Chronological Quran : 13th Year of Revelation
[July 27, 621 AD --- July 15, 622 AD]
क़ुरआन- कालक्रम के अनुसार : तेरहवें वर्ष में उतरी आयतें
[1 मुहर्रम/ 1 हिजरी पूर्व----- 29 ज़ुल हिज्जा/ 1 हिजरी पूर्व]
सूरह 82 : अल इंफ़ितार [Torn Apart]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. जब आसमान फट जायेगा o
2. जब तारे (और ग्रह ) गिर कर बिखर जाएंगेo
3. और जब समुद्र (और नदी) फूट कर बह जाएंगे o
4. जब कब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे) o
5. तो हर आदमी जान लेगा कि क्या (अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब) उसने आगे भेजा और (क्या अच्छे बुरे कर्म) पीछे छोड़ आया (जो वह नहीं कर सका) o
6. ऐ इंसान! तुझे किस चीज़ ने अपने उदार रब के बारे में धोखे में डाल रखा है ?o
7. जिसने तुझे पैदा किया, फिर उसने तुझे (ढाँचा और अंग बनाने के लिए ) ठीक ठाक किया, फिर तेरी संरचना में सही अनुपात में बदलाव लाया o
8. जिस रूप में भी चाहा, उसने तुझे जोड़ कर तैयार कर दिया o
9. (ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए, फिर भी) तुम उस फैसले के दिन को झूट जानते हो o
10. हालांकि तुम पर निगरानी रखनेवाले फरिशते निर्धारित हैं o
11. (जो) बहुत सम्मानित हैं , (तुम्हारे कर्मों का लेखा-जोखा) लिखते रहते हैं o
12. वह उन (सभी कार्यों) को जानते हैं जो तुम करते हो o
13. बेशक अच्छे कर्म करनेवाले
(जन्नत की) नेमतों में होंगे o
14. और बेशक बुरे कर्मवाले जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में होंगे o
15. वह इसमें फैसले के दिन [ क़यामत] दाखिल होंगे o
16. और वह इस (नरक) से (कभी भी) बाहर नहीं जा सकेंगे o
17. और आपने क्या समझा कि फैसले का दिन क्या है o
18. फिर आपको क्या मालूम कि फैसले का दिन क्या है o
सूरह 84 : अल इंशिक़ाक़ [Ripped Apart]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. जब आसमान फट जाएगा o
2. और वह [आसमान] अपने रब के आदेश का पालन करेगा और यही (आदेश का पालन करना) उसके लिये उचित होगा
3. जब पृथ्वी (चूर चूर करके) फैला दी जाएगी o
4. और जो कुछ उसके अंदर है उसे बाहर फेंक देगी और खाली हो जाएगी o
5. और (वह भी) अपने रब के आदेश का पालन करेगी और (यही आज्ञापालन) उसके लिये उचित होगा, (वही तुम्हारे रब के सामने हाज़िर होने का दिन होगा) o
6. ऐ इंसान! तू अपने रब तक पहुंचने में (ज़िंदगी भर) भारी परेशानी उठाता रहता है और अंतत: तू उसी (रब) से जा मिलेगा o
7. तो जिस व्यक्ति के कर्मों का हिसाब उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा o
8. तो उससे आसान सा हिसाब लिया जाएगा o
9. और वह अपने परिवार के सदस्यों की तरफ खुशी खुशी लौटेगा o
10. और रहा वह व्यक्ति जिसके कर्मों का हिसाब उसकी पीठ के पीछे से (बायें हाथ में) दिया जाएगा o
11. तो वह जल्द ही अपनी मौत को पुकारेगा o
12. और वो जहन्न्म (नरक) की भड़कती हुई आग में जा पड़ेगा o
13. बेशक वह (दुनिया में) अपने परिवार के साथ हँसी खुशी रहता था o
14. बेशक उसको ऐसा लगता था कि ज़िंदगी के हिसाब किताब के लिए (अल्लाह के सामने) वह कभी लौट कर नहीं जाएगा o
15. क्यों नहीं!(ज़रूर लौटेगा!) बेशक उसका रब उसको खूब देख रहा था o
16. सो मुझे क़सम है शफ़क़ (यानी शाम की लाली या इसके बाद के उजाले) की o
17. और रात की और उन चीजों की जिन्हें वह (अपने दामन में) समेट लेती है o
18. और चांद की जब वह पूरा दिखाई देता है o
19. (कि अपने रब के सामने पेशी के लिए) तुम निश्चित ही (जीवन के) एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक [बचपन, जवानी, अधेड़ उम्र, बुढापा] इसी तरह से चढते जाओगे o
20. तो उनलोगों को क्या हो गया है कि (कुरआन के भविष्यवाणी की सच्चाई देख कर भी) विश्वास नहीं करते o
21. और जब उनके सामने कुरआन पढ़ा जाता है तो (अल्लाह के सामने ) घुटने (सजदे में) नहीं
टेकते o
22. बल्कि काफ़िर लोग (क़ुरआन को और ज्यादा) झुठला रहे हैं o
23. और अल्लाह (कुफ़्र व बैर के सामान को) खूब जानता है जिसे इन लोगों ने अपने अंदर जमा कर रखा है o
24. सो आप उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़ुश्ख़बरी सुना दें o
25. हाँ उनलोगों के लिए जो लोग ईमान लाए [विश्वास रखनेवाले] और अच्छे कर्म किए तो उनको ऐसा सवाब [पुण्य, reward] मिलेगा जो कभी ख़त्म ना होगा o
सूरह 30 : अर रुम [पूर्वी रोमन साम्राज्य, The Byzantines]
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
(1)
कुछ ही साल [3 - 9 वर्ष] की अवधि में (रोम की सेना की जीत होगी) --- हर मामले में अल्लाह ही को
पूरा अधिकार है, पहले भी और आख़िर में भी। और उस दिन ईमानवाले अल्लाह की मदद से होनेवाली (रोमियों की
फ़ारस पर) जीत की ख़ुशियां मनाएंगे । (4)
यह अल्लाह का
वादा है : और अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है। मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं
जानते : (6)
वे तो इस
सांसारिक जीवन के केवल बाहरी रूप को ही जानते हैं। किन्तु आने वाली दुनिया
[आख़िरत] के बारे में वे बिलकुल ही अनजान बने हुए हैं। (7)
क्या उन्होंने
ख़ुद अपने बारे में सोच-विचार नहीं किया? अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है, उन्हें बिना किसी ख़ास मक़सद के और बिना एक तय की हुई अवधि के , यूँ ही नहीं पैदा कर दिया है , मगर फिर भी, सचमुच बहुत-से लोग इस बात को मानने से इंकार करते
हैं कि उन्हें (एक दिन) अपने रब के सामने जाना होगा। (8)
क्या वे ज़मीन पर यहाँ वहाँ
चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का क्या अंजाम हुआ जो उनसे पहले वहां रहते थे? वे ताक़त
में इन लोगों से कहीं अधिक ज़ोर रखते थे : उन्होंने धरती में खेतों की अधिक जुताई
की थी और उस पर बस्तियों के निर्माण भी कहीं अधिक किए थे। उनके पास भी उनके रसूल
साफ़ साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे : (मगर उन्होंने सच्चाई को न माना और तबाह हुए) सो
अल्लाह तो ऐसा न था कि उनपर ज़ुल्म करता, किन्तु वे स्वयं ही अपने आप पर
ज़ुल्म करने वाले थे. (9)
बाद में शैतानी करने वाले लोगों
का अंजाम बहुत बुरा हुआ, क्योंकि
उन्होंने अल्लाह की आयतों को झूठ माना और उनकी (बराबर) हंसी उड़ाते रहे. (10)
अल्लाह ही सृष्टि कर के जीवन की
शुरुआत करता है , फिर वही
उसको दोबारा पैदा करेगा, और
फिर उसी की ओर तुम्हें लौट कर जाना होगा. (11)
उनलोगों ने जिनको
(शक्ति में) अल्लाह के बराबर का साझीदार [Partners] मान रखा था, उनमें से कोई भी उनके लिए सिफ़ारिश करनेवाला न
होगा---- और वे स्वयं ही इन (झूठे) साझीदारों को मानने से इंकार कर देंगे (13)
किन्तु जिन लोगों
ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया था और हमारी आयतों [संदेशों] को और आनेवाली
दुनिया [आख़िरत] में हमारे सामने होने वाली पेशी को झूठ जाना था, वे सज़ा के लिए वहां पकड़ कर लाए जाएँगे (16)
और आसमानों और
ज़मीन में सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं , __सो (अल्लाह का गुणगान करो) तीसरे पहर सूरज ढलने के समय भी और दोपहर में भी.
(18)
वह बेजान चीज़ से
जीवित चीज़ को निकाल लाता है और जीवित चीज़ से बेजान चीज़ को निकाल लाता है । वह मुर्दा पड़ी हुई धरती में (बारिश के द्वारा) फिर से
जान डाल देता है, इसी तरह तुम भी (क़ब्रों से ज़िंदा) निकाले जाओगे। (19)
यह उसकी
निशानियों में से है कि उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया___और फिर देखते देखते तुम आदमी बन गए , और धरती पर दूर दूर तक फैल गए। (20)
और यह भी उसकी
निशानियों में से है कि उसने तुम्हीं लोगों में से तुम्हारे लिए (मर्द-औरत के रूप
में) जोड़े पैदा कर दिए, ताकि तुम उनके साथ शान्ति व सुकून से रह सको : और
उसने तुम्हारे बीच आपस में प्रेम और दया का भाव पैदा कर दिया। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है जो सोच-विचार
करते हैं . (21)
उसकी एक और
निशानियों में से है आसमानों और ज़मीन को बनाना, और उसमें पायी जानेवाली विविधता -- तुम्हारी भाषाओं की और तुम्हारे (शरीर के)
रंगों की। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं जो जानकारी रखते
हैं. (22)
और उसकी
निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन के समय का सोना, और (रोज़ी के लिए) उसके फ़ज़ल[bounty] की तलाश करना भी
है। सचमुच ही इसमें निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सुनना चाहते हों. (23)
और उसकी
निशानियों में से यह भी है कि वह तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है जिससे डर भी लगता
है और उम्मीद भी जागती है ; और वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे मुर्दा पड़ी हुई
ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है । सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के
लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं . (24)
और उसकी
निशानियों में से यह भी है कि आसमान और ज़मीन उसके आदेश से मज़बूती से जमे हुए हैं ।
आख़िर में, जब वह तुम्हें एक बार ज़मीन से पुकारेगा, उसी वक़्त तुम सब (उसकी ओर) निकल पड़ोगे. (25)
वही(अल्लाह) है
जो सृष्टि की पहली बार रचना करता है। फिर वही उसको दोबारा बना देगा---- और यह उसके
लिए पहले से ज़्यादा आसान होगा. वह आसमानों और ज़मीन में किसी भी तरह की तुलना से
परे है ; वह सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और ज्ञानवाला है . 27)
वह तुम्हें एक
उदाहरण देता है, जो ख़ुद तुम्हारी ज़िंदगी से लिया गया है : जो कुछ माल
हम ने तुम्हें दे रखा है, क्या तुम अपने ग़ुलाम को (अपने माल में) बराबर- बराबर
का हिस्सेदार [Partner] बना सकते हो ? क्या तुम उनसे (बिना पूछे ख़र्च करने से पहले) ऐसे ही डरोगे जैसे आपस में (अपने
हिस्सेदारों से) डरते हो? इसी तरह से हम
अपने संदेशों[आयतों] को उन लोगों के लिए साफ़ व स्पष्ट रूप से पेश करते हैं जो
समझ-बूझ से काम लेते हैं । (28)
और तब भी (सच्चाई
से) इंकार करनेवाले [बहुदेववादी, Idolaters] बिना (सच्चाई की)
जानकारी के अपनी इच्छाओं के पीछे भागते फिरते हैं। मगर जिसे अल्लाह ही भटकता छोड़
दे, उसे कौन मार्ग दिखा सकता है ? कोई नहीं होगा जो
इनकी मदद कर सके. (29)
अतः [ऐ रसूल]
पक्के ईमानवाले होने के नाते, अपने मज़हब [दीन]
पर पूरी भक्ति से मज़बूती के साथ जमे रहें. यह एक प्राकृतिक स्वभाव [फ़ितरत] है जिसे
अल्लाह ने हर आदमी में डाल कर पैदा किया है--- अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली
नहीं जा सकती--- यही सीधा व सही धर्म है, किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं हैं । (30)
तुम सब, पूरी भक्ति से(तौबा के लिए) केवल उसी की ओर झुका करो। तुम्हें हर समय उसी का
ध्यान [तक़वा] होना चाहिए ; नमाज़ को पाबंदी से पढ़ा करो; और उनलोगों के साथ शामिल न हो जाओ जो अल्लाह के साथ उसका साझीदार [partner] ठहराते हैं, (31)
या
जिन्होंने अपने मज़हब (धर्म) को कई फ़िरक़ों [sects] में बाँट दिया, हर फ़िरक़े के पास जो कुछ है, उसी में ख़ुश और मगन है. (32)
और जब लोगों को
कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वे अपने रब को पुकारते हैं और मदद के लिए
उसी की ओर झुकते हैं, मगर जैसे ही वह उन्हें अपनी दयालुता का रस चखाता
है--- तो क्या देखते हैं कि --- उनमें से कुछ लोग अचानक(किसी और को) अपने रब का
साझीदार [partners] ठहराने लगते है़ं, (33)
और (ऐसा लगता है
कि) जो कुछ हमने उन्हें दिया था, उसके बदले में वे
जान-बूझ कर शुक्र तक अदा करना नहीं चाहते। "अच्छा तो मज़े उड़ा लो, जल्द ही तुम्हें पता चल जाएगा ! " (34)
या क्या हमने उन
पर ऐसा कोई प्रमाण उतारा है जो अल्लाह के साथ (किसी को) साझीदार ठहराने की अनुमति
देता हो ? (35)
और हम जब लोगों
को अपनी रहमत का मज़ा चखने देते हैं, तो वे उस पर बहुत ख़ुश हो जाते हैं, मगर जब उनके साथ कोई बुरी घटना घट जाती है ----और वह भी उन्हीं के करतूतों के
कारण--- तो वे बहुत जल्द पूरी तरह निराश हो जाते हैं. (36)
क्या वे नहीं
देखते कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा-चढ़ा कर देता है और (जिसके लिए
चाहता है) रोज़ी को घटा देता है? सचमुच इसमें उन
लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान रखते हैं. (37)
अतः रिश्तेदार को, ज़रूरतमंद को और (ग़रीब) मुसाफ़िर को उनका हक़ देते रहो---- यह उनके लिए बेहतर है
जिनका मक़सद अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना हो : यही वह लोग हैं जो कामयाब होंगे.
(38)
जो कुछ क़र्ज़ तुम
ब्याज पर देते हो, ताकि लोगों के धन के ज़रिये तुम्हारी सम्पत्ति बढ़ जाए, तो वह अल्लाह की नज़रों में नहीं बढ़ती ; मगर अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने की इच्छा से जो कुछ तुम दान (ज़कात) में देते
हो, तो बदले में (अल्लाह के यहाँ) तुम कई गुना इनाम कमा लोगे. (39)
वह अल्लाह है
जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें रोज़ी दी, वह तुम्हें मौत भी देगा और उसके बाद तुम्हें दोबारा जीवित करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए (अल्लाह के) साझीदारों[Partners] में से कोई भी है जो इनमें से एक काम भी कर सके? महान है अल्लाह, और वह उनसे बहुत ऊँचा व बड़ा है जिन्हें वे (अल्लाह
का) साझीदार मानते हैं. (40)
लोगों के ग़लत
कामों के चलते थल [land] और जल [sea] में बिगाड़ [फ़साद, corruption] पैदा हो गया है, और अल्लाह उनके कुछ बुरे कामों के नतीजे में उन्हें अपनी सज़ा का मज़ा चखाएगा, ताकि वे उन (बुरे कामों) से अपने को रोक सकें. (41)
कह दें, "धरती में यहाँ- वहाँ चल-फिरकर देखो कि जो लोग तुमसे पहले गुज़रे हैं, उन लोगों का अंत किस तरह हुआ-- --- उनमें अधिकतर बहुदेववादी[Idolaters] ही थे।" (42)
अतः [ऐ रसूल] आप
एक सच्चे व सही मज़हब की भक्ति में मज़बूती से जमे रहें, इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसे टाला न जा सके। उस दिन, मानव जाति को अलग-अलग बाँट दिया जाएगा : (43)
जिन लोगों ने
सच्चाई (को मानने) से इंकार किया था तो उनको इंकार करने का नतीजा भुगतना होगा, और जिन लोगों ने अच्छे कर्म किए थे तो उन्होंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली
होगी . (44)
अल्लाह अपने फ़ज़ल
[bounty] से उन लोगों को इनाम देगा जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए ; निश्चय ही वह उन्हें पसंद नहीं करता जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं ।
(45)
और अल्लाह की
निशानियों में से यह (भी) है कि वह (वर्षा की) ख़ुशख़बरी सुनानेवाली हवाएँ भेजता है, ताकि तुम उसकी रहमत[grace] का मज़ा उठा सको, और उसके हुक्म से (हवा के द्वारा) पानी में नौकाएं चल सकें, और तुम (उसमें यात्रा करके) अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको. (46)
[ऐ रसूल] आपसे पहले, हम हर रसूल को उनकी अपनी क़ौमों के पास भेज चुके हैं :
वे उनके पास साफ़ व स्पष्ट प्रमाण लेकर आए, (मगर वे न माने) और उसके बाद, हमने शैतानी
करनेवालों को दंड दिया. मगर ईमानवालों की मदद करना तो हमारा कर्तव्य बनता है.
(47)
अल्लाह ही है जो
हवाओं को भेजता है; फिर वे बादलों में हलचल मचा देती हैं; फिर वह जिस तरह चाहता है उन बादलों को आसमान में फैला देता है; फिर उन परतोंवाली घटाओं के टुकड़े कर देता है और तब तुम देखते हो कि उनके बीच
से बारिश की बूँदें टपकी चली आती हैं। वह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है, पानी बरसाता है, और जब ऐसा होता है तो देखो कि कैसे वे ख़ुशियाँ मनाने
लगते हैं, (48)
अब ज़रा देखो, अल्लाह की दयालुता की निशानियाँ! वह किस तरह से मुर्दा पड़ी हुई धरती में फिर
से एक नई जान डाल देता है : वही अल्लाह मुर्दा पड़े हुए लोगों को भी (उसी
तरह) फिर से ज़िंदा कर देगा---- और तमाम चीज़ें उसी के क़ब्ज़े में हैं. (50)
अगर हम एक (जला देनेवाली गर्म) हवा भेज दें, जिसके नतीजे में वे अपनी फ़सल को पीली पड़ी हुई देखे लें, तब भी वे विश्वास नहीं करने पर अड़े रहेंगे . (51)
अतः [ऐ रसूल] आप मुर्दों को अपनी बात नहीं सुना सकते
और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं , जबकि वे पीठ फेरे चले जा रहे हों ; (52)
और न आप अंधों को ग़लत रास्ते से फेरकर सही मार्ग पर
ला सकते हैं : आप तो केवल उन्हीं को अपनी बात सुना सकते हैं जो हमारी आयतों
मॆं विश्वास रखते हैं और पूरी भक्ति के साथ (हमारे सामने) झुकते हैं। (53)
वह अल्लाह ही है जिसनें तुम्हें कमज़ोर पैदा किया, फिर कमज़ोरी के बाद तुम्हें ताक़त दी, ताक़त के बाद (बुढ़ापे में) फिर से कमज़ोरी दी और तुम्हारे बाल पक गए : वह
जो कुछ चाहता है पैदा करता है, वह सब जाननेवाला, हर चीज़ पर क़ाबू रखनेवाला है. (54)
जिस दिन वह
(क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, गुनाहगार लोग क़समें खाएँगे कि वे (क़ब्रों में) घड़ी
भर से अधिक नहीं ठहरे----(सचमुच) वे दुनिया में हमेशा से ही धोखे में पड़े रहे थे
----(55)
किन्तु जिन लोगों
को ज्ञान और ईमान दिया गया था, वे कहेंगे, "अल्लाह के लिखे हुए रिकार्ड के मुताबिक़ तो तुम असल में ‘दोबारा उठाए जाने के दिन’ तक (दुनिया में)
ठहरे रहे थे : यही तो है ‘ज़िंदा उठाए जाने का दिन’ [Day of
Resurrection], मगर तुम तो समझते ही नहीं थे।" (56)
उस दिन शैतानी
करनेवालों के कोई भी बहाने उनके किसी काम न आएंगे : उन्हें (अपनी ग़लतियों में)
सुधार करने का कोई मौक़ा नहीं दिया जाएगा. (57)
हमने इस क़ुरआन
में लोगों के सामने हर क़िस्म की मिसालें पेश कर दी हैं, इसके बावजूद अगर [ऐ रसूल] आप इनके सामने कोई चमत्कार भी ला कर दिखाएं, तब भी विश्वास न करनेवाले यही कहेंगे, "तुम तो बस झूठ गढ़ते हो।" (58)
सूरह 29 : अल अंकबूत [मकड़ी, The Spider]
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क्या लोगों ने यह समझ रखा
है कि वे इतना कह देने मात्र से छोड़ दिए जाएँगे कि "हम ईमान लाए" और उनकी
परीक्षा नहीं ली जाएगी? (2)
वे लोग जो इनसे पहले
गुज़र चुके हैं, हमने उन सब लोगों की भी
परीक्षा ली थी: बेशक, अल्लाह उनकी पहचान ज़रूर
कर लेगा, कि कौन लोग हैं जो सच्चाई
पर हैं, और कौन हैं जो झूठे हैं. (3)
क्या बुरे कर्म करनेवाले
ऐसा सोचते हैं कि वे हम से बच कर निकल जाएँगे? (अगर हाँ), तो क्या ही ग़लत अंदाज़ा
है उनका! (4)
मगर, वे लोग जो अल्लाह से जा मिलने की उम्मीद में
लगे रहते हैं, तो वह यक़ीन रखें कि
अल्लाह का तय किया हुआ समय तो ज़रूर आकर रहेगा; और वही हर चीज़ का सुननेवाला, जाननेवाला है. (5)
और जो लोग (अल्लाह के
रास्ते में) संघर्ष करते हैं, तो वे ऐसा अपने ही फ़ायदे
के लिए करते हैं---- निश्चय ही अल्लाह को अपनी सृष्टि में किसी की भी ज़रूरत नहीं
है----- (6)
और जो लोग (एक अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो हम ज़रूर उनके बुरे कर्मों को(उनके
रिकार्ड से) मिटा देंगे, और उनके बेहतरीन कर्मों
के मुताबिक़ उन्हें बदले में इनाम देंगे. (7)
और हमने लोगों को यह आदेश दिया है कि वे अपने माँ-बाप के
साथ अच्छा सलूक करें. किन्तु अगर तुम्हारे
माँ-बाप तुमपर ज़ोर डालें कि तुम मेरे सिवा, किसी ऐसे (देवता) को मेरे बराबर का ठहराओ, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानो : तुम्हें मेरी ही पास
लौट कर आना होगा, फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम ने किया होगा. (8)
जो लोग ईमान लाए और वे अच्छे कर्म करते रहे, तो हम उन्हें अवश्य ही नेक लोगों के दर्जे
में शामिल करेंगे. (9)
लोगों में कुछ ऐसे
हैं जो यह कहते है कि "हम अल्लाह में विश्वास रखते हैं," मगर, जब अल्लाह के रास्ते में उन्हें कोई तकलीफ़
पहुँचती है, तो
वे लोगों की दी हुई सख़्त तकलीफ़ को अल्लाह की दी हुई सज़ा समझ बैठते हैं---- फिर भी, आप के रब की तरफ़ से [ऐ रसूल] जब आपको कोई मदद पहुँचती है, तो वे कहते हैं, "हम तो हमेशा से तुम्हारे
साथ हैं।" क्या जो कुछ दुनियावालों के सीनों में छिपा है, उसे अल्लाह भली-भाँति नहीं जानता? (10)
अल्लाह ज़रूर उन लोगों को पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो
सचमुच ईमान रखते हैं, और कौन लोग हैं जो ढोंगी
[मुनाफ़िक़, Hypocrite] हैं. (11)
जो लोग (सच्चाई में)
विश्वास नहीं रखते, वे ईमानवालों से कहते
हैं, "तुम हमारे मार्ग पर चलो
और हम तुम्हारे गुनाहों (के नतीजे) को झेलने के लिए तैयार रहेंगे, " हालाँकि वे ऐसा करनेवाले तो हैं नहीं--- सचमुच वे बिल्कुल झूठे हैं. (12)
वे अपने(गुनाहों का) बोझ
अवश्य ही उठाएँगे, और इसके साथ दूसरों के
(बोझ भी) : क़यामत के दिन उनके झूठे व फ़र्ज़ी दावों के बारे में ज़रूर पूछताछ होगी .
(13)
हमने नूह[Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा। वह पचास कम
एक हजार साल[950 साल] उनके बीच रहे, मगर जब तूफ़ानी बाढ ने उन्हें घेर लिया, तब तक वे शैतानियों में लगे हुए थे. (14)
फिर हमने उन्हें और उनके साथ नौका में सवार लोगों को बचा लिया, और उस(घटना)को सारी दुनिया के लिए एक निशानी बना दिया. (15)
और हम ने इब्राहीम[Abraham]को भी भेजा, उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह की बन्दगी करो, और उसको हर समय अपने ध्यान में रखो : यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम सचमुच समझ पाते. (16)
तुम अल्लाह को छोड़ कर
जिसे पूजते हो वे तो बस मूर्तियाँ हैं; और जो तुम गढते रहते हो, वे झूठी बातों के सिवा
कुछ नहीं है । तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो वे तुम्हें रोज़ी देने का कोई
अधिकार नहीं रखते, अतः तुम अल्लाह से ही
रोज़ी मांगा करो, उसी की बन्दगी करो, और उसका शुक्र अदा करो : तुम सभी को उसके
पास लौटकर जाना होगा. (17)
और अगर तुम कहते हो कि यह बातें झूठी हैं (तो सावधान किया
जाता है कि) तुमसे पहले भी कितने ही समुदायों ने इसे झूठ ही बताया था । रसूल पर तो
बस यही ज़िम्मेदारी है कि वह साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से(अल्लाह के संदेश द्वारा) सचेत
कर दे।" (18)
क्या वे नहीं देखते कि अल्लाह किस तरह किसी चीज़ को(पहली
बार) पैदा करता है, और फिर उसको दोबारा भी
बना देता है ? सचमुच यह अल्लाह के लिए
बेहद आसान है. (19)
कहें कि, "धरती के बड़े हिस्सों में
घूमो-फिरो और देखो कि किस तरह अल्लाह ने सृष्टि की रचना की है : और अगले जीवन में
भी वह इसी तरह उन्हें (दोबारा) पैदा कर देगा । निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ की
ताक़त है. (20)
तुम न तो धरती पर उससे बच कर निकल सकते हो, और न आसमानों में; और अल्लाह को छोड़कर कोई न होगा जो तुम्हें
बचा सके या तुम्हारी मदद कर सके.” (22)
और जिन लोगों ने अल्लाह
की उतारी गयी आयतों [Revelations] को और उससे जा मिलने की
बात को मानने से इंकार किया, उन्हें मेरी तरफ़ से दया
किए जाने की कोई आशा नहीं : उन्हें बड़ी दर्दनाक यातना होगी । - (23)
इब्राहीम[Abraham] की क़ौम के लोगों ने
जवाब में बस इतना ही कहा था " मार डालो या जला डालो!” मगर
अल्लाह ने इब्राहीम को (नमरूद की लगायी हुई) आग से बचा लिया : विश्वास रखनेवालों
के लिए सचमुच इस (घटना) में (सीखने के लिए) निशानियाँ हैं. (24)
इब्राहीम ने उनसे कहा, "अल्लाह को छोड़कर तुमने मूर्तियों को (ख़ुदा) चुना है (ताकि
तुम्हारे दोस्त ख़ुश रहें), मगर उनसे यह तुम्हारा
मेल-मिलाप केवल इसी सांसारिक जीवन तक ही चल पाएगा : क़यामत के दिन, तुम एक-दूसरे को दोस्त मानने से इंकार करोगे
और एक-दूसरे को बुरा भला कहोगे। जहन्नम(की आग) ही तुम्हारा ठिकाना होगा और
तुम्हारी मदद करनेवाला कोई न होगा।" (25)
लूत[Lot] ने उन [इब्राहीम] में विश्वास किया, औऱ कहा, "(सुदोम की तबाही के बाद) जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए, मैं यहाँ से उसी जगह जा रहा हूँ: बेशक अल्लाह
सबसे प्रभुत्वशाली और ज्ञानी है।" (26)
हमने इब्राहीम को इसहाक़[Isaac] और याक़ूब[Jacob] (जैसी औलाद) दी, और उसकी संतानों में (कई लोगों को) पैग़म्बरी[Prophethood] अता की और (कई आसमानी) किताबें उनपर उतारीं.
हमने बदले में उसे इस संसार में भी इनाम दिए और आने वाली दुनिया [परलोक] में भी वह
बेशक नेक बंदों में शामिल होगा. (27)
और(याद करें) लूत को : जब
उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा,
"तुम ऐसे बेशर्मी के[अश्लील] काम में लगे रहते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले कभी किसी ने नहीं
किया. (28)
किस तरह तुम (मर्द लोग) मर्दों के पास (सेक्स की इच्छा से)
जाते हो, यात्रियों का रास्ता रोक
कर ज़ोर-ज़बरद्स्ती करते हो और अपने समारोहों में भद्दी हरकतें करते हो?" इस बात पर उसकी क़ौम के
लोगों का उत्तर बस यही था, " तुम जो कहते हो वह अगर सच
है, तो ले आओ हम पर अल्लाह की यातना! " (29)
तो लूत ने दुआ की, "ऐ मेरे रब! (समाज में) बिगाड़ पैदा
करनेवाले लोगों के मुक़ावले में मेरी मदद कर।"(30)
हमारे भेजे हुए(फ़रिश्ते) जब इब्राहीम के पास (उसके यहाँ
बेटा होने की) ख़ुशख़बरी लेकर आए थे, तब उन्होंने(इब्राहीम को) बताया, "हम उस(लूत के लोगों की) बस्ती[सुदोम] को बर्बाद करनेवाले हैं।
निस्संदेह उस बस्ती के लोग शैतानी करनेवाले हैं।" (31)
इब्राहीम ने कहा, "मगर वहाँ तो लूत मौजूद हैं।" फ़रिश्तों ने जवाब दिया, " वहाँ कौन रहता है, यह बात हम आप से ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं।
हम उसको और उसके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय उसकी पत्नी के: वह उनलोगों में शामिल होगी जो पीछे
छूट जाते हैं।" (32)
फिर जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह उनके वहाँ आने के मक़सद को सुनकर परेशान
और दुखी हो गया। फ़रिश्तों ने कहा,
"आप डरें नहीं और न दुखी हों : हम आपको और आपके घरवालों को ज़रूर बचा
लेंगे, सिवाय आपकी पत्नी
के----- वह उनलोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं ---- (33)
निश्चय ही हम इस बस्ती के लोगों पर आसमान से एक भयानक यातना
उतारनेवाले हैं, इस कारण कि वे बुरे
कर्मों में लगे हुए हैं।" (34)
हमने उस बस्ती के कुछ हिस्से (खंडहर) एक साफ़ निशानी के
रूप में वहाँ छोड़ दिए, उनलोगों के लिए जो बुद्धि
से काम लेते हैं. (35)
और मदैन [Midian] की तरफ़ हम ने उनके भाई शुऐब
को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की इबादत (उपासना) करो, और आने वाले अंतिम दिन[क़यामत] के बारे में
सोचो. शैतानियाँ न करो और धरती
में बिगाड़ मत फैलाओ।" (36)
मगर उन्होंने उसे झूठा
कहा और अन्ततः भूकम्प ने उन्हें दबोच लिया। जब सुबह हुई, तो वे सब अपने घरों में मरे पड़े थे. (37)
और (याद करो)आद और समूद की
क़ौम को : (उनकी बर्बादी की कहानी) उनके घरों के बचे हुए खंडहरों को देखकर तुम साफ़
तौर से समझ चुके हो। शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए सुहाना बना कर पेश
किया और उन्हें सीधे मार्ग से रोक दिया, हालाँकि वे समझ बूझ वाले लोग थे. (38)
और(याद करें) क़ारून[Korah] और फ़िरऔन[Pharaoh] और हामान को : मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ
लेकर आए, किन्तु उन्होंने धरती पर
बड़े घमंड से काम लिया. मगर वे हमसे बच कर नहीं निकल सकते थे(39)
और अन्ततः हमने हरेक को उसके गुनाहों के कारण दंड दिया :
उनमें से कुछ पर तो हमने पत्थर बरसानेवाली भयानक आँधी भेजी; कुछ को अचानक हुई एक ज़ोरदार आवाज़ ने आ लिया; कुछ को हमने ज़मीन में धँसा दिया; और उनमें से कुछ को हमने पानी में डुबा दिया।
अल्लाह तो ऐसा न था कि उन लोगों पर ज़ुल्म करता; मगर वे स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया करते थे. (40)
जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़
कर अपने लिए दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, उनकी मिसाल मकड़ियों जैसी है जो अपने लिए घर बनाती हैं ---- और सच है कि
सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का ही होता है--- काश वे इस बात को समझ पाते ! (41)
वे लोग अल्लाह को छोड़ कर जिस चीज़[बुतों] को पुकारते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है : वह सबसे
प्रभुत्वशाली और ज्ञानी है. (42)
हम ऐसी मिसालें लोगों के
(समझाने के) लिए देते हैं, परन्तु इनको समझ वही सकते
हैं जो ज्ञान रखते हैं. (43)
अल्लाह ने आसमानों और
ज़मीन को सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है। जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है. (44)
[ऐ रसूल] उस किताब को पढ़ कर सुनाएं जो आप पर वही द्वारा
भेजी गई[revealed] है; नमाज़ को बराबर अदा करें: बेशक नमाज़ अश्लीलता और बुरे आचरण से रोकती
है। और अल्लाह को याद करते रहना सबसे बेहतर चीज़ है: जो कुछ तुम करते हो अल्लाह (तुम्हारे) हर काम को जानता है. (45)
और [ऐ मुसलमानो] किताबवालों[यहूदी,ईसाई] से जब बहस करना पड़े तो बेहतरीन ढंग से
ही बहस करो, हाँ जो लोग उनमें से
अन्याय करते हैं, उनकी बात अलग है. (उनसे)
कहो, "हम विश्वास रखते हैं उस (किताब) पर जो हम पर उतारी गयी, और उस पर भी ईमान रखते हैं जो तुम पर उतारी
गयी थी; हमारा ख़ुदा और तुम्हारा
ख़ुदा एक ही है; और हम उसी की आज्ञा
माननेवाले हैं ।" (46)
इसी तरह हमने [ऐ रसूल] आप पर किताब उतारी है, तो(मक्का के) लोगों में से जिन्हें हमने पहले
से किताब दे रखी थी [यहूदी व ईसाई], वे उस(क़ुरआन) में विश्वास रखते हैं और उन (मक्का के मूर्तिपूजकों) में से भी
कुछ लोग इसपर विश्वास रखते हैं। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं
जो (सच्चाई को) न मानने की ज़िद्द पर अड़े रहते हैं. (47)
[ऐ रसूल] यह (किताब) जो आप पर
उतारी गयी, उससे पहले आपने कभी कोई
किताब न तो पढ़ी थी; और न ही कभी कोई किताब
अपने हाथ से लिखी थी। अगर आपने ऐसा किया होता, तो झूठे लोगों को सन्देह करने का बहाना मिल गया होता. (48)
मगर नहीं, यह (क़ुरआन) तो (अल्लाह
द्वारा) उतारी गयी है, और यह बात उन लोगों के
दिलों में एकदम स्पष्ट है जिन्हें ज्ञान दिया गया
है। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं जो शैतानी कामों में डूबे
रहते हैं. (49)
वे[काफ़िर] कहते हैं, " उस (रसूल) के रब ने उसके पास कोई चमत्कार दे कर क्यों नहीं भेजा ? " कह दें, "चमत्कार तो बस अल्लाह के
हाथ में है; मैं तो यहाँ केवल इसीलिए
हूँ कि तुम्हें साफ़ तौर से सावधान कर दूँ।" (50)
क्या उनलोगों के लिए यह
पर्याप्त नहीं कि हमने आप पर किताब उतारी, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है? निस्संदेह उनलोगों के लिए इसमें बड़ी रहमत[mercy] है और सीखने के लिए सबक़
है जो ईमान रखते हैं. (51)
कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच
अल्लाह गवाह के रूप में काफ़ी है : जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह(सब) जानता है. जो लोग झूठे (देवताओं) में
विश्वास रखते हैं, और(एक) अल्लाह को नहीं
मानते, वे सख़्त घाटे में रहेंगे.” (52)
वे आपको (उनके लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं
: अगर अल्लाह ने इसका एक नियत समय पहले ही तय न कर दिया होता तो उनपर अबतक यातना आ
चुकी होती, मगर वह आयेगी ज़रूर, और इतनी अचानक आयेगी कि उन्हें ख़बर तक न
होगी. (53)
वे आपको (उनके लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं
: सच्चाई से इंकार करनेवालों को जहन्नम अपने घेरे में ले लेगी, (54)
उस दिन जब यातना उन्हें
ऊपर से घेर लेगी और उनके अपने पाँव के नीचे से भी, तब उनसे कहा जाएगा, "अब चखो उसका मज़ा जो कुछ तुम किया करते थे!" (55)
ऐ मेरे ईमानवाले बन्दों!
निस्संदेह मेरी धरती विशाल व बहुत फैली हुई है, अतः तुम मेरी और केवल मेरी ही बन्दगी करो. (56)
जो लोग (सच्चाई में) विश्वास[ईमान] रखते थे, और अच्छे कर्म करते थे, उन्हें हम बाग़ों[जन्नत] के ऊँचे महलों में
रहने की जगह देंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वे उसमें हमेशा रहेंगे। क्या ही अच्छा इनाम है उनलोगों के लिए जो (सही मार्ग
पर चलने के लिए) मेहनत करते हैं, (58)
कितने जीव-जंतु ऐसे हैं
जो अपनी रोज़ी जमा करके नहीं रखते! अल्लाह ही उन्हें भी रोज़ी देता है और तुम्हें
भी : वही तो है जो सब कुछ सुनता है, और सब जानता है. (60)
और अगर तुम उन (विश्वास न
करनेवालों) से पूछो कि "किसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और सूरज और चाँद
को काम में लगा दिया?" तो वे ज़रूर कहेंगे, "अल्लाह ने!" तो फिर
क्यों वे उस (अल्लाह) से मुँह मोड़ते हैं ? (61)
वह अल्लाह ही है जो अपने
बन्दों में से जिसे चाहता है भरपूर रोज़ी देता है और जिसे चाहता है, रोज़ी में कमी कर देता है: निस्संदेह अल्लाह
हरेक चीज़ की पूरी जानकारी रखता है. (62)
और अगर तुम उनसे पूछो कि
" कौन है जो आसमान से पानी बरसाता है, और उससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को फिर से ज़िंदा कर देता है ?" तो वे ज़रूर बोल पड़ेंगे, "अल्लाह !" कहो, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही
के लिए है !" किन्तु उनमें से अधिकतर लोग बुद्धि से काम नहीं लेते. (63)
इस दुनिया की ज़िंदगी तो
बस खेल-तमाशा और दिल का भटकाव मात्र है; असल ज़िंदगी तो आनेवाली दुनिया [परलोक] में है, अगर वे सचमुच जान पाते! (64)
जब कभी वे पानी के जहाज़ों में सवार होते हैं तो वे (मुसीबत
में अपने देवताओं को छोड़कर) अपनी पूरी भक्ति केवल अल्लाह में दिखाते हुए उसे ही
पुकारते हैं। मगर जैसे ही वह उन्हें सही-सलामत वापस ज़मीन पर ले आता है, तो क्या देखते हैं कि वे अचानक दूसरों को उस
(अल्लाह) का साझीदार[Partner] ठहराने लग जाते हैं! (65)
जो कुछ(नेमत) हमने
उन्हें दिया है उसके बदले में कर लेने दो उन्हें हमारी नाशुक्री[ingratitude]; और उड़ा लेने दो कुछ
मज़े---- जल्द ही उन्हें पता चल जाएगा. (66)
क्या वे देखते नहीं कि
हमने (उनके शहर मक्का को) एक शांत व सुरक्षित जगह बनाया है, जबकि उसके आसपास की जगहों मे लोगों के साथ
छीना-झपटी होती है? तब भी, कैसे वे झूठी चीज़ में विश्वास
रखते हैं और अल्लाह के अहसानों को मानने से इंकार करते हैं ? (67)
उस आदमी से बड़ा शैतान कौन
होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता हो, या जब उसके पास सच्ची बात पहुँचे तो उसको झूठी बताए ? क्या (ऐसे) इंकार करनेवालों का ठिकाना जहन्नम
नहीं होगा ? (68)
जो लोग हमारे मक़सद के लिए
जी-तोड़ कोशिश करते हैं, उन्हें अवश्य ही रास्ता
दिखाते हुए हम अपने मार्ग पर लगा देंगे: निस्संदेह अल्लाह अच्छा कर्म करनेवालों के
साथ है. (69)
सूरह 83 : अल मुतफ़्फ़िफ़ीन [Those Who
Give Short Measure]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
1. बर्बादी है माप तौल में कमी करने वालों के
लिए o
2. यह लोग जब (दूसरे) लोगों से नापकर(कुछ) लेते
हैं तो (उनसे) पूरा लेते हैं o
3. जब उन्हें (स्वयं) मापकर या तौल कर देते हैं
तो घटा कर देते हैं o
4. क्या ये लोग इस बात का यक़ीन नहीं रखते कि वह
(मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करके) उठाए जाएंगे o
5. एक बड़े भारी (क़यामत के) दिन ! o
6. जिस दिन सब लोग तमाम जहाँनों के रब के सामने (हिसाब
देने के लिए) खड़े होंगे o
7. यह सच है कि दुराचारियों के कर्मों का लेखा-जोखा
“ सिज्जीन “ (यानी जहन्न्म के दीवान ख़ाने) में है o
8. और आप क्या जानें कि “सिज्जीन” क्या है ? o
9. (यह
जहन्नम के बन्दीगृह में उस बड़े दीवान के अंदर) लिखी हुई (एक) पुस्तक है (
जिसमें हर जहन्नमी का नाम और उसके कर्मों का लेखा जोखा लिखा हुआ हैं) o
10. उस दिन (सच्चाई को) झुठलाने वालों के लिए
तबाही होगी o
11. जो लोग फ़ैसले के दिन को झूठ जानते हैं o
12. और उस दिन को वही झूठ जानता है जो हद से ज़्यादा
बड़ा पापी हो o
13. उसे जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं तो
कहता (या समझता) है कि “ (यह तो) पिछले (गुज़रे हुए) लोगों की कहानियाँ हैं!” o
14. (ऐसा) बिल्कुल नहीं! (सच्चाई यह है कि) उनके
दिलों पर (बुरे) कर्मों का ज़ंग चढ़ गया है जो वे किया करते थे (इसलिए ये आयतें
उनके दिल पर असर नहीं करतीं) o
15. (ऐसा) बिल्कुल नहीं! सच्चाई यह है कि वास्तव
में उस दिन उन्हें अपने रब के दर्शन से (वंचित रखने के लिए) ओट में कर दिया जाएगा o
16. फिर वे नरक में झोंक दिए जाएंगे o
17. फिर उनसे कहा जाएगा: “ यह वो (जहन्नम की यातना)
है जिसे तुम झुठलाया करते थे” o
18. यह (भी) सच्चाई है कि वास्तव में
नेक लोगों के कर्मों का लेखा-जोखा ‘इल्लीयीन” (यानी जन्नत के दीवान ख़ाने में) है o
19. और आप क्या जानें कि “ इल्लीयीन”
क्या है ?o
20. (यह जन्नत के ऊँचे दर्जे में
उस बड़े दीवान के अंदर) लिखी हुई (एक) पुस्तक है (जिसमें उन जन्नत वालों के नाम और
कर्मों का लेखा जोखा दर्ज हैं जिन्हें उच्च स्थान दिए जाएंगे) o
21. इस जगह (अल्लाह के) अंतरंग
फरिश्ते मौजूद रहते हैं o
22. बेशक नेक लोग (राहत और
प्रसन्नता से) नेमतों वाले जन्नत (स्वर्ग) में होंगे o
23. (आरामदेह) तख्तों पर बैठे हुए
देख रहे होंगे o
24. आप उनके चेहरों से ही नेमतों की रौनक़
और तरोताज़गी पता कर लेंगे o
25. उन्हें मुहर लगी हुई (sealed) बड़ी लज़ीज़ व शुद्ध शराब (तहूर) पिलाई जाएगी o
26. उसकी मुहर कस्तूरी (जैसी खुशबूदार चीज़) की होगी, और (यही वह शराब है) जिसको पीने के लिये शौक़ीन लोगों को (जल्द कोशिश कर) बढ़त लेनी चाहिए अगर वे बाज़ी मारने की तमन्ना रखते हैं (कोई नेमत हासिल करना चाहता है, कोई निकटता चाहता है और कोई दीदार करना चाहता है. सो, हर किसी को उसके शौक के अनुसार पिलाई जाएगी) o
27. और इस (जन्नत की शराब) में ‘तसनीम’ के पानी की मिलावट होगी o
28. (यह तसनीम) एक चश्मा (बड़ा सोता, spring) है जहां से केवल (अल्लाह से) नज़दीकी प्राप्त लोग ही पियेंगे o
29. बेशक अपराधी लोग ईमान वालों का (दुनिया में) मज़ाक उड़ाया करते थे o
30. और जब उनके पास से गुजरते तो आपस में आंखों से इशारेबाज़ी करते थे o
31. और जब अपने घर वालों की ओर लौटते तो (मोमिनों की बदहाली और अपनी खुशहाली की तुलना कर के) इतराते, हँसते और बातें बनाते हुए जाते थे o
32. और जब यह (घमंडी लोग) उन (कमजोर हाल मोमिनों) को देखते तो कहते: “बेशक ये लोग राह से भटक गए हैं” (यानी यह दुनिया गँवा बैठे हैं और परलोक तो है ही केवल गढी हुई कहानी!) o
33. हालाँकि वे उन (मुसलमानों) के हाल पर निगरानी करने वाला [keeper] बनाकर नहीं भेजे गए थे o
34. सो आज (देखो) ईमानवाले, विश्वास ना करने वाले (काफिरों )पर हंस रहे हैं o
35. सजे हुए तख्तों पर बैठे (अपनी खुशहाली और काफिरों की बदहाली को) देख रहे हैं o
36. सो क्या काफिरों को उन कर्मों का पूरा बदला (नहीं) दे दिया गया जो वे किया करते थे? o
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