Chronological Quran : 8th Year of Revelation
[Sep 19, 616 AD --- Sep 07, 617 AD]
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : आठवें वर्ष में उतरी आयतें
[1 मुहर्रम/ 6 हिजरी पूर्व----- 29 ज़ुल हिज्जा/ 6 हिजरी पूर्व]
सूरह
31 : लुक़मान [Sage Luqman]
अल्लाह के नाम से शुरू जो
सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)
(जो आयतें उतर रही हैं) यह ज्ञान से भरी हुई
किताब[क़ुरआन] की आयतें हैं, (2)
मार्ग दिखानेवाली हैं, और उनके लिए रहमत [mercy] है जो अच्छा कर्म करते
हैं, (3)
जो नमाज़ को पाबंदी से
अदा करते हैं, ज़कात[दान] देते हैं और
आनेवाली दुनिया[आख़िरत] पर पक्का विश्वास रखते हैं : (4)
वही हैं जिनको रब ने सही
मार्ग दिखाया है, और वही हैं जो कामयाब
होंगे. (5)
लोगों में एक ऐसा आदमी है
जो (क़ुरआन से लोगों के) ध्यान को भटका देनेवाली चीज़ों [कहानी, खेल तमाशे] के लिए पैसे ख़र्च करता है, इस इरादे से कि दूसरों को अल्लाह के रास्ते
से भटका सके, बिना
कुछ जाने, और उस (अल्लाह के रास्ते
का व उसकी निशानियों) का मज़ाक़ उड़ा सके । उसके लिए अपमानित करनेवाली यातना होगी!
(6)
जब उसे हमारी आयतें पढ़ कर
सुनाई जाती हैं, तो वह नफ़रत व
उपेक्षा से पीठ फेरकर चल देता है, मानो उसने कुछ सुना ही नहीं, या मानो कानों से वह बहरा
हो। यह ख़बर उसे सुना दें कि उसे बड़ी दर्दनाक यातना होगी ! (7)
मगर जो लोग (सच्चाई में)
विश्वास [ईमान] रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म
किए, तो उनके लिए नेमत भरे
बाग़ [जन्नत, Garden of bliss] हैं, (8)
जहाँ वे (हमेशा) रहेंगे :
यह अल्लाह का सच्चा वादा है और वह बहुत प्रभुत्वशाली, ज्ञानी है. (9)
उसने आसमानों को ऐसा
बनाया है कि तुम देख सकते हो कि वह बिना किसी सहारे के थमा हुआ है, और उसने ज़मीन में
मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया ताकि तुम्हारे नीचे(की ज़मीन) हिले डुले नहीं---- - और उसमें हर प्रकार के
जानवर चारों ओर फैला दिए। और हमने आसमान से पानी बरसाया, और हम ने धरती पर हर
प्रकार की अच्छी चीज़ें उगा दीं : (10)
यह सभी चीज़ें अल्लाह की
रची हुई हैं । अब तुम ज़रा मुझे दिखाओ कि (अल्लाह को छोड़ कर) जिन्हें तुम पूजते हो, उन्होंने क्या पैदा कर दिया है! नहीं, यह (सच्चाई में) विश्वास
न करनेवाले साफ़ तौर से भटके हुए हैं. (11)
और हमने लुक़मान को अक़्ल व
ज्ञान दिया था : “ अल्लाह का शुक्र अदा करते
रहो : जो कोई उसका शुक्र अदा करता है, वह अपने ही फ़ायदे के लिए ऐसा करता है, और वे लोग जो उसके एहसानों को नहीं मानते
---- (तो वे जान लें कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है) उसे किसी की ज़रूरत नहीं, वही सारी प्रशंसा के लायक़ है.” (12)
लुक़मान ने अपने बेटे को
समझाते हुए कहा था, "ऐ मेरे बेटे! किसी को भी
अल्लाह का साझीदार [Partner] मत ठहराना। अल्लाह के
साथ (उसके अधिकारों में किसी को) साझीदार ठहराना सचमुच बहुत भारी ग़लती
है।"(13)
हमने
लोगों को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करने पर बहुत ज़ोर दिया है : तकलीफ़ पे
तकलीफ़ सह के, उनकी माँ उन्हें अपने
पेट में लिए फिरी, और दो वर्ष लगते हैं
(बच्चों को) दूध छुड़ाने में. सो तुम मेरा शुक्र अदा करो और साथ में अपने
माँ-बाप का भी---- (अंत में) सब को मेरी ही पास लौट कर आना है. (14)
अगर तब भी, वे [माँ-बाप] तुझपर दबाव डालें कि तू मेरे
साथ किसी और को (मेरी ख़ुदायी में) साझीदार [partner] ठहराए, जिसका तुझे (कोई किताबी) ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानना. मगर इसके बावजूद, अपनी ज़िंदगी में तुम उनके साथ भले तरीक़े से
रहना, और उन लोगों के रास्ते
पर चलना जो (पूरी भक्ति से माफ़ी के लिए) मेरी ओर झुकते हैं । और अंत में, तुम सबको मेरे ही पास लौट कर आना है, और फिर मैं तुम्हें वह सब कुछ बता
दूँगा जो तुम ने किया होगा। (15)
[लुक़मान ने यह भी कहा], "ऐ मेरे बेटे! (याद रखो) अगर राई के दाने के बराबर
भी कोई चीज़ चट्टान के बीच में छिपी हो या आसमानों और ज़मीन में कहीं भी हो, अल्लाह उसे सामने हाज़िर कर देगा, क्योंकि अल्लाह छोटी से छोटी चीज़ को देखनेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।(16)
"ऐ मेरे बेटे! नमाज़ पाबंदी से
पढ़ा करो; लोगों को अच्छाई की तरफ़
प्रेरित करो; बुराई से
रोको; जो
मुसीबत भी तुम पर पड़े उसपर धैर्य से काम लो : यही वे काम हैं जिन्हें करने का पक्का इरादा
करना चाहिए. (17)
लोगों की उपेक्षा करते हुए
उनसे मुँह न मोड़ो, न ज़मीन
पर अकड़ कर चला करो, क्योंकि अल्लाह किसी
अहंकारी और डींग मारनेवाले को पसन्द नहीं करता. (18)
जब चलो तो एक अंदाज़ की चाल[न
धीमी, न तेज़] से चला करो, और अपनी आवाज़ धीमी रखा करो, निस्संदेह आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों के
रेंकने की होती है।" (19)
[लोगो] क्या तुम देखते
नहीं कि जो कुछ आसमानों में है और
जो कुछ ज़मीन पर है, उन सबको अल्लाह ने किस
तरह से तुम्हारे फ़ायदे के लिए बनाया है, और उसने तुमपर अपनी नेमतें[blessings] न्योंछावर कर दी हैं--- तुम्हारे भीतर भी और
तुम्हारे बाहर भी ? तब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो
अल्लाह के विषय में बहस करते हैं, जबकि न तो उन्हें जानकारी है, न कोई सही मार्ग दिखानेवाला है और न उनके
पास ऐसी कोई (आसमानी) किताब है जो सही रौशनी दिखा सके. (20)
जब
उनसे कहा जाता है कि " जो चीज़ अल्लाह ने उतारी है, उसको मानते हुए उस रास्ते पर चलो”, तो वे कहते हैं, "नहीं, हम तो उस रास्ते पर चलेंगे जिसपर हमने अपने
बाप-दादा को चलते हुए देखा है।" क्या! यहाँ तक कि शैतान उनको भड़कती
हुई (जहन्नम की) आग की यातना की ओर बुला रहा हो तब भी (वे बाप-दादा के रास्ते पर
चलेंगे) ? (21)
जो कोई अपने आप को अल्लाह
के सामने पूरी भक्ति के साथ समर्पित करता हो, और वह अच्छे कर्म भी करता हो, तो सचमुच उसने बड़ा मज़बूत सहारा थाम लिया है, क्योंकि सारे मामलों का नतीजा तो अल्लाह ही
के हाथ में है. (22)
और जो कोई ऐसा करने से
इंकार कर दे, तो [ऐ रसूल] उसका (आपकी
बातों को मानने से) इंकार कर देना कहीं आपको बहुत दुखी न कर दे---- वे सब हमारे ही
पास लौट कर आएंगे और फिर जो कुछ वे किया करते थे, हम उन्हें सब बता देंगे---- निस्संदेह
अल्लाह दिलों के अंदर की बात तक जानता है----- (23)
हम उन्हें (दुनिया में)
कुछ समय के लिए थोड़ा मज़ा उड़ाने का मौक़ा देते हैं, मगर फिर हम उन्हें एक कठोर यातना की ओर खींच
कर ले जाएँगे. (24)
अगर आप उनसे पूछें कि
आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने।" कह दें, "तारीफ़ें भी सब अल्लाह के
लिए है, " मगर अधिकांश लोग
नहीं समझते हैं . (25)
हर एक चीज़ जो आसमानों में
और ज़मीन पर है, सब अल्लाह की है ।
निस्संदेह अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (जिसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी प्रशंसा के लायक़ भी वही है. (26)
ज़मीन पर जितने पेड़ हैं, अगर वे क़लम बन जाएँ और
सारे समंदर स्याही बन जाएं, और फिर उसके साथ सात समंदर और भी मिल जाएं, तब भी अल्लाह की बातें
समाप्त न हो सकेंगी : निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, बहुत ज्ञानी है. (27)
तुम सबको पैदा करना और
फिर दोबारा ज़िंदा करके उठाना (अल्लाह के लिए) तो बस ऐसा है, जैसे किसी एक आदमी को
पैदा करना और फिर ज़िंदा उठाना : अल्लाह सब कुछ सुनता और हर चीज़ देखता है. (28)
क्या आपने[ऐ रसूल] देखा
नहीं कि अल्लाह रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है; और यह कि उसने सूरज और चाँद को काम में लगा
रखा है, हर एक अपने नियत समय तक
अपनी कक्षा में चलता रहता है; और(क्या तुम नहीं जानते कि) जो कुछ भी तुम(लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर
रखता है? (29)
और यह सब कुछ इस कारण से
है कि अल्लाह ही सत्य है, और उसे छोड़कर जिन
(बुतों) को भी वे पुकारते हैं, वे झूठ हैं। और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे महान है. (30)
क्या [ऐ रसूल] आपने देखा
नहीं कि समंदर में नौकाएं अल्लाह की मेहरबानी से चलती हैं, ताकि वह तुम(लोगों) को
अपनी कुछ निशानियाँ दिखाए ? सचमुच इसमें निशानियाँ हैं हर उस आदमी के लिए
जो धैर्य व सब्र से काम लेता है, और शुक्र अदा करता है. (31)
(पानी के जहाज़ों पर) जब
समंदर की लहरें किसी विशाल परछायीं की तरह छा जाती हैं, तो (उसमें बैठे हुए) लोग पूरी भक्ति से अपने
आपको केवल अल्लाह के सामने समर्पित करते हुए(मदद के लिए) पुकारते हैं, फिर जब वह उन्हें बचाकर
किनारे तक पहुँचा देता है, तो उनमें से कुछ लोगों की
सोच डगमगा जाती है (और वे अल्लाह को छोड़ कर अपने बनाए हुए ख़ुदाओं को याद करने लगते
हैं) ---- हमारी निशानियों को मानने से इंकार केवल वही करता है जो एक नम्बर का
विश्वासघाती, और नाशुक्रा[Ungrateful] हो. (32)
ऐ लोगों! मन में हर समय
अपने रब का ध्यान होना चाहिए, और उस दिन से डरो जब किसी भी तरह से न कोई माँ-बाप
(मदद के लिए) अपने बच्चे की जगह ले पायेगा और न ही कोई बच्चा अपने माँ-बाप की जगह
ले पायेगा। अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः देखना कि यह सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे में न डाल दे, और न ही अल्लाह के बारे
में कोई (शैतान) धोखेबाज़ तुम्हें धोखे में डाल सके. (33)
निस्संदेह उस [क़यामत की]
घड़ी का ज्ञान तो बस अल्लाह ही को है ; वही पानी बरसाता है और वह जानता है कि माँ की कोख में क्या
छुपा है, कोई भी आदमी नहीं जानता
कि कल उसके कर्मों का क्या फल मिलेगा, और कोई व्यक्ति नहीं जानता है कि उसकी मौत ज़मीन के किस
हिस्से में होगी; निस्संदेह
अल्लाह ही है जो सब जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है. (34)
सूरह 34 : सबा [यमन में बसे सबा के लोग, Sheba]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान
है, अत्यंत दयावान है
हर तरह की प्रशंसा अल्लाह के लिए ही है, जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है--- सब अल्लाह का है । और आने
वाली दूसरी ज़िंदगी [आख़िरत] में भी सब तारीफ़ें उसी के लिए हैं । और वही है जिसे हर
चीज़ का ज्ञान भी है और हर चीज़ की ख़बर भी . (1)
वह उन सब चीज़ों को जानता है जो कुछ धरती के
भीतर जाती हैं और जो कुछ उससे बाहर निकलती हैं ; और उनको भी जानता है जो
आसमान से उतरती हैं और जो कुछ उस पर चढ़ती हैं. और वही है जो बहुत दया
करनेवाला और बड़ा माफ़ करनेवाला है. (2)
तब भी, सच्चाई से इंकार करने पर अड़े हुए लोग [काफ़िर] यह कहते हैं कि "हम पर
क़यामत की घड़ी कभी नहीं आएगी।" कह दें, "क्यों नहीं ? मेरे रब की क़सम, वह ज़रूर आकर रहेगी !
क़सम है उसकी जो हर अनदेखी चीज़ को जानता है! यहाँ तक कि आसमानों और
ज़मीन में कण भर भी कोई चीज़ ऐसी नहीं जो उसकी नज़रों से ओझल हो सके, चाहे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी। हर एक चीज़ एक स्पष्ट किताब में लिखी हुई है (3)
ताकि वह [अल्लाह] उन लोगों को इनाम दे सके
जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए : ऐसे लोगों के गुनाह माफ़ किए जाएंगे और उन्हें दिल खोलकर रोज़ी दी जायेगी. “ (4)
लेकिन जिन लोगों ने हमारे संदेश [आयतों] के
विरोध में काम किया, और उसके मक़सद को नाकाम
करने की कोशिश की, उनके लिए बहुत ही दर्दनाक
यातना होगी . (5)
[ऐ रसूल] जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है वे स्वयं देख सकते
हैं कि जो कुछ (संदेश) आपके रब की तरफ़ से आपको भेजा गया है वह सत्य है, और वह उस (अल्लाह) के मार्ग की ओर ले जाता है जिसके क़ब्ज़े में हर चीज़ की ताक़त
है , और जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है. (6)
मगर (सच्चाई
से) इनकार करनेवाले [काफ़िर] लोग कहते हैं कि "क्या हम तुम्हें एक ऐसे आदमी
[रसूल] के बारे में बताएँ जो यह दावा करता है कि जब तुम (मरने के बाद सड़-गल कर)
चूर चूर हो जाओगे, तब तुम्हें फिर से एक नए जन्म के साथ
उठाया जाएगा ? (7)
क्या उसने
अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ ली हैं ?, क्या वह दीवाना है?” बिल्कुल नहीं!, बल्कि जो लोग आनेवाली दूसरी दुनिया
[आख़िरत] में विश्वास नहीं रखते, वे दर्दनाक यातना झेलेंगे और वही लोग हैं जो भारी ग़लती पर हैं . (8)
क्या वे लोग
आसमानों और ज़मीन में मौजूद उन चीज़ों के बारे में नहीं सोचते जो उनके आगे भी हैं और
उनके पीछे भी? अगर हम चाहें तो उन्हें ज़मीन में धँसा
दें या उन पर आसमान से कुछ टुकड़े गिरा दें। सचमुच इसमें एक निशानी है हर उस बन्दे
के लिए जो (गुनाहों से) तौबा करने के लिए अल्लाह के सामने झुकने वाला हो. (9)
हमने दाऊद(अलै.) [David] को अपनी तरफ से कुछ ख़ास ख़ूबियाँ दी थीं. हमने कहा, “ जब वह [दाऊद] हमारी बड़ाई
बयान करें तो ऐ पर्वतो! तुम भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाया करो, और पक्षियों तुम भी!" और हमने उसके लिए
लोहे को नर्म कर दिया था, (10)
हुक्म दिया कि "लोहे की कवचें [Chainmail] बनाओ और कड़ियों को ठीक
अंदाज़े से जोड़ो" , “ और तुम
सब अच्छे कर्म करो, निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, मैं उसे देखता हूँ.” (11)
और सुलैमान(अलै.) [Solomon] के लिए हमने हवा को उनके
वश में कर दिया था, जिसकी सुबह की यात्रा एक महीने में तय
किए गए रास्ते जितनी होती और (वापसी में) शाम की भी यात्रा एक महीने के रास्ते
जितनी थी. और हमने उनके लिए पिघले हुए ताँबे/पीतल का सोता बहा दिया, और जिन्नों में से भी कुछ (को उनके वश में कर दिया था) जो अपने रब के हुक्म से उनके अधीन काम करते
थे। उन(जिन्नों) में से कोई भी अगर हमारे हुक्म से फिरता तो हम उसे (जहन्नम की)
भड़कती आग का मज़ा चखाते । (12)
वे जिन्न सुलैमान के लिए वह सब कुछ बनाते जैसा वे चाहते - - बड़े-बड़े भवन, प्रतिमाएँ, पानी के बड़े बड़े हौज़ और ज़मीन में जमी हुई देगें. हम ने कहा, "ऐ दाऊद के लोगो! तुम ऐसे कर्म किया करो जिससे लगे कि तुम (अल्लाह का)
शुक्र अदा करने वाले हो क्योंकि मेरे बन्दों में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जो सचमुच
शुक्र अदा करते हैं।" (13)
फिर जब हमने सुलैमान की मौत का फ़ैसला किया
तो उन (मज़दूरी करने वाले) जिन्नों को उनकी मौत का पता किसी और से नहीं, बल्कि भूमि के उस कीड़े से चला जो उनकी लाठी को खा रहे थे, (असल में लाठी पर टेका लगाए हुए उनकी मौत हो गयी थी, फिर कीड़ों के खाने से लाठी कमज़ोर पड़ कर टूट
गयी): फिर जब वह गिर पड़े, तब जाकर जिन्नों को उनके
(मरने की) बात समझ में आयी---- अगर वे (सुलैमान अलै. की मौत की) छुपी हुई अंदेखी
बातों को जानते होते तो (उनके मरने के बाद भी) इस अपमानजनक मज़दूरी में लगे न रहते.
(14)
सच्चाई यह है कि (यमन में आबाद) सबा के लोगों के लिए ख़ुद उस जगह एक निशानी
मौजूद थी जहाँ वे रहा करते थे - - दो बाग़ थे, एक दाहिनी तरफ़ और दूसरा बायीं तरफ़ : "खाओ अपने रब की दी हुई रोज़ी में से और उसका शुक्र अदा करो, कि एक तो ज़मीन इतनी अच्छी सी और दूसरे रब
इतना माफ़ करनेवाला ।" (15)
मगर उन लोगों ने (मार्गदर्शन पर) कोई ध्यान
नहीं दिया, तो (नतीजे में) हमने उन लोगों पर (टूटे हुए)
बाँध का सैलाब छोड़ दिया और उनके दोनों बाग़ों के बदले में उन्हें ऐसे बाग़ दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल, झाऊ के पेड़ [Tamarisk bushes], और कुछ थोड़ी सी काँटेदार बेरियों के पेड़ [Lote tree] थे. (16)
यह दंड हमने उन्हें इसलिए दिया कि उनलोगों ने
नाशुक्री [कृतध्नता] की आदत अपना ली थी --- तो क्या ऐसा दंड हम ने किसी और को दिया
सिवाय उनके जो बड़े नाशुक्रे [कृतध्न] लोग थे ? (17)
और हमने उनके[यमन के] और उन बरकत वाली बस्तियों[सीरिया व फ़िलिस्तीन के इलाक़े]
के बीच कुछ दूसरी बस्तियाँ बसा रखी थीं जो दूर से दिखायी देती थीं, और उनकी आसानी के लिए सफ़र को कई पड़ावों में बाँट रखा था ---(और कहा था) "चाहे रात का समय हो या दिन का, इन (बस्तियों) में बिना डरे यात्रा करो
"--- (18)
मगर तब भी उन्होंने शिकायत की, "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव
डालने वाली जगहों के बीच बहुत लम्बी दूरी रखी है।" (इस तरह) उन्होंने स्वयं
अपने आप पर ही ज़ुल्म किया, और अंत में, नतीजा यह हुआ कि हम ने उन्हें (अतीत की) कहानियाँ बना डाला, औऱ उन्हें टुकड़े टुकड़े करके बिल्कुल
छिन्न-भिन्न कर डाला। सचमुच, इस घटना में हर एक धैर्यवान और शुक्र अदा
करने वाले आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं . (19)
सचमुच, उन लोगों के बारे में शैतान [इबलीस] का विचार सही साबित हुआ, और सब लोग उसी (शैतान) के रास्ते पर चल पड़े---केवल ईमानवालों के एक गिरोह
को छोड़कर---- (20)
हालाँकि उस (शैतान) का उन लोगों पर कोई क़ब्ज़ा
नहीं था. मगर (शैतान को बहकाने की
क्षमता इसलिए दी कि) हम चाहते थे कि जो लोग आनेवाली ज़िंदगी [आख़िरत] पर विश्वास
रखते हैं और जो लोग इसके बारे में सन्देह में पड़े हुए
हैं--- उन दोनों के बीच का अंतर साफ़ साफ़ पता चल जाए : [ऐ रसूल] आपका रब हर चीज़ पर निगरानी रखता
है. (21)
आप कह दें, " पुकार कर देखो उनको, जिन्हें तुम ने अल्लाह को
छोड़कर अपना ख़ुदा बना रखा है : आसमानों और ज़मीन में कणभर चीज़ भी उनके नियंत्रण
में नहीं है, न ही (किसी मामले में अल्लाह के साथ) उनका
कोई हिस्सा है और न उनमें से कोई अल्लाह के किसी काम में सहायक है।“ (22)
और उस[अल्लाह] के सामने कोई सिफ़ारिश काम नहीं आएगी, सिवा उस आदमी के जिसके लिए उसने ख़ुद
(सिफ़ारिश करने की) अनुमति दी हो। (क़यामत के दिन) जब उनके दिलों से घबराहट दूर कर
दी जाएगी, तो उनसे पूछा जाएगा, "तुम्हारे रब ने क्या कहा?" वे जवाब देंगे, "सच्ची बात। और वह सबसे ऊँचा, सबसे महान है।" (23)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन में रोज़ी
देता है ?" बता दें , "अल्लाह!"(ही देता है!). अब अवश्य ही हम
(में से कोई एक गिरोह) सही मार्ग पर है और दूसरा साफ़ तौर से सही मार्ग से भटक चुका
है.” (24)
कह दें, "जो अपराध (गुनाह) हम से
हुआ हो, उसके बारे में तुम से
नहीं पूछा जाएगा, और जो कुछ तुम करते हो, उसके बारे में हम से कोई सवाल नहीं पूछा
जाएगा ।" (25)
कह दें, "हमारा रब हम सबको (क़यामत
के दिन) एक साथ इकट्ठा करेगा, फिर हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा; और वही तो है फ़ैसला करनेवाला जो सब कुछ जानता है।" (26)
कह दें, "मुझे ज़रा दिखाओ तो कि कौन
हैं जिनको तुमने उस (अल्लाह) के साथ हिस्सेदार[Partner] के रूप में जोड़ रखा है। हरगिज़ नहीं! अल्लाह तो केवल वही है (उसका कोई साझीदार
नहीं), सारी ताक़त भी उसी की और
सारा ज्ञान भी उसके ही पास है ।" (27)
हमने तो आपको [ऐ रसूल] भेजा ही इसीलिए है कि
तमाम लोगों को अच्छी ख़बर भी सुना दें और चेतावनी भी दे दें, किन्तु अधिकतर लोग समझते नहीं हैं. (28)
कह दें, "तुम्हारे लिए (वादे के मुताबिक़) एक ख़ास दिन में मिलने का
समय तय किया हुआ है, जिसे एक घड़ी भर के लिए
भी तुम न तो आगे बढा सकते हो और न पीछे हटा सकते हो ।" (30)
और (सच्चाई से) इनकार पर अड़े लोग [काफ़िर] कहते हैं, "हम न तो इस क़ुरआन पर विश्वास करेंगे और न ही
उन (आसमानी किताबों) पर जो इस पहले आ चुकी हैं।" अगर आप [ऐ रसूल] उस
वक़्त का हाल देख पाते जब शैतानी करनेवाले लोग अपने रब के सामने खड़े किए जाएँगे, और कैसे वे एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा रहे
होंगे। जिन लोगों पर कमज़ोर समझ कर (दुनिया में) ज़ुल्म किया गया था, वे अपने उन ज़ालिमों से कहेंगे, "यदि तुम न रहे होते, तो हम ज़रूर ही (अल्लाह
में) विश्वास रखनेवाले [believers] होते।" (31)
ज़ालिम लोग जवाब में उनसे कहेंगे, "जब सही मार्गदर्शन तुम्हारे पास आ चुका था, तो उन्हें अपना लेने से क्या हम ने तुम्हें
रोका था ? नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही गुनाहगार हो।" (32)
कमज़ोर
समझे गए लोग ज़ालिमों से कहेंगे, "नहीं ! बल्कि यह तुम्हारी रात-दिन की मक्कारी ही तो थी
(जिसने हमें रोका था) कि तुम हम पर ज़ोर डालते रहते थे कि हम (एक) अल्लाह में
विश्वास न करें और दूसरों को उसके बराबर का साझीदार ठहराएँ।" जब वे यातना देख
लेंगे तो शर्म छुपाते हुए मन ही मन पछताएँगे, और हम उन इंकार पर अड़े
लोगों की गर्दनों में लोहे का तौक़ [iron collar] डाल देंगे। जो कुछ कर्म उन्होंने किए हैं, किस तरह मुमकिन है कि उसका बदला उन्हें कुछ
और दिया जाए ? (33)
और ऐसा हमेशा ही हुआ कि जब भी हमने किसी बस्ती में कोई सावधान करने वाला
[पैग़म्बर] भेजा, तो वहाँ धन-दौलत के नशे में
डूबे हुए लोगों ने यही कहा कि "जो कुछ संदेश देकर तुम्हें भेजा गया है, हम तो उसको नहीं मानते।" (34)
वे यह भी कहते कि "हम तो धन और संतान में तुमसे कहीं बढ़कर हैं, और हमें कोई यातना मिलनेवाली नहीं है।" (35)
आप कह दें, "इस में शक नहीं कि मेरा रब जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढा
चढा कर देता है और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है, हालाँकि अधिकांश लोग यह बात समझते नहीं हैं
।" (36)
याद
रहे कि न तुम्हारी धन-दौलत और न तुम्हारी सन्तान ऐसी चीज़ है जो तुम्हें हमसे नज़दीक
कर दे। हाँ, मगर जिन लोगों ने
(अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों के बदले में कई गुना इनाम दिया जाएगा, और वे (जन्नत के) ऊँचे कक्षों में आराम से निश्चिन्त हो कर रहेंगे, (37)
रहे वे लोग जिन्होंने हमारे संदेशों [आयतों]
का विरोध किया और उसके प्रभाव को घटाने की कोशिश में लगे रहे , ऐसे लोगों को कड़ा दंड देने के लिए वहाँ हाज़िर
किया जाएगा. (38)
कह दें, "मेरा रब अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रोज़ी को
ख़ूब बढा कर देता है और जिसके लिए चाहता है रोज़ी में तंगी कर देता है; और (अल्लाह के रास्ते में) जो कुछ भी तुम
किसी को देते हो, उसके बदले में वह
तुम्हें और देगा; और वही सबसे बेहतर रोज़ी
देनेवाला है।" (39)
और
जिस दिन वह उन सबको एक साथ इकट्ठा करेगा, फिर
फ़रिश्तों से कहेगा, "क्या सचमुच यह लोग तुम्हारी
पूजा करते थे ?" (40)
वे जवाब देंगे, "महान है तू ! तू ही ऐसे लोगों से हमें बचानेवाला और मदद
करनेवाला है ! असल बात यह है कि वे जिन्नों
को पूजते थे--- उनमें से अधिकतर उन्हीं [जिन्नों] पर विश्वास रखते थे।" (41)
"अतः आज तुम में से किसी को भी यह ताक़त नहीं है कि
वह किसी और को कोई भी फ़ायदा या नुक़सान पहुँचा सके।" फिर हम उन शैतानी
करनेवालों से कहेंगे, "अब उस आग की यातना का मज़ा
चखो, जिसे तुम झूठ बताते थे।" (42)
और जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती
हैं, जो (अपने मतलब में) स्पष्ट व
साफ़ हैं, तो वे (रसूल के बारे में) कहते हैं, "यह तो बस ऐसा आदमी है जो चाहता है कि तुम्हें उन
(देवताओं से) रोक दें जिनको तुम्हारे बाप-दादा पूजते रहे हैं ।" और कहते हैं, "यह[क़ुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि उस (पैग़म्बर) की बनायी हुई झूठी बातें
हैं।" (सच्चाई से) इंकार करनेवालों [काफ़िरों] के सामने जब सच्चा संदेश आ
पहुँचा, तो उसके बारे में उन्होंने
कहा, "यह तो बस एक साफ़ साफ़ जादू
है।" (43)
हालाँकि हमने उन(मक्का वालों) के पढने के लिए कोई
(आसमानी) किताबें नहीं दी थीं, और न आपसे पहले उनकी ओर कोई
(रसूल) सावधान करनेवाला ही भेजा था. (44)
और
जो लोग वहाँ इन लोगों से पहले रहते थे,
उनलोगों ने भी सच्चाई को मानने से इंकार किया था ---- और जो कुछ हमने उनसे पहले
गुज़रे हुए लोगों को दिया था, ये लोग तो उसके दसवें हिस्से को भी नहीं पहुँचे
हैं---- तब भी उन्होंने (भी) मेरे रसूलों को मानने से इंकार कर दिया था। तो
फिर देख लो कैसी (सख़्त) रही मेरी यातना! (45)
[ऐ रसूल] कहें, "मैं तुम्हें बस एक चीज़ करने की सलाह देता हूँ
: अल्लाह के सामने (पूरी भक्ति भाव से) खड़े हो जाओ, जोड़े बना कर या अकेले-अकेले, फिर (आपस में चर्चा करो
या ख़ुद ही) ध्यान से विचार करो: तुम्हारे साथी[मोहम्मद सल.] में पागलपन का
तो कोई निशान भी मौजूद नहीं है--- वह तो एक कठोर यातना के आजाने से पहले तुम्हें
केवल सावधान करने वाले हैं।" (46)
कह दें, "अगर मैंने (दी गयी नसीहतों के) बदले में तुमसे कोई चीज़
माँगी हो, तो वह तुम अपने पास ही
रख सकते हो। वह तो बस अल्लाह है जो मुझे (मेरे काम का) बदला देगा: और वह हर चीज पर
गवाह है।" (47)
कह दें, " मेरा रब (तुम्हारे सामने झूठ के ख़िलाफ़) सच्चाई को ऊपर से
भेजता रहता है (ताकि सच दिलों में बैठ जाए और झूठ की हार हो)। और उस [अल्लाह] को
ऐसी सभी चीज़ों का जो अनदेखी हैं, पूरा पूरा ज्ञान
है।" (48)
कह दें, "सच्चाई आ चुकी है ; और झूठ में कोई दम नहीं होता (न कोई चीज़
शुरू करने का और न दोबारा करने का) ।" (49)
कहें, " अगर मैं रास्ते से भटक जाता हूँ तो इसमें मेरा ही नुक़सान
होगा, और यदि मैं सीधे मार्ग पर
हूँ, तो यह उस वही [revelations] के चलते है जो मेरा रब
मेरी ओर भेजता है। बेशक, वह सब कुछ सुनता है, बहुत निकट है।" (50)
[ऐ रसूल] आप अगर उस (क़यामत
के) दिन इन लोगों का हाल देख पाते कि मारे डर के घबराए हुए होंगे; फिर भाग निकलने का कोई रास्ता न होगा
और वे निकट स्थान ही से पकड़ लिए जाएँगे; (51)
वे कहेंगे, "अब हम उस (सच्चाई) पर विश्वास करते हैं", मगर (विश्वास तो दुनिया में करना था) अब वे इतनी दूर की जगह से उस(विश्वास) को
कैसे पा सकते हैं --- (52)
इससे पहले तो उन्होंने हमेशा (सच्चाई को
मानने से) इंकार किया, और बड़े दूर की जगह से ही (अल्लाह और आने वाली
दुनिया के बारे में) अटकल के तीर चलाते रहे थे ---- (53)
(उस समय वे चाहेंगे कि काश एक बार उन्हें दुनिया में भेज दिया जाता तो वे
अल्लाह पर और क़यामत में विश्वास कर लेते) मगर, तब उनके और उनकी चाहतों के बीच एक रोक लगा दी जाएगी, जिस तरह इससे पहले उनके जैसे लोगों के साथ
मामला किया गया। सचमुच वे (फ़ैसले के दिन के बारे में) गहरे शक और डाँवाडोल कर
देनेवाले संदेह में पड़े रहे थे. (54)
सूरह : 39, अज़ ज़ुमर [The Groups]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
निस्संदेह
[ऐ रसूल!] हमने यह किताब पूरी सच्चाई के साथ आपकी ओर उतारी है , इसलिए
पूरी भक्ति के साथ केवल अल्लाह की ही इबादत[उपासना] करें : (2)
याद रखो कि सच्ची भक्ति तो केवल अल्लाह ही के
लिए है। (रहे वे लोग) जिन्होंने उस [अल्लाह] को छोड़कर दूसरे(देवताओं को) अपना
संरक्षक [Protector/Guardian] बना रखा है, (वे बातें बनाते हुए) कहते हैं, "हम तो
केवल उनकी पूजा इसीलिए करते है कि वे हमें अल्लाह से नजदीकी करा दें"
--- उनके बीच अल्लाह ख़ुद (क़यामत के दिन)
फ़ैसला कर देगा उन बातों का जिनमें वे (सच्चाई से) मतभेद रखते हैं। अल्लाह उसे
मार्ग नहीं दिखाता जो कभी शुक्र न अदा करता हो और बड़ा झूठा हो (3)
यदि
अल्लाह अपने लिए कोई सन्तान चाहता तो वह अपने पैदा किए हुए में से किसी को भी चुन
सकता था, लेकिन वह इस चीज़ से (कि उसकी संतान हो) कहीं महान व ऊँचा है! वह अल्लाह है
अकेला, सब पर क़ाबू रखनेवाला (4)
उसने
आकाशों और धरती को सही मक़सद के साथ पैदा किया; वह रात को दिन पर लपेटता जाता है और दिन को
रात पर लपेटता जाता है; और उसने सूर्य और
चन्द्रमा को (एक व्यवस्था के अंदर) काम पर लगा रखा है; हर एक (ग्रह, तारा) नियत
समय तक (अपने बने हुए रास्ते पर) चल रहा है। याद रखो, वही
प्रभुत्वशाली, बड़ा क्षमा करनेवाला है (5)
उसने तुम सब को अकेली जान(आदम अलै.) से पैदा
किया; फिर उसी से उसका जोड़ा बनाया औऱ तुम्हारे लिए चार तरह के
मवेशियों के जोड़े [ऊँट, गाय, भेड़ औए बकरी] पैदा कर के भेजे। वह तुम्हारा सृजन तुम्हारी माँओं के पेट में
इस तरह करता है कि तीन किस्म के अँधेरे पर्दों के भीतर तुम बनावट के एक चरण के बाद
दूसरे चरण से गुज़रते हो। वही अल्लाह
तुम्हारा पालनहार है! सारी बादशाही [control] उसी की
है, उसके सिवा कोई
इबादत के योग्य नहीं। फिर (भी) तुम कहाँ बहके फिरते हो? (6)
यदि तुम
इंकार पर अड़े रहे (व शुक्र अदा नहीं करते) तो याद रखो अल्लाह को तुम्हारी कोई
ज़रूरत नहीं है, तब भी वह अपने बन्दों में इंकार(व
नाशुक्री) को पसन्द नहीं करता; हाँ अगर तुम कृतज्ञता दिखाओगे, तो उसे वह तुम्हारे
लिए पसन्द करता है। कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों का) बोझ न उठाएगा।
फिर अंत में तुम सब को लौट कर ( हिसाब-किताब के लिए) अपने रब के पास ही जाना है।
और (उस वक़्त) वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम (दुनिया में) किया करते थे। बेशक, वह दिलों(के अंदर छुपी) हुई बातें (तक) ख़ूब जानता है (7)
जब आदमी पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वह
पूरे दिल से अपने रब की तरफ़ झुकता है और उसे (मदद के लिए) पुकारने लगता है, फिर जब (अल्लाह)
उसपर अपनी अनुकम्पा कर देता है, तो वह उसको भूल जाता है जिसे पहले
पुकार रहा था और (दूसरे देवताओं को) अल्लाह के बराबर का ठहराने लगता है, जिसके नतीजे में वह
दूसरे लोगों को भी उसके मार्ग से भटका देता है। कह दें,
" तुम
(सच्चाई से) इंकार
करने का मज़ा थोड़े दिन और उठा लो!
निस्संदेह तुम आग में रहनेवालों [जहन्नम] में शामिल हो।" (8)
उस आदमी के बारे में क्या कहा जाए जो रात की घड़ियों में दिल लगा कर इबादत करता है, सजदे में झुकता है, (नमाज़ में)
खड़ा रहता है, यहाँ तक कि मौत के
बाद की ज़िंदगी से भी डरता रहता है और अपने रब से अपने लिए रहम व दया की आशा रखता
है ? कह दें, "क्या वे लोग जो
जानते हैं (कि एक दिन उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा) और वे लोग जो नहीं जानते, दोनों बराबर होंगे? (मगर) शिक्षा तो वही ग्रहण करते हैं
जो बुद्धि और समझ-बूझ रखते हैं।"(9)
कह
दें कि (अल्लाह कहता है) "ऐ मेरे ईमान वाले बन्दो! अपने रब का डर रखो। जो लोग
इस दुनिया में अच्छे काम करते हैं, उनके लिए बदले में अच्छाई होगी---
और अल्लाह की धरती
बहुत लम्बी-चौड़ी है---- और जो लोग (नेक कामों में) सब्र के साथ जमे रहते हैं, तो उनको इसका पूरा पूरा और बेहिसाब बदला [इनाम] दिया
जाएगा ।" (10)
कह
दें, "मुझे तो आदेश दिया गया है कि मैं अल्लाह की
इबादत[उपासना] करूँ, इस तरह कि मेरी बंदगी [भक्तिभाव व
निष्ठा] सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी के लिए हो (11)
और मुझे आदेश दिया
गया है कि मैं (अल्लाह के सामने) पूर्ण समर्पण करनेवाला[मुस्लिम] पहला आदमी बनूँ।" (12)
कह
दें, "यदि मैं अपने रब के आदेशों को न मानूँ तो मुझे एक बड़े
जबरदस्त दिन[क़यामत] की यातना का डर है।" (13)
अब तुम उसे [अल्लाह
को] छोड़कर जिसकी चाहो पूजा करो, कह दें, "वास्तव में घाटे
में पड़नेवाले तो वही हैं, जो क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को हरा बैठेंगे :
याद रखो, असल घाटा यही है (15)
ऐसे लोगों के लिए
उनके ऊपर (भी) आग की कई पर्तें होंगी और उनके नीचे भी।“ यही वह यातना है, जिससे अल्लाह अपने
बन्दों को डराता है : "ऐ मेरे बन्दो!
तुम मेरा डर रखो।" (16)
रहे
वे लोग जो गढे हुए देवताओं या शैतान की पूजा से बचते रहे और अल्लाह की ओर (पूरी
भक्ति से) झुके रहे, उनके लिए शुभ सूचना है, अतः मेरे उन बन्दों को [ऐ रसूल!] आप शुभ सूचना दे दें (17)
जो
बात को ध्यान से सुनते हैं और अच्छी बातों पर अमल करते हैं । यही वे लोग हैं, जिन्हें अल्लाह ने
मार्ग दिखाया है ; और वही बुद्धि और समझवाले हैं (18)
भला जिस व्यक्ति पर
यातना की सज़ा तय हो चुकी है, क्या आप [ऐ रसूल] उसे छुड़ा लेंगे जो आग के अंदर पहुँच चुका है ? (19)
अलबत्ता
जिन्होंने दिलों मे अपने रब का डर रखा है, उनके रहने के
लिए (जन्नत में) तल्ले ऊपर बने हुए ऊँचे ऊँचे भवन
होंगे, उनके नीचे नहरें बह रही होगी। यह
अल्लाह का वादा है : अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है. (20)
(ऐ इंसान) क्या तुमने नहीं
देखा कि अल्लाह ने किस तरह आकाश से पानी उतारा, फिर धरती में उसके सोते प्रवाहित
कर दिए; फिर वह उस पानी के द्वारा अलग अलग
रंगों की हरियाली व खेतियाँ उगा देता है; फिर वह (तैयार होकर) सूखने लगती है; फिर तुम देखते हो
कि वह (फ़सल पकने के बाद) पीली पड़ गई; फिर उसके हुक्म से वह दब दबाकर चूर
हो जाती हैं ? निस्संदेह इन बातों में उन लोगों के लिए बड़ी शिक्षा है जो
बुद्धि और समझ रखते हैं (21)
भला क्या वह व्यक्ति जिसका सीना (हृदय)
अल्लाह ने अपनी पूर्ण भक्ति [इस्लाम] के लिए खोल दिया, जिसके नतीजे में वह
अपने रब की ओर से दी गयी रौशनी में आ चुका है, (उस व्यक्ति के समान होगा जो कठोर
हृदय वाला और अल्लाह को भुलाए बैठा है)? हाँ, अफसोस! उन
लोगों के लिए जिनके दिल अल्लाह का नाम लेने से कठोर हो चुके हैं! ये लोग पूरी तरह
से रास्ता भटक चुके हैं. (22)
अल्लाह ने (अपने
द्वारा भेजी गयी शिक्षाओं में) सबसे अच्छी वाणी उतार भेजी है: एक ऐसी किताब जिसके
विषय एक दूसरे से (आपस में और दूसरी आसमानी किताबों से भी) मिलते-जुलते हैं, जिसकी बातें बार बार दुहराई गयीं हैं ; (इन बातों को
सुनकर) वे लोग जो दिलों में अपने रब का डर रखते हैं, उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फिर अल्लाह को याद
करने के नतीजे में उनकी खालें (शरीर) और उनके दिल नर्म पड़ जाते हैं : यह है अल्लाह
का मार्गदर्शन ; उसके द्वारा वह जिसको चाहता है सीधे मार्ग पर ले आता है, और जिसको अल्लाह
रास्ते में भटकता छोड़ दे, तो फिर उसे कोई सीधे रास्ते पर लानेवाला नहीं (23)
अब भला (उसका क्या
हाल होगा) कि क़यामत के दिन (उसके दोनों हाथ बँधे होंगे और) अपने आपको भयानक यातना
[आग] से बचाने के लिए केवल उसका खुला चेहरा होगा ? और ज़ालिमों से कहा जाएगा, "चखो मज़ा उस
(बुरे कर्म द्वारा की गयी) कमाई का, जो तुम करते रहे थे!" (24)
जो लोग उनसे पहले
थे उन्होंने भी(रसूलों की बातों को) झूठ माना, अन्ततः
उनपर उस जगह से यातना आ पहुँची, जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न था : (25)
फिर अल्लाह
ने उन्हें सांसारिक जीवन में भी बेइज़्ज़ती का मज़ा चखाया; और आख़िरत[परलोक, Hereafter] की यातना तो इससे भी कहीं बड़ी होगी । काश, वे लोग जानते! (26)
सच्चाई यह है कि हमने इस क़ुरआन में लोगों (को समझाने) के लिए हर तरह की
मिसालें बता दी हैं, ताकि वे याद रखें व इनसे सीख ले सकें --- (27)
एक ऐसी
अरबी(भाषा की) क़ुरआन से, जिसमें कोई गड़बड़ी (उलझाव) नहीं है, ताकि लोग तक़वा
[धर्मपरायणता] अपनाएँ (28)
(समझाने के लिए) अल्लाह एक मिसाल पेश करता है
: एक (ग़ुलाम) आदमी है जिसके एक से ज़्यादा मालिक हैं जो आपस में खींचातानी करनेवाले हैं , और एक आदमी वह है
जो पूरे का पूरा एक ही मालिक का गुलाम है।
क्या दोनों का हाल एक जैसा होगा? (बिल्कुल नहीं! एक मालिक वाला ग़ुलाम कहीं बेहतर होगा!), सारी प्रशंसा
अल्लाह ही के लिए है, किन्तु उनमें से अधिकांश लोग नहीं जानते (29)
तो फिर उस
से बढ़कर बुरा व ग़लत आदमी कौन होगा जो अल्लाह
के बारे में झूठी बातें गढता है और जब सच्चाई उसके सामने आ चुकी हो तो वह
उसे (झूठ समझ कर) मानने से इंकार कर देता है ? क्या
(सच्चाई से) इंकार करनेवालों का ठिकाना
(उचित दंड के लिए) जहन्नम नहीं है? (32)
और (दूसरी
तरफ़) जो व्यक्ति सच्चाई लेकर आया और जिसने उसे सच मानते हुए स्वीकार कर लिया, ऐसे ही लोग तक़वा
रखते हैं (33)
उनको उनके
रब के पास वह सब कुछ (नेमतें) मिलेंगी , जो भी वे चाहेंगे। यह इनाम है अच्छा कर्म
करनेवालों के लिए : (34)
यहाँ तक कि
अल्लाह उनके सब से बुरे कर्म को भी माफ़ कर देगा औऱ नेकी का बदला उनके द्वारा किए गए सबसे अच्छे कर्म
के हिसाब से उन्हें प्रदान करेगा (35)
क्या अल्लाह अपने
बन्दे के लिए काफ़ी नहीं है ? फिर भी वे आपको [ऐ रसूल]
उन (बुतों) से डराते हैं जिन्हें
ये पूजते हैं अल्लाह को छोड़कर . और अल्लाह (सच्चाई से इंकार के नतीजे में) जिसे रास्ते से भटका
दे तो फिर उसे मार्ग दिखानेवाला कोई नहीं (36)
और जिसे
अल्लाह सीधे मार्ग पर ले आए उसे रास्ते से भटकानेवाला भी कोई नहीं। क्या
अल्लाह ज़बरदस्त ताक़तवाला और बदला लेने में सक्षम नहीं है?(37)
यदि आप [ऐ रसूल]
उनसे पूछें कि "आकाशों और धरती को किसने
पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने", तो कह दें , “ ज़रा विचार करो कि अल्लाह को छोड़कर जिन (बुतों) को तुम (मदद के
लिए) पुकारते हो : यदि अल्लाह मुझे
कोई तकलीफ़ पहुँचानी चाहे तो क्या ये (बुत) मेरी उस तकलीफ़ को दूर कर सकते है? या अगर अल्लाह मुझपर
कोई दया [रहम] करना चाहे तो क्या ये उसकी रहमत को रोक सकते है?" कह दें , "मेरे लिए
अल्लाह काफ़ी है। भरोसा करनेवाले उसी पर भरोसा करते हैं।" (38)
कह दें, "ऐ मेरी क़ौम
के लोगो! तुम्हारे अधिकार में जो कुछ है उसके हिसाब से तुम अपने काम किए जाओ-- मैं
भी (अपने तरीक़े से) काम करता हूँ। तो शीघ्र ही तुम्हें पता चल जाएगा (39)
कि किसे (इस
दुनिया में) भारी बेइज़्ज़ती झेलनी पड़ेगी और किस पर (आख़िरत में) कभी समाप्त न
होनेवाली यातना उतरती है।"(40)
निश्चय
ही हमने लोगों के (मार्गदर्शन के) लिए आप (रसूल) पर हक़ के साथ
किताब उतारी है। अतः जिस किसी ने
सीधा मार्ग अपनाया तो अपने ही फ़ायदे के लिए अपनाया , और जो भटक गया तो वह भटककर अपने ही को हानि
पहुँचाता है : आप उनके ज़िम्मेदार नहीं हैं (41)
अल्लाह
ही मरे हुए लोगों की रूहों [प्राणों] को
अपने पास ले लेता है और ज़िंदा लोगों की रूहों को भी ले जाता है जबकि वे नींद की हालत में होते हैं--- फिर
जिसकी मृत्यु का फ़ैसला उसने कर दिया है उसकी रूह को (वहीं) रोक लेता है और दूसरे
(ज़िंदा लोगों की) रूहों को एक नियत समय तक के लिए वापस छोड़ देता है-- निश्चय ही
इसमें सोच-विचार करनेवालों के लिए कितनी
ही निशानियाँ हैं (42)
(इसके बावजूद) उन्होंने
अल्लाह से हटकर दूसरे (गढे हुए देवताओं) को सिफ़ारिशी [Intercessor] बना रखा है! (उनसे) कहें , "चाहे वे किसी चीज़ का न तो
अधिकार रखते हों और न कुछ समझते ही हों तब भी?" (43)
कह दें , "सिफ़ारिश
तो सारी की सारी अल्लाह के ही अधिकार में है। उसी के क़ब्ज़े में आकाशों और धरती की
बादशाही है। फिर उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।"(44)
और जब कभी अल्लाह का ज़िक्र अलग से किया जाता है तो जो लोग आख़िरत [ hereafter] पर ईमान नहीं रखते उनके दिल नफ़रत से कुढने लगते है, किन्तु जब उसके
सिवा दूसरे (देवताओं) का ज़िक्र होता है (जिन्हें वे पूजते हैं) तो वे खुशी से खिल
उठते हैं; (45)
कहें , "ऐ
अल्लाह! आसमानों और धरती को पैदा करनेवाले! हर ढकी-छुपी चीज़ और सामने दिखायी देनेवाली चीज़ के जाननेवाले!, तू ही अपने बन्दों के बीच उस चीज़ का फ़ैसला
करेगा, जिसमें वे मतभेद करते रहे हैं।" (46)
अगर
बदमाश/शैतान लोगों को वह सब कुछ [माल-असबाब] मिल जाए जो धरती में है और उसके साथ
उतना ही और भी(मिल जाए), तो वे क़यामत के दिन बुरी यातना से बचने के लिए अपनी जान के
बदले में वह सब कुछ दे डालने के लिए तैयार होंगे : (मगर) अल्लाह की ओर से उनके
सामने कुछ ऐसी चीज़ सामने आयेगी जिसके बारे में उन लोगों ने कभी सोचा तक न होगा (47)
उनके कर्मों की बुराइयाँ उनपर प्रकट हो जाएँगी, और वही चीज़ें उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी जिनकी वे हँसी उड़ाया करते थे (48)
(आदमी
का हाल यह है कि) जब उस पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वह हमें पुकारने लगता है, फिर जब हम उसपर अपनी दया दिखाते हुए कोई नेमत दे देते हैं, तो कहता है, "यह तो मुझे अपने (हुनर और) ज्ञान के कारण प्राप्त हुआ
है"---- नहीं! बल्कि यह तो एक परीक्षा है, किन्तु उनमें से अधिकतर
लोग नहीं जानते (49)
ऐसी ही
बात उनसे पहले गुज़र चुके (कुछ) लोगों ने कही थी. नतीजा यह हुआ कि जो कुछ कमाई वे
करते थे, वह उनके कुछ काम न आई (50)
फिर जो
कुछ उन्होंने (अपने कर्मों से) कमाया था, उसकी बुराइयाँ उनपर ही आ पड़ीं.
और (इसी तरह) आजकल भी जिन (अरब के) लोगों ने शैतानियाँ कर रखी हैं, उन्हें अपने
कर्मों का बुरा प्रभाव भुगतना पड़ेगा : वे
(अल्लाह की पकड़ से) बच कर नहीं जा सकते (51)
क्या
उन्हें मालूम नहीं कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को ख़ूब बढा देता है और
जिसके लिए चाहता है (रोज़ी में) तंगी कर देता है? निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी
निशानियाँ है जो ईमानवाले हैं (52)
कह दें, "[अल्लाह कहता है] ऐ मेरे वह बन्दो, जिन्होंने (गुनाहों से) अपने आप पर ज़्यादती
करके अपनी हानि की है, अल्लाह की रहमत [दयालुता] से निराश न हो। निस्संदेह अल्लाह
सारे ही गुनाहों को क्षमा कर देता है : निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान
है” (53)
(गुनाहों से तौबा करने के लिए) अपने रब का ध्यान लगाओ. उसके
आज्ञाकारी बन जाओ इससे पहले कि तुम पर यातना आ जाए (क्योंकि) फिर तुम्हारी
सहायता नहीं की जाएगी(54)
और उस
बेहतरीन शिक्षा [क़ुरआन] का अनुसरण करो जो तुम्हारे रब ने तुम्हारी ओर उतारी है, इससे पहले कि
तुम पर अचानक यातना आ जाए और तुम्हें इसकी ख़बर भी न हो" (55)
और तुम्हारी आत्मा यह कह
उठे, "हाय, अफ़सोस मुझ पर!
जो उपेक्षा अल्लाह के हक़ में मुझ से हुई । और सच तो यह है कि मैं (अल्लाह के
आदेशों का) मज़ाक़ उड़ानेवालों में शामिल रहा " (56)
या, जब वह यातना
अपनी आँखों से देखले तो कहने लगे,
"काश! मुझे एक बार (दुनिया में) वापस जाने का
मौक़ा मिल जाए, तो मैं नेक लोगों में शामिल हो जाऊँ ! " (58)
[रब कहेगा] "हरगिज़ नहीं! मेरी आयतें
तेरे पास आ चुकी थीं, किन्तु तूने उनको मानने से इंकार कर दिया : तू अपनी बड़ाई के
घमंड में पड़ गया और इंकार करनेवालों[काफ़िरों] में शामिल हो गया”. (59)
और
क़यामत के दिन आप [ऐ रसूल] उन लोगों को देखेंगे जिन्होंने अल्लाह के ख़िलाफ झूठी
बातें गढी थीं, कि उनके चेहरे काले पड़ गए हैं । क्या अहंकारियों का ठिकाना
जहन्नम में नहीं है?" (60)
(इसके
विपरीत) जिन लोगों ने अल्लाह को अपने दिल में बसा रखा था, अल्लाह उन
लोगों को उनकी आख़िरी मंज़िल [मुक्ति] तक सुरक्षित पहुँचा देगा: न उन्हें कोई तकलीफ़
छू सकेगी और न उन्हें किसी बात का ग़म होगा (61)
उसी के
पास आकाशों और धरती की कुंजियाँ हैं। और जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों को मानने से
इंकार किया, वही हैं जो घाटे में रहेंगे (63)
कह दें, " ऐ
बेवक़ूफ़ लोगो! क्या फिर भी तुम मुझसे कहते हो कि मैं अल्लाह के सिवा किसी और की
बन्दगी करूँ ?" (64)
[ऐ रसूल] आप पर और आपसे पहले गुज़र चुके (नबियों) पर पहले ही
यह बात वही के द्वारा उतारी जा चुकी है कि
: "अगर तुमने अल्लाह का कोई साझीदर
ठहराया तो तुम्हारे द्वारा किए गए अच्छे –बुरे सब कर्म बर्बाद व अकारथ हो जायेंगे और तुम अवश्य ही घाटे में
पड़नेवालों में शामिल हो जाओगे (65)
इन
लोगों ने न अल्लाह की सही हक़ीक़त समझी न उसकी क़द्र जानी, जैसी क़द्र के वह लायक़ था । हालाँकि क़यामत
के दिन पूरी की पूरी धरती उसकी मुट्ठी में होगी. आसमानों को लपेट कर वह अपने दाएँ
हाथ में रख लेगा--- महान है वह! और वह हर
उस ज़ात से कहीं ऊँचा और बड़ा है जिसे वे (प्रभुत्व में अल्लाह का) साझीदार ठहराते
हैं (67)
और जब
सूर (नरसिंघा) फूँका जाएगा, तो आसमानों और धरती में जितने हैं, वह सब बेहोश हो जायेंगे, सिवाय उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दूबारा फूँका जाएगा, तो वे सब लोग
सहसा खड़े होकर देखने लगेंगे (68)
और धरती
रब के प्रकाश से जगमगा उठेगी; और कर्मों के हिसाब-किताब खोल कर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा. और लोगों
के बीच हक़ के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा : उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी (69)
और हर
एक को उसके कर्मों का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा। और वह [अल्लाह] भली-भाँति जानता
है, जो कुछ वे करते
हैं (70)
जिन
लोगों ने सच्चाई से इंकार किया, वे गिरोह के गिरोह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब
वे वहाँ पहुँचेंगे तो उसके द्वार खोल दिए जाएँगे और उसके प्रहरी उनसे कहेंगे, "क्या
तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे जो तुम्हें तुम्हारे रब की आयतें
सुनाते रहे हों और तुम्हें इस दिन की मुलाक़ात से सचेत करते रहे हों?" वे
कहेंगे, "क्यों नहीं (वे तो आए थे) ।" किन्तु सच्चाई से इंकार
करनेवालों के जुर्मों की सज़ा पहले ही दी जा चुकी होगी (71)
कहा
जाएगा, "जहन्नम के द्वारों में प्रवेश करो : उसमें सदैव रहने के
लिए।" तो क्या ही बुरा ठिकाना है अहंकारियों का! (72)
और जो
लोग अपने रब का डर रखते थे, वे गिरोह के गिरोह जन्नत की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब
वे वहाँ पहुँचेंगे तो पायेंगे कि उसके द्वार पहले से खुले होंगे। और उसके प्रहरी
उनसे कहेंगे, "सलाम हो तुमपर! बहुत अच्छे रहे! अतः इसमें प्रवेश करो: सदैव रहने के लिए तो (उनकी ख़ुशियों का क्या
हाल होगा!) (73)
और वे
कहेंगे, " सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है , जिसने हमारे
साथ अपना वादा सच कर दिखाया, और हमें इस भूमि का वारिस बनाया कि हम जन्नत में जहाँ चाहें
वहाँ रहें-बसे।" अतः क्या ही अच्छा इनाम [reward] है नेक कर्म करनेवालों
का!- (74)
और आप [ऐ रसूल]
फ़रिश्तों को देखेंगे कि वे सिंहासन के गिर्द घेरा बाँधे हुए, अपने रब का गुणगान कर रहे हैं । और लोगों के बीच
ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाएगा और कहा जाएगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (75)
सूरह 40 : ग़ाफ़िर [माफ़ करनेवाला, The
forgiver]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जो
गुनाहों को क्षमा करनेवाला, तौबा क़बूल करनेवाला, दंड देने में कठोर और बेहिसाब इनाम देनेवाला है।
उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। अन्ततः उसी की ओर सबको लौट कर जाना
है(3)
अल्लाह की
आयतों में बस वही लोग झगड़े पैदा करते हैं जिन्होंने(सच्चाई को मानने से) इंकार
किया, तो [ऐ रसूल] आप ज़मीनों पर उन
लोगों को जो (व्यापार के लिए) चलते फिरते देखते हैं, उनकी (ख़ुशहाली) कहीं आपको धोखे में न डाल दे (4)
उनसे पहले
नूह की क़ौम ने और उनके बाद दूसरे गिरोहों ने भी (अपने रसूलों की बातों को) मानने
से इंकार किया और हर समुदाय के लोगों ने
अपने रसूलों के बारे में इरादा किया कि उन्हें पकड़(कर क़त्ल कर दें या क़ैद कर) लें
और उन्होंने असत्य का सहारा लेकर झगड़े किए, ताकि उसके द्वारा सत्य को मिटा दें। अन्ततः
मैंने उन्हें (अपनी) पकड़ (में ले) लिया। तौ कैसी रही मेरी सज़ा! (5)
और इस तरह, तेरे रब की ओर से इंकार करने वालों के
ख़िलाफ़ सज़ा तय की जा चुकी है कि ऐसे लोगों
का ठिकाना (जहन्नम की) आग में होगा ; (6)
जो
(फ़रिश्ते) सिंहासन को उठाए हुए हैं, और जो उसको घेरे रहते हैं , अपने रब की
बड़ाई के बयान के साथ उसका गुणगान करते रहते हैं और उस पर विश्वास रखते है: और ईमानवालों के लिए क्षमा की प्रार्थना करते
रहते हैं कि "ऐ हमारे रब! तेरी दया
और तेरी जानकारी हर चीज़ को अपने घेरे में
लिए हुई है । अतः जिन लोगों ने (गुनाहों से) तौबा की और तेरे बताए हुए रास्ते पर
चले, उन्हें क्षमा कर दे और उन्हें भड़कती हुई आग की यातना से
बचा ले(7)
और ऐ हमारे रब! उन्हें ऐसे बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दे जो सदैव बाक़ी रहने वाले हैं, जिनका तूने उनसे वादा किया है और साथ
में उनके पूर्वजों, उनके पति/ पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक हों
उन्हें भी(उनके साथ दाख़िल कर दे)। निस्संदेह तू ही है जिसके पास सबसे ज़्यादा ताक़त
भी है, और सबसे ज़्यादा ज्ञान भी (8)
और
उन्हें हर तरह के बुरे कर्मों से बचा। और उस दिन जिसे तूने बुरे कामों (की सज़ाओं
से)
निश्चय
ही जिन लोगों ने (सच्चाई से) इंकार किया उन्हें पुकारकर कहा जाएगा कि "(आज)
तुम्हें जितनी नफ़रत अपने आपसे हो रही है , उससे ज़्यादा नफ़रत अल्लाह को उस समय होती थी जब तुम्हें ईमान की ओर बुलाया
जाता था और तुम (उस पर विश्वास करने से) इंकार करते थे।" (10)
वे
कहेंगे, "ऐ हमारे रब! तूने हमें दो बार मौत दी[एक पैदा होने से पहले
बेजान हालत और एक मरने के बाद] और दो बार जीवन प्रदान किया। अब हम अपने गुनाहों को
स्वीकार करते हैं, तो क्या अब (जहन्नम से) बच निकलने का भी कोई रास्ता है?" (11)
(उनसे कहा जाएगा), “ तुम्हारी यह हालत इसलिए है कि जब
अकेले अल्लाह का नाम लिया जाता था तो तुम
उसे मानने से इंकार कर देते थे, किन्तु उस(अल्लाह) के साथ जब दूसरों को साझीदार ठहराया जाता
तो तुम (उनमें) विश्वास कर लेते थे”। तो अब फ़ैसला तो अल्लाह ही के हाथ में है, जो सबसे बड़ा, सबसे महान है।
-(12)
वही(अल्लाह) है जो तुम्हें अपनी
निशानियाँ दिखाता है और तुम्हारे लिए आकाश से (वर्षा के रूप में) रोज़ी उतारता है, किन्तु इससे सीख
तो बस वही हासिल करता है जो उसकी ओर(तौबा करने के लिए) सच्चे दिल से झुके. (13)
अतः[ऐ लोगो] तुम
अल्लाह को इस तरह पुकारो कि पूरी भक्ति और
समर्पण केवल उसी के लिए हो, यद्यपि इंकार करनेवालों को
अप्रिय ही लगे : (14)
वह [अल्लाह]
बहुत ऊँची श्रेणीवाला, सिंहासन का मालिक है. वह अपने बन्दों में से जिसे चाहे, उसपर वही [Revelations] द्वारा अपनी शिक्षाओं को भेजता है, ताकि वह
मुलाक़ात के दिन[क़यामत] से (लोगों को) सावधान कर दे (15)
जिस दिन सब लोग
(क़बरों से) निकल कर सामने उपस्थित होंगे, उनकी कोई चीज़
अल्लाह से छिपी न रहेगी, (पूछा जाएगा) "आज किसकी
बादशाही है?"(जवाब
होगा) "अल्लाह की, जो अकेला है और
सबपर क़ाबू रखनेवाला है (16)
आज के दिन प्रत्येक व्यक्ति को उसके
(कर्मों की) कमाई का बदला दिया जाएगा; आज कोई नाइंसाफ़ी
नहीं होगी । निश्चय ही अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है (17)
[ऐ रसूल] आप उन्हें निकट आते जा रहे (क़यामत
के) दिन से सावधान कर दें, जब कलेजे मुँह को आ लगेंगे और दम घुटने लगेगा। ज़ालिमों का
न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफ़ारिशी जिसकी बात मानी जाए (18)
अल्लाह
ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा। रहे वे (देवता) जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी चीज़
का भी फ़ैसला नहीं कर सकते । निस्संदेह अल्लाह ही है जो हर बात सुनता है, सब कुछ देखता है (20)
क्या वे
लोग धरती में घूमे-फिरे नहीं और देखा नहीं कि जो लोग उनसे पहले गुज़र चुके थे उन
लोगों का क्या अंजाम हुआ? वे[पुराने लोग] ताक़त में भी इनसे कहीं ज़्यादा थे, और धरती पर भी अधिक प्रभावशाली निशानियाँ छोड़ गए थे, फिर भी उनके गुनाहों
के कारण अल्लाह ने उन्हें तबाह कर डाला-- और उनके पास कोई न था जो उन्हें अल्लाह
से बचा पाता -- - (21)
यह सब
कुछ इसलिए हुआ कि उनके पास (अल्लाह के भेजे हुए) रसूल स्पष्ट प्रमाण [Clear signs]लेकर बराबर आते रहे, फिर भी उनलोगों ने इन्हें मानने से इंकार कर दिया। (अन्ततः)
अल्लाह ने उन्हें तबाह कर डाला : निश्चय ही वह बड़ी शक्तिवाला, सज़ा देने में
बड़ा कठोर है (22)
फ़िरऔन, हामान [फ़िरऔन का दरबारी] और क़ारून[ Korah] के पास, किन्तु
उन्होंने कहा, "यह तो जादूगर है, बड़ा झूठा है!" (24)
फिर जब
वह [मूसा] उनके सामने हमारी तरफ़ से सच्चाई का संदेश लेकर आए तो उस [फ़िरऔन] ने कहा, "जो लोग
उन [मूसा अलै.] के साथ (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, उनके बेटों को
मार डालो औऱ उनकी स्त्रियों को जीवित छोड़ दो"--- किन्तु सच्चाई से इंकार करनेवालों की चाल तो
भटकने के लिए ही होती है (25)
फ़िरऔन
ने कहा, " छोड़ दो मुझे ताकि मैं
मूसा को मार डालूँ! ---- और वह भी अपने रब को (अपनी सहायता के लिए) बुला ले ----
मुझे डर है कि ऐसा न हो कि वह तुम्हारे धर्म को बदल डाले या यह कि वह [मिस्र] देश
में बिगाड़ पैदा करे।" (26)
मूसा ने
कहा, "मैं अपने और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ हर उस ज़ालिम आदमी
से, जो हिसाब-किताब
के दिन[क़यामत] पर विश्वास नहीं रखता ।" (27)
फ़िरऔन
के ख़ानदान में से (अल्लाह पर) विश्वास रखने वाले एक व्यक्ति ने, जिसने अपने
ईमान को अभी तक छिपा रखा था, बोल उठा, ‘क्या तुम एक
व्यक्ति को केवल इसलिए मार डालोगे कि वह कहता है कि “ मेरा रब अल्लाह है?” और वह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से
खुली निशानियाँ भी लेकर आया है--- यदि वह झूठा है
तो उसके झूठ का वबाल उसी पर पड़ेगा--- किन्तु यदि वह सच्चा है, तो जिस चीज़ की वह तुम्हें धमकी दे रहा है, उसमें से कुछ न कुछ तो तुमपर पड़कर रहेगा।
निश्चय ही अल्लाह उसको मार्ग नहीं दिखाता जो मर्यादा(की सीमा) लांघनेवाला और बड़ा
झूठा हो (28)
ऐ मेरी
क़ौम के लोगो! आज तुम्हारी हुकूमत है, (मिस्र की) धरती पर तुम्हारा राज है, किन्तु अल्लाह की यातना अगर आ जाए, तो कौन है जो उसके मुक़ाबले में हमारी सहायता
करे?" फ़िरऔन ने कहा, "मैं जो ठीक समझता हूँ वह
मैंने तुम्हें बता दिया है; और मैं तुम्हारा मार्गदर्शन सही रास्ते की तरफ़ कर रहा हूँ
।" (29)
उस
व्यक्ति ने, जो ईमान ला चुका था, (आगे) कहा, "ऐ मेरी
क़ौम के लोगो! मुझे डर है कि तुम पर (विनाश का) ऐसा दिन न आ पड़े, जैसा उन सभी
समुदायों पर आ पड़ा था(जिन्होंने अपने रसूलों का विरोध किया था) : (30)
जैसे
नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके बाद के लोगों का हाल हुआ था---- अल्लाह तो अपने बन्दों पर कभी नाइंसाफ़ी नहीं
करना चाहता (31)
और ऐ
मेरी क़ौम के लोगो! मुझे तुम्हारे लिए उस दिन का डर है जिस [क़यामत के] दिन लोग एक
दूसरे को चिल्ला-चिल्ला कर पुकार रहे होंगे , (32)
जिस दिन
तुम पीठ फेरकर भागोगे और तुम्हें अल्लाह
से बचानेवाला कोई न होगा! - और जिसे
अल्लाह भटकता छोड़ दे उसे मार्ग दिखानेवाला कोई न होगा । - (33)
सच्चाई
यह है कि इससे पहले तुम्हारे [मिस्र के लोग] पास यूसुफ़ (अलै.) साफ़ निशानियाँ लेकर
आए थे, तब भी जो संदेश लेकर वे आए थे, उसके बारे में
तुम बराबर सन्देह में पड़े रहे, फिर जब उनकी मृत्यु हो गई तो तुम कहने लगे, " उनके
बाद अल्लाह अब कोई रसूल न भेजेगा।"
जो लोग अल्लाह की आयतों में झगड़े निकाला करते
हैं, जबकि उन्हें ऐसा
करने का अधिकार [authority]
नहीं दिया गया है, तो यह (काम) अल्लाह की
दृष्टि में अत्यन्त अप्रिय है और उन लोगों
की दृष्टि में भी जो उस पर विश्वास रखते हैं। इस तरह अल्लाह हर अहंकारी और
अत्याचारी आदमी के दिल पर मुहर लगा(कर उसे बंद कर) देता है।“ (35)
फ़िरऔन ने(अपने
वज़ीर से) कहा, "ऐ हामान! मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना दो, ताकि मैं (उस पर
चढ कर) उस रस्सी तक पहुँच सकूँ, (36)
जो आसमानों तक चली जाती है, फिर
मैं (वहाँ) मूसा के ख़ुदा को झाँककर देख सकूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।"
इस तरह फ़िरऔन के कर्मों की बुराइयाँ उसकी नज़रों में सुहानी बना दी गयीं और उसे
सही मार्ग पर जाने से रोक दिया गया--- उसकी चालें उसे बर्बादी की ओर ही ले गयीं . (37)
उस ईमानवाले व्यक्ति ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, मेरा अनुसरण करो! मैं तुम्हे भलाई का ठीक रास्ता दिखाऊँगा (38)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह सांसारिक
जीवन तो बस थोड़े समय के लिए मज़ा लेने की जगह है। यक़ीन करो कि स्थायी रूप से रहने
बसने का घर तो आख़िरत [परलोक] ही है (39)
जिस किसी ने बुराई की होगी तो उसे उसी के बराबर बदला मिलेगा, किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया और वह (एक अल्लाह
में) विश्वास रखता हो, तो वह पुरुष हो या स्त्री, ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे। वहाँ उन्हें
बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी (40)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह
मेरे साथ क्या मामला है कि मैं तो तुम्हें मुक्ति की ओर बुलाता हूँ और तुम मुझे आग
की ओर बुला रहे हो? (41)
तुम मुझसे चाहते हो कि मैं अल्लाह में विश्वास करने
से इंकार कर दूँ और उसके साथ ऐसी चीज़ों को उसका
साझीदार मान लूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं; जबकि मैं तुम्हें उसकी ओर बुला रहा
हूँ जो प्रभुत्वशाली, अत्यन्त क्षमा करनेवाला है (42)
इसमें कोई शक नहीं कि तुम
मुझे जिसकी ओर बुला रहे हो, वह न तो इस दुनिया में पुकारे जाने
के क़ाबिल है और न आनेवाली दुनिया[परलोक] मे: सच तो यह है कि हमें लौटना तो अल्लाह
ही की ओर है और यह कि जो लोग मर्यादा (की सीमा) लाँघनेवाले हैं, वही आग में रहनेवाले हैं (43)
[एक दिन] तुम मुझे याद करोगे, जो कुछ मैं तुमसे अभी कह रहा हूँ, अत: मैं अपना मामला अल्लाह को सौंपता हूँ : निस्संदेह अल्लाह अपने बंदों को अच्छी तरह से
जानता है “ . (44)
अन्ततः अल्लाह ने उस (ईमानवाले) को उन लोगों
की बुरी योजनाओं से बचा लिया,
उन्हें
सुबह व शाम (जहन्नम की) आग के सामने लाया जाएगा; और जिन दिन (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, (तो आदेश होगा), "झोंक दो
फ़िरऔन के लोगों को अत्यंत बुरी यातना में!"(46)
वे
आग के भीतर एक-दूसरे से झगड़ रहे होंगे : तो कमज़ोर लोग उन (घमंडी) लोगों से, जो बड़े बनते
थे, कहेंगे, "हम तो
तुम्हारे पीछे चलनेवाले थे, तो क्या अब तुम हमपर से आग का कुछ भाग हटा सकते हो?" (47)
वे लोग(जो बड़े बनते
थे) कहेंगे, "हम सब ही इसी(आग) में पड़े हैं। निश्चय ही अल्लाह बन्दों के
बीच फ़ैसला कर चुका है।" (48)
आग
में पड़े हुए लोग जहन्नम के प्रहरियों से कहेंगे कि "अपने रब से निवेदन करो कि
वह हमपर से एक दिन की यातना में कुछ कमी
कर दे!" (49)
मगर वे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे
रसूल सच्चाई का खुला प्रमाण लेकर नहीं आते रहे थे ?" (जहन्नमी) कहेंगे, " बेशक! (आते तो रहे थे)
!" और प्रहरी कहेंगे, "फिर तो तुम्हीं फ़रियाद करो, मगर हाँ, इंकार करनेवालों[काफ़िरों] की फ़रियाद तो बस
(हमेशा) अनसुनी ही रह जाती है”. (50)
निश्चय
ही हम अपने रसूलों की और उन लोगों की जो ईमान रखते हैं, अवश्य सहायता करते है, सांसारिक जीवन में भी और उस दिन (भी करेंगे) जबकि गवाही देने वाले खड़े होंगे (51)
जिस दिन
शैतानी करनेवालों के (अपनी सफ़ाई में) किए गए बहाने, उन्हें कुछ भी लाभ न पहुँचाएंगे , बल्कि उनके लिए
तो फटकार होगी और रहने के लिए सबसे बुरा घर होगा (52)
और
मूसा(अलै.) को भी हमने (किताब द्वारा) मार्ग दिखाया, और इसराईल की सन्तान को हमने उस किताब का
उत्तराधिकारी बनाया, (53)
अतः ऐ रसूल, आप धैर्य से काम लें। निश्चय ही अल्लाह का
वादा सच्चा है और अपने गुनाहों की क्षमा माँगते रहें और संध्या समय और प्रातः की घड़ियों में अपने
रब की प्रशंसा के साथ गुणगान करते रहें (55)
जो लोग
बिना किसी ऐसे प्रमाण के जो उनके पास आया हो, अल्लाह की आयतों में झगड़े निकालते हैं, उनके सीनों में और कुछ नहीं बल्कि महान बनने की लालसा है मगर उस (बड़ायी के
मुक़ाम) तक वे कभी पहुँचनेवाले नहीं। अतः आप (उनकी बुराइयों से) अल्लाह की शरण
माँगते रहें । निश्चय ही वह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है (56)
निस्संदेह, आकाशों और धरती को
पैदा करना लोगों को पैदा करने की अपेक्षा कहीं बड़ा (कठिन) काम है, किन्तु अधिकतर
लोग (छोटी सी बात) नहीं जानते (57)
आँखों से अंधा और
आँखोंवाला बराबर नहीं होते, ठीक वैसे ही जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे
कर्म करते हैं और जो लोग बुरे कर्म करनेवाले हैं, वे बराबर नहीं हो सकते: (मगर)
तुम इन बातों पर कितना कम ध्यान देते हो ! (58)
तुम्हारे रब ने
कहा है कि "तुम मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थनाएँ स्वीकार
करूँगा; जो लोग मेरी बन्दगी के मामले में
घमंड से काम लेते है, निश्चय ही वे अपमानित होकर जहन्नम
में प्रवेश करेंगे” (60)
अल्लाह
ही तो है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें आराम पा सको औऱ दिन बनाया
ताकि (उसके उजाले में) तुम देख सको । निस्संदेह अल्लाह लोगों के लिए बड़ा उदार व
मेहरबान है, किन्तु अधिकतर लोग उसका शुक्र अदा नहीं करते (61)
ऐसा है अल्लाह, तुम्हारा रब, हर चीज़ का पैदा करनेवाला : उसके सिवा कोई
पूज्यनीय नहीं। तुम (ग़लत चीज़ों को सही
समझकर) कैसे इतना बहक सकते हो?(62)
अल्लाह
ही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को रहने की जगह बनाया, और आकाश को एक छत बनाया. तुम्हें शक्ल-सूरत
[रूप] दी, तुम्हारी सूरतों को अच्छे रूप दिए, और तुम्हें अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी। वह
है अल्लाह जो तुम्हारा रब है। तो बड़ी बरकतवाला है अल्लाह, सारे संसारों का रब. (64)
वह सदा ज़िंदा रहनेवाला है, उसके सिवा कोई
प्रभु पूज्यनीय नहीं। अतः उसी को पुकारो, धर्म (भक्ति) को उसी के लिए पूरी तरह समर्पित
करके। सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का रब है (65)
आप कह दें
[ऐ रसूल], "चूँकि मेरे पास मेरे रब की ओर से खुले प्रमाण आ चुके हैं, अत: मुझे उनकी
बंदगी करने से मना किया गया है जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो । मुझे तो
हुक्म हुआ है कि मैं सारे संसार के रब के आगे अपना सर झुका दूँ।" -(66)
वही है जिसने तुम्हें (पहली बार) मिट्टी से पैदा
किया, फिर वीर्य की एक बूँद से, फिर जमे हुए ख़ून के लोथड़े से; फिर वह तुम्हें
(माँ के पेट से) एक बच्चे के रूप में बाहर लाता है, फिर तुम्हें बढ़ाता है ताकि अपनी प्रौढ़ता को
पहुँच जाओ, फिर मुहलत देता है कि तुम बुढापे को पहुँचो - यद्यपि तुममें से कई इससे पहले
ही मर जाते हैं - - - और ताकि तुम एक नियत
अवधि तक पहुँच जाओ और ऐसा इसलिए है कि तुम समझो (67)
वही है जो जीवन
देता है और मृत्यु देता है, और जब वह किसी काम का फ़ैसला करता है, तो उसके लिए बस इतना कह देता है कि: 'हो जा' और बस वह हो जाता है (68)
क्या आपने [ऐ
रसूल] ऐसे बहके हुए लोगों को देखा जो अल्लाह के संदेश [आयतों] में झगड़े निकालते
हैं-- (69)
जिन
लोगों ने किताब को भी मानने से इंकार किया और उन संदेशों को भी जिनके साथ हमने
अपने रसूलों को भेजा था? तो शीघ्र ही उन्हें पता चल
जाएगा (70)
अल्लाह को छोड़कर?” वे कहेंगे, "वे हमें छोड़ कर
गुम हो गए : बल्कि हम इससे पहले जिसे पूजते रहे थे वे असल में कोई चीज़ ही न
थे।" इसी तरह अल्लाह इंकार करनेवालों को भटकता छोड़ देता है (74)
यह सब इसलिए हुआ
कि तुम धरती पर बेकार व झूठी चीज़ों की ख़ुशियों में मस्त रहते थे और बेलगाम इतराते फिरते थे (75)
“ प्रवेश करो जहन्नम के दरवाज़ों में, वहाँ हमेशा रहने
के लिए--- सो अहंकारियों के रहने के लिए बहुत ही बुरा ठिकाना है!” (76)
अतः [ऐ
रसूल] आप धैर्य से काम लें, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है: तो जिस (यातना) का हम
इन [विश्वास न करने वालों] से वादा कर रहे हैं, उसमें से कुछ हिस्सा यदि हम आपको (आपके जीवनकाल
में) दिखा दें या हम आपको दुनिया से पहले ही उठा लें, हर हाल में
उन्हें हमारे पास ही वापस लाया जाएगा (77)
हम आप से पहले कितने ही रसूल भेज चुके है---
उनमें से कुछ तो वे है जिनका उल्लेख हमने आपसे किया है और कुछ वे हैं जिनका उल्लेख
हमने नहीं किया है--- और किसी रसूल के लिए भी यह (संभव) न था कि वह अल्लाह की
इजाज़त के बिना कोई निशानी ले आए। फिर जब [जिस दिन] अल्लाह का आदेश आ जाएगा, तो उनके बीच सच व इंसाफ़ के साथ फ़ैसला
कर दिया जाएगा, और उस समय झूठ पर चलने वाले भारी घाटा उठाएंगे (78)
अल्लाह
ही है जिसने तुम्हारे लिए मवेशी बनाए, ताकि
उनमें से कुछ पर तुम सवारी करो और उनमें से वह भी हैं जिन्हें तुम खाते हो ; (79)
उनमें
तुम्हारे लिए और भी कई फ़ायदे हैं. अपनी ज़रूरत के लिए जहाँ भी तुम्हारा दिल चाहे, तुम उस पर
(सवार होकर) अपनी मंज़िल तक पहुँच सकते हो: वे तुम्हें सवार करके ले जाते हैं जिस
तरह नौकाएं तुम्हें (दरिया में) सवारी
कराती हैं. (80)
और
वह[अल्लाह] तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है: फिर तुम अल्लाह की किन-किन निशानियों
को पहचानने से इंकार करोगे ? (81)
फिर
क्या उन लोगों ने धरती पर चल-फिर कर देखा नहीं कि उनसे पहले गुज़र चुके लोगों का
कैसा अंजाम हुआ? वे उनसे गिनती में
भी अधिक थे, शक्ति में भी ज़्यादा थे और ज़मीन पर अपनी छोड़ी हुई
निशानियों की दृष्टि से भी बढ़-चढ़कर थे। इसके बावजूद जो कुछ भी उन्होंने हासिल
किया, वह उनके कुछ भी काम न आया (82)
फिर जब उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों
के साथ आए तब भी वे अपने उस ज्ञान पर गर्व करते रहे जो उनके पास था, और जिस चीज़ का वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, उसी ने उनको आ घेरा (83)
फिर जब उन्होंने हमारी यातना अपनी आँखों से
देख ली तो कहने लगे, "हम विश्वास करते हैं उस अल्लाह में जो अकेला है, और हम जिसको भी अल्लाह का साझीदार ठहराते थे, उन सबको मानने से इंकार करते हैं।" (84)
मगर हमारी(दी गयी) यातना को देख लेने के बाद
(अल्लाह में) विश्वास कर लेने से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होने वाला -- यही अल्लाह
की रीति है, जो उसके बन्दों (को जाँचने) में पहले से चली आ रही है - और
उस समय विश्वास न करनेवाले (हमेशा) भारी घाटे में पड़ जाते हैं . (85)
सूरह
41 : फ़ुस्सिलत/अस-सज्दा [स्पष्ट आयतें, Verses made distinct]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
एक किताब-- जिसकी आयतों को स्पष्ट और
अलग पहचान वाली बनाया गया है : अरबी भाषा में क़ुरआन-- उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं ; (3)
अच्छी ख़बर देनेवाली और सचेत करनेवाली(किताब)
है. फिर भी उनमें से अधिकतर लोगों ने इस (किताब) से मुँह मोड़ रखा है, सो वे सुनते ही नहीं हैं. (4)
और वे [रसूल से] कहते हैं
कि "जिस चीज़ (में विश्वास कर लेने) के लिए तुम हमें बुलाते हो उसके ख़िलाफ़ तो
हमारे दिलों पर आवरण चढा हुआ है; हमारे कान बहरे हैं; हमारे और तुम्हारे बीच (रोक के लिए) एक पर्दा है; अतः तुम अपना काम करते रहो, हम अपना काम करते हैं।" (5)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो तुम्हारे जैसा ही एक इंसान हूँ, (मगर) मुझ पर यह बात उतारी गयी है कि
तुम्हारा ख़ुदा असल में एक ही ख़ुदा है। अतः तुम उसी (ख़ुदा) की ओर जानेवाले सीधे
रास्ते को अपनाओ और उसी से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो. और बड़ी तबाही है उनकी
जो एक अल्लाह के साथ (दूसरे भगवानों को) उसका साझीदार ठहराते हैं, (6)
जो (निर्धारित) ज़कात नहीं देते और आने वाली
दुनिया [आख़िरत, hereafter] को मानने से इंकार करते हैं ! (7)
बेशक वे लोग जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म
करते रहे, तो उनके लिए (बदले में)
ऐसा इनाम है जिसका सिलसिला कभी टूटनेवाला नहीं।" (8)
कह दें, "तुम उस (अल्लाह) का इनकार कैसे कर सकते हो, जिसने धरती को दो दिनों (दो कालों) में पैदा
किया? तुम दूसरे भगवानों को
उस(अल्लाह) के बराबर का कैसे ठहरा सकते हो? वह
तो सारे संसारों का पालनहार है! (9)
और उसने उस (धरती) में ठोस पहाड़ों को रखकर जमा
दिया और उसके अंदर (खनिज पदार्थ आदि से) बरकत डाल दी और उसमें सभी
ज़रूरतमंदों के लिए ठीक अंदाज़े के साथ क़िस्म क़िस्म के खाने-पीने व जीवन जीने के
सामान रखे--- और यह सब कुछ चार दिन (काल) में हुआ (10)
फिर उस [अल्लाह] ने आकाश की ओर ध्यान दिया, जो कि उस समय मात्र धुआँ था-- और उसने उस[आकाश]
से और धरती से कहा, 'चले आओ(हमारा आदेश मानते हुए), खुशी के साथ या अनिच्छा से।' उन्होंने कहा, 'हम
ख़ुशी ख़ुशी आते हैं--- ' - (11)
फिर उसने दो दिनों में
(अपने फ़ैसले के मुताबिक़) सात आकाशों को बना डाला और प्रत्येक आकाश में उससे
सम्बन्धित आदेश भेज दिए. औऱ हमने इस दुनिया वाले (निकटवर्ती) आकाश को
दीपों [तारों व ग्रहों] से सजाया और उसे ख़ूब सुरक्षित कर दिया। यह ऐसी व्यवस्था है
जो अत्यंत प्रभुत्वशाली और सब कुछ जाननेवाले की निर्धारित की हुई है।" (12)
(फिर भी) अगर वे लोग ध्यान न दें और मुँह मोड़ें तो आप कह दें, "मैं तुम्हें उस कड़कदार धमाके [thunderbolt] से डराता हूँ, जैसा धमाका ‘ आद और समूद’ पर आ
पड़ा था" : (13)
जब उनलोगों के पास रसूलों के संदेश आए, (कभी) उनके आगे से और (कभी) उनके पीछे से [यानी हर दृष्टिकोण से समझाया] कि
"अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो", तो उन्होंने कहा, "यदि हमारा रब चाहता तो फ़रिश्तों को भेज
देता। अतः जिस संदेश के साथ तुम्हें भेजा गया है, हम उसे नहीं मानते।" (14)
‘ आद की क़ौम के लोग धरती पर हर जगह घमंड में चूर रहे और वह सब किया जिसका उन्हें
कोई अधिकार न था, और कहते, "कौन है जो हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्हें यह नहीं सूझा कि जिस अल्लाह ने
उन्हें पैदा किया, वह उनसे शक्ति में कहीं
बढ़कर है? वे तो हमारी आयतों को
मानने से इंकार ही करते रहे, (15)
सो हमने कुछ (अशुभ व भयानक) दिनों के लिए उन
लोगों पर एक अत्यंत तेज़ आँधी छोड़ दी, ताकि उन्हें सांसारिक जीवन में अपमान की यातना का मज़ा चखा दें; मगर आने वाले जीवन [आख़िरत, परलोक] की यातना तो इससे कहीं बढ़कर अपमानित करनेवाली होगी, और उनको कोई सहायता भी नहीं दी जाएगी. (16)
और रहे समूद (के लोग), तो हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया था, किन्तु सही मार्ग अपनाने के बजाए उन्होंने
अन्धा रहना ही ज़्यादा पसन्द किया। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ (बुरे कर्मों की) कमायी वे
करते रहे थे उसके बदले में एक कड़कदार धमाके ने उन्हें जकड़ लिया जो अपमानित कर
देनेवाला दंड था. (17)
और एक दिन आयेगा जब अल्लाह के शत्रुओं को
इकट्ठा करके (जहन्नम की) आग की ओर हँका के ले जाया जाएगा, फिर उन्हें श्रेणियों में बाँट कर क़तार में
खड़ा किया जाएगा, (19)
यहाँ तक कि जब वे उस (आग) के पास पहुँच
जाएँगे तो उनके कान, उनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन
बातों की गवाही देंगी, जो कुछ (बुरे कर्म) वे
करते रहे थे. (20)
वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने बोलने की शक्ति प्रदान की है, जिसने प्रत्येक चीज़ को बोलने की दी है-- उसी
ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी की ओर तुम्हें वापस ले जाया जा रहा है-- (21)
तब भी, तुमने अपने आपको अपने कानों से, अपनी आँखों से और अपनी
खालों से छुपाने की कोशिश नहीं की ताकि तुम अपने कानों, आँखों और खालों को अपने ही विरुद्ध गवाही देने से रोक पाते, बल्कि तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही
नहीं है जो तुम करते रहे थे, (22)
इस तरह, अपने रब के बारे में जो तुम एक ग़लत सोच रखते थे, वही तुम्हें बर्बादी की ओर ले गयी, और तुम उनलोगों में शामिल हो गए जो पूरी तरह
घाटे में हैं ”. (23)
अब यदि वे धैर्य से (यातना) झेलें तब भी
(जहन्नम की) आग ही उनका ठिकाना है। और यदि वे अपनी ग़लतियों को सुधारने के लिए मौक़ा
दिए जाने का निवेदन करें, तब भी उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी
जाएगी. (24)
हमने (दुनिया में) उन(विश्वास न रखनेवालों)
के लिए कुछ साथियों [शैतानों] को नियुक्त कर दिया है जो उनके बीते हुए कल और वर्तमान समय को इस तरह दिखाते हैं जो उनको सही और
सुहाना लगने लगता है, मगर उनके लिए सज़ाओं का
फ़ैसला पहले ही तय हो चुका है, इनमें जिन्नों और मनुष्यों की वे पीढियाँ भी
शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं : निश्चय ही वे घाटा उठानेवालों में से थे.
(25)
जिन लोगों ने इंकार किया उन्होंने (एक दूसरे
से) कहा, "इस क़ुरआन को सुनो ही मत
और (अगर कोई इसे सुना रहा हो
तो) इसके बीच में ह्ल्ला-ग़ुल्ला मचा दिया करो, ताकि तुम अपनी बरतरी बना सको।" (26)
अतः हम अवश्य ही विश्वास न रखनेवालों को कठोर
यातना का मजा चखाएँगे. हम इन लोगों के द्वारा किए गए बुरे से बुरे
कर्मों के हिसाब से उसका पूरा पूरा बदला उन्हें देंगे--- (27)
यही है इनाम अल्लाह के
दुश्मनों के लिए – (जहन्नम की) आग, उसी में उनके हमेशा रहने का ठिकाना होगा, यह इनाम इसलिए कि वे
हमारी आयतों को मानने से इंकार करते रहे (28)
और जिन लोगों ने इंकार किया[काफिर], वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमें उन
जिन्नों और मनुष्यों को दिखा दे, जिन्होंने हमको रास्ते से भटका दिया ताकि हम
उन्हें अपने पैरों तले ऐसा कुचल डालें कि वे सबसे नीचे वालों में जा पड़ें” . (29)
(दूसरी तरफ़) जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है", फिर उसकी तरफ़ जानेवाले सीधे रास्ते पर जमे
रहे, तो बेशक उनपर
फ़रिश्ते(यह कहते हुए) उतरेंगे कि "अब न दिल में कोई डर रखो और न किसी बात पर
दुखी हो, बल्कि उस जन्नत (के पाने)
की ख़ुशियाँ मनाओ, जिसका तुमसे वादा किया
जाता था (30)
हम इस संसार में भी और आनेवाली दुनिया
[आख़िरत] में भी तुम्हारे दोस्त व मददगार हैं, और वहाँ[जन्नत में] तुम्हारे दिल में जिस चीज़ की भी इच्छा होगी और जिस
चीज़ की भी तुम माँग करोगे, तुम्हारे लिए वह सब कुछ
(हाज़िर) होगा-- (31)
और बात-चीत में उस आदमी से अच्छा कौन हो सकता
है जो लोगों को अल्लाह की ओर बुलाए, और अच्छे कर्म करे और कहे,
"निस्संदेह मैं अल्लाह पर समर्पित लोगों [मुस्लिम] में शामिल हूँ?" (33)
अच्छाई और बुराई के काम बराबर नहीं हो सकते।
[ऐ रसूल], आप बुराई [बुरे व्यवहार]
का जवाब अच्छे से अच्छे व्यवहार से दिया करें और आप देखेंगे कि आपका दुश्मन
भी आपके पुराने और घनिष्ठ दोस्त जैसा हो गया, (34)
किन्तु केवल वही लोग उस महानता(के मुक़ाम) तक
पहुँचेंगे जो(बुराई के बावजूद) धैर्य से काम में लगे रहते हैं, और जिन पर भाग्य की बड़ी कृपा होती है (35)
और अगर शैतान (तुम्हारे ग़ुस्से को) इस तरह से उकसा दे कि तुम भड़क उठो, तो अल्लाह की शरण माँग लिया करो। निश्चय ही
वह सब कुछ सुनता और जानता है. (36)
और उसी की चंद निशानियों में से हैं-- यह रात और दिन और सूर्य और चन्द्रमा ।
तुम सूर्य या चन्द्रमा के आगे पूजा करने के लिए मत झुक जाया करो, बल्कि झुको उस अल्लाह के सामने जिसने उन्हें
पैदा किया, यदि सचमुच तुम्हें
उसी(अल्लाह) की बन्दगी करनी हो. (37)
लेकिन यदि विश्वास न रखनेवाले [काफ़िर] इतने
ही घमंडी हैं (कि मेरे सामने झुक नहीं सकते), [तो याद रखें, ऐ रसूल कि], आपके रब के पास जो लोग
(फ़रिश्ते) हैं वे तो रात-दिन बिना थके व उकताए हुए उसका गुणगान करते ही रहते हैं
(38)
और उसकी निशानियों में से यह चीज़ भी है: कि तुम देखते हो कि धरती(सूखे से)
मुरझाई पड़ी है; फिर ज्यों ही हमने उसपर
पानी बरसाया कि उसमें हलचल आ गयी और फिर फलने-फूलने लगी।हक़ीक़त यह है कि जिसने उस
(मुरझाई हुई) धरती में जान डाल दी, वही मुर्दों को भी(क़यामत में दोबारा) ज़िंदा करनेवाला है। निस्संदेह वह हर चीज़
की ताक़त रखता है. (39)
जो लोग हमारी आयतों (के मतलब) के साथ छेड़-छाड़ करते हैं, वे हमसे छिपे हुए नहीं हैं. भला बताओ कि जो व्यक्ति जहन्नम की आग में
झोंक दिया जाए, वह अच्छा है या वह, जो क़यामत के दिन बिना किसी (यातना के) डर से
निश्चिन्त होकर आएगा? तुम्हारा जो जी चाहे वह
करो, मगर तुम जो भी करते हो, यक़ीन रखो कि अल्लाह हर काम को देख रहा है. (40)
जिन लोगों ने क़ुरआन(की नसीहतों) को मानने से
इंकार किया, जब वह उनके बीच (चर्चा
में) आयी -- हालाँकि यक़ीनन वह एक बड़ी इज़्ज़तवाली(व हर तरह की त्रुटियों से दूर)
किताब है !, (41)
जिसे असत्य किसी भी तरफ़ से [न उसके आगे से और
न पीछे से] उसे छू भी नहीं सकता; यह उस [रब] की ओर से
उतारी गयी है जो बहुत ज्ञानवाला [हिकमत] व हर प्रशंसा के योग्य है-- (42)
(आप इस बात को याद रखें, ऐ रसूल! कि) आपसे जो भी
बातें कही जा रही हैं, यह सब बातें वही हैं जो
आप से पहले गुज़र चुके रसूलों से भी कही गयी थीं। निस्संदेह आपका रब क्षमा करनेवाला
है मगर(साथ में) दर्दनाक दंड देनेवाला भी है. (43)
यदि हम इस (क़ुरआन) को अरबी छोड़ कर किसी दूसरी
भाषा में लाते तो वे कहते कि "उसकी आयतें क्यों नहीं (हमारी भाषा में) खोलकर
बयान की गयीं? यह क्या! कि वाणी तो किसी
अलग भाषा में है और व्यक्ति अरबी?"
कह दें, "जो लोग ईमान रखते हैं, उन लोगों के लिए यह (क़ुरआन) तो सही रास्ता
दिखानेवाली और बीमारियों को ठीक करनेवाली है, किन्तु जो लोग(एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखते, उनके कानों में यह (बहरेपन का) बोझ है, यह (क़ुरआन) उनके लिए अन्धेरे में भटकने का
सामान है, यह ऐसा है मानो उनको
किसी बड़े दूर के स्थान से पुकारा जा रहा हो।" (44)
और हमने मूसा(अलै.) को भी किताब दी थी, पर उसमें भी झगड़े निकाले गए-- यदि पहले
ही उस (फ़ैसले के समय) पर तुम्हारे रब की ओर से फ़रमान जारी न हो गया होता तो
उनके बीच अब तक फ़ैसला हो चुका होता—और हक़ीक़त यह है कि वे अभी तक
उस (क़ुरआन) के बारे में ऐसे सन्देह में पड़े हुए हैं जो उलझन में डाल देनेवाला है.
(45)
जिस किसी ने अच्छा कर्म किया तो अपने ही फ़ायदे के लिए किया और जिस किसी ने
बुराई की, तो अपने ही (विरुद्ध)
नुक़सान के लिए की : वास्तव में तुम्हारा रब
अपने बन्दों पर कभी भी नाइंसाफ़ी नहीं करता. (46)
(क़यामत की आनेवाली) घड़ी की जानकारी केवल अल्लाह को ही है और बिना उसकी
जानकारी के न तो कोई फल अपने शगूफ़े [कोष, sheath] से निकलता है, न कोई मादा गर्भवती होती है और न ही बच्चा
जनती है। जिस दिन वह उन (काफ़िरों को) पुकारेगा, "कहाँ हैं मेरी (ख़ुदायी में) साझीदार?" वे कहेंगे, "हम तेरे सामने इस बात को
स्वीकार करते हैं कि हममें से कोई भी उन [तेरे गढे हुए साझीदारों] को देख नहीं
पाता है" : (47)
और जिन ख़ुदाओं को वे पहले पुकारा करते थे वह
सब(उन्हें छोड़कर) वहाँ से ग़ायब हो चुके होंगे; और वे समझ लेंगे कि उनके लिए अब कोई भागने की जगह नहीं है. (48)
आदमी का हाल यह है कि वह भलाई माँगने से नहीं थकता, किन्तु अगर उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है तो वह
निराश होकर आस छोड़ बैठता है (49)
और जो तकलीफ़ उसे पहुँची थी,उसके बाद अगर हम उसे अपनी थोड़ी सी दयालुता का
मज़ा दे दें, तो वह अवश्य ही कहेगा, "यह सब तो मेरी कोशिशों का
नतीजा है: और मैं नहीं समझता कि क़यामत की घड़ी कभी आने वाली है, और अगर मुझे अपने रब की ओर वापस भेजा भी गया
तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए सबसे अच्छा इनाम होगा।" मगर हम उन
काफ़िरों को ज़रूर बताएंगे जो कुछ कर्म उन्होंने किए होंगे, और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा
चखाएँगे. (50)
जब कभी हम आदमी पर अपनी ख़ास कृपा करते हैं तो
वह मुँह मोड़ लेता है और अकड़ कर हम से दूर चला जाता है, लेकिन जैसे ही उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है. (51)
[ऐ रसूल] कह दें, "क्या तुमने कभी विचार
किया, कि अगर यह उतारी हुई
आयतें [क़ुरआन] सचमुच अल्लाह की ओर से ही हुईं और फिर भी तुमने उसको
मानने से इंकार किया? तो
उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन होगा जो इसके विरोध में बहुत दूर जा पड़ा हो?" (52)
हम
उन्हें पृथ्वी के हर एक क्षेत्र में अपनी निशानियाँ दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने
भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर यह बात खुल
कर सामने आ जायेगी कि यही (क़ुरआन) सत्य है। क्या यह बात काफ़ी नहीं कि
तुम्हारा रब सारी चीज़ों का साक्षी है? (53)
तब
भी उन्हें इस बात पर संदेह है कि सचमुच उन्हें अपने रब से मिलना होगा; हालाँकि सचमुच, अल्लाह
(की जानकारी और ताक़त) हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है. (54)
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