Monday, January 8, 2018

Chronological Quran : 9th Year of Revelation/क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : नवें वर्ष में उतरी आयतें


Chronological Quran : 9th Year of Revelation


[Sep 8, 617 AD --- Aug 28, 618 AD]
 

क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : नवें वर्ष में उतरी आयतें

[1 मुहर्रम/ 5 हिजरी पूर्व----- 30 ज़ुल हिज्जा/ 5 हिजरी पूर्व]










सूरह 42 : अश-शूरा [राय-मशविरा/परामर्श, Consultation]


 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)
ऐन॰ सीन॰ क़ाफ़॰ (2)

अल्लाह जो बहुत ताक़तवाला, और बहुत ज्ञानवाला है,  आप पर [ऐ रसूल!] इसी तरह से वही[revelations]  उतारता है जैसा कि आपसे पहले गुज़र चुके (रसूलों पर) उतारता था.  (3)

जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ धरती पर है, सब उसी का है:  और वही है जो बड़ाई में सबसे ऊँचा और महान है (4)

फ़रिश्ते इस तरह अपने रब की तारीफ़ के साथ उसका गुणगान करते रहते हैं, और धरती पर रहनेवाले लोगों के लिए क्षमा की प्रार्थना करते रहते हैं कि लगता है कि आसमान ऊपर की तरफ़ से (इनके बोझ से) फट पड़ेगा । याद रखो! अल्लाह ही सबसे अधिक क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है (5)

और जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने लिए कुछ दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, अल्लाह उनपर निगरानी रखे हुए है; आप[ऐ रसूल]  उनके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं .  (6)

 हमने आपकी ओर यह अरबी क़ुरआन उतार भेजा है, ताकि आप बस्तियों के केन्द्र (मक्का) में  और जो लोग उसके आसपास रहते हैं,    उनको उस दिन से (ख़ास करके) सचेत कर दें, जिस दिन सबको इकट्ठा किया जाएगा, जिसके आने में  कोई सन्देह नहीं,  जब एक गिरोह बाग़ (जन्नत) में जायेगा  और एक गिरोह भड़कती आग में.  (7)

 यदि अल्लाह चाहता तो उन सबको एक ही समुदाय बना देता, किन्तु वह जिसे चाहेगा, उसे  अपनी रहमत[mercy] में शामिल कर लेगा; और शैतानियाँ करने वालों का न तो कोई रखवाला होगा और न ही कोई मददगार.  (8)

 उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को कैसे अपना रखवाला बना रखा है? रखवाला तो बस अल्लाह ही है;  वही मुर्दों को जीवित करता है;  और उसकी ताक़त हर चीज़ के ऊपर है . (9)

 किसी चीज़ के बारे में तुम जो कुछ भी मतभेद रखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह को ही करना है।[आप कह दें], ऐसा है अल्लाह,  मेरा रब। उसी पर मेरा भरोसा है, और उसी की ओर झुकता हूँ पूरी भक्ति के साथ, (10)

वह आकाशों और धरती का पैदा करनेवाला है।उसने तुम लोगों में से ही तुम्हारे लिए जोड़े बनाए --- और चौपायों के जोड़े भी--- ताकि तुम्हारी नस्ल बढ सके। उसके जैसी कोई चीज़ नहीं: वही है जो हर बात सुनता है, सब कुछ देखता है.  (11)

 आकाशों और धरती की सारी कुंजियाँ उसी के क़ब्ज़े में हैं;  वह जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को ख़ूब बढा देता है और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है;  निस्संदेह उसे हर चीज़ का पूरा ज्ञान है (12)

 धर्म के मामलों में, उसने  तुम(लोगों) के लिए वही नियम-क़ायदे तय किए हैं जैसे आदेश उसने नूह(अलि.) को दिए थे, और जो हमने   [ऐ रसूल] आपके पास उतारा [revealed] है  और जिसका आदेश हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को दिया था कि:  "तुम (इसी) दीन/ धर्म पर क़ायम रहो और उसके अंदर अलग-अलग गुटों में न बँट जाओ" --- फिर भी, बहुदेववादियों को जिस बात की तरफ़ आप   बुला रहे हैं,  वह चीज़ उन के लिए बहुत कठिन व भारी थी; अल्लाह जिसे चाहता है उसे अपने लिए  चुन लेता है और जो उसकी ओर पूरी भक्ति के साथ(क्षमा मांगने के लिए) झुकता है, उसे अपने तक पहुँचने का मार्ग दिखा देता है (13)

 आपसी ज़िद व दुश्मनी के कारण वे लोग (धर्म के मामले में) बँट गए हालाँकि ऐसा करने के समय तक उनके पास सच्चा ज्ञान आ चुका था। और यदि तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि तक के लिए  उन्हें मुहलत दिए जाने का आदेश पहले से ही न पारित हो गया होता, तो उनका फ़ैसला पहले ही किया जा चुका होता। किन्तु उनलोगों के बाद जिनको किताब का वारिस बनाया गया,  वे उसके बारे में एक उलझन में डाल देनेवाले संदेह में पड़े हुए हैं.  (14)

 अतः [ऐ रसूल] आप उन लोगों को उसी (सच्चे धर्म) की ओर बुलाते रहें, और ख़ुद सीधे रास्ते पर चलते रहें जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है. और उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें,  और कह दें, "अल्लाह ने जो भी किताब उतारी है, मैं उसमें विश्वास रखता हूं। मुझे तो आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह तो हमारा भी रब है और तुम्हारा भी रब है --- हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म---  हमारे और तुम्हारे बीच (अब) कोई झगड़ा-बहस नहीं। अल्लाह हम सबको(एक दिन)  इकट्ठा करेगा, और अन्ततः उसी की पास सबको लौट कर जाना है।" (15)

रहे वे लोग जो अल्लाह की पुकार को स्वीकार कर लेने के बाद भी, उस[अल्लाह] के विषय में (अभी तक) बहस करते रहते हैं, उनके रब के सामने ऐसी (झूठी) बातों का कोई मोल नहीं है : (अल्लाह का) क्रोध उनपर टूट पड़ेगा और उनके लिए कड़ी यातना होगी.  (16)

 वह अल्लाह ही है जिसने सच्चाई पर आधारित किताब उतारी और (प्रकृति के नियमों में और इंसाफ़ में) संतुलन स्थापित किया।  तुम्हें क्या मालूम? शायद क़यामत की घड़ी जल्दी ही आ जाए :  (17)

 जो लोग उस[क़यामत] में विश्वास नहीं रखते, वे चाहते हैं कि यह घड़ी जल्दी आ जाए, किन्तु जो इसमें विश्वास रखते हैं,  वे तो उससे डरे-सहमे रहते हैं. वे जानते हैं कि यह सत्य है;  जो लोग उस घड़ी के बारे में (सन्देह डालनेवाली) बहसें करते रहते हैं, वे सही रास्ते से बहुत ज़्यादा भटके हुए हैं .(18)

अल्लाह अपने बन्दों[सभी जीवों] पर अत्यन्त दयालु है; वह जिसे चाहता है रोज़ी(बढा के) देता है; वह बहुत ताक़तवाला, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है.  (19)

अगर कोई आदमी आने वाली दुनिया[आख़िरत/परलोक] में (अपने लिए) फ़सल चाहता है, तो हम उसकी फ़सल को और बढा कर देंगे;   और अगर कोई (केवल) इसी दुनिया की फ़सल चाहता है, तो हम उसे उसी में से कुछ हिस्सा दे देंगे, किन्तु आने वाली दुनिया में उसका कोई हिस्सा नहीं होगा.  (20)

कैसे उन लोगों ने ऐसे (ठहराए हुए) साझीदारों[भगवानों] में विश्वास कर लिया, जिन्होंन उनके लिए ऐसा धर्म निर्धारित कर दिया है जिसकी मंज़ूरी अल्लाह ने दी ही नहीं? यदि अंतिम निर्णय के बारे में अल्लाह का आदेश पारित न हो गया होता, तो उनके बीच फ़ैसला पहले ही किया जा चुका होता। निश्चय ही शैतान लोगों के लिए दर्दनाक यातना होगी---  (21)

तुम शैतान लोगों [ज़ालिमों] को देखोगे कि जो बुरे कर्म उन्होंने कर रखे हैं, उसके नतीजे में डरे-सहमे हुए होंगे: मगर सज़ा तो उनको मिल कर रहेगी--- किन्तु जिन लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, वे (जन्नत में) फूलों से लदे हुए बाग़ों में होंगे। अपने रब से वे जिस चीज़ की भी इच्छा करेंगे, उन्हें वह सब कुछ मिलेगा : यह है सबसे बड़ा इनाम;  (22)

यही तो है वह चीज़ जिसकी ख़ुशख़बरी अल्लाह अपने उन बन्दों को देता है जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं। [ऐ रसूल] आप कहें,  "मैं इस(अच्छाई की तरफ़ बुलाने के काम) के बदले में तुमसे कोई मज़दूरी नहीं माँगता, बस नातेदारी के कारण प्रेम-भाव चाहता हूँ.”  और जो आदमी कुछ भलाई का काम करेगा, हम उसके लिए उसकी अच्छाई को और बढा देंगे; निश्चय ही अल्लाह बहुत क्षमा करनेवाला और (अच्छाई की) बहुत क़द्र करनेवाला है। (23)

क्या वे ऐसा कहते हैं कि "इस व्यक्ति[रसूल] ने अल्लाह के नाम से झूठी बातें गढ कर बना ली हैं?"

यदि अल्लाह चाहे तो आपके दिल पर मुहर लगा दे (ताकि झूठी बात गढना बंद हो जाए)। अल्लाह तो असत्य को मिटाता है और अपने बोलों से सच्चाई की पुष्टि करता  है। निश्चय ही वह सीनों में छुपी हुई बातों को भी भली-भाँति जानता है--- (24)

 वही तो है जो अपने बन्दों के (गुनाहों से) तौबा करने को क़बूल करता है और बुरे कर्मों को माफ़ करता है---- (हालाँकि) जो कुछ तुम करते हो, वह सब जानता है.   (25)

 और वह उन लोगों की दुआएं सुनता है जो (एक अल्लाह में) ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और अपनी उदारता से उन्हें और ज़्यादा इनाम देता है। रहे इंकार करनेवाले[काफ़िर], तो उनके लिए दर्दनाक यातना है (26)

 यदि अल्लाह अपने (पैदा किए हुए) सभी जीवों के लिए रोज़ी को ख़ूब बढा देता तो वे धरती पर अकड़ते व बदतमीज़ी पर उतर आते । किन्तु वह जितनी (रोज़ी) चाहता है, एक सही अंदाज़े के साथ उतार भेजता है। निस्संदेह वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है, और  उनपर नज़र रखता है:  (27)

 जब लोग सारी उम्मीद छोड़ चुके होते हैं, तो वही है जो बारिश से राहत पहुँचाता है और अपनी रहमत [दयालुता, mercy] को दूर दूर तक फैला देता है। वही है सबका रखवाला, हर प्रशंसा के लायक़.  (28)

 आकाशों और धरती की रचना करना उसकी निशानियों में से हैं, और वे जीवधारी भी जो उसने इन दोनों में फैला रखे हैं : वह जब चाहे उन्हें एक-साथ इकट्ठा करने की सामर्थ्य भी रखता है (29)

 जो भी मुसीबत तुम(लोगों) को पहुँचती है,  वह तो तुम्हारे अपने हाथों किए कामों के कारण पहुँचती है-- और बहुत कुछ तो अल्लाह  माफ़ कर देता है--- (30)

 तुम धरती पर कहीं भी उसके क़ब्ज़े से बच नहीं सकते हो:  अल्लाह को छोड़कर न तुम्हारा कोई संरक्षक है और न कोई मददगार. (31)

उसकी निशानियों में से हैं समुद्र में चलने वाले (ऊँचे) जहाज़,  जो पानी में तैरते हुए पहाड़ों जैसे लगते हैं  (32)

 अगर वह चाहे तो हवा को ठहरा दे, जिससे वे (जहाज़) समुद्र की सतह पर बिना किसी हरकत के खड़े रह जाएँ सचमुच इसमें कितनी ही निशानियाँ है हर उस व्यक्ति के लिए जो अत्यन्त धैर्यवान और शुक्र अदा करने वाला हो (33)

 या अगर वह [अल्लाह]  चाहे तो (जहाज़ के) यात्रियों के (बुरे) कर्मों के नतीजे में उन(जहाज़ों) को नष्ट कर दे --- वैसे अल्लाह तो बहुत माफ़ करनेवाला है.  (34)

 और जो लोग जो हमारी आयतों में झगड़े निकालते हैं, वे जान लें कि उनके लिए भाग निकलने की कोई जगह नहीं है.  (35)

 तुम्हें जो चीज़ भी मिली है वह तो सांसारिक जीवन की (तेज़ी से) समाप्त होनेवाली सुख-सामग्री मात्र है। इससे कहीं बेहतर और लम्बे समय तक बाक़ी रहने वाली चीज़ तो अल्लाह देगा अपने उन बंदों को जो अपने रब में विश्वास और भरोसा रखते हैं; (36)

जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों[indecencies] से बचते है; जब उन्हें (किसी पर) ग़ुस्सा आता है तो वे क्षमा कर देते हैं; (37)

 अपने रब का हुक्म मानते हैं; नमाज़ क़ायम करते हैं; काम-काज के मामलों में एक दूसरे से परामर्श करते हैं; और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दिया है उसमें से दूसरों पर भी ख़र्च करते हैं; (38)

 और जब उनपर ज़ुल्म किया जाता है तो वे अपनी रक्षा करते हैं.  (39)

 बुराई(हानि) के बदले में ठीक उसी के बराबर बुराई(हानि) की जा सकती है, हालाँकि जो कोई क्षमा कर देता है और (मामले में) सुधार करता है तो उसका इनाम उसे ख़ुद अल्लाह से मिलेगा---  निश्चय ही वह ग़लत काम करनेवालों को पसन्द नहीं करता.  (40)

 अगर किसी पर ज़ु्ल्म किया जाए और उसके बाद वह उसका (बराबर का) बदला ले ले, तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं;  (41)

 मगर इल्ज़ाम उनपर ज़रूर आता है जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती पर न्याय की तमाम सीमाओं को तोड़ डालते हैं---- ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना होगी---- (42)

 किन्तु जो आदमी धैर्य से काम लेता है और क्षमा कर देता है, तो निश्चय ही यह बहुत हिम्मत का काम है. (43)

 जिस व्यक्ति को अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके बाद कोई और नहीं होगा जो उसकी मदद कर सके : आप[ऐ रसूल] बदमाशों को देखेंगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या अब लौटने का भी कोई मार्ग है?" (44)

और आप देखेंगे कि उन्हें  उस (जहन्नम की) आग के सामने इस हालत में लाया जाएगा कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए, और  नज़रें चुरा रहे होंगे, जबकि जो लोग ईमान रखते थे, वे उस समय कहेंगे कि "निश्चय ही असल घाटे में वही हैं जिन्होंने क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया।सचमुच! शैतान लोग (ज़ालिम) कभी न ख़त्म होने वाली यातना में पड़े होंगे;  (45)

 और उनके कोई मददगार भी न होंगे, जो अल्लाह के ख़िलाफ़ उनकी मदद कर सकें। जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके लिए फिर (आगे बढने का) कोई मार्ग नहीं। (46)

[ऐ लोगो!] अपने रब की बात उस दिन के आने से पहले पहले मान लो जिसे अल्लाह की ओर से टाला नहीं जा सकता--- उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण लेने की जगह  होगी और न तुम (अपने किए कर्मों से) किसी चीज़ का इंकार कर सकोगे.  (47)

 यदि वे तब भी आपकी बातों से मुँह मोड़ें--- तो(याद रखें ऐ रसूल!) कि हमने आपको उनपर निगरानी रखनेवाला बनाकर तो भेजा नहीं है : आप पर तो केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम मनुष्य को अपनी ओर से  दयालुता का मज़ा चखाते हैं तो वह बहुत ख़ुश हो कर इतराने लगता है, और अगर ख़ुद अपने हाथों किए करतूत के कारण ऐसे लोगों को जब कोई मुसीबत आ पड़ती है तो वही मनुष्य बड़ा नाशुक्रा [कृतघ्न, ungrateful] बन जाता है.  (48)

 अल्लाह ही की बादशाहत है आकाशों और धरती पर; वह जो चाहता है पैदा करता है--- जिसे चाहता है लड़कियाँ प्रदान करता है और जिसे चाहता है लड़के प्रदान करता है,  (49)

 या लड़के और लड़कियाँ दोनों मिलाकर देता है, और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है : नि:संदेह वह सब कुछ जाननेवाला, बहुत ताक़तवाला है.  (50)

 किसी इंसान की इतनी हैसियत नहीं कि अल्लाह उससे(सीधे-सीधे) बात करे, बल्कि (अल्लाह की बात) वही[revelation] के द्वारा, या परदे के पीछे से (बिना दिखे) होती है, या यह कि वह एक संदेश लानेवाला (फ़रिश्ता) भेज दे, जो अल्लाह के हुक्म से वही का संदेश पहुँचा दे । निश्चय ही वह बहुत ऊँची शानवाला, अत्यन्त ज्ञानी है.  (51)

और इस तरह,  [ऐ रसूल] हमने अपने आदेश से आपकी ओर वही[revelation] के द्वारा एक रूह (क़ुरआन) उतारी है : आप इससे पहले न यह जानते थे कि किताब क्या होती है और न यह कि ईमान क्या होता है, किन्तु हमने इस किताब (क़ुरआन) को एक प्रकाश बनाया, जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते हैं, मार्ग दिखाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आप लोगों को सीधा मार्ग दिखाते हैं,  (52)

 जो अल्लाह का मार्ग है, वह अल्लाह जिसके क़ब्ज़े में वह सब कुछ है जो आकाशों में है और वह सब कुछ जो धरती में है : हक़ीक़त यह है कि सारे मामले अन्ततः अल्लाह ही की ओर लौटेंगे.  (53)



सूरह 46 : अल अहक़ाफ़ [रेत के टीले, The Sand Dunes]

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़  से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला , बहुत ज्ञान वाला है। - (2)
हमने आसमानों और ज़मीन की और जो कुछ उन दोनों के बीच मौजूद है, उनकी रचना एक ख़ास मक़सद और एक तय की हुई अवधि तक के लिए ही की है, इसके बावजूद जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया है, वे उन चेतावनियों पर ध्यान नहीं देते जो उन्हें दी जाती रही हैं.  (3)

[ऐ रसूल] आप कहें, " तुम अल्लाह को छोड़कर जिन देवताओं की पूजा करते हो, क्या तुमने उनके बारे में कभी सोचा है : मुझे दिखाओ तो सही कि इस धरती का कौन सा हिस्सा है जिसे उन्होंने पैदा किया है या बताओ कि आसमानों में क्या कोई हिस्सा है जो इनके क़ब्ज़े में है; मेरे पास इस [क़ुरआन] से पहले की कोई किताब ले आओ या दिव्य ज्ञान की कोई बची हुई मान्यताओं को ही(सबूत में) पेश करो---- अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो।" (4)

 उस आदमी से बढ़कर ग़लती पर और कौन होगा जो अल्लाह को छोड़कर उन(गढे हुए देवताओं) को पुकारता हो जो क़यामत के दिन तक उसकी पुकार का जवाब नहीं दे सकते, बल्कि उन्हें तो यह भी ख़बर नहीं कि उन्हें कोई पुकार रहा है ; (5)

और जब सारे लोग(क़यामत के दिन) इकट्ठा किए जाएँगे तो वे [गढे हुए देवता] ख़ुद उस आदमी के दुश्मन हो जाएंगे और उसके द्वारा की गयी पूजा को न मानते हुए उससे अलग हो जाएंगे !  (6)

 जब हमारी (क़ुरआन की) आयतें उन्हें पढ़कर स्पष्ट रूप से सुनाई जाती हैं तो वह सच्चाई जो उन लोगों तक पहुँचती है, उसके बारे में इंकार करने वाले लोग[काफ़िर] यह कह देते हैं कि "यह तो सचमुच जादू है।" (7)

 या वे कहते हैं कि, "उस[रसूल] ने इस(क़ुरआन) को स्वयं अपनी तरफ़ से गढ लिया है?" [ऐ रसूल] आप कह दें, "यदि मैंने इसे सचमुच गढा है तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से ज़रा भी नहीं बचा सकते। जिसके विषय में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह[अल्लाह] उसे भली-भाँति जानता है। और वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (8)

कह दें, "मैं अल्लाह के रसूलों में कोई पहला(या अलग) रसूल तो नहीं हूँ। मैं (निजी तौर पर) नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न यह मालूम है कि तुम्हारे साथ क्या होगा ; (अल्लाह की ओर से) जो भी वही”  [revelation] मुझे भेजी जाती है, मैं बस उसी का अनुसरण करता हूँ ; और मैं सीधे सीधे (अल्लाह की ओर से) सावधान करनेवाला हूँ।" (9)

 आप कहें, "क्या तुमने सोचा भी है : कि क्या होगा अगर यह क़ुरआन सचमुच अल्लाह की तरफ़ से हुआ और फिर भी तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया ?  क्या होगा अगर इसराईल की सन्तानों में से कोई इस किताब को पुरानी आसमानी किताबों [तोरैत, इंजील] से मिलती जुलती होने की गवाही दे दे, और उसमें विश्वास करने लगे, मगर तब भी तुम घमंड में इतने पड़े रहे (कि विश्वास न कर सके) ? शैतानियाँ करने वालों को अल्लाह कभी मार्ग नहीं दिखाता।" (10)

 जो लोग सच्चाई से इंकार करने पर अड़े रहे, वे विश्वास रखनेवालों के बारे में कहते हैं, "अगर इस (क़ुरआन) में कुछ भी अच्छा होता, तो हम लोगों से पहले उन (गरीब ईमानवालों) ने इसमें विश्वास न किया होता",  और चूँकि उन [काफ़िरों]  ने उससे मार्गदर्शन लेने से इंकार कर दिया, सो अब वे कहते हैं , "यह तो वही पुराना झूठ है!" (11)

 हालाँकि इससे पहले मूसा(अलै) की किताब [तोरैत] एक रास्ता दिखाने वाली और रहमत [mercy] के रूप में  उतारी जा चुकी थी,  और यह (क़ुरआन) अरबी भाषा में एक ऐसी किताब है जो उस (तोरैत) के सही व सच्चे  होने की पुष्टि करती है, ताकि बुरे कर्म करने वालों को सावधान कर दे  और अच्छा कर्म करने वालों के लिए ख़ुश-ख़बरी ले आए.  (12)

 इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने कह दिया, "हमारा रब अल्लाह है, " फिर वे सीधे मार्ग पर जमे रहे तो उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे दुखी होंगे. (13)

 वही जन्नतवाले लोग हैं, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे-- यह उन कर्मों का इनाम है जो वे (दुनिया में) किया करते थे.  (14)

हमने मनुष्य को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है : उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर  उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस अहसान का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तुने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर किया है ; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को भी अच्छा व नेक बना । मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (15)

 ऐसे ही लोगों के द्वारा किए गए कर्मों में से बेहतरीन कामों को हम क़बूल कर लेते हैं , और हम उनके बुरे कर्मों को (माफ़ करते हुए) उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं । वे जन्नतवालों में शामिल होंगे---- यह सच्चा वादा है जो उनसे किया जा रहा है . (16)

किन्तु एक आदमी है जो अपने माँ-बाप से कहता है, "उफ़्फ़! क्या आप सचमुच मुझे डरा रहे हैं कि मैं अपनी क़ब्र से ज़िंदा उठाया जाऊँगा, हालाँकि कितनी ही नस्लें हैं जो गुज़र चुकी हैं और मुझ से पहले जा चुकीं ?" उसके माँ-बाप अल्लाह से फ़रियाद करते हैं, और (बेटे से) कहते हैं  - "अफ़सोस है तुमपर! विश्वास करो ! निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है।" मगर तब भी वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की झूठी कहानियाँ हैं और कुछ नहीं।" (17)

 ऐसे सभी लोगों (की सज़ाओं) का फ़ैसला तय हो चुका है, और इनमें ऐसे सभी गिरोह शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके हैंचाहे वे जिन्न हों या इंसान : सचमुच वे बड़े घाटे में रहे.  (18)

 (अच्छे और बुरे) कर्मों के मुताबिक़ हर एक का दर्जा तय किया जाएगा और जो कुछ उन्होंने किया है, अल्लाह उन्हें उसका पूरा-पूरा बदला दे देगा : और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं होगा. (19)

 और एक दिन आएगा जब सच्चाई से इंकार करने वाले लोगों को (जहन्नम की) आग के सामने पेश किया जाएगा, और उनसे कहा जाएगा, "तुम अपने सांसारिक जीवन में अपने हिस्से की अच्छी चीज़ों को बेकार  [waste]कर चुके और उनका मज़ा ले चुके हो, अतः आज के दिन तुम्हें अपमानित करनेवाली सज़ा दी जाएगी:  क्योंकि तुम धरती पर बिना किसी अधिकार के घमंड करते रहे और तुमने (मर्यादा) की सभी सीमाएं तोड़ डालीं ।" (20)

[ऐ रसूल] आद के भाई [हूद अलै.] की चर्चा करें : जब उन्होंने (यमन में स्थित) रेत के टीलों के बीच बसने वाले आद के लोगों को सावधान किया, और ऐसा सावधान करने वाले उनसे पहले भी और उनके बाद भी कई आए और कई गुज़र चुके थे --- (सब एक ही बात कहते कि) , "अल्लाह को छोड़ कर किसी की उपासना न करो। मुझे तुम्हारे लिए डर है कि एक भयानक दिन में तुम्हें दंडित किया जाएगा ।" (21)

 मगर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको अपने देवताओं से अलग-थलग कर दो ?  तुम अगर अपनी बात में सच्चे हो, तो फिर ले आओ हम पर वह सज़ा जिसकी धमकी तुम हमें देते हो !" (22)

 हूद (अलै.) ने कहा, " यह तो केवल अल्लाह ही जानता है कि वह दिन कब आएगा : मैं तो तुम्हें बस वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है मगर मैं देख रहा हूँ कि तुम बड़े अक्खड़ व जाहिल लोग हो ।" (23)

 फिर जब उन लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आता हुआ देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसनेवाला है!', (हूद अलै. ने कहा), "नहीं !, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी : यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (24)

जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस नहस कर देगी।" (अगली सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था : अपराधियों को हम इसी तरह बदला देते हैं .  (25)

 [ऐ मक्का के लोगो !] हमने (आद की क़ौम के) लोगों को कुछ चीज़ों में ऐसी ताक़त व सलाहियत दे रखी थी, कि  वैसी ताक़त तुम्हें नहीं दी; हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे, इसके बावजूद न तो उनके कान, न उनकी आँखें और न उनके दिल ही उनके किसी काम आ सके, क्योंकि वे अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करते थे. जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी यातना ने उन्हें आ घेरा.  (26)

 हम तुम्हारे आस-पास बसी हुई दूसरे समुदायों की बस्तियों को भी तबाह-बर्बाद कर चुके हैं---- हमने उन्हें भी अपनी बहुत सारी निशानियाँ दी थीं, ताकि वे सही रास्ते पर वापस आ सकें---  (27)

 (वे कहते थे कि) अल्लाह से नज़दीकी हासिल करने के लिए उन लोगों ने कुछ देवताओं को अल्लाह के बजाए अपना भगवान बना लिया था, (अगर यह नज़दीकी वाली बात सच होती तो) फिर क्यों उनके देवताओं ने उनकी कोई मदद नहीं की ? बिल्कुल नहीं! बल्कि वे (देवता) उन्हें छोड़ कर ख़ुद ही चले गए : असल में यह एक झूठी बात थी जो ख़ुद उन्हीं लोगों ने गढ कर बना ली थी.  (28)

और याद करें [ऐ रसूल], जब हमने जिन्नों के एक समूह को आपके पास क़ुरआन को सुनने के लिए भेजा था, तो जब वे वहाँ पहुँच कर उसे सुनने लगे तो उन लोगों ने (एक दूसरे से) कहा,  "चुप हो जाओ!" फिर जब उस  (क़ुरआन) का पाठ पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर लौट गए और उन्हें (अल्लाह की ओर से) चेतावनियाँ दीं . (29)

 उन (जिन्नों) ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! हमने एक ऐसी किताब [क़ुरआन] सुनी है, जो मूसा(अलै. की तौरात) के बाद उतारी गई है, जो अपने से पहले उतारी गयी किताबों को सच्चा मानती है, और मार्गदर्शन करती है सच्चाई की तरफ़ और सीधे मार्ग की ओर.  (30)

(आगे कहा) ऐ लोगो! उसकी बात मान लो जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाता है. उस (अल्लाह) में विश्वास करो : अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा लेगा.”  (31)

और जो कोई अल्लाह की तरफ़ बुलानेवाले की बात नहीं मानता, तो वह धरती पर कहीं भी अल्लाह के क़ाबू से बच निकलनेवाला नहीं है और न कोई  अल्लाह से उसकी रक्षा करने वाला होगा : ऐसे लोग सचमुच रास्ता भटक कर दूर जा पड़े हैं ।(32)

 क्या इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] यह नहीं समझते कि वह अल्लाह जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, और जो ऐसा करने में ज़रा थका भी नहीं, उसमें इतनी ताक़त है कि वह मरे हुए लोगों को फिर से ज़िंदा कर दे? क्यों नहीं ! बेशक, हर एक चीज़ उसके क़ब्ज़े में है .  (33)

 और जिस दिन इंकार पर अड़े काफ़िरों को जहन्नम की आग के सामने लाया जाएगा, (और उनसे पूछा जाएगा), "क्या यह (जहन्नम) सचमुच असली नहीं है?" वे जवाब देंगे, " हमारे रब की क़सम! यह सचमुच असली है, " तब अल्लाह  कहेगा, "सच्चाई से इंकार करने के बदले में अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का! (34)

अत: [ऐ मुहम्मद] आप धैर्य से अपने काम पर जमे रहें !  जिस तरह (आप से पहले) पक्के इरादों वाले रसूलों[नूह, इब्राहीम,मूसा,ईसा] ने धैर्य से काम लिया था। आप उन [इंकार पर अड़े काफ़िरों] के लिए सज़ा माँगने में जल्दी न करें : जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसके बारे में उन्हें सावधान किया जाता था, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर से ज़्यादा (इस दुनिया में) नहीं ठहरे थे। यह एक (चेतावनी भरा) संदेश है । अब क्या कोई है जो बर्बाद होगा सिवा हर बात का विरोध करनेवाले बदमाशों के ? (35)


सूरह 44 : अद-दुख़ान [धुंआँ, The Smoke]

 


 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है


हा॰ मीम॰ (1)
 क़सम है इस किताब की जो सच्चाई को स्पष्ट करने वाली है,  (2)
निस्संदेह हमने उसे एक मुबारक (शुभ) रात में उतारा हैहमेशा ही हम ने सावधान करने के लिए चेतावनियाँ भेजी हैं --  (3)

 उस रात, जब ज्ञान व समझ-बूझ [wisdom] के हर एक मामले को साफ़ व स्पष्ट  कर दिया गया, (4)

 हमारे हुक्म पर--- हम ने हमेशा ही आदमियों के पास (अपने) संदेश भेजे हैं --- (5)

 जो (असल में, ऐ रसूल) आपके रब की रहमत [mercy] है, वह रब जो हर बात को सुनने वाला और हर चीज़ को जानने वाला है, (6)

जो सारे आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ उन दोनों के बीच है, उन सबका रब है---- अगर तुम लोग सचमुच पक्का विश्वास रखनेवाले हो ---(7)

उस[अल्लाह] के अलावा कोई प्रभु नहीं : वही ज़िंदगी भी देता है और मौत भी --- वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है---  (8)

 तब भी वे [इंकार करनेवाले] संदेह (की हालत) में पड़े रहते हैं, और किसी भी चीज़ को गंभीरता से नहीं लेते. (9)


सो, [ऐ रसूल] आप उस दिन का इंतेज़ार करें, जब आसमान से धुँएं के बादल आते दिखायी देंगे । (10)

जो लोगों को पूरी तरह से ढँक लेंगे । (वे चिल्ला कर कहेंगे) यह तो एक दर्दनाक सज़ा है! (11)

ऐ हमारे रब! हमपर से यह यातना हटा दे!  अब हम (एक अल्लाह में) विश्वास करते हैं ! " (12)

 (मगर) उनके (अचानक) विश्वास कर लेने का तब क्या फ़ायदा होगा ? जब उनके पास एक रसूल आया था जिसने साफ़ शब्दों में चेतावनियाँ दी थीं,  (13)

 फिर भी उन्होंने यह कहते हुए उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया कि, "यह तो सिखाया-पढ़ाया हुआ है!, दीवाना है ! " (14)

 "(अच्छा) हम इस यातना को थोड़ी देर के लिए  रोक देते हैं---  तुम अवश्य ही अपनी उसी(कुफ़्र की) हालत पर लौट आओगे--- (15)

 और जिस दिन हम (उन लोगों) को अपनी मज़बूत पकड़ में ले लेंगे, तो निश्चय ही उस दिन हम पूरा बदला लेकर रहेंगे . (16)


 उनसे पहले हम ने फ़िरऔन की क़ौम के लोगों की परीक्षा ली थी : उनके पास एक बहुत ही इज़्ज़त व गरिमा वाले रसूल[मूसा अलै.] को भेजा,   (17)

 यह कहते हुए कि "तुम अल्लाह के बन्दों [इसराईल की संतानों] को मेरे हवाले कर दो !  निश्चय ही मैं विश्वास करने योग्य रसूल हूँ जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ . (18)

और यह कि अपने आपको अल्लाह से ऊँचा न समझो !, मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ, (19)

 और मैं इस बात से अपने रब और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ कि तुम मुझे बेइज़्ज़त करो या मुझ पर पत्थर बरसाओ,  (20)

 किन्तु अगर तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करते, तो (कम से कम) मुझसे दूर रहो !" (21)

(परेशान हो कर अन्ततः मूसा अलै. ने) अपने रब को पुकारा कि "ये शैतान लोग हैं ।" (22)

 (अल्लाह ने जवाब दिया) " तुम रातों रात मेरे बन्दों को लेकर निकल भागो, निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा . (23)

(और तुम लोग जब समुद्र के बीच से बने रास्ते से पार हो चुको) तो समुद्र को(वैसा ही खुला हुआ) स्थिर छोड़ देना, (वहीं) उस [फ़िरऔन] के पूरे दल- बल को डुबा दिया जायेगा ।" (24)

 छोड़ गये वे कितनॆ ही बाग़ और पानी के सोते,   (25)

 और कितने खेत और शानदार रहने के मकान ,  (26)

और सुख सामग्री, जिनमें वे मज़े कर रहे थे :  (27)

 और ऐसा हुआ कि एक दूसरी क़ौम के लोगों को इन सभी (छोड़ी हुई) चीज़ों का वारिस बना दिया गया.  (28)

 फिर न तो उनपर आसमान रोया और न ज़मीन और न उन्हें कुछ मुहलत ही दी गयी.  (29)

और हमने इसराईल की सन्तानों को अपमानजनक यातना से छुटकारा दे दिया (30)

मतलब फ़िरऔन से छुटकारा : सचमुच वह बड़ा ही ज़ालिम था जिसने मर्यादा की सभी हदें पार कर ली थीं.  (31)

 और हमने उन (इसराईल की संतानों) को जानते-बूझते हुए सारे संसार की क़ौमों में से चुना था  (32)

और हमने उन्हें अपनी निशानियाँ [ revelations] दी जिनमें उनके लिए (इनाम भी था और) स्पष्ट परीक्षा भी थी . (33)


ये लोग यहाँ (मक्का में) बड़ी दृढ़ता से कहते हैं, (34)

 "बस हमारी पहली मृत्यु के बाद का जीवन कुछ नहीं है : हमें दोबारा ज़िंदा नहीं किया जाएगा. (35)

 (आगे कहते) अगर जो कुछ तुम कह रहे हो वह सच है, तो उठा लाओ हमारे बाप-दादा को !" (36)

 क्या ये (लोग) यमन के बादशाहों [तुब्बा] की क़ौम से या उन क़ौम के लोगों से बेहतर हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके ? हमने उन सबको तबाह बर्बाद कर दिया---  सचमुच वे अपराधी थे . (37)

हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच में है, उन्हें  बेमक़सद खेल करने के लिए नहीं बनाया ; (38)

हमने उन्हें एक सच्चे मक़सद के लिए पैदा किया है, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग समझते नहीं हैं (39)


निश्चय ही फ़ैसले का दिन उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है;  (40)

 जिस दिन कोई अपना, किसी अपने के कुछ काम न आ सकेगा.  (41)

 उनमें से किसी की कोई मदद नहीं की जायेगी सिवाय उस लोगों के जिनपर अल्लाह दया कर दे : निश्चय ही वह प्रभुत्वशाली है, और अत्यन्त दयावान रब है .  (42)

 इसमें शक नहीं कि ज़क़्क़ूम [काँटेदार फल] का पेड़  (43)

 गुनहगारों का भोजन होगा :  (44)

 पिघले हुए धातु जैसा (गर्म), वह लोगों के पेटों में (इस तरह) खौलेगा, (45)

 जैसे गर्म पानी खौलता है.  (46)

(आदेश होगा),  "पकड़ो उसे ! और जहन्नम की गहराइयों के बीच तक घसीटते हुए ले जाओ !  (47)

फिर उसके सिर पर खौलते हुए पानी की यातना उंडेल दो!" (48)

 "लो चखो मज़ा, तुम तो बड़े बलशाली, और इज़्ज़तदार आदमी हो ! (49)

 यही तो है (वह जहन्नम) जिसके बारे में तुम संदेह करते थे।" (50)

(दूसरी तरफ़) वे लोग जिनके ध्यान में हर समय अल्लाह होता है, वे सुरक्षित व अमन वाली जगह में होंगे, (51)

बाग़ों और पानी के सोतों [springs] के बीच,  (52)

 रेशम और महीन ज़री के कपड़े पहने हुए, एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे होंगे : (53)

 ऐसा ही होगा। और हम बड़ी बड़ी व काली आँखोंवाली हूरों से उनकी शादी कर देंगे (54)

वे वहाँ सुकून व इत्मिनान से (बैठे हुए) हर तरह के फल व मेवे मँगवा रहे होंगे (55)

(दुनिया में) एक मृत्यु के बाद, वहाँ(जन्नत में) वे मौत का मज़ा फिर कभी नहीं चखेंगे। और अल्लाह उन्हें भड़कती हुई आग की यातना से सुरक्षित रखेगा,  (56)

यह सब तुम्हारे रब की तरफ़ से इनाम है, (इंसान के लिए) यही सबसे बड़ी कामयाबी है.  (57)


हमने इस (क़ुरआन) को समझने में आसान बनाया है --- [ऐ रसूल] आपकी अपनी(अरबी) भाषा में-- ताकि वे ध्यान दें  और नसीहत प्राप्त करें.  (58)

तो आप बस इंतेज़ार करें; वे (अल्लाह पर विश्वास न करनेवाले) भी इंतेज़ार कर रहे हैं . (59)




सूरह 45 : अल जासिया [घुटनों के बल बैठना, Kneeling]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

 इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़  से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला , बहुत ज्ञान वाला है। - (2)

 सचमुच आसमानों और धरती में विश्वास रखनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं :  (3)

 ख़ुद तुम्हारी रचना करने में, और सभी जीव-जंतुओं में जिनकी रचना करके अल्लाह ने धरती पर फैला रखा है, निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो पक्का विश्वास रखते हैं ;  (4)

और रात और दिन के बारी बारी आने जाने में, और उस बारिश में जिसे अल्लाह आसमान से नीचे उतारता है , जिससे मरी हुई धरती फिर से ज़िंदा हो उठती है और (इसी तरह) हवाओं की दिशा बदल देने में भी उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं  (5)

 [ऐ रसूल!] ये अल्लाह की निशानियाँ हैं,  जिनके द्वारा हम आपको सच्चाई (दिखा और) सुना रहे हैं। अब अगर वे  अल्लाह और उसकी उतारी गयी आयतों को भी मानने से इंकार करते हैं, तो आख़िर ये किस बात पर विश्वास करेंगे ? (6)


 तबाह हो जाए हर झूठ बोलनेवाला गुनहगार आदमी , (7)

 जो अल्लाह की उतारी गयी आयतें जब उसे पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो वह सुन लेता है, मगर तब भी वह घमंड के साथ (अपने इंकार पर) अड़ा रहता है मानो उसने कभी कुछ सुना ही नहीं----  अतः उसको दर्दनाक यातना की शुभ सूचना”  दे दें ! --- (8)

 और जब वह हमारी उतारी गयी आयतों में से किसी बात को भी अगर जान लेता है तो वह उसकी हँसी उड़ाता है!  ऐसे लोगों के लिए बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना होगी :   (9)

 जहन्नम उनके पीछे (घात में लगी) है, जो भी (धन) उन्होंने कमाया, न तो वह उनके कुछ काम आएगा और न ही वे (झूठे देवता) काम आएंगे जिन्हें इन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने संरक्षक ठहरा रखे हैं --- एक ज़बरदस्त यातना उनके इंतेज़ार में है (10)

 यह [क़ुरआन] एक दम सही मार्गदर्शन है ; और जिन लोगों ने अपने रब की आयतों को मानने से इंकार किया, उनके लिए हिला देनेवाली दर्दनाक यातना है.  (11)


 वह अल्लाह ही है जिसने समुद्र को तुम्हारे लिए काम पर लगा दिया है--- उसके आदेश से उसमें जहाज़ें चलती हैं ताकि तुम उससे अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको और उस (अल्लाह) का शुक्र अदा कर सको--- (12)

 आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, उन सबको उसने अपनी तरफ़ से तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं  (13)


[ऐ रसूल!] जो लोग ईमान रखते हैं उनसे कह दें कि, "वे उन लोगों(द्वारा किए गए बुरे सुलूक) को क्षमा कर दें जो लोग अल्लाह के (दंड देने वाले) दिनों (के इसी दुनिया में आ जाने ) का डर नहीं रखते----जैसे भी कर्म उन लोगों ने किए हैं, वह [अल्लाह] उन लोगों को उसका उचित बदला देगा.  (14)

 जो कोई भी अच्छा कर्म करता है तो अपने ही फ़ायदे के लिए करता है और जो कोई बुरा कर्म करता है तो वह अपना ही नुक़सान करता है :  फिर तुम सब को अपने रब की ओर ही लौट कर जाना होगा.  (15)


निश्चय ही हमने इसराईल की सन्तानों को किताब, ज्ञान (नियम-क़ानून) और पैग़म्बरी [Prophethood] प्रदान की थी; और हमने उन्हें अच्छी चीज़ो से रोज़ी दी और उन्हें सारे संसारवालों पर श्रेष्ठता दी थी ; (16)

 और हमने इस (धर्म के) मामले में उन्हें साफ़ व स्पष्ट प्रमाण (और आदेश) दिए थे। मगर (इन आदेशों को) जान लेने के बाद भी, आपसी दुश्मनी और जलन के कारण ही उन लोगों का आपस में मतभेद हो गया : निश्चय ही आपका रब क़यामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे आपस में मतभेद रखते थे. (17)

 अब हमने आपको [ऐ रसूल] इस (धर्म के) मामले में साफ़ रास्ते (शरीअत) पर डाल दिया है, अतः आप उसी रास्ते पर चलते जाएं. और उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें जो सच्चाई की जानकारी नहीं रखते--- (18)

 वे अल्लाह के मुक़ाबले में वैसे भी आपके कुछ काम नहीं आ सकते। हक़ीक़त यह है कि ग़लत काम करनेवालों के पास बस एक दूसरे का ही सहारा है; जबकि अल्लाह के ध्यान में डूबे हुए [मुत्तक़ी] लोगों का मददगार ख़ुद अल्लाह है . (19)

यह [क़ुरआन] लोगों में गहरी समझ-बूझ पैदा करने वाली है , सही रास्ता दिखाने वाली है और पक्का विश्वास रखनेवाले लोगों के लिए (अल्लाह की) रहमत [mercy] है . (20)


 क्या वे लोग जो बुरे कर्म करते रहते हैं, वे सचमुच ऐसा समझ बैठे हैं कि हम उनके साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ जो (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और कि उन (अच्छे और बुरे कर्म करने वालों) का जीना और मरना एक बराबर हो जाएगा ? (अगर उनका यही फ़ैसला है तो) कितना ग़लत है उनके फ़ैसला करने का तरीक़ा !  (21)

 अल्लाह ने सारे आसमानों और ज़मीन को एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है : ताकि हर एक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार बदला दिया जाए और देते समय उनपर अन्याय न किया जाए.  (22)

[ऐ रसूल] क्या आपने उस व्यक्ति को नहीं देखा जिसने अपने अंदर की इच्छाओं को ही अपना ख़ुदा बना लिया? अल्लाह ने उसकी स्थिति जानते हुए उसे भटकता छोड़ दिया, और उसके कानों और दिल पर मुहर लगा दी और उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया--- अब अल्लाह (की ऐसी मर्ज़ी) के बाद कौन है जो उसे मार्ग पर ला सकता है?  फिर भी तुम(लोग) शिक्षा नहीं ग्रहण करते? (23)


 वे कहते हैं , "जो कुछ हमारी ज़िंदगी है वह तो बस इसी संसार की ज़िंदगी है : (इसी में) हम मरते हैं, जीते हैं,  और कोई और नहीं बल्कि हमें तो काल (समय) ही मार डालता है।" हालाँकि इस बात की उनके पास कोई जानकारी नहीं है; वे तो बस अटकलें ही दौड़ाते हैं.  (24)

 और जब उनके सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़ कर सुनायी जाती हैं, तो वे अपने तर्क में केवल यही कहते हैं , "यदि तुम सच्चे हो तो हमारे बाप-दादाओं को (ज़िंदा करके) ले आओ।" (25)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता है, फिर वहीं तुम्हें मृत्यु देता है, फिर वही तुम सब को क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा जिसमें कोई संदेह नहीं, किन्तु अधिकतर लोग यह बात नहीं समझते I” (26)


 आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह के नियंत्रण व क़ाबू में है। जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन असत्य पर जमे रहनेवाले भारी घाटा उठाएंगे.  (27)

और (उस दिन) तुम हर एक गिरोह को देखोगे कि वह घुटनों के बल झुका हुआ है । हर गिरोह को अपने कर्मों के बही-खाते को देखने के लिए बुलाया जाएगा :  "आज तुम्हें उन कर्मों का बदला दिया जाएगा, जो तुम किया करते थे (28)

 "यह हमारा (तैयार किया हुआ) बही-खाता है, जो तुम्हारे बारे में सच सच बता रहा है। तुम जो कुछ भी करते  थे, हम वह सब कुछ लिखवाते रहे हैं ।" (29)

 अतः जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उन्हें तो उनका रब (दया दिखाते हुए) अपनी रहमत[mercy] में दाख़िल कर लेगा -----  यही सबसे स्पष्ट कामयाबी है --- (30)

 रहे वे लोग जिन्होंने मानने से इंकार किया व कुफ़्र पर अड़े रहे (उनसे पूछा जाएगा,) “ तुम्हारे सामने  जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती थीं, तो क्या उस वक़्त तुम घमंड में चूर और कुकर्मों में डूबे हुए न थे?  (31)

और जब तुम से कहा जाता था, अल्लाह का वादा सच्चा है और उस (क़यामत की) घड़ी में कोई संदेह नहीं है,”  तो तुम जवाब में ऐसा नहीं कहते थे कि, "हम नहीं जानते कि वह घड़ी क्या है ? हमारे विचार में तो बस यह अटकल लगाने जैसा लगता है, सो हम इसे सच नहीं मानते ?(32)


और (एक दिन आएगा कि) जो कुछ कुकर्म वे करते रहे थे, उसकी बुराइयाँ खुल कर उनके सामने आ जायेंगी  और जिस (दंड) की वे हँसी उड़ाया करते थे, वही उन्हें घेर लेगा.  (33)

और उनसे कह दिया जाएगा कि "आज हम तुम्हें ठीक वैसे ही भुला देंगे जैसे कि (दुनिया में) तुम इस बात को भुलाए बैठे थे कि तुम्हें इस दिन का सामना करना पड़ेगा. तुम्हारा ठिकाना अब (जहन्नम की) आग है और अब कोई तुम्हारी मदद करनेवाला नहीं है,  (34)

 यह सब इसलिए कि तुमने अल्लाह की आयतों [संदेशों] की हँसी उड़ाई थी और सांसारिक जीवन ने तुम्हें धोखे में डाल रखा था ।" अतः उस दिन न तो ऐसे लोगों को उस (आग) से बाहर निकाला जाएगा और न उन्हें अपनी ग़लती सुधारने का कोई मौक़ा ही दिया जाएगा.  (35)


अतः सारी तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं जो ज़मीन और आसमानों का मालिक है और सारे जहानवालों को पालनेवाला है . (36)


 आसमानों और ज़मीन में असली महानता उसी की है : वह बहुत ताक़तवाला और अत्यन्त ज्ञानी है.  (37)




सूरह 46 : अल अहक़ाफ़ [रेत के टीले, The Sand Dunes]


 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़  से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला , बहुत ज्ञान वाला है। - (2)
हमने आसमानों और ज़मीन की और जो कुछ उन दोनों के बीच मौजूद है, उनकी रचना एक ख़ास मक़सद और एक तय की हुई अवधि तक के लिए ही की है, इसके बावजूद जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया है, वे उन चेतावनियों पर ध्यान नहीं देते जो उन्हें दी जाती रही हैं.  (3)

[ऐ रसूल] आप कहें, " तुम अल्लाह को छोड़कर जिन देवताओं की पूजा करते हो, क्या तुमने उनके बारे में कभी सोचा है : मुझे दिखाओ तो सही कि इस धरती का कौन सा हिस्सा है जिसे उन्होंने पैदा किया है या बताओ कि आसमानों में क्या कोई हिस्सा है जो इनके क़ब्ज़े में है; मेरे पास इस [क़ुरआन] से पहले की कोई किताब ले आओ या दिव्य ज्ञान की कोई बची हुई मान्यताओं को ही(सबूत में) पेश करो---- अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो।" (4)

 उस आदमी से बढ़कर ग़लती पर और कौन होगा जो अल्लाह को छोड़कर उन(गढे हुए देवताओं) को पुकारता हो जो क़यामत के दिन तक उसकी पुकार का जवाब नहीं दे सकते, बल्कि उन्हें तो यह भी ख़बर नहीं कि उन्हें कोई पुकार रहा है ; (5)

और जब सारे लोग(क़यामत के दिन) इकट्ठा किए जाएँगे तो वे [गढे हुए देवता] ख़ुद उस आदमी के दुश्मन हो जाएंगे और उसके द्वारा की गयी पूजा को न मानते हुए उससे अलग हो जाएंगे !  (6)

 जब हमारी (क़ुरआन की) आयतें उन्हें पढ़कर स्पष्ट रूप से सुनाई जाती हैं तो वह सच्चाई जो उन लोगों तक पहुँचती है, उसके बारे में इंकार करने वाले लोग[काफ़िर] यह कह देते हैं कि "यह तो सचमुच जादू है।" (7)

 या वे कहते हैं कि, "उस[रसूल] ने इस(क़ुरआन) को स्वयं अपनी तरफ़ से गढ लिया है?" [ऐ रसूल] आप कह दें, "यदि मैंने इसे सचमुच गढा है तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से ज़रा भी नहीं बचा सकते। जिसके विषय में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह[अल्लाह] उसे भली-भाँति जानता है। और वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (8)

कह दें, "मैं अल्लाह के रसूलों में कोई पहला(या अलग) रसूल तो नहीं हूँ। मैं (निजी तौर पर) नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न यह मालूम है कि तुम्हारे साथ क्या होगा ; (अल्लाह की ओर से) जो भी वही”  [revelation] मुझे भेजी जाती है, मैं बस उसी का अनुसरण करता हूँ ; और मैं सीधे सीधे (अल्लाह की ओर से) सावधान करनेवाला हूँ।" (9)

 आप कहें, "क्या तुमने सोचा भी है : कि क्या होगा अगर यह क़ुरआन सचमुच अल्लाह की तरफ़ से हुआ और फिर भी तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया ?  क्या होगा अगर इसराईल की सन्तानों में से कोई इस किताब को पुरानी आसमानी किताबों [तोरैत, इंजील] से मिलती जुलती होने की गवाही दे दे, और उसमें विश्वास करने लगे, मगर तब भी तुम घमंड में इतने पड़े रहे (कि विश्वास न कर सके) ? शैतानियाँ करने वालों को अल्लाह कभी मार्ग नहीं दिखाता।" (10)

 जो लोग सच्चाई से इंकार करने पर अड़े रहे, वे विश्वास रखनेवालों के बारे में कहते हैं, "अगर इस (क़ुरआन) में कुछ भी अच्छा होता, तो हम लोगों से पहले उन (गरीब ईमानवालों) ने इसमें विश्वास न किया होता",  और चूँकि उन [काफ़िरों]  ने उससे मार्गदर्शन लेने से इंकार कर दिया, सो अब वे कहते हैं , "यह तो वही पुराना झूठ है!" (11)

 हालाँकि इससे पहले मूसा(अलै) की किताब [तोरैत] एक रास्ता दिखाने वाली और रहमत [mercy] के रूप में  उतारी जा चुकी थी,  और यह (क़ुरआन) अरबी भाषा में एक ऐसी किताब है जो उस (तोरैत) के सही व सच्चे  होने की पुष्टि करती है, ताकि बुरे कर्म करने वालों को सावधान कर दे  और अच्छा कर्म करने वालों के लिए ख़ुश-ख़बरी ले आए.  (12)

 इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने कह दिया, "हमारा रब अल्लाह है, " फिर वे सीधे मार्ग पर जमे रहे तो उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे दुखी होंगे. (13)

 वही जन्नतवाले लोग हैं, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे-- यह उन कर्मों का इनाम है जो वे (दुनिया में) किया करते थे.  (14)

हमने मनुष्य को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है : उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर  उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस अहसान का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तुने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर किया है ; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को भी अच्छा व नेक बना । मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (15)

 ऐसे ही लोगों के द्वारा किए गए कर्मों में से बेहतरीन कामों को हम क़बूल कर लेते हैं , और हम उनके बुरे कर्मों को (माफ़ करते हुए) उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं । वे जन्नतवालों में शामिल होंगे---- यह सच्चा वादा है जो उनसे किया जा रहा है . (16)

किन्तु एक आदमी है जो अपने माँ-बाप से कहता है, "उफ़्फ़! क्या आप सचमुच मुझे डरा रहे हैं कि मैं अपनी क़ब्र से ज़िंदा उठाया जाऊँगा, हालाँकि कितनी ही नस्लें हैं जो गुज़र चुकी हैं और मुझ से पहले जा चुकीं ?" उसके माँ-बाप अल्लाह से फ़रियाद करते हैं, और (बेटे से) कहते हैं  - "अफ़सोस है तुमपर! विश्वास करो ! निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है।" मगर तब भी वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की झूठी कहानियाँ हैं और कुछ नहीं।" (17)

 ऐसे सभी लोगों (की सज़ाओं) का फ़ैसला तय हो चुका है, और इनमें ऐसे सभी गिरोह शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके हैंचाहे वे जिन्न हों या इंसान : सचमुच वे बड़े घाटे में रहे.  (18)

 (अच्छे और बुरे) कर्मों के मुताबिक़ हर एक का दर्जा तय किया जाएगा और जो कुछ उन्होंने किया है, अल्लाह उन्हें उसका पूरा-पूरा बदला दे देगा : और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं होगा. (19)

 और एक दिन आएगा जब सच्चाई से इंकार करने वाले लोगों को (जहन्नम की) आग के सामने पेश किया जाएगा, और उनसे कहा जाएगा, "तुम अपने सांसारिक जीवन में अपने हिस्से की अच्छी चीज़ों को बेकार  [waste]कर चुके और उनका मज़ा ले चुके हो, अतः आज के दिन तुम्हें अपमानित करनेवाली सज़ा दी जाएगी:  क्योंकि तुम धरती पर बिना किसी अधिकार के घमंड करते रहे और तुमने (मर्यादा) की सभी सीमाएं तोड़ डालीं ।" (20)

[ऐ रसूल] आद के भाई [हूद अलै.] की चर्चा करें : जब उन्होंने (यमन में स्थित) रेत के टीलों के बीच बसने वाले आद के लोगों को सावधान किया, और ऐसा सावधान करने वाले उनसे पहले भी और उनके बाद भी कई आए और कई गुज़र चुके थे --- (सब एक ही बात कहते कि) , "अल्लाह को छोड़ कर किसी की उपासना न करो। मुझे तुम्हारे लिए डर है कि एक भयानक दिन में तुम्हें दंडित किया जाएगा ।" (21)

 मगर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको अपने देवताओं से अलग-थलग कर दो ?  तुम अगर अपनी बात में सच्चे हो, तो फिर ले आओ हम पर वह सज़ा जिसकी धमकी तुम हमें देते हो !" (22)

 हूद (अलै.) ने कहा, " यह तो केवल अल्लाह ही जानता है कि वह दिन कब आएगा : मैं तो तुम्हें बस वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है मगर मैं देख रहा हूँ कि तुम बड़े अक्खड़ व जाहिल लोग हो ।" (23)

 फिर जब उन लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आता हुआ देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसनेवाला है!', (हूद अलै. ने कहा), "नहीं !, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी : यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (24)

जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस नहस कर देगी।" (अगली सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था : अपराधियों को हम इसी तरह बदला देते हैं .  (25)

 [ऐ मक्का के लोगो !] हमने (आद की क़ौम के) लोगों को कुछ चीज़ों में ऐसी ताक़त व सलाहियत दे रखी थी, कि  वैसी ताक़त तुम्हें नहीं दी; हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे, इसके बावजूद न तो उनके कान, न उनकी आँखें और न उनके दिल ही उनके किसी काम आ सके, क्योंकि वे अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करते थे. जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी यातना ने उन्हें आ घेरा.  (26)

 हम तुम्हारे आस-पास बसी हुई दूसरे समुदायों की बस्तियों को भी तबाह-बर्बाद कर चुके हैं---- हमने उन्हें भी अपनी बहुत सारी निशानियाँ दी थीं, ताकि वे सही रास्ते पर वापस आ सकें---  (27)

 (वे कहते थे कि) अल्लाह से नज़दीकी हासिल करने के लिए उन लोगों ने कुछ देवताओं को अल्लाह के बजाए अपना भगवान बना लिया था, (अगर यह नज़दीकी वाली बात सच होती तो) फिर क्यों उनके देवताओं ने उनकी कोई मदद नहीं की ? बिल्कुल नहीं! बल्कि वे (देवता) उन्हें छोड़ कर ख़ुद ही चले गए : असल में यह एक झूठी बात थी जो ख़ुद उन्हीं लोगों ने गढ कर बना ली थी.  (28)

और याद करें [ऐ रसूल], जब हमने जिन्नों के एक समूह को आपके पास क़ुरआन को सुनने के लिए भेजा था, तो जब वे वहाँ पहुँच कर उसे सुनने लगे तो उन लोगों ने (एक दूसरे से) कहा,  "चुप हो जाओ!" फिर जब उस  (क़ुरआन) का पाठ पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर लौट गए और उन्हें (अल्लाह की ओर से) चेतावनियाँ दीं . (29)

 उन (जिन्नों) ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! हमने एक ऐसी किताब [क़ुरआन] सुनी है, जो मूसा(अलै. की तौरात) के बाद उतारी गई है, जो अपने से पहले उतारी गयी किताबों को सच्चा मानती है, और मार्गदर्शन करती है सच्चाई की तरफ़ और सीधे मार्ग की ओर.  (30)

(आगे कहा) ऐ लोगो! उसकी बात मान लो जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाता है. उस (अल्लाह) में विश्वास करो : अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा लेगा.”  (31)

और जो कोई अल्लाह की तरफ़ बुलानेवाले की बात नहीं मानता, तो वह धरती पर कहीं भी अल्लाह के क़ाबू से बच निकलनेवाला नहीं है और न कोई  अल्लाह से उसकी रक्षा करने वाला होगा : ऐसे लोग सचमुच रास्ता भटक कर दूर जा पड़े हैं ।(32)

 क्या इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] यह नहीं समझते कि वह अल्लाह जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, और जो ऐसा करने में ज़रा थका भी नहीं, उसमें इतनी ताक़त है कि वह मरे हुए लोगों को फिर से ज़िंदा कर दे? क्यों नहीं ! बेशक, हर एक चीज़ उसके क़ब्ज़े में है .  (33)

 और जिस दिन इंकार पर अड़े काफ़िरों को जहन्नम की आग के सामने लाया जाएगा, (और उनसे पूछा जाएगा), "क्या यह (जहन्नम) सचमुच असली नहीं है?" वे जवाब देंगे, " हमारे रब की क़सम! यह सचमुच असली है, " तब अल्लाह  कहेगा, "सच्चाई से इंकार करने के बदले में अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का! (34)

अत: [ऐ मुहम्मद] आप धैर्य से अपने काम पर जमे रहें !  जिस तरह (आप से पहले) पक्के इरादों वाले रसूलों[नूह, इब्राहीम,मूसा,ईसा] ने धैर्य से काम लिया था। आप उन [इंकार पर अड़े काफ़िरों] के लिए सज़ा माँगने में जल्दी न करें : जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसके बारे में उन्हें सावधान किया जाता था, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर से ज़्यादा (इस दुनिया में) नहीं ठहरे थे। यह एक (चेतावनी भरा) संदेश है । अब क्या कोई है जो बर्बाद होगा सिवा हर बात का विरोध करनेवाले बदमाशों के ? (35)


सूरह 51 : अज़ ज़ारियात [उड़ाकर बिखेर देनेवाली हवा, Scattering winds]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

क़सम है उन (हवाओं) की जो धूल-गर्द उड़ाकर दूर दूर तक फैला देती हैं; (1)
  फिर उनकी (क़सम) जो बारिश की बूंदों से लदे हुए बादल को उठाती हैं; (2) 
 फिर उनकी जो आसानी से तेज गति के साथ चलती रहती है; (3)
 
फिर उनकी जो बाँट देती हैं (बारिशों को) जैसा कि उन्हें हुक्म हुआ हो !   (4)
 बेशक, तुम (लोगों) से जिस [परलोक] का वादा किया जा रहा है, वह बिलकुल सच्चा है:   (5)

  (
कर्मों का) हिसाब-किताब और फ़ैसला ज़रूर हो कर रहेगा  (6) 

आसमान की क़सम जहाँ (तारों से भरे) रास्ते हैं  (7)

 
निश्चय ही तुम [लोग] (मरने के बाद के जीवन पर) अलग-अलग व परस्पर विरोधी बातों में पड़े हुए हो  (8)

 
इस [परलोक की हक़ीक़त] से जो लोग मुँह मोड़ते हैं, वे सच्चाई को समझने में (पूरी तरह) धोखा खा चुके हैं  (9)

 
तबाह हो जाएँ वे, (जो बिना किसी आधार के) यूँ ही अटकलें  लगाते व झूठी बातें बनाया करते हैं ; (10)

 
जो ग़फ़लत में ऐसे पड़े  हैं कि सब कुछ भुलाए बैठे हैं (11)

  (
व्यंग्य से) पूछते है, "फ़ैसले का दिन कब आएगा?" (12)

  (
कह दें) उस दिन आएगा जब वे (जहन्नम की) आग पर तपाए जाएँगे, (13)
 "चखो मज़ा अब अपनी सज़ा का! यही है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।" (14)

 
बेशक परहेज़गार लोग बाग़ों और (बहते हुए) पानी के स्रोतों में (मज़े) कर रहे होंगे (15)

 
उनका रब जो कुछ नेमत  उन्हें देगा, वे उसे(ख़ुशी-ख़ुशी) ले रहे होंगे, निस्संदेह वे इससे पहले के जीवन में अच्छे कर्म करने वाले  थे,  (16)
  रातों को कम ही सोते थे, (17)

  
भोर के समय इबादत करते थे और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते थे,  (18)

 
और उनके धन दौलत में माँगनेवाले और ठुकराए हुए लोगों का बाक़ायदा हिस्सा होता था (19)

 
और पक्का विश्वास रखनेवालों के लिए इस धरती पर बहुत-सी निशानियाँ हैं--  (20) 

 
और स्वयं तुम्हारे अपने आप में भी ! तो फिर भी क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता? (21)

 
और आसमान मे ही तुम्हारी रोज़ी [sustenance] है, और वह चीज़ [अंतिम फ़ैसला] भी, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है (22)

 
अतः क़सम है आकाश और धरती के रब की!  निश्चय ही यह बात ऐसी ही पक्की है जैसे तुम (अपने मुँह से) अभी बोल रहे हो  (23) 

 
[ऐ रसूल!] क्या आपने  इबराहीम(अलै.) के इज़्ज़तवाले  मेहमानों का क़िस्सा सुना है? (24) 

जब वे [फ़रिश्ते] इब्राहीम के पास आए तो "सलामकहा, (जवाब में इब्राहीम ने भी) सलामकहा,  (और मन में सोचा) "ये तो अपरिचित लोग हैं।" (25)
 
फिर वह जल्दी से अपने घरवालों के पास गए और एक मोटा-ताज़ा बछड़े (का भूना हुआ मांस) ले आए (26) 

और उसे मेहमानों के सामने पेश किया। कहने लगे, "क्या आपलोग  खाते नहीं?" (27) 

इससे इब्राहीम ने दिल में उनसे डर महसूस किया। उन लोगों ने कहा, "डरिए नहीं", और उन्हें एक लड़के[इसहाक़] के होने की ख़ुशख़बरी दी जो बड़े ज्ञानवाला होगा (28)

 
इस पर उनकी बीवी [सारा] चिल्लाती हुई वहाँ आयीं, और उन्होंने (चकित होकर व झेंपते हुए) अपने मुँह  पर हाथ मारते हुए कहा, "एक बूढ़ी बाँझ औरत ( बच्चा जनेगी!)!" (29) 

मेहमानों ने कहा, "ऐसा ही होगा, तेरे रब ने कहा है, निश्चय ही वह बड़ा हिकमतवाला[Wise], सब कुछ जाननेवाला है।" (30)
 
इब्राहीम ने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) फ़रिश्तो, आपलोगों के यहाँ (धरती पर) आने का क्या मक़सद है?" (31) 

 
उन्होंने कहा, "हमें कुछ अपराधी लोगों[लूत की क़ौम] के पास भेजा गया है; (32)

  "
ताकि हम उनके ऊपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ, (33)

 
जिनपर (गुनाहों की) सीमा पार कर जाने वालों के लिए आपके रब की तरफ से ख़ास निशान भी लगा होगा " (34) 

 
फिर ऐसा हुआ कि उस बस्ती में जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने वहाँ से बाहर निकाल लिया; (35) 

किन्तु हमने वहाँ केवल एक ही घर ऐसा पाया जिसमें रहनेवाले अल्लाह पर समर्पित थे  (36) 

इस तरह, हमने वहाँ (हमेशा के लिए) एक निशानी छोड़ दी, उन लोगों के लिए  जो दर्द्नाक यातना से डरते हों (37)

 
और मूसा(अलै.की घटना) में भी (ऐसी ही निशानियाँ है): हमने उन्हें फ़िरऔन के पास  स्पष्ट प्रमाण [Clear Authority] के साथ भेजा था, (38) 

किन्तु उस[फ़िरऔन]ने अपने सहायकों समेत सच्चाई से मुँह फेर लिया और (अपनी ताक़त के घमंड में) कहने लगा, (यह मूसा) "जादूगर है या कोई  दीवाना!" (39)

 
अन्ततः हमने उसे और उसकी सेना को धर-दबोचा और उन्हें समंदर में फेंक दिया: कि वह था भी इसी मलामत के लायक़ !  (40)
 
और आद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए निशानी है) जबकि हमने उनपर ज़िंदगी तबाह करनेवाली आँधी भेजी  (41) 

 
वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर कर के भूंसा बना डाला (42)

 
और समूद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए ऐसी ही निशानी है): जबकि उनसे कहा गया था, "थोड़े समय तक मज़े कर लो!" [न सुधरे तो तबाही आयेगी] (43)
 
किन्तु उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर एक धमाकेदार कड़क ने उन्हें आ दबोचा और वे देखते ही रह गए : (44)

 
हाल यह हुआ कि अपना बचाव करना तो दूर, वे तो खड़े तक न रह पाए  (45)

 
और इससे भी पहले, नूह की क़ौम को भी हमने अपनी पकड़ में ले कर तबाह किया था, निश्चय ही
वे गुनाहों में डूबे हुए लोग थे! (46) 

 
हमने अपनी ताक़त से आसमानों को बनाया  है और उसे बहुत विस्तार से फैलाया है (47)
 
और धरती को हमने(रहने के लिए) बिछा दिया--- तो क्या ही अच्छे ढंग से हमने इसे सँवारा और बिछाया है! (48) 

 
और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम [लोग] ध्यान दो और समझो 49) 

[
अतः ऐ रसूल, आप उन लोगों से कह दें कि], “अल्लाह की तरफ़ दौड़ो। यक़ीन करो, मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिए एक साफ़ साफ़ चेतावनी देनेवाला (बन कर) आया हूँ (50) 

और किसी भी दूसरे भगवान को अल्लाह के साथ बराबरी का न ठहराओ। मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक साफ़-साफ़ चेतावनी देनेवाला (बन कर) आया हूँ !” (51) 

इसी तरह, उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के पास भी जब कभी कोई रसूल आया तो उन्होंने भी (रसूलों को)  "जादूगर  या दीवाना कहा !" (52)

 
क्या उन्होंने एक-दूसरे को ऐसा कहने के लिए पहले से तय कर रखा था? नहीं !  बल्कि वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने हदें पार कर दी हैं (53)

 
अतः [ऐ रसूल] उनकी तरफ़ ध्यान न देंअब आपका कोई दोष नहीं (54) 

और (लोगों को) बराबर नसीहतें देते रहें, क्योंकि याद दिलाते रहना ईमानवालों के लिए अच्छा होता है (55)

 
मैंने तो जिन्नों और मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ही बन्दगी करें (56) 

 
मैं उनसे किसी तरह की रोज़ी(कमाई) नहीं चाहताऔर न यह चाहता हूँ कि वे मुझे(खाना) खिलाएँ (57)
  
 अल्लाह तो ख़ुद ही है रोज़ी देनेवाला, बेहद ताक़तवाला, सबसे मज़बूत! (58) 

अतः जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है और(उन जैसे) उनके साथी जो पहले गुज़र चुके हैं, उनके लिए  तो यातनाओं का हिस्सा तय किया हुआ है; इसलिए वे मुझसे जल्दी (यातनाओं) की माँग न करें! (59)

 
अतः (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के लिए उस दिन के कारण बड़ी खराबी होगी, जिसका उनसे वादा किया जा रह है (60)




         सूरह 88 : अल ग़ाशियह 
[छा जानेवाली घटना, The Overwhelming Event] 
  

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


1. क्या (ऐ रसूल!) आपको (हर चीज पर) छा जाने वाली घटना [क़यामत]  की खबर पहुंची है? o
 
2.
  उस दिन कितने ही चेहरे अपमानित और उतरे हुए होंगे o
 
3.
  (अल्लाह को भूल कर सांसारिक फायदे के लिये) मुसीबत झेलने वाले,  (कुछ दिन के ऐश व आराम की ख़ातिर) थका देने वाले परिश्रम करने वाले !  o
 
4.
  वे दहकती हुई आग में जा गिरेंगे o
 
5.
  (उन्हें) खौलते हुए स्रोत से (पानी) पिलाया जाएगा o
 
6.
  उनके लिए काँटेदार सूखी ज़हरीली झाड़ियों के अलावा कुछ खाना नहीं होगा o
 
7.
  (यह खाना) न बदन को मोटा [nourish] करेगा और न भूख ही मिटायेगा  o
 
8.
  (इसके विपरीत) उस दिन बहुत से चेहरे (हसीन) चमकते और खिले खिले होंगे o
 
9.
 (दुनिया में किए गए) अपने (नेक) प्रयासों के नतीजे में बहुत खुश होंगे o
 
10.
 आलीशान जन्नत में (ठहरे) होंगे o
 
11.
 इसमें कोई बेकार और व्यर्थ बात न सुनेंगे (जैसे लोग उनसे दुनिया में  किया करते थे) o
 
12.
 उस जन्नत में बहते हुए चश्मे [सोता, spring] होंगे o
 
13.
 इसमें ऊँचे (बिछे हुए) तख्त होंगे o
 
14.
  और प्याले (बड़े करीने से) सामने रखे हुए होंगे o
 
15.
 और गाओ तकिये लाइन से लगे होंगे o
 
16.
  और (मुलायम व नफीस [refined]) कालीनें बिछी होंगी o
 
17.
  (अविश्वासी लोग आश्चर्य करते हैं कि जन्नत में सब कुछ कैसे बन जाएगा! तो) क्या यह लोग ऊँट की ओर नहीं देखते कि वह किस तरह (अजीब ढाँचे का) पैदा किया गया है ? या क्या अविश्वासी लोग बारिश से भरे हुए बादलों को नहीं देखते कि वे कैसे तैयार होते हैं ?  o
 
18.
  और आसमान की तरफ (नज़र नही डालते कि) वह कैसे (ज़बरदस्त विस्तार के साथ) उठाया गया है?  o
 
19.
  और पहाड़ों को (नहीं देखते) कि कैसे (ज़मीन से उभार कर) खड़े किए गए हैं ? o
 
20.
  और पृथ्वी को (नहीं देखते) कि कैसे (गोलाई के बावजूद) बिछाई गई है? o
 
21.
  इसलिये (ऐ रसूल!) आप चेतावनी देते रहिए :  आप तो नसीहत ही करने वाले हैं o
 
22.
  आप उन लोगों पर दारोग़ा (की तरह) थोपे तो नहीं गये हैं (कि लोगों को ईमान लाने पर मजबूर करें)o
 
23.
 मगर जिस किसी ने मुँह मोड़ा और विश्वास करने से इंकार किया o
24.
 तो उसे अल्लाह सबसे बड़ा अज़ाब (यातन) देगा o
 
25.
 बेशक (अंतत:) हमारी ही पास उन सबको लौट कर आना है o
 
26.
 फिर बेशक उनका हिसाब लेने की जिम्मेदारी हमारी है o
































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