Chronological Quran : 12th Year of Revelation
[Aug 06, 620 AD --- July 26, 621 AD]
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : बारहवें वर्ष में उतरी आयतें
[1 मुहर्रम/ 2 हिजरी पूर्व----- 30 ज़ुल हिज्जा/ 2 हिजरी पूर्व]
सूरह 52 : अत-तूर [Mountain Tur/ Sinai]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
तूर पर्वत की क़सम, (1)
और उस लिखी हुई किताब की क़सम; (2)
(जो) खुले हुए झिल्ली के पन्नों [Unrolled parchment] में (लिखी हुई है) (3)
और उस घर [काबा] की क़सम जहाँ बार बार हाज़िर होते है ; (4)
और ऊँची की हुई छत [आसमान] की; (5)
और भरे हुए समुद्र की क़सम (6)
कि (ऐ रसूल !) आपके रब की यातना अवश्य आ कर रहेगी__ (7)
कोई नहीं है जो इसे टाल सके__ (8)
जिस दिन आकाश थरथराहट के साथ बुरी तरह डगमगा उठेगा; (9)
और पहाड़ (अपनी जगह छोड़ कर बिखरने लगेंगे और बादलों की तरह) उड़्ते-फिरेंगे; (10)
तो उस दिन तबाही होगी उनकी जो (अल्लाह के संदेश को) झुठलाते हैं; (11)
जो बेकार की बातों में डूबे हुए खेल तमाशे में लगे हुए है (12)
जिस दिन वे धक्के दे-देकर जहन्नम की आग की ओर ढकेले जाएँगे (13)
(कहा जाएगा), "यही है वह आग जिसे तुम झुठलाया करते थे , (14)
"अब भला (बताओ) यह कोई जादू है या तुम्हें (अब भी) दिखायी नहीं देता? (15)
"जाओ, आग के अंदर (झुलसो इसमें)___फिर तुम इसे सहन करने में धैर्य से काम लो या न लो; सब बराबर है___ तुम्हें उन्हीं कामों का बदला दिया जायेगा, जो तुम करते रहे थे।" (16)
अल्लाह का डर रखनेवाले निश्चय ही बाग़ों में और परम आनंद [Bliss] में होंगे (17)
जो कुछ उनके रब ने उन्हें (तोहफ़ा) दिया होगा, उसका मज़ा ले रहे होंगे: कि उनके रब ने उन्हें भड़कती हुई आग से बचा लिया - (18)
(उनसे कहा जाएगा) "ख़ूब मज़े से खाओ-पियो और मौज करो, ये इनाम है उन अच्छे कर्मों का जो तुम करते रहे थे।" (19)
– वे एक क़तार में लगे हुए तख़्तो पर तकिया लगाए हुए (बैठे) होंगे और हम बड़ी बड़ी आँखोंवाली हूरों [परम रूपवती स्त्रियों] से उनका विवाह कर देंगे (20)
और ईमानवाले लोगों के साथ हम उनकी सन्तान को भी (जन्नत के दर्जों[Grade] में) वहाँ साथ मिला देंगे अगर संतान ने भी ईमान में अपने माँ-बाप का अनुसरण किया होगा, (चाहे उनकी संतान के कर्म अपने माँ-बाप के कर्मों के स्तर के न भी हों) और उन (नेक माँ-बाप) के कर्मों के इनाम में से कुछ भी कमी नहीं करेंगे : (इसके अलावा) हर व्यक्ति की जान अपने (अच्छे/ बुरे) कर्मों के बदले में गिरवी रखी हुई है (21)
और हम उन्हें कोई भी फल (मेवे) और मांस, जिसकी वे इच्छा करेंगे, देते रहेंगे (22)
वे वहाँ आपस में (शराब ए तहूर के) प्याले हाथोंहाथ ले रहे होंगे, जिसमें न कोई बेहूदगी होगी और न गुनाह पर उभारनेवाली कोई बात, (23)
और उनकी सेवा में आसपास ऐसे नौजवान घूमते फिरेंगे जो देखने में ऐसी मोतियों की तरह होंगे जिन्हें छुपा कर रखा गया हो, (24)
वे एक दूसरे से मिलकर हाल पूछेंगे, (25)
कहेंगे, "जब हम पहले अपने घरवालों (दुनिया) में थे तो (अल्लाह की यातना से) डरे डरे रहते थे, ---(26)
अन्ततः अल्लाह ने हम पर बड़ा एहसान किया और हमें (जहन्नम की) झुलसा देनेवाली हवा की यातना से बचा लिया -- (27)
इससे पहले भी हम उससे दुआएं माँगते रहते थे । निश्चय ही वह एहसान करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (28)
अतः (ऐ रसूल) आप (लोगों को) नसीहत देते रहें. अपने रब के फ़ज़ल[Grace] से (ऐ रसूल) न आप काहिन [ ढोंगी भविष्यवक्ता, Oracle] हैं और न दीवाने (29)
क्या वे लोग ऐसा कहते है, " यह साहब तो कवि हैं जिनकी (मौत के) लिए हम काल-चक्र की प्रतीक्षा कर रहे है?" (30)
कह दें, "कर लो प्रतीक्षा! मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।" (31)
क्या उनकी बुद्धियाँ यही कुछ करने को कहती हैं, या वे हैं ही बाग़ी लोग? (32)
हाँ क्या वे यह कहते है, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को स्वयं ही गढ लिया है? " नहीं, बल्कि वे (ज़िद के कारण) ईमान नहीं लाते (33)
अच्छा यदि वे अपने दावे में सच्चे है तो क़ुरआन जैसी वाणी(गढ कर) ले आएँ (34)
क्या ये लोग बिना किसी चीज़ के अपने आप पैदा हो गए? या उन्होंने स्वयं ही अपनी सृष्टि की है? (35)
या क्या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? नहीं, असल बात यह है कि ये (सच्चाई पर) विश्वास नहीं रखते. (36)
क्या उनके पास तुम्हारे रब के खज़ाने है? या वही उनके दारोग़ा बने हुए हैं? (37)
या उनके पास कोई सीढ़ी है जिसपर चढ़कर वे (ऊपर की दुनिया की गुप्त बातें) सुन लेते है? फिर उनमें से जिसने सुन लिया हो तो वह ले आए स्पष्ट प्रमाण (38)
क्या उस (अल्लाह) के हिस्से में तो बेटियाँ हैं और तुम्हारे अपने लिए बेटे? (39)
या आप [रसूल] उनसे कोई मज़दूरी माँगते हैं कि वे क़र्ज़ के बोझ से दबे जा रहे है? (40)
या उनके पास अनदेखी चीज़ों की जानकारी है, जिसे ये लिख लेते हों? (41)
या वे कोई चाल चलना चाहते हैं? तो जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया वही उस चाल की लपेट में आनेवाले हैं (42)
क्या अल्लाह के अतिरिक्त उनका कोई और ख़ुदा [प्रभु] है? वे जिसे भी अल्लाह के बराबरी का ठहराते हैं, अल्लाह ऐसी तमाम चीज़ों से कहीं अधिक ऊँचा व महान है (43)
यदि वे आकाश का कोई टुकड़ा भी अपने ऊपर गिरता हुआ देखलें तो कहेंगे, "यह तो बस परत दर परत (गहरे) बादल हैं!" (44)
अतः (ऐ रसूल) आप उन्हें (उनके हाल पर) छोड़ दें, यहाँ तक कि वे अपने उस दिन का सामना करें जिस दिन उनके होश जाते रहेंगे; (45)
जिस दिन उनकी चाल उनके कुछ भी काम न आएगी और न उन्हें कोई सहायता ही मिलेगी; (46)
और निश्चय ही जो लोग ज़ुल्म कर रहे हैं, उन (बदमाशों) के लिए एक और यातना इंतेज़ार कर रही है, परन्तु उनमें से अधिकतर लोग इसे जानते नहीं (47)
अपने रब का फ़ैसला आने तक [ऐ रसूल] धैर्य से अपने काम पर जमे रहें, आप तो हमारी निगाहों में हैं, और जब उठें तो अपने रब का गुणगान करें; (48)
रात की कुछ घड़ियों में भी उसकी तसबीह [गुणगान] करें, और सितारों के डूबने के समय (प्रातःकाल) भी (49)
सूरह 67. अल- मुल्क [The Sovereignty]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है और बहुत दयावान
है.
1. बड़ी ऊँची शान वाला (व बरकत वाला) है वह जिसके हाथ में
(दुनिया की) बादशाही है, और वह हर चीज़ पर पूरी तरह सामर्थ्य रखता है o
2. जिसने मौत और ज़िंदगी को (इसलिए) पैदा किया ताकि वह
तुम्हारी (लोगों की) परीक्षा ले सके कि
तुम में से कौन कर्म की दृष्टि से ज़्यादा बेहतर है, और वही
प्रभुत्वशाली भी है, और बड़ा माफ करने वाला भी है o
3. जिसने सात (या कई) आकाशीय पिंड [heavenly spheres] ( आपसी तालमेल के
साथ) तल्ले ऊपर पैदा किये, तुम (ख़ुदा) रहमान की रचना में कोई असंगति और
विषमता नहीं देखोगे, सो तुम फिर नज़र फेरकर देखो, क्या तुम्हें इस
(निर्माण) में कोई कमी या बिगाड़ दिखायी देता है ?o
4. तुम फिर बार बार नज़र को (विभिन्न दृष्टिकोणों और
वैज्ञानिक तरीकों से) दौड़ाओ, (हर बार) नतीजा यही होगा कि निगाह थक-हार कर
तुम्हारी ओर लौट आएगी और वह (कोई कमी खोजने में) विफल होगी o
5. और हमने सबसे निकट वाले (निचले) आकाश को (ग्रहों, तारों और अन्य अंतरिक्ष के खगोलीय पिंडों के रूप में) रौशन
दीपों से सजा रखा है, और हमने उन्ही (में से कुछ) को शैतानों(यानी
बाग़ी शक्तियों) को मार भगाने (यानी उनके नकारात्मक प्रभाव खत्म करने) का साधन (भी)
बनाया है, और हमने इन(शैतानों) के लिए (जहन्नम में) दहकती आग की यातना तैयार कर रखी है o
6. और जिन लोगों ने अपने रब को मानने से इनकार किया, उनके लिए जहन्नम की यातना है, और वह (जहन्नम)
क्या ही बुरा ठिकाना है o
7. जब वे इसमें (जहन्नम में) डाले जाएंगे तो उसकी भयानक आवाज़
सुनेंगे और वह (आग ग़ुस्से से) खौल रही होगी o
8. ऐसा लगेगा जैसे वह बेहद गुस्से से फट पड़ेगी, जब भी (काफिरों
क) कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके दारोगे उनसे पूछेंगे: “ क्या तुम्हारे पास
कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया था? “o
9. वे कहेंगे: हाँ! बेशक हमारे पास अल्लाह का डर सुनाने
वाला आया था, मगर
हमने (उसे) झुठला दिया, और कहा कि “
अल्लाह ने कुछ भी ऊपर से नहीं उतारा (नाज़िल किया), तुम तो बस एक
बड़ी भारी गुमराही में (पड़े हुए) हो” o
10. और वे कहेंगे: “ काश हम (सच्चाई को) सुन लिया करते और
समझ से काम लेते तो हम (आज) जहन्नम वालों में (शामिल) न होते” o
11. इस तरह वे अपने पापों को ख़ुद स्वीकार कर लेंगे, सो धिक्कार है जहन्नम वालों पर! (कि अल्लाह के
रहम से दूर रहना उनकी क़िसमत बन गयी) o
12. (और दूसरी तरफ) जो लोग बिना देखे अपने रब से डरते हैं,
निश्चय ही उनके लिए माफी और बड़ा इनाम है o
13. और तुम लोग अपनी बात छिपाकर करो या ऊँची आवाज़ में करो, (सब अल्लाह की जानकारी में
है, क्योंकि) निश्चित रूप से
वह दिलों के अंदर की (छुपी) बातों की (भी) पूरी जानकारी रखता है o
14. भला वही न जाने जिसने पैदा किया है! हालांकि वह बड़ा
सूक्ष्मदर्शी है और (हर चीज़ की) ख़बर रखने
वाला है o
15. वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती को रहने लायक़ बना
दिया, सो तुम उसके रास्तों में चलो फिरो,और उसकी(दी गयी) रोज़ी में
से खाओ, और उसी के पास (मरने के बाद) दोबारा ज़िंदा हो कर
जाना है o
16. क्या तुम आसमान वाले (रब) से डर नहीं रखते कि कहीं
तुम्हें भूमि में धँसा दे (इस तरह) कि अचानक ज़बरदस्त भूकंप आ जाए ! o
17. क्या तुम आसमान वाले (रब) से डर नहीं रखते कि वह कहीं तुम
पर पत्थर बरसाने वाली हवा भेज दे ! फिर तुम्हें पता चलेगा कि मेरा डराना कैसा होता
है o
18. और इन लोगों से पहले भी जो लोग थे, उनलोगों ने (भी पैग़म्बरों को) झुठलाया था , सो (देख लो कि)
मेरा इनकार कैसा (दर्दनाक साबित) हुआ o
19. क्या उन्होंने पक्षियों को अपने ऊपर पर फैलाए हुए और (कभी)
पर समेटे हुए नहीं देखा? उन्हें (हवा में गिरने से) कोई नहीं रोक सकता
सिवाय रहमान के (बनाए कानून के), बेशक वह हर चीज़ की खूब देखभाल करने वाला है o
20. भला कोई ऐसा है जो तुम्हारी सेना बनकर (ख़ुदा) रहमान के
मुक़ाबले में तुम्हारी मदद करे? काफ़िर (सच्चाई से इंकार करने वाले) लोग निरे
धोखे में पड़े हुए हैं o
21. भला कोई है जो तुम्हें रोज़ी दे सके अगर (अल्लाह तुम पर)
अपनी रोज़ी बंद कर दे ? इसके बावजूद वे लोग सरकशी और (सच्चाई से) घृणा
पर मजबूती से अड़े हुए हैं o
22. भला वह व्यक्ति जो मुंह के बल औंधे चल रहा हो वह अधिक
सही मार्ग पर है या वह व्यक्ति जो सीधे खड़ा होकर सीधी राह पर चल रहा हो ? O
23. आप कह दीजिए: “ वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें पैदा
किया और तुम्हें सुनने और देखने की ताक़तें दें और सोचने समझने वाले दिल बनाए, (मगर) तुमलोग बहुत ही
कम शुक्र अदा करते हो”o
24. कह दीजिए: “ वही(अल्लाह) है जिसने तुम्हें जमीन में फैला
दिया और तुम्हें(क़यामत के दिन) उसी के पास जमा कर के ले जाया जाएगा” o
25. और ये लोग कहते हैं: “ कि अगर तुम सच्चे हो तो बताओ कि
यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा? “ o
26. कहदीजिए कि “ इसके (समय का) सहीज्ञान तो अल्लाह ही के
पास है, और मैंतो बस साफ साफ तरीक़े से चेतावनी देने वाला हूँ” (अगर क़यामत का समय बता
दिया जाए तो डर खत्म हो जाएगा) o
27. फिर जब वे(क़यामत की यातना) को करीब आता देख लेंगे तो
काफिरों के चेहरे बिगड़ कर काले पड़ जाएंगे, और (उनसे) कहा जाएगा: “
यही वह (वादा) है जिसके (जल्द घटित किए जाने की) तुम माँग किया करते थे o
29. कह दीजिए: “ वही (ख़ुदा) रहमान है जिस पर हम ईमान लाए हैं और उसी पर हमने भरोसा किया है, इसलिए तुम निकट भविष्य में जान लोगे कि कौन है जो खुली गुमराही में है”o
30. कह दीजिए : “ अगर (किसी दिन) तुम्हारे (कुँओं का) पानी ज़मीन में बहुत नीचे को उतर जाए (यानी सूख जाए) तो कौन है जो तुम्हें (ज़मीन पर) बहता हुआ पानी ला दे” 0
69. अल-हाक़्क़ा [the sure reality/ the inevitable hour]
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. वह घटना जो (घटित) हो कर रहेगीo
2.
क्या है वह घटना जो (नि:संदेह) हो कर रहेगी?o
3.
और आपको क्या पता कि वह घटना क्या है जो बेशक घटित हो कर रहेगी o
4.
समूद और आद के क़ौम के लोगों ने उसी झिंझोड़ देने वाली घटना (क़यामत) को झुठलाया था o
5.
नतीजा यह हुआ कि समूद की क़ौम के लोग तो (एक कड़कदार चिंघाड़ वाली आवाज़ की) आफत से
मार डाले गए (जिससे उनके कलेजे फट गये थे) o
6.
और रहे आद की क़ौम के लोग! तो (वे भी) ऐसी तेज और बेक़ाबू आंधी से मार दिए गए (जो बहुत
सर्द और बहुत गरजदार थी)o
7.
अल्लाह ने उस (आंधी) को उन पर लगातार सात रातें और आठ दिन तक थोपे रखा, सो तम (अगर वहाँ होते तो) उन लोगों को
(उस अवधि) में (इस तरह) मरे पड़े देखते जैसे वे खजूर के गिरे हुए पेड़ों की खोखली जड़ें होंo
8.
सो क्या तम इनमें से किसी को बाकी बचा हुआ देखते हो ?o
9.
और फ़िरऔन ने और उसके के पहले लोगों ने और (लूत अलै0 की क़ौम की) उल्टी हुई बस्तियों
(के निवासियों) ने भी ऐसे ही जुर्म किये थे o
10.
कि उन्होंने (भी) अपने रब के रसूल का कहना नहीं माना, सो अल्लाह ने उन्हें बहुत सख्त
गिरफ़्त में पकड़ लिया o
11.
बेशक जब (नूह अलै. के तूफान का) पानी हद पार कर गया तो हमने तुम्हें एक तैरती हुई
नाव में सवार कर लिया o
12.
ताकि हम (इस घटना) को तुम्हारे लिए (याद रखनेवाली) नसीहत बना दें और याद रखने वाले
कान उसे (सुन कर) याद रखें o
13.
फिर जब सूर [नरसिंघे,trumpet] में एक ही बार फूंक मार दी जायेगीo
14.
और पृथ्वी और पहाड़ (अपनी जगहों से) उठा लिए जाएंगे, फिर वे एक ही बार टकरा कर चूर चूर कर दिए जाएंगे o
15.
सो उस वक़्त वह अवश्य घटने वाली घटना (क़यामत) घटित हो जायेगी o
16.
और (सब) आसमानी पिंड फट जाएंगे और उस दिन ब्रह्मांड का आपसी बंधन (जो एक प्रणाली
में मज़बूती से बंधा रहता हैं) ढीला व कमज़ोर पड़ जायेगा (और तब ब्रहमांड आधुनिक
विज्ञान के अनुसार एक काले छेद यानी black hole में शामिल होकर नष्ट
हो जायेगा)o
17.
और फरिश्ते उसके किनारों पर खड़े होंगे और आपके रब के सिंहासन को उस दिन उनके ऊपर
आठ (फरिश्ते या फरिश्तों का वर्ग या कोई नियम जिनपर सिंहासन टिका होगा) उठाए हुए
होंगे o
18.
उस दिन तुम (हिसाब देने के लिए अल्लाह के सामने) पेश किए जाओगे, इस तरह
कि तुम्हारी कोई
गुप्त बात छुपी नहीं रहेगी o
19.
फिर जिस किसी को उसके कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ
में दिया जाएगा तो वह (खुशीसे) कहेगा: “ लोगो आओ मेरे
कर्मों का हिसाब पढ़ लो” o
20.
मैं तो पहले से यक़ीन रखता था कि मुझे अपने हिसाब का सामना करना होगा” o
21.
सो वह सुखी व मनपसंद ज़िंदगी गुज़ारेगाo
22
उस ऊँची जन्नत में o
23.
जिसके फलों के गुच्छे (पेड़ों पर लदे होने के कारण) झुके हुए होंगे o
24.
(उनसे कहा जाएगा) : खूब मज़े से खाओ और पियो उन (अच्छे कर्मों) के बदले जो तुमने गुज़रे
हुए (जीवन) दिनों में किये थे o
25.
रहा वह व्यक्ति जिसके कर्मों का हिसाब उसके बाएं हाथ
में दिया जाएगा तो वह कहेगा: “ हाय काश! मुझे मेरे कर्मों का हिसाब दिया ही न जाता o
26.
और मुझे ख़बर भी न होती कि मेरा हिसाब क्या है! o
27.
हाय काश! कि मेरी मौत पर ही मेरा काम तमाम हो चुका होता o
28.
(आज) मेरी धन दौलत मेरे कोई काम न आ सकी o
29.
मुझसे मेरी शक्ति और सत्ता(भी) चली गयी” o
30.
(आदेश होगा :) “ पकड़ो उसे और उसके गले में तौक़ पहना दो o
31.
फिर उसे जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में झोंक दो o
32.
फिर उसे ऐसी ज़ंजीर में जकड़ दो जिसकी लंबाई सत्तर हाथ हो o
33.
बेशक यह बड़ी महिमा वाले अल्लाह पर ईमान नहीं रखता था o
34.
और न ग़रीब मोहताज को खाना खिलाने पर उभारता था o
35.
सो आज के दिन यहँ उसका न कोई दोस्त व मददगार है o
36.
और न पीप के सिवा (उसके लिए) कोई खाना हैo
37.
जिसे गुनाहगारों के सिवा कोई नहीं खाएगा o
38.
सो मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की जो तुम देखते हो o
39.
और इन चीजों की(भी) जिन्हें तुम नहीं देखते o
40.
बेशक यह (कुरआन) एक बहुत इज़्ज़तवाले व महान रसूल (स.) की (अल्लाह द्वारा उतारी गयी)
वाणी हैo
41.
और यह किसी कवि की वाणी नहीं (कि साहित्यिक कौशल से स्वयं लिखी गयी हो), (मगर) तुम बहुत ही कम विश्वास रखते हो o
42.
और न (यह) किसी भविष्यवक्ता का वचन है (कि तकनीकी अनुमानों से तैयार किया गया हो), (मगर) तुम बहुत ही कम नसीहत लेते हो o
43.
(यह) वाणी सारी दुनिया के रब की तरफ से उतारी जा रही है o
44.
और अगर (मान लो कि) यह पैग़म्बर हम पर कोई
(एक) बात भी झूठी गढ कर कह देते o
45.
तो निश्चित रूप से हम उनका दाहिना हाथ पकड़ लेते o
46.
फिर हम ज़रूर उनकी मुख्य रग [life
artery ]
काट देते o
47.
फिर तुम में से कोई न होता जो उनके बचाव के लिये आड़े आ सकता o
48.
सो यक़ीन जानो यह (कुरआन) अल्लाह का डर रखने वालों के लिए नसीहत है o
49.
और निश्चित रूप से हम जानते हैं कि तुम में से कुछ लोग (इस खुली सच्चाई को) झुठलाने
वाले भी हैं o
50.
और वाकई यह (क़ुरआन) ऐसे काफिरों के लिए पछतावे (का कारण) है o
51.
और बेशक यही वह बात है जो सरासर हक़ीक़त है o
52. सो(ए रसूल!) आप महानता वाले रब के नाम का गुणगान करते रहें o
सूरह 70 : अल- मआरिज [The Ways of Ascent]
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1.
एक माँगने वाले ने (मज़ाक़ उड़ाते हुए) ऐसा अज़ाब मांगा है जो काफिरों पर आने वाला है o
2.
कोई नहीं है जो इसे टाल सके o
3.
(वह अज़ाब) अल्लाह की तरफ से आयेगा जो चढने वाले तमाम आसमानी रास्तों का मालिक है o
4. (जिससे हो कर) फरिश्ते और रूह
[जिबरील] उस (अल्लाह के अर्श) की तरफ एक दिन में चढकर जाते हैं जिस दिन की लम्बाई (इस दुनिया के हिसाब
से) पचास हजार साल की है o
5.
तो(ए रसूल!) आप (काफिरों की बातों पर बिना दुखी व परेशान हुए) धैर्य से काम लें o
6.
बेशक वे लोग (तो) उस (क़यामत के दिन) को दूर समझ रहे हैं o
7.
और हम उसे निकट ही देख रहे हैं o
8.
(वह अज़ाब उस दिन आयेगा) जिस दिन आसमान पिघले हुए ताम्बे/ पीतल (या तेल की
तलछट) की तरह हो जाएगा o
9.
और पहाड़ (धुनी हुई) रंगीन ऊन की तरह हो जाएंगे o
10.
कोई जिगरी दोस्त किसी दोस्त को पूछेगा भी नहीं o
11.
(हालांकि) वह (एक दूसरे को) दिखा भी दिये जायेंगे, अपराधी यह इच्छा करेगा कि काश! उस दिन की यातना (से रिहाई) के बदले में
अपने बेटे दे दे o
12.
और अपनी पत्नी और अपने भाई (दे डाले) o
13.
और अपना (पूरा) ख़ानदान (भी दे दे) जो उसे शरण देता था o
14.
और जितने लोग भी जमीन में रहते हैं , इन सबको (बदले में दे कर) अपने आपको (अल्लाह के अज़ाब से) बचा ले o
15.
(लेकिन) ऐसा कभी न होगा, बेशक वह (जहन्नम) तो एक भड़कती हुई आग
है o
16.
सिर और बदन के सभी अंगों की खाल उतार देने वाली है o
17.
वह हर उस आदमी को बुला रही है जिसने (सच्चाई से) पीठ फेरी और मुँह मोड़ा होगा o
18.
और (जिसने) धन दौलत इकट्ठा की फिर उसे सैंत सैंत कर रखा [लोगों को बाँटा नहीं]o
19.
बेशक इंसान बड़ा अधीर और लालची पैदा हुआ है o
20.
जब उसे कोई मुसीबत (या वित्तीय हानि) पहुंचती है तो बहुत घबरा जाता है o
21.
और जब उसके पास भलाई (या वित्तीय ख़ुशहाली) आती है तो कंजूसी करने लगता है
22.
मगर नमाज़ अदा करने वाले (लोगों की बात अलग है) o
23.
जो अपनी नमाज़ की हमेशा पाबंदी करते हैं o
24.
और (त्याग करने वाले) लोग जिनके धन दौलत में (ज़रूरतमंदों के लिये) एक ख़ास हिस्सा
निर्धारित है o
25.
मांगने वाले और न मांगने वाले ज़रूरत मंदों का o
26.
और जो (बदले के दिन) को सत्य मानते हैं o
27.
और जो अपने रब की यातना से डरे सहमे रहते हैं o
28.
बेशक उनके रब का अज़ाब ऐसी चीज़ नहीं जिससे बेफिक्री बरती जाए o
29.
और जो लोग (बीवियों व दासियों के अलावा दूसरों से) अपने गुप्त अंगों [private parts] की रक्षा करते हैं o
30.
अपनी पत्नियों या अपने अधिकार में आयी हुई दासियों [लौंडियों] को छोड़कर,क्योंकि इस (तरह के रिशतों) में उन
लोगों पर कोई दोष नहीं है o
31.
सो जिस किसी ने इसके अतिरिक्त कुछ और चाहा [यानी किसी और से शारीरिक संबंध रखे] तो
ऐसे ही लोग हद से गुजरने वाले हैं o
32.
और जो अपने पास रखी गयी अमानतों (की हिफाज़त) और (किये गये) वादों को निभाते हैं o
33.
और जो अपनी गवाहियों (को ठीक ठीक देते हैं और उन) पर कायम रहते हैं o
34.
और जो लोग अपनी नमाज़ों की हिफाज़त [यानी सही तरीक़े से पढा ] करते हैं o
35.
यही लोग हैं जो जन्नतों में इज़्ज़त और सम्मान के साथ रहेंगे o
36.
तो (ऐ रसूल) इन काफिरों को क्या हो गया है कि (आप को क़ुरान पढते देख) आपकी ओर चढे चले
आ रहे हैं o
37.
दाएँ से (भी) और बाईं ओर से (भी) टोलियाँ बना बना कर (वे जन्नत में जाने के बारे
में रसूल का मज़ाक़ उड़ाते और कहते कि आपसे पहले हमलोग जन्नत में जायेंगे) o
38.
क्या उनमें से हर व्यक्ति यह लालसा रखता है कि वह (बिना ईमान और अच्छे कर्म किये)
नेमतों वाली जन्नत में प्रवेश पा जाएगा? O
39.
कभी नहीं, बेशक हमने उन्हें उस चीज़ से पैदा किया
है जिसे वह (ख़ुद भी) जानते हैं o
40.
सो मैं क़सम खाता हूँ पूरब और पश्चिम के सभी स्थानों के रब की (कि जहाँ से सितारे
निकलते और डूबते हैं) कि बेशक हम पूरा सामर्थ्य रखते हैं o
41.
इस बात पर कि उन लोगों की जगह उनसे बेहतर लोग ले आएं और कोई हमें हरा नहीं सकता o
42.
सो आप उन्हें छोड़ दीजिए कि वे बेकार की बातों और खेल तमाशे में पड़े रहें, यहाँ तक कि उस दिन से जा मिलें जिसका
उनसे वादा किया जा रहा है o
43.
जिस दिन वह कब्रों से जल्दी जल्दी इस तरह निकलेंगे जैसे वे किसी नियत स्थान की ओर
दौड़े जा रहे होंo
44.
(उनका) हाल यह होगा कि उनकी आँखें (शर्म और डर से) झुकी होंगी, ज़िल्लत उनपर छायी होगी, यही वह दिन होगा जिसका उनसे वादा किया
जाता हैo
सूरह 78 : अन नबा [The Announcement]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. यह (काफिर) लोग आपस
में किस (चीज़) के बारे में सवाल करते हैं ? o
2. (क्या) उस महान खबर के बारे में (पूछताछ कर रहे हैं) o
3. जिसके बारे में वे मतभेद रखते हैं o
4. हरगिज़ (वह खबर इनकार के योग्य) नहीं! वे जल्द ही (इस तथ्य को) जान जाएंगे o
5. (हम) फिर (कहते हैं मतभेद और इनकार) कभी (सही) नहीं! वह जल्द ही जान जाएंगे o
6. क्या हमने धरती को फर्श (यानि रहने सहने और जीवनयापन करने की जगह) नहीं बनाया ?o
7. और (क्या) पहाड़ों को (इसमें) उभार कर खड़ा (नहीं) क्या ? o
8. और (विचार करो) हमने तुम्हें (नस्ल को बढाने के लिए) जोड़ा जोड़ा पैदा किया (है) o
9. और हमने तुम्हारी नींद को (शारीरिक थकान से) आराम (के लिये) बनाया (है) o
10. और हमने रात को (उसके अंधेरे के कारण) पर्दा डाले हुई बनाया (है) o
11. और हमने दिन को रोज़ी रोटी कमाने का (समय) बनाया (है) o
12. और (अब अंतरिक्ष जगत में भी विचार करो) हमने तुम्हारे ऊपर सात मजबूत (आसमान) बनाए o
13. और हमने (सूरज को) रौशनी और ताप का (ज़बरदस्त) स्रोत बनाया o
14. और हमने भरे बादलों से मूसलाधार पानी बरसाया o
15. ताकि हम इस (बारिश) के द्वारा (धरती से) अनाज और वनस्पति उगाएँ o
16. और घने घने उद्यान (उगाएँ) o
17. (हमारी प्रकृति की इन निशानियों को देखकर जान लो कि) बेशक फैसले का दिन (क़यामत भी) एक तय किया हुआ समय है o
18. जिस दिन सूर (नरसिंघा) फूँका जाएगा तो तुम गिरोह के गिरोह (अल्लाह के सामने) चले आओगे o
19. और आसमान (की पर्तें) फाड़ दी जाएंगी तो (फटने के कारण जैसे) उसके दरवाजे ही दरवाज़े बन जाएंगे o
20. और पहाड़ (धुआँ बनाकर वातावरण में) उड़ा दिए जाएंगे तो वे मिरीचिका (की तरह नज़र का धोखा मात्र होकर खत्म) हो जाएंगे o
21. बेशक जहन्नम एक घात स्थल (है जो बुरे लोगों की ताक में) है o
22. (वह) सरकशों (यानि सच्ची बातों को न मानने वालों) का ठिकाना है o
23. (जहाँ) वे बिना किसी समय सीमा के असीमित अवधि तक उसी में पड़े रहेंगे o
24. न वे इसमें (किसी तरह की) ठंढक का मज़ा चखेंगे और न किसी पीने की चीज का o
25. सिवाय खौलते हुए पानी और (जहन्नमियों के घावों से) बहती हुई पीप के o
26. (यही उनकी सरकशी के) अनुकूल बदला है o
27. इसलिए कि वे (फैसले के दिन होने वाले) हिसाब किताब का बिल्कुल भय नहीं रखते थे o
28. और हमारी आयतों को बढ चढ कर झुठलाया करते थे o
29. और हमने हर (छोटी बड़ी) चीज़ को लिखकर सुरक्षित कर रखा है o
30. (ए इनकार करने वालो!) “ अब तुम (अपने किए का) मजा चखो (तुम दुनिया में कुफ़्र व सरकशी में बढ़ते गए) अब हम तुम पर यातनाओं को ही बढ़ाते जाएंगे” o
31. बेशक अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए बड़ी कामयाबी है o
32. (उनके लिए) ढेर सारे बाग़ और अंगूर (होंगे) o
33. और कमसिन जवान, बराबर उम्र के साथी (companions) (होंगे) o
34. और (तहूर के) छलकते हुए जाम (होंगे) o
35. वहाँ यह (लोग) न तो कोई बेहूदा (व्यर्थ) बात सुनेंगे और न (एक दूसरे को) झुठलाना (होगा) o
36. वह आपके रब की तरफ से इनाम है जो (कर्मों के अनुरूप) उपयुक्त तोहफा होगा o
37. (वह) आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ इन दोनों के बीच में है (सब) का पालनहार है, बड़ी ही रहमत वाला है (लेकिन क़यामत के दिन उसके रोब व जलाल का हाल यह होगा कि) किसी को (भी) इससे बात करने की मजाल न होगी o
38. जिस दिन जिबराईल (रूहुल अमीन) और (सभी) फरिशते पंक्ति जोड़कर खड़े होंगे, कोई बोलने के लिये मुँह न खोल सकेगा, सिवाय उस आदमी के जिसे ख़ुदा रहमान ने सिफारिश करने की अनुमति दे रखी हो और उसने (जीवन में इस्लाम की शिक्षा के अनुसार) बात भी सही कही हो o
39. वह (फैसले का) दिन तो पूरी तरह सच्चाई का दिन है, सो जो व्यक्ति चाहे अपने रब के पास (रहमत और निकटता का) ठिकाना बना ले o
40. निश्चय ही हमने तुम्हें निकट भविष्य में आने वाले प्रकोप से डरा दिया है, उस दिन हर आदमी उन (कर्मों) को जो उसने आगे भेजे हैं अपनी आँखों से देख लेगा और (प्रत्येक) काफ़िर कहेगा ऐ काश! मैं मिट्टी होता (और यातनाओं से बच जाता) o
सूरह 79 : अन नाज़ियात [Those Who
Fly Out]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1.
इन
(फरिश्तों) की क़सम जो (काफिरों की आत्मा को उनके शरीर से) अत्यंत सख्ती से खींच
लाते हैं. o
2.
फिर उन (फरिशतों)
की क़सम जो (मोमिनों की आत्मा की) गाँठ बहुत
नर्मी से खोल देते हैं.
3.
और उन
(फरिशतों) की क़सम जो (ज़मीन और आसमान के
बीच) तेजी से तैरते हुए जाते हैं.
4.
फिर उन (फरिशतों)
की क़सम जो (आदेश को पूरा करने के लिए) लपककर (दूसरों से) आगे बढ़ जाते हैं.
5.
फिर उन (फरिशतों) की क़सम जो विभिन्न मामलों को पूरा
करने के उपाय करते हैं (जैसा कि उन्हें आदेश होता है)
6.
(जब उन्हें ब्रह्मांड की पूरी व्यवस्था
को तहस नहस कर देने का आदेश होगा तब नरसिंघे में पहली फूँक मारी जाएगी) उस दिन
(ब्रह्मांड की) हर चीज़ बुरी तरह से हिला डुला दी जायेगी o
7.
उसके बाद
(जब दूसरी बार नरसिंघे में फूँक मारी जाएगी) तो फिर से एक और भूकंप आएगा o
8.
उस दिन
(लोगों) के दिल डर और घबराहट से धड़क रहे होंगे o
9.
उनकी
आँखें (मारे डर के) झुकी होंगी o
10.
(काफिर लोग) कहते हैं: “ क्या हम
(ज़िंदगी की) पुरानी हालत में फिर से लौटाये जाएंगे ?” o
11.
“ क्या जब
हम (खोखली) व गली हुई हड्डियाँ हो जाएंगे
(तब भी जीवित किये जाएँगे) ?” o
12.
वह कहते
हैं: (ऐसा मुमकिन नहीं) “ अगर ऐसा
हुआ तो यह (लौटना) तो इस समय बड़े घाटे की वापसी होगी “o
13.
सच तो यह
है बस एक ही बार बेहद डरावनी आवाज होगी ( और इस के साथ ब्रह्मांड के सभी खगोलीय
पिंड फट जाएंगे) o
14.
फिर वे
(सब लोग) अचानक खुले मैदान (हश्र) में इकट्ठा होंगे o
15. (ऐ पैग़म्बर!) क्या आपके पास मूसा (अ. स.) के क़िस्से की खबर पहुंची है? O
16. जब उनके रब ने
तुवा की पवित्र घाटी में उन्हें पुकारा था o
17. (और आदेश दिया
था कि) फ़िरऔन के पास जाओ कि उसने लोगों पर ज़ुल्म व अत्याचार करने की हर सीमा पार
कर दी है o
18. फिर (इससे)
कहो: “ क्या तेरी इच्छा है कि तू (गुनाहों से) पाक-साफ़ हो जाए ?” o
19. “ और (क्या तू चाहता है कि) मैं तेरे रब की तरफ तेरा
मार्गदर्शन करूँ ताकि तू (उसके सामने झुके और उससे) डरने लगे ?” o
20. फिर मूसा (अ.
स) ने उसे बड़ी ज़बरदस्त निशानी दिखाई (जब लाठी साँप में बदल गयी और उनका हाथ चमकने
लगा) o
21. फिर भी फ़िरऔन ने
(उन्हें अल्लाह का संदेशवाहक मानने से) इंकार कर दिया और उनकी बात नहीं मानी o
22. फिर वह (सच्ची
बातों से) मुँह मोड़कर (मूसा अ.स. के विरोध में) चालें चलने लगा o
23. फिर उसने
(लोगों को) जमा किया और पुकारने लगा o
24. उसने कहा: “ मैं
तुम्हारा सबसे बुलंद और उच्च कोटि का स्वामी हूँ”
25. नतीजा यह हुआ कि
अल्लाह ने उसे आखिरत (परलोक) और दुनिया की (दोहरी) सज़ा में
पकड़ लिया o
26. बेशक इस
(घटना) में उस आदमी के लिए बड़ी शिक्षा है जो (अल्लाह से) डरता है o
27.
(इंसानो) क्या तुम्हें
पैदा करना अधिक कठिन काम है या (पूरे) ब्रह्मांड (को बनाना), जिसे उसने बनाया o
28.
उसने
आकाश के सभी पिंडों ( ग्रहों, तारों)
को (असीमित फैले हुए अंतरिक्ष में पैदा कर) बुलंद किया, फिर (उनकी संरचना, निर्माण
और चक्कर लगाने की गतियों में संतुलन और स्थिरता पैदा करके) उन्हें ठीक ठाक किया o
29.
और उसी
ने अंतरिक्ष की रात को अंधकारमय बनाया और
(इस अंतरिक्ष से) उन (सूरज जैसे तारों) की रौशनी (धूप की शक्ल में पैदा करके)
निकाली o
30.
और उसी
ने पृथ्वी को इस (तारे: सूरज के अस्तित्व में आ जाने) के बाद (इससे) अलग करके जोर
से फेंक दिया (और इसे रहने लायक़ बनाने के लिए बिछा दिया) o
31.
उसी ने
पृथ्वी से उसका पानी (अलग) निकाल लिया और (शेष सूखे अनुभाग में) उसकी वनस्पतियाँ निकालीं o
32.
और उसी
ने ज़मीन से गड़े हुए पहाड़ों को उभार दिया o
33.
(यह सब कुछ) तुम्हारे और तुम्हारे
चौपायों के लाभ के लिए (किया) o
34.
फिर उस
समय (जब ब्रह्मांड विकास की अंतिम सीमा पर पहुंच जायेगा तब) हर चीज़ पर हावी हो
जाने वाली बहुत सख्त आफ़त (क़यामत) आएगी o
35.
उस दिन
इंसान अपना सब किया धरा याद करेगा o
36.
और हर
देखने वाले के लिए जहन्नम जाहिर कर दी जाएगी o
37.
फिर जिस
व्यक्ति ने सरकशी [सीमाएं तोड़ना] की होगी o
38.
और
सांसारिक जीवन को (आखिरत/परलोक पर)
प्राथमिकता दी होगी o
39.
तो
निश्चित रूप से जहन्नम ही (उसका) ठिकाना होगा o
40.
और जो
व्यक्ति अपने रब के समक्ष खड़ा होने से डरता रहा और उसने (अपने) जी को (बुरी)
इच्छाओं से रोके रखा o
41.
तो बेशक
जन्नत ही (उसका) ठिकाना होगा o
42. (काफिरलोग) आप [पैग़म्बर] से क़यामत के बारे में पूछते हैं
कि “ कब आयेगी वह घड़ी?” o
43. मगर आपको उसके
(घटित होने के समय) के बारे में क्या मालूम! O
44. उसके (क़यामत) घटित
होने के समय (की जानकारी) तो आपके रब को ही है o
45. आप तो केवल उस आदमी को खबरदार करने
वाले हैं जो अल्लाह से डरे o
46. जिस दिन वे उसको देख लेंगे तो
(उन्हें ऐसा लगेगा कि) मानो वे (दुनिया में) एक शाम या उसकी सुबह से अधिक ठहरे ही
नहीं थे o
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