Early Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के आरंभिक दिनों की सूरतें
सूरह 1: अल-फ़ातिहा
[(किताब की) शुरुआत/ The Opening]
यह एक मक्की
सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है, उसका इस सूरह
में निचोड़ पेश किया गया है, दूसरे शब्दों में कहें तो "गागर में सागर
भर दिया गया है।" यह सूरह इस्लामी इबादत के लिए बहुत अहम है
क्योंकि इस सूरह को हर नमाज़ में पढ़ना ज़रूरी होता है और इस तरह, इसे दिन भर में 17 बार पढ़ा जाता है। असल में देखा जाए तो इसमें
अल्लाह का अपने बंदों से संबंध स्थापित किया गया है, सर्वशक्तिमान
के रूप में इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में अल्लाह की नि:संदेह authority है, और इंसान उस पर पूरी तरह से निर्भर है, चाहे
मार्गदर्शन हो या मदद मांगना हो। मुख्य बात यही है कि इंसान इस बात को मान ले कि
अकेला अल्लाह ही इबादत के लायक़ है---- इस सच्चाई से इंकार करनेवाले इस हक़ीक़त को
समझने में असमर्थ हैं। जो भी बुनियादी सिद्धांत इस सूरह में दिए गए हैं, बाक़ी क़ुरआन में
उन्हीं बातों को विस्तार से बताया गया है।
विषय:
01 : अल्लाह के नाम
से शुरू
02-07: दुआ
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है (1)
सारी तारीफ़ें
अल्लाह की हैं, जो सारे संसारों का रब
है, (2)
सब पर मेहरबान
है, अत्यंत दयावान है, (3)
(और) जो फ़ैसले
के दिन का मालिक है। (4)
[ऐ अल्लाह!] हम
तेरी ही इबादत करते हैं; और तुझसे ही (ज़रूरत पड़ने
पर) मदद माँगते हैं। (5)
हमें सीधे
रास्ते पर चला: (6)
उन लोगों के
रास्ते पर (चला) जिन पर तूने करम [Bless] किया है, उनके (रास्ते पर) जिन पर न तो ग़ुस्सा उतरा हो, और न जो सीधे रास्ते से भटके हुए हों। (7)
नोट:
1: क़ुरआन में जब-जब "रहमान" शब्द आया
है, वह इस संदर्भ
में है कि अल्लाह बहुत ताक़तवाला और महान होने के साथ-साथ बहुत दयावान भी है। इसका
मतलब वह हस्ती जिसकी रहमत बहुत व्यापक [Extensive] हो, यानी दुनिया का हर अच्छा-बुरा आदमी उसकी दी
हुई नेमतों से फ़ायदा उठाता है, इसलिए अल्लाह 'रहमान' यानी सब पर
मेहरबान है। यह शब्द केवल अल्लाह के लिए ही इस्तेमाल होता है कि बड़े प्यार और दया
[loving mercy] से उसने सृष्टि
की हर चीज़ को पैदा किया है|
अल्लाह
"रहीम" भी है, इसका मतलब यह है कि रहम [दया] करना उसकी
प्रकृति में रचा-बसा हुआ है, और वह जिसे चाहता है, उस पर रहम
[दया] करता है।
“रहमान" और "रहीम" का संबंध इस
तरह का है कि जैसे 'रहमान' सूरज की रौशनी है जो सारे आसमान को
रौशन कर देती है, और 'रहीम' सूरज की रौशनी की एक ख़ास किरण है जो किसी जीव
पर पड़ती है।
2: अरबी में "रब" का मतलब मालिक के
साथ-साथ परवरिश करना और देखभाल करना भी होता है। तो जहाँ-जहाँ भी क़ुरआन में
"रब" का शब्द आया है, इसका ये मतलब भी ध्यान में रखना चाहिए।
"आ'लमीन" का मतलब सारे जहानों का यानी
इंसानों का, जानवरों का, फ़रिश्तों का, पौधों का, इस दुनिया का, आने वाली
दुनिया का, इत्यादि।
इस कायनात की
हर चीज़ अल्लाह की बनायी हुई है। अगर किसी चीज़ की तारीफ़ की जाए, तो वह असल में
उसके बनाने वाले की ही तारीफ़ होगी, इस तरह सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, जो सारे जहानों
का रब है।
4: अल्लाह "फ़ैसले के दिन" का मालिक है, जिस दिन हर
आदमी के कर्मों का हिसाब-किताब होगा और इसके नतीजे में किसी को इनाम मिलेगा और
किसी को सज़ा। दुनिया में इंसानों को थोड़े समय के लिए कुछ-कुछ चीज़ों का मालिक बनाया
गया है, मगर क़यामत के दिन यह अधिकार ख़त्म हो जाएगा।
5: यहाँ से बंदों को अल्लाह से दुआ करने का
तरीक़ा सिखाया गया है। केवल अल्लाह की ही इबादत [पूजा] करना और केवल उसी से ज़रूरत
पड़ने पर मदद माँगने को ही "तौहीद" [एकेश्वरवाद] कहते हैं। अल्लाह को
छोड़कर किसी और को मदद के लिए पुकारना या अल्लाह के साथ किसी और (ख़ुदा) को भी
अल्लाह का साझेदार मानना बिल्कुल ग़लत है।
6: यहाँ सीधा रास्ता दिखाने की दुआ की गई है जो
हमेशा से नेक और सच्चे लोगों का रास्ता रहा है, जिन पर अल्लाह
ने अपना करम किया है।
7: वैसे लोगों पर गुस्सा उतरा है, जो सच्चाई
जानने के बावजूद अपने घमंड और अपने बाप-दादा की परम्परा के मोह में अटके रहे या
अपनी बड़ाई के समाप्त हो जाने के डर से सच्चाई से मुँह मोड़ते रहे।
सीधे रास्ते से
गुमराह वे हो गए जो सच्चाई सामने होते हुए भी झूठे ख़ुदाओं के जाल में फंस गए और
उन्हें अल्लाह का साझेदार मानकर अपनी ज़रूरतों के लिए पुकारने लगे।
उप समूह- I
सूरह 54: अल-क़मर
[चाँद, The Moon]
यह एक मक्की
सूरह है जिसमें मुख्यत: विश्वास न करने वालों की पिछली पीढ़ियों को उनके बुरे
कर्मों के नतीजे में जो सज़ाएं मिलीं, उनका वर्णन है। उन्हें मक्का के विश्वास न
करने वालों के लिए एक चेतावनी के रूप में पेश किया गया है, और एक वाक्य बार-बार पूरी सूरह के दौरान आया
है: "तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत
हासिल करे?" अंत में फ़ैसले के दिन विश्वास न करने वालों
के साथ किए जाने वाले बर्ताव की तुलना उन ईमानवाले लोगों के कभी न ख़त्म होने वाले
परम आनंद की स्थिति से की गई है। सूरह का नाम आयत 1 में आए फ़ैसले के दिन के हवाले पर रखा गया है, जब चाँद दो टुकड़े हो जाएगा।
विषय:
1- 8: क़यामत की घड़ी
आकर रहेगी
9-17: नूह (अलै.) की क़ौम
18-22: 'आद' की क़ौम
23-32: 'समूद' की क़ौम
33-40: लूत (अलै.) की
क़ौम
41-42: फिरऔन के लोग
43-55: विश्वास न
करने वालों को धमकी
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़यामत की घड़ी
निकट आ पहुँची है; और चाँद दो
टुकड़े हो गया। (1)
किन्तु उन (मक्का
के काफ़िरों) का हाल यह है कि अगर वे कोई निशानी [चमत्कार] देखते हैं, तो मुँह मोड़ लेते हैं और कहते हैं, "यह तो वही पुराना जादू है जो पहले से चला आ रहा
है!" (2)
उन्होंने सच्चाई
[रसूल की निशानियों] को मानने से इंकार किया और अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े ----
हर मामले (को लिख लिया जाता है और उस) का नतीजा तय है ------ (3)
हालाँकि उनके पास
(पिछली क़ौमों की) ऐसी चेतावनी भरी घटनाओं की ख़बरें पहुँच चुकी थीं, जिनसे (सबक़ लेते हुए बुराइयों से) उन्हें बचना
चाहिए था----- (4)
दिल में उतर
जानेवाली गहरी समझ-बूझ की बातें ----- मगर इन चेतावनियों का उनपर कुछ असर नहीं
होता: (5)
अतः [ए रसूल!] आप
उनसे मुँह फेर लें (और उनकी परवाह न करें)। जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक बेहद
भयानक घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा, (6)
अपनी आँखें झुकाए
हुए, वे अपनी क़ब्रों
से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर
फैली हुई टिड्डियाँ हों, (7)
वे दौड़े जा रहे
होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर। (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (8)
इनसे पहले नूह
[Noah] की क़ौम ने भी
सच को मानने से इंकार किया था: उन्होंने हमारे बन्दे को झूठा ठहराया और कहा, "यह तो दीवाना है!" और उन्हें बुरी तरह
झिड़का गया, (9)
अन्त में उसने
अपने रब को पुकारा कि "मैं बेबस हो चुका हूँ, अब आप ही बदला लीजिए!" (10)
तब हमने
मूसलाधार बरसते हुए पानी के साथ आसमान के दरवाज़े खोल दिए, (11)
और ज़मीन के
भीतर से पानी के सोते [gushing springs] बहा दिए: इस तरह (आसमान और ज़मीन का) सारा
पानी उस काम के लिए एक साथ मिल गया जो (उनकी नियति में) तय हो चुका था। (12)
और हमने
उन्हें [नूह व उनके साथियों को] एक तख़्तों और कीलोंवाली (नौका) पर सवार कर दिया, (13)
जो हमारी
देख-रेख में (सुरक्षित) चल रही थी, यह भरपाई थी उस [नूह] के लिए जिसको मानने से
इंकार कर दिया गया था। (14)
हमने इस [घटना
या नौका] को एक निशानी के रूप में (यादगार बनाकर) छोड़ दिया: तो क्या कोई है जो
(इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (15)
तो अब सोचो कि
कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (16)
हमने क़ुरआन को
(याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत
हासिल करे? (17)
आद की क़ौम के
लोगों ने भी (हमारे पैग़म्बर हूद के संदेश की) सच्चाई को ठुकरा दिया, तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी
(सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (18)
हमने उन लोगों
पर, उस तबाही वाले
मनहूस दिन, भयानक
आवाज़वाली एक आँधी भेज दी थी; (19)
जो लोगों को
(इस तरह) उखाड़ फेंकती थी मानो वे उखड़े हुए खजूर के तने हों। (20)
तो कैसी रही
मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (21)
हमने क़ुरआन को
(याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत
हासिल करे? (22)
समूद की क़ौम ने भी
(हमारे पैग़म्बर सालेह द्वारा दी गयी) चेतावनियों को ठुकरा दिया: (23)
वे कहने लगे, "क्या? (हमारे जैसा) एक आदमी? क्या हम उस अकेले आदमी के पीछे चलेंगे, जो हम में से ही है? यह तो भारी गुमराही होगी; एकदम पागलपन होगा!” (24)
"क्या हमारे बीच बस
वही एक आदमी बचा था जिसे (अल्लाह की तरफ़ से) संदेश देकर भेजा गया है? नहीं, वह तो बड़ा झूठा और घमंडी है!" (25)
(हम ने सालिह से
कहा), "कल ही उन्हें पता
चल जाएगा कि कौन बड़ा झूठा, और घमंडी है, (26)
क्योंकि हम उनकी
परीक्षा लेने के लिए एक ऊँटनी को उनके पास भेज रहे हैं: अतः आप उन्हें देखते जाएं
और धीरज से काम लें। (27)
उन्हें बता दें कि
उनके (और ऊँटनी के) बीच पानी का बँटवारा होगा: हर एक हिस्सेदार को उसकी बारी आने
पर ही पानी मिलेगा।" (28)
मगर (अन्ततः)
उन्होंने (क़दार नामक) अपने साथी को बुलाया, उसने हाथ (में तलवार को) उठाया और ऊँटनी के
(अगले) पाँव की कूचें [Hamstrung] काटकर उसे मार
डाला।" (29)
(तो सोचो!) कैसी थी
मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (30)
हमने उनपर केवल एक
ही इतने ज़ोर का धमाका किया, और वे ऐसे हो गए जैसे किसी बाड़वाले [fence-maker] की सूखी लकड़ियाँ हों। (31)
हमने क़ुरआन को
(याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान
बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (32)
लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी चेतावनियों को मानने
से इंकार कर दिया था। (33)
सो हमने उन पर
पत्थर बरसानेवाली तेज़ हवा छोड़ दी, (मगर) लूत के घरवालों को छोड़कर। उन्हें हमने
भोर होने से पहले बचा लिया था, (34)
यह हमारी तरफ
से ख़ास करम था: हम शुक्र अदा करनेवालों को ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (35)
(लूत) ने लोगों
को हमारी पकड़ से सावधान कर दिया था, मगर उन लोगों ने चेतावनियों को मानने से सिरे
से इंकार कर दिया---- (36)
यहाँ तक कि उन
लोगों ने लूत के मेहमानों को भी उनके हवाले कर देने की माँग की ---- जिस पर हमने
उनकी आँखों को अंधा कर दिया कि, "लो, अब चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी
चेतावनियों (के पूरा होने) का!"--- (37)
और सुबह सवेरे
ही एक ऐसी भयानक यातना ने उन्हें धर-दबोचा जो पहले से तय थी ---- (38)
"लो, चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी
चेतावनियों (के पूरा होने) का!" (39)
हमने क़ुरआन को
(याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत
हासिल करे? (40)
फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों के पास भी (मूसा द्वारा) चेतावनियाँ
आयी थीं; (41)
उन लोगों ने
हमारी सारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, तो (इसके नतीजे में) हमने उन्हें अपनी पूरी
ताक़त और प्रभुत्व के साथ दबोच लिया। (42)
"क्या तुम्हारे
[मक्का के] विश्वास न करनेवाले, इन (पहले के) लोगों से किसी भी तरह अच्छे हैं? या (ख़ुदा की) किताबों में तुम्हारे लिए कोई
छुटकारा लिखा हुआ है?" (43)
या शायद वे
कहते हैं, "हम एक मज़बूत
दल हैं और हम (रसूल के साथ मुक़ाबले में) जीत जाएंगे?" (44)
उनके सारे
दल-बल को बुरी तरह कुचल दिया जाएगा और वे पीठ दिखाकर भाग खड़े होंगे। (45)
मगर उनसे असल
वादा उस (क़यामत की) नियत घड़ी का है ---- और वह घड़ी कहीं अधिक सख़्त और बेहद कड़वी
होगी: (46)
सचमुच, शैतानी करनेवाले लोग भारी गुमराही और पागलपन
में पड़े हुए हैं ----- (47)
जिस दिन उनको
मुँह के बल आग में घसीटा जाएगा (उस दिन उन्हें होश आ जायेगा, उनसे कहा जाएगा), "(जहन्नम की) आग को छूकर महसूस करो!" (48)
हमने सारी
चीज़ों को उसके सही अनुपात में पैदा किया है; (49)
जब हम किसी
चीज़ के होने का आदेश देते हैं, तो वह बस पलक झपकते ही (पूरा) हो जाता है; (50)
हम तुम्हारे
जैसे बहुत लोगों को (पहले) तबाह-बर्बाद कर चुके हैं। तो फिर क्या कोई है जो इस पर
ध्यान दे (और नसीहत हासिल करे)? (51)
जो कुछ भी वे
करते हैं, सब कुछ (उनके
कर्मों की बही में) लिख लिया जाता है: (52)
छोटा हो या बड़ा, हर एक काम का हिसाब लिख लिया जाता है। (53)
हाँ, सच्चे व बुराइयों से बचनेवाले लोग (सुकून से)
बाग़ों और नहरों के बीच रहेंगे, (54)
सच्चाई की जगह
में निश्चिंत होकर, उस बादशाह
[अल्लाह] के सामने (रहेंगे), जिसके क़ब्ज़े में सब तरह की शक्तियाँ हैं। (55)
नोट:
1: चांद का फटकर दो टुकड़े हो जाना क़यामत की
निशानियों में से है। एक दूसरा मतलब मुहम्मद (सल्ल.) से जुड़ी हुई एक मशहूर घटना
से है। मक्का शहर से थोड़ी दूर मिना के मैदान में एक शाम मुहम्मद साहब मुसलमानों
के एक गिरोह और मक्का के कुछ लोगों को जो सच्चाई पर विश्वास नहीं
करते थे, सम्बोधित कर रहे थे, वे कई दिन से मुहम्मद साहब से बहस कर रहे थे
और उन्हे6 रसूल मानने को तैयार न थे, फिर वे कहने लगे कि हम उस वक्त तक आपको
अल्लाह का रसूल नहीं मानेंगे जब तक आप कोई चमत्कार (मोज्ज़ा) न दिखा दें। मुहम्मद साहब ने अल्लाह के हुक्म से चांद को
अंगुली के इशारे से दो टुकड़े कर दिया, चांद का एक हिस्सा सामने के हिरा पहाड़ के
पूर्वी हिस्से में चला गया और दूसरा हिस्सा पहाड़ के पश्चिमी भाग में। मुहम्मद
साहब ने कहा कि लोगो तुम गवाह रह्रना! वहाँ मौजूद सारे लोगों ने जब इस नज़ारे को
देख लिया तो यह दोनों टुकड़े आपस में मिल गए। इस घटना को अपनी आँखों से देखने के
बावजूद उन लोगों ने यही कहा कि यह नज़र का धोखा था, जो जादू से पैदा किया गया था और उन लोगों ने
विश्वास नहीं किया। कुछ बाद में जब व्यापारिक कारवाँ के लोग आए तो उन्होंने भी चाँद
के टुकड़े होते हुए देखने की पुष्टि की।
12: इस घटना का विस्तार से उल्लेख सूरह हूद (11: 40) और सूरह मोमिनीन (23: 27) में आया है।
19: विस्तार से वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 65) में देखें।
28: यह ऊँटनी उन्हीं लोगों की माँग पर पैदा की
गयी थी, और उनसे कहा गया था कि बस्ती के कुंएं से एक दिन वह पानी
पियेगी, और एक दिन बस्ती वाले। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 73).
37: इसका विवरण सूरह हूद (11:78) में आया है कि हज़रत लूत (अलै.) के पास
फ़रिश्ते खूबसूरत नौजवानों की शक्ल में आए थे ताकि उनकी क़ौम के लोगों को दंड दे
सकें। वहाँ के लोग समलैंगिकता की बीमारी से ग्रसित थे, वे ख़ूबसूरत जवानों को देखकर लूत (अलै.) से
माँग करने लगे कि उन्हें उनके हवाले कर दिया जाए, मगर अल्लाह ने उन बदमाश लोगों को अंधा कर
दिया ताकि वे उन फ़रिश्तों तक न पहुँच पाएं।
45: यह भविष्यवाणी तब की गई थी जब मक्का के
मुसलमान वहाँ के बहुदेववादियों की तुलना में बहुत कमज़ोर थे और ख़ुद अपना बचाव भी
नहीं कर पाते थे। लेकिन कुछ ही साल के बाद बद्र के मैदान में दोनों दलों के बीच
लड़ाई हुई जिनमें मक्का के विश्वास न करनेवालों की बड़ी हार हुई और वे पीठ दिखाकर
भागने पर मजबूर हुए।
सूरह 37: अस-साफ़्फ़ात
[क़तारों
में लाइन से खड़े होनेवाले / Those ranged in rows]
इस मक्की सूरह का केंद्रीय
विषय है केवल एक अल्लाह का होना (आयत 4, 180-182), और बहुदेववादियों की इस मान्यता को रद्द करना
कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं और वे इबादत के योग्य हैं। फ़रिश्तों की बातें भी
नक़ल की गई हैं जिसमें ख़ुद फ़रिश्तों ने इस मान्यता को रद्द किया है (164-166). मुहम्मद सल्ल. के पैग़म्बर होने और आनेवाली
दुनिया [आख़िरत] की पुष्टि भी की गई है। इसमें दो और खंड हैं: आख़िरत का दृश्य (19-68), जहाँ विश्वास करने से इंकार करने वालों को
मिलने वाली सज़ा और ईमानवालों को मिलने वाले इनाम के बारे में बताया गया है, और पिछले नबियों की कहानियाँ (75-148), जिनमें पिछली क़ौमों की तबाही के क़िस्से भी
सुनाए गए हैं जिन्हें नाफ़रमानी करने के चलते बर्बाद कर दिया गया।
विषय:
01-05: अल्लाह एक है
06-11: अल्लाह की पैदा करने की ताक़त
12-34: फ़ैसले का दिन: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य
35-39: रसूल की कही बात सही साबित होगी
40-61: जन्नत की ख़ुशियाँ
62-68: जहन्नम की पीड़ा
69-74: पिछले रसूलों की कहानियों का परिचय
75-82: नूह (अलै)
83-98: इबराहीम (अलै) की कहानी
99-111: इबराहीम अपने बेटे को क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो गए
112-113: इबराहीम और इसहाक़ (अलै)
114-122: मूसा और हारून (अलै)
123-132: इदरीस [Elijah] (अलै)
133-138: लूत (अलै)
139-148: यूनुस [Jonah] (अलै)
149-166: अल्लाह की न कोई औलाद है, और न कोई साझेदार [Partner]
169-179: कुछ समय के लिए विश्वास न करने वालों से मुँह मोड़ लें
180-182: आख़िर में अल्लाह की बड़ाई का बयान
अल्लाह
के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है उन [फरिश्तों] की जो
क़तारों में सीधी लाइन बनाकर खड़े होते हैं, (1)
जो (बुराइयों पर) सख़्ती से डाँटते-फटकारते हैं (2)
और अल्लाह की वाणी [कलाम] को
पढ़ते रहते हैं, (3)
सचमुच तुम्हारा अल्लाह तो एक
ही है, (4)
जो आसमानों और ज़मीन और जो कुछ
उनके बीच है, उन
सबका रब है, और
(अलग-अलग मौसमों में) सूरज के निकलने की हर एक जगह का भी रब है। (5)
हमने सबसे नीचे वाले आसमान को तारों से सजा रखा है, (6)
और उन्हें हर बाग़ी शैतान से
सुरक्षा के लिए बनाया है: (7)
वे [शैतान] ऊपर (फ़रिश्तों) की
दुनिया की बातें चोरी-छिपे नहीं सुन सकते --- हर ओर से उनपर (अंगारे) फेंके
जाते हैं, (8)
और उन्हें निकाल बाहर किया
जाता है ---- उनके लिए (परलोक) में कभी न समाप्त होने वाली यातना होगी ----
(9)
हाँ, अगर (शैतानों में से) कोई चोरी-छिपे (फ़रिश्तों
की बात का) कोई टुकड़ा किसी तरह उचक (कर सुन) भी ले, तो एक तेज़ दहकता अंगारा उसके पीछे लग जाता है।
(10)
[ऐ रसूल]
आप उन (विश्वास न करनेवाले काफ़िरों) से पूछें: कि उन्हें पैदा करने का काम ज़्यादा
कठिन है या हमारे द्वारा अन्य सारी चीज़ों का पैदा किया जाना? निस्संदेह हमने उनको लसलसी व चिपचिपी मिट्टी से
पैदा किया है। (11)
आपको (उनकी बातों पर) आश्चर्य
होता है कि वे (सच बात की) हँसी उड़ाते हैं, (12)
जब उन्हें सावधान किया जाता है, तो वे (उन बातों पर) कोई ध्यान नहीं देते, (13)
और जब (हमारी) कोई निशानी
देखते हैं तो उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं, (14)
और कहते हैं, "यह और कुछ नहीं, बस एक खुला जादू है।” (15)
“क्या!
जब हम मर जाएंगे और मरकर मिट्टी और हड्डियों में बदल जाएंगे, तो क्या सचमुच हम दोबारा उठाए जाएँगे?, (16)
अपने बाप-दादों के साथ?" (17)
कह दें, "हाँ, बिल्कुल! और तुम्हें वहाँ बे-इज़्ज़त किया
जाएगा।" (18)
बस एक ज़ोर का धमाका होगा ----
और अचानक! --- वे देखेंगे (19)
और कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हम पर! यह तो (कर्मों के) हिसाब-किताब
[फ़ैसले] का दिन है।" (20)
[उनसे
कहा जाएगा], “यह वही
फ़ैसले का दिन है जिसे तुम मानने से इंकार किया करते थे। (21)
(कहा
जाएगा, फरिश्तों!)
"एक साथ इकट्ठा करो उन लोगों को जिन्होंने ग़लत काम किए, और उन्हीं जैसे (काम करने वाले) दूसरे
पति/पत्नियों को, और साथ
में उनको भी जिनकी वे पूजा करते थे, (22)
अल्लाह को छोड़कर; फिर उन सबको जहन्नम की तरफ़ जानेवाले रास्ते पर
लेकर चलो, (23)
और उन्हें ज़रा रोको, उनसे सवाल-जवाब होगा: (24)
"तुम्हें क्या हो गया कि तुम अब एक-दूसरे की सहायता नहीं कर रहे हो?"--- (25)
नहीं! बल्कि उस दिन वे पूरी
तरह सिर झुकाए खड़े होंगे--- (26)
उनमें से कुछ लोग आपस में
मिलकर एक-दूसरे पर दोष लगा रहे होंगे, (27)
वे कहेंगे, "तुम हमारे पास जब आते थे, उस समय तो तुम्हारी स्थिति मज़बूत व असरदार आदमी
की थी। (28)
वे (जवाब में) कहेंगे, "नहीं! वह तो तुम थे जो (अल्लाह पर) विश्वास नहीं
करते थे---- (29)
तुम्हारे ऊपर तो हमारा कोई
ज़ोर नहीं चलता था --- और तुम तो पहले से ही तमाम सीमाएं पार कर चुके थे। (30)
इस तरह, हमारे रब ने हम पर जो दंड का हुक्म सुनाया था, वह बिल्कुल सही साबित हुआ, और निस्संदेह हम सभी को अपनी सज़ा का मजा़ चखना ही
होगा। (31)
हमने तुम्हें सही रास्ते से
भटका दिया, क्योंकि
हम स्वयं ही भटके हुए थे।" (32)
अतः वे सब उस दिन यातना में
एक-दूसरे के भागीदार होंगे: (33)
अपराधियों के साथ हम ऐसा ही
किया करते हैं। (34)
उनका हाल यह था कि जब उनसे कहा
जाता था कि "अल्लाह के सिवा कोई भी पूजा के लायक़ नहीं है," तो वे घमंड में अकड़ जाते, (35)
और कहने लगते, "क्या हम एक दीवाने कवि [मोहम्मद] के लिए अपने
देवताओं को छोड़ दें?" (36)
"नहीं: बल्कि वह सत्य लेकर आए थे और वह (पिछले) रसूलों को भी सच्चा बताते थे; (37)
निश्चय ही तुम सब दर्दनाक
यातना का मज़ा चखोगे, (38)
तुम बदला वैसा ही तो पाओगे, जैसे तुम कर्म करते रहे हो।" (39)
हाँ, मगर अल्लाह के सच्चे व अच्छे बंदों की बात
अलग है, (40)
उनके लिए जानी-पहचानी
रोज़ी होगी ---- (41)
तरह-तरह के फल--- और उनको
सम्मानित किया जाएगा, (42)
आनंद से भरे बाग़ों [जन्नत]
में; (43)
वे तख़्तों पर आमने-सामने
बैठे होंगे; (44)
एक बहते हुए सोते से भरी
गयी शराब उनके बीच में घुमायी जाएगी: (45)
बिल्कुल सफ़ेद, पीनेवालों के लिए बहुत ही मज़ेदार होगी, (46)
न उससे सर में कोई भारीपन
होगा और न मदहोशी में बहकना। (47)
और इनके साथ वहाँ औरतें
होंगी-----शर्मीली व निगाहें नीची रखनेवाली, सुन्दर आँखोंवाली [हूरें] ---(48)
(उनका
बेदाग़ हुस्न ऐसा होगा) मानो वे (धूल-गर्द से बचाए हुए शुतुर्मुर्ग़ के) साफ़ अंडे
हों। (49)
फिर वे [जन्नती लोग]
एक-दूसरे की तरफ़ मुड़कर बातचीत करते हुए पूछेंगे: (50)
उनमें से एक कहेगा, "ज़मीन पर मेरा एक बड़ा नज़दीकी साथी था, (51)
वह मुझसे पूछा करता था कि “क्या तुम सचमुच यह विश्वास करते हो कि
(52)
मरने के बाद जब हम मिट्टी
और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में (कर्मों के)
हिसाब-किताब के लिए लाया जाएगा?" (53)
फिर वह कहेगा, "क्या हम उसे खोजकर देखें?" (54)
फिर वह नीचे झाँकेगा तो
उसे भड़कती हुई आग के बीच में उसका साथी दिख जाएगा (55)
वह उससे कहेगा, "क़सम है अल्लाह की! तुम तो मुझे बर्बादी के
बहुत नज़दीक ले आए थे! (56)
अगर मेरे रब ने मुझ पर
एहसान न किया होता, तो अवश्य ही मैं भी उन लोगों में शामिल होता जिन्हें (दंड
के लिए) जहन्नम ले जाया जाता।” (57)
फिर वह (अपने जन्नत के
साथियों से) कहेगा, “हमारी पहली मौत के बाद क्या अब हमें कभी भी फिर से नहीं
मरना है? (58)
क्या हमें अब कभी कोई
तकलीफ़ भी नहीं दी जाएगी?" (59)
सही मायने में यही असली
कामयाबी है!” (60)
ऐसी ही कामयाबी हासिल करने
के लिए हर एक को अपने कर्मों द्वारा कोशिश करनी चाहिए। (61)
क्या (जन्नत में) मेहमानों
की तरह स्वागत अच्छा है या 'ज़क़्क़ूम' का पेड़, (62)
जिस (पेड़) को हमने शैतानी
करने वालों की कड़ी परीक्षा लेने के लिए बनाया है? (63)
असल में यह ऐसा पेड़ है जो
नरक की भड़कती हुई आग की तह से निकलता है (64)
उसके फल ऐसे होते हैं जैसे
कि शैतानों के सिर हों। (65)
वे [जहन्नमी लोग] उसी को
खाकर अपना पेट भरेंगे; (66)
फिर उसके ऊपर से (पीप मिला
हुआ) खौलता हुआ पानी पिया करेंगे; (67)
(खाने-पीने
के बाद) फिर उन्हें उसी (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में लौटना होगा। (68)
उन्होंने अपने बाप-दादों
को मार्ग से भटका हुआ पाया, (69)
और वे भी उन्हीं के (ग़लत)
रास्ते पर चलने के लिए दौड़ पड़े--- (70)
(मक्का
के) इन विश्वास न करनेवालों से पहले गुज़र चुके लोगों में भी ज़्यादातर लोग सही
रास्ते से भटके हुए थे, (71)
हालाँकि हमने उन्हें
सावधान करने के लिए कई रसूल [messengers] भेजे थे: (72)
तो आप देख लें कि जिन्हें
सावधान किया गया था, उन लोगों का अंजाम कैसा हुआ! (73)
हाँ, अल्लाह के नेक व समर्पित बंदों की बात अलग है
(वे सुरक्षित रहे)। (74)
नूह [Noah] ने (जब मुसीबत में) हमें पुकारा था, तो कितनी ज़बरदस्त रही हमारी जवाबी कार्रवाई!
(75)
हमने उन्हें और उनके
परिवारवालों को बड़े दुख-दर्द और बेचैनी से छुटकारा दिया, (76)
और हमने उनकी ही नस्ल को
धरती पर बाक़ी बचाए रखा, (77)
और हमने ऐसा किया कि बाद में
आने वाली पीढ़ियों में भी उन्हें हमेशा अच्छे नामों से याद किया जाता रहा: (78)
"सलाम हो नूह पर सारे संसारवालों में!" (79)
अच्छे काम करनेवालों को हम
ऐसा ही इनाम देते हैं: (80)
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले
बंदों में से था। (81)
फिर बाक़ी बचे लोगों को हमने
डूबो दिया। (82)
और इबराहीम [Abraham] भी उसी (नूह के) रास्ते पर चलने में विश्वास
रखते थे: (83)
वह अपने रब के पास एक साफ़
व समर्पित हृदय लेकर आए थे; (84)
उन्होंने अपने बाप और अपनी
क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किस की पूजा करते हो? (85)
तुम असली अल्लाह को छोड़कर
दूसरे झूठे देवताओं को कैसे मान सकते हो? (86)
अच्छा, सारे संसार के पालनेवाले [रब] के बारे में
तुम्हारा क्या ख़्याल है?" (87)
फिर उन्होंने एक नज़र ऊपर
तारों पर डाली, (88)
और कहा, "मेरी तबियत ख़राब है।" (सो मैं मेले में
नहीं जा सकता!) (89)
सो (उनकी क़ौम के लोगों ने)
पीठ फेरी और वे उन्हें छोड़कर चले गए। (90)
फिर वह [इबराहीम] उनके
देवताओं की तरफ़ गए और कहा, "क्या तुम खाते नहीं? (91)
तुम्हें क्या हुआ कि तुम
बोलते भी नहीं?" (92)
फिर वह मुड़े और उन्होंने
अपने दाहिने हाथ से (उन देवताओं की मूर्तियों पर) भरपूर वार करके उन्हें तोड़ डाला।
(93)
फिर (पता चलते ही) उनकी
क़ौम के लोग उनके पास दौड़े हुए आए, (94)
(इबराहीम
ने) कहा, "तुम उनको कैसे पूज सकते हो, जिन्हें स्वयं अपने हाथों से तराशते हो, (95)
जबकि वह अल्लाह है जिसने
तुम्हें भी पैदा किया है और जो कुछ तुम बनाते हो, उनको भी?" (96)
वे बोले, "उनके लिए एक चिता तैयार करो और उन्हें भड़कती
आग में फेंक दो!" (97)
इस तरह, वे लोग उन्हें नुक़सान पहुँचाना चाहते थे, मगर (आग का उन पर कोई असर न हुआ और) हमने उन
लोगों को पूरी तरह से नीचा दिखा दिया। (98)
उस [इबराहीम] ने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ: वह ज़रूर मेरा
मार्गदर्शन करेगा (99)
ऐ मेरे रब! मुझे ऐसी संतान
दे जो नेक लोगों मे से हो।" (100)
तो हमने उन्हें एक सहनशील
बेटे [इस्माईल, Ishmael] के होने की ख़ुशख़बरी सुना दी। (101)
फिर जब वह लड़का इतना बड़ा
हो गया कि बाप के काम में हाथ बँटाने लगा (और उनके साथ दौड़-धूप करने लगा), तब इबराहीम ने उससे कहा, "ऐ मेरे बेटे! मैंने सपने में देखा है कि मैं
तुझे क़ुरबान कर रहा हूँ। तो अब बताओ, कि तुम्हारा क्या विचार है?" उसने कहा, "ऐ मेरे बाबा! आप वही करें जिसका आपको आदेश
दिया जा रहा है, और अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे धैर्य [सब्र] करने वालों में से
पाएँगे।" (102)
फिर जब दोनों ने अपने आपको
अल्लाह (की मर्ज़ी) के आगे झुका दिया, और फिर उन्होंने अपने बेटे को माथे के बल
लिटा दिया, (103)
और... फिर हमने उसे
पुकारा, "ऐ इबराहीम! (104)
तूने सपने को सच कर
दिखाया। निस्संदेह जो लोग अच्छा काम करते हैं, हम उनको इसी प्रकार इनाम देते हैं"--- (105)
यह तो असल में एक परीक्षा
थी ताकि (उनके असल चरित्र) सामने आ जाएं --- (106)
और हमने उसके बेटे (की
जान) को एक ज़बरदस्त (जानवर की) क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया, (107)
और हमने ऐसी परम्परा बनायी
कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा: (108)
"सलाम हो इबराहीम पर! " (109)
हम नेकी करने वालों को
बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (110)
सचमुच ही वह हमारे
आज्ञाकारी बंदों में से था। (111)
और हमने इबराहीम को
(इस्माईल के बाद दूसरे बेटे) इसहाक़ की ख़ुशख़बरी दी--- एक नबी और सच्चे व
अच्छे आदमी की --- (112)
और हमने उसपर और इसहाक़ [Isaac] पर भी बरकतें [blessings] भेजीं: उनकी संतानों में से कुछ तो बहुत
अच्छे थे, मगर कुछ खुलकर अपने आप पर बुराइयाँ करने वाले थे। (113)
हमने मूसा और हारून [Moses & Aaron]
पर
भी ख़ास उपकार किया था: (114)
हमने उन्हें और उनकी क़ौम
के लोगों को बड़ी घुटन व बेचैनी से छुटकारा दिया था, (115)
हमने उनकी मदद की, जिसके नतीजे में वे ही कामयाब रहे; (116)
हमने उनको ऐसी किताब
[तोरात, Torah] दी थी जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट करने वाली थी; (117)
और हमने उन्हें सीधा मार्ग
दिखाया; (118)
और ऐसी परम्परा बनाई कि
बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा, (119)
"सलाम हो मूसा और हारून पर!" (120)
निस्संदेह जो अच्छा काम
करते हैं, हम उन्हें बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं: (121)
सचमुच ही वे दोनों हमारे
आज्ञाकारी बंदों में से थे। (122)
और इसमें शक नहीं कि
इल्यास [Elijah] भी रसूलों में से था। (123)
उसने अपनी क़ौम के लोगों
से कहा, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते? (124)
तुम ऐसा कैसे कर सकते हो
कि 'बाल' (नामक देवता) की पूजा करते हो और उसे छोड़ बैठे
हो जो सबसे महान रचना करनेवाला है, (125)
अर्थात अल्लाह, जो तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं
का भी रब है?" (126)
मगर उन लोगों ने उसे मानने
से इंकार कर दिया। इसके नतीजे में वे लोग (दंड के लिए) पकड़कर हाज़िर किए जाएँगे; (127)
मगर अल्लाह के सच्चे बंदों
की बात अलग होगी। (128)
और हमने ऐसी परम्परा बनायी
कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा।
(129)
"सलाम हो इल्यास [Elijah] पर!" (130)
निस्संदेह जो अच्छा काम
करते हैं, हम उन्हें बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं: (131)
सचमुच वह हमारे आज्ञाकारी
बंदों में से एक था। (132)
और निश्चय ही लूत [Lot] भी रसूलों में से एक था (133)
हमने उसे और उसके परिवार
के लोगों को बचा लिया था --- (134)
सिवाए एक बुढ़िया [उनकी
पत्नी] के, जो पीछे रह जाने वाले (काफ़िरों) में से थी --- (135)
बाक़ी बचे लोगों को हमने
तहस-नहस कर दिया। (136)
तो (ऐ मक्का के लोगो!) तुम
(लोग सीरिया) आते-जाते उन बस्तियों (के खंडहरों) के पास से गुज़रते हो, कभी सुबह में, (137)
और रात में भी: तो क्या
तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? (138)
और निस्संदेह यूनुस [Jonah] भी रसूलो में से एक था। (139)
जब वह भागकर पहले से भरी
हुई नौका में पहुँचा, (140)
और फिर (भँवर में फंसी
नौका को बचाने के लिए एक आदमी को उतार देना था), वह अपने नाम की पर्ची डालने में शामिल हुआ और
उसमें उसकी हार हुई (कि पर्ची में उसका ही नाम निकला) (141)
(सो
उसे नौका से फेंक दिया गया) और फिर उसे एक बड़ी मछली ने निगल लिया, जबकि उसके द्वारा कुछ दोषपूर्ण काम हो गए थे।
(142)
अगर वह उन लोगों में से न
होता जो अल्लाह की बड़ाई बयान करते रहते हैं, (143)
तो वह उसी (मछली) के पेट
में उस (क़यामत के) दिन तक पड़ा रहता, जब सारे लोग (क़ब्रों से) उठाए जाएँगे। (144)
मगर हमने उसे एक खुले व
उजाड़ तट पर (मछली के पेट से) बाहर निकाल दिया, जबकि वह (अभी) बीमार था। (145)
और हमने उस पर (कद्दू का)
बेलदार पेड़ उगा दिया था, (146)
फिर हमने उसे एक लाख बल्कि
उससे अधिक (लोगों) की ओर [नैनवा, Nineveh नामी शहर में] रसूल बनाकर भेजा, (147)
उन लोगों ने (सच्चाई पर)
विश्वास किया, तो हमने उन्हें एक ज़माने तक ज़िंदगी के सुख भोगने का मौक़ा दे
दिया। (148)
[ऐ
रसूल] अब उन (मक्का के काफ़िरों] से पूछें, "क्या यह सही है कि तुम्हारे रब के पास तो
बेटियाँ हैं, और उन लोगों ने अपने लिए बेटे चुने हैं (क्योंकि उन्हें तो
बेटियाँ पसंद नहीं)? (149)
या क्या हमने फ़रिश्तों को
औरतों के रूप में बनाया और इन्हें बनाते समय वे यह सब देख रहे थे?" (150)
बिल्कुल नहीं!, यह झूठी व मनघड़ंत बातें हैं, जब वे कहते हैं, (151)
कि "अल्लाह के यहाँ
औलाद हुई है!" निश्चय ही वे झूठे हैं ।(152)
क्या सचमुच अल्लाह ने
बेटों की अपेक्षा बेटियाँ चुन ली हैं? (153)
तुम्हें क्या हो गया है? आख़िर तुम अपने फ़ैसले किस तरह करते हो? (154)
तो क्या तुम सोच-विचार
नहीं करते? (155)
या शायद तुम्हारे पास कोई
पक्का सुबूत है? (156)
अगर तुम सच बोल रहे हो, तो ले आओ अपनी किताबें। (157)
वे झूठा दावा करते हैं कि
जिन्नों के साथ उनकी रिश्तेदारी है, हालाँकि उन (जिन्नों) को अच्छी तरह से मालूम
है कि वे पकड़कर (अल्लाह के सामने) हाज़िर किए जाएँगे ---- (158)
अल्लाह उन चीज़ों से कहीं
ऊँचा है, जो कुछ वे उसके बारे में बातें बनाते रहते हैं----- (159)
अल्लाह के जो सच्चे बंदे
होते हैं, वे ऐसे काम नहीं करते ---- (160)
तुम और जिनकी पूजा तुम
करते हो, (161)
तुम किसी को भी अल्लाह के
विरुद्ध (बग़ावत के लिए) बहका नहीं सकते, (162)
सिवाए उनके जिनकी (क़िस्मत
में) जहन्नम की आग में जलना लिखा हुआ है। (163)
और (फ़रिश्ते तो कहते हैं
कि), “हममें से हर एक के लिए ख़ास जगह पहले से तय की हुई है: (164)
और हम (हुक्म मानने के
लिए) क़तारों में खड़े रहते हैं। (165)
और सचमुच हम अल्लाह की
बड़ाई का गुणगान करते रहते हैं।” (166)
और वे [काफ़िर] लोग तो यह
कहा करते थे कि (167)
"अगर हमारे पास भी पीछे गुज़रे हुए लोगों की तरह नसीहत की कोई
किताब होती, (168)
तो हम ज़रूर अल्लाह के
सच्चे बंदों में शामिल होते", (169)
इसके बावजूद वे अब (क़ुरआन
को) मानने से इंकार करते हैं। तो अब जल्द ही उन्हें पता चल जाएगा। (170)
और हम अपने उन बंदों में
से जो रसूल बनाकर भेजे गए, पहले ही वादा कर चुके हैं: (171)
यही वे लोग हैं जिनकी मदद
की जाएगी, (172)
और जो कोई भी इसके समर्थन
में खड़ा होगा, जीत उन्हीं लोगों की होगी। (173)
अतः [ऐ रसूल] कुछ समय के
लिए आप उनसे मुँह मोड़ लें। (174)
उन्हें देखते रहें: वे
जल्द ही (अपना परिणाम) देख लेंगे! (175)
क्या वे सचमुच हमारी यातना
के जल्दी आ जाने की कामना करते हैं? (176)
तो जब सचमुच वह [यातना]
उनके आँगन में आ उतरेगी, तो वह सुबह उनके लिए बड़ी ही दर्दनाक होगी, जिन्हें सावधान किया जा चुका था! (177)
[ऐ
रसूल!] आप कुछ समय के लिए उन विश्वास न करनेवालों से मुँह मोड़ लें। (178)
उन्हें देखते रहें: वे
बहुत जल्द (इसका परिणाम) देख लेंगे! (179)
तुम्हारा रब बहुत
इज़्ज़तवाला व महान रब है, और वह इन चीज़ों से कहीं ऊँचा है, जिसके बारे में लोग बातें बनाते हैं! (180)
सलाम है रसूलों पर; (181)
औऱ सारी प्रशंसा अल्लाह के
लिए है, जो सारे संसारों का रब है। (182)
नोट:
2: फ़रिश्ते
शैतानों को डाँटते-फटकारते हैं जब वे ऊपर आसमान से कुछ ख़बर पता लगाने की कोशिश
करते हैं।
10: इस बात का वर्णन सूरह हिज्र (15: 17-18) में भी आया है।
11: बिना किसी चीज़ के [Out of nothing] पूरी सृष्टि, यानी सूरज, तारे, चाँद, पहाड़ आदि की रचना कर देने वाले अल्लाह के लिए
मिट्टी से बने इंसान को उसकी मौत के बाद दोबारा पैदा करने में क्या मुश्किल हो
सकती है!
19: यह तब होगा जब दूसरी बार नरसिंघा बजाया
जाएगा।
28: यानी तुम ने दबाव डाला, सच्चाई के नाम पर झाँसा दिया, भलाई करने से रोका, झूठी क़समों के साथ धोखे में डाला इत्यादि।
65: कुछ लोगों ने इसका अनुवाद “साँपों का सिर” भी किया है, और इसीलिए ज़क़्क़ूम के पेड़ को “नागफनी” का पेड़ समझा है।
82: नूह (अलै) और उनकी क़ौम का पूरा विवरण सूरह
हूद (11: 36) में आया है।
98: इस घटना का वर्णन सूरह अंबिया (21: 68-70) में आया है।
99: हज़रत इबराहीम इराक़ के रहने वाले थे, इस घटना के बाद वह सीरिया की तरफ़ चले गए थे।
102: यह तो एक सपना था, मगर नबियों का सपना सच होता है जिसमें अल्लाह
का संदेश छिपा होता है।
107: हज़रत इबराहीम की छुरी हज़रत इस्माईल के बजाए
एक मेंढे पर चली, जिसे अल्लाह
ने अपनी क़ुदरत से उसे वहाँ भेज दिया, और इस्माइल (अलै.) ज़िंदा बच गए।
123: सुलैमान (अलै.) के बाद जब इसराईल की संतानों
में एक ख़ुदा को छोड़कर धीरे-धीरे बहुदेववाद शुरू हुआ, तो अल्लाह ने इल्यास (अलै.) को वहाँ पैग़म्बर
बनाकर भेजा। बाइबल में है कि राजा अख़िअब की बीवी अज़ाबील ने “बाल” नामक देवता की पूजा शुरू की थी, जब इल्यास (अलै.) ने उन्हें रोका, तो उनको क़त्ल कर देने की योजनाएं बनने लगीं।
अल्लाह ने उनकी योजना असफल कर दी और उन लोगों को मुसीबतों में डाल दिया और हज़रत
इल्यास को अपने पास बुला लिया।
139: हज़रत यूनुस (अलै.) का वर्णन सूरह यूनुस (10: 98) और सूरह अंबिया (21: 87) में भी है। वह इराक़ के शहर नैनवा में भेजे गए
थे, वहाँ काफ़ी समय
तक वह अल्लाह का संदेश देते रहे। जब उन्होंने देखा था कि उनकी क़ौम के लोग एक
अल्लाह पर विश्वास नहीं करते और ग़लत कामों से नहीं रुक रहे हैं, तो उन्होंने लोगों को कड़ी चेतावनी दी कि अब
तुम पर तीन दिन के अंदर भयानक यातना आकर रहेगी। वहाँ के लोगों ने यह तय किया कि
अगर हज़रत यूनुस बस्ती छोड़कर चले जाते हैं, तो यह इशारा होगा कि वह ठीक कह रहे हैं। इस
बीच अल्लाह के हुक्म से हज़रत यूनुस (अलै,) बस्ती छोड़कर चले गए। इधर बस्ती के लोगों ने
देखा कि हज़रत यूनुस बस्ती में नहीं हैं, उन्हें यातना के आने का यक़ीन हो गया। उन
लोगों ने अल्लाह के सामने झुकते हुए तौबा की जिसके नतीजे में उनसे यातना टल गई।
इधर तीन दिन गुज़र जाने के बाद हज़रत यूनुस ने देखा कि जब कोई यातना नहीं आयी, तो उन्हें डर हुआ कि अगर बस्ती वालों ने
उन्हें देख लिया तो उन्हें झूठा कहेंगे और हो सकता है कि क़त्ल कर दें। सो वह बस्ती
में जाने के बजाए समंदर की तरफ़ निकल गए। अल्लाह को यह बात पसंद नहीं आयी कि बिना
इजाज़त उन्होंने बस्ती छोड़ने का फ़ैसला क्यों कर लिया। इधर वह एक नौका में सवार हो गए जो आदमियों से भरी
हुई थी, ज़्यादा वज़न हो
जाने के कारण नौका डूबने को आई, ऐसे में नौका से एक आदमी को कम करने के लिए
उनके नामों की लाटरी लगाई गई जिसमें हज़रत यूनुस का ही नाम निकला, अत: उन्हें पानी में फेंक दिया गया, उन्हें एक बड़ी मछली ने निगल लिया, कुछ अवधि आप पेट में ही रहे, फिर अल्लाह के हुक्म से मछली ने आपको किनारे
पर उगल दिया।
149: मक्का के बहुदेववादी लोग फ़रिश्तों को अल्लाह
की बेटियाँ कहा करते थे, हालाँकि
अल्लाह को औलाद की ज़रूरत नहीं। मज़े की बात यह कि ख़ुद ये लोग बेटियों को बिल्कुल
पसंद नहीं करते थे, बल्कि कुछ लोग
बेटियों को ज़िंदा दफ़न कर देते थे।
158: एक और मान्यता थी जिसके अनुसार जिन्नों के
सरदारों की बेटियाँ फ़रिश्तों की माताएं मानी जाती थी।
सूरह 15: अल-हिज्र
[पत्थर का शहर/ Stone City]
यह एक मक्की सूरह है, इसका नाम अल-हिज्र के लोगों के ज़िक्र (80-84) की वजह से पड़ा है, जिनके पास हज़रत सालेह अलै. नबी बनकर आए थे।
ये सब मिसालें ऐसे बहुत से लोगों की हैं जिन्होंने सच्चाई पर विश्वास नहीं किया, अपने नबियों को मानने से इंकार किया, और अंत में सज़ा भुगती। इसे सुनाने का मक़सद
अरब के इंकार करनेवालों को चेतावनी देना था। हर एक के लिए सज़ा देने का समय तय किया
हुआ है, इसलिए पैग़म्बर साहब को कहा गया है कि वह धीरज से काम लें, और जो कुछ विश्वास न करनेवाले कहते हैं उस पर
दुखी न हों, और अपनी इबादत जारी रखें। यह सूरह प्रकृति का उदाहरण सामने
लाती है, जहाँ इबलीस [शैतान] इस बात पर ज़ोर देता है कि वह इंसानों को
भटकाता रहेगा। यहाँ अल्लाह का अपने बंदों पर फ़ज़ल व करम दिखाया गया है, और इसी तरह शैतान से इंसानों को क्या-क्या ख़तरा
हो सकता है, यह भी बताया गया है।
विषय:
01 : क़ुरआन की आयतें
02-05: सज़ा मिलना तय है
06-15: रसूलों का हमेशा लोगों ने मज़ाक़ उड़ाया है
16-25: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
26-27: इंसानों और जिन्नों को पैदा किया जाना
28-48: इबलीस [शितान] की कहानी
49-60: इबराहीम (अलै) और उनके मेहमानों का क़िस्सा
61-77: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
78-84: जंगलों में रहने वाले, और पत्थर के शहर में बसने वाले लोग
85-86: फ़ैसले की घड़ी का आना तय है
87-99: रसूल का उत्साह बढ़ाया गया
अल्लाह
के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰।
यह आयतें हैं आसमानी
किताब--- क़ुरआन की, जो बातों को साफ़ व स्पष्ट कर देती है। (1)
जिन लोगों ने (इस किताब की
सच्चाई को मानने से) इंकार किया है, एक समय आएगा जब वे कामना करेंगे कि क्या ही
अच्छा होता कि हम इसको मानते और अल्लाह के सामने झुकनेवालों में होते! (2)
सो [ऐ रसूल!] आप उनको उनके
हाल पर छोड़ दें कि खाएँ-पिएँ और मज़े उड़ाएँ, और (झूठी) आशाओं के भुलावे में मगन रहें:
लेकिन बहुत जल्द उन्हें मालूम हो जाएगा (कि वे किस धोखे में पड़े हुए थे)! (3)
हमने कभी किसी बस्ती के
रहनेवालों को (उस समय तक) बर्बाद नहीं किया, जब तक कि (हालात के अनुसार) उनकी बर्बादी का
तय किया हुआ समय नहीं आ गया; (4)
किसी समुदाय के लोग न (तय
किए हुए) समय को पहले ला सकते हैं और न तो (तय) समय को पीछे ढकेल सकते हैं। (5)
[ऐ
रसूल!] वे (आपके बारे में) कहते हैं, "ऐ वह, कि तुम पर नसीहत [क़ुरआन] उतरी है! (हमारे
ख़्याल से) तुम निश्चय ही दीवाने हो! (6)
अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हमारे सामने फ़रिश्तों को क्यों नहीं ले
आते?" (7)
मगर हम फ़रिश्तों को (ज़मीन
पर) तभी उतारते हैं जब हमें न्याय (स्थापित) करना होता है, और तब इन लोगों को (बचने की) कोई मुहलत नहीं
मिलेगी। (8)
हमने ख़ुद इस क़ुरआन को
उतारा है, और हम ख़ुद ही इसकी हिफ़ाज़त करेंगे। (9)
आपसे पहले भी [ऐ रसूल], हम बहुत सारी पुरानी क़ौमों के बीच अपने
(संदेशों के साथ) रसूलों को भेज चुके हैं, (10)
मगर कोई भी रसूल ऐसा नहीं
हुआ, कि जो लोगों के बीच गया हो और उन लोगों ने उसकी हँसी न
उड़ायी हो: (11)
इस तरह हम अपराधियों के
दिलों को ऐसा बना देते हैं जिनसे होकर हमारे संदेश (बिना उन पर असर डाले हुए) निकल
जाते हैं। (12)
वे इस पर विश्वास नहीं
करेंगे। पुराने ज़माने के लोगों ने भी ऐसा ही किया था, (13)
और यहाँ तक कि अगर हम उनके
लिए आसमान तक जाने का कोई दरवाज़ा खोल दें, और वे इतनी ऊँचाई पर चढ़कर वहाँ तक पहुँच भी
जाएं, (14)
तब भी वे यही कहेंगे, "(असल में यह कुछ नहीं), बस नज़र का धोखा है। हम लोगों पर तो जादू कर
दिया गया है!" (15)
हमने आसमान में तारों के समूहों (को ख़ास-ख़ास डिज़ाइन का) बनाया है जो देखनेवालों को बहुत ख़ूबसूरत लगता है, (16)
और उसे हर दुत्कारे हुए
[मरदूद] शैतान से सुरक्षित रखा है: (17)
अगर कोई (शैतान) चोरी-छिपे
कुछ सुनने की ताक में रहता है, तो एक चमकता हुआ शोला उसका पीछा करता है। (18)
और (देखो!) हमने धरती (की
सतह) को (फ़र्श की तरह) फैला दिया, उसमें मज़बूत पहाड़ों को गाड़ दिया और हर एक
चीज़ (सही संतुलन के साथ) नपे-तुले अन्दाज़ में उगा दी। (19)
और उसमें तुम्हारे
गुज़र-बसर के सामान पैदा किए, और उन सब जीवों के लिए भी किया जिनको रोज़ी
देनेवाले तुम नहीं हो। (20)
कोई भी चीज़ ऐसी नहीं
जिसके भंडार हमारे पास न हों, फिर भी हम उसे सही व उचित मात्रा में उतारते
हैं: (21)
और (देखो!) हम ऐसी हवाएं
चलाते हैं जो बादलों को पानी से भर देती हैं, और फिर हम तुम्हारे पीने के लिए आसमान से
पानी बरसाते हैं---- जहाँ से पानी निकल के आता है, उस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है। 22)
यह हम हैं जो ज़िंदगी और
मौत देते हैं; और हम ही हैं जो (हर चीज़) के वारिस हैं। (23)
हमें एकदम ठीक-ठीक मालूम
है कि कौन है जो पहले आया है, और कौन है जो बाद में आनेवाला है। (24)
[ऐ
रसूल] यह आपका रब है जो (क़यामत के दिन) उन सबको एक साथ इकट्ठा करेगा: वह बेहद
ज्ञानी और सब कुछ जाननेवाला है। (25)
हमने इंसान को सड़ी हुई
मिट्टी के गारे से बनाया है जो सूखकर बजने लगता है---- (26)
और जिन्न को इससे पहले, हम जलती हुई हवा की गर्मी से पैदा कर चुके
थे। (27)
[ऐ
रसूल] जब ऐसा हुआ कि आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा था, "मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से
एक आदमी पैदा करनेवाला हूँ। (28)
तो जब मैं उसे पूरा बना
लूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो तुम सब उसके आगे झुक जाना," (29)
और सब के सब फ़रिश्तों ने
ऐसा ही किया। (30)
मगर इबलीस न माना: उसने
दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) झुकने से इंकार कर दिया। (31)
अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तुम दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के
आगे) क्यों नहीं झुके?" (32)
और उसने जवाब दिया, "मैं ऐसे मामूली आदमी के आगे नहीं झुक सकता
जिसको तूने सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया है।" (33)
अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तुझे ज़ात-बाहर [Outcast] किया जाता है, (34)
और फ़ैसले के दिन तक तुझ पर
फिटकार रहेगी।" (35)
इबलीस ने कहा, "मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए
(ज़िंदा रहने की) मुहलत दे दे, जब मरे हुए लोग दोबारा (ज़िंदा करके) उठाए
जाएँगे।" (36)
अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तुझे मुहलत दी जाती है, (37)
मगर (यह मुहलत) एक तय किए
हुए समय के दिन तक (ही होगी)।" (38)
इबलीस ने फिर अल्लाह से
कहा, "चूँकि तूने मेरे लिए सीधे मार्ग से भटकना तय कर दिया है, अतः मैं भी धरती पर इंसानों को इस तरह
बहकाऊंगा (कि उन्हें बुरी चीज़ें बहुत भली लगने लगेंगी) और उन सबको (सीधे मार्ग से)
भटका कर रहूँगा, (39)
सिवाए उनके, जो सचमुच तेरे नेक व भक्ति में डूबे हुए
बन्दे होंगे (जो मेरे बहकावे में आने वाले नहीं)।" (40)
अल्लाह ने कहा, "बस यही सीधा रास्ता है जो मुझ तक पहुँचने
वाला है: (41)
मेरे (असल) बन्दों पर तो
तेरा कोई ज़ोर चलने वाला नहीं है, तेरा ज़ोर तो केवल उन पर चलेगा जो राह से भटक
गए हों और तेरे पीछे-पीछे चलते हों। (42)
जहन्नम उनका ठिकाना होगा, इस बात का उन सबसे वादा है, (43)
उसके सात दरवाज़े हैं, उनकी हर टोली के हिस्से में एक दरवाज़ा आएगा
(जिससे होकर वे जहन्नम में दाख़िल होंगे)। (44)
मगर जो सच्चे व अच्छे
[मुत्तक़ी] लोग हैं, वे तो बाग़ों और बहते हुए पानी के सोतों [spring] के बीच (आराम से) होंगे---- (45)
(उनसे
कहा जाएगा), "सलामती के साथ बेधड़क (इन बाग़ों में) दाख़िल हो जाओ----
" (46)
उनके दिलों से हम उनके
मन-मुटाव निकाल देंगे: वे तख़्तों पर भाइयों की तरह आमने-सामने बैठे होंगे। (47)
न तो वहाँ उन्हें कभी कोई
थकान महसूस होगी और न उन्हें कभी वहाँ से बाहर निकाला जाएगा।” (48)
[ऐ
रसूल!] मेरे बन्दों को बता दें कि मैं (गुनाहों का) बड़ा माफ़ करनेवाला और बेहद
दयावान हूँ, (49)
मगर मेरी यातना भी सचमुच
बहुत ही दर्दनाक होती है। (50)
उन्हें इबराहीम [Abraham] के मेहमानों [फ़रिश्तों] का क़िस्सा भी बता दें: (51)
जब वे इबराहीम के यहाँ आए और
कहा, “तुम
पर सलाम हो”, इबराहीम
ने (अजनबियों को देखकर) कहा, "हमें तो तुमसे डर मालूम होता है।" (52)
"डरो नहीं”, वे बोले, “हम तो तुम्हें एक बेटे के पैदा होने की ख़ुशख़बरी
देने आए हैं जो बड़ा ज्ञानी होगा।" (53)
इबराहीम ने कहा, "तुम मुझे किस तरह ऐसी ख़बर सुना सकते हो जबकि
पता है कि मुझ पर बुढ़ापा आ चुका है? यह भला कैसी ख़बर हुई?" (54)
उन्होंने कहा, "हमने जो बात बतायी है वह सच है, इसलिए तुम निराश न हो", (55)
इबराहीम ने कहा, "गुमराहों को छोड़कर कौन है जो अपने रब की रहमत [Mercy] से निराश हो सकता है?" (56)
और फिर उनसे पूछा, "ऐ फ़रिश्तों, तुम किस अभियान पर आए हो?" (57)
वे बोले, "हम तो एक अपराधी [लूत की] क़ौम की ओर (उनकी
तबाही के लिए) भेजे गए हैं।” (58)
मगर हाँ, लूत [Lot] के घरवालों को हम बचा लेंगे, (59)
सिवाए उसकी पत्नी के: हम यह
बात तय कर चुके हैं कि वह उन लोगों में से होगी जो (तबाह होने के लिए) पीछे रह
जाएंगे।" (60)
फिर जब वे भेजे हुए दूत
[फ़रिश्ते] लूत के घरवालों के पास पहुँचे, (61)
तो लूत ने कहा, "तुम (लोग) तो अजनबी मालूम होते हो।" (62)
उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारे पास वह (यातना) लेकर आ गए हैं, जिसके बारे में ये लोग कहा करते थे कि ऐसा कभी
होने वाला नहीं है। (63)
और हम तुम्हारे पास सच्चाई
लेकर आए हैं, और हम
बिलकुल सच कहते हैं, (64)
तुम अपने घरवालों को लेकर रात
के पिछले पहर निकल जाना, और स्वयं उन सबके पीछे-पीछे चलना। और (ध्यान रहे!) तुममें से कोई भी पीछे
मुड़कर न देखे। बस चुप-चाप चलते जाना, जहाँ जाने का तुम्हें आदेश हुआ है।" (65)
हमने इस फ़ैसले की जानकारी लूत
को दे दी: सुबह होते ही उस शहर के लोगों के आख़िरी अवशेष [remnants] तक पूरी तरह से मिटा दिए जाएंगे। (66)
इतने में शहर के लोग नाच-गाना
करते हुए (लूत के पास) आ पहुँचे, (67)
उसने लोगों से कहा, "ये लोग मेरे मेहमान हैं, (इनके सामने) मेरा अपमान न करो। (68)
अल्लाह से डरो और मुझे
शर्मिंदा न करो।" (69)
उन लोगों ने जवाब दिया, "क्या हमने तुम्हें किसी दूसरे आदमी (की इज़्ज़त) को
बचाने से या ऐसे लोगों को अपने यहाँ ठहराने से रोका नहीं था?" (70)
लूत ने कहा, "तुम को अगर (सेक्स) करना ही है, तो (छोड़ो मेहमान मर्दों को), इसके लिए ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद
हैं।" (71)
[तब
फ़रिश्तों ने लूत से कहा], आपकी ज़िंदगी की क़सम! वे अपनी मौज-मस्ती के नशे में धुत हैं।” (आपकी बात सुननेवाले नहीं!) (72)
और सुबह का सूरज निकलते ही एक
भयानक धमाके ने उन्हें धर दबोचा: (73)
हमने उस शहर को ऐसा उलट दिया
कि सब ऊपर का नीचे और नीचे का ऊपर हो गया, और उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए। (74)
सचमुच इसमें उन लोगों के लिए
बड़ी निशानी है जो इससे सीख लेना चाहते हैं----(75)
यह (खंडहर बनी) जगह अब भी
मुख्य रास्ते पर मौजूद है----(76)
सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक निशानी है जो ईमान रखते हैं। (77)
(इसी
तरह) जंगलों में रहनेवाले [ऐका यानी मदयन के क़बीले के लोग] भी अत्याचारी थे, (78)
उन्हें भी हमने (उनके
अत्याचार की) सज़ा दी थी; और ये (लूत व मदयन के लोगों की) दोनों बस्तियाँ मुख्य मार्ग
पर अब भी स्थित हैं जिसे देखा जा सकता है। (79)
अल-हिज्र [पत्थर का शहर]
में (समूद की क़ौम) के लोगों ने भी हमारे रसूलों को मानने से इंकार किया था: (80)
हमने उन्हें अपनी
निशानियाँ दी थीं, मगर वे उनसे मुँह मोड़े रहे। (81)
वे पहाड़ों को काट-काटकर
अपने घर बनाते थे कि उसमें सुरक्षित रह सकें---- (82)
मगर एक दिन सुबह-सवेरे उठे
तो उन्हें एक ज़ोरदार धमाके ने धर दबोचा। (83)
फिर जो कुछ उन्होंने कमाया
था, वह उनके कुछ काम न आ सका। (84)
हमने आसमानों और ज़मीन को
और वे सारी चीज़ें जो उनके बीच में हैं, उन्हें बिना किसी सही मक़सद के यूँ ही नहीं
बना दिया है: और (क़यामत की) वह घड़ी तो अवश्य आकर रहेगी, अतः [ऐ रसूल!] आप (उनके विरोध के बावजूद)
उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए उन्हें झेल लें। (85)
आपका रब हर चीज़ को पैदा करनेवाला, और सब (की हालत) जाननेवाला है। (86)
हमने आपको बार-बार दोहरायी
जाने वाली सात आयतें दी हैं [सूरह फ़ातिहा], और इसके साथ पूरी क़ुरआन दी है जो महानता से
भरी है। (87)
हमने उनमें से कुछ लोगों
को (इस दुनिया में) थोड़ा मौज करने के लिए कुछ सुख-सामग्री दे रखी है, आप उन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें। और न
ही आप उन (काफ़िरों) के लिए बेकार ही दुखी हों। बल्कि ईमानवालों के लिए अपने बाज़ू
फैलाए रखें (और उन पर हमेशा ध्यान दें), (88)
और कह दें, "मैं तो बस तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के
लिए) साफ़-साफ़ चेतावनी देनेवाला हूँ," (89)
जिस तरह हमने (अपनी
चेतावनी) उन लोगों के लिए भेजी थी जिन लोगों ने अपने आपको कई समूहों में बाँट रखा
था (और वे तीर्थ-यात्रियों को क़ुरआन के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे), (90)
और क़ुरआन को बुरा-भला
कहते थे ---- (91)
आपके रब की क़सम! हम अवश्य
ही उन सबसे पूछताछ करेंगे, (92)
जो कुछ (कर्म) वे करते रहे
थे। (93)
अतः जिस बात को कहने का
आदेश हुआ है, उसकी खुले-आम घोषणा कर दें, और बहुदेववादियों [idolaters] की ओर कोई ध्यान न दें। (94)
वे लोग जो आपके संदेश का
मज़ाक़ उड़ाते हैं, उनके ख़िलाफ़ हम काफ़ी हैं। (95)
जो अल्लाह के साथ दूसरों
को भी पूजने के लायक़ ठहराते हैं, तो शीघ्र ही उन्हें (सच्चाई) मालूम हो जाएगी!
(96)
हम अच्छी तरह जानते हैं कि
वे जो कुछ कहते हैं, उन बातों से (तकलीफ़ के मारे) आपका दिल रुकने लगता है। (97)
सो अपने रब की महानता का
(दिन-रात) गुणगान करें और उन लोगों में शामिल हो जाएं जो उसके आगे झुके रहते हैं: (98)
और अपने रब की इबादत में
उस समय तक लगे रहें, जब तक कि वह (मौत) न आ जाए जिसका आना निश्चित है। (99)
नोट:
3: विश्वास न करने वाले दुनिया की ज़िंदगी में मगन रहते हैं, जबकि मुसलमान दुनिया में रहता ज़रूर है और
इसमें अल्लाह की नेमतों से फ़ायदा भी उठाता है, मगर इस दुनिया को अपनी ज़िंदगी का मक़सद नहीं
बनाता, बल्कि उसे परलोक [आख़िरत] की भलाई के लिए इस्तेमाल करता है।
8: जिस क़ौम के पास रसूल भेजे जाते हैं और जब वह क़ौम अल्लाह के
संदेशों को मानने से इंकार कर देती है और आदेश तोड़ने में हदें पार कर जाती है, तब फ़रिश्तों को भेज दिया जाता है, ताकि बिना कोई मुहलत दिए हुए पूरी क़ौम को
तबाह-बर्बाद कर दिया जाए।
9: क़यामत तक के लिए क़ुरआन आख़िरी आसमानी किताब है, और इसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ख़ुद अल्लाह ने लिया
है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त इस तरह की है कि यह छोटे-छोटे बच्चों को याद हो जाती है, और पूरी दुनिया में लाखों लोग हैं जिन्हें
पूरी किताब याद है, इस तरह, इसमें मामूली फेरबदल भी मुमकिन नहीं है।
17: देखें सूरह जिन्न (72: 8-9)
18: शैतान आसमान के ऊपर जाकर ऊपर की दुनिया की ख़बरें लेना चाहते
हैं, ताकि वह ख़बरें काहिनों [तांत्रिकों] और भविष्यवक्ताओं
[नजूमियों] तक पहुँचाएं, और उनके द्वारा वे लोगों को यह बताएं कि उन्हें छिपी हुई बातें
भी मालूम होती हैं। लेकिन आसमान में उनके घुसने पर रोक लगी हुई है, वैसे ये शैतान आसमान के क़रीब जाकर चोरी-छिपे
फ़रिश्तों की बातें सुनने की कोशिश करते थे, और वहाँ से कोई बात कान में पड़ जाती, तो उसमें नमक-मिर्च लगाकर काहिनों को बता
देते थे। लेकिन मुहम्मद (सल्ल.) के दुनिया में आने के बाद जब कभी शैतान आसमान के
नज़दीक जाने की कोशिश करते हैं, तो एक शोला उनका पीछा करता हुआ उन्हें मार
भगाता है। देखें सूरह जिन्न 72: 8-10
23: सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद भी अल्लाह हमेशा बाक़ी रहेगा
26: इंसान का मतलब यहाँ पर आदम (अलै.) की रचना से है, देखें सूरह बक़रा (2: 30-34)
27: जिन्नों में सबसे पहले जिस जिन्न को पैदा किया गया, उसका नाम जान था।
28: असल में आदम (अलै) को चरणों में बनाया गया था। सबसे पहले
धूल [Dust] से बनाया जो बाद में कीचड़ [Mud] जैसी चीज़ बन गई, और फिर उसके बाद खनखनाती हुई मिट्टी [Clay] बन गई।
38: शैतान को जो मुहलत दी गयी है, वह शायद पहली बार नरसिंघे [सूर] में फूँक
मारने तक दी गई है, जिसके बाद शैतान समेत सारे जीवों को मौत आ जाएगी।
42: असल बंदे वे होंगे जो अल्लाह के हुक्म पर चलने का पक्का
इरादा रखते हैं, और उसी से मदद माँगते हैं, उनकी नेकी और अल्लाह की सच्ची भक्ति उन्हें
बहकने से बचा लेगी।
47: अपने दूसरे ईमानवालों के साथ अगर उनके कुछ पुराने मन-मुटाव
रहे होंगे, तो वे मिटा दिए जाएंगे।
52: मेहमानों के लिए इबराहीम (अलै.) ने भुना गोश्त पेश किया, जब उन्होंने देखा कि वे खा नहीं रहे, तो उन्हें लगा कि ये कोई दुश्मन हैं, और ज़रूर किसी बुरे इरादे से आए हैं। देखें
सूरह हूद (11: 69-83)
62: लूत (अलै.) की क़ौम के मर्द सेक्स के लिए दूसरे मर्दों के
पास जाते थे, यानी [Homo-sexual] थे, और वे अपने यहाँ आए हुए अजनबियों को भी नहीं
छोड़ते थे। देखें सूरह अ'राफ़ [7: 80]
67: ये फ़रिश्ते ख़ूबसूरत नौजवान की शक्ल में आए थे, और उन्हें वहां के लोगों ने देख लिया था, इसलिए वे ख़ुशी मनाते हुए अपनी हवस पूरी करने
के लिए आए थे।
76: लूत अलै के क़ौम की बस्तियां जॉर्डन (Jordan) में मृत सागर (Dead Sea) के आसपास के इलाकों में फैली हुई थी, और उनके खंडहर अरब से सीरिया जाते समय
व्यापारिक मार्ग पर ही पड़ते थे।
78: "ऐका" यानी घना जंगल, हज़रत शोएब (अलै.) की क़ौम घने जंगल के पास
रहती थी। कुछ लोग कहते हैं कि इस बस्ती का नाम मदयन था, जोकि जार्डन में है, और यह भी सीरिया जाने के रास्ते में पड़ता था। कुछ लोग इसे कोई दूसरी बस्ती बताते हैं। इनका
वर्णन सूरह आराफ़ (7:85-93) में थोड़े विस्तार से आया है। देखें 26: 176-191; 38: 13; 50: 14
80: "हिज्र" यानी "पत्थर का शहर", जो कि मदीने के उत्तर में था, और जार्डन के पेट्रा जैसा होगा, यह समूद के क़ौम की उन बस्तियों का नाम था
जिनके पास हज़रत सालेह (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था, इसका वर्णन भी सूरह आराफ़ (7: 73-79) में आया है।
85: इस कायनात को पैदा करने का असल मक़सद यह है कि नेक लोगों को
परलोक [आख़िरत] में इनाम दिया जाए, और बुरे कर्म करने वालों को सज़ा दी जाए, अत: मुहम्मद (सल्ल.) को यहाँ तसल्ली दी जा
रही है कि आप इन विश्वास न करने वालों के कर्मों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उनका फ़ैसला ख़ुद अल्लाह करेगा। ....
ध्यान देने की बात यह है कि मक्का के लोगों द्वारा तकलीफ़े पहुँचाने के बावजूद उनसे
बदला न लेते हुए उनसे अच्छा व्य्वहार और बर्दाश्त करने को कहा गया है।
87: "सात आयतों" का मतलब "सूरह फ़ातिहा" है जो हर नमाज़ में बार-बार दोहरायी जाती है, यहाँ उसके ज़िक्र का मतलब शायद यह है कि
मुसीबत और तकलीफ़ में हमेशा अल्लाह से ही मदद माँगनी चाहिए और सीधे रास्ते पर चलते
रहने की दुआ करनी चाहिए।
90: मक्का के विश्वास न करने वालों ने अपने कुछ समूह बना रखे थे
जो कि मक्का में आने वाले तीर्थ-यात्रियों [हाजियों] को क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल)
के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे।
91: मक्का के कुछ लोग क़ुरआन के बारे में तरह-तरह की झूठी बातें
कहते थे, जैसे कि यह जादू है, या शायरी है, या पुराने ज़माने की कहानियाँ है आदि। कुछ लोग
इसकी कुछ बातों को मान लेते थे और कुछ बातों को अपनी मर्ज़ी से नहीं मानते थे, इसे ही क़ुरआन को बुरा-भला [Abuse] कहना कहा गया है।
94: कहा जाता है कि इस आयत के बाद मुहम्मद (सल्ल.) लोगों के
सामने अल्लाह का संदेश खुले-आम पहुँचाने लगे, इससे पहले तक वह लोगों से अलग-अलग बातें करते
थे।
सूरह 50: क़ाफ़ [Qaf]
यह एक मक्की
सूरह है जिसमें मुख्यत: मुर्दों को दोबारा उठाए जाने और फ़ैसले के दिन के आने के
बारे में विश्वास न करने वालों का वर्णन आया है। इसके साथ पिछली पीढ़ियों के
विश्वास न करने वालों के अंजाम के भी हवाले दिए गए हैं (12-14), और इसका असल मक़सद है मक्का के विश्वास न करने
वालों को चेतावनी देना और पैग़म्बर साहब को आश्वस्त करना। अल्लाह को किसी भी चीज़ के
पैदा करने की बेपनाह क्षमता है, इस बात को आगे बढ़ाते हुए मुर्दा लोगों को
ज़िंदा करके उठाने की अल्लाह की सलाहियत की तरफ़ इशारा किया गया है (आयत 3-11), और इस बात पर
ज़ोर दिया गया है कि दोबारा उठाए जाने के दिन आदमी में कोई ताक़त न होगी (आयत 20-30). सूरह की
शुरुआत और समाप्ति दोनो ही में क़ुरआन का ज़िक्र मिलता है।
विषय:
01-11: विश्वास न
करने वालों ने क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को ठुकराया
12-14: पहले के
विश्वास न करने वालों की मिसालें
15-19: मौत आना और
मरने के बाद एक दिन दोबारा उठाया जाना निश्चित है
20-35: क़यामत और उसके
बाद होने वाले फ़ैसले का मंज़र
36-37: पुरानी
पीढ़ियों को सज़ा मिली: एक चेतावनी
38-45: रसूल मुहम्मद
(सल्ल.) को आगे की कार्रवाई के लिए सलाह
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़ाफ़॰;
क़ुरआन मजीद
की क़सम! (कि मुर्दा आदमियों को ज़रूर दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा) (1)
मगर विश्वास न
करनेवालों [काफ़िरों] को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके पास सावधान करनेवाला, उन्हीं में से एक आदमी (कैसे) आ गया है, सो वे कहने लगे, "यह तो हैरानी की बात है! (2)
कि जब हम मर
जाएँगे और मिट्टी में मिल जाएँगे, तो फिर हम वापस (ज़िंदा होकर) उठ खड़े होंगे? यह (ज़िंदा होकर) वापसी तो समझ से बहुत दूर की
बात है!" (3)
धरती (मरे हुए
शरीर का हिस्सा खाकर) उसमें जितनी भी कमी कर देती है, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं: हम एक किताब
में इसका पूरा हिसाब रखते हैं। (4)
मगर विश्वास न
करनेवालों के सामने जब सच्चाई पहुँचती है, तो वे उसे मानने से इंकार कर देते हैं; असल में वे उलझन की हालत में पड़े हुए हैं।
(5)
अच्छा तो क्या
उन लोगों ने अपने ऊपर आसमान को नहीं देखा ---- कि हमने उसे कैसा बनाया और किस तरह
उसे सजाया है कि उसमें कोई दरार तक नहीं है; (6)
और किस तरह
हमने धरती को फैलाया और उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया, और उसमें हर प्रकार की सुन्दर वनस्पतियाँ उगा
दीं, (7)
(और यह सब)
आँखें खोलने और याद दिलाते रहने के मक़सद से है --- हर उस बन्दे के लिए जो पूरी
भक्ति से अल्लाह के सामने झुकनेवाला हो; (8)
और कैसे हमने
आसमान से बरकत से भरी [blessed] बारिश भेजी और उससे बाग़ और अनाज की फ़सलें उगाईं; (9)
और खजूरों के
गुच्छों से लदे हुए ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़ ---- (10)
हर एक आदमी की
रोज़ी के रूप में; तो देखो कैसे
पानी के द्वारा बेजान पड़ी हुई धरती को हम नया जीवन दे देते हैं? ठीक इसी तरह, मरे हुए लोग (अपनी क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे। (11)
इन (मक्का के)
विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] से बहुत पहले, नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास
नहीं किया, इसी तरह 'अर्-रस' [यमामा के अंधे कुँएवाले], समूद [सालेह की क़ौम], (12)
आद [हूद की
क़ौम], फ़िरऔन [मिस्र
के राजा], लूत के भाई
[सदूम व अमूरह के लोग], (13)
'अल-ऐका' [जंगलों में रहनेवाली शोऐब की क़ौम] और तुब्बा
[यमन के बादशाह अलहमैरी] के लोग भी थे: इन सभी लोगों ने अपने-अपने पैग़म्बरों [messengers] की बातों में विश्वास नहीं किया, अन्ततः जिस सज़ा की चेतावनी मैंने दे रखी थी
वह सच होकर रही। (14)
तो क्या हम
पहली बार सारी सृष्टि को पैदा करने में असमर्थ रहे? बिल्कुल नहीं! मगर तब भी वे दोबारा पैदा किए
जाने के बारे में सन्देह में पड़े हैं। (15)
हमने आदमी को
पैदा किया है--- हम उसके दिल में पैदा होनेवाली बातों को भी जानते हैं: हम उसके
गर्दन की रग [Jugular vein] से भी ज़्यादा
उससे नज़दीक हैं--- (16)
क्योंकि (हर
अच्छे बुरे कर्म की जानकारी) प्राप्त करनेवाले दो (फ़रिशते), लिखने के लिए बैठे रहते हैं, एक उस आदमी के दायीं तरफ़, और दूसरा उसके बायीं तरफ़: (17)
आदमी हर वक़्त
उन (फ़रिश्तों) की निगरानी में होता है, कोई एक शब्द मुँह से निकला नहीं कि उसे लिख
लिया जाता है। (18)
और मौत की
बेहोशी अपने साथ सच्चाई को साथ ले आएगी: “यही वह चीज़ है जिससे तू भागने की कोशिश करता
था।” (19)
और नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा: “यही है वह (क़यामत का) दिन, जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी।” (20)
हर आदमी इस
हाल में आएगा कि उसके साथ एक (फ़रिश्ता) हँकाकर लानेवाला होगा और दूसरा गवाही
देनेवाला: (21)
“तुम ने इस
(दिन) की हक़ीक़त पर कभी ध्यान नहीं दिया; तुम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था, और आज हमने तुमसे वह पर्दा हटा दिया, सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ हो गई है।” (22)
उसके साथ
रहनेवाला (फ़रिश्ता) कहेगा, "यह है (इसके कर्मों का लेखा-जोखा) जो मैंने तैयार कर रखा है---- (23)
(दोनों
फ़रिश्तों को हुक्म होगा), "फेंक दो, जहन्नम में!
ज़िद पर अड़े हुए हर उस विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] को, (24)
जो हर एक को
भलाई से रोकता था, मर्यादा की
सीमाएं तोड़ता था और (सच्चाई की बातों में) लोगों को सन्देह में डालता था, (25)
जिसने अल्लाह
के साथ दूसरे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा था। फेंक दो उसे कठोर यातना
में!"--- (26)
उसका (शैतान)
साथी कहेगा, "ऐ हमारे रब!
मैंने इसे नहीं बहकाया था, बल्कि वह ख़ुद
पहले से ही बहुत ज़्यादा भटका हुआ था।" (27)
अल्लाह कहेगा, "मेरे सामने झगड़ा मत करो। मैंने तो तुम्हें
(यातना की) चेतावनी भेजी थी (28)
और मेरी कही हुई बात बदला नहीं करती: मैं अपने किसी बंदे पर कोई अन्याय नहीं करता।" (29)
उस दिन हम
जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अब और कोई (इसमें आने वाला) नहीं है?" (30)
लेकिन नेक
लोगों के लिए जन्नत नज़दीक लायी जाएगी, इतनी नज़दीक कि अब कुछ भी दूरी न रहेगी: (31)
"यही है वह
चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था--- यह हर उस आदमी के लिए है, जो पूरे मन से अक्सर अल्लाह की तरफ़ (तौबा के
लिए) झुकता हो और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता हो; (32)
"जो बेहद दयालु
रब से डरता हो, हालाँकि उसे
देखा नहीं जा सकता, और जब उसके
सामने आता हो, तो उसका दिल
पूरी भक्ति-भाव से उसके आगे झुकता हो--- (33)
"तो अब सलामती
के साथ दाख़िल हो जाओ इस (जन्नत) में, वह दिन कभी ख़त्म न होने वाली ज़िंदगी का दिन
होगा।” (34)
उनके लिए वहाँ
(जन्नत में) वह सब कुछ होगा जिस चीज़ की भी वे इच्छा करेंगे, और हमारे पास (देने के लिए) उससे अधिक भी है।
(35)
इन (मक्का के
काफ़िरों) से पहले हम काफ़िरों की इनसे भी अधिक मज़बूत नस्लों को तहस-नहस कर चुके हैं, वे धरती के बड़े हिस्से पर मारे फिरे--- मगर
क्या भागने की कोई जगह थी? (36)
सचमुच इसमें
हर उस आदमी के लिए सीखने और याद रखने का सामान है जिसके पास दिल हो, और जो कोई ध्यान लगाकर सुनता हो। (37)
हमने आसमानों, ज़मीन और जो कुछ उनके बीच में है, सब कुछ छः दिनों [कालों] में पैदा कर दिया और
हमें कोई थकान नहीं हुई। (38)
अतः [ऐ रसूल]
जो कुछ वे कहते हैं, उस पर आप धीरज
[सब्र] से काम लें; और सूरज के
निकलने से पहले भी और सूरज के निकलने के बाद भी अपने रब की प्रशंसा का गुणगाण करते
रहें; (39)
और रात की
घड़ियों में भी उसकी बड़ाई का बखान करें, और हर नमाज़ [सज्दों] के बाद भी; (40)
और ध्यान से
सुनो उस दिन की बात, जिस दिन एक
पुकारनेवाला बहुत पास से पुकारेगा, (41)
वे लोग उस दिन
(अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच
सुनेंगे। (42)
हम ही तो हैं
जो ज़िंदगी भी देते हैं और मौत भी, और अंत में सबको हमारी ही पास लौटकर आना है।
(43)
जिस दिन धरती
को फाड़ दिया जाएगा, वे [मुर्दा
लोग] बहुत तेज़ी से बाहर निकल पड़ेंगे--- यह इकट्ठा करना हमारे लिए बेहद आसान है।
(44)
जो कुछ भी वे
[मक्का के काफ़िर] कहते हैं, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं। [ऐ रसूल] आप
उन्हें ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने के लिए तो हैं नहीं। अतः आप क़ुरआन के द्वारा
नसीहत करें, हर उस आदमी को
जो हमारी चेतावनी से डरता हो। (45)
नोट:
4: अल्लाह कहता है कि शरीर के जिन-जिन हिस्सों को मिट्टी
खाती है, उसकी पूरी जानकारी उसके पास होती है, इसीलिए उनको दोबारा उसी हाल में बहाल करना
कोई मुश्किल नहीं है। और सारी बात एक “सुरक्षिर स्लेट”[लौह-ए-महफ़ूज़/Preserved Tablet] में
लिखी हुई है।
5: यानी कभी कहते हैं कि क़ुरआन जादू है, या यह ‘काहिनों’ [तांत्रिकों] की बातें हैं, कभी इसे शायरी बताते हैं, और कभी मुहम्मद (सल्ल) को ‘दीवाना’ कहते
हैं।
12: “अर-रस” के
बारे में कुछ लोग कहते हैं कि ये समूद की क़ौम का कोई शहर था। कुछ लोगों का मानना
है कि इसका मतलब “अंधा कुआँ” है, जहाँ के रहने वालों ने अल्लाह के भेजे हुए
पैग़म्बर को कुएं में धकेल दिया था। शायद इन्हीं लोगों का ज़िक्र सूरह यासीन (36:
13-27) में आया है।
17: फ़रिश्ते हर आदमी के कर्मों का हिसाब इसलिए लिखते रह्ते
हैं ताकि क़यामत के दिन उसके सामने प्रमाण के रूप में पेश किया जा सके।
21: हर आदमी के साथ शायद ये वही दो फ़रिश्ते होंगे जो दुनिया
में उसके कर्मों को लिखा करते थे।
24: दोनों फरिश्ते वही हो सकते हैं जो कर्मों का लेखा-जोखा
तैयार करते हैं, या ये दो फ़रिश्ते जहन्नम के पहरेदार भी हो सकते हैं।
27: काफ़िर लोग यह चाहेंगे कि अपने हिस्से की सज़ा यह कहकर
अपने सरदारों पर और ख़ासकर शैतान पर डालें कि इसने हमें गुमराह किया था, मगर शैतान जवाब में कहेगा कि मैंने इसे
गुनाहों की तरफ़ लुभाया ज़रूर था, मगर गुमराही में तो यह ख़ुद ही अपनी इच्छा से
पड़ा था। देखें सूरह इबराहीम (14: 22).
35: जन्नत की नेमतों की कुछ झल्कियाँ तो क़ुरआन में कई आयतों
में बयान हुई हैं, लेकिन जैसा कि एक हदीस में है, असल में वहाँ की नेमतें ऐसी होंगी जो किसी
आँख ने देखी नहीं, किसी कान ने सुनी नहीं और किसी आदमी के दिल में इसका विचार
तक नहीं आया होगा। अंत में यह इशारा किया गया है कि हमारे पास देने के लिए कुछ और
ज़्यादा भी है, इन्हीं में से एक नेमत होगी अल्लाह का दीदार! देखें सूरह
यूनुस (10: 26).
39: सूरज निकलने से पहले से मतलब सुबह की नमाज़ [फ़ज्र], और सूरज के निकलने के बाद का मतलब दोपहर और
शाम की नमाज़ें [ज़ुहर, असर और मग़रिब] हैं।
40: रात की घड़ियों में गुणगान का मतलब रात की नमाज़ें [इशा
और तहज्जुद] हैं। हर (फ़र्ज़) नमाज़ के बाद “सज्दे” से
मतलब ‘नफ़िल नमाज़ें’ हैं।
41: पुकारनेवाले का मतलब यहाँ (फ़रिश्ता) हज़रत इसराफ़ील
(अलै.) से है जो मुर्दों को क़ब्रों से बाहर निकल आने के लिए आवाज़ देंगे, और यह आवाज़ बहुत पास से आती हुई महसूस होगी।
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