Early Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के आरंभिक दिनों की सूरतें
अकेली सूरतें
सूरह 76: अल-इंसान/ अद-दहर
[आदमी/ Man]
यह एक मक्की/
मदनी सूरह है जो बताती है कि आदमी को अच्छा या बुरा रास्ता चुनने की छूट देकर कैसे
उसकी परीक्षा ली जाती है (2-3), और शैतानियाँ
करने वालों का अंजाम क्या होगा (आयत 4), और अच्छा काम
करने वालों का अंजाम क्या होगा (आयत 5-22). पैग़म्बर साहब
को कहा गया है कि वह अपनी भक्ति में लगे रहें और धीरज से काम लें (आयत 23-26).
विषय:
01-03: इंसानों का पैदा किया जाना
04-22: नेक लोगों का
इनाम
23-26: रसूल को धीरज
से काम लेने की सलाह
27-31: एक चेतावनी
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क्या इंसान पर
समयकाल का एक ऐसा वक़्त नहीं गुज़र चुका है कि जब वह कोई उल्लेखनीय चीज़ ही न था? (1)
हमने इंसान को
(मर्द व औरत के) मिले-जुले तरल पदार्थ की बूंदों से पैदा किया जिसे हम (बच्चा पैदा
होने तक एक चरण से दूसरे चरण तक) पलटते और जाँचते रहते हैं, इसलिए हमने उसे (क्रम से) सुनने वाला (और
फिर) देखने वाला बनाया है। (2)
हमने इसे (सही
और ग़लत, सच और झूठ में
फर्क़ करने की समझ-बूझ के लिए) रास्ता भी दिखा दिया, (अब) चाहे वह (अल्लाह का) आभार मानने वाला हो
या आभार न मानने वाला [ungrateful] हो जाए। (3)
हमने विश्वास
न रखने वालों के लिए (पैर की) ज़नजीरें और (गर्दन के) तौक़ [iron collars] और (जहन्नम की) दहकती आग तैयार कर रखी है। (4)
निष्ठावान और
नेक बंदे (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पियेंगे जिसमें काफ़ूर [एक मीठा सुगंधित पौधा]
की मिलावट होगी। (5)
(ये जाम वहाँ) के एक बहते हुए सोते [spring] के होंगे जिससे ख़ुदा के ख़ास बंदे पिया करेंगे (और) जहां चाहेंगे (दूसरों को पिलाने के लिए) इसे छोटी नहरों के रूप में बहाकर (भी) ले जाएंगे। (6)
(ये अल्लाह के
वे ख़ास बंदे हैं) जो (अपनी) नज़रें [मन्नतें] (मान लेते हैं तो उसे) पूरी करते
हैं, और उस दिन से
डरते हैं जिसकी सख़्ती बड़ी व्यापक होगी। (7)
और वे (अपना) खाना अल्लाह की मुहब्बत में (स्वयं खाने की चाहत रखने और भूखा होने के बावजूद) ग़रीबों, अनाथों और क़ैदियों को खिला देते हैं। (8)
(और कहते हैं
कि): ”हम तो केवल अल्लाह
की खुशी के लिए तुम्हें खिला रहे हैं, न तुम से बदले में कोई चीज़ हमें चाहिए और न
(यह इच्छा है कि) तुम हमारा शुक्र अदा करो।" (9)
हमें तो अपने रब से उस दिन का डर रहता है जो (चेहरों को) बहुत काला (और) भद्दा कर देने वाला है। (10)
सो अल्लाह
उन्हें (अपना डर रखने के कारण) उस दिन की सख़्ती से बचा लेगा और उन्हीं (चेहरों पर)
रौनक़ और ताज़गी और (दिलों में) मस्ती व खुशी भर देगा। (11)
और (हमेशा)
सब्र व धीरज (से नेक कामों पर डटे रहने) के बदले उन्हें (इनाम के तौर पर रहने को)
जन्नत और (पहनने को) रेशमी कपड़े प्रदान करेगा। (12)
वे उसमें तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे, न वहाँ धूप की तेज़ गर्मी पाएंगे और न सर्दी की ठिठुरा देने वाली तेज़ी। (13)
और (जन्नत के पेड़ों के) साये उन पर झुक रहे होंगे और उनके (फलों के) गुच्छे झुककर लटक रहे होंगे। (14)
और (सेवक लोग) उनके आसपास चांदी के बर्तन और (साफ़-सुथरे) शीशे के गिलास लिए फिरते होंगे। (15)
(और) शीशे भी
चांदी की तरह के (बने) होंगे जिन्हें सेवकों ने (हर एक की ख़्वाहिश के अनुसार)
ठीक-ठीक अनुपात में भरा होगा। (16)
और उन्हें
वहां (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पिलाए जायेंगे जिनमें सोंठ/अदरक (जैसी महक) की
मिलावट होगी। (17)
(वह शराब
जन्नत) में “सलसबील” नाम के एक सोते [spring] से बनी होगी। (18)
और उनके आसपास
ऐसे सदाबहार नौजवान लड़के (सेवा में) घूमते रहेंगे कि जब आप उन्हें देखेंगे तो ऐसा
लगेगा मानो वे बिखरे हुए मोती हों। (19)
जब आप (जन्नत
पर) नज़र डालेंगे तो वहां (बेशुमार) नेमतें और (हर तरफ़) बड़े साम्राज्य के लक्षण दिखायी देंगे। (20)
उन (के
शरीरों) पर महीन रेशम के हरे और गाढ़े ब्रोकेड के कपड़े होंगे, और उन्हें चांदी के कंगन पहनाए जाएंगे और
उनका रब उन्हें पवित्र शराब पिलाएगा। (21)
(उनसे कहा
जाएगा): “यह तुम्हारा
इनाम है और (संसार में नेक राह पर चलने में की गयी) तुम्हारी मेहनत की सराहना की
जाती है।“ (22)
(ऐ रसूल), हमने आप पर क़ुरआन थोड़ा-थोड़ा करके उतारा
[नाज़िल किया] है। (23)
सो आप अपने रब
के आदेश पाने के लिए धीरज (बनाए) रखें और किसी पापी या सच्चाई से इंकार करने वाले
की बात पर कान न धरें। (24)
और सुबह और शाम अपने रब के नाम का स्मरण किया करें, (25)
और रात की कुछ
घड़ियों में (अल्लाह) के सामने सज्दे में सर झुकाया करें और रात के (शेष) लंबे
हिस्से में उसकी बड़ाई बयान किया करें। (26)
यह (दुनिया की
चाहत रखने वाले) जल्दी से हासिल हो जाने वाली चीज़ (संसार) से प्रेम रखते हैं और
एक सख़्त भारी दिन (की याद) को छोड़े बैठे हैं। (27)
(वे नहीं सोचते
कि) हम ही ने उन्हें पैदा किया और उनके जोड़-जोड़ को मज़बूत बनाया है और हम जब
चाहें उनके बदले में उन्हीं जैसे लोगों को पैदा कर दें। (28)
बेशक यह
(क़ुरआन) एक नसीहत है (जो आदमी को सीधे रास्ते पर चलने के लिये याद दिलाती रहती है), सो जो कोई चाहे अपने रब की तरफ़ (पहुंचने का)
रास्ता अपनाले। (29)
और तुम खुद
कुछ नहीं चाह सकते सिवाय इसके जो अल्लाह चाहे, बेशक अल्लाह ख़ूब जानने वाला, बड़ी समझ-बूझवाला है। (30)
वह जिसे चाहता है अपनी रहमत [दयालुता के दायरे] में ले लेता है, और ज़ालिमों के लिए उसने दर्दनाक अज़ाब [यातना] तैयार कर रखा है। (31)
नोट:
1. यहाँ पैदा
होने से पहले के समयकाल के बारे में कहा गया है; जिस तरह से अल्लाह ने इंसानों को पहली बार
पैदा किया, उसी तरह वह
उन्हें क़यामत के दिन दोबारा पैदा करने की ताक़त रखता है (देखें 19:9,
67).
2: मर्द और औरत
के मिले-जुले पदार्थ यानी शुक्राणु और अंडाणु के मिश्रण (intermingling of
sperm & ovum) से पैदा किया।
28: इसका एक मतलब
तो यह है कि अगर अल्लाह चाहे तो इन सबको मारकर उनकी जगह दूसरे इंसान पैदा कर
दे। दूसरा मतलब यह हो सकता है कि जिस तरह अल्लाह
ने उन्हें शुरू में पैदा किया था, उसी तरह वह जब चाहे उनके मरने के बाद भी
उन्हें दोबारा पैदा कर देगा।
सूरह 38: साद [Saad]
यह एक मक्की
सूरह है, ऐसा लगता है
कि यह पिछली सूरह के क्रम में उतरी है क्योंकि यहाँ कुछ उन नबियों के बारे में
ज़िक्र आया है जिनका पिछली सूरह में ज़िक्र नहीं था, जैसे दाऊद, सुलैमान, अय्यूब अलै. आदि। यहाँ मुहम्मद सल्ल. की मदद
और हौसला बढ़ाने के लिए पिछले नबियों की कहानियाँ सुनायी गई हैं, और मक्का के विश्वास न करनेवालों का घमंड, पिछली पीढ़ियों के आचरण और असल आज्ञा न
माननेवाले इबलीस [शैतान], इनमें एक
स्पष्ट संबंध स्थापित किया गया है। बहुदेववादियों की फिर से यहाँ निंदा की गई है
क्योंकि वे एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करते, रसूल को कभी दीवाना, कभी जादूगर, कभी झूठा कहते हैं, और वे यह भी कहते हैं कि यह दुनिया बिना किसी
मक़सद के बनायी गई है। पहली और आख़िरी आयत में क़ुरआन की सच्चाई और महानता पर ज़ोर
डाला गया है।
विषय:
01-15: विश्वास न
करने वालों ने रसूल की बातों को मानने से इंकार कर दिया
16-28: दाऊद (अलै) का
क़िस्सा और एक विवाद
29 : यह किताब [क़ुरआन] एक वरदान है
30-40: सुलैमान (अलै)
की कहानी और घोड़े
41-44: अय्यूब (अलै)
[Job] की कहानी
45-47: इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब अलै.
48 : इस्माईल, अल-यस्सा' [Elisha], और ज़ुल-किफ़्ल
49-55: जन्नत की
ख़ुशियाँ
55-64: जहन्नम की
पीड़ा [suffering]
65-66: रसूल तो बस एक
सावधान करनेवाले हैं
67-85: इब्लीस
[शैतान] की कहानी
86-88: क़ुरआन का
संदेश पहुँचाने के लिए रसूल कोई इनाम नहीं मांगता
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
साद।
क़सम है उस
क़ुरआन की जो याद दिलाती रहती है (कि अल्लाह तो केवल एक ही है) (1)
मगर, (सच्चाई से) इंकार करने पर अड़े लोग-- अपनी
बड़ाई के घमंड, ज़िद्द और
दुश्मनी के भाव में डूबे हुए हैं। (2)
उन लोगों से
पहले हम कितनी ही पीढ़ियों को मिटा चुके हैं! (मुसीबत देखकर) वे सभी ज़ोर-ज़ोर से
चिल्लाये थे, मगर बचकर निकल
जाने के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी। (3)
उन (मक्का के)
विश्वास न करने वालों को यह बात अजूबा लगी कि उन्हें सावधान करने के लिए एक रसूल
उन्हीं के बीच का कैसे आ गया है: वे कहने लगे, "यह बड़ा झूठा जादूगर है। (4)
वह यह दावा
कैसे कर सकता है कि सारे देवताओं के बदले केवल एक देवता [ख़ुदा] होता है? निस्संदेह यह तो बहुत अचम्भेवाली बात
है!" (5)
और उनके सरदार
यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि "चलो यहाँ से! और अपने देवताओं की आस्था में जमे
रहो! निस्संदेह तुम सबको ऐसा ही करना चाहिए। (6)
इस तरह की बात
तो हमने पिछले [ईसाई] धर्म में भी नहीं सुनी: यह एक नयी बात है जो बस गढ़ ली गयी
है। (7)
क्या हम सबमें
से (चुनकर) केवल इसी के पास अल्लाह का संदेश भेजा गया है?" नहीं! सच्चाई यह है कि उन्हें मेरी धमकियों
पर संदेह है; असल में
उन्होंने अभी तक मेरी यातना का मज़ा चखा ही नहीं है! (8)
आपका रब जो
बड़ी ताक़तवाला और बड़ा दाता है, क्या उसकी रहमत [दयालुता] के सारे ख़ज़ाने
उन्हीं के पास हैं? (9)
या आसमानों और
ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है, उन सब चीज़ों पर क्या उन्हीं का क़ब्ज़ा है? (अगर है, तो) उन्हें रस्सियाँ बाँधकर ऊपर (आसमान में)
चढ़ जाना चाहिए: (10)
वह उनके
गठबंधन वाली एक कमज़ोर सेना है, जो कुचल दी जाएगी। (11)
उनसे पहले नूह
की क़ौम और आद और मज़बूती से जमे हुए फ़िरऔन के लोगों ने रसूलों को मानने से इंकार
किया। (12)
और समूद ने और
लूत की क़ौम ने और 'ऐकावाले' [जंगल मे रहने वाले शुएब के लोग] भी—- इनमें से हर एक ने (रसूलों के) विरोध में गुट
बनाए। (13)
उन सभी ने
रसूलों को (झूठा बताते हुए) मानने से इंकार कर दिया, और वे इसी लायक़ थे कि मेरी यातना उनपर टूट
पड़े: (14)
और यह (मक्का
के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग भी बस एक धमाके के इंतज़ार में हैं, (समय आ जाने पर) जिसे टाला नहीं जा सकता है। (15)
वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हिसाब के दिन [क़यामत] से पहले ही
हमारे हिस्से की सज़ा हमें जल्दी से जल्दी दे दे! " (16)
वे जो कुछ
कहते हैं, उस पर [ऐ
रसूल] आप धीरज व सब्र से काम लें।
हमारे बन्दे
दाऊद [David] को याद करें, जो बड़ा ताक़तवर आदमी था और बेशक वह
हमेशा (तौबा के लिए) हमारी ओर भक्ति-भाव से झुकता था। (17)
हमने पर्वतों
को इस तरह उसके वश में कर दिया था कि सूरज के निकलते वक़्त और डूबते वक़्त (पर्वत
भी) उसके साथ मिलकर हमारा गुणगान करते थे; (18)
और चिड़ियाँ भी, जो झुंड की झुंड होती थीं, सब मिलकर (अल्लाह की) बड़ाई में आवाज़ से आवाज़
मिलाते थे। (19)
हमने उसकी
सल्तनत को मज़बूती प्रदान की थी, उसे ज्ञान व समझ-बूझ दिया था और बात कहने का
ऐसा अंदाज़ दिया था कि उनकी बातें निर्णायक होती थी। (20)
और क्या आपने
उन दो विवाद करने वालों की कहानी सुनी है जब वे दीवार पर चढ़कर उस [दाऊद] के
एकान्त कक्ष मे घुस आए थे? (21)
जब वे दाऊद के
पास पहुँचे, तो वह (अचानक
उन्हें देखकर) घबरा गया, वे बोले, "डरिए नहीं, हम दो विवादी हैं। हममें से एक ने दूसरे पर
ज़्यादती की है: तो अब आप हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दीजिए--- नाइंसाफ़ी मत
कीजिए--- और हमें सही मार्ग दिखा दीजिए। (22)
यह मेरा भाई
है। इसके पास निन्यानवे [99] भेड़ें हैं और
मेरे पास एक ही भेड़ है। अब इसका कहना है कि ‘इसे भी मुझे सौंप दो’ और बातचीत में (यह इतना तेज़ है कि) इसने मुझे
दबा लिया है।" (23)
दाऊद ने कहा, "इसने अपनी भेड़ों के झुंड में तेरी भेड़ को
मिला लेने की माँग करके निश्चय ही तुझ पर ज़ुल्म किया है। साथ मिलकर काम करने वाले
बहुत सारे लोग एक-दूसरे पर ज़्यादती करते हैं। हाँ, जो लोग ईमान के पक्के हैं और अच्छे कर्म करते
हैं, वे ऐसा नहीं
करते, मगर ऐसे लोग
बहुत कम हैं।"
[तब ही] दाऊद
को बात समझ में आ गयी कि असल में हम उसकी परीक्षा ले रहे थे। अतः उसने अपने रब से
माफ़ी माँगी, घुटनों के बल
गिर पड़ा और (गुनाहों से) तौबा की: (24)
तो हमने उसका
(क़सूर) माफ़ कर दिया। इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है। (25)
"ऐ दाऊद! हमने
धरती पर तुम्हें मालिक [ख़लीफ़ा/ उत्तराधिकारी] बनाया है। अतः तुम लोगों के बीच
इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करना। अपनी इच्छाओं के पीछे मत भागते चलना, कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें अल्लाह के मार्ग
से भटका दे: याद रखो, जो लोग उसके
मार्ग से भटक जाते हैं, निश्चय ही
उनके लिए दर्दनाक यातना होगी क्योंकि वे हिसाब के दिन [क़यामत] को भुला बैठते हैं।” (26)
हमने आसमान व
ज़मीन और उनके बीच की हर एक चीज़ को, यूँ ही बिना मक़सद के नहीं पैदा कर दिया है।
हाँ, भले ही
(सच्चाई से) इंकार करने वाले [काफ़िर] ऐसा मान सकते हैं ---ओह! (जहन्नम की) आग में
कैसी दुर्गति होगी उनकी!---- (27)
मगर, जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, क्या हम उनके साथ ठीक वैसा ही सलूक करेंगे
जैसा कि उन लोगों के साथ जो धरती पर बिगाड़ पैदा करते हैं? वे जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते
हैं, और वे जो
बेधड़क सारी सीमाओं को तोड़ डालते हैं—--- हम क्या दोनों के साथ एक समान सलूक करेंगे? (28)
यह किताब
[क़ुरआन] एक वरदान है जो [ऐ रसूल!] आप पर उतारी गयी है, ताकि लोग इसके संदेशों पर सोच-विचार कर सकें
और समझदार लोग इसे ध्यान से सुनें और उस पर अमल करें। (29)
और हमने दाऊद
को सुलैमान [Solomon] (जैसा बेटा)
दिया। वह बहुत अच्छा बन्दा था और हमेशा ही (तौबा के लिए) अल्लाह के सामने झुकता
था। (30)
(ऐसा हुआ कि)
जब दिन ढलने के समय उसके सामने अच्छी नस्ल के, तेज़ दौड़नेवाले उम्दा घोड़ों की परेड करायी गयी, (31)
तो वह (देखकर)
कहता जाता, "मेरा इन उम्दा
चीज़ों के प्रति लगाव, असल में अपने
रब को याद करने का एक ज़रिया है!" यहाँ तक कि वे (घोड़े) नज़रों से ओझल हो
गए---- (32)
"उन्हें मेरे
पास वापस लाओ!" (सुलैमान ने कहा), फिर वह उनकी टांगों और गर्दनों पर हाथ फेरने
लगा। (33)
निश्चय ही
हमने सुलैमान को भी परीक्षा में डाला, और हमने उसे (इतना कमज़ोर कर दिया कि वह) अपने
तख़्त पर एक ढाँचा मात्र रह गया था। (34)
फिर वह मेरी
ओर (तौबा के लिए) झुका, और उसने दुआ
की: "ऐ मेरे रब, मुझे माफ़ कर
दे! और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद फिर किसी की ऐसी हुकूमत न हो---- इसमें
शक नहीं कि तू सबसे ज़्यादा दिल खोलकर देने वाला है।" (35)
तब हमने हवा
को उसके वश में कर दिया, इस तरह जहाँ
कहीं भी वह जाना चाहता, हवा उसकी
इच्छा के अनुसार हौले-हौले चला करती थी। (36)
और जिन्नों (व
शैतानों) को भी (उसके वश में कर दिया)----- जिनमें हर तरह के निर्माण करने वाले और
ग़ोताख़ोर थे, (37)
और कुछ दूसरे
(जिन्नात) भी थे जो ज़ंजीरों में जकड़े हुए रहते थे। (38)
"यह हमारी तरफ़
से तोहफ़ा है, अब तुम्हारी
मर्ज़ी--- चाहो तो इसमें से कुछ दो या अपने पास रखो! इस पर कोई हिसाब-किताब नहीं
होगा।" (39)
और इनाम में
उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है। (40)
हमारे बन्दे
अय्यूब [Job] को याद करो, जब उसने अपने रब को (मुसीबत में) पुकारा था, "शैतान ने मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी
है।" (41)
(हमने बताया)
"अपना पाँव (ज़मीन पर) मारो! देखो, यह है ठंडा पानी— नहाने-धोने और पीने के लिए," (42)
और (इस तरह)
हमने उसे उसके परिवारवालों से दोबारा मिला दिया, और साथ में उनके जैसे और लोगों को भी: यह एक
निशानी थी हमारी रहमत [दयालुता] की और सबक़ था उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते
हैं। (43)
(हमने उससे कहा)
"और अपने हाथ में तिनकों का एक छोटा मुट्ठा लो और उससे (अपनी पत्नी को) मार लो और अपनी क़सम मत तोड़ो।" हमने उसे बुरे
वक़्तों में भी बड़ा धैर्य व सब्र करने वाला पाया, क्या ही अच्छा बंदा था वह! निस्संदेह वह भी
हमेशा अल्लाह के सामने (तौबा के लिए) झुकने वाला था। (44)
हमारे बंदों
में इबराहीम [Abraham], इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] को भी याद करो, यह सभी (नेक अमल की) ताक़त और (सूझ-बूझ की)
नज़र रखते थे। (45)
हमने उन्हें
दिल से (परलोक के) आख़िरी घर की याद करनेवाला बनाया था, जो हम पर पूरी भक्ति-भाव से समर्पित थे: (46)
निश्चय ही
हमारे यहाँ, वे चुने हुए, बेहतरीन लोगों में से होंगे। (47)
हमारे बंदों
में इस्माईल [Ishmael], अल-यसा’ [Elisha] और ज़ुलकिफ़्ल [Dhu’l-Kifl] को भी याद करो, इनमें से सभी बेहतरीन लोगों में से थे।
(48)
यह एक नसीहत
से भरा संदेश है। बेशक जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए (जन्नत में) लौटकर जाने का अच्छा
ठिकाना होगा: (49)
हमेशा रहने के
बाग़, जिनके दरवाज़े
उनके लिए खुले होंगे। (50)
उनमें वे
(आराम से) तकिया लगाए हुए बैठे होंगे; वे बहुत-से फल-मेवे और पीने की चीज़ें मँगवाते
होंगे; (51)
और उनके पास
निगाहें नीची रखनेवाली, बराबर उम्र की
औरतें [हूरें] होंगी। (52)
हिसाब-किताब
के दिन [क़यामत] के लिए यही वह (नेमतों से भरी) चीज़ है, जिसका तुमसे वादा किया जाता है। (53)
बेशक यह हमारी
दी हुई चीज़ है, जो कभी ख़त्म
नहीं होगी। (54)
मगर शैतानी करने
वालों का आख़िरी ठिकाना बहुत ही बुरा होगा: (55)
वह जहन्नम
जिसमें वे जलेंगे, रहने के लिए
क्या ही बुरा ठिकाना है--- यह सब उनके लिए होगा: (56)
उन्हें इसका मज़ा
चखने दो --- खौलता हुआ, गाढ़ा, पीप मिला हुआ पानी, (57)
और इसी तरह की
दूसरी और यातनाएं। (58)
(उनके नेताओं से
कहा जाएगा), "यह लोगों का एक
और बड़ा दल है जो तुम्हारे पास दौड़ा चला आ रहा है।” (जवाब मिलेगा), “उनके लिए कोई आवभगत (की ज़रूरत) नहीं! वे तो आग
में जलने वाले हैं।" (59)
वे (नेता) उनसे
कहेंगे, "तुम्हारा यहाँ
कोई स्वागत नहीं होगा! तुम्हीं तो हो, जो यह (मुसीबत) हमारे ऊपर लेकर आए हो, रहने के लिए बहुत ही बुरा ठिकाना (दुखदायी अंत)
है," (60)
आगे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! जो हमारे ऊपर यह (मुसीबत) लाया है
उसे दोहरी सज़ा दे!" (61)
और वे कहेंगे, "क्या बात है कि वे (मुस्लिम) लोग यहाँ दिखायी
नहीं देते जिन्हें हम बुरा समझते थे, (62)
और जिनका हम
मज़ाक़ बनाते थे? क्या हमारी
नज़रें उन्हें देखने में चूक गई हैं?" (63)
हक़ीक़त में
बिल्कुल ऐसा ही होगा: (जहन्नम की) आग में रहने वाले एक दूसरे पर इसी तरह इल्ज़ाम
लगाएंगे। (64)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो बस यहाँ चेतावनी देने के लिए हूँ। उस एक
अल्लाह के सिवा कोई (ख़ुदा) इबादत के लायक़ नहीं, ताक़त में वह सबसे बड़ा है; (65)
वह आसमानों और
ज़मीन का, और हर चीज़ जो इन
दोनों के बीच है उन सबका मालिक है, सारी चीज़ उसके क़ब्ज़े में है, और वह बहुत माफ़ करनेवाला है।" (66)
कह दें, "यह एक ज़बरदस्त संदेश [क़ुरआन] है, (67)
इसके बावजूद तुम
इस पर ध्यान नहीं देते हो। (68)
मुझे ऊपर
(फ़रिश्तों) की दुनिया की कोई जानकारी नहीं कि वे आपस में किस मुद्दे पर चर्चा कर
रहे थे: (69)
मुझे तो 'वही' [revelation] के द्वारा बस यही बताया गया है, मेरा काम यहाँ साफ़ व खुले तौर पर चेतावनी देना
है।" (70)
याद करो जब
तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि "मैं मिट्टी से एक आदमी पैदा करने वाला
हूँ, (71)
तो जब मैं
उसको पूरी तरह ठीक-ठाक कर दूँ औऱ उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो उसके आगे सज्दे में झुक जाना।" (72)
तो सभी
फ़रिश्तों ने एक साथ झुककर सज्दा किया, (73)
मगर इबलीस ने
(सज्दा) नहीं किया, जो कुछ ज़्यादा
ही घमंडी था। वह इंकार करके बाग़ी हो गया। (74)
अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उस आदमी के सामने
झुकने से रोक दिया जिसे मैंने ख़ुद अपने हाथों से बनाया है? क्या तू अपने आपको महान या कोई ऊँची हस्ती
समझता है?" (75)
इबलीस ने कहा, "मैं उस (आदमी) से अच्छा हूँ: तूने मुझे आग से
पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (76)
(अल्लाह ने
कहा), "निकल जा यहाँ
से! तू (फ़रिश्तों के दल से) दुत्कार दिया गया है: (77)
और फ़ैसले के
दिन [क़यामत] तक तुझ पर मेरी लानत बनी रहेगी!" (78)
मगर इबलीस ने
कहा, "ऐ मेरे रब!
फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (जीने की) मुहलत दे, जबकि लोग (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे," (79)
अल्लाह ने कहा, "ठीक है, जा तुझे मुहलत दी, (80)
एक तय दिन व
ज्ञात समय तक (कि तू ज़िंदा भी रहेगा और तुझे दंड भी नहीं दिया जाएगा)।" (81)
इबलीस ने कहा, "तेरी इज़्ज़त की क़सम! मैं उन सबको बहकाता
रहूँगा, (82)
बस तेरे उन
सच्चे व अच्छे बन्दों को छोड़कर।" (83)
कहा अल्लाह ने, "यह सच्चाई है --- और मैं तो सच ही बोलता
हूँ--- (84)
कि मैं जहन्नम
को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा, जो तेरे बताए हुए रास्ते पर चलेंगे।" (85)
[ऐ रसूल] आप कह
दें, "मैं इस (संदेश
को पहुँचाने) के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, और न मैं अपने बारे में ऐसा कोई दावा करता
हूँ, जो मैं नहीं
हूँ": (86)
यह [क़ुरआन] तो
सारे लोगों के लिए चेतावनी मात्र है, (87)
और थोड़ी ही
अवधि के बाद तुम्हें इस सच्चाई का पता चल जाएगा। (88)
नोट:
4: बुतपरस्तों की यह माँग थी कि अल्लाह का संदेश लेकर कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया, हमारे जैसा आदमी क्यों लाया है।
6: उनके कहने का
मतलब यह था कि असल में मुहम्मद (सल्ल) को उनके मार्गदर्शन से कोई लेना देना नहीं
है, बल्कि वह उन
पर अपना वर्चस्व बनाना चाहते हैं।
7: यहाँ ईसाइयों
की "तीन में से एक ख़ुदा" [Christian Trinity] वाली मान्यता की तरफ़ शायद इशारा है या यह अरब
पुतपरस्तों की कोई मानयता हो सकती है।
8: असल में
उन्हें मुहम्मद (सल्ल) की ईमानदारी पर शक नहीं था, बल्कि क़ुरआन
की सच्चाई पर ही संदेह था। यह आयत 6:33 से मिलती-जुलती है।
10: आसमान पर
रस्सी से चढ़ने की बात सूरह हज्ज (22: 15) में भी है।
11: जैसा कि मक्का
के बुतपरस्तों की बाद में बद्र की लड़ाई में होने वाली हार से ज़ाहिर हो गया कि उनकी
सेना कुचल दी गई।
12: यानी 'पिरामिड"और
"Obelisks"
19: पहाड़ों और
चिड़ियों द्वारा अल्लाह के गुणगान करने का वर्णन सूरह अंबिया (21: 79) में भी आया है।
24: वह कौन सी भूल
थी जो हज़रत दाऊद से हो गई थी, इसके बारे में कई तरह की बातें बतायी गयी
हैं। कुछ के अनुसार, दो वादी जब
अपने केस का फ़ैसला कराने उनके घर में घुस आए, तो हज़रत दाऊद ने बिना दूसरे वादी का पक्ष
सुने हुए फ़ैसला कर दिया, शायद इसी ग़लती
का उन्हें एहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी माँगी। बहरहाल, यह साफ़ नहीं है कि उनसे क्या ग़लती हो गई थी, मगर असल बात यह है कि उन्होंने इशारे को
तुरंत समझ लिया और तौबा कर ली।
मगर कुछ लोग
इस घटना को बाइबिल (2 सैमुयेल) में बतायी गई बात (12: 1--5) से जोड़ते हैं, इसके अनुसार उस ज़माने के रिवाज के मुताबिक़
हज़रत दाऊद की कई बीवियाँ थीं, मगर उनका दिल उनके एक फ़ौजी उरियह [Uriah] की बीवी बाथशीबा [Bathsheba] पर आ गया था, उन्होंने उरियह को एक मोर्चे पर लड़ने के लिए
भेज दिया जहाँ वह मारा गया, और उन्होंने उसकी एकलौती बीवी से शादी कर ली।
जब 99 भेड़ के साथ एक और भेड़ लेने की बात सामने आयी, तो हज़रत दाऊद इसका इशारा समझ गए, उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ, और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी माँगी। ज़्यादातर
मुस्लिम विद्वान इस कहानी को सही नहीं
मानते क्योंकि ऐसी बातें एक पैग़म्बर के चरित्र में नहीं हो सकती।
33: पहले ज़माने
में युद्ध में लड़ने वाले घोड़ों की अक्सर परेड करायी जाती थी ताकि देखा जा सके कि
वे लड़ने के लिए चुस्त और तैयार हैं कि नहीं। हज़रत सुलैमान (अलै.) को घोड़े इतने
पसंद आए कि परेड ख़त्म हो जाने के बाद उन्होंने दोबारा घोड़ों को बुलाया।
कुछ लोगों ने
यह भी मतलब बताया है कि वह घोड़ों को देखने में ऐसे मगन हुए कि शाम की इबादत करना
भूल गए, फिर उन्हें
एहसास हुआ तो फिर इबादत की, और घोड़ों को वापस बुलाकर उन्हें तलवार से मार
डाला कि उनकी वजह से वह इबादत करना भूल गए थे। मगर इस बात में कोई पक्का सबूत नहीं
मिलता।
34: एक दूसरा मतलब
यह बताया गया है कि उनके सिंहासन पर एक धड़ लाकर डाल दिया गया था। यहूदी परंपरा में
एक बात यह भी कही जाती है कि चूँकि सुलैमान (अलै.) की एक बीवी बुतों की पूजा करने
लगी थी और उसे वह रोक न पाए, इसलिए अल्लाह ने दंड के रूप में उनकी शक्ल के
एक जिन्न को कुछ दिनों के लिए उनकी गद्दी पर बैठा दिया था।
36: इसका वर्णन
सूरह अंबिया (21: 81) में भी आया
है।
37: जिन्न पानी
में ग़ोता लगाकर उसमें से राजा के लिए मोतियाँ निकाला करते थे।
38: उनकी सेवा में
जिन्नात लगे रहते थे, इसका ज़िक्र
सूरह सबा में भी आया है, यहाँ यह भी
बताया गया है कि वे ग़ोता लगाकर समंदर से मोती, मूँगा आदि भी निकालते थे। कुछ जिन्न जो बहुत
ही दुष्ट थे, उन्हें
ज़ंज़ीरों में जकड़ कर रखा जाता है।
41: जैसा कि सूरह
अंबिया (21: 83-84) में है कि उन्हें एक लम्बी बीमारी हुई थी, और वह पूरे सब्र के साथ अल्लाह से स्वास्थ्य
की दुआ करते रहे थे।
42: ज़मीन पर पाँव
मारने से जो सोता फूटा था, उसी पानी को
पीने और नहाने से उन्हें स्वास्थ्य मिला था।
44: जब हज़रत
अय्यूब लम्बी बीमारी में पड़े थे तो शैतान हकीम बनकर उनके यहाँ आया और उनकी बीवी से
कहा कि मैं उन्हें भला-चंगा कर सकता हूँ, जब वह ठीक हो जाएं तो बस तुम्हें यह कहना
होगा कि मैंने उन्हें ठीक कर दिया है। इस बात का ज़िक्र जब उनकी बीवी ने अय्यूब
(अलै.) से किया, तो वह ग़ुस्सा
हुए कि उनकी बीवी शैतान की बातों में कैसे आ गई! उन्होंने क़सम खा ली कि अगर मैं
ठीक हुआ, तो अपनी बीवी
को 100 कोड़े मारूँगा। मगर जब वह ठीक हो गए तो उन्हें
शर्म आयी कि जिस बीवी ने उनकी सेवा ऐसी बीमारी की हालत में की थी, उसको कोड़ा कैसे मारूँ, इस दुविधा का
आसान हल अल्लाह ने उन्हें बताया है जिससे उनकी क़सम भी पूरी हो जाए और बीवी को चोट
भी नहीं आएगी।
48: हज़रत अल-यसा
(अलै.) का नाम क़ुरअन में केवल दो जगह पर आया है, एक यहाँ पर, और दूसरा सूरह अनाम (6: 86) में। यह भी इसराइल की संतानों के बीच नबी
बनाए गए थे और हज़रत इल्यास अलै. के चचेरे भाई थे। इनका ज़िक्र बाइबल में भी आया है।
ज़ुल-किफ़्ल
अलै. का ज़िक्र सूरह अंबिया (21: 85) में भी आया है। जो लोग उन्हें नबी मानते हैं
वह उन्हें बाइबिल के पैग़म्बरों जैसे Ezekiel, Isaiah
या Obadiah से जोड़ते हैं।
कुछ उन्हें अल-यसा अलै. का ख़लीफ़ा बताते हैं, और कुछ लोग उन्हें नबी नहीं बल्कि अल्लाह का
वली मानते हैं।
69: यहाँ फ़रिश्तों
की उस चर्चा की तरफ़ इशारा है जो हज़रत आदम को पहली बार बनाते समय हुई थी जिसे सूरह
बक़रा (2: 31) में बताया गया
है।
74: शैतान को
आदम के सामने झुकने का आदेश असल में उसकी परीक्षा लेने के लिए था कि वह आज्ञा
मानता है कि नहीं, मगर शैतान ने घमंड में चूर होकर उस आदेश को
इसलिए नहीं माना कि वह आदम से बढ़कर था।
81: इस घटना का
वर्णन सूरह बक़रा (2: 31--36) में आया है। शैतान को एक नियत समय तक मुहलत दी गई है, अत: जब नरसिंघे में पहली बार फूँक मारी जाएगी
तो सारे जीवधारी मर जाएंगे, साथ में शैतान भी मर जाएगा।
सूरह 19: मरयम [Mary]
यह एक मक्की सूरह है, जिसका नाम आयत 16-35 में आयी उस चमत्कारिक कहानी पर रखा गया है जिसमें हज़रत मरयम द्वारा ईसा मसीह के पैदा होने की बात कही गई है, साथ में बूढ़े हो चले ज़करिया और उनकी बांझ पत्नी से यह्या अलै. के पैदा होने का भी ज़िक्र है। इस सूरह में अल्लाह ने अपने बहुत से पैग़म्बरों पर किए गए करम को दोबारा याद किया है और उनसे जुड़ी हुई कहानियाँ सुनायी हैं। इस दावे को कि ईसा अल्लाह के बेटे हैं, और साथ में मक्का के बुतपरस्तों का दावा कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं (88-95), और इसके अलावा दोबारा ज़िंदा उठाए जाने से इंकार (66-70), इन तीनों बातों को रद्द किया गया है। आयत 66-98 में मक्का के विश्वास न करने वाले लोगों की घमंड भरी बातों को उजागर किया गया है। पैग़म्बर (सल्ल) को कहा गया है कि इंकार करनेवालों के लिए अल्लाह की सज़ा बहुत नज़दीक आ पहुँची है, अत: मुहम्मद साहब को जल्दी सज़ा न आने के बारे में, या आयतों के कभी-कभी न उतरने के बारे में (64-65) अधीर या बेचैन होने की ज़रूरत नहीं है।
विषय:
02-15: ज़करिया और यह्या [Zachariah
& John] की कहानी
16-36: मरयम और ईसा (अलै) की कहानी
37-40: ईसा (अलै) के बारे में झगड़ने वालों को चेतावनी
41-50: इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब (अलै)
51-53: मूसा और हारून (अलै)
54-55: इसमाईल (अलै)
56-57: इदरीस (अलै)
58-63: अल्लाह के ख़ास नबियों का समूह
64-65: फ़रिश्तों का काम
66-72: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है
73-87: सच्चाई पर विश्वास न करने और मूर्तिपूजा की सज़ा
88-96: अल्लाह की कोई औलाद नहीं
97-98: अंत में रसूल को सलाह
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
काफ॰ हा॰ या॰
ऐन॰ साद॰ (1)
[ऐ रसूल] यह
आपके रब की उस रहमत [Mercy] का बयान है, जो उसने अपने
बंदे ज़करिया [Zachariah] पर दिखायी थी, (2)
जब उसने अपने
रब को मन ही मन में (दबी आवाज़ से) पुकारा था, (3)
"ऐ मेरे रब!
मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं, और मेरे सिर के बाल बुढ़ापे से बिल्कुल सफ़ेद
हो गए हैं, मगर ऐ रब!, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने तुझसे कोई दुआ
माँगी हो और तूने मेरी माँग पूरी न की हो: (4)
मुझे अपने
मरने के बाद अपने भाई-बन्धुओं की ओर से डर है (कि पता नहीं वे क्या करेंगे), और मेरी पत्नी तो बाँझ है। अतः तू मुझे अपने
पास से एक उत्तराधिकारी [Successor] प्रदान कर----जो तेरी ओर से एक इनाम हो---- (5)
जो मेरा भी
वारिस [heir] हो और याक़ूब
[Jacob] के वशंज का भी
वारिस हो। और ऐ रब! उसे ऐसा बना देना कि (तू और तेरे बंदे) सब उसे पसंद
करें।" (6)
(जवाब मिला), "ऐ ज़करिया! हम तुझे एक लड़के (के पैदा होने)
की ख़ुशख़बरी सुनाते हैं, जिसका नाम
यह्या [John] होगा---- इससे
पहले हमने किसी के लिए भी यह नाम नहीं चुना।" (7)
उसने (हैरान
होकर) कहा, "मेरे रब! मेरे
यहाँ लड़का कैसे हो सकता है! मेरी पत्नी बाँझ है और मैं बूढ़ा और बहुत कमज़ोर हो
चुका हूँ?" (8)
कहा गया, 'ऐसा ही होगा! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कोई मुश्किल बात नहीं, इससे पहले मैं ख़ुद तुझे पैदा कर चुका हूँ, हालाँकि (उस समय) तेरे वजूद [अस्तित्व] का
कोई अता-पता न था।" (9)
इस पर ज़करिया
ने कहा, "मेरे रब! मेरे
लिए इस बारे में कोई निशानी ठहरा दे।" कहा, "तेरे लिए निशानी यह है कि तू तीन (दिन और)
रात तक लोगों से बात न कर पाएगा।" (10)
अतः वह
इबादतगाह से बाहर निकलकर अपने लोगों के पास आया और (बिना मुँह से बोले हुए) उनसे
इशारों में कहा कि सुबह-शाम अल्लाह की बड़ाई का बखान करते रहो।" (11)
(हमने कहा), "ऐ यह्या! अल्लाह की किताब [तोरात] को मज़बूती
से थाम ले।" वह अभी छोटा लड़का ही था कि हमने उसे गहरी समझ-बूझ दे दी थी, (12)
और ख़ास अपने
पास से दिल की नर्मी और मन की शुद्धि भी दे दी थी। सचमुच वह बड़ा परहेज़गार था, (13)
अपने माँ-बाप
की सेवा करनेवाला था, कड़े मिज़ाज का
और आज्ञा न माननेवाला न था। (14)
"सलामती थी उस
पर, जिस दिन वह
पैदा हुआ और जिस दिन उसकी मृत्यु हो गयी, और सलामती होगी उस पर जिस दिन वह फिर से
ज़िंदा उठाया जाएगा!" (15)
[ऐ रसूल] इस
क़ुरआन में मरयम [Mary] की कहानी को
बयान करें। ऐसा हुआ कि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक ऐसी जगह चली गयीं जो पूरब
की तरफ़ थी (16)
और वहाँ वह
पर्दा करके उन सबसे अलग-थलग हो गयीं; तब हमने उसके पास अपनी रूह [फ़रिश्ते] को
भेजा जो उसके सामने एक पूरे आदमी के रूप में प्रकट हुआ। (17)
(मरयम उसे
देखकर घबरायीं और) बोलीं, "मैं रहम करनेवाले रब [रहमान] के नाम से तुझसे अपनी हिफ़ाज़त माँगती हूँ: अगर
तुझे (अल्लाह का) कुछ भी डर है (तो मुझसे दूर हट जा)!" (18)
मगर फ़रिश्ते
ने कहा, "मैं तो केवल
तेरे रब का संदेश लेकर आया हूँ, ताकि तुझे तोहफ़े में एक नेक बेटा दे
सकूँ।" (19)
मरयम ने कहा, "मुझे बेटा कैसे हो सकता है जबकि मुझे किसी
आदमी ने छुआ तक नहीं? और न ही मैं
बदचलन हूँ", (20)
फरिश्ते ने
कहा, "मगर होगा ऐसा
ही! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए
कुछ भी मुश्किल नहीं---हम उसे सारे लोगों के लिए एक निशानी बना देंगे, जो हमारी तरफ़ से एक रहमत [blessing] होगी।" और यह ऐसी बात थी जिसका होना
पहले से ही तय हो चुका था: (21)
फिर उसे उस
(होनेवाले बच्चे) का गर्भ ठहर गया। वह लोगों से अलग हटकर एक दूर के स्थान पर चली
गई (22)
और, फिर प्रसव के दर्द [Labour pain] की बेचैनी उसे एक खजूर के पेड़ के नीचे ले आई।
(जहाँ वह उसके तने के सहारे बैठ गयी) और वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही मर
चुकी होती और लोग मुझे भूल जाते!" (23)
उस समय (पहाड़ी
के) नीचे से एक पुकारनेवाले (फ़रिश्ते) की आवाज़ सुनाई दी, "चिंता न कर: तेरे रब ने तेरे क़दमों तले पानी
का एक सोता [Stream] बहा दिया है (24)
और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर
हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (25)
अतः खाओ, पियो और ख़ुश रहो, फिर अगर कोई आदमी नज़र आ जाए (जो कुछ पूछ
बैठे) तो उसे (इशारे से) कह देना, “मैंने अपने रब [रहमान] के लिए (चुप रहने के)
रोज़े [मौन व्रत] की मन्नत मान रखी है, इसलिए मैं आज किसी आदमी से बातचीत नहीं कर
सकती।" (26)
फिर (ऐसा हुआ
कि) वह उस बच्चे को साथ लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस आई। (लड़के को गोद
में देखकर) वे बोल उठे, "मरयम, यह तूने क्या कर डाला! (27)
ऐ हारून की
बहन! न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी!" (28)
इस पर मरयम ने
लड़के की तरफ़ इशारा किया (कि यही बताएगा)। वे कहने लगे, "भला हम एक (पालने के) बच्चे से कैसे बात कर
सकते हैं?" (29)
(मगर लड़का) बोल
उठा, "मैं अल्लाह का
बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब [Scripture] प्रदान की; मुझे नबी [Prophet] बनाया; (30)
मुझे बरकतवाला
[blessed] बनाया, चाहे मैं जहाँ भी रहूँ। और जब तक मैं ज़िंदा
रहूँ, मुझे हुक्म
दिया नमाज़ पढ़ने का, (ग़रीबों को)
ज़कात [alms] देने का, (31)
और अपनी माँ
की (प्यार से) देखभाल करने का। उसने मुझे पत्थर-दिल या बेरहम नहीं बनाया। (32)
(अल्लाह की ओर
से) सलामती थी मुझ पर, जिस दिन मैं
पैदा हुआ और उस दिन भी मुझ पर सलामती होगी जिस दिन मैं मरूँगा, और जिस दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया
जाऊँगा!" (33)
ऐसा था मरयम
का बेटा, ईसा [Jesus]!
यह है असल में
सच्ची बात जिसके बारे में वे सन्देह में पड़े हुए हैं: (34)
अल्लाह के लिए
यह बात कभी भी उपयुक्त नहीं कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। वह इन चीज़ों से बहुत
ऊँचा है: उसकी शान तो यह है कि जब वह कोई काम करने का फ़ैसला करता है तो बस हुक्म
देता है, "हो जा!"
तो बस वह हो जाता है। (35)
और (ईसा यही
तो कहते थे), "निस्संदेह
अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो: यही (सच्चाई का)
सीधा मार्ग है।" (36)
मगर फिर उसके
बाद विभिन्न गुटों [factions] का आपस में मतभेद होने लगा, तो जिन लोगों ने सच्चाई की बातों (पर संदेह
किया) और उसे मानने से इंकार किया, उनकी हालत पर अफ़सोस! वे कितनी दर्दनाक मुसीबत
में पड़ जाएंगे जिस दिन वह भयानक दिन आ जाएगा! (37)
जिस दिन वे
हमारे सामने हाज़िर होंगे, उनके कान और
उनकी आँखें सुनने और देखने में कितनी तेज़ होंगी, मगर अभी इन ज़ालिमों का हाल यह है कि यह
रास्ते से पूरी तरह भटके हुए हैं! (38)
[ऐ रसूल] आप
उन्हें ‘पछतावे के दिन’ [Day of Remorse]
से सावधान कर
दें, जब इन मामलों
का फ़ैसला कर दिया जाएगा, मगर उनका हाल
यह है कि वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते और उनको भुलाए बैठे हैं, और वे ईमान भी नहीं रखते हैं। (39)
हम ही (अंतत:)
ज़मीन के वारिस होंगे, और उन सभी
लोगों के भी (वारिस) होंगे जो इस ज़मीन पर बसे हुए हैं, और हमारे ही पास सबको लौटकर आना है। (40)
इस क़ुरआन में
इबराहीम [Abraham] की कहानी को
भी बयान करें। निस्संदेह वह सच्चाई की मूर्ति था, अल्लाह का नबी था। (41)
जब उसने अपने
बाप से कहा, "ऐ बाबा! आप उस
चीज़ को क्यों पूजते हैं, जो न सुन सकती
है, न देख सकती है, और न आपके किसी काम आ सकती है? (42)
बाबा! मैं सच
कहता हूं, ज्ञान की एक
रौशनी जो आपको नहीं मिल पायी थी, वह मुझे मिल गई है, अतः आप मेरे पीछे चलें: मैं आपको सीधा मार्ग
दिखाऊँगा। (43)
बाबा! शैतान
की बन्दगी न कीजिए---- शैतान तो
दयालु रब [रहमान] की आज्ञा को मानने से ही इंकार कर चुका है। (44)
बाबा! मैं
डरता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि आपको रहम करनेवाले [रहमान] की तरफ़ से कोई यातना आ
पकड़े, और आप (जहन्नम
में) शैतान के साथी होकर रह जाएँ।" (45)
बाप ने (यह
बातें सुनकर) कहा, "ऐ इबराहीम!
क्या तू मेरे देवताओं को रद्द करता है? याद रख! अगर तू ऐसी बातों से बाज़ न आया तो
मैं तुझे पत्थर से मरवाउंगा। अगर तू अपनी जान चाहता है, तो मेरे रास्ते से अलग हट जा!" (46)
इबराहीम ने
कहा, "अच्छा तो सलाम
है आपको: (आपसे अलग होकर भी) मैं आपके लिए रब से माफ़ी की दुआ करूँगा---- वह तो मुझ
पर बहुत मेहरबान है --- (47)
मगर अब, मैं आप सबको छोड़ता हूँ, और उन (मूर्तियों) को भी, जिन्हें अल्लाह को छोड़कर आपलोग पुकारा करते
हैं, और मैं तो
अपने रब को पुकारूँगा। मुझे भरोसा है कि अपने रब को पुकारकर मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।" (48)
फिर जब वह उन
लोगों से और उन सबसे जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे, अलग हो गया, तो हमने (उसकी नस्ल में बरकत दी और) उसे
इसहाक़ [Isaac] और (इसहाक़ का
बेटा) याक़ूब [Jacob] प्रदान किया
और उन दोनों को हमने नबी [Prophet] बनाया था: (49)
हमने उनपर
अपनी ख़ास दया-दृष्टि डाली थी, और उन सबको सच्चाई की आवाज़ें बुलंद करनेवाला
बनाकर बड़ी प्रतिष्ठा दी। (50)
और इस किताब [क़ुरआन]
में मूसा [Moses] की कहानी भी बयान
कर दें। निस्संदेह वह ख़ास चुना हुआ बंदा था, जो एक रसूल [Messenger] और नबी [Prophet] था: (51)
हमने उसे 'तूर' पहाड़ के दाहिनी ओर से पुकारा और (‘वही’ द्वारा) रहस्य की बातें करने के लिए उसे अपने से
नज़दीक किया; (52)
और अपनी रहमत से
उसके भाई हारून [Aaron] को (उसकी मदद के
लिए) नबी बनाकर उसे दिया। (53)
और (ऐ रसूल), इस किताब [क़ुरआन] में इसमाईल [Ishmael] की भी चर्चा करें। निस्संदेह वह अपने वायदे का
पक्का था और (अल्लाह का) रसूल और नबी था। (54)
वह अपने घर के
लोगों को नमाज़ पढ़ने और (ग़रीबों को) ज़कात देने का हुक्म देता था और वह (अपनी
सारी बातों में) अपने रब के यहाँ बहुत पसंद किया जाता था। (55)
और (ऐ रसूल) इस किताब में इदरीस की भी चर्चा करें। बेशक वह भी सच्चाई की मूर्ति था, और एक नबी था। (56)
और हमने उसे बड़े ही ऊंचे दर्जे तक पहुंचा दिया था। (57)
ये लोग उन
नबियों में से थे जिन पर अल्लाह ने ख़ास कृपा की थी---आदम की सन्तान में से, और उन लोगों के वंशज में से जिनको हमने नूह
के साथ (नौका में) सवार किया था, और इबराहीम और इसराईल (याक़ूब) के वंशज में
से----और उन गिरोहों में से जिनको हमने सीधा मार्ग दिखाया और (अच्छाई के लिए) चुन
लिया। ये वे लोग हैं कि जब उन्हें दयालु रब [रहमान] की आयतें सुनाई जाती थी, तो वे सुनते ही सज्दे में झुक जाते थे और
उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते थे, (58)
मगर फिर उनके
बाद ऐसे बुरे लोगों की कई पीढ़ियां गुज़रीं, जो नमाज़ की (हक़ीक़त) को भुला बैठे और मन की
इच्छाओं के पीछे बढ़ चले। अतः जल्द ही ऐसा होगा कि उनकी गुमराही (के नतीजे) उनके
सामने आ जाएं, (59)
मगर हां, जो कोई (गुनाहों से) तौबा कर ले, (सच्चाई पर) विश्वास कर ले, और अच्छे कर्मों में लग जाए, तो बेशक ऐसे लोगों के लिए कोई डरने की बात
नहीं। वे जन्नत में प्रवेश करेंगे। उनके हक़ के साथ थोड़ी सी भी नाइंसाफी नहीं
होगी: (60)
वे सदाबहार
रहने वाली जन्नत में दाख़िल होंगे, जिसका वादा दयालु रब [रहमान] ने अपने बन्दों
से कर रखा है---- और वह वादा एक अनदेखी चीज़ का है (जिसे इस ज़िन्दगी में वे महसूस
नहीं कर सकते, मगर) उसका
वादा तो ऐसा है जैसे एक बात घट चुकी है। (61)
उस (जन्नत की
ज़िन्दगी में) कोई व्यर्थ बात उनके कानों में नहीं पड़ेगी। जो कुछ सुनेंगे, वह बस सलामती की ही आवाज़ होगी; वहां सुबह-शाम उनकी रोज़ी उन्हें बराबर मिला
करेंगी। (62)
यह है वह जन्नत जिसका वारिस हम अपने बन्दों में से हर उस आदमी को बनाएँगे, जो परहेज़गार (devout) हो। (63)
(फ़रिश्ता जिबरईल रसूल से कहेंगे), “हम आपके रब की आज्ञा के बिना आपके पास (''वही' लेकर) नहीं आते----- जो कुछ हमारे सामने है, और जो कुछ हमारे पीछे गुज़र चुका है और जो कुछ इन दोनों वक़्तों के बीच हुआ, सब उसी के हुक्म से है----और आपका रब कभी भी कोई चीज़ भूलनेवाला नहीं है। (64)
वह आसमानों और ज़मीन का रब है और उन सबका भी रब है, जो इन दोनों के बीच है, अतः (ऐ रसूल) आप उसी की बन्दगी करें: उसकी बंदगी की राह में जो कुछ घटे, उस पर धीरज से जमे रहें। क्या आपकी जानकारी में उस जैसा कोई है? (65)
और (सच्चाई से बेख़बर) इंसान कहता है, "क्या! जब मैं मर गया तो फिर क्या ऐसा होने वाला है कि फिर से ज़िंदा उठाया जाऊँ?" (66)
मगर क्या
इंसान को यह बात याद नहीं रही कि हमने उसे पहली बार तब पैदा किया था, जब उसका कोई वजूद न था? (67)
अतः (ऐ रसूल)
आपके रब की क़सम, हम उन सबको और
उनके साथ सारे शैतानों को ज़रूर इकट्ठा करेंगे। फिर उन सबको जहन्नम के गिर्द
हाज़िर होने का आदेश देंगे, इस दशा में कि वे घुटनों के बल झुके होंगे; (68)
फिर हर गिरोह
में से उन लोगों को (चुन-चुनकर) अलग कर लेंगे जो (अपनी ज़िंदगी में) रहम करनेवाले
रब [रहमान] की बनायी गयी सीमाओं को तोड़ने वाला होगा----(69)
फिर यह बात भी
हम ही जानते हैं कि कौन जहन्नम में झोंके जाने के सबसे ज़्यादा योग्य है --- (70)
(याद रखो)
तुममें से हर एक को इस मंज़िल से गुज़रना ही पड़ेगा, यह एक तय किया हुआ फ़ैसला है जिसे पूरा करना
तेरे रब ने ज़रूरी ठहरा लिया है। (71)
फिर हम ऐसा
करेंगे कि जो परहेज़गार होंगे, उन्हें तो हम बचा लेंगे और जो शैतानी करने
वाले ज़ालिम हैं, उन्हें हम
जहन्नम में घुटनों के बल पड़े हुए छोड़ देंगे। (72)
और (देखो) जब
हमारी आयतें लोगों को स्पष्ट करके सुनाई जाती हैं, तो जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े
हुए हैं, वे ईमानवालों
से कहते हैं, "दोनों गिरोहों
में ज़्यादा अच्छी स्थिति में कौन है? और किस गिरोह के पीछे चलने वाले अधिक हैं?" (73)
उनसे पहले हम
कितनी ही कौमों को बर्बाद कर चुके हैं जो तरह तरह के सामान, धन-दौलत और बाहरी चकाचौंध में इनसे कहीं आगे
थीं! (74)
(ऐ रसूल) कह
दें, "जो कोई
गुमराही में पड़ा तो दयालु रब [रहमान] का क़ानून यही है कि उसे उस वक़्त तक बराबर
ढील देता जाता है जब तक कि वह अपनी आँखों से वह बात देख न ले जिसका उनसे वादा किया
गया था---चाहे (इसी जीवन की) यातना हो या क़यामत की घड़ी (का फ़ैसला)--- तो वे उस
समय जान लेंगे कि कौन था जिसकी स्थिति सबसे बदतर हुई और किसका गिरोह सबसे कमज़ोर
निकला।" (75)
मगर जिन लोगों
ने (सही) मार्ग पा लिया, तो अल्लाह
उन्हें और ज़्यादा (कामयाबी की) राह दिखा देता है। और तुम्हारे रब की नज़र में तो
बाक़ी रहनेवाली नेकियाँ ही बेहतर हैं-- सवाब [पुण्य] के हिसाब से भी और (अन्तिम)
परिणाम के हिसाब से भी। (76)
(ऐ रसूल) क्या
आपने देखा उस आदमी का क्या हाल है जिसने हमारी आयतों को (मानने से) इंकार किया और
कहा, "ख़ुदा की
क़सम! मैं (परलोक में भी) ज़रूर धन-दौलत पाऊंगा, मैं ज़रूर औलाद पाऊंगा"? (77)
वह जो ऐसा कहता है तो क्या उसने (छिपी हुई) अनदेखी चीज़ को झाँककर देख लिया है, या रहम करनेवाले रब [रहमान] से कोई वचन ले रखा है कि उसे ऐसा करना ही पड़ेगा? (78)
हरगिज़ नहीं!
(ऐसा कभी नहीं हो सकता!), हम इसे भी लिख
लेंगे जो कुछ वह कहता है और उसकी यातना को बढ़ाते चले जाएँगे: (79)
यह जिस माल व
औलाद का दावा करता है (अगर वह उसे मिल भी जाए तो अंत में) वह सब हमारे ही कब्ज़े
में आएगा, औऱ उसे तो
हमारे सामने एकदम अकेले ही हाज़िर होना है! (80)
उन लोगों ने
अल्लाह को छोड़कर दूसरों को अपना प्रभु बना लिया है, ताकि वे उनके मददगार हों, (81)
लेकिन (क़यामत
के दिन) उनके प्रभु उनकी पूजा किए जाने से साफ़ इंकार कर देंगे, बल्कि उल्टे वे उनके विरोधी बन जाएँगे। (82)
(ऐ रसूल) क्या
आपने देखा नहीं कि हमने शैतानों को इंकार करने वालों [काफ़िरों] पर छोड़ रखा है, जो उन्हें बराबर (गुनाह करने पर) उकसाते रहते
हैं? (83)
अतः उनके लिए
आपको उतावला होने की कोई ज़रूरत नहीं: हम तो बस उनके लिए (नियत किए गए) समय गिन
रहे हैं। (84)
उस दिन हम नेक
व परहेज़गार इंसानों को अपने रब [रहमान] के सामने मेहमानों के रूप में इकट्ठा
करेंगे, (85)
और अपराधियों
को जहन्नम की ओर प्यासे जानवरों की तरह हँका के ले जाएँगे। (86)
उस दिन
सिफ़ारिश करना-कराना किसी के अधिकार में न होगा, सिवाए उनके जिन्होंने दयालु रब [रहमान] से
इसकी अनुमति पा ली हो। (87)
और उन (मक्का
के काफ़िरों ने) कहा, "ख़ुदा [रहमान] की कोई औलाद है।" (88)
यह अत्यन्त भारी बात है, जो तुम कहते हो: (89)
कहीं ऐसा न हो कि आकाश फट पड़े, धरती फट के टुकड़े-टुकड़े हो जाए और पहाड़ टूटकर गिर पड़ें, (90)
इस बात पर कि लोग ख़ुदा (रहमान) के लिए औलाद रखने का दावा कर रहे हैं! (91)
यह बात ख़ुदा
(रहमान) की शान के बिल्कुल ख़िलाफ़ है कि उसकी कोई औलाद हो: (92)
आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है वह इसीलिए है, कि ख़ुदा (रहमान) के सामने बंदगी में सर झुकाए हुए हाज़िर हो ---(93)
उसने अपनी (क़ुदरत से) उन्हें घेर रखा है, और (अपने ज्ञान से) हर एक को ठीक-ठीक गिन रखा है--- (94)
और क़यामत के दिन हर एक, उस ख़ुदा (रहमान) के सामने बिल्कुल अकेले आ खड़ा होगा। (95)
मगर जो लोग (सच्चाई पर) ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्मो में लगे रहते हैं, तो उनके लिए यह बात पक्की है कि ख़ुदा (रहमान) उन लोगों को अपना प्यार देगा: (96)
इसीलिए (ऐ रसूल), हमने इस क़ुरआन को आपकी भाषा (अरबी) में उतारकर आसान कर दिया, ताकि अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचनेवालों को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दें, और जो गिरोह सच्चाई के विरुद्ध अड़ियल रवैया अपनाने वाला है, उसे (इंकार व सीमा तोड़ने के नतीजे से) सावधान कर दें, (97)
मगर इन सीमा तोड़नेवालों से पहले, विभिन्न क़ौमों के कितने दौर गुज़र चुके हैं जिन्हें हमने (बुरे कर्मों के नतीजे में) बर्बाद कर दिया! क्या उनमें से किसी की हस्ती भी अब तुम महसूस करते हो, या क्या उनकी कोई भनक भी तुम्हें सुनाई देती है? (98)
नोट:
5: नबी के रूप में लोगों को भलाई के कामों की
तरफ़ बुलाना और बुरे कामों से रोकने के जिस मिशन में वह लगे हुए थे, उन्हें संदेह था कि उनके मरने के बाद उनके
भाई-बंधु इस काम को ठीक से आगे बढ़ा पाएंगे।
17: शायद वह नहाने या अकेले में इबादत के लिए
अलग-थलग हो गयी थीं।
24: हज़रत मरयम जिस जगह चली गयी थीं, वह एक छोटी पहाड़ी पर स्थित थी, शायद यही जगह "बैतुल-लहम" कहलाती है जो बैतुल मक़दिस से कुछ मील की दूरी
पर है।
28: हो सकता है कि हज़रत मरयम के भाई का नाम "हारून" हो, या यह हो सकता है कि वह हारून (अलै.)/ [Aaron] के क़बीले से हों।
30: हज़रत मरयम की चाल-चलन पर जब सवाल उठने लगे, तो अल्लाह ने छोटे से बच्चे [ईसा] को बोलने
की शक्ति दे दी..... "मुझे नबी बनाया और किताब [इंजील] दी" का मतलब बड़े होकर नबी बनाया जाएगा और किताब
दी जाएगी, और यह बात इतनी पक्की है जैसे हो ही चुकी।
34: संदेह में ईसाई और यहूदी दोनों ही पड़े हुए थे, यहूदी उन्हें अल्लाह का नबी मानते ही नहीं थे, और ईसाई उन्हें अल्लाह का बेटा मानते थे।
36: कुछ विद्वान कहते हैं कि यह बात ईसा (अलै) ने
नहीं कही, बल्कि मुहम्मद (सल्ल) के द्वारा कही गयी है।
45: ....."आप शैतान के साथी होकर रह जाएं" या "आप शैतान की मदद करने वाले बन जाएं।"
47: इबराहीम (अलै) अल्लाह से अपने बाप के गुनाहों
की माफ़ी माँगना चाहते थे, मगर जैसा सूरह तौबा (9: 114) से पता चलता है कि जब उन्हें लगा कि वह एक
अल्लाह पर विश्वास नहीं करने वाले, तो वह अपने बाबा से अलग हो गए, और उनकी माफ़ी के लिए दुआ भी नहीं की।
50: मुसलमान अपनी नमाज़ों में और ऐसे भी रोज़ाना
मुहम्मद (सल्ल) और उनके परिवार पर दरूद [blessings] भेजते रहते हैं, और उनके साथ-साथ इबराहीम (अलै) और उनके
परिवार पर भी दरूद भेजते हैं।
54: यूँ तो हर रसूल/नबी अपने वादे के पक्के होते
हैं, मगर यहाँ इसमाईल (अलै.) का ख़ास करके ज़िक्र है, शायद इसलिए कि जब उनके बाप इबराहीम (अलै) को
उन्हें क़ुर्बान [sacrifice] करने का हुक्म हुआ, तो इसमाईल ने वादा किया था कि ज़बह होते समय
वह सब्र [धीरज] करेंगे।
56: इदरीस (अलै.) के बारे में ज़्यादा जानकारी
नहीं मिलती। कुछ लोग उन्हें बाइबल में आए Enoch से मिलाते हैं जो कि नूह (अलै) के परदादा थे, जिन्हें अल्लाह ने ज़िंदा आसमान पर उठा लिया
था। हज़रत इदरीस के बारे में कहा जाता है कि वह पहले आदमी थे जिसने क़लम से लिखा था, उन्हें गणित और ग्रह-नक्षत्र की भी जानकारी
थी, और पहली बार उन्होंने जानवरों की खाल की सिलाई करके कपड़ा
पहना था। कुछ लोग इन्हें हज़रत इल्यास (अलै) से भी जोड़ते हैं जिनका ज़िक्र सूरह अनाम
(6: 85) और सूरह साफ़्फ़ात (37: 123 ) में भी आया है।
64: कभी-कभी ऐसा होता था कि कुछ अवधि के लिए
फ़रिश्ता जिबरईल अल्लाह की तरफ़ से आयतें लेकर आना बंद कर देते थे जिससे मुहम्मद
(सल्ल) बेचैन हो जाते थे, क्योंकि मक्का के लोग आपका मज़ाक़ उड़ाया करते थे कि उनके
अल्लाह ने उन्हें छोड़ दिया है, इसीलिए उन्होंने जिबरईल (अलै) से अनुरोध किया था कि वह जल्दी जल्दी आया करें, मगर उन्होंने यहाँ बताया है कि बिना अल्लाह
के हुक्म के वह ऐसा नहीं कर सकते। (सही बुख़ारी)
71: "तुममें से हर एक को", इसका मतलब या तो वे विश्वास न करनेवाले हैं, या फिर सारे ही अच्छे-बुरे लोग हैं जिन्हें "पुल सिरात" से ग़ुज़रना ही होगा, यह पुल जहन्नम पर ही बना हुआ है। नेक और
अच्छे लोग इस पर से आराम से गुज़र जाएंगे, मगर उनकी गति उनके ईमान की ताक़त के हिसाब से
ज़्यादा या कम होगी, और बुरे कर्म करने वाले और विश्वास न करने वाले लोग जहन्नम
में गिरा दिए जाएंगे। जिनके दिलों में ईमान होगा, वे अपने बुरे कर्मों की सज़ा भुगतने के बाद
वहाँ से निकाल लिए जाएंगे।
77: कहा जाता है कि यह बात मक्का के एक बुतपरस्त
अल आस इब्ने वैल ने कही थी जो कि क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने की बात का घोर
विरोधी था। मक्का के कुछ लोगों में ऐसी मान्यता थी कि इस दुनिया में
अगर उसके पास धन-दौलत और औलाद हैं, तो इसका मतलब यह है कि अल्लाह उनसे ख़ूश है, और ये सब उसे परलोक में भी ज़रूर मिलेगा।
81: मक्का के कुछ विश्वास न करने वाले यह कहा
करते थे कि हम "लात, उज़्ज़ा, मनात" आदि की पूजा इसलिए करते हैं कि वे अल्लाह के
पास हमारी सिफ़ारिश करेंगे, देखें सूरह यूनुस (10: 18).
88: अरब के बुतपरस्तों का मानना था कि फ़रिश्ते
अल्लाह की बेटियाँ हैं, ईसाइयों का दावा था कि ईसा अल्लाह के बेटे हैं।
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