Early Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के आरंभिक दिनों की सूरतें
उप समूह - II
सूरह 20: ता हा [Ta Ha]
यह एक मक्की सूरह जिसका आरम्भ और अंत दोनों क़ुरआन के ज़िक्र से हुआ है: यह रसूल पर इसलिए नहीं उतारी गई कि उन्हें कोई दुख में डाल दिया जाए, बल्कि यह तो उनके रब की तरफ़ से एक स्पष्ट प्रमाण है। उदाहरण के तौर पर मूसा अलै. की लम्बी कहानी सुनायी गई है (09-101), जिसमें यह दिखाया गया है कि फिरऔन जैसा ज़बरदस्त विरोधी होने के बावजूद उसके जादूगरों ने मूसा अलै. के सामने घुटने टेक दिए और किस तरह फ़िरऔन के ज़ुल्म का अंत हुआ, ताकि रसूल का हौसला बढ़ाया जा सके और सच्चाई पर विश्वास न करने वालों का भयानक अंजाम दिखाया जा सके। पिछली पीढ़ियों की बर्बादी के क़िस्से इसलिए सुनाए गए हैं, ताकि विश्वास न करने वाले उनसे सबक़ सीख सकें। पैग़म्बर साहब को धीरज से काम लेने और अपनी इबादतों में मज़बूती से जमे रहने का आदेश दिया गया है।
विषय:
01-08: क़ुरआन उतारने
का मक़सद
09-36: मूसा (अलै) की कहानी: उनका मिशन
37-40: मूसा के बचपन और शुरुआती ज़िंदगी की कहानी
41-48: मूसा और हारून को फिरऔन के पास भेजा गया
49-76: मूसा (अलै) का फिरऔन के साथ संघर्ष
77-79: मिस्र से इसराईल की संतानों का निकलना
80-82: इसराईल की संतानों से किए गए वादे
83-98: बछड़े से जुड़ी पूरी घटना
99-101: मूसा (अलै) की कहानी का अंत
102-112: अंतिम दिन की घटनाएं
113-114: क़ुरआन अरबी भाषा में है
115-127: आदम से लिया हुआ शपथ
128-132: रसूल के लिए कुछ आदेश
133-135: रसूल से कोई चमत्कारिक निशानी दिखाने की माँग
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ हा॰ (1)
[ऐ रसूल] हमने
आप पर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारी कि आप चिंता व तकलीफ़ में पड़ जाएं, (2)
यह तो इसलिए
उतारी गयी है कि जो लोग (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे में) अल्लाह से डरने वाले
हैं, उनके लिए
नसीहत हो, (3)
यह उस हस्ती
की तरफ़ से उतारी जा रही है जिसने ज़मीन और ऊंचे आसमानों को पैदा किया है, (4)
वह (हस्ती)
रहम करनेवाला रब [रहमान] है, जो अपने तख़्त पर विराजमान है। (5)
जो कुछ
आसमानों और ज़मीन में है, और जो कुछ इन
दोनों के बीच में है, और जो कुछ
धरती के नीचे है--- सब कुछ उसी (अल्लाह) का है। (6)
तुम चाहे कोई
बात ऊँची आवाज़ में कहो (या चुपके से), वह तुम्हारे राज़ [secret] की बातें भी जानता है, और यहाँ तक कि तुम्हारे (दिल के अंदर) छिपी
हुई बातें भी जानता है। (7)
वह अल्लाह---
कि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं--- सारी ख़ूबियों वाले अच्छे नाम उसी के लिए
हैं। (8)
[ऐ रसूल] क्या
आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी? (9)
जब उसने (दूर
से) आग देखी तो अपने घरवालों से कहा, "तुम लोग यहीं ठहरो! मुझे (दूर में) आग दिखायी
दी है। शायद तुम्हारे (आग तापने के) लिए उसमें से एक अंगारा ले आऊँ या उस अलाव पर
सही मार्ग का पता चल जाए।" (10)
फिर जब वह आग
के पास पहुँचा, तो (एक आवाज़
ने) उसे पुकारा, "ऐ मूसा! (11)
मैं तेरा रब
हूँ। अपने जूते उतार दे: तू इस वक़्त ‘तुवा’ की पवित्र घाटी में खड़ा है। (12)
मैंने (अपना
संदेश पहुँचाने के लिए) तुझे चुन लिया है। अतः जो बात ‘वही’[revelation] के द्वारा कही जा रही है, उसे ध्यान लगा कर सुनो। (13)
निस्संदेह मैं
ही अल्लाह हूँ; मेरे सिवा कोई
भी पूजने के लायक़ नहीं। अतः तू मेरी ही बन्दगी कर और (पाबंदी से) नमाज़ अदा कर ताकि
तू मुझे याद करता रहे। (14)
वह (नियत)
घड़ी जल्द आनेवाली है----- हालाँकि मैं उस (समय) को अभी छिपाए रखना चाहता हूँ
---ताकि हर आदमी को उसके द्वारा की गयी कोशिशों का बदला मिल सके। (15)
देखो! ऐसा
नहीं होना चाहिए कि कोई आदमी जो इस (नियत घड़ी) में विश्वास न करता हो और अपनी
इच्छाओं के पीछे भागता हो, वह तुम्हें
इससे बहका दे, और तुम्हारी
बर्बादी का कारण बन जाए।” (16)
“ऐ मूसा! यह तेरे
दाहिने हाथ में क्या है?" (17)
उसने कहा, "यह मेरी लाठी है। मैं इस पर टेक लगाता हूँ; इससे अपनी बकरियों के लिए पेड़ों के पत्ते झाड़ता
हूँ; और इससे मेरी
दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती हैं।" (18)
अल्लाह ने कहा, "मूसा! इसे नीचे फेंक दे!" (19)
उसने (लाठी) नीचे
फेंक दी, और सहसा क्या
देखता है कि वह एक तेज़ दौड़ता हुआ साँप बन गयी! (20)
अल्लाह ने कहा, "इसे पकड़ लो और डरो मत: हम इसे फिर इसकी असली हालत
पर लौटा देते हैं। (21)
(फिर आदेश हुआ): अब
अपने हाथ को अपनी बग़ल [armpit] के नीचे रखो और
बाहर निकालो, वह बिना किसी
ख़राबी के, सफ़ेद (चमकता हुआ)
निकलेगा: (लाठी के अलावा) यह दूसरी निशानी होगी। (22)
(यह दोनों
निशानियाँ इसलिए दीं कि) आने वाले समय में हम तुझे अपनी निशानियों में से कुछ बड़ी
निशानियाँ दिखा सकें। (23)
[आदेश हुआ]: ऐ
मूसा! फ़िरऔन [मिस्र का राजा, Pharaoh] के पास जाओ, कि सचमुच वह बहुत ज़ालिम हो गया है।" (24)
मूसा ने कहा, "मेरे रब! मेरे दिल में उम्मीद व जोश जगा दे (ताकि
बड़े से बड़ा बोझ उठा सकूँ) (25)
और मेरे काम को
मेरे लिए आसान बना दे। (26)
मेरी ज़बान की
लड़खड़ाहट ठीक कर दे, (27)
ताकि मेरी बात
लोगों की समझ में आ जाए, (28)
और मेरे घरवालों
में से मेरे लिए एक सहायक दे दे, (29)
हारून [Aaron] के रूप में, जो मेरा भाई है --- (30)
उसके द्वारा मेरी
ताक़त बढ़ा दे। (31)
और उसे मेरे काम
में हाथ बँटानेवाला बना दे, (32)
ताकि हम अधिक से
अधिक तेरी बड़ाई का बखान कर सकें (33)
और अक्सर तेरी याद
में लगे रहें: (34)
तू तो हमेशा ही हम
पर नज़र रखनेवाला है।" (35)
अल्लाह ने कहा, "मूसा, जो कुछ तूने माँगा है, मैंने मंज़ूर कर लिया। (36)
(तू जानता है) हम
तुझ पर पहले भी एक बार एहसान कर चुके हैं, (37)
जब हमने तेरी माँ
के दिल में यह बात डालते हुए कहा था, (38)
“तुम अपने बच्चे को
बक्से में रख दो, फिर उसे (नील) नदी
में डाल दो। नदी उस बक्से को बहाते हुए स्वंय किनारे पर लगा देगी, और फिर वह उस (बच्चे) को उठा लेगा जो मेरा दुश्मन
है, और उस बच्चे का भी
दुश्मन है।” मैंने तुझ पर अपना
ख़ास प्यार बरसाया था (कि जो देखता तुम से प्यार कर बैठता), और ऐसी योजना बनायी थी, ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी ख़ास निगरानी में हो
सके। (39)
तेरी बहन (घर से)
बाहर निकली, और (फ़िरऔन की लड़की
से) कहने लगी, “क्या मैं तुम्हें
उस (औरत) का पता बता दूँ जो इस (बच्चे) को दूध पिला सकती है”, इस तरह, हमने तुझे फिर तेरी माँ के पास (सुरक्षित) पहुँचा
दिया, ताकि खुशी में
उसकी आँख ठंडी रहें और वह दुखी न रहे। कुछ समय बाद तुमने (मिस्र में) एक आदमी को
मार डाला था, लेकिन हमने तुझे
उस चिंता व परेशानी से मुक्ति दी थी, और फिर तुझे और भी कई तरीक़े से परखा। फिर तुम कई
सालों तक मदयन [Midian] के लोगों के बीच
रहे, और उसके बाद मेरे
तय किए हुए इरादे के मुताबिक़, ऐ मूसा, तुम यहाँ आ पहुँचे। (40)
हमने तुझे अपने
(संदेश पहुँचाने के) लिए चुन लिया है। (41)
अब तुम और
तुम्हारा भाई, दोनों मेरी
निशानियों के साथ जाओ, और देखो! इस बात
का ध्यान रहे कि मुझे याद करते रहना। (42)
दोनों मिलकर
फ़िरऔन के पास जाओ, कि उसने (मर्यादा
की) तमाम हदें तोड़ डाली हैं। (43)
मगर देखो, उससे नर्मी से बात करना, शायद कि वह उस पर ध्यान दे या कुछ आदर
दिखलाए।" (44)
दोनों ने कहा, "ऐ हमारे रब! हमें डर है कि कहीं वह हमें कोई
बड़ा नुक़सान न पहुँचाए या मर्यादा की सीमाएं न तोड़ डाले।" (45)
अल्लाह ने कहा, "डरो नहीं, मै तुम दोनों के साथ हूँ। मैं सब सुनता भी
हूँ और देखता भी हूँ। (46)
जाओ और जाकर
उससे कहो, “हम तेरे रब के
भेजे हुए रसूल [Messengers] हैं, अत: इसराईल की सन्तान को हमारे साथ भेज दे, और उनके साथ ज़ुल्म न करे। हम तेरे पास तेरे
रब की निशानी लेकर आए हैं, और जो कोई भी
सीधे रास्ते पर चले, उसके लिए
सलामती है; (47)
हमें ‘वही’ [Revelation] द्वारा (अल्लाह की तरफ़ से) यह बात बतायी गयी
है कि जो कोई भी सच्चाई को मानने से इंकार करेगा और उससे मुँह फेरेगा, तो उसके ऊपर यातना आ पड़ेगी।" (48)
फ़िरऔन ने पूछा, "अच्छा, तुम दोनों का रब कौन है, मूसा?" (49)
मूसा ने कहा, "हमारा रब वह है जिसने हर चीज़ को उसकी सही आकृति
[Form] दी, फिर उसके (विकास के) लिए ज़रूरी रास्ता भी बता
दिया।" (50)
फ़िरऔन ने कहा, "अच्छा तो उन पीढ़ियों का क्या होगा, जो पहले गुज़र चुकी हैं?" (51)
मूसा ने कहा, "इन सब का ज्ञान तो केवल मेरे रब के पास ही है, जो एक किताब में लिखा हुआ है; मेरा रब न चूकता है और न भूलता है।" (52)
"वह (अल्लाह) है
जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फ़र्श की तरह बिछा दिया, और उसमें से रास्ते निकाल दिए। उसने आसमान से
बारिश उतार भेजी। इसी पानी से हमने तरह तरह के पेड़-पौधे निकाले, (53)
अत: ख़ुद भी खाओ, और अपने चौपायों को भी चराओ! निस्संदेह इन सब में
समझदार लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं। (54)
इसी ज़मीन (की
मिट्टी) से हमने तुम्हें पैदा किया था, इसी के अंदर हम तुम्हें वापस ले जाएंगे, और फिर इसी से दूसरी बार उठाए जाओगे।" (55)
हक़ीक़त यह है
कि हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखायीं, मगर उसने उन्हें झुठलाया और मानने से इंकार
कर दिया। (56)
उसने कहा, "ऐ मूसा! क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि
अपने जादू से हमको अपनी ज़मीन से निकाल बाहर कर दे? (57)
अच्छा, हम भी तेरे जादू का मुक़ाबला जादू से ही
करेंगे: एक (मुनासिब) जगह ठहरा लो जिस पर दोनों पक्ष राज़ी हों, और (मुक़ाबले का) एक समय तय कर लो, जिसे हम दोनों में से कोई भी तोड़ न
पाए।" (58)
मूसा ने कहा, "ठीक है, हमारे बीच वह दिन तय रहा, जिस दिन उत्सव मनाया जाता है, और यह कि लोग दिन चढ़े वहाँ इकट्ठे हो
जाएँ।" (59)
फ़िरऔन (वहाँ
से) चला गया, फिर उसने अपने
सारे (शैतानी) हथकंडे जुटाए, और (नियत समय पर) आ गया। (60)
मूसा ने उन
लोगों से कहा, "ख़बरदार!
अल्लाह के बारे में झूठी बातें न गढ़ो, वरना वह [अल्लाह] तुम्हें ऐसी सज़ा देगा कि
तुम बर्बाद हो जाओगे। याद रहे, जिस किसी ने भी झूठ गढ़ा, वह असफल रहेगा।" (61)
इस पर वे आपस
में अपनी योजना के बारे में विचार-विमर्श करने लगे, और चुपके-चुपके कानाफूसी करते हुए, (62)
कहने लगे, "ये दोनों जादूगर हैं, इनका मक़सद है कि अपने जादू से तुम्हें अपनी
ज़मीनों से निकाल बाहर कर दें, और तुम्हारी उत्तम संस्कृति को बर्बाद कर
डालें।" (63)
अतः अपने सभी
हथकंडों [resources] को जुटा लो, फिर मुक़ाबले के लिए पंक्तिबद्ध हो जाओ। आज जो
भी जीतेगा, असल कामयाबी
उसी की होगी।" (64)
जादूगरों ने
कहा, "ऐ मूसा! पहला
दांव तुम चलोगे या फिर हम चलें?” (65)
मूसा ने कहा, "तुम्हीं पहले चलो।" फिर (जादूगरों ने
अपने दांव फेंके), अचानक जादू के
असर से उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ (साँप की तरह) दौड़ती हुई महसूस होने लगीं! (66)
मूसा अपने जी
में थोड़ा डरा, (67)
मगर हमने कहा, "डरो मत! निस्संदेह तुम ही (मुक़ाबले में) भारी
पड़ोगे। (68)
तुम्हारे
दाहिने हाथ में जो (लाठी) है, उसे नीचे फेंक दो: जो कुछ (जादू से) उन्होंने
रचा है, वह उसे निगल
जाएगी। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह तो बस जादूगर के करतब हैं, और जादूगर चाहे किसी रास्ते से आए, उसे कभी कामयाबी नहीं मिलती।" (69)
[ऐसा ही हुआ, और] सारे जादूगर घुटनों के बल (सज्दे में) गिरा
दिए गए। वे बोले, "हमने विश्वास
कर लिया, हारून और मूसा
के रब पर।" (70)
फ़िरऔन ने
(जादूगरों से) कहा, "मेरी इजाज़त
लेने से पहले ही तुम्हारी यह मजाल कि तुमने इनके रब पर विश्वास कर लिया? यह ज़रूर तुम्हारा उस्ताद होगा, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अब अवश्य ही
मैं तुम्हारा एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ का पाँव कटवा दूँगा, और खजूर के तनों पर तुम्हें सूली चढ़ा दूँगा।
तब तुम्हें अवश्य ही मालूम हो जाएगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कठोर और लम्बे
समय तक रहने वाली है!" (71)
जादूगरों ने
कहा, "हम यह कभी
नहीं कर सकते कि जो (सच्चाई की) स्पष्ट निशानियाँ (अल्लाह की तरफ़ से) हमारे सामने
आ चुकी हैं, उन्हें छोड़कर
तेरा आदेश मान लें, और न ही जिस
अल्लाह ने हमें पैदा किया है, उससे मुँह फेरकर तेरा हुक्म मान लें: अत: तू
जो चाहे, फ़ैसला कर ले:
वैसे भी तू तो बस इसी सांसारिक जीवन के मामलों का ही फ़ैसला कर सकता है----- (72)
हमने तो अपने
रब पर विश्वास कर लिया, (इस आशा में)
कि शायद वह हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे औऱ इस जादूगरी को भी जिसे दिखाने के लिए
तूने हमें मजबूर किया---- अल्लाह ही सबसे अच्छा और हमेशा बाक़ी रहने वाला है।"
(73)
शैतानियाँ
करने वाले लोग जब अपने रब के पास लौटकर आएंगे, तो (अपने कर्मों के) बदले में जहन्नम पाएंगे:
वहीं उन्हें (हमेशा) रहना है, जहाँ वे न मर सकेंगे, न जी सकेंगे। (74)
मगर वे लोग
जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, जब अपने रब के पास लौटकर आएंगे, तो इनाम में उनके लिए ऊँचे से ऊँचा दर्जा
होगा, (75)
बहती हुई
नहरों के बीच, फैले हुए
सदाबहार (परम आनंदवाले) बाग़ होंगे, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। यह इनाम है उन लोगों
के लिए, जिसने स्वयं
को (बुराइयों से) बचाए रखा था। (76)
हमने मूसा को ‘वही’ [Revelation] भेजी, "रातों रात मेरे बन्दों [इसराईल की संतान] को लेकर
(मिस्र से) निकल पड़ो, और उनके लिए दरिया
में सूखा मार्ग निकाल लो। और देखो, तुम्हें न तो (फ़िरऔन द्वारा) पीछा किए जाने व
पकड़े जाने का डर हो, और न कोई चिंता व
दुख तुम्हें सताए।" (77)
फ़िरऔन ने अपनी
सेना के साथ उनका पीछा किया और अन्ततः समंदर की लहरें उन पर इस तरह छा गयीं कि
पूरी तरह से डुबाकर रख दिया। (78)
फ़िरऔन ने सचमुच
अपनी क़ौम के लोगों को पथभ्रष्ट किया; और उन्हें सही मार्ग न दिखाया। (79)
ऐ इसराईल की
सन्तान! हमने तुम्हें तुम्हारे दुश्मनों से बचा लिया। तूर पहाड़ के दाहिनी तरफ़ जब
तुमसे (बरकतों का) वादा किया था, और फिर (सीना के रेगिस्तान में खाने के लिए)
तुम पर ‘मन्ना’ और ‘सलवा’ [quails] उतारा, (80)
(तुम्हें कहा
गया), "जो कुछ रोज़ी
हमने दे रखी है, उसमें से
अच्छी चीज़ें खाओ, मगर (मर्यादा
की) एक हद से आगे न बढ़ो, वरना मेरा
ग़ुस्सा तुम पर आ गिरेगा। और जिस किसी पर मेरा ग़ुस्सा उतरा, तो सचमुच वह बहुत नीचे गिर गया। (81)
इसके बावजूद, मैं उन लोगों को बेहद माफ़ करनेवाला हूँ, जो (अपने किए पर) तौबा करते हैं, ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और सीधे मार्ग पर जमे रहते हैं।" (82)
[मूसा अपनी क़ौम
को हारून की निगरानी में छोड़कर तूर पहाड़ पर ध्यान लगाने आए थे, तब अल्लाह ने कहा], "ऐ मूसा! अपनी क़ौम को पीछे छोड़कर तुझे इतनी
जल्दी यहाँ आने पर किस चीज़ ने उभारा?" (83)
उसने कहा, "वे मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए पीछे-पीछे
चले आ रहे हैं, ऐ रब! मैं
तेरे पास लपककर आ गया, ताकि तू ख़ुश
हो जाए।" (84)
लेकिन अल्लाह
ने कहा, "तेरी अनुपस्थिति
में हमने तेरी क़ौम के लोगों की परीक्षा ली: सामरी ने उन्हें बहका दिया है।"
(85)
तब मूसा बेहद
ग़ुस्सा और दुखी मन से अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस गया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे रब ने
तुम से अच्छा वादा नहीं किया था? क्या इस बात को हुए बहुत लम्बा समय गुज़र गया
था या तुम यही चाहते ही थे कि तुम पर तुम्हारे रब का ग़ुस्सा टूट पड़े? इसीलिए तुमने मुझ से किए हुए वादे को तोड़
डाला?" (86)
उन लोगों ने
कहा, "हमने आप से
किए हुए वादे को जान-बूझकर नहीं तोड़ा, बल्कि असल में (मिस्र से निकलते समय) लोगों
के पास भारी भारी ज़ेवर थे जिसके बोझ तले हम दबे हुए थे, (और फिर सफ़र की मुसीबतों से बचने व ईमान की
सफ़ाई के लिए ज़ेवरों को फेंक देना तय हुआ), अत: हमने उनको फेंक दिया था, और सामरी ने (उन्हें जमा करके आग में) डाल
दिया था।" (87)
फिर सामरी ने
उस (पिघले हुए ज़ेवरों) से एक बछड़े की मूर्ति बना दी, जिसमें से गाय के पुकारने जैसी आवाज़ आती थी, और लोग देखकर कहने लगे, "यही तुम्हारा ख़ुदा है और मूसा का भी ख़ुदा यही
है, मगर वह [मूसा]
भूल गए हैं।" (88)
क्या उन्होंने
नहीं देखा था कि वह (बछड़ा आवाज़ तो निकालता है, पर) उनकी किसी बात का जवाब नहीं देता था, और यह कि उसमें न तो किसी को कोई नुक़सान
पहुँचाने की ताक़त थी और न फ़ायदा? (89)
हारून ने
हालाँकि उन्हें बता दिया था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बछड़ा तुम लोगों के
लिए एक परीक्षा है, तुम्हारा असल
रब तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है, अतः तुम मेरे पीछे चलो, और मेरा आदेश मानो।" (90)
मगर उन्होंने
जवाब दिया, "जब तक मूसा
लौटकर हमारे पास न आ जाएं, तब तक हम इसकी
भक्ति करना नहीं छोड़ेंगे।" (91)
मूसा ने कहा, "ऐ हारून! जब तुम समझ गए कि ये पथभ्रष्ट हो
चुके हैं, तो किस चीज़
ने तुम्हें रोके रखा था, (92)
मेरे
पीछे-पीछे चले आने से? तुम मेरे आदेश
की अवहेलना कैसे कर सकते हो?" (93)
हारून ने कहा, "ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी और मेरा सिर
न नोच!---- मुझे डर था कि तू कहेगा, “तूने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और
मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।" (94)
(मूसा ने) कहा, "और ऐ सामरी! तेरा क्या मामला था?" (95)
उसने जवाब
दिया, "मैंने कुछ ऐसा
देखा था, जो इन लोगों
ने नहीं देखा; मैंने रसूल की
कुछ शिक्षाएं तो ली थीं, मगर फिर
उन्हें (अपने मन से) निकालकर एक तरफ़ डाल दिया: मेरे जी ने ही मुझे ऐसा करने के लिए
उकसाया था।" (96)
मूसा ने कहा, "चला जा यहाँ से! अब इस जीवन में तेरे लिए यही
है कि तू कहता रहे, “मत छूओ मुझे!” मगर हाँ, तेरे लिए (अल्लाह के सामने हाज़िर होने का) एक
निश्चित समय तय किया हुआ है, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। देख
अपने इस प्रभु को जिसकी भक्ति में तू जमा बैठा था---- हम इसे चूर-चूर करके दरिया में बिखेर
देंगे।" (97)
“[लोगो]
तुम्हारा असल ख़ुदा तो बस एक अल्लाह है, जिसके अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं-----
उसके ज्ञान ने हर चीज़ को घेर रखा है।" (98)
इस तरह से [ऐ
रसूल], हम पुराने
ज़माने की कहानियों से आपका रिश्ता जोड़ देते हैं। हमने आपको अपनी तरफ़ से एक नसीहत
का सामान [क़ुरआन] दिया है। (99)
जिस किसी ने
इससे मुँह मोड़ा, वह निश्चय ही
क़यामत के दिन (अपने जुर्म का) बड़ा भारी बोझ उठाएगा, (100)
वे इसी बोझ
तले दबे रहेंगे। कैसा भयानक बोझ है जो क़यामत के दिन यह लिए फिरेंगे! (101)
जिस दिन
नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर
बजा दिया जाएगा, और हम
मुजरिमों को अंधों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (102)
वे आपस में
चुपके-चुपके पूछेंगे कि "हम (क़ब्रों में) दस दिन से ज़्यादा क्या रहे होंगे?"---- (103)
जो कुछ वे कह
रहे होंगे, हम उसे अच्छी
तरह जानते हैं---- मगर उनमें से सबसे समझदार आदमी कहेगा, "हम बहुत रहे होंगे तो बस एक दिन रहे
होंगे।" (104)
[ऐ रसूल] वे
आपसे पहाड़ों के बारे में पूछते हैं: कह दें, "(क़यामत के दिन) मेरा रब उन पहाड़ों को (चूर-चूर
करके) धूल की तरह उड़ा देगा (105)
और धरती को एक
समतल मैदान बनाकर छोड़ेगा, (106)
जिसमें न तो
कोई ऊँचाई दिखेगी और न ही पस्ती।" (107)
उस दिन सब लोग
पुकारनेवाले के पीछे-पीछे चल पड़ेंगे, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता न होगा; रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने हर एक
आवाज़ दबकर रह जाएगी; बस केवल
फुसफुसाने की आवाज़ ही सुनाई देगी। (108)
उस दिन किसी
की सिफ़ारिश काम न आएगी सिवाय उसके, जिसको रब [रहमान] ख़ास इजाज़त दे दे, और जिसकी बात को मंज़ूर कर ले ---- (109)
जो कुछ लोगों
के सामने है और जो उनके पीछे गुज़र चुका, वह सारी बातों को जानता है, हालाँकि वे उस [अल्लाह] को पूरी तरह समझ नहीं
सकते---- (110)
सभी चेहरे उस
हमेशा ज़िंदा रहनेवाले, हर समय
निगरानी रखनेवाले [अल्लाह] के आगे झुकें होंगे। ऐसे लोग जिन पर बुरे कर्मों का बोझ
होगा, वे निराशा में
डूब जाएंगे, (111)
पर जिस किसी
ने अच्छे कर्म किए हैं, और (सच्चाई
पर) ईमान रखा है, तो उसे न तो
किसी नाइंसाफ़ी का डर होगा और न हक़ मारे जाने का।” (112)
हमने क़ुरआन
को अरबी ज़बान में उतारा है, और हमने इसमें हर तरह से (इंकार व बुरे
कर्मों के नतीजे की) चेतावनियाँ दे दी हैं, ताकि वे (भटकने से) सावधान रह सकें या इस पर
ध्यान दे सकें--- (113)
बड़ी ऊँची शान
है अल्लाह की, जिसे हर एक
चीज़ पर पूरा नियंत्रण है।
[ऐ रसूल] जब
क़ुरआन (की आयतें) उतारी जा रही हों, तो उसे पूरी तरह उतरने से पहले ही पढ़ने में
जल्दी न किया करें, बल्कि कहें, "मेरे रब, मेरे ज्ञान में बढ़ोत्तरी कर दे!" (114)
असल में हमने
आदम को पहले से ही बताकर शपथ ले ली थी, फिर वह भूल गया और हमने उसमें इरादे की
मज़बूती न पाई। (115)
जब हमने
फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब झुक गए थे, मगर इबलीस ने (झुकने से) इंकार किया, (116)
इस पर हमने
कहा, "ऐ आदम! (देख
लो), इबलीस
तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हारा और
तुम्हारी बीवी का दुश्मन: कहीं ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और
तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। (117)
तुम्हारे लिए
अब ऐसी ज़िंदगी है कि (जन्नत के) बाग़ में तुम न कभी भूखे रहोगे, और न ही नंगापन महसूस करोगे, (118)
न प्यासे
रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।" (119)
लेकिन फिर
शैतान ने आदम को बहकाया, और कहने लगा, "ऐ आदम! क्या मैं तुझे एक ऐसे पेड़ का पता दे
दूँ जिससे जीवन अमर हो जाए, और ऐसी शक्ति मिल जाए जो कभी घटे नहीं?" (120)
और (फिर आदम
और उसकी पत्नी) दोनों ने उस (पेड़) में से कुछ खा लिया, जिसके नतीजे में उन्हें (शर्म से) अपने जिस्म
को छिपाने की ज़रूरत महसूस हुई, और वे बाग़ के पत्तों से अपने जिस्म को ढकने
लगे। आदम अपने रब के कहने पर न चला और वह (जन्नत की ज़िंदगी से) भटक गया----- (121)
लेकिन बाद में, उसका रब उसे फिर अपने नज़दीक ले आया, उसकी तौबा [repentance] क़बूल कर ली, और उसका मार्गदर्शन किया ---- (122)
अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों इस जन्नत से चले जाओ!, (आदम और शैतान) तुम दोनों एक दूसरे के दुश्मन
होगे।
(अब धरती पर)
अगर मेरी ओर से तुम (लोगों) को कोई मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन को अपनाया, वह न तो गुमराह होगा और न किसी तकलीफ़ में
पड़ेगा। (123)
और जिस किसी
ने मेरी नसीहत से मुँह मोड़ा, तो उसका जीवन सख़्त परेशानी में गुज़रेगा।
क़यामत के दिन हम उसे अंधा करके खड़ा करेंगे।" (124)
वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! तू मुझे यहाँ अंधा करके क्यों
लाया? पहले तो मैं
देख सकता था!" (125)
अल्लाह कहेगा, "ऐसा ही होना था: जब हमारी निशानियाँ [आयतें]
तेरे पास आती थीं, तो तू उन्हें
नज़रअंदाज़ [ignore] कर देता था, अत: आज तुझे भी भुला दिया जाएगा।" (126)
जो कोई
मर्यादा को तोड़कर बहुत आगे चला जाता है, और अपने रब की आयतों पर विश्वास नहीं रखता, तो इसी तरह हम उसे बदला देते हैं। और आख़िरत
[Hereafter] की सज़ा तो
बेहद कठोर और बहुत देर तक रहने वाली है। (127)
पहले की कितनी
ही पीढ़ियों को हम (उनके जुर्मों के नतीजे में) बर्बाद कर चुके हैं जिनके खंडहरों
से होकर तुम लोग आते जाते हो, तो क्या उनसे कोई सबक़ नहीं सीखते? समझदार आदमी के लिए सचमुच इसमें बहुत-सी
निशानियाँ हैं! (128)
[ऐ रसूल] अगर
आपके रब ने (सज़ा देने के समय) की बात पहले से ही तय न कर दी होती, तो अब तक उन्हें तबाह कर दिया गया होता। उनका
समय तय हो चुका है, (129)
अतः [ऐ रसूल]
जो कुछ वे कहते हैं, आप उस पर धीरज
[सब्र] से काम लें---- मन से अपने रब का गुणगान करें, सूरज निकलने और डूबने से पहले, और रात की घड़ियों में भी उसका गुणगान करें, और दिन के शुरू और ख़त्म होने पर [दोपहर के
लगभग] भी, ताकि आपको
संतोष मिल सके ---- (130)
हमने उनमें से
कुछ लोगों को इस ज़िंदगी की बहार लूटने और मज़े करने का मौक़ा दिया है: हम उसके
द्वारा उनकी परीक्षा लेते हैं, मगर आप इन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें, आपके रब की दी हुई रोज़ी उत्तम भी है और देर
तक रहने वाली भी। (131)
आप अपने लोगों
को नमाज़ पढ़ने का आदेश दे दें, और स्वयं भी उसपर जमे रहें। हम आपसे कोई
रोज़ी नहीं माँगते; रोज़ी तो हम
ही देते हैं, और आख़िरत का
इनाम तो उन्हीं लोगों के लिए है जो (अल्लाह की) भक्ति में डूबे होते हैं। (132)
विश्वास न
करनेवाले कहते हैं, "यह (रसूल)
अपने रब की ओर से हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं लाते?" मगर क्या उन्हें स्पष्ट प्रमाण (के रूप में
क़ुरआन) नहीं दिया गया, जो पहले की
(आसमानी) किताबों में लिखी हुई बातों की पुष्टि करती है? (133)
अगर इस रसूल
के आने से पहले, हम सज़ा के तौर
पर इन्हें तबाह व बर्बाद कर देते, तो वे ये कहते "ऐ हमारे रब, काश, तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता, तो हम अपमानित और बदनाम होने से पहले ही तेरी
आयतों के अनुसार चलते!" (134)
[ऐ रसूल] कह
दें, "हम सब (आने
वाले समय का) इंतज़ार कर रहे हैं, अतः तुम भी इंतज़ार करो: जल्द ही तुम्हें
मालूम हो जाएगा कि कौन सीधे मार्ग पर चलने वाला है और कौन मंज़िल तक पहुँचता
है।" (135)
नोट:
1: राज़ी के अनुसार ता.हा. अलग-अलग अक्षर नहीं
हैं, बल्कि यमनी
ज़बान की एक शाख़ में "ताहा" का मतलब "ऐ इंसान!" होता है। कुछ
लोग कहते हैं कि यह अल्लाह का एक नाम है, जबकि कुछ लोग इसे मुहम्मद (सल्ल) का एक नाम
भी मानते हैं।
2: जब क़ुरआन की नसीहतों पर मक्का के लोग विश्वास
नहीं करते थे, तो मुहम्मद
(सल्ल) को तकलीफ़ होती थी। इसका एक मतलब यह भी बताया जाता है कि शुरू में आप सारी
रात खड़े होकर इबादत करते थे जिससे आपके पाँव सूज जाते थे, इस आयत में उन्हें इतनी तकलीफ़ें उठाने से मना
किया गया है।
9: "क्या आपने ...कहानी सुनी?"... यह एक अरबी मुहावरा है जिसका मतलब है, "इसके बारे में अच्छी तरह सोचें.... या इससे
सबक सीखें।"
10: मूसा (अलै.) काफी लम्बी अवधि मदयन में गुज़ारकर
मिस्र की तरफ़ जा रहे थे, उनके साथ उनका
परिवार भी था। जब वे सीना [Sinai] के रेगिस्तान से गुज़र रहे थे, तब यह घटना हुई।
11: कहा जाता है कि जब मूसा (अलै.) आग के पास
पहुँचे, तो देखा कि वह
आग पेड़ के ऊपर शोले मार रही है, मगर पेड़ का कोई पत्ता जलता नहीं है!
12: तूर पहाड़ के नीचे जो घाटी है, उसका नाम "तुवा" है।
18: ".... मैं इस (लाठी) से पेड़ के पत्ते झाड़ता
हूँ" का एक और अनुवाद है, " मैं इससे अपनी भेड़ों को क़ाबू में रखता
हूँ।"
27: बचपन में मूसा (अलै.) ने ग़लती से अपने मुँह
में आग का अंगारा रख लिया था जिसकी वजह से ज़बान लड़खड़ाती थी।
39: फ़िरऔन के सामने किसी ने भविष्यवाणी की थी कि
तुम्हारी सल्तनत का अंत इसराईल की संतान का एक आदमी करेगा, इसलिए उसने हुक्म दे रखा था कि इसराईल की
संतानों के यहाँ अगर कोई बेटा पैदा हो, तो उसे मार दिया जाए। जब मूसा पैदा हुए, तो उनके मारे जाने का डर हो गया था। इसीलिए
उनकी माँ ने अल्लाह के हुक्म से उन्हें बक्से में रखकर नील नदी में डाल दिया
था......... मेरा और बच्चे का दुश्मन यानी फिरऔन ......
40: फ़िरऔन के लोगों ने बक्सा उठा लिया और बच्चे
को जब फ़िरऔन की बीवी ने देखा तो उसको पालने का इरादा कर लिया और फ़िरऔन को भी इस पर
राज़ी कर लिया। फिर ऐसा हुआ कि बच्चा किसी का भी दूध नहीं पी रहा था, इसी बीच मूसा की बहन पता करते हुए वहाँ
पहुँची, और उसने एक
औरत यानी अपनी माँ के बारे में बताया जो कि बच्चे को दूध पिला सकती थी....... मूसा
(अलै) ने एक बेकसूर इसराइली को बचाने के लिए एक ज़ालिम को एक घूंसा मारा था, मगर वह मर गया हालाँकि उनका इरादा उसे क़त्ल
करने का नहीं था, देखें सूरह
क़सस (28: 15)
51: फ़िरऔन यह पूछना चाहता था कि जो क़ौमें पहले
गुज़र चुकीं हैं और जो एक ख़ुदा को नहीं मानती थीं , इसके बावजूद
वह ज़िंदा रहीं और उनपर कोई यातना नहीं आयी। जवाब में कहा गया है कि यह अल्लाह ही तय करता है कि किसे दुनिया ही में
सज़ा देना है और किसकी सज़ा को आख़िरत/परलोक तक टाले रखना है।
56: अल्लाह की नौ निशानियों के ज़िक्र के लिए
देखें 20: 17-22 और 7: 130-133.
61: अल्लाह के संदेश की सच्चाई को "जादू:
कहकर मानने से इंकार करना, अल्लाह के
बारे में झूठी बातें गढ़ने जैसा है।
69: जब मूसा (अलै.) ने अपनी लाठी फेंकी, तो वह अजगर बनकर जादूगरों के बनाए हुए नक़ली
साँपों को एक-एक करके निगल गई। जादूगरों ने मूसा (अलै) का यह चमत्कार देखा तो वे
एकदम से सज्दे में गिर पड़े।
77: जादूगरों की घटना के बाद कई साल मूसा (अलै) मिस्र में अल्लाह का संदेश पहुंचाते रहे, फिर उन्हें इसरायली लोगों के साथ समंदर [लाल
सागर] में से होकर जाने
का हुक्म मिला, जिसका ज़िक्र
सूरह यूनुस (10: 89-92) और सूरह शुअरा (26: 60-66) में आया है।
80: अल्लाह का वादा यह था कि लोगों के मार्गदर्शन
के लिए एक किताब [तौरात] दी जाएगी।
जब इसराइल के लोग मिस्र छोड़ने के बाद किसी
बस्ती की तलाश में मारे फिरे, तो इस दौरान उनके खाने-पीने के लिए अल्लाह ने
"मन्ना" (आसमान से उतरी रोटी) और "सलवा" (मुर्ग़ी की तरह की
चिड़िये का गोश्त) की व्यवस्था की था।
83: सीना के रेगिस्तान में ठहरने के दौरान अल्लाह
ने मूसा (अलै) को तूर पहाड़ पर बुलाया था, ताकि वह 40 दिन तक अल्लाह
की भक्ति में ध्यान लगाएं, तो उन्हें
तोरात [Torah] दी जाए। मूसा
(अलै) अपने साथियों को छोड़कर थोड़ा पहले ही चले गए थे, उन्होंने सोचा कि उनके 70 साथी भी पीछे से आ
रहे होंगे, लेकिन वे लोग
नहीं आए।
85: सामरी, या समारिया [Samaria] का रहने वाला
आदमी, एक जादूगर था, जो ऊपरी मन से मूसा (अलै) में विश्वास रखता
था, मगर असल में
वह पाखंडी था जिसने इसराइल की संतानों को मूर्तिपूजा में लगा दिया था।
86: "अच्छा वादा" का मतलब तूर पहाड़ पर लोगों
को रास्ता दिखाने वाली किताब [तौरात] देने का वादा था।
87: मिस्र से निकलते वक़्त इसराईल की संतानों के
पास बहुत सारे ज़ेवर थे जो कि मिस्र के लोगों से उधार पर लिए गए थे, चूँकि वह ज़ेवर इन लोगों के नहीं थे, इसलिए यह फ़ैसला हुआ कि जब तक मूसा (अलै.) आ
नहीं जाते, उन्हे गड्ढे
में डाल दिया जाए। कुछ लोग कहते हैं कि हज़रत हारून (अलै) के कहने पर यह तय हुआ था।
जब सारे लोगों ने अपने ज़ेवर फेंक दिए, तो सामरी भी कोई चीज़ मुठ्ठी में दबाकर लाया, और हारून (अलै) से इसे गड्ढे में डाल देने की
इजाज़त माँगी, उन्होंने यह
सोचते हुए कि ज़ेवर होगा कह दिया कि डाल दो। इस पर सामरी ने कहा कि आप मेरे लिए दुआ
कर दें कि जो कुछ मैं चाहता हूँ वह पूरा हो जाए, उन्होंने दुआ कर दी। असल में वह ज़ेवर की जगह
मिट्टी लेकर आया था, उसने वही
मिट्टी उन ज़ेवरों पर डालकर उन्हें पिघलाया, और उनसे एक बछड़े की सी सुनहरी मूर्ति बना ली
जिसमें से आवाज़ निकलती थी।
90: इस आयत से साफ़ हो गया कि बाइबिल में जो बात
कही गयी है कि हारून (अलै) ख़ुद भी बछड़े की पूजा करने लगे थे, ग़लत है। (देखें Exodus: 1-6)
93: मूसा (अलै) ने जो हुक्म दिए थे, उसके लिए देखें 7: 142
96: इसका शाब्दिक अनुवाद है कि .."मैंने
रसूल [जिबरईल] के पैरों के निशान से एक मुठ्ठी मिट्टी उठाई और फेंक दी".....
कुछ लोगों ने इसका अजीब मतलब बताया है, कि मूसा (अलै) के लशकर के साथ जिबरील (अलै)
इंसानी शक्ल में घोड़े पर सवार होकर चल रहे थे, सामरी ने देखा कि घोड़े के पाँव जहाँ-जहाँ
पड़ते, वहाँ की
मिट्टी,पत्थर, झाड़ियाँ आदि जीवित हो जाते थे। सो उसने पाँव
के नीचे की एक मुठ्ठी मिट्टी लेकर बछड़े पर डाल दी, और फिर बछड़े की मूर्ति में से आवाज़ आने लगी।
इस बात की सच्चाई का कोई ठोस सबूत नहीं है, कुछ लोग कहते हैं कि खोखली मूर्ति में कई महीन छेद थे, जिनसे हवा के गुज़रने से सीटी जैसी आवाज़
निकलती थी। जैसा कि सूरह अ'राफ़ (7: 148) में भी है कि वह एक बेजान मूर्ति थी जो न बोल
सकती थी और न रास्ता दिखा सकती थी।
97: कुछ लोग "मत छुओ मुझे" का मतलब यह
बताते हैं कि उसका सामाजिक बहिष्कार [social outcast] हो गया।
114: मुहम्मद (सल्ल) पर जब आयतें उतरती थीं, तो आप उनको जल्दी-जल्दी दुहराते थे क्योंकि
उन्हें लगता था कि
कहीं भूल न जाएं। कभी ऐसा भी हुआ कि अभी पूरी आयत नहीं उतरी, और आपने उसे हड़बड़ी में दोहराना शुरू कर दिया, देखें सूरह क़ियामह (75: 16-19)
115: असल में अल्लाह ने आदम से एक ख़ास पेड़ का फल न
खाने की शपथ ली थी , देखें सूरह बक़रा (2: 34-39),
.... उनका इरादा
अगर मज़बूत होता तो वह शैतान के बहकावे में आकर भूल न कर बैठते।
121: क़ुरआन में जन्नत से निकाले जाने के लिए केवल
आदम को ज़िम्मेदार ठहराया गया है, जबकि बाइबल में हव्वा [Eve] की ग़लती बताई गई है, देखें (Genesis 3).
124: जब लोग क़ब्र से उठाकर हिसाब-किताब के लिए
हश्र की तरफ़ लाए जाएंगे, उस समय ये लोग अंधे होंगे, लेकिन बाद में उनकी आँख की रौशनी उन्हें दे
दी जाएगी, क्योंकि फिर
वह जहन्नम की आग को देखेंगे। देखें सूरह कहफ़ (18: 53).
130: मुहम्मद (सल्ल) को तसल्ली दी जा रही है कि ये
लोग आपके विरोध में जो कुछ बातें करते हैं, उनका जवाब देने के बजाए धीरज से काम लें, और अल्लाह का गुणगान करते रहें। गुणगान करने
का सबसे अच्छा तरीक़ा है नमाज़ पढ़ना.... ..इस आयत में पाँच वक़्त की नमाज़ का ज़िक्र है, सूरज निकलने
से पहले और डूबने से पहले (फ़ज्र, ज़ुहर, और अस्र), फिर रात में इशा, और दिन के किनारों पर मग़रिब की नमाज़। अल्लाह
को इस तरह याद करते रहने के कारण इन कर्मों के चलते मिलने वाले इनाम और इस दुनिया
में मिलने वाली नेमतों से आपको संतोष हो जाएगा।
133: मक्का के लोग मुहम्मद साहब से हमेशा निशानी
दिखाने की माँग करते रहते थे। लेकिन क़ुरआन से बढ़कर और क्या निशानी हो सकती थी, जिसमें उन पुरानी घटनाओं का उल्लेख मिलता है
जो पुरानी आसमानी किताबों (तोरात, इंजील, ज़बूर आदि) में भी आया है (जबकि मुहम्मद
(सल्ल) पढ़े-लिखे नहीं थे), मगर वे लोग
कोई ऐसे चमत्कार की मांग करते थे जो सब लोग देख सकें जैसे कि मूसा (अलै) की लाठी
थी (देखें 17: 90-91), और कुछ मुस्लिम विद्वानों के अनुसार उन किताबों में मुहम्मद (सल्ल) के आने की
सूचना भी दी गई थी, जैसे Deuteronomy 18: 15-18 & 33:2. Isaiah 42, John 14: 16.
हालाँकि बाइबल जानने वाले इसका अर्थ दूसरे से ढंग से लगाते हैं।
135: "आने वाला समय" इस दुनिया में भी हो सकता
है और फ़ैसले का दिन भी हो सकता है, तब तक इंतज़ार करना होगा कि क्या परिणाम
[अंजाम] होता है।
सूरह 26: अश-शु’अरा
[कविगण /The Poets]
यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम आयत 224 में आए कवि लोगों के ज़िक्र पर पड़ा है। इसमें विश्वास न करने वालों का बयान है जो क़ुरआन के महत्व को कम करके दिखाते हैं। इसमें प्रकृति में फैली हुई अल्लाह की ताक़त और उसकी मेहरबानियों का वर्णन है। पुराने ग़ुज़र चुके नबियों जैसे नूह, शुऐब, लूत, सालेह (अलै.) आदि की कई कहानियाँ यहाँ दुहरायी गई हैं जिनमें अल्लाह का संदेश सुनने के बाद उन लोगों की प्रतिक्रियाएं, और साथ में नतीजे के तौर पर लोगों को मिलने वाली यातना के बारे में भी बताया गया है, अंत में फिर से इस बात की पुष्टि की गई है कि क़ुरआन को अल्लाह की तरफ़ से उतारा गया है, और यह कि न तो यह किसी जिन्न का लाया हुआ है और न ही यह कोई कविता है।
विषय:
01-02: अल्लाह की
किताब की आयतें (निशानियाँ)
03-09: विश्वास न
करने वालों की ज़िद्द और हठधर्मी
10-51: मूसा (अलै) और
फ़िरऔन की कहानी
52-68: मिस्र से
इसराईल की संतानों का निकलना
69-104: इबराहीम (अलै)
और उनकी क़ौम की कहानी
105-122: नूह (अलै) और
उनकी क़ौम की कहानी
123-140: हूद (अलै) और
आ'द के लोगों की
कहानी
141-159: सालेह (अलै)
और समूद के लोगों की कहानी
160-175: लूत (अलै) और
उनकी क़ौम की कहानी
176-191: शुएब (अलै) और
जंगल में रहने वाले
लोगों की कहानी
192-209: सचमुच क़ुरआन
भरोसा करने के लायक़ है
210-220: क़ुरआन लाने
वाला कोई जिन्न या शैतान नहीं है
221-227: झूठे लोग और
कविगण
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰ मीम॰
(1)
ये उस किताब
की आयतें हैं, जो सच्चाई को
स्पष्ट कर देती हैं: (2)
[ऐ रसूल], क्या आप यह सोच-सोचकर अपनी जान ही दे देंगे
कि आख़िर वे लोग (आपकी बातों में) विश्वास क्यों नहीं करते? (3)
अगर हम ऐसा
चाहते, तो उनपर आसमान
से एक ऐसी निशानी उतार देते, कि फिर उसके आगे उनकी गर्दनें झुकी की झुकी
रह जातीं। (4)
जब कभी दयालु
रब [रहमान] की तरफ़ से उनके पास नयी नसीहतें [आयतें] भेजी जाती हैं, वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं: (5)
वे इसे (मानने
से) इंकार करते हैं, मगर जल्द ही
उन्हें उसकी हक़ीक़त मालूम हो जाएगी, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे हैं। (6)
क्या उन्होंने
धरती को नहीं देखा कि हमने उसमें कैसी-कैसी (वनस्पतियों की) क़िस्में उगा दीं? (7)
सचमुच ही
इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि उनमें
से अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (8)
और तुम्हारा
रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (9)
(उस समय का हाल
सुनो) जबकि तुम्हारे रब ने मूसा [Moses] को पुकारकर कहा था, "ग़लत काम करनेवाले [ज़ालिम] लोगों के पास जाओ, (10)
यानी फ़िरऔन [Pharaoh] की क़ौम के पास --- क्या वे (अल्लाह की बातों
पर) ध्यान नहीं देंगे?" (11)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे डर है कि वे मुझे झूठा कहेंगे, (12)
और मैं दुखी
हो जाऊँगा और मेरी ज़बान बंद हो जाएगी, इसलिए (मेरे भाई) हारून [Aaron] को भी मेरे साथ भेज दें; (13)
इसके अलावा, मेरे ख़िलाफ़ उन लोगों ने एक (क़त्ल का) इल्ज़ाम
भी लगा रखा है। इसलिए मैं डरता हूँ कि कहीं वे मुझे मार ही न डालें।" (14)
अल्लाह ने कहा, "नहीं [वे ऐसा नहीं कर सकते]! तुम दोनों हमारी
निशानियाँ लेकर जाओ--- यक़ीन रखो, हम तुम्हारे साथ रहेंगे, और सब सुनते रहेंगे। (15)
अतः तुम दोनो
फ़िरऔन के पास जाओ और कहो, “हम सारे संसार
के रब की तरफ़ से संदेश लेकर आए हैं: (16)
इसराईल की
सन्तानों को हमारे साथ जाने दो।" (17)
फ़िरऔन ने कहा, "क्या हमने तुम्हें अपने यहाँ रखकर पाला नहीं
था जब तुम बच्चे थे? क्या तुमने
हमारे साथ रहते हुए अपनी उम्र के कई साल नहीं गुज़ारे थे? (18)
और फिर तुमने
अपने हाथ से वह अपराध कर डाला था: तुम बड़े एहसान फ़रामोश [ungrateful] हो।" (19)
मूसा ने जवाब
दिया, “जब मैंने वह
(घूँसा मारने का) काम किया, उस वक़्त मुझे धोखा हुआ था, (20)
और मैं
तुम्हारे डर से यहाँ से भाग़ खड़ा हुआ था; बाद में, मेरे रब ने मुझे सही ज्ञान दिया और मुझे अपने
रसूलों में शामिल कर लिया। (21)
और क्या यही
बड़ा काम किया है तुमने --- कि इसराईल की सन्तान को ग़ुलाम बना रखा है--- जो तुम
मुझ पर अपना एहसान जता रहे हो?" (22)
फिर फ़िरऔन ने
पूछा, "और यह सारे
संसार का रब क्या होता है?" (23)
मूसा ने जवाब
दिया, "वह सारे
आसमानों का, ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उन सबका रब है, अगर तुम सचमुच विश्वास कर सको!" (24)
फ़िरऔन ने वहाँ
मौजूद लोगों से कहा, "क्या तुमने
सुना, जो कुछ इस ने
कहा?" (25)
मूसा ने कहा, "वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं
का भी रब है।" (26)
फ़िरऔन ने कहा, "यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, सचमुच ही पागल है।" (27)
मूसा ने आगे
कहा, "वह पूरब और
पश्चिम का भी रब है और जो कुछ उनके बीच है उसका भी रब है, (समझ जाओगे) अगर तुम अपनी बुद्धि से काम
लो!" (28)
मगर फिरऔन ने
(मूसा से) कहा, "अगर तूने मेरे
सिवा किसी और को पूजने के क़ाबिल माना, तो मैं तुझे ज़रूर बन्दी बना लूँगा", (29)
इस पर मूसा ने
पूछा, "क्या तब भी, अगर मैं तुम्हें कोई ऐसी चीज़ दिखा दूँ जिसे
(देखकर) तुम मान जाओ?" (30)
“अच्छा ठीक है, दिखाओ, अगर तुम सच बोल रहे हो", फ़िरऔन ने कहा। (31)
अत: मूसा ने
अपनी लाठी फेंकी, देखते ही
देखते वह अजगर साँप बन गयी। (32)
फिर उसने अपना
हाथ (बग़ल से) खींचकर निकाला, तो वह पल भर में देखने वालों के सामने सफ़ेद
होकर चमकने लगा। (33)
फ़िरऔन ने अपने
आसपास मौजूद सरदारों से कहा, "यह आदमी तो बड़ा ही माहिर जादूगर है! (34)
ऐसा लगता है
कि यह अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी ज़मीन से निकाल बाहर करना चाहता है! तो अब
तुम्हारी क्या राय है?" (35)
उन्होंने जवाब
दिया, "इसे और इसके
भाई को अभी कुछ समय के लिए टाल दें, और सभी शहरों में संदेशवाहकों को भेज दें, (36)
ताकि सभी मँझे
हुए जादूगरों को आपके पास लाया जा सके।" (37)
जादूगरों को
एक ख़ास दिन में एक नियत समय पर जमा होना था, (38)
और लोगों से
पूछा गया था, (39)
"क्या तुम सब
लोग (देखने) आ रहे हो? अगर जादूगरों
की जीत होती है, तो हम उनके
बताए हुए रास्ते पर चल सकते हैं।" (40)
फिर जादूगरों
ने वहाँ पहुँचकर फ़िरऔन से कहा, "अगर हम जीत जाएंगे, तो क्या हमें कोई इनाम दिया जाएगा?" (41)
उसने कहा, "हाँ, हाँ, तुम हमारे क़रीबी दरबारियों में शामिल कर लिए
जाओगे।" (42)
मूसा ने उनसे
कहा, "फेंको, जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो।" (43)
तब जादूगरों
ने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकी और बोले, "फ़िरऔन की इज़्ज़त व ताक़त की क़सम! हम ही विजयी
रहेंगे।" (44)
मगर मूसा ने
अपनी लाठी जैसे ही ज़मीन पर फेंकी, तो क्या देखते हैं कि वह (अजगर बनकर) उस
स्वांग से रची गयी चीज़ों को निगल गया, (45)
और इस पर
जादूगर घुटनों के बल (सज्दे में) गिरा दिए गए, (46)
और बोल उठे, "हमने सारे संसार के रब पर विश्वास कर लिया, (47)
जो मूसा और
हारून का रब है!" (48)
फ़िरऔन ने कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि मेरी अनुमति लिए
बिना ही, तुमने इस पर
विश्वास भी कर लिया? यह ज़रूर तुम
सबका उस्ताद है, जिसने तुमको
जादू सिखाया है! अच्छा, तो अभी
तुम्हें मालूम हुआ जाता है: मैं तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव कटवा
दूँगा, और तुम सबको
सूली पर चढ़ा दूँगा!" (49)
जादूगरों ने
कहा, "हमारा तो इससे
कोई नुक़सान नहीं होगा, क्योंकि यह
बात पक्की है कि हमको अपने रब के पास लौटकर जाना है। (50)
उम्मीद है कि
हमारा रब हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, क्योंकि सबसे पहले हमने विश्वास कर लिया
था।" (51)
हमने मूसा को 'वही' [revelation] भेजकर अपनी बात बतायी, "मेरे बन्दों को लेकर रातों-रात निकल जाओ, अवश्य ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा!" (52)
इस बीच फ़िरऔन
ने शहरों में संदेशा देने वालों को यह कहते हुए भेजा, (53)
"यह (इसराईल की
संतानें) कमज़ोर और थोड़े से लोगों की एक टोली है--- (54)
उन लोगों ने
हमें ताव दिलाया है--- (55)
और हम एक बड़ी
सेना हैं, हमेशा तैयार
रहने वाली।" (56)
अंत में, ऐसा हुआ कि उन (फिरऔन के लोगों) को --- अपने
बाग़ों और पानी के सोतों को, (57)
अपने ख़ज़ानों, और रहने के बेहतरीन मकानों को--- छोड़कर
निकलना पड़ा। (58)
हमने ऐसी
चीज़ें (बाद में) इसराईल की सन्तानों को दे दी। (59)
सुबह-तड़के ही
फ़िरऔन और उसके लोगों ने उनका पीछा किया, (60)
फिर जैसे ही
दोनों तरफ़ के लोग (नज़दीक पहुंचे) और एक-दूसरे को दिखाई देने लगे, तो मूसा के माननेवालों ने कहा, "अब हम ज़रूर पकड़े जाएंगे!" (61)
मूसा ने कहा, "नहीं, मेरा रब मेरे साथ है: वह अवश्य रास्ता
दिखाएगा", (62)
और हमने मूसा
को 'वही' [Revelation] भेजी, "अपनी लाठी समंदर पर मारो।" समंदर दो
हिस्सों में फट गया ----- हर एक हिस्सा ऊँचे पहाड़ की तरह खड़ा हो गया (और रास्ता
बन गया) ---- (63)
और हम दूसरों
[फ़िरऔन व उसके साथियों] को भी उसी जगह ले आए : (64)
और हमने मूसा
को और उनके सभी साथियों को बचा लिया, (65)
और बाक़ी बचे
(फ़िरऔन के) लोगों को डुबा दिया। (66)
सचमुच इसमें
एक बड़ी निशानी है, मगर अधिकतर
लोग विश्वास नहीं करते: (67)
तुम्हारा रब
ही है जो सबसे ताक़तवाला, सब पर दयावान
है। (68)
और [ऐ रसूल]
उन्हें इबराहीम [Abraham] की कहानी
सुनाएं, (69)
जबकि उसने
अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किसे पूजते हो?" (70)
उन्होंने कहा, "हम मूर्तियों की पूजा करते हैं, और हम तो उन्हीं की सेवा में लगे रहते
हैं।" (71)
उसने पूछा, "क्या ये तुम्हारी बात सुनते हैं, जब तुम पुकारते हो, (72)
क्या ये
तुम्हारी कुछ मदद या हानि पहुँचाते हैं?" (73)
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हमने तो अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते
हुए देखा है।" (74)
इबराहीम ने
कहा, "कभी तुमने यह
सोचा कि तुम किसकी पूजा करते रहे हो, (75)
तुम और
तुम्हारे बाप-दादा, (76)
वे सब तो मेरे
लिए दुश्मन हैं; मगर सारे
संसार के रब की बात अलग है, (77)
जिसने मुझे
पैदा किया। फिर वही है जो मुझे सीधा रास्ता दिखाता है; (78)
और वही है जो
मुझे खिलाता और पिलाता है; (79)
जब मैं बीमार
होता हूँ, तो वही मुझे
ठीक कर देता है; (80)
और वही है जो
मुझे मौत देगा, और फिर मुझे
दोबारा ज़िंदगी देगा; (81)
और वही है
जिससे मुझे उम्मीद है कि फ़ैसले के दिन वह मेरी ग़लतियाँ माफ़ कर देगा। (82)
ऐ मेरे रब!
मुझे ज्ञान व समझ-बूझ दे; और मुझे नेक
लोगों के साथ शामिल कर ले; (83)
और मुझे बाद
में आने वाली नस्लों में भी अच्छे नामों से याद किया जाता रहे; (84)
और मुझे उनमें
से बना जिन्हें नेमतों वाली जन्नत [Garden of bliss] दी जाएगी--- (85)
और मेरे बाबा
को माफ़ कर दे, कि वह उन
लोगों में से हैं जो सही रास्ते से भटक चुके हैं——(86)
और मुझे उस
दिन की बेइज़्ज़ती से बचा, जब सब लोग
जीवित करके दोबारा उठाए जाएँगे: (87)
उस दिन न माल
काम आएगा और न बाल-बच्चे ही कोई मदद कर सकेंगे, (88)
और उस दिन
केवल वही सुरक्षित बच पाएगा, जो अल्लाह के सामने ऐसा दिल लेकर आया हो, जो पूरी भक्ति से उसके ही सामने झुकनेवाला
हो।" (89)
जब (जन्नत के) बाग़
को सही रास्ते पर चलने वाले नेक लोगों के नज़दीक लाया जाएगा, (90)
और (जहन्नम की) आग
भटके हुए लोगों के ठीक सामने खड़ी कर दी जाएगी, (91)
और तब उनसे पूछा
जाएगा, "कहाँ हैं वे
जिन्हें तुम पूजते थे, (92)
अल्लाह को छोड़कर? क्या वे अब तुम्हारी सहायता कर सकते हैं या अपना
बचाव ही कर सकते हैं?" (93)
और उसके बाद, उन सबको जहन्नम में फेंक दिया जाएगा, साथ में उन लोगों को भी जो उन्हें सीधे रास्ते से
भटका देते थे, (94)
और इबलीस [शैतान]
के सारे समर्थक भी (आग में डाले जाएंगे)। (95)
वहाँ वे आपस में
तू-तू मैं-मैं करते हुए, अपने (गढ़े हुए)
ख़ुदाओं से कहेंगे, (96)
"अल्लाह की क़सम!
हम उस समय सचमुच बड़ी गुमराही में थे, (97)
जब हमने तुम्हें
सारे संसार के रब के बराबर ठहराया था। (98)
वे शैतानियाँ
करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (99)
और अब हमारे लिए न
तो कोई सिफ़ारिश करने वाला है, (100)
और न कोई सच्चा
दोस्त है। (101)
काश! अगर हम अपनी
ज़िंदगी दोबारा जी पाते, तो हम पक्के
ईमानवाले [मोमिन] हो जाते!" (102)
सचमुच ही इसमें एक
बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर
लोग विश्वास नहीं करते: (103)
तुम्हारा रब ही है
जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है।
(104)
नूह [Noah] की क़ौम ने भी रसूलों को झुठा बताया। (105)
उनके भाई नूह ने
उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह
का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (106)
निस्संदेह मैं
एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास
भेजा गया हूँ: (107)
अल्लाह का डर
रखो और मेरा कहा मानो। (108)
मैं इसके लिए
तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे
संसार का पालनहार है: (109)
अल्लाह का डर
रखो और मेरा कहा मानो।" (110)
उन्होंने जवाब
दिया, "हम तुम्हारी बात
पर कैसे विश्वास कर लें, जबकि तुम्हारे
पीछे चलने वाले तो बिल्कुल ही नीच क़िस्म के लोग हैं?" (111)
नूह ने कहा, "मुझे क्या मालूम कि वे क्या करते थे? (112)
उनका हिसाब लेने
का काम तो बस मेरे रब के हाथ में है---काश तुम समझ पाते--- (113)
और जिन लोगों ने
(मेरी बात पर) विश्वास कर लिया, मैं उन्हें दुत्कारने वाला तो हूँ नहीं। (114)
मैं तो बस यहाँ
इसीलिए हूँ कि लोगों को साफ़-साफ़ चेतावनी दे दूँ।" (115)
इस पर उन लोगों
ने कहा, "ऐ नूह! अगर
तुमने अपनी हरकतें बंद नहीं की, तो तुम्हें ज़रूर पत्थरों से मार डाला
जाएगा।" (116)
नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोगों ने मेरी बात
मानने से इंकार कर दिया है, (117)
इसलिए अब मेरे
और उनके बीच दो टूक फ़ैसला कर दे, और मुझे और मेरे ईमानवाले साथियों को बचा
ले!" (118)
इस तरह, हमने उसे और उसके माननेवालों को, जो भरी हुई नौका में थे, बचा लिया, (119)
और बाक़ी बचे
लोगों को डुबा दिया। (120)
सचमुच ही इसमें
एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर
लोग विश्वास नहीं करते: (121)
तुम्हारा रब ही
है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान
है। (122)
आद के लोगों
ने भी रसूलों को झूठा बताया। (123)
उनके भाई हूद
ने उनसे कहा, "क्या तुम
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (124)
निस्संदेह मैं
एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे
पास भेजा गया हूँ: (125)
अल्लाह का डर
रखो और मेरा कहा मानो। (126)
मैं इसके लिए
तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे
संसार का पालनहार है। (127)
क्या तुम
दिखावे के लिए हर ऊँची जगह पर बेकार के स्मारक ही बनाते फिरोगे? (128)
क्या तुम इस
आशा में (शानदार) क़िले बनवाते रहते हो कि जैसे तुम्हें यहाँ हमेशा ज़िंदा रहना है? (129)
और जब किसी पर
हमला करते हो, तो बिल्कुल
निर्दयी ज़ालिम क्यों बन जाते हो? (130)
अतः अल्लाह का
डर रखो और मेरा कहा मानो; (131)
उस (अल्लाह)
का डर रखो, जिसने तुम तक
वह सारी चीज़े पहुँचाई हैं जिन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो--- (132)
उसने तुम्हें
चौपाए और बाल-बच्चे दिए हैं, (133)
और बाग़ व
पानी के सोते [Springs] भी--- (134)
इस कारण मुझे
सचमुच डर है कि एक बड़े दर्दनाक दिन की यातना तुम्हें घेर लेगी।" (135)
जवाब में वे
बोले, "चाहे तुम हमें
सावधान करो या न करो, हमें इससे कोई
फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है, (136)
क्योंकि हम तो
केवल वही करेंगे, जैसा कि हमारे
बाप-दादा किया करते थे: (137)
हमें कोई सज़ा
नहीं दी जाएगी।" (138)
उन लोगों ने
हूद को खुले आम झूठा घोषित कर दिया, जिसके नतीजे में हमने उन्हें बर्बाद कर दिया।
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (139)
तुम्हारा रब
ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (140)
समूद के लोगों
ने भी रसूलों को झुठा कहा। (141)
उनके भाई
सालेह ने उनसे कहा, "क्या तुम
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (142)
निस्संदेह मैं
तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ: (143)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (144)
मैं इसके लिए
तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे
संसार का पालनहार है। (145)
(क्या तुम सोचते
हो कि) यहाँ जो कुछ है उनके बीच, तुम हमेशा के लिए सुरक्षित छोड़ दिए जाओगे---
(146)
इन बाग़ों और
पानी के सोतों, (147)
खेतों और फलों
से लदे हुए खजूर के पेड़ों के बीच--- (148)
और पहाड़ों को
काट-काटकर नफ़ासत से बनाए हुए घरों के बीच (क्या सदा के लिए रहोगे)? (149)
अतः अल्लाह से
डरो, और मेरा कहा
मानो: (150)
और उन मर्यादा
को तोड़नेवालों का कहना बिल्कुल न मानो, (151)
जो धरती में
गड़बड़ी फैलाते रहते हैं, बजाए इसके कि
चीज़ों को सुधारते व सही काम करते।" (152)
उन्होंने कहा, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (153)
तुम और कुछ
नहीं, बस हमारे ही
जैसे एक आदमी हो। अगर तुम सच बोल रहे हो तो कोई निशानी दिखाओ।" (154)
सालेह ने कहा, "(ठीक है, लो) यह ऊँटनी है, पानी पीने की बारी इसकी अलग होगी, और तुम्हारी बारी अलग होगी, और हर एक के लिए पीने का एक नियत दिन होगा। (155)
सो देखना, उस (ऊँटनी) को कोई नुक़सान नहीं होना चाहिए, अन्यथा एक बड़े भयानक दिन की यातना तुम्हें आ
पकड़ेगी।" (156)
मगर उन लोगों
ने उसके अगले पाँव की कूचें [hamstring] काट डालीं। सुबह में वे (अपनी ग़लती पर)
पछताते रह गए: (157)
यातना ने
उन्हें आ दबोचा था। सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (158)
तुम्हारा रब
ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (159)
लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी रसूलों को झुठा
बताया। (160)
उनके भाई लूत
ने उनसे कहा, "क्या तुम
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (161)
निस्संदेह मैं
तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ: (162)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (163)
मैं इसके लिए
तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे
संसार का पालनहार है। (164)
क्या दूसरे
लोगों से तुम अलग-थलग हो कि (सेक्स के लिए) मर्दों के पास जाते हो, (165)
और अपनी
पत्नियों को तुमने छोड़ रखा है, जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा किया है? तुम तो सारी सीमाएं तोड़ रहे हो।" (166)
मगर उन लोगों
ने जवाब दिया, "ऐ लतू! अगर
तुमने सचमुच अपनी बातें बंद नहीं कीं, तो तुम्हें अवश्य ही निकाल बाहर किया
जाएगा।" (167)
सो लूत ने कहा, "जो हरकत तुम करते हो, उससे मुझे नफ़रत है: (168)
ऐ मेरे रब! जो
कुछ ये करते हैं, उससे मुझे और
मेरे परिवार के लोगों को बचा ले।" (169)
फिर हमने उसे
और उसके परिवार के सारे लोगों को बचा लिया; (170)
सिवाय एक
बुढ़िया के, जो पीछे रह
जाने वालों में थी, (171)
फिर दूसरे सभी
लोगों को हमने बर्बाद कर दिया, (172)
और हमने उन पर
एक तबाहीवाली बारिश बरसाई--- और कितनी भयानक बारिश थी वह, उन लोगों के लिए जिन्हें पहले सावधान किया जा
चुका था! (173)
सचमुच ही
इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि
अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (174)
तुम्हारा रब
ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (175)
अल-ऐका [जंगल
में रहनेवालों] ने भी रसूलों को झुठा कहा। (176)
शुऐब ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से
नहीं बचोगे? (177)
निस्संदेह मैं
तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ: (178)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (179)
मैं इसके लिए
तुमसे कोई इनाम तो नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे
संसार का पालनहार है। (180)
नाप-तौल के
मुताबिक़ पूरा दिया करो: दूसरों को बेचते समय (नाप से) कम न दो। (181)
सही व ठीक
तराज़ू से तौलो: (182)
लोगों को उनकी
चीज़ों में कमी करके न दो। धरती पर गड़बड़ी व लूटमार [corruption] न मचाओ। (183)
अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हें और पिछली नस्लों को पैदा
किया", (184)
मगर उन लोगों
ने जवाब दिया, "तुम पर तो
जादू कर दिया गया है! (185)
तुम और कुछ
नहीं, बस हमारे ही
जैसे एक आदमी हो। असल में तो हम तुम्हें झूठा समझते हैं। (186)
अगर तुम सच
बोल रहे हो, तो हम पर
आसमान का कोई टुकड़ा ही गिरा के दिखा दो।" (187)
शुऐब ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह से जानता है जो कुछ तुम
करते हो।" (188)
उन लोगों ने
उसे झुठा कहा, और इस तरह
छायावाले दिन की यातना ने उन्हें आ दबोचा--- वह एक बड़े भयानक दिन की यातना थी! (189)
सचमुच ही
इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि
अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (190)
तुम्हारा रब
ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (191)
सचमुच इस
क़ुरआन को सारे संसार के रब ने उतार भेजा है: (192)
एक भरोसेमंद
रूह [जिबरईल] इसे लेकर आए, (193)
और इसको [ऐ
रसूल], आपके दिल पर
उतारा गया, ताकि आप
चेतावनी दे सकें, (194)
साफ़ अरबी ज़बान
में। (195)
यह पिछले
धर्मों की आसमानी किताबों में पहले ही बता दिया गया था। (196)
क्या उनके लिए
यह सबूत काफ़ी नहीं कि इसराईल की संतानों में पढ़े-लिखे लोगों ने इसे पहचान लिया है? (197)
अगर हम इसे
किसी ऐसे आदमी पर उतारते, जो अरब का न
होता, (198)
और वह इसे
पढ़कर उन्हें सुनाता, तब भी उन
लोगों ने इस पर विश्वास नहीं किया होता। (199)
इस तरह, हमने अपराधियों के दिलों में ये बातें डाल
दीं, जो उनके दिल
से होती हुई सीधे गुज़र जाती हैं, (200)
वे उस वक़्त तक
इस में विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि दर्दनाक यातना ख़ुद न देख लें, (201)
फिर वह
(यातना) अचानक उन पर आ जाएगी, और उन्हें इसके आने की ख़बर तक न होगी, (202)
और तब वे
कहेंगे, "क्या हमें कुछ
मुहलत मिल सकती है?" (203)
तो फिर कैसे
यह लोग माँग करते हैं कि हमारी यातना उन तक जल्दी से जल्दी ले आयी जाए? (204)
ज़रा सोचो, अगर हम उन्हें इस जीवन में कुछ सालों तक मज़ा
उठाने दें; (205)
फिर उन पर वह
यातना आ जाए, जिससे उन्हें
डराया जाता है; (206)
तो जो सुख
(पहले) उन्हें मिला होगा, उसका उन्हें
क्या फ़ायदा होगा? (207)
हमने कभी भी
किसी बस्ती को उस वक़्त तक तबाह-बर्बाद नहीं किया, जब तक कि पहले रसूलों को उनके पास सावधान
करने के लिए नहीं भेज दिया, (208)
जो हमारी तरफ़
से उन्हें याद दिला दें [reminder]: हम कभी ना-इंसाफ़ी नहीं करते हैं। (209)
वह कोई जिन्न
[या शैतान] नहीं है जो इस क़ुरआन को लेकर उतरा है: (210)
न तो वे इस
काम के लायक़ हैं, और न ही
उन्हें ऐसा करने की शक्ति है, (211)
सच तो यह है
कि वे इसके सुनने से भी दूर रखे गए हैं। (212)
अतः [ऐ रसूल]
आप अल्लाह के अलावा दूसरे ख़ुदाओं को कभी न पुकारें, अन्यथा आप भी सज़ा पाने वालों में होंगे, (213)
और अपने
नज़दीकी नातेदारों को सावधान कर दें, (214)
और जो भी
विश्वास रखनेवाले आपके रास्ते पर चलते हैं, उनके लिए स्नेह दिखाते हुए अपने कंधे झुका
दें। (215)
अगर वे आपकी
आज्ञा न मानें, तो कह दें, "जो कुछ तुम करते हो, उसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ।" (216)
उस प्रभुत्वशाली
और बेहद दया करनेवाले पर भरोसा रखें, (217)
जो आपको देख
रहा होता है, जब आप (नमाज़
के लिए) खड़े होते हैं (218)
और जब सज्दे
में झुकने वालों के पास आते-जाते हैं: (219)
वह सब कुछ
सुनता है, सब जानता है।
(220)
क्या मैं
बताऊँ कि शैतान किन लोगों पर उतरते हैं? (221)
वे हर ढोंग
रचनेवाले झूठे व गुनाहगार पर उतरते हैं, (222)
जो सुनी
सुनायी बातों पर कान लगाते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं: (223)
और कवियों के
पीछे तो केवल वही लोग चलते हैं जिन्होंने अपने आपको ग़लतियों में गुम कर लिया हो। (224)
क्या तुमने
देखा नहीं कि वे हर (काल्पनिक) घाटी में बेमक़सद भटकते फिरते हैं; (225)
और यह कि, वह जो बात कहते हैं, करते नहीं? (226)
हाँ, उन (कवियों) की बात अलग है जो (रसूल की बातों
में) विश्वास करते हैं, अच्छे कर्म
करते हैं, और अल्लाह को
अक्सर याद करते हैं, और जब भी
बदमाशों ने उनपर निशाना साधा, तो (कविता के द्वारा) वे अपना बचाव करते हैं।
शैतानियाँ करनेवालों को जल्द ही पता चल जाएगा कि वे किस अंजाम की तरफ़ लौटकर जाने
वाले हैं। (227)
नोट:
1. ता.सीम.मीम भी
पढ़ सकते हैं।
4: इंसान को दुनिया
में भेजने का मक़सद यह नहीं है कि उसे (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने पर ज़बरदस्ती
मजबूर किया जाए, अल्लाह यह चाहता
है कि इंसान सोच-समझकर ईमान का रास्ता चुने। इसलिए अगर लोग विश्वास नहीं कर रहे
हैं, तो इस बात की
बहुत ज़्यादा फ़िक्र करना ठीक नहीं।
14: मूसा (अलै.) ने
ज़ुल्म करने वाले को एक मुक्का मारा था जिसके कारण वह मर ही गया और उन पर क़त्ल का
इल्ज़ाम लग गया था, देखें सूरह क़सस
( 28: 15-20)
17: इसराईल की संतान
असल में हज़रत याक़ूब (अलै.) की संतानों को कहते हैं, जो फ़िलिस्तीन के कनआन के रहने वाले थे। याक़ूब
(अलै) के बेटे हज़रत यूसुफ़ (अलै.) जब मिस्र के प्रशासक बने, तो उन्होंने अपने सारे ख़ानदान के लोगों को
मिस्र बुलाकर बसा दिया था। एक अवधि तक तो वे लोग वहाँ चैन से रहे, मगर यूसुफ़ (अलै.) के बाद वहाँ के बादशाहों
[फ़िरऔन] ने उनको ग़ुलाम बनाकर ज़ुल्म करना शुरू कर दिया। इसलिए मूसा (अलै.) ने कहा
कि इन्हें मेरे साथ फ़िलिस्तीन के इलाक़े में जाने दो।
18: देखें सूरह ताहा
(20: 39)
19: देखें सूरह क़सस
(28: 15-20)
20: देखें सूरह नम्ल
(27: 10-11)
21: मूसा (अलै.)
मिस्र से भागकर मदयन चले गए थे, देखें सूरह क़सस (28: 21-22)
44: देखें सूरह ताहा
(20 : 66)
64: देखें सूरह
यूनुस (10: 91-92)
82: इबराहीम (अलै)
से क्या ग़लतियाँ हुईं? हदीस में है कि
इबराहीम (अलै) ने तीन बार मसलिहत देखते हुए पूरा सच नहीं कहा: एक बार जब उनकी क़ौम
के सब लोग मेले में जा रहे थे तो वह यह कहकर उनके साथ नहीं गए कि वह बीमार हैं (37:89), और जब उन्होंने सब बुत तोड़ डाले और उसका
इल्ज़ाम बड़े बुत पर लगाया (21:63), और एक ज़ालिम बादशाह से बचाने के लिए उन्होंने
अपनी बीवी सारा को अपनी बहन बताया।
86: हज़रत इबराहीम
(अलै.) ने अपने बाबा से वादा किया था कि वह उनके गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ
करेंगे, (सूरह मरयम 19: 47), लेकिन जब अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया, तो फिर उन्होंने दुआ नहीं की, (सूरह तौबा: 9: 114).
120: देखें सूरह हूद
(11: 25-48)
139: देखें सूरह अ'राफ़ (7: 65), सूरह हूद (11:50-59)
141 देखें 7:72, 11-61-68
158: देखें सूरह हूद
(11: 68)
166: देखें सूरह हूद
(11: 77-83) और सूरह हिज्र (15: 58-76)
171: बुढ़िया का मतलब
हज़रत लूत (अलै.) की बीवी से है, जो बुरे चरित्र वाली थी, ग़लत काम में क़ौम का साथ देती थी, और अंत में जब भयानक यातना आ गयी तो अपने
घरवालों के साथ शहर से बाहर निकलने के बजाय वह पीछे रह गई और उसके चपेट में आ गई।
173: उन लोगों पर
पत्थरों की बारिश हुई, जैसा कि सूरह
हिज्र (15: 74) में आया है।
176: " एका" असल
में घने जंगल को कहते है। हज़रत शुऐब (अलै.) जिस क़ौम की तरफ़ भेजे गए थे, वह ऐसे ही किसी घने जंगलों के पास स्थित थी।
कुछ लोग कहते हैं कि उस बस्ती का नाम "मदयन था, कुछ का कहना है कि वह कोई दूसरी बस्ती थी, और शुऐब (अलै.) उस क़ौम की तरफ़ भी भेजे गए थे।
इसका विवरण सूरह अ'राफ़ (7: 85-93) में आया है।
189: कई दिन तक बहुत
तेज़ गर्मी के बाद एक बादल का टुकड़ा उनकी बस्ती के नज़दीक आया जिसके नीचे देखने से
लगता था कि ठंढी हवा चल रही थी, बस्ती के सब लोग उस बादल के नीचे जमा हो गए, तो उस बादल ने उनके ऊपर अंगारे बरसाए जिससे
वे सब मारे गए।
196: पिछली आसमानी
किताबों यानी तोरात [Torah], ज़बूर [Psalm], इंजील [Gospel] और दूसरे नबियों के सहीफ़े।
197: कुछ पढ़े-लिखे
यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) को पहचान लिया था और इस बात को माना था कि उनके आने के
बारे में तोरात/इंजील में ज़िक्र है।
199: क्योंकि उनका
विश्वास न करना किसी पक्की दलील की वजह से न था, बल्कि केवल उनकी ज़िद्द और हठधर्मी के कारण
था।
204: चूँकि यातना के
आ जाने का उन्हें विश्वास नहीं था, इसलिए मज़ाक़ उड़ाते हुए उसे जल्दी ले आने की
माँग करते थे।
210: मक्का के लोग
क़ुरआन के बारे में दो तरह की बातें कहते थे: कुछ लोग कहते थे कि मुहम्मद (सल्ल) एक
"काहिन" हैं, यानी उनके क़ब्ज़े
में कुछ जिन्न हैं जो उनको छिपी चीज़ों की ख़बर देते हैं। लेकिन यहां बताया गया है
कि वह जिन्न असल में शैतान हैं और उनमें क्षमता नहीं कि नेकी की ऐसी अच्छी बातें
कर सकें। कुछ लोग यह भी मानते थे कि मुहम्मद (सल्ल) असल में "शायर [कवि] हैं
और क़ुरआन शायरी की किताब है।
212: देखें 72: 8-10
214: माना जाता है कि
यह पहली आयत है जिसमें मुहम्मद साहब को ख़ास करके कहा गया कि आप मक्का में अल्लाह का संदेश अपने नज़दीकी
रिश्तेदारों को पहुँचाना शुरू कर दें।
222: यह
भविष्य-वक्ताओं के बारे में है जो शैतानी काना-फूसी की बातें सुनते थे और उसमें
नमक-मिर्च लगाकर लोगों को बताया करते थे।
सूरह 71: नूह [Noah]
यह एक मक्की
सूरह है जिसमें बाढ़ आने से पहले की नूह अलै. की ज़िंदगी के बारे में थोड़ा विस्तार
से बताया गया है कि किस तरह वह 950 साल तक अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाते
रहे, मगर उनकी क़ौम
के लोग मानने से इंकार ही करते रहे, और फिर बाढ़ के आने से सब बर्बाद हो गए। इस
कहानी को सुनाने का मक़सद पैग़म्बर साहब का उत्साह बढ़ाना और मक्का के विश्वास न करने
वालों को चेतावनी देना था।
विषय:
01-20: नूह (अलै) का
मिशन और संदेश
21-28: नूह की क़ौम ने
उन्हें ठुकराया और बर्बाद हो गए
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हमने नूह [Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा: "आप अपने लोगों
को सावधान कर दें, इससे पहले कि उन
पर कोई दर्दनाक यातना [punishment] आ पहुँचे।" (1)
(चुनांचे)
उन्होंने कहा, “ए मेरी क़ौम के
लोगो! मैं तुम लोगों को साफ़-साफ़ चेतावनी देने आया हूँ। (2)
तुम अल्लाह की
इबादत करो, उसी से डरो और
मेरा कहना मानो। (3)
अल्लाह तुम्हारे
गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक (ज़िंदा) बाक़ी रखेगा
--- जब अल्लाह का (निर्धारित) समय आ जाता है, तो वो टाला नहीं जा सकता। काश! तुम (यह बात)
समझ पाते!” (4)
(फिर) नूह ने
(अल्लाह से) कहा, “ऐ मेरे रब! मैं
अपनी क़ौम को रात दिन (सच्चाई की बातों की तरफ़) बुलाता रहा, (5)
लेकिन मैं जितना
ही उनको (सच्चाई की तरफ़) बुलाता हूँ, उतना ही वे और ज़्यादा (सच्चाई से) दूर भागते
हैं: (6)
जब (भी) मैं
उन्हें (ईमान की तरफ़) बुलाता हूँ, ताकि तू उन्हें माफ़ कर सके, तो वे अपनी अंगुलियाँ कानों में ठूंस लेते हैं
और अपने ऊपर अपने कपड़े तान लेते हैं, अपनी (गलत) बातों पर अड़े रहते हैं, और उनका घमंड और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। (7)
मैं उन्हें खुलकर
(सच्चाई की तरफ़) बुलाने की कोशिश कर चुका हूँ। (8)
मैंने उन्हें सब
के सामने भी उपदेश देने की कोशिश की है और उन्हें अकेले में भी समझाने की कोशिश की
है। (9)
मैंने कहा, "तुम अपने रब से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो: वह
बड़ा माफ़ करनेवाला है। (10)
वह तुम्हारे लिए
आसमान से ख़ूब पानी बरसाएगा; (11)
वह तुम्हें
धन-दौलत और बेटे देगा; वह तुम्हारे लिए
बाग़ उगा देगा और नहरें बहा देगा। (12)
तुम्हें क्या हो
गया है? अल्लाह की महिमा
से तुम डरते क्यों नहीं, (13)
जबकि उसने
तुम्हें एक-के-बाद-एक कई चरणों [stage by stage] में (से गुज़ार कर) पैदा किया है? (14)
क्या तुमने कभी
इस बात पर विचार किया कि किस तरह अल्लाह ने सात (या कई) आसमानों को तल्ले ऊपर पैदा
किया, (15)
उनमें चाँद को
रौशनी और सूरज को दीपक [प्रकाश और ताप के स्रोत] के रूप में स्थापित किया, (16)
और किस तरह
अल्लाह ने तुम्हें ज़मीन से पौधे की तरह उगाया है* (17)
किस तरह वह
तुम्हें उसी (भूमि) में लौटा देगा और फिर तुमको (वहीं से दोबारा) बाहर ला खड़ा
करेगा, (18)
और किस तरह
अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़मीन को फर्श की तरह बिछा दिया है, (19)
ताकि तुम उसके
खुले हुए रास्तों में चलो फिरो।" (20)
नूह ने कहा, “ऐ मेरे रब! हक़ीक़त यह है कि उन लोगों ने
मेरा कहना नहीं माना, और उन
(सरदारों) के पीछे चल पड़े जिनके धन-दौलत और संतानों ने उन्हें सिवाय नुक़सान
पहुँचाने के और कुछ नहीं दिया; (21)
और (जनता को
गुमराही में रखने के लिए) वे बड़ी-बड़ी चालें चलते रहे, (22)
और (उन लोगों
ने अपने आदमियों से) कहा, "तुमलोग अपने भगवानों [gods] को कभी मत छोड़ना! और “वद्द”, “सुवा”, “यग़ूस”, “यऊक़” और “नस्र” (नाम के देवताओं) को (भी) कभी नहीं छोड़ना!” (23)
उन्होंने बहुत
लोगों को गुमराह [पथभ्रष्ट] किया है। सो (ऐ मेरे रब!), तू इन ज़ालिमों के लिए सिवाय बर्बादी के और
कुछ न ला।" (24)
(अंत में) वे
अपने पापों के कारण ही (ज़बरदस्त बाढ़ में) डुबा दिए गए, और (जहन्नम की) आग में डाल दिए गए: अल्लाह के
मुक़ाबले में उन्हें कोई मददगार नहीं मिल सका। (25)
और नूह ने यह
भी कहा, “ऐ मेरे रब!
(सच्चाई से) इंकार करने वालों में से किसी को भी इस धरती पर ज़िंदा न छोड़ ----- (26)
अगर तूने
उन्हें (जीवित) छोड़ा, तो वे तेरे
बन्दों को गुमराह करते रहेंगे, और उनसे जो औलाद पैदा होगी, वह केवल पाप करने वाली (और) विश्वास न करने
वाली पैदा होगी ---- (27)
“ऐ मेरे रब!
मुझे भी माफ़ कर दे और मेरे माँ-बाप को भी, और हर उस आदमी को जो ईमान की हालत में मेरे
घर में दाख़िल हुआ। (सभी) ईमान रखने वाले मर्दों और औरतों को भी माफ़ कर दे, मगर ज़ालिमों के लिए बर्बादी के सिवाए कोई और
चीज़ न ला।” (28)
नोट:
1: इस सूरह में अल्लाह क़ा संदेश पहुंचाने
के लिए हज़रत नूह (अलै.) द्वारा किए गए संघर्षों और आपकी दुआओं का वर्णन है। आपके
बारे में अधिक विवरण सूरह यूनुस (10:17) और सुरह हूद (11:36)
में मिलता है।
14: यानी इंसान वीर्य [sperm]
से लेकर जीता जागता आदमी बनने तक विभिन्न चरणों से गुज़रता है जिनका विवरण सूरह
हज (22: 5) और सूरह मोमिनून (23
:14) में भी मिलता है। यह सारे चरण अल्लाह की
विशाल क़ुदरत पर गवाही देते हैं। अत: इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि वह
मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करने में सक्षम है।
17: जिस तरह एक पौधा जमीन मे विभिन्न चरणों से गुज़रते
हुए उगता है, उसी तरह अल्लाह ने तुम्हें विभिन्न चरणों से गुज़ार कर इस
जमीन में पैदा किया है। और जिस तरह जमीन से उगने वाला पौधा नष्ट होकर मिट्टी में
मिल जाता है और फिर जब अल्लाह चाहता है उस पौधे को दोबारा उसी मिट्टी से उगा देता
है, इसी तरह तुम भी मरकर मिट्टी में मिल जाओगे,
फिर जब अल्लाह चाहेगा तो तुम्हें दोबारा जिंदा करके जमीन से दोबारा निकाल
लेगा।
22: यह उन साज़िशों की तरफ इशारा
है जो हज़रत नूह (अलै.) के दुश्मन उनके विरुद्ध कर रहे थे।
23: यह सब उन देवी-देवताओं के
नाम हैं जिन्हें हज़रत नूह (अलै.) की क़ौम पूजती थी।
27: सूरह हूद (11:36)
में आया है कि अल्लाह ने हज़रत नूह (अलै.) को "वही" [Revelation]
के द्वारा बता दिया था कि उस समय तक जितने लोग आप पर विश्वास रखते थे,
उनके सिवा अब कोई और विश्वास करनेवाला नहीं है।
28: ईमान की शर्त इसलिए लगाई कि
आपके घर वालों में से आपकी बीवी आखिर तक काफ़िर रही और उसने आप पर विश्वास नहीं
किया, जैसाकि सूरह तहरीम (66 :10) में आया है।
सूरह 44: अद-दुख़ान
[धुआँ / The Smoke]
यह एक मक्की
सूरह है जिसका नाम आयत 10 से लिया गया है, जिसमें एक 'धुएं से भरे
दिन' का वर्णन किया
गया है जिसे कुछ लोग "फ़ैसले के दिन" से जोड़ते हैं
और कुछ लोग मक्का में आए अकाल से जोड़ते हैं। मक्का के बुतपरस्त लोगों को फ़िरऔन के
लोगों के समान बताया गया है जिन्होंने पहले वादा किया था कि अगर प्लेग की बीमारी
ख़त्म हो जाएगी तो वे एक अल्लाह की इबादत करेंगे, मगर जैसे ही मुसीबत हटी, वे अपने वादे से मुकर गए। इस सूरह में ख़ास
तौर से बताया गया है कि अल्लाह की रहमत यानी क़ुरआन को इंसानों के मार्गदर्शन के
लिए उतारा गया है, मक्का के
ताक़तवर और अमीर अत्याचारियों के ग़लत काम पर अड़े रहने की प्रवृति को भी बताया गया
है, और फ़िरऔन, तुब्बा और मक्का के लोगों की आपस में तुलना
की गई है। जिन लोगों ने सही हिदायत के मुताबिक़ कर्म किए तो वे जन्नतवाले होंगे, जो वहाँ परम आनंद और ख़ुशियों में लगे होंगे, जबकि वे लोग जो हिदायत को नहीं मानते और इस
दुनिया में बड़े ताक़तवर समझे जाते थे, उन्हें जहन्नम की सख़्त मुसीबतें झेलनी
पड़ेंगी।
विषय:
02-08: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
09-16: यातना आने ही वाली है
17-33: फ़िरऔन की कहानी और इसराईल की संतानें
34-42: विश्वास न करने वालों ने दोबारा ज़िंदा उठाए
जाने को ठुकराया
43-50: बुरे लोगों की सज़ा
51-57: अच्छे व नेक लोगों के लिए इनाम
58-59: अंत में रसूल को सलाह
अल्लाह के नाम
से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हा॰ मीम॰ (1)
क़सम है उस किताब
[क़ुरआन] की, जो चीज़ों (की
सच्चाई) को स्पष्ट कर देती है, (2)
सचमुच हमने उसे
एक मुबारक [शुभ] रात में उतारा है—- हमने हमेशा ही (लोगों को) सावधान करने के लिए
चेतावनियाँ भेजी हैं --- (3)
उस रात, जब समझ-बूझ [wisdom] के हर एक मामले को साफ़ व स्पष्ट कर दिया जाता है, (4)
हमारे हुक्म पर
--- हमने हमेशा ही आदमियों के पास (रसूलों द्वारा अपने) संदेश भेजे हैं --- (5)
जो (असल में, ऐ रसूल) आपके रब की रहमत [mercy] है, वह रब जो हर बात को सुननेवाला और हर चीज़ को
जाननेवाला है, (6)
जो सारे आसमानों
और ज़मीन का और जो कुछ उन दोनों के बीच है, उन सबका रब है---- अगर तुम लोग सचमुच पक्का
विश्वास रखने वाले हो ---(7)
उस [अल्लाह] के
अलावा कोई ख़ुदा नहीं: वही ज़िंदगी भी देता है और मौत भी --- वह तुम्हारा भी रब है
और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है--- (8)
तब भी वे [इंकार
करनेवाले] संदेह (की हालत) में पड़े रहते हैं, और किसी भी चीज़ को गंभीरता से नहीं लेते। (9)
सो, [ऐ रसूल] आप उस दिन का इंतज़ार करें, जब आसमान से धुएं के बादल आते दिखायी देंगे।
(10)
जो लोगों को
पूरी तरह से ढँक लेंगे। (वे चिल्लाकर कहेंगे) “यह तो एक दर्दनाक सज़ा है! (11)
ऐ हमारे रब!
हम पर से यह यातना हटा दे! अब हम (एक अल्लाह में) विश्वास करते हैं!" (12)
(मगर) उनके
(अचानक) विश्वास कर लेने का तब क्या फ़ायदा होगा? जब उनके पास एक रसूल आया था जिसने साफ़
शब्दों में चेतावनियाँ दी थीं, (13)
फिर भी
उन्होंने यह कहते हुए उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया कि, "यह तो सिखाया-पढ़ाया हुआ है!, दीवाना है!" (14)
"(अच्छा) हम इस
यातना को थोड़ी देर के लिए रोक देते हैं--- तुम ज़रूर (हमारे पास) लौट आओगे ----- (15)
और जिस दिन हम
(उन लोगों) को अपनी मज़बूत पकड़ में ले लेंगे, तो उस दिन हम पूरा बदला लेकर ही रहेंगे। (16)
उनसे पहले
हमने फ़िरऔन की क़ौम के लोगों की परीक्षा ली थी: उनके पास एक बहुत ही इज़्ज़त व
गरिमावाले रसूल [मूसा] को भेजा, (17)
यह कहते हुए
कि "तुम अल्लाह के
बन्दों [इसराईल की संतानों] को मेरे हवाले कर दो! मैं विश्वास करने योग्य रसूल हूँ जो
तुम्हारे पास भेजा गया हूँ। (18)
अपने आपको
अल्लाह से ऊँचा न समझो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ। (19)
और मैं इस बात
से अपने रब और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ कि तुम मुझे बेइज़्ज़त करो या मुझ पर
पत्थर बरसाओ, (20)
किन्तु अगर
तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करते, तो (कम से कम) मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो!" (21)
(परेशान होकर
मूसा ने) अपने रब को पुकारा, "ये बड़े शैतान लोग हैं!" (22)
(अल्लाह ने
जवाब दिया), "तुम रातों रात
मेरे बन्दों को लेकर निकल भागो, निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा। (23)
अपने पीछे
समुद्र के बीच से बने रास्ते को (पार करके) वैसा ही छोड़ जाना, (वहीं) उस [फ़िरऔन] के पूरे दल-बल को डुबा दिया
जाएगा।" (24)
वे अपने पीछे
(शहर में) कितनॆ ही बाग़ और पानी के सोते छोड़ गए, (25)
और कितने खेत
और शानदार रहने के मकान, (26)
और
सुख-सामग्री, जिनमें
उन्होंने मज़े किए थे: (27)
हमने एक दूसरी
क़ौम के लोगों को इन सभी (छोड़ी हुई) चीज़ों का वारिस बना दिया। (28)
फिर न तो उनपर
आसमान रोया और न ज़मीन, और न उन्हें
कुछ मुहलत ही दी गयी। (29)
और हमने
इसराईल की सन्तानों पर चली आ रही अपमानजनक यातना से छुटकारा दे दिया, (30)
जो फ़िरऔन के
हाथों हो रही थी: वह बड़ा ही ज़ालिम था जिसने मर्यादा की सभी हदें पार कर ली थीं। (31)
और हमने उन
(इसराईल की संतानों) को जानते-बूझते हुए सारे संसार की क़ौमों में से चुना था (32)
और हमने
उन्हें अपनी निशानियाँ [revelations] दी थीं, जिनमें उनके लिए (इनाम के साथ) स्पष्ट
परीक्षा थी। (33)
ये लोग यहाँ (मक्का
में) बड़ी दृढ़ता से कहते हैं, (34)
"बस हमारी पहली
मृत्यु के बाद का जीवन कुछ नहीं है: हमें दोबारा ज़िंदा नहीं किया जाएगा। (35)
(आगे कहते), अगर जो कुछ तुम कह रहे हो वह सच है, तो उठा लाओ हमारे बाप-दादा को!" (36)
क्या ये (लोग)
यमन के बादशाहों [तुब्बा] की क़ौम से या उन क़ौम के लोगों से बेहतर हैं जो उनसे
पहले गुज़र चुके? हमने उन सबको
तबाह-बर्बाद कर दिया--- सचमुच वे अपराधी
थे। (37)
हमने आसमानों और
ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच में है, उन्हें बिना किसी मक़सद के खेल-तमाशे के लिए
नहीं बनाया; (38)
हमने उन्हें एक
सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है, मगर उनमें से अधिकतर लोग समझते नहीं हैं। (39)
फ़ैसले का दिन
[क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है; (40)
जिस दिन कोई दोस्त, किसी दूसरे के कुछ काम न आ सकेगा। (41)
उनमें से किसी की
कोई मदद नहीं की जाएगी, सिवाए उन लोगों के
जिन पर अल्लाह दया कर दे: वह बहुत ताक़तवाला, और बेहद दयावान रब है। (42)
ज़क़्क़ूम
[काँटेदार फल] का पेड़ (43)
गुनहगारों का भोजन
होगा: (44)
पिघले हुए धातु
जैसा (गर्म), वह लोगों के पेटों
में (इस तरह) खौलेगा, (45)
जैसे गर्म पानी
खौलता है। (46)
(आदेश होगा), "पकड़ो उसे! और जहन्नम की गहराइयों के बीच तक
घसीटते हुए ले जाओ! (47)
फिर सज़ा के तौर पर
उसके सिर पर खौलते हुए पानी को उंडेल दो!" (48)
"लो चखो मज़ा, तुम तो बड़े ताक़तवर, और इज़्ज़तदार आदमी बनते थे! (49)
यही तो है (वह
जहन्नम), जिसके बारे में
तुम संदेह करते थे।" (50)
(दूसरी तरफ़) वे लोग
जिन्होंने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया होगा, वे सुरक्षित व अमनवाली जगह में होंगे, (51)
बाग़ों और पानी के
सोतों [springs] के बीच, (52)
महीन रेशम और गाढ़े
ज़री के कपड़े पहने हुए, एक-दूसरे के
आमने-सामने बैठे होंगे: (53)
ऐसा ही होगा! और
हम बड़ी-बड़ी व काली आँखोंवाली हूरों से उनकी शादी कर देंगे। (54)
वे वहाँ सुकून व
इत्मिनान से (बैठे हुए) हर तरह के फल व मेवे मँगवा रहे होंगे। (55)
(दुनिया की) एक मौत
के बाद, वहाँ (जन्नत में)
वे मौत का मज़ा फिर कभी नहीं चखेंगे। अल्लाह उन्हें (जहन्नम की) आग की यातना से
बचाए रखेगा, (56)
यह सब तुम्हारे रब
की तरफ़ से इनाम [bounty] है, और (इंसान के लिए) यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (57)
हमने इस
(क़ुरआन) को समझने में आसान बनाया है --- [ऐ रसूल] आपकी अपनी (अरबी) भाषा में--
ताकि वे ध्यान दें और नसीहत ले सकें। (58)
तो आप बस
इंतज़ार करें; वे [अल्लाह पर
विश्वास न रखनेवाले] भी इंतज़ार कर रहे हैं। (59)
नोट:
3: मुबारक रात से मतलब वही “क़द्र
की रात” है जो रमज़ान के आख़िरी 10 रातों में से एक रात
होती है, इसी रात क़ुरआन “लौह-ए-महफ़ूज़”[Preserved Tablet] से दुनिया के आसमान पर उतरी, और वहाँ से थोड़ा-थोड़ा करके मुहम्मद (सल्ल) पर
उतरती रही।
4: यानी उस एक साल में जो महत्वपूर्ण घटनाएं होने वाली हैं, जैसे कि अमुक आदमी कब पैदा होगा, उसे कितनी रोज़ी दी जाएगी, कोई आदमी कब मरेगा आदि, इन सारी बातों पर अमल करने के लिए फ़रिश्तों
को काम पर लगा दिया जाता है।
9: शाब्दिक अर्थ है कि “संदेह
में पड़े हुए खेल करते रहते हैं।“
11: कुछ विद्वान उस धुएं वाले दिन को मुहम्मद साहब की
ज़िंदगी के दौरान मक्का में होने वाले भयंकर सूखे और अकाल से जोड़ते हैं, जब ज़बरदस्त भूख के कारण जब वे आसमान की तरफ़
देखते तो उन्हें धुआँ ही धुआँ नज़र आता था, फिर उन लोगों ने वादा किया कि अगर अकाल ख़त्म
हो जाए, तो वे विश्वास कर लेंगे, मगर जैसे ही मुसीबत टल गई, वे फिर अपने देवताओं की तरफ़ लौट आए…... मगर
ज़्यादा सही यही लगता है कि यहाँ क़यामत के दिन के बारे में कहा गया है।
15: अगर ऊपर की आयत में क़यामत का दिन माना जाए, तो मतलब यह हो सकता है कि उस यातना को रोका
नहीं जाएगा, बल्कि थोड़ी देर के लिए राहत दी जाएगी, और ऐसे में विश्वास न करने वाले [काफ़िर] फिर
अपने पुराने विश्वास पर लौट आएंगे।
20: असल शब्द “र-ज-मा” है
जिसका मतलब गालियाँ देना, बे-इज़्ज़त करना, पत्थर मारना, निकाल बाहर करना आदि होता है।
24: इस घटना का विस्तार से वर्णन सूरह यूनुस (10: 90-92) और
सूरह शुअरा (26: 56-67) में देखा जा सकता है।
33: निशानियों का मतलब यहाँ पर वे इनाम हैं जो अल्लाह ने
इसराईल की संतानों पर किए थे, जैसे खाने के लिए “मन
और सलवा” का उतारा जाना, पत्थर् से पानी के सोतों का फूटना आदि जिसका
ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 47-58) में आया है।
37: “तुब्बा” यमन के बादशाहों की उपाधी थी, प्राचीन काल में दक्षिण अरब के क्षेत्रों में
इनकी हुकूमत काफ़ी सालों तक रही थी जहाँ एक के बाद एक बड़े मज़बूत शासक हुए थे।
39: सच्चा मक़सद यही है कि दुनिया में किए गए कर्मों के
अनुसार अच्छा कर्म करने वालों को इनाम मिले और बुरे कर्म करने वालों को दंड मिले।
59: मुहम्मद (सल्ल) को मक्का के अपने विरोधियों के ख़िलाफ़
मदद के लिए और मिलने वाली जीत के लिए इंतज़ार करने को कहा गया है। जबकि मक्का के
विरोधी मुहम्मद साहब की तबाही और उनकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे।
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