Late Middle Meccan : मक्का-मध्यकाल के बाद के दिनों की सूरतें
सूरह 17: अल-इसरा /बनी इसराईल
[रात की
यात्रा, The Night Journey]
यह एक मक्की सूरह है, जिसमें शुरुआत में इसराईल की संतानों का ज़िक्र आया है और अंत में फ़िरऔन का। सूरह के बड़े हिस्से में बताया गया है कि क़ुरआन को इंसानों के मार्गदर्शन के लिए और (इंकार के नतीजे से) सावधान करने के लिए उतारा गया है। मुहम्मद सल्ल और उनके रसूल होने की विशेषताओं में ख़ासकर इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि एक इंसान होने के नाते उन्हें अपनी मर्ज़ी से कोई चमत्कार [मोजज़ा] दिखाने की ताक़त नहीं दी गई है जब तक कि अल्लाह ऐसा न चाहे। किस तरह इबलीस [शैतान] इंसानों को बहकाने के लिए झूठे वादे करता है, उसके साथ-साथ विश्वास न करने वालों का अंजाम कैसा होगा, दोनों हालात के लिए इस सूरह में चेतावनी दी गई है, और आयत 22-39 में बहुत से आदेश दिए गए हैं। "रात का सफ़र" जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा, उसका ज़िक्र आयत 1 में और फिर से आयत 60 में आया है। मक्का काल के आख़िरी सालों में अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) की इज़्ज़त बढ़ाते हुए एक ही रात में मक्का से येरुशलम और वहाँ से आसमानों का सफ़र कराया और फिर वापस मक्का पहुँचा दिया, फ़ैसले के दिन भी उनके दर्जे बुलंद किए गए कि वह अपनी क़ौम के लोगों की अल्लाह के सामने सिफ़ारिश करेंगे (आयत 79), जिसका इस सूरह में ज़िक्र आया है। इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में कामयाबी पाने के कुछ नियम-क़ायदे बताए गए हैं (22-39), साथ में शैतान और उसके धोखेबाज़ियों से सावधान किया गया है (61-65). दोबारा ज़िंदा उठाए जाने के विरोध में बुतपरस्तों द्वारा दिए जाने वाले तर्क, और उनके द्वारा की जाने वाली हास्यास्पद मांगों (89-93) की निंदा की गई है।
विषय:
01 : रात में दूरवाली मस्जिद [अक़्सा] की यात्रा
02-08: इसराईल की संतानें
09-11: क़ुरआन सही रास्ता दिखानेवाली (किताब) है
12 : अल्लाह की क़ुदरत की दो निशानियाँ
13-21: सज़ा और इनाम का औचित्य
22-39: भलाई के आदेश और बुरे कर्मों पर रोक
39-44: मूर्तिपूजा के ख़िलाफ तर्क
45-48: विश्वास न करने वालों ने क़ुरआन को ठुकरा दिया
49-52: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते
53-55: ईमानवालों का (धर्म के मामले में) बहस के समय मेल-मिलाप का
रवैया होना चाहिए
56-57: फ़रिश्तों और जिन्नों में भी कोई ताक़त नहीं
58 : सज़ा मिलना तय है
59-60: क्यों रसूल (सल्ल) कोई चमत्कार नहीं दिखाते
61-65: इबलीस की कहानी
66-69: अल्लाह के एहसानों का इंसान शुक्र अदा नहीं करता
70 : पैदा किए गए प्राणियों में आदम की संतानों को वरीयता
71-72: हर आदमी से उसके कर्मों का हिसाब होगा
73-77: रसूल को नियमों में समझौता करने के लिए बहकाना
78-81: रसूल को पाबंदी से और सही समय पर नमाज़ पढ़ने का हुक्म
82-84: क़ुरआन: (आत्माओं के) दर्द का मरहम और रहमत है
85 : रूह [आत्मा]
86-87: जो संदेश "वही" द्वारा भेजा गया, अल्लाह चाहे तो उन्हें वापस ले ले
88-89: क़ुरआन की नक़ल नहीं हो सकती
90-93: रसूल को लोगों की तरफ़ से चुनौती
94-99: एक आदमी को रसूल बनाने पर आपत्ति
100 : इंसान बड़ा तंगदिल होता है
101-104: मूसा (अलै) की नौ निशानियाँ
105-109: क़ुरआन में आई बातें सच्ची हैं
110-111: "अल्लाह" के नाम से पुकारो या "रहमान" [रहम करनेवाले] से, दोनों एक ही है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब
पर मेहरबान है, अत्यंत
दयावान है
महानता है उस [अल्लाह] की, जिसने अपने बन्दे [मुहम्मद] को रात के समय
पवित्र मस्जिद [काबा] से उस दूरवाली मस्जिद [अक़्सा] तक की यात्रा करायी, जिसके चारों तरफ़ की जगह को हमने बरकत [blessing] दी है, (और यह यात्रा इसलिए करायी) ताकि हम उन्हें अपनी
कुछ निशानियाँ दिखा दें: सचमुच वही है जो सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (1)
(इससे
पहले) हमने मूसा [Moses] को भी किताब [तोरात,Torah] दी थी, और उसे इसराईल की सन्तानों के लिए रास्ता
दिखाने का ज़रिया बनाया था (और कहा था) कि "तुम मेरे सिवा किसी और को अपना
रखवाला न बना लेना, (2)
ऐ नूह [Noah] के साथ (नौका में सुरक्षित) बैठनेवालों की
संतानों: सचमुच वह बड़ा ही शुक्र अदा करनेवाला बंदा था।” (3)
और (देखो!) हमने किताब
[तोरात] में इसराईल की सन्तानों के सामने यह घोषणा कर दी थी कि, "दो बार तुम धरती पर ज़रूर फ़साद मचाओगे और
बेहद घमंडी बन जाओगे।" (4)
फिर जब उन दोनों में से
पहली चेतावनी के पूरा हो जाने का समय आ गया, तो [ऐ इसराईल की संतानों] हमने तुम्हारे
ख़िलाफ़ अपने ऐसे बन्दों को भेज दिया जो लड़ाई लड़ने में बड़े सख़्त थे, और उन लोगों ने तुम्हारे घरों को तबाह कर
डाला। (इस तरह) वह चेतावनी पूरी होकर रही, (5)
मगर फिर, हमने तुम्हें मौक़ा दिया कि तुम अपने दुश्मन
के मुक़ाबले में जीत सको। फिर हमने तुम्हारे धन-दौलत और औलाद में बढ़ोत्तरी कर दी, और तुम्हें बड़ी-संख्यावाले लोगों का एक जत्था
बना दिया---- (6)
"अगर तुम अच्छा काम करते हो, तो अपने ही भलाई के लिए करते हो, और अगर तुम बुरे काम करते हो, तो वह भी तुम्हारी ही (जान के) लिए बुरा
होगा"---- और फिर, जब दूसरी चेतावनी के पूरा होने का समय आ गया (तो हमने
तुम्हारे पास ऐसे दुश्मनों को भेज दिया ताकि) वे तुम्हारे चेहरे बिगाड़ डालें और
मस्जिद [बैतुल मक़दिस] में जा घुसें जैसाकि पहली बार भी घुसे थे, और जिस चीज़ पर भी उनकी नज़र पड़ी उसे
तोड़-फोड़कर बर्बाद कर डालें। (7)
तुम्हारा रब अब भी तुम पर
दया कर सकता है, लेकिन अगर तुम फिर उसी गुनाह की तरफ़ लौटे, तो हम भी (तुम्हारी सज़ा के साथ) लौट आएंगे:
हमने उन लोगों के लिए जहन्नम को क़ैदख़ाना बना रखा है जो (हमारी चेतावनियों को) नहीं
मानते। (8)
सचमुच यह क़ुरआन उस रास्ते
की तरफ़ ले जाना चाहती है जो सबसे सीधा है। यह उन ईमान रखनेवालों को जो अच्छे कर्म
करते रहते हैं, ख़ुशख़बरी सुनाती है कि उन्हें बहुत बड़ा इनाम मिलने वाला है, और (9)
चेतावनी देती है कि जो लोग
आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए हमने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी
है। (10)
तब भी, इंसान जिस तरह (अपने लिए) भलाई की दुआ माँगता
है, (कभी-कभी अनजाने में) वह बुराई की भी दुआ माँगने लगता है:
सचमुच इंसान बड़ा ही उतावला है! (11)
और (देखो!) हमने रात और
दिन को दो निशानियों के रूप में बनाया, फिर रात को (आराम करने के लिए) अँधेरा कर
दिया, और दिन के उजाले को देखने के लिए बनाया, ताकि तुम अपने रब की दी हुई रोज़ी ढूँढ सको, और यह भी जान सको कि कैसे वर्षों की गिनती की
जाती है और उसका हिसाब रखा जाता है। हमने हर चीज़ को विस्तार से साफ़-साफ़ बता दिया
है। (12)
हमने हर आदमी की क़िस्मत
उसकी गर्दन से बाँध दी है। क़यामत के दिन, उनमें हर एक लिए, हम उनके (कर्मों का) लेखा-जोखा निकाल लाएंगे, जिसको वे अपने सामने खुला हुआ देख लेंगे, (13)
(उनसे
कहा जाएगा), "अपने (कर्मों का) लेखा-जोखा पढ़ ले! आज तू स्वयं ही अपना
हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।" (14)
जो कोई सीधा मार्ग अपनाता
है, तो वह अपने ही भले के लिए अपनाता है; और जो कोई सीधे रास्ते से भटक गया, तो भटकने का नतीजा भी उसे ही भुगतना होगा।
कोई भी आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं उठाएगा, और न ही हम (किसी क़ौम के) लोगों को उस वक़्त
तक सज़ा देते हैं, जब तक कि उनके पास कोई रसूल नहीं भेज देते हैं। (15)
जब हम किसी बस्ती को
बर्बाद करने का इरादा कर लेते हैं, तो वहाँ के बिगड़े हुए अमीर लोगों को (सुधर
जाने का) आदेश देते हैं, मगर वे इसे मानने के बजाय इंकार करने में और भी जम जाते है, तब हमारा फ़ैसला पक्का हो जाता है, फिर हम उन्हें पूरी तरह से बर्बाद कर देते
हैं। (16)
और (देखो!) हम नूह के बाद
कितनी नस्लों को बर्बाद कर चुके हैं! तुम्हारा रब अपने बन्दों के गुनाहों को ख़ूब
अच्छी तरह से जानता भी है और उन पर नज़र भी रखता है। (17)
अगर कोई (केवल) इसी दुनिया
की छोटी सी ज़िंदगी (में भलाई) चाहता है, तो हम जिस किसी के लिए चाहते हैं, और जितना चाहते हैं, उसे इसी दुनिया में जल्दी से जल्दी कुछ दे
देते हैं; मगर अंत में, उसके लिए हमने जहन्नम तैयार कर रखी है जिसमें
जलने के लिए वह बदहाल और ठुकराया हुआ प्रवेश करेगा। (18)
लेकिन अगर कोई आनेवाली
दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी चाहता है, और उसको पाने की कोशिश भी करता है, जैसाकि उसे करना चाहिए, तो एक सच्चे ईमानवाले के रूप में, उसकी कोशिशें क़बूल की जाएंगी। (19)
(ऊपर
ज़िक्र किए गए) बादवाले [आख़िरत चाहनेवाले] और पहलेवाले [दुनिया चाहनेवाले], दोनों को ही आपके रब की तरफ़ से रोज़ी दी जाती
है। [ऐ रसूल] आपके रब की तरफ़ से किसी को रोज़ी देने में कोई रोक-टोक नहीं होती
है---- (20)
देखिए, कैसे (इस दुनिया में) हमने उनके कुछ लोगों को
कुछ दूसरे लोगों से ज़्यादा दे रखा है---- मगर आख़िरत [Hereafter] के दर्जे सबसे बढ़कर हैं और सबसे बेहतर हैं।
(21)
अल्लाह के साथ कोई दूसरा प्रभु न बनाओ, वरना बेइज़्ज़त और बेसहारा होकर रह जाओगे। (22)
आपके रब ने आदेश दिया है कि
तुम उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो, और यह कि माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। अगर
उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ, तो (अपना धीरज खोते हुए) उन्हें 'उफ़'! तक न कहो और न उनके साथ कठोरता से पेश आओ, बल्कि उनसे आदर के साथ बात किया करो, (23)
और नर्मी के साथ बर्ताव करते
हुए उनके सामने विनम्रता से अपने आपको झुकाओ और कहो, "मेरे रब! जिस तरह उन्होंने बचपन में मुझे
पाला-पोसा और बड़ा किया था, तू भी उन पर दया कर।" (24)
जो कुछ तुम्हारे दिल में है, उसे तुम्हारा रब अच्छी तरह से जानता है। अगर तुम
अच्छे व नेक हुए, तो वह
उन लोगों को (जिनसे अनजाने में छोटे-मोटे गुनाह हो जाते हैं) बहुत माफ़ करनेवाला है
जो उसके सामने (गुनाहों से तौबा करते हुए) झुकते हैं। (25)
और (देखो!) अपने रिश्तेदारों
को दो, जो उनका
हक़ है, ज़रूरतमंदों
और (बेसहारा) मुसाफ़िरों को भी दो--- और अपने माल को बेहूदा कामों में न उड़ाओ: (26)
जो फ़ु़ज़ूलख़र्ची करते हैं, वह शैतान के भाई हैं, और शैतान अपने रब की नेमतों का कभी भी शुक्र अदा
नहीं करता--- (27)
लेकिन अगर कभी ऐसा हो कि तुम
ख़ुद अपनी रोज़ी की खोज में अपने रब से उम्मीद लगाए बैठे हो, (तुम्हारे पास कुछ नहीं है) और इस हालत में
तुम्हें इन ज़रूरतमंदों से मुँह फेरना पड़े, तो उनसे कम से कम नर्मी से बात कर लिया करो। (28)
और (देखो!) अपना हाथ न तो इतना
सिकोड़ लो कि गर्दन में बँध जाए (कि किसी को कुछ न दो) और न उसे बिल्कुल खुला छोड़
दो (कि सब कुछ लुटा बैठो), कि फिर तुम्हारी निंदा हो और तुम दुख में घिर जाओ। (29)
तुम्हारा रब जिसे चाहता है
उसकी रोज़ी को बहुत बढ़ा देता है और जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है:
निस्संदेह वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है और उन पर पूरी नज़र रखता है। (30)
और (देखो!) ग़रीबी के डर से अपने बच्चों की हत्या न करो---- हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी---- उनकी हत्या करना बहुत ही बड़ा गुनाह है। (31)
और किसी शादीशुदा मर्द या
औरत को (सेक्स के इरादे से) किसी दूसरी औरत या मर्द के नज़दीक तक भी नहीं जाना
चाहिए: यह एक अश्लील कर्म और बड़ी बुराई का चलन है। (32)
किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है, सिवाय इसके कि जब (क़ानून ने हत्या करने का)
अधिकार दिया हो: अगर किसी बेगुनाह की अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, तो उसके वारिस को हमने अधिकार दे दिया है (कि
वह हत्यारे से बदला ले सकता है), मगर उसे जान लेते समय ज़्यादती नहीं करनी
चाहिए, क्योंकि (अल्लाह ने) पहले ही उसकी मदद कर दी है। (33)
और (ख़र्च करने के इरादे
से) अनाथों के माल के नज़दीक भी मत जाओ, सिवाय उसकी भलाई के इरादे से, जब तक कि वह अपनी जवानी को न पहुँच जाएं (और
तुम उनकी अमानत उन्हें लौटा दो)। और अपनी प्रतिज्ञा [Pledge] पूरी किया करो: प्रतिज्ञा के विषय में तुमसे
अवश्य ही पूछा जाएगा। (34)
जब किसी पैमाने से नापकर
दो, तो (कमी न करो और) पूरा नापा करो, और तौलते समय सटीक तराज़ू से सही तौलो: यह
बेहतर और ईमानदार तरीक़ा है और इसका नतीजा भी अच्छा होगा। (35)
और (देखो!) जिस चीज़ के सच
होने की तुम्हें जानकारी न हो, आँख बंद करके उसकी पैरवी मत करने लगो: कान, आँख और दिल (बुद्धि), इन सब चीज़ों के बारे में तुम से पूछ्ताछ की
जाएगी। (36)
और ज़मीन पर अकड़कर मत चलो:
न तो तुम ज़मीन को फाड़ सकते हो और न लम्बाई में पहाड़ों की बराबरी कर सकते हो। (37)
यह सारे बुरे काम ऐसे हैं
जो तुम्हारे रब को बेहद अप्रिय हैं। (38)
[ऐ रसूल] ये कुछ ज्ञान की बातें हैं जो आपके रब की तरफ़ से आप पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजी गयी हैं: (लोगो! असल बात यह है कि) अल्लाह के साथ पूजने के लिए कोई दूसरा प्रभु न बना लो, वरना निंदा झेलते हुए और ठुकराए हुए, जहन्नम में फेंक दिए जाओगे! (39)
क्या! क्या तुम्हारे रब ने
तुम लोगों को तो अपने फ़ज़ल से बेटे दिए हैं, और ख़ुद अपने लिए फ़रिश्तों को बेटियाँ बना लिया
है? (अफ़सोस
तुम्हारी सोच पर!) कितनी गम्भीर बात है जो तुम कह रहे हो! (40)
और (देखो!) हमने इस क़ुरआन में चीज़ों को तरह-तरह से स्पष्ट करके बता दिया है, ताकि लोग सचेत हों, और इस पर ध्यान दे सकें, मगर इन पर कोई असर न हुआ, उल्टा (सच्चाई से) उनकी नफ़रत में और भी बढ़ोत्तरी हो गयी। (41)
[ऐ
रसूल] कह दें, "अगर अल्लाह के साथ दूसरे और भी ख़ुदा होते, जैसा कि ये कहते हैं, तब तो उन ख़ुदाओं ने (मुक़ाबले के लिए)
सिंहासनवाले रब [अल्लाह] तक पहुँचने का मार्ग खोज लिया होता।" (42)
महिमावान है अल्लाह! वह
कहीं बड़ा और बहुत ऊँचा है उन बातों से, जो ये कहते हैं! (43)
सातों आसमान और ज़मीन और जो
कोई भी उनमें है, सब उसकी बड़ाई का बयान करते हैं। और कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो
उसकी तारीफ़ों के साथ उसका गुणगान न करती हो, हालाँकि तुम उनकी तारीफ़ व गुणगान को समझ नहीं
पाते: बेशक वह अत्यन्त सहनशील, और क्षमा करनेवाला है। (44)
[ऐ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़कर सुनाते हैं, तो हम आपके और उन लोगों के बीच जो आख़िरत [परलोक/ Hereafter] को नहीं मानते, एक अनदेखे पर्दे की आड़ कर देते हैं। (45)
हमने उनके दिलों पर भी
पर्दे डाल दिए हैं जो उन्हें (क़ुरआन को) समझने से रोक देता है, और उनके कानों में बोझ डाल दिया है (कि वे
कुछ सुन न सकें)। जब आप क़ुरआन में केवल अपने रब का ही ज़िक्र करते हैं, (और वे जब अपने बनाए हुए प्रभुओं का इसमें
उल्लेख नहीं पाते), तो वे नफ़रत से अपनी पीठ फेरकर भाग खड़े होते हैं। (46)
जब वे आपकी बातें ध्यान से
सुनते हैं, तो उनके सुनने का तरीक़ा क्या है, इसे हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं, और जब वे आपस में गुप्त बातें करते हैं (हम
वह भी जानते हैं), और ये ज़ालिम (मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम तो बस एक ऐसे आदमी के पीछे चल पड़े हो, जिस पर जादू कर दिया गया है।" (47)
[ऐ
रसूल] देखिए, वे आपके बारे में कैसी कैसी बातें बनाते हैं! नतीजा यह हुआ
कि वे भटक चुके हैं, और अब सीधा रास्ता नहीं पा सकते! (48)
वे यह भी कहते हैं, "क्या? जब हम (मरकर) सड़-गल जाएंगे व हड्डियाँ और धूल
होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा करके फिर से उठाया जाएगा?" (49)
कह दें, "(हाँ), यहाँ तक कि तुम (मरने के बाद) पत्थर या लोहे
(जैसे ठोस) हो जाओ, (50)
या कोई और पदार्थ जिसे तुम
समझते हो कि उसे जीवित करना बहुत मुश्किल होगा।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें (ज़िंदा करके) वापस लाएगा?" कह दें, "वही, जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया था।"
तब वे आपके सामने अपने सिर मटकाने लगेंगे और कहेंगे, "अच्छा तो वह कब होगा?" कह दें, "हो सकता है कि बहुत जल्द ही हो: (51)
एक दिन आएगा जिस दिन
अल्लाह तुम्हें बुलाएगा, और तुम उसकी तारीफ़ें करते हुए उसकी पुकार का जवाब भी दोगे, और समझोगे कि (दुनिया में) तुम बस थोड़ी ही
देर ठहरे थे। (52)
[ऐ रसूल!] मेरे बन्दों से कह दें कि "(धर्म पर होने वाली बहस में) जो बात कहो, ऐसी कहो जो बहुत अच्छी हो। शैतान उनके बीच झगड़े का बीज बोता है: सचमुच शैतान तो आदमी का खुला दुश्मन है।" (53)
तुम्हारा रब, तुम सब के बारे में सबसे अधिक जानता है: अगर
वह चाहे तो तुम पर दया कर दे, और अगर वह चाहे तो तुम्हें दंड दे दे। और [ऐ
रसूल] हमने आपको उनकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए नहीं भेजा है। (54)
आसमानों और ज़मीन में हर एक
के बारे में तुम्हारा रब ख़ूब अच्छी तरह से जानता है। हमने कुछ पैग़म्बरों [Prophets] को दूसरे पैग़म्बरों से ज़्यादा दिया: हम ने
दाऊद [David] को किताब [ज़बूर/ Psalms] दी थी। (55)
कह दें, "(संकट में) पुकारकर देखो उन सबको, जिनको तुमने अल्लाह के सिवा अपना प्रभु बना
रखा है: उनके पास कोई ताक़त नहीं है कि वे तुम्हारे कष्ट दूर कर सकें या तुम्हारी
हालत बदल सकें।" (56)
वे लोग जिन [फ़रिश्तों और
जिन्नों] को पूजते हैं, वे तो ख़ुद अपने रब तक पहुँचने का रास्ता ढूँढते रहते हैं, यहाँ तक कि वे (फ़रिश्ते) भी जो अल्लाह से
सबसे निकट हैं। वे उसकी दया-दृष्टि की उम्मीद लगाए रखते हैं और उसकी सज़ा से डरते
रहते हैं। तुम्हारे रब की सज़ा सचमुच बड़े डरने की चीज़ है: (57)
क़यामत के दिन से पहले ऐसा
अवश्य होगा कि (शैतानियाँ करने वालों की) जितनी बस्तियाँ होंगी, हम उन्हें तबाह कर देंगे या उसे कठोर दंड
देंगे--- यह बात (अल्लाह की) किताब में लिखी जा चुकी है। (58)
हम अगर चाहें तो चमत्कारिक निशानियाँ (देकर) भेजने से हमें कोई नहीं रोक सकता, मगर हमें इस बात ने रोक रखा है कि पहले गुज़र चुके लोगों ने भी इन (निशानियों) को मानने से इंकार कर दिया था। हमने समूद के लोगों को स्पष्ट निशानी के रूप में एक ऊँटनी दी थी, इसके बावजूद उन लोगों ने (क़त्ल करके) उसके साथ कितना बुरा सलूक किया। हम निशानियाँ तो केवल इसलिए भेजते हैं ताकि लोग उसके नतीजे से डरें। (59)
[ऐ
रसूल!] हम आपको बता चुके हैं कि मनुष्य जाति के बारे में आपके रब को हर एक चीज़ की
जानकारी है। (मेराज के मौक़े पर रात की यात्रा के दौरान) वह झलक जो हमने आपको
दिखायी, वह तो लोगों के लिए केवल एक आज़माइश थी, इसी तरह (जहन्नम का) वह मन्हूस पेड़ [ज़क़ूम] था
जिसका ज़िक्र क़ुरआन में किया गया है। हम उन्हें (तरह तरह से) सावधान करते रहते हैं, मगर उन पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि इससे तो उनकी बदतमीज़ी और बढ़ती जाती
है।" (60)
और जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ, तो वे सब सज्दे में झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका।" उसने कहा, "क्या मैं उसके सामने झुकूँ, जिसे तूने मिट्टी से बनाया है?" (61)
और (फिर) कहने लगा, "ज़रा इस तुच्छ (इंसान) को देखो, कि तूने इस हस्ती को मुझ पर बड़ाई दी है! अगर
तू मुझे क़यामत के दिन तक मुहलत दे दे, तो मैं बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर उसकी सारी
सन्तानों को बहकाकर मार्ग से भटका दूँगा।" (62)
अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तेरा बदला [reward] तो जहन्नम होगा, और जो कोई भी तेरे पीछे चलेगा उन लोगों की
सज़ा भी जहन्नम ही होगी ---- पूरी पूरी सज़ा! (63)
जिस किसी पर तेरा बस चले, जा उसे अपनी आवाज़ से बहका ले, उनपर हमला करने के लिए अपने सवार और अपने
प्यादे तैयार कर ले, उनके माल और औलाद में भी उनके साथ हिस्सेदार बन जा, और उनसे (झूठे) वादे कर---मगर शैतान के वादे
धोखे के सिवा कुछ नहीं होते---- (64)
मगर तुम्हारा कोई ज़ोर
हमारे (असल) बंदों पर नहीं चल सकता: तेरा रब उनकी अच्छी तरह से देखभाल के लिए काफ़ी
है।" (65)
(ऐ लोगो) यह तुम्हारा रब है जो तुम्हारे लिए समंदर में बड़े आराम से जहाज़ों को चलाता है, ताकि तुम उसके फ़ज़ल से रोज़ी तलाश कर सको: वह तुम्हारे हाल पर बेहद दयावान है। (66)
जब समंदर में तुम पर कोई
मुसीबत आ जाती है, तो वे सब हस्तियाँ जिन्हें तुम पुकारते हो, बिना मदद के छोड़ जाती हैं, केवल एक अल्लाह की याद ही बाक़ी रह जाती है।
मगर जब अल्लाह तुम्हें बचाकर सूखे में ले आता है तो फिर तुम उससे मुँह मोड़ लेते
हो: सच्चाई यह है कि आदमी शुक्र अदा नहीं करता! (67)
क्या तुम इस बात से
बेफ़िक्र हो कि एक बार थल पर आ जाने के बाद वह तुम्हें धरती के अंदर धँसा नहीं
सकता या यह कि तुम पर पथराव करनेवाली आँधी नहीं भेज सकता है? और तब तो तुम्हें बचानेवाला कोई नहीं मिलेगा।
(68)
या तुम कैसे इस बात का
यक़ीन कर सकते हो कि वह [अल्लाह] तुम्हें समंदर में दोबारा नहीं ले जाएगा, और (यात्रा के दौरान अगर) फिर तुम पर समंदरी
तूफ़ान भेज दे, और तुम्हारी नाशुक्री के कारण तुम्हें डूबो दे? वहाँ कोई न होगा जो हमारे ख़िलाफ़ तुम्हारी मदद
कर सके। (69)
हमने आदम की सन्तान को
इज़्ज़त दी है और उनके लिए थल औऱ जल में सवारी की व्यवस्था की है; हमने उनके लिए अच्छी रोज़ी का इंतज़ाम किया है, और अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों के
मुक़ाबले उन्हें बड़ाई दी है। (70)
उस दिन जब हम लोगों के हर एक गिरोह को उनके लीडरों के साथ बुलाएँगे, फिर जिन्हें उनके कर्मो का लेखा-जोखा उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, वे इसे (ख़ुशी-ख़ुशी) पढ़ेंगे। और किसी के साथ तनिक भी अन्याय न होगा: (71)
जो लोग इस दुनिया में
(बुद्धि से काम न लेते हुए) अंधे होकर रहे, वे आख़िरत [परलोक] में भी अंधे ही रहेंगे, बल्कि वे मार्ग से और भी अधिक भटके हुए
होंगे। (72)
[ऐ
रसूल!] विश्वास न करनेवाले इस कोशिश में लगे थे कि जो कुछ हमने आपकी ओर 'वही' [revelation] द्वारा भेजा है, उससे आपको बहकाकर दूर कर दें, ताकि आप कोई अलग ही 'वही' अपनी तरफ़ से गढ़कर हमारे नाम के साथ जोड़ दें, और तब वे ख़ुश होकर आपको अपना दोस्त बना लें।
(73)
अगर हमने आपके क़दम मज़बूती
से जमा न दिए होते, तो बहुत संभव था कि उनकी तरफ़ आपका झुकाव थोड़ा बहुत तो हो ही
जाता। (74)
और अगर ऐसा हुआ होता, तो हम आपको इस दुनिया में भी दुगनी सज़ा देते, और मरने के बाद भी दुगनी सज़ा होती और तब आपको
हमारे मुक़ाबले कोई भी मदद करने वाला न मिलता। (75)
उन्होंने चाल चली कि इस
भूभाग से आपके क़दम उखाड़ दें, ताकि आप यहाँ से निकल जाएं, (अगर ऐसा हो जाता तो) आपके बाद ये भी थोड़ी देर
से ज़्यादा टिक नहीं पाते। (76)
हमारा तरीक़ा तो उन रसूलों
के लिए भी ऐसा ही था, जिन्हें हमने आपसे पहले भेजा था, और आप हमारे तरीक़े में कभी कोई बदलाव नहीं
पाएंगे। (77)
अत: [ऐ रसूल] पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करें -- दोपहर सूरज के ढलने से लेकर रात के अंधेरे तक, और सुबह सवेरे क़ुरआन (सुबह की नमाज़) पढ़ा करें--- सुबह-सवेरे क़ुरआन के पढ़ने को (फ़रिश्तों द्वारा) हमेशा ख़ास तौर से देखा जाता है--- (78)
और रात के कुछ हिस्से में
(पिछ्ले पहर) नींद से उठकर नमाज़ पढ़ा करें, यह आपके लिए अतिरिक्त इबादत होगी, ताकि आपका रब आपका दर्जा ऊँचा करते हुए आपको ‘पसंदीदा दर्जे ’[मक़ाम ए महमूद] तक पहुँचा दे। (79)
और दुआ में कहें, "मेरे रब! तू मुझे (जहाँ कहीं पहुँचा, तो) सच्चाई के साथ पहुँचा, और (जहाँ कहीं से निकाल, तो) सच्चाई के साथ बाहर निकाल, और अपनी ओर से मुझे ऐसी ताक़त दे जिसमें तेरी
मदद हो।" (80)
कह दें, "(देखो!) सच्चाई सामने आ चुकी है और झूठ मिट
गया है: और झूठ को एक दिन मिटना ही था।" (81)
हम क़ुरआन में जो (संदेश) भेजते हैं, वह ईमान रखनेवालों (की आत्मा के सभी दर्द) का मरहम (healing) और रहमत है, मगर जो लोग विश्वास नहीं करते, उनकेे लिए तो यह बस उनके घाटे को और बढ़ाने वाली चीज़ हैै। (82)
और आदमी पर जब हम अपनी ख़ास
कृपा करते हैं तो वह घमंड में आकर मुँह फेर लेता है, किन्तु जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है, तो (देखो!) एकदम निराश होेकर बैठ रहता है। (83)
कह दें, "हर एक आदमी चीज़ों को अपने ही ढंग से करता है, मगर तुम्हारा रब भली-भांति जानता है कि कौन
सबसे सही बताए हुए मार्ग पर चल रहा है।" (84)
[ऐ रसूल], वे आपसे रूह [आत्मा] के बारे में पूछते हैं। कह दें, "रूह तो मेरे रब के अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा है।" आपको तो (सृष्टि के राज़ की) बहुत थोड़ी ही जानकारी दी गयी है। (85)
अगर हम चाहें, तो जो कुछ भी आपकी ओर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजा गया है, उसे वापस ले लें-----तो फिर आपको कोई भी न
मिलेगा जो हमारे ख़िलाफ़ आपकी वकालत कर सके। (86)
लेकिन यह तो बस आपके रब की
दयालुता है (कि वह ऐसा नहीं करता): सच तो यह है कि उसका आप पर बड़ा करम है। (87)
कह दें, "अगर सारे इंसान और जिन्न साथ मिलकर भी चाहें
कि इस क़ुरआन जैसी कोई चीज़ बना लाएँ, तो वे इस जैसी चीज़ नहीं बना सकते, चाहे वे एक-दूसरे की कितनी ही मदद कर
लें।" (88)
हमने इस क़ुरआन में लोगों
(को समझाने) के लिए हर तरह की मिसालें बार-बार बयान कर दी हैं, फिर भी अधिकतर लोग (सच्चाई पर) विश्वास न
करने पर अड़े रहते हैं। (89)
वे कहते हैं, "[ऐ मुहम्मद] हम तब तक तुम्हारी बात पर विश्वास
नहीं करेंगे, जब तक कि तुम हमारे लिए धरती के अंदर से पानी का एक सोता [spring] न निकाल दो; (90)
या फिर तुम्हारा खजूरों और
अंगूरों का एक बाग़ हो, और तुम उसके बीच से नहरें निकाल दो; (91)
या जैसा कि तुम्हारा दावा
है, आसमान टुकड़े-टुकड़े होकर हम पर गिर पड़े, या अल्लाह और फ़रिश्तों को हमारे आमने-सामने
ला खड़ा करो; (92)
या फिर तुम्हारे लिए सोने
का एक महल पैदा हो जाए; या तुम आसमान में चढ़ जाओ--- तब भी, हम तुम्हारे चढ़ने पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि तुम एक सचमुच की (लिखी-लिखाई) किताब
न उतार लाओ, जिसे हम पढ़कर जाँच सकें।" कह दें, "महिमावान है मेरा रब! मैं एक (सच्चा) संदेश
पहुंचानेवाले मामूली आदमी के सिवा और क्या हूँ?" (93)
जब लोगों के पास मार्ग
दिखानेवाली चीज पहुँच गयी, तो उस पर विश्वास कर लेने से बस एक ही बात ने उन्हें रोके
रखा था, कि वे कहते थे कि, "ऐसा कैसे हो सकता है कि अल्लाह ने एक आदमी को
रसूल बनाकर भेज दिया?" (94)
कह दें, "अगर फ़रिश्ते ज़मीन पर (यहाँ के लोगों की तरह)
बसे होते और आराम से चल फिर रहे होते, तो हमने उनके पास आसमान से किसी फ़रिश्ते ही
को रसूल बनाकर भेज दिया होता।" (95)
कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही गवाह के रूप
में काफ़ी है। निश्चय ही वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता भी है, और उन पर नज़र भी रखता है।" (96)
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए तो असल में वही सही रास्ता पानेवाला होता है, और वह जिसे भटकता छोड़ दे, तो उस (अल्लाह) के सिवा ऐसे लोगों को बचानेवाला कोई नहीं पाओगे। और क़यामत के दिन हम ऐसे लोगों को इकट्ठा करेंगे, औंधे मुँह पड़े हुए, इस हाल में कि वे अंधे, गूँगे और बहरे होंगे। जहन्नम उनके रहने का ठिकाना होगा। जब कभी (वहाँ की) आग धीमी पड़ने लगेगी, तो हम उसे और भी भड़का देंगे। (97)
यही बदला है जो उन्हें
हमारी निशानियों को मानने से इंकार करने और ऐसा कहने के नतीजे में मिलेगा कि, "क्या! जब हम मरके (सड़-गलकर) हड्डी और चूरा हो
जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा करके उठाया जाएगा?" (98)
क्या वे नहीं समझते कि जिस
अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, वह उस जैसी चीज़ दोबारा भी पैदा कर सकता है? उसने उनके लिए एक समय तय कर रखा है--- इस बात
में कोई सन्देह नहीं है--- मगर इस पर भी शैतानी करनेवाले लोग हर चीज़ का इंकार करते
हैं, सिवाय अविश्वास करने के। (99)
[ऐ
रसूल] कह दें, "अगर कहीं मेरे रब की रहमत [दयालुता] के ख़ज़ाने तुम्हारे
अधिकार में होते, तो ख़र्च हो जाने के भय से तुम उसे रोके ही रखते: वास्तव
में इंसान है ही बड़ा तंग दिल! (100)
(बहुत पहले) हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दी थीं--- इसराईल की सन्तान से पूछ लो। जब मूसा [Moses] (मिस्र के लोगों के पास) आया, तो फ़िरऔन [Pharaoh] ने उससे कहा, "ऐ मूसा! मुझे लगता है कि किसी ने तुम पर जादू कर दिया है।" (101)
मूसा ने कहा, "तुम अच्छी तरह से जानते हो कि स्पष्ट सबूत के
तौर पर ऐसी निशानियाँ तो केवल आसमानों और ज़मीन का रब ही भेज सकता है। और ऐ फ़िरऔन!
मुझे लगता है कि तुम्हारी बर्बादी बस आने ही वाली है।" (102)
अत: फ़िरऔन यह चाहता था कि
उन (इसराईल की संतानों) को उस ज़मीन से उखाड़ फेंके, मगर हमने उसे और जो उसके साथ थे, सभी को (समंदर में) डुबा दिया, (103)
उसके मरने के बाद, हमने इसराईल की सन्तान से कहा था, "तुम इस ज़मीन पर बस जाओ, और जब आख़िरत [परलोक/ Hereafter] का वादा पूरा हो जाने का समय आ जाएगा, तो हम तुम सबको इकट्ठा हाज़िर कर देंगे।"
(104)
हमने क़ुरआन को सच्चाई के साथ उतार भेजा, और सच्चाई के साथ ही वह आयी है--- और [ऐ रसूल] हमने आपको केवल इसलिए भेजा ताकि आप (ईमान व अच्छे कर्मों के नतीजे की) ख़ुशखबरी सुना दें और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे दें---- (105)
यह (क़ुरआन) एक पढ़कर
सुनाने की चीज़ है, जिसे हमने अलग अलग हिस्सों में उतारा है, ताकि आप ठहर-ठहरकर इसे लोगों को पढ़कर सुना
सकें; (यही वजह है कि) हमने इसे थोड़ा-थोड़ा करके उतारा है। (106)
[ऐ
रसूल] कह दें, "तुम इस (क़ुरआन) पर विश्वास करो या न करो, मगर जिन लोगों को पिछली किताबों का ज्ञान
दिया गया था, उनके सामने जब इसे पढ़कर सुनाया जाता है, तो वे मुँह के बल सज्दे में गिर पड़ते हैं, (107)
और पुकार उठते हैं, "महान है हमारा रब! हमारे रब का वादा इसीलिए
था कि पूरा हो जाए।" (108)
वे रोते हुए चेहरों के बल
गिर जाते हैं, और सच्चाई की बातें [क़ुरआन] उनकी विनम्रता [humility] को और बढ़ा देती है। (109)
(उनसे)
कह दें, "तुम उसे 'अल्लाह' के नाम से पुकारो या 'रहम करनेवाले रब' [रहमान] के नाम से--- चाहे किसी भी नाम से उसे
पुकारो, उसके सारे नाम अच्छे और ख़ूबीवाले हैं।" और [ऐ रसूल]
अपनी नमाज़ न बहुत ऊँची आवाज़ में पढ़ें, और न बहुत धीमी आवाज़ में, बल्कि इन दोनों के बीच की आवाज़ को अपनाएं (110)
और कहें, "तारीफ़ें तो अल्लाह के लिए हैं, जिसकी न तो कोई औलाद है और न उसकी हुकूमत में
कोई उसका सहभागी [partner] है। वह इतना कमज़ोर नहींं कि उसे अपने बचाव के लिए किसी
सहारे की ज़रूरत हो। उसकी बेहिसाब महानता का बखान बुलंद आवाज़ में करें!” (111)
नोट:
1: इस आयत में मेराज की घटना की तरफ़ इशारा है, जो मुहम्मद (सल्ल) के साथ मक्का से (मदीना
को) हिजरत करने के क़रीब एक या दो साल पहले हुई थी। बताया जाता है कि एक रात
फ़रिश्ता जिबरईल (अलै.) मक्का में आए और मुहम्मद साहब को एक घोड़े जैसे जानवर
[बुराक़] पर बैठाकर बिजली की सी रफ़्तार से काबा से येरुशलम में स्थित "बैतुल मक़दिस" ले गए, इस सफ़र को "इसरा" कहते हैं। फिर मेराज का आसमानी सफ़र वहाँ से
शुरू हुआ, जिबरईल आपको
सातों आसमानों पर ले गए, हर आसमान पर
आपकी मुलाक़ात पिछले पैग़म्बरों में से किसी पैग़म्बर से हुई, उसके बाद जन्नत में स्थित एक बड़े से बेर के
पेड़ [सद्र्तुल मुंतहा] के पास ले गए, वहाँ आपको अल्लाह से सीधे-सीधे बातचीत करने
का मौक़ा मिला, इसी अवसर पर
अल्लाह ने आपके मानने वालों पर पाँच वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ कीं, फिर रात ही रात में आप वापस मक्का चले आए। इस
मेराज के सफ़र का ज़िक्र सूरह नज्म (53: 13-18) में आया है। यह अल्लाह की तरफ़ से एक
चमत्कारिक निशानी थी। ज़्यादातर विद्वान मानते हैं कि यह सफ़र मुहम्मद (सल्ल) ने
जागती हालत में किया था, और यह Physical अनुभव था, जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि यह अनुभव उनको
ख़्वाब में दिखाया गया था
और पूरा अनुभव असल में Spiritual था।
5: असल मेंं इतिहास में कई बार येरूशलम तहस-नहस
हो चुका है, और क़ुरआन ने
जो दो घटनाओं का उल्लेख किया है, उसे पूरे यक़ीन से बता पाना मुश्किल है।
ज़्यादातर विद्वानों ने बताया है कि जब इसराइलियों ने तोरात के आदेशों से हटकर
मनमानी शुरू कर दी और नाफ़रमानी करने लगे, यहाँ तक कि कुछ नबियों का क़त्ल कर दिया, तब बाबिल [Babylon] के बादशाह
बख़्त नसर [Nebudchadnezzar] ने इसराइलियों पर सन 586 ई.पू. में हमला करके
शहर की ईंट से ईंट बजा दी थी, और बैतुल मक़दिस को भी तोड़ डाला, हज़ारों लोगों
का सार्वजनिक क़त्ल किया और जो ज़िंदा रह गए थे, उन्हें गिरफ़्तार करके फिलिस्तीन से बाबिल ले
गया था जहाँ लम्बी अवधि तक वे ग़ुलाम बनाकर रखे गए थे।
6: काफ़ी साल बख़्त नसर की ग़ुलामी में रहने के बाद
अल्लाह ने उन पर इस तरह रहम किया कि ईरान के बादशाह साइरस ने सन 539 ई.पू. बाबिल पर
हमला करके उसे जीत लिया, इस मौक़े पर
उसे यहूदियों की हालत पर तरस आया और उसने उनको आज़ाद करके दोबारा फ़िलिस्तीन में
बसने की अनुमति दे दी, इस तरह वे
दोबारा ख़ुशहाल हो गए। मगर फिर धीरे-धीरे जब बुरे कर्मों में डूब गए तो दूसरी घटना
घटी।
7: कुछ विद्वान दूसरी चेतावनी को यहूदी राजा
हेरोड [Herod] द्वारा हज़रत यह्या [John, the Baptist] के क़त्ल से
जोड़ते हैं, उस समय यह इलाक़ा रोमन साम्राज्य के क़ब्ज़े में
था। उस ज़माने में (सन 70 ई.) रोम के शाह तयतूस [Titus] का हमला हुआ
था, जिसमें
यहूदियों को बड़ा भारी नुक़सान उठाना पड़ा था, और उसने बैतुल मक़दिस
को भी तोड़-फोड़ दिया था।
11: इंसान ग़ुस्से और झुंझलाहट में अक्सर ऐसा
करता है।
13: इंसान को इस दुनिया में अपनी मर्ज़ी से
कर्म करने की पूरी आज़ादी दी गयी है, मगर इंसान अपनी मर्ज़ी से वही काम करता है जो
उसकी क़िस्मत में पहले से लिख दिया गया है, इस तरह, अल्लाह को लोगों के कर्मों की जानकारी पहले
से ही होती है।
31: देखें 81: 8-9.
33: किसी बेगुनाह का अगर क़त्ल हुआ है तो उसके
वारिस यानी नज़दीकी रिश्तेदार को हक़ होगा कि वह बदले में अदालती कार्र्वाई के बाद
क़ातिल को क़त्ल करे या करवाए [क़सास] ....... जान लेते समय ज़्यादती का मतलब यह भी है
कि क़ातिल को छोड़कर किसी और का क़त्ल किया जाए, या क़ातिल के साथ दूसरों का भी क़त्ल किया जाए।
उसके हाथ-पाँव या किसी दूसरे अंगों को काटना या क़त्ल करने के लिए कोई ज़्यादा तकलीफ़
पहुँचानेवाला तरीक़ा अपनाना भी ग़लत है।
34: यह किसी यतीम [अनाथ] के रिश्तेदारों और ख़ास
करके उसकी देख-रेख करनेवालों को कहा जा रहा है कि उनके माल का कोई ऐसा उपयोग़ न
करें जिससे कि उस अनाथ को कोई घाटा पहुँचे। देखें 4: 2.
40: अरब के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ
समझते थे, उनके यहाँ
बेटियों का पैदा होना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी, और वे अपने लिए बेटे की ही तमन्ना करते थे, बल्कि कुछ क़बीले में बेटी को ज़िंदा गाड़ देते
थे। देखें 16:57-62.
45: ऐसे लोग इस दुनिया की ज़िंदगी और उसके फ़ायदे
में इतने मगन होते हैं कि सच्चाई पाने की उनके अंदर कोई तलब भी नहीं होती, बल्कि वे केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते
सच्चाई के विरोधी हो जाते हैं, और इस तरह वे सच्चाई को देखने-सुनने से वंचित
हो जाते हैं।
48: यानी कभी शायर, कभी बातें गढ़नेवाला, कभी दीवाना और कभी जादूगर कहते हैं।
53: देखें 16: 125; 29: 46.
55: देखें 4: 163-166.
59: जिन लोगों को कोई जानकारी नहीं है, उनकी तरफ़ से निशानियों की माँग के लिए देखें 2:118
60: मेराज के मौक़े पर (17:1) जो क़ुदरत की
निशानियाँ दिखायी गयीं, उस पर विश्वास
करना तो दूर मक्का के लोगों ने मज़ाक़ उड़ाते हुए हर बात को रद्द कर दिया, उनलोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से बैतुल-मक़दिस के
बारे में बहुत से सवाल पूछे जिसका उन्होंने ठीक-ठीक जवाब भी दे दिया, इसके बावजूद वे ज़िद्द और हठधर्मी पर अड़े
रहे।..... .. इसी तरह जहन्नम के पेड़ ज़क़्क़ूम के पेड़ के बारे में (37: 62-65) भी
मज़ाक़ उड़ाते रहे कि जहन्नम की आग
से भला यह पेड़ कैसे पैदा हो सकता है। ज़क़्क़ूम के पेड़ के लिए देखें सूरह वाक़िया (56:
52), सूरह दुख़ान (44: 43-46).
64: आवाज़ से बहकाने का मतलब यह हो सकता है कि
आदमी के दिलों में गुनाह करने का विचार बैठा देता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि
इसका मतलब गाने-बजाने की आवाज़ से है जिससे शैतान लोगों को बहका देता है। .......
जब आदमी अपने माल व औलाद का ग़लत इस्तेमाल करता है, तो वह एक तरह से शैतान को अपना हिस्सेदार बना
लेता है।
71: लीडरों को अपनी उम्मत की गवाही देने के
लिए बुलाया जाएगा, देखें सूरह नह्ल (16: 89) ....... दाएं हाथ
में कर्मों का लेखा-जोखा दिए जाने के बारे में देखें सूरह हाक़्क़ा (69: 19-24)
73: मक्का के बुतपरस्तों ने मुहम्मद (सल्ल)
को उपदेश देने से रोकने के लिए कई तरह के तरीक़े अपनाए थे, जैसे ये कहा
कि हम आपके अल्लाह के सामने सिर झुका देंगे अगर आप भी हमारे देवी-देवता के आगे झुक
जाएं, या कुछ लोगों ने उन्हें काफ़ी धन-दौलत देने, उनको अपना
सरदार मान लेने आदि का भी प्रलोभन दिया।
76: क़ुरैश के लोगों ने मुसलमानों को मक्का से
ज़बरद्स्ती नहीं निकाला था, बल्कि उन
लोगों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उनके अत्याचार से तंग आकर मुसलमान धीरे-धीरे
ख़ुद ही वहाँ से निकल गए थे। अगर उन लोगों ने ताक़त के ज़ोर पर मुसलमानों को निकाला
होता, तो अल्लाह की
तरफ़ से यातना आ जाती और सब बर्बाद हो गए होते, जैसा कि पहले रसूलों की क़ौम के साथ होता रहा
था। इस तरह वे बर्बाद तो हुए, मगर कुछ समय के बाद।
78: सूरज के ढलने से लेकर रात तक चार नमाज़ें हुईं
और सुबह की नमाज़ का अलग से बयान है। सुबह की नमाज़ में क़ुरआन का पढ़ा जाना फ़रिश्तों
द्वारा ख़ास करके देखा जाता है।
79: यहाँ "तहज्जुद" की नमाज़ का ज़िक्र है जो मुहम्मद (सल्ल) पर
फ़र्ज़ थी, जबकि आम
मुसलमानों को इसे पढ़ना ज़रूरी नहीं था। ...... "पसंदीदा दर्जे" से मतलब मुहम्मद (सल्ल) का वह ख़ास दर्जा
जिसके मुताबिक़ क़यामत के दिन उन्हें अपने समुदाय [उम्मत] के लोगों के लिए अल्लाह के
सामने सिफ़ारिश करने की अनुमति होगी।
80: यह एक दुआ है जो उस समय उतरी जब अल्लाह का
आदेश हुआ कि मुसलमानों को अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के कारण मक्का से बाहर निकल
जाना चाहिए और हिजरत करके मदीना पहुंच कर वहाँ अपना ठिकाना बनाना चाहिए, और यह क़दम सच्चाई को बचाने की ख़ातिर किया
जाए।
81: मक्का छोड़कर जाते समय यह ख़ुशख़बरी दी गयी है
कि बहुत जल्द सच की जीत होगी और झूठ मिट जाएगा, सो उसके आठ (8) साल बाद यानी सन 630 ई. में मक्का
पर मुसलमानों की जीत हुई और झूठ को पूरी तरह मिटा दिया गया।
85: असल में यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) से रूह के बारे
में पूछा था।
94: इससे पहले भी अल्लाह ने हमेशा किसी आदमी को
ही अपना संदेश पहुँचाने के लिए चुना था जो कि लोगों के हालात समझते हुए उनको सही
रास्ता दिखा सके।
101: ये निशानियाँ फ़िरऔन और मिस्रवालों के लिए थी
जिसका वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 130-33) और सूरह नम्ल (27:
12) में भी आया है। दो निशानियाँ तो मूसा (अलै.) की लाठी, और उनका चमकता हुआ हाथ हुए, फिर एक के बाद एक सात (7) निशानियाँ आयीं---- अकाल, पैदावार में कमी, तूफ़ान, टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार, और पानी में ख़ून।
कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ निशानियों से मतलब
आदेश से है जो एक हदीस में बयान हए हैं: अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को
साझेदार न ठहराना, चोरी न करना, अशलील काम (बलात्कार) न करना, नाहक़ किसी को क़त्ल न करना, किसी पर झूठा इल्ज़ाम लगाकर उसे सज़ा के लिए
पेश करना, जादू न करना, सूद न खाना, शरीफ़ औरतों पर झूठे लांछन न लगाना, और सच की लड़ाई में पीठ दिखाकर न भाग जाना।
107: जिन (यहूदी और ईसाई) लोगों को पिछली किताबों
यानी तोरात और इंजील का ज्ञान दिया गया था, उनमें से कुछ तो क़ुरआन सुनकर तुरंत विश्वास
कर लेते थे, क्योंकि उनकी
किताबों में जिस नबी के आने की ख़बर दी गयी थी, उन्हें वे पहचान लेते थे।
110: अरब के लोग "अल्लाह" के नाम से तो अच्छी तरह परिचित थे, मगर अल्लाह के "रहमान" नाम को नहीं जानते थे। जब मुसलमान "या अल्लाह, या रहमान" कहकर दुआ करते, तो मक्का के लोग मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाते थे
कि एक तरफ़ तो ये लोग एक ही ख़ुदा को मानते हैं और दूसरी तरफ़ दो दो ख़ुदाओं को पुकार
रहे हैं।
उप समूह – I
सूरह 43: अज़-ज़ुख़रुफ़
[सोने के ज़ेवरों से सजावट / Ornaments of Gold]
यह एक मक्की
सूरह है जिसका नाम आयत 35 में वर्णन किए गए "सोने के ज़ेवरों" पर रखा गया है, और फिर आयत 53 में भी इस ओर
इशारा है: दोनों ही जगहों पर अल्लाह ने विश्वास न करने वालों के इस दावे को ख़ारिज
किया है जिसके मुताबिक़ असली पैग़म्बर अमीर या धनवान होना चाहिए। इस सच्चाई पर
बार-बार ज़ोर दिया गया है कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ नहीं होते, बल्कि वे अल्लाह के आज्ञाकारी बंदे होते हैं
(15-20; 60). इसी तरह, ईसा (अलै) को "ख़ुदा का बेटा" मानने की परिकल्पना को भी साफ़ तौर से रद्द
किया गया है (57-59). बहुदेववादियों
की भी यह मान्यता थी कि ज़मीन और आसमान को पैदा करने वाला अल्लाह ही है, मगर इसके बावजूद अपनी इबादतों में वे अपने
देवी-देवताओं को भी अल्लाह के साथ शरीक करते थे, जिसके लिए उन्हें चेतावनी दी गई है।
विषय:
02-04: यह क़ुरआन अरबी
में है
05-08: पिछली पीढ़ियों
को सज़ा: एक चेतावनी
09-15: विश्वास न
करनेवाले एक तरह की [consistent] बात नहीं करते
16-25: अल्लाह की
बेटियाँ नहीं हैं
26-28: इबराहीम (अलै)
की मिसाल
29-30: रसूल की सच्ची
बात ठुकरा दी गई
31-35: अल्लाह जिसे
(रसूल बनाना) चाहे, उसे चुन लेता
है
36-39: विश्वास न
करने पर अड़े रहने से होने वाला ख़तरा
40-45: रसूल का
उत्साह बढ़ाना
46-56: मूसा (अलै.)
और फ़िरऔन की कहानी
57-65: ईसा (अलै) की
कहानी पर एतराज़ करना
66-78: कर्मों का
हिसाब-किताब
79-80: अल्लाह से कोई
भी चीज़ छिपी नहीं है
81-89: अल्लाह का कोई
बेटा नहीं है
अल्लाह के नाम से
शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हा॰ मीम॰ (1)
क़सम है उस
किताब की जो चीज़ों को (साफ़ व) स्पष्ट करती है, (2)
हमने इस
क़ुरआन को अरबी भाषा में बनाया है ताकि तुम (लोग) समझ सको। (3)
बेशक हमारे
पास रखी हुई ‘मूल किताब’ [लौह ए महफ़ूज़/Preserved
Tablet] में इस
[क़ुरआन] का बहुत ऊँचा स्थान है, और यह गहरी समझ-बूझ की बातों से भरी हुई है। 4)
क्या हम
तुम्हें नज़रअंदाज़ कर दें, और जो नसीहतें
(क़ुरआन में) उतारी जा रही हैं, वह तुम पर से हटा लें, इसलिए कि तुम मर्यादाहीन लोग हो? (5)
हमने पहले के
लोगों के पास कितने ही रसूल भेजे (6)
और उन लोगों
ने हर एक रसूल का मज़ाक़ उड़ाया; (7)
अन्ततः हमने
उन लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया जो उन [मक्का के काफ़िरों] से ताक़त में कहीं
अधिक थे और पहले के लोगों की मिसालें इतिहास में गुज़र चुकी हैं। (8)
अगर आप [ऐ
रसूल], उनसे पूछें कि "आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "उन्हें ज़बरदस्त ताक़त [प्रभुत्व] वाले, सब कुछ जाननेवाले [रब] ने पैदा किया।" (9)
वही है जिसने
तुम्हारे लिए धरती को एक-बराबर (बिछौने जैसा) कर दिया औऱ उसमें तुम्हारे लिए
रास्ते बना दिए, ताकि तुम अपना
रास्ता ढूंढ सको। (10)
जो आसमान से
(ज़रूरत के मुताबिक़) एक अन्दाज़े से पानी उतारता है --- हम उसके द्वारा मुर्दा ज़मीन
को ज़िंदा कर देते हैं, ठीक इसी तरह, तुम्हें भी क़ब्रों से (ज़िंदा करके) निकाला
जाएगा---- (11)
उसने हर तरह
की चीज़ों के जोड़े बनाए, तुम्हें वे
नौकाएँ (व जहाज़) और जानवर प्रदान किए, जिन पर तुम (पानी व धरती पर) सवार होते हो, (12)
ताकि तुम जब
उन पर बैठकर सवारी करो, तो अपने रब की
नेमतों को याद करो और कहो, "कितना महिमावान है वह जिसने इन (सवारियों) को हमारे वश में कर दिया; वरना हममें यह ताक़त नहीं थी कि उसे क़ाबू में
कर सकते (13)
और इसमें शक
नहीं कि हम अपने रब की ओर लौटकर जानेवाले हैं।" (14)
इसके बावजूद, उन (मक्का के बहुदेव-वादियों) ने अल्लाह के
अपने बन्दों में से (फ़रिश्तों को) उसकी औलाद [बेटी] ठहरा दिया! हक़ीक़त यह है कि
आदमी बिल्कुल भी शुक्र अदा नहीं करता! (15)
भला क्या
अल्लाह ने अपने लिए तो बेटियाँ पसंद की हैं और तुम्हें चुन लिया है बेटों के लिए? (16)
मगर हाल यह है
कि जब उनमें से किसी को (बेटी पैदा होने की) ख़ुशख़बरी सुनायी जाती है, जबकि उस (बेटी) को इन लोगों ने अपने रहम
करनेवाले रब [रहमान] के साथ जोड़ रखा है, तो उसका चेहरा काला पड़ जाता है और वह दुख में
घुटता रहता है---- (17)
(इस्लाम आने के
पहले ऐसा माना जाता था..) “(लड़की) वह है जो सोने-चाँदी के ज़ेवरों के बीच पले-बढ़े और जो वाद-विवाद में अपनी
कोई बात ठीक ढंग से खुलकर रख भी न पाए”? (18)
फ़रिश्तों को, जो रहम करनेवाले रब के बन्दे होते हैं, वे महिला मानते हैं। क्या वे उनकी रचना के
समय मौजूद थे? उनके दावों को
लिख लिया जाएगा, और उनसे इस
बारे में (क़यामत के दिन) पूछताछ होगी। (19)
वे कहते हैं कि "यदि रहम करने वाला रब [रहमान] चाहता, तो हमने उन (बुतों/फरिश्तों) की पूजा न की होती," मगर सच्चाई यह है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी
नहीं है; वे तो बस अटकल से
काम ले रहे हैं----- (20)
या क्या हमने इस
किताब से पहले उनको कोई किताब दी थी जिसे यह थामे बैठे हैं? (21)
बिल्कुल नहीं!
बल्कि वे कहते हैं, "हमने तो अपने
बाप-दादाओं को इसी परम्परा पर चलते हुए पाया; हम तो उन्हीं के क़दमों के निशान पर चलते हुए सही
मार्ग पर जा रहे हैं।" (22)
[ऐ रसूल] हमने आपसे
पहले जब भी किसी बस्ती में सावधान करने के लिए कोई रसूल भेजा, तो वे लोग जो दौलत के नशे में बिगड़े हुए थे, उन लोगों ने भी वही कहा था कि "हमने तो अपने बाप-दादा को इसी परम्परा पर चलते
हुए देखा है; और हम उन्हीं के
पद-चिन्हों पर चलते हुए सही मार्ग पर जा रहे हैं।" (23)
रसूल ने कहा, "अगर मैं तुम्हारे बाप-दादा की परम्पराओं से
ज़्यादा सही मार्गदर्शन तुम्हारे लिए लेकर आऊँ, तो क्या तब भी तुम अपने बाप-दादा के ही रास्ते पर
चलोगे?" उन्होंने जवाब में
कहा, "तुम्हें जो संदेश
देकर भेजा गया है, हम उसे मानने से
इंकार करते हैं।" (24)
अन्ततः हमने
उन्हें दंड दिया: आप सोचें कि किस तरह सच्चाई से इंकार करने वाले अपने अंत को
पहुँचे। (25)
याद करें, जबकि इबराहीम [Abraham] ने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा था, "तुम जिनको पूजते हो, उन्हें मैं त्याग चुका हूँ; (26)
मैं केवल उसी की
इबादत करता हूँ जिसने मुझे पैदा किया, और वही मुझे सही मार्ग दिखाएगा," (27)
और इबराहीम इन
बातें को अपनी संतानों के लिए वसीयत में छोड़ गया, ताकि वे (केवल अल्लाह की ओर) लौट सकें। (28)
मैंने उन
लोगों को और उनके बाप-दादा को लम्बे जीवन का सुख उठाने दिया, और अब मैंने उन्हें 'सच्ची बात' [क़ुरआन] और एक रसूल दिया है, ताकि वह चीज़ों को साफ़-साफ़ समझा सकें--- (29)
फिर जब वह 'सच्ची बात' उनके पास पहुँच गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो जादूगरी है। हम इसमें विश्वास नहीं
करते हैं," (30)
और कहने लगे, "इस क़ुरआन को इन दो शहरों [मक्का या तायफ़] के
किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं उतारा गया?" (31)
(रसूलों को
चुनना तो अल्लाह की रहमत है) तो भला क्या वे लोग आपके रब की रहमत [grace] को (अपने हिसाब से) बाँट सकते हैं? सांसारिक जीवन में उनकी रोज़ी-रोटी के साधन
हमने ही उनके बीच बाँट रखे हैं, और हमने ही उनमें से कुछ लोगों को श्रेणियों
में दूसरे लोगों से ऊँचा रखा है, ताकि वे एक-दूसरे से काम ले सकें: आपके रब की
रहमत तो उस [दौलत] से कहीं अच्छी है जिसे वे जमा कर रहे हैं। (32)
अगर इस बात की
सम्भावना न होती कि सारी मानव-जाति [विश्वास न रखनेवाले-- काफ़िरों की] एक समुदाय
हो जाएगी, तो जो लोग रहम
करनेवाले रब [रहमान] को मानने से इंकार करते हैं, उनके लिए हम उनके घरों की छतें चाँदी की कर
देते, और सीढ़ियाँ
भी जिनपर वे चढ़ते हैं, (33)
और घरों के
दरवाज़े भी (चाँदी के कर देते) और वे तख़्त भी जिन पर वे तकिया लगाकर बैठते हैं, (34)
और बल्कि सोने
के ज़ेवर (से सजा देते)। मगर सच्चाई यह है कि यह सब चीज़ें तो बस इसी सांसारिक जीवन
के सुख व मज़े के सामान हैं; और आपके रब ने आने वाली दुनिया (के सुखों) को
उन लोगों के लिए रखा है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाए रखते
हैं। (35)
जो कोई भी
दयालु रब [रहमान] के ज़िक्र या उसकी याद से मुँह मोड़ता है, हम उसपर एक शैतान नियुक्त कर देते हैं, जो उसका साथी बन जाता है: (36)
औऱ ये शैतान, लोगों को सीधे मार्ग से रोकते रहते हैं, जबकि (इंकार करनेवाले) यह समझते हैं कि वे
ठीक मार्ग पर हैं, (37)
यहाँ तक कि जब
ऐसा आदमी हमारे पास आएगा, तो (अपने
शैतान साथी से) कहेगा, "ऐ काश, मेरे और तेरे
बीच इतनी दूरी होती जितनी पूरब और पश्चिम के दोनों किनारों में होती है, तू तो बहुत ही बुरा साथी निकला!" (38)
(उन लोगों से
कहा जाएगा) “तुम ने ग़लत
काम किया है, और आज यह बात
तुम्हें कुछ भी राहत न पहुँचा सकेगी कि यातना में तुम एक-दूसरे के साझेदार [Partner] हो।” (39)
तो क्या [ऐ
रसूल] आप किसी बहरे को सुना सकते हैं? या उन्हें रास्ता दिखा सकते हैं जो अंधे हों
या जो पूरी तरह से भटक चुके हों? (40)
अब तो यह होगा
कि या तो हम आपको दुनिया से उठा लें और उन्हें दंड दें--- और वह तो हम ज़रूर देकर
रहेंगे --- (41)
या हम आपके
सामने ही उनको वह सज़ा दें, जिसकी धमकी
हमने उन्हें दे रखी है; वे पूरी तरह
से हमारे क़ाबू में हैं। (42)
अतः आप पर जो 'वही'
[revelation] उतारी गयी है
उसको मज़बूती से थामे रहें --- आप सचमुच सीधे मार्ग पर हैं--- (43)
क्योंकि यह (क़ुरआन), आपके लिए और आपकी क़ौम के लिए भी सचमुच एक
याद दिलाने वाली चीज़ [reminder] है: तुम सबसे (इस पर अमल करने के बारे में)
पूछा जाएगा। (44)
आप से पहले
हमने जो भी रसूल भेजे, उनसे पूछ लें: “क्या हमने कभी भी रहम करनेवाले रब [रहमान] को
छोड़कर, किन्हीं
देवताओं [gods] को पूजने के
लिए नियुक्त किया था?” (45)
और (देखो!), हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, तो उसने जाकर कहा, "मैं सचमुच सारे संसार के रब का रसूल हूँ।" (46)
लेकिन जब उसने
हमारी निशानियाँ उनके सामने पेश कीं, तो वे लगे उन (निशानियों) की हँसी उड़ाने, (47)
हालाँकि हमने
उन्हें जो भी निशानी दिखायी, उसमें हर एक निशानी पिछली वाली से बढ़-चढ़कर
थी। हमने उन्हें कड़ी यातना में भी डाला, ताकि वे सीधे रास्ते पर लौट सकें। (48)
वे (यातना
देखकर मूसा से) कहने लगते, "ऐ जादूगर! तेरे रब ने तुझ से जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उस आधार पर अपने रब से हमारे लिए दुआ कर दो:
निश्चय ही हम (तुम्हारे मार्गदर्शन में) सीधे मार्ग पर आ जायेंगे, " (49)
फिर जैसे ही
हम उन पर से यातना हटा देते, पल भर में वे प्रतिज्ञा तोड़ डालते थे। (50)
फ़िरऔन ने
अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मिस्र की सल्तनत
मेरी नहीं? और ये नदियाँ
जो मेरे (महलों के) नीचे बहती हैं, क्या यह मेरी नहीं? तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता? (51)
क्या मैं इस
तुच्छ व गिरे हुए आदमी [मूसा] से बेहतर नहीं हूँ जो अपनी बात साफ़-साफ़ बोल भी नहीं
पाता? (52)
(यदि यह अल्लाह
का भेजा हुआ रसूल है, तो) फिर उसके
लिए सोने के कंगन क्यों नहीं दिए गए (जिसे यह पहनकर आता)? या फ़रिश्तों का दल उसकी अगुवाई में यहाँ साथ
क्यों नहीं आया?" (53)
इस तरह, उसने अपनी क़ौम के लोगों को (अपनी बातों से)
मोह लिया, और उन्होंने
उसकी बात मान ली --- सचमुच वे
भ्रष्ट [perverse] लोग थे। (54)
अन्ततः जब
उन्होंने (मूसा की बात न मानकर) हमें अप्रसन्न कर दिया, तो हमने उन्हें सज़ा दी और उन सबको दरिया में
डुबो दिया: (55)
इस तरह, हमने उन्हें एक गुज़री हुई चीज़ बना डाला और
आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदाहरण [Example] बना दिया। (56)
और जब मरयम के
बेटे [ईसा/Jesus] की मिसाल दी
जाती है, तो उसपर [ऐ
रसूल] आपकी क़ौम के लोग हँसते हैं, चिल्लाकर व्यंग्य करते हैं, (57)
और कहते हैं, "हम जिन (फ़रिश्तों) को (अल्लाह की बेटी मानते
हुए) पूजा करते हैं, वे बेहतर हैं
या वह (ईसा, जिन्हें ईसाई
अल्लाह का बेटा मानते हैं)?"--- वे केवल आपको चुनौती देने के लिए उनका उदाहरण
देते हैं: वे बड़े ही झगड़ालू लोग हैं ---- (58)
वह [ईसा मसीह]
तो बस एक बंदे हैं, जिन पर हमने
अपना ख़ास करम [favour] किया था और
हमने उनको इसराईल की सन्तानों के लिए एक नमूना बनाया था: (59)
अगर हमारी ऐसी
इच्छा रही होती, तो (ठीक वैसे
ही जैसे ईसा को बिना बाप के पैदा किया था), हम तुममें से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती पर एक दूसरे के उत्तराधिकारी होते। (60)
वह [क़ुरआन या
ईसा का दोबारा आना] क़यामत की घड़ी की जानकारी देता है: अतः तुम उसके बारे में
संदेह न करो। मेरी बात मानो कि यही सीधा रास्ता है; (61)
और (देखो!)
ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें कहीं उस रास्ते से रोक दे, क्योंकि वह तुम्हारा पक्का दुश्मन है। (62)
जब ईसा स्पष्ट
निशानियों के साथ आए, तो उन्होंने
(लोगों से) कहा, "मैं तुम्हारे
पास ज्ञान व समझदारी की बातें लेकर आया हूँ; मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे कुछ मतभेदों को भी
दूर करने आया हूँ। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और मेरी बात मान लो: (63)
अल्लाह ही
मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, तो उसी की बन्दगी करो: यही सीधा मार्ग है।" (64)
इसके बावजूद
उनमें से कई गुट आपस में एक दूसरे से सहमत न हुए -– तबाही है
शैतानी करने वालों की: वे एक दर्दनाक दिन की यातना को झेलेंगे! (65)
ये लोग किस
बात का इंतज़ार कर रहे हैं, क्या उस
(क़यामत की) घड़ी का, जो अचानक उन
पर आ पड़ेगी और उन्हें उसकी ख़बर तक न होगी? (66)
उस दिन सभी
दोस्त एक-दूसरे के दुश्मन होंगे, मगर नेक व बुराइयों से बचनेवाले [मुत्तक़ी]
लोगों को छोड़कर ---- (67)
(मुत्तक़ी लोगों
के बारे में कहा जायेगा) "ऐ मेरे बन्दों! आज तुम्हारे लिए न तो कोई डर होगा, और न तुम (किसी बात पर) दुखी होगे" ---- (68)
वे लोग
जिन्होंने हमारी आयतों (की सच्चाई) में विश्वास किया और पूरी भक्ति से अपने आपको
हमारे सामने झुकाया, (69)
[उनसे कहा
जाएगा], "तुम और
तुम्हारे जोड़ीदार [मर्द/औरत, spouses] दोनों, जन्नत के अंदर दाख़िल हो जाओ! : तुम ख़ुशी से
खिल उठोगे!" (70)
वहाँ [जन्नत
में] उनके आसपास सोने की प्लेटें और प्याले घुमाए जाते रहेंगे और, दिल जिस चीज़ की भी इच्छा करे और आँखे जिससे
ख़ुशी पाएँ, वह सब कुछ
मौजूद होगा।" वहाँ तुम
हमेशा के लिए रहोगे: (71)
यह है वह
जन्नत, जो तुम्हें
दिया जाता है, और अब से यह
तुम्हारा अपना हुआ, यह नतीजा है
उन कर्मों का जो तुम (दुनिया में) किया करते थे, (72)
तुम्हारे खाने
के लिए वहाँ बड़ी मात्रा में फल होंगे।" (73)
मगर शैतानियाँ
करने वाले लोग जहन्नम की यातना में हमेशा रहेंगे, (74)
जिससे कभी
उन्हें कोई राहत (छूट) नहीं दी जाएगी: वे उस में बेहद निराश पड़े रहेंगे। (75)
हमने उनपर कभी
कोई ज़ुल्म नहीं किया; असल में वे ही
ज़ुल्म करने वाले लोग थे। (76)
वे (जहन्नम के
फ़रिश्ते से) पुकारकर कहेंगे, "ऐ मालिक! अच्छा हो कि तुम्हारा रब हमारा काम
ही तमाम कर दे", मगर वह जवाब
देगा, "नहीं, तुम्हें तो इसी हाल में रहना है।" (77)
हम तुम्हारे
पास सच्चाई लेकर आए हैं, मगर तुममें से
अधिकतर लोग सच्चाई से नफ़रत करते हो। (78)
क्या इन
विश्वास न रखने वाले (काफ़िरों) ने कोई नयी चाल सोची है? अगर ऐसा है, तो हम भी (इनके ख़िलाफ़) प्लान बना रहे हैं। (79)
क्या वे सोचते
हैं कि हम उनकी छिपी बातें और उनकी कानाफूसी को सुन नहीं सकते? बिल्कुल सुन सकते हैं: हमारे भेजे हुए
(फ़रिश्ते) उनके नज़दीक ही हैं, वे हर बात लिखते रहते हैं।" (80)
[ऐ रसूल] आप कह
दें , "अगर रहम करनेवाले रब [रहमान] की (सचमुच) कोई
औलाद होती, तो सबसे पहले
मैं उनकी बंदगी करता, मगर ----- (81)
महिमा हो उसकी, जो आसमानों और ज़मीन का रब है, जो सिंहासन का स्वामी है--- वह उन बातों से
कहीं ऊपर है जो वे उसके बारे में ग़लत बयान करते रहते हैं!" (82)
[ऐ रसूल] आप
छोड़ दें उन्हें, ताकि वे
व्यर्थ की बहस में पड़े रहें और बेकार के खेलों में लगे रहें, यहाँ तक कि उनका सामना उस दिन से हो जाए
जिसका वादा उनसे किया जाता है। (83)
वही [अल्लाह]
है जो आसमानों में भी ख़ुदा है और धरती पर भी ख़ुदा है; वह (हर बात में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला, सब कुछ जाननेवाला है। (84)
बड़ी ऊँची शान
है उस [अल्लाह] की, जिसके क़ब्ज़े
में हर वह चीज़ है जो आसमानों में है, जो ज़मीन पर है और जो कुछ उन दोनों के बीच में
है; उसी के पास
(आने वाली क़यामत की) घड़ी की जानकारी है; और उसी के पास तुम सब को लौटकर जाना होगा। (85)
यह लोग उस
(अल्लाह) को छोड़कर जिन ख़ुदाओं को पुकारते हैं, उन्हें तो (अल्लाह से) पैरवी करने का भी कोई
अधिकार नहीं है, हाँ उन लोगों
की बात अलग है (जिन्हें अल्लाह ने ऐसा करने की अनुमति दी हो) जिन्होंने सच्ची बात
की गवाही दी, और उस
(सच्चाई) को पहचाना। (86)
और अगर आप [ऐ
रसूल] इन लोगों से पूछें कि उनको किसने पैदा किया है, तो वह अवश्य ही यह कहेंगे कि “अल्लाह ने।" इसके बावजूद कोई उन्हें कैसे बहका देता है? (87)
अल्लाह के
रसूल ने कहा कि, ”ऐ मेरे रब! यह
ऐसे लोग हैं जो (एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखते,” (88)
अत: [ऐ रसूल!]
आप इनकी परवाह ना करें और (उनसे हाथ जोड़कर) कह दें, ”सलामती हो!”: बहुत जल्द इन्हें ख़ुद पता चल जायेगा! (89)
नोट:
4: माना जाता है कि क़ुरआन शुरू से ही एक “सुरक्षित
पट्टिका” [लौह ए महफ़ूज़/ Preserved Tablet] में मौजूद थी, फिर उसे वहाँ से दुनिया के आसमान पर लाया गया, और फिर उसके बाद थोड़ा-थोड़ा करके मुहम्मद
(सल्ल) पर वह किताब उतारी गयी।
5: जो लोग मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ देते हैं, उन्हें भी अल्लाह सही मार्ग दिखाना चाहता है
और नसीहत करना नहीं छोड़ता।
12: एक तो ऐसी सवारियाँ हैं जिन्हें बनाने में इंसान का कोई
हाथ नहीं, यानी घोड़े, ऊँट जैसे चैपाए वाली सवारियाँ। ये जानवर वैसे
तो इंसानों से ज़्यादा ताक़तवर होते हैं, मगर उन्हें आदमी के वश में कर दिया गया है।
दूसरे तरह की कुछ सवारियाँ ऐसी हैं जिन्हें इंसान ने अपनी कला से बनाया है, जैसे नौका, जहाज़, रेल आदि, मगर देखा जाए तो इन्हें बनाने में भी जो
बुनियादी पदार्थ लगते हैं, और जैसी समझ-बूझ की ज़रूरत होती है, वह भी अल्लाह की ही देन है।
13-14: यह एक दुआ है जो सवारी पर बैठने के समय पढ़ी जाती है, आख़िर में इंसान को अपना अंतिम
सफ़र याद दिलाया गया है, जब उसे दुनिया छोड़कर अपने रब के पास लौटकर जाना होगा।
45: पहले के रसूलों से पूछने का मतलब यह है कि उन
पर जो आसमानी किताबें उतरी थीं, उनको देख लें कि उनमें लोगों के लिए क्या
शिक्षाएं दी गयी थीं।
48: यहाँ निशानियों का मतलब वह मुसीबतें हैं जो मिस्र के
लोगों पर बारी-बारी आयी थीं, यानी तूफ़ान, फिर टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार और पानी में ख़ून मिल जाना, जिसका वर्णन सूरह अ’राफ़ (7: 133-135) में आया है।
54: यहाँ फ़िरऔन और उसकी क़ौम के लोगों दोनों को गुनाहगार
बताया गया है। फ़िरऔन तो ज़ाहिर है कि अपने को ख़ुदा समझता था और अपनी क़ौम के लोगों
पर हर तरह के ज़ुल्म ढाता था, मगर साथ में उनके मन को मोहने में भी कामयाब था।
लेकिन उस क़ौम के लोग भी न केवल उसके ज़ुल्म सहते थे बल्कि उसके हर ग़लत काम को सही
मान भी लेते थे।
57: जब सूरह अंबिया (21: 98) में बहुदेववादियों से कहा गया
था कि अल्लाह को छोड़कर तुम लोग जिन्हें भी पूजते हो, सब जहन्नम का ईंधन बनेंगे। इसके जवाब में उन
लोगों ने शोर मचाया और व्यंग्य से कहा कि मान लिया कि हमारे देवता जहन्नम के ईंधन
हैं, पर ईसाई लोग जो हज़रत ईसा की पूजा करते हैं, तो क्या वह भी जहन्नम का ईंधन हैं, जबकि मुसलमान तो उन्हें अल्लाह का पैग़म्बर [Prophet] मानते हैं।
61: इस्लामी परम्परा के अनुसार ईसा (अलै.) अपनी
मौत नहीं मरे थे, बल्कि अल्लाह ने उन्हें उठा लिया था (4: 158), (3: 55). माना जाता है कि मुहम्मद (सल्ल) ने कहा था कि
हज़रत ईसा (अलै.) क़यामत के कुछ पहले दुनिया में दोबारा आएंगे, और यह क़यामत के आने की एक निशानी होगी।
79: मक्का के काफ़िर लोग मुहम्मद (सल्ल) की बढ़ती हुई
लोकप्रियता से घबराकर उन्हें गिरफ़्तार करने या क़त्ल कर देने की ख़ुफिया योजनाएं
बनाते रहते थे, जैसाकि सूरह अंफ़ाल (8: 30) में भी है।
सूरह 36: या-सीन [Ya Sin]
यह एक मक्की सूरह है जो इस
बात पर ज़ोर देती है कि क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से उतारी गई है और इस आरोप का खंडन
करती है कि यह किसी आदमी की लिखी हुई कोई कविताओं की किताब है (आयत 5-6; 69-70)। यहाँ अरब के उन लोगों को कड़ी चेतावनी दी गई
है जो बहुत ज़िद्दी और हठधर्म हैं, और हमेशा अल्लाह की आयतों का मज़ाक़ उड़ाते रहते
हैं, दोबारा ज़िंदा उठाए जाने पर विश्वास नहीं करते, उन्हें याद दिलाया गया है कि कैसे पिछली
पीढ़ियों पर यातना आ पहुँची थी। अल्लाह की सृष्टि में हर जगह उसकी ताक़त दिखायी देती
है, सूरह के अंत में क़यामत के दिन दोबारा उठाए
जाने पर कुछ मज़बूत दलीलें दी गई हैं।
विषय:
02-06: पैग़म्बर का मिशन
07-12: (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करने वालों के ख़िलाफ़
फ़ैसला हो चुका है
13-32: उदाहरण एक ऐसी बस्ती का जहाँ के लोगों ने रसूलों पर विश्वास
नहीं किया
33-44: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
45-50: विश्वास न करने वाले बहुत ज़िद्दी हैं
51-68: (सच्चाई पर) विश्वास रखने वाले और न रखने वाले दोनों का
अंजाम अलग-अलग
69-70: अल्लाह के रसूल शायर नहीं हैं
71-76: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
77-83: दोबारा ज़िंदा करके उठाए जाने पर ज़ोर
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
या॰ सीन॰
(1)
गहरी समझ-बूझ [हिकमत] से
भरे हुए क़ुरआन की क़सम, (2)
[ऐ
मुहम्मद] आप सचमुच भेजे गए पैग़म्बरों [messengers] में से एक हैं, (3)
बिल्कुल सीधे मार्ग पर, (4)
यह (क़ुरआन) उस रब की तरफ़
से उतारा जा रहा है जिसके क़ब्ज़े में सारी ताक़त है, और वह बहुत दया करने वाला है, (5)
ताकि आप ऐसे लोगों को
सावधान कर दें, जिनके बाप-दादा को सावधान नहीं किया गया था; इस कारण वे इन बातों को नहीं जानते हैं।
(6)
उनमें से अधिकतर लोगों के
ख़िलाफ़ फ़ैसला हो चुका है, क्योंकि उन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार कर
दिया है। (7)
(ऐसा
लगता है मानो) हमने उनकी गर्दनों में ठुड्डियों [chin] तक लोहे की ज़ंजीर बाँध दी हो, जिससे उनके सिर ऊपर की तरफ़ अकड़ गए हों, (8)
और हमने एक रोक [barrier] लगा दी हो, उनके आगे भी और उनके पीछे भी, और उनकी नज़रों को छेंक लिया हो: सो वे कुछ
देख नहीं सकते। (9)
आप
उन्हें चेतावनी दें या न दें, उनके लिए तो दोनों ही बराबर
है: वे (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करेंगे। (10)
आप तो बस ऐसे ही लोगों को
सावधान कर सकते हैं जो (क़ुरआन की) नसीहत पर चलते हों, और अपने दयालु रब का डर रखते हों, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते: ऐसे लोगों को
उनके गुनाहों की माफ़ी और एक बड़े इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दें। (11)
निस्संदेह हम-- मुर्दों को
दोबारा ज़िंदा करेंगे, और हम लिखते रहते हैं जो कुछ (कर्म) वे अपने आगे भेजते हैं, और साथ ही जो कुछ (अपने कर्मों के प्रभाव) वे
अपने पीछे छोड़ जाते हैं: हम एक स्पष्ट किताब में हर एक चीज़ का हिसाब-किताब रखते
हैं। (12)
[ऐ
रसूल] आप उनके सामने उन लोगों का उदाहरण बताएं जिनकी बस्ती में (अल्लाह का संदेश
लेकर) रसूल आए थे। (13)
हमने (शुरू में) दो रसूल [messengers] भेजे, मगर उन लोगों ने दोनों को मानने से इंकार कर
दिया। फिर हमने तीसरे (रसूल) के द्वारा उनकी ताक़त बढ़ायी, तब उन (रसूलों) ने कहा, "यक़ीन करो, हम तुम्हारे पास (अल्लाह का संदेश) लेकर आए
हैं।" (14)
उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो। रहम
करनेवाले रब ने कोई भी चीज़ नहीं भेजी है; तुम तो केवल झूठ बोल रहे हो।" (15)
उन (रसूलों) ने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी
ओर भेजे गए हैं (16)
और हमारी ज़िम्मेदारी तो
बस तुम तक संदेश पहुँचा देने की है।" (17)
वे जवाब में बोले, "हम तो तुम्हें अप-शगुन [evil omen] समझते हैं, यदि तुम नहीं माने तो हम तुम्हें पत्थर से
मारेंगे, और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दर्दनाक यातना
पहुँचेगी।" (18)
रसूलों ने कहा, "तुम्हारा अप-शगुन तो तुम्हारे अपने अंदर है।
तुमलोग इस चीज़ को अप-शगुन क्यों मानते हो, जबकि तुम्हें (सच्चाई की याद दिलाकर) चेताया
जा रहा है? असल में तुम लोग (गुनाहों में) बहुत दूर जा चुके हो!"
(19)
फिर शहर के दूसरे छोर से
एक आदमी दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इन रसूलों का कहना मान
लो। (20)
इनके बताए हुए रास्ते पर
चलो: वे तुम से कोई मज़दूरी तो नहीं मांग रहे हैं, और वे सीधे मार्ग पर हैं, (21)
और मैं उसकी बंदगी क्यों न
करूँ, जिसने मुझे पैदा किया? और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है। (22)
मैं उस (अल्लाह) को छोड़कर
दूसरे देवताओं को कैसे अपना ख़ुदा मान लूँ, जबकि अगर रहम करनेवाला ख़ुदा मुझे कोई तकलीफ़
पहुँचाना चाहे, तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कोई काम आ सकेगी और न तो वे मुझे
बचा ही सकेंगे? (23)
तब तो मैं साफ़ तौर से ग़लत
रास्ते में पड़ जाऊँगा। (24)
मैं तो आपके रब में
विश्वास करता हूं, अतः मेरी बात सुनो!" (25)
(अंतत:
बस्तीवालों ने शायद उसे शहीद कर दिया, तब अल्लाह की तरफ़ से) कहा गया, “दाख़िल हो जाओ जन्नत में!" उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग यह बात जान पाते (26)
कि किस तरह मेरे रब ने
मुझे माफ़ कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में शामिल कर लिया!" (27)
उसके बाद उसकी क़ौम पर
हमने आसमान से कोई सेना नहीं उतारी और न हमें उतारने की कोई ज़रूरत थी: (28)
वह तो केवल एक ज़ोरदार
आवाज़ थी जिससे वे बेजान होकर गिर गए! (29)
अफ़सोस है मनुष्य जाति पर! जब
कभी कोई रसूल उनके पास आया, वे उसका मज़ाक़ ही उड़ाते रहे। (30)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि
उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हमने तबाह-बर्बाद कर दिया, जिनमें से कोई भी अब कभी लौटकर उनके पास आने वाला
नहीं है? (31)
मगर यह सबके सब लोग हमारे
सामने इकट्ठा करके हाज़िर किए जाएँगे। (32)
और (देखो!) उनके लिए एक निशानी
तो वह ज़मीन है जो मुर्दा पड़ी हुई थी: हमने उसे जीवित किया और उससे अनाज उगा दिए, जिसमें से वे खाते हैं। (33)
और हमने उसमें खजूरों और
अंगूरों के बाग़ लगाए हैं, और उसमें से पानी के सोते (springs) प्रवाहित कर दिए हैं, (34)
ताकि वे उसके फल खा सकें ---
हालाँकि यह सब कुछ उनके हाथों का बनाया हुआ नहीं है --- तो क्या फिर भी वे शुक्र
नहीं अदा करेंगे? (35)
महिमावान है वह जिसने हर चीज़
को जोड़े-जोड़े में (और तरह-तरह का) पैदा किया है--- धरती जो चीजें उगाती है उनमें
से भी, और
स्वयं उन इंसानों में से भी, और उन चीज़ों में से भी जिनको वे अभी नहीं जानते!
(36)
और एक निशानी उनके लिए रात भी
है: हम उस पर से दिन की रौशनी को खींच लेते हैं, फिर क्या देखते हैं कि वे अचानक अँधेरे में रह
गए। (37)
और सूरज भी अपने नियत रास्ते
पर चलता रहता है जिसे सबसे ताक़तवाले और सबसे ज्ञानी (अल्लाह) ने उसके लिए तय किया
है। (38)
और चाँद की भी हमने मंज़िलें [phases] हिसाब करके तय कर रखी हैं, यहाँ तक कि वह (अपनी मंज़िलें तय करता हुआ) फिर
खजूर की पुरानी टहनी की तरह (पतला) हो जाता है। (39)
न सूरज ही से हो सकता है कि
चाँद को जा पकड़े और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है: हर एक अपनी-अपनी कक्षा में तैर
रहे हैं। (40)
और एक निशानी उनके लिए यह
भी है कि हमने आदमी की पूरी एक नस्ल को भरी हुई (नूह की) नौका [Noah’s Ark] में सवार कर (के बचा) लिया था, (41)
और हमने उनके लिए उस
(नौका) की तरह (सवारी करने की) कई चीज़ें बनायीं, जिन पर वे सवारी करते हैं, (42)
और अगर हम चाहें तो उन्हें
पानी में डुबा दें, फिर कोई न होगा जो इनकी मदद कर सके: उन्हें बचाया नहीं जा
सकेगा। (43)
यह तो बस हमारी दयालुता [mercy] है कि हमने उन्हें थोड़े समय के लिए ज़िंदगी के
मज़े उठाने की मुहलत दे रखी है। (44)
इसके बावजूद जब उनसे कहा
जाता है कि “बचकर
रहो (उस यातना से), जो तुम्हारे आगे (आने वाली दुनिया में) भी है और जो
तुम्हारे पीछे (इस दुनिया में) भी है, ताकि तुम पर रहम [दया] किया जा सके”, (45)
मगर वे अपने रब की तरफ से
आयी हुई हर एक निशानी को नज़रअंदाज़ [ignore] कर देते हैं, (46)
और जब उनसे कहा जाता है कि
"अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी तुम्हें दी है उनमें से (दूसरों पर भी) ख़र्च
करो", तो (सच्चाई से) इंकार करने वाले [काफ़िर], ईमानवालों से कहते हैं, "हम उन लोगों को खाना क्यों खिलाएँ जिन्हें
अगर अल्लाह चाहता तो स्वयं ही खिला देता? असल में तुम तो पूरी तरह मार्ग से भटक चुके
हो।" (47)
और वे कहते हैं कि
"अगर तुम्हारी बात सच्ची है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (48)
असल में, वे तो बस एक ज़ोरदार धमाके की प्रतीक्षा में
हैं जो उन्हें (अचानक) आ पकड़ेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे, (49)
फिर न तो उन्हें कोई वसीयत
करने का समय मिल पाएगा और न अपने घरवालों की ओर लौटकर जा सकेंगे। (50)
(जब)
नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा और --– देखोगे कि अचानक ---- वे अपनी क़ब्रों से
निकलकर अपने रब की ओर तेज़ी से चल पड़ेंगे, (51)
(क़यामत
देखकर) कहेंगे, "अफ़सोस हम पर! किसने हमें आराम करने की जगहों से उठा खड़ा
किया है?” (उनसे कहा जाएगा) यह वही चीज़ है जिसका वादा रहम करनेवाले रब
ने किया था, और रसूलों ने सच कहा था।" (52)
बस बड़े ज़ोर का एक ही
धमाका होगा और फिर ---– देखोगे कि अचानक वे सबके-सब हमारे सामने हाज़िर कर दिए गए। (53)
आज के दिन किसी जान पर
रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा, और तुम्हें बदले में कुछ और नहीं, बल्कि वही मिलेगा जो कुछ कर्म तुम किया करते
थे। (54)
सचमुच जन्नतवाले लोग आज
अपने पसंदीदा कामों में मगन होंगे, (55)
वे लोग और उनके
पति-पत्नियाँ घनी छाँव में तख़्तों पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे, (56)
उनके लिए वहाँ (हर तरह का)
फल होगा, और वह सब कुछ मौजूद होगा जिसकी वे माँग करें। (57)
दया करनेवाले रब की तरफ़ से
उन्हें “सलाम” कहा जाएगा। (58)
[काफ़िरों
से कहा जाएगा], "मगर ऐ अपराधियो! आज तुम (नेक लोगों से) अलग हट जाओ! (59)
क्या मैंने तुम्हें यह
आदेश नहीं दिया था, ऐ आदम के बेटो!, कि शैतान की पूजा न करो क्योंकि सचमुच वह
तुम्हारा खुला दुश्मन है, (60)
बल्कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है (61)
उसने तुममें से बहुत बड़ी
संख्या में लोगों को सही मार्ग से भटका दिया। तो क्या तुमने अपनी बुद्धि का
इस्तेमाल नहीं किया? (62)
यह वही जहन्नम है जिसकी
तुम्हें धमकी दी जाती थी। (63)
आज इस (आग) में दाख़िल हो
जाओ, इस कारण से कि तुम (मेरे आदेशों को) मानने से हमेशा इंकार
करते रहे हो।" (64)
और उस दिन हम उनके मुँह को
बंद करके सील कर देंगे, मगर उनके हाथ हमसे बातें करेंगे, और उनके पाँव उन कर्मों की गवाही देंगे, जो कुछ भी उन्होंने किया है। (65)
अगर हम ऐसा चाहते तो (इसी
दुनिया में) उनकी आँखों की रौशनी छीन लेते। वे रास्ते की तलाश में मारे मारे फिरते, मगर वे कैसे देख पाते? (66)
अगर हम ऐसा चाहते तो जहाँ
वे खड़े हैं, वहीं उनके शरीर को बेकार कर देते जिससे न वह आगे बढ़ पाते और
न ही पीछे हट पाते। (67)
अगर हम किसी को लम्बी उम्र
देते हैं, तो उसके (शरीर के) विकास को (कमज़ोर कर) उलट देते हैं। फिर
भी वे बुद्धि से काम नहीं लेते? (68)
हमने उन (रसूल) को शायरी
(का हुनर) नहीं सिखाया और न ही कभी भी वह कवि के रूप में जाने गए हैं। यह क़ुरआन, और कुछ नहीं, बल्कि लोगों को (उनके कर्तव्यों को) याद
दिलाने [remind] के लिए उतारी गई है, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है; (69)
ताकि वह ऐसे आदमियों को
चेतावनी दे सके जो सचमुच ज़िंदा (दिल रखते) हों, और यह कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के
ख़िलाफ़ अल्लाह अपना फ़ैसला सुना सके। (70)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि
हमने अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से उनके लिए चौपाए [मवेशी/livestock] पैदा किए, जिनके अब वे मालिक हैं? (71)
और उन (मवेशियों) को उनके वश
में करके सधा दिया, ताकि
उनमें से कुछ तो उनके लिए सवारियों के काम में आते हैं, कुछ खाने के काम में, (72)
कुछ मवेशियों से दूसरे कई
फ़ायदे हैं, तो कुछ
पीने के काम में आते हैं, तो क्या वे (हमारा) शुक्र नहीं अदा करेंगे? (73)
मगर इसके बावजूद उन्होंने
अल्लाह को छोड़कर दूसरों को अपना ख़ुदा बना रखा है कि शायद उनसे उन्हें कोई मदद मिल
जाए, (74)
हालाँकि वे उनकी कोई मदद नहीं
कर सकते, चाहे
वे अपनी पूरी फ़ौज को ही एक साथ क्यों न बुला लें! (75)
अतः [ऐ रसूल] आप उनकी बातों
से दुखी न हों: हम जानते हैं जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ वे सामने कहते हैं।
(76)
क्या आदमी नहीं जानता कि
हमने उसे वीर्य [sperm] की एक बूंद से पैदा किया? तब भी क्या देखते हैं कि वह खुलकर (क़ुरआन और
क़यामत पर) झगड़े करता है, (77)
हमारे ख़िलाफ़ तर्क-वितर्क
करता है, मगर ख़ुद अपनी पैदाइश को भुला बैठा है। कहता है, "कौन इन हड्डियों में फिर से जान डालेगा, जबकि वे सड़-गल चुकी होंगी?" (78)
कह दें, "उनमें वही फिर से जान डालेगा जिसने उनको पहली
बार पैदा किया था: वह तो पैदा करने के हर एक काम की पूरी पूरी जानकारी रखता है, (79)
वही तो है जिसने तुम्हारे
लिए हरे पेड़ से आग पैदा कर दी --— फिर तुम उससे अपने लिए आग सुलगा लेते
हो।" (80)
जिसने आसमानों और ज़मीन को
पैदा किया है, क्या उसे इसकी ताक़त नहीं कि उन जैसे लोगों को (दोबारा) पैदा
कर सके? बिल्कुल है! वह तो ऐसी रचना करने वाला है जो सब कुछ जानता
है: (81)
उसका मामला तो यह है कि जब
वह किसी चीज़ (के पैदा करने) का इरादा करता है, तो बस इतना कहता है कि ---- "हो
जा!" और वह हो जाती है। 82)
अतः महिमा है उसकी, जिसके हाथ में हर चीज़ का पूरा नियंत्रण [Control] है। और उसी के पास तुम सबको ले जाया जाएगा.” (83)
नोट:
8/9: यह उनकी ज़िद और हठधर्मी का बयान है कि सच्चाई
सामने होने के बावजूद ऐसा लगता है कि वे उसे देख नहीं पाते।
12: लोगों के
सारे बुरे कर्मों को भी लिखा जा रहा है, और उन बुरे कर्मों के जो प्रभाव उनके मरने के
बाद भी बाक़ी रह जाते हैं, वह भी लिखे जा रहे हैं।
40: चाँद और
सूरज अपनी-अपनी कक्षाओं [Orbits] में चलते रहते हैं और वे कभी भी एक-दूसरे की
कक्षा में नहीं घुसते। चाँद हर महीने में एक चक्कर पूरा करता है, जबकि सूरज को एक
चक्कर लगाने में पूरा साल लगता है (जिसके चलते अलग-अलग मौसम बदलते रहते हैं)।
49: फ़ैसले के
दिन जब एक फ़रिश्ता नरसिंघा बजा देगा, तो क़यामत आ जाएगी और नतीजे में सब को मौत आ
जाएगी। फिर जब नरसिंघे में दूसरी बार फूँक मारकर बजाया जाएगा, तो सब मरे हुए
लोग फ़ैसले के लिए ज़िंदा उठ खड़े होंगे। देखें 39:68
65: यही बात
सूरह नूर (24: 24) और सूरह फ़ुस्सिलत (41: 20) में भी कही गई है।
69: मक्का के
लोगों ने शुरू में मुहम्मद (सल्ल) को कवि कहना शुरू किया था और वह जो क़ुरआन सुनाते, उसे वह जादुई शायरी कहते थे।
80: अरब में
दो पेड़ होते थे, एक “मर्ख़ और दूसरा अफ़्फ़ार।" अरब के लोग जब इनकी हरी डालियों को एक-दूसरे
के साथ रगड़ते थे तो आग पैदा हो जाती थी।
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