमने उसे दो आंखें नहीं दीं? (8)
और (उसे) एक ज़बान और दो होंठ (नहीं दिए)? (9)
और हमने उसे (अच्छाई और बुराई के) दोनों रास्ते साफ़-साफ़ दिखा दिए। (10)
इसके बावजूद, वह तो (अच्छे कर्मों को करने के लिए) खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं, (11)
और आप क्या जानें कि वह खड़ी चढ़ायी वाली घाटी [steep pass] क्या है? (12)
किसी को ग़ुलामी से आज़ाद करा देना, (13)
या भूखवाले दिनों में (यानी अकाल और ग़रीबी के दौर में) खाना खिला देना, (14)
किसी अनाथ [यतीम] को जो नज़दीकी रिश्तेदार हो, (15)
या सख़्त ग़रीबी के मारे हुए आदमी को जो धूल में पड़े होते हैं (और बेघर हैं), (16)
और वह उन लोगों में से एक हो जो ईमान रखता हो, और एक दूसरे को धीरज से क़दम जमाए रखने पर ज़ोर देता हो, और आपस में दया-भाव रखने [compassion] की नसीहत करता हो। (17)
तो जो लोग ऐसा करते हैं, वे दाहिने तरफ़वाले [अच्छी क़िस्मतवाले और माफ़ किये गये] हैं, (18)
मगर जिन लोगों ने हमारी आयतों पर विश्वास करने से इंकार किया, वे बायीं तरफ़वाले [बदक़िस्मत और पापी] हैं, (19)
और आग उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी और उन्हें (उसी में) बंद कर दिया जाएगा! (20)
नोट:
2: अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्ल.) की मक्का में मौजूदगी के कारण अल्लाह ने इस शहर की क़सम खाकर इसकी इज़्ज़त और बढ़ा दी। एक मतलब यह भी बताया गया है कि अल्लाह के रसूल अपने मन के मुताबिक़ यहाँ कोई भी कार्रवाई करने के लिए आज़ाद थे।
3: बाप का मतलब यहाँ पर हज़रत आदम (अलै) हैं, और चूँकि सारे इंसान उन्हीं की औलाद हैं, इसलिए यहाँ सारे इंसानों की क़सम खायी गई है। एक मतलब बाप का हज़रत इस्माईल (अलै) भी बताया जाता है, क्योंकि अरब के लोग इन्हीं की औलाद माने जाते हैं।
4: चाहे बड़ा आदमी हो या छोटा, सभी इंसान किसी न किसी कष्ट में हमेशा फँसा रहता है। पूर्ण राहत तो जन्नत की ज़िंदगी में ही हो सकती है, जिसे पाने के लिए दुनिया में कष्ट झेलना ज़रूरी है। मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों को इस आयत में तसल्ली दी गई है। मक्का जिसे अल्लाह ने सबसे पवित्र जगह बनाया, और उसमें मुहम्मद (सल्ल) जैसी हस्ती रहती थी, इसके बावजूद उन्हें और उनके साथियों को कितनी तकलीफ़ें झेलनी पड़ रही थी।
6: मक्का में सच्चाई पर विश्वास न करने पर अड़े कई ऐसे (काफ़िर) लोग थे जिन्हें अपनी शारीरिक ताक़त पर बड़ा घमंड था। साथ ही वे बेकार चीज़ों पर ख़र्च करते थे और आपस में दिखावे के लिए बड़े घमंड से कहते थे कि उन्होंने ढेरों माल उड़ा डाले हैं।
11: अच्छे व नेक काम करने के लिए जो अपने मन की इच्छाओं से संघर्ष करना पड़ता है, और जो कठिनाई झेलनी पड़ती है, उसे यहाँ पर 'खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रना' कहा गया है।
18: दायीं तरफ़वाले: देखें 56:8; 27:40, 90-91 ..... बायीं तरफ़वाले : देखें 56:9, 41-56, 92-94
उप समूह “ख”:
सूरह 87: अल-आला
[सबसे ऊँचा / The
Most High]
यह एक मक्की सूरह है जिसके शुरू में ही कहा गया है कि अल्लाह की महानता का गुणगान करो। रसूल को यह आश्वासन दिया गया है कि अल्लाह उनकी ज़रूर मदद करेगा और उन्हें बिना चिंता किए अपने मिशन में लगे रहना चाहिए। यह दुनिया थोड़े समय के लिए ही है और इसे हरी-भरी वनस्पतियों से समझाया गया है कि थोड़े समय के बात हरियाली ख़त्म हो जाती है (आयत 4-5).
विषय:
01-13: अल्लाह क़ुरआन का पढ़ना और उस पर चलना आसान कर देगा
14-19: आने वाली [आख़िरत] ज़िंदगी इस जीवन से कहीं अच्छी है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल], अपने रब के नाम की बड़ाई बयान करें जो सबसे ऊँचा है, (1)
जिसने (हर चीज़ को, ठीक जैसी ज़रूरत थी) सही अनुपात [due proportion] में पैदा किया; (2)
और जिसने (हर एक चीज़ के लिए) क़ानून ठहरा दिया, और फिर (इसे अपने-अपने सिस्टम के अनुसार रहने और चलने का) रास्ता भी बता दिया; (3)
और जिसने (धरती से) हरा-हरा चारा [Green pastures] उगाया (4)
फिर उसे सूखा काला कूड़ा बना दिया। (5)
[ए रसूल!], हम आपको (इस तरह से क़ुरआन) पढ़ाएँगे कि आप (कभी) नहीं भूलेंगे ----- (6)
जब तक अल्लाह न चाहे; सचमुच वह उन चीज़ों को भी जानता है जो सबके सामने हैं, और उन्हें भी जो छुपी हुई हैं ------- (7)
और हम आपको आसान तरीक़ा बता देंगे। (8)
इसलिए आप नसीहत देते रहिए, अगर (सुनने वालों को) इस नसीहत [Reminding] से लाभ हो ------ (9)
लेकिन नसीहत तो वही क़बूल [स्वीकार] करेगा जिसके दिल में अल्लाह का डर होगा, (10)
मगर जो बेहद बदमाश आदमी [wicked person] होगा, वह इस (नसीहत) पर कोई ध्यान नहीं देगा, (11)
जो (क़यामत के दिन) सबसे बड़ी आग में प्रवेश करेगा, (12)
जहाँ न तो वह मर सकेगा और न जी सकेगा। (13)
बेशक वही कामयाब हुआ जिसने (पाप की गंदगियों से) अपने को साफ़ रखा, (14)
और अपने रब के नाम को याद करता रहा और (पाबंदी से) नमाज़ पढ़ता रहा। (15)
लेकिन इसके बावजूद, तुम [लोग] (अल्लाह से लगाव बढ़ाने के बजाए) सांसारिक जीवन (के आनंद) को अपना लेते हो, (16)
हालाँकि आख़िरत [परलोक/ hereafter] (की राहत और वहाँ का आनंद) बेहतर और हमेशा बाक़ी रहने वाला है। (17)
बेशक यह (शिक्षा) पहले की किताबों [Scriptures] में (भी लिखी हुई मौजूद) हैं, (18)
(जो) इबराहीम [Abraham]
और मूसा [Moses]
की किताबें [scriptures] हैं। (19)
नोट:
5: इस दुनिया में अल्लाह ने हर चीज़ ऐसी बनायी है कि कुछ अवधि अपनी बहार दिखाने के बाद उसकी सूरत बिगड़ जाती है और फिर उसका अंत हो जाता है।
7: मुहम्मद (सल्ल.) को इस बात की चिंता होती थी कि कहीं वह क़ुरआन का कुछ हिस्सा भूल न जाएं। इस आयत में अल्लाह ने आपको आश्वस्त किया है कि वह आपको भूलने नहीं देंगे। हाँ, अल्लाह ख़ुद ही अपने किसी पहले वाले हुक्म को अगर रद्द करना चाहे, तो आपको इजाज़त थी कि आप चाहेंं, तो उसे भूल जाएं। देखें सूरह बक़रा (2: 106)
8: या हम आपके लिए चीज़ों को आसान कर देंगे, यह क़ुरआन को पढ़कर सुनाने के बारे में है।
14: अपने आपको साफ़ रखने का तरीक़ा यह है कि ज़्यादा से ज़्यादा दान देकर ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद की जाए।
सूरह 96: अल-अलक़
[सटे हुए ख़ून का लोथड़ा, The Clinging Form]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें आयत 2 में एक शब्द "अलक़" आया है जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा है। क़ुरआन जब पहली बार पढ़कर फ़रिश्ते जिबरील ने मुहम्मद साहब को सुनाया था और उन्हें पढ़ने को कहा था, वह इसी सूरह की पहली पाँच आयतें थीं। इस सूरह का दूसरा हिस्सा थोड़ा बाद में उतरा था जिसमें यह बताया गया है कि आदमी जब आत्म-संतुष्ट या ख़ुदपसंद [self-satisfied] बन जाता है, तो वह सही रास्ते से भटक जाता है (जो कि अबु जहल नाम के आदमी की मिसाल से स्पष्ट है)।
विषय:
01-05: पहली वही: पढ़िए !
06-08:
इंसान बुराइयों की हदें तोड़ डालता है
09-19:
एक विरोधी जिसने रसूल को बुरा-भला कहा और धमकी दी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] पढ़िए! अपने रब का नाम लेकर जिसने (हर चीज़ को) पैदा किया: (1)
उसने पैदा किया इंसान को (माँ के पेट में जोंक की तरह) सटे हुए ख़ून के लोथड़े से। (2)
पढ़िए! कि आपका रब सबसे अधिक करम करने वाला [Bountiful] है (3)
जिसने क़लम के सहारे (लिखने पढ़ने का) ज्ञान सिखाया, (4)
जिसने इंसान को वह (कुछ) सिखा दिया जो वह नहीं जानता था। (5)
(लेकिन) सच्चाई यह है कि इंसान (बुराइयों की) सभी हदों को तोड़ डालता है (6)
क्योंकि उसने अपने आपको (दुनिया में) आज़ाद समझ लिया है जो किसी पर निर्भर नहीं है: (7)
[ऐ रसूल], सबको आपके रब के ही पास लौटकर जाना है। (8)
क्या आपने उस आदमी को देखा जो रोकता है, (9)
(हमारे) बंदे को जब वह नमाज़ पढ़ता है? (10)
भला देखिए अगर वह (नमाज़ पढ़नेवाला) सीधे मार्ग पर हो, (11)
या वह (लोगों को) बुराइयों से बचने व नेक काम करने को प्रोत्साहित करता हो (तो क्या ऐसे आदमी को रोकना उचित है)? (12)
अब बताइए! अगर वह (रोकनेवाला) सच्चे धर्म को मानने से इंकार करता हो, और उससे मुँह मोड़ता हो? (13)
क्या वह नहीं समझता कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है? (14)
ख़बरदार! अगर उसने अपने आपको (रसूल की बेइज़्ज़ती और सच्चे धर्म से दुश्मनी करने से) नहीं रोका, तो हम ज़रूर (उसे नरक में) माथे के बाल पकड़कर घसीटेंगे----- (15)
वह माथे जो झूठे (और) गुनाहगार हैं। (16)
अब वह अपने साथियों को (सहायता के लिए) बुला ले; (17)
हम भी नरक के रक्षकों को बुला लेंगे। (18)
हरगिज़ नहीं! आप [ऐ रसूल] उसकी बात न मानें: सज्दे में सर झुकाते रहें और (हमसे ज़्यादा) क़रीब होते जाएं। (19)
नोट:
1: मुहम्मद (सल्ल) पर सबसे पहली बार जो अल्लाह का संदेश उतरा जब आप “हिरा” नामक गुफा में थे, वह इसी सूरह की पहली पाँच आयतें हैं। इस घटना से पहले आप कई कई दिन इस गुफा में जाकर सोच-विचार किया करते थे, एक दिन इसी दौरान हज़रत जिबरील, जो अल्लाह के फ़रिश्ते थे, आपके पास आए, और आपको ज़ोर से दबाकर कहा, “पढ़ें!”, आपने जवाब दिया, “मैं तो पढ़ा हुआ नहीं हूँ”, यह संवाद तीन बार उनके बीच हुआ, फिर हज़रत जिबरील ने ये पाँच आयतें पढ़ीं।
5: पढ़ाने या सिखाने का आम तरीक़ा यही है कि क़लम से लिखी हुई चीज़ पढ़वायी जाती है, लेकिन अल्लाह चाहे तो इसके बिना भी किसी को ज्ञान दे सकता है। मुहम्मद साहब जो कि पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी अल्लाह ने उन्हें ऐसा ज्ञान व समझ-बूझ दी जो किताब से पढ़ने वाले सोच भी नहीं सकते।
6: आयत 6 से 19 तक गुफा में घटी घटना के काफ़ी बाद मॆं उतरी थी। आगे जिस घटना के बारे में इशारा किया गया है, वह यूँ हुआ था कि एक दिन अबु जहल जो कि मुहम्मद साहब का घोर विरोधी था, उसने आपको काबा के परिसर में नमाज़ पढ़ते हुए देखा तो ऐसा करने से मना किया। उसने यह भी कहा कि अगर आपने यहाँ नमाज़ पढ़ी, तो आपकी गर्दन को पाँव से कुचल देगा। इसी मौक़े पर ऊपर की आयतें उतरी थीं।
7: अपनी धन-दौलत और क़ुरैश की सरदारी के कारण वह अपने आपको आज़ाद समझने लगा जो अपनी ज़रूरतों के लिए किसी पर निर्भर न था। उसे लगता था कि कोई उसे किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। मगर अल्लाह कहता है कि सबको अंत में लौटकर मेरे ही पास आना है।
18: शुरु में जब अबु जहल ने मुहम्मद साहब को नमाज़ के लिए रोका, तो आपने उसे ज़ोर से झिड़क दिया था। इस पर अबु जहल ने यह कहा था कि मक्का में मेरी मजलिस में बहुत बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं, वे सब मेरे साथ हैं। इसके जवाब में कहा गया है कि अगर वह आपको तकलीफ़ पहुँचाने के लिए अपनी मजलिस वालों को बुलाएगा, तो हम भी जहन्नम के फ़रिश्तों को बुला लेंगे।
उप समूह “ग”:
सूरह 82: अल-इंफ़ितार
[चीरकर अलग कर देना / Torn Apart]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें आदमी की नाशुक्री और उसका इस सच्चाई को मानने से इंकार करना कि एक दिन क़यामत का आना निश्चित है, इन दोनों विषयों पर चर्चा की गई है। यहाँ भी सूरह के शुरू में क़यामत के दिन की घटनाओं को बड़े ही प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया गया है, और इस सूरह का नाम भी इसी बयान से लिया गया है।
विषय:
01-05: क़यामत का दिन
06-16: कर्मों का फ़ैसला ज़रूर होगा
17-19: फ़ैसले का दिन क्या है, जान लें
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आसमान चीरकर अलग कर दिया जाएगा, (1)
जब तारे (और ग्रह) गिरकर बिखर जाएंगे, (2)
जब समुंदर भड़क उठेंगे (और अपने किनारे तोड़ डालेंगे), (3)
जब क़ब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे): (4)
तो हर आदमी जान लेगा कि क्या (अच्छा/बुरा कर्म) उसने (दुनिया में) किया है, और क्या (कर्म) छोड़ आया है जो वह नहीं कर सका। (5)
ऐ इंसान! तुझे किस चीज़ ने अपने रहम करनेवाले रब [रहमान] के बारे में धोखे में डाल रखा है? (6)
जिसने तुझे पैदा किया, फिर उसने तुझे (ढाँचा और अंग बनाने के लिए) ठीक-ठाक किया, फिर तेरी संरचना को सही अनुपात दिया, (7)
जिस रूप में भी चाहा, उसने तुझे जोड़कर तैयार कर दिया। (8)
फिर भी तुम उस फ़ैसले के दिन को अभी तक झूठ जानते हो! (9)
हालांकि तुम पर निगरानी रखने वाले [फ़रिश्ते] निर्धारित हैं, (10)
(जो) बहुत सम्मानित हैं, (तुम्हारे कर्मों का लेखा-जोखा) लिखते रहते हैं, (11)
वह उन (सभी कार्यों) को जानते हैं जो तुम करते हो: (12)
अच्छा कर्म करने वाले (जन्नत की) नेमतों में आनंद से होंगे, (13)
और बुरे कर्मवाले जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में जलेंगे। (14)
वे इसमें फैसले के दिन [क़यामत] दाख़िल होंगे, (15)
और वे इस (नरक) से (कभी भी) भाग नहीं सकेंगे। (16)
और आपने क्या समझा कि वह फ़ैसले का दिन क्या है? (17)
हाँ! आपको क्या मालूम कि फ़ैसले का दिन क्या है? (18)
(यह) वह दिन होगा जब कोई भी जान किसी दूसरे के लिए कुछ भी नहीं कर सकेगी; और उस दिन (हर) आदेश, अल्लाह का ही चलेगा। (19)
नोट:
5: जो कर्म दुनिया में करके (आख़िरत/परलोक के लिए) आगे भेजा है, और वैसे कर्म जो कि दुनिया में करने चाहिए थे, मगर नहीं कर सका, वह पीछे छोड़ आया है।
6: यानी लोग अभी भी इसी धोखे में हैं कि उन्हें मरने के बाद हिसाब-किताब के लिए दोबारा ज़िंदा नहीं किया जाएगा!
सूरह 81: अत-तकवीर
[अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें इस सच्चाई पर ज़ोर दिया गया है कि फ़ैसले के दिन लोगों को अपने कर्मों के नतीजे के साथ जूझना पड़ेगा, साथ में क़ुरआन की सच्चाई पर और लोगों को सही रास्ते की तरफ़ बुलाने पर भी ज़ोर डाला गया है। इस सूरह की शुरुआत में क़यामत के दिन की भयानक घटनाओं को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया गया है, और सूरह का नाम इसी विवरण से लिया गया है। अंत में बताया गया है कि क़ुरआन सचमुच अल्लाह के उतारे हुए शब्द हैं, और रसूल कोई दीवाने नहीं हैं, जैसा कि बुतपरस्तों का दावा है।
विषय:
01-14: क़यामत का दिन
15-29: रसूल का फ़रिश्ते को देखना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब सूरज लपेटकर अँधेरा कर दिया जाएगा, (1)
जब सितारे मद्धिम पड़ जाएंगे (और टूट-टूटकर गिर पड़ेंगे), (2)
जब पहाड़ (धूल बनाकर वातावरण में) चला दिए जाएंगे, (3)
जब (दस महीने की) गर्भवती ऊँटनियाँ बेकार मारी फिरेंगी (क़ीमती होते हुए भी कोई उनको पूछनेवाला न होगा), (4)
जब जंगली जानवर (डरके मारे बदहवास हो जाएंगे और फिर अल्लाह के सामने) इकट्ठा कर दिए जाएंगे, (5)
जब समंदर उबल पड़ेंगे (और अपनी हदें तोड़ देंगे), (6)
जब आत्माओं को (बुरे और अच्छे लोगों के) जोड़े में अलग-अलग छाँटकर रखा जाएगा, (7)
जब ज़िंदा गाड़ दी गयी लड़की से पूछा जाएगा (8)
कि वह किस गुनाह के कारण मार दी गई थी, (9)
जब कर्मों के बही-खाते (record of deeds) खोल दिए जाएंगे,
(10)
जब आसमान से पर्दा हटा दिया जाएगा, (11)
और जब जहन्नम (की आग) भड़कायी जाएगी (12)
और जब जन्नत नज़दीक कर दी जाएगी: (13)
(लोगो! तुम में से) हर आदमी जान लेगा जो कुछ (कर्मों का लेखा जोखा) वह लेकर आया है। (14)
तो मैं कसम खाता हूँ उन [ग्रहों/Planets] की, जो (अपने नियत पथ पर चलते हुए) दूर चले जाते हैं, (15)
जो (एक ख़ास गति से) चलते रहते हैं, और (फिर कभी इतने दूर चले जाते हैं कि नज़रों से) ओझल हो जाते हैं, (16)
और रात की क़सम जब उसका अंधेरापन जाने लगे,
(17)
और सुबह की क़सम जब (हल्की सी रौशनी में) वह साँस ले: (18)
यह [कुरआन] संदेश लानेवाले बड़े सम्मानीय फरिश्ते [जिबरईल/ Gabriel] द्वारा (पढ़ी हुई) वाणी [speech] है,
(19)
जो बड़ी ताक़त रखता है, और सिंहासन के मालिक [अल्लाह] के यहाँ उसका बड़ा सम्मान और रूतबा है ------ (20)
(साथी फरिश्तों में) उसका आदेश माना जाता है, और वह (अल्लाह के नज़दीक) बहुत भरोसे के लायक़ [trustworthy] है। (21)
और (ऐ मक्का के लोगो!) तुम्हारे साथी [मुहम्मद], कोई दीवाने नहीं हैं: (22)
उन्होंने सचमुच उस (जिबरईल नामी) फरिश्ते को साफ-खुले हुए आसमान के किनारे (क्षितिज/ horizon) पर देखा था। (23)
और (जो भी संदेश 'वही' [Revelation] के द्वारा भेजा जाता है), वह [मुहम्मद] उन चीज़ों को बताने में कोई कमी नहीं करते हैं (और न किसी बात को अपने तक छुपाकर रखते हैं)। (24)
(याद रहे), यह [कुरआन] किसी दुत्कारे हुए शैतान की लायी हुई बात (वाणी) नहीं है। (25)
फिर तुम (लोग इतनी बड़ी चीज़ को छोड़कर) कहाँ चले जा रहे हो? (26)
यह [कुरआन] तो सारे लोगों के लिए एक संदेश है; (27)
हर उस आदमी के लिए जो सीधी राह चलना चाहता हो। (28)
मगर तुम ऐसा तभी चाहोगे, जब अल्लाह की मर्ज़ी हो, जो सारे जहाँनों का रब है। (29)
नोट:
1: आयत 1 से लेकर 14 तक क़यामत और परलोक [आख़िरत/ Hereafter] के हालात का बयान है।
4: ऊंटनी उस समय के अरब के लोगों के लिए सबसे बड़ी दौलत समझी जाती थी, और अगर दस महीने की गर्भवती हो, तो उसे और भी क़ीमती समझा जाता था।
7: यानी एक प्रकार के लोग एक जगह जमा कर दिए जाएंगे, जैसे ईमान रखनेवाले एक जगह और काफ़िर एक जगह, अच्छे लोग एक जगह और बुरे लोग एक जगह।
9: इस्लाम आने से पहले अरब में कुछ कबीले ऐसे थे जिसमें बेटी पैदा होती तो उसे शर्म के मारे लोग जिंदा जमीन में गाड़ देते थे (देखें 16:58-59; 6: 137, 140, 151; 17:31; 60:12). क़यामत में उस बच्ची को लाकर पूछा जाएगा कि तुम्हें किस जुर्म में मार दिया गया था? इसका मकसद उन ज़ालिमों को सज़ा देना है जिन्होंने उस बच्ची के साथ ऐसा किया था।
15: यहाँ अल्लाह ने कई चीज़ों की क़सम खाई है। ऐसी क़समों के लिए देखें 56:75; 69:38-39; 75:1-2; 84:16-18; 90:1,3)
18: सुबह सवेरे आमतौर से हल्की हल्की हवा चलती है, जिसके चलने को "सुबह के सांस लेने" से उपमा दी गई है।
20: फ़रिश्ता "जिबरील" के बारे में है कि वह बहुत ताक़त रखता है। देखें 53:6
23: कहा जाता है एक बार मुहम्मद साहब ने जिबरील फरिश्ते को क्षितिज पर अपने असली रूप में देखा था, शायद इस आयत में उसी की तरफ इशारा है। इसका वर्णन सूरह नजम (53: 7) में भी आया है।
22: तुम्हारे "साथी" यानी मुहम्मद (सल्ल) कोई "मजनूँ" नहीं हैं। अरबी में 'मजनूँ' उसको कहते हैं जिस पर जिन्न सवार हो जाता है। (देखें 7:184)
24: इस्लाम आने से पहले (जाहिलियत के) ज़माने में जो लोग "काहिन" कहलाते थे, वे भी आसमानी बातें बताने का दावा करते थे, और शैतानों से दोस्ती करके उनसे कुछ झूठी-सच्ची बातें सुन लिया करते थे, लेकिन जब लोग उनसे पूछते तो वे बिना फ़ीस लिए कुछ भी बताने से मना कर देते थे। यहाँ काफ़िरों से कहा जा रहा है कि तुम मुहम्मद साहब को "काहिन" कहते हो, मगर वह तो सारी सच्ची आसमानी बातें बिना किसी पैसे के बताने में कभी कंजूसी नहीं करते हैं।
सूरह 84: अल-इंशिक़ाक़
[फट पड़ना / Ripped Apart]
यह एक मक्की सूरह है जिससे रसूल और उनके अनुयायियों के दिल मज़बूत हुए जब यह पता चला कि जिन लोगों ने पहले के ईमानवालों के साथ बहुत ज़ुल्म किया था, उनका कैसा बुरा अंजाम होने वाला है। कहा जाता है कि सन 523-24 ई. में नजरान (यमन और अरब की सरहद पर स्थित) के ईसाइयों के साथ बुतपरस्तों (या यहूदियों) ने बड़ा ज़ुल्म किया था और उन्हें आग की खायी में फेंक दिया था। उन ज़ालिमों की सज़ा यह होगी कि जहन्नम की आग में जलाए जाएंगे। इस सूरह का नाम अल्लाह की ताक़त को दर्शाता है जो सारे ब्रह्मांड पर छायी हुई है, आसमान के तारों से लेकर शैतानी करनेवालों तक जिनका हवाला इस सूरह में आया है। सचमुच इस पूरी सूरह में देखा जाए तो अल्लाह की बेपनाह ताक़त का ज़िक्र है जो हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है।
विषय:
01-06: क़यामत का दिन
07-15: कर्मों का हिसाब-किताब
16-19: आदमी का एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक बढ़ना
20-25: क़ुरआन को ठुकरा देने वालों को चेतावनी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आसमान फट पड़ेगा, (1)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (आसमान) के लिए ज़रूरी होगा, (2)
जब ज़मीन (खींच करके) फैला दी जाएगी, (3)
तो जो कुछ उसके अंदर है उसे बाहर फेंक देगी, और ख़ाली हो जाएगी, (4)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (ज़मीन) के लिए ज़रूरी होगा, (5)
ऐ इंसान! तू अपने रब तक पहुंचने में (ज़िंदगी भर) भारी मेहनत करता रहा, अंतत: तू उस (रब) से जा मिलेगा: (6)
तो जिस आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, (7)
तो उससे आसान-सा हिसाब लिया जाएगा (8)
और वह अपने घरवालों के पास खुशी-खुशी लौटेगा। (9)
मगर जिस किसी को उसका लेखा-जोखा उसकी पीठ के पीछे से (बायें हाथ में) दिया जाएगा, (10)
तो वह अपनी बर्बादी को पुकार उठेगा ------ (11)
वह जहन्न्म की भड़कती हुई आग में जलेगा। (12)
वह (दुनिया में) अपने परिवार के साथ हँसी-ख़ुशी रहा करता था। (13)
उसको ऐसा लगता था कि (अल्लाह के सामने) वह कभी लौटकर नहीं जाएगा ---- (14)
सचमुच! (वह ज़रूर लौटेगा!) उसका रब उसको देख रहा था। (15)
मुझे क़सम है सूरज डूबने के समय की लाली की, (16)
क़सम है रात की, और उन चीजों की जिन्हें वह ढक लेती है, (17)
और क़सम है चाँद की, जब वह (बढ़ते-बढ़ते) पूरा दिखाई देता है, (18)
तुम (जीवन के) एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक [बचपन, जवानी, अधेड़ उम्र, बुढ़ापा] इसी तरह से बढ़ते जाओगे। (19)
तो वे (सच्चाई पर) विश्वास क्यों नहीं करते? (20)
जब उनके सामने कुरआन पढ़ी जाती है, तो वे (अल्लाह के सामने) सज्दे में क्यों नहीं झुक जाते? (21)
नहीं! बल्कि विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग क़ुरआन को ठुकरा देते हैं ---- (22)
अल्लाह बेहतर जानता है जो कुछ इन लोगों ने अपने अंदर छिपा रखा है---- (23)
सो आप उन्हें दर्दनाक यातना की ख़ुशख़बरी सुना दें। (24)
मगर जो लोग विश्वास रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, तो उनके लिए कभी ख़त्म न होने वाला इनाम [reward] होगा। (25)
नोट:
1: क़यामत का बयान है।
3: बताया जाता है कि क़यामत में ज़मीन को रबर की तरह खींचकर बड़ा कर दिया जाएगा, ताकि उसमें सभी अगले-पिछले लोग समा सकें।
4: ज़मीन के भीतर जो कुछ है, यानी मरे पड़े लोग और जो खनिज-पदार्थ हैं, सब बाहर निकाल दिए जाएंगे।
6: जो अच्छे कर्म करनेवाले हैं, वे अल्लाह के हुक्म को मानने में मेहनत करते रहते हैं, और जो दुनिया की मुहब्बत रखते हैं, वे भी दुनिया के लाभ हासिल करने के लिए मेहनत करते रहते हैं। आख़िर में सबको अल्लाह के पास ही पहुँचना है।
10: सूरह अल-हाक़्क़ा (69: 25) में कहा गया है कि बुरे लोगों को उनके कर्मों का लेखा-जोखा बायें हाथ में दिया जाएगा। यहाँ बताया गया है कि बायें हाथ में पीछे की तरफ़ से दिया जाएगा।
17: सूरज डूबने के समय की लाली, रात और चांद की कसम खाई गई है। ये सारी चीजें अल्लाह के हुक्म के अनुसार एक हालत से दूसरी हालत में बदलती रहती हैं, उनकी कसम खाकर यह कहा गया है कि इंसान भी एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल तक सफ़र करता रहेगा, यहाँ तक कि अल्लाह से जा मिलेगा।
19: इंसान अपने जीवन में विभिन्न चरणों से गुज़रता है। इसके अलावा उसकी सोच में भी बराबर बदलाव आता रहता है।
23: एक मतलब तो यह हो सकता है कि वे जो भी कर्म करके जमा कर रहे हैं, उन्हें अल्लाह जानता है। दूसरा मतलब यह भी हो सकता है कि उन्होंने अपने दिलों में जो बातें छुपा रखी हैं, उन्हें भी अल्लाह अच्छी तरह जानता है।
सूरह 86: अत-तारिक़
[रात को (नज़र) आनेवाला / The Night-Comer]
यह एक मक्की सूरह है। इसमें क़सम खाकर कहा गया है कि जो कुछ भी आदमी करता है, उसको फ़रिश्ते लिख लेते हैं, और यह कि मरे हुए लोगों को दोबारा ज़िंदा उठाना, उन्हें पहली बार पैदा करने से ज़्यादा आसान है। हमारे सामने आने वाली बहुत सारी चीज़ों की मिसाल देकर ध्यान दिलाया गया है:
तेज़ चमकता हुआ तारा, उछलकर निकल जानेवाला वीर्य, कोख से बच्चे का बाहर निकल आना या धरती फाड़कर पौधों का बाहर निकलना। यह सारी मिसालें इसलिए दी गई हैं ताकि लोग समझ सकें कि मरे-पड़े लोग कैसे अपनी क़ब्रों को फाड़कर बाहर निकल आएंगे। एक और क़सम खाकर कहा गया है कि क़ुरआन एक फैसला कर देने वाला संदेश है, और जो अल्लाह के ख़िलाफ़ साज़िश करे तो उसे कड़ी चेतावनी दी गई है।
विषय:
01-10: हर आदमी को परखा जाएगा
11-14: क़ुरआन का संदेश कोई हँसी-मज़ाक़ की चीज़ नहीं
15-17: विश्वास न करने वालों को थोड़ी सी ढील दे दें
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमान (पर फैले हुए अंतरिक्ष) की क़सम, और रात को (नज़र) आने वाले की क़सम ----- (1)
और आपको क्या मालूम कि रात को (नज़र) आने वाला क्या है? (2)
चमकता हुआ तारा (जो आसमान के अँधेरे को मिटा देता है) ---- (3)
कि कोई जान ऐसी नहीं जिस पर एक निगरानी करनेवाला [watcher] (नियुक्त) नहीं है। (4)
इसलिए आदमी को सोच-विचार करना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा किया गया था? (5)
वह ज़ोर से उछलते हुए पानी [शुक्राणु/sperm] से पैदा किया गया है, (6)
फिर वह (माँ की) पीठ और सीने की हड्डियों के बीच (कोख में) से गुज़रकर बाहर निकलता है: (7)
(जिस तरह माँ के कोख से निकलता है, उसी तरह क़ब्र से भी ज़िंदा निकलेगा!) बेशक वह [अल्लाह] इसे दोबारा पैदा करने में पूरी तरह समर्थ है। (8)
जिस दिन (दिलों में) छुपी बातें सामने आ जाएंगी (और उन्हें परखा जाएगा), (9)
फिर आदमी के पास न (स्वयं) कोई ताक़त होगी, और न कोई (उसको) मदद करने वाला होगा। (10)
क़सम है आसमान की और उससे बार-बार होने वाली (मौसमी) बारिश की, (11)
और ज़मीन की क़सम है जो फट जाती है (और उसमें से पौधे निकल आते हैं, उसी तरह क़यामत के दिन, आदमी ज़मीन फाड़कर बाहर निकल आएगा)। (12)
यह सचमुच एक निर्णायक [decisive]
फ़रमान है (जो होकर रहेगा);
(13)
यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे (हँसी-मज़ाक़ के तौर पर) हल्के में लिया जाए। (14)
वे [काफ़िर लोग] अपनी योजना बनाने और चाल चलने में लगे हुए हैं, (15)
मगर मैं भी अपनी तदबीर [strategy]
में लगा हूँ: (16)
इसलिए [ऐ रसूल], आप विश्वास न करनेवालों को ढील दे दीजिए, उन्हें थोड़ी सी ढील (और) दे दीजिए। (17)
नोट:
1: "तारिक़" यानी चमकते हुए तारे की क़सम खाकर कहा गया है कि कोई इंसान ऐसा नहीं है जिसपर कोई निगरानी करने वाला नियुक्त न हो। तारे की क़सम का मक़सद शायद यह मालूम होता है कि जिस प्रकार तारे आसमान पर दुनिया की हर जगह से नज़र आते हैं, और दुनिया की हर चीज़ उनके सामने होती है, उसी तरह अल्लाह ख़ुद भी इंसान के हर काम पर नज़र रखता है और उसके फरिश्ते भी इस काम के लिए नियुक्त हैं।
2: यहाँ बारिश और ज़मीन के फट पड़ने की क़सम खाने का मक़सद शायद यह लगता है कि बारिश के पानी से वही ज़मीन फ़ायदा उठाती है जिसमेंं उगने की सलाहियत हो। इसी तरह क़ुरआन से भी वही फ़ायदा उठाता है जिसके दिल में सच्चाई को मान लेने की चाहत हो।
एक नन्हे से पौधे की कोंपल इतनी भारी ज़मीन को फाड़कर जिस तरह बाहर निकल आती है, वह अल्लाह की क़ुदरत पर विश्वावास कर लेने के लिए काफ़ी होना चाहिए (देखें 80:26).
3: क़ुरआन को "निर्णायक फ़रमान" कहा गया है।
17: देखें 73:11
सूरह 85: अल-बुरूज
[तारों की राशियाँ /The Towering Constellations]
यह एक मक्की सूरह है जिससे रसूल और उनके अनुयायियों के दिल मज़बूत हुए जब यह पता चला कि जिन लोगों ने पहले के ईमानवालों के साथ बहुत ज़ुल्म किया था, उनका कैसा बुरा अंजाम होने वाला है। कहा जाता है कि सन 523-24 ई. में नजरान (यमन और अरब की सरहद पर स्थित) के ईसाइयों के साथ बुतपरस्तों (या यहूदियों) ने बड़ा ज़ुल्म किया था और उन्हें आग की खायी में फेंक दिया था। उन ज़ालिमों की सज़ा यह होगी कि जहन्नम की आग में जलाए जाएंगे। इस सूरह का नाम अल्लाह की ताक़त को दर्शाता है जो सारे ब्रह्मांड पर छायी हुई है, आसमान के तारों से लेकर शैतनी करनेवालों तक जिनका हवाला इस सूरह में आया है। सचमुच इस पूरी सूरह में देखा जाए तो अल्लाह की बेपनाह ताक़त का ज़िक्र है जो हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है।
विषय:
01-09: खाई खोदनेवाले
10-11: सज़ा और इनाम
12-16: अल्लाह की महानता
17-20: फ़िरऔन और समूद
1-22: यह गौरवशाली क़ुरआन है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
तारों की राशियों [Constellations] से भरे हुए आसमान की क़सम,
(1)
और उस [क़यामत के] दिन की क़सम जिसका वादा किया गया है,
(2)
क़सम है "गवाह" [अल्लाह] की और (लोगों के) उन (कर्मों) की, जिनके बारे में गवाही दी जाए, (3)
कि बर्बाद हो गए खाई (खोदने) वाले, (4)
(जिन्होंने) ईंधन झोंक-झोंककर आग (से भरी खाइयाँ) बनायी थीं! (5)
जब वे उस (खाई के) किनारों पर बैठे थे, (6)
उस (ज़ुल्म को) देखने के लिए जो कुछ वे ईमानवालों के साथ कर रहे थे (यानी उन्हें आग में फेंक-फेंककर जला रहे थे)। (7)
उन्हें उन (ईमानवालों) से बस एक ही शिकायत थी, और वह था अल्लाह पर उनका विश्वास [ईमान] रखना, वह [अल्लाह], जो बहुत ही ताक़तवाला और सारी तारीफ़ों के योग्य है,
(8)
जिसके नियंत्रण [control]
में आसमान और ज़मीन की (सारी) बादशाहत है: अल्लाह सारी चीज़ों पर गवाह है। (9)
जिन लोगों ने ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को यातनाएं दीं, और बाद में (गुनाहों से) तौबा [Repent] नहीं की, तो उनके लिए जहन्नम [नरक] की यातना है, और उनको (वहाँ) आग में जलाया जाएगा। (10)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं, उनके लिए (जन्नत के) बाग़ [Gardens] हैं, जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी: वह बहुत बड़ी कामयाबी है। (11)
[ऐ रसूल], आपके रब की सज़ा सचमुच बड़ी कठोर होती है---- (12)
वही है जो लोगों में पहली बार जान डालता है, और वही उन्हें दोबारा ज़िंदा करेगा ----
(13)
और वह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, (लोगों से) बहुत प्यार करनेवाला है। (14)
(समस्त दुनिया के) सिंहासन का मालिक [Lord of the Throne] है, बड़ी शानवाला है, (15)
वह जो कुछ भी करना चाहता है, उसे कर डालता है। (16)
क्या आपने उन लशकरों [Forces] की कहानियाँ नहीं सुनी हैं,
(17)
फ़िरऔन [Pharaoh] और समूद [Thamud]
(के लशकरों) की? (18)
इसके बावजूद विश्वास न करने वाले, (सच्चाई से) इंकार करने पर अड़े रहते हैं। (19)
जबकि अल्लाह ने उन सबको अपने घेरे में ले रखा है। (20)
(उनके न मानने से क्या होगा) यह सचमुच बहुत गौरवशाली [Glorious] क़ुरआन है, (21)
जो (अल्लाह के पास) संजोकर रखी हुई स्लेट [Preserved Tablet] पर (लिखी हुई) है। (22)
नोट:
3: एक अनुवाद यह भी हो सकता है कि क़सम है गवाह (यानी इंसान) की और उस (कयामत के दिन) की, जिस दिन इंसान अल्लाह के सामने हाज़िर हो जाएगा। एक और मतलब हो सकता है कि गवाह (मुहम्मद सल्ल) हैं, जो अल्लाह के सामने ईमानवालों के ईमान की गवाही देंगे।
4: "खाई खोदनेवाले" के बारे में पिछ्ले ज़माने की कई कहानियाँ बतायी जाती हैंं। कुछ लोग इसे यमन के एक यहूदी राजा ज़ु नुवास के काल की बताते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने नजरान के ईसाइयों को क़त्ल करवाया था। इन आयतों में एक घटना की तरफ इशारा है जो हदीस सही मुस्लिम में लिखी हुई एक घटना हो सकती है। पहले किसी जमाने में एक बादशाह था जो एक जादूगर से काम लिया करता था। जब वह जादूगर बूढ़ा हो गया तो उसने एक नैजवान लड़को को जादू सिखाना शुरु किया। लड़का जादूगर के पास जाने लगा, रास्ते में एक ईसाई भिक्षु की कुटिया पड़ती थी जहाँ वह आते-जाते बैठ जाता था। एक दिन वह जा रहा था तो रास्ते में एक बड़ा जानवर नजर आया जिसने लोगों का रास्ता रोक रखा था। लड़के ने एक पत्थर उठाया और अल्लाह से दुआ की, फिर उसके पत्थर मारते ही जानवर मर गया और लोगों का रास्ता खुल गया। लोगों को लगा कि उस लड़के में कोई खास ज्ञान है। एक अंधे आदमी के लिए उसने दुआ की और उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई। इन घटनाओं की जब बादशाह को खबर हुई तो उसने अंधे आदमी को, उस लड़के को और उस ईसाई भिक्षु को गिरफ्तार करवा लिया। और इन सबको कहने लगा कि तुम मुझे पूजने के बजाय अगर एक खुदा पर विश्वास करना नहीं छोड़ोगे, तो तुम्हें सजा दी जाएगी। जब वे तीनों नहीं माने, तो उसने अंधे आदमी और भिक्षु को मरवा डाला और लड़के के बारे में हुक्म दिया कि उसे किसी ऊंचे पहाड़ पर ले जाकर नीचे फेंक दिया जाए, लड़का बच गया, फिर उसे पानी में डुबा देने की कोशिश की गई मगर वह फिर भी बच गया। जब बादशाह परेशान हो गया तो उस लड़के ने कहा कि अगर मुझे सचमुच मारना चाहते हो, तो ऐसा करो कि सब लोगों को एक मैदान में जमा करके मुझे सूली पर चढ़ा दो और अपने तरकश से तीर निकालकर कमान में चढ़ाओ और कहो: "उस अल्लाह के नाम पर जो इस लड़के का पालनहार है, फिर तीर से मेरा निशाना लगाओ।" ऐसा ही किया गया और वह लड़का शहीद हो गया। लोगों ने जब यह घटना देखी, तो बहुत से लोग एक खुदा पर ईमान ले आए। इस मौके पर बादशाह ने उनको सजा देने के लिए सड़कों के किनारों पर खाइयाँ खुदवाकर उनमें आग भड़काई, और हुकुम दिया कि जो कोई मुझे ख़ुदा माने उसे छोड़ दो और जो कोई एक खुदा को मानने पर अड़ा रहे, उसे आग से भरी खाइयों में डाल दिया जाए। विश्वास रखने वालों की बड़ी संख्या को जिंदा जला दिया गया। यह घटना 523 ई. की मानी जाती है। कुछ लोग मानते हैं कि इस घटना में मरनेवाले लोग ईसाई नहीं, बल्कि मजूसी [Magians] थे। बहरहाल, वे जिस दीन के भी मानने वाले थे, यह आयत उन ईमान रखनेवालों पर हुए अत्याचार की निंदा करती है।
22: संजोकर रखी गई स्लेट/पट्टिका या "लौह ए महफ़ूज़" जिसे आम तौर से माना जाता है कि अल्लाह के पास रखी हुई 'मूल किताब' है (देखें 13:39; 43:4) या 'सुरक्षित किताब (56:78), जिससे न केवल क़ुरआन बल्कि सारी आसमानी किताबें यानी तौरात, इंजील, ज़बूर आदि इसी से निकली हैं।
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