Tuesday, January 9, 2018

Chronological Quran : 4th Year of Revelation/ क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : चौथे वर्ष में उतरी आयतें

Chronological Quran : 4th Year of Revelation
[Nov 1, 612 AD --- Oct 21, 613 AD] 

क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : चौथे वर्ष में उतरी आयतें
 [मुहर्रम 1, 10 हिजरी पूर्व----- ज़ुल हिज्जा 30, 10 हिजरी पूर्व]




सूरह 7 : अल अ'राफ़ [ऊँची जगह,The Heights]
 
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ साद॰ (1)
[ऐ रसूल!] यह एक किताब [क़ुरआन] है, जो आप पर उतारी गयी है, ताकि इसकी मदद से आप (लोगों को) चेतावनी दे सकें और ईमानवालों को (नसीहत की बातें) याद दिला सकें. तो देखें! ऐसा नहीं होना चाहिए कि इसके चलते आपका दिल बेचैन रहा करे. (2)
"(लोगो!) जो किताब तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उसी के पीछे चलो; अपने रब को छोड़कर (अपने बनाए हुए) दूसरे मालिकों के पीछे मत चलो. मगर (अफ़सोस!) तुम नसीहत पर बहुत कम ही ध्यान देते हो! (3)
कितनी ही बस्तियों को हमने (उनके कर्मों के चलते) बर्बाद कर दिया! उन पर हमारी यातना (अचानक ही) आ पहुँची, सोयी रात में, या दोपहर के वक़्त जबकि वे आराम कर रहे थे : (4)
फिर जब उनपर (सचमुच) यातना आ गयी, तो उनके पास कहने को कुछ न रहा, सिवाय इसके कि वे पुकार उठे, "हम सचमुच मुजरिम थे!" (5)
हम उन लोगों से अवश्य पूछ-गछ करेंगे जिनके पास रसूलों को भेजा गया था (कि उन्होंने रसूलों की बात मानी या नहीं)------ और हम उन रसूलों से भी ज़रूर पूछ-ताछ करेंगे (कि उन्होंने हमारे संदेशों को ठीक-ठीक पहुँचाया या नहीं)- ----- (6)
फिर जो कुछ भी उन लोगों ने किया होगा, वे सारी बातें हम उनके सामने बता देंगे, क्योंकि हमें तो इनकी पूरी जानकारी है, और (इन घटनाओं के समय) हम कहीं ग़ायब तो न थे. (7)
और उस दिन कर्मों के वज़न को सही-सही और इंसाफ के साथ तौला जाएगा : जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी निकला, तो वही हैं जो कामयाब हो गए, (8)
और जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा हल्का निकला, तो ये वही लोग होंगे जो हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते रहे, और नतीजे में अपने आपको घाटे में डाल बैठे. (9)
हमने तुम (लोगों) को ज़मीन में बसा दिया, और साथ में ज़िंदगी गुज़ारने के सारे सामान भी दे दिए-----(मगर) शायद ही कभी तुम शुक्र अदा करते हो! (10)
हमने तुम्हें [इंसान को] पैदा किया; तुम्हारी शक्ल सूरत बनायी, उसके बाद, हमने फ़रिश्तों से कहा, "(पहले इंसान), आदम [Adam] के आगे झुक जाओ", और सब (फरिश्ते) झुक गए. मगर इबलीस न झुका : वह झुकनेवालों में शामिल न था. (11)
अल्लाह ने कहा, "तुझे किस बात ने (आदम के सामने) झुकने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?", (इबलीस ने) कहा, "मैं उससे बेहतर हूँ : तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (12)
अल्लाह ने कहा, "उतर जा यहाँ से! यह [जन्नत] तुम्हारे घमंड करने की जगह नहीं है. निकल जा, दूर हो यहाँ से!, तू उनमें से हो गया जो अपमानित हुए!" (13)
मगर इबलीस ने कहा, "मुझे उस दिन तक (ज़िंदा रहने की) छूट दे दे, जिस दिन मरे हुए लोगों को ज़िंदा कर के दोबारा उठाया जाएगा।" (14) 
और अल्लाह ने जवाब दिया, "तुझे छूट दी गयी।" (15)
और फिर इबलीस ने कहा, "चूँकि तूने मुझे ग़लत राह पर लगा दिया है,  इसलिए अब मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उन सब लोगों की ताक में बैठूँगा :  (16)
मैं उन पर (चारों तरफ से) हमले करूँगा---- "उनके सामने से और उनके पीछे से भी, उनके दाएँ से और उनके बाएँ से भी----- और तू उनमें से अधिकतर को शुक्र अदा करनेवाला न पाएगा।" (17)
अल्लाह ने कहा, "निकल जा यहाँ से! बेइज़्ज़त और ठुकराया हुआ! मुझे क़सम है, कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सब से भर दूँगा जो तेरे पीछे चलेंगे।" (18) 
मगर "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी बीवी, दोनों (जन्नत के) बागों में रहो, और जहाँ से जो चीज़ चाहो, खाओ-पियो, लेकिन इस पेड़ के नज़दीक मत जाना, नहीं तो (याद रखो!) तुम भी ग़लती करनेवालों में से हो जाओगे।" (19)
फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए : उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा न हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या कहीं हमेशा की ज़िंदगी न हासिल हो जाए।" (20)
और उसने उनके सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (21)
उसने झूठी बातें बोल कर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से नहीं रोका था?, क्या मैंने तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (22)
उन दोनों ने जवाब दिया, "हमारे रब! हम अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं : अगर तूने हमें माफ़ न किया और हम पर दया न की, तो फिर हम बर्बाद हो जाएंगे।" (23)
अल्लाह ने कहा, "निकल जाओ यहाँ से तुम सब! तुम [शैतान और आदमी] एक-दूसरे के दुश्मन हो! अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी और जीवन-यापन के सामान होंगे----  मगर एक ख़ास अवधि तक।" (24)
और कहा, "वहीं (ज़मीन पर) तुम्हें जीना है, वहीं तुम्हें मरना होगा, और उसी से (मरने के बाद) तुम्हें दोबारा निकाला जाएगा।" (25)
ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हें कपड़ा दिया है ताकि तुम अपने नंगेपन को छिपा सको और यह तुम्हारे सजने-संवरने का साधन भी है; (मगर अपने भीतर की बुराई छिपाने के लिए) परहेज़ का कपड़ा सब कपड़ों में बेहतर है : यह अल्लाह की निशानियों में से है ताकि वे ध्यान दे सकें. (26)
ऐ आदम की सन्तान! देखो! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस तरह उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके कपड़े उतरवा दिए थे, ताकि उनकी नग्नता उनके सामने खोल दे : वह और उसका गिरोह उस जगह से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते : हमने शैतानी करनेवालों को उन लोगों का साथी व मददगार बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते. (27)
इसके बावजूद, जब ये लोग कोई अश्लील कर्म करते हैं, तो कहते है कि "हमने अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है", और, "अल्लाह ने हमें ऐसा करने का आदेश दिया है।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह कभी अश्लील बातों का आदेश नहीं दिया करता। तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कैसे कह सकते हो, जिसके (सच होने की) तुम्हें कोई जानकारी नहीं है?" (28)
कह दें, "मेरे रब ने नैतिक रूप से सही काम करने का आदेश दिया है. तुम जहाँ कहीं भी इबादत [पूजा[ करो, तो इबादत में तुम्हारा पूरा ध्यान उसी (रब) की तरफ़ होना चाहिए; अपने दीन [आस्था] को पूरी भक्ति के साथ उसी पर समर्पित करते हुए, उसे पुकारो। ठीक जैसे उसने तुम्हें शुरू में पैदा किया, वैसे ही तुम फिर से ज़िंदा कर के उठाए जाओगे।" (29)
(तुम में से) कुछ को उसने (सीधा) मार्ग दिखा दिया और कुछ की क़िस्मत में (इंकार व बुरे कर्मों के चलते) भटकना लिख दिया : उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना रखवाला बना लिया, और यह समझते रहे कि वे सीधे मार्ग पर हैं. (30)
ऐ आदम की सन्तान! जब कभी तुम इबादत किया करो, तो अच्छी तरह कपड़े पहना करो, और (हलाल चीज़ें) खाओ पियो, मगर (ख़र्च करने में) हद से आगे न बढ़ो : बिना सोचे-समझे, बेकार की चीज़ों में पैसे उड़ानेवालों को अल्लाह पसन्द नहीं करता. (31)
[ऐ रसूल!] आप कहें, "अल्लाह ने अपने बंदों के लिए जो सजने-सँवरने और खाने-पीने की चीज़ें दी हैं, उन्हें इस्तेमाल करने से किसने रोका है?" कह दें, "ईमान रखनेवालों के लिए भी इस दुनिया की ज़िंदगी में ये सब चीज़ें (जायज़)  हैं : (मगर) क़यामत के दिन ये चीज़ें केवल ईमानवालों के लिए ही होंगी।" तो (देखो!) किस तरह हम उन लोगों के लिए अपनी आयतों को साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से बताते हैं, जो बातों को समझते हैं। (32)
[ऐ रसूल!] आप कहें, "मेरा रब तो केवल अश्लील व बेशर्मी के कामों को करने से रोकता है------ चाहे वह खुले आम की जाएं या ढँके-छिपे की जाएं---- और गुनाह करने से, और बेवजह ज़्यादती करने से, और यह कि तुम किसी को अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराओ जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा और यह कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहो जिसकी तुम्हें कोई जानकारी न हो।" (33)
हर एक क़ौम के लोगों के लिए एक नियत समय तय किया हुआ है: वे न तो इसे समय से पहले ही ला सकते हैं, और न ही, समय आ जाने पर, वे इसे घड़ी भर के लिए भी टाल सकेंगे।  (34) 
ऐ आदम की सन्तान! अगर तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल बन कर आता है, और मेरी आयतें पढ़ कर सुनाता है, तो जिसने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आप को बुराइयों से बचाये रखा, और नेकी की ज़िन्दगी गुज़ारी, तो ऐसे लोगों को न कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (35) 
मगर जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, और अकड़ दिखाते हुए उनसे नफ़रत की, तो ऐसे ही लोग हैं जिनका घर (जहन्नम की) आग होगा, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। (36) 
उस आदमी से बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, और उसकी आयतों को मानने से इंकार करता हो? ऐसे लोगों की क़िस्मत में जितनी रोज़ी लिखी हुई है, उतनी (इस दुनिया में) उन्हें मिलती रहेगी, मगर उसके बाद, जब हमारे फ़रिश्ते उनकी जान वापस ले जाने के लिए आएँगे, तो कहेंगे, "कहाँ हैं वे [ख़ुदा] जिन्हें तुम अल्लाह के बजाए पुकारा करते थे?" वे लोग कहेंगे, "वे तो हमें छोड़ कर गुम हो गए हैं।" वे (अपने ही ख़िलाफ़ गवाही देते हुए) इस बात को मान लेंगे कि वे (सच्चाई में) विश्वास नहीं करते थे. (37)
अल्लाह कहेगा, "जाओ! तुम भी जिन्नों और इंसानों की उस भीड़ में शामिल हो जाओ जो तुम से पहले (जहन्नम की) आग में जा चुकी हैं।" हर समूह (जहन्नम में) घुसते समय अपने साथ के दूसरे समूहों को बुरा-भला कहते हुए घुसेगा, उसके बाद, जब अंदर में वे सब एक साथ जमा हो जाएंगे, तो उनमें से सबसे बाद में आनेवाला समूह, अपने पहले आनेवालों के बारे में कहेगा, "हमारे रब! इन्हीं लोगों ने हमें गुमराह कर दिया था : तू इन्हें आग की दुगनी सज़ा दे"----- अल्लाह कहेगा, "तुम में से हर एक के लिए दुगनी सज़ा है, हालाँकि  तुम इसे नहीं जानते"---- (38)
उनमें से पहले आनेवाले, आख़िर में आनेवालों से कहेंगे, "तुम भी हम से किसी मामले में अच्छे तो नहीं थे : (अपने कर्मों से) जो सज़ा तुम ने कमायी है, अब उसका मज़ा चखो!" (39)
यक़ीन रखो कि ऐसे लोगों के लिए आसमान के दरवाज़े कभी नहीं खोले जाएंगे, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया और अपनी अकड़ में उन्हें ठुकरा दिया ; उनका जन्नत में दाख़िल होना ऐसा ही है जैसे, ऊँट (या मोटी रस्सी) का सूई के नाके में से गुज़र जाना। मुजरिमों को हम इसी तरह उनके जुर्म की सज़ा देते हैं---- (40)
जहन्नम उनके लिए आराम करने की जगह होगी (जहाँ आग का बिस्तर होगा)  और उनके ऊपर परत दर परत, आग ही की चादर होगी-----शैतानी करनेवालों को हम ऐसी ही यातना देते हैं. (41)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए --- और (याद रहे कि) हम किसी जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना वह सह सके---- तो बस ऐसे ही लोग जन्नतवाले हैं और वहीं वे हमेशा रहेंगे। (42) 
हम उनके दिलों के अंदर पलनेवाली सारी बुरी भावनाओं को निकाल देंगे; उनके पैरों तले नहरें बह रही होंगी. वे कहेंगे, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें इस (ज़िंदगी का) रास्ता दिखाया : अगर अल्लाह ने हमें रास्ता न दिखाया होता, तो हम कभी भी सही रास्ता न खोज पाते। हमारे रब के रसूल सच्चाई का संदेश लेकर आए थे।" और फिर उन्हें एक आवाज़ सुनायी देगी, "यह है जन्नत, जो अब तुम्हारा अपना हो चुका है, उन अच्छे कर्मों के नतीजे में जो तुम करते रहे थे।" (43)
जन्नत के लोग (जहन्नम के) आगवालों को पुकार कर कहेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुम्हारे रब ने जो तुम से वादा कर रखा था, तुमने भी उसे सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतने में एक पुकारनेवाला उनके बीच पुकारेगा, "अल्लाह की फिटकार है शैतानियाँ करनेवालों पर : (44)
जो अल्लाह के मार्ग से रोकते थे और उसे टेढ़ा करना चाहते थे और जो आख़िरत [Hereafter] का इंकार करते थे." (45)
इन दोनों समूहों के बीच एक ओट [Barrier] होगी जो इनको अलग अलग कर देगी, और (दोनों के बीच ऊँचाई पर कुछ लोग होंगे जो हर एक समूह को उनके निशानों से पहचानते होंगे: वे जन्नतवालों से पुकार कर कहेंगे, "तुम पर सलामती हो!"--- वे अभी जन्नत में दाख़िल नहीं हुए होंगे, मगर वे उसके लिए आस लगाए होंगे, (46) 
और जब उनकी नज़रें आगवाले लोगों पर पड़ेंगी, तो वे कहेंगे, "हमारे रब, हमें शैतानियाँ करनेवालों में शामिल न कर दीजियो!"---- (47)
और ऊँचाई पर ठहरे लोग कुछ ख़ास लोगों को जिन्हें ये उनके निशानियों से पहचानते होंगे, पुकार कर कहेंगे, "बताओ! क्या फ़ायदा हुआ तुम्हारी इतनी बड़ी संख्या में होने का, और तुम्हारी झूठी शान का? (48) 
"और क्या ये वही लोग हैं ना, जिनके बारे में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह उनपर कभी अपनी दया-दृष्टि न डालेगा?" (अब उन लोगों से कहा जाएगा), "जन्नत में दाख़िल हो जाओ, तुम्हारे लिए न कोई डर है और न तुम दुखी होगे।(49) 
आगवाले लोग जन्नत में रहने वालों को पुकार कर कहेंगे ,"थोड़ा पानी हमें भी दे दो, या उन चीज़ों में से ही कुछ दे दो जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं!" और वे कहेंगे, "अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें इंकार करनेवालों के लिए मना कर दी हैं"----- (50) 
जिन लोगों ने धर्म को बस एक ध्यान भटकाने, व खेल-तमाशे की चीज़ बना दिया था, और इस दुनिया की ज़िन्दगी ने उन्हें धोखे में डाल रखा था।आज हम उन पर कोई ध्यान नहीं देंगे, जिस तरह उन्होंने उस (क़यामत के) दिन की होनेवाली मुलाक़ात को नज़रअंदाज़ [ignore] कर दिया और हमारी आयतों को मानने से इंकार करते रहे. (51)
लोगों के लिए हम एक (आसमानी) किताब लाए हैं---- हम ने सच्चे ज्ञान के आधार पर इसमें चीज़ों को विस्तार से बता दिया है----यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] है, उन लोगों के लिए जो (सच्चाई में) विश्वास करते हैं. (52) 
वे किसी और चीज़ के नहीं, बल्कि इसी इंतिज़ार में हैं कि कब उस (आख़िरी अंजाम) के बारे में कही हुई बात [Prophecy] पूरी होती है? जिस दिन वह कही हुई बात पूरी हो जाएगी, तो जिन लोगों ने इसे नज़रअंदाज़ किया था, वे बोल उठेंगे, "हमारे रब के रसूल ने सच्ची बात कही थी। तो क्या कोई है जो अब हमारे लिए थोड़ी सिफ़ारिश कर सके? या क्या हमें वापस (उसी दुनिया में) भेजा जा सकता है ताकि जैसा हम पहले व्यवहार करते थे, उससे (इस बार) कुछ अलग व्यवहार कर सकें?" सचमुच वे अपनी जानें गँवा बैठेंगे, और वे सारी [मूर्तियाँ] जो उन्होंने गढ रखी थीं, वे उन्हें छोड़कर गुम हो चुकी होंगी. (53)
अल्लाह ही तुम्हारा रब है, जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया, फिर (काम-काज की व्यवस्था के लिए) अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया; उसने रात ऐसी बनायी है कि वह तेज़ी से पीछा करते हुए दिन को ढँक लेती है; उसने सूरज, चाँद और तारे भी पैदा किए, जो उसके आदेश से काम में लगे रहते हैं; सारी सृष्टि, और सारे आदेश, सब उसी के हैं। महिमा हो उसकी! वह सारे संसारों का रब है! (54)
अपने रब को विनम्रता से और चुपके-चुपके पुकारा करो---वह उन्हें पसंद नहीं करता जो मर्यादा की सीमाएं तोड़नेवाले हैं: (55)
और (देखो!) ज़मीन पर फैली बुराइयों को ठीक कर देने के बाद इसमें बिगाड़ न पैदा करो---- उसे (अपनी ग़लतियों से) डरते हुए और (उसकी रहमत की) उम्मीद के साथ पुकारा करो। अल्लाह की रहमत [mercy] उन लोगों के नज़दीक होती है जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं. (56)
यह अल्लाह है जो हवाएं भेजता है, जो उसकी आनेवाली बरकत [बारिश] की ख़ुशखबरी ले कर आती है, और जब वे ऊपर उठ कर बोझल बादलों को इकट्ठा कर लेती है, तो हम उसे किसी मुर्दा ज़मीन की तरफ उड़ा ले जाते हैं, जहाँ उससे पानी बरसाते हैं, फिर उससे हर तरह की फ़सलें उग जाती हैं, ठीक इसी तरह, हम मुर्दों लोगों को (धरती से) निकाल खड़ा करेंगे. तो क्या तुम इस पर विचार नहीं करोगे? (57)
अगर ज़मीन अच्छी हो, तो अपने रब की मर्ज़ी से, पेड़-पौधे काफी मात्रा में निकल आते हैं, लेकिन अगर ज़मीन ख़राब हुई, तो पैदावार होगी भी, तो बहुत ही कम : हम अपनी आयतों [निशानियों] को उनलोगों के लिए तरह-तरह से बयान करते हैं, जो अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं. (58)
हमने नूह को उसकी क़ौम के लोगों के पास भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। मैं डरता हूँ कि एक बड़े भयानक दिन की यातना कहीं तुम्हें न आ पकड़े!(59)
मगर उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हमें तो ऐसा लगता है कि तुम गुमराही में काफ़ी दूर जा पड़े हो।"(60)
उन्होंने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मेरे बारे में किसी गुमराही का कोई सवाल नहीं है! उल्टा मैं तो सारे संसारों के रब का भेजा हुआ एक रसूल हूँ। (61)
 "मैं तो अपने रब के संदेशों को तुम तक पहुँचा रहा हूँ और तुम्हारे हित में सलाह दे रहा हूँ. मैं अल्लाह की तरफ़ से उन चीज़ों को जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते।(62)
"क्या तुम्हें यह बड़ा अजीब लगता है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है--- एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो----जो तुम्हें चेतावनी दे सके और तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बच सको, ताकि तुम पर दया की जा सके?"  (63)
मगर उनलोगों ने नूह को झूठा घोषित कर दिया। हमने उसे बचा लिया, और उन लोगों को भी जो उसके साथ नौका में सवार थे, और उन लोगों को डुबा दिया जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था-----वे जानते-बूझते अन्धे बने हुए थे. (64)
आद की क़ौम के पास हम ने उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उस अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तो क्या तुम इस बात पर ध्यान नहीं दोगे?" (65)
मगर उसकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "हमारा ऐसा मानना है कि तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी हो" और "हमारी समझ से तुम एक झूठे आदमी भी हो।(66)
हूद ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझ में बेवक़ूफ़ी की कोई बात नहीं है! उल्टा, मैं सारे संसारों के रब की तरफ़ से भेजा हुआ एक रसूल हूँ : (67)
"मैं तो अपने रब का संदेश तुम तक पहुँचा रहा हूँ. मैं तुम्हारा हित देखते हुए  ईमानदारी से सलाह देता हूँ. (68)
"क्या तुम्हें यह बात इतनी अनोखी लगती है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है, वह भी एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो, ताकि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे सके? याद करो, किस तरह उसने नूह की क़ौम के बाद तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया, और क़द-काठी में तुम्हें (दूसरों से) लम्बा-चौड़ा बनाया : अल्लाह की नेमतों [bounties] को याद करो, ताकि तुम कामयाबी पा सको।" (69)
वे कहने लगे, "क्या तुम हमारे पास सचमुच यही बताने के लिए आए हो कि हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे हैं, उन्हें (पूजना) छोड़ दें? ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो जिस यातना (के आने) की धमकी तुम देते रहते हो, उसे हम पर ले आओ।" (70)
हूद ने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की नफ़रत और ग़ुस्से का क़हर टूट पड़ना  तय हो चुका है। क्या तुम मुझ से उन (देवताओं के) नामों के लिए झगड़ रहे हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े हैं, जिन नामों लिए अल्लाह ने कोई मन्ज़ूरी नहीं दी? अच्छा, तो बस अब (आनेवाले समय का) इंतिज़ार करो; मैं भी इंतिज़ार कर रहा हूँ।" (71)
फिर हमने अपनी दया दिखाते हुए हूद को, और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया; और उन लोगों को बर्बाद कर दिया जिन्होंने हमारी आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार कर दिया था, और वे विश्वास करनेवाले न थे. (72)
(इसी तरह) समूद के लोगों की तरफ़ हम उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके अलावा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तुम्हारे  रब की तरफ़ से अब एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है: यह अल्लाह के नाम पर छोड़ी हुई ऊँटनी है----यह तुम्हारे लिए एक निशानी है---- सो इसे अल्लाह की धरती पर खाने-चरने के लिए खुला छोड़ दो और देखो! उसे किसी तरह का कोई नुक़सान मत पहुँचाना, वरना एक दर्दनाक यातना तुम्हें आ लगेगी। (73)
याद करो कि किस तरह अल्लाह ने आद के बाद तुम्हें उनका उत्तराधिकारी बनाया और उस ज़मीन पर तुम्हें बसा दिया, जिस ज़मीन पर तुम अपने लिए महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-काट कर मकान बना लेते हो : अल्लाह की बरकतों (blessings) को याद करो और धरती पर फ़साद फैलाते न फिरो।(74) 
मगर उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने ईमान रखनेवाले लोगों को, जिसे वे बिल्कुल ही गया गुज़रा समझते थे, कहा, "क्या तुम सचमुच ऐसा सोचते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ पैग़म्बर [Messenger] है?" उनलोगों ने कहा, "हाँ, हम उस संदेश पर विश्वास करते हैं, जो उनके माध्यम से भेजा जाता है।" (75)
मगर उन घमंडी सरदारों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम विश्वास करते हो, उसे हम तो मानने से इंकार करते हैं", (76)
उसके बाद, उन लोगों ने उस ऊँटनी को पाँव काट कर [hamstrung] मार डाला. फिर अपने रब के आदेश को मानने से साफ़ इंकार कर दिया और बोले, "ऐ सालेह! अगर तुम सचमुच के रसूल हो, तो हमें जिस यातना की धमकी देते रहते हो, उसे हम पर अब ले आओ!" (77) 
अन्त में, एक ज़बरदस्त भूचाल ने उन्हें दबोच लिया : सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े रह गए. (78) 
फिर सालेह ने यह कहते हुए उनलोगों से मुँह फेर लिया, "ऐ मेरे लोगो! मैंने  तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा दिया और हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए सलाह देता रहा, मगर (अफ़सोस!) तुम नेक सलाह देनेवालों को पसंद नहीं करते।" (79)
हमने लूत [Lot] को भेजा और उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ने क्यों इस अश्लील काम को अपना लिया है? दुनिया में कोई नहीं है जो इस गंदे काम में तुमसे आगे हो. (80)
सेक्स के लिए तुम औरतों के बजाए मर्दों के पीछे जाते हो! तुम ने (अपनी हवस में) मर्यादा की सभी सीमाएं तोड़ डाली हैं!" (81)
उसके लोगों की तरफ़ से बस इतना ही जवाब मिला कि (वे आपस में) कहने लगे, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो इन लोगों को! ये लोग अपने आपको बहुत पाक-साफ़ बनते हैं!" (82)
फिर ऐसा हुआ कि हमने लूत और उसके लोगों को (तबाह होने से) बचा लिया----- सिवाय उसकी बीवी के जो (शैतानी करनेवालों के साथ) पीछे रह गयी---- (83)
और हमने उन बाक़ी बचे लोगों पर तबाह कर देनेवाली (पत्थरों की) बारिश की.  तो देखो! शैतानियाँ करनेवालों का कैसा अंजाम हुआ. (84)
मदयन [Midian] के लोगों के पास हमने उनके भाई, शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक स्पष्ट निशानी आ चुकी है। (जब सामान दो) तो नाप और तौल में पूरा पूरा दिया करो, और लोगों की चीज़ों को कम कर के मत आँका करो; और ज़मीन में सारी व्यवस्था ठीक कर देने के बाद उसमें गड़बड़ी पैदा न करो : यह तुम्हारे लिए ज़्यादा अच्छा  है, अगर तुम ईमानवाले हो. (85)
"(देखो!) हर एक रास्ते पर न बैठ जाओ, कि (आते-जाते) लोगों को धमकियाँ देने लगो, और उनलोगों को अल्लाह के मार्ग (पर चलने) से रोकने लगो, जो उसपर ईमान रखते हों, और न उस मार्ग को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, तुम गिनती में कितने थोड़े हुआ करते थे, फिर उसने तुम्हें बढा कर कई गुना कर दिया। ज़रा उनके अंजाम के बारे में सोचो, जो फ़साद फैलाया करते थे. (86) 
"अगर तुममें से कुछ लोग (अल्लाह के) उस संदेश में विश्वास रखते हों जो मैं ले कर आया हूँ, और कुछ दूसरे लोग (इस पर) विश्वास नहीं करते, तो उस समय तक धीरज से काम लो, जब तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला न कर दे। और वह फ़ैसला करनेवालों में सबसे अच्छा फ़ैसला करता है।" (87)
उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने कहा, "ऐ शुऐब! अगर तुम हमारे दीन [Religion] में नहीं लौटे, तो हम तुम्हें और तुम्हारे साथ सारे ईमान रखनेवालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करेंगे।" शुऐब ने कहा, "क्या! अगर यह (तुम्हारा धर्म) हमें बिल्कुल भी पसंद न हो, तब भी(88) 
"अगर हमें तुम्हारे दीन में वापस जाना पड़े, जबकि अल्लाह हमें उससे बचा चुका है, तो यह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ने जैसा होगा : उस (दीन) में अब वापस जाने का तो कोई सवाल नहीं है---- हाँ, अगर हमारे रब, अल्लाह की मर्ज़ी कुछ और हो तो बात अलग है। हर चीज़ को उसने अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। हम तो  अल्लाह पर भरोसा करते हैं। हमारे रब, तू हमारे और हमारी क़ौम के बीच सच्चाई को उजागर कर दे (और हमारे बीच) फ़ैसला कर दे, कि सचमुच तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।(89)
उनकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "अगर तुम शुऐब के बताए हुए रास्ते पर चले, तो सचमुच तुम घाटे में पड़ जाओगे"----  (90)
एक ज़बदस्त भूचाल ने उन्हें धर दबोचा : अगली सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े थे; (91)
शुऐब की बातों को झूठ मानने वालों का ऐसा हाल हुआ, मानो वे कभी वहाँ बसे ही नहीं थे ; जिन लोगों ने शुऐब को मानने से इंकार किया था, असल में वही लोग घाटे में रहे---- (92)
तब शुऐब ने उनलोगों से यह कहते हुए मुँह मोड़ लिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देशों को तुम तक पहुँचा दिया और तुम्हारा हित देखते हुए मैंने तुम्हें सही सलाह दी, तो जिन लोगों ने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, ऐसे लोगों (की तबाही) पर दुखी होने का क्या फ़ायदा है?"(93)
जब कभी हमने किसी बस्ती में कोई रसूल भेजा, तो वहाँ के (विश्वास न करनेवाले) लोगों को दु:ख-दर्द और तंगी में डाला, ताकि वे अपने आपको (अल्लाह के सामने) झुका दें, (94)
फिर उसके बाद हमने उनकी बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले. लेकिन वे कहने लगे, "ये तंगहाली और ख़ुशहाली तो हमारे बाप-दादा ने भी झेली थीं", और नतीजे में हमने अचानक उन्हें धर- दबोचा, जबकि उन्हें इसकी भनक तक न थी. (95)
अगर उन बस्तियों के लोगों ने विश्वास किया होता, और अपने आपको बुराइयों से बचाया होता, तो हम ने उनपर आसमानों और ज़मीन से बरकतों [blessings] की बारिश की होती, मगर उनलोगों ने सच्चाई को ठुकरा दिया, नतीजा यह हुआ कि हम ने उन्हें उनके बुरे कर्मों के चलते दंड दिया। (96)
क्या इन बस्तियों के लोगों ने अपने आपको सुरक्षित महसूस कर लिया है और वे सोचते ही नहीं हैं कि रात के समय जबकि वे सो रहे हों, उस वक़्त भी हमारी यातना आ सकती है(97) 
और यातना दिन चढ़े भी आ सकती है, जबकि वे खेल कूद में मगन  हों(98)
क्या अल्लाह की योजना के ख़िलाफ़ वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं? अल्लाह की योजना से तो केवल घाटे में पड़नेवाला ही सुरक्षित महसूस कर सकता है. (99) 
क्या उन लोगों को यह बात स्पष्ट नहीं है कि जिन्हें पिछली पीढ़ियों से धरती विरासत में मिल गयी है, अगर हम चाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें भी सज़ा दे सकते हैं? और हम  उनके दिलों को बंद कर के उस पर मुहर लगा सकते हैं, ताकि वे कुछ भी सुन ही न सकें। (100)
(ऐ रसूल) हम ने आपको उन बस्तियों की कहानियां सुना दी हैं : उनके पास कितने रसूल आए, साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ आयीं, मगर जिस चीज़ को वे पहले ही मानने से इंकार कर चुके थे, वे उसमें विश्वास करने वाले न थे। इसी तरह, अल्लाह (हठधर्मी से) विश्वास न करनेवालों के दिलों को बंद कर के उसपर मुहर लगा देता है। (101)
हम ने उनमें ज़्यादातर लोगों को वचन देने के बाद उसको निभाते हुए नहीं पाया; हम ने उनमें अधिकतर लोगों को खुले आम नियमों को तोड़ते हुए पाया. (102)

फिर इनके बाद हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसका समर्थन करनेवाले बड़े सरदारों के पास भेजा, मगर उन लोगों ने उसे मानने से इंकार कर दिया, और देखो! उनका अंजाम क्या हुआ जो फ़साद फैलाया करते थे  ! (103) 
मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसारों के रब का (भेजा हुआ) रसूल हूँ, (104)
"मेरा यह फ़र्ज़ बनता है कि मैं अल्लाह के बारे में सिवाय सच कहने के और कुछ न कहूँ, और मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से (सच्चाई की) स्पष्ट निशानी लेकर आया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तानों को मेरे साथ जाने दो।" (105)
फ़िरऔन ने कहा, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो उस निशानी को पेश करो, जो तुम ले कर आए हो।" (106) 
अत: मूसा ने अपनी लाठी नीचे फेंकी, देखते ही देखते वह, नज़र के सामने  अजगर बन गया, (107)
और फिर उसने अपना हाथ (अपनी बग़ल से) निकाला, तो अचानक सबके सामने वह सफ़ेद होकर चमकने लगा. (108) 
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार (आपस में) कहने लगे, "अरे, यह तो बडा माहिर जादूगर लगता है! (109)
"वह तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल बाहर करना चाहता है!" फ़िरऔन ने कहा, "तो अब तुम्हारी क्या सलाह है?" (110)
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को थोड़े समय के लिए टाल दो और इस बीच सभी शहरों में हरकारे भेज दो(111) 
"कि वे हर माहिर जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।(112)
 सो जादूगर फ़िरऔन के पास पहुंच गए, और कहने लगे, "अगर हम जीत गए तो क्या हमें इनाम मिलेगा?" (113) 
उसने जवाब दिया, "हाँ, ज़रूर मिलेगा, और तुम (मेरे) ख़ास नज़दीकी लोगों में शामिल हो जाओगे।(114) 
फिर जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! तुम पहले (दांव) फेंकोगे या फिर हम फेंकें?" (115) 
मूसा ने कहा, "तुम ही पहले फेंको।" फिर उन्होंने (लाठी व रस्सियाँ) फेंकी, बस देखनेवालों की आँखों पर जादू कर दिया, (करतब से) उनमें डर पैदा कर दिया, और (सचमुच) उन्होंने ज़बरदस्त जादूगरी दिखायी। (116) 
फिर हमने मूसा को 'वही'[Inspiration] भेजी, "तुम भी अपनी लाठी (नीचे) फेंक दो!"-- फिर देखते ही देखते-- वह लाठी उनके रचे हुए स्वांग को निगल गयी.  (117)
इस तरह, सच्चाई साबित हो गयी और जो कुछ उन्होंने (जादू के असर से) पैदा किया था, वह बेकार हो कर रह गए थे : (118) 
(फ़िरऔन के) जादूगरों की हार हो गयी, और वे बुरी तरह अपमानित हो गए. (119)
फिर ऐसा हुआ कि सभी जादूगर घुटनों के बल गिर पड़े (120)
और बोले, "हम सारे संसारों के रब पर ईमान लाते हैं,  (121)
 "मूसा और हारून के रब पर!(122)

मगर फ़िरऔन बोला, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि बिना मेरी अनुमति के, तुमने उस (रब) पर विश्वास कर लिया!  यह तो एक बड़ी साज़िश है, जो तुम लोगों ने रची है, ताकि इस शहर से लोगों को निकाल बाहर कर दो! अच्छा, तो तुम्हें जल्द ही (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा : (123) 
"मैं (तुम लोगों का) एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ़ का पाँव कटवा दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा!" (124)
जादूगरों ने (बिना डरे) कहा, "और इस तरह हम अपने रब के पास लौट जाएंगे----- (125)
"हमारे ख़िलाफ़ तेरी शिकायत बस यही तो है कि जब हमारे रब की निशानियाँ हमारे पास आ गयीं, तो हम ने उन पर विश्वास कर लिया। हमारे रब! हम पर धीरज के साथ जमे रहने की ताक़त डाल दे, और हमें इस दशा में मौत दे कि हम पूरी भक्ति के साथ तेरी आज्ञा मानने वाले रहें।" (126)
फ़िरऔन की क़ौम के सरदारों ने उससे कहा, "मगर क्या तुम मूसा और उसके लोगों को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में फ़साद फैलाते रहें और वे तुम्हें और तुम्हारे देवताओं को छोड़ बैठें?" फिरऔन ने कहा, "हम उनके (बच्चों में से) लड़कों को मार डालेंगे, और केवल स्त्रियों को (दासियाँ बना कर ज़िंदा) छोड़ देंगे : वे हमारी ताक़त से दबे हुए और बेबस हैं।(127)
मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "मदद माँगना हो तो अल्लाह के सामने झुकते हुए  माँगो और धीरज से काम लो : सारी धरती तो अल्लाह की है---- वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसे उस (संपत्ति) का वारिस बना देता है----और आनेवाला अच्छा समय तो उनलोगों का ही है जो अपने आपको बुराइयों से बचाते हैं।" (128)
उनलोगों ने जवाब दिया, "तुम्हारे यहाँ आने के बहुत पहले से ही हम पर ज़ुल्म किया जा रहा था, और तुम्हारे आने के बाद भी यह (सिलसिला) चल रहा है।" मूसा ने कहा, "हो सकता है कि तुम्हारा रब तुम्हारे दुश्मनों को पूरी तरह से मिटा दे, और तुम्हें इस धरती पर उनका उत्तराधिकारी बना दे, ताकि वह यह देख सके कि तुम कैसा आचरण करते हो।" (129) 
हमने फ़िरऔन के लोगों को वर्षों तक अकाल और फ़सल की ख़राबी जैसी मुसीबतों में डाला, ताकि शायद वे चेत जाएं व ध्यान दें, (130)
(मगर) फिर, जब उन पर कभी ख़ुशहाली आ जाती, तो वे कहते, "इस पर तो हमारा हक़ बनता था!". और जब उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती, तो वे उसे मूसा और उसके साथियों का 'अपशगुन' [evil omen] बताते थे, मगर असल में, उनका 'अपशगुन' अल्लाह की तरफ़ से था, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग इस बात को समझ नहीं पाए. (131)
और वे (मूसा से) बोले, "हम पर अपना जादू चलाने के लिए चाहे तू कैसी भी निशानियाँ हमारे सामने ले आए, हम तुझपर विश्वास करनेवाले नहीं हैं," (132)
और इसलिए, हमने उन पर (एक के बाद एक मुसीबतें) छोड़ दीं---- बाढ़, टिड्डियों (के दल), छोटे (घुन के) कीड़े [जुएं], मेंढक और ख़ून-----ये सभी साफ़-साफ़ निशानियाँ थीं. (मगर) वे बड़े घमंडी, और मुजरिम लोग थे। (133)
जब कभी उनपर (प्लेग के रूप में) यातना आ पड़ती, तो वे कहते थे, "ऐ मूसा, जो वादा तेरे रब ने तेरे साथ कर रखा है, उस आधार पर तू अपने रब से हमारे लिए दुआ कर दे : अगर तू ने हमें इस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दिला दिया, तो हम तुझ पर विश्वास कर लेंगे, और इसराईल की सन्तान को तेरे साथ जाने देंगे," (134)
मगर जब हम ने उन्हें उस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दे दिया और उन्हें एक तय किया हुआ समय भी दिया (ताकि वे विश्वास करने का वादा पूरा कर सकें)-----तो क्या देखते हैं कि उन्होंने अपना वादा तोड़ डाला. (135) 
और इस तरह, चूँकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, और उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, तो फिर हमने उनसे बदला लिया : हम ने उन्हें समंदर में डुबा दिया (136) 
और जिन (इसराइली) लोगों पर (बरसों से) ज़ुल्म हुआ था, हमने उन्हें उस भू-भाग के पूरब और पश्चिम के हिस्सों [सीरिया व फ़िलिस्तीन] का वारिस बना दिया, जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी। (इस तरह) तुम्हारे रब ने इसराईल की सन्तान के साथ जो भलाई का वादा कर रखा था, वह पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धीरज व सब्र से काम लिया, और हम ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ तहस-नहस कर दिया, जिसे वे (ख़ूबसूरती से) बनाते थे और जिन (ऊँचे भवनों) का निर्माण किया करते थे. (137)
और इसराईल की सन्तान को हम (सुरक्षित) समंदर पार करा लाए, फिर जब वे ऐसे लोगों को पास से गुज़रे जो मूर्तियों की पूजा करते थे, तो वे बोले, "ऐ मूसा! उनलोगों के देवताओं जैसा हमारे लिए भी एक देवता बना दो।" मूसा ने कहा, "तुम सचमुच बड़े ही बेवक़ूफ़ [व जाहिल] लोग हो : (138)
ये लोग जिन (देवताओं) की पूजा में लगे हुए हैं, वह तो बर्बाद होकर रहेगा, और जो कुछ ये करते आ रहे हैं, वह व्यर्थ व किसी काम का नहीं है। (139)
मैं तुम्हारे लिए अल्लाह को छोड़कर किसी और देवता को क्यों ढूढूँ, जबकि उसने दूसरे तमाम लोगों पर तुम्हें श्रेष्ठता दी है?" (140)
[ऐ इसराईल की संतानों!] याद करो कि हमने किस तरह तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से बचाया था, जिन्होंने तुम्हें बुरी से बुरी तकलीफ़ों में डाल रखा था, वे तुम्हारे बेटों को मार डालते और केवल तुम्हारी औरतों को (ज़िंदा) छोड़ देते थे---- इसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी कठिन परीक्षा थी. (141) 
हमने मूसा के लिए (सीना/Sinai के पहाड़ पर इबादत करने को) तीस रातों की अवधि तय की थी, फिर उसमें दस और बढ़ा दिया : उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई. मूसा ने (जाने से पहले) अपने भाई हारून से कहा था, "मेरी (अनुपस्थिति में) तुम मेरी क़ौम के लोगों को संभाल लेना : हर मामले में सही तरीक़े से काम करना, और उनलोगों के पीछे न चल पड़ना जो फ़साद फैलाते हैं।" (142)
जब मूसा तय किए हुए समय पर (सीना के पहाड़ पर) पहुँचा, और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह कहने लगा, "मेरे रब! मैं तुझे देखना चाहता हूँ : मुझे देख लेने दे!" अल्लाह ने कहा, "तुम मुझे कभी नहीं देख सकोगे, मगर उस पहाड़ [तूर] को ध्यान से देखो : अगर वह पहाड़ अपनी जगह मज़बूती से खड़ा रह गया, तो फिर तुम मुझे देख लोगे", और जब उसके रब ने अपने आपको उस पहाड़ पर प्रकट किया, तो उसे चकनाचूर कर दिया : मूसा बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया, तो कहा, "महिमावान है तू! मैं (गुनाहों की) तौबा के लिए तेरी ही ओर झुकता हूँ! और इस बात पर (कि दुनिया में अल्लाह को कोई नहीं देख सकता है) मै सबसे पहले विश्वास करता हूँ!" (143)
अल्लाह ने कहा, "ऐ मूसा! मैंने तुम्हें अपने संदेश [तोरात/Torah] दे कर, और तुम से सीधे बात कर के (तुम्हें चुन लिया है, और) तुम्हारा दर्जा दूसरे लोगों के मुक़ाबले में ऊँचा कर दिया है : जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है, उसे सँभाल कर रखो; और शुक्र अदा करनेवालों में से हो जाओ।" (144)
हमने उनके लिए तख़्तियों [Tablets] पर (उपदेश की) हर चीज़ लिख दी थी, जो हर चीज़ को सिखाती और विस्तार से समझाती भी थी, और कहा, "उनको मज़बूती से थामे रहो, और अपने लोगों को आज्ञा दो कि वे उनकी बेहतरीन शिक्षाओं को अपनाएँ। मैं तुम्हें ऐसे लोगों का (आख़िरत में) अंत दिखा दूँगा, जो लोग आज्ञा नहीं मानते और उसके ख़िलाफ़ काम करते हैं. (145)
मैं अपनी निशानियों से उनलोगों को दूर रखूँगा, जो ज़मीन पर बिना अधिकार के घमंड में चूर रहते हैं, और वे ऐसे हैं कि अगर वे हर एक निशानी भी देख लें, तब भी वे उस पर विश्वास नहीं करेंगे; अगर वे सही मार्गदर्शन का रास्ता  देख लें, तो वे उस रास्ते को नहीं अपनायेंगे, लेकिन अगर वे गुमराही का मार्ग देख लें, तो उसी रास्ते पर चल पड़ेंगे। यह इसलिए है क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार किया और उन पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया :   (146)
जिन लोगों ने हमारी निशानियों को और आख़िरत में (हिसाब-किताब के लिए) होनेवाली मुलाक़ात को झूठ समझ कर ठुकरा दिया, तो उनके सारे कर्म बेकार जाएंगे------ उन्हें जो बदला दिया जाएगा, वह इसके सिवा कुछ न होगा कि उन्हीं के कर्मों का फल होगा. (147)
और जबकि मूसा वहाँ मौजूद नहीं था, उसकी क़ौम के लोगों ने एक बछड़े के आकार की चीज़ की पूजा करना शुरू कर दिया जिसमें से गाय की सी आवाज़ निकलती थी-----यह बछड़ा उनके ज़ेवरों (को गलाने) से बनाया गया था। क्या वे इतना भी नहीं देख पाए कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई रास्ता ही दिखाता है? तब भी वे उसकी पूजा करने लगे : वे शैतानी करनेवाले लोग थे. (148)
फिर जब ऐसा हुआ कि वे (शर्म से) हाथ मलने लगे, और उन्हें अपने किए पर पछ्तावा हुआ और उन्हें इस बात का अहसास हो गया कि वे ग़लत काम कर रहे थे, तो कहने लगे, "अगर हमारे रब ने हम पर दया न की और उसने हमें माफ़ न किया, तो हम बर्बाद हो जाएँगे!" (149)
जब मूसा ग़ुस्से और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम के पास वापस आया, तो उसने कहा, "मेरे यहाँ नहीं होने पर तुम लोगों ने कितना बुरा और शैतानी काम किया है! क्या तुम अपने रब के फ़ैसले को समय से पहले ले आने के लिए इतने उतावले हो गए?" फिर उसने तख़्तियाँ नीचे फेंक दीं और अपने भाई [हारून] का बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। हारून बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! इन लोगों ने मुझ पर क़ाबू पा लिया था! और क़रीब क़रीब मुझे मार ही डाला था! अतः मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने का मौक़ा न दे और मुझे इन शैतानियाँ करनेवालों का साथी न ठहरा।" (150)
मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे; और हमें अपनी रहमत की छाया में ले ले : तू तो दया करनेवालों में सबसे बड़ा दयावान है।" (151) 
जिन लोगों ने बछड़े की पूजा शुरू कर दी, उन पर उनके रब का क़हर टूटेगा, और इस जीवन में वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे." उन लोगों को हम ऐसा ही बदला देते हैं जो ऐसा झूठ गढ़ते रहते हैं, (152)
मगर तुम्हारा रब तो उन लोगों के प्रति बेहद माफ़ करनेवाला और अत्यंत दयावान है, जो अगर ग़लती कर बैठते हैं, तो फिर उसके बाद (अपनी ग़लती सुधारते हुए) तौबा करते है, और सचमुच ईमान रखते हैं. (153)
                                                                                                                                                                                   
जब मूसा का ग़ुस्सा ठंढा हुआ, तो उसने तख़्तियों को उठाया, जिसमें लोगों के मार्गदर्शन की बातें लिखी हुई थीं, और यह उन लोगों के लिए रहमत थीं जो अपने रब का डर रखते हैं. (154)
मूसा ने अपने लोगों में से सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय (पर तूर पहाड़ जाने) के लिए चुना, फिर जब उन लोगों को एक थरथराहट ने आ पकड़ा, तो उसने दुआ की, "मेरे रब! अगर तू ने यही करने के लिए इन्हें चुना था, तो तू बहुत पहले ही इनको, और मुझ को, भी मिटा चुका होता। तो क्या अब तू हमें इसलिए बर्बाद कर देगा कि हम में से कुछ बेवक़ूफ़ आदमियों ने ऐसा किया था? यह तो तेरी ओर से एक परीक्षा मात्र है---- इसके द्वारा तू जिसको चाहे भटकता छोड़ दे और जिसे चाहे सही रास्ता दिखा दे----- और तू ही हमारी रक्षा करनेवाला है, सो हमें माफ़ कर दे और हम पर दया कर, और तू ही माफ़ करनेवालों में सबसे बेहतर है। (155)
"[या ख़ुदा!] हमारे लिए इस संसार में भी अच्छाई लिख दे, और आने वाली दुनिया में भी। हम सच्चे दिल से तेरी ही तरफ़ लौटते हैं।" अल्लाह ने कहा, "मैं जिस किसी पर चाहता हूं, अपनी यातना ले आता हूं, लेकिन मेरी दयालुता व रहमत का हाल यह है कि उसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है।
मैं अपनी रहमत उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो बुराइयों से बचते हैं, और उचित ज़कात देते है ; और जो हमारी आयतों में विश्वास रखते हैं (156)
और उस रसूल [Messenger] के पीछे चलते हैं, जो ऐसा नबी [Prophet] है कि (न तो यहूदी नस्ल का है, और) पढ़ा-लिखा नहीं है, जिसका ज़िक्र वे अपने यहाँ तौरात [Torah] में लिखा पाते हैं, और इंजील [Bible] में भी---- जो उन्हें अच्छा व सही काम करने का हुक्म देता और बुराई व ग़लत काम करने से रोकता है, जो उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल [Lawful] और बुरी चीज़ों को हराम [Unlawful] ठहराता है, और उन्हें उनके बोझ से और गले में पड़े हुए उन लोहे के बन्धनों से मुक्ति देता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः ऐसे ही लोग हैं जो उस पर ईमान रखते हैं, उसकी इज़्ज़त करते हैं और उसकी मदद करते हैं, और वह उस रौशनी के पीछे चलते हैं, जो उसके साथ भेजी गयी है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।" (157)
[ऐ मुहम्मद!] कह दें, "ऐ लोगो! मैं तुम सब लोगों के लिए अल्लाह का रसूल हूँ, यह उसकी तरफ़ से है जिसके नियंत्रण में आसमानों और ज़मीन की सलतनत है ; उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है, वही ज़िंदगी और मौत देता है, अतः विश्वास करो अल्लाह पर और उसके रसूल पर, जो ऐसा पैग़म्बर है कि पढ़ा-लिखा नहीं है, जो अल्लाह पर और उसकी बातों पर विश्वास रखता है. तो उसके बताए हुए रास्ते पर चलो, ताकि तुम्हें शायद मार्गदर्शन मिल जाए।(158)
मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो सच्चाई का रास्ता दिखाते थे, और उसी के मुताबिक़ इंसाफ़ के साथ काम करते थे. (159)
हमने उन्हें बारह क़बीलों में, अलग-अलग समुदाय के रूप में बाँट दिया था, और, जब मूसा के लोगों ने उससे पीने का पानी माँगा, तो हमने मूसा को 'वही' [Revelation] द्वारा बता दिया कि अपनी लाठी से (एक ख़ास) चट्टान पर मारो, ताकि उससे पानी के बारह सोते फूट निकले. हर गिरोह को अपने पीने के घाट मालूम थे; हमने उनपर बादलों से छाया कर दी थी, और उनके (खाने के) लिए 'मन्न' और 'सलवा' [बटेर] उतारा था, [और कहा,] "हमनें तुम्हें जो चीज़े दे रखी हैं, उनमें से अच्छी चीज़ें खाओ।" उन्होंने (हुक्म न मान कर) हमारा तो कुछ नहीं बिगाड़ा, ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे. (160)
जब उनसे कहा गया था, "इस बस्ती में जा कर बस जाओ और इसमें जहाँ चाहो, आराम से खाओ-पियो, मगर यह कहते हुए अंदर जाना, “[हित्ता] यानी हमारा बोझ उतार दे!”, और दरवाज़े से सिर झुका के दाख़िल होना : हम तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देंगे, और जो अच्छा काम करते हैं, उनके इनाम और ज़्यादा बढ़ा देंगे।(161)
लेकिन जैसा कहने के लिए उनसे कहा गया था, उनमें से शैतानियाँ करने वालों ने उसके शब्दों में कुछ फेर-बदल कर (अनर्थ कर) दिया, अत: उनके गुनाहों के चलते हम ने आसमान से उनके लिए यातना भेजी. (162)
[ऐ रसूल!] आप इन (इसराईल की संतानों) से उस बस्ती के बारे में पूछें जो समंदर के किनारे थी; किस तरह उनके लोगों ने 'सब्त' [Sabbath] के दिन (मछली का शिकार नहीं करने) के मामले में अपना वचन तोड़ दिया, होता यह था कि मछलियाँ केवल उसी (सब्त के) दिन उनके पास पानी के ऊपर आ जाती थीं, मगर सप्ताह के दूसरे दिन कभी नहीं आतीं-----इस तरीक़े से हम ने उनकी परीक्षा ली : क्योंकि वे आज्ञा नहीं मानते थे----- (163)
इस बस्ती में से कुछ लोगों ने (नसीहत करने वालों से) पूछा, "तुम ऐसे लोगों को नसीहत देने के लिए क्यों बेकार में परेशान होते हो, जिन्हें अल्लाह (उनकी बुराइयों के कारण) बर्बाद कर देगा या कम से कम कठोर यातना तो देगा ही?" [नसीहत करनेवालों ने] जवाब दिया, "यह इसलिए कि तुम्हारे रब की तरफ़ से हम पर कोई इल्ज़ाम न रहे (कि हम ने अपना काम न किया), और इसलिए भी कि शायद वे (नसीहत की) बातों पर ध्यान दें।(164)
फिर जब उनलोगो ने (उन नसीहतों) को भुला डाला, जो उन्हें दी गई थीं, तब हमने उन लोगों को तो बचा लिया जो बुराई करने से रोकते थे, मगर ग़लत काम करने वालों को, लगातार आज्ञा न मानने के कारण, कठोर सज़ा में जकड़ लिया। (165)
फिर जब वे अपने घमंड में (हदें पार करने लगे, और) वही कुछ करने लगे, जिससे उन्हें रोका गया था, तो हमने उनसे कहा, "बन्दर जैसे हो जाओ! ज़ात बाहर हो जाओ!(166)
और उसके बाद, तुम्हारे रब ने घोषणा कर दी थी, कि वह क़यामत के दिन तक, उन पर ऐसे लोगों को बैठाता रहेगा, जो उनको दर्दनाक तकलीफ़ें पहुँचाते रहेंगे. तुम्हारा रब (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत तेज़ है, मगर साथ में वह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयालू भी है. (167)
हमने उन्हें अलग अलग समुदायों में बाँट कर ज़मीन पर फैला दिया----- कुछ उनमें से अच्छे व नेक थे, और कुछ उनमें इन जैसे नहीं थे : हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनको जाँचा-परखा, ताकि शायद वे सभी (अच्छाई की तरफ़) लौट आएँ. (168)
और, उनके बाद जो पीढ़ियां आयीं, हालांकि उन्हें आसमानी किताब [तोरात] विरासत में मिली थीं, तब भी, वे इसी तुच्छ संसार के अल्प (समय टिकनेवाले) फ़ायदे को लेने में ही लगे रहे, और कहते थे, "हमें ज़रूर माफ़ कर दिया जाएगा", और अगर इसी तरह के दूसरे (भ्रष्ट) फ़ायदे भी उनके हाथ आ जाते, तो (बिना ग़लती पर पछताए) ज़रूर उसे भी ले लेते। क्या उनसे यह क़सम नहीं ली गयी थी, जो कि किताब में लिखी हुई थी, कि वे अल्लाह के बारे में सिवाय सच के और कुछ न कहेंगे? और उन लोगों ने (किताब के) विषयों को अच्छी तरह से पढ़ा था। जिन लोगों ने अल्लाह को अपने ध्यान में रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया है, उनके लिए आख़िरत का घर कहीं अच्छा है। "तो तुम अपनी बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते?"  (169)
मगर (इसराईल की संतान में से) जो लोग किताब को मज़बूती से थामे रहे, और पूरी पाबंदी से नमाज़ को क़ायम रखा, तो अच्छे व नेक लोगों के कर्मों का बदला देने से हम कभी मना नहीं करते हैं. (170)
जब हमने पहाड़ को ऊँचा उठा कर परछाईं की तरह उन लोगों के ऊपर कर दिया, और उन्हें लगने लगा कि वह उनके दम पर गिरनेवाला है, तो हम ने कहा, "जो कुछ हम ने तुम्हें दे रखा है, उसे मज़बूती से थामे रहो, और याद रखो जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, ताकि तुम बुराइयों से बचते रहो।(171)
[ऐ रसूल! यह याद दिलाएं], जब आपके रब ने आदम की सन्तान की पीठों से उनके बच्चों को बाहर निकाला, और उन्हें स्वयं अपना गवाह बनाया, तो अल्लाह ने कहा, "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" और वे जवाब में बोले, "हाँ, हम गवाही देते हैं।" और ऐसा इसलिए किया कि तुम क़यामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी", (172)
या, यह कहने लगो कि "असल में, हम से पहले तो, हमारे बाप-दादा थे जिन्होंने अल्लाह के साथ साझेदार[Partners] ठहरा लिए थे, हम तो बस उनके बाद आनेवाली पीढ़ियों में से हैं : क्या तू हमें बर्बाद कर देगा, इस कारण से उन्होंने झूठी बातें गढ़ीं?" (173)
इस तरह, हम अपने संदेशों को अलग-अलग कर के समझाते हैं, ताकि शायद वे सच्चाई के रास्ते की ओर लौट आएं. (174)
[ऐ रसूल!], आप उन्हें उस आदमी की कहानी सुना दें जिसे हमने अपने संदेश [आयतें] दिए थे : किन्तु वह उनसे जान छुड़ा कर भाग निकला, इस तरह, शैतान ने उसे अपने पीछे चलने वाला बना लिया और वह सीधे मार्ग से भटक कर रह गया----(175)
अगर हमारी यह इच्छा रही होती, तो इन निशानियों का उपयोग कर के हम उसका दर्जा ऊंचा कर सकते थे, मगर इसके बजाए वह तो धरती के साथ चिमट गया और अपनी इच्छा के पीछे चल पड़ा----उसकी मिसाल एक कुत्ते की तरह थी, अब चाहे तुम उसे दौड़ा कर भगाओ या उसे चुपचाप छोड़ दो, वह ज़बान बाहर निकाल कर हांफता रहेगा। ऐसी ही है उनकी छवि जो हमारी निशानियों को मानने से इंकार करते हैं। तो [ऐ रसूल], आप उन्हें यह कहानी सुना दें, ताकि वे सोच विचार कर सकें। (176)
कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया! वे ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे : (177)
जिस किसी को अल्लाह ने मार्ग दिखा दिया, तो वही असल में सीधा व सही मार्ग पानेवाला है, और जिस किसी को वह भटकता छोड़ दे, तो ऐसे ही लोग नुक़सान उठानेवाले हैं. (178)
हमने बहुत-से जिन्नों और आदमियों को पैदा किया है, जिनकी क़िस्मत में जहन्नम जाना लिखा हुआ है। उनके पास दिल है मगर वे इसका उपयोग  समझने-बूझने में नहीं करते हैं, उनके पास आँखें है, मगर वे देखने के काम नहीं आतीं, उनके पास कान हैं, मगर उसका उपयोग सुनने में नहीं करते। वे चौपायों की तरह हैं, नहीं, बल्कि वे उनसे भी अधिक भटके हुए हैं : यही लोग हैं जो पूरी तरह से (नसीहतों को) भुलाए बैठे हैं. (179)
सारे अच्छे (गुणों वाले) नाम अल्लाह ही के हैं: तो जब उसको पुकारना हो, तो तुम इन्हीं (नामों से) उसे पुकारो, और उन लोगों से दूर रहो, जो (मतलब बदलने के लिए) इन नामों के साथ छेड़-छाड़ करते हैं----- जो कुछ वे करते हैं, उसका पूरा पूरा बदला उन्हें दिया जाएगा. (180)
हम ने जिन्हें पैदा किया, उनमें से कुछ समूह ऐसे लोगों का है जो सच्चाई का रास्ता दिखाता है और उसी के अनुसार न्याय से काम लेता है. (181)
मगर जिन लोगों ने हमारे संदेशों को झुठा बताते हुए ठुकरा दिया, हम उन्हें थोड़ा थोड़ा कर के, इस तरह उसके अंत की ओर ले जाएँगे कि उन्हें पता तक न चलेगा : (182)
मैं उन्हें बीच-बीच में ढील दूँगा, मगर मेरी योजना बिल्कुल पक्की है. (183) 
क्या उनके दिमाग़ में यह बात नहीं आती कि उनके साथ (वर्षों) रहनेवाला आदमी [मुहम्मद], कोई पागल नहीं है, बल्कि वह तो साफ़-साफ़ चेतावनी दे रहा है? (184)
क्या उन लोगों ने आसमानों और ज़मीन की सल्तनत और वह तमाम चीज़ें  जो अल्लाह ने पैदा की हैं, उन पर कभी विचार नहीं किया, और यह कि इन चीज़ों के समाप्त हो जाने की घड़ी शायद नज़दीक आ लगी हो? आख़िर इस (क़ुरआन के संदेश) के बाद अब कौन-सी (दूसरी निशानियाँ) हो सकती हैं, जिस पर ये विश्वास करेंगे(185)
जिन्हें अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो कोई नहीं है जो उन्हें सही रास्ता दिखा सकता है: अल्लाह उन्हें अपनी अकड़ में भारी ग़लतियाँ करने के लिए छोड़  देता है. (186)
[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़ियामत] के बारे में पूछते हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास है : केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आयेगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी समय होगा, जब वह (समय) आएगा, तो तुम पर बस अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं। कह दें, "(क़यामत कब आएगी), इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते हैं।" (187)
[ऐ रसूल!], आप कह दें, "किसी चीज़ से फ़ायदा या नुक़सान होना, मेरे नियंत्रण में नहीं है, (यहाँ तक कि) ख़ुद मुझे अपने आप पर भी क़ाबू नहीं, जब तक कि अल्लाह न चाहे : जो चीज़ छिपी हुई है, अगर मुझे उसकी जानकारी होती, तो मेरे पास ढेर सारी अच्छी चीज़ें होतीं और मुझे कोई नुक़सान न पहुँचता। मैं इसके सिवा क्या हूँ कि बस (इंकार व बुरे कर्मों के लिए) चेतावनी देनेवाला, और उन लोगों को ख़ुशख़बरी सुनानेवाला, जो ईमान रखते हैं।" (188)
वही [अल्लाह] है, जिसने तुम सबको एक अकेली जान [Soul] से पैदा किया,  और उसी से फिर उसका (मादा) जोड़ा बनाया, ताकि वह उसके पास जा कर सुकून पा सके : फिर जब कोई मर्द अपनी बीवी के साथ सोता है और उसकी बीवी को हल्का सा बोझ [बच्चा] ठहर जाता है, फिर वह उसे लिए हुए यहाँ-वहाँ फिरती रहती है, फिर जब (गर्भ बढा) तो वह भारी हो जाती है, तब (मर्द और औरत) दोनों अपने रब, अल्लाह को पुकारते हैं, " हम ज़रूर तेरा शुक्र अदा करने वाले बन कर रहेंगे, अगर तू हमें भला-चंगा बच्चा दे दे।(189)
लेकिन जब हम ने उन्हें भला-चंगा बच्चा प्रदान कर दिया, तो (बजाए केवल अल्लाह का शुक्र मानने के) दूसरों को उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner]  ठहराने लगे। (190)

अल्लाह के साथ वे जिन्हें उसका साझेदार ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊंचा व महान है! अल्लाह के साथ आख़िर कैसे वे (ख़ुदायी में) दूसरों को साझेदार ठहरा लेते हैं, जबकि वे कोई चीज़ भी पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो ख़ुद ही पैदा किए गए हैं,  (191)
और यह कि वे उनकी कुछ भी मदद नहीं कर सकते, यहाँ तक कि वे ख़ुद अपनी ही मदद नहीं कर सकते हैं(192) 
अगर तुम [ईमानवाले], ऐसे लोगों को सही मार्ग दिखाने के लिए बुलाओ, तो वे तुम्हारे पीछे नहीं आएँगे: अब चाहे तुम उन्हें बुलाओ या चुप-चाप रहो, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. (193)
अल्लाह को छोड़कर जिन्हें तुम [मूर्तिपूजक] पुकारते हो, वे भी तुम्हारे ही जैसे (पैदा किए हुए) बन्दे हैं. अतः उन्हें (परेशानी में) पुकार कर देखो, फिर अगर तुम (अपनी मान्यताओं में) सच्चे हो, तो उन्हें (तुम्हारी पुकार का) जवाब देना चाहिए! (194) 
क्या इन (पत्थर की मूर्तियों) के पास चलने के लिए पाँव हैं, किसी चीज़ को पकड़ने के लिए हाथ हैं, देखने के लिए आँखें हैं, या उनके पास सुनने के लिए कान हैं? [ऐ रसूल!] आप कह दें, " बुला लाओ उन सब (देवताओं) को, जिन्हें तुम ने अल्लाह का साझेदार [Partners] ठहरा रखा है! फिर मेरे ख़िलाफ़ कोई साज़िश रचो! और मुझे बिल्कुल भी मत छोड़ो! (फिर देखो क्या होता है!) (195)
मेरा रखवाला तो बस अल्लाह है : उसी ने यह किताब [क़ुरआन] उतारी है, और वही है जो अच्छे व सच्चे लोगों की रक्षा करता है, (196)
मगर उसे छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो, वे तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकते, अरे वे तो ख़ुद अपनी भी मदद नहीं कर सकते." (197)
अगर तुम  [ईमानवाले] ऐसे लोगों को सही मार्ग की ओर बुलाओ, तो वे कभी तुम्हारी पुकार नहीं सुनते हैं। [ऐ रसूल!] अगर आप उनको देखें, तो ऐसा लगेगा कि वे आपकी तरफ़ ताक रहे हैं, मगर असल में वे आपको नहीं देखते. (198)
(फिर भी) उदारता व क्षमा [Tolerance] से काम लें, और जो सही काम है उसका हुक्म देते रहें : जाहिलों की तरफ़ ध्यान न दें. (199)
अगर शैतान तुम्हें कुछ (ग़लत) करने पर उकसाए, तो अल्लाह की शरण माँगो---- वह सब कुछ सुनता, सब कुछ जानता है---- (200)
जो लोग अल्लाह को हर समय अपने ध्यान में रखते हुए बुराइयों से बचते हैं, उन्हें जब शैतान कुछ (ग़लत) करने पर उकसाता है, तो उन्हें तुरंत अल्लाह का ध्यान हो आता है, और उनकी आँखें खुल जाती हैं; (201)
शैतानों के पीछे चलनेवाले लोगों को, शैतान और अधिक गुमराही में लगातार घसीटता हुआ लिए जाता है, और फिर वे रुक नहीं सकते. (202) 
[ऐ रसूल], जब आप उनके पास कोई नई आयत [निशानी] लेकर नहीं जाते हैं, तो वे कहते हैं, "क्या तुम कोई एक निशानी की माँग नहीं कर सकते?" कह दें, "मेरे रब की तरफ़ से जो 'वही'[Revelation] मुझ पर उतारी जाती है, मैं तो बस उसी को दोहरा देता हूँ : आपके रब की तरफ़ से उतरी हुई ये आयतें [क़ुरआन], (लोगों में) गहरी समझ बढ़ाती हैं, और ईमान रखनेवालों के लिए यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत है," (203)
तो [मुसलमानो], जब क़ुरआन पढ़ी जाए तो उसे ध्यान से और ख़ामोशी से सुना करो, ताकि तुम पर दया की जा सके. (204)
[ऐ रसूल!], अपने रब को मन ही मन में याद किया करें, सुबह के वक़्त भी और शाम के वक़्त भी, पूरी विनम्रता और (रब से) डरते हुए, और ज़बान से भी पुकारें, बिना ऊँची आवाज़ किए हुए ----- और उन लोगों में से न हो जाएं जो इन बातों को बिल्कुल भुलाए बैठे हैं------ (205)
यहाँ तक कि जो [फ़रिश्ते] आपके रब के सामने मौजूद रहते हैं, वे कभी अपनी अकड़ दिखाते हुए उसकी बंदगी न करें, ऐसा कभी नहीं होता : वे उसकी महिमा का बखान करते रहते हैं और उसके सामने सिर झुकाए रहते हैं. (206)
सूरह 72 : अल जिन्न [The Jinn]  


    अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

1. (ऐ रसूल) आप कह दें : मेरी ओर “वही”[revelation] भेजी गयी है कि जिन्नों* के एक दल ने (मेरे क़ुरआन पढने को) ध्यान से सुना, तो (जाकर अपनी क़ौम से) कहने लगे: “ बेशक हमने एक अजीब कुरआन सुना है o
 * जिन्न आग से पैदा किए गए हैं जो हमें दिखायी नहीं देते.

2. जो अच्छाई की राह पर चलने का रास्ता दिखाता है, इसलिये हम उस पर ईमान ले आए  है, और अब हम अपने रब के साथ किसी को (इबादत में) कभी शरीक [साझेदार,  partner]  नहीं ठहराएँगेo

3. और यह कि “ हमारे रब की शान बहुत बुलंद है, उसने न कोई पत्नी बना रखी है और न ही कोई औलाद” o

4. और यह कि “ हम में से कुछ मूर्ख लोग अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहा करते थे जो सच्चाई से बहुत दूर थीं” o

5. और यह कि “ (हालाँकि) हमने यह समझा था कि इंसान और जिन्न अल्लाह के बारे में कभी झूठ  नहीं बोल सकते” o

6. और यह कि “ इंसानों में से कुछ लोग जिन्नों के कुछ लोगों की शरण लेते थे, इस तरह  उन लोगों ने जिन्नों को और सर चढा दिया था”  o

7. “ और वे इंसान भी ऐसा ही समझने लगे जैसा कि तुमने (ए जिन्नों के समूह!) समझा कि अल्लाह (मरने के बाद) कभी किसी को दोबारा नहीं उठाएगा” o

8. और यह कि “ हम (जिन्नों) ने आसमानों को टटोलना चाहा तो उन्हें कड़े पहरेदारों और (अंगारों की तरह) जलने और चमकने वाले सितारों [shooting stars] से भरा हुआ पाया o

9. और यह कि “ हम (पहले आसमानों की सुन-गुन लेने के लिए) उसके [आसमान के] कुछ स्थानों पर बैठ जाया करते थे, मगर अब जो कोई (चोरी छुपे) सुनना चाहे तो वह देखता है कोई आग की लौ उसके घात में लगी हुई है” o

10. और यह कि “ (सो अब) हम नहीं जानते कि (हमारे ऊपर रोक लगाने से) ज़मीन पर रहने वालों के साथ कोई बुरा मामला करने का इरादा किया गया है या उनके रब ने उनके साथ भलाई का (व सीधा रास्ता दिखाने का) इरादा किया है” o

11. और यह कि “ हम में से कुछ अच्छे लोग हैं और हम (ही) में से कुछ ऐसे नहीं हैं (यानी बुरे हैं) और हम विभिन्न तरीक़ों पर (चल रहे) हैं” o

12. और यह कि “ हमने यक़ीन कर लिया है कि हम अल्लाह को कभी ज़मीन में (रहकर) आजिज़ [frustrate] नहीं कर सकते और न ही (धरती से कहीं और) भाग कर उसे हरा सकते हैं” o

13. और यह कि “ जब हमने रास्ता दिखाने वाली (किताब) को सुना तो हमने उसका विश्वास किया , फिर जो आदमी अपने रब पर विश्वास करता है तो वह न नुकसान से भयभीत होता है और न जुल्म (अन्याय) से” o

14. और यह कि “ हम में से (कुछ) आज्ञाकारी [यानि मुसलमान ] भी हैं और हम में से (अब भी कुछ) ग़लत रास्ते पर हैं, फिर जो कोई आज्ञाकारी हो गया तो ऐसे ही लोगों ने भलाई व सूझ-बूझ की राह ढूँढ ली”0

15. “ और रहे वह लोग जो ज़ालिम [सच्चाई से मुँह मोड़ने वाले] हैं तो वह जहन्नम का ईंधन बनने वाले हैं” o

16. और (ऐ रसूल आप मक्का के लोगों से कह दें कि) यह (“वही” भी मेरे पास आयी है) कि अगर यह लोग सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए जमे रहते तो हम उनके लिये बड़ी मात्रा में पीने का पानी उपलब्ध करा देतेo

17. ताकि हम इस (नेमत के द्वारा) उनकी परीक्षा ले सकें और जो कोई व्यक्ति अपने रब की याद से मुंह मोड़ेगा तो वह [अल्लाह] उसे बहुत सख्त अज़ाब [यातना] में डाल देगा o

18. और यह कि सभी मस्जिदें अल्लाह के लिए (विशेष) हैं, सो उनमें अल्लाह के साथ किसी और की इबादत [पूजा] मत किया करो o

19. और यह कि जब अल्लाह के बंदे (मुहम्मद सल्ल.) उसकी इबादत करने खड़े हुए तो (जिन्नों के) समूह के समूह वहाँ जमा हो गये (ताकि उनको क़ुरआन पढते हुए सुन सकें) o

20. आप कह दें कि “ मैं तो केवल अपने रब की इबादत करता हूँ और उसके साथ किसी को साझेदार या शरीक नहीं मानता” o

21. आप कह दें कि “ न तुम्हारा कोई नुकसान (यानी तुम्हारा कुफ़्र) मेरे अधिकार में है और न भलाई (यानी तुम्हारा ईमान लाना)”  (अर्थात असली मालिक अल्लाह है, रसूल तो  अल्लाह और बंदे के बीच एक माध्यम हैं) o

22. आप कह दें कि “ न मुझे कभी कोई अल्लाह के (हुक्म के खिलाफ) अज़ाब से बचा सकता है और न मैं उसे छोड़कर कोई पनाह की जगह पा सकता हूँ “ o

23. मगर अल्लाह की ओर से आदेश और संदेश पहुंचाना (मेरी जिम्मेदारी है), और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल (स.) की बात न मानेगा तो निश्चित रूप से इसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें ऐसे लोग हमेशा रहेंगे o

24. (और वे लोग बुराई पर अड़े रहेंगे) यहां तक ​​कि जब वे (अज़ाब) देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जा रहा है तो (उस समय) उन्हें पता चल जायेगा कि किसके मददगार कमजोर हैं और कौन संख्या में कम है o

25. आप कह दें: “ मैं नहीं जानता कि जिस (क़यामत के दिन) से तुम्हें डराया जा रहा है वह करीब है या इसके लिए मेरे रब ने कोई लंबी अवधि निर्धारित कर रखी है”  o

26. (वही) सारे भेद का जानने वाला है, इसलिये वह अपने भेद के बारे में किसी (आम आदमी) को नहीं बताताo

27. सिवाय किसी पैग़म्बर के जिसे उसने (इस काम के लिये) पसंद कर लिया हो, ऐसी सूरत में वह उस पैगम्बर के आगे और पीछे (भेद की बातों की रक्षा के लिए) कुछ रक्षकों को लगा  देता है o

28. ताकि अल्लाह (यह) जान ले कि बेशक उनके (रसूलों) ने अपने रब के संदेश पहुंचा दिए, और (अल्लाह के आदेश और भेद की बातों के ज्ञान में से) जो कुछ उनके पास है अल्लाह को (पहले से) इनकी सारी जानकारी है, और उसने हर हर चीज़ का हिसाब कर रखा है o  

सूरह 36 : या-सीन [Ya Sin]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

या॰ सीन॰ (1)

 ज्ञान [हिकमत] से भरे हुए क़ुरआन की क़सम,  (2)

  [ऐ मुहम्मद] आप सचमुच भेजे गए पैग़म्बरों[ messengers] में से एक हैं ,  (3) 
बिल्कुल सीधे मार्ग पर,   (4)

 यह (क़ुरआन) उस रब की तरफ़ से उतारा जा रहा है जिसके क़ब्ज़े में सारी ताक़त है, और वह बहुत दया करनेवाला है ,  (5)

 ताकि आप ऐसे लोगों को सावधान कर दें, जिनके बाप-दादा को सावधान नहीं किया गया था ; इस कारण वे इन बातों को नहीं जानते हैं.  (6)

 उनमें से अधिकतर लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो चुका है, क्योंकि उन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार कर दिया है । (7) 

(ऐसा लगता है मानो) हमने उनकी गर्दनों में ठोड़ियों[chin] तक लोहे की ज़ंजीर बाँध दी हो, जिससे उनके सिर ऊपर की तरफ़ अकड़े हुए हों,  (8)

 और हमने एक रोक [barrier] लगा दी हो, उनके आगे भी और उनके पीछे भी, और उनकी नज़रों को छेंक लिया हो : सो वे कुछ देख नहीं सकते.   (9)

 आप उन्हें चेतावनी दें या न दें, उनके लिए तो दोनों ही बराबर है : वे (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करेंगे.  (10)

 आप तो बस ऐसे ही लोगों को सावधान कर सकते हैं  जो (क़ुरआन की) नसीहत पर चलते हों और अपने दयालु रब का डर रखते हों, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते :  ऐसे लोगों को उनके गुनाहों की माफ़ी और एक बड़े  इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दें . (11)

निस्संदेह हम-- मुर्दों को दोबारा ज़िंदा करेंगे, और हम लिखते रहते हैं जो कुछ (कर्म) वे अपने आगे भेजते हैं और साथ ही जो कुछ (अपने कर्मों के प्रभाव) वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं : हम एक स्पष्ट किताब में हर एक चीज़ का हिसाब-किताब रखते हैं .  (12)

[ऐ रसूल] आप उनके सामने उन लोगों का उदाहरण बताएं जिनकी बस्ती में (अल्लाह का संदेश लेकर) रसूल आए थे  (13)

 हमने (शुरू में) दो रसूल [messengers] भेजे, मगर उन लोगों ने दोनों को मानने से इंकार कर दिया। फिर  हमने तीसरे (रसूल) के द्वारा उनकी ताक़त बढायी, तब उन (रसूलों) ने कहा, "यक़ीन करो, हम तुम्हारी ओर (अल्लाह का संदेश) लेकर आए हैं ।" (14)

 उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो। रहम करनेवाले रब ने कोई भी चीज़ नहीं भेजी है; तुम तो केवल झूठ बोल रहे हो।" (15)

 उन (रसूलों) ने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी ओर भेजे गए हैं  (16)

 औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो बस तुम तक संदेश पहुँचा देने की है।" (17)

 वे जवाब में बोले, "हम तो तुम्हें अपशगुन [evil omen] समझते हैं, यदि तुम नहीं माने तो हम तुम्हें पत्थर से मारेंगे और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दर्दनाक यातना पहुँचेगी।" (18)

 रसूलों ने कहा, "तुम्हारा अपशगुन तो तुम्हारे अपने अंदर है। तुमलोग इस चीज़ को अपशगुन क्यों मानते हो, जबकि तुम्हें (सच्चाई की याद दिला कर) चेताया जा रहा है ? असल में तुम लोग (गुनाहों में) बहुत दूर जा चुके हो! " (19) 
फिर शहर के दूसरे छोर से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इन रसूलों का कहना मान लो । (20)

 इनके बताए हुए रास्ते पर चलो : वे तुम से कोई मज़दूरी तो नहीं मांग रहे हैं, और वे सीधे मार्ग पर हैं  (21)

 "और मैं उसकी बन्दगी क्यों न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया ? और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है.  (22)

 मैं उस (अल्लाह) को छोड़ कर दूसरे देवताओं को कैसे अपना ख़ुदा मान लूँ, जबकि अगर रहम करनेवाला ख़ुदा मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे, तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कोई काम आ सकेगी और न तो वे मुझे बचा ही  सकेंगे ? (23)
 तब तो मैं साफ़ तौर से ग़लत रास्ते में पड़ जाऊँगा. (24)

 मैं तो आपके रब में विश्वास करता हूं , अतः मेरी बात सुनो!" (25)

 (अंतत:  बस्तीवालों ने शायद उसे शहीद कर दिया, तब अल्लाह की तरफ से) कहा गया, "प्रवेश करो जन्नत में!"  उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग यह बात जान पाते (26)

 कि किस तरह मेरे रब ने मुझे क्षमा कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में शामिल कर लिया !" (27)

उसके बाद उसकी क़ौम पर हमने आसमान से कोई सेना नहीं उतारी और न हमें उतारने की कोई ज़रूरत थी :(28)

 वह तो केवल एक ज़ोरदार आवाज़ थी जिससे वे बेजान होकर गिर गए (29)

  अफ़सोस है मनुष्य जाति पर! जब कभी कोई रसूल उनके पास आया, वे उसका मज़ाक़ ही उड़ाते रहे.  (30

क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हमने तबाह बर्बाद कर दिया, जिनमें से कोई भी अब कभी लौट कर उनके पास आने वाला नहीं है ? (31)

 मगर यह सबके सब लोग हमारे सामने इकट्ठा कर के हाज़िर किए जाएँगे ? (32)
 और उनके लिए एक निशानी तो वह ज़मीन है जो मुर्दा पड़ी हुई थी : हमने उसे जीवित किया और उससे अनाज उगा दिए, जिसमें से वे खाते हैं.  (33
और हमने उसमें खजूरों और अंगूरों के बाग लगाए हैं और उसमें से पानी के सोते प्रवाहित कर दिए हैं    (34)

ताकि वे उसके फल खा सकें - हालाँकि यह सब कुछ उनके हाथों का बनाया हुआ नहीं है - तो क्या फिर भी वे शुक्र नहीं अदा करेंगे ? (35)

 महिमावान है वह जिसने हर चीज़ को जोड़े जोड़े में (और तरह-तरह का) पैदा किया है--- धरती जो चीजें उगाती है उनमें से भी और स्वयं उन इंसानों में से भी और उन चीज़ों में से भी जिनको वे अभी नहीं जानते! (36)

 और एक निशानी उनके लिए रात भी है : हम उसपर से दिन की रौशनी को खींच लेते हैं, फिर क्या देखते हैं कि वे अचानक अँधेरे में रह गए (37)

 और सूर्य  भी अपने नियत रास्ते पर चलता रहता है जिसे सबसे ताक़तवाले और सबसे  ज्ञानी (अल्लाह) ने उसके लिए तय किया है (38)

 और  चाँद की भी हमने मंज़िलें [phases] हिसाब कर के तय कर रखी हैं , यहाँ तक कि वह (अपनी मंज़िलें तय करता हुआ) फिर खजूर की पूरानी टहनी  की तरह (पतला) हो जाता है.  (39)

 न सूर्य ही से हो सकता है कि चाँद को जा पकड़े और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है : हर एक (ग्रह, तारे) अपनी अपनी कक्षा में तैर रहे हैं. (40)

और एक निशानी उनके लिए यह भी है कि हमने आदमी की पूरी एक नस्ल को भरी हुई (नूह की) नौका में सवार कर (बचा)  लिया था, (41)

 और हमने उनके लिए उस(नौका) की तरह (सवारी करने की) कई चीज़ें बनायीं, जिनपर वे सवारी करते हैं  (42)

और अगर हम चाहें तो उन्हें पानी में डुबा दें, फिर कोई न होगा जो इनकी मदद कर सके : उन्हें बचाया नहीं जा सकेगा. (43)

 यह तो बस हमारी दयालुता [mercy] है कि हमने उन्हें थोड़े समय के लिए ज़िंदगी के मज़े उठाने की मोहलत दे रखी है.  (44)

 इसके बावजूद जब उनसे कहा जाता है कि बच कर रहो (उस यातना से), जो तुम्हारे आगे (आनेवाली दुनिया में) भी है और जो तुम्हारे पीछे (इस दुनिया में) भी है, ताकि तुम पर रहम (दया) किया जा सके , (45)

 मगर वे अपने रब की तरफ से आयी हुई हर एक निशानी को नज़रअंदाज़ [ignore] कर देते हैं,  (46)

और जब उनसे कहा जाता है कि "अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी तुम्हें दी है उनमें से ख़र्च करो", तो (सच्चाई से) इंकार करनेवाले[काफ़िर] ईमानवालों से कहते हैं, " हम उन लोगों को खाना क्यों खिलाएँ जिन्हें अगर अल्लाह चाहता तो स्वयं ही खिला देता? असल में तुम तो पूरी तरह मार्ग से भटक चुके हो।" (47)

 और वे कहते हैं कि " अगर तुम्हारी बात सच्ची है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (48)

असल में, वे तो बस एक ज़ोरदार धमाके की प्रतीक्षा में हैं जो उन्हें (अचानक) आ पकड़ेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे (49)

 फिर न तो उन्हें कोई वसीयत करने का समय मिल पाएगा  और न अपने घरवालों की ओर लौट कर जा  सकेंगे (50)

 (जब) नरसिंघे[Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा और देखोगे कि अचानक-- वे अपनी क़ब्रों से निकलकर अपने रब की ओर तेज़ी से चल पड़ेंगे,  (51)

 (क़यामत देख कर) कहेंगे, " अफ़सोस हम पर! किसने हमें आराम करने की जगहों से उठा खड़ा किया है?” (उनसे कहा जाएगा) यह वही चीज़ है जिसका वादा रहम करनेवाले रब ने किया था, और रसूलों ने सच कहा था।" (52)

बस बड़े ज़ोर का एक ही धमाका होगा और फिर देखोगे कि अचानक वे सबके-सब हमारे सामने हाज़िर कर दिए गए. (53)

आज के दिन किसी जान पर रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा और तुम्हें बदले में कुछ और नहीं, बल्कि वही मिलेगा जो कुछ कर्म तुम किया करते थे.  (54)

सचमुच जन्नतवाले लोग आज अपने पसंदीदा कामों में मगन हैं  (55)

 वे लोग और उनके पति-पत्नियाँ घनी छाँव में तख़्तों पर तकिया लगाए हुए बैठे हैं (56)

 उनके लिए वहाँ (हर तरह का) फल है, और वह सब कुछ मौजूद है जिसकी वे माँग करें.  (57)

 दया करनेवाले रब की तरफ़ से उन्हें सलामकहा जाएगा .  (58)

 [काफ़िरों से कहा जाएगा] " मगर ऐ अपराधियों! आज तुम (नेक लोगों से) अलग हट जाओ! (59)

 क्या मैंने तुम्हें यह आदेश नहीं दिया था, ऐ आदम के बेटो!, कि शैतान की पूजा न करो क्योंकि सचमुच वह तुम्हारा खुला दुश्मन  है,  (60)

 बल्कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है (61)

 उसने तुममें से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सही मार्ग से भटका दिया। तो क्या तुम ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया (62)

 यह वही जहन्नम है जिसकी तुम्हें धमकी दी जाती थी.  (63)

 आज इस (आग) में दाख़िल हो जाओ, इस कारण से कि तुम (मेरे आदेशों को) मानने से हमेशा इंकार करते रहे हो ।" (64)

 और उस दिन हम उनके मुँह को बंद करके सील कर देंगे, मगर उनके हाथ हमसे बातें करेंगे, और उनके पाँव उन कर्मों की गवाही देंगे, जो कुछ भी उन्होंने किया है. (65)
 अगर हम ऐसा चाहते तो(इसी दुनिया में) उनकी आँखों की रौशनी छीन लेते. वे रास्ते की तलाश में मारे मारे फिरते, मगर वे कैसे देख पाते(66)

अगर हम ऐसा चाहते तो जहाँ वे खड़े हैं, वहीं उनके शरीर को बेकार कर देते जिससे न वह आगे बढ पाते और न ही पीछे हट पाते. (67)

अगर हम किसी को लम्बी उम्र देते हैं , तो उसके (शरीर के) विकास को उलट [कमज़ोर कर] देते हैं.  फिर भी वे बुद्धि से काम नहीं लेते(68)

 हमने उन (रसूल) को कविता (का हुनर) नहीं सिखाया और न ही कभी भी वह कवि के रूप में जाने गए हैं । यह क़ुरआन, और कुछ नहीं बल्कि लोगों को याद दिलाने के लिए [reminder] उतारी गई है, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है (69)

 ताकि वह ऐसे आदमियों को चेतावनी दे सकें जो सचमुच ज़िंदा (दिल रखते) हों, और यह कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के ख़िलाफ़ अल्लाह अपना फ़ैसला सुना सके.  (70)

क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से उनके लिए चौपाए [मवेशी, livestock] पैदा किए, जिनके अब वे मालिक हैं?,  (71)
 और उन(मवेशियों) को उनके वश में कर के सधा दियाताकि उनमें से कुछ तो उनके लिए सवारियों के काम में आते हैंकुछ खाने के काम में,  (72)

 कुछ मवेशियों से दूसरे कई फ़ायदे हैंतो कुछ पीने के काम में आते हैं ? तो क्या वे (हमारा) शुक्र नहीं अदा करेंगे ?  (73)

 मगर इसके बावजूद उन्होंने अल्लाह को छोड़ कर दूसरों को अपना भगवान बना रखा है कि शायद उनसे उन्हें कोई मदद मिल जाए,  (74)

  हालाँकि वे उनकी कोई मदद नहीं कर सकते चाहे वे अपनी पूरी फ़ौज को ही एक साथ क्यों न बुला लें ! (75)

 अतः [ऐ रसूल] आप उनकी बातों से दुखी न हों : हम जानते हैं जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ वे सामने कहते हैं.  (76)

 क्या आदमी नहीं जानता कि हमने उसे वीर्य[sperm] की एक बूंद से पैदा कियातब भी क्या देखते हैं कि वह खुल कर (क़ुरआन और क़यामत पर) झगड़े करता है(77)

  हमारे ख़िलाफ़ तर्क-वितर्क करता है मगर ख़ुद अपनी पैदाइश को भुला बैठा है। कहता है, "कौन इन हड्डियों में फिर से जान डालेगाजबकि वे सड़-गल चुकी होंगी?" (78)

कह दें, "उनमें वही फिर से जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया था : वह तो पैदा करने के हर एक काम की पूरी पूरी जानकारी रखता है(79)
 वही तो है जिसने तुम्हारे लिए हरे पेड़  से आग पैदा कर दीफिर तुम उससे अपने लिए आग सुलगा लेते हो ।" (80) 

 जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया हैक्या उसे इसकी ताक़त नहीं कि उन जैसे लोगों को (दोबारा) पैदा कर सके ? बिल्कुल है ! वह तो ऐसी रचना करनेवाला है जो सब कुछ जानता है :  (81)

 उसका मामला तो यह है कि जब वह किसी चीज़ (के पैदा करने) का इरादा करता है तो बस इतना कहता है कि---  "हो जा!" और वह हो जाती है82)


 अतः महिमा है उसकीजिसके हाथ में हर चीज़ का पूरा नियंत्रण[Control] है। और उसी के पास तुम सबको ले जाया जाएगा.”  (83)

  

सूरह 25:  अल फ़ुरक़ान

[सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ बतानेवाली किताब, The Differentiator]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने अपने बन्दे पर एक ऐसी किताब उतारी है, जो सच को झूठ से अलग करनेवाली है, ताकि सारी दुनिया के लोगों को सावधान किया जा सके. (1)

 वही है जिसके पास आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण[control] है, और उसकी कोई संतान नहीं है ---- कोई नहीं है जो उसके नियंत्रण व क़ब्ज़े में उसका साझीदार[Partner] हो--- और उसी ने सारी चीज़ें पैदा की हैं और उन्हें बिल्कुल नपे-तुले अन्दाज़े के मुताबिक़ बनाया है . (2)

इसके बावजूद, विश्वास न करनेवालों[काफ़िर] ने अल्लाह को छोड़कर ऐसे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा है, जो किसी चीज़ को पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो स्वयं पैदा किए जाते हैं, न तो वे कोई नुक़सान पहुँचा सकते हैं, न ही ख़ुद अपनी मदद ही कर सकते हैं, और उनके हाथ में न किसी की मौत है, न जीवन है, और न ही मरे हुए को दोबारा ज़िंदा उठाया जाना है. (3)

 विश्वास न करनेवाले[काफ़िर] कहते हैं, "यह(क़ुरआन) तो बस मनघड़ंत चीज़ है जो इस (रसूल) ने दूसरों की मदद से गढ़ ली है” ---- (मगर) इनलोगों ने तो ख़ुद ही बहुत शैतानियाँ की हैं और अब झूठ बकने पर उतर आए हैं---- (4)

 वे कहते हैं, "ये(क़ुरआन) तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं, जिनको इस (रसूल) ने लिख रखा है : वह (अफ़साने) उसे सुबह और शाम लिखवाए जाते हैं।" (5)

 कह दें, "इस (क़ुरआन) को उस (अल्लाह) ने उतारा है जो आसमानों और ज़मीन के रहस्य जानता है। सचमुच ही वह बहुत माफ़ करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (6)

 उनका यह भी कहना है, "यह किस तरह का रसूल है जो (आम आदमी की तरह) खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है! किसी फ़रिश्ते को क्यों नहीं भेजा गया जो लोगों को सावधान करने में इसकी मदद करता ? (7)

 क्यों नहीं इसे ऊपर से कोई ख़ज़ाना या कोई बाग़ दे दिया गया, जिसमें से यह खाता पीता? "और यह शैतानियाँ करनेवाले(मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम लोग जिस आदमी के पीछे चल रहे हो, उस पर कुछ और नहीं, बस जादू हो गया है !" (8)

 [ऐ रसूल] देखें, आपके बारे में वे कैसी कैसी बातें सोचते हैं ! वे रास्ते से पूरी तरह भटक चुके हैं और अब सही रास्ते पर नहीं आ सकते.  (9)

 बड़ी ऊँची शान है उस(आल्लाह)की जो अगर चाहे, तो आपको इनसे भी बढ़िया चीज़ें दे सकता है: बहुत से बाग़ और उनके नीचे से बहती हुई नहरें, और (रहने के लिए) कई महल भी. (10)

 असल में, वे लोग आनेवाली (क़यामत की) घड़ी को मानने से इंकार करते हैं: और जो उस घड़ी के आने को नहीं मानता, उसके लिए हम ने दहकती हुई आग तैयार कर रखी है. (11)

जब वह (जहन्नम की आग) उनको दूर से देखेगी, तो वे लोग उसके बिफरने और ग़ुस्से में चिल्लाने की आवाज़ें सुनेंगे, (12)

 और जब उनके हाथ-पाँव बाँध कर उस (आग) के एक पतले से हिस्से में उन्हें फेंक दिया जाएगा, तब वे अपनी मौत को पुकारने लगेंगे. (13)

 (उनसे कहा जाएगा,) "आज  के दिन तुम केवल एक मौत को नहीं, बल्कि कई मौतों को पुकारो!" (14)

 आप कहें, "(बताओ) यह अच्छा रहेगा या हमेशा रहनेवाला वह बाग़? --- जो उनका इनाम होगा और उनके सफ़र का अंत भी---- जिसका वादा उन लोगों से किया गया है जिन्होंने अल्लाह को हर समय अपने ध्यान में बसा रखा है।" (15)

 उनके लिए वहाँ वह सब कुछ होगा, जो वे चाहेंगे, और वहाँ वे हमेशा रहेंगे। [ऐ रसूल] यह आपके रब की तरफ़ से एकदम पक्का वादा है. (16)

 उस (क़यामत के) दिन जब अल्लाह सभी को इकट्ठा करेगा-- उनको भी जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, फिर वह कहेगा, "क्या तुम ही वह [झूठे ख़ुदा] थे जिसने मेरे बन्दों को रास्ते से बहका दिया था, या वे स्वयं ही मार्ग छोड़ बैठे थे?" (17)

 वे कहेंगे, "महान और बहुत ऊँचा है तू! हम ख़ुद तो तुझे छोड़कर कभी किसी और को अपना मालिक बना ही नहीं सकते थे! मगर  हुआ यह कि तूने उन्हें औऱ उनके बाप-दादा को इस जीवन में मौज-मस्ती के ख़ूब  सामान दे दिए, यहाँ तक कि वे तेर्री चेतावनी [Reminder] को भुला बैठे और बर्बाद होकर रहे।" (18)

 [अल्लाह कहेगा], “ अब जबकि तुम्हारे (ठहराए हुए) ख़ुदाओं ने भी तुम्हारी बातों को झूठी होने की घोषणा कर दी है : तो अब तुम सज़ा से बच नहीं सकते; तुम्हें कोई मदद नहीं की जाएगी.तुममें से कोई भी अगर ऐसी शैतानी करता है, तो हम उसको ज़रूर बड़ी दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे. (19)


 [ऐ मोहम्मद] आपसे पहले हमने कोई भी रसूल[Messenger] ऐसा नहीं भेजा, जो (आम लोगों की तरह) खाना न खाता हो या बाज़ारों में चलता- फिरता न हो । मगर हमने तुम में से कुछ को ऐसा बनाया है जिसके द्वारा दूसरे लोगों को जाँचा-परखा जा सके---- " तो क्या तुम धैर्य व सब्र से काम लोगे ?" तुम्हारा रब तो सब कुछ देख रहा है. (20)

जिन्हें (अंत में) हमारे सामने हाज़िर होने की उम्मीद (या डर) नहीं है, कहते हैं, "फ़रिश्तों को क्यों नहीं उतार कर हमारे पास भेजा जाता है ? या फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि हम अपने रब को देख पाते ?" वे घमंड में अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगे हैं और दूसरों को बहुत छोटा समझते हुए हदें तोड़ने में लगे हैं.(21)

 जिस(क़यामत के) दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे, वह अपराधियों के लिए कोई ख़ुशी का दिन न होगा. फ़रिश्ते कहेंगे, “ तुम्हारे लिए उस (जन्नत के दरवाज़े) के अंदर जाने पर रोक[barrier] लगी हुई है”!, (22)

और फिर हम (हिसाब-किताब के लिए) उनके किए गए कर्मों पर नज़र डालेंगे, और उसे धूलकण (जैसा बेकार) बना देंगे. (23)

 मगर उस दिन जो लोग जन्नत[बाग़] में होंगे, उनके पास रहने की जगह भी बहुत बेहतर होगी, और आराम करने की जगह भी बहुत अच्छी होगी. (24)

 उस दिन सारे आसमान और उसके बादल फट पड़ेंगे, और फ़रिश्तों को इस तरह उतारा जाएगा कि  ताँता लग जाएगा, (25)

 उस दिन, वास्तव में सारा अधिकार[Authority] तो रहम व दया करनेवाले रब का ही होगा. विश्वास न करनेवालों के लिए वह  दिन बड़ा ही कठिन होगा. (26)

 उस दिन शैतानी करनेवाला ख़ुद अपने हाथ चबा लेगा और कहेगा, "काश! मैं भी रसूल के बताए हुए मार्ग पर चला होता ! (27)

 हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने उस उस आदमी से दोस्ती न की होती! (28)

  मेरे पास जबकि (अल्लाह का) संदेश आ चुका था, तब भी उस(दोस्त) ने मुझे उससे भटका दिया । शैतान ने तो हमेशा ही आदमी को धोखा दिया है ।" (29)

 रसूल ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोग इस क़ुरआन के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे कि यह कोई छोड़ देनेवाली चीज़ हो, " (30)

 मगर हम ने हमेशा हर नबी के साथ गुनाहगारों में से ही दुश्मनों को भी नियुक्त किया है : आपका रब मार्गदर्शन देने और मदद कॆ लिए काफ़ी है। (31)
 विश्वास न करनेवाले यह भी कहते हैं, "उसपर पूरी क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारी  गयी?" हम ने इसे इस तरह (थोड़ाथोड़ा कर के) इसलिए उतारा है ताकि इसके द्वारा [ऐ रसूल] आपका दिल मज़बूत कर सकें ; और हमने इसे (फ़रिश्ते के द्वारा) ठहर ठहर के आपको पढ़वाया है.  (32)

और जब भी वे अपनी बात को साबित करने के लिए कोई दलील या मिसाल देते हैं, तो हम (पहले ही) उस बात की असल सच्चाई को ठीक ढ़ंग से
बता देते हैं, और चीज़ों को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर देते हैं.  (33)

 जो लोग औंधे मुँह जहन्नम की ओर हँका के  ले जाए जाएँगे, वे लोग सबसे बुरी जगह में होंगे----वे ही सीधे व सही मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं.  (34)

हमने मूसा को किताब[तोरैत] दी थी और उनके भाई हारून को मददगार के रूप में उनके साथ लगा दिया था.  (35)

 हम ने कहा था,  "तुम दोनों उन लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया है।" बाद में हमने उन लोगों को पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया. (36)

 और नूह की क़ौम के लोगों ने भी : जब रसूलों को झूटा कह कर मानने से इंकार कर दिया तो हमने उन्हें पानी में डुबा डाला, और तमाम लोगों के लिए(इस घटना को) एक मिसाल बना दिया. हम ने शैतानी करनेवालों के लिए एक दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है,  (37)

 जैसा कि आद, समूद और अर-रस्सवाले लोगों और उनके बीच(के काल) की बहुत-सी नस्लों को भी हम ने बर्बाद कर दिया। (38)

 उनमें से हर एक को हम ने(पहले) चेतावनियाँ दीं, और हर एक को अंत में पूरी तरह से तबाह-बर्बाद कर दिया. (39)

 ये विश्वास न करनेवाले लोग तो ज़रूर उस बस्ती से हो कर गुज़रे होंगे,  जिसे एक भयानक बारिश द्वारा तहस नहस कर दिया गया था---- क्या उन्होंने नहीं देखा ?  इसके बावजूद, वे मरने के बाद, दोबारा जीवित होकर उठाए जाने की आशा नहीं रखते हैं. (40)

 [ऐ रसूल] वे जब भी आपको देखते हैं, आपका यह कह कर मज़ाक़ उड़ाते हैं : "क्या यही है जिसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है?(41)

 इसने तो क़रीब क़रीब हमें अपने देवताओं से भटका ही दिया होता, अगर हम उनकी भक्ति में मज़बूती से जम न गए होते।" जब वे यातना को देखेंगे, तो वे जान जाएंगे कि कौन सही मार्ग से बहुत दूर भटका हुआ था.  (42)

 [ऐ रसूल] आप उसके बारे में ज़रा सोचें, जिसने अपनी ख़्वाहिशों को
 अपना ख़ुदा बना रखा है : तो क्या आप उसके (देखरेख की) ज़िम्मेदारी ले सकते हैं ? (43)

या क्या आपको ऐसा लगता है कि इनमें से ज़्यादातर लोग सुनते या समझते हैं ? वे तो एकदम चौपायों की तरह हैं--- नहीं, बल्कि वे सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़े हैं !(44)


 क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारा रब कैसे छाया[shadow] को लम्बी कर देता है ? अगर वह चाहता, तो उसे एक जगह स्थिर रख देता---  फिर हमने  सूरज को (छाया के लिए) रास्ता दिखानेवाला[indicator] बनाया(45)

 मगर हम उस (छाया) को थोड़ा-थोड़ा कर के (छोटी करते हुए) अपनी ओर समेट लेते हैं.  (46)

वही है जिसने रात को तुम्हारे लिए वस्त्र [garment] बनाया, और नींद को बनाया आराम करने के लिए, और दिन को फिर से जी उठने का समय बनाया। (47)

वही है जो हवाओं को पहले भेज देता है जो (बारिश के रूप में) अल्लाह की रहमत की ख़ुशख़बरी ले कर आती हैं।  और हम ही हैं जो आसमान से साफ़ पानी उतारते हैं, (48)

 ताकि हम इससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को दोबारा जीवन प्रदान करें, और उससे अपने पैदा किए हुए बहुत-से जानवरों और आदमियों के लिए  पीने का सामान कर दें। (49)

 और हम इस (बारिश) को लोगों के बीच (अलग अलग जगहों पर) अलग अलग समय बाँटते रहते हैं, ताकि वे इससे शिक्षा ले सकें, परन्तु अधिकतर लोग शुक्रिया  अदा नहीं करने के आदी बन चुके हैं। (50)

अगर हम ऐसा चाहते, तो हर बस्ती में एक सावधान करनेवाला भेज देते,  (51)
 अतः विश्वास न करनेवालों का [ऐ रसूल] आप कहना मत मानें : इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे कड़ा संघर्ष [जिहाद] करें.(52)

वही है जिसने दो बड़े सागरों को इस तरह बहा दिया कि एक का पानी ताज़ा व मीठा है, और दूसरे का खारा और कड़ुआ, और उन दोनों के बीच उसने एक ऐसी रोक लगा रखी है कि दोनों अपनी सीमाएं नहीं लाँघते हैं. (53)

और वही है जिसने पानी से आदमी को पैदा किया, फिर उसे ख़ून और शादी के संबंधों से जोड़ कर एक रिश्ते में बाँध दिया: तुम्हारा रब बहुत ताक़तवाला है! (54)
 इसके बावजूद वे अल्लाह को छोड़ कर, ऐसी चीज़ों को पूजते हैं जो उन्हें न कोई फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न ही कोई नुक़सान : विश्वास न करनेवालों ने हमेशा ही अपने रब का विरोध करने के लिए कमर कस रखी है.(55)

[ऐ रसूल] हमने तो आपको केवल ख़ुशख़बरी सुनानेवाला और चेतावनी देनेवाला ही  बनाकर भेजा है। (56)

 कह दें, "मैं इस काम के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, हाँ अगर कोई (कुछ देना ही) चाहता है तो उसे चाहिए कि वह अपने रब की ओर जानेवाले मार्ग को अपना ले।" (57)

 तुम उस (अल्लाह) पर भरोसा रखो जो ज़िंदा है और जिसे कभी मौत नहीं आती, और तुम उसकी बड़ाई का गुणगान करते रहो। वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है : (58)

 वही है जिसने आसमानों को और ज़मीन को और जो कुछ उन दोनों के बीच है, सबको छह दिनों में पैदा किया, फिर अपने सिंहासन पर विराजमान हुआ--- वह दया करनेवाला [रहमान] रब है; उसे हर चीज़ की पूरी ख़बर है. (59)

तब भी, उन लोगों से जब कहा जाता है कि "रहमान के सामने झुक जाओ" तो वे कहते हैं, "यह रहमान क्या होता है? जिसके सामने भी तुम कहोगे, क्या हम उसके सामने अपना सर झुका देंगे ?" इससे वे और भी ज़्यादा बिदक जाते हैं. (60)

 बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने आसमानों में तारों के समूह[नक्षत्र] बनाए, और उसमें बनाया एक रौशनी देनेवाला चिराग़ [सूरज], और एक चमकता हुआ चाँद --- (61)

 वही है जिसने रात और दिन को इस तरह बनाया कि वे बारी-बारी से एक-दूसरे के पीछे चले आते हैं--- अत: (यह बातें उसके लिए काम की हैं) जो (इन निशानियों से) सबक़ लेना चाहता हो या (अल्लाह का) शुक्र अदा करना चाहता हो.(62)

रहम करनेवाले रब [रहमान] के बन्दे वह हैं जो धरती पर नम्रता से चलते-फिरते  हैं, और जब जाहिल व बेवक़ूफ़ उनके मुँह लगते हैं, तो वे जवाब में कह देते हैं, "तुम पर सलामती हो!"; (63)

जो अपने रब की इबादत करते हुए रातें गुज़ारते हैं, कभी (सजदे में) झुके हुए, कभी (नमाज़ में) खड़े हो कर (64)

जो यह कहते हैं "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे दूर रख, कि झेलने के लिए सचमुच कितनी दर्दनाक  यातना होगी! (65)

सचमुच यह शैतानी घर होगा, रहने की बहुत ही बुरी जगह!”  (66)

 (अच्छे लोग) वे हैं जो जब ख़र्च करते हैं, तो न फ़ज़ूलख़र्ची करते हैं, और न ही कंजूसी से काम लेते हैं, बल्कि वे इनके बीच एक संतुलन बनाए रखते हैं; (67)

जो लोग अल्लाह के अलावा किसी दूसरे देवी-देवता को न कभी पूजते हैं; और न किसी की जान (बे वजह) लेते हैं जिसे अल्लाह ने हराम क़रार दिया है, सिवाय इसके कि (किसी को क़त्ल करना) न्यायसंगत हो, और न ही वे अवैद्ध शारीरिक संबंध[Adultery] बनाते हैं. [तो जो कोई भी इन बातों को न माने और ऐसे गुनाह करता हो, तो वह दंड का भोगी होगा: (68)

क़यामत के दिन उसकी यातना बढ़ा कर दोगुनी कर दी जाएगी, और वे उसी में हमेशा पड़े रहेंगे, अपमानित होकर, (69)

 सिवाय उसके जो पछताया अपने गुनाहों पर, विश्वास रखा (अल्लाह पर), और अच्छे कर्म किए : तो ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को अल्लाह अच्छे कर्मों में बदल देगा। और अल्लाह सबसे ज़्यादा क्षमा करनेवाला, बेहद दयावान है. (70)

 जो लोग (गुनाहों से) तौबा कर लेते हैं और फिर अच्छे कर्म करते हैं, तो वे        (अपनी तौबा से) सचमुच अल्लाह की ओर पूरी तरह से लौट आते हैं.]  (71)

[रहम करनेवाले रब के असल बंदे वे हैं ] जो कोई झूठी गवाही नहीं देते, और वे, जब कहीं कोई बेकार की चीज़ें होते हुए देखते हैं, तो वहाँ से शालीनता से गुज़र जाते हैं ;(72)

और जब उन्हें अल्लाह की निशानियाँ [आयतें] याद दिलायी जाती हैं, तो वे उन (आयतों) पर (काफ़िरों की तरह) अपने कानों और आँखों को बंद नहीं कर लेते (73)

 बल्कि वे दुआ करते हैं, "ऐ हमारे रब! हमें  अपने पति/ पत्नियों और अपने बाल-बच्चों के बीच ख़ुशी व आराम के साथ रख. और हमें ऐसा बना दे कि जो लोग तुझे अपने ध्यान में बसाए रखते हैं, उनके सामने हमारी मिसालें दी जा सकें ।" (74)

 यही वे बंदे होंगे जिन्हें (अपने ईमान पर) जमे रहने की वजह से बदले में जन्नत की सबसे ऊँची जगह दी जाएगी. वहाँ दुआओं और सलाम से उनका स्वागत किया जाएगा. (75)

 वहीं वे हमेशा रहेंगे---  एक ख़ुशनुमा घर और आराम की बेहतरीन जगह में ! (76)


 [ऐ रसूल, काफिरों से कह दें] , "मेरे रब के सामने तुम्हारी औक़ात ही क्या है,  अगर तुम उसके सामने झुक कर उससे फ़रियाद नहीं करते ?  मगर चूँकि तुम सच्चाई को झुठ मान कर ठुकरा ही चुके हो, तो अब वह (सज़ा) तुम्हारे गले पड़ कर रहेगी।" (77)

 








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